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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

( ३४ ) बृहदारण्यकोपनिषद् ६।५।३ में उन्होंने मैत्रेयी को आत्मा के विषय में तथा अमरता के बारे में जो व्याख्यान दिये हैं वे भारतीय दर्शन में उत्कृष्ट कोटि के चिन्तन के परिचायक हैं। इस उपनिषद् के तीसरे और चौथे अध्यायों के प्रायः सभी ब्राह्मणों में याज्ञवल्क्य किसी न किसी आचार्य से दार्शनिक विवेचन करते हुए दिखाई पड़ते हैं, जैसे जनक, अश्वल, आर्तभाग, भुज्यु, कोहल, गार्गी, आरुणि या शाकल्य से । महाभारत में याज्ञवल्क्य युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर उपस्थित दिखाये गये हैं, यह कुछ विचित्र प्रतीत होता है। याज्ञवल्क्य-रचित एक योगशास्त्र का भी उल्लेख कूर्मपुराण १।२५-२७ में मिलता है और विण्टरनिट्स का विचार है कि यह याज्ञवल्क्यगीता का निर्देश करता है जिसमें योग की व्याख्या की गयी है ।१ प्रश्न उठता है : क्या वैदिक परम्परा के ऋषि याज्ञवल्क्य ही प्रस्तुत याज्ञ- वल्क्यस्मृति के प्रणेता हैं ? प्रश्न सकारण है। वैदिक ग्रन्थों की भाषाशैली से स्मृति की भाषा और शैली नितान्त भिन्न है और इनमें समय की दृष्टि से सामीप्य नहीं है, और शायद इसी तथ्य को दृष्टिगत करके मिताक्षरा टीका के लेखक विज्ञानेश्वर ने स्पष्ट संकेत किया है कि याज्ञवल्क्य के किसी शिष्य ने धर्मशास्त्र को संक्षिप्त करके वर्तमान रूप प्रदान किया है। परन्तु स्वयं याज्ञवल्क्य- स्मृति ( ३. ११० ) में इस बात की घोषणा की गई है कि इस स्मृति के प्रणेता आरण्यक अर्थात् बृहदारण्यकोपनिषद् के रचयिता हैं और उन्हें सूर्य ने ज्ञान प्रदान किया, तथा वे योगी थे- ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान् । योगशास्त्रं च मत्प्रोक्तं ज्ञेयं योगमभीप्सता ॥ याज्ञवल्क्य के साथ इस स्मृति का संबन्ध संभवतः इसे महत्ता प्रदान करने के लिए जोड़ा गया है । किन्तु एक बात निर्विवाद है और वह यह कि शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा से इस स्मृति का संबन्ध है, इस तथ्य पर यहाँ हमने याज्ञवल्क्यस्मृति का परिचय देते समय प्रकाश डाला है । बृहदारण्यकोपनिषद् ६।३।१५ में याज्ञवल्क्य को उद्दालक आरुणि का शिष्य बताया गया है और राजा जनक के साथ इनके संबन्धों के कारण इन्हें विदेह का निवासी कहते हैं, किन्तु मैकडानल और कीथ के मत में यह सन्देहास्पद है- ‘Despite the legend of Janaka’s patronage of him, his association with Uddalaka, the Ku'ru Pancala renders this doubtful.’ -वैदिक इण्डेक्स, भाग २, पृ० १८९ । शतपथब्राह्मण के अन्त में ( १४।९।४।२९ आदि ) आचार्यों की जो सूची दी गयी है उसमें याज्ञवल्क्य ४५ वें स्थान पर आते हैं और उसमें भी उनके गुरु का १. विण्टरनिट्स, वही, भाग १, पृ० ५७४, टिप्पणी ।

( ३५ ) नाम उद्दालक आरुणि है। जहाँ तक याज्ञवल्क्य के समय का प्रश्न है वे परवर्ती संहिताओं और ब्राह्मणों के काल के ऋषि हैं। किसी भी स्थिति में वे पाणिनि के पहले के हैं। याज्ञवल्क्यविषयक ब्राह्मणीय आख्यानों का विवेचन प्रस्तुत लेखक ने अपने शोधग्रन्थ ‘द लेजेण्ड्स इन द शतपथब्राह्मण’ में किया है । योगियाज्ञवल्क्य एवं बृहद् याज्ञवल्क्य नाम की याज्ञवल्क्य की रचनाओं के विषय में डा० काणे ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में डेकन कालेज संग्रहालय की पाण्डुलिपियों का हवाला दिया है, जिनमें प्रथम में १२ अध्याय और ४९५ श्लोक हैं तथा दूसरे में १२ अध्याय और ९३० श्लोक हैं। वृद्धयाज्ञवल्क्य नाम की स्मृति का भी उल्लेख मिलता है। इससे विश्वरूप ने अपनी टीका में उद्धरण लिए हैं। मिताक्षरा में भी इसका उल्लेख आया है। —उमेशचन्द्र पाण्डेय ४ प्र० या०

( १ ) उपोद्घातप्रकरण

विषयानुक्रम ( टीका में विवेचित महत्त्वपूर्ण विषयों का भी निर्देश इस विषयानुक्रम में किया गया है ) १. आचाराध्याय ( १ ) उपोद्घातप्रकरण मुनियों की जिज्ञासा - १ छः प्रकार का स्मार्त धर्म - २ धर्म के चौदह स्थान - ३ धर्मशास्त्रकार ऋषि - ” धर्म के कारक हेतु - ४ धर्म के ज्ञापक हेतु - ” देश आदि कारक हेतुओं का अपवाद - ५ हेतुविषयक सन्देह का निर्णय - ” ( २ ) ब्रह्मचारिप्रकरण वर्ण - ५ गर्भाधान आदि संस्कार - ६ संस्कार करने का फल - ७ स्त्रियों के संस्कार - ” उपनयन का समय - ” गुरु के धर्म - ” शौच के नियम - ८ प्राजापत्य आदि तीर्थ - ९ आचमन की विधि - ” प्राणायाम - १० सावित्रीजप की विधि - ” अग्निकार्य - ११ अभिवादन की विधि - ” अध्यापन के योग्य व्यक्ति - ” दण्ड इत्यादि का धारण - १२ भिक्षाचरण की विधि - ” भोजन का नियम - १३ ब्रह्मचारी के लिए निषिद्ध कर्म - १३ गुरु, आचार्य आदि के लक्षण - १४ उपाध्याय, ऋत्विक् के लक्षण - ” ब्रह्मचर्य की अवधि - ” उपनयन की समयसीमा - १५ द्विजत्व का कारण - ” वेदाध्ययन का फल - १६ काम्यब्रह्मयज्ञाध्ययन का फल - ” पञ्चमहायज्ञ का फल - १७ नैष्ठिक ब्रह्मचारी के धर्म - १८ ( ३ ) विवाहप्रकरण गुरुदक्षिणा के पूर्व का स्नान - १८ कन्या के लक्षण - २० सपिण्ड का विचार - २१ कन्यावरण का नियम - २२ कन्यादान में वर के नियम - ” द्विजातियों के लिए शूद्रा से विवाह का निषेध - २३ अनुलोमविवाह - ” आठ प्रकार के विवाह - २४ सवर्णा से विवाह में विशेषता - २५ कन्यादान देने वाले - ” कन्याहरण का दण्ड - २६ कन्या के दोष का गोपन - ” नियोग की विधि - २७ व्यभिचारिणी के लिए दण्ड - २८ स्त्रियों की पवित्रता - ” दूसरे विवाह के हेतु - २९

