भारतकोश
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बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

( २०० ) १५. कामी हाथ : यदि हथेली में शुक्र क्षेत्र बेडौल, जरूरत से ज्यादा उभरा हुआ, कोमल तथा फला हुआ हो इसके साथ ही अंगूठे का पोरु अधिक लम्बा हो तथा शुक्र पर्वत पर नक्षत्र चिह्न अंकित हो तो वह व्यक्ति जरूरत से ज्यादा कामी होता है । यदि इसके साथ ही शनि रेखा पर बिन्दु या क्रॉस हो तो वह इस क्षेत्र में बदनामी उठाता है । कामी हाथ

१६. हत्यारा : यदि हथेली में हृदय रेखा का अभाव हो तथा शुक्रवलय दोहरा हो इसके साथ ही साथ पूरा हाथ सख्त तथा मजबूत हो और अंगूठा ठिगना, मोटा तथा थुलथुला हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही हत्यारा होता है । यदि इसके साथ ही साथ हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा तीनों मंगल पर्वत पर मिलती हों तो वह व्यक्ति निश्चय ही क्रूर और निर्दयी हत्यारा होगा तथा जीवन में एक से अधिक हत्याएं करेगा । हत्यारा

१७. गुप्तचर : यदि हथेली मे शनि पर्वत अविकसित हो तथा बुध पर्वत दबा हुआ हो पर भाग्यरेखा पूरी लम्बाई लिए हुए हो और मंगल पर्वत पर त्रिभुज का चिह्न लिए हुए हो तो वह व्यक्ति सफल गुप्तचर होता है । गुप्तचर

( २०१ ) १८. शिक्षक : १८. शिक्षक हाथ :—जिसके हाथ में जीवन रेखा, भाग्यरेखा तथा सूर्य रेखा विकसित हो तथा गुरु पर्वत विकसित हो और उस पर क्रॉस का चिह्न हो तथा अनामिका से तर्जनी उंगली लम्बी हो तो वह सफल शिक्षक (लेक्चरार) होता है। शिक्षक

हस्तरेखा योग

गजलक्ष्मी योग : यदि दोनों हाथों में भाग्यरेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर सीधी शनि पर्वत पर जा रही हो तथा सूर्य पर्वत विकसित होने के साथ-साथ उस पर सूर्य रेखा भी पतली लम्बी तथा लालिमा लिये हुए हो। इसके साथ ही साथ मस्तिष्क रेखा, स्वास्थ्य रेखा तथा आयु रेखा पुष्ट हो तो उसके हाथ में गजलक्ष्मी योग बनता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति साधारण घराने में जन्म लेकर के भी अत्यन्त उच्चस्तरीय सम्मान प्राप्त करता है। इसके साथ ही साथ वह अपने कार्यों से पहिचाना जाता है। आर्थिक एवं भौतिक दृष्टि से ऐसे व्यक्तियों के जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। ऐसे व्यक्ति स्वभाव से नम्र, विवेकवान तथा गुणवान होते हैं। व्यापार तथा विदेशों में कार्य करने से वे व्यक्ति विशेष सफल होते हैं। वस्तुतः गजलक्ष्मी योग रखने वाला व्यक्ति जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है तथा मृत्यु के बाद भी उसकी कीर्त्ति अपने क्षेत्र में अक्षुण्य रहती है। टिप्पणी : इस योग मे यह ध्यान रखने की बात है कि यदि ऐसी स्थिति दोनों ही हाथों में हो तभी यह योग पूर्ण माना जाता है। यदि एक ही हाथ में हो तो इसका आधा फल समझना चाहिए । अमलायोग : यदि हाथ में चन्द्र पर्वत विकसित हो और उसके साथ ही साथ सूर्य पर्वत तथा शुक्र पर्वत भी अपने पूर्ण उभार पर हो तथा चन्द्र रेखा बुध पर्वत की ओर जाती हो तो ऐसी स्थिति होने पर उसके हाथ में अमला योग बनता है ।

( २०६ ) फल : जिस व्यक्ति के हाथ में अमला योग होता है, वह व्यक्ति बुद्धिमान चतुर तथा प्रसिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति माना जाता है। आर्थिक एवं भौतिक दृष्टि से ऐसा व्यक्ति पूर्ण सफल होता है तथा अपने जीवन में व्यापारिक कार्यों से कई बार विदेश यात्राएं करता है। यदि हाथ में शुक्र पर्वत पूर्ण विकास पर होता है तथा उस पर बाधक रेखाएं नहीं होतीं तो निश्चय ही ऐसा व्यक्ति भौतिक सुख प्राप्त करता है तथा उसके जीवन में पत्नी के अलावा भी अन्य स्त्रियों से सम्बन्ध रहते हैं। जीवन में उसे बदनामी का सामना नहीं करना पड़ता। अमला योग शुभ योग : परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में शनि का पर्वत विकसित हो तथा उस पर स्पष्ट भाग्य रेखा आकर बनी हो तो उसके हाथ में शुभ योग होता है। फल : जिस व्यक्ति के हाथ में शुभ योग होता है वह प्रसिद्ध वक्ता, तथा जनता को सम्मोहित करने की क्षमता रखने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में इस प्रकार का योग होता है कि वह जो कुछ भी चाहता है जनता से प्राप्त कर लेता है। उसकी वाणी में मंत्र मुग्ध करने की शक्ति होती है। तथा जनता की भावनाओं को अपने पक्ष में करने की उसे पूर्ण शुभ योग कला आती है। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व अपने आप में आकर्षक एवं भव्य होता है। टिप्पणी : शुभ योग से सम्पन्न व्यक्ति का भाग्योदय अपने जन्म स्थान से दूर जाने पर ही होता है। बुध योग : परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में बुध पर्वत अपने आप में विकसित हो और चन्द्र पर्वत से धनुषाकार रेखा बुध पर्वत पर पहुंचती हो और वह रेखा मार्ग में कहीं पर भी टूटी हुई या कमजोर न हो अथवा जंजीरदार एवं बहुत अधिक मोटी न हो तो ऐसे व्यक्ति के हाथ में बुध योग बनता है। फल : जिस व्यक्ति के हाथ में बुध योग होता है वह व्यापार के माध्यम से जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है। उसके जीवन में धन का तथा सम्मान का किसी प्रकार का कोई बुध योग अभाव नहीं रहता। शारीरिक दृष्टि से वह पूर्णतः स्वस्थ एवं

