विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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१०६ : विज्ञानभैरव निर्विकल्पदशाप्राप्तिः । एवमन्तर्मुखतया विमृश्य यत एव क्षोभमयान्मनस उत्थिता तत्रैव शमं नयेत् प्रापयेत्, ततस्तत्रैव लीयते तदा स्वयमेव ब्रह्म सम्पद्यत इत्यर्थः ॥९४॥ अमूर्त चिन्मात्र स्वात्मस्वरूप में भी माया के क्षोभ के कारण ¹पुत्र, धन, यश आदि की मुझे प्राप्ति हो, इस तरह की भाँति-भाँति की इच्छाओं की उत्पत्ति होते देखकर अपनी अन्तर्मुखी वृत्ति से उसको वहीं शीघ्र शान्त कर दे । वास्तव में प्रारंभ और अन्त में भी यह अमूर्त आत्मा चिन्मात्रस्वरूप ही है । बीच में अज्ञानवश इसमें एषणाएँ पैदा हो जाती हैं । चिन्मात्र स्वरूप तो निराकार है, उसमें इच्छाएँ नहीं हो सकतीं । इष्यमाण (इच्छित वस्तु) और एषणा (इच्छा) यह सब अविद्या ही है, इस तरह की दृष्टि का उन्मेष होने पर साधक की सारी इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं । जिस अविद्या से ये इच्छाएँ पैदा होती हैं, वह अविद्या आकाशस्वरूप है, शून्यस्वभाव है, अतः इस शून्य भावना का अभ्यास करने से वे इच्छाएँ अन्ततः आकाश में ही लीन हो जाती हैं और योगी का निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप मात्र बच रहता है । अर्थात् साधक की जब सब वृत्तियाँ अन्तर्मुख हो जाती हैं, तो उसकी सब इच्छाएँ भी, जो कि मन के क्षोभ के कारण उत्पन्न हुई थीं, उसी तरह से मन में ही विलीन हो जाती हैं, जैसे कि प्रक्षुब्ध सागर से उठी लहरें सागर के शान्त हो जाने पर उसी में लीन हो जाती हैं । इन वृत्तियों के लीन हो जाने पर योगी शान्त समुद्र के समान अपने प्रशान्त स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, ब्रह्म बन जाता है । यदि इच्छा शान्त न होती दिखाई दे तो उसके लिये स्पन्दकारिका में प्रदर्शित उपाय का सहारा लेना चाहिये । "एकचिन्ताप्रसक्तस्य" (श्लो० ४१) इत्यादि स्पन्दकारिका के श्लोक में 'उन्मेष' दशा का वर्णन है । उसका अभिप्राय यह है कि मनुष्य जब किसी एक चिन्ता में पड़ा रहता है, तभी उसमें दूसरी चिन्ता का आविर्भाव हो जाता है । जिस क्षण में एक चिन्ता से दूसरी चिन्ता में चित्त प्रविष्ट होता है, वही क्षण 'उन्मेष' कहलाता है । इस उन्मेष क्षण में दोनों चिन्ताओं को विलीन कर देना चाहिये, अर्थात् पहली चिन्ता के विलय क्षण में ही चित्त को स्थिर कर लेना चाहिये । ऐसा करने से आगे की चिन्ता का उत्थान ही नहीं होगा और पहली चिन्ता के विलीन हो जाने से चित्त उस क्षण में वृत्ति-शून्य हो जायगा, "न चित्तं निक्षिपेत्" (श्लो० १०१), "यत्र यत्र मनो याति" (श्लो० १२६) इत्यादि धारणाओं में इसी स्थिति को आलम्बन बनाया गया है । इस उन्मेष क्षण में धारणा को स्थिर कर देने से सारी इच्छाएँ जहाँ से उत्पन्न होती हैं, वहीं विलीन हो जाती हैं, अर्थात् जिस उन्मेष स्वरूप स्पन्द तत्त्व से ये इच्छाएँ पैदा होती हैं, उसी में ये विलीन भी हो जाती हैं । इस उन्मेष दशा का वर्णन करने वाला स्पन्दकारिका का यह महत्त्वपूर्ण श्लोक पहले ही उद्धृत कर दिया गया है ॥९४॥
- पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा के भेद से एषणा (इच्छा) के तीन भेद माने गये हैं । इन तीनों एषणाओं से मुक्त व्यक्ति ही वास्तविक ब्राह्मण है, ऐसा उपनिषदों में प्रति- पादित है (बृह० उ० ३।५।१) । मनुस्मृति (२।१६२) में भी ब्राह्मण के लिये संमान से दूर रहने का विधान है ।
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विज्ञानभैरव : १०७ [ धारणा-७२ ] यदा ममेच्छा नोत्पन्ना ज्ञानं वा कस्तदाऽस्मि वै । तत्त्वतोऽहं तथाभूतस्तन्लीनस्तन्मना भवेत् ॥९५॥ यदा मम इच्छा न उत्पन्ना, ज्ञानं वा न उत्पन्नम्। ज्ञानमिति क्रियाया उप- लक्षणम् । क्रिया च नोत्पन्ना। तदा कोऽस्मि ? इच्छाज्ञानक्रियाणामनाविर्भावेऽहमेव नास्मि, किन्तु चिदानन्दरूप एवास्तीत्यर्थः। तदेवाह—तत्त्वतो वस्तुतः, तथाभूतश्चिदा- नन्दात्मक एवाहम् इति भावनयाऽनया तस्मिन् चिदानन्दस्वरूपे लीनस्तन्मना भवेत् तन्मयश्चिदानन्दमयो भवेत् ॥९५॥ इस श्लोक में ज्ञान पद क्रिया का भी बोध कराता है, अतः इसका अर्थ यह होगा कि जब मेरे अन्दर इच्छा, ज्ञान और क्रिया में से किसी की भी उत्पत्ति नहीं होगी, तो उस स्थिति में मेरा स्वरूप क्या होगा ? अर्थात् इनके अभाव में अहन्ता, ममता, इदन्ता की कोई भी स्थिति नहीं बन सकती, किन्तु उस अवस्था में तो चित् और आनन्द स्वरूप की ही स्थिति रहती है। इसलिये साधक को सदा इसी स्थिति की भावना करनी चाहिये कि वास्तव में मैं चित् और आनन्द स्वरूप ही हूँ। इस धारणा के अभ्यास से योगी उस चिदानन्द स्वरूप में ही लीन हो जाता है और अनन्तः स्वयं उसका चिदानन्दमय स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है। स्पन्दकारिका में इस स्थिति को इस प्रकार स्पष्ट किया है— गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥ अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः । पातयन्ति दुरुत्तारे घोरे संसारवर्त्मनि ॥ अतः ^1सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये । जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥ (१९-२१ श्लो०) अर्थात् सत्त्व, रज, तम आदि गुण तथा महत्, अहङ्कार, तन्मात्रा, इन्द्रिय, पंच महा- भूत आदि सभी पदार्थ और इनके कारण प्रादुर्भूत होने वाली सुख, दुःख, मोह आदि की लहरें —ये सब अनन्त विशेषताओं को अपने में समेटे हुए स्पन्द तत्त्व से ही उठती हैं, इस बात को जानने वाले योगी के मार्ग में ये सब वस्तुएँ रुकावट नहीं डाल पातीं, उसके स्वरूप को नहीं ढक पातीं। इसके विपरीत ^2अप्रबुद्ध मनुष्य के स्वात्मस्वरूप को ढक कर ये वृत्तियाँ उसको घोर दुस्तर संसार-समुद्र में गिरा देती हैं। इसलिये जो व्यक्ति इस स्थिति को समझ
- स्पन्द तत्त्व के स्वरूप को समझने के लिये निरन्तर प्रयत्नरत रहने की बात यहाँ बताई गई है। इसीलिये "उद्यमो भैरवः" (१।५) इस शिवसूत्र में उद्यम को भैरव का ही स्वरूप माना गया है। योगवासिष्ठ में अनेक स्थलों पर पुरुषार्थ की बड़ी महिमा गाई गई है।
