अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
बालकाण्ड - सर्ग ५: मारीच और सुबाहुका दमन तथा अहिल्योद्धार
सर्ग ५ ] । बालकाण्ड । २१
ततोऽतिसुन्दरी यक्षी सर्वाभरणभूषिता ।
शापात्पिशाचतां प्राप्ता मुक्ता रामप्रसादतः ॥ ३१ ॥
नत्वा रामं परिक्रम्य गता रामाज्ञया दिवम् ॥ ३२ ॥
ततोऽतिहृष्टः परिरभ्य रामं
मूर्ध्न्यवघ्राय विचिन्त्य किञ्चित् ।
सर्वास्त्रजालं सरहस्यमन्त्रं
प्रीत्याऽभिरामाय ददौ मुनीन्द्रः ॥ ३३ ॥
विभूषिता परम सुन्दरी यक्षिणी हो गयी तथा रामचन्द्रजीकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणामकर उनकी आज्ञासे स्वर्गलोकको चली गयी ॥ ३१-३२ ॥ तब मुनिवर विश्वामित्रजीने अति हर्षित होकर रामजीका आलिंगन किया और उनका शिर सूँघकर कुछ सोच-विचारकर रहस्य और मन्त्रादिके सहित समस्त अस्त्र-शस्त्र प्रीतिपूर्वक अभिराम रामको दिये ॥ ३३ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चम सर्ग
मारीच और सुबाहुका दमन तथा अहक्योद्धार
श्रीमहादेव उवाच
तत्र कामाश्रमे रम्ये कानने मुनिसङ्कुले ।
उषित्वा रजनीमेकां प्रभाते प्रस्थिताः शनैः ॥ १ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदुपरात्त विश्वामित्रजीके सहित वे दोनों भाई एक रात मुनिजनसंकुलित अति सुन्दर उस कामा श्रम नामक वनमें रहकर प्रातःकाल होते ही धीरे-धीरे वहाँसे चले ॥ १ ॥
सिद्धाश्रमं गताः सर्वे सिद्धचारणसेवितम् ।
विश्वामित्रेण संदिष्टा मुनयस्तन्निवासिनः ॥ २ ॥
पूजां च महतीं चक्रू रामलक्ष्मणयोर्द्रुतम् ।
श्रीरामः कौशिकं प्राह मुने दीक्षां प्रविश्यताम् ॥ ३ ॥
दर्शयस्व महाभाग कुतस्तौ राक्षसाधमौ ।
तथेत्युक्त्वा मुनिर्यष्टुमारेभे मुनिभिः सह ॥ ४ ॥
तब वे सब सिद्ध और चारणोंसे सेवित सिद्धाश्रमपर आये । वहाँके रहनेवाले मुनिजनोंने विश्वामित्रजीकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक राम और लक्ष्मणका बड़ा सत्कार किया । तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने विश्वामित्रजीसे कहा—"हे मुने ! आप दीक्षामें स्थित होइये ॥ २-३ ॥ और हे महाभाग ! हमें केवल यह दिखा दीजिये कि वे राक्षसाधम कहाँ हैं ?" तब मुनिवरने 'बहुत अच्छा' कहकर अन्य मुनियोंके साथ यज्ञ करना आरम्भ कर दिया ॥ ४ ॥
मध्याह्ने ददृशाते तौ राक्षसौ कामरूपिणौ ।
मारीचश्च सुबाहुश्च वर्षन्तौ रुधिरास्थिनी ॥ ५ ॥
मध्याह्नके समय मारीच और सुबाहु नामक वे दोनों कामरूपी राक्षस रक्त और अस्थियोंकी वर्षा करते दिखायी दिये ॥ ५ ॥
रामोऽपि धनुरवादाय द्वौ बाणौ सन्दधे सुधीः ।
आकर्णान्तं समाकृष्य विससर्ज तयोः पृथक् ॥ ६ ॥
बुद्धिमान् रामने भी दो बाण लेकर धनुषपर चढ़ाये और कर्णपर्यन्त खींचकर अलग-अलग उन दोनों राक्षसोंकी ओर छोड़े ॥ ६ ॥
तयोरेकस्तु मारीचं भ्रामयञ्छतयोजनम् ।
पातयामास जलधौ तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ७ ॥
उनमेंसे एक बाणने मारीचको आकाशमें घुमाते हुए सौ योजनकी दूरीपर समुद्रमें गिरा दिया । यह एक बड़ा ही आश्चर्य-सा हो गया ॥ ७ ॥
द्वितीयोऽग्निमयो बाणः सुबाहुमजयत्क्षणात् ।
अपरे लक्ष्मणेनाशु हतास्तदनुयायिनः ॥ ८ ॥
दूसरे अग्निमय बाणने क्षणभरमें सुबाहुको भस्म कर डाला तथा जो उनके अन्यान्य अनुयायी थे उन सबको तुरन्त ही लक्ष्मणजीने मार डाला ॥ ८ ॥
| २२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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पुष्पौघैराकिरन्देवा राघवं सहलक्ष्मणम्।<br>देवदुन्दुभयो नेदुस्तुष्टुवुः सिद्धचारणाः ॥ ९॥<br>विश्वामित्रस्तु संपूज्य पूजाहं रघुनन्दनम्।<br>अङ्के निवेश्य चालिङ्ग्य भक्त्या बाष्पाकुलेक्षणः १०<br>भोजयित्वा सह भ्रात्रा रामं पक्वफलादिभिः।<br>पुराणवाक्यैर्मधुरैर्निनाय दिवसत्रयम् ॥११॥<br>चतुर्थेऽहनि संप्राप्ते कौशिको राममब्रवीत् ।<br>राम राम महायज्ञं द्रष्टुं गच्छामहे वयम् ॥१२॥<br>विदेहराजनेगरे जनकस्य महात्मनः।<br>तत्र माहेश्वरं चापमस्ति न्यस्तं पिनाकिना ॥१३॥<br>द्रक्ष्यसि त्वं महासत्त्वं पूज्यसे जनकेन च।<br>इत्युक्त्वा मुनिभिस्ताभ्यां ययौ गङ्गासमीपगम् १४<br>गौतमस्याश्रमं पुण्यं यत्राहल्यास्थिता तपः।<br>दिव्यपुष्पफलोपेतपादपैः परिवेष्टितम् ॥१५॥ | | उस समय देवताओंने लक्ष्मणजीके सहित श्रीरघुनाथजीपर फूल बरसाये और देवदुन्दुभि आदि बाजोंका घोष किया तथा सिद्ध और चारणगण उनकी स्तुति करने लगे ॥ ९॥ विश्वामित्रजीने पूजनीय रघुनाथजीका भली प्रकार पूजन किया और उन्हें गोदमें ले नेत्रोंमें भक्तिपूर्वक प्रेमाश्रु भरकर गले लगा लिया ॥ १०॥ फिर भाई लक्ष्मणके सहित रामको पके फल आदि खिलाकर पुराण और इतिहासादिकों मधुर कथाएँ सुनाते हुए तीन दिन बिताये ॥ ११ ॥ चौथा दिन आनेपर विश्वामित्रजीने रामसे कहा-"हे राम ! महात्मा जनकजीका बड़ा भारी यज्ञ देखनेके लिये हम-लोग जनकपुर चलेंगे। वहाँ श्रीमहादेवजीका धरोहरके रूपमें रखा हुआ एक बड़ा भारी धनुष है ॥१२-१३॥ उस सुदृढ़ धनुषको तुम देखोगे और महाराज जनक तुम्हारा भली प्रकार सत्कार करेंगे।" विश्वामित्र-जी इस प्रकार कह मुनियोंको और राम-लक्ष्मणको साथ ले गङ्गाजीके निकट मुनिश्रेष्ठ गौतमजीके उस पवित्र आश्रमपर आये जो दिव्य और पवित्र फलों-वाले वृक्षोंसे घिरा हुआ था और जहाँ अहल्या तप कर रही थी ॥ १४-१५ ॥ मृगपक्षिगणैर्हीनं नानाजन्तुविवर्जितम् ।<br>दृष्ट्वोवाच मुनिं श्रीमान् रामो राजीवलोचनः ॥१६॥<br>कस्यैतदाश्रमपदं भाति भास्वच्छुभं महत् ।