( २०४ ) आकर्षक होता है तथा वह अपने प्रयत्नों से अपने व्यापार का विस्तार विदेशों में भी करता है। ऐसा व्यक्ति शीघ्र निर्णय करने वाला तथा स्वस्थ मस्तिष्क का धनी होता है। शत्रुओं का प्रबल रूप से संहार करने वाला बुद्धिमान तथा चतुर होता है। टिप्पणी : इस योग में यह बात ध्यान रखने की है कि उसके हाथ में बुध पर्वत विकसित हो, लालिमा लिए हुए तथा अपने स्थान पर स्थित हो। वह न तो हथेली के बाहर निकला हुआ हो और न सूर्य की ओर झुका हुआ हो । इन्द्र योग : परिभाषा : जिसके हाथ में मंगल पर्वत अपने स्वाभाविक रूप से विकसित हो तथा मस्तिष्क रेखा तथा भाग्य रेखा पूर्ण लम्बाई लिए हुए सीधी और स्पष्ट हो तो उस व्यक्ति की हथेली इन्द्र में योग होता है। फल : जिस व्यक्ति के हाथ में इन्द्र योग होता है वह व्यक्ति बलिष्ठ, चतुर तथा सफल रणनीतिज्ञ होता है। ऐसा व्यक्ति मिलिट्री में या पुलिस में उच्च पद प्राप्त करता है एवं राजा के समान अपना जीवन व्यतीत करता है। ऐसा व्यक्ति बातचीत करने में चतुर एवं सरल स्वभाव का होता है तथा उसका भाग्यो- दय २८वें साल के बाद ही विशेष रूप से होता देखा गया है। टिप्पणी : यह योग राज योग के समान है ऐसा अनुभव हुआ है कि जिसके हाथ में यह योग होता है, उसकी आयु बहुत अधिक बड़ी नहीं होती परन्तु फिर भी ऐसा व्यक्ति छोटी आयु में ही पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त करके अपना नाम चारों ओर फैला देता है। भौतिकता की दृष्टि से देखा जाय तो इनके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। ऐसे व्यक्ति जीवन में पूर्ण यश, सम्मान, तथा प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं। मरुत योग : यदि हाथ में शुक्र पर्वत पूर्ण विकसित हो और उस पर किसी प्रकार की बाधक रेखाएं न हों साथ ही गुरु पर्वत स्पष्ट हो और उस पर क्रास का चिह्न हो एवं चन्द्र रेखा बलवान एवं सीधी व स्पष्ट हो तो ऐसे व्यक्ति के हाथ में मरुत् योग होता है। फल : जिस व्यक्ति के हाथ में मरुत् योग्य होता है वह व्यक्ति बातचीत की कला में अत्यधिक निपुण तथा योग्य होता है। उसका हृदय विशाल और दूसरों की सहायता करने में आनन्द

( २०५ ) अनुभव करता है । जीवन में ये व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः सुखी व सफल होते हैं । तथा अपने प्रयत्नों से व्यापार को बहुत अधिक फैला देते हैं। ऐसे व्यक्ति तुरन्त निर्णय लेने वाले व सही रूप में समय को पहचानने वाले होते हैं । निश्चय ही इन व्यक्तियों के हाथों में कोई चीज अप्राप्य नहीं रहती । टिप्पणी : इस योग का अध्ययन करते समय यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि हाथ में शुक्र, गुरु तथा चन्द्र पर्वत अपने आप में पूर्ण विकसित हों तथा शुक्र रेखा एवं चन्द्र रेखा में किसी प्रकार की कोई न्यूनता न हो ।

लग्नाधि योग : परिभाषा : यदि हथेली में भाग्य रेखा पूर्ण विकसित हो और पूरी हथेली में सभी पर्वत अपने आप में विकसित हों और बुध रेखा पूरी लम्बाई लिए हुए हो तो उस व्यक्ति के हाथ में लग्नाधियोग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में लग्नाधियोग होता है वह पूर्ण विद्वान् और चतुर वक्ता होता है । उसकी विद्वता का लोहा अन्य लोग भी मानते हैं । शारीरिक रूप से व्यक्ति स्वस्थ, सबल, और आकर्षक होता है । हृदय से यह उच्च विचारों वाला होता है । सांसारिक कार्य और प्रपंचों में इसकी रुचि नहीं होती । यह अपने कार्य से प्रसिद्धि प्राप्त करता है । टिप्पणी : हथेली में यह योग तभी माना जायगा जब सभी पर्वत पूर्णतः विकसित हों और अपने-अपने स्थान पर स्थित हों । यदि पर्वत इधर-उधर विशृंखलित हों तो इस योग का लाभ व्यक्ति को नहीं मिल पाता ।

अधि योग : परिभाषा : यदि चन्द्र रेखा विकसित हो और बुध पर्वत तक पहुंची हो साथ ही उसकी एक शाखा शनि पर्वत को स्पर्श करती हो तो उसके हाथ में अधियोग होता है । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति विनम्र होता है तथा अपने कार्य में चतुर, सावधान तथा समय को पहचान कर कार्य करने वाला होता है । ऐसे व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन आनन्द के साथ व्यतीत होता है । भौतिक दृष्टि से उसे किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती । परन्तु कई बार ऐसे व्यक्ति शत्रु पर विश्वास करके धोखा भी खा जाते हैं ।

