सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

५६४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

भासता है। आत्मा सदा एक है किञ्चन से उसमें आकार दिखते हैं। भैरव और काली सब निराकार हैं। भ्रान्ति में आकार प्रतीत होते हैं। जैसे मनोराज्य में युद्ध भासते हैं और जैसे कथा में अर्थ भासते हैं, वे असत् ही संकल्प-विज्ञान से हैं; वैसे ही चिदात्मा में यह जगत् भासित होता है। जैसे आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही ये आकार दिखते हैं। हे राम! ये जो जगत्, प्रलय और महाप्रलय आदि शब्द हैं, उनका नाश करने के लिए मैं तुमको कहता हूँ। आत्मा एक अद्वैत चैतन्य है, उस चैतनता का अभाव कभी नहीं होता। वह अपने आपमें स्थित है और किञ्चन है। जैसे सूर्य की किरणें किञ्चनरूप होती हैं और उनमें जल भासता है, वैसे ही चित्त का किञ्चन जगत् भासता है। वही महाप्रलय में रुद्र और भैरवी होकर भासता है। वास्तव में न कुछ रुद्र है और न काली है, सब आत्मा ही है।

हे राम! जो कुछ कहना-सुनना होता है सो वाच्य तथा वाचक से होता है, आत्मा में कहना और सुनना कुछ नहीं। वही चिदाकाश रुद्र संकल्प में नृत्य करता था। जैसे सुवर्ण भूषण होकर भासित होता है, वैसे ही चिदाकाश संकल्प में आकार होकर भासित होता है, दृश्य कुछ नहीं बना। मैं, तुम और जगत्, चेत्य और अचेत्य सब वही रूप है; उसमें कोई शब्द नहीं फुरा। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के शब्द भासित होते हैं सो कुछ वास्तव नहीं—पत्थर की नाईं मौन हैं—वैसे ही जाग्रत् जगत् में भी जितना शब्द होता है सो सब स्वप्न है; कुछ हुआ नहीं। केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही आत्मसत्ता अपने आप भाव में स्थित है, जहाँ न एक है, न द्वैत है, न सत्य है, न असत्य है, न चित्त है, न चेत है, न मौन है, न अमौन है और न कोई चेतनेवाला है। चेत के अभावसा केवल अचेत चिन्मात्र आत्मसत्ता निर्विकल्परूप स्थित है। हे राम! सबसे बड़ा शास्त्र का सिद्धान्त यही है; इस दृष्टि से तुम मौन में स्थित हो। हे राम! सब सिद्धान्तों की समता है निर्विकल्प होना। जैसे पत्थर की शिला मौन होती है, वैसे ही चेत्य से रहित रहकर ही

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६५

जो कुछ प्रत्यक्ष आचार प्राप्त हो, उसमें वृत्त होना और सदा आत्म-निश्चय रखना, इसी का नाम परम मौन है। सब क्रिया होती रहें, पर अपने से कुछ न देखना—जैसे नट स्वाँग भरता है और उसके अनुसार विचरता है, परन्तु निश्चय उसका आदि शरीर में ही होता है, उससे वह चलायमान नहीं होता, वैसे ही जो कुछ अनिच्छित प्राप्त हो, उसको यथाशास्त्र करे, परन्तु अपने निर्गुण निष्क्रियस्वरूप में चलायमान न हो, उसी अद्वैत स्वरूप में स्थित रहे।

राम ने पूछा, हे भगवन्! वह रुद्र क्या था और वह काली शक्ति क्या थी? उनके अङ्गों का बढ़ना-घटना और नृत्य करना क्या था और वस्त्र क्या थे, सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शिवतत्त्व ही आकार होकर भासता है और कोई आकार नहीं। वह चिन्मात्र, अमल विद्या और अविद्या के कार्य से रहित, शान्त और अवाच्यपद है। यह संज्ञा भी संकल्प में तुमसे कही है, आत्मवेत्ता आत्मपद को अवाच्यपद कहते हैं, तथापि मैं कुछ कहता हूँ। हे राम केवल आत्मतत्त्वमात्र जो चिदाकाश है, वही शिव भैरव है। उसी के चमत्कार का नाम चित्तशक्ति है। उसी का नाम काली है। उस काली, आत्मा और शिवरूप में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन और स्पन्दन में और अग्नि तथा उष्णता में कुछ भेद नहीं होता, वैसे ही चित्तकला और आत्मा में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन निष्पन्द होता है, तब उसका लक्षण नहीं होता, अवाचकरूप होता है, और जब स्पन्दन होता है, तब उसका लक्षण भी होता है और उसमें शब्द प्रयोग होता है वैसे ही चित्तशक्ति में उसका लक्षण होता है। उसके अनेक नाम हैं। उसी का नाम स्पन्दन और इच्छा है। उसी को चैत्योन्मुखत्व से वासना कहते हैं। उसी के स्वाद की इच्छा से जब चित्तसंवित् में वासना फुरती है, तब उसका नाम वासना करने वाला वासक कहलाता है—फिर आगे दृश्य होता है। जब त्रिपुटी हुई अर्थात् वासना, वासक और वास्य हुए, तब वासक को जीव कहते हैं—जो जीवत्व भाव लेकर स्थित होता है। तब इसको यह भावना होती है कि मैं जीव हूँ और मेरा नाश कभी

५६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

न हो, इस इच्छा में जीव कहाता है। चित्शक्ति की जो ऐसी संज्ञा होती है, वह स्पन्दन में होती है। पर शिवतत्त्व अस्फुरण है और अचेत शक्ति में फुरने की नाईं स्थित है।

जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं होता और हुए की नाईं भासता है, वैसे ही यह जगत् है नहीं और हुए की नाईं दिखता है, इससे उसको यह संज्ञा देते हैं। परमात्मा की क्रियाशक्ति काली प्रथम तो कारणरूप-प्रकृति है और उसी मे सब हैं—इसी मे प्रकृतिरूप है। वह विकृति अर्थात् किसी का कार्य नहीं है। महत्तत्त्व, पञ्चभूत, और अहंकार ये सात प्रकृति—विकृत हैं—अर्थात् कार्य भी हैं और कारण भी हैं। कार्य आदि देवी के हैं और कारण षोडश के हैं—पञ्चज्ञान इन्द्रियाँ, पञ्चकर्म इन्द्रियाँ, पञ्चप्राण और एक मन। इनके सप्तदश कार्य हैं। षोडश विकृति हैं अर्थात् कार्यरूप हैं, कारण किसी के नहीं। सत्रहवाँ पुरुष जो परमात्मा का अंश है वह अद्वैत, अचिन्त्य और चिन्मात्र है। न किसी का कारण है और न कार्य अपने आपमें स्थित है। इससे कारणकार्य में जितनी द्वैतकल्पना है, वह सब चित्तशक्ति में स्थित है। जब यह निस्पन्द होती है तब तत्त्वरूप शिवपद में निर्वाण हो जाती है और कारण-कार्यरूपी सब भ्रम मिट जाता है, केवल आकाशवत् शेष रहता है। वह शुद्ध, अद्वैत, अचेत चिन्मात्र सदा अपने आप-भाव में स्थित है और उसकी स्पन्दनरूप क्रियाशक्ति की ये सब संज्ञा हैं। प्रथम तो सबका कारणरूप प्रकृति है, जो शोष है, अर्थात् जैसे वडवाग्नि समुद्र को सुखाती है, वैसे ही वह जगत् को सुखाती है। वह सिद्ध है, अर्थात् साधक उसे आश्रय करके सेवते हैं। वह जयन्ती है, अर्थात् उसकी जय है। वह चण्डिका है अर्थात् उसके क्रोध से जगत् का प्रलय होता है और संसार डरता है। वह वीर्य है, अर्थात् उसका वीर्य अनन्त है। वह दुर्गा है, अर्थात् उसका रूप जानना कठिन है, वह गायत्री है, अर्थात् उसके पाठ से संसार समुद्र से रक्षा होती है। वह सावित्री है, अर्थात् जगत् का पालन करती है। वह कुमारी अर्थात् कोमलस्वभाव है। वह गौरी अर्थात् गौर अङ्गवाली है। वह शिवा अर्थात्

