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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❉ निर्वाण प्रकरण ❉ १३३

होता है; इनमें रहित होने पर विषयों का कदापि ग्रहण नहीं हो सकता। इस प्रकार इनमें स्थित होकर जीवकला विषय को ग्रहण करती है। यद्यपि इन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न हैं, तो भी इनको जीवकला एकत्र कर लेती है और ये अहंकाररूपी तागे में इकट्ठी होती हैं। देह और इन्द्रियाँ मन की तरह हैं इनको इकट्ठा करके जीव कहता है कि में देखता, सूँघता, सुनता, फिरता, बोलता हूँ और इन्हीं के अभिमान से विषय को ग्रहण करता है।

हे राम ! देह, इन्द्रियाँ और मन आदि जड़ हैं, परन्तु आत्मा की सत्ता पाकर अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं। जबतक पुर्यष्टका देह में होती है, तबतक इन्द्रियाँ भी विषयों को ग्रहण करती हैं। जब पुर्यष्टका देह से निकल जाती है, तब इन्द्रियाँ भी विषयों को नहीं ग्रहण करतीं। हे राम ! ये जो प्रत्यक्ष नेत्र, नासिका, कान, जिह्वा और त्वचा आदि अंग देख पड़ते हैं, ये इन्द्रियाँ नहीं हैं। इन्द्रियाँ तो सूक्ष्म तन्मात्रा हैं। ये तो उनके रहने के स्थान हैं। जैसे गृह में झरोखे होते हैं, वैसे ही ये स्थान हैं। हे राम ! अब जीव का रूप सुनो। आत्मतत्त्व सब जगह व्याप्त है, परन्तु उसका प्रतिबिम्ब वही भासित होता है, जहाँ निर्मल स्थान होता है। जैसे निर्मल जल में प्रतिबिम्ब पड़ता है, अथवा जैसे दो कुण्ड हों, एक जल से पूर्ण और दूसरा जल से रहित, तो सूर्य का प्रकाश तो दोनों में तुल्य होता है, पर जिसमें जल है उसमें प्रति-बिम्बित होता है और जल के डोलने से प्रतिबिम्ब भी हिलता दिखता है, पर जहाँ जल नहीं है वहाँ प्रतिबिम्ब भी नहीं, वैसे ही जहाँ सात्त्विक अंश अन्तःकरण होता है, वहाँ आत्मा का प्रतिबिम्ब जीव भी होता है और जब तक जीव शरीर में रहता है, तब तक शरीर चेतन भासित होता है; पर जब वह जीवकला पुर्यष्टकारूप शरीर को त्याग जाती है, तब शरीर जड़ भासित होता है। जैसे कुण्ड से जल निकल जाय तो कुण्ड सूर्य के प्रतिबिम्ब से हीन हो जाता है, वैसे ही अन्तःकरण और तन्मात्र पुर्यष्टका में आत्मा का प्रतिबिम्ब होता है। जब पुर्यष्टका शरीर को त्याग जाती है, तब शरीर जड़ भासित होता है।

१३४ ❈ योगवाशिष्ठ ❈

हे राम ! जैसे झरोखे के आगे कोई पदार्थ रखिये तो झरोखे को पदार्थ का ज्ञान नहीं होता और जब उसका स्वामी देखता है तब पदार्थ का ग्रहण करता है, वैसे ही इन्द्रियों के स्थानों में जो सूक्ष्मतन्मात्रा ग्रहण करनेवाली होती है, वही विषयों को ग्रहण करती है, और जब तन्मात्रा नहीं होती, तब इन्द्रियाँ ग्रहण नहीं कर सकतीं। हे राम ! प्रत्यक्ष देखो कि कथा का श्रोता पुरुष कथा में बैठा होता है, पर यदि उसका चित्त और जगह निकल जाता है, तब प्रत्यक्ष बैठा रहता है; किन्तु कुछ नहीं सुनता, क्योंकि उसकी श्रवण इन्द्रिय मन के साथ गई है; वैसे ही जब पुर्यष्टका निकल जाती है तब मृतक होता है और इन्द्रियाँ भी विषयों को ग्रहण नहीं करतीं। हे राम ! अहं-मम आदि दृश्य भी सर्ग के आदि में आत्मरूपी समुद्र में तरङ्ग की तरह निकला है, उसके पश्चात् दृश्य कल्पना हुई है। अतएव न देश है, न काल है, न क्रिया है। यह सब असतरूप है; वास्तव में कुछ नहीं। यह जानकर संसार के सुख, दुःख, हर्ष, शोक, राग, द्वेष से रहित होकर विचरो, तब तुम माया से मुक्त हो जाओगे।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे संवेदनविचारो नामैकोन- पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ४९ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वास्तव में इन्द्रियादिक गण कुछ उपजे नहीं हैं। आदि-ब्रह्मा की उत्पत्ति मैंने तुमसे कही और तुमने सुनी है। जैसे आदि-जीव पुर्यष्टकारूप ब्रह्मा उपजे हैं, वैसे ही और भी सब उपजे हैं। हे राम ! जीव पुर्यष्टका में स्थित होकर जैसी-जैसी भावना करता गया, वैसा ही वैसा भासित होने लगा है और फिर उसी की सत्ता पाकर अपने-अपने विषय को ग्रहण करने लगा है। वास्तव में इन्द्रियाँ भी कुछ वस्तु नहीं। जब आत्मा के आभास में चेतता है, इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषय संवेदन में उपजे हैं। ये जैसे उपजे हैं, सो तुमसे कह चुके हैं। हे राम ! शुद्ध संवित् सत्तामात्र में जो अहं का उन्मेष हुआ, वही संवेदन है। वही संवेदन जीवरूप पुर्यष्टकाभाव को प्राप्त होकर बुद्धि, मन और पञ्चतन्मात्रा को उपजाकर आपही उनमें

  • निर्वाण प्रकरण * १३५

प्रवेशकर स्थित हुआ है । उमी को पुर्यष्टका कहते हैं । परन्तु यह पुर्यष्टका भी स्पन्दन में उपजी है । आत्मा से कुछ नहीं उपजा । वह आत्मा न एक है, न अनेक । परमात्मतत्त्व अस्ति अनामय है, और उसमें संवेदन भी अनन्यरूप है । हे राम ! उसमें न कोई द्वैत कल्पना है और न कुछ मनशक्ति है; केवल शान्त सत्ता है । उमी को परमात्मा कहते हैं । वह मनसहित षट् इन्द्रियों से अतीत अ-चैत्य ( चित्त से रहित ) और चिन्मात्र है । उमसे जीव उत्पन्न हुआ है । यह भी मैं उपदेश के निमित्त कहता हूँ; वास्तव में कुछ उपजा नहीं, केवल भ्रममात्र है । जहाँ जीव उपजा है, वहाँ उमको अहंभावरूप विपर्यय हुआ है । यही अविद्या है, जो उपदेश मे लय हो जाती है ।