टिप्पणी : इसमें चन्द्र रेखा पर विशेष बल है और ध्यान में रखने की बात यह है कि चन्द्र रेखा का झुकाव तो बुध पर्वत की ओर ही होना चाहिए, परन्तु उसकी एक शाखा ऊपर की ओर उठती हुई अन्य पर्वत की ओर अवश्य ही पहुँचनी चाहिए । शकट योग : परिभाषा : यदि हथेली में शनि पर्वत एवं चन्द्र पर्वत दबे हुए हों । शुक्र पर्वत पर जरूरत से ज्यादा आड़ी तिरछी रेखाएं हों तथा भाग्य रेखा अत्यन्त कमजोर हो तो उसकी हथेली में शकट योग बनता है । फल : शकट योग में जिस व्यक्ति का जन्म होता है, वह जीवन भर अभाग्यशाली ही रहता है । उसके जीवन में बरा- बर संघर्ष बना रहता है, तथा कई बार जीवन में कर्ज लेकर के काम चलाना पड़ता है । समाज में इसका कोई सम्मान नहीं होता और उसका जीवन एक साधारण स्तर का ही व्यतीत होता है । (चित्र: शकट योग) टिप्पणी : जिसके हाथ मे शकट योग होता है उसमें ऊपर लिखा फल ही अधिकतर मिलता है, परन्तु यदि उसके हाथ में बुध पर्वत तथा गुरु पर्वत विकसित हो और गुरु पर क्रॉस का चिह्न हो तो शकट योग का इतना बुरा फल उसे देखने को नही मिलता । दरिद्र योग : परिभाषा : यदि हथेली मे सभी पर्वत कमजोर हो तथा चन्द्र पर्वत पर बिन्दु हो साथही बुध की उंगली पर तारे का चिह्नहो तो उसकी हथेली में दरिद्र योग बनता है । फल : दरिद्र योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे करोड़पति के घर में भी जन्म ले फिर भी वह अपने दुष्कर्मों के कारण संचित पूंजी समाप्त कर देता है । तथा उसे दरिद्र जीवन बिताने को बाध्य होना पडता है । उसका सम्पूर्ण जीवन सभी दृष्टियों से सामान्य स्तर का होकर रह जाता है । (चित्र: दरिद्र योग) टिप्पणी : हस्तरेखा के विद्वानों ने ऊपर लिखे योग के अतिरिक्त निम्न योगों को भी दरिद्र योग माना है । १. यदि हथेली मे सूर्य रेखा तथा भाग्य रेखा अत्यन्त कमजोर या टूटी हुई हो ।

( २०७ ) २. यदि भाग्य रेखा मोटी तथा हथेली में धंसी हुई हो और वह मध्यमा उंगली के प्रथम पौर तक पहुंच गई हो । ३. यदि शुक्र पर्वत दबा हुआ हो और उस पर जरूरत से ज्यादा बाधक रेखाएं हों । ४. यदि हथेली में बहुत अधिक रेखाएं ऊपर से नीचे की ओर जा रही हों । ५. यदि मध्यमा उंगली के सबसे नीचे के पौर पर तारे का चिह्न हो तथा भाग्य रेखा कमजोर हो । ६. यदि सूर्य रेखा मुड़कर शुक्र पर्वत की ओर जा रही हो । ७. यदि हथेली मोटी तथा भारी हो, साथ ही उस पर सभी पर्वत कमजोर और दबे हुए हों । ८. चन्द्र पर्वत कमजोर हो तथा उस पर एक से अधिक क्रास हों । ६. यदि हाथ की उंगलियां छोटी हों तथा उंगलियों के सिरे वर्गाकार हों एवं भाग्य रेखा पलट कर हथेली के बाहर जा रही हो । इनमें से कोई भी योग होने पर व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त कमजोर रहता है । दुरधरा योग : यदि हथेली में शुक्र पर्वत, सूर्य पर्वत एवं शनि पर्वत दबे हुए हों तथा सूर्य रेखा टूटी हुई हो तो दुरधरा योग बनता है । फल : जिसके हाथ में दुरधरा योग होता है उस व्यक्ति का प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त कष्ट के साथ व्यतीत होता है । परन्तु उसका भाग्योदय जीवन के ३६वें साल से प्रारम्भ होता है और इस आयु के बाद वह आश्चर्यजनक रूप से प्रगति करता है । [चित्र: दुरधरा] टिप्पणी : वस्तुतः दुरधरा योग का फल विचित्र है, इस योग के होने से जीवन के पहले ३६ वर्ष अत्यन्त दुखदायी, कष्टप्रद तथा परेशानीपूर्ण होते हैं । परन्तु ३६ वर्ष से आगे की आयु पूर्णतः सुखमय एवं समृद्धिपूर्ण होती है । हकीकत में वह आगे चलकर धन, मान, यश, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी कुछ प्राप्त करने में सफल होता है ।

( २०८ ) केमद्रुम योग : परिभाषा : यदि हथेली में शुक्र पर्वत तथा सूर्य पर्वत अविकसित हों तथा सूर्य रेखा टूटी हुई हो तो उसकी हथेली में केमद्रुम योग बनता है। फल : केमद्रुम योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति हमेशा दुखी बना रहता है। उसके हाथ में भले ही अन्य अच्छे योग हों परन्तु केमद्रुम उन सभी अच्छे योगों का नाश कर देता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं गलतियां करता है, और अदूरदर्शी होने के कारण बाद में पछताता रहता है। आर्थिक दृष्टि से यह बहुत अधिक गरीब होता है तथा जीवन में आजीविका के साधन बार-बार बदलता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा दूसरों पर निर्भर रहता है। टिप्पणी : कुछ विद्वानों का विचार है कि यदि भाग्य रेखा पुष्ट हो तो केमद्रुम भंग हो जाता है। इसके अलावा कुछ विद्वानों ने केमद्रुम भंग के अन्य तथ्य भी स्पष्ट किये हैं। निम्न स्थितियां हाथ में होने पर केमद्रुम योग का प्रभाव उसके जीवन में नहीं रहता। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हथेली में केमद्रुम योग हो परन्तु निम्न स्थितियों में से कोई भी एक स्थिति हो तो केमद्रुम का असर उसके जीवन में नहीं रहता। १. यदि हथेली में सूर्य रेखा पूर्णतः प्रबल, स्पष्ट तथा सीधी हो। २. यदि सूर्य रेखा से कोई एक सहायक रेखा बुध पर्वत की ओर पहुंची हो। ३. शुक्र पर्वत पुष्ट तथा विस्तृत क्षेत्र वाला हो तथा उस पर किसी प्रकार की अन्य रेखाएं या जाल न हो। ४. चन्द्र पर्वत पूर्ण विकसित हो तथा उससे एक रेखा निकल कर बुध पर्वत पर पहुंची हो। ५. हथेली में चार मणिबन्ध पूर्ण एवं स्पष्ट हों। ६. हथेली में आयु रेखा स्वास्थ्य रेखा तथा मस्तिष्क रेखा सीधी और स्पष्ट हों तथा इन तीनों का परस्पर पूर्ण सम्बन्ध बना हो। विशेष टिप्पणी : वस्तुतः हथेली में केमद्रुम योग होना अत्यन्त दुखमय होता है। सामुद्रिक सुधा में लिखा है कि यदि किसी के हाथ में पूर्ण राज्य योग तथा प्रबल भाग्य योग भी हो परन्तु हथेली में केमद्रुम योग होने से उनका नाश हो जाता है तथा उन शुभ योगों का भी अशुभ फल मिलने लग जाता है।

