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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४९ सिद्धिमयाख्ये निरुक्त(१।८४)सर्वसिद्धिमय^१नाम्नि, आयुधभूषिते^२ कामेश्वरी- कामेश्वरयोरायुधैः^३ शरचापपाशाङ्कुशैरष्टभिर्मिथुनीकृतैः “पश्चिमोत्तरपौरस्त्य- दक्षिणाशाक्रमेण तु” (१।१७९) इत्यादिवचतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्याऽलङ्कृते^४ । तेन^५ आयुधानां ^६कामेश्वर्यावरणान्तःपातित्वं सिद्धम् ; चक्रेऽष्टमे स्थिताः कामेश्वरी- पूर्वाः “कामेश्वरीमग्रकोणे” (१।१८२) इति चतुःशतोशास्त्रो^७क्तरीत्या, चतस्रः पीठ- देवताः, पीठानि “का पू जा ओ इति क्रमात्” (१।४१) इति पूर्वोक्तानि मनोबुद्ध्य- हङ्कारचित्तलक्षणानि, तेषु संक्रान्ता देवताः परप्रकाशावयव^८भूतवामाज्येष्ठारौ- द्र्यम्बिकामयमित्रेशषष्ठीशओड्डीशचर्यानाथशिवाङ्कस्थास्तद्विमर्शशक्त्यंशभूतेच्छा- ज्ञानक्रियाशान्तामयकामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिनीमहात्रिपुरसुन्दर्यश्चतस्र इति नवमचक्रदेवतया सह संकलनात् । अष्टमचक्रे तु तिस्र एव कामेश्वर्याद्याः सायुधाः ॥१५६-१५८॥ विश्राम रूप सिद्धि को, जीवन्मुक्तावस्था को दिलाने वाला है। सर्वसिद्धि पद की निर्वक्ति पहले (१।८४) बताई जा चुकी है। यह चक्र कामेश्वर और कामेश्वरी के आयुधों से अलंकृत है। शर, चाप, बाण और अंकुश को मिथुनीकृत करने पर, अर्थात् कामेश्वर और कामेश्वरी के आयुधों के रूप में मिलाकर गिनने पर इनकी संख्या आठ हो जाती है। इनका विन्यास चतुःशती शास्त्र (१।१७९) के अनुसार-“पश्चिम, उत्तर, पूर्व और दक्षिण दिशा के क्रम से” करना चाहिये। इस तरह से यह चक्र कामेश्वर और कामेश्वरी के आठ आयुधों से अलंकृत है। इससे यह सिद्ध होता है कि इन आयुधों की कामेश्वरी आदि आवरण देवताओं के साथ पूजा करनी चाहिये। अष्टम चक्र में स्थित कामेश्वरी आदि देवियाँ चतुःशती शास्त्र (१।१८२) में वर्णित हैं। ये चार पीठदेवता हैं। का पू जा ओ नामक पीठों का वर्णन पहले (१।४१) आ चुका है। ये पीठ ^१मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त का प्रतिनिधित्व करते हैं। परप्रकाश के अवयवभूत वामा, ज्येष्ठा, रौद्री और अम्बिका शक्तिमय मित्रेश, षष्ठीश, ओड्डीश और चर्यानाथ के अंक (गोद) में स्थित विमर्श शक्ति की अवयवभूत इच्छा, ज्ञान, क्रिया और शान्ता शक्तिमय कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी और महात्रिपुरसुन्दरी नामक चार देवियाँ इनमें संक्रान्त होती हैं। यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि नवम चक्र की स्वामिनी का भी संकलन करने पर ही इनकी संख्या चार होती है। अष्टम चक्र में तो केवल कामेश्वरो आदि तीन देवियों और आयुधों का ही पूजा होती है ॥१५६-१५८॥ १. मयानन्दे-ख. ने. ज. उ. । २. षिताः-क. ग. । ३. 'आयुधैः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ४. ताश्च-क. ग. । ५. तेन-इति केवलं झमातृकायां दृश्यते । ६. कामेश्वर- कामेश्वर्योश्चरणा-क. ग. । ७. शास्त्रोक्ताश्च-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. भूता-ज. झ. । १. पृ० ६१ पर उद्धृत सौभाग्यसुधोदय के चार श्लोकों में इस विषय की चर्चा पहले आ चुका है।

३५० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः आयुधदेवतानां ध्यानमाह— आयुधोस्त्वतिरक्ताभाः स्वायुधोज्ज्वलमस्तकाः । वरदाभयहस्ताश्च पूज्या १ध्यातृफलप्रदाः ॥१५९॥ त्वदीयाश्च मदीयाश्च पुंस्त्रीवश्यविधायिनः । आयुधा आयुध३देवताः, छान्दसत्वात् पुंल्लिङ्गप्रयोगः । स्वायुधोज्ज्वल- मस्तकाः स्वाधिष्ठितायुधपरि४कलितमस्तकाः । महापद्मवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम् । मदङ्कोपाश्रयां देवीमिच्छाकामफलप्रदाम् ॥ भवतीम् (३।१११-११२) इति पूर्वोक्तरीत्या महापद्मवनान्तस्थानाश्रितेश्वरस्य विश्वगुरोर्ममाङ्कस्थाया अनाश्रितकलायास्तव संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः पुंवश्यविधायिनः, तादृशस्य मम संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः स्त्रीवश्यविधायिन इत्यर्थः । तदुक्तं चतुःशतीशास्त्रे— आयुध देवताओं का ध्यान बताते हैं— ये आयुध चटकीली लाल आभा (कान्ति) वाले हैं । इनके मस्तक पर अपना ही स्वरूप अंकित है । वर और अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं । अपना ध्यान करने वाले को अभीष्ट फल देने वाले हैं । इसी चक्र में इनकी भी पूजा करनी चाहिये । तुम्हारे (कामेश्वरी के) आयुध पुरुष को और मेरे (कामेश्वर के) आयुध स्त्री को वश में करने में समर्थ हैं ॥१५९-१६०॥ आयुध शब्द से यहाँ आयुधदेवताओं का ग्रहण किया जाता है । आयुध शब्द का पुंलिंग में प्रयोग वैदिक पद्धति से किया गया है । ये आयुध अपने अपने मस्तक पर अपनी ही आकृति धारण किये रहते हैं । "महापद्मवन में विराजमान, कारणानन्द शरीरवाली, इच्छानुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाली तुम मेरे अंक में विराज- मान हो" इस तरह से पहले (३।१११-११२) यहाँ महापद्मवन में स्थित विश्वगुरु कामेश्वर की गोद में विराजमान अनाश्रित कला भगवती का वर्णन किया गया है । इस युगल स्वरूप में से तुम्हारे (कामेश्वरी सम्बन्धी) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग पुरुषों को वश में करने के लिये तथा मेरे (कामेश्वर के) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग स्त्रियों को वश में करने के लिये किया जाता है । चतुःशती शास्त्र (४।६०-६१) में इनका वर्णन इस तरह से किया गया है— १. धा अपि-ख. ने. छ. ज. झ. । २. व्रत-क. ग., प्रीति-उ. । ३. धाधिदे-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कल्पित-ख. ने. ज. झ. उ. ।

तृतीयाः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५१ मादनैर्मदनो भूत्वा पाशाङ्कुशधनुःशरैः । क्षोभयेत् स्वर्गभूलोकपातालतलयोषितः ॥ तथैव शाक्तैर्देवेशि त्रिपुरीकृतविग्रहः । ^१क्षोभयेद् देवगन्धर्वसिद्धविद्याधरानपि ॥ (४।६०-६१) स्पष्टमन्यत् ॥१५९-१६०॥ चतुःशतीशास्त्रेऽनुद्धृतत्वाच्छक्तिबाणात्मबीजान्युद्धरति— त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमँज्जाणान्ताः सुरेश्वरि ॥१६०॥ द्वितीयस्वरसंयुक्ता एते बाणास्त्वदीयाकाः । श्रीकण्ठादिन्यासपरिपाट्या त्वगादीनां धातूनां यवर्णादयः पञ्च, एते द्वितीय- स्वरसंयुक्ता बाणाः । आकारो द्वितीयः स्वरः, सामर्थ्याद् बिन्दुरपि ^३लक्ष्यते । त्वदीयाका बाणाः ^४त्वत्संबन्धिबाणबीजानि । तत्र यकारस्त्वगात्मकः, रेफोऽसृ- गात्मकः, लकारो मांसात्मकः, वकारो मेदस्वरूपः । ^५अस्थिमज्जाणन्तिशब्दोऽस्थि- शिव संबन्धी पाश, अंकुश, धनुष और बाण को धारण कर स्वयं शिवस्वरूप हो साधक स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और पाताल तल में विद्यमान स्त्रियों को भी क्षुब्ध कर देता है। इसी तरह से हे देवेशि ! शक्ति संबन्धी आयुधों को धारण कर त्रिपुरा स्वरूप हुआ साधक देव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर आदि को भी क्षुब्ध कर देता है ॥ बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१५९-१६०॥ चतुःशती शास्त्र में उद्धृत न होने से अब यहाँ शक्ति के बाण बीजों का उद्धार किया जा रहा है— हे सुरेश्वरि ! त्वक्, असृक्, मांस, मेदा और अस्थिमज्जान्त (शुक्र) धातुओं के वाचक वर्णों को द्वितीय स्वर से संयुक्त कर देने पर तुम्हारे (शक्ति के) बाण- बीज बनते हैं ॥१६०-१६१॥ श्रीकण्ठ न्यास में बताई गई पद्धति से त्वक् आदि पांच धातुओं के ^१यकार आदि पाँच वर्ण होते हैं। इनको द्वितीय स्वर से संयुक्त करने पर ये बाणबीज बन जाते हैं। दूसरा स्वर आकार है। बीज पद को सार्थक करने के लिये बिन्दु भी इनके साथ जोड़ा जाता है। इस तरह से तुम्हारे बाण, शक्तिसंबन्धी बाणबीज बनते हैं। यहाँ यकार त्वगात्मक, रेफ असृगात्मक, लकार मांसात्मक और वकार मेदास्वरूप है। अस्थिमज्जा- १. साधयेद्-मु. । २. शुक्लानां च महे-क. ग. । ३. लभ्यते-क. ग. । ४. तव धनुषि बाण-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अस्थिशब्द उपरि स्थितेन शुक्लात्मकेन सकारेणा- न्वेति-क. ग. ।