जैमे निर्मली मे जल की मलिनता दूर हो जाती है, वैमे ही गुरु और शास्त्र के उपदेश मे जब अविद्या मिट जाती है, तब भ्रमरूप आकाश शान्त हो जाते हैं और ज्ञानरूप आत्मा शेष रहता है, जो आकाश में भी सूक्ष्म है । जैमे परमाणु के मुकाबले में सुमेरु स्थूल होता है, वैमे ही आत्मा के मुकाबले में आकाश स्थूल है । हे राम ! आत्मा के आगे जो स्थूलता भासित होती है, वह भी भ्रममात्र है । जो बड़े-बड़े आरम्भ दिखते हैं, वे भी असत् हैं, तब और पदार्थों की क्या बात है ? हे राम ! आत्मा में जगत् नहीं पाया जाता; क्योंकि वस्तु असम्यक् ज्ञान से भासित होती है, सम्यक्ज्ञान में नहीं रहती । जो कुछ-जगत् के प्रपंच देख पड़ते हैं, वे सब मायामात्र हैं । उनमे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता । जैमे मृगतृष्णा का जल पिया नहीं जाता, वैमे ही जगत् के पदार्थों में कोई परमार्थ नहीं सिद्ध होता । वे सब अज्ञान से भासित होते हैं । हे राम ! जो वस्तु सम्यक्ज्ञान में प्राप्त हो, उमे मत जानिये और जो सम्यक्ज्ञान में न रहे, उमे भ्रममात्र जानिये । यह जीव-पुर्यष्टका अवि-द्यक भ्रम है, अर्थात् असत् ही मन भासित होता है । जब गुरु और शास्त्रों का विचार होता है, तब जगत् का भ्रम मिट जाता है ।

पुर्यष्टका में स्थित होकर जीव जैमी भावना करता है, वैमे ही सिद्धि होती है । जैमे बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करता है,

१३६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

वैसे ही जीवकला अपने में देश, काल, तत्त्व आदिकी कल्पना करती है और भावना के अनुसार उसको वे भासित होते हैं। जैसे बीज में पत्ते, डाल, फूल, फल आदि का विस्तार होता है, वैसे ही तन्मात्रा में सब प्राणी, भीतर, बाहर, देश, काल, क्रिया, कर्म आदि सब प्रकट हुआ है। आदि-जीव चेतकर जैसा संकल्प रचता है, वैसा ही भासित होता है। यह संवेदन भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे मिरच में तीक्ष्णता और आकाश में शून्यता अलग नहीं है, वैसे ही आत्मा से संवेदन अलग नहीं। उस संवेदन ने उपजकर निश्चय जाना है कि ये पदार्थ ऐसे हैं, ये ऐसे हैं, इसी से वे वैसे ही स्थित हुए, अन्यथा कभी नहीं होते। आदिजीव ने प्रकट होकर जो निश्चय धारण किया, उर्मी का नाम नीति है। वह स्वरूप में सर्वव्यापी आत्मसत्ता है। आत्मसत्ता ही ये सब रूप रचकर स्थित हुई है। जैसे एक ही ऊख का रस, गुड़, शक्कर आदि के और मृत्तिका घट, पटादि के आकार को रचती है, वैसे ही आत्मसत्ता सर्व ज्ञान को पाती है। जैसे एक ही जल का रस पत्ते, डाल, फूल, फलादिक होकर भासित होता है, वैसे एक ही आत्मसत्ता घट, पट और दीवाल आदि के आकार में भासित होती है।

हे राम ! आदि-जीव ने जैसे निश्चय किया, वैसे ही स्थित है अन्यथा कदापि नहीं होता, परन्तु जगत् वास्तव में भ्रममात्र है; वास्तव में न बिम्ब है और न प्रतिबिम्ब। ये द्वैत में होते हैं और द्वैत कुछ नहीं केवल चिदानन्द ब्रह्म आत्मतत्त्व अपने आप में स्थित है। देहादिक भी सब चिन्मात्र है। हे राम ! जो कुछ जगत् दिखता है, सो आत्मा का किञ्चनरूप है। जैसे रस्सी सर्परूपा जान पड़ती है, वैसे ही आत्मा जगत्-रूप देख पड़ता है। जैसे सुवर्ण भूषण के रूप में भासित होता है, वैसे ही आत्मा दृश्यरूप होकर भासित होता है । जैसे सुवर्ण में भूषण वास्तविक नहीं होते, वैसे ही आत्मा में दृश्य वास्तविक नहीं। जैसे स्वप्न का विषय देश असत् है, पर सत्-सा लगता है, वैसे ही जीव को देह पृथक् भासित होती है। हे राम ! आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है परन्तु स्फुरित होने से अनेक रूप रचती है । जैसे एक नट अनेक स्वाँग

☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️

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मरता है, वैसे ही आत्मसत्ता देहादिक अनेक आकार रखती है। जैसे स्वप्न में एक ही मनुष्य अनेक रूप रचकर चेष्टा करता है, वैसे ही जगत् में आत्मसत्ता नानारूप रखती है।

हे राम! आत्मा नित्य शुद्ध और सबका आत्मरूप है। अपने स्वरूप के प्रमाद से वह अपने जन्म-मरण को जानता है, पर वे जन्म-मरण असत् हैं। जैसे कोई पुरुष अपने को स्वप्न में श्वानरूप देखे, वैसे ही यह अपने को जन्मता-मरता देखता है। जैसे इसको पूर्वभावना है, भ्रम में असत् को सत् जानता है और जैसे स्वप्न में वस्तु को अवस्तु और अवस्तु को वस्तु देखता है, वैसे ही वह जाग्रत् में विपर्यय (उल्टा) देखता है। जैसे जाग्रत् के ज्ञान से स्वप्न का भ्रम निवृत्त हो जाता है, वैसे ही आत्माधिष्ठान के ज्ञान से जगत् का भ्रम निवृत्त हो जाता है। जैसे पहले का किया दुष्कृत हो तो उसके पीछे सुकृत करने से वह घट जाता है, वैसे ही पूर्व-संस्कार से जब नीच वासना होती है और फिर आत्मतत्त्व का अभ्यास करता है तो पुरुष के प्रयत्न से मलिन वासना नष्ट हो जाती है। जब तक वासना मलिन होती है, तब तक जीव उपजता, मरता और गोते खाता है। जब सन्तों के संग और सत्शास्त्रों के विचार से आत्मज्ञान होता है, तब संसारबन्धन से छूटता है—अन्यथा नहीं छूटता।

हे राम! वासणारूपी कलङ्क से जीव घिरा हुआ है और देहरूपी मन्दिर में बैठकर अनेक भ्रम के दृश्य देखता है। आदि-जीव को जो भ्रम हुआ है सो अपने स्वरूप को त्यागकर अनात्म भ्रम को देखने से जैसे बालक परछाहीं में भूत की कल्पना करे वैसे ही जीव ने कल्पना कर जैसी भावना की, वैसा ही भासित होने लगा। आदि-जीव पुर्यष्टका में स्थित हुआ है। बुद्धि, मन, अहंकार और तन्मात्रा का नाम पुर्यष्टका है और देह अन्तर्वाहक है। चैतन्य आत्मा अमूर्ति है। आकाश भी उसके आगे स्थूल है। प्राणवायु गुच्छा के और देह सुमेरु के समान है। ऐसा जीव सूक्ष्म है। सुषुप्ति में जडरूप और स्वप्नभ्रम, दोनों अवस्थाओं में स्थावर-जङ्गमरूपी जीव भटकते हैं, कभी सुषुप्ति में और