( २०६ ) अनफा योग : परिभाषा : जिसके हाथ में शुक्र क्षेत्र विस्तार लिए हुए प्रभाव पूर्ण हो तथा इसके साथ ही साथ सूर्य रेखा तथा भाग्य रेखा का आगे चलकर सम्बन्ध बना हो तो हथेली में अनफा योग होता है । फल : जिसके हाथ में अनफा योग होता है उसका व्यक्तित्व अपने आप में पूर्ण प्रभाव युक्त एवं चुम्बकीय होता है । वह दूसरों पर अपने व्यक्तित्व का प्रभाव डालने में समर्थ होता है । समाज में वह अपने कार्यों से विशेष सम्मानित होता है । [अनफा] ऐसा व्यक्ति अपने विचारों पर दृढ़ रहने वाला, समझदार, सद्गुणी तथा सुशील होता है । वह स्वयं का सम्मान चाहता है तथा दूसरों को भी सम्मानित करने की क्षमता रखता है । ऐसा व्यक्ति हमेशा प्रसन्नचित्त एवं सुखी रहता है । टिप्पणी : यह योग शुक्र सूर्य तथा शनि से मिलकर बनता है । अतः अलग अलग ग्रहों के प्रभाव से उसके फलादेश में भी अन्तर आ जाता है। यदि एक से अधिक ग्रहों का फल सम्मिलित हो तो वहां मिश्रित फल समझना चाहिए । शुक्र :--- यदि हथेली में अनफा योग बन रहा हो और शुक्र पर्वत तथा शुक्र रेखा सबसे अधिक विकसित हो तो वह व्यक्ति प्रसिद्ध प्रेमी होता है तथा जीवन में अपनी पत्नी के अलावा अन्य कई स्त्रियों से सम्पर्क में आता है । वह व्यक्ति दूसरों के दिल को सम्मोहित करने की कला पूर्णतः जानता है । शनि :--- यदि हथेली में अनफा योग हो और शनि पर्वत पूर्णतः विकसित हो तथा शनि रेखा भी प्रभाव पूर्ण हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्यवान होता है एवं प्रसिद्ध कुल में जन्म लेकर सुखमय जीवन व्यतीत करता है । वह अपने शब्दों के माध्यम से दूसरों पर प्रभाव डालने में समर्थ होता है । जनता को किस प्रकार से बातचीत के माध्यम से सम्मोहित किया जा सकता है, यह उसे बखूबी आता है । जीवन भर उसे वाहन सुख बना रहता है तथा जीवन में सुन्दर स्त्रियों से उसका सम्पर्क थोड़े बहुत रूप में रहता ही है । ऐसा व्यक्ति गुणवान, पुत्रवान तथा धनवान होता है । सूर्य :--- यदि हथेली में अनफा योग हो तथा सूर्य पर्वत एवं सूर्य रेखा अपने आप में पुष्ट एवं प्रबल हो तो वह व्यक्ति व्यापार में विशेष रुचि रखने वाला होता है । साथ ही साथ काव्य संगीत आदि कलाओं में भी वह निपुण होता है । ऐसा व्यक्ति नौकरी में विशेष सफलता प्राप्त करता है । तथा शीघ्र ही उच्च पद प्राप्त करने में सफल हो जाता है । उसका शरीर अपने आप में स्वस्थ एवं आकर्षक होता है । तथा

( २१० ) उसके व्यक्तित्व का प्रभाव उससे मिलने वालों पर पड़ता है, जिसकी वजह से समाज में वह अत्यन्त लोकप्रिय हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में सुखी, सफल एवं आनन्दमय जीवन व्यतीत करता हुआ समाज में सम्मानित होता है । सुनफा योग : यदि हथेली में सूर्य शनि तथा बुध पर्वत विकसित हो तथा ये तीनों ही रेखाएं स्पष्ट एवं बिना कटी हुई हों तो उसके हाथ में सुनफा योग होता है । फल ‧ जिस व्यक्ति की हथेली में सुनफा योग होता है वह जीवन में परिश्रमी होता है और परिश्रम के बल पर ही धन संचय करता है और समाज में सम्माननीय स्थान बनाता है । उसके प्रत्येक कार्य में सावधानी और चतुराई होती है । दूरदर्शी होने के कारण इसके सभी निर्णय सही होते हैं । ऐसा व्यक्ति जीवन में पूर्णतः सुखमय जीवन व्यतीत करता है । [चित्र: सुनफा] टिप्पणी . यह योग मुख्यतः सूर्य, शनि, तथा बुध पर्वत की वजह से होता है । इसमें एक शर्त यह होती है कि बुध रेखा शनि रेखा तथा सूर्य रेखा का हथेली के बीच में परस्पर सम्बन्ध होना आवश्यक होता है । नीचे मैं प्रत्येक ग्रह से संबंधित विशेष फल स्पष्ट कर रहा हूँ : बुध :—यदि हथेली में सुनफा योग हो और बुध पर्वत तथा बुध रेखा दूसरों की अपेक्षा ज्यादा विकसित हो, स्पष्ट हो तो वह व्यक्ति कलाओं में विशेष रुचि रखने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति सामाजिक परम्पराओं तथा सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरी तरह से निभाता है । साथ ही ऐसा व्यक्ति सामाजिक रूढ़ियों को मानने वाला बुद्धिमान सुन्दर एवं परोपकारी होता है । शनि :--यदि हथेली में सुनफा योग हो परन्तु शनि पर्वत एवं शनि रेखा विशेष पुष्ट एवं सीधी हों तो वह व्यक्ति बुद्धिमान होता है तथा राजनीति में विशेष सफलता प्राप्त करता है । ऐसे व्यक्ति को जीवन में धन की कोई चिंता नहीं रहती । मन में प्रत्येक बात छिपाकर रखने में सफल रहता है और जब तक कार्य सिद्धि नहीं हो जाती तब तक वह उस बात को उजागर नहीं करता । उसका व्यवहार सरल, सीधा तथा भेदपूर्ण होता है । सूर्यः —यदि हाथ में सुनफा योग हो परन्तु सूर्य पर्वत विशेष रूप से विकसित हो तथा सूर्य रेखा बलवान हो तो वह व्यक्ति उच्च स्तर का सम्मानित अधिकारी