५६८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे राम! स्पन्दन शक्ति का जबतक शिव में व्यतिरेक है, तब तक वह जगत को रचती है---जहाँ वह है वहाँ जगत है---जगत से विलग नहीं रहती। जैसे जहाँ सूर्य की किरणें हैं, वहाँ जलाभास होता है---किरण बिना जलाभास नहीं रहता, वैसे ही स्पन्दनशक्ति जगत के बिना नहीं रहती। जैसे आकाश के अङ्ग आकाश हैं, वैसे ही इसके अङ्ग जगत हैं और जैसे समुद्र में तरङ्ग समुद्ररूप हैं, वैसे ही जगत इसका रूप है। यह शक्ति चिदाकाश है उसमें व्यतिरिक्त नहीं। जब यह फुरती है, तब जगदाकार मानती है और जब शिव की ओर आती है, तब शिवरूप हो जाता है, ओर जगत का भाव नहीं रहता। इससे हे राम! तुम्हारी चित्तशक्ति जब तुम्हारी ओर आवै तब जगतभ्रम मिटै। इस चित्त शक्ति ने ही जगतभ्रम रचा है। शिव शान्तरूप है और अजर, अमर, अचेत, चिन्मात्र है। उसमें कुछ क्षोभ नहीं---आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुमने काली के अङ्गों की जो सृष्टि देखी थी, वह आत्मा में सत् है अथवा असत्, सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह काली देवी आत्मा की क्रियाशक्ति अर्थात स्फुरणशक्ति है, इसमें आत्मा में सत्य है और वास्तव में आत्मा में कुछ नहीं, मिथ्या है। जैसे तुम मनोराज्य में अपने से दूसरा चिन्तन करो तो वह कुछ वस्तु नहीं पर, उस काल में सत् भासता है, वैसे ही जितनी सृष्टियाँ हैं, वे आत्मा में सत्य नहीं, परन्तु चित्तशक्ति से बसती दिखती हैं जैसे जितने कुछ विधि-निषेध पदार्थ और आकाश, पर्वत, समुद्र, वन, जगत, तीर्थ, कर्म, बन्ध, मोक्ष, गुरु, शास्त्र, युद्ध शास्त्र आदि भासते हैं, वे सब चिदाकाश ब्रह्मरूप हैं और वास्तव में इनका होना ब्रह्म से भिन्न नहीं। सब प्रकार और सर्वदा आत्मा अपने आपमें स्थित है। वह शुद्ध, अद्वैत, निराकार, निर्विकार और ज्यों का त्यों है। उसमें जगत कोई नहीं उपजा।

सब जगत आत्मा में क्रियाशक्ति ने रचा है, सो वह माया काल में सत्य है, वास्तव में कुछ नहीं। जैसे सोनेवाले को स्वप्न में सृष्टि दिखती है और उसके शरीर को कोई हिलावे तो वह नहीं जागता, पर जो

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६६

कुछ सृष्टि होती तो हिलाने से उसका कोई स्थान गिर पड़ता—इसी से जाना जाता है कि किसी का नाश नहीं होता—वास्तव कुछ नहीं है। हे राम! वह सृष्टि, जो प्रत्यक्ष अंगीकार होती है, उसके चित्तस्पन्दन में स्थित है, परन्तु जबतक निद्रा है, तभी तक वह सृष्टि है; जब निद्रा निवृत होती है तब स्वप्नसृष्टि भी नहीं दिखती। वैसे ही यह सृष्टि भी वास्तव में कुछ नहीं है, अज्ञान ने चित्तशक्ति में भासती है। हे राम! सब पदार्थ चित्त के फुरने में भासते हैं जिसका संकल्प शुद्ध होता है, उसके मनोराज्य की सृष्टि यदि देशकाल में प्रत्यक्ष होती है तो संकल्प-रूप होती है, क्योंकि कुछ बना नहीं। जब संकल्प फुरता है, तब संकल्प के अनुसार सृष्टि भासती है; इससे संकल्परूप ही हुई। और जब उसकी सत्यता हृदय में होती है, तब इसका अर्थ हृदय में अनुभव होता है। जैसे परलोक अदृष्ट है, पर जब उसकी सत्यता हृदय में होती है, तब उसका राग-द्वेष भी हृदय में फुरता है, क्योंकि संकल्प में उसका भाव है। वैसे ही जबतक चित्त में स्पन्दन फुरता है, तब तक जगत् है, और जब चित्त निस्पन्दन होता है, तब जगत् की सत्यता नहीं भासती।

हे राम! यह सब जगत् क्रियाशक्ति ने आत्मा में रचा है। जबतक यह क्रियाशक्ति काली शिव से व्यतिरिक्त होती है, तबतक नाना प्रकार के जगत् रचती है और क्षोभ को प्राप्त होती है। और जब शिव की ओर आती है तब शान्तरूप हो जाती है। तब फिर उसकी प्रकृति संज्ञा नहीं रहती—वह अद्वैततत्त्व में अद्वैतरूप ही हो जाती है। जैसे जबतक पवन चलता है, तबतक शीत, उष्ण, सुगन्ध, दुर्गन्ध, बड़ी और छोटी संज्ञा होती है, और जब ठहरता है, तब यह नहीं कहा जाना कि ऐसा है अथवा वैसा है। वैसे ही जबतक चित्तशक्ति स्पन्दनरूप होती है, तब तक जगत् रचती है और प्रकृति कारण रूप कहाती है। उसमें दो प्रकार के शब्द होते हैं—विद्या और अविद्या! हे राम! जो कुछ कहना होता है वह स्पन्दनरूप जो चित्र लिखा है, उसमें है। वह जब शिव-तत्त्व के अन्तर्गत होती है, तब अद्वैतरूप हो जाती है—वहाँ किसी शब्द की गति नहीं।