ऋतुकाल का समय ,, ( ६ ) स्नातकधर्मप्रकरण

( ३७ ) पतिव्रता की प्रशंसा ३० जीवनवृत्ति का चुनाव ५४ अधिवेत्ता के लिए दण्ड ,, श्रौतकर्म ५५ स्त्री के धर्म ,, यज्ञ के लिए हीनभिक्षा का निषेध ५६ शास्त्रानुसार दारसंग्रह का फल ३१ आर्थिक अवस्था का विचार ,, ऋतुकाल का समय ,, ( ६ ) स्नातकधर्मप्रकरण स्त्रीगमन के लिए निषिद्ध दिन ,, स्नातक के व्रत ५७ ऋतुकाल के अतिरिक्त स्त्रीगमन ३२ स्नातक का राजादि धन लेना ५८ स्त्रियों का आदर ३५ शारीरिक पवित्रता ५९ स्त्रियों के कर्तव्य ,, स्नातक के औपचारिक कर्म ६० प्रोषितपतिका का कर्तव्य ३६ दान लेने में दोष ६३ पतिहीना का कर्तव्य ३८ उपाकर्म का समय ,, अनेक पत्नियों में सहधर्मिणी ,, उत्सर्जन का समय ६४ पत्नी की मृत्यु पर दूसरा विवाह ३९ अनध्याय के अवसर ,, ( ४ ) वर्णजातिविवेकप्रकरण औपचारिक कर्तव्य ६७ सजातिपुत्र ,, धर्माचरण का आधार ६९ अनुलोमविवाह से उत्पन्न पुत्र ४० विवाद के परित्याग का फल ,, प्रतिलोमविवाह से उत्पन्न पुत्र ४१ स्नान का नियम ७० जाति के उत्कर्ष का नियम ४३ दूसरे की वस्तु के उपयोग का निषेध ,, ( ५ ) गृहस्थधर्मप्रकरण अभोज्य अन्न ,, स्मार्त और श्रौतकर्म की अग्नि ४४ अन्नग्रहण के नियम का अपवाद ७२ गृहस्थ के धर्म ,, ( ७ ) भक्ष्याभक्ष्यप्रकरण योगक्षेम के लिए राजाश्रय ४५ निषिद्ध अन्न ७२ वेद आदि का जप ४६ कतिपय बासी खाद्य वस्तुएँ ७३ पञ्चमहायज्ञ ,, अपेय दूध ७४ भोजन कराने का क्रम ४७ मांसभक्षण के लिए निषिद्ध पक्षी ७५ अतिथियों को भोजन कराने में प्याज आदि का निषेध ७७ वर्ण का विचार ४८ मांसभक्षण का अवसर ७८ वेदपाठी का सत्कार ४९ यज्ञ के अतिरिक्त पशुवध का फल ७९ मधुपर्क के पात्र ,, मांस न खाने का फल ,, सायंकालीन कर्तव्य ५१ ( ८ ) द्रव्यशुद्धिप्रकरण धर्म, अर्थ, काम का संतुलन ,, सोने के पात्रों की शुद्धि ८० मान्य व्यक्ति ५२ यज्ञिय पात्रों की शुद्धि ८१ मार्ग देने योग्य व्यक्ति ,, लेपयुक्त पात्रों की शुद्धि ,, द्विजातियों के कर्तव्य ,, वस्त्रों की सफाई ८२ शूद्र के कर्तव्य ५३ पृथ्वी की शुद्धि ८४ साधारण धर्म ५४ अन्न की शुद्धि ,,

( ३८ ) [बायाँ स्तम्भ] जल और मांस की शुद्धि का विचार ८७ पशुओं के मुख की शुद्धि-अशुद्धि ८८ मुख की शुद्धि ८९ आचमन के अवसर " ( ९ ) दानप्रकरण • ब्राह्मणों का महत्त्व ९० दान की वस्तुएँ ९१ दान के पात्र ९२ गोदान और उसका फल " उभयतोमुखी गोदान ९३ गोदान के तुल्य कर्म ९४ दान की अन्य वस्तुएँ " दान न लेने की प्रशंसा ९६ अयाचित वस्तु को स्वीकार करना " दाता के चरित्र का विचार ९७ वृत्तिनिर्वाह के लिए नियमापवाद " ( १० ) श्राद्धप्रकरण श्राद्ध का अर्थ ९७ पार्वणश्राद्ध का स्वरूप " श्राद्ध के ब्राह्मण ९८ श्राद्ध में वर्जित ब्राह्मण ९९ पार्वणश्राद्ध का प्रयोग १०१ अग्नौकरण १०६ ब्राह्मण भोजन की विधि १०८ पिण्डदान १०९ अक्षय्योदकदान ११० स्वधावाचन " ब्राह्मणप्रार्थना और विसर्जन १११ वृद्धिश्राद्ध ११२ एकोद्दिष्ट कर्म ११३ सपिण्डीकरण ११४ एकोद्दिष्ट का समय १२१ भोज्यवस्तुओं का विशिष्ट फल " श्राद्ध की तिथि के अनुसार फल १२३ नक्षत्र के अनुसार श्राद्ध का फल १२४ श्राद्ध के देवता १२५ [दायाँ स्तम्भ] ( ११ ) गणपतिकल्पप्रकरण विघ्न के कारक हेतु १२६ विघ्न के ज्ञापक हेतु १२७ विघ्न के प्रत्यक्ष लक्षण " विघ्न की शान्ति के लिए कर्म १२८ स्नपन की विधि " उपस्थान के मन्त्र १३२ ग्रहपूजा १३३ महागणपति की पूजा का फल १३४ ( १२ ) ग्रहशान्तिप्रकरण ग्रहयज्ञ १३४ नव ग्रहों के नाम १३५ ग्रहों की मूर्तियों की धातुएँ " ग्रहपूजा की विधि १३६ ग्रहपूजा के मन्त्र " ग्रहपूजा की समिधाएँ " नवग्रहों के भोजन १३७ ग्रहपूजा की दक्षिणा १३८ दुष्टग्रहों की पूजा " ( १३ ) राजधर्मप्रकरण • अभिषिक्त राजा का धर्म १३९ राजा का मन्त्री १४१ राजा का पुरोहित " राजा द्वारा ब्राह्मणों का सत्कार १४२ राजा का लक्ष्य " भूमिदान का लेख्यकरण १४३ लेख्यकरण की विधि " राजा का निवासस्थान १४४ विभागीय अध्यक्षों की नियुक्ति १४५ युद्ध में अपहृत धन का दान " युद्ध में वीरगति " युद्ध में अवध्य व्यक्ति १४६ राजा का दैनिक कार्यक्रम " राजा का विशेष व्यक्तियों से विशेष व्यवहार १४९ प्रजापालन का फल " पीडित प्रजा की रक्षा १५०