- अप्रबुद्ध आदि शब्दों के अर्थ के लिये १२८वें श्लोक की व्याख्या के अवसर पर की गई टिप्पणी देखनी चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१०८ : विज्ञानभैरव कर स्पन्द तत्त्व के स्वरूप को जानने के लिये निरन्तर क्रियाशील रहता है, उद्योग करता रहता है, वह जाग्रदवस्था में ही अपने निज स्वभाव को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाता है । प्रस्तुत धारणा के अभ्यास से भी योगी इसी स्थिति को प्राप्त करता है ॥९५॥ [ धारणा -७३ ] ^१इच्छायामथवा ज्ञाने जाते चित्तं निवेशयेत् । ^२आत्मबुद्ध्याऽनन्यचेतास्ततस्तत्त्वार्थदर्शनम् ॥९६॥ अत्रापि ज्ञानं क्रियाया उपलक्षणम् । इच्छायां जातमात्रायाम्, ज्ञाने वा जाते सति, क्रियायां वा समुत्पन्नायाम् अनन्यचेताः विषयसंकल्पं विहाय आत्मबुद्ध्या आत्मैवैतदिति बुद्ध्या चित्तं निवेशयेत् निक्षिपेत् । ततस्तत्त्वार्थदर्शनं तयैव भावनया परमार्थज्ञानं भवेत् । सर्वस्मिन् स्वात्मरूपदृढभावनयाऽनन्यचेतसस्तत्त्वार्थदर्शनं स्यादेवेति भावः ॥९६॥ इस श्लोक में भी ज्ञान पद क्रिया का भी बोध कराता है । इच्छा, ज्ञान अथवा किसी क्रिया के उत्पन्न होने के साथ ही अपने चित्त को उसी में स्थिर करके अन्य सभी प्रकार के विषयों के संकल्प का परित्याग कर दे, 'यह सब कुछ आत्मा ही है' इस प्रकार की दृढ़ भावना से इच्छा, ज्ञान अथवा क्रिया में ही अपने चित्त को स्थिर कर अन्य सभी बाह्य विषयों से अपने चित्त को हटा ले । “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (छा० ३।१४।१), “अयमात्मा ब्रह्म” (बृ० २।५।१९) इन श्रुतिवचनों के अनुसार सभी सांसारिक वस्तुओं में जब योगी का चित्त स्वात्मस्वरूप को ही देखने लगता है, तो इस भावना के दृढ़ होने पर परमार्थ तत्त्व का ज्ञान हो जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि जब योगी सभी पदार्थों को अपना ही रूप मानकर एकाग्र चित्त से उनमें अपनी धारणा को स्थिर कर देता है, तो उसको परमार्थ तत्त्व का परिज्ञान हो जाता है । इस श्लोक में सालम्बन अर्थात् साकार भावना का विधान है । नेत्रतन्त्र (८।४१-४४) में ^२अनुत्तर योग का विवेचन करते समय अनेक प्रकार की धारणाओं का निषेध किया गया है । क्षेमराज ने इसकी व्याख्या करते हुए सालम्बन भावना के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत किया है ॥९६॥ [ धारणा-७४ ] ^३निर्निमित्तं^४ भवेज्ज्ञानं ^३निराधारं प्रमात्मकम् । तत्त्वतः कस्यचिन्नैतदेवंभावी शिवः प्रिये ॥९७॥ १. तत्र-ने० । २. °तः स्यादात्म°-ने० । ३. निराधारं-त० । ४. निर्निमित्तं-त० ।
- नेत्रतन्त्र की उद्योत टीका (भा० १, पृ० २०१) में यह श्लोक मिलता है ।
- जैसा कि पृ० ९९ की २ टिप्पणी में बताया गया है, अनुत्तर योग का बौद्ध तान्त्रिक ग्रन्थों में विशेष वर्णन मिलता है । नेत्रतन्त्र में वर्णित पर योग अनुत्तर योग ही है, क्योंकि यह स्थूल और सूक्ष्म योग की अपेक्षा उत्कृष्ट है ।
- तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह उपलब्ध है ।
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विज्ञानभैरव : १०९ हे प्रिये, यदिदं घटादिज्ञानं तद् निराधारं निराश्रयम्, तत्त्वतः स्थिरस्य कस्य- चिदात्मनो घटादेराधारस्य वाऽवास्तवत्वात्। अत एव निर्निमित्तं निर्हेतुकम्, तत्त्वतश्चक्षुरालोकादिनिमित्तस्याप्यवास्तवत्वात्। भ्रमात्मकं मायावशोत्थितम्, विकल्पात्मकत्वात्, तत्त्वतो ज्ञानव्यतिरिक्तस्यान्यस्याभावात्। स एवायं घट इति संवेदनं तु सोऽयं गङ्गाया प्रवाह इतिवद् भ्रान्तिरेवेति भावः। अस्ति हि सर्वं चिन्मात्रम्, चिद्व्यतिरिक्तस्यान्यस्याभादित्येवं भावनादार्ढ्यात् शिव एव स्यादिति ॥९७॥ हे प्रिये, यह जो घट आदि का ज्ञान है, उसका कोई आधार नहीं है, क्योंकि वस्तुतः किसी स्थिर आत्मा अथवा घट आदि वस्तुओं की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। इसी लिये यह निर्हेतुक भी है, क्योंकि चक्षु, आलोक (प्रकाश) आदि पदार्थों की भी वास्तविक सत्ता नहीं है। इसी लिये यह सब कुछ भ्रमात्मक है, माया के कारण उत्पन्न है। अत एव विकल्प- स्वरूप है, क्योंकि ज्ञान के अतिरिक्त अन्य सभी वस्तुओं का अभाव है। 'यह वही घट है' इस तरह का ज्ञान 'यह वही गंगा का प्रवाह है' इस ज्ञान की तरह भ्रमात्मक ही माना जायगा। अर्थात् गंगा के प्रवाह में जैसे 'यह वही प्रवाह है' यह प्रत्यभिज्ञा भ्रान्ति-जन्य है, उसी तरह से घट, पट, देवदत्त आदि की प्रत्यभिज्ञा को भी भ्रमात्मक ही मानना चाहिये। इस तरह से अन्ततः सब कुछ चिन्मात्र, विज्ञानात्मक ही सिद्ध होता है। इस चिदात्मक विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी की भी सत्ता नहीं है, इस तरह की भावना का दृढ़ता से अभ्यास करने से साधक शिव हो जाता है। तन्त्रालोक (५।७१) में यह स्थिति 'सर्वात्म-संकोच' के नाम से वर्णित है और टीकाकार ने इस स्थिति के उदाहरण के रूप में इसी श्लोक को प्रस्तुत किया है ॥९७॥ [ धारणा-७५ ] ^1चिद्धर्मा सर्वदेहेषु विशेषो नास्ति कुत्रचित्। अतश्चयं तन्म सर्वं भावयन् भवजिज्जनः ॥९८॥ चिद् ज्ञानं क्रिया वा धर्मो गुणो यस्य स चिद्धर्मा चेतनः, सर्वदेहेषु हस्तिपिपी- लिकादिशरीरेषु सामान्यतया वर्तते, कीटादिसदाशिवान्तं नास्ति कुत्रचित् कश्चिद् विशेषः। अतश्च चैतन्यस्य साधारणत्वात् तन्मयं चिन्मयं सर्वं भावयन् निर्विशेषं ब्रह्म सर्वत्रास्तीति बोधमेवं धारयन् जनो भवजित् दुस्तरसंसारोत्तीर्णो भवति। 'चिद्धर्माः' इति पाठे देवासुरनरतिर्यगादिमूर्तिषु चिद्धर्माः सामान्येन सन्तीति न तत्र विशेषोऽस्ति कुत्रचित्। देहादेरेव विशेषोऽस्ति न तु चितेरिति भावयतः सर्वत्र चिदेव जृम्भतेऽनुभव- दाढ्यादित्यर्थः ॥९८॥ चित् अर्थात् ज्ञान अथवा क्रिया जिसका धर्म है, वह चेतन प्राणी चिद्धर्मा कहलाता है। यहाँ “धर्मादनिच् केवलात्” (५।४।१२४) इस पाणिनि सूत्र से अनिच् प्रत्यय होता है। १. °र्माः-ख०।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३) पर यह श्लोक मिलता है।
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११० : विज्ञानभैरव हाथी और चींटी आदि छोटे-बड़े सभी प्राणियों के शरीरों में, अर्थात् कीट से लेकर सदाशिव पर्यन्त सभी प्राणियों में चैतन्य की दृष्टि से कोई विशेष भेद नहीं है। अतः यह सब चिन्मय ही है, क्योंकि चैतन्य इन सब का साधारण धर्म है। इस तरह से सभी प्राणियों में चिन्मय निर्विशेष ब्रह्म विद्यमान है, इस भावना का दृढ़तापूर्वक अभ्यास करने वाला साधक इस संसार को जीत लेता है, इस दुस्तर संसार-सागर को पार कर लेता है। 'चिद्धर्माः' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि देव, असुर, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर, जंगम आदि सभी मूर्तियों में चिति (चैतन्य) समान रूप से विद्यमान है, चैतन्य की दृष्टि से इनमें परस्पर कोई विशेषता नहीं है। विशेषता केवल शरीरों की है, चिति की नहीं। इस तरह से चैतन्य- सामान्य सर्वत्र स्फुरित हो रहा है, इस अनुभव को दृढ़ता से अपनी भावना का आधार बनाने वाला योगी दुस्तर संसार-सागर को पार कर लेता है, उसको सर्वत्र चिन्मात्रस्वरूप ब्रह्म की प्रतीति होने लगती है। "चैतन्यमात्मा" (१।१) इस शिव-सूत्र की व्याख्या करते हुए क्षेम- राज ने इस श्लोक को प्रस्तुत किया है ॥९८॥ [ धारणा-७६ ] ¹कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यगोचरे । बुद्धिं निस्तिमितां कृत्वा तत्तत्त्वमवशिष्यते ॥९९॥ कामक्रोधादिषु मात्सर्यपर्यन्तेषु अरिषड्वर्गेषु बुद्धिं स्वसंविदं निस्तिमितामेकाग्रां विकारानधिगमान्निष्पन्दां कृत्वा विधाय तत् तत्त्वं चिन्मात्रस्वरूपमवशिष्यते । कामादिविषये चित्ते एकाग्र्यप्रकर्षादपहारितबाह्यविषयाश्लेषं चिदानन्दमयमेवावि- र्भवतीत्यभिप्रायः ॥९९॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य ये छः चित्तगत दोष शास्त्रों में अरिषड्वर्ग के नाम से प्रसिद्ध हैं । इन चित्त-वृत्तियों में से किसी एक उत्कट चित्त-वृत्ति में धारणा को स्थिर कर देने पर अन्य समस्त वृत्तियां शान्त हो जातो हैं। इसी स्थिति में योगी को निरन्तर स्पन्दनशील स्वात्मस्वरूप के विवेक में लग जाना चाहिये, जिससे कि उसकी वृत्ति पुनः बहिर्मुख न हो। ऐसा करने से उसकी बुद्धि एकाग्र हो जाती है, बाह्य विषयों का संपर्क छूट जाने से निश्चल (स्थिर) और विकारशून्य हो जाती है। इस प्रकार की वृत्ति-क्षय दशा को जगा कर योगी अपनी उत्कट काम, क्रोध आदि वृत्तियों को उसी तरह से शान्त कर लेता है, जैसे कि कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है। भगवद्गीता (२।५८) में स्थितप्रज्ञ का लक्षण बताते समय इसी स्थिति की ओर इंगित किया गया है। इस स्थिति में योगी का केवल चित् स्वरूप बच रहता है । अर्थात् काम, क्रोध आदि विषयों में चित्त की एकाग्रता के बढ़ जाने पर जब अन्य बाह्य विषयों से उसकी बुद्धि का संपर्क छूट जाता है, तब साधक का चिदानन्दमय बोधस्वरूप अभिव्यक्त हो उठता है। स्पन्दकारिका के—