  1. तन्त्राभिधान में संगृहीत प्रकारान्तर मन्त्राभिधान (पृ० १९-२१) में यह विषय देखा जा सकता है।

३५० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः आयुधदेवतानां ध्यानमाह— आयुधोस्त्वतिरक्ताभाः स्वायुधोज्ज्वलमस्तकाः । वरदाभयहस्ताश्च पूज्या १ध्यातृफलप्रदाः ॥१५९॥ त्वदीयाश्च मदीयाश्च पुंस्त्रीवश्यविधायिनः । आयुधा आयुध३देवताः, छान्दसत्वात् पुंल्लिङ्गप्रयोगः । स्वायुधोज्ज्वल- मस्तकाः स्वाधिष्ठितायुधपरि४कलितमस्तकाः । महापद्मवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम् । मदङ्गोपाश्रयां देवीमिच्छाकामफलप्रदाम् ॥ भवतीम् (३।१११-११२) इति पूर्वोक्तरीत्या महापद्मवनान्तस्थानाश्रितेश्वरस्य विश्वगुरोर्मामङ्कस्थाया अनाश्रितकलायास्तव संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः पुंवश्यविधायिनः, तादृशस्य मम संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः स्त्रीवश्यविधायिन इत्यर्थः । तदुक्तं चतुःशतीशास्त्रे— आयुध देवताओं का ध्यान बताते हैं— ये आयुध चटकीली लाल आभा (कान्ति) वाले हैं। इनके मस्तक पर अपना ही स्वरूप अंकित है। वर और अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं। अपना ध्यान करने वाले को अभीष्ट फल देने वाले हैं। इसी चक्र में इनकी भी पूजा करनी चाहिये। तुम्हारे (कामेश्वरी के) आयुध पुरुष को और मेरे (कामेश्वर के) आयुध स्त्री को वश में करने में समर्थ हैं ॥१५९-१६०॥ आयुध शब्द से यहाँ आयुधदेवताओं का ग्रहण किया जाता है। आयुध शब्द का पुंलिंग में प्रयोग वैदिक पद्धति से किया गया है। ये आयुध अपने अपने मस्तक पर अपनी ही आकृति धारण किये रहते हैं। "महापद्मवन में बिराजमान, कारणानन्द शरीरवाली, इच्छानुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाली तुम मेरे अंक में विराज- मान हो" इस तरह से पहले (३।१११-११२) यहाँ महापद्मवन में स्थित विश्वगुरु कामेश्वर की गोद में विराजमान अनाश्रित कला भगवती का वर्णन किया गया है। इस युगल स्वरूप में से तुम्हारे (कामेश्वरी सम्बन्धी) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग पुरुषों को वश में करने के लिये तथा मेरे (कामेश्वर के) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग स्त्रियों को वश में करने के लिये किया जाता है। चतुःशती शास्त्र (४।६०-६१) में इनका वर्णन इस तरह से किया गया है— १. धा अपि-ख. ने. छ. ज. झ. । २. व्रत-क. ग., प्रीति-उ. । ३. धाधिदे-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कल्पित-ख. ने. ज. झ. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५१ मादनैर्मदनो भूत्वा पाशाङ्कुशधनुःशरैः । क्षोभयेत् स्वर्गभूलोकपातालतलयोषितः ॥ तथैव शाक्तैर्देवेशि त्रिपुरीकृतविग्रहः । १क्षोभयेद् देवगन्धर्वसिद्धविद्याधरानपि ॥ (४।६०-६१) स्पष्टमन्यत् ॥१५९-१६०॥ चतुःशतीशास्त्रेऽनुद्धृतत्वाच्छक्तिबाणात्मबीजान्युद्धरति— त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमँज्जार्णान्ताः सुरेश्वरि ॥१६०॥ द्वितीयस्वरसंयुक्ता एते बाणास्तवदीयाः । श्रीकण्ठादिन्यासपरिपाट्या त्वगादीनां धातूनां यवर्णादयः पञ्च, एते द्वितीय- स्वरसंयुक्ता बाणाः । आकारो द्वितीयः स्वरः, सामर्थ्याद् बिन्दुरपि ३लक्ष्यते । त्वदीयाका बाणाः ४त्वत्संबन्धिबाणबीजानि । तत्र यकारस्त्वगात्मकः, रेफोऽसृ- गात्मकः, लकारो मांसात्मकः, वकारो मेदस्वरूपः । ५अस्थिमज्जार्णान्तशब्दोऽस्थि- शिव संबन्धी पाश, अंकुश, धनुष और बाण को धारण कर स्वयं शिवस्वरूप हो साधक स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और पाताल तल में विद्यमान स्त्रियों को भी क्षुब्ध कर देता है । इसी तरह से हे देवेशि ! शक्ति संबन्धी आयुधों को धारण कर त्रिपुरा स्वरूप हुआ साधक देव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर आदि को भी क्षुब्ध कर देता है ॥ बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१५९-१६०॥ चतुःशती शास्त्र में उद्धृत न होने से अब यहाँ शक्ति के बाण बीजों का उद्धार किया जा रहा है— हे सुरेश्वरि ! त्वक्, असृक्, मांस, मेदा और अस्थिमज्जान्त (शुक्र) धातुओं के वाचक वर्णों को द्वितीय स्वर से संयुक्त कर देने पर तुम्हारे (शक्ति के) बाण- बीज बनते हैं ॥१६०-१६१॥ श्रीकण्ठ न्यास में बताई गई पद्धति से त्वक् आदि पांच धातुओं के १यकार आदि पांच वर्ण होते हैं । इनको द्वितीय स्वर से संयुक्त करने पर ये बाणबीज बन जाते हैं । दूसरा स्वर आकार है । बीज पद को सार्थक करने के लिये बिन्दु भी इनके साथ जोड़ा जाता है । इस तरह से तुम्हारे बाण, शक्तिसंबन्धी बाणबीज बनते हैं । यहाँ यकार त्वगात्मक, रेफ असृगात्मक, लकार मांसात्मक और वकार मेदास्वरूप है । अस्थिमज्जा- १. साधयेद्-मु. । २. शुक्लानां च महे-क. ग. । ३. लभ्यते-क. ग. । ४. तव धनुषि बाण-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अस्थिशब्द उपरि स्थितेन शुक्लात्मकेन सकारेणा- न्वेति-क. ग. ।

  1. तन्त्राभिधान में संगृहीत प्रकारान्तर मन्त्राभिधान (पृ० १९-२१) में यह विषय देखा जा सकता है ।