१३= ❇ योगवाशिष्ठ

कमी स्वप्न में स्थित होते हैं। इसी प्रकार दोनों अवस्थाओं में जीव भटकते हैं। हे राम! सबकी देह अन्तवाहक है, और उशी देह से सब चेष्टा करते हैं। कभी स्थावर में जाकर वृक्ष और पत्थर आदि की योनि पाते हैं और कभी जब स्वप्न में होते हैं, तब जङ्गमयोनि पाते हैं। वह भी कर्मवासना के अनुसार पाते हैं। जब तामसी वासना घनी होती है, तब कल्पवृक्ष चिन्तामणि आदि स्वरूप को प्राप्त होते हैं। जब केवल तामसी वासना घनी मोहरूप होती है, तब वृक्ष और पत्थर आदि की योनि पाते हैं। इसका नाम सुषुप्ति है। सो लय घना मोह रूप है और इससे भिन्न जङ्गम विक्षेपरूप स्वप्न अवस्था है, कभी उसमें होता है और कभी सुषुप्तिरूप स्थावर होता है।

हे राम! सुषुप्ति अवस्था में वासना सुषुप्तिरूप होती है। वह फिर उगती है, इसमें मोहरूप है। उस सुषुप्ति में जब उतरता है, तब विक्षेप रूप स्वप्नावस्था होती है और जब बोध होता है, तब जाग्रत अवस्था प्राप्त होती है। जाग्रत अवस्था दो प्रकार की है। जाग्रत वही है जो लय और विक्षेप से रहित चेतन अवस्था है। उससे रहित और मनो-राज्य सब स्वप्नरूप है। एक जीवन्मुक्त जाग्रत, और दूसरी विदेहमुक्ति है। जीवन्मुक्ति तुरीयारूप और विदेहमुक्ति तुरीयातीत है। यह अवस्था जीव को बोध में प्राप्त होती है और जीव को बोध पुरुष-प्रयत्न से होता है—अन्यथा नहीं होता। हे राम! जीव का उदय ज्ञानरूप है। यदि दृश्य की ओर लगता है, तो वही हो जाता है और यदि मन की ओर लगता है, तो सतरूप हो जाता है। जब दृश्य के सम्मुख होता है, तब दीर्घ भ्रम को देखता है। जीव के भीतर जो सृष्टिरूप होकर स्फुरित होता है, वह भी आत्मसत्ता से भिन्न कोई वस्तु नहीं है। जैसे बटनाही में दोनों के समान जल भी उछलता है और वह उस जल से भिन्न वस्तु नहीं होता, वैसे ही आत्मा के सिवा जीव के भीतर और कुछ वस्तु नहीं है। यह सृष्टि जो भाषित होती है, सो मायामात्र है। हे राम! जीव को स्वरूप के प्रमाद से सृष्टि भाषित होती है और सत् जैसी लगती है। उसे नाना प्रकार का विश्व प्रतीत होता है

✻ निर्वाण प्रकरण ✻ १३६

और नाना प्रकार की वासनाएँ उठती हैं। उसमे जीव बंधन को प्राप्त हुआ है। जब वासना का क्षय हो तब मुक्ति हो। हे राम! मोहरूप घनी वासना का नाम सुषुप्ति या जड़ अवस्था है। वह क्षीण स्वप्न-रूप है। जब स्वरूप का प्रमाद होता है, तब दृश्य में मन्बुद्धि होती है और जब उसमें प्रतीत होती है तब नाना प्रकार की वासनाओं का उदय होता है। पर जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब संसार की सत्यता नष्ट हो जाती है, फिर वासना नहीं उठती।

हे राम! घनी वासना तब तक उठती है, जब तक दृश्य में मन्बुद्धि होती है। जब जगत् का अत्यन्त अभाव होता है, तब वासना भी नहीं रहती। जैसे भूषण पिघलाकर जब सुवर्ण बन गया, तब भूषण-बुद्धि नहीं रहती। जो वस्तु अज्ञान में उपजी है, वह ज्ञान में लीन हो जाती है। वासना का भ्रम अबोध में उपजा है, वह बोध में लीन हो जाता है। हे राम! घनी वासना से सुषुप्तिरूप जड़ अवस्था होती है, और क्षीण वासना में जीव स्वप्न देखता है। घनी वासना रूप मोह में जीव स्थावर अवस्था को प्राप्त होता है, मध्यवासना में तिर्यक्यौनि पाता है अर्थात् पशु, पक्षी और सर्पादिक होता है; क्षीण वासना में मनुष्यादिक शरीर और नष्टवासना से मोक्ष पाता है। हे राम! यह सब जगत् संकल्प में रचा है। घट-पट आदि जो बाहर देखते और ग्रहण करते हो, वे ही हृदय में स्थित हो जाते हैं, और जब उनको ग्रहण करते हो, तो ग्राह्य-ग्राहक का सम्वन्ध देखते हो कि यह मैंने ग्रहण किया है और यह मैंने लिया है। जो ज्ञानवान् है, वह न ग्रहण करने का अभिमान करता है और न कुछ त्यागने का अभिमान करता है। उसको भीतर-बाहर सब चिदाकाश भासित होता है। चैतन्यसत्ता का यह चमत्कार है; तीनों जगतरूप होकर वही प्रकाशता है, रञ्चकमात्र भी कुछ अन्य नहीं-केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले उठकर भासित होते हैं, परन्तु सब जल ही जल है-जल से भिन्न कुछ नहीं। वैसे ही आत्मा जगतरूप होकर भासित होता है, द्वैत नहीं है।

इति श्रीयो० वा० नि० यथार्थोपदेशो नाम पञ्चाशत्तमम्सर्गः ॥ ५० ॥

१४० ॐ योगवाशिष्ठ ॐ

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे जीव को स्वप्न में जो संसार उदय होता है, वह कल्पनामात्र होता है, न सत् है और न असत् है, जीव के चेतन में ही भ्रम भासित होता है; वैसे ही यह जाग्रत अवस्था भ्रम-मात्र है—स्वप्न और जाग्रत एकरूप हैं। जैसे स्वप्न में जाग्रत का एक अणु भी दीर्घकाल होता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद में जाग्रत भी एक दीर्घकाल का भ्रम हुआ है, जिसमें जीव सत् का असत् और असत् को सत् जानता है; जड़ को चेतन और चेतन को विपर्यय ज्ञान से जड़ जानता है। जैसे स्वप्न में एक ही जीव अनेकता को प्राप्त होता है, वैसे ही आदि-जीव एक से अनेक होकर भासित होता है। जैसे किसी स्थान में चोर का भ्रम भासित होता है, वैसे ही आत्मा में तीनों जगत का भ्रम भासित होता है। जैसे सुषुप्ति से स्वप्नभ्रम उदय होता है, वैसे ही अद्वैततत्त्व आत्मा में जगत का भ्रम होता है। आत्मा अनन्त, सर्वगत जीव का बीजरूप है, जैसा उसके आश्रय में स्फुरण होता है, वैसे ही सिद्ध होकर वह भासित होता है। हे राम! जिस पुरुष की स्वरूप में स्थिति हुई है, वह सदा निसंग होकर विचरता है। जैसे आगे चलकर द्वापर में विष्णुजी के निसंगता के उपदेश से अर्जुन मुक्त होकर विचरेंगे, वैसे ही हे महाबाहो! तुम भी विचरोगे। हे राम! पांडु के पुत्र अर्जुन जैसे सुख से जन्म व्यतीत करेंगे और सब व्यवहारों में भी सुखी और स्वस्थ रहेंगे, वैसे ही तुम भी निसंग होकर विचरोगे।