- स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०) पर यह श्लोक उद्धृत है ।
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विज्ञानभैरव : १११ अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वामृशन् । धावन् वा यत्पदं गच्छेत् तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ (श्लो० २२) इस श्लोक में भी इस स्थिति का वर्णन मिलता है, जिसकी कि व्याख्या पहले ही की जा चुकी है। स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०-४१) में क्षेमराज का कहना है कि प्रस्तुत धारणा की ही तरह “आनन्दे महति प्राप्ते” (श्लो० ७०) और “क्षुताद्यन्ते” (श्लो० ११६) इन दोनों स्थलों में भी इस स्पन्द तत्त्व में प्रतिष्ठित होने की ही विधि बताई गई है ॥९९॥ [ धारणा-७७ ] 1इन्द्रजालमयं विश्वं न्यस्तं वा चित्रकर्मवत् । भ्रमद्वा१ ध्यायतः सर्वं पश्यतश्च सुखोद्गमः ॥१००॥ विश्वं ग्राह्यग्राहकात्मकमिदं सर्वं जगद् ज्ञानानुभवयुक्त्या निश्चितया बुद्ध्या इन्द्रजालनिभं मायानिर्मितम्, पटादिषु चित्रकर्मवत् न्यस्तं कल्पितम्, नावारूढस्य भ्रमद् गच्छत्तरुपर्वतादिवद् भ्रान्तिकल्पितं वा ध्यायतः पश्यतश्च सुखोद्गमः अक्षयसुखाविर्भावो भवति । ‘भ्रमतः’ इति पाठे भ्रमन्नपि ध्यायन्नपि पश्यन्नपीति योज्यम् ॥१००॥ यह सारा विश्व यद्यपि ग्राह्य और ग्राहक के रूप में दिखाई पड़ता है, किन्तु अनुभव और तर्क के द्वारा परिष्कृत बुद्धि से जब इसके स्वरूप पर विचार किया जाता है तो ये सब इन्द्रजाल (जादू के खेल) की तरह माया से निर्मित; कपड़े, कागज आदि पर बनाये चित्र के समान कल्पित; अथवा नाव आदि सवारी पर चढ़ कर चलने पर जैसे वृक्ष-पर्वत आदि चलते हुए से नजर आते हैं, उसी तरह से भ्रमपूर्ण, कल्पना से प्रसूत (उत्पन्न) मालूम पड़ते हैं। इस सही स्थिति का ज्ञान हो जाने पर और उसी में अपने ध्यान को केन्द्रित कर देने पर योगी के चित्त में अक्षय सुख का आविर्भाव हो जाता है। ‘भ्रमतः’ यह पाठ मानने पर इसका अर्थ होगा कि साधक जब अपने स्पन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो वह भ्रमण करे, ध्यान करे अथवा देखे, उनमें अक्षय सुख की स्थिति सदा बनी रहती है। “शाक्ते क्षोभे” (५।७१) इत्यादि तन्त्रालोक के श्लोक की व्याख्या करते हुए जयरथ ने इस श्लोक को भी उद्धृत किया है ॥१००॥ [ धारणा-७८ ] न चित्तं निक्षिपेद् दुःखे न सुखे वा परिक्षिपेत् । भैरवि २ज्ञायतां मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यते ॥१०१॥ हे भैरवि, सुखदुःखयोर्विषये चित्तस्थापनं न विधेयम्—अहं सुखी, अहं दुःखीति । शुद्धे स्वात्मनि अन्तःकरणधर्मान् सुखदुःखादीनध्यस्य न स्थेयमिति भावः । १. भ्रमतः-ख०, भ्रमाद्वा-त० । २. ध्या°-ख० ।
- तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३८०) में इसको देखा जा सकता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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११२ : विज्ञानभैरव किन्तु ज्ञायतां त्वया स्वयमेव विचारय त्वम्, मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यत इति । सुखदुःख- योर्मध्ये यत् तत्त्वं तत्साक्षिभूतं तदनुसन्धातृ एकं चित्तत्त्वम्, एकाग्र्येण तदेव विमृश इति तात्पर्यम् । 'ध्यायताम्' इति पाठे हे भैरवि, चित्तैकाग्र्यं विधाय किं तत्त्वमवशिष्यत इति ध्यायतां तन्मध्ये ध्यानमध्ये भैरवोदयः स्यादित्यर्थः ॥१०१॥ हे भैरवि, अपने चित्त को न तो सुख के विषय में ही स्थापित करे और न दुःख के विषय में ही कि मैं सुखी हूँ या दुःखी हूँ। शुद्ध स्वात्मा में अन्तःकरण के धर्म सुख-दुःख आदि की कल्पना करनी चाहिये, किन्तु योगी को यह स्वयं विचार करना चाहिये कि इन दोनों के बीच में कौन सा तत्त्व बच रहता है ? सुख और दुःख के बीच में जो तत्त्व है, वही साक्षीभूत, सुख-दुःख का अनुसन्धाता, एक चित् तत्त्व है। एकाग्र भाव से योगी को उसी चित् तत्त्व पर अपने चिन्तन को केन्द्रित कर देना चाहिये। 'ध्यायताम्' ऐसा पाठ मानने पर इसका अर्थ यह होगा कि हे भैरवि, चित्त को एकाग्र करने पर सुख और दुःख के बीच में जो तत्त्व बच रहता है, उसमें अपने ध्यान को केन्द्रित कर देने वाले योगियों को उसी ध्यान में भैरव स्वरूप की अभिव्यक्ति हो जाती है ॥१०१॥ [ धारणा-७९ ] विहाय निजदेहास्थां सर्वत्राऽस्मीति भावयन् २ । दृढेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥१०२॥ निजदेहे आस्थां स्वदेहे प्रमातृतां न देहोऽहमित्यादिना विहाय, सर्वत्रास्मीति सर्वमिदमहमेवेति सदाशिवेश्वरादिवन्न तु 'चिद्धर्मा' (श्लो० ९८) इत्युक्तचिन्मात्रात्म- शिववत्, दृढेन निःसंशयेन, मनसा चित्तेन, तथा दृष्ट्या स्वसंविदा नान्येक्षिण्या प्रोक्त- वस्तुविमर्शैकाग्रया भावयन् सुखी भवेत् ॥१०२॥ अपने शरीर में आस्था, प्रमातृभाव को छोड़कर, अर्थात् मैं केवल इस देह में ही नहीं हूँ, किन्तु सदाशिव अथवा ईश्वर की तरह सर्वत्र मैं ही हूँ, सब कुछ मैं ही हूँ, इस भावना का अभ्यास करे। संशय रहित चित्त से तथा अपनी संवित्ति के बल पर, जो कि उक्त स्वरूप के विमर्श (विचार) में स्थिर है, अन्य किसी वस्तु का चिन्तन नहीं करती, इस भावना के विकास में लगा योगी सुखी हो जाता है। 'चिद्धर्मा' इत्यादि कारिका में सभी शरीरों में चिति की भावना का उपदेश दिया गया है। उसके विपरीत यहाँ अपने देह के अभिमान को छोड़कर सभी शरीरों में अपनी प्रमातृता, अपनी सत्ता के विकास की भावना का विधान है। इन दोनों धारणाओं का यह स्पष्ट अन्तर है। प्रस्तुत श्लोक में यह स्पष्ट किया गया है कि शिव और शक्ति का अपनी आत्मा के साथ सामरस्य संपादन करने वाले योगी के चित्त में समस्त विश्व के साथ अहंभाव की अभिव्यक्ति होती है, अर्थात् वह अपने को विश्वस्वरूप समझने लगता है। विश्वाहन्ता के १. ॰मस्मी-ख० । २. ॰येत्-ख० ।
