भारतकोश
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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

उत्तरार्ध तीसवां अध्याय

उत्तरार्ध तीसवां अध्याय अंग चालन हेतु सूत, गीत के लिए नट, धर्म के लिए सभासद, नेतृत्व हेतु क्षमतावान, नरमाई हेतु मधुरभाषी, मनोविनोद हेतु स्वांग करने वाला उपयुक्त रहता है. आनंद प्राप्ति के लिए स्त्रियों के प्रति सख्य भाव, प्रबल मद ( से उन्मत्त ) के लिए कुमारी ( वीरांगना ) पुत्र, मेधावी के लिए रथकार और धैर्य के लिए गढ़िया ( गढ़ाई करने वाला ) उपयुक्त है. ( ६ ) तपसे कौलालं मायायै कर्मार १४ रूपाय मणिकार १४ शुभे वप १४ शरव्याया ऽ इषुकार १४ हेत्यै धनुष्कारं कर्मणे ज्याकारं दिष्टाय रज्जुसर्जं मृत्यवे मृगयु मन्तकाय श्वनिनम्.. ( ७) तपाने के लिए कुम्हार, माया के लिए कारीगर, रूप के लिए मणिकार, शुभ कार्य के लिए काटछांट में प्रवीण, लक्ष्यभेदी बाण के लिए इषुकार, आयुध के लिए धनुष्कार, कर्म के लिए ज्याकार ( डोरी बनाने वाले ), आज्ञा देने हेतु रज्जुसर्जक ( रस्सी बनाने वाले ), मृत्यु के लिए कसाई, यम के लिए कुत्ते पालक की नियुक्ति की जानी चाहिए. ( ७ ) नदीभ्यः पौञ्जिष्ठ मृक्षीकाभ्यो नैषादं पुरुषव्याघ्राय दुर्मदं गन्धर्वाप्सरोभ्यो व्रात्यं प्रयुग्भ्य ऽ उन्मत्त १४ सर्पदेवजनेभ्योप्रतिपदमयेभ्यः कितव मीर्यताया ऽ अकितवं पिशाचेभ्यो विदलकारीं यातुधानेभ्यः कण्टकीकारीम्.. ( ८) नदियों के लिए नाविक, रीछ आदि के लिए वनचरों ( निषाद ), शेर की तरह दुर्दम्य पुरुष के लिए प्रबल प्रतापी को, गंधर्व और अप्सराओं के लिए असंस्कारित, शोधार्थी हेतु उन्मत्त को, सांप, मनुष्य और देवों के लिए ज्ञानी को, जुए के लिए जुए में कुशल व्यक्ति को, उन्नति के लिए छलकपट मुक्त को पिशाचों के लिए हृदय विदीर्ण करने वाले राक्षस जैसे लुटेरों के लिए रास्ते में कांटे ( रोड़े ) अटकाने वालों को नियुक्त किया जाना चाहिए. ( ८ ) सन्ध्ये जारं गेहायोपपति मार्त्यै परिवित्तं निर्ऋत्यै परिविविदान मराध्या ऽ एदिधिषुः पतिं निष्कृत्यै पेशस्कारी १४ संज्ञानाय स्मरकारीं प्रकामोद्यायोपसदं वर्णायनुरुधं बलायोपदाम्.. ( ९) संधि के लिए मित्र को, घर के लिए उपमुखिया को, गरीबी के लिए धनी को, आपातकाल में साधन जुटाने में दक्ष को, सिद्धि के लिए हित को सर्वोपरि मानने वाले, संस्कार हेतु शुद्धिकरण में कुशल को, ज्ञानप्राप्ति हेतु कार्य कुशल को, अचानक काम आ पड़ने पर पास वाले व्यक्ति को, स्वीकार कराने के लिए आग्रह में दक्ष को तथा बल हेतु सहारा देने वाले को नियुक्त करना चाहिए. ( ९ ) उत्सादेभ्यः कुब्जं प्रमुदे वामनं द्वाभ्यः स्राम १४ स्वप्नायान्धमधर्माय बधिरं पवित्राय भिषजं प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्श माशिक्षायै प्रश्निन मुपशिक्षायै ऽ अभिप्रश्निनं मर्यादायै प्रश्नविवाकम्.. ( १०) ३५६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध तीसवां अध्याय शत्रुओं के नाश हेतु तलवार वाले को, मनोरंजन हेतु बौने को, द्वार हेतु मेहनती को नियुक्त किया जाना चाहिए. सपने के लिए चक्षुहीन का, अधर्म के लिए बहरे का अनुकरण करना चाहिए. पवित्रता के लिए वैद्य, अच्छे ज्ञान के लिए नक्षत्र विज्ञानी, अशिक्षा हेतु प्रश्नकर्ता, उपशिक्षा हेतु अभिप्रश्न कर्ता और मर्यादा के लिए प्रश्न कर्त्ता को नियुक्त करना चाहिए. (१०) अर्मेभ्यो हस्तिपं जयायाश्वपं पुष्ट्यै गोपालं वीर्यायाविपालं तेजसेजपालमिरायै कीनाशं कीलालाय सुराकारं भद्राय गृहप ᳪ श्रेयसे वित्तधमाध्यक्षायानुक्षत्तारम्.. (११) भारी वाहन हेतु हाथी पालक को, तेज गति हेतु अश्व पालक को, पुष्टि हेतु ग्वाले को, वीर्य हेतु भेड़ पालक को, तेज हेतु बकरी पालक को, अन्नवृद्धि हेतु किसान को, अमृत जैसे पेय हेतु अमृत विशेषज्ञ को, सुख कल्याण हेतु गृहपति, श्रेय हेतु धनवान को, अध्यक्षता हेतु निरीक्षक को नियुक्त किया जाना चाहिए. (११) भायै दार्व्वाहारे प्रभाया ऽ अग्न्येधं ब्रध्नस्य विष्टपायाभिषेक्तारं वर्षिष्ठाय नाकाय परिवेष्टारं देवलोकाय पेशितारं मनुष्यलोकाय प्रकरितार ᳪ सर्वेभ्यो लोकेभ्य ऽ उपसेक्तारमव ऋत्यै वधायोपमन्थितारं मेधाय वास: पल्पूलीं प्रकामाय रजयित्रीम्.. (१२) अग्नि हेतु लकड़हारे, प्रकाश हेतु अग्नि जलाने वाले, गरमी के लिए जल बरसाने वाले को, स्वर्ग जैसे सुख हेतु चारों ओर से घेरने वाले को, देवलोक हेतु सुंदर आकार बनाने वाले को, मनुष्यलोक हेतु प्रसार करने वाले को, सभी लोकों के लिए संतोष देने वाले को, वध के लिए हल्ला मचाने वाले को नियुक्त किया जाना चाहिए. बुद्धि पाने के लिए वस्त्र क्षालन, शोभा हेतु चित्रकारी के ज्ञाता का अनुकरण करना चाहिए. (१२) ऋतये स्तेनहृदयं वैरहत्याय पिशुनं विविक्तयै क्षत्तार मौपद्रष्ट्र्यायानुक्षत्तारं बलायानुचरं भूम्ने परिष्कन्दं प्रियाय प्रियवादिन मरिष्ट्या ऽ अश्वसाद ᳪ स्वर्गाय लोकाय भागदुघं वर्षिष्ठाय नाकाय परिवेष्टारम्.. (१३) शत्रु के लिए गुप्त हृदय वाला, वैरी की हत्या हेतु चुगलखोर, भेद के लिए भेद करने वाले को, निरीक्षण के लिए निरीक्षक को, बल हेतु आज्ञा पालक को, क्षेत्र विशेष हेतु भ्रमणशील को, प्रिय के लिए प्रिय बोलने वाले को, अरिष्ट निवारण हेतु घुड़सवार को, स्वर्ग के लिए भाग्यदोहक को अच्छे सुख के लिए सब ओर से वेष्टित (घेरने) वाले को नियुक्त करना चाहिए. (१३) मन्यवेयस्तापं क्रोधाय निसरं योगाय योक्तार ᳪ शोकायाभिसर्त्तारं क्षेमाय विमोक्तार मुत्कूलनिकूलेभ्यस्त्रिष्ठिनं वपुषे मानस्कृत ᳪ शीलायाञ्जनीकारीं निर्ऋत्यै कोशकारीं यमायासूम्.. (१४) क्रोध लोहे को भी ताप देने वाला होता है. क्रोध की शांति हेतु जग को निस्सार यजुर्वेद - ३५७