( ३६ ) धर्मपूर्वक कोश की वृद्धि १५१ दूसरे राष्ट्र की विजय का फल ,, पराजित देश की मर्यादा का पालन १५२ मन्त्रणा का गोपन ,, पड़ोसी राज्यों से सतर्कता १५३ साम दान आदि उपाय ,, सन्धि और विग्रह १५४ आक्रमण करने का समय ,, दैव और पौरुष ,, मित्र की प्राप्ति की श्रेष्ठता १५५ राज्य के अङ्ग १५५ दण्ड और धर्म ,, दण्डधारण की योग्यता ,, अनुचित दण्डप्रयोग का अधर्म १५७ शास्त्रानुसार दण्डप्रयोग का फल ,, अधर्मी स्वजन भी दण्ड्य ,, उचित दण्डप्रयोग का पुण्य १५८ त्रसरेणु, लिक्षा, राजसर्षप, गौरसर्षप, मध्यमयव, कृष्णल, माष, सुवर्ण और पल का परिमाण १५९ रूप्यमाष, धरण, पल, निष्क, कर्ष, पण १६० उत्तम, मध्यम, अधम साहस के लिए आर्थिक दण्ड की मात्रा १६१ दण्ड के प्रकार १६२ दण्डव्यवस्था के निमित्त ,, २. व्यवहाराध्यायः ( १ ) साधारणव्यवहारमातृका- प्रकरण व्यवहार के सभासदों की योग्यता १६४ राजा की अनुपस्थिति में धर्मज्ञ ब्राह्मण की नियुक्ति १६५ धर्मविरुद्ध सभासदों को दण्ड १६६ व्यवहार के विषय १६६ व्यवहार की कार्यवाही १६९ चार प्रकार का विवाद १७४ ( २ ) असाधारणव्यवहारमातृका- प्रकरण प्रत्यभियोग १७५ कलह और साहस के अपराध में अभियोग १७६ अभियोग को छिपाने पर दण्ड १७७ तात्कालिक निर्णय वाले वाद १७८ दुष्ट साक्षी के लक्षण १७९ साक्षियों का क्रम १८० सपणविवाद का निर्णय १८१ दो धर्मशास्त्रवचनों में विरोध की स्थिति १८३ लिखित, भुक्ति, साक्षी प्रमाण १८४ दूसरे का कब्जा होने पर अधिकार निर्णय १८६ इसका अपवाद १८९ लेख और भोग का विचार १९२ आगम या लेख का उपयोग १९३ व्यवहार देखने वाले अन्य व्यक्ति १९४ पुनर्विचार के योग्य व्यवहार १९५ असिद्धव्यवहार १९५ खोयी वस्तु के विषय में विचार १९७ चोरों से छीने गये धन १९९ ( ३ ) ऋणादानप्रकरण ब्याज की दर १९९ ऋण की वापसी २०२ ऋण भुगतान में जाति का विचार २०३ ऋण दिलवाने में राजा का अंश २०३ ऋण न लौटाने पर जाति के अनुसार कार्य २०४ ब्याज न लगने की स्थिति ,, ऋणी की मृत्यु पर ऋण भुगतान २०५ न लौटाये जाने वाले दूसरे के ऋण ,, स्त्रियों द्वारा लिया गया ऋण २०६ स्त्री द्वारा देय ऋण - पुत्र और पौत्र द्वारा देय ऋण २०७ प्रातिभाव्य का अर्थ २११

( ४० ) अनेक प्रतिभू द्वारा ऋण भुगतान २१३ | लेख्य के ऋण की वापसी की प्रतिभू द्वारा स्त्री का आदान-प्रदान २१४. | अवधि २३८ बन्धक रखी वस्तु के प्रणष्ट होने का | दूसरा लेख्य लिखने की स्थिति २३९ समय २१५ | सन्दिग्ध लेख्य की शुद्धि २४० ब्याज न देने की स्थितियाँ २१६ | ऋण भुगतान पर लेख्य २४१ आधिनाश पर दूसरी आधि की | ( ७ ) दिव्यप्रकरण व्यवस्था २१७ | दिव्य और उसके भेद २४२ बन्धक वापस न देने पर दण्ड २१९ | दिव्य के प्रयोग के पात्र और भोग्य आधि के विषय में विचार २२० | अवसर २४३ ( ४ ) उपनिधिप्रकरण | तुलादिव्य के लिए अयोग्य व्यक्ति २४५ उपनिधि की परिभाषा २२१ | तप्तकाल, विष, तुलादिव्य की उपनिधि लौटाने के नियम का | अवस्था २४७ अपवाद २२२ | तुलादिव्य के प्रयोग की विधि उपनिधि के भोग का दण्ड ” | और मंत्र २४८ ( ५ ) साक्षिप्रकरण | अग्निदिव्य के प्रयोग की विधि साक्षी के स्वरूप का निर्णय २२३ | और मन्त्र २५३ साक्षी के भेद और योग्यता २२४ | जलदिव्य के प्रयोग की विधि और साक्षी होने के अयोग्य व्यक्ति २२५ | मन्त्र २५६ साक्षी के विषय में नियम का | विषदिव्य की विधि और मन्त्र २५९ अपवाद २२६ | कोशविधि २६१ साक्षियों को उद्‌बोधन या उपदेश २२७ | तण्डुलविधि, तप्तमाषकविधि २६२ झूठे साक्षी के लिए दण्ड २२८ | धर्माधर्मविधि २६३ साक्षियों के वचनों में विरोध की | ( ८ ) दायविभागप्रकरण स्थिति २२९ | दायशब्द का अर्थ २६५ साक्षियों की सत्यता के विषय में | दाय के दो भेद २६९ विचार २३० | पिता द्वारा किया गया सम, विषम कूटसाक्षियों के दण्ड २३२ | विभाग २७० साक्षी का असत्य भाषण विहित | माता-पिता की मृत्यु के बाद विभाग होने की स्थिति २३४ | की विधि २७१ असत्य भाषण का प्रायश्चित्त २३५ | अविभाज्य धन २७३ ( ६ ) लेख्यप्रकरण | अविभाज्य धन के अपवाद २७६ लेख्य के दो प्रकार २३६ | पौत्र का अंश ” लेख्य में व्यक्ति और समय का | पितामह के धन में अंश २७६ विस्तृत लेखन ” | माता का अंश २७९ ऋणदाता और ऋणी साक्षियों और | असंस्कृत भाइयों के संस्कार का लेखक के हस्ताक्षर २३७ | दायित्व ” स्वयं लिखा गया लेख्य २३८ | अनेक वर्ण की कई पत्नियों के | पुत्रों का भाग २८१

( ४१ ) छिपा कर रखे हुए धन का विभाग २८३ | ( १० ) स्वामिपालविवादप्रकरण नियोगज पुत्र का भाग ,, | दूसरे का खेत चराने पर दण्ड ३१३ औरसपुत्र और पुत्रिकासुत २८५ | अधिक अपराध होने पर दूना दण्ड ३१४ गूढज और कानीन पुत्र ,, | चरवाहे और पशु के स्वामी को पौनर्भव और दत्तक पुत्र २८६ | दण्ड ३१५ क्रीत और कृत्रिम सहोढज पुत्र ,, | क्षेत्रविशेष के विषय में अपवाद ,, अपविद्ध पुत्र २८७ | पशुविशेष के संबन्ध में दण्ड का दासीपुत्र का अंश २८९ | अभाव ३१६ पुत्रहीन के धन का अधिकारी ,, | चरवाहे का पशुस्वामी के प्रति वाणप्रस्थ, यति, ब्रह्मचारी की | दायित्व ,, संपत्ति २९७ | पशुनाश पर चरवाहे को दण्ड ३१७ संसृष्टी को धन का विचार २९९ | चरागाह की व्यवस्था ,, विभाग में अंशप्राप्ति के लिए अयोग्य | चरागाह की भूमि और स्थान ३१८ व्यक्ति ३०० | ( ११ ) अस्वामिविक्रयप्रकरण इस नियम का अपवाद ,, | अस्वामिविक्रय का लक्षण ३१८ अयोग्य सदस्यों की स्त्रियों की | कममूल्य पर क्रय का निषेध ,, स्थिति ३०१ | खोई वस्तु देखने पर कर्तव्य ३१९ स्त्रीधन ,, | लेख्य और उपभोग द्वारा खोई स्त्रीधन का उत्तराधिकारी ३०२ | वस्तु ३२० वाग्दत्ता का धन, उसके हरण | स्वयं अपनी अपहृत वस्तु लेने पर का दण्ड ३०४ | दण्ड ३२१ पति द्वारा स्त्रीधन न लौटाने की | राजा को अर्पित खोई वस्तु का स्थिति ३०४ | निर्णय ,, दो पत्नियों में पहली पत्नी का | खोये हुए पशु की प्राप्ति पर राजा स्त्रीधन ३०५ | को देय धन ३२२ घर और खेत का विभाग ,, | ( १२ ) दत्ताप्रदानिकप्रकरण ( ६ ) सीमाविवादप्रकरण | दत्ताप्रदानिक का स्वरूप ,, सीमाविवाद का निर्णय ३०६ | दत्तानपाकर्म का स्वरूप ,, सीमानिर्णय के साधन ३०८ | चार प्रकार का दत्तानपाकर्म ,, ग्राम सामन्ता आदि ३०८ | दान कितना दें, क्या न दें ? ३२३ झूठे बोलने वाले सामन्तादि के | दान सबके सामने लेना चाहिए ,, दण्ड ३०९ | दत्तादत्त का स्वरूप ३२४ मर्यादा तोड़ने का दण्ड ३११ | अदत्त का प्रकार ,, खेत छीन लेने का दण्ड ,, | ( १३ ) क्रीतानुशयप्रकरण दूसरे के खेत में कूप, सेतु का | क्रीतानुशय ३२५ निर्माण ३१२ | क्रीतानुशय का स्वरूप ,, खेत की जोत की व्यवस्था ३१३ |