राम ने पूछा, हे ब्राह्मण! पांडु के पुत्र अर्जुन कब होंगे और कैसे विष्णु भगवान् उनको निसंग होने का उपदेश करेंगे? वशिष्ठजी बोले, हे राम! अस्ति-सन्मात्रतत्त्व में आध्यात्मिक संज्ञा कल्पित ही है। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही निर्मलतत्त्व आप अपनेमें स्थित है। जैसे सुवर्ण में भूषण और समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा में चौदह प्रकार के प्राणी फिरते हैं। जैसे जाल में पक्षी भ्रमते हैं, वैसे ही जगत् में जीव भ्रमते हैं। वहाँ ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य, लोकपाल आदि होकर स्थित हैं और उन्होंने पञ्चभूतों के कर्म रचे हैं कि यह पुण्य ग्रहण करने योग्य है और यह पाप त्यागने योग्य है; पुण्य से

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १४१

स्वर्गादिक सुख प्राप्त होता है और पाप से नरक होता है । यह मर्यादा लोकपाल प्रजापति ने स्थापित की है । इस प्रकार संसाररूपी नदी में जीव बहते हैं। संसाररूपी नदी अविच्छिन्न निरंतर बहती देख पड़ती है, पर यह क्षण-क्षण में नष्ट होती है । इस जगत् में सूर्य के पुत्र यमराज बड़े प्रतापी और तेजस्वी लोकपाल हैं । वही सब जीवों को मारते हैं और उस प्रवाह कार्य को चलाते हैं । उनका जीवों का मारना और दण्ड देना ही नियम है; परन्तु चित्त में वह पहाड़ की तरह अचल हैं । वह यमराज हरएक चौजुगी में कभी आठ, कभी सात, कभी बारह वा सोलह वर्षों का नियम रखकर किसी जीव को नहीं मारते और उदासीन की तरह स्थित होते हैं ।

जब पृथ्वी में अधिक प्राणी हो जाते हैं, चलने को मार्ग नहीं रहता और कोई दुष्टजीव जीवों को दुःख देते हैं, जिससे पृथ्वी भारी और दुःखी होती है, तब पृथ्वी के भार को उतारने के निमित्त विष्णु भगवान् अवतार लेकर दुष्टजीवों के नाश और धर्ममार्ग की रक्षा करते हैं । हे राम ! इस प्रकार नियम के पालक यम को अपना काम करते अनन्त युग व्यतीत हो गये हैं । वैसे ही प्राणी और जगत् भी असंख्य हो गये हैं । इस सृष्टि का अब वैवस्वत यम (मनु) है । वह आगे द्वादश-वर्ष पर्यन्त नियम करेगा और किसी को न मारेगा । तब जीव अक्रूरकर्म करने लगेंगे और पृथ्वी प्राणियों से भर जायगी । जैसे वृक्ष गुच्छों के साथ गुँथ जाते हैं, वैसे ही पृथ्वी भी प्राणियों से गुँथ जायगी, और जैसे चोर से डरकर स्त्री भर्ता की शरण जाती है, वैसे ही पृथ्वी भी दुःखित होकर विष्णु की शरण जायगी । तब विष्णुजी दो देह धारण कर पृथ्वी का भार उतारेंगे और सन्मार्ग स्थापित करेंगे । सब देवता भी अवतार लेकर उनके साथ आवेंगे और नरनायक होंगे । एक देह से विष्णु भगवान् वसुदेव के घर पुत्ररूप में प्रकट होंगे । उनका कृष्ण नाम होगा । और दूसरी देह में पाण्डु के गृह में अर्जुन नाम से युधिष्ठिर नामक धर्मपुत्र के भाई होंगे और समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का राज्य करेंगे । उनके चाचा के पुत्र का नाम दुर्योधन होगा । उनका और

१९२ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ

भीमसेन आदि पाण्डवों का बड़ा युद्ध होगा । दोनों ओर संग्राम की लालसा में अठारह अक्षौहिणी सेना इकट्ठी होगी और बड़े भयानक युद्ध होंगे । उनके द्वारा हरि पृथ्वी का भार उतारेंगे ।

हे राम ! उस सेना के युद्ध में विष्णु का अर्जुन नाम अवतार होगा । वह अर्जुन गाण्डीव धनुष धारण कर मानव स्वभाव में स्थित हो, हर्ष-शोकादिक-विकार-संयुक्त मोहाभिभूत होंगे । युद्ध में अपने बांधवों को देखकर मूच्छित होंगे और मोह और करूणा से उनके हाथ में धनुष गिर पड़ेगा । वह जब आतुर होंगे, तब बोध-देह में उनको हरि उपदेश करेंगे । जब दोनों सेनाओं के मध्य में अर्जुन मोहित होकर गिरेंगे, तब हरि कहेंगे कि हे राजसिंह अर्जुन ! तुम मनुष्यभाव को प्राप्त हो क्यों मोहित हुए हो ? इस कायरपन को त्याग करो । तुम तो परम प्रकाश आत्मतत्त्व हो । तुम सबका आत्मा, आनन्द, अविनाशी, आदि-अन्त-मध्य से रहित, सर्वव्यापी, परमअंकुशरूप, निर्मल, दुःख के स्पर्श से रहित, नित्य, शुद्ध, निरामय हो । हे अर्जुन ! आत्मा न जन्मता है, न मरता है; होकर भी फिर कुछ नाश नहीं होता, क्योंकि वह अजन्मा, निरन्तर, पुरातन और सबका आदि है । शरीर का नाश होने पर उसका नाश नहीं होता । तुम क्यों वृथा कातर हो रहे हो ?