( २११ ) होता है । प्रशासन के क्षेत्र में वह पूर्णतः सफल होता है । तथा उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यों को सही प्रकार से निपटाने में कुशल माना जाता है । ऐसे व्यक्ति साधारण पद से प्रारंभ होकर अत्यन्त उच्च पद पर पहुंचने में सफल होते हैं । अशुभ योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य रेखा टूटी हुई हो तथा सूर्य पर्वत का अभाव हो तो उसके हाथ में अशुभ योग होता है । फल : जिसके हाथ में अशुभ योग होता है वह व्यक्ति कामी, क्रोधी तथा सामान्य स्तर का जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य होता है । वह दूसरों को धोखा देकर पैसा हड़पने में ज्यादा विश्वास रखता है । ऐसा व्यक्ति जीवन में असफल होता है तथा हर कदम पर उसे बाधाओं का सामना करना पड़ता है । अशुभ शुभकर्तरी योग : परिभाषा :—यदि हथेली के बीच का हिस्सा गहरा हो और सूर्य एवं गुरु पर्वत उभरे हुए हो तो उसके हाथ में शुभकर्तरी योग बनता है । फल :—जिसके हाथ में शुभकर्तरी योग होता है । वह व्यक्ति तेजस्वी एवं प्रभावपूर्ण जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है । उसके जीवन में आय के एक से अधिक स्रोत होते हैं, तथा धन संचय करने में वह योग्य होता है । शारीरिक दृष्टि से भी ऐसा व्यक्ति आकर्षक सबल, एवं पुष्ट होता है । शुभकर्तरी पापकर्तरी योग : परिभाषा :—यदि हथेली उथली हो तथा सूर्य एवं शनि पर्वत दबे हुए या कमजोर हों तो पापकर्तरी योग होगा फल :—इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति पापपूर्ण कार्यों में व्यस्त रहता है । दूसरी को धोखा देने या दूसरों को हानि पहुंचाने में उसे आनन्द आता है । ऐसा व्यक्ति कठोर हृदय निर्धन तथा दुखमय जीवन व्यतीत करने को बाध्य होता है । पापकर्तरी योग

( २१२ ) उभयचरिक योग : **परिभाषा :—**यदि हथेली में सूर्य पर्वत पर वर्ग का चिह्न हो तथा कनिष्ठिका अंगुली का ऊपरी सिरा अनामिका के ऊपरी पोर से आगे बढ़ा हुआ हो तो उसके हाथ में उभयचरिक योग बनता है । **फल:—**जिस व्यक्ति के हाथ में उभयचरिक योग होता है वह व्यक्ति दूरदर्शी होने के साथ-साथ परिस्थितियों को भली प्रकार से समझने वाला होता है । ऐसा व्यक्ति न्यायशील होता है । तथा समाज में वह तटस्थता के कारण सम्मानित होता है । ऐसा व्यक्ति अविचलित पुष्ट, स्वस्थ शरीर तथा अपनी जबान का पक्का होता है और यदि किसी को वचन दे देता है तो उसे यथासंभव पूरा करने का प्रयत्न करता है । टिप्पणी : —उभयचरिक योग में सूर्य पर्वत पर पूर्ण वर्ग का चिह्न होना आव- श्यक होता है । परन्तु यह वर्ग का चिह्न जितना छोटा होता है उतना ही ज्यादा शुभ एवं अनुकूल प्रभाव वाला माना जाता है ।

पर्वत योग : **परिभाषा :—**यदि हथेली में भाग्य रेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर सीधी शनि पर्वत तक पहुंचती हो ; तथा यह रेखा पतली, गहरी, स्पष्ट तथा बिना कटी-फटी हो और अपने उद्गम स्थान पर मछली का आकार बनाती हो तो उसके हाथ में पर्वत योग का निर्माण होता है । **फल :—**जिसके हाथ में पर्वत होता है, वह व्यक्ति अपने भाग्य का स्वयं ही निर्माता होता है । जीवन में वह जिस कार्य में भी हाथ डालता है उसे भाग्य साथ देता है । और वह उन कार्यों में सफलता प्राप्त करता है । शिक्षा के क्षेत्र में इसे पूर्ण सफलता मिलती है, तथा अपने यौवन काल में यह गरीबों, अनाथों एवं पीड़ितों की मदद करता है । मेरे अनुभव में यह आया है कि यह इन सभी गुणों से युक्त होने पर भी भोगी होता है । तथा अपनी पत्नी के अलावा अन्य कई स्त्रियों से उसके पत्नीवत् मधुर सम्बन्ध रहते हैं । समाज में उसकी प्रशंसा होती है, तथा जीवन में उसे किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता ।