[Page Header] ( ४२ )


[बायाँ स्तम्भ]

प्रत्यर्पणीयनिर्णय ३२५ बीजा आदि खरीदने में परीक्षावधि ,, सोना, चाँदी, पीतल, शीशा, ताँबा, लोहा की परीक्षा ३२६ कम्बल और सूती कपड़े के वजन ,, कसीदाकारी आदि से वस्त्र के भार में कमी ३२७ द्रव्य के नाश होने पर निर्णय ,, (१४) अभ्युपेत्याशुश्रूषाप्रकरण अभ्युपेत्या शुश्रूषा का स्वरूप ३२७ पाँच प्रकार के शुश्रूषक ३२८ चार प्रकार के कर्मकर ,, दो प्रकार के कर्म ,, तीन प्रकार के भृतक ,, दासों के भेद ,, दासता से मुक्ति का समय ३२९ संन्यास से च्युत व्यक्ति राजा का दास ३३० दास अपने से निम्नवर्ण का होता है ,, अन्तेवासी का धर्म ,, (१५) संविद्व्यतिक्रमप्रकरण संविद्व्यतिक्रम का लक्षण ३३१ धर्म की रक्षा के लिए ब्राह्मण की स्थापना ,, सामयिक और राजा द्वारा निर्दिष्ट धर्म का पालन ३३२ गण के व्यक्तियों के अनुसरण का नियम ,, समूह के कार्य के लिए आये हुए व्यक्तियों का राजा द्वारा सत्कार ३३३ समूह के कार्य से प्रेषित व्यक्ति को प्राप्त धन ,, कार्यचिन्तकों के लक्षण ,, श्रेणी, नैगम, पाखण्डी, गण के विषय में नियम ३३४


[दायाँ स्तम्भ]

(१६) वेतनादानप्रकरण वेतनादान का स्वरूप ३३४ वेतन लेकर काम छोड़ने पर दण्ड ,, बिना वेतन लिए कार्य करना स्वीकार करके कार्य न करने पर दण्ड ३३४ भृत्यों को लाभांश (वोनस) का विधान ३३५ भृत्य के कार्य से हानि और लाभ तथा उसका वेतन ,, दो भृत्यों के एक कार्य करने पर वेतन ३३६ भार ढोने वाले भृत्य के विषय में निर्णय ,, मार्ग में कार्य छोड़ने वाले की मजदूरी ,, (१७) द्यूतसमाह्वयप्रकरण जुए की बाजी का स्वरूप ३३७ द्यूतसभा के अधिकारी का अंश ३३८ द्यूताधिकारी का कर्त्तव्य ,, राजा का सभिकों के प्रति कर्तव्य ,, जुए में हारजीत का निर्णय ३३९ कपटपूर्वक जुआ खेलने वाले का दण्ड ,, जुए के निषेध के लिए दण्ड ,, द्यूताध्यक्ष की नियुक्ति ,, प्राणिद्यूत का नियम ३४० (१८) वाक्पारुष्यप्रकरण वाक्पारुष्य का लक्षण ३४० वाक्पारुष्य के तीन प्रकार ,, निष्ठुर आक्रोश का दण्ड ,, गाली देने का दण्ड ३४१ गाली देने के दण्ड में वर्ग का विचार ,, वर्णों की प्रतिलोमता के आधार पर दोष लगाने का दण्ड ३४२

( ४३ )

बायाँ स्तम्भ (Left Column):

अंग तोड़ने की धमकी का दण्ड ३४३ धमकी के सम्बन्ध में शक्ति का विचार ,, तीव्र आक्रोश का दण्ड ,, दोष लगाने पर दण्ड का विधान ३४४ (१९) दण्डपारुष्यप्रकरण दण्डपारुष्य का स्वरूप ३४४ दण्डपारुष्य के तीन भेद और पाँच विधियाँ ,, दण्डपारुष्य के सन्दिग्ध स्वरूप का निर्णय ३४५ साधन के अनुसार दण्ड ,, वर्ण की प्रतिलोमता के अनुसार दण्ड ३४६ समान जाति वाले को मारने पर दण्ड ३४७ पैर, केश, वस्त्र, हाथ पकड़ कर खींचने का दण्ड ,, लकड़ी आदि से मारने का दंड ३४८ मारकर खून निकालने पर दंड ,, अंग तोड़ने पर दण्ड ,, कई व्यक्तियों द्वारा एक व्यक्ति के पीटे जाने पर दण्ड ३४९ दूसरे की दीवाल तोड़ने पर दण्ड ,, दूसरे के घर में काँटा, विष, सर्प छोड़ने पर दण्ड ३५० पशुओं को मारने पर दण्ड ,, वृक्षों को हानि पहुँचाने पर दंड ३५१ लताओं को हानि पहुँचाने पर दण्ड ,, (२०) साहसप्रकरण साहस का लक्षण ३५२ साहस के तीन प्रकार ,, प्रथम, मध्यम और उत्तम साहस ,, दूसरे का धन लेने पर दण्ड ३५३ अपराध कराने वाले का दण्ड ,, विशेष प्रकार के साहसिक ,,


दायाँ स्तम्भ (Right Column):

बिना नियोग के विधवा संभोग, भयात्तुर की रक्षा के लिए न दौड़ने, उच्च वर्णों के स्पर्शवर्ण के अयोग्य कर्म करने वाले, झूठी शपथ लेने, पशुओं को बधिया करने, दासी का गर्भपात, निर्दोष सम्बन्धी का त्याग करने का दण्ड ३५४ धोबी के विषय में दण्डव्यवस्था ३५५ पिता और पुत्र के कलह में साक्षी के लिए दण्ड ,, तौलने आदि में धूर्तता का दण्ड ३५६ खोटा सिक्का चलाने वाले का दण्ड ,, अल्पज्ञानी वैद्य का दण्ड ,, बन्धन के अयोग्य व्यक्ति का दण्ड ३५७ नापने, तौलने में बेईमानी करने का दण्ड ,, मिलावट करने पर दण्ड ,, घटिया वस्तु अधिक मूल्य पर विक्रय का दण्ड ३५८ ठगी और बनावटी कस्तूरी बेचने का दण्ड ,, शिल्पियों को पीड़ित करने वाले व्यापारियों को दण्ड ३५९ आयातित वस्तु को अनिश्चित मूल्य पर बेचने का दण्ड ,, राजा द्वारा मूल्य का निर्धारण ,, विक्रय में लाभ का अंश ३६० मूल्य के निर्धारण का आधार ,, (२१) विक्रीयासंप्रदानप्रकरण विक्रीयासंप्रदान का स्वरूप ३६० विक्रीयासंप्रदान के दो भेद ,, मूल्य लेकर सौदा न देने वाले का दण्ड ३६१ क्रेता के सौदा न लेने पर दूसरे के हाथ विक्रय ,,