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विज्ञानभैरव : ११३ विकास की यह प्रक्रिया विरूपाक्षपञ्चाशिका जैसे शास्त्रों में भी वर्णित है। तत्त्वमंजरीकार इस तरह के अहम्भाव को भी स्वीकार नहीं करते । वे बौद्ध मत का अनुमोदन करने में रस लेते हुए से कहते हैं— यतस्ततो वाऽस्तु भयं यद्यहं नाम किञ्चन । अहमेव न किञ्चिच्चेद् भयं कस्योपजायते ॥ अर्थात् यदि मैं कुछ होऊँ, तब मुझे इधर-उधर, जहाँ-तहाँ से भय हो सकता है । यदि मैं ही कुछ नहीं हूं, तो फिर भय किसको पैदा होगा । इसविचार से बौद्ध विद्वान् सहमत हैं, जब कि वे कहते हैं— सत्यात्मनि परसंज्ञा स्वपरविभागे च रागविद्वेषौ । अनयोः संप्रतिबद्धा सर्वे दोषाः प्रजायन्ते ।। (प्र० वा० १।२२१-२२२) अर्थात् अपनी आत्मा के रहने पर दूसरी आत्मा की बात उठती है । यह अपना है, यह पराया है, ऐसी कल्पना हो जाने पर अपने से राग और दूसरे से द्वेष उत्पन्न होने लगता है । समस्त प्राणियों में इस राग और द्वेष से जुड़े हुए ही अन्य समस्त छोटे-छोटे दोष उत्पन्न होते हैं । इसके विपरीत विमर्शदीपिका में इस अहम्भाव की एक अलग व्याख्या की गई है । जैसे कि— विश्वात्म विश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् । अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेतिः कः ॥ अर्थात् विश्वात्मक होते हुए भी विश्वोत्तीर्ण, स्वतन्त्र, दिव्य, अक्षर तत्त्व ही 'अहम्' नाम से कहा जाता है। इस प्रकार के 'अहम्' तत्त्व में धारणा स्थिर हो जाने पर भय किसको छू सकता है ? किसी आचार्य ने ठीक ही कहा है— एककोऽहमिति संसृतौ जनस्त्राससाहसरसेन खिद्यते । एककोऽहमिति कोऽपरोऽस्ति मे इत्थमस्मि गतभीर्व्यवस्थितः ॥ अर्थात् इस संसार में जब मनुष्य यह सोचता है कि मैं अकेला हूँ, मेरा कोई सहायक नहीं है, तब वह भयभीत रहता है । किन्तु जब वह यह सोचता है कि मैं अकेला ही तो इस संसार में हूँ, यह सब कुछ मुझ से अलग छोड़े ही है, तब वह निर्भय होकर रहता है । इस प्रकार आगमशास्त्र में अहम्भाव को भगवत्स्वरूप ही माना गया है । अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ के द्वारा प्रतिपादित अहम्भाव की व्याख्या पहले (श्लो० ८८) की जा चुकी है । इस प्रकार यह अहम्भाव उपादेय है, त्याज्य नहीं । परिमित अहन्ता का, अहंकार का तो त्याग होना ही चाहिये । जैसा कि तपस्वीराज ने कहा है— सुविषमममतादंष्ट्राविदलितजनधैर्यशोणितपिपासुः । अहमिति पिशाच एष त्वत्स्मृतिमात्रेण किङ्करीभवति ।।
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११४ : विज्ञानभैरव अर्थात् अहंकार की ममता रूपी बड़ी तीखी दाढ़ें होती हैं। इनकी पकड़ में आने पर मनुष्य का धैर्य छूट जाता है । तब यह अहंकार रूपी पिशाच उस मनुष्य का रक्त चूसने लगता है, अर्थात् उसकी सद्बुद्धि पर आवरण डाल देता है। किन्तु मनुष्य जब भगवान् की शरण में पहुँच जाता है, तो यही पिशाच उसका सेवक बन जाता है। भगवान् ने भगवद्गीता¹ के सोलहवें अध्याय में आसुरी सम्पत्ति के रूप में इस अहंकार रूपी पिशाच का बड़ा हृदयहारी वर्णन किया है ॥१०२॥ [ धारणा-८० ] घटादौ यच्च विज्ञानमिच्छाद्यं वा ममान्तरे । नैव सर्वगतं जातं भावयन्निति सर्वगः ॥१०३॥ सर्वगतं सदा सर्वत्र सर्वास्ववस्थासु परिदृश्यमानं यद् घटादौ विज्ञानं घटोऽय- मित्यादिनाऽनुभूयमानम्, यच्च ममान्तरे इच्छादिकम् एवं करोमीत्यादिना प्रतीयमानम्, तत्सर्वं जातमपि किमपि न भवति, निःसारत्वादिति भावयन् सर्वगः सर्वत्र प्रकाशस्वरूपः, स्यादिति शेषः । अथवा घटादौ विषये यदस्मदादेर्विषयिणो ज्ञानमिच्छाद्यं वा यदस्ति तन्ममै- वान्तरे हृदयमध्ये नैव, किन्तु सर्वगतं जातं तद्भवतीत्यन्वयः । एवकारो भिन्नक्रमः, स तु 'मम' इत्यनन्तरं बोद्धव्यः । सर्वेषां घटादीनामप्यस्मदादिविषयं ज्ञानमिच्छाद्यं वाऽस्ति । तेन किं जातम् ? घटादयोऽपि जानन्त्यस्मदादिज्ञानेन, तथा सदाशिवादिरपि क्रिमिपर्यन्तं मदात्मना जानाति इच्छति वा, क्रिमिरप्यस्मदादिप्रभृति सदाशिवान्तं जानाति इच्छति चेति ज्ञानक्रियात्मकं सर्वं सर्वात्मकमिति भावयन् धारणां कुर्वन् सर्वगतो भवेत् ॥१०३॥ सदा, सर्वत्र, सभी अवस्थाओं में दिखाई पड़ने वाला 'यह घट है' इस प्रकार का बाह्य घट प्रभृति पदार्थों का अनुभव और मेरे भीतर प्रतीत हो रहे, 'मैं ऐसा करता हूँ' इस प्रकार के इच्छा प्रभृति भाव, वे सब निःसार होने से पैदा होते हुए भी कुछ नहीं है। अतः उनकी शून्य रूप में भावना करने पर योगी सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, सभी स्थितियों में प्रकाश- स्वरूप हो जाता है। अथवा इस श्लोक की दूसरी व्याख्या इस तरह से की जा सकती है—घट आदि विषय में भी अस्मदादि विषयी का भान अथवा इच्छा प्रभृति भावों का उदय होता है, अर्थात् वह केवल मेरे हृदय में ही नहीं होते, किन्तु उनकी प्रतीति तो सर्वत्र घट-पट आदि में भी होती है । यहाँ 'नैव' के साथ जुड़े हुए एवकार को 'मम' के साथ जोड़ना चाहिये । तब श्लोक का अन्वय इस तरह से होगा—ममैव अन्तरे न, (किन्तु) सर्वगतं जातम् । तदनुसार ही यह
- भगवद्गीता में इस आसुरी सम्पत्ति का वर्णन 'आसुरं पार्थ मे शृणु' इस छठे श्लोक से लेकर 'आसुरीं योनिमापन्नाः' इस बीसवें श्लोक तक विस्तार से किया गया है ।
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विज्ञानभैरव : ११५ दूसरा अर्थ किया गया है । घट-पट आदि सभी पदार्थों में अस्मदादि विषयक ज्ञान अथवा इच्छा प्रभृति भाव विद्यमान हैं, यह कह कर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? इससे हम यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हमारे ज्ञान के घट आदि में संक्रान्त हो जाने से वे भी ज्ञानवान् हो जाते हैं । सदाशिव प्रभृति जैसे क्रिमि-कीट पर्यन्त सभी पदार्थों को अपने से अभिन्न मानते हैं और उनको चाहते हैं, उसी तरह क्रिमि-कीट भी अस्मदादि से लेकर सदाशिव पर्यन्त सभी को जानते हैं और उनको चाहते हैं । ज्ञान और क्रिया की इस समानता के आधार पर जगत् के सभी पदार्थ सर्वात्मक हैं । इस तरह की धारणा का अभ्यास करने वाला योगी सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । यही विषय सोमानन्द की शिवदृष्टि में भी प्रतिपादित है— घटो मदात्मना वेत्ति वेद्म्यहं च घटात्मना ॥ सदाशिवात्मना वेत्सि स वा वेत्ति मदात्मना । नानाभावैः स्वमात्मानं जानन्नास्ते स्वयं शिवः ॥ (५।१०५-१०६, १०९) सभी भावों की सर्वात्मकता का प्रतिपादन शिवदृष्टि के प्रथम और पंचम आह्निक के अन्त में विस्तार से किया गया है । यह वहीं अवलोकनीय है ।।१०३।। [ धारणा-८१ ] १ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं१ संबन्धे सावधानता ।।१०४।। सर्वदेहिनां सदाशिवादिकीटान्तानाम् इदं ग्राह्यम् अयं ग्राहक इत्यादिना यो व्यवहारः स सामान्य एव । यदेको जानाति तदपरोऽपि जानातीति नात्र कश्चन विशेष इति भावः । परन्तु योगिनामयमेव विशेषः—सम्बन्धे ग्राह्यग्राहकस्वरूपावधारणे सावधानता ग्रहीतृरूपाविस्मरणम् ।।१०४।। सदाशिव से लेकर कीट पर्यन्त सभी प्राणियों में यह वस्तु ग्राह्य है और यह प्रमाता उसका ग्राहक है, इस तरह का व्यवहार समान रूप से विद्यमान है । इनके संवेदन (ज्ञान) में परस्पर कोई विशेषता या विलक्षणता नहीं है, क्योंकि किसी वस्तु को एक प्रमाता जिस तरह से देखता है, दूसरा प्रमाता भी उसी तरह से देखता है । यह तो योगियों की ही विशेषता है कि वे सम्बन्ध के प्रति अधिक सावधान रहते हैं, अर्थात् ग्राह्य और ग्राहक के स्वरूप का अवधारण करते समय उनको अपने चित् स्वरूप की कभी विस्मृति नहीं होती और वे इस १. ॰षोऽस्ति-क० ।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १८, ६८), महा० परि० (पृ० १५४), तन्त्रा० वि० (भा० ७, आ० १०, पृ० १४०), ई० प्र० वि० वि० (भा० १, पृ० ७७; भा० २, पृ० ४०५), प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ३८) में यह श्लोक उद्धृत है । नेत्रतन्त्र० (भा० २, पृ० ३७), ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ५०; भा० ३, पृ० ३०, ५२) में केवल चतुर्थ चरण उद्धृत है ।