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे नारायणावतारे नामकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५२ ॥

श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! जो इस आत्मा को मारनेवाला और मरता मानते हैं, वे आत्मा को नहीं जानते । यह आत्मा न मरता है और न मारता है, क्योंकि जो अक्षयरूप निराकार आकाश से भी सूक्ष्म है उस आत्मा परमेश्वर को कोई किस प्रकार मार सकता है ? हे अर्जुन ! तुम अहंकाररूप नहीं हो । इस अनात्म अभिमानरूपी मल का त्याग करो । तुम जन्म-मरण से रहित मुक्तरूप हो । जिस पुरुष का अनात्म में अहंभाव नहीं और जिसकी बुद्धि कर्तृत्व-भोक्तृत्व में लिप्त नहीं होती, वह पुरुष सब विश्व को भी यदि मारे तो भी उसको नहीं मारता और न उसे बन्धन होता है । हे अर्जुन ! जिसको

❈ निर्वाण प्रकरण ❈ १४३

जैसा दृढ़ निश्चय होता है, उसे वैसा ही अनुभव होता है। इसमें यह मैं, मेरा इत्यादि जो मलिन संवित् निश्चय है, उसे त्यागकर स्वरूप में स्थित होओ। जो ऐसी भावना में स्थित नहीं होते और आपको नष्ट होता मानते हैं, वे सुख-दुःख भोगते और रागद्वेष में जलते हैं। हे अर्जुन ! वे अपने त्रिगुणरूप असंख्य कर्मों में बँधते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इनमें पाँचों तत्त्व-आकाश, वायु, अग्नि जल और पृथ्वी उपजे हैं और उन भूतों के अंश श्रवण, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नामिका अपने विषयों में स्थित हैं। ये इन्द्रियाँ अपने विषयों को ग्रहण करती हैं। नेत्र रूप को, त्वचा स्पर्श को, जिह्वा रस को, नामिका गन्ध को और श्रवण शब्द को ग्रहण करते हैं। उसमें अहंकार विमूढ़ व्यक्ति अपने को कर्त्ता मानता है। सोचता है कि मैं देखता हूँ, सुनता हूँ, स्पर्श करता हूँ, स्वाद और गन्ध लेता हूँ।

हे अर्जुन ! ये सब कर्म कलना से रचे गये हैं। इन्द्रियों से कर्म होते हैं और अहंभाव से जीव वृथा क्लेश का भागी होता है। बहुतों ने मिलकर कर्म किया और उनका अभिमानी होकर एक ही दुःख पाता है। बड़ा आश्चर्य है कि देह और इन्द्रियों से कर्म होते हैं और जीव उनका अभिमानी होकर सुख, दुःख और राग, द्वेष में जलता है। इससे इनका संग और अभिमान त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो। योगी केवल इन्द्रियों से कर्म करता है, उनमें अभिमान वृत्ति नहीं करता। हे अर्जुन ! इस जीव को अहंकार ही दुःखदायक है, क्योंकि उससे वह अनात्म में आत्म-अभिमान करता है। जो अभिमानरूपी विष से रहित होकर चेष्टा करता है, वह दुःख का कारण नहीं होता। वह सदा सुखरूप है। हे अर्जुन ! जैसे सुन्दर शरीर विष्ठा और मल से मलिन हुआ हो तो उसकी शोभा जाती रहती है, वैसे ही बुद्धिमान, पुरुष यदि शास्त्र का वेत्ता और गुणों से सम्पन्न भी हो, पर यदि अनात्म में आत्म-अभिमान करे तो उसकी शोभा जाती रहती है। जो निर्मल, निरहंकार, सुख-दुःख में सम और क्षमावान् है, वह शुभ कर्म करे अथवा अशुभ कर्म करे, उसको कोई कर्म स्पर्श नहीं करता। हे अर्जुन !

१४४ ☀️ योगवाशिष्ठ ☀️

ऐसे निश्चयवान होकर कर्म को करो। हे पाण्डुपुत्र ! युद्ध तुम्हारा परम- धर्म है, उसे करो। अपना अधिकृत कर्म भी कल्याण करता है। पराया धर्म उत्तम भी दुःखदायक है और अपना धर्म अल्प भी अमृत की तरह सुखदायक है। हे अर्जुन ! चाहे जैसा कर्म करो; यदि तुम में अहं- भाव न होगा तो वह तुमको स्पर्श न करेगा। संग—अभिमान को त्याग और योग में स्थित होकर कर्म करो। जो निसंग पुरुष है, उसको कोई कर्म करना पड़े, वह उसको करता हुआ बन्धन को नहीं होता। इसमें ब्रह्मरूप होकर ब्रह्ममय कर्म करो, तब शीघ्र ही ब्रह्मरूप हो जाओगे। जो कुछ आचार कर्म हो, उसे ब्रह्म में अर्पण करो। संन्यास योग युक्ति में कर्मों को करते हुए भी मुक्ति पाओगे।

इतना सुन अर्जुन ने पूछा, हे भगवन् ! संगत्याग, ब्रह्मार्पण, ईश्वरार्- पण, और योग किसको कहते हैं? मोह की निवृत्ति के लिए इनको पृथक्-पृथक् कहिये। श्रीभगवान बोले हे अर्जुन ! प्रथम तुम यह सुनो कि ब्रह्म किसको कहते हैं। जहाँ सब संकल्प शान्त हैं, केवल एक घनी वेदना है, दूसरी भावना का उत्थान नहीं, केवल अचिन्त्य चिन्मात्र- सत्ता है, उसको परब्रह्म कहते हैं। उसको जानकर उसके पाने का विचार और उद्यम करना ही ज्ञान है। उसमें स्थित होने का नाम योग है। ऐसा निश्चय करना कि यह सब ब्रह्म है; मैं ब्रह्म हूँ और सब जगत् में ही हूँ; और ब्रह्म से भिन्न कुछ भावना न करना, इसका नाम ब्रह्मा- र्पण है। नाना प्रकार का जो जगत् भासित होता है सो क्या है? भीतर भी शून्य है और बाहर भी शून्य है। जिसकी शिला की उपमा है, ऐसा जो आकाशवत् सत्तारूप है, वह न शून्य है, न शिलासदृश है। उसके आश्रय से स्पन्दन कल्पना स्फूर्ति की भाँति अन्यवत् जगत्- रूप होकर भासित होती है, परन्तु वह आकाश की तरह शून्य है। जैसे समुद्र में तरंग और बुलबुले अनेकरूप होकर स्थित होते हैं सो जल ही हैं, और कुछ नहीं। एक जल ही अनेकरूप देख पड़ता है, वैसे एक ही वस्तुसत्ता घट, पट आदिक आकार होकर भासती है। संवित्मात्र आत्मा में भेदकल्पना कुछ नहीं अज्ञान में अनेकरूप भेदकल्पना

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १४५

विकल्पजाल भासित होकर अनेकभाव को प्राप्त होते हैं। आत्मा के अनेक नाम-रूप देखना और भिन्न-भिन्न देह, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि आदिक, अनेक में अहंप्रतीति से एकत्रभाव देखना अज्ञान है। यह कलना ज्ञान से नष्ट हो जाती है।

हे अर्जुन ! संकल्पजाल को त्याग करने को असंग कहते हैं। सब कलना-जाल को भी ईश्वर से भिन्न न जानने की भावना से द्वैतभाव गलित हो जाने का नाम ईश्वरसमर्पण है। हे अर्जुन ! जब ऐसी अभेद भावना होती है, तब आत्मबोध होता है। बोध में सब शब्द-अर्थ एकरूप भासित होते हैं, सब शब्दों का-एक ही शब्द भासित होता है और एक ही अर्थ सब शब्दों में भासित होता है। हे अर्जुन ! सब जगत में हूँ; दिशा और आकाश में हूँ। कर्म, काल, द्वैत, अद्वैत में ही हूँ। तुम मुझमें मन लगाओ, मेरी भक्ति करो, मेरा ही भजन करो और मुझही को नमस्कार करो, तब तुम मुझे ही प्राप्त होगे। हे अर्जुन ! में आत्मा हूँ और तुम मेरे ही परायण हो। अर्जुन बोले, हे देव ! आपके दो रूप हैं—एक पर और दूसरा अपर। उन दोनों रूपों में मैं किसका आश्रय करूँ, जिससे परमसिद्धि पाऊँ ?