उत्तरार्ध तीसवां अध्याय समझने वाले की नियुक्ति करनी चाहिए. योग के लिए योगी को नियुक्त करना चाहिए. शोक के लिए सांत्वना देने वाले को नियुक्त करना चाहिए. संरक्षण के लिए मुक्ति दाता को नियुक्त करना चाहिए. उतारचढ़ाव हेतु ऊंचनीच में दक्ष को, शरीर हेतु मनोनुकूल आचरण करने वाले को, शालीनता हेतु आंख शुद्ध करने वाले को, नियुक्त किया जाना चाहिए. विपत्ति हेतु संचय नीति को यमनियम आदि हेतु असूया (ईर्ष्या रहित) को नियुक्त किया जाना चाहिए. (१४) यमाय यमसू॒मथ॑र्वभ्योवतो॒का थ्४ सं॑वत्स॒राय॑ पर्या॒यिणीं॑ प॒रि॒व॒त्स॒राया॑विजा॒तामि॒दाव॑त्सरायातीत्वरीमिद्वत्स॒राया॑तिष्क॒द्वरीं॑ वत्स॒राय विज॑र्जरा थ्४ सं॑वत्स॒राय॑ पलिक्री॒मृभुभ्यो॑जिनस॒न्ध थ्४ सा॒ध्येभ्य॑श्चर्म॒म्नम्.. (१५) हे परमात्मा! यम के लिए नियम में समर्थ स्त्री को नियुक्त करना चाहिए. अहिंसकों के लिए अवतोका नामक स्त्री को नियुक्त करना चाहिए. संवत्सर हेतु समय की व्यवस्था जानने वाली की नियुक्ति की जानी चाहिए. परिवत्सर के लिए कुंआरी को, इदावत्सर हेतु गतिशील को, अनुवत्सर हेतु ज्ञानवती को, वत्सर या अनुवत्सर हेतु वृद्धा को, संवत्सर हेतु श्वेत बालों वाली वृद्धा को नियुक्त करना चाहिए. ऋभु हेतु पराजित न होने वाले से मित्रता की जानी चाहिए. साध्य हेतु विशेष धर्म ज्ञानी की नियुक्ति की जानी चाहिए. (१५) स॒रोभ्यो॑ धैव॒रमुप॑स्थावरा॒भ्यो दाशं॑ वैशन्ता॒भ्यो वैन्दं॑ नड्वला॒भ्यः शौष्कलं॑ पारा॒य मा॒र्गा॒रम॑वारा॒य कैव॒र्तं तीर्थेᳪभ्य ऽ आ॒न्दं वि॑षमे॒भ्यो मैनाल॑ थ्४ स्व॒नेभ्यः॑ पर्ण॒कं गुहा॑भ्यः किरा॒तं थ्४ सानु॑भ्यो जम्भ॒कं पर्व॑तेभ्यः किम्पू॒रुषम्.. (१६) तालाब हेतु मछुआरों को, उपवन हेतु सेवकों को, छोटे तालाब हेतु निषादों को, नडवल हेतु मछली से जीविका निर्वाहक को नियुक्त किया जाना चाहिए. पार जाने के लिए रास्ता जानने वाले को, उस पार से इस पार आने वाले के लिए केवट को, तीर्थ के लिए बाड़ बांधने वाले को, असमान स्थान के लिए किनारा लगाने वाले को नियुक्त करना चाहिए. मधुर ध्वनि के लिए तुरही वादक की, गुफाओं के लिए भीलकिरात की, शिखर के लिए प्रचंड व्यक्ति की और पर्वत के लिए छोटे पुरुषों की नियुक्ति की जानी चाहिए. (१६) बी॒भ॒त्सायै॑ पौल्क॒सं वर्णा॑य हिरण्यका॒रं तु॒लायै॑ वाणि॒जं प॒श्चाद्दो॒षाय॑ ग्ला॒विनं॑ विश्वे॑भ्यो भू॒तेभ्यः॑ सि॒ध्मलं॑ भू॒त्यै जा॒गर॑णमभू॒त्यै स्वप॑नमार्त्यै जनवा॒दिनं॑ व्यृद्ध्या ऽ अपग॒ल्भं थ्४ स थ्४ श॒राय॑ प्रच्छि॒दम्.. (१७) बीभत्स (भयंकर/घृणित) कामों के लिए अनगढ़ (निर्दय) लोगों की नियुक्ति की जानी चाहिए. अच्छे वर्ण के लिए सुनार, तौलने के लिए बनिए की नियुक्ति करनी चाहिए. बाद में दोष देने के लिए नाराज व्यक्ति को, सभी प्राणियों के लिए सिद्धिदायक व्यक्ति को नियुक्त करना चाहिए. समृद्धि हेतु जागरणशील ३५८ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध तीसवां अध्याय को, असमृद्धि हेतु स्वप्नजीवी को, पीड़ा से मुक्ति के लिए सावधान करने वाले को, उन्नति ( बढ़ोतरी ) हेतु अभिमान रहित को, बाण निशाने पर साधने के लिए लक्ष्य साधक को नियुक्त करना चाहिए. ( १७ ) अक्षराजाय कितवं कृतायादिनवदर्शं त्रेतायै कल्पिनं द्वापरायाधिकल्पिन मास्कन्दाय सभास्थाणुं मृत्यवे गोव्यच्छमन्तकाय गोघातं क्षुधे यो गां विकृन्तन्तं भिक्षमाण ऽ उपतिष्ठति दुष्कृताय चरकाचार्यं पाप्मने सैलग्म्.. (१८) जुआ खेलने के लिए द्यूतकार, क्रियाशील हेतु समीक्षा करने वाले, त्रेता के लिए कल्पनाकार, द्वापर हेतु अकल्पनाकार की नियुक्ति की जानी चाहिए. आक्रमण जैसी स्थिति में स्थिर मति वाला ठीक रहता है. मृत्यु की स्थिति में इंद्रियों का अनुकरण कर्ता ठीक रहता है. यमराज हेतु गौ घाती, भूख हेतु भीख मांगने वाले, पाप के निवारण के लिए चरकाचार्य और दुष्टों के लिए कठोर दंड दे सकने वाले की नियुक्ति की जानी चाहिए. ( १८ ) प्रतिश्रुत्काया ऽ अर्तनं घोषाय भषमन्ताय बहुवादिनमनन्ताय मूक १७ शब्दायाडम्बराघातं महसे वीणावादं क्रोशाय तूणवध्म मवरस्पराय शङ्खध्मं वनाय वनपमन्यतोरण्याय दावपम्.. (१९) प्रतिज्ञा के लिए उस को निबाह सकने वाले की नियुक्ति की जानी चाहिए. योजना के लिए उद्घोषक को, विवाद निर्णय हेतु चुप रहने वालों को, बहुवादी हेतु आडंबर का आघात करने वाले को, महिमा हेतु वीणावादक को, भीषण स्वर के लिए ढोल बजाने वाले को, ठीकठीक आवाज हेतु शंख वादक को, वन रक्षार्थ वन रक्षक को, अन्य वनों की रक्षा के लिए दावानल रक्षक को नियुक्त करना चाहिए. ( १९ ) नर्माय पुँश्चलू १७ हसाय कारिं यादसे शाबल्यां ग्रामण्यं गणकमभिक्रोशकं तान्महसे वीणावादं पाणिघ्नं तूणवध्मं तान्नृत्तायानन्दाय तलवम्.. (२०) मनोरंजन हेतु पुरुषों के पीछे चलने वाली, हंसाने में नक्काल, जल जंतुओं को मारने में नीच जाति वालों की नियुक्ति की जानी चाहिए. स्वागतसत्कार के लिए ग्रामीण ज्योतिषी और व्यवहार कुशल व्यक्ति की नियुक्ति की जानी चाहिए. नृत्य हेतु वीणावादक, तालवादक और स्वरवादक की नियुक्ति की जानी चाहिए. आनंद हेतु तालीवादक की नियुक्ति की जानी चाहिए. ( २० ) अग्नये पीवानं पृथिव्यै पीठसर्पिणं वायवे चाण्डालमन्तरिक्षाय व १७ शनर्तिनं दिवे खलति १७ सूर्याय हर्यक्षं नक्षत्रेभ्यः किर्मिरं चन्द्रमसे किलासमह्रे शुक्लं पिङ्गाक्ष १७ रात्र्यै कृष्णं पिङ्गाक्षम्.. (२१) आग से जुड़े कार्य हेतु पुष्ट को, पृथ्वी के लिए आसन पर बैठने वाले को, यजुर्वेद - ३५१