<br>पत्रपुष्पफलैर्युक्तं जन्तुभिः परिवर्जितम् ॥१७॥<br>आह्लादयति मे चेतो भगवन् ब्रूहि तत्त्वतः ॥१८॥ | | कमलनयन श्रीमान् रामजीने उस आश्रमको मृग, पक्षी तथा नाना प्रकारके जीवोंसे रहित देख मुनिवर कौशिकसे कहा ॥ १६ ॥ "यह पत्र, पुष्प और फल आदिसे सम्पन्न तथा जीवशून्य महान् आश्रम जो बड़ा सुन्दर, रमणीय और पवित्र दीख पड़ता है, किसका है ? भगवन् ! इसे देखकर मेरा चित्त अति आह्लादित हो रहा है; आप इसका सब वृत्तान्त यथावत् कहिये ॥ १७-१८ ॥ विश्वामित्र उवाच<br>शृणु राम पुरा वृत्तं गौतमो लोकविश्रुतः ।<br>सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठस्तपसाराधयन् हरिम् ॥१९॥<br>तस्मै ब्रह्मा ददौ कन्यामहल्यां लोकसुन्दरीम् ।<br>ब्रह्मचर्येण सन्तुष्टः शुश्रूषणपरायणाम् ॥२०॥<br>तया सार्द्धमिहावात्सीद्गौतमस्तपतां वरः ।<br>शक्रस्तु तां धर्षयितुमन्तरं प्रेप्सुरन्वहम् ॥२१॥ | | श्रीविश्वामित्रजी बोले—हे राम ! इस आश्रमका पूर्व-वृत्तान्त सुनो। पहले इस आश्रममें जगद्विख्यात धार्मिक-श्रेष्ठ मुनिवर गौतमजी तपस्याद्वारा श्रीहरिकी आराधना करते हुए रहते थे ॥ १९ ॥ उनके ब्रह्मचर्यसे सन्तुष्ट होकर भगवान् ब्रह्माजीने उनकी सेवाके लिये उन्हें अहल्या नामकी एक लोक-सुन्दरी सेवा-परायणा कन्या दी ॥ २० ॥ और तापसप्रवर गौतमजी उस अहल्याके साथ यहाँ रहने लगे, इधर देवराज इन्द्र अहल्याके रूप-लावण्यपर मुग्ध होकर नित्य-प्रति उसके साथ रमण करनेका अवसर देखने लगे ॥२१॥
सर्ग ५] बालकाण्ड २३
| कदाचिन्मुनिवेषेण गौतमे निर्गते गृहात् ।<br>धर्षयित्वाऽथ निरगाच्चरितं मुनिरप्यगात् ॥२२॥<br>दृष्ट्वा यान्तं स्वरूपेण मुनिः परमकोपनः ।<br>पप्रच्छ कस्त्वं दुष्टात्मन्मम रूपधरोऽधमः ॥२३॥<br>सत्यं ब्रूहि न चेद्भस्म करिष्यामि न संशयः ।<br>सोऽब्रवीद्देवराजोऽहं पाहि मां कामकिङ्करम् ॥२४॥<br>कृतं जुगुप्सितं कर्म मया कुत्सितचेतसा ।<br>गौतमः क्रोधताम्राक्षः शशाप दिविजाधिपम् ॥२५॥<br>योनिलम्पट दुष्टात्मन्सहस्रभगवान्भव ।<br>शप्त्वा तं देवराजानं प्रविश्य स्वाश्रमं द्रुतम् ॥२६॥<br>दृष्ट्वाऽहल्यां वेपमानां प्राञ्जलिं गौतमोऽब्रवीत् ।<br>दुष्टे त्वं तिष्ठ दुर्वृत्ते शिलायामाश्रमे मम ॥२७॥<br>निराहारा दिवारात्रं तपः परममास्थिता ।<br>आतपानिलवर्षादिसहिष्णुः परमेश्वरम् ॥२८॥<br>ध्यायन्ती राममेकाग्रमनसा हृदि संस्थितम् ।<br>नानाजन्तुविहीनोऽयमाश्रमो मे भविष्यति ॥२९॥<br>एवं वर्षसहस्रेषु ह्यनेकेषु गतेषु च ।<br>रामो दाशरथिः श्रीमानागमिष्यति सानुजः ॥३०॥<br>यदा त्वदाश्रयशिलां पादाभ्यामाक्रमिष्यति ।<br>तदैव धूतपापा त्वं रामं संपूज्य भक्तितः ॥३१॥<br>परिक्रम्य नमस्कृत्य स्तुत्वा शापाद्विमोक्ष्यसे ।<br>पूर्ववन्मम शुश्रूषां करिष्यसि यथासुखम् ॥३२॥<br>इत्युक्त्वा गौतमः प्रागाद्धिमवन्तं नगोत्तमम् ।<br>तदाद्यहल्या भूतानामदृश्या स्वाश्रमे शुभे ॥३३॥<br>तव पादरजःस्पर्शं काङ्क्षते पवनाशना ।<br>आस्तेऽद्यापि रघुश्रेष्ठ तपो दुष्करमास्थिता ॥३४॥<br>पावयस्व मुनेर्भार्यामहल्यां ब्रह्मणः सुताम् ।<br>इत्युक्त्वा राघवं हस्ते गृहीत्वा मुनिपुङ्गवः ॥३५॥ | एक दिन मुनिवर गौतमके बाहर चले जानेपर वह गौतमके रूपसे अहल्याके साथ रमण कर जल्दीसे वहाँसे चलता बना, इसी समय मुनि भी वहाँ लौट आये ॥२२॥ उसे अपना रूप धारण कर वहाँसे जाते देख गौतम मुनिने अत्यन्त कुपित होकर पूछा—"रे दुष्टात्मा ! रे अधम ! मेरे रूपको धारण करनेवाला तू कौन है ? ॥२३॥ सच-सच बता, नहीं तो मैं तुझे अभी भस्म कर दूँगा—इसमें सन्देह न करना।" तब वह बोला—"भगवन् ! मैं कामके वशीभूत देवराज इन्द्र हूँ, मेरी रक्षा कीजिये ॥२४॥ मुझ पापात्माने बड़ा घृणित कार्य किया है।" तब गौतमने क्रोधसे आँखें लाल कर देवराजको शाप दिया ॥२५॥ "हे दुष्टात्मन् ! तू योनि-लम्पट है इसलिये तेरे शरीरमें सहस्र भग हो जायँ।" इस प्रकार देवराजको शाप देकर मुनिने अपने आश्रममें प्रवेश किया तो देखा कि अहल्या भयसे काँपती हुई हाथ जोड़े खड़ी है। उसे देखकर गौतमने कहा—"हे दुष्टे ! तू मेरे आश्रममें शिलामें निवास कर ॥२६-२७॥ यहाँ तू निराहार रहकर धूप, वायु और वर्षा आदिको सहन करती हुई दिन-रात तपस्या कर और एकाग्रचित्तसे हृदयमें विराजमान परमात्मा रामका ध्यान कर। अबसे यह मेरा आश्रम विविध प्रकारके जीव-जन्तुओं-से रहित हो जायगा ॥२८-२९॥ इसी प्रकार कई हजार वर्ष बीत जानेपर यहाँ दशरथ-नन्दन श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मणके साथ आयेंगे ॥३०॥ जिस समय वे तेरी आश्रयभूत शिलापर अपने दोनों चरण रखेंगे उसी समय तू पाप-मुक्त हो जायगी, तथा भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका पूजन कर उनकी परिक्रमा और नमस्कारपूर्वक स्तुति कर शापसे छूट जायगी और फिर पूर्ववत् मेरी सुखपूर्वक सेवा करने लगेगी" ॥३१-३२॥ ऐसा कहकर महर्षि गौतम पर्वतश्रेष्ठ हिमालयपर चले गये। हे रघुश्रेष्ठ ! उसी दिनसे यह अहल्या वायु-भक्षण करती हुई कठोर तपस्यामें स्थित हो आपके चरण-रजके स्पर्शकी कामनासे आजतक प्राणियोंसे अलक्षिता रहकर अपने शुभ आश्रममें रहती है ॥३३-३४॥ हे राम ! अब तुम ब्रह्माजीकी पुत्री गौतम-पत्नी अहल्याका उद्धार करो।<br>मुनिवर विश्वामित्रजीने ऐसा कह रघुनाथजीका |