३५२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः मज्जयोरुपरि स्थितं शुक्रात्मकं सकारं लक्षयति । चतुः^१शतीशास्त्रेऽप्यनुक्तानां कामेश्वरबाणबीजानाम्—"आदौ ^२पादावरेण्याख्यां ^३संयुजेन्नलरक्रमे" इति स्वच्छन्दसंग्रहोद्धृतत्वादागमान्तरेषु प्रसिद्धत्वान्नात्रोद्धारः क्रियते ॥१६०-१६१॥ वामादीनां पुराणां तु जननी त्रिपुराम्बिका ॥१६१॥ परस्वातन्त्र्यरूपत्वादिक्षासिद्धिर्महेश्वरि । एताः सर्वोपचारेण पूजयेत् तु वरानने ॥१६२॥ वामादीनां वामाज्येष्ठारौद्र्याख्यानां मित्रेशादिरूपाणां ^४मिच्छाज्ञानक्रिया^५त्मक- विमर्शशक्त्यंशकामेश्वर्याद्यधि^६ष्ठानत्वात् पुरशब्दवाच्यत्वम्, तेषां त्रिपु- राणां जननी समष्टिरूपत्वादम्बिकाशक्ति^७रेव त्रिपुराम्बिका, निरुक्ता ^८चक्रे- श्वरीति शेषः। "स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि" इत्याज्ञावतारोक्तरीत्या परशिवस्य विश्वसर्जनसंहारलक्षणस्वातन्त्र्यलक्षणेच्छासिद्धि ^९रेतच्चक्राचर्कस्य र्णान्त शब्द अस्थि और मज्जा के ऊपर स्थित शुक्रात्मक सकार को लक्षित करता है। चतुःशती शास्त्र में कामेश्वर के बाण बीजों का भी उद्धार नहीं बताया गया है किन्तु उनका उद्धार 'स्वच्छन्दसंग्रह में बता दिया गया है और आगमान्तर में भी ये प्रसिद्ध हैं, अतः उनका उद्धार यहाँ नहीं किया गया है ॥१६०-१६१॥ त्रिपुराम्बिका वामा आदि तीन पुरों की जननी है। हे महेश्वरि ! अपनी परम स्वातन्त्र्य शक्ति के कारण यह अपने साधक को इच्छासिद्धि प्रदान करने वाली है। हे वरानने ! इस अष्टम चक्र में इन सबकी पूजा करनी चाहिये ॥१६१-१६२॥ मित्रेश आदि तीन प्रकाशों की अंशभूत वामा, ज्येष्ठा और रौद्री नामक शक्तियों में इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मक विमर्शांशभूत कामेश्वरी आदि शक्तियां अधिष्ठित हैं, अतः वामा आदि को यहाँ पुर नाम दिया गया है। इन तीनों पुरों की जननी समष्टिस्वरूपिणी अम्बिका शक्ति है। इसी को 'त्रिपुराम्बिका' कहते हैं। इस अष्टम चक्रेश्वरी का ही स्वरूप यहाँ बताया गया है। आज्ञावतार के वर्णन के अनुसार यह शक्ति सारे जगत् १. शत्यामप्यनुद्धृतानां-क. ग.। २. यायो-झ. । ३. रक्तयोर्नीलरक्तयोः-ख. ने. ज. उ. ब., संयुजेन्नीलरक्तयोः-झ. । ४. णां पुराणामि-ख. झ. उ. । ५. मय-ख. ज. झ. उ. । ६. ष्ठितत्वात्-क. ग. । ७. क्तेरेतत् त्रि-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. चक्रेशी-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. रेतदर्च-ख. ने. ज. झ. उ. । १. दीपिका में उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन से तो यह विषय स्पष्ट नहीं होता, किन्तु ऋजुविमर्शिनी (पृ० २५५) तथा सुभगोदय (पृ० २९५) में कामेश्वरी और कामेश्वर के बाणबीजों का उद्धार स्वरूप बताया गया है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५३ सिद्धयति, १सेयमिच्छासिद्धिरस्मिन् चक्रे स्थितेत्यर्थः । एता आयुधदेवताः कामेश्व- र्याद्याश्चक्रे२श्वरीसिद्धियुताः सर्वोपचारैर्गन्धादिभिरुपचारैः पूजयेत् ॥१६१-१६२॥ नवमचक्रपूजां सवासनामाह— सर्वानन्दमये देवि परब्रह्मात्मके परे । चक्रे संवित्तिरूपा च महात्रिपुरसुन्दरी ॥१६३॥ स्वैराचारेण सम्पूज्या त्वहन्तेदन्तयोः समा । महाकामकलारूपा “आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (तै० उ० ३।६), “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” (बृ० उ० ४।३।३२) इति ३श्रुत्युक्तरीत्या सर्वानन्द- समष्टिभूतपरमानन्दमयत्वात् परब्रह्मात्मके । अत एव परे विश्वोत्तीर्णे । ४परम- शिवस्पन्दमयत्वाच्चक्रे नवमे संवित्तिरूपा, “स्वसंवित् त्रिपुरा देवी लौहित्यं तद्वि- मर्शनम्” इत्यभियुक्त५वचनोक्तरीत्या वेदकवेद्ययोरहन्तेदन्तयोः समा मध्यस्था को निगलती और उगलती रहती है। इस शक्ति की उपासना करने वाले को भी विश्व की सृष्टि और संहार करने की स्वातन्त्र्य (सामर्थ्य) स्वरूपिणी इच्छासिद्धि प्राप्त हो जाती है। अतः इस इच्छासिद्धि की भी इसी चक्र में पूजा की जाती है। इन सबकी— आयुध देवताओं की, कामेश्वरी आदि तीन देवियों की और इच्छासिद्धि के साथ चक्रेश्वरी त्रिपुराम्विका की—गन्ध, पुष्प आदि सभी उपचारों से यहाँ पूजा करनी चाहिये ॥१६१-१६२॥ नवम चक्र की पूजाविधि वासना के साथ बताते हैं— हे देवि ! परब्रह्मात्मक सर्वानन्दमय श्रेष्ठ चक्र में संवित्ति स्वरूपिणी महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा स्वैराचार से करनी चाहिये। महाकामकला स्वरूपिणी यह देवी अहन्ता और इदन्ता इन दोनों ही स्थितियों में समान स्वरूप वाली है ॥१६३-१६४॥ “ऋषि (भृगु वारुणि) ने जान लिया कि आनन्द ही ब्रह्म है”, “इसी ब्रह्मानन्द की एक मात्रा का अन्य प्राणी उपभोग करते हैं” इत्यादि श्रुतियों के प्रमाण से सर्वानन्द के समष्टिभूत परमानन्दमय परब्रह्मात्मक इस विश्वोत्तीर्ण परम चक्र में परमशिव का स्पन्दन स्पष्ट भासित होने लगता है, इसीलिये यह संवित्तिस्वरूप है। १किसी अभि- युक्त ने कहा है—“स्वसंवित् ही त्रिपुरा है और उसकी ललाई ही विमर्श शक्ति है”। १. अतः सेय-क.ग. । २. श्चक्रेशी-झ. उ. । ३. श्रुत्युक्ता-ख. ने. ग. झ .उ. । ४. परशिवानन्दमय-ख. ने. । ५. युक्तोक्त-ख. ने. ग. झ. उ. ।

  1. प्रस्तुत श्लोक को भी भास्करराय ने नित्याषोडशिकार्णव (५।४१) का अंग मानकर उसकी व्याख्या की है। (द्र० सेतुबन्ध, पृ० १२६) २३