उत्तरार्ध तीसवां अध्याय वायु को सहने के लिए चांडाल को, अधर में लटकने जैसे काम के लिए बांस पर नृत्य करने वाले को नियुक्त करना चाहिए. स्वर्गलोक हेतु खगोल विज्ञानी को, सूर्य हेतु हरे रंग वाले को, नक्षत्रों के लिए नारंगी रंग जानने वाले को, चंद्रमा हेतु किलास ( चर्म रोग विशेष ) वाले को, सफेद रंग हेतु पीली आंख वाले को, रात्रि के लिए कालीपीली आंखों वालों को नियुक्त किया जाना चाहिए. ( २१ ) अथैतानष्टौ विरूपान लभतेतिदीर्घ चातिह्रस्वं चातिस्थूलं चातिकृशं चातिशुक्लं चातिकृष्णं चातिकुल्वं चातिलोमशं च. अशूद्रा ऽ अब्राह्मणास्ते प्राजापत्याः मागधः पुँश्चली कितवः क्लीबोशूद्रा ऽ अब्राह्मणास्ते प्राजापत्याः.. (२२) इस प्रकार इन आठों अति दीर्घ, अतिह्रस्व, अतिस्थूल, अतिकृश, अतिशुक्ल, अतिकृष्ण, रोम रहित व रोम सहित को तथा इन चार प्रकार के चाटुकार, चरित्रहीन, जुआरी, नपुंसक ऐसे ब्राह्मणत्वहीन अशूद्र प्रजापालक को सौंप देना चाहिए. ( २२ ) ३६० – यजुर्वेद

इकतीसवां अध्याय

इकतीसवां अध्याय सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्. स भूमि १४ सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्.. ( १ ) परम पुरुष हजारों सिर वाला, हजारों नेत्रों वाला व हजारों पैर वाला है. वह परम पुरुष सारे ब्रह्मांड को घेर कर भी दस अंगुली ऊपर अधिष्ठित है. ( १ ) पुरुष ऽ एवेद १४ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्. उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति.. ( २ ) जो हो चुका है और जो होने वाला है वह परम पुरुष ही है. वह अमरता का स्वामी है. जो अन्न से बढ़ोतरी पाते हैं, उन के भी वही स्वामी हैं. ( २ ) एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः. पादोस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. ( ३ ) परम पुरुष अत्यंत महिमावान है. इस के चरणों में सभी प्राणी हैं. इस का एक भाग पृथ्वी पर है, जिस में सब प्राणी हैं और तीन भाग स्वर्गलोक में स्थित हैं. ( ३ ) त्रिपादूर्ध्व ऽ उदौत्पुरुषः पादोस्येहाभवत् पुनः. ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि.. ( ४ ) परम पुरुष के तीन पैर ऊर्ध्वलोक में समाए हुए हैं. एक भाग में इहलोक समाहित है. जड़, चेतन सभी इस के इस पैर में समाहित हैं. ( ४ ) ततो विराजडजायत विराजो अधि पूरुषः. स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः.. ( ५ ) उस परम पुरुष से विराट् उपजा. विराट् से सृष्टि उपजी. उस से भूमि पैदा हुई फिर जीव पैदा हुए. ( ५ ) तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्. पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये.. ( ६ ) यजुर्वेद - ३६१

उत्तरार्ध इकतीसवां अध्याय उस विराट् के यज्ञ से घी प्राप्त हुआ, जिस से सब को आहुति दी जाती है. उसी विराट् से पक्षी, पशु, गांव के जीव, जानवर उपजे. ( ६ ) तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऽ ऋचः सामानि जज्ञिरे. छन्दा १५ं सि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत.. (७) उस विराट् यज्ञ रूपी पुरुष से ऋग्वेद प्रकटा. उसी से सामवेद प्रकटा. उसी से यजुर्वेद प्रकट हुआ. उसी से अथर्ववेद का प्रादुर्भाव हुआ. ( ७ ) तस्मादश्वा ऽ अजायन्त ये के चोभयादतः. गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता ऽ अजावयः... (८) उसी विराट् यज्ञ रूपी पुरुष से दोनों ओर दांतों वाले जीव उपजे. उसी से घोड़े उपजे. उसी से बकरियां उपजीं. उसी से भेड़ आदि उपजे. ( ८ ) तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः. तेन देवा ऽ अयजन्त साध्या ऽ ऋषयश्च ये.. (९) सब से पहले यज्ञ से बाहर आए उस पुरुष को पूजा. उसी से देवताओं, ऋषियों और साधकों ने यज्ञ को उपजाया. ( ९ ) यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्. मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा ऽ उच्येते.. (१०) संकल्प से प्रकटे विराट् पुरुष का ज्ञानीजन भांतिभांति से वर्णन करते हैं. उस का मुख क्या है ? बाहु क्या है ? जांघ कौन सी है ? पांव क्या कहे जाते हैं. ( १० ) ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः. ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्या १५ं शूद्रो अजायत.. (११) ब्राह्मण विराट् पुरुष का मुंह हुए. क्षत्रिय उस की भुजाएं हुए. वैश्य उस की जंघाएं हुईं. शूद्र उस के पैर हुए. ( ११ ) चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायतः. श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत.. (१२) विराट् पुरुष के मन से चंद्रमा, आंखों से सूर्य, कान से वायु और मुख से अग्नि उत्पन्न हुई. ( १२ ) नाभ्या ऽ आसीदन्तरिक्ष १५ं शीर्ष्णो द्यौः समवर्त्तत. पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ २ अकल्पयन्.. (१३) परम पुरुष की नाभि से अंतरिक्ष प्रकट हुआ. परम पुरुष के सिर से स्वर्गलोक ३६२ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध इकतीसवां अध्याय