( २१३ ) टिप्पणी :—सामुद्रिक ग्रन्थों में इसके बारे में यह लिखा हुआ है कि ऐसा व्यक्ति प्रयत्न करे तो सरपंच, म्युनिसिपल कमिश्नर या जिला बोर्ड के सदस्य का पद सुशो- भित करता है । यद्यपि ऐसे व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ नहीं होते; परन्तु फिर भी ऊँचे स्तर के मन्त्रियों एवं विधायकों का विश्वासपात्र होता है । वासी योग : परिभाषा :—यदि हथेली में शनि मुद्रा एवं बुध मुद्रा विद्यमान हो तो वासी योग होता है । फल :—जिसके हाथ में वासी योग होता है वह व्यक्ति अपने कार्य में चतुर एवं दक्ष होता है । ऐसा व्यक्ति हर समय मुस्कराने वाला प्रसन्नचित गुणी और चतुर होता है तथा उसके प्रत्येक कार्य में चतुराई स्पष्ट दिखाई देती है । परिवार की दृष्टि से भी ऐसे व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता । पहले तो उसके सामने कोई शत्रु आता ही नहीं और यदि आता भी है तो स्वतः ही उसका पतन हो जाता है । यदि हाथ में वासी योग हो, परन्तु भाग्यरेखा टूटी हुई हो तो वह व्यक्ति जीवन में कई ऐसी भयंकर भूलें कर लेता है जिससे वह दुखी और परेशान रहता है । उसके मन में हर समय बदला लेने की भावना बनी रहती है और धोखा देकर धन संचय करने की प्रवृत्ति ही उसके जीवन में विशेष रूप से रहती है । यदि सूर्य रेखा टूटी हुई, कमजोर हो या सूर्य रेखा का अभाव हो तो वह व्यक्ति अत्यन्त साधारण एवं दुखमय जीवन व्यतीत करने के लिये बाध्य होता है । टिप्पणी : वासी योग देखते समय सूर्य रेखा तथा शनि रेखा पर भी विशेष ध्यान रखना चाहिए । इनका अध्ययन करने के बाद ही उसका फलाफल किया जाना ज्यादा उचित एवं प्रामाणिक रहता है । वेशि योग : परिभाषा : यदि हथेली में बुध मुद्रा तथा शनि मुद्रा हो पर इसके साथ ही साथ 'गर्डेल आफ वीनस' अर्थात् शुक्र मुद्रा भी हो तो उसके हाथ में वेशि योग होता है । फल : जिस व्यक्ति का जन्म वेशि योग में होता है वह व्यक्ति सौम्य स्वभाव वाला, चतुर, धीर तथा गम्भीर होता है । अपनी बातचीत के माध्यम से वह दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है तथा ऐसे व्यक्ति नेतृत्व करने में दक्ष होते हैं । परन्तु इतना होने पर भी उसके जीवन में आर्थिक अभाव

( २१४ ) बराबर बना रहता है। यद्यपि वह जीवन में लाखों कमाता है परन्तु उसका व्यय बढ़ा-चढ़ा होने के कारण लाखों खर्च भी कर डालता है। एक प्रकार से देखा जाय तो ऐसे व्यक्ति के जीवन में बैंक बैलेंस नहीं के बराबर होता है। इतना होने पर भी समाज में उसका सम्मान होता है तथा कई व्यक्ति उसके आदर्शों का अनुकरण करते हैं। भास्कर योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य रेखा का बुध रेखा से सम्बन्ध हो, बुध रेखा का चन्द्र रेखा से सम्बन्ध हो तथा गुरु पर्वत एवं गुरु रेखा अपने आप में स्पष्ट दीर्घ एवं पुष्ट हो तो भास्कर योग बनता है। फल : भास्कर योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सफल होता है। जीवन में उसे भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। वह एक से अधिक कलाएं जानता है जिसकी वजह से उसके आय के स्रोत भी एक से अधिक होते हैं। शारीरिक दृष्टि से ऐसा व्यक्ति पुष्ट तथा प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व लिये हुए होता है। शत्रु इससे भयभीत रहते हैं तथा मित्र बनाने की कला में यह विशेष चतुर [भास्कर योग] होता है। साहित्य, संगीत, कला आदि में यह व्यक्ति रुचि रखने वाला होता है। तथा कलाकारों को धन एवं सहायता देकर समाज में यश, सम्मान तथा वाहवाही भी लूटता है। ऐसे व्यक्ति के पास एक प्रकार से चुम्बकीय आकर्षण होता है। जिसकी वजह से उसके जीवन में पुरुष मित्र एवं महिला मित्रों की कोई कमी नहीं रहती। टिप्पणी :—इस योग में गुरु सूर्य, बुध, तथा चन्द्र पर्वत पूर्ण विकसित होने चाहिए, साथ ही साथ सूर्य रेखा तथा बुध रेखा अपने आप में निर्दोष होकर आपस में मिलती हो। इसी प्रकार चन्द्र रेखा से बुध रेखा का सम्बन्ध बनता हो परन्तु चन्द्र रेखा का सूर्य रेखा से सम्बन्ध होना उचित नहीं होता। गन्धर्व योग : परिभाषा :—यदि दाहिने हाथ तथा बायें हाथ की हथेलियों में शुक्र पर्वत पूर्ण विकसित हो तथा उन पर वर्ग का चिह्न हो, साथ ही सूर्य पर्वत एवं सूर्य रेखा पुष्ट एवं स्पष्ट हो तो गंधर्व योग होता है। फल :—जिसके हाथ में गंधर्व योग होता है वह व्यक्ति प्रसिद्ध गायक, अथवा संगीतकार होता है। ऐसे व्यक्ति अपना पूरा जीवन कला की साधना में लगा देते हैं और इस क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करते हैं। कला के माध्यम से ये व्यक्ति [गंधर्व]