३५४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः संवित्तिर्महात्रिपुरसुन्दरी पूर्वोक्त (१।८५) निर्वचना। महाकामकलारूपा प्रकाश- विमर्श¹सामरस्यमहाबिन्दुत्रयमयहार्धकला महाकामकला, तद्रूपा “बिन्दुं संकल्प्य वक्त्रं तु” (१।१८५) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्या। ²स्वैराचारेण सम्पूज्य, यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत्। तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं संप्रकाशते॥ (श्लो० ७८) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या निजेच्छानुरूपैरिन्द्रियप्रीणनैर्द्रव्यैः परिस्फुर- त्परमानुसन्धानलक्षणेन स्वैराचारेण सम्पूज्य, स्वसंविद्देवता भावनीयेत्यर्थः ॥१६३-१६४॥ प्राप्तिसिद्धिमाह— पीठविद्यादिसिद्धिदा ॥१६४॥ महामुद्रामयी देवीपूज्य। “का पू जा ओ इति क्रमात्” (१।४१) इति पूर्वोक्ताः पीठाश्चत्वारः। विद्याः वाग्भवकामराजशक्ति³तुरीयबीजात्मिकाः। आदिशब्दाद् देवताः कामेश्वर्याद्या- इस तरह से यह संवित् वेद्य और वेदक दशा में, अहन्ता और इदन्ता की स्थिति में समान स्वरूप वाली है, अर्थात् सभी अवस्थाओं में यह मध्यस्थ रूप में विद्यमान है। इस तरह से यह मध्यस्थ संवित्ति ही महात्रिपुरसुन्दरी है। इसकी निरुक्ति पहले (१।८५) बताई जा चुकी है। यह महाकामकला स्वरूपिणी है। प्रकाश और विमर्श के सामरस्य स्वरूप तीन महाबिन्दुओं वाली हार्धकला को ही महाकामकला कहा जाता है। यह नवम चक्रेश्वरी महाकामकला स्वरूपिणी है। चतुःशती शास्त्र (१।१८५) में इसका स्वरूप बताया गया है। स्वैराचार से इसकी पूजा करनी चाहिये। विज्ञान- भैरव भट्टारक का कहना है— जहाँ जहाँ मन को तुष्टि हो, वहीं मन को स्थिर कर देना चाहिये। ऐसा करने से उसी में अपना परमानन्दात्मक स्वात्मस्वरूप प्रकाशित हो उठता है॥ इसी पद्धति से अपनी इच्छा के अनुसार इन्द्रियों को तृप्त करने वाले द्रव्यों से, इन्हीं में अपने स्वात्मस्वरूप को खोजता हुआ साधक यथेच्छ आचरण द्वारा नवम चक्रेश्वरी की पूजा और भावना करे ॥१६३-१६४॥ प्राप्ति नामक सिद्धि का अब वर्णन करते हैं— यह देवी पीठ, विद्या आदि की प्राप्तिरूप सिद्धि को देने वाली है। महा- मुद्रामयी इस देवी की पूजा यहीं की जाती है ॥१६४-१६५॥ का पू जा ओ के क्रम से चार पीठ पहले (१।४१) बताये जा चुके हैं। वाग्भव, १. व्याससमासमयबिन्दुत्रयहार्धकला—क. झ.। २. 'स्वैरा''''कोक्तरीत्या' नास्ति— क.। ३. तूर्यबीजा—ते., ज.।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५५ श्चतस्रः। तेषां ^१तुरीयातीतपदपरशिवविश्रान्तिलय^२लक्षणां सिद्धिं ददाति प्रापयतीति प्राप्तिसिद्धिः। महामुद्रामयी महामुद्रा सर्व^३मुद्रासमष्टिभूतत्वाद् योनिमुद्रा, तन्मयी पूज्येत्यर्थः ॥१६४-१६५॥ पञ्चदशात्मिका । ^४तत्तत्तिथिमयी नित्या नवमी भैरवी परा ॥१६६॥ प्रतिचक्रं ^५समुद्रास्तु चक्रसंकेतकोदिताः^६। पञ्चदशात्मिका पञ्चदशाक्षर्या विद्याया वाच्यभूता पञ्चदशभूतगुणात्मिका। तत्तत्तिथिमयी प्रतिपदादिपञ्चदशतिथि^७रूपा। नित्या निजसुखमयनित्यनिरुपमा- कारा। नवमी भैरवी परा। "मूलविद्या तथा ^८प्रोक्ता" (२।५) इति पूर्वोक्तरीत्या मूलविद्यारूपनवमचक्रेश्वरी विद्या^९ षोडशकलात्मिका मूलदेवी नवमचक्रेश्वरी ^१०पूज्येत्यर्थः। प्रतिचक्रं त्रैलोक्यमोहनादिष्वेकेकस्मिन् चक्रे। चक्रसंकेत^११कोदिताः कामराज, शक्ति और तुरीय बीजात्मक विद्याओं का भी वर्णन किया जा चुका है। आदि शब्द से कामेश्वरी आदि चार देवियों का ग्रहण किया जाता है। इन सबको परशिव- स्वरूप तुरीयातीत पद में विश्रान्ति देने वाली, उसमें लीन कर देने वाली सिद्धि को प्राप्त करा देने वाली यह देवी प्राप्तिसिद्धि स्वरूपिणी है। यही देवी महामुद्रामयी भी है। सभी मुद्राओं की समष्टिरूपिणी योनिमुद्रा को महामुद्रा कहा जाता है। योनिमुद्रामयी महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा यहीं करनी चाहिये ॥१६४-१६५॥ पंचदश भूतगुणात्मिका, प्रतिपदादि तिथिरूपिणी पन्द्रह देवियां तिथि- नित्या और नवीं पराभैरवी मूलविद्या कहलाती हैं। इन सबकी यहाँ पूजा करनी चाहिये। चक्रसंकेत में वर्णित मुद्राओं का पूजन तो प्रत्येक चक्र में अलग अलग होना चाहिये ॥१६५-१६६॥ पंचदशात्मिका का अर्थ पंचदशाक्षरी विद्या के वाच्यभूत पन्द्रह भूतगुण शब्द, स्पर्श आदि से सम्पन्न प्रतिपदादि तिथियों की अधिष्ठात्री पन्द्रह तिथिनित्यायँ है। इनको नित्या इसलिये कहते हैं कि ये सब निज सुखमय नित्य निरुपम आकार से सम्पन्न हैं। इन अवयव नित्याओं से सम्पन्न नवीं पराभैरवी अवयवी नित्या है। पहले (२।५) बताया जा चुका है—"इसी को मूलविद्या भी कहते हैं"। यह मूलविद्या ही नवम चक्रेश्वरी विद्या है और यही अवयव और अवयवी नित्याओं के भेद से सोलह कला वाली मूल देवी है। नवम चक्र की स्वामिनी के रूप में इसकी पूजा की जाती है। प्रतिचक्र का १. तुर्या—ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'लय' नास्ति—क. ग.। ३. विद्या—क. ग.। ४. संपूज्या परमेशानि तत्तत्तिथिमयी परा—ख. ने. च. छ. ज. उ.। ५. तु मु—ख. च. छ. ज. झ.। ६. तचोदिताः—ख. च. छ. ज. झ.। ७. पद—ने. ज. झ. उ.। ८. ख्याता— क. ग.। ९. विद्यामुच्चार्य नवमचक्रेश्वरीविद्या या षोडश—ख. ने. ज. झ. उ.। १०. संपू- जयेन्ने—ने. उ.। ११. ते चोदिताः—ख. ज. उ.।

३५६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः १"योनिप्राचुर्यतः सैषा सर्वसंक्षोभिणी पुनः" (१।५९) इत्यादिना चक्रसंकेते चक्रे विहिताः सर्वमुद्राः सर्वसंक्षोभिण्याद्यास्तत्तच्चक्रमुद्रास्तत्तच्चक्रेषु पूज्या इति योज्यम् ।।१६५-१६६।। नित्यक्लिन्नादिकाश्चैव काम्यकर्मानुसारतः ।।१६६।। चतुरस्रान्तराले वा त्रिकोणे वा यजेत् सुधीः । कामेश्वरीभगमालिन्योरावरणान्तःपातित्वात् २तयोर्मध्यत्रिकोणाग्रवाम- कोणयोः स्थितिरुक्ता । शिष्टाः— नित्यक्लिन्ना३ तथा नित्या भेरुण्डा वह्निवासिनी ।। महाविद्येश्वरी दूती त्वरिता कुलसुन्दरी । नित्या नीलपताका च विजया सर्वमङ्गला ।। ज्वालामालिनी चित्रा च (१।२६-२८) इति चतुःशतीशास्त्रोक्तास्त्रयोदशनित्यास्त्रिकोणे वा, श्रीचक्रमध्यत्रिकोणे वा, चतु- रस्रान्तराले वा षोडशदलचतुरस्रान्तराले वा काम्यकर्मानुसारतः वश्यादिकाम्य- कर्मानुरूपवर्णध्यानपुष्पादिभिः । सुधीः तत्तत्काम्यकर्म४विधानविषयज्ञो ५यजेत् ।।१६६-१६७।। अभिप्राय यह है कि त्रैलोक्यमोहन आदि एक एक चक्र में चक्रसंकेत प्रकरण में उपदिष्ट सर्वसंक्षोभिणी आदि सभी नौ मुद्राओं को उस उस चक्र की मुद्रा के रूप में उन उन चक्रों में पूजा होनी चाहिये ।।१६५-१६६।। काम्य कर्म के अनुसार प्रयोग करने वाले विद्वान् को चाहिये कि वह चतुरस्र के अन्तराल में अथवा त्रिकोण में नित्यक्लिन्ना आदि तिथिनित्याओं की पूजा करे ।।१६६-१६७।। पन्द्रह तिथिनित्याओं में १कामेश्वरी और भगमालिनी के नाम भी पठित हैं। मध्यत्रिकोण के अग्र भाग और वाम कोण में इनको पूजाविधि बताई जा चुकी है। बाकी की नित्यक्लिन्ना, भेरुण्डा, वह्निवासिनी, महाविद्येश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताका, विजया, सर्वमंगला, ज्वालामालिनी और चित्रा नामक चतुःशती शास्त्र (१।२६-२८) में प्रोक्त तेरह नित्याओं की पूजा त्रिकोण में, अर्थात् श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोण में, अथवा चतुरस्रान्तराल में, अर्थात् षोडशदल और चतुरस्र के बीच में वशीकरण आदि काम्य कर्मों के अनुरूप वर्ण, ध्यान, पुष्प आदि से पूजा १. ‘योनि''''स्तत्तत्’ नास्ति-क. ग.। २. तन्मध्य-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. न्नाभिधा-मु. । ४. कर्मानुवि-ख. । ५. 'यजेत्' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । १. यहाँ अमृतानन्द तिथिनित्याओं से त्रिकोण स्थित कामेश्वरी एवं भगमालिनी का अभेद मान कर व्याख्या करते हैं, जब कि भास्करराय इनमें भेद मानते हैं। अमृतानन्द