उत्तरार्ध इकतीसवां अध्याय प्रकट हुआ. परम पुरुष के पैर से भूमि प्रकट हुई. परम पुरुष के कानों से दिशाएं प्रकट हुईं. परम पुरुष ने अनेक लोक रचे हैं. ( १३ ) यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत. वसन्तोस्यासीदाज्यं ग्रीष्म ऽ इध्मः शरद्धविः.. ( १४) देवताओं ने परम पुरुष को हवि माना. परम पुरुष को हवि मान कर यज्ञ की शुरुआत की. उस यज्ञ में घी वसंत ऋतु, ईंधन ग्रीष्म ऋतु एवं हवि शरद ऋतु हो गई. ( १४ ) सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः. देवा यद्यज्ञं तन्वाना ऽ अबध्नन् पुरुषं पशुम्.. ( १५) देवताओं ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उस यज्ञ में परम पुरुष को ही हवि के पशु के रूप में बांधा. उस यज्ञ में सात परिधियां और इक्कीस समिधाएं हुईं. ( १५ ) यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्. ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः.. (१६) देवताओं ने यज्ञ से यज्ञ किया. उस में धर्म को प्रथम आसन प्राप्त हुआ. जो लोग यज्ञ आदि विधिविधान से जीवन जीते हैं, ऐसे जीवन साधक महिमाशाली होते हैं. ऐसे व्यक्ति स्वर्ग प्राप्त करते हैं. ( १६ ) अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च विश्वकर्मणः समवर्त्तताग्रे. तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे.. ( १७) परम पुरुष ने सब से पहले जल का निर्माण किया. तत्पश्चात पृथ्वी का निर्माण किया. इस पृथ्वी का निर्माण जल के रस से हुआ. त्वष्टा देव संसार को रूप धारण कराते हैं. त्वष्टा देव मनुष्यों को देवत्व और अमरता प्रदान करते हैं. ( १७ ) वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्. तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेयनाय.. (१८) परम पुरुष को जानने से परम तत्त्व की प्राप्ति होती है. वह अंधकार से परे है. वह आदित्य जैसे वर्ण ( रंग ) का है. उस को जान कर जो मृत्यु के पथ पर जाते हैं, उन्हें उस पथ से मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस के अलावा मोक्ष का कोई और मार्ग नहीं है. ( १८ ) प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा वि जायते. तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा.. (१९) प्रजापति गर्भ में संचरण करते हैं. वे अजन्मा हैं. फिर भी बहुत रूपों में प्रकट यजुर्वेद - ३६३

उत्तरार्ध इकतीसवां अध्याय होते हैं. उन्हीं में सारे लोक स्थित हैं. धीर पुरुष उस के कारण चारों ओर देखते हैं. ( १९) यो देवेभ्य ऽ आतपति यो देवानां पुरोहितः. पूर्वो यो देवेभ्यो जातो नमो रुचाय ब्राह्मये.. (२०) जो सभी देवताओं में सब से पहले प्रकटे, जो तेज संपन्न हैं, उन ब्रह्म को नमस्कार है. आप देवताओं के पुरोहित हैं. आप देवताओं को प्रकाशित करने वाले हैं. ( २० ) रुचं ब्राह्मं जनयन्तो देवा ऽ अग्रे तदब्रुवन्. यस्त्वैवं ब्राह्मणो विद्यात्तस्य देवा ऽ असन् वशे.. (२१) जो देवताओं में अग्रणी हैं, जिन के बारे में यह कहा गया है कि वे प्रकाशमय ब्रह्म को प्रकटातें हैं, उस परम पुरुष को ब्रह्मज्ञानी जानते हैं. उस परम पुरुष के वश में सारे देवता रहते हैं. ( २१ ) श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्. इष्णन्निषाणामुं म ऽ इषाण सर्वलोकं म ऽ इषाण.. (२२) हे परम पुरुष! श्री और लक्ष्मी आप की पत्नी हैं. दोनों भुजाएं दिन और रात हैं. नक्षत्र आप के रूप हैं. आप सब की इच्छा पूर्ति की सामर्थ्य रखते हैं. आप सभी लोकों की इच्छा पूर्ति करने की कृपा कीजिए. ( २२ ) ३६४ - यजुर्वेद

बत्तीसवां अध्याय

बत्तीसवां अध्याय तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः. तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः.. (१) परम पुरुष ही अग्नि है. वही आदित्य है. वही वायु है. वही चंद्रमा, प्रकाशमान व ब्रह्मज्ञानी है. वही जल और वही प्रजापति है. ( १ ) सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि. नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परि जग्रभत्.. (२) सारे काल उस परम पुरुष से ही यज्ञ में उत्पन्न हुए. उस से ऊपर कोई नहीं है. उस को ऊपर, बीच आदि से कोई भी पार नहीं पा सकते. ( २ ) न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः. हिरण्यगर्भ ऽ इत्येष मा मा हि ४ँ सीदित्येषा यस्मान्न जात ऽ इत्येषः.. (३) उस परम पुरुष की कोई प्रतिमा ( सानी ) नहीं है. आप का यश महान है. आप का नाम अत्यंत महान् है. ‘हिरण्यगर्भ’, ‘मा हिंसीत्’, ‘यस्मान् जात’ इत्यादि मंत्रों में उस परम पुरुष की प्रशंसा और नाम का बारंबार वर्णन किया गया है. ( ३ ) एषो ह देवः प्रदिशोनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः. स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः.. (४) वह परम पुरुष सभी प्रदेशों में व्याप्त है. वह पूर्व और अंत में भी व्याप्त है. वही उत्पन्न हुओं में विद्यमान है. वही उत्पन्न हो रहे प्राणियों में भी विद्यमान है. वही जन्म लेने वालों में भी व्याप्त होगा. वह सभी में सर्वविधि व्याप्त है. ( ४ ) यस्माज्जातं न पुरा किं चनैव य ऽ आबभूव भुवनानि विश्वा. प्रजापतिः प्रजया स ४ँ रराणस्त्रीणि ज्योती ४ँ षि सचते स षोडशी.. (५) जिस से पहले कोई उत्पन्न नहीं हुआ, उस परमात्मा से सभी लोक उत्पन्न हुए हैं. वह परम पुरुष प्रजा के साथ रहते हैं. वह परम पुरुष तीन ज्योतियों को धारते हैं. प्रजा के साथ रहने वाले प्रजापति सोलह कलाओं वाले हैं. ( ५ ) येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः. यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (६) यजुर्वेद - ३६५