६०० ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे राम ! शिव क्या है और शक्ति क्या है, यह भी सुनो । ये सब जीव शिवरूप हैं और इनके चित्त का फुरना काली है । जबतक इच्छा में चित्तशक्ति बाहर फुरती है, तबतक भ्रम का अन्त नहीं होता और नाना प्रकार के विकारों का अनुभव होता है, कभी शान्ति नहीं होती । और जब चित्तशक्ति उलटकर अधिष्ठान को देखता है, तब जगद्भ्रम निवृत्त हो जाता है और परम शान्ति प्राप्त होती है । हे राम ! आत्मा और चित्तसंविद् में कुछ भेद नहीं । जैसे वायु के स्पन्दन और निष्पन्द में कुछ भेद नहीं होता, परन्तु जब स्पन्दन होता है, तब जाना जाता है और निष्पन्द नहीं जाना जाता, वैसे ही चित्तसंविद् जब फुरता है, तब जाना जाता है, और नहीं फुरता तब नहीं जाना जाता, और जानना और न जानना दोनों नहीं रहते हैं । हे राम ! जबतक इच्छा-शक्ति शिव की ओर नहीं देखती, तब तक नाना प्रकार के नृत्य करती है अर्थात् जगत् को रचती है, और जब शिव की ओर देखती है, तब नृत्य बन्द हो जाता है । और सब अङ्ग सूक्ष्म हो जाते हैं । हे राम ! इस काली का आकार अपरिमित था, पर शिव की ओर देखने से सूक्ष्म हो गया । पहले पर्वत-समान था; फिर निकट आई तब ग्राम के समान हुआ; फिर वृक्ष के समान हुआ । जब और निकट आई, तब सूक्ष्म आकार हो गया और शिव के साथ मिली तब शिवरूप हो गई । शिव के सम्मिश्रण में इसका जो विलास है, वह शून्य हो जाता है और परमशान्त शिवपद की प्राप्ति होती है ।

श्रीराम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! यह जो परमेश्वरी कालीशक्ति है, वह उसका मिलकर शान्त कैसे हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! देवी परमात्मा की इच्छाशक्ति है । इसका नाम जगन्माता है । जब तक यह शिवतत्त्व से अलग रहती है, तब तक जगत् को रचती है और जब अपने अधिष्ठान की ओर आती है, जो नित्यतृप्त, अनामय, निर्विकार, द्वैतभाव से रहित है, तब परमशान्ति को प्राप्त होती है, तब इसकी प्रकृतिसंज्ञा जाती रहती है । जैसे नदी जबतक समुद्र को नहीं प्राप्त हुई, तबतक दौड़ती और शब्द करती है, पर जब समुद्र को मिली, तब

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६०१

शब्द करना और दौड़ना नष्ट हो जाता है और नदीसंज्ञा भी नहीं रहती—समुद्र को मिलकर परमगम्भीर समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही जबतक चित्तशक्ति शिव से अलग होती है, तबतक जगत्भ्रम को रचती है और जब शिवतत्त्व को मिलती है, तब शिवरूप हो जाती है और द्वैतभ्रम मिट जाता है। हे राम! जब यह चित्तशक्ति शिवपद में लीन हो जाती है, तब प्रथम जो देह और इन्द्रियों से तद्रूप हुई थी, इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट में अपने को सुखी-दुःखी मानती थी और राग-द्वेष से जलती थी, वह भाव जाता रहता है, और नित्यतृप्त अनामय पद के मिलने से सुख-दुःख से रहित हो जाती है, क्योंकि अनात्मदेह इन्द्रियों की तद्रूपता का अभाव हो जाता है और आत्मतत्त्व के साथ यह तद्रूप हो जाती है। जैसे पत्थर की शिला में मिलकर खड्ग की धार तीक्ष्ण होती है, वैसे ही चित्तसंवित् जब आत्मपद में मिलती है, तब एक अद्वैतरूप हो जाती है। तब आत्मपद का स्पर्श करने से अनात्म-भाव का त्याग करती है।

जैसे ताँबा पारस के स्पर्श से सुवर्ण हो जाता है और फिर ताँबा नहीं होता, वैसे ही यह वृत्ति अनात्मभाव को नहीं प्राप्त होती। चित्तकला तबतक विषय की ओर दौड़ती है, जबतक अपने वास्तव स्वरूप को नहीं प्राप्त हुई। जब अपने वास्तवस्वरूप को प्राप्त होती है, तब विषय की ओर नहीं दौड़ती है। जैसे जिस पुरुष को अमृत प्राप्त होता है और उसके स्वाद का अनुभव होता है, वह नीम खाने की इच्छा नहीं करता, वैसे ही जिसको आत्मानन्द प्राप्त हुआ है, वह विषयों के सुख की इच्छा नहीं करता। हे राम! यह संसारभ्रम चित्तसंवित् में दृढ़ सत्य होकर स्थित है और संसार के सुख का त्याग नहीं कर सकता। पर जब आत्मसुख प्राप्त होगा, तब उस तुच्छ सुख को त्याग देगा। जैसे किसी पुरुष को जबतक पारस नहीं मिलता, तबतक वह और धन को त्याग नहीं सकता, पर जब पारस प्राप्त हो जाता है, तब तुच्छ धन का त्याग करता है और फिर धन के लिए कोई यत्न नहीं करता, वैसे ही जब जीव को आत्मानन्द प्राप्तहोता है, तब वह विषय के सुख का त्याग करता

६०२ ॐ योगवासिष्ठ ॐ

हे, उसे पाने का यत्न नहीं करता। हे राम! भौंरा तबतक और स्थानों में घूमता है, जबतक कमल की पंक्ति पर नहीं पहुँचता, पर जब उस पंक्ति पर पहुँच जाता है, तब और स्थान को त्याग देता है, वैसे ही चित्तशक्ति जब आत्मपद में लीन होती है, तब किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करती, निर्विकल्पपद को प्राप्त होती है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पुरुषप्रकृतिविचारो नाम शताधिकाष्टनवतितमसर्गः॥ १९८॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब पूर्व का प्रसङ्ग फिर सुनो। जब काली नृत्य करके निर्वाण हो गई, तब शिव अकेला रह गया। वहाँ मुझे देख पड़ता था और दो खण्ड आकाश के देख पड़े—एक अधोभाग और दूसरा ऊर्ध्वभाग। और कुछ न देख पड़ता था। तब रुद्र ने नेत्रों को फैलाकर दोनों खण्ड देख—जैसे सूर्य जगत् को देखता है—और प्राण को भी खींचा। तब ऊर्ध्व और अधः दोनों खण्ड इकट्ठे हो गये और ब्रह्माण्ड को अन्तर्मुख कर लिया—एक शिव ही रह गया और कुछ न दिखता था। हे राम! जब एक क्षण व्यतीत हुआ, तब रुद्र बड़े आकार को धारण कर ब्रह्माण्ड को भी नाँघ गया और एक वृक्ष के समान हो गया। फिर अङ्गुष्ठमात्र शरीर रखकर एक क्षण में सूक्ष्म अणु सा हो गया। फिर रेत के कण से भी सूक्ष्म हो गया। फिर नेत्रों से अदृश्य हो गया। तब दिव्यदृष्टि से मैं देखता रहा। फिर वह भी लुप्त हो गया, केवल चिदाकाश ही शेष रहा और दूसरी वस्तु कुछ न दिखी। जैसे वर्षाकाल के मेघ शरत्काल में नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही वह रुद्र भी लुप्त हो गया। हे राम! उस काल में मुझको तीनों इकट्ठे दिखे—एक देवी ब्रह्मा की शक्ति; दूसरी कालीशक्ति और तीसरी शिला। तब मैंने विचार किया कि यह स्वप्न गन्धर्व नगर सा आश्चर्य था, और कुछ नहीं। तब मैंने क्या देखा कि स्वर्ण की शिला ही पड़ी है। यह सृष्टि शिलाकोष में स्थित थी। तब मैंने विचार किया कि यह सृष्टि शिलाकोष में है तो और सृष्टि भी होगी, क्योंकि सब वस्तु सब प्रकार और सब स्थान पूर्ण है। इसलिए मैं उसमें भी सृष्टि देखने लगा और नाना प्रकार की