( २१५ ) विदेशों में भी नाम कमाते हैं। इनके जीवन में धन, तथा यश की किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती तथा जीवन में भौतिक दृष्टि से अपनी समस्त इच्छाएं पूर्ण करता है । टिप्पणी : इस योग का अध्ययन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसके हाथ में सूर्य रेखा तथा सूर्य पर्वत विकसित हो तथा सही हो । इसके अलावा शुक्र पर्वत दोनों ही हाथों में विकसित हो । आर्थिक दृष्टि से इन व्यक्तियों के जीवन में कोई बाधा नहीं रहती । वसुमति योग : परिभाषा : यदि उंगलियां बिना गांठ वाली तथा कुछ लम्बाई लिये हुए होती है, साथ ही गुरु सूर्य शनि तथा बुध पर्वत अपने-अपने स्थानों पर विकसित हों तो वसुमति योग बनता है । फल : ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में पूर्ण भौतिक सुख प्राप्त करता है तथा उसके जीवन में धन की कोई कमी नहीं रहती । ऐसा व्यक्ति अपने ही परिश्रम से धन उपार्जित कर समाज में यश, तथा सम्मान प्राप्त करता है । टिप्पणी : इस योग में यह आवश्यक है कि हथेली मे गुरु, सूर्य, शनि तथा बुध के पर्वत विकसित हों पर इसके साथ ही साथ वे अपने स्थान से च्युत न हों। ऐसा होने पर ही वसु- मति योग सम्भव हो सकता है । परइचतुस्सागर योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य, बुध, गुरु, तथा शनि पर्वत दबे हुए हों या सभी पर्वत अपने-अपने स्थान से च्युत हों तो परइचतुस्सागर योग बनता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जीवन में आर्थिक अभावों से पीड़ित रहता है। साथ ही उसे अपने जीवन में मानसिक संतुष्टि अथवा आराम नहीं मिलता । वह जितना भी प्रयत्न करता है उतनी ही ज्यादा कठिनाइयां उसके जीवन में आती रहती हैं। वस्तुतः ऐसा व्यक्ति अपने जीवन को दरिद्रता के साथ ही व्यतीत करता है । परश्चतुस्सागर

( २१६ ) चतुस्सागर योग : परिभाषा : यदि हथेली के सभी पर्वत विकसित हों तथा सभी रेखाएं पुष्ट एवं सीधी, सरल, तथा स्पष्ट हों तो ऐसे व्यक्ति के हाथ में चतुस्सागर योग बनता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अपने ही कार्यों से प्रसिद्ध होते हैं और अपने प्रयत्नों से समाज का अथवा देश का नेतृत्व करने में सफलता प्राप्त करते हैं । ऐसे व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः सुखी एवं सफल होते हैं । इनकी वाणी में ओज होता है तथा अपने भाषणों के माध्यम से लोगों को प्रभावित करने की पूरी क्षमता रखते हैं। ये व्यक्ति अपने प्रयत्नों को अपने अनुकूल बनाकर विदेश यात्राएं करते हैं तथा समुद्र पारीय देशों में भी ख्याति लाभ करते हैं। यदि ऐसे व्यक्ति राजकीय सेवा में होते हैं तो उनकी नौकरी ऐसी होती है जिसकी वजह से इनके जीवन में भ्रमण विशेष रूप से रहता है तथा उसमें सफलता प्राप्त कर लेते हैं। पारिवारिक दृष्टि से ये व्यक्ति पूर्णतः सन्तुष्ट होते हैं । [चित्र-शीर्षक: चतुस्सागर] टिप्पणी : इस योग में राहू और केतु पर्वतों पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता, इसके अलावा सभी पर्वत अपने आप में पूर्ण विकसित अवस्था में होने चाहिए और उन पर किसी प्रकार का बिन्दु व जाल नहीं होना चाहिए । पर इसके साथ ही उस व्यक्ति की हथेली लचीली, कोमल तथा गुलाबीपन लिये हुए होनी आवश्यक है । रोग योग : परिभाषा : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों के अनुसार निम्नलिखित योग यदि हथेली में पाये जाएं तो रोग योग होता है । १. दुर्बल शरीर : यदि नाखून पतले हों तथा जीवन रेखा फीकी हो साथ ही वह जंजीरदार होकर नीचे की ओर झुकी हुई हो । २. अकाल मृत्यु : यदि हृदय रेखा शनि पर्वत को स्पर्श करती हो, साथ ही मस्तिष्क रेखा के बीच में क्रॉस का चिह्न हो तथा जीवन रेखा कटी हुई हो । [चित्र-शीर्षक: रोग योग]

( २१७ ) ३. बचपन में दुर्बलता : यदि जीवन रेखा बहुत अधिक मोटी हो और गुरु पर्वत के नीचे जंजीरदार हो गई हो । ४. वंशगत रोग : जहां से जीवन रेखा प्रारम्भ हो रही हो वहीं पर द्वीप का चिह्न हो तो उस व्यक्ति को वंशगत रोग होता है । ५. कमजोर शरीर : यदि जीवन रेखा सीढ़ीदार तथा टूटी हुई हो । ६. बचपन में दुर्घटना : यदि भाग्य रेखा के प्रारम्भ में कोई बिन्दु का चिह्न हो । ७. अविकसित शरीर : यदि जीवन रेखा के बीच में कई शाखाएं नीचे की ओर बढ़ी हों तथा वह टूटी हुई हो । ८. बुढ़ापे में कमजोरी : यदि स्वास्थ्य रेखा चौड़ी हो और अन्त में वह जाकर गुच्छेदार हो गई हो अथवा टूट गई हो । ६. आकस्मिक मृत्यु :-यदि हृदय रेखा शनि पर्वत के नीचे जाकर अचानक से दिखाई देती हो या मस्तिष्क रेखा मणिबन्ध को स्पर्श करती हो । १०. हत्या : यदि जीवन रेखा मस्तिष्क रेखा तथा हृदय रेखा अपने प्रारम्भिक स्थान पर परस्पर पूरी तरह से जुड़ी हुई हो और जंजीरदार हो गई हो । ११. पशु से दुर्घटना : यदि मस्तिष्क रेखा सूर्य पर्वत के नीचे या शनि पर्वत के नीचे अचानक टूट गई हो । १२. सिर पर चोट : यदि मस्तिष्क रेखा पर लाल रंग के तारे का चिह्न हो । १३. यौवनकाल में भयंकर दुर्घटना :-यदि मस्तिष्क रेखा नीचे की ओर झुकी हुई हो तथा लहरदार दिखाई देती हो । १४. फांसी : यदि जीवन रेखा बीच में ही एकाएक समाप्त हो गई हो और हृदय रेखा, मस्तिष्क रेखा तथा जीवन रेखा से बने हुए त्रिकोण में क्रास या दो तारक चिह्न हों । १५. कारावास : यदि भाग्य रेखा के प्रारम्भ में कई रेखाएं निकल कर नीचे की ओर जा रही हों और वह भाग्य रेखा मध्यमा के दूसरे पौर तक पहुंच गई हो । १६. जल में मृत्यु : यदि चन्द्र पर्वत पर वृत्त का चिह्न हो अथवा चन्द्र पर्वत पर त्रिकोण हो अथवा बुध पर्वत पर बिन्दु, त्रिकोण या तारक चिह्न हो ।