उत्तरार्ध बत्तीसवां अध्याय

उत्तरार्ध बत्तीसवां अध्याय उस परम पुरुष ने स्वर्ग को उग्र बनाया. उस ने पृथ्वी को दृढ़ बनाया. उस ने स्वर्ग को स्थिर बनाया. उस ने अंतरिक्ष में शोभा रची. हम ( उन के अलावा ) अब किस देव के लिए हवि का विधान करें ? ( ६ ) यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने. यत्राधि सूर ऽ उदितो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम. आपो ह यद्बृहतीर्यश्चिदापः... (७) जिस को परम पुरुष की शक्ति से ज्ञानी जन मन के द्वारा सब ओर देखते हैं, जहां प्रकाशवान सूर्य उदय हो कर चमकता है, ( अब हम उन के अलावा ) किस देव के लिए हवि का विधान करें. 'आपो ह यद् बृहतीः' और 'यश्चिदापः' में उसी परम शक्ति का गुणगान किया गया है. ( ७ ) वेनस्तत्पश्यन्निहितं गुहा सद्यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्. तस्मिन्निद ६० सं च वि चैति सर्व ६० स ओतः प्रोतश्च विभूः प्रजासु.. (८) वह परम पुरुष सभी में गुप्त रूप से मौजूद है, जो सब का आश्रयदाता है, जो सब पर दृष्टि रखता है. सभी प्राणी प्रलय में उस में लीन हो जाते हैं. सभी में वही ओतप्रोत है. प्रजाओं में वही प्रकाशवान है. ( ८ ) प्र तद्वोचेदमृतं नु विद्वान् गन्धर्वो धाम विभृतं गुहा सत्. त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुः पितासत्.. (९) परम पुरुष अमर है. विद्वान् पुरुष उस के बारे में कुछ कह सकते हैं. उस का धाम दिव्य है जो गुप्त रूप से सब में विद्यमान है, जिस में तीन पद गुप्त रूप से निहित हैं, जो ज्ञाता और जो पिता का भी पिता है. ( ९ ) स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा. यत्र देवा ऽ अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त.. (१०) वह परम पुरुष सब का बंधु है. वह सब को उपजाने वाला, विधाता, आश्रय दाता और सारे लोकों और लोगों का ज्ञाता है. उस के वहां तीसरे धाम में अमर देवता आनंदपूर्वक विचरण करते हैं. ( १० ) परीत्य भूतानि परीत्य लोकान् परीत्य सर्वाः प्रदिशो दिशश्च. उपस्थाय प्रथमजामृतस्यात्मनात्मानमभि सं विवेश.. (११) वह परम पुरुष सभी प्राणियों व समस्त लोकों को घेरे हुए है. वह सभी दिशाओं में व्याप्त है. वह सभी उपदिशाओं को घेरे हुए है. वह अजन्मा व अमर है. सभी ज्ञानी आत्मरूप को जान कर अपने आत्मरूप का इस में समावेश कर देते हैं. ( ११ ) ३६६ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध बत्तीसवां अध्याय परि द्यावापृथिवी सद्य ऽ इत्वा परि लोकान् परि दिशः परि स्वः. ऋतस्य तन्तुं विततं विचृत्य तदपश्यत्तदभवत्तदासीत्.. (१२) परम पुरुष स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक में परिव्याप्त है. वह लोकों व दिशाओं में व्याप्त है. वह अपनेआप में परिव्याप्त है. फैले हुए सत्य के तंतु को जान कर ज्ञानी वैसे ही हो जाते हैं और देखते हैं, जैसे पहले थे. ( १२ ) सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्. सनिं मेधामयासिष ष्ठ स्वाहा.. (१३) परम पुरुष को सभी पाना चाहते हैं. वह अद्भुत, इंद्र देव का प्रिय व काम्य है. हम उस से ( श्रेष्ठ ) बुद्धि व ( श्रेष्ठ ) धन चाहते हैं. परम पुरुष के लिए स्वाहा. ( १३ ) यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते. तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा.. (१४) हे अग्नि! जिस श्रेष्ठ बुद्धि की देवतागण और पितरगण उपासना करते हैं, उस बुद्धि से आप हमें बुद्धिमान बनाने की कृपा कीजिए. अग्नि के लिए स्वाहा. ( १४ ) मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः. मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा.. (१५) वरुण, अग्नि व प्रजापति हमें बुद्धि प्रदान करें. इंद्र देव बुद्धि धारण करते हैं. वे हमें बुद्धि प्रदान करें. इन सभी देवों के लिए स्वाहा. ( १५ ) इदं मे ब्रह्म च क्षत्रं चोभे श्रियमश्नुताम्. मयि देवा दधतु श्रियमुत्तमां तस्यै ते स्वाहा.. (१६) परम पुरुष हमें यह ब्रह्मज्ञान और क्षात्र तेज इन दोनों से युक्त करें ( शोभित करने की कृपा करें ). हमें देवता श्रेष्ठ शोभा धारण कराने की कृपा करें. इसी के लिए उन्हें यह आहुति प्रदान करते हैं. ( १६ ) यजुर्वेद - ३६७

तैंतीसवां अध्याय

तैंतीसवां अध्याय अस्याजरासो दमामरिन्त्रा ऽ अर्चद्धूमासो अग्नयः पावकाः. श्वितीचयः श्वात्रासो भुरण्यवो वनर्षदो वायवो न सोमाः.. (१) यजमान ने जो अग्नियां प्रज्वलित की हैं, वे अजर हैं. वे दुश्मनों से त्राण करने वाली, पूजनीय, धूम्रमय, पवित्र, शीघ्र फल देने वाली व भुवन को पालने वाली हैं. वे वन के समान व्यापक व वायु के समान प्राणदायी हैं. वे अग्नियां सोम की तरह हमारी इच्छा पूरी करने की कृपा करें. (१) हरयो धूमकेतवो वातजूता ऽ उप द्यवि. यतन्ते वृथगग्नयः.. (२) अग्नियां हरी हैं. धुएं की पताका वाली और वायु से बढ़ोतरी पाने वाली हैं. स्वर्गलोक में जाने के लिए बारबार प्रयत्न करती हैं. (२) यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाँ २ ऋतं बृहत्. अग्ने यक्षि स्वं दमम्.. (३) हे अग्नि! आप मित्र, वरुण व अन्य देवताओं के लिए यजन करने की कृपा कीजिए. आप सत्यवान व विशाल हैं. आप अपने घर को यज्ञ के शुभ कार्यों से युक्त करने की कृपा कीजिए. (३) युक्ष्वा हि देवहूतमाँ २ अश्वाँ २ अग्ने रथीरिव. नि होता पूर्व्यः सदः.. (४) हे अग्नि! जैसे सारथी रथ में घोड़े जोतता है, वैसे ही देवों को (यज्ञ में) आमंत्रित करने के लिए आप घोड़ों को रथ में जोतिए. आप चिरकाल से ही यज्ञ में बुलाए जाते हैं. (४) द्वे विरूपे चरतः स्वर्थे अन्यान्या वत्समुप धापयेते. हरिरन्यस्यां भवति स्वधावाञ्छुक्रो अन्यस्यां ददृशे सुवर्चाः.. (५) रात्रि और दिवस अपने श्रेष्ठ काम के लिए वैसे ही विचरते हैं, जैसे अलगअलग रूपरंग वाली स्त्रियां विचरती हैं. रात्रि हरी (काली) है. रात्रि के स्वधावान चमकीले पुत्र चंद्रमा हुए. दूसरी के श्रेष्ठ वर्चस्वी पुत्र सूर्य हुए. ऐसा देखा (कहा) जाता है. (५) ३६८ – यजुर्वेद 632/23