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५७ चक्रपूजामुपसंहरन् कुलदीपनिवेदनमाह— अलिना पिशितैर्गन्धैर्धूपैराराध्य देवताः ॥१६७॥ चक्रपूजां विधायेत्थं कुलदीपं निवेदयेत् । अन्तर्बहिर्भासमानं स्वप्रकाशोज्ज्वलं प्रिये ॥१६८॥ अलिना हेतुना। १पिशितगन्धधूपशब्दाः स्पष्टार्थाः। देवताः त्रैलोक्यमोहनादि- बैन्दवान्तनवचक्रगताः, अलिपिशितगन्ध २धूपैराराध्य, इत्थ पूर्वोक्तरीत्या चक्रपूजां विधाय कुलदीपम्, कुलं षट्त्रिंशत्तत्त्वसमुदायरूपं शरीरम्, तत्र भवं ३ दीपम्, "ततो हृदयपद्मान्तः स्फुरन्तीं सांविदीं४ कलाम्" (सु० ३४) इत्यभियुक्त ५वचनोक्त- रीत्या हृदयान्तर्भासमानं संवित्कलारूपं दीपम्, इन्द्रियद्वारा बहिरर्थेषु तद्रूपेण ६भासमानम्, अत एव स्वप्रकाशोज्ज्वलं तत्र प्रमाणनिरपेक्षप्रतीतिकं निर्वाणरहितं करनी चाहिये। यहां सुधी पद का अर्थ है उन उन काम्य कर्मों के विधि-विधान को अच्छी तरह से जानने वाला ॥१६६-१६७॥ चक्रपूजा का उपसंहार करते हुए कुलदीप के निवेदन की विधि बताते हैं— अलि, पिशित, गन्ध, धूप आदि से सभी देवताओं की आराधना करने के बाद चक्रपूजा की समाप्ति पर कुलदीप प्रज्वलित करे । हे प्रिये ! यह कुलदीप अपने प्रकाश की उज्ज्वल आभा से हृदय के भीतर और बाहर भी आलोक फैलाने वाला है ॥१६७-१६८॥ अलि का अर्थ हेतु द्रव्य है। पिशित, गन्ध और धूप शब्दों का अर्थ स्पष्ट है। त्रैलोक्यमोहन से बैन्दव पर्यन्त सभी नौ चक्रों में निवास करने वाले देवताओं की अलि, पिशित, गन्ध, धूप आदि से ऊपर बताई पद्धति के अनुसार आराधना कर लेने के उपरान्त कुलदीप को प्रज्वलित करना चाहिये। कुल शब्द का अर्थ है छत्तीस तत्त्वों का समुदाय स्वरूप यह शरीर । इस शरीर में दीपक जलाना चाहिये। शिवानन्द मुनि के अनुसार "हृदय रूपी कमल में स्फुरित होने वाली सांविदी कला ही दीपक है"। संवित्कला के स्फुरण से हृदय के भीतर प्रज्वलित यह दीप इन्द्रियों के द्वारा बाह्य पदार्थों में अपना प्रकाश फैलाता है। अपने इस अद्भुत उज्ज्वल प्रकाश से यह दीपक हृदय के भीतर और बाहर भी बिना किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा रखे भासित होता रहता है और यह कभी १. पिशितैर्मांसैः-क. ग. ने. । २. धूपदीपै-क. ग. । ३. 'भवं' नास्ति-ख. ने.०ज. झ. ड. । ४. संविदं-ख. ने. ज. झ. ड. । ५. युक्तोक्त-ख. ने. ज. झ. ड. । ६. 'भासमानं' नास्ति-ख. ज. झ. ड. । की व्याख्या का खण्डन करते समय वे वज्रेश्वरी का उल्लेख करते हैं, किन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि तिथिनित्याओं में वज्रेश्वरी की गणना नहीं है।

३५८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः च १कुलदीपं निवेदयेत् । पुनः प्रत्यङ्मुखतया तेनैव द्वारेणान्तः संविद्विश्रान्ति- स्तन्निवेदनं नाम ॥१६७-१६८॥ पुष्पाञ्जलिं ततः कृत्वा जपं कुर्यात् समाहितः । संयम्येन्द्रियसंचारं प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् । एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ॥ इति २प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या समाहितः३ नियतेन्द्रियः, नादरूपमन्त्रो- च्चारणलक्षणं जपं कुर्यात् । शिष्टं स्पष्टम् ॥१६९॥ जपप्रकारमाह४— कूटत्रये महादेवि कुण्डलीत्रितयेऽपि च ॥१६९॥ चक्राणां पूर्वपूर्वेषां नादरूपेण योजनम् । कूटत्रये कूटानां वाग्भवकामराजशक्तिबीजाख्यानां त्रये । कुण्डलीत्रितयेऽपि च । कुण्डलीनां त्रितयं ५कुण्डलीत्रयम्, “आधारं ६हृदयं बिन्दुस्थानं च परिकी- र्तितम्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तेषु आधारहृदयभ्रूमध्येषु स्थितानां बीजत्रयशिखर- बुझता नहीं है । इस तरह के कुलदीप को देवियों को समर्पित करे । बाहर की तरफ दौड़ रही इन्द्रिय-वृत्तियों को अन्तर्मुख बना कर, उसी इन्द्रिय-मार्ग से उनको भीतर ले जा कर अपने संवित्स्वभाव में उनको विलीन कर देना हो, उनको विश्राम दिला देना ही यहाँ निवेदन शब्द का अर्थ है ॥१६७-१६८॥ तब पुष्पांजलि प्रदान कर समाहित चित्त से जप करे ॥ किसी प्रामाणिक१ व्यक्ति ने जप के विषय में कहा है— इन्द्रियों के बाहरी संचार को रोक कर आन्तर नाद का उच्चारण करे । वास्तविक जप इसी को कहा जाता है । बाह्य जप वस्तुतः जप नहीं है ॥ साधक को चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियों को वश में करके नादरूप मन्त्र का उच्चारण करते हुए जप करे । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१६९॥ अब इस जप की विधि बताते हैं— हे महादेवि ! तीन कूटों में और तीन कुण्डलियों में एक एक चक्र का नाद के रूप में संयोजन हो जप कहलाता है ॥१६९-१७०॥ कूटत्रय का अर्थ है वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक तीन बीज और कुण्डली- त्रय का अर्थ स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण पर आधार, हृदय और बिन्दुस्थान है । इसका १. ‘कुलदीपं’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रमाण-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. हिते- न्द्रियः-ख. ने. ज. उ. । ४. मेवाह-ख. झ. उ. । ५. ‘कुण्डलीत्रयम्’ नास्ति-क. ग. । ६. चैव हृद्बिन्दु-ख. ने. ज. झ. । I. पृ० २२७ की दूसरी टिप्पणी देखिये ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५९ वर्तिकामकलान्तर्गतसपरार्धकलारूपाणां वह्निसूर्यसोम¹कुण्डलिनीनां त्रये। चक्राणां पूर्वपूर्वैषाम्। "अकुले विषुसंज्ञे च" (१।२५) इत्यत्रोक्ताऽकुलादिबिन्दुन्तस्थानेषु नवसु भावितानां त्रैलोक्यमोहनादिनवचक्राणामेकैकस्मिन् बीजे कुण्डलिन्यां च त्रिशस्त्रिशो विभज्य योजितानां नादरूपेण योजनम्। त्रैलोक्यमोहनादि²नवचक्र- स्थादित्रयस्याधारस्थवह्नि³मण्डलस्थितवाग्भवशिखरवर्तिकामकलान्तर्गतहार्धकला- रूपवह्निकुण्डलिन्युत्थानोदितहृद्⁴गतकामराजबीजपर्यन्तव्यापिनादमयताभावनं वाग्भवबीजजपः। सर्वसौभाग्यदायकादिचक्रत्रयस्य हृदयस्थसूर्यमण्डलस्थित- कामराजशिखरवर्तिकामकलान्तर्गतहार्धकलारूपसूर्यकुण्डलिन्युत्थानोदितबिन्दुस्था- नगतशक्तिबीजपर्यन्तव्यापिनादमयताभावनं कामराजबीजजपः। सर्वरोगहरादि- चक्रत्रयस्य "बिन्दुस्थानेन्दुमण्डलान्तर्गतशक्तिबीजशिखरवर्ति⁶कामकलान्त- र्गतहार्धकलारूपसोमकुण्डलिन्युत्थानोदितब्रह्मरन्ध्रोपरिस्थितशिवतत्त्वातीतसमना- सोमपर्यन्तव्यापिना नादेन सहोन्मन्यां लयभावनं शक्तिबीज⁷जप इत्यर्थः। तदुक्त- मभियुक्तैः— अभिप्राय यह होगा कि आधार, हृदय और भ्रूमध्य में स्थित तीन बीजों के शीर्ष स्थान में विद्यमान कामकला के अन्तर्गत सपरार्धकला स्वरूप वह्नि, सूर्य और सोम नामक तीन कुण्डलिनियाँ हैं। पहले (१।२५) बताई गई पद्धति से अकुल से बिन्दु पर्यन्त नौ स्थानों में भावित त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों का एक एक बीज और कुण्डलिनी में तीन तीन विभाग कर नाद रूप से संयोजित करने को ही यहाँ जप कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि त्रैलोक्यमोहन आदि तीन चक्रों को आधारस्थ वह्निमण्डल में विद्यमान वाग्भव बीज के शिखर में स्थित कामकला के अन्तर्गत हार्धकलारूप वह्नि- कुण्डलिनी के उत्थान से वहाँ से उठकर हृत्स्थानगत कामराज बीजपर्यन्त व्याप्त नादमयता की भावना का नाम वाग्भव बीज का जप है। सर्वसौभाग्यदायक आदि तीन चक्रों की हृदयस्थ सूर्यमण्डल में विद्यमान कामराज बीज के शिखर में स्थित कामकला के अन्तर्गत हार्धकलारूप सूर्यकुण्डलिनी के उत्थान से वहाँ से उठकर बिन्दुस्थानगत शक्तिबीज पर्यन्त व्याप्त नादमयता की भावना का नाम कामराज बीज का जप है। सर्वरोगहर आदि तीन चक्रों की बिन्दुस्थान स्थित चन्द्रमण्डल में विद्यमान शक्तिबीज के शिखर में स्थित कामकला के अन्तर्गत हार्धकलारूप सोमकुण्डलिनी के उत्थान से वहाँ से उठकर ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर स्थित शिवतत्त्व से अतीत समना की सीमा तक व्याप्त नाद की उन्मना शक्ति में लीन होने की भावना का नाम शक्तिबीज का जप कहलाता है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने इस विषय में कहा है— १. कुण्डलीनां-ख. झ. उ. । २. नादिचक्रत्रय-क. ग. । ३. वह्निकुण्डली-क. ग. ज. । ४. हृत्स्थ-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. बिन्दुमण्डलान्तर्गत-क. ग. ने. । ६. 'कामकलान्तर्गत' नास्ति-क. ग. ने. । ७. बीजोच्चार-ख. ने. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