* निर्वाण प्रकरण * ६०३

सृष्टि देखीं। जब मैं बोधदृष्टि से देखता, तब सब ब्रह्म ही दिखता। संकल्पदृष्टि से आत्मरूपी आदर्श में अनन्तसृष्टि देख पड़ती और चर्मदृष्टि से शिला ही दीखती। इस प्रकार मैं शिलाकोष में चला तो वहाँ मुझे घास, तृण, पत्थर, फल और फूलों की अनन्त सृष्टि दृष्टिगत होती और निसंकल्प आत्मदृष्टि से देखता तो अद्वैत आत्मा ही दीखता।

हे राम! इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टि देखीं। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि ब्रह्मा उपजे हैं और रचना रचने को समर्थ हुए हैं। कहीं ब्रह्मा ने चन्द्रमा सूर्य उपजाये हैं, और मर्यादा स्थापित की है। कहीं सम्पूर्ण पृथ्वी आदि तत्त्व उपजाये हैं। पर उसमें प्राण नहीं पड़े। कहीं समुद्र नहीं उपजे। कहीं आचार सहित सृष्टि दिखी। कहीं चन्द्रमा-सूर्य नहीं उपजे और कहीं उपजे थे। कहीं चन्द्रमा शिव से नहीं निकले। कहीं क्षीरसमुद्र मथा नहीं गया और अमृत नहीं निकला और लक्ष्मी, हाथी, घोड़ा, धन्वन्तरि वैद्य भी नहीं निकले। कहीं विष और अमृत नहीं निकला। कहीं देवता मरते हैं। कहीं क्षीरसमुद्र मथा गया है और उससे अमृत निकला है। कहीं प्रकाश नहीं होता; कहीं सदा प्रकाश ही रहता है। कहीं पृथ्वी पर पर्वतों के सिवा कुछ नहीं देख पड़ता। कहीं इन्द्र के वज्र से पर्वतों के पंख कटे थे और कहीं वे पर्वत उड़ते थे। कहीं प्राणियों को जरा-मृत्यु का भय नहीं होता, कल्पपर्यन्त ज्यों के त्यौं रहते हैं। कहीं प्रलय होता है। कहीं मेघ गर्जते हैं। कहीं सम्पूर्ण जल ही जल भरा है। कहीं आकाश ही है और प्राणी कोई नहीं दिखता। कहीं देवताओं के युद्ध होते थे; कहीं देवताओं को दैत्य जीतते थे; कहीं दैत्यों को देवता जीतते थे। कहीं देवता और दैत्यों में परस्पर प्रतीति थी। कहीं बलि और इन्द्र, रुद्र और वृत्तासुर का युद्ध होता था। कहीं मधुकैटभ दैत्य ब्रह्मा की कन्या से उत्पन्न होते थे। कहीं देखा सदा प्रसन्नता ही रहती है और लोग तीनों कालों की बातें जानते हैं। कहीं सदा शोकाकुल ही रहते हैं। कहीं सतयुग का समय है और दान, पुण्य, तप होते हैं। कहीं कलियुग का समय है और प्राणी पाप में लिप्त हैं। कहीं अर्द्धयुग बीता था। कहीं राम और रावण का युद्ध होता

६०५ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

था । कहीं रावण का राम ने मर्दन किया था; कहीं राम का रावण ने मर्दन किया था । कहीं सुमेरु पर्वत तले है और पृथ्वी ऊपर है । कहीं शेषनाग पर पृथ्वी है और भूचाल से घूमती है । कहीं प्रलयकाल का जल चढ़ा है और एक बालक वट के वृक्ष पर बैठा अपने अंगुष्ठ को चूमता है । वह विष्णु भगवान है । कहीं ब्रह्मा के कल्प की रात्रि है और महाशून्य अन्धकार है । कहीं कौरव-पाण्डवों की सहायता कृष्ण करते हैं । कहीं महाभारत का युद्ध होता है, दोनों ओर से कई अक्षौहिणी सेना निकली है और श्रीकृष्णजी पाण्डवों की सहायता करते हैं । कहीं एक सृष्टि का नाश होता है और दूसरी उर्मी में वैसी ही और उत्पन्न होती है और वैसे कर्म, वैसा ही कुल, जाति और गोत्र होते हैं । कहीं उसमें अर्धभाग मिलता है । कहीं चतुर्थ भाग उर्मी का सा मिलता है । कहीं-कहीं उससे विलक्षण है ।

हे राम ! इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टि देखीं, जो आत्मआदर्श में प्रतिबिम्बित थीं । जब मैं आत्मदृष्टि से देखता, तब सब चिदाकाश ही दिखता और जब संकल्पदृष्टि से देखता, तब जगत् भासित होता । कहीं ऐसी सृष्टि देखीं, जहाँ दशरथ के पुत्र राम हैं और रावण के मारने को समर्थ हुए हैं । कहीं तुम्हारे रूप के बड़े तपस्वी रहते हैं, जिनके मन सदा प्रसन्न हैं । ऐसी अनन्त सृष्टि देखीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! मैं आगे भी ऐसा ही हुआ हूँ, अथवा किसी और प्रकार का हुआ हूँ, सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कई वैसे ही, कई अर्धलक्षण के और कई चौथाई लक्षणवाले होते हैं । जैसे अन्न का बीज वैसा ही होता है, और कोई उसमें विशेष भी होता है, वैसे ही ये सब पदार्थ होते हैं । हे राम ! तुम भी आगे होगे और मैं भी आगे हूँगा, परन्तु आत्मा का विवर्त है । जैसे समुद्र में एक से तरङ्ग भी होते हैं और विलक्षण भी देख पड़ते हैं परन्तु वही जलरूप हैं वैसे ही हमारे सदृश भी फिर होंगे परन्तु आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ नहीं—संकल्प से भिन्न की नाईं विलक्षणरूप भासित होते हैं । जैसे समुद्र में वायु से तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा संकल्प से जगतरूप होकर भासित होता है । यद्यपि