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः. यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभवं विशे विशे.. (६) यह अग्नि अग्रगण्य हैं. यज्ञ में सर्वप्रथम इन्हीं का ध्यान किया जाता है. यह यजमानों के होता व यज्ञ में उपासनीय हैं. यज्ञों में विशेष रूप से इन्हें प्रतिष्ठित किया जाता है. इन अग्नि को अप्नवान, भृगु, विरुरुचु आदि ऋषियों ने वनों में बारबार प्रतिष्ठित किया है. (६) त्रीणि शता त्री सहस्राण्यग्निं त्रि ᳪ शच्च देवा नव चासपर्यन. औक्षन् घृतैरस्तृणन् बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त.. (७) हे यजमानो! तीन हजार, तीन सौ तीस और नौ अर्थात् तैंतीस सौ उनतालीस देवता अग्नि की उपासना करते हैं. देवगण घी की आहुतियों से अग्नि को सींचते हैं. अग्नि के विराजने के लिए कुश का आसन बिछाते हैं. उन्हें होता के रूप में प्रतिष्ठित कर के यज्ञ करते हैं. (७) मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत ऽ आ जातमग्निम्. कवि ᳪ साम्राज्यमतिथिं जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः.. (८) अग्नि मूर्धन्य, स्वर्गलोक में भी श्रेष्ठ, पृथ्वीलोक को सूर्य के रूप में जगमगाने वाले व वैश्वानर हैं. वे यज्ञ में उत्पन्न होने वाले, कवि, सम्राट्, यजमान के अतिथि हैं. देवताओं के आह्वाहक हैं. यजमानों ने अपनी रक्षा हेतु पात्र में अग्नि को उपजाया. (८) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया. समिद्धः शुक्र ऽ आहुतः.. (९) अग्नि वृत्र को मारते हैं ( नष्ट करते हैं). अग्नि धनवान व प्रकाशमान हैं. समिधा से उन्हें प्रदीप्त किया जाता है. उन को आहुति समर्पित करते हैं. (९) विश्वेभिः सोम्यं मध्वग्न ऽ इन्द्रेण वायुना. पिबा मित्रस्य धामभिः.. (१०) हे अग्नि! आप इंद्र देव, वायु, मित्र देव व सभी देवताओं के साथ आइए. आप इन सब के साथ मधुर सोमरस का पान करने की कृपा कीजिए. (१०) आ यदिषे नृपतिं तेज ऽ आनट् शुचि रेतो निषिक्तं द्यौरभीके. अग्निः शर्धमनवद्यं युवान ᳪ स्वाध्यं जनयत् सूदयच्च.. (११) जब अग्नि में अन्न और पवित्र जल से शुद्ध हवि से यजन किया जाता है, तब अग्नि जल से सींचते हैं. यह जल बलशाली बनाता है. यह सुखवर्द्धक, निरंतर प्रवाहित होने वाला, युवा बनाने वाला व जग के लिए उपजाऊ है. (११) अग्ने शर्ध महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु. सं जास्पत्य ᳪ सुयममा कृणुष्व शत्रूयतामभि तिष्ठा महा ᳪ सि.. (१२) यजुर्वेद - ३६९

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय हे अग्नि! आप हमें अपनी महत्ता प्रदान कीजिए. आप हमारे सौभाग्य में बढ़ोतरी कीजिए. स्वर्गलोक से आप और अधिक यशस्वी हों. आप यजमान जोड़े को प्रेम भाव से जोड़िए. यजमान से शत्रुभाव रखने वालों की साख ( प्रतिष्ठा ) गिराइए. ( १२ ) त्वा हि मन्द्रतममर्कशोकैर्ववृमहे महि नः श्रोष्यग्ने. इन्द्रं न त्वा शवसा देवता वायुं पृणन्ति राधसा नृतमाः.. (१३) हे अग्नि! आप के लिए महिमामय स्तोत्र गा रहे हैं. आप उन्हें सुनने की कृपा कीजिए. आप विचारक हैं. हम सूर्य की तरह आप का वरण करते हैं. आप इंद्र देव की तरह बलवान और वायु की भांति बलशाली हैं. हम आप को धनधान्य भरी आहुतियों से परिपूर्ण करते हैं. ( १३ ) त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः. यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वान् दयन्त गोनाम्.. (१४) हे अग्नि! हम आप के लिए श्रेष्ठ आहुति भेंट करते हैं. शूरवीर आप के प्रिय हो जाते हैं. जो धनवान और ऊर्जावान हैं, उन के प्रति आप दयावान हैं. उन पर गोधन आदि की कृपा करते हैं. ( १४ ) श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः. आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम्.. (१५) हे अग्नि! आप श्रेष्ठ कानों वाले हैं. आप हमारे द्वारा की गई स्तुतियों को सुनते हैं. हम देवताओं के लिए अग्नि में जो आहुति अर्पित करते हैं. आप उस हवि को वहन करते हैं. आप हमारे प्रातःकालीन यज्ञों में मित्र देव व अर्यमा देव के साथ आइए. आप उन के साथ कुश के आसन पर विराजने की कृपा कीजिए. ( १५ ) विश्वेषामदितिर्यज्ञियानां विश्वेषामतिथिर्मानुषाणाम्. अग्निर्देवानामव आवृणानः सुमृडीको भवतु जातवेदाः.. (१६) अग्नि! आप सर्वज्ञाता, देवों में अदिति देव जैसे ( वर्चस्वी ), यज्ञ करने योग्य, मनुष्यों के लिए अतिथि जैसे आदरणीय व प्रकाशमान हैं. आप देवताओं तक हमारी हवि पहुंचाने व हमें भरपूर सुख प्रदान करने की कीजिए. ( १६ ) महो अग्नेः समिधानस्य शर्मण्यनागा मित्रे वरुणे स्वस्तये. श्रेष्ठे स्याम सवितुः सवीमनि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (१७) हे अग्नि! आप महिमाशाली व समिधावान हैं. हम आप का संरक्षण पाना चाहते हैं. हम अपने कल्याण के लिए मित्र और वरुण देव की उपासना करते हैं. हम सविता देव की कृपा से श्रेष्ठता प्राप्त करें. अर्थात् श्रेष्ठ हो जाएं. हम देवताओं को हवि प्रदान करने के लिए आप का वरण करते हैं. ( १७ ) ३७० - यजुर्वेद