( ४४ ) सौदा देते समय क्रेता के दोष से वस्तु वस्त्र चुराने वाले और में हानि ३६१ गिरहकट का दण्ड ३७२ राजकृत या दैवकृत उत्पात से उचक्के के दुवारा अपराध का दण्ड ,, हानि ३६२ दण्डनिर्धारण का आधार ,, दोषयुक्त वस्तु के विक्रय का दण्ड ,, क्षुद्र द्रव्य के विषय में दण्ड का सौदे की फेराफेरी करने पर दण्ड ३६३ नियम ३७३ ( २२ ) संभूयसमुत्थानप्रकरण धान्य चुराने पर दण्ड ,, सामूहिक व्यापार में लाभ-हानि का सोना चुराने का दण्ड ,, विचार ३६३ विशेष द्रव्य का दण्ड ३७४ हानि करने वाले हिस्सेदार को चोर की सहायता करने वाले के दण्ड ३६४ लिए दण्ड ,, सुरक्षित रखने वाले को दशांश की दुष्टा स्त्री को डुबाने का आदेश ३७५ प्राप्ति ,, हत्यारिणी स्त्री के अङ्ग विक्रयकर और निषिद्धवस्तु विक्रय ,, भङ्ग का दण्ड ,, विक्रयकर में बेईमानी करने का हत्यारे का पता लगाने की विधि ,, दण्ड ३६५ दूसरे की फसल, घर, वाटिका, नौका की फेरी ,, गाँव आदि जलाने वाले के योग्य ब्राह्मणों को श्राद्ध में न बुलाने लिए दण्ड ३७६ पर दण्ड ,, राजपत्नी के साथ व्यभिचार विदेशगत या मृत हिस्सेदार का का दण्ड ,, धन ३६६ ( २४ ) स्त्रीसंग्रहप्रकरण बेईमान हिस्सेदार के प्रति व्यवहार ३६७ स्त्रीसंग्रहण के तीन प्रकार ३७६ ( २३ ) स्तेयप्रकरण पराई स्त्री के साथ व्यभिचार के स्तेय का लक्षण ३६७ चिह्न ३७७ चोर पकड़ने के उपाय ३६८ छेड़खानी करने का अपराध ,, सन्देह में दूसरों को भी पकड़ने निषिद्ध भाषण की दशा में का नियम ,, बोलने पर दण्ड ३७८ सन्देह में पकड़े गये लोगों में चारणस्त्री से व्यभिचार में चोर की पहचान ,, दण्ड का अभाव ,, निर्दोषता न प्रमाणित करने माता आदि से संभोग का दण्ड ,, वाले को दण्ड ३६९ सजातीय परस्त्री से व्यभिचार चोर को शारीरिक दण्ड ,, का दण्ड ,, ब्राह्मण चोर के लिए दण्ड ३७० हीन वर्ण की परस्त्री से व्यभि- गाँव में चोरी का दोषी ,, चार का दण्ड ३७९ चोरी का दण्ड कौन दे ? ३७१ नीच वर्ण के पुरुष से व्यभिचार विशेष अपराध के लिए का स्त्री को दण्ड ,, विशेष दण्ड ,, वाग्दत्ता सवर्णा कन्या का अपहरण ,,

( ४५ ) उच्च जाति की कन्या का अपहरण ३७९ राजा का कोश चुराने वाले का दण्ड ३८८ कन्या की सहमति, असहमति का शव के ऊपर की वस्तु बेचने वाले विचार ३८० का दण्ड ३८९ कन्यादूषण का दण्ड ,, पिता या आचार्य को पीटने वाले कन्या का वास्तविक दोष का दण्ड ,, कहने का दण्ड ३८१ राजसिंहासन पर बैठने का दण्ड ,, पशुमैथुन, हीनस्त्रीसंभोग, गो- आँख फोड़ने, राजा के अनिष्ट का मैथुन का दण्ड ,, प्रचार करने, ब्राह्मण का वेश साधारण स्त्रीगमन का दण्ड ,, बनाने पर दण्ड ,, वेश्या जाति की प्राचीनता ६८२ राग, लोभ से व्यवहार में पक्षपात पञ्चचूडा नाम की अप्सराएं ,, करने पर दण्ड ,, दासी-संभोग का दण्ड ,, साक्षियों का दोष होने पर दण्ड ३९० स्वैरिणी दासियों के बलात् सभासदों द्वारा देखे गये अधर्मपूर्ण संभोग का दण्ड ३८३ व्यवहार पर विचार ,, वेतन लेने वाली वेश्या के मुकरने निर्णीत व्यवहार के प्रत्यावर्तन का पर दण्ड ,, दण्ड ,, असामान्य स्त्रीमैथुन का दण्ड ३८४ पराजय न स्वीकारने वाले का दण्ड ,, चाण्डाली-संभोग का दण्ड ,, राजा द्वारा अन्याय से लिये गये धन की उपयोगविधि ३९१ ( २५ ) प्रकीर्णकप्रकरण ३. प्रायश्चित्ताध्यायः स्त्रीपुंयोग नाम का व्यवहार ३८४ (१) आशौचप्रकरण । उसका लक्षण ३८५ आशौच शब्द का अर्थ ३९२ स्त्री पुरुष को अपने मार्ग में शव के गाड़ने और जलाने का विचार ,, स्थापित करना ,, शवानुगमन ,, प्रकीर्ण व्यवहार का लक्षण ,, चाण्डाल आदि अग्नि का निषेध ३९३ अपराध विशेष का दण्ड ,, उदकदान के विचार ३९४ द्विज को अभक्ष्य से दूषित आहिताग्नि की मृत्यु पर विशेष करने का दण्ड ,, नियम ,, खोटा सोना और निषिद्ध मांस शूद्र द्वारा लाये गये अग्नि आदि ३९५ बेचने का दण्ड ३८६ ब्रह्मचारी और पतित द्वारा उदक- सावधान करने पर चोट लगने दान का निषेध ३९६ में दोषाभाव ३८७ सपिण्डों में उदकदान के लिए दुर्घटना से हिंसा होने में प्रतिषिद्ध व्यक्ति ,, दोषाभाव ,, पाखण्डी आदि के मरनेपर आशौच ,, उपेक्षा करने पर पशु के स्वामी विशेष प्रकार की मृत्यु से आशौच का दण्ड ,, का निषेध ३९७ जार को छोड़ देने पर दण्ड ३८८ राजा की निन्दा करनेवाले का दण्ड ,,

( ४६ ) पतितों के विषय में रोने का निषेध ३९७ | मृत्युविशेष की स्थिति में अशौच आत्महत्या करने वाले का अशौच ३९८ | का अपवाद ४१५ नारायण बलि ,, | युद्ध में, विदेश में, मरने पर अशौच ,, नागबलि ३९९ | विमाता की मृत्यु पर अशौच ,, शोक को दूर करने के लिए इतिहास ४०० | वर्णानुसार अशौच के दिन ४१६ मनुष्य की निःसारता ,, | आयु के अनुसार अशौच ४१७ रोने का निषेध ४०१ | आयु के अनुसार स्त्रियों का प्रेतदाह के बाद वापस आना ,, | अशौच ४१८ घर में प्रवेश की विधि ,, | गुरु, मामा की मृत्यु पर अशौच ४२० तत्काल शुद्धि का उपाय ४०२ | पिता की मृत्यु पर विवाहित ब्रह्मचारी के व्रत की अखण्डता ४०३ | कन्या का अशौच ,, अशौचियों के नियम ,, | श्वशुर आदि की मृत्यु पर अशौच ४२१ प्रेतपिण्डदान ४०४ | अनौरस पुत्र की मृत्यु का अशौच ,, पिण्डदान देने वाला ४०५ | पराश्रित पत्नी की मृत्यु का पिण्ड की संख्या और काल ,, | अशौच ,, शिक्या आदि में जलदान ४०६ | शव के साथ जाने पर अशौच ४२२ अस्थिसंचयन का समय ,, | राजा आदि की मृत्यु पर अशौच वपन ,, | का अभाव ,, अग्निहोत्र के विषय में विचार ,, | दास आदि की मृत्यु पर अशौच ४२३ सूतक में सन्ध्योपासना ४०७ | ऋत्विज् आदि की मृत्यु पर अशौच का समय ,, | अपवाद ,, सपिण्ड आदि का अशौच ,, | ब्रह्मचारी और संन्यासी के बालकों आदि का अशौच ४०८ | विषय में ४२४ जन्मसंबंधी अशौच ,, | अशौच के अन्त में स्नान ,, प्रसूतिका का अशौच ४०९ | रजस्वला कुत्ता, चाण्डाल, पक्षियों के पुत्रजनन के समय दान का अधिकार ,, | स्पर्श पर अशुद्धि ४२६ षष्ठीपूजन ,, | शुद्धि के हेतु और साधन ४२९ अशौच के बीच दूसरे अशौच का | ( ७५ ) आपद्धर्मप्रकरण संपात ,, | आपत्ति के समय दूसरी वृत्ति मातापिता की मृत्यु के अशौच का | धारण करने का नियम ४३१ संपात ४१० | वैश्यवृत्ति वाले ब्राह्मण द्वारा गर्भस्राव में अशौच का निर्णय ,, | अविक्रेय वस्तुएँ ४३२ रजस्वला की शुद्धि के विषय में | निषिद्ध वस्तुओं में अपवाद ४३३ विचार ४१२ | निषिद्ध कर्म करने का दोष ४३४ रजस्वला और सूतिका की मृत्यु का | आपत्ति काल में दान लेने पर अशौच ४१३ | दोषाभाव ,, आहिताग्नि की मृत्यु पर विशेष | आपत्ति काल में जीविका के साधन ,, नियम ४१४ |