श्रीभगवान् बोले, हे अनघ ! एक समानरूप है और दूसरा परमरूप है। यह शंख, चक्र, गदादि युक्त मेरा समानरूप है और परमरूप आदि-अन्त से रहित एक अनामय है। उस ब्रह्मरूप को आत्मा और परमात्मा आदि कहते हैं। जब तक तुम अप्रबुद्ध हो और तुमको अनात्म देहादिक में आत्मा-भिमान है, तब तक मेरे चतुर्भुज आकार की पूजा और कर्मों को करो। जब प्रबुद्ध होगे, तब मेरे परमरूप को पाओगे, जो आदि-अन्त-मध्य से रहित है। उसको पाकर फिर जन्म-मरण में न पड़ोगे। जब तुम मोह आदि शत्रुओं के नाशक और ज्ञानवान होगे, तब आत्मा से मेरा पूजन होगा। मैं सबका आत्मा हूँ। हे अर्जुन ! मैं मानता हूँ कि तुम अब प्रबुद्ध हुए हो, तुमने आत्मपद में विश्राम पाया है और संकल्पकलना से रहित एक आत्मसत्ता में स्थित होकर मुक्त हुए हो। ऐसे योग से तुम सब प्राणियों में स्थित आत्मा को देखोगे, और सब प्राणियों को

१४६ * योगवाशिष्ठ *

आत्मा में स्थित देखोगे । जब सर्वत्र तुमको समबुद्धि होगी, तब स्व- रूप में तुम्हारी दृढ़ स्थिति होगी । हे अर्जुन ! जो सब प्राणियों में स्थित आत्मा को देखता है, एकत्वभाव से मनन करता है और जिसमें आत्मा से भिन्न और भावना नहीं उठती, वह सब कर्म करके भी फिर जन्म-मरण नहीं पाता । हे अर्जुन ! जिसमें सब शब्दों का अर्थ है और जो सब शब्दों से अनर्थरूप है, ऐसी आत्मसत्ता न सत है और न असत । सत-असत से रहित जो सत्ता है, वह आत्मसत्ता है । वह सब लोगों के चित्त में प्रकाशरूप में स्थित है ।

हे भारत ! जैसे दूध में घृत और जल में रस स्थित होता है; वैसे ही मैं सब लोगों के हृदय में तत्त्वरूप में स्थित हूँ । जैसे दूध में घृत स्थित है, वैसे ही सब पदार्थों के भीतर में आत्मा स्थित हूँ । जैसे रत्नों के भीतर- बाहर प्रकाश होता है, वैसे ही मैं सब पदार्थों के भीतर-बाहर स्थित हूँ । जैसे अनेक घटों के भीतर-बाहर एक ही आकाश स्थित है, वैसे ही मैं अनेक देहों के भीतर-बाहर अव्यक्तरूप स्थित हूँ । हे अर्जुन ! ब्रह्मा से लेकर तृण-पर्यन्त सब पदार्थों में मैं समान सत्ता में स्थित नित्य और अजन्मा हूँ, मुझसे जो विश्वारम्भ हुआ है, वह ब्रह्मसत्ता की तक हुआ है और फुरने से जगत् रूप ही भासित होता है, पर आत्मतत्त्व अपने आपमें स्थित है, द्वैत कुछ नहीं है । हे अर्जुन ! आत्मा सबका साक्षीरूप है—उसको जगत् का सुख-दुःख स्पर्श नहीं करता । जैसे दर्पण प्रति- बिम्ब को ग्रहण करता है, परन्तु सबमें संग है और किसी से भिन्न नहीं होता, वैसे ही सब पदार्थों तथा अवस्थाओं का साक्षी आत्मा है; परन्तु किसी को स्पर्श नहीं करता, और शरीर के नाश से उसका नाश नहीं होता । जो ऐसा देखता है, वही यथार्थ देखता है ।

हे अर्जुन ! पृथ्वी में गन्ध, जल में रस, पवन में स्पर्श और स्पन्दन शक्ति में ही हूँ । अग्नि में प्रकाश और आकाश में शब्दशक्ति में ही हूँ । तुमसे क्या कहूँ कि यह में हूँ । सर्वरूप सबका आत्मा में हूँ— मुझसे कुछ भिन्न नहीं । हे पाण्डव ! यह जो सृष्टि प्रवृत्त है, उत्पन्न और प्रलय होती देख पड़ती है । सो मुझमें ऐसे है, जैसे समुद्र में तरङ्ग

❉ निर्वाण प्रकरण ❉ १४७

उपजते और लीन होते हैं। जैसे पहाड़ पत्थररूप हैं; वृक्ष काष्ठरूप हैं और तरङ्ग जलरूप हैं, वैसे ही सब पदार्थों में मैं आत्मारूप हूँ। जो सब भूतों को आत्मा में देखता है, वह आत्मा को अकर्ता देखता है। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरङ्ग और सुवर्ण में भूषण दीखते हैं, वैसे ही आत्मा में नाना आकार भासित होते हैं। हे अर्जुन ! ये नाना प्रकार के पदार्थ ब्रह्मरूप हैं—ब्रह्म से भिन्न नहीं। तब और क्या कहिए; भाव-विकार क्या कहिये और जगत् द्वैत क्या कहिए ? जो सब वही है तो वृथा मोहित क्यों होते हो ? इस प्रकार सुनकर बुद्धिमान् इस लोक में समरस विचरते हैं। हे अर्जुन ! उस पद को तुम क्यों नहीं प्राप्त होते ? जो पुरुष निर्वाण और निर्मोह हुए हैं और जिनकी सब अभिलाषाएँ निवृत्त हुई हैं, वे अक्षयपद को प्राप्त हुए हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे अर्जुनोपदेशो नाम द्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५२ ॥

श्रीभगवान बोले, हे महाबाहो ! फिर मेरे श्रेष्ठ वचन सुनो; मैं तुम्हारी प्रसन्नता के निमित्त कहता हूँ, क्योंकि तुम्हारा हितकारी हूँ। ये जो शीतोष्ण विषय हैं सो इन्द्रियों से भोग्य हैं और आगमापायी अर्थात् आते हैं और फिर निवृत्त हो जाते हैं, इससे अनित्य हैं, इनको सहो, ये आत्मा को स्पर्श नहीं करते। तुम तो आदि-अन्त-मध्य में पूर्ण, निराकार, अखण्ड और व्यापक एक आत्मा हो। तुमको शीत, उष्ण, सुख, दुःख खण्डित नहीं कर सकते। ये कल्पना से रचे हुए हैं। जैसे सुवर्ण में भूषण का निवास है, वैसे ही आत्मा में इनका निवास असत् है। हे भारत ! जिनको इन्द्रियों के भ्रमरूप भोग और स्पर्श चलायमान नहीं कर सकते और सुख-दुःख सम है, उसी पुरुष को मोक्ष की प्राप्ति होती है। हे अर्जुन ! आत्मा नित्य, शुद्ध और सर्वरूप है और इन्द्रियों के स्पर्श असतरूप हैं। इसलिए असत् पदार्थ सत् आत्मा को मोहित नहीं कर सकते। ये अल्पमात्र तुच्छ हैं और बोधरूप आत्म-तत्त्व सर्वगत शुद्धरूप है; उसको इनका स्पर्श कैसे हो—सत् को असत् स्पर्श नहीं कर सकता। जैसे रस्सी में सर्प का जो अभास होता है, वह