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय आपश्चित्पिप्यु स्तर्यो न गावो नक्षन्नृतं जरितारस्त ऽ इन्द्र. याहि वायुर्न नियुतो नो अच्छा त्व ँहि हि धीभिर्दायसे वि वाजान्.. (१८) हे इंद्र देव! यजमान यज्ञ में आप का ध्यान करते हैं. आप के लिए मंत्र गाते हैं. आप के लिए जल व शक्ति की बढ़ोतरी करते हैं. आप हमारे पास आइए. आप आने के लिए वायु जैसे वेगशाली घोड़े जोतिए. आप हमें अन्न व बल दीजिए. ( १८ ) गाव ऽ उपावतावतं मही यज्ञस्य रप्सुदा. उभा कर्णा हिरण्यया.. (१९) सूर्य की किरणें यज्ञ व पृथ्वी की रक्षा करती हैं. किरणों के दोनों कान स्वर्णमय हैं. ( १९ ) यदद्य सूर ऽ उदितेनागा मित्रो अर्यमा. सुवाति सविता भगः.. (२०) आज सूर्य के उदित होने पर निष्छल यजमानों को मित्र और अर्यमा देव श्रेष्ठ कामों में लगाने की कृपा करें. सविता देव सौभाग्यशाली बनाएं. वे श्रेष्ठ कामों में लगाएं. ( २० ) आ सुते सिञ्चत श्रिय ँ रोदस्योरभिश्रियम्. रसा दधीत वृषभम्. तं प्रत्नथायं वेनः.. (२१) यजमानगण प्रवहमान सोमरस को सिंचित करते हैं. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के संरक्षण में सोम का प्रवाह बहुत तेज होता है. वह शोभायमान होता है. ( २१ ) आतिष्ठन्तंपरि विश्वे अभूषञ्छ्रियो वसानश्चरति स्वरोचिः. महत्तद्वृष्णो असुरस्य नामा विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ.. (२२) इंद्र देव प्रकाशमान और वैभववान हैं. सभी देवताओं ने मिल कर उन की प्रतिष्ठा की है. सभी देव चारों ओर से घेर कर उन की उपासना करते हैं. वे महान् व विश्वरूप हैं. कई असुरों को मार कर उन्होंने ख्याति पाई है. वे अमर हैं. ( २२ ) प्र वो महे मन्दमानायान्धसोर्चा विश्वानराय विश्वाभुवे. इन्द्रस्य यस्य सुमख ँ सहो महि श्रवो नृम्णं च रोदसी सपर्यतः.. (२३) हे यजमानो! इंद्र देव महिमाशाली, सब लोकों के पालक, संपूर्ण जग को उपजाने वाले व मदमस्त बनाने वाले हैं. हम उन की अर्चना करते हैं. इंद्र देव के लिए श्रेष्ठ यज्ञ किए जाते हैं. उन की महिमा सुनी जाती है, जो पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों को महान् वैभव प्रदान करते हैं. ( २३ ) बृहन्निदिध्म ऽ एषां भूरि शस्तं पृथुः स्वरुः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (२४) यजुर्वेद - ३७१

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय इंद्र देव युवा, हमारे सखा, विशाल व शत्रुनाशी हैं. वे बहु प्रशंसित और सामर्थ्यशाली हैं. ( २४ ) इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः. महाँ २ अभिष्टिरोजसा.. ( २५) हे इंद्र देव! आप महान्, आदरणीय व सब को आनंद देने वाले हैं. आप सोम उत्सव में पधारिए. आहुति ग्रहण कर के प्रसन्न होइए. हमें ओजस्वी बनाइए. हमारे अभीष्ट पूरिए. ( २५ ) इन्द्रो वृत्रमवृणोच्छर्धनीतिः प्र मायिनाममिनादृर्पणीतिः. अहन् व्य १ष समुशधग्वनेष्वाविर्धेना ऽ अकृणोद्राभ्याणाम्.. ( २६) हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर, मायावी राक्षसों व दुष्टों का दलन करने वाले हैं. आप आह्लादक और हमारी स्तुतियों को प्रकट करते हैं. ( २६ ) कुतस्त्वमिन्द्र माहिनः सन्नेको यासि सत्पते किं त ऽ इत्था. सं पृच्छसे समराणः शुभानैर्वोचेस्तन्नो हरिवो यत्ते अस्मे. महाँ २ इन्द्रो य ऽ ओजसा कदा चन स्तरीरसि कदा चन प्र युच्छसि.. ( २७) हे इंद्र देव! आप महिमाशाली सज्जनों के स्वामी हैं. आप अकेले कहां जाते हैं ? आप इस प्रकार क्यों जाते हैं. अच्छी तरह जाते हुए आप से यह प्रश्न पूछा जाता है. आप के घोड़े हरे रंग के हैं. आप ओजस्वी हैं. आप कभी भी हिंसा आदि नहीं करते हैं. आप हमारे शुभचिंतक और अपने हैं. इसीलिए हम आप से यह सब पूछ रहे हैं. ( २७ ) आ तत्त ऽ इन्द्रायवः पनन्ताभि य ऽ ऊर्वं गोमन्तं तितृत्सान्. सकृत्स्वं ये पुरुपुत्रां मही ६ष सहस्रधारां बृहतीं दुदुक्षन्.. ( २८) हे इंद्र देव! आप गोस्वामियों के घातकों व भूपतियों ( भूमिस्वामी ) के हत्यारों को मारते हैं. पृथ्वी पर सहस्रों धाराओं वाले सोम को निचोड़ते हैं. उस का दोहन करते हैं. श्रेष्ठ कर्मों वाले आप के पुत्र आप की महिमा का गान करते हैं. ( २८ ) इमां ते धियं प्र भरे महो महीमस्य स्तोत्रे धिषणा यत्त ऽ आनजे. तमुत्सवे च प्रसवे च सासहिमिन्द्रं देवासः शवसामदन्ननु.. (२९) हे इंद्र! हम आप की बुद्धि को धारण करते हैं. आप महान व पृथ्वी का भरणपोषण करने में समर्थ हैं. हम आप की स्तुति करते हैं. उत्सव और प्रसव के समय हमें कष्ट पहुंचाने वाले शत्रुओं का साहसी इंद्र देव दमन करते हैं. देवगण भी आनंदित हो कर इंद्र देव के गुण गाते हैं. ( २९ ) विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्. वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा वि राजति.. (३०) हे इंद्र देव! आप चमकीले व विशाल हैं. आप सोमरस को पीने की कृपा ३७२ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय कीजिए. सोमरस मधुर है. हम यज्ञ में आप का आह्वान करते हैं. आप अपनी प्रजा की सर्वविधि ( सब प्रकार से ) रक्षा करते हैं. आप प्रजा का पालनपोषण और उन्हें बहुविधि प्रकाशित करते हैं. ( ३० ) उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. ( ३१ ) सूर्य सब को प्रकाशित करने वाले, सब कुछ जानने वाले व सारे विश्व को देखने में समर्थ हैं. वे ऊर्ध्वगामी पताका वहन करते हैं. ( ३१ ) येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ २ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. ( ३२ ) हे वरुण देव! आप पवित्र बनाने वाले व भरणपोषण करने वाले हैं. आप जिस दृष्टि से देखते हैं. हम भी उसी दृष्टि से ( लोगों को ) देखने में आप का अनुकरण करें. ( ३२ ) दैव्यावध्वर्यू आ गत १४ रथेन सूर्यत्वचा. मध्वा यज्ञ १४ समञ्जाथे. तं प्रत्नथायं वेनश्चित्रं देवानाम्.. ( ३३ ) हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों दिव्य व ( यज्ञ के ) अध्वर्यु ( पुरोहित ) हैं. आप सूर्य के समान चमकने वाले रथ से यहां आ जाइए. आप देवताओं के इस यज्ञ को प्रयत्नपूर्वक ( अच्छी तरह से ) पूर्ण कराइए. ( ३३ ) आ न ऽ इडाभिर्विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव ऽ एतु. अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगदभिपित्वे मनीषा.. ( ३४ ) हे सविता देव! आप बहुप्रशंसित, कल्याणकारी व अन्नदाता हैं. आप हमारे यहां यज्ञ स्थान में पधारने की कृपा कीजिए. आप युवा व जगत् के पालनहार हैं. आप हम सभी को अपनी बुद्धि से तृप्त करने की कृपा कीजिए. ( ३४ ) यदद्य कच्च वृत्रहन्नुदगा ऽ अभि सूर्य. सर्वं तदिन्द्र ते वशे.. ( ३५ ) हे इंद्र देव! आप शत्रुनाशी हैं. सूर्य जैसे अंधेरे का नाश करते हैं, वैसे ही आप वृत्र का नाश करते हैं. हे इंद्र देव! सब कुछ आप के ही वश में है. ( ३५ ) तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमा भासि रोचनम्.. ( ३६ ) हे सूर्य! आप तारक, संसार के लिए दर्शनीय व ज्योति के आविष्कारक हैं. आप अपने प्रकाश से सब को प्रकाशित करने वाले हैं. ( ३६ ) तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्वितत १४ सं जभार. यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै.. ( ३७ ) यजुर्वेद – ३७३