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११६ : विज्ञानभैरव बात में सदा सावधान रहते हैं कि मैं स्मर्ता हूँ, सदा प्रकाशस्वरूप हूँ तथा मुझसे भिन्न सब कुछ वेद्य (ज्ञेय) है, अनित्य है, अत एव असत् कहलाता है। यह सत् और असत् वस्तु का विवेक कभी योगी से अलग नहीं होता। यह श्लोक, विशेष कर इसका चतुर्थ चरण अनेक ग्रन्थों में उद्धृत है। इससे इस श्लोक की महत्ता सिद्ध होती है। यह सावधानी लौकिक कार्यों को पूरा करने के लिए भी जब अत्यन्त आवश्यक है, तब योगी के लिए तो इसकी उपयोगिता के विषय में कहना ही क्या ! कहा जा सकता है कि किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए सावधानी पहली शर्त है ॥१०४॥ [ धारणा-८२ ] स्ववदन्यशरीरेऽपि संवित्तिमनुभावयेत् । अपेक्षां स्वशरीरस्य त्यक्त्वा व्यापी दिनैर्भवेत् ॥१०५॥ स्ववत् स्वीयदेहवत्, अन्यशरीरेऽपि स्वावयवभूते सर्वदेहसमूहे संवित्तिं चेतनां स्वकीयामहन्ताम्^२ अनुभावयेत् । कथम् ? स्वशरीरस्य अपेक्षां त्यक्त्वा चिन्मात्ररूपस्य मम सर्वत्र तुल्यस्थितित्वेन निखिलं जगन्ममैव वपुः, न तु एकदेशावयवतुल्योऽयं देहवराकः, एतस्मिन् देहावयवे नष्टेऽप्यन्ये सर्वे देहा मम सन्त्येवेति किमनेन ? इत्थं ममताविषयोकृतां स्वशरीरापेक्षां त्यक्त्वा कतिपयैर्द्दिनैरेव सर्वव्यापको भवेत् ॥१०५॥ किसी ज्ञान के लिये अपने शरीर की भी आवश्यकता रहती है, इस बात का विचार किये बिना अपने बाह्य देह की तरह दूसरे व्यक्ति के बाह्य देह में भी एक ही तरह की संवित्ति अनुगत रूप से प्रवाहित हो रही है, ऐसी भावना करे। अपने शरीर में अविनाभाव सम्बन्ध से विद्यमान संवित् का रूप दूसरे के बाह्य शरीर में भी अनुगत है, इस तरह के विचार को निरन्तर अभ्यास के द्वारा दृढ़ करे। इस भावना का अभ्यास करने से "तद्बुद्धय- स्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः" (५।१७) इत्यादि भगवद्गीता के वचन के अनुसार विदेह कैवल्य की सिद्धि हो जाती है। साथ ही "विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि" (५।१८) इस गीता वाक्य में उपदिष्ट पद्धति से सर्वत्र ब्रह्म का दर्शन करने से महाविदेह कैवल्य की भी प्राप्ति होती है। ^३विदेह कैवल्य और महाविदेह कैवल्य की सिद्धि हो जाने पर योगी में
- ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ३११) में इस श्लोक का प्रथम और तृतीय चरण तथा वहीं (पृ० ४२७) उत्तरार्ध मात्र मिलता है।
- पृ० १०० की तीसरी टिप्पणी में विश्वाहन्ता की संक्षिप्त व्याख्या की गई है। इस विश्वाहन्ता का विकास होने पर योगी की अपने शरीर की ही भांति अन्य शरीरों में भी अहन्ता-बुद्धि स्थिर हो जाती है।
- विवेक ख्याति से मनुष्य जड़ से अर्थात् त्रिगुणात्मक प्रकृति से अपने को पृथक् अर्थात् द्रष्टा के रूप में समझ या पहचान सकता है। इस अवस्था में देह का बोध नहीं रहता, केवल निष्क्रिय आत्मस्वरूप ही रहता है। इसी स्थिति को साधारणतया विदेह कैवल्य के नाम Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ११७ परकायप्रवेश आदि के द्वारा नाना प्रकार के शरीरों में उन-उन कर्मों का भोग पूरा करने के अभिप्राय से विहार करने का और नाना सुखों को भोगने का सामर्थ्य आ जाता है । अपने देह का सहारा लिये बिना दूसरे के शरीर में संवित् स्वरूप की भावना कैसे करें ? इसका उत्तर श्लोक में ही 'स्ववत्' पद से दिया गया है । जैसे अपनी आत्मा में अपने शरीर का सहारा छोड़ कर योगी अपने संवित्स्वरूप का चिन्तन करता है, वैसे ही दूसरे के जीवित अथवा मृत शरीर में भी अपने संवित्स्वरूप के विमर्श को अनुगत करे । इसमें योगी की इच्छा ही नियामिका है कि वह अपने विमर्श को जीवित शरीर से अनुगत करेगा या मृत शरीर से । जीवित शरीर में विमर्श को अनुगत करने पर १वशिता, यत्रकामावसायिता आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । अपने संवित्स्वरूप के परामर्श के बल से किसी मरे हुए राजा आदि के शरीर में प्रविष्ट होकर योगी नाना प्रकार के भोगों को भोगता है, अथवा अपना अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध करता है । इससे यह सिद्ध होता है कि संवित्स्वरूप को कभी भी शरीर की अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि यह संवित्स्वरूप सर्वत्र अनुगत है । एक शरीर तो दूसरी जगह नहीं रह सकता । जैसे कि स्वप्नावस्था में चिदात्मा की तो अनुवृत्ति रहती है, क्योंकि स्वप्न के साक्षी के रूप में उस समय भी उसका स्फुरण विद्यमान है; किन्तु स्थूल शरीर उस समय नहीं रहता, क्योंकि उसकी वहाँ प्रतीति नहीं होती । सुषुप्ति अवस्था में तो केवल चिति की ही अनुवृत्ति रहती है, क्योंकि साक्षी के रूप में उस समय भी उसका स्फुरण विद्यमान हैं। अन्यथा यह कौन सोया है ? इस प्रश्न का उत्तर आप क्या देंगे ? इसके लिये स्वात्मस्वरूप संवित्ति की अनुवृत्ति माननी पड़ेगी । स्वप्नावस्था में जैसे स्थूल शरीर की निवृत्ति हो जाती है, उसी तरह सुषुप्ति दशा में सूक्ष्म शरीर की भी निवृत्ति माननी पड़ती है, क्योंकि उस अवस्था में गाढ निद्रा के कारण पदार्थों के दर्शन-स्पर्शन का आभास भी नहीं बच रहता । इसी तरह से चित्त के समाधिस्थ हो जाने पर तुरीय दशा में शुद्ध चिदानन्द का स्फुरण होने से आत्मा की वृत्ति रहती है, क्योंकि उस समय वह समाहित अवस्था में रहता है । सुषुप्ति दशा में प्रतीत होने वाले कारण देह रूप अज्ञान की भी तुरीय दशा में निवृत्ति हो जाती है । इस तरह से उक्त चार अवस्थाओं में उक्त तीनों शरीरों की नियमतः अनुवृत्ति नहीं होती, किन्तु आत्मा की संवित्स्वरूपता तो सर्वत्र अनुवृत्त रहती है । अतः इसके लिए उस-उस शरीर की अपेक्षा के न रहने से यह कहना से जाना जाता है । “बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः” (३।४३) इस योगसूत्र के व्यासभाष्य में विदेह और महाविदेह कैवल्य की व्याख्या की गई है और परकायप्रवेश की चर्चा आई है । . वशिता का अर्थ है सर्ववशीकार, सबको अपने वश में कर लेने का सामर्थ्य । यत्रकामाव- सायिता का तात्पर्य है जिस वस्तु को प्राप्त करने की चाह (इच्छा) योगी के मन में उत्पन्न होती है, वह अवसित हो जाती है, पूरी हो जाती है, उसकी इच्छा का कभी विघात नहीं होता ।