३६० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पिण्डो १वाचकविस्तरस्य महतः संस्कारशेषा२ स्थिति- र्नादोऽसौ तव देवि मूर्ध्नि समनासीमानमुल्लङ्घयन् । घण्टाक्वाण इव क्रमेण विरमन्नन्यामणीयस्तनी-३ माजिघ्रन् परचिद्दशामनुभवन् मूर्तिं पुराणीमुमे४ ॥ इति५ ॥१६९-१७०॥ ननु “दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त६ इष्यते” (१।२८) इत्यादि त्रिष्वपि बीजेषु७ उन्मनीपर्यन्तमुच्चारः किमिति नोक्तः ? प्राणादीनामुन्मन्यन्तानां द्वाद- शांशानां सर्वत्र साधारण्येन वक्तुं शक्यत्वादित्यत आह— तेषु प्राणाग्निमायार्णकलाबिन्द्वर्धचन्द्रकाः८ ॥१७०॥ रोधिनोनादनादान्ताः ९शक्तिर्व्यापिकयान्विता । वर्ण, पद, वाक्यरूप इस विशाल शब्द विस्तार की जहाँ संस्कार के रूप में स्थिति बनी रहती है, उसी का नाम पिण्ड है। इसको नाद भी कहते हैं। इसका भाव यह है कि नाद के रूप में परिणत हुए पिण्ड-मन्त्र में वर्ण, पद, वाक्यरूप शब्दप्रपंच की संस्कार के रूप में स्थिति रहती है, सारा शब्दप्रपंच यहाँ आकर शान्त हो जाता है। हे देवि उमे ! यह नाद ललाट से ऊपर बढ़ता हुआ जब समना की सीमा को लांघ कर उन्मना अवस्था में पहुँचता है, तब वह एक अनोखी सूक्ष्मतर अवस्था को स्पर्श करता हुआ परचिद् दशा रूप अपने पुराने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है। यह कैसे होता है ? इसका उदाहरण है—घण्टा-ध्वनि । जैसे घण्टे के बजने से उत्पन्न हुई ध्वनि धीरे-धीरे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती हुई सनसनाहट के रूप में बदल कर अन्ततः विलीन हो जाती है, उसी तरह से नाद भी समना पर्यन्त सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था में पहुँचता हुआ अन्त में उन्मना में विलीन हो जाता है, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥१६९-१७०॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि पहले (१।२८) बिन्दु से उन्मना पर्यन्त मात्राओं का उच्चा- रण काल आदि बताया गया है, यहाँ ऐसा क्यों नहीं किया गया ? प्राण से उन्मना पर्यन्त द्वादश मात्राओं का समान रूप से सर्वत्र वर्णन होना चाहिये था ? इस प्रश्न का समाधान करते हुए कहते हैं— इन तीनों बीजों में प्राण, अग्नि, मायार्ण नामक कला के साथ बिन्दु, अर्ध- चन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना—ये सब १. वाक्पद–ख. ने. झ. उ. । २. दोषा–ख. ने., दोषोत्थितिः–ज. । ३. स्तमा–क. ग. । ४. णीं मम–ख. ज. झ. उ. । ५. इत्यत्रैवोक्तम्–ज. विहाय सर्वत्र । ६. बिन्दुरि–ज. । ७. पोठेषु–ने., भेदेषु–झ. । ८. न्द्रिकाः–क. ग. । ९. शक्तिव्यापि- कलान्विताः–क. ग. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६१ समना चोन्मना चेति द्वादशान्ते स्थिता प्रिये ॥१७१॥ मूलकुण्डलिनीरूपे मध्यमे च ततः पुनः । सृष्ट्युन्मुखे च विश्वस्य स्थितिरूपे १महेश्वरि ॥१७२॥ केवलं नादरूपेण उत्तरोत्तरयोजनम् । शबलाकारके देवि तृतीये द्वादशी कला ॥१७३॥ तेषु त्रिष्वपि बीजेषु । प्राणो हकारः, अग्नी रेफः, मायार्ण ईकारः, स एव कला । तदुक्तं कामकलाविलासे— बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः । कामः कमनीयतया कला च दहनेन्दुविग्रहो बिन्दू ॥ (श्लो० ७) इति । बिन्द्वादय उन्मन्यन्ताः पूर्वोक्त(१।२८-३४)लक्षणाः । एते प्राणादय उन्म- न्यन्ता २द्वादशान्ते स्थिताः । ३मूलकुण्डलिनीरूपे वाग्भवबीजे, या मात्रा त्रपुसोलतातनुलसत्तन्तूत्थितिस्र्पधिनी वाग्बीजे प्रथमे स्थिता तव सदा तां मन्महे ते वयम् । हे प्रिये ! द्वादशान्त में स्थित हैं। मूल कुण्डलिनी रूप सृष्ट्युन्मुख वाग्भव बीज में और विश्व के स्थिति रूप मध्यम कामराज बीज में हे महेश्वरि ! केवल नाद- रूपता का उत्तर उत्तर बीज में संयोजन किया जाता है । हे देवि ! पूर्ववर्ती दोनों बीजों के संयोजन से शबल आकार वाले तृतीय बीज में ही बारहवीं कला (उन्मना) पर्यन्त उच्चारण होता है ॥१७०-१७३॥ ऊपर बताये गये तीनों बीजों में प्राण (हकार), अग्नि (रेफ) और मायार्ण (ईकार) की स्थिति रहती है । ईकार को ही कला कहा जाता है, जैसा कि कामकलाविलास में बताया गया है— यह श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल अहंकारस्वरूप है । इसका नाम रवि है । इसमें दोनों बिन्दु समरसभाव से रहते हैं । यह समरसभाव सबके लिये कमनीय (स्पृहणीय) है । इसलिये इसे काम भी कहते हैं। अग्नि और चन्द्र (अग्नीषोम) नामक दो बिन्दु इस काम की कलाएँ कहलाती हैं ॥ बिन्दु से उन्मनी पर्यन्त कलाओं का स्वरूप पहले (१।२८-३४) बताया जा चुका है । प्राण से उन्मनी पर्यन्त सबकी स्थिति द्वादशान्त में है। मूलकुण्डलिनी रूप वाग्भव बीज विश्व की सृष्टि के लिये उन्मुख रहता है । लघुस्तोत्र में इसका वर्णन करते हुए कहा गया है— हे भगवति त्रिपुरे ! ककड़ी की लता से निकल रहे सूक्ष्म तन्तुओं के समान कुटिल आकृति वाली ईकार स्वरूपिणी जो मात्रा तुम्हारे प्रथम वाग्भव बीज में स्थित है, उसी- १. परे-ख., तथे-ने. च. छ. ज. झ. उ. । २. द्वादश-क. ने. उ. । ३. कुल-ने. ।