  • निर्वाण प्रकरण * ६०५ ===

नाना प्रकार होकर जगत् भासता है तो भी दूसरा कुछ नहीं हुआ । यह जगत् चैतन्य का विलास है और चित्त के फुरने में अनन्त सृष्टि भासित होती है । जैसे स्वप्न की सृष्टि बड़े आरम्भ से भासित होती है, परन्तु स्वरूप से कुछ भी भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् आरम्भ परिणाम से कुछ नहीं बना, आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अनन्तजगद्वर्णनं नाम शताधिकनवनवतितमसर्गः ॥ १६६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार मैंने सृष्टि देखी और फिर दृश्य भ्रम को त्यागकर अपने वास्तव स्वरूप में स्थित हुआ । मैं अनन्त, नित्य, शुद्ध, बोध, चिदाकाश और सर्वदा अपने आपमें स्थित हूँ । हे राम ! चिन्मात्र आत्मा के किसी स्थान में संवेदन का आभास फुरा है—जैसे अनाज के कोठे से एक मुट्ठी भर अन्न निकालिये और खेत में डालिये तो उसी से अंकुर निकलते हैं, वैसे ही चैतन्य में संवेदन फुरा है और उस संवेदन से जगत् उपजा है । जैसे जल डालने से अंकुर निकल आता है, वैसे ही मुझमें सृष्टि का अनुभव होने लगा और मैंने जाना कि सृष्टि मुझसे उपजी है । राम बोले, हे भगवन् ! तुम जो आकाशरूप अपने आपमें स्थित थे, उसमें सृष्टि तुमको कैसे फुरी ? दृढ़बोध के निमित्त मुझसे कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वास्तव में तो कुछ उपजा नहीं, परन्तु जैसे सृष्टि हुई है, सो सुनो । मुझे अनुभव आकाश और अनन्त के किसी स्थान में संवेदन चित्त 'अहं' फुरा, अर्थात् 'मैं हूँ' यह अनुभव हुआ । उस अहंभाव के होने से मैं अपने को सूक्ष्म तेज अणु सा जानने लगा, और उस अणु में अहंकार उपजा । जिसको तुम अहंकार कहते हो, उस अहंकार की दृढ़ता से निश्चयात्मक बुद्धि उपजी । उस बुद्धि से संकल्प-विकल्प रूप मन उपजा और उस मन ने प्रपञ्च रचा । उस मन में देखने का स्पन्दन फुरा, तब चक्षु इन्द्रिय हुई और जिसको वह देखने लगा वह रूप दृश्य हुआ । फिर सुनने की इच्छा फुरी, तब श्रवण इन्द्रिय हुई और वह शब्द ही सुनने

६०६ योगवाशिष्ट

लगी। फिर रस लेने की इच्छा हुई, तब जिह्वा इन्द्रिय हुई और वह रस को ग्रहण करने लगी। जब सुगन्ध लेने की इच्छा की; तब नासिका इन्द्रिय हुई और सुगन्ध ग्रहण करने लगी। फिर स्पर्श करने की इच्छा में त्वचा इन्द्रिय प्रकट होकर स्पर्श ग्रहण करने लगी। इस प्रकार मुझको ज्ञानइन्द्रियाँ फुरीं और उनमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध विषय उदय हुए। तब मैंने अपने साथ स्थूल देह देखा। जैसे कोई स्वप्न में अपना शरीर देखता है, वैसे ही मैंने देखा।

हे राम ! जिसको मैं देखने लगा, वह दृश्य हुआ और जिसमें मैं देखता था, वे इन्द्रियाँ हुईं। जब दृश्य फुरना हुआ; वह काल हुआ। जहाँ हुआ, वह देश हुआ, और जैसे हुआ, वह क्रिया हुई। इस प्रकार सब देश, काल, पदार्थ हुए हैं; सो मैंने तुमसे कहे। हे राम ! वास्तव में न कोई देह है, न इन्द्रियाँ हैं और न सृष्टि है, पर चित्तकला में हुए की नाई देख पड़ते हैं, जैसे स्वप्न की सृष्टि दिखती है। जब वह सृष्टि मुझको फुरी, तब पूर्वस्वरूप मुझे भूल गया। जैसे सुषुप्ति में अपना स्वरूप विस्मृत सा होता है, वैसे ही मुझको भूले की नाईं प्रतीत हुआ। तब जैसे स्वप्न में जाग्रतस्वरूप का और जाग्रत में स्वप्न के स्वरूप का विस्मरण होता है, वैसे ही पूर्व का स्वरूप मुझे भूल गया। जब शरीर और इन्द्रियाँ मुझको अपने साथ लगी जान पड़ीं तो उनमें मैंने अहंप्रत्यय करके ॐकार शब्द का उच्चारण किया। जैसे बालक माता के गर्भ से उत्पन्न होकर शब्द करता है, वैसे ही मैंने ॐशब्द का उच्चारण किया। जैसे कोई पुरुष स्वप्न में उड़ता और शब्द करता है, वैसे ही मैंने ॐकार का उच्चारण किया। ॐकार आदि, मध्य, अन्त से रहित परब्रह्म है और सर्वब्रह्माण्डरूपी तरङ्ग का आधार समुद्र है। हे राम ! जब मैं आधिभौतिक दृष्टि से देखूँ, तब मुझको शिला ही दिखे और जब आत वाहक दृष्टि से देखूँ, तब अनन्त ब्रह्माण्ड देख पड़ें और नाना प्रकार की क्रिया और मर्यादा सहित भासित हों, पर जब आत्मदृष्टि से देखूँ तब अद्वैत अपना रूप ही भासित हो। हे राम ! जैसे सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी भासती है, वैसे ही मुझको सृष्टि भासित होती थी।

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६०७

जैसे मरुस्थल की नदी मिथ्या है, वैसे ही ग्रहण करनेवाली वृत्ति मिथ्या है। जैसे संवेदन में जो मनन फुरता है, वह भी मिथ्या है—क्योंकि नदी मिथ्या है तो उसका मनन कैसे सत् हो—वैसे ही यह जीव का रूप-अवलोक भी मिथ्या है और भ्रान्ति से सत्य जान पड़ता है। जैसे स्वप्नसृष्टि, संकल्प और मनोराज्य का नगर मिथ्या है और कथा का वृत्तान्त अनहोता ही भ्रान्ति से प्रत्यक्ष लगता है, वैसे ही यह जगत् भ्रान्ति से सत्य लगता है—वास्तव में कुछ नहीं; पर संकल्पविलास में बना देख पड़ता है।