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११८ : विज्ञानभैरव ठीक ही है कि अपने शरीर की अपेक्षा को त्याग कर और सभी शरीरों को अपना ही मान कर योगी कुछ ही दिनों में सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, अर्थात् वह सांसारिक दोष-जालों से सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है । इस श्लोक का वास्तविक अभिप्राय यह है कि अपने शरीर की भाँति अन्य शरीरों में भी-“स्वाङ्गकल्पेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च सा” (४।१।४) इस प्रत्यभिज्ञाकारिका के अनुसार भगवान् की ज्ञान और क्रिया शक्ति का विकास मानकर सर्वत्र चैतन्य की समान स्थिति की ही भावना करे कि अपने शरीर की उपेक्षा कर देने पर अथवा सभी शरीरों को अपना मान लेने पर चिन्मात्रस्वरूप सर्वत्र समान रूप से अनुस्यूत (अनुगत) है । अर्थात् यह सारा जगत् मेरा ही शरीर है, इस तरह की भावना का योगी को अभ्यास करना चाहिये । इस एक शरीर के नष्ट हो जाने पर भी मेरे ये सब दूसरे शरीर तो विद्यमान हैं ही, इस भावना के आधार पर अपने शरीर की ममता योगी को छोड़ देनी चाहिये । इस बेचारे अपने एक शरीर को उस अंग की तरह नहीं मान लेना चाहिये, जहाँ से कि प्राण के निकल कर गले में अटक जाने पर व्यक्ति को मरा समझ लिया जाता है। ऐसी नासमझी कर बैठने पर तो यह साधक भी मृतप्राय, मुर्दे के बराबर हो जायगा। जैसा कि विरूपाक्षपंचाशिका के इस श्लोक में बताया गया है— 1 उत्क्रम्य विश्वतोऽङ्गात् तद्भागैकतनुनिष्ठिताहन्तः । कण्ठलुठत्प्राण इव व्यक्तं जीवन्मृतो लोकः ।। (श्लो० ५) ऐसी भूल न हो, इसके लिये साधक को चाहिये कि अपने शरीर की तरह अन्य शरीरों में भी स्वसंवित्ति की समान रूप से अनुवृत्ति की भावना करे । ऐसा करने पर वह कुछ ही दिनों में सर्वव्यापक हो जाता है । ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० ३११, ४२७) में दो स्थलों पर यह श्लोक उद्धृत है ।।१०५।। [ धारणा-८३ ] निराधारं मनः कृत्वा विकल्पान्न विकल्पयेत् । तदात्मपरमात्मत्वे भैरवो मृगलोचने ॥१०६॥ हे मृगलोचने, निराधारं त्यक्तबाह्यालम्बनं मनः कृत्वा यदा विकल्पान् न विकल्पयेत् संकल्पकला यदा न विकल्पयेत्, तदा आत्मपरमात्मत्वे जीवात्मपरमात्म- भावे, उभयोरप्यवस्थयोरिति यावत्, भैरव एव भैरवरूपः परमात्मैव भवति । संकल्प- कलया जीवत्वम्, निर्विकल्पदशया ब्रह्मत्वमित्यतो विकल्पान् न विदध्यादिति भावः ॥१०६॥
- श्लोक का अर्थ इस प्रकार होगा—अपने विश्वमय शरीर को अज्ञानवश भूलकर प्राणी मनुष्य, देव आदि के कल्पित स्थूल शरीर को अपना मानने लगता है । इस जरा-रोग ग्रस्त शरीर में उसके प्राण कंठ में अटके रहते हैं और वह जीवित रहता हुआ भी मुर्दे के समान लगता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ११६ हे मृगनयनि, बाह्य और आन्तर आलम्बनों का परित्याग कर मन को निराधार कर देना चाहिये और ऐसा कर लेने के बाद संकल्प-विकल्प के लवलेश को भी फिर मन के पास नहीं फटकने देना चाहिये । इस धारणा का अभ्यास पूर्ण हो जाने पर वह जीवात्मा की दशा हो या परमात्मा की, इन दोनों ही अवस्थाओं में भैरव स्वरूप ही मात्र बच रहता है । संकल्प की कला में जीवभाव और निर्विकल्प दशा में ब्रह्मभाव विद्यमान रहता है, अतः साधक को चाहिये कि वह सभी विकल्पों का परित्याग कर ब्रह्मभाव में, परभैरव स्वरूप में, समाविष्ट होने के लिये सतत इस धारणा का अभ्यास करता रहे ।।१०६।। [ धारणा-८४ ] ^1सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः । स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो^१ ^२भवेत् ॥१०७॥ शिवस्यायं शैवो धर्मः स्वच्छस्वातन्त्र्यादिर्यस्य स शैवधर्मा, स एवाहम् अहमेव स सर्वज्ञः सर्वकर्ता व्यापकः परमेश्वर इति दाढर्यादसंदिग्धत्वेन भावनात् शिवो भवेत् परमशिवस्वरूपः स्यात् ॥१०७॥ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की निम्न कारिका में दो तरह की प्र भज्ञा का प्रतिपादन किया गया है । इसमें प्रथम प्रत्यभिज्ञा का स्वरूप यह है कि मैं शुद्ध बोधस्वरूप हूँ । दूसरे प्रकार की प्रत्यभिज्ञा यह है कि सारा जगत् मेरा ही विस्तार है, अर्थात् इस जगत् के रूप में मैं ही फैला हुआ हूँ । इन दोनों तरह की प्रत्यभिज्ञाओं का उदय हो जाने पर साधक विश्वमय हो जाता है । उस स्थिति में उसके चित्त में विकल्पों का प्रादुर्भाव होने पर भी वह अपनी शिवा- वस्था में ही प्रतिष्ठित रहता है । जैसे कि— सोऽहं ममायं विभव इति प्रत्यभिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥ (४।१।१२) शिवोपाध्याय का यहाँ कहना है कि प्रस्तुत श्लोक में और इसके आगे के श्लोक में प्रत्यभिज्ञा के इन्हीं दो स्वरूपों में धारणा को केन्द्रित करने का विधान है । मैं शुद्ध स्वरूप हूँ, प्रत्यभिज्ञा के इस अंश पर धारणा को स्थिर करने की विधि यह है कि साधक यह भावना करे कि स्वच्छ, स्वातन्त्र्य आदि शिव धर्मों से युक्त, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, व्यापक, परमेश्वर मुझ से अलग नहीं है, अर्थात् ये सब धर्म मेरे ही हैं । इस तरह का दृढ़ निश्चय जब साधक के चित्त में गहरा पैठ जाता है, तो वह शिव ही बन जाता है, अर्थात् उसके चित्त में प्रथम प्रकार की प्रत्यभिज्ञा प्रकट हो जाती है और ऐसा होने पर जागतिक प्रपंच उसके चित्त में किसी प्रकार का विकार नहीं पैदा कर सकते, क्योंकि सभी अवस्थाओं में उसका यह शिवस्वरूप निरन्तर अनुस्यूत रहता है ॥१०७॥ १. °द् भवेच्छिवः-क० । २. °दयः-स्व० ।
- स्वच्छन्द० (भा० ६, पृ० १२, पृ० ७७), शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १७), महा० परि० (पृ० २५) और तन्त्रा० वि० (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह उद्धृत है ।
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१२० : विज्ञानभैरव [ धारणा-८५ ] १जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभङ्ग्यः१ प्रभा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभङ्ग्यो विभेदिताः२ ॥१०८॥ यथा जलस्य ऊर्मयो जलादेव, वह्नेर्वा ज्वालाः, रवेर्वा प्रभाः, तथा एता विश्व- भङ्ग्यो गमनागमनभोजनहवनदानप्रसारणनिर्गमनाद्याः संसारविच्छित्तिलहर्यो ममैव भैरवस्य मदीयादेव भैरवस्वरूपाद् विभेदिताः संजातभेदाः, सन्तीति भावयेदिति शेषः ॥१०८॥ यह जगत् मेरा ही विस्तार है, प्रत्यभिज्ञा के इस द्वितीय अंश पर धारणा को स्थिर करने की विधि यह है कि साधक यह भावना करे कि जैसे जल की लहरें जल से ही उठती हैं, अग्नि की ज्वाला अग्नि से ही निकलती है अथवा जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य से ही पैदा होता है, उसी तरह से स्वात्मस्वरूप भैरव से ही चलना-फिरना, भोजन, हवन, दान, प्रसा- रण, निर्गमन प्रभृति इस विश्व की सारी विचित्रताएँ प्रकट होती हैं। इस धारणा में दृढ़ता आ जाने पर योगी इस पूरे विश्व में अपने ही शिवस्वरूप को देखता है। शिवोपाध्याय का कहना है कि ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की उक्त कारिका में कुछ लोग 'सर्वो ममाऽयम्' अथवा 'सर्गो ममाऽयम्' इस तरह के पाठभेद की कल्पना करते हैं, जो कि गलत है। यह बात तो सही है कि अभिनवगुप्त ने शिवोपाध्याय संमत पाठ को ही स्वीकार किया है और तदनुसार ही इसकी व्याख्या भी की है, यद्यपि वहाँ भी मूल में पाठ 'सर्वो ममाऽयम्' ही छपा है, किन्तु अपनी बात की पुष्टि में उनका यह कहना कहाँ तक उचित माना जा सकता है कि इन दो तरह की प्रत्यभिज्ञाओं के आधार पर ही 'स एवाहं शैवधर्मा (श्लो० १०७) और 'ममैव भैरवस्यैताः' (श्लो० १०८) विज्ञानभैरव के इन दो श्लोकों में दो तरह की धारणाओं का विधान किया गया है। इसका अर्थ तो यह हो जाता है कि विज्ञानभैरव की रचना उत्पल की ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की रचना के बाद हुई, जहाँ कि उक्त दो प्रकार की प्रत्यभिज्ञा का विधान है, जिनके आधार पर कि विज्ञानभैरव में दो प्रकार की धारणाओं का विधान करना पड़ा। इसके विपरीत इस कल्पना को कौन रोक सकता है कि आपने ही विज्ञान- भैरव के इन दो श्लोकों के आधार पर 'सोऽहं ममायम्' इस पाठ की परिकल्पना कर ली है, क्योंकि विज्ञानभैरव एक ईश्वर प्रोक्त शास्त्र है और इसका आविर्भाव अवश्य ही उत्पल से पहले हो चुका होगा। अभिनवगुप्त के प्रमाण पर इसी पाठ को उचित मानने का आग्रह किया जाय, तो उस परिस्थिति में यही मानना उचित होगा कि प्रत्यभिज्ञाकार ने पूर्व पर म्परा से चली आ रही दो प्रकार की प्रत्यभिज्ञा का यहाँ वर्णन किया है, जिसकी कि स्पष्ट पुष्टि विज्ञानभैरव के इन दो श्लोकों से भी होती है ॥१०८॥ १. ङ्गाः-शि० त० । २. विनिर्गताः-शि० । १. शिवसूत्रवि० (पृ० १५) और तन्त्रा० वि० (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह श्लोक उद्धृत है।