( ३ ) वानप्रस्थप्रकरण प्राणों के स्थान ”

( ४७ ) कृषि आदि से जीविका न होने पर शरीर के अंगों, अस्थियों की संख्या ४५५ अन्य साधन ४३५ इन्द्रियों के विषय-गन्धादि ४५८ राजा द्वारा वृत्ति निर्धारण ” कर्मेन्द्रियाँ ” ( ३ ) वानप्रस्थप्रकरण प्राणों के स्थान ” वानप्रस्थ के धर्म ४३६ प्राणस्थानों के विस्तार ४५९ स्वयं प्राप्त फल द्वारा पंचमहायज्ञ ४३७ स्नायु, धमनी, पेशियों द्रव्यसंचय का नियम ४३८ की संख्या ४६० स्नान, स्वाध्याय और दान ४३९ बालों और रोओं की संख्या ४६१ वानप्रस्थ के भोजन का नियम ” शरीर में रसों का अनुपात ४६२ चान्द्रायणादि व्रत का नियम ” शरीर में आत्मा की स्थिति ४६३ पञ्चाग्निसेवन आदि ४४० ‘बृहदारण्यक’ तथा योगशास्त्र समदृष्टि होने का नियम ४४१ का निर्देश ” भैक्षाचरण ” आत्मा के ध्यान की विधि ४६४ शरीर त्याग का नियम ४४२ शब्द ब्रह्म की उपासना ” मुक्ति के मार्ग सामगान, वीणा ” ( ४ ) यतिधर्मप्रकरण वादन आदि ४६५ यतिधर्म का निरूपण ४४२ गीतज्ञ की योनि ” यति के धर्म ४४४ आत्मा से सम्पूर्ण जगत् भिक्षाटन ४४५ की उत्पत्ति ४६६ यति के पात्र और उनकी शुद्धि ४४६ मुनियों का प्रश्न ” इन्द्रियसंयम और अनिष्टमय यज्ञ से प्रजासृष्टि ” संसार ४४७ आत्मा द्वारा सुख-दुःख का भोग ध्यान और ब्रह्मदर्शन ४४८ क्यों ? ४६७ धर्म के लिए आश्रमविशेष आदिदेव से चार वर्णों की आवश्यक नहीं ” उत्पत्ति ४६८ सत्य, अस्तेय आदि धर्म ” मुनियों की शंका ४६९ ब्रह्म से अनेक जीवात्मा की उत्पत्ति ४४९ कर्मानुसार योनि की प्राप्ति ४७० आत्मा द्वारा किया गया कर्म ” कर्मों के फल की प्राप्ति का समय ” आत्मा का शरीरधारण ४५० कैसा व्यक्ति किसी योनि में जन्म शरीरधारण की प्रक्रिया और लेता है ४७१ अवस्थाएँ ४५१ सत्त्वादि गुण का परिणक ४७२ गर्भ में शरीर का विकास और आत्मा को पिछले जन्म का बोध शारीरिक गुणों के उद्भव का क्यों नहीं होता ४७३ क्रम ४५३ आत्मा का समष्टि, व्यष्टि भेद ४७४ दोहद का महत्त्व ” धातुएं और आत्मा से जगत् गर्भ के महीनों में विकास की की उत्पत्ति ” दशाएँ ४५४ जगत् के सृजन की प्रक्रिया ४७५ प्रसव का समय ४५५ आत्मा के विषय में प्रमाण ४७६

( ४८ ) आत्मा का अज्ञान और क्लेश ४७६ | उपपातक ५०८ मुक्ति कौन पाता है ? ४७८ | जाति अंश के कारणभूत पाप " मोक्षप्राप्ति का हेतु ४७९ | ब्राह्मणहत्या के प्रायश्चित्त की विधि ५१३ कर्मफलभोग के लिए शरीरधारण आत्मा को नट से उपमा " | ब्रह्मवध के विषय में विशेष नियम ५१४ मोक्ष का मार्ग, स्वर्गमार्ग संसरण-मार्ग ४८१ | प्रोत्साहक आदि के लिए दण्ड-प्रायश्चित्त ५१६ आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण ४८३ | बालक और वृद्ध के लिए आधा प्रायश्चित्त ५१७ क्षेत्रज्ञ का स्वरूप ४८४ | ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त की अवधि ५१८ बुद्धि आदि की उत्पत्ति " | ब्रह्महत्या का दूसरा प्रायश्चित्त ५२१ गुणस्वरूप ४८५ | ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त का अतिदेश ५२५ स्वर्गमार्ग, पितृयान ४८६ | आत्रेयी की हत्या का प्रायश्चित्त ५२६ पितृयान के मुनियों का वर्णन ४८७ | आत्रेयी का लक्षण " ज्ञान के हेतु " | सुरापान प्रायश्चित्त ५२७ आत्मज्ञानी और देवयान ४८८ | सुरा के विषय में विचार ५२८ उपासना की विधि ४८९ | एकादश मद्य ५२९ धारणात्मक योगाभ्यास का प्रयोजन ४९० | सुरापान का दूसरा प्रायश्चित्त ५३० योग की सिद्धि के लक्षण ४९१ | सुरायुक्त शुष्कान्न के भक्षण का प्रायश्चित्त " कर्मों के त्याग से मुक्ति " | सुरापात्र में जल पीने का प्रायश्चित्त ५३१ गृहस्थ के लिए भी मुक्ति संभव " | मद्यपान का प्रायश्चित्त ५३२ ( ५ ) प्रायश्चित्तप्रकरण | द्विजाति की पत्नी के विषय में सुरापान प्रायश्चित्त ५३४ कर्मविपाक का निरूपण ४९२ | सुवर्णस्तेय का प्रायश्चित्त " महापातकी का पुनः पुनः जन्म " | शङ्ख के विचार ५३५ कर्म के अनुसार शरीरधारण ४९६ | सुवर्ण शब्द का अर्थ ५३६ पतित होने का कारण और आवश्यकता ४९७ | सुवर्णस्तेय का दूसरा प्रायश्चित्त ५३७ प्रायश्चित्त का अधिकारी " | गुरुतल्पगमन का प्रायश्चित्त ५३९ प्रायश्चित्त न करने पर दोष ४९९ | गुरु शब्द का अर्थ " इक्कीस नरक ५०० | गुरुतल्पगमन का दूसरा प्रायश्चित्त ५४२ प्रायश्चित्त का फल ५०१ | महापातकियों के साथ संसर्ग का प्रायश्चित्त ५४६ महापातकी ५०२ | इस विषय में नियम का अपवाद ५४९ ब्रह्महत्या के समान पाप ५०५ | शूद्रादि के विषय में प्रायश्चित्त ५५० सुरापान के समान पाप " | गोवध का प्रायश्चित्त ५५१ सुवर्णस्तेय के समान पाप ५०६ गुरुतल्प के समान पाप " गुरुतल्पातिदेश ५०७