१४८ * योगवाशिष्ठ *

रस्सी को स्पर्श नहीं कर सकता, जैसे चित्र की अग्नि कागज को जला नहीं सकती और जैसे स्वप्न के सांप जाग्रत् पुरुष को स्पर्श नहीं कर सकते, वैसे ही इन्द्रियाँ और उनके विषय आत्मा को स्पर्श नहीं कर सकते।

हे अर्जुन ! जो सत् है वह असत् नहीं होता और जो असत् है वह सत् नहीं होता। सुख-दुःखादिक असतरूप हैं और परमात्मा सतरूप है। जगत् की सत् वस्तुएँ घटादिक और आकाश की असत् फलादिक त्यागने से जो निष्किञ्चन महासत् पद शेष रहे, उसमें स्थित हो। हे अर्जुन ! ज्ञानवान् पुरुष इष्ट अनिष्ट में चलायमान नहीं होता। वह इष्ट (सुख) में हर्षित और अनिष्ट (दुःख) में शोकातुर नहीं होता। चैतन्य पाषाण सदृश शरीर में स्थित होता है। हे माधो ! यह चित्त भी जड़ है और देह इन्द्रियादिक भी जड़ हैं। आत्मा चेतन है। अपने को इनके साथ मिला हुआ देह क्यों देखना ? चित्त और देह भी आपस में भिन्न-भिन्न हैं। देह के नष्ट होने पर चित्त नहीं नष्ट होता और चित्त के नष्ट होने पर देह नहीं नष्ट होता। इनके नष्ट होने पर जो अपने को नष्ट हुआ मानता है और इनके सुखदुःख में सुखी-दुःखी होता है, वह महामूर्ख है। हे अर्जुन ! स्वरूप के प्रमाद से जो देहादिक में अहंप्रतीति करता है और अपने को भोक्ता मानता है, वह निर्बुद्धि है। जब आत्मा का बोध होता है, तब अपने को अकर्ता, अभोक्ता और अद्वैत देखता है। जैसे रस्सी के अज्ञान में सर्प देख पड़ता है और रस्सी के बोध से सर्प का अभाव होता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान में देह और इन्द्रियों के सुखदुःख प्रतीत होते हैं और आत्मज्ञान से सुख-दुःख का अभाव हो जाता है।

हे अर्जुन ! यह विश्व एक अज ब्रह्मस्वरूप है। न कोई जन्मता है और न मरता है—यह सत् उपदेश है। हे अर्जुन ! ब्रह्मरूपी समुद्र में तुम एक तरङ्ग उठे हो और कुछ काल रहकर फिर ऊर्मि में लीन हो जाओगे—इसमें तुम्हारा स्वरूप निरामय ब्रह्म है। सब जगत् ब्रह्म का स्पन्दन है और समय पाकर देख पड़ता है। इसमें मान, मद, शोक और सुख, दुःख सब असतरूप है। तुम शान्ति होकर रहो। हे अर्जुन ! प्रथम तो तुम

☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ १४६

ब्रह्ममय युद्ध करो और जो कुछ अक्षौहिणी सेना है, उसका अनुभव में नाश करो । यह द्वैत कुछ नहीं । सर्वदा एक ही परब्रह्म स्थित है। ब्रह्ममय युद्ध करो और सुख, दुःख, हानि, लाभ और जय, पराजय को उस युद्ध में समान मानो । ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त जो कुछ जगत् दीखता है, सो सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं, ऐसा जानकर लाभ-हानि में सम होकर स्थित हो और कुछ चिन्ता न करो । हे अर्जुन ! जड़-शरीर में कर्म स्वाभाविक होते हैं । जैसे वायु का स्फुरण स्वाभाविक होता है, वैसे ही शरीर से कर्म स्वाभाविक होते हैं ।

हे अर्जुन ! भोजन, यजन, दान इत्यादिक जो कुछ कार्य करो, सब आत्मा ही को अर्पण करो । सदा आत्मसत्ता में स्थित रहो और सबको आत्मरूप देखो । हे अर्जुन ! जो किसी के हृदय में दृढ़ निश्चय होता है, वही रूप उसको भासित होता है । जब तुम इस प्रकार अभ्यास करोगे, तब ब्रह्मारूप हो जाओगे—इसमें संशय नहीं । हे अर्जुन ! जो आत्मा को कर्मों का अकर्ता देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है और सम्पूर्ण कर्मों के करते भी कुछ नहीं करता । हे अर्जुन ! कर्मों के फल की इच्छा भी न हो और कर्मों से विरमता भी न हो-योग में स्थित होकर कर्म को करो ! हे धनंजय ! कर्तृत्व के अभिमान और फल की वाञ्छा को त्यागकर कर्म करो । जो कर्मों के फल और संग को त्यागकर नित्य तृप्त हुआ है, वह करता हुआ भी कुछ नहीं करता । हे अर्जुन ! जिसने सब आरम्भों में कामना और संकल्प का त्याग किया है और ज्ञान-अग्नि में कर्म जलाये हैं, उसी को बुद्धिमान् लोग पण्डित कहते हैं । जो आत्मा में समवस्थित है और सब अर्थों में निस्पृह और निर्द्वन्द्वसत्ता में स्थित है, यथा प्राप्त में वरतता है, वह पृथ्वी का भूषण है । वह समुद्र की तरह अचल और अपने में तृप्त है । जैसे समुद्र में अनिच्छित जल प्रवेश करता है, वैसे ही ज्ञानवान् में सुख प्रवेश करते हैं । वह शान्तरूप सब कामनाओं से रहित है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे अर्जुनोपदेशे सर्वब्रह्मप्रति- पादनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५३ ॥

१५० * योगवाशिष्ठ *

श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! तुम देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित, अविनाशी और अजर आत्मा हो। परिणाम या विकार से रहित को अजर कहते हैं। हे अर्जुन ! तुम शोक मत करो। यह जगत तुमको अज्ञान से भासित होता है। अज्ञान अपने प्रमाद को कहते हैं और प्रमाद अनात्मा में आत्माभिमान करने का नाम है। हे अर्जुन ! यह जो संसाररूपी तुम्हारी देह है, इसमें अभिमान मत करो—यह मिथ्या है—इसमें दुःख होता है। तुम असंग और अविनाशी हो; तुम्हारा नाश कदापि नहीं होता। हे अर्जुन ! जो विनाशरूप है, उसका अस्तित्व कभी न होगा और जो सत्य है उसका अभाव न होगा। तत्त्ववेत्ताओं ने इन दोनों का निर्णय किया है। हे अर्जुन ! जिससे यह सब प्रकाशित होता है, उसको तुम अविनाशी जानो। उसका कोई विनाश नहीं कर सकता। हे अर्जुन ! तुम ऐसे हो और यह आत्मा सबका अपना है, तब उसका विनाश कैसे हो ? अज्ञानी मनुष्य उसका विनाश होता मानते हैं।