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय सूर्य की दिव्यता व महिमा व्यापक है. सूर्य संसार के मध्य विराजमान ( स्थित ) व विशाल निर्माण और संहार करने वाले हैं. जब वे अलग कर के अपनी हरी किरणों को साधते हैं, तब रात्रि संसार को अंधकार से घेर लेती है. ( ३७ ) तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे. अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति.. ( ३८) सूर्य मित्र देव और वरुण देव के साथ मनुष्यों को सब ओर से देखते हैं. सूर्य रूपवान हैं. स्वर्गलोक उन के उस रूप को धारण करता है. दूसरा कृष्ण और हरित रूप है. उसे आकाश धारण करता है. ( ३८ ) बण्महाँ २ असि सूर्य बडादित्य महाँ २ असि. महस्ते सतो महिमा पनस्यतेद्धा देव महाँ २ असि.. ( ३९) हे सूर्य! आप बड़े ही महान् हैं. हे आदित्य देव! आप बड़े महान् हैं. महान् होने के कारण ही सभी आप की महिमा गाते हैं. वास्तव में आप सभी देवों में महान् हैं. ( ३९ ) बट् सूर्य श्रवसा महाँ २ असि सत्रा देव महाँ २ असि. महा देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम्.. ( ४०) हे सूर्य! आप प्रख्यात, महान्, सभी देवों में महान् व असुरनाशक हैं. आप पुरोहित, प्रकाशक व ज्योति के भंडार हैं. ( ४० ) श्रायन्त ऽ इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत. वसूनि जाते जनमान ऽ ओजसा प्रति भागं न दीधिम.. ( ४१) सूर्य से उत्पन्न हो कर उन के संरक्षण में उन की किरणें संसार के वैभव को भोगती हैं, वैसे ही हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए ओज और धन को धारण करें. ( ४१ ) अद्या देवा ऽ उदिता सूर्यस्य निर १७ हसः पिपृता निरवद्यात्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. ( ४२) हे यजमानो! आज सूर्य की किरणें उदित हो कर हमें पापों व हिंसा से बचाएं. वे मित्र देव, वरुण देव, अदिति देव, समुद्र, पृथ्वी और स्वर्गलोक हम अहिंसक यजमानों की इच्छा पूरी करने की कृपा करें. ( ४२ ) आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च. हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्.. ( ४३) काले अंधकार से भरे पथ पर घूमते हुए सविता देव अपने सोने के रथ पर ३७४ - यजुर्वेद

उत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय सवार हो कर लोकों को देखते हुए जाते हैं. सविता देव मनुष्यों को निवेश ( काम में लगाते ) करते हुए जाते हैं. ( ४३ ) प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विशपतीव बीरिट ऽ इयाते. विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान्.. (४४) यजमान अपने कल्याण के लिए उषाकाल में वायु व पूषा देव को आमंत्रित करते हैं. यजमान इन देवों के लिए कुश के आसन भेंट करते हैं. ये देव ठाटबाट से राजा की तरह पधारते हैं. ( ४४ ) इन्द्रवायू बृहस्पतिं मित्राग्निं पूषणं भगम्. आदित्यान् मारुतं गणम्.. (४५) हम इंद्र देव, वायु देव, बृहस्पति देव, मित्र देव, अग्निपूषा देव भग देव, आदित्यगण और मरुद्गण का आह्वान करते हैं. ( ४५ ) वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः. करतां नः सुराधसः.. (४६) वरुण देव और मित्र देव संसार के मित्र हैं. वे अपनी पूरी क्षमता से अपने सभी रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ये देव हमें श्रेष्ठ धनों से संपन्न बनाने की कृपा करें. ( ४६ ) अधि न ऽ इन्द्रैषां विष्णो सजात्यानाम्. इता मरुतो अश्विना. तं प्रत्नथायं वेनो ये देवास ऽ आ न ऽ इडाभिर्विश्वेभिः सोम्यं मध्वोमासश्चर्षणीधृतः.. (४७) हे इंद्र देव! हे विष्णु! आप पधारिए. आप सजातीय बंधुओं के बीच अधिष्ठित होइए. मरुद्गण और अश्विनी देव भी अधिष्ठित होने की कृपा करें. सभी देव सर्वद्रष्टा हैं. सभी देव मधुर सोमरस को पीने व हमें धारण करने की कृपा करें. ( ४७ ) अग्न ऽ इन्द्र वरुण मित्र देवाः शर्धः प्र यन्त मारुतोत विष्णो. उभा नासत्या रुद्रो अध ग्नाः पूषा भगः सरस्वती जुषन्त.. (४८) हे अग्नि! हे इंद्र देव! हे वरुण देव, हे मित्र देव! हे मरुद्गण! हे विष्णु! आप हमें सुख व सामर्थ्य प्रदान कीजिए. अश्विनीकुमार, रुद्रगण, पूषा, भग, सरस्वती आदि देवता भी हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा करें. ( ४८ ) इन्द्राग्नी मित्रावरुणादिति १७ स्वः पृथिवीं द्यां मरुतः पर्वताँ २ अपः. हुवे विष्णुं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं भगं नु श १७ स १७ सवितारमूतये.. (४९) हम इंद्र देव, अग्नि, मित्र देव, वरुण देव, अदिति देव, पृथ्वीलोक, स्वर्गलोक, मरुद्गण, पर्वत, जल, विष्णु, पूषा देव, बृहस्पति देव, भग देव व सविता देव यजुर्वेद - ३७५