( २१८ ) १७. यात्राकाल में मृत्यु : यदि यात्रा रेखाएं टूटी हुई तथा जरूरत से ज्यादा चौड़ी हों। १८. कैंसर : यदि दोनों हाथों में मंगल रेखा पर शाखाएं निकली हुई हों या जीवन रेखा के प्रारम्भ में तारे का चिह्न हो। १६. मिरगी : यदि हृदय रेखा पर क्रास हो या स्वास्थ्य रेखा कई रंगों की दिखाई देती हो। २०. पक्षाघात : यदि हृदय रेखा तथा चन्द्र पर्वत पर दो खड़ी लम्बी लाइनें हों। २१. मस्तिष्क रोग : यदि मस्तिष्क रेखा लहरदार या सीढ़ीदार हो तथा उसका झुकाव स्वास्थ्य रेखा की ओर हो या मस्तिष्क रेखा स्वास्थ्य रेखा से जुड़ी हुई हो या जुड़ने के स्थान पर रेखाओं का गुच्छा सा बन गया हो। २२. दमा : यदि हाथ लुजलुजा हो तथा जीवन रेखा पर द्वीप का चिह्न हो। २३. अन्धा : यदि जीवन रेखा पर वृत्त हो या हृदय रेखा पर धब्बा हो अथवा स्वास्थ्य रेखा पर क्रॉस हो या सूर्य रेखा के प्रारम्भ में बड़ा काला धब्बा हो। २४. मस्तिष्क रोग : यदि मस्तिष्क रेखा जरूरत से ज्यादा चौड़ी हो तथा उस पर काला धब्बा हो। २५. एनीमिया : यदि हृदय रेखा चौड़ी और कमजोर हो तथा नाखूनों का रंग नीला सा हो। २६. जुकाम या नजला : यदि चन्द्र पर्वत बहुत अधिक विकसित तथा उठा हुआ हो। २७. हृदय रोग : यदि हृदय रेखाएं दो हों तथा बीच-बीच में आपस में मिल जाती हों अथवा हृदय रेखा शनि पर्वत पर पहुंच गई हो। २८. गठिया : यदि चन्द्र पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो और पूरे चन्द्र पर्वत को कोई एक रेखा काटती हो या उसे दो भागों में विभाजित करती हो। अथवा जीवन रेखा के अन्तिम स्थल पर छोटी-छोटी रेखाओं का गुच्छा हो। २६. मूर्च्छा का रोग : यदि स्वास्थ्य रेखा जीवन रेखा से प्रारम्भ हो रही हो तथा मस्तिष्क रेखा हृदय रेखा की ओर बढ़ रही हो तो उसे जीवन में मूर्च्छा के बार-बार दौरे आते हैं।

( २१६ ) ३०. बहरापन : बृहस्पति पर्वत कमजोर हो तथा इस पर्वत के नीचे मस्तिष्क रेखा पर बिन्दु का चिह्न हो। ३१. क्षय रोग : यदि नाखून लम्बे, पतले तथा मुड़े हुए हों साथ ही मस्तिष्क रेखा पर कई छोटे-छोटे द्वीप हों। ३२. जलोदर : चन्द्र पर्वत जरूरत से ज्यादा उभरा हुआ हो और उस पर एक से अधिक क्रॉस के चिह्न या बिन्दु के चिह्न हों। ३३. कम्प रोग : यदि मस्तिष्क रेखा पर काला धब्बा हो और जीवन रेखा के प्रारम्भ में तारे का चिह्न हो तो उसके शरीर के अंग थोड़े बहुत रूप में कांपते ही रहते हैं। ३४. डिफ्थीरिया : यदि जीवन रेखा तथा मस्तिष्क रेखा कटी हुई हो एवं शनि पर्वत के नीचे चतुर्भुज तथा क्रॉस का चिह्न हो। ३५. मोटापा : यदि हृदय रेखा टूटी हुई हो और हाथ मोटा तथा गुदगुदा हो। ३६. हिस्टीरिया : यदि हाथ सामान्य स्तर का हो तथा चन्द्र पर्वत पर एक से अधिक तारे के चिह्न हों। ३७. घातक रोग : यदि जीवन रेखा टूटी हुई हो तथा उसका एक खण्ड शुक्र पर्वत से सम्बन्धित हो। ३८. पाचनशक्ति में कमी : मस्तिष्क रेखा तंग हो तथा स्वास्थ्य रेखा लहरदार हो। ३६. स्मृति नाश : यदि मस्तिष्क रेखा कई जगह से टूटी हुई हो तो उसकी स्मरण शक्ति बिल्कुल नहीं होती। ४०. वायु रोग : यदि जीवन रेखा के अन्त में कई शाखाएं निकल कर नीचे की ओर बढ़ रही हों। ४१. प्लूरिसी : यदि जीवन रेखा से कोई रेखा निकल कर शनि पर्वत पर पहुंचती हो तथा वहां त्रिकोण का चिह्न हो अथवा दो तारक चिह्न हों, तो ऐसे व्यक्ति को प्लूरिसी अर्थात् उसके फेफड़ों में पानी का जमाव हो जाता है। ४२. हत्या : यदि अनामिका के नीचे से पौर पर तारक चिह्न हो तो पिस्तौल की गोली खाकर उसकी मृत्यु होती है। गांधी जी के हाथ में यह चिन्ह स्पष्ट रूप से दिखाई देता था। ४३. आत्म हत्या : यदि दूसरी उंगली का पहला पौर बहुत ज्यादा लम्बा हो या भाग्य रेखा के अन्त पर तारे का चिन्ह हो।