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विज्ञानभैरव : १२१ [ धारणा-८६ ] भ्रान्त्वा भ्रान्त्वा शरीरेण१ त्वरितं भुवि पातनात् । क्षोभशक्तिविरामेण परा संजायते दशा ॥१०९॥ शरीरेण स्वदेहेन पुनः पुनरतिशयेन परिभ्रम्य अन्ते तस्य शरीरस्य त्वरितं शीघ्रं भुवि पातनात् क्षोभशक्तिविरामेण भुवि स्थितस्य शरीरस्य वेगशक्तेर्विरामे सति प रा निर्विकल्पदशा संजायते प्रादुर्भवति ॥१०९॥ अपने शरीर को साधक उसी तरह से चारों तरफ तेजी से घुमावे, जैसा कि बच्चे चक्करघानी खाते समय तेजी से घूमते हैं। घूमते-घूमते वह अपने शरीर को पृथिवी पर गिरा दे । भूमि पर लुढ़क जाने पर उसको सब कुछ घूमता हुआ सा नजर आवेगा और थोड़ी देर के बाद एक विचित्र शान्ति का अनुभव होगा। यह एक प्रकार की निर्विकल्प अवस्था है। इस स्थिति में अपनी धारणा को स्थिर करने पर परम निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप की अभि- व्यक्ति हो जाती है। टीकाकारों ने यहाँ पूजा के अंग के रूप में प्रदक्षिण परिभ्रमण का और जीव के नाना योनियों में जन्म-मरण की परम्परा का उल्लेख कर इनमें धारणा जमाने की बात कही है, जिनका कि प्रस्तुत ग्रन्थ की धारणा-पद्धति से कोई साम्य नहीं है ॥१०९॥ [ धारणा-८७ ] आधारेष्वथवा२ऽशक्त्या३ऽज्ञानाच्चित्तलयेन वा । जातशक्तिसमावेशक्षोभान्ते भैरवं वपुः ॥११०॥ आधारेषु ज्ञानविषयेषु पदार्थेषु अशक्त्या असामर्थ्येन, अथवा अज्ञानात् ज्ञानादे- रभावतः, वा अथवा, चित्तलयेन यो जातः शक्तौ अनाश्रिताख्यायां समावेशस्तेन क्षोभान्ते चञ्चलताविरामे सति भैरवं वपुः पूर्वोक्तस्वानुभवानन्दावस्थारूपम्, व्यज्यत इति शेषः ॥११०॥ आधार अर्थात् ज्ञान के विषयीभूत पदार्थों में असामर्थ्य के कारण जो चित्त का लय होता है, अथवा अज्ञान के कारण जो चित्त का लय होता है और इसके कारण जो अनाश्रित शक्ति में समावेश होता है, उससे क्षोभ अर्थात् चंचलता का विराम हो जाने पर साधक भैरव- शरीर हो जाता है, अर्थात् उसमें अपने अनुभव से ही जानी जा सकने वाली आनन्दात्मक अवस्था का आविर्भाव हो जाता है ॥११०॥ [ धारणा-८८ ] १सम्प्रदायमिमं देवि४ शृणु सम्यग् वदाम्यहम् । कैवल्यं जायते सद्यो नेत्रयोः स्तब्धमात्रयोः५ ॥१११॥ १. ॰राणि-ख० । २. ॰वा श०-ख० । ३. ध्या०-ख० । ४. भद्रे-ख० ई० । ५. इतः परम्-‘संकोचं कर्णयोः’ इत्यादिकः श्लोकोऽधिको वर्तते-क० ।
- ई० प्र० वि० वि० (भा० १, पृ० ७७; भा० ३, पृ० १६९, ३८६) में यह पूरा श्लोक अथवा उत्तरार्ध मात्र उद्धृत है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१२२ : विज्ञानभैरव हे देवि, इमं सम्प्रदायं शृणु, अहं ते सम्यग् वदामि—नेत्रयोः स्तब्धमात्रयोः सर्वस्यास्य भेदाभेदमयस्य जगतो विस्मरणादन्तरात्मनि च दत्तदृष्टेर्योगिनः सद्यः कैवल्यं जायते, यत्र तत्र ज्ञानप्रकाशः स्यादेवेत्यर्थः । सर्वेषूक्तवक्ष्यमाणानुशासनेष्वेतेषु चिन्मात्रा- वधारणचित्तैकाग्र्याभ्यसनमभिप्रेतमस्तीत्यवधेयम् ।।१११।। हे देवि, सुनो । मैं तुम्हें उस परम्परा का उपदेश करता हूँ, जिसका कि सही पद्धति से अभ्यास करने पर, अर्थात् भैरवी मुद्रा में प्रदर्शित विधि से अपने नेत्रों को विषयों की ओर से समेट कर स्थिर कर लेने पर, इस सारे भेदात्मक और अभेदात्मक जगत् को भूलकर अपनी अन्तरात्मा की ओर दृष्टि फेर लेने पर योगी तत्काल कैवल्य को प्राप्त कर लेता है, जिस किसी भी परिस्थिति में हो शुद्ध स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस ग्रन्थ में पहले बताई गई अथवा आगे बताई जाने वाली सभी धारणाओं का मुख्य उद्देश्य चित्त की एकाग्रता के संपादन के द्वारा चिन्मात्र स्वरूप की अभिव्यक्ति है ।।१११।। [ धारणा-८९ ] ¹कूपादिके महागर्ते स्थित्वोपरि निरीक्षणात् । अविकल्पमतेः सम्यक् सद्यश्चित्तलयः स्फुटम् ।।११२।। कूप उदपानम्, आदिना गिरिशृङ्गादेर्ग्रहणम् । महागर्ते बृहत्सुषिरे कूपादौ स्थित्वा । सामीप्यं सप्तम्यर्थः । महाश्वभ्रादिसमीपे स्थित्वेति यावत् । उपरि निरीक्ष- णात् ऊर्ध्वमेव कूपाद्याकाशनिश्चलदृष्ट्यवलोकनाद्धेतोः, अविकल्पमतेः अविद्यमानो विकल्पो यस्याः सा तथाविधा मतिर्यस्य तस्य निर्विकल्पबुद्धेर्भावकस्य सद्यस्तत्क्षणमेव चित्तलयश्चित्तप्रशान्तिरिति स्फुटं निश्चितम् ।।११२।। बहुत गहरे कूप, खड्ड आदि के पास खड़ा होकर नीचे देखने पर अथवा पर्वत के ऊँचे शिखर के पास खड़ा होकर ऊपर ताकने पर एक अज्ञात भय की कल्पना से एक क्षण के लिये शरीर रोमांचित हो उठता है, चित्त निर्विकल्प दशा में प्रविष्ट हो जाता है । साधक जब इस क्षणिक निर्विकल्प दशा में अपने चित्त को तल्लीन कर लेता है, तो तत्क्षण उसका चित्त शान्त हो जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है । किसी भी भयानक स्थिति में कुछ क्षण के लिये वेद्य अथवा अवेद्य कोटि में प्रविष्ट नील-पीत आदि पदार्थों की कोई सत्ता नहीं रह जाती । इस स्थिति में भैरव का परम घोरतर स्वरूप ही मात्र भासित होता है । इस भैरव स्वरूप में चित्त को स्थिर लेने पर साधक का चित्त तत्काल शान्त हो जाता है और तब उसके चित्त में परभैरव स्वरूप शिव का शान्त स्वरूप अभिव्यक्त हो उठता है ।।११२।। १. ॰ते परिनि॰-ख० ।
- नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २००) में यह श्लोक मिलता है ।
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विज्ञानभैरव : १२३ [ धारणा-९० ] १यत्र यत्र' मनो याति बाह्ये वाऽऽभ्यन्तरे२ प्रिये । तत्र तत्र ३शिवावस्था व्यापकत्वात् क्व४ यास्यति ।।११३।। यत्र यत्र यस्मिन् यस्मिन्, बाह्ये नीलपीतादौ, अपि वा अथवा, आभ्यन्तरे सुखदुःखादौ, मनो याति मनोविकल्पः संवेदनं प्रसरति, तत्र तत्र स्फुरत्संवित्सतत्त्वे, शिवावस्था शिवस्य चित्प्रकाशस्य अवस्था अवस्थानं क्व यास्यति ? न क्वचिद् गमिष्यतीति भावः । अत्र हेतुः—व्यापकत्वादिति । दिक्कालाकारैः प्रकाशसारत्वात् प्रकाशमानैः प्रकाशात्मनः स्वात्मभैरवस्यानवच्छेदादित्यर्थः ।।११३।। हे प्रिये, जहाँ-जहाँ नील-पीत आदि बाह्य पदार्थों में अथवा सुख-दुःख आदि आभ्यन्तर विषयों में मन का, अर्थात् उसके संकल्प-विकल्पात्मक संवेदनों का प्रसार होता है, वहाँ-वहाँ संवित् स्वरूप शिव ही चित्प्रकाश अवस्था में विद्यमान है । ऐसी स्थिति में यह मन उसको छोड़ कर जायगा कहाँ ? इसका अभिप्राय यह है कि इस जगत् में ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जहाँ कि शिव न प्रकाशित हो रहे हों । अतः जहाँ भी मन जायगा वहाँ शिव का प्रकाशात्मक स्वरूप अवश्य रहेगा । इसके विपरीत यह प्रकाशात्मक स्वात्मस्वरूप भैरव दिशा, काल, आकार आदि को तो प्रकाशित करता है, क्योंकि उसी भैरव के प्रकाश से ये प्रकाशित हैं, किन्तु ऐसा होते हुए भी वे उस प्रकाशात्मक भैरव को परिच्छिन्न नहीं कर सकते । इसी लिये यह प्रकाशात्मक भैरव मन से भी परिच्छिन्न नहीं हो सकता । इसके साक्षात्कार के लिये तो इस भावना के अभ्यास को ही तीव्र करना पड़ता है कि मेरा मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ- वहाँ सर्वत्र प्रकाशात्मक शिव विद्यमान है ! इस धारणा का दृढ़ अभ्यास करने पर वह स्वात्म- स्वरूप स्वयं प्रकाशित हो जाता है । यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ।। (६।