हे राम ! जिस प्रकार मुझको सृष्टि भासित हुई, सो सुनो। जब मुझमें पृथ्वी की धारणा हुई, तब पृथ्वी मुझको शरीर होकर भासित होने लगी; क्योंकि मैं विराट् आत्मा था। उस पृथ्वी पर वन, पर्वत, नदी, समुद्र, वृक्ष, फल, फूल, मनुष्य, पक्षी, देवता, ऋषीश्वर, दैत्य और नाग आदि जो स्थित हैं, अतः पृथ्वी मेरा शरीर हुई, पर्वत मेरे मुख हुए, सुमेरु आदि पर्वत मेरी भुजा हुई, सप्त समुद्र इन्द्रियाँ हुए, सब नदी मेरे कण्ठ की माला और वन मेरी रोमावली हुए। मरुस्थल की नदी मेरे ऊपर विस्तार को प्राप्त हुई और देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी और दैत्य इत्यादि मुझमें कीट-सदृश भासे—जैसे शरीर में जुआँ, लीख, आदिक होते हैं। किसी जगह मेरे ऊपर हल चलाते हैं और बीज बोते हैं, जिससे खेती उगती है और प्राणी अन्न खाते हैं। कहीं मुझे खोदते हैं, कहीं पूजा करते हैं। कहीं समुद्र स्थित हैं, कहीं नदी बहती है, कहीं राजा राज्य करते हैं और कहीं मेरे लिए झगड़ते मरते हैं। एक कहता है कि पृथ्वी मेरी है, दूसरा कहता है मेरी है। इस प्रकार मुझ पर ममता करके युद्ध करते हैं। कहीं हाथी चेष्टा करते हैं। कुछ लोग रुदन करते हैं, कुछ हास्य करते हैं। कहीं वृत्ति फैलाते हैं। कहीं सुगन्ध है, कहीं दुर्गन्ध है। कहीं नदियाँ बहती और क्षोभ को प्राप्त होती हैं, कहीं देवता और दैत्य मेरे ऊपर युद्ध करते हैं। कहीं शीतलता से जल मेरे ऊपर वरफ हो जाता है। इस प्रकार मैंने अपने ऊपर इष्ट-अनिष्ट स्थान देखा और राजसी, तामसी और सात्त्विकी जितनी जीवों की क्रिया

६०८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

होती है उन सबका आधार में हुआ । पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं की संज्ञा संवेदन फुरने से हुई है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ऽन्तरोगोपाख्याने पृथ्वीधातु- वर्णनन्नाम द्विशततमस्सर्गः ॥ २०० ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुमको जो धारणा से पृथ्वी का अनुभव हुआ और उसमें जगत् उत्पन्न हुआ, वह संकल्परूप था या मन से उपजा था अथवा आधिभौतिक था ? वशिष्ठ बोले, हे राम ! सब जगत् संकल्प-रूप है, पर आधिभौतिक की नाईं भासित होता है । वास्तव में केवल चिदाकाश अपने आपमें स्थित है । वह चिदाकाश मैं हूँ । मैं न कभी उपजा हूँ और न मेरा नाश होगा, सर्वदा मैं अद्वैत, अचैत्य, चिन्मात्र रूप हूँ । उसके संकल्प का नाम मन और आभास का नाम संकल्प है । ऊर्मी का नाम ब्रह्मा और इच्छा है । उसी में जगत् स्थित है । वह आकाशरूप है—बना कुछ नहीं । हे राम ! जिसको सत्य और असत्य कहते हो, वह शुभ-अशुभरूप जगत् मन में स्थित है, और सब आकार निराकार रूप हैं, भ्रान्ति से पिण्डाकार दिखते हैं । जैसे स्वप्न में जो शुभ-अशुभ पदार्थ दिखते हैं, वे निराकार हैं, पर भ्रान्ति से पिण्डाकार जान पड़ते हैं, वैसे ही वे जगत् भी निराकार है, पर भ्रम से पिण्डाकार लगते हैं और विचार करने से शून्य हो जाते हैं । जैसे मनोराज्य से आकार रचित है, वैसे ही मेरे आकार जानो—स्वरूप से कुछ नहीं उपजे । जैसे मृत्तिका से बालक नाना प्रकार की सेना रचते हैं और उस मृत्तिका के उनको भिन्न-भिन्न भाव निश्चय होते हैं, वैसे ही अद्वैत आत्मा में मन-रूपी बालक ने जगत् की कल्पना की है, वास्तव में कुछ नहीं, आत्म-तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है । जैसे मृगतृष्णा का जल ही नहीं तो उसमें डुबा किसे कहिये, वैसे ही मन आप आभासरूप है तो उसका रचा जगत् कैसे सत् हो ?

हे राम ! सब चिदाकाशरूप है—दूसरा कुछ नहीं बना । आत्मरूप आकाश में जो मनरूपी नीलता है, सो अविचार-सिद्ध है । विचार करने से नीलता कुछ वस्तु नहीं । जैसे दीपक के रहने से अन्धकार नहीं

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६०६

रहता, वैसे ही विचार किये से मन और मन की रचना जगत् नहीं रहता। मन का निर्वाण करना ही परमशान्ति है, और कोई उपाय नहीं। हे राम! जितने क्षोभ हैं, उनका कर्त्ता मन है। सम्पूर्ण शब्द-अर्थ की कल्पना मन से उठती है—मन का निर्वाण होने पर कोई नहीं रहती। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर! आप अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुए सो कुछ और रूप भी हुए, अथवा नहीं हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! आत्मरूपी जो जाग्रत् है, उसमें अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुआ। मैं चैतन्य था और जड़ की नाईं स्थित हुआ—वास्तव में मैं जगत् न था, केवल चिदाकाश था, जिसमें न कुछ नानात्व है, न अनानात्व है, न अस्ति है न नास्ति है, और अहं-त्वं-इदं का अभाव है। वह केवल परम आकाश है, जो आकाश से भी निर्मल चिदाकाश है, और जो है सो सब शब्द-ब्रह्म है। जगत् के होते भी वह अरूप है; क्योंकि कुछ आरम्भ परिणाम से नहीं बना—केवल आत्मा का चमत्कार है।

हे राम! जहाँ-जहाँ पदार्थसत्ता है, वहाँ-वहाँ जगत् वस्तु है। सर्वदा, सब प्रकार, सब पदार्थों का स्पन्दन ब्रह्म है। जहाँ ब्रह्मसत्ता है, वहाँ जगत् है। इस प्रकार मैंने अनन्त ब्रह्माण्ड को देखा। जब मैं अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुआ तो जब जल की धारणा की, तब जल-रूप होकर फैला। वृक्ष, धाम, फूल, गुच्छे डाल, तमाल और पत्तों में रस होकर स्थित हुआ। खम्भे में मैं ही बल हुआ और समुद्र हुआ, नदियों के प्रवाह होकर मैं ही बहने लगा और उनमें गड़गड़ शब्द करने लगा। तरङ्ग बुलबुले और फेन को फैलाकर विलास किया। ओस के कण होकर मैं ही स्थित हुआ। आकाश में मेघ होकर बरसता और प्राणियों को तृप्त करने लगा। उनमें रुधिर आदि रस होकर मैं ही स्थित हुआ और उनकी नाड़ियों में मथन करके आप ही प्रवेश किया। जैसी-जैसी नाड़ी होती है, वैसा-वैसा रस होकर मैं स्थित हुआ। सब नाड़ियों में रस, बीज, कफ, पित्त, मूत्र आदि मैं ही स्थित हुआ। सब प्राणियों की जिह्वा के अग्रभाग में रस होकर मैं स्थित