३६२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः शक्तिः कुण्डलिनीति विश्वजननव्यापारबद्धोद्यमा ज्ञात्वेत्थं न पुनः स्पृशन्ति जननीगर्भेऽर्भकत्वं नराः ॥ (श्लो० २) इति लघुस्तोत्रोक्तरीत्या विश्वस्य सृष्ट्युन्मुखे, मध्यमे कामराजबीजे विश्वस्य स्थितिरूपे, संहारसृष्ट्योर्मध्यस्थितत्वात् । केवलं नादरूपेण नादाद्युन्मन्यन्तावय- वोच्चारवर्जं नादमात्ररूपेण । उत्तरोत्तरयोजनम्, उच्चारक्रियाविशेषणम् । वाग्भव- बीजशिखरवत्तिनं नादं हृद्गतकामराजबीजपर्यन्तमुच्चरेत्, कामराजबीजशिखर- वर्तिनं नादं बिन्दुस्थानगतशक्तिबीजपर्यन्तमुच्चरेदित्यर्थः । शबलाकारके एत- द्वीजद्वयनादद्वययोगान्मिश्ररूपे तृतीये शक्तिबीजे द्वादशी कला ^१उन्मना, स्थिते- त्यनुषङ्गः । तेन प्राणादयो द्वादशकला अपि तृतीयबीजशिखरे स्थिता उच्चार्या इति लभ्यते । कोऽर्थः ? यद्यपि ^२वाग्भवकामराजशक्तिबीजत्रयाणामप्यन्ते प्राणाग्निमायाबिन्द्वर्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनाख्या द्वादश- कला वक्तुं शक्यन्ते, तथापि वाग्भवकामराजबीजयोः^३ सृष्टिस्थितिरूपत्वान्न विश्वातीतोन्मनापर्यन्तमुच्चारः । अतो न विरोध इत्यर्थः ॥ १७०-१७३ ॥ को हम तुम्हारे भक्तगण वास्तविक मात्रा मानते हैं। यही कुण्डलिनी शक्ति है। विश्व की उत्पत्ति के व्यापार में यह सचेष्ट रहती है। ऐसा जान लेने पर मनुष्य फिर जननी के गर्भ में बच्चे के रूप में जन्म नहीं लेता ॥ मध्यम कामराज बीज स्थितिरूप है, क्योंकि संहार और सृष्टि के मध्य में इसकी स्थिति है। इन दोनों बीजों में नाद से उन्मनी पर्यन्त कलाओं का उच्चारण किये बिना प्रथम से उत्तर बीज में केवल सामान्य नाद का संयोजन किया जाता है। अर्थात् वाग्भव बीज के शिखरवर्ती नाद को हृदयगत कामराज बीज पर्यन्त पहुँचा दिया जाता है और कामराज बीज के शिखरवर्ती नाद को बिन्दुस्थान गत शक्तिबीज पर्यन्त उच्चारित किया जाता है। इन दोनों बीजों के दोनों नादों के मिलन से तृतीय शक्तिबीज का स्वरूप शबल (मिश्रित) आकार का हो जाता है। नाद की बारहवीं कला वस्तुतः यहीं रहती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राण आदि बारह कलाओं का उच्चारण तृतीय बीज के शिखर स्थान में ही करना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि वाग्भव, कामराज और शक्ति, तीनों बीजों के अन्त में प्राण, अग्नि, माया, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और उन्मना नामक बारह कलाओं का उच्चारण किया जा सकता है, तो भी वाग्भव और कामराज बीज सृष्टि और स्थिति रूप हैं, अतः इनका विश्वातीत्त उन्मना पर्यन्त उच्चारण नहीं किया जाता। इस तरह से पूर्वापर ग्रन्थ में यहाँ किसी प्रकार के विरोध की आशंका नहीं करनी चाहिये ॥१७०-१७३॥ १. उन्मनी-ख. ने. ज. झ. । २. 'वाग्भव''''तथापि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ३. योः प्राणादय उन्मन्यन्तास्तथापि तयोः सृष्टि-ख. ने. ज. झ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६३ जपकाले¹ भाव्यानाह— शून्यषट्कं ²तथा देवि ह्यवस्थापञ्चकं पुनः। विषुवं³ सप्तरूपं च भावयन् मनसा जपेत् ॥१७४॥ ⁴जपकाले एतानि विद्यावयवेषु भाव्यानि। शिखि⁵पक्षचित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम्। ध्यायतोऽनुत्तरे ⁶शून्ये ⁷परं व्योमतनुर्भवेत् ॥ (श्लो० ३२) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोकरीत्या शून्यषट्कस्य रूपं ज्ञेयम्। अवस्थापञ्चकं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुर्यतुर्यातीतात्मकम्। एषां जाग्रदादीनां स्वरूपं वक्ष्यति (३।१७६- १८१), ⁸विषुवं सप्तरूपं च वक्ष्यति (३।१८१-१८७) ॥१७४॥ ⁹शून्यादीनां स्थानानि स्वरूपाणि च क्रमेणाह— अग्न्यादिद्वादशान्तेषु¹⁰ त्रींस्त्रीन् त्यक्त्वा वरानने। शून्यत्रयं विजानीयादेकैकान्तरतः¹¹ प्रिये ॥१७५॥ शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं विभावयेत्। जप के समय इनकी भावना करनी चाहिये— हे देवि ! शून्यषट्क की तथा अवस्थापंचक को एवं सप्तविध विषुव की जप करते समय मन से भावना करनी चाहिये ॥१७४॥ जप करते समय विद्या के अवयवों में इनकी भावना करनी चाहिये। शून्यषट्क का स्वरूप विज्ञानभैरव भट्टारक ने इस तरह से बताया है— मयूर के पंख के चित्र-विचित्र चन्द्रकों में जैसे पाँच शून्य दिखाई पड़ते हैं, उसी तरह से पंचेन्द्रिय मण्डल से चित्र-विचित्र भासमान शून्यपंचक रूप जगत् को अनुत्तर शून्य में विलीन कर देने वाला योगी परभैरव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है ॥ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्य और तुर्यातीत ये पाँच अवस्थाएँ हैं। इनका स्वरूप अभी आगे बताया जायगा। सात विषुवों का स्वरूप भी यहीं आगे बताया जा रहा है ॥१७४॥ पहले छः शून्यों के स्थान और स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं— हे वरानने ! अग्न्यादि (हकार) से द्वादशान्त (उन्मना) पर्यन्त स्थानों में तीन तीन को छोड़कर तीन शून्य जाने। हे प्रिये ! इसी तरह से एक एक के अन्तराल १. कालां भावनामाह-ख. ज. झ. ड. । २. सुरेशानि-ख. च. छ. ज. झ. । ३. विषुवत्-ख. ने. च. छ. ज. झ. ड. । ४. जपकाल इति केवलं जमातृकायाम् । ५. पिच्छ- क. ग. । ६. शून्यं-ख. ने. ज. झ. ड. । ७. रूपं-क. ग. । ८. विषुवत्-ख. ने. झ. ड. । ९. शून्यानां-ख. ने. झ. ड. । १०. शांतेषु-ख. ने. च. ड. । ११. रितं-क. ग. ज. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

३६४ योगिनोहृदयम् [ पूजासंकेतः एकश्च एकश्च द्वयोर्द्वयोरन्तरत¹ इत्यर्थः । अग्न्यादि अग्निः रेफः, तदादीन् त्रीन् त्रीन् षट् त्यक्त्वा, शून्यत्रयं षट् शून्यानि, विजानीयात् । कोऽर्थः ? हकार- मायाक्षरयोर्मध्ये रेफम्², मायार्धचन्द्रयोर्मध्ये बिन्दुम्², अर्धचन्द्रनादयोर्मध्ये रोधि- नीम्², नादशक्त्योर्मध्ये नादान्तम्², शक्तिसमनयोर्मध्ये व्यापिकाम्², समनोर्ध्वे चोन्मना²मिति षट् त्यक्त्वा । तत्र रेफबिन्दुरोधिनीनादान्तव्यापिकास्थानेषु पञ्चसु "शिखिपक्षचित्ररूपैः" (श्लो० ३२) इत्यादिपूर्वोक्तरीत्या बर्हिबर्हगतचन्द्रक³- सदृशरूपाणि पञ्च शून्यानि ⁴भावनीयानीत्यर्थः । षष्ठोन्मनास्थाने तु "पञ्च- व्योमतनुर्भवेत्" (श्लो० ३२) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्यैव व्योमतनु शून्यं ज्ञेयमित्यन्यश्च⁶ विशेषः । शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं निराकारं विभावयेदित्यर्थः ॥१७५-१७६॥ में भी तीन शून्यों की स्थिति है। (प्रथम) शून्यत्रय से आगे के स्थान में, अर्थात् उन्मना स्थित तृतीय शून्य में महाशून्य की भावना करे ॥१७५-१७६॥ 'एकैकान्तरतः' इस पद में एक और एक मिलकर दो होता है। इसका अर्थ होगा दो दो के अन्तराल से । अग्नि रेफ को कहते हैं। ¹रेफ का आदि हकार है। हकार से तीन तीन को छोड़कर छः शून्यों की भावना करे। इसका अभिप्राय यह है कि हकार और मायाक्षर के बीच में रेफ को, माया और अर्धचन्द्र के बीच में बिन्दु को, अर्धचन्द्र और नाद के बीच में रोधिनी को, नाद और शक्ति के बीच में नादान्त को, शक्ति और समना के बीच में व्यापिका को और समना के ऊपर उन्मना को—इस तरह से छः स्थानों को भली भाँति जानकर उनमें छः शून्यों की भावना करनी चाहिये । इनमें से रेफ, बिन्दु, रोधिनी, नादान्त और व्यापिका नामक पाँच स्थानों में विज्ञानभैरव भट्टारक के अभी अभी उद्धृत वचन के अनुसार मोर के पंख में विद्यमान चंदवों के समान आकार वाले पाँच शून्यों की भावना करनी चाहिये । षष्ठ उन्मना स्थान में विज्ञानभैरव भट्टारक की ही पद्धति पर परमाकाश रूप षष्ठ शून्य की भावना करे । अन्य पाँच शून्यों से इस षष्ठ शून्य की यही विशेषता है कि शून्यत्रय से पर स्थान में, अर्थात् उन्मना स्थित षष्ठ शून्य में निराकार महाशून्य के रूप में इसकी भावना करनी चाहिये ॥१७५-१७६ ॥ १. रन्तर इ-क. ग. ज. झ. । २. रेफः, बिन्दुः, रोधिनी, नादान्तः, व्यापिका, उन्मना-इत्येवं सर्वत्र प्रथमान्तः पाठः-क. ग. ज. । ३. चन्द्रिका-क., चन्द्रकला-उ. । ४. भाव्यानी-ख. ने. उ. । ५. पञ्च ˙˙˙˙'परे स्थाने' नास्ति-क. ग. ने. । ६. मित्यन्य- शेषः-ख., मित्यस्य शेषः-ज. ।

  1. हकार का ग्रहण करने पर ही पहली आवृत्ति में तीन तीन को छोड़ कर तीन शून्य बनेंगे तथा दूसरी आवृत्ति में एक एक को छोड़ कर तीन शून्य बनेंगे । इस तरह से छः शून्य बन जायंगे । इनमें से पाँच शून्य सामान्य हैं और अन्तिम को महाशून्य कहा गया है । यह महाशून्य प्रथम आवृत्ति के तीन शून्यों में से अन्तिम है । दीपिका की पद-

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६५ इदानीमवस्थापञ्चकभावनां क्रमेण विवक्षन्नादौ जागरितावस्थाभावना- माह— प्रबोधकरणेष्व१ऽथ जागरत्वेन भावनम् ॥१७६॥ वह्नौ देवि महाजाग्रदवस्था त्विन्द्रियद्वयैः । इन्द्रियद्वयैः ज्ञानकर्मेन्द्रियद्वयैः२ दशैन्द्रियैः, प्रमातु३र्व्यवहारो जागरणणं प्रबोधो जागर इत्युच्यते । ४तत्करणस्य प्रकाशस्य जागरत्वेन भावनम् । ५अन्तः- प्रकाशके वह्नौ तार्तीयबीज६शिखरवर्तिनि रेफे, महाजाग्रदवस्था सार्वकालिक- निद्राक्षयलक्षणा परप्रबोधदशा भावनीयेत्यर्थः ॥१७६-१७७॥ अब पाँच अवस्थाओं की भावना का क्रमशः वर्णन करना चाहते हैं । सबसे पहले उनमें से जागरित अवस्था की भावना बताते हैं— ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के द्वारा प्रबोध के करण प्रकाश की जागरा- वस्था के रूप में भावना की जाती है । अतः हे देवि ! वह्नि में महाजाग्रदवस्था की भावना करनी चाहिये ॥१७६-१७७॥ इन्द्रियद्वय का अर्थ है ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय नामक दस इन्द्रियाँ । इनकी सहा- यता से जो प्रमाता का व्यवहार चलता है, उसी को जागरण, प्रबोध, जागर आदि शब्दों से कहा जाता है । इस प्रबोध का करण प्रकाश है । इसी की जागर दशा के रूप में भावना की जाती है । इस प्रकाश का वाचक वर्ण वह्नि, अर्थात् तृतीय बीज के शिखर में स्थित रेफ है । इस रेफ में महाजाग्रदवस्था की भावना करनी चाहिये । ऐसा करने से सदा सदा के लिये निद्रा दशा समाप्त हो जाती है और परम प्रबोध की स्थिति सदा बनी रहती है ॥१७६-१७७॥ १. णार्थस्य-ख. ने. छ. ज. । २. न्द्रियैर्दशभिः प्र-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. जाग्रद् व्यव-क. ग. झ. उ. । ४. तत्कार-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अतः प्रकाशवाचके-क. ग. । ६. 'शिखर' नास्ति-ख. ने. झ. । व्याख्या से इसके अभिप्राय की संगति नहीं बैठ पाती । उक्त व्याख्या से मूल के अक्षरों की तथा दीपिका के अभिप्राय की संगति बैठ जाती है । जैसे कि हकार, रेफ, ईकार, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना—ये बारह स्थान हैं । इनमें प्रथम तीन के बाद बिन्दु की स्थिति है, द्वितीय तीन के बाद नादान्त की तथा तृतीय तीन के बाद उन्मना की स्थिति है । इस तरह से तीन तीन को छोड़ने पर तीन शून्य बन गये । एक एक को छोड़कर तीन शून्य बनाते समय हम पूर्व के तीन शून्य स्थानों को छोड़ देंगे । तब हकार के बाद रेफ में, अर्धचन्द्र के बाद रोधिनी में और शक्ति के बाद व्यापिका में तीन शून्यों की भावना करेंगे । इस क्रम से अन्ततः एक एक स्थान को छोड़ने पर छः शून्य बन जाते हैं और मूल श्लोक के पदों का लाक्षणिक अर्थ नहीं करना पड़ता ।

३६६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः स्वप्नभावनामाह— आन्तरैः करणैरेव १स्वप्नो मायावबोधनः ॥१७७॥ गलदेशे बाह्येन्द्रिय२रहितैरान्तरैः करणैर्मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्ताख्यैरेव व्यवहारः प्रमातुः स्वप्नः। स मायया तार्तीय३बोजस्थेन चतुर्थस्वरेण, अवगतबोधनः, तद्वाच्य इत्यर्थः। गलदेशे स्वप्नस्य स्थानम् ॥१७७-१७८॥ सुषुप्तिभावनामाह— सुषुप्तिस्तु लीनपूर्वस्य वेदनम्। अन्तःकरणवृत्तीनां लयतो विषयस्य तु ॥१७८॥ पूर्ववर्णानां विलोमेन भ्रूमध्ये बिन्दुसंस्थिता। स्वप्ने विद्यमानानामन्तःकरणवृत्तीनां लयतः सर्वेन्द्रियोपरतिः सुषुप्तिरिति हि लक्षणम्। अतो लीनपूर्वस्य देहाक्षादिषु४ क्रोडीकृतस्य ५लीनस्थितस्यैव स्वात्मनो वेदनं प्रकाशनं भवति। 'सुखमहमस्वाप्सम्' इति हि पश्चात् सुखमयं स्वात्मरूपं स्वप्न की भावना बताते हैं— केवल आन्तर इन्द्रियों से स्वप्न का व्यवहार चलता है। माया बीज इसका बोधक है। गल देश में इसकी स्थिति है ॥१७७॥ बाह्य इन्द्रियों से रहित केवल आन्तर करणों से, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त से जो प्रमाता का व्यवहार चलता है, उसे स्वप्न कहते हैं। तृतीय बीज में स्थित चतुर्थ स्वर मायाक्षर ईकार से इसका बोध होता है। इसकी भावना कण्ठ स्थान में की जाती है ॥१७७॥ सुषुप्ति की भावना बताते हैं— सुषुप्ति दशा में अपने विलीन स्वरूप का बोध होता है। यहाँ अन्तःकरण की सभी वृत्तियाँ विलीन हो जाती हैं। तृतीय बीज के पूर्व वर्णों को विलोम क्रम से रखकर भ्रूमध्य में इसकी भावना की जाती है ॥१७८-१७९॥ स्वप्नदशा में अन्तःकरण की वृत्तियाँ काम करती रहती हैं। जब इन वृत्तियों का भी लोप हो जाता है, तो सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने व्यापार से उपरत हो जाती हैं। इसी स्थिति को सुषुप्ति दशा कहते हैं। इस दशा में देह, इन्द्रिय आदि में विलीन केवल स्वात्मस्वरूप का भान होता है। सोकर उठने के बाद 'मैं आराम से सोया' इस तरह १. स्वप्नमायावबोधकः-क. ग.। २. विरहितैः-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. यस्थाने ४. बोजे-घ.। ५. देहादिषु-ख. ने. ज. झ.। ६. लीनस्यैव-क. ग.।