( ४६ ) अवस्था के अनुसार प्रायश्चित्त का नियम ५५३ गोपालक की उपेक्षा से गोहत्या का प्रायश्चित्त ५५५ स्त्रियों के प्रायश्चित्त के विषय में विशेष नियम ५५६ पुरुषों के विषय में प्रायश्चित्त के विशेष नियम ५५७ उपपातकों के प्रायश्चित्त ५५८ स्त्री, शूद्र, विट्, क्षत्र के वध का प्रायश्चित्त ५६२ स्त्रीवध का प्रायश्चित्त ५६३ अनुपपातक प्राणिवध के विषय में प्रायश्चित्त ५७० बिल्ली मारने पर प्रायश्चित्त ५७१ वृक्षादि काटने पर प्रायश्चित्त ५७३ पुंश्चली, वानर के वध का प्रायश्चित्त और उनके स्पर्श से शुद्धि का उपाय ५७५ वीर्यस्खलन का प्रायश्चित्त ५७६ ब्रह्मचारी द्वारा स्त्रीभोग का प्रायश्चित्त ५७८ स्वप्न में वीर्यपातहुने के प्रायश्चित्त का मन्त्र ५८० संन्यास से भ्रष्ट होने पर प्रायश्चित्त ,, अन्य अनुपपातक का प्रायश्चित्त ५८१ गुरु के लिए प्रायश्चित्त का विधान ५८२ सब प्रकार की हिंसा का प्रायश्चित्त ५८३ झूठा दोष लगाने पर प्रायश्चित्त ,, भ्रातृजायागमन का प्रायश्चित्त ५८५ रजस्वला पत्नी के संभोग का प्रायश्चित्त ,, अयाज्य व्यक्ति का यज्ञ कराने का प्रायश्चित्त ५८७ वेदविप्लावन का प्रायश्चित्त ५८८


स्वाध्यायत्याग का प्रायश्चित्त ५८९ अग्नित्याग का प्रायश्चित्त ,, आश्रम में न रहने का प्रायश्चित्त ५९० समुद्रयात्रा का प्रायश्चित्त ५९१ वेश्यागमन का प्रायश्चित्त ,, प्याज आदि खाने पर प्रायश्चित्त ५९३ संधिनी गाय का दूध पीने पर प्रायश्चित्त ५९५ गर्हित मांस खाने का प्रायश्चित्त ,, अपवित्र द्रव्य से स्पृष्ट वस्तु खाने का प्रायश्चित्त ५९५ बुरे विचार से प्रदत्त अन्न खाने का प्रायश्चित्त ५९९ बासी भोजन करने का प्रायश्चित्त ,, गुणदुष्टशुक्त आदि के भक्षण का प्रायश्चित्त ६०० क्रियादुष्ट अन्न के भक्षण का प्रायश्चित्त ,, एकाह्यादि श्राद्धभोजन का प्रायश्चित्त ६०३ अपुत्रादि के अन्नभक्षण का प्रायश्चित्त ६०४ जातिभ्रंश करने वाले पाप का प्रायश्चित्त ६०४ (६) प्रकीर्णकप्रायश्चित्तानि निषिद्ध दान लेने का प्रायश्चित्त ६०४ गुरु की भर्त्सना का प्रायश्चित्त ६०५ विप्र को मारने के लिए उद्यत होने पर दण्ड ६०६ पादप्रहार का प्रायश्चित्त ,, मनु द्वारा बताये गये प्रकीर्णक-प्रायश्चित्त ,, नित्य, श्रौतादि कर्म न करने पर प्रायश्चित्त ,, इन्द्रधनुष देखने का प्रायश्चित्त ६०७ यज्ञोपवीत चढ़ाये विना मलमूत्र-त्याग का प्रायश्चित्त ,,

५ या० भू०

( ५० )

चोर और पतित के साथ भोजन करने का प्रायश्चित्त ६०७ नीलरंगे वस्त्र धारण करने का प्रायश्चित्त " देशविशेषगमन का प्रायश्चित्त ६०८ प्रायश्चित्त के विषय में देश और काल का विचार ६०९ पतित के घड़ा फोड़ने की विधि ६१० पतित को समाज में मिलाने की विधि " पतितत्याग की विधि का अतिदेश ६११ स्त्रियों का विशेष रूप से पतित होना ६१२ चरितव्रत के विषय में विशेष ६१३ जाति में सम्मिलित करने की दूसरी विधि ६१४ रहस्यप्रायश्चित्त ६१५ दूसरा प्रायश्चित्त ६१७ सुरापान का रहस्यप्रायश्चित्त " सुवर्णस्तेय का प्रायश्चित्त ६१८ गुरुतल्प का प्रायश्चित्त " उपपातक का रहस्य प्रायश्चित्त ६२० सौ बार प्राणायाम का नियम " अपवित्र वस्तु मुख में डालने का प्रायश्चित ६२१ अज्ञानवश किये गये पाप का प्रायश्चित्त " साधारण पवित्र मन्त्र ६२२ यम और नियम ६२४

सान्तपन नाम का व्रत ६२५ महासान्तपन व्रत ६२६ पर्णकृच्छ्रव्रत ६२७ पादकृच्छ्रव्रत ६२८ प्राजापत्यकृच्छ्र ६२९ अतिकृच्छ्र ६३० कृच्छ्रातिकृच्छ्र " पराककृच्छ्र ६३१ सौम्यकृच्छ्र " तुलापुरुषकृच्छ्र " चान्द्रायणव्रत ६३२ दूसरे प्रकार का चान्द्रायण ६३३ कृच्छ्र और चान्द्रायण का साधारणतः आचरण ६३४ प्रायश्चित्त में वपन का विचार ६३६ अनादिए पाप का प्रायश्चित्त " व्रत न कर सकने पर गोदान आदि ६३७ महापातक आदि में गायों की संख्या " चान्द्रायण आदि में गायों की संख्या " पुनः पाप करने पर पुनः प्रायश्चित्त ६३८ व्रत न कर सकने पर ब्राह्मण भोजन ६३९ कृच्छ्र और चान्द्रायण का फल ६४० इस शास्त्र के अध्ययन और श्रवण का फल " टिप्पणी (नोट्स) ६४३ पद्यार्धानुक्रमणिका ६९७

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उपोद्घातप्रकरणम्

॥ श्रीः ॥

याज्ञवल्क्यस्मृतिः

‘मिताक्षरा’ सहितहिन्दीव्याख्योपेता

आचाराध्यायः ॥ १ ॥

उपोद्घातप्रकरणम्

धर्माधर्मौ तद्विपाकाश्चयोऽपि क्लेशाः पञ्च प्राणिनामायतन्ते । यस्मिन्नेतैर्नो परामृष्ट ईशो यस्तं वन्दे विष्णुमोङ्कारवाच्यम् ॥ १ ॥ याज्ञवल्क्यमुनिभाषितं मुहुर्विश्वरूपविकटोक्तिविस्तृतम् । धर्मशास्त्रमृजुभिर्मिताक्षरा बालशोधविधये विविच्यते ॥ २ ॥ याज्ञवल्क्यशिष्यः कश्चित्प्रश्नोत्तररूपं याज्ञवल्क्यमुनिप्रणीतं धर्मशास्त्रं संक्षिप्य कथयामास-यथा मनुप्रणीतं भृगुः । तस्य चायमाद्यश्लोकः— योगीश्वरं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मुनयोऽब्रुवन् । वर्णाश्रमेतराणां नो ब्रूहि धर्मानशेषतः ॥ १ ॥ योगिनां सनकादीनामीश्वरः । ^२ श्रेष्ठस्तं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मनोवाक्काय- कर्मभिः पूजयित्वा मुनयः सामश्रवःप्रभृतयः श्रवणधारणयोग्या अब्रुवन् उक्तवन्तः धर्मान्नोऽस्मभ्यं ^४ब्रूहीति । कथम् ? अशेषतः कार्त्स्न्येन । केषाम् ? वर्णाश्रमेत- राणाम्, वर्णा ब्राह्मणादयः; आश्रमा ब्रह्मचारिप्रभृतयः, इतरेऽनुलोमप्रतिलोम- जाता मूर्धावसिक्तादयः । ‘इतर’शब्दस्य ‘द्वन्द्वे च’ (पा. १।१।३१) इति सर्वनामसंज्ञाप्रतिषेधः । अत्र च ‘धर्म’शब्दः षड्विधस्मार्तधर्मविषयः । तद्यथा— वर्णधर्मः, आश्रमधर्मः, वर्णाश्रमधर्मः, गुणधर्मः निमित्तधर्मः, साधारणधर्मश्चेति । तत्र वर्णधर्मो ब्राह्मणो नित्यं मद्यं वर्जयेदित्यादि । आश्रमधर्मोऽग्नीन्धनभैक्ष- १. पाठान्तरम्—मनुक्तं । २. प्रभुस्तं । ३. सोमश्रवाद्यः । ४. ब्रूहि कथयेति । ५. स्मार्तकर्मविषयः । ६. वर्जयेद्विति ।