| २४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दर्शयामास चाहल्यामुग्रेण तपसा स्थिताम् ।<br>रामः शिलां पदा स्पृष्ट्वा तां चापश्यत्तपोधनाम् ३६<br>ननाम राघवोऽहल्यां रामोऽहमिति चाब्रवीत् ।<br><br>ततो दृष्ट्वा रघुश्रेष्ठं पीतकौशेयवाससम् ॥३७॥<br>चतुर्भुजं शङ्खचक्रगदापङ्कजधारिणम् ।<br>धनुर्बाणधरं रामं लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥३८॥<br>स्मितवक्त्रं पद्मनेत्रं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् ।<br>नीलमाणिक्यसङ्काशं द्योतयन्तं दिशो दश ॥३९॥<br>दृष्ट्वा रामं रमानाथं हर्षविस्फारितेक्षणा ।<br>गौतमस्य वचः स्मृत्वा ज्ञात्वा नारायणं परम् ॥४०॥<br>सम्पूज्य विधिवद्राममर्ध्यादिभिरनिन्दिता ।<br>हर्षाश्रुजलनेत्रान्ता दण्डवत्प्रणिपत्य सा ॥४१॥<br>उत्थाय च पुनर्द्दष्ट्वा रामं राजीवलोचनम् ।<br>पुलकाङ्कितसर्वाङ्गा गिरा गद्गदयैडत ॥४२॥<br><br>अहल्योवाच<br>अहो कृतार्थाऽस्मि जगन्निवास ते<br>पादाम्बुजसंलग्नरजःकणादहम् ।<br>स्पृशामि यत्पद्मजशङ्करादिभि-<br>र्विमृग्यते रन्धितमानसैः सदा ॥४३॥<br>अहो विचित्रं तव राम चेष्टितं<br>मनुष्यभावेन विमोहितं जगत् ।<br>चलस्यजस्रं चरणादिवर्जितः<br>सम्पूर्ण आनन्दमयोऽतिमायिकः ॥४४॥<br>यत्पादपङ्कजपरागपवित्रगात्रा<br>भागीरथी भवविरिञ्चिमुखान्पुनाति ।<br>साक्षात्स एव मम दृग्विषयो यदास्ते<br>किं वर्ण्यते मम पुराकृतभागधेयम् ॥४५॥<br>मर्त्यावतारे मनुजाकृतिं हरिं<br>रामाभिधेयं रमणीयदेहिनम् ।<br>धनुर्धरं पद्मविशाललोचनं<br>भजामि नित्यं न परान्मजिष्ये ॥४६॥ | हाथ पकड़ उन्हें उग्र तपमें स्थित अहल्याको दिखलाया । तब श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरणसे उस शिलाको स्पर्शकर तपस्विनी अहल्याको देखा ॥ ३५-३६ ॥ उसे देखकर भगवान् रामने 'मैं राम हूँ' ऐसा कहकर प्रणाम किया ।<br><br>तब अहल्याने रेशमी पीताम्बर धारण किये श्रीरघुनाथजीको देखा ॥ ३७ ॥ उनकी चारों भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे, कन्धेपर धनुष-बाण विराजमान थे तथा साथमें श्रीलक्ष्मणजी थे ॥ ३८ ॥ उनका मुख मुसकान-युक्त, नेत्र कमलदलके समान और वक्षःस्थल श्रीवत्साङ्कसे सुशोभित था । अपने नीलमणि-सदृश श्याम विग्रहसे वे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥ ३९ ॥ रमानाथ श्रीरामचन्द्रको देखकर अहल्याके नेत्र हर्षसे खिल गये और उसे मुनिवर गौतमके वाक्योंका स्मरण हो आया । तब उन्हें साक्षात् श्रीनारायण जान उस अनिन्दिताने अर्ध्यादिसे उनका विधिवत् पूजन किया और नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ४०-४१ ॥ फिर खड़ी होकर वह कमलनयन भगवान् रामको देख सर्वांगसे पुलकित हो गद्गदवाणीसे उनकी स्तुति करने लगी ॥ ४२ ॥<br><br>अहल्या बोली—हे जगन्निवास ! आपके चरण-कमलोंके रजःकणका स्पर्श कर आज मैं कृतार्थ हो गयी । अहो !(बड़े भाग्यकी बात है कि) आपके जिन पादार-विन्दोंका ब्रह्मा और शंकर आदि एकाग्र-चित्तसे सर्वदा अनुसन्धान किया करते हैं उन्हींका आज मैं स्पर्श कर रही हूँ ॥ ४३ ॥ हे राम ! आपकी लीलाएं बड़ी विचित्र हैं, आपके मानुष-भावसे सम्पूर्ण जगत् मोहित हो रहा है । आप पूर्णानन्दमय और अति मायावी हैं; क्योंकि चरणादिहीन होकर भी आप निरन्तर चलते रहते हैं ॥ ४४ ॥ जिनके चरण-कमलके परागसे पवित्र हुई श्रीगङ्गाजी शिव और ब्रह्मा आदि जगदीश्वरोंको भी पवित्र करती हैं, आज साक्षात् वे ही मेरे नेत्रोंके विषय हो रहे हैं—मैं अपने पूर्वकृत पुण्यकर्मोंका किस प्रकार वर्णन करूँ ? ॥ ४५ ॥ जिन्होंने परम सुन्दर मानव-देहसे मर्त्यलोकमें अवतार लिया है, मैं उन धनुषधारी कमलदल-लोचन भगवान् रामको सर्वदा भजती हूँ, और किसीको भी नहीं भजना चाहती ॥ ४६ ॥ |
| सर्ग ५ ] | बालकाण्ड | २५ |
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यत्पादपङ्कजरजः श्रुतिभिर्विमृग्यं<br>यन्नाभिपङ्कजभवः कमलासनश्च ।<br>यन्नामसाररसिको भगवान्पुरारि-<br>स्तं रामचन्द्रमनिशं हृदि भावयामि ॥४७॥ | जिनके चरण-कमलोंकी रजको श्रुति भी ढूँढ़ती रहती है, जिनकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमलसे ब्रह्माजी प्रकट हुए हैं तथा जिनके नामामृतके भगवान् शंकर रसिक हैं उन श्रीरामचन्द्रजीका मैं अपने हृदयमें अहर्निश ध्यान करती हूँ ॥ ४७ ॥ यस्यावतारचरितानि विरिञ्चिलोके<br>गायन्ति नारदमुखा भवपद्मजाद्याः ।<br>आनन्दजाश्रुपरिपिक्तकुचाग्रसीमा<br>वागीश्वरी च तमहं शरणं प्रपद्ये ॥४८॥ | जिनके अवतार-चरित्रोंका नारदादि देवर्षिगण, ब्रह्मा और महादेव आदि देवेश्वरगण तथा आनन्दाश्रुओंसे जिनके कुचमण्डल भीगे हुए हैं वे सरस्वतीजी भी ब्रह्मलोकमें निरन्तर गान किया करती हैं उन प्रभुकी मैं शरण लेती हूँ ॥ ४८ ॥ सोऽयं परात्मा पुरुषः पुराण<br>एकः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः ।<br>मायातनूं लोकविमोहनीयां<br>धत्ते परानुग्रह एष रामः ॥४९॥ | उन्हीं पुराण-पुरुष परमात्मा रामने संसारपर परम अनुग्रह करनेके लिये स्वयंप्रकाश, अनन्त और सबके आदिकारण होते हुए भी यह जगन्मोहन मायामय रूप धारण किया है ॥ ४९ ॥ अयं हि विश्वोद्भवसंयमाना-<br>मेकः स्वमायागुणविम्वितो यः ।<br>विरिञ्चिविष्ण्वीश्वरनामभेदान्<br>धत्ते स्वतन्त्रः परिपूर्ण आत्मा ॥५०॥ | जो अकेले ही संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाशके लिये अपनी मायाके गुणोंका आश्रयकर ब्रह्मा, विष्णु और महादेव नामक विभिन्न रूप धारण करते हैं वे स्वतन्त्र और परिपूर्ण आत्मा आप ही हैं ॥५०॥ नमोऽस्तु ते राम तवाङ्घ्रिपङ्कजं<br>श्रिया धृतं वक्षसि लालितं प्रियात् ।