अर्जुन ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि आत्मा अविनाशी है और सबका अपना है तो इन प्राणियों का नाश क्यों होता है ? श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! तुम सत्य कहते हो। किसी का नाश नहीं होता, परन्तु अज्ञान से लोग अपना नाश होता मानते हैं। हे अर्जुन ! तुम आत्मवेत्ता बनो। वह आत्मा एक अद्वैत है, जिसको एक भी नहीं कह सकते। तब द्वैत कहाँ से हो ? अर्जुन बोले, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि आत्मा एक है, तो मृत्यु भी उससे भिन्न दूसरा न हुआ और यह भी सत्य है कि लोग मर कर नरक या स्वर्ग भोगते हैं। यदि मृत्यु नहीं तो लोग मरते क्यों हैं और पाप-पुण्य का फल कैसे भोगते हैं ? श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! न कोई मरता है और न जन्मता है—यह स्वप्न की तरह मिथ्या कल्पना है। जैसे स्वप्न में निद्रादोष से जन्मना और मरना जान पड़ता है, वैसे ही संसार में यह जन्म-मरण अज्ञान से दीखता है। अज्ञान स्फुरण का नाम है, उसी में नरक और स्वर्ग कल्पित हुआ है।

* निर्वाण प्रकरण *

१५१

हे अर्जुन ! जैसे यह जीव भोगता है, सो तुम सुनो । इस जीव ने अपने स्वरूप के प्रमाद से संकल्पमय शरीर रचे हैं । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में मन, बुद्धि और अहंकार में जीव प्रकट होता है । उस अंतःकरण में मिलकर जैसी वासना करता है, वैसा ही आगे भोगता है । वह वासना तीन प्रकार की है—एक सात्त्विकी, दूसरी राजसी और तीसरी तामसी । जैसी वासना होती है, वैसा ही स्वर्ग और नरक बन जाता है । सात्त्विकी वासना से स्वर्ग बन जाता है और राजसी-तामसी से नरकादिक बन जाते हैं । स्वर्ग-नरक केवल वासनामात्र हैं; वास्तव में न कोई स्वर्ग है, न नरक है; न कोई मरता है, न जन्मता है । केवल एक आत्मा ही ज्यों का त्यों स्थित है, परन्तु यह जगत् आभास भ्रम से होता है । इस जीव ने अज्ञान में चिरकाल तक वासना का अभ्यास किया है, उसी में भ्रम देखता है । अर्जुन बोले, हे जगत्पते ! यह जीव जो नरक, स्वर्गादिक योनि जगत् में देखता है, उसका कारण क्या है ? श्रीभगवान् बोले, हे अर्जुन ! अज्ञान में जो अनात्मा में आत्माभिमान हुआ है, उससे जगत् को सत् जानकर जीव वासना करने लगा है और जैसे-जैसे जगत् को सत् जानकर वासना करता है, वैसे ही वैसे जगत्-भ्रम देखता है । जब आत्मविचार उपजता है, तब जगत् को स्वप्न की तरह देखता है और वासना का भी क्षय हो जाता है । जब वासना का क्षय होता है, तब कल्याण होता है ।

फिर अर्जुन ने पूछा, हे भगवन् ! चिर अभ्यास में जो संसारभ्रम दृढ़ हो रहा है, वह किस प्रकार उपजता है और किस प्रकार लीन होगा ? श्रीभगवान् बोले, हे अर्जुन ! मूर्खता और अज्ञान में जो अनात्म देहादिक में आत्मभावना होती है, उससे जगत् को सत् जानकर जीव वासना करता है और उस वासना के अनुसार जगत्-भ्रम देखता है । पर जब स्वरूप का अभ्यास करता है, तब वासना नष्ट हो जाती है । इससे हे अर्जुन ! तुम स्वरूप का अभ्यास करो । अहं, मम आदिक वासना को त्यागकर केवल आत्मा की भावना करो । यह

१५२ ✵ योगवाशिष्ट ✵

देह वासनारूप है । जब वासना निवृत्त होगी, तब देह भी लीन हो जायगी और जब देह लीन हुई तब देश, काल, क्रिया, जन्म, मरण भी न रहेंगे । ये जीव के अपने ही संकल्प से उठे हैं और भ्रमरूप हैं । उनकी वासना मे घिरा हुआ जीव भटकता है । जब आत्मबोध होता है, तब जीव वासना मे मुक्त होता है और निरालम्ब असंकल्प अविनाशी आत्मतत्त्व पाता है । उर्मी को मोक्ष कहते हैं ।

हे अर्जुन ! जब जीव को तत्त्वबोध होता है तब वासनारूपी जाल मे वह मुक्त हो जाता है और जो वासना मे मुक्त हुआ सो मुक्त हुआ । कोई पुरुष सर्वधर्म-परायण सर्वज्ञ और शास्त्रों का ज्ञाता भी हो, पर यदि वासना मे मुक्त नहीं हुआ, तो वह सब ओर से बँधा हुआ है । जैसे दृष्टि के दोष से निर्मल आकाश में मोर की पूँछ की तरह तारे भासित होते हैं, वैसे ही मूर्ख को शुद्ध आत्मा में वासनारूपी मल यह जगत् भासित होता है । जैसे पिंजड़े में पक्षी बन्द होता है, वैसे ही वह बन्धन में पड़ता है । जिसके हृदय में वासना है, वह बंधन में है और जिसके हृदय में वासना नहीं है, उसको मुक्त जानो । हे अर्जुन ! जिसके हृदय में जगत् की वासना है, वह यदि बड़ी प्रभुता में संयुक्त देख पड़े तो भी दरिद्र और दुःख का भागी है । जिसकी वासना नष्ट हुई है, वह यदि प्रभुता में रहित देख पड़े तो भी बड़ा प्रभुतासम्पन्न ऐश्वर्यशाली है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे जीवनिर्णयो नाम चतुष्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५४ ॥

श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! इस प्रकार तुम निर्वासनिक जीवन्मुक्त होकर विचरो, तब तुम्हारा अन्तःकरण शीतल हो जायगा । तुम जगमरण से मुक्त और निःसंग आकाश समान होगे और इष्ट-अनिष्ट को त्याग वीतराग होकर स्थित होगे । हे अर्जुन ! प्रवाह में जो कार्य आकर प्राप्त हो, उसको करो । युद्ध में कायरपन न करो । आत्मा अविनाशी और देह नाशवान् है । देह का नाश होने से आत्मा का नाश नहीं होता । हे अर्जुन ! जो जीवन्मुक्त पुरुष हैं, वे रागद्वेष से रहित होकर