२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः चर्यादिः । वर्णाश्रमधर्मः पालाशो दण्डो ब्राह्मणस्येत्येवमादिः । गुणधर्मः शाखी- याभिषेकादिगुणयुक्तस्य राज्ञः प्रजापरिपालनादिः । निमित्तधर्मो विहिताकरण- प्रतिषिद्धसेवननिमित्तं प्रायश्चित्तम् । साधारणधर्मोऽहिंसादिः । ‘न हिंस्यात्सर्व्वा भूतानि’ इत्याचण्डालं साधारणो धर्मः । ‘शौचाचारांश्च शिक्षयेत्’इत्याचार्यकरण- विधिप्रयुक्तत्वाद्वर्मशास्त्राध्ययनस्य प्रयोजनादिकथनं नातीवोपयुज्यते । तत्र चायं क्रमः-प्रागुपनयनात्कामचारकामवादकामभक्षाः । ऊर्ध्वमुपनयनाद्राग्वेदाध्यय- नोपक्रमाद्धर्मशास्त्राध्ययनं, ततो धर्मशास्त्रविहितयमनियमोपेतस्य वेदाध्ययनं, ततस्तदर्थजिज्ञासा, ततस्तदर्थानुष्ठानमिति । तत्र यद्यपि धर्मार्थकाममोक्षाः शास्त्रेणानेन प्रतिपाद्यन्ते, तथापि धर्मस्य प्राधान्याद्धर्मग्रहणम् । प्राधान्यं च धर्ममूलत्वादितरेषाम् । न च वक्तव्यं धर्ममूलोऽर्थोऽर्थमूलो धर्म इत्यविशेष इति । यतोऽर्थमन्तरेणापि जपतपस्तीर्थयात्रादिना धर्मनिष्पत्तिः, अर्थलेशोऽपि न धर्ममन्तरेणेति । एवं काममोक्षावपीति ॥ १ ॥ भाषा— किसी समय ) योगियों में श्रेष्ठ याज्ञवल्क्य की पूजा करके ( सोमश्रवस आदि ) मुनियों ने कहा कि आप वर्णों, आश्रमों और दूसरे ( अनुलोमज-प्रतिलोमज संकर जातियों ) का धर्म हमें पूर्णरूप से बताइए ॥ १ ॥ एवं पृष्टः किमुवाचेत्याह— मिथिलास्थः स योगीन्द्रः क्षणं ध्यात्वाऽब्रवीन्मुनीन् । यस्मिन्देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्निबोधत ॥ २ ॥ मिथिला नाम नगरी तत्र स्थितः स याज्ञवल्क्यो योगीश्वरः क्षणं ध्यात्वा किञ्चित्कालं मनः समाधाय एते श्रवणाधिकारिणो विनयेन पृच्छन्तीति युक्तमेतेभ्यो वक्तुमित्युक्त्वाऽन्मुनीन् । किम् ? ‘यस्मिन्देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्नि- बोधयत’–इति । कृष्णसारो मृगो यस्मिन्देशे स्वच्छन्दं विहरति तस्मिन्देशे दद्यमाणलक्षणा धर्मा अनुष्ठेया नान्यत्रेत्यभिप्रायः ॥ २ ॥ भाषा—मिथिला नगरी में विराजमान उस योगीश्वर ने थोड़ी देर अपने मन में विचार करके मुनियों से कहा कि जिस देश में काले मृग ( स्वच्छन्द ) विचरण करते हैं उस देश में ( अनुष्ठेय ) धर्मों को समझिए ॥ २ ॥ १. सर्वभूतानि इति । २. श्रुत्युक्तशौचाचारान् । ३. जपतीर्थयात्रा ।

आचाराध्यायः ३ 'शौचाचारांश्च शिक्षयेत्'इत्याचार्यस्य धर्मशास्त्राध्यापनविधिः । शिष्येण तदध्ययनं कर्तव्यमिति कुतोऽवगम्यत इत्यत आह— पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ ३ ॥ पुराणं ब्रह्मादि, न्यायस्तर्कविद्या, मीमांसा वेदवाक्यविचारः, धर्मशास्त्रं मानवादि, अङ्गानि व्याकरणादीनि षट्, एतैरुपेतश्चत्वारो वेदाः विद्याः पुरुषार्थ- साधनानि, तासां स्थानानि च चतुर्दश, धर्मस्य च चतुर्दश स्थानानि हेतवः । एतानि च त्रैवर्णिकैरध्येतव्यानि । तदन्तर्भूतत्वाद्वर्मशास्त्रमप्यध्येतव्यम् । तत्रैतानि ब्राह्मणेन विद्याप्राप्तये धर्मानुष्ठानाय चाधिगन्तव्यानि ! क्षत्रियवैश्याभ्यां धर्मानुष्ठानाय । तथा च शङ्खेन विद्यास्थानान्युपक्रम्योक्तम्—'एतानि ब्राह्मणोऽ- धिकुरुते स च वृत्तिं दर्शयतीतरेषाम्' इति । मनुरपि द्विजातीनां धर्मशास्त्राध्य- यनेऽधिकारः, ब्राह्मणस्य प्रवचने नान्यस्येति दर्शयति ( २।१६) 'निषेकादि- श्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिन्ज्ञेयो नान्यस्य कँर्हिचित् ॥ विदुषा ब्राह्मणेनेदमध्येतव्यं प्रयत्नतः । शिष्येभ्यश्च प्रवक्तव्यं सम्यङ्- नान्येन केनचित् ॥' इति ॥ ३ ॥ भाषा—पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और ( व्याकरण आदि ) अङ्गों सहित ( चारों ) वेद चौदह विद्या के और धर्म के स्थान या कारण हैं ॥ ३ ॥ अस्तु धर्मशास्त्रमध्येतव्यं, याज्ञवल्क्यप्रणीतस्यास्य शास्त्रस्य किमायातमित्यत आह— मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः⁴ । यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥ ४ ॥ पराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ । शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः⁶ ॥ ५ ॥ 'उशनः' शब्दपर्यन्तो द्वन्द्वैकवद्भावः । याज्ञवल्क्यप्रणीतमिदं धर्मशास्त्रमध्येत- व्यमित्यभिप्रायः । नेयं परिसंख्या, किंतु प्रदर्शनार्थमेतत् । अतो बौधायनादेरपि धर्मशास्त्रत्वमविरुद्धम् । एतेषां प्रत्येकं प्रामाण्येऽपि साकाङ्क्षाणामाकाङ्क्षापरिपूरण- मन्यतः क्रियते । विरोधे विकल्पः ॥ ४-५ ॥ १. पुरुषार्थज्ञानानि, पुरुषार्थसाधनज्ञानानि । २. तदन्तर्गतत्वात् । ३. तत्र ब्राह्मणेनैतानि । ४. कस्यचित् । ५. ऽङ्गिरः । ६. प्रवर्त्तका ।