<br>आक्रान्तमेकेन जगत्त्रयं पुरा<br>ध्येयं मुनीन्द्रैरभिमानवर्जितैः ॥५१॥ | हे राम ! आपके जिन चरण-कमलोंको श्रीलक्ष्मीजी अपने वक्षःस्थलपर रखकर बड़े प्रेमसे लाड़ लड़ाती हैं, जिन्होंने पूर्वकालमें (बलि-बन्धनके समय ) एक ही पगमें सम्पूर्ण त्रिलोकी माप ली थी तथा अभिमान-हीन मुनिजन जिनका निरन्तर ध्यान किया करते हैं उन आपके चरण-कमलोंको मैं नमस्कार करती हूँ ॥५१॥ जगतामादिभूतस्त्वं जगत्त्वं जगदाश्रयः ।<br>सर्वभूतेष्वसंयुक्त एको भाति भवान्परः ॥५२॥ | हे प्रभो ! आप ही जगत्के आदिकारण, आप ही जगत्-रूप और आप ही उसके आश्रय हैं, तथापि आप समस्त प्राणियोंसे पृथक् हैं और अद्वितीय परब्रह्मरूपसे प्रकाशमान हैं ॥ ५२ ॥ ओंकारवाच्यस्त्वं राम वाचामविषयः पुमान् ।<br>वाच्यवाचकभेदेन भवानेव जगन्मयः ॥५३॥ | हे राम ! आप ओंकारके वाच्य हैं तथा आप ही वाणीके अगोचर परम पुरुष हैं । हे प्रभो ! वाच्य-वाचक (शब्द-अर्थ) भेदसे आप ही सम्पूर्ण जगत्-रूप हैं ॥ ५३ ॥ कार्यकारणकर्तृत्वफलसाधनभेदतः ।<br>एको विभासि राम त्वं मायया बहुरूपया ॥५४॥ | हे राम ! आप अकेले ही बहु-रूपमयी मायाके आश्रयसे कार्य, कारण, कर्त्तृत्व, फल और साधनादिके भेदसे अनेक रूपोंमें भासमान हो रहे हैं ॥ ५४ ॥ त्वन्मायामोहितधियस्त्वां न जानन्ति तत्त्वतः।<br>मानुषं त्वाभिमन्यन्ते मायिनं परमेश्वरम् ॥५५॥ | आपकी मायासे जिनकी बुद्धि मोहित हो रही है वे लोग आपका वास्तविक रूप नहीं जान सकते । आप मायापति परमेश्वरको वे मूढ़-जन साधारण मनुष्य समझते हैं ॥५५॥ आकाशवत्त्वं सर्वत्र बहिरन्तर्गतोऽमलः ।<br>असङ्गो ह्यचलो नित्यः शुद्धो बुद्धः सदव्ययः॥५६॥ | आप आकाशके समान बाहर-भीतर सब ओर विराजमान, निर्मल, असङ्ग, अचल, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सत्यस्वरूप और अव्यय हैं ॥ ५६ ॥ हे विभो ! मैं मूढ़ और अज्ञानी स्त्री-जाति
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| २६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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योपिन्मूढाऽहमज्ञा ते तत्त्वं जाने कथं विभो ।
तस्मात्ते शतशो राम नमस्कुर्यामनन्यधीः ॥५७॥
देव मे यत्र कुत्रापि स्थिताया अपि सर्वदा ।
त्वत्पादकमले सक्ता भक्तिरेव सदाऽस्तु मे ॥५८॥
नमस्ते पुरुषाध्यक्ष नमस्ते भक्तवत्सल ।
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश नारायण नमोऽस्तु ते ॥५९॥
भवभयहरमेकं भानुकोटिप्रकाशं
करधृतशरचापं कालमेघावभासम् ।
कनकरुचिरवस्त्रं रत्नवत्कुण्डलाढ्यं
कमलविशदनेत्रं सानुजं राममीडे ॥६०॥
भला आपके तत्त्वको क्या जानूँ ? अतः हे राम ! मैं अनन्यभावसे आपको सैकड़ों बार केवल नमस्कार ही करती हूँ ॥ ५७ ॥ हे देव ! मैं जहाँ-कहीं भी रहूँ वहीं सर्वदा आपके चरण-कमलोंमें मेरी आसक्तिपूर्ण भक्ति बनी रहे ॥ ५८ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है; हे भक्तवत्सल ! आपको नमस्कार है; हे हृषीकेश ! आपको नमस्कार है; हे नारायण ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ ५९ ॥ जो संसारके एकमात्र भय दूर करनेवाले हैं, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान हैं, कर-कमलोंमें धनुष और बाण धारण किये हैं, श्याम मेघके समान आभावाले हैं, सुवर्णके समान पीत वस्त्र धारण किये हैं, रत्न-जटित कुण्डलोंसे सुशोभित हैं, तथा जिनके कमल-दलके समान अति सुन्दर विशाल नेत्र हैं, भाई लक्ष्मणसहित उन श्रीरघुनाथजीकी मैं स्तुति करती हूँ ॥ ६० ॥
स्तुत्वैवं पुरुषं साक्षाद्राघवं पुरतः स्थितम् ।
परिक्रम्य प्रणम्याशु साऽनुज्ञाता ययौ पतिम् ॥६१॥
इस प्रकार सम्मुख खड़े हुए साक्षात् परमपुरुष श्रीरघुनाथजीकी स्तुति, परिक्रमा और वन्दना कर वह उनकी आज्ञा ले शीघ्र ही अपने पतिके पास चली गयी ॥६१॥
अहल्या कृतं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिसंयुतः ।
स मुच्यतेऽखिलैः पापैः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥६२॥
पुत्रार्थ्ये पठेद्भक्त्या रामं हृदि निधाय च ।
संवत्सरेण लभते वन्ध्या अपि सुपुत्रकम् ॥६३॥
सर्वान्कामानवाप्नोति रामचन्द्रप्रसादतः ॥६४॥
जो पुरुष अहल्याके किये हुए इस स्तोत्रको भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर परब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है ॥ ६२ ॥ जो वन्ध्या स्त्री भी श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें धारणकर पुत्रकी कामनासे इसका भक्तिपूर्वक पाठ करे तो एक वर्षमें ही उसे श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हो सकता है तथा श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ६३–६४ ॥
ब्रह्मघ्नो गुरुतल्पगोऽपि पुरुषः
स्तेयी सुरापोऽपि वा
मातृभ्रातृविहिंसकोऽपि सततं
भोगैकबद्धाऽतुरः ।
नित्यं स्तोत्रमिदं जपन् रघुपतिं
भक्त्या हृदिस्थं स्मरन्
ध्यायन्मुक्तिमुपैति किं पुनरसौ
स्वाचारयुक्तो नरः ॥६५॥
ब्राह्मणका वध करनेवाला, गुरु-स्त्रीसे भोग करनेवाला, चोर, मद्यप, माता-पिता और भाईकी हिंसा करनेवाला तथा निरन्तर भोगासक्त रहनेवाला पुरुष भी यदि अपने हृदयमें विराजमान श्रीरघुनाथजीका भक्तिपूर्वक नित्य स्मरण करता है और उनका ध्यान करते हुए इस स्तोत्रका पाठ करता है तो मुक्त हो जाता है; फिर स्वधर्म-परायण पुरुषोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ६५ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे
अहल्योद्धरणं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
बालकाण्ड - सर्ग ६: धनुर्भङ्ग और विवाह
सर्ग ६ ] | बालकाण्ड | २७
षष्ठ सर्ग
धनुर्भङ्ग और विवाह ।
| सूत उवाच<br>विश्वामित्रोऽथ तं प्राह राघवं सहलक्ष्मणम् ।<br>गच्छामो वत्स मिथिलां जनकेनाभिपारिताम् ॥ १॥<br>दृष्ट्वा क्रतुवरं पश्चादयोध्यां गन्तुमर्हसि ।<br>इत्युक्त्वा प्रययौ गङ्गामुत्तर्तुं सहराघवः ।<br>तस्मिन्काले नाविकेन निषिद्धो रघुनन्दनः ॥ २॥<br><br>नाविक उवाच<br>क्षालयामि तव पादपङ्कजं<br>नाथ दारुदृषदोः किमन्तरम् ।<br>मानुषीकरणचूर्णमस्ति ते<br>पादयोरिति कथा प्रथीयसी ॥ ३॥<br>पादाम्बुजं ते विमलं हि कृत्वा<br>पश्चात्परं तीरमहं नयामि ।<br>नोचेत्तरी सद्युवती मलेन<br>स्याच्चेद्विभो विद्धि कुटुम्बहानिः ॥४॥<br>इत्युक्त्वा क्षालितौ पादौ परं तीरं ततो गताः ।<br>कौशिको रघुनाथेन सहितो मिथिलां ययौ ॥ ५॥<br>विदेहस्य पुरं प्रातर्ऋषिवाटं समाविशत् ।<br>प्राप्तं कौशिकमाकर्ण्य जनकोऽतिमुदान्वितः ॥ ६॥<br>पूजाद्रव्याणि संगृह्य सोपाध्यायः समाययौ ।<br>दण्डवत्प्रणिपत्याथ पूजयामास कौशिकम् ॥ ७॥<br>पप्रच्छ राघवौ दृष्ट्वा सर्वलक्षणसंयुतौ ।<br>द्योतयन्तौ दिशः सर्वाश्चन्द्र-सूर्याविवापरौ ॥ ८॥<br>कस्यैतौ नरशार्दूलौ पुत्रौ देवसुतोपमौ ।<br>मनःप्रीतिकरौ मेऽद्य नरनारायणाविव ॥ ९॥<br>प्रत्युवाच मुनिः प्रीतो हर्षयन् जनकं तदा ।<br>पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१०॥ | **सूतजी बोले—**तदनन्तर विश्वामित्रजीने लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीसे कहा, "वत्स ! अब हम महाराज जनकसे पालित मिथिलापुरीको चलेंगे ॥ १ ॥ वहाँ यज्ञोत्सव देखकर फिर तुम अयोध्यापुरीको लौट सकते हो।" ऐसा कह वे रघुनाथजीके साथ गङ्गाजी पार करनेके लिये तटपर आये, तब नाविकने रघुनाथजीको नावपर चढ़नेसे रोक दिया ॥ २ ॥<br><br>**नाविक बोला—**हे नाथ ! यह बात प्रसिद्ध है कि आपके चरणोंमें कोई मनुष्य बना देनेवाला चूर्ण है । (आपने अभी शिलाको स्त्री बना दिया, फिर) शिला और काष्ठमें भेद ही क्या है ? अतः नौकापर चढ़ाने-से पूर्व मैं आपके चरणकमलोंको धोऊँगा ॥ ३ ॥ इस प्रकार आपके चरणोंको मलरहित करके मैं आपको श्रीगङ्गाजीके उस पार ले चलूँगा । नहीं तो, हे विभो ! आपके चरण-रजके स्पर्शसे यदि मेरी नौका युवती हो गयी तो मेरे कुटुम्बकी आजीविका ही मारी जायगी ॥ ४ ॥ ऐसा कह केवटने उनके चरण धोये और फिर गङ्गाजीके पार ले गया । वहाँसे राम और लक्ष्मणके सहित श्रीविश्वामित्रजी मिथिलापुरी-को चले ॥ ५ ॥<br><br>प्रातःकाल होते ही वे विदेहनगरमें पहुँचकर ऋषियोंके निवास-स्थानमें ठहर गये । उसी समय, विश्वामित्रजीके आगमनकी सूचना पाकर जनकजी अत्यन्त प्रसन्नता-पूर्वक पूजन-सामग्री लिये अपने पुरोहितके साथ वहाँ आये, और साष्टांग दण्डवत् कर उन्होंने मुनिवर कौशिककी पूजा की ॥ ६-७ ॥ फिर साक्षात् दूसरे सूर्य और चन्द्रमाके समान अपने तेज-से सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए उन सर्व-लक्षण-सम्पन्न रघुकुमारोंको देखकर पूछा—॥ ८ ॥ "ये देवपुत्रोंके समान दो नरशार्दूल किसके पुत्र हैं; ये मेरे हृदयमें इस समय नर और नारायणके समान प्रीति उत्पन्न करते हैं" ॥ ९ ॥<br><br>तब मुनिवर विश्वामित्रजीने महाराज जनकको आनन्दित करते हुए प्रसन्नतापूर्वक कहा—"ये दोनों |
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| (संस्कृत) | (हिन्दी अनुवाद) |
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| मखसंरक्षणार्थाय मयानीतौ पितुः पुरात् ।<br>आगच्छन् राघवो मार्गे ताटकां विश्वघातिनीम् ११<br>शरेणैकेन हतवाबोदितो मेऽतिविक्रमः ।<br>ततो ममाश्रमं गत्वा मम यज्ञविहिंसकान् ॥१२॥<br>सुबाहुप्रमुखान्हत्वा मारीचं सागरेऽक्षिपत् ।<br>ततो गङ्गातटे पुण्ये गौतमस्याश्रमं शुभम् ॥१३॥<br>गत्वा तत्र शिलारूपा गौतमस्य वधूः स्थिता ।<br>पादपङ्कजसंस्पर्शात्कृता मानुषरूपिणी ॥१४॥<br>दृष्ट्वाहल्यां नमस्कृत्य तया सम्यक्प्रपूजितः ।<br>इदानीं द्रष्टुकामस्ते गृहे माहेश्वरं धनुः ॥१५॥<br>पूजितं राजभिः सर्वैरिष्टमित्यनुशुश्रुवे ।<br>अतो दर्शय राजेन्द्र शैवं चापमनुत्तमम् ॥<br>दृष्ट्वाऽयोध्यां जिगमिषुः पितरं द्रष्टुमिच्छति ॥१६॥<br><br>इत्युक्तो मुनिना राजा पूजार्हाविति पूज्य ।<br>पूजयामास धर्मज्ञो विधिदृष्टेन कर्मणा ॥<br>ततः सम्प्रेषयामास मन्त्रिणं बुद्धिमत्तरम् ॥१७॥<br><br>जनक उवाच<br>शीघ्रमानय विश्वेशचापं रामाय दर्शय ॥१८॥<br><br>ततो गते मन्त्रिवरे राजा कौशिकमब्रवीत् ।<br>यदि रामो धनुर्धृत्वा कोट्यामारोपयेद्गुणम् ॥१९॥<br><br>तदा मयाऽऽत्मजा सीता दीयते राघवाय हि।<br>तथेति कौशिकोऽप्याह रामं संवीक्ष्य सस्मितम् ॥२०॥<br><br>शीघ्रं दर्शय चापाग्र्यं रामायामिततेजसे ।<br>एवं ब्रुवति मौनीशे आगताश्चापवाहकाः ॥२१॥<br><br>चापं गृहीत्वा बलिनः पञ्चसाहस्रसङ्ख्यकाः ।<br>घण्टाशतसमायुक्तं मणिवज्रादिभूषितम् ॥२२॥ | भाई राम और लक्ष्मण कोशल-नरेश दशरथजीके पुत्र हैं ॥१०॥ मैं इन्हें अपने यज्ञकी रक्षाके लिये अयोध्यासे ले आया था । मार्गमें आते समय मेरी प्रेरणासे इन अति पराक्रमी रघुनाथजीने एक ही बाणसे विश्वघातिनी ताटकाको मार डाला, फिर मेरे आश्रममें पहुँचकर मेरा यज्ञविध्वंस करनेवाले सुबाहु आदि राक्षसोंको मार डाला, तथा मारीचको समुद्रमें फेंक दिया । नन्दनन्दन ये गङ्गातटपर महर्षि गौतमके पुनीत आश्रममें आये और वहाँ शिलारूपमें स्थित गौतम-पत्नीको देख अपने चरणकमलके स्पर्शसे उसे मनुष्यरूप बना दिया ॥११-१४॥ अहल्याको देखकर रामजीने उसे नमस्कार किया फिर उसने भली प्रकार पूजा ग्रहणकर इस समय तुम्हारे यहाँ शंकरका धनुष देखनेके लिये आये हैं ॥१५॥ हमने सुना है उस धनुषकी तुम्हारे यहाँ बड़ी पूजा होती है और सब राजा लोग उसे देख गये हैं । अतः हे राजेन्द्र ! आप महादेवजीका वह उत्तम धनुष इन्हें दिखा दीजिये, क्योंकि ये उसे देखकर शीघ्र ही अपने माता-पितासे मिलनेके लिये अयोध्या जाना चाहते हैं। १६<br><br>मुनिवर विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ राजा जनकने राम और लक्ष्मणको पूजनीय समझकर उनकी विधिपूर्वक पूजा की ॥१७॥ फिर अपने बुद्धिमान् मन्त्रीको यह कहकर भेजा कि तुम शीघ्र ही श्रीविश्वेश्वरका धनुष लाकर रामचन्द्रजीको दिखाओ ॥१८॥<br><br>मन्त्रीके चले जानेपर राजाने श्रीविश्वामित्रजीसे कहा, "यदि रामचन्द्रजी उस धनुषको उठाकर उसकी कोटियोंपर रोदा चढ़ा देंगे तो निश्चय मैं उन्हें ही अपनी कन्या सीता विवाह दूँगा ।" तब विश्वामित्रजीने रामजीकी ओर देखते हुए मुसकाकर कहा— "ठीक है ॥१९-२०॥ राजन् ! आप शीघ्र ही वह श्रेष्ठ धनुष अमित तेजसी रघुनाथजीको दिखाइये ।" मुनीश्वरके ऐसा कहते ही बड़े बलवान् पाँच हजार धनुष-वाहक उस धनुष-श्रेष्ठको लेकर वहाँ आ पहुँचे । उस धनुषमें सैकड़ों घंटियाँ बँधी हुई थीं तथा वह हीरे और मणि आदि रत्नोंसे सुसज्जित था ॥२१-२२॥ तब परामर्श-दाताओंमें श्रेष्ठ उन मन्त्रि- |
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दर्शयामास रामाय मन्त्री मन्त्रयतां वरः।
दृष्ट्वा रामः प्रहृष्टात्मा बद्ध्वा परिकरं दृढम् ॥२३॥
गृहीत्वा वामहस्तेन लीलया तोलयन् धनुः।
आरोपयामास गुणं पश्यत्स्वखिलराजसु ॥२४॥
ईषदाकर्षयामास पाणिना दक्षिणेन सः।
बभञ्जाखिलहृत्सारो दिशः शब्देन पूरयन् ॥२५॥
दिशश्च विदिशश्चैव स्वर्गं मर्त्यं रसातलम्।
तदद्भुतमभूत्तत्र देवानां दिवि पश्यताम् ॥२६॥
आच्छादयन्तः कुसुमैर्देवाः स्तुतिभिरीडिरे।
देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥२७॥
द्विधा भग्नं धनुर्दृष्ट्वा राजाऽऽलिङ्ग्य रघूद्वहम्।
विस्मयं लेभिरे सीतामातरोऽन्तःपुराजिरे ॥२८॥
सीता स्वर्णमयीं मालां गृहीत्वा दक्षिणे करे।
स्मितवक्त्रा स्वर्णवर्णा सर्वाभरणभूषिता ॥२९॥
मुक्ताहारैः कर्णपत्रैः क्वणच्चरणनूपुरा।
दुकूलपरिसंवीता वस्त्रान्तर्व्यञ्जितस्तनी ॥३०॥
रामस्योपरि निक्षिप्य स्मयमाना मुदं ययौ।
ततो मुमुदिरे सर्वे राजदाराः स्वलङ्कृतम् ॥३१॥
गवाक्षजालरन्ध्रेभ्यो दृष्ट्वा लोकविमोहनम्।
ततोऽब्रवीन्मुनिं राजा सर्वशास्त्रविशारदः ॥३२॥
भो कौशिक मुनिश्रेष्ठ पत्रं प्रेषय सत्वरम्।
राजा दशरथः शीघ्रमागच्छतु सपुत्रकः ॥३३॥
विवाहार्थं कुमाराणां सदारः सहमन्त्रिभिः।
तथेति प्रेषयामास दूतांस्त्वरितविक्रमान् ॥३४॥
ते गत्वा राजशार्दूलं रामश्रेयो न्यवेदयन्।
श्रुत्वा रामकृतं राजा हर्षेण महताप्लुतः ॥३५॥
हिन्दी अनुवाद:
वरने रामको वह धनुष दिखाया। प्रसन्नचित्त श्रीरामजीने उसे देखते ही दृढ़तासे कमर कसकर उस धनुषको खेल करते हुए बाँये हाथसे उठाकर थाम लिया और सब राजाओंके देखते-देखते उसपर रोंदा चढ़ा दिया ॥२३-२४॥ फिर सबके हृदय-सर्वस्व भगवान् रामने अपने दाँये हाथसे उस धनुषको थोड़ा-सा खींचा और दशों दिशाओंको गुञ्जायमान करते हुए तोड़ डाला ॥२५॥ दिशा, विदिशा, स्वर्गलोक, मर्त्यलोक और रसातल आदि समस्त पातालोंमें वह शब्द गूँज उठा। स्वर्गलोकसे देवगणोंके देखते-देखते यह एक बड़ा आश्चर्य-सा हो गया ॥२६॥ देवताओंने पुष्प बरसाकर भगवान्को ढँक दिया और दुन्दुभी आदि बाजे बजाते हुए उनकी स्तुति की तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥२७॥
धनुषके दो खण्ड हुए देख महाराज जनकने रघुनाथजीका आलिङ्गन किया और अन्तःपुरके आँगनमें स्थित सीताजीकी माताएँ अत्यन्त विस्मित हुईं ॥२८॥ तत्पश्चात् सर्वालंकारविभूषिता, सुवर्णवर्णा श्रीसीताजी अपने दाहिने हाथमें सुवर्णमयी माला लिये मन्द-मन्द मुसकाती हुई वहाँ आयीं ॥२९॥ वे मुक्ताहार, कर्णफूल और झमझमाते हुए पायजेब आदि आभूषणोंसे विभूषिता थीं तथा शरीरमें अति उत्तम साड़ी पहिने हुए थीं जिसमेंसे उनके पीन-पयोधर झलक रहे थे ॥३०॥
सीताजी नम्रतापूर्वक मुसकाते हुए वह जयमाल रामचन्द्रजीके ऊपर डालकर प्रसन्न हुईं। उस समय श्रीरामचन्द्रजीके सर्वांलंकारविभूषित भुवनमोहन रूपको झरोखोंमेंसे देखकर समस्त रानियाँ अति आनन्दित हुईं। फिर सर्वशास्त्रज्ञ महाराज जनकने मुनिवर विश्वामित्रजीसे कहा ॥३१-३२॥ "मुनिवर कौशिकजी! आप तुरन्त ही महाराज दशरथके पास पत्र भेजिये; वे कुमारोंके विवाहोत्सवके लिये शीघ्र ही पुत्र, महिषियों और मन्त्रियोंके साथ यहाँ पधारें।" तब विश्वामित्रजीने 'बहुत अच्छा' कह शीघ्रगामी दूतोंको भेजा ॥३३-३४॥
दूतोंने जाकर राजशार्दूल दशरथसे रामका कुशल-क्षेम कहा। उनसे रामचन्द्रजीके अद्भुत कृत्यका वृत्तान्त सुनकर महाराज परमानन्दमें डूब गये ॥३५॥
| ३० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ६ |
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मिथिलागमनार्थाय त्वरयामास मन्त्रिणः।
गच्छन्तु मिथिलां सर्वे गजाश्वरथपत्तयः ॥३६॥
रथमानय मे शीघ्रं गच्छाम्यद्यैव मा चिरम्।
वसिष्ठस्त्वग्रतो यातु सदारः सहितोऽग्निभिः॥३७॥
राममातृः समादाय मुनिर्मे भगवान् गुरुः।
एवं प्रस्थाप्य सकलं राजर्षिर्विपुलं रथम् ॥३८॥
महत्या सेनया सार्धमारुह्य त्वरितो ययौ।
आगतं राघवं श्रुत्वा राजा हर्षसमाकुलः ॥३९॥
प्रत्युज्जगाम जनकः शतानन्दपुरोधसा।
यथोक्तपूजया पूज्यं पूजयामास सत्कृतम् ॥४०॥
रामस्तु लक्ष्मणेनाशु ववन्दे चरणौ पितुः।
ततो हृष्टो दशरथो रामं वचनमब्रवीत् ॥४१॥
दिष्ट्या पश्यामि ते राम मुखं फुल्लाम्बुजोपमम्।
मुनेरनुग्रहात्सर्वं सम्पन्नं मम शोभनम् ॥४२॥
इत्युक्त्वाऽऽघ्राय मूर्धानमालिङ्ग्य च पुनः पुनः।
हर्षेण महताऽऽविष्टो ब्रह्मानन्दं गतो यथा ॥४३॥
ततो जनकराजेन मन्दिरे सन्निवेशितः।
शोभने सर्वभोगाढ्ये सदारः ससुतः सुखी ॥४४॥
ततः शुभे दिने लग्ने सुमुहूर्ते रघूत्तमम्।
आनयामास धर्मज्ञो रामं सभ्रातृकं तदा ॥४५॥
रत्नस्तम्भसुविस्तारे सुविताने सुतोरणे।
मण्डपे सर्वशोभाढ्ये मुक्तापुष्पफलान्विते ॥४६॥
वेदविद्भिः सुसम्बाधे ब्राह्मणैः स्वर्णभूषितैः।
सुवासनीभिः परितो निष्ककण्ठीभिरावृते ॥४७॥
भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्गीतनृत्यैः समाकुले।
दिव्यरत्नान्विते स्वर्णपीठे रामं न्यवेशयत् ॥४८॥
वसिष्ठं कौशिकं चैव शतानन्दः पुरोहितः।
यथाक्रमं पूजयित्वा रामस्योभयपार्श्वयोः ॥४९॥
फिर अपने मिथिलापुरीको चलनेके लिये शीघ्रता करते हुए मन्त्रियोंसे कहा—"हाथी, घोड़े, रथ और पदातियोंके सहित सब लोग मिथिलापुरीको चलो ॥३६॥ मेरा रथ भी तुरन्त ले आओ, देरी न करो, मैं भी आज ही चलूँगा। अग्नियोंके सहित मेरे गुरु मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठजी रामकी माताओंको लेकर सबसे आगे चलें।" इस प्रकार सबका कूच करा एक विशाल रथपर आरूढ़ हो राजर्षि दशरथजी बड़े दल-बलके सहित शीघ्रतापूर्वक मिथिलापुरीको चले। रघुकुल-तिलक दशरथजीको आये हुए सुन महाराज जनक हर्ष-पूर्वक पुरोहित शतानन्दजीको ले उन्हें लेने गये और उन पूजनीय राजाका यथोचित रीतिसे सत्कार कर पूजन किया ॥३७—४०॥ तदनन्तर लक्ष्मणके सहित रामजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया; तब राजा दशरथने प्रसन्न होकर रामसे कहा—॥४१॥ "राम आज बड़े भाग्यसे मैं तुम्हारा विकसित कमलके समान मुख देख रहा हूँ; मुनिवरके अनुग्रहसे सब प्रकार मेरा कल्याण ही हुआ" ॥४२॥ ऐसा कह वे उन्हें पुनः पुनः हृदयसे लगा और उनका मस्तक सूँघ अत्यन्त हर्षसे मानों ब्रह्मानन्दमें डूब गये ॥४३॥ तदनन्तर महाराज जनकने उन्हें रानियों और राजकुमारोंके सहित समस्त भोग-सामग्रियोंसे पूर्ण एक परम सुन्दर महलमें सुख-पूर्वक ठहराया ॥४४॥
फिर शुभ दिनमें शुभ मुहूर्त और लग्नके समय धर्मज्ञ जनकजीने भाइयोंसहित रामको बुलाया ॥४५॥ और एक सर्वशोभासम्पन्न विस्तीर्ण मण्डपमें जिसमें रत्नजटित स्तम्भ, सुन्दर वितान, मनोहर मोतियोंकी झालर तथा मोतियोंके पुष्प और फल लगे हुए थे, तथा जो सुवर्ण-भूषण-भूषित वेदपाठी ब्राह्मणोंसे खचाखच भरा हुआ था और सुन्दर वस्त्र धारण किये निष्ककण्ठी (सुहागिन) नारियोंसे समाकुल था, श्रीरामचन्द्रजीको एक दिव्य-रत्न-जटित सुवर्ण-सिंहासनपर बैठाया। उस समय भेरी और दुन्दुभि आदि बाजों तथा नृत्य और गान आदिका बड़ा तुमुल कोलाहल हो रहा था ॥४६—४८॥ तब पुरोहित शतानन्दने श्रीवसिष्ठ और विश्वामित्रजीका क्रमशः पूजनकर उनको रामचन्द्रजीके दोनों ओर
सर्ग ६ ] बालकाण्ड ३१
स्थापयित्वा स तत्राग्निं ज्वालयित्वा यथाविधि।
सीतामानीय शोभाढ्यां नानारत्नविभूषिताम् ॥५०॥
सभार्यो जनकः प्रायाद्रामं राजीवलोचनम् ।
पादौ प्रक्षाल्य विधिवत्तदपो मूर्द्धन्यधारयत् ॥५१॥
या धृता मूर्ध्नि शर्वेण ब्रह्मणा मुनिभिः सदा ।
ततः सीतां करे धृत्वा साक्षतोदकपूर्वकम् ॥५२॥
रामाय प्रददौ प्रीत्या पाणिग्रहविधानतः ।
सीता कमलपत्राक्षी स्वर्णमुक्तादिभूषिता ॥५३॥
दीयते मे सुता तुभ्यं प्रीतो भव रघूत्तम ।
इति प्रीतेन मनसा सीतां रामकरेऽर्पयन् ॥५४॥
मुमोद जनको लक्ष्मीं क्षीराब्धिरिव विष्णवे ।
ऊर्मिलां चौरसीं कन्यां लक्ष्मणाय ददौ मुदा ॥५५॥
तथैव श्रुतकीर्तिं च माण्डवीं भ्रातृकन्यके ।
भरताय ददावेकां शत्रुघ्नायापरां ददौ ॥५६॥
चत्वारो दारसम्पन्ना भ्रातरः शुभलक्षणाः ।
विरेजुः प्रभया सर्वे लोकपाला इवापरे ॥५७॥
ततोऽब्रवीद्वसिष्ठाय विश्वामित्राय मैथिलः ।
जनकः स्वसुतोदन्तं नारदेनाभिभाषितम् ॥५८॥
यज्ञभूमिविशुद्धयर्थं कर्षतो लाङ्गलेन मे ।
सीतामुखात्समुत्पन्ना कन्यका शुभलक्षणा ॥५९॥
तामद्राक्षमहं प्रीत्या पुत्रिकाभावभाविताम् ।
अर्पिता प्रियभार्यायै शरच्चन्द्रनिभानना ॥६०॥
एकदा नारदोऽभ्यागाद्विविक्ते मयि संस्थिते।
रणयन्महतीं वीणां गायन्नारायणं विभुम् ॥६१॥
पूजितः सुखमासीनो मामुवाच सुखान्वितः ।
शृणुष्व वचनं गुह्यं तवाभ्युदयकारणम् ॥६२॥
परमात्मा हृषीकेशो भक्तानुग्रहकाम्यया ।
देवकार्यार्थसिद्धयर्थं रावणस्य वधाय च ॥६३॥
बैठा दिया। फिर वहाँ विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित की गयी तथा नाना-रत्न-विभूषिता सीताको साथ लेकर महारानीसहित महाराज जनकजी कमलनयन रामजीके पास आये और विधि-पूर्वक उनके चरण धोकर अपने शिरपर चरणोदक रक्खा ॥४९-५१॥ जिसे शिव, ब्रह्मा और अन्यान्य मुनिजन भी सदा अपने मस्तकपर धारण करते हैं। फिर सीताजीका हाथ पकड़कर उसे जल और चावल-सहित पाणिग्रहणकी विधिसे प्रीतिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीके कर-कमलोंमें दे दिया और कहा—"हे रघूश्रेष्ठ! मैं सुवर्ण और मुक्ता आदिसे विभूषिता अपनी पुत्री कमल-लोचना सीता आपको सौंपता हूँ, आप प्रसन्न होइये।" इस प्रकार सीताजीको प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामचन्द्रजीके कर-कमलोंमें सौंपकर जनकजी ऐसे आनन्दमग्न हो गये जैसे क्षीरसागर श्रीविष्णु भगवान्के करकमलोंमें लक्ष्मीको सौंपकर हुआ था। फिर उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपनी औरसी कन्या उर्मिला लक्ष्मणजीको विवाह दी ॥५२–५५॥ तथा अपने भाईकी पुत्रियाँ माण्डवी और श्रुतकीर्ति क्रमशः भरत और शत्रुघ्नको दीं ॥५६॥ इस प्रकार सुलक्षणसम्पन्न चारों भाई पत्नियोंके सहित साक्षात् दूसरे लोकपालोंके समान अपने प्रकाशसे सुशोभित हुए ॥५७॥