२६) भगवद्गीता के इस वचन में चंचल मन को नियमित कर उसको आत्मप्रवण बनाने की बात कही गई है । इसके विपरीत प्रस्तुत श्लोक में यह बताया गया है कि मन जहाँ भी जायगा, वही प्रकाशात्मक स्वात्मस्वरूप विद्यमान रहेगा । अतः मन को उस विषय से हटा कर अन्तरात्मा की ओर खींच लाने की आवश्यकता नहीं है । किन्तु जहाँ भी मन लग जाय, उसको वहीं उसी स्थिति में स्थिर कर देना चाहिये । ऐसा करने से वहीं शिवावस्था विकसित हो जायगी, जिसकी कि चर्चा स्पन्दकारिका के (२८-३० श्लोकों) को उद्धृत कर पहले (श्लो० ३३ की व्याख्या में) की जा चुकी है । १. तत्र-यो० । २. °पि वा-क० । ३. परा°-यो० । ४. प्रकाश्यते-यो० ।
- परमार्थसार (पृ० १४८), स्वच्छन्द० (भा० ३, प० ७, पृ० ३१२) और योगिनी० दीपिका (पृ० १९२, २९९, ३४३) में यह श्लोक प्राप्त होता है ।
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१२४ : विज्ञानभैरव इस अवस्था को योगशास्त्र में छः समाधियों का अभ्यास पूरा हो जाने पर प्राप्त सप्तम समाधि कहते हैं, जो कि बिना ही प्रयत्न के (ईश्वर या गुरु की कृपा से अथवा स्वतः उत्पन्न प्रातिभ ज्ञान से) अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराने में समर्थ होने के कारण 'नित्य समाधि' के नाम से प्रसिद्ध है। शिवोपाध्याय के द्वारा उद्धृत 1 वाक्यसुधा नामक ग्रन्थ में इन समाधियों के लक्षण बताये गये हैं। चित्त जब अखण्ड आत्मा में, अद्वयस्वरूप ब्रह्म में स्थिर हो जाता है, तो उसे 'समाधि' कहते हैं। इस समाधि का अभ्यास बाह्य और आन्तर विषयों को आलम्बन बना कर दो स्थानों में किया जा सकता है—भीतर और बाहर । आन्तर विषयों को आलम्बन बना कर हृदय प्रदेश में अभ्यस्त समाधि सविकल्पक और निर्विकल्पक के भेद से दो तरह की होती है। इनमें से सविकल्पक समाधि के भी दो भेद होते हैं—दृश्यसंपृक्त और शब्दसंपृक्त । इनमें से दृश्यसंपृक्त समाधि का स्वरूप इस तरह से बताया गया है— कामाद्याश्चित्तसादृश्यात् तत्साक्षित्वेन चेतनाम् । ध्यायेद् दृश्यानुविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥२४॥ अर्थात् काम, क्रोध आदि चित्त के धर्म हैं, क्योंकि इनमें परस्पर समानता है। अतः इनके साक्षी के रूप में अपनी चेतना को स्थिर करना चाहिये। यह दृश्यानुविद्ध सविकल्पक समाधि कहलाती है। इसको स्थूल सविकल्पक समाधि कहते हैं। सूक्ष्म सविकल्पक समाधि का स्वरूप वहीं इस तरह से वर्णित है— असङ्गः सच्चिदानन्दः स्वप्रभो द्वैतवर्जितः । अस्मीति शब्दविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥२५॥ अर्थात् मैं असंग, सच्चिदानन्द स्वरूप, स्वयंप्रकाश, अद्वय तत्त्व हूँ, इस भान (ज्ञान) में चित्त को अवस्थित करने का नाम सविकल्पक शब्दसंपृक्त समाधि है। इस तरह प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने से उक्त दो समाधि दशाओं की प्राप्ति हो जाने पर अपने आप होने वाली तीसरी निर्विकल्पक समाधि का स्वरूप यह बताया गया है— स्वानुभूतिरसावेशाद् दृश्यशब्दावुपेक्ष्य तु । निर्विकल्पः समाधिः स्यान्नि1वातस्थलदीपवत् ॥२६॥ अर्थात् स्वात्मस्वरूप के अनुभव का आनन्द मिलने पर दृश्य और शब्द की उपेक्षा कर साधक जब अपने चित्त को पवन रहित स्थान में रखे दीपक की तरह स्थिर कर लेता है, तो यह निर्विकल्पक समाधि कही जाती है। इस तरह सविकल्पक के दो भेदों के साथ इस निर्विकल्पक १. °र्वातस्थित°–वा० ।
- शंकराचार्य विरचित ग्रन्थों में वाक्यसुधा की भी गणना की जाती है। अन्य टीकाकार इसको विद्यारण्य की कृति मानते हैं। इसके २२-२३ श्लोकों में समाधि का लक्षण और उसके भेद बताये गये हैं। जैसे कि—"उपेक्ष्य नामरूपे द्वे सच्चिदानन्दवस्तुनि । समाधिं सर्वदा कुर्याद् हृदये चाथवा बहिः ।। सविकल्पो निर्विकल्पः समाधिर्द्विविधो हृदि । दृश्य- शब्दानुवेधेन सविकल्पः पुनर्द्विधा ।।" इनका अर्थ ऊपर टीका में कर दिया गया है।
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विज्ञानभैरव : १२५ समाधि को मिला देने से समाधि के तीन भेद हो जाते हैं। ये तीनों भेद आन्तर समाधि के हैं। सूर्य, चन्द्र, आकाश आदि बाह्य वस्तुओं को आलम्बन बनाने से भी समाधि के तीन भेद होते हैं। जैसे कि— हृदीव बाह्यदेशेऽपि यस्मिन् कस्मिंश्च वस्तुनि । समाधिराद्यः सन्मात्रे१ नामरूपपृथक्स्थितः ॥२७॥ अर्थात् हृदय की ही भांति जिस किसी बाह्य आलम्बन चन्द्र, सूर्य, आकाश प्रभृति सत्स्वभाव दृश्यों के नाम और रूप की अलग-अलग हो रही प्रतीति में चित्त को स्थिर करना दृश्यानुविद्ध सविकल्पक समाधि कही जाती है। शब्दानुविद्ध सविकल्पक समाधि का स्वरूप यह है— अखण्डैकरसं वस्तु सच्चिदानन्दलक्षणम् । इत्यविच्छिन्नचिन्तेयं समाधिर्मध्यमो भवेत् ॥२८॥ अर्थात् सच्चिदानन्द स्वरूप वस्तु अखण्ड और एकरस है, इस तरह की निरन्तर प्रवहमान चित्त की दशा को मध्यम समाधि, अर्थात् शब्दानुविद्ध सविकल्पक समाधि कहते हैं। बाह्य आलम्बन में भी केवल ब्रह्माकार वृत्ति का उदय होने पर जब मन निश्चेष्ट हो जाता है, तो यह निर्विकल्पक समाधि संपन्न होती है, जिसका कि लक्षण इस प्रकार बताया गया है— स्तब्धीभावो रसास्वादात् तृतीयः पूर्ववन्मतः । एतैः समाधिभिः षड्भिर्नयेत् कालं निरन्तरम् ॥२९॥ अर्थात् ब्रह्म से भिन्न बाह्य वस्तु कुछ भी नहीं है, इस भावना के अभ्यास से मन को निश्चेष्ट कर देने पर तीसरी निर्विकल्पक समाधि की उपलब्धि होती है। इस तरह से इन छः प्रकार की समाधियों का अभ्यास करता हुआ साधक निरन्तर कालयापन करता रहे। इन समाधियों के पुष्ट हो जाने पर स्पन्दकारिका में प्रदर्शित जीवन्मुक्त दशा की प्राप्ति हो जाती है, जो कि विज्ञानभैरव की प्रस्तुत धारणा का भी लक्ष्य है। वाक्यसुधा में इस स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया गया है— देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ॥३०॥ अर्थात् देह में अहंभाव के नष्ट हो जाने पर और परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर जहाँ जहाँ मन जाता है, वहीं वहीं समाधि लग जाती है। स्वच्छन्दतन्त्र में भी यही स्थिति इस तरह से वर्णित है— यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् । चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ (४।३१३) अर्थात् जहाँ जहाँ मन जाता है, उसी विषय के साथ अपने ध्येय को एकाकार बना उसका चिन्तन करने लगे। जब सब कुछ शिवमयं ही है, तब यह चित्त अन्ततः जायगा कहाँ ? इसका अभिप्राय यह है कि जब सब कुछ शिव ही शिव है, तब जिस किसी भी विषय पर मन आकृष्ट हो, उसको रोकने का प्रयास न करे, किन्तु सहज गति से उस विषय को भी शिव १. °त्रान्नामरूपपृथक्कृतिः-वा० ।