६१० ❊ योगवासिष्ठ ❊

हुआ। अपने का आप स्वाद ग्रहण करने लगा। हिमालय में बर्फ होकर स्थित हुआ। हे राम! मैं चैतन्य होकर जड़ की नाईं स्थित हुआ। बीज होकर मैंने ही अपने को उत्पन्न किया और प्रलय के मेघ होकर मैंने ही अपना नाश किया। इस प्रकार जल होकर स्थावर, जङ्गम सब जगत् में स्थित हुआ और सदा अपने आपमें स्थित होकर अपने स्वरूप को न त्यागा। जैसे स्वप्न में जगत् अनुभवरूप है और अनहोता भासित होता है, वैसे ही मैंने जलरूप होकर जगत् को धारण किया। हे राम! में नाना प्रकार के स्थानों में स्थित हुआ। फूलों की शय्या पर चिरकाल तक विश्राम करता रहा। गन्ध होकर फूलों में स्थित हुआ। मेघ होकर आकाश में विचरा और ऐसी वर्षा की कि पर्वतों पर वेग से प्रवाह चलने लगा। मैं कण-कण होकर समुद्र और नदी में विचरा। यह भावना चित्अणु में मुझको हुई।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ऽन्तर्गोपाख्याने जलरूपवर्णन-नाम द्विशताधिकप्रथमसर्गः ॥ २०१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जल के अनन्तर मैंने तेज की भावना की, अर्थात तेज धारण किया. तब मुझमें इतने अङ्ग उदय हुए-चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि-और इनसे जगत् की क्रिया सिद्ध होने लगी। जैसे राजा के अङ्ग अनुचर और हरकारे होते हैं, वैसे ही तमरूपी चोर को दीपकरूपी हरकारे मारने लगे। में आकाशरूपी था, इससे मेरे कण्ठ में तारावलीरूपी माला पड़ी थी। सूर्य होकर मैं जल को सोखता और दशों दिशाओं को प्रकाश देता रहा। आकाश जो ऊँचाई के कारण श्याम भासित होता है, वह मेरे निकट प्रकाशमान होता था। सब जगत् में में ही फैल रहा था। जहाँ में रहता, वहाँ से तम का अभाव हो जाता। चन्द्रमा और सूर्यरूपी डब्बा है, जिसमें दिन-रात और कालसर्परूपी अनेक रत्न सर्वदा निकलते रहते हैं। राजसी, सात्त्विकी और तामसी क्रियारूपी कमलिनी का मैं सूर्य हुआ और सब देवताओं और पितरों को तृप्त करता रहा। यज्ञ की अग्नि और रत्न, मोती, मणि आदिक जो प्रकाशमान पदार्थ हैं, उनमें प्रकाश मैं ही

ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ

६११

हुआ। प्राणों के भीतर मैं स्थित हुआ और प्राण-अपान के क्षोभ से अन्न को पचाने लगा। जैसे आत्मा के प्रकाश से रूप, अवलोक और मनस्कार प्रकाशित होते हैं, वैसे ही सब पदार्थ मेरे प्रकाश से प्रकाशित होने लगे, क्योंकि मैं तेजरूप था—मानों चैतन्यसत्ता का दूसरा भाई हूँ। जैसे सब पदार्थ आत्मा से सिद्ध होते हैं, वैसे ही मुझसे सिद्ध होने लगे। हे राम! राजाओं में तेज और सिद्धों में वीर्य मैं ही था। बलरूप होकर जगत् को मैं ही पुष्ट करता था। बड़वाग्नि की दाहकशक्ति होकर जगत् को मैं ही नष्ट करता था। तेजवानों में तेज और बलवानों में बल मैं ही था। तले भी मैं था, मध्य भी मैं ही था और चन्द्रमा सूर्य से रहित जो स्थान हैं, उनमें भी मैं ही था। मैं अग्निरूपी दीपक और चन्द्रमा-सूर्यरूपी नेत्रों से मध्यमण्डल में स्पष्ट देखता था।

हे राम! इस प्रकार मैं तेजरूप होकर भीतर-बाहर सब स्थावर-जङ्गम पदार्थों में स्थित हुआ, पर जब बोधदृष्टि से देखता, तब सब आत्मा ही का भान होता और जब अन्तवाहक दृष्टि से देखता तब अपने को विराटरूप जानता कि सब जगत् में मैं ही फैल रहा हूँ और सब पदार्थ मेरे ही अङ्ग हैं। निदान तेजवानों में तेज और क्रोधवानों में क्रोध, यतियों में यती और अजित मैं हुआ। सब ओर मेरी ही जय है; क्योंकि जय उसकी होती है, जिसमें बल और तेज होता है—सो बल में हूँ और तेज भी मैं हूँ, इससे मेरी जय है। हे राम! सुवर्ण और रत्नमणि में जो प्रकाश और रूप है, वह मैं हुआ। राम ने पूछा, हे भगवन्! इस प्रकार जो आप जगत् की क्रिया अनुभव करने लगे कि जलरूप होकर अग्नि को बुझाया और अग्नि होकर जल को जलाया, ये क्रियाएँ जो तुम्हारे ऊपर इष्ट-अनिष्ट से होती रहीं, उनको तुमने सुख-दुःख के साथ अनुभव किया या नहीं किया? यह मेरे बोध के लिए कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे चैतन्य पुरुष स्वप्न में पर्वत, वृक्ष, देह, इन्द्रियाँ और नाना प्रकार के जड़ पदार्थ देखता है, जो वास्तव में उनमें नहीं हैं, केवल अनुभवरूप हैं, परन्तु निद्रादोष से वे उन्हें द्वैत की नाईं जानते हैं, और उनका राग-द्वेष अपने में मानते हैं—यथार्थ में द्रष्टा ही दृश्यरूप

६१२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

होकर स्थित होता है, परन्तु निद्रादोष में नहीं जान सकता, और जब जागता है, तब स्वप्न की सब सृष्टि को अपना रूप ही जानता है—वैसे ही यह जगत् अपने स्वरूप में नहीं है। जब बोधस्वरूप में जागोगे तब पदार्थ भावना जाती रहेगी और सब जगत् बोधस्वरूप प्रतीत होगा।

हे राम ! जिस पुरुष को देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित अखण्ड मत्ता उदय हुई है, उसको ज्ञानी कहते हैं। जब यह पुरुष परमात्मा का अवलोकन करता है, तब सब जगत् आत्मस्वरूप ही भासित होता है। जिस पुरुष को स्वप्न की सृष्टि में पूर्व का स्वरूप नहीं भूला, उसको अन्तवाहक कहते हैं। उसको पत्थर, जल और अग्नि में प्रवेश करने से भी खेद नहीं होता। हे राम ! मैं जो आकाश में उड़ता फिरा और आकाश को भी नाँघकर ब्रह्माण्ड के खप्पर पर फिरा हूँ सो अन्तवाहक शरीर से ही फिरा हूँ। जिसको अन्तवाहक शरीर प्राप्त होता है, उसको कोई आवरण नहीं रोक सकता, क्योंकि सब उसके अङ्ग होते हैं। मुझको शुद्ध आत्मा में स्वप्न हुआ था पर पहले का स्वरूप नहीं भूला, इससे सब जगत् मुझको अपना स्वरूप ही भासित होता रहा। अपने संकल्प में कल्पित अपने ही अङ्ग भासित होते थे। जैसे कोई मनोराज्य में अग्नि का समुद्र रचे और उसमें स्नान करे तो वह भी होता है; क्योंकि उसको खेद नहीं होता, सब अपने संकल्प में ही उसको भासित होते हैं। अन्तवाहक शरीर से विराट् सबका अपना रूप देखता है। वैसे ही सब जगत् मुझको अपना रूप भासित होता था, तो खेद कैसे हो ? स्वप्न देखनेवाला स्वप्न में पर्वत, नदियाँ और अग्नि देखता है, सो वही रूप है, और आप भी एक आकार धारण करके बन जाता है और पहले का स्वरूप उसकी परिच्छिन्नता में भूल जाता है और राग-द्वेष से जलता है। मैंने तत्त्वरूप बन अपने को जडरूप देखा और चैतन्यरूप भी देखा। इस प्रकार मुझको अपना स्वरूप न भूला। तब मैं विराट्‌रूप हो सबको अपना अङ्ग ही देखता रहा, इससे मुझे खेद कैसे होता ? खेद तब होता है, जब अपना स्वरूप भूलता है और परिच्छिन्न सा बन जाता है; पर मैं तो बोधवान् रहा कि मैंने

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६१३

स्पन्दन से सब रूप धारण किये हैं । हे राम ! जिसको यह निश्चय है, उसको दुःख कहाँ ? सुखदुःखरूप जो पदार्थ हैं, वे मैंने अपने में ऐसे देखे, जैसे आईने में प्रतिबिम्ब पड़ता है । जिसको यह दृष्टि हो, उसको दुःख कहाँ है ?

हे राम ! जिसको अन्तवाहक शक्ति प्राप्त होती है, वह पाताल और आकाश में जाने को समर्थ होता है और जहाँ प्रवेश किया चाहे वहाँ जा सकता है, क्योंकि सृष्टि संकल्पमात्र है । हे राम ! और कुछ सृष्टि नहीं बनी । आत्मा का किञ्चन ही सृष्टिरूप होकर भासित होता है । हे राम ! यह सब सृष्टि ब्रह्मस्वरूप है । मुझको तो सदा ऐसी ही भासती है । जब तुम जागोगे, तब तुमको भी ऐसी ही भासित होगी । तुम भी अब जागे हो । उस प्रकार मैं अग्नि होकर स्थित हुआ कि जिसकी शिखा से कालख निकलती थी । प्रकाश में ही हुआ और अपने चित्तस्वरूप अनुभव में मुझको जगत् भासित हो रहा था, उसमें मैं स्थित हुआ । अन्धकार और उलूकादि भी मेरे प्रकाश में प्रकाश पाते हैं और भावरूप पदार्थ भी मैंने अपने में जाने क्योंकि भावरूप पदार्थ तब भासित होते हैं, जब उनका रूप होता है । सो रूपवान पदार्थ में ही था, इस कारण सब मुझ ही में सिद्ध होते थे । इस प्रकार मुझको यह भावना हुई ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणेऽन्तरुपाख्याने चिद्रूप-वर्णनन्नामद्विशताधिकद्वितीयसर्गः ॥ २०२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! फिर मैंने पवन की धारणा का अभ्यास किया, तब पवनरूप होकर विचरने लगा और कमल के फूलों और वृक्षों को हिलाने लगा । तारों और नक्षत्रों का आधारभूत हुआ और वे मेरे आधार पर फिरने लगे । चन्द्रमा और सूर्य को चलानेवाला भी मैं ही हुआ । समुद्र और नदियों के प्रवाह भी मेरी ही शक्ति से चलते रहे । मन का बड़ा वेग भी मैं ही हुआ प्राणियों के शरीरों में मेरा निवास हुआ । मैं ही प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान पञ्चरूप होकर स्थित हुआ और सब नाड़ियों में मेरा निवास हुआ । सब नाड़ियों

६१४ * योगवाशिष्ठ *

को अपना-अपना भाग रस में ही पहुँचाता रहा। हिलना, चलना, बोलना, लेना, देना, सब मुझ ही में सिद्ध होता था। निदान सब पदार्थों में स्पर्शशक्ति मैं ही हुआ और सब शब्द मुझ ही से सिद्ध होते थे। क्रियारूपी बूँद का मैं मेघ हुआ। आकाशरूपी गृह में मेरा निवास था और दशों दिशाएँ सब मुझ में ही फुरी थीं। देवताओं को गन्ध से मैं ही सुख देता था और दीपक को मैं ही प्रज्वलित करता था। पक्षियों में मेरा सदा निवास था। जैसे अग्नि में उष्णता रहती है, वैसे ही सब के सुखाने और हरियावल करनेवाला मैं ही हूँ। हे राम! इस प्रकार मैं पवन होकर स्थित हुआ, इसलिए रूप, अवलोक और मनस्कार सब पदार्थ में ही हुआ। चन्द्रमा, सूर्य, तारे, अग्नि, इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, वरुण, कुबेर और यम आदि का जगत होकर मैं ही स्थित हुआ। पञ्च-भूतों के भीतर और बाहर भी मैं था। प्राण-अपान के क्षोभ से दुःख होता है। मैं ही साकार-निराकाररूप हूँ। सब रक्त-पीत श्यामरङ्ग पदार्थ में ही हूँ। पञ्चभूत जो चितअणु में फुरे हैं, सो उर्मी का रूप है, जैसे स्वप्न की सृष्टि सब अपना ही रूप होती है, इतर कुछ नहीं होती। हाड़, मांस, पृथ्वी होकर भूतों में स्थित हुआ और वायुरूप प्राण, अग्निरूप समिधा और आकाशरूप अवकाश हुआ। इस प्रकार मैं सब में स्थित हुआ। मैं भी चैतन्य शरीर था और वे तत्त्व भी चैतन्य शरीर थे। जैसे स्वप्न में जगत आकाशरूप होता है, वैसे ही वे भी आकाशरूप हैं।

हे राम! सब कालों में सब प्रकार सब का सर्वात्मा स्थित है, दूसरा कुछ नहीं। आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, इससे भिन्न जानना भ्रान्तिमात्र है। यह दृष्टि ज्ञानवान् की है। पर जो असम्यक्दर्शी हैं, उनको भिन्न-भिन्न पदार्थ भासित होते हैं। इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण जगत अपने में ही देखा। हे राम! मैं ब्रह्मरूप था, इससे उसमें जगत उत्पन्न होते दिखे। जो मैं ब्रह्म से इतर होता तो एक तृण भी न उत्पन्न होता। मैं जो ब्रह्मरूप था, इससे सृष्टि उत्पन्न होती है। हे राम! जब मैंने बोध-दृष्टि से देखा तब आत्मा से भिन्न कुछ न दीखा और जब आन्तवाहक दृष्टि से देखा तब स्पन्दन के कारण अणु-अणु में सृष्टि भासित हुई। जैसे