तदनन्तर, मिथिलापति महाराज जनकने, पुत्री जानकीके विषयमें देवर्षि नारदने जो कुछ कहा था वह सब वृत्तान्त वसिष्ठ और विश्वामित्रजीको सुनाया ॥५८॥ वे बोले—"एक बार मैं यज्ञभूमिकी शुद्धिके लिये हल जोत रहा था, उसी समय मेरे हलके सीता (अग्रभाग) से यह शुभलक्षणा कन्या प्रकट हुई ॥५९॥ उस समय मैंने इसे देखा और इसमें मुझे पुत्रीवत् प्रीति हुई, इसलिये मैंने इस चन्द्रमुखीको अपनी प्रिय-पत्नीको सौंप दिया ॥६०॥ एक दिन जब मैं एकान्तमें बैठा हुआ था मेरे पास महर्षि नारदजी अपनी महती नामकी वीणा बजाते और सर्वव्यापक श्रीहरिका गुण गाते हुए आये ॥६१॥ मेरे पूजा-सत्कारादि कर चुकनेपर वे सुखपूर्वक बैठकर मुझसे बोले, 'राजन् ! अपने कल्याणका कारणरूप यह परम गुह्य वचन सुनो—॥६२॥ 'परमात्मा हृषीकेश भक्तोंपर कृपा, देवताओंकी कार्य-सिद्धि और रावणका वध
३२ अध्यात्मरामायण [सर्ग ६
जातो राम इति ख्यातो मायामानुषवेषधृक्। आस्ते दाशरथिर्भूत्वा चतुर्धा परमेश्वरः ॥६४॥ योगमायाऽपि सीतेति जाता वै तव वेश्मनि। अतस्त्वं राघवायैव देहि सीतां प्रयत्नतः ॥६५॥ नान्येभ्यः पूर्वभार्यैषा रामस्य परमात्मनः। इत्युक्त्वा प्रययौ देवगतिं देवमुनिस्तदा ॥६६॥ तदारभ्य मया सीता विष्णोर्लक्ष्मीर्विभाव्यते। कथं मया राघवाय दीयते जानकी शुभा ॥६७॥ इति चिन्तासमाविष्टः कार्यमेकमचिन्तयम्। मत्पितामहगेहे तु न्यासभूतमिदं धनुः ॥६८॥ ईश्वरेण पुरा क्षिप्तं पुरदाहादनन्तरम्। धनुरेतत्पणं कार्यमिति चिन्त्य कृतं तथा ॥६९॥ सीतापाणिग्रहार्थाय सर्वेषां माननाशनम्। त्वत्प्रसादान्मुनिश्रेष्ठ रामो राजीवलोचनः ॥७०॥ आगतोऽत्र धनुर्द्रष्टुं फलितो मे मनोरथः। अद्य मे सफलं जन्म राम त्वां सह सीतया ॥७१॥ एकासनस्थं पश्यामि भ्राजमानं रविं यथा। त्वत्पादाम्बुधरो ब्रह्मा सृष्टिचक्रप्रवर्तकः ॥७२॥ बलिस्त्वत्पादसलिलं धृत्वाऽभूद्दिविजाधिपः। त्वत्पादपांसुसंस्पर्शादहल्या भर्तृशापतः ॥७३॥ सद्य एव विनिर्मुक्ता कोऽन्यस्त्वत्तोऽधिरक्षिता॥७४॥ यत्पादपङ्कजपरागसुरागयोगि- वृन्दैर्जितं भवभयं जितकालचक्रैः। यन्नामकीर्तनपरा जितदुःखशोका देवास्तमेव शरणं सततं प्रपद्ये ॥७५॥ इति स्तुत्वा नृपः प्रादाद्राघवाय महात्मने। दीनाराणां कोटिशतं रथानामयुतं तदा ॥७६॥ अश्वानां नियुतं प्रादाद्गजानां षट्शतं तथा। पत्तीनां लक्षमेकं तु दासीनां त्रिशतं ददौ ॥७७॥
करनेके लिये माया-मानवरूपसे अवतीर्ण होकर 'राम' नामसे विख्यात हुए हैं। वे परमेश्वर अपने चार अंशोंसे दशरथके पुत्र होकर अयोध्यामें रहते हैं ॥६३-६४॥ और इधर योगमायाने तुम्हारे यहाँ सीताके रूपसे जन्म लिया है। अतः तुम प्रयत्नपूर्वक इस सीताका पाणिग्रहण रघुनाथजीके साथ ही करना और किसीसे नहीं—क्योंकि यह पहलेसे ही परमात्मा रामकी ही भार्या है।" ऐसा कहकर देवर्षि नारदजी आकाश-मार्गसे चले गये ॥६५-६६॥ तबसे इस सीताको मैं विष्णु भगवान्की भार्या लक्ष्मी ही समझता हूँ। फिर यह सोचते हुए कि 'शुभलक्षणा जानकी- को किस प्रकार रघुनाथजीको दूँ' मैंने एक युक्ति विचारी। पूर्वकालमें श्रीमहादेवजीने त्रिपुरासुरको भस्म करनेके अनन्तर यह धनुष मेरे दादाके यहाँ धरोहरके रूपमें रक्खा था। मैंने यह सोचकर कि 'सीताके पाणि- ग्रहणके लिये सबके गर्वनाशक इस धनुषको ही पण (बाजी) बनाना चाहिये' वैसा ही किया। हे मुनिश्रेष्ठ आपकी कृपासे यहाँ कमलनयन रामजी धनुष देखने आ गये; इससे मेरा मनोरथ सिद्ध हो गया। हे राम ! आज मेरा जन्म सफल हो गया जो मैं सूर्यके समान देदीप्यमान और सीताके साथ एक आसनपर विराजमान आपको देख रहा हूँ। प्रभो ! आपके चरणोदकको सिरपर धारण करके ही ब्रह्माजी सृष्टि-चक्रके प्रवर्तक हुए हैं ॥६७-७२॥ आपके चरणोदकके प्रतापसे बलिको इन्द्र-पद प्राप्त हुआ है और आपकी ही चरण-धूलिके स्पर्शसे अहल्या तुरन्त पतिके शापसे मुक्त हो गयी। आपसे बढ़कर हमारा रक्षक और कौन है ? ॥७३-७४॥ जिनके चरण-कमल-परागके रसिक, काल-चक्रको जीतनेवाले योगीजनोंने संसार-भयको भी जीत लिया है तथा जिनके नाम-कीर्तनमें लगे रहकर देवगण दुःख और शोकको जीत लेते हैं, उन आपकी मैं निरन्तर शरण ग्रहण करता हूँ" ॥७५॥
महात्मा रघुनाथजीकी इस प्रकार स्तुतिकर महाराज जनकने उन्हें दहेजमें सौ करोड़ दीनार (सुवर्णमुद्रा), दश हजार रथ, दश हजार घोड़े, छः सौ हाथी, एक लाख पदाति और तीन सौ दासियाँ दीं ॥७६-७७॥
बालकाण्ड - सर्ग ७: परशुरामजीसे भेंट
सर्ग ७] बालकाण्ड ३३
दिव्याम्बराणि हारांश्च मुक्तारत्नमयोज्ज्वलान् ।
सीतायै जनकः प्रादात्प्रीत्या दुहितृवत्सलः ॥७८॥
वसिष्ठादीन्सुसंपूज्य भरतं लक्ष्मणं तथा ।
पूजयित्वा यथान्यायं तथा दशरथं नृपम् ॥७९॥
प्रस्थापयामास नृपो राजानं रघुसत्तमम् ।
सीतामालिङ्ग्य रुदतीं मातरः साश्रुलोचनाः॥८०॥
श्वश्रूशुश्रूषणपरा नित्यं राममनुव्रता ।
पातिव्रत्यमुपालम्ब्य तिष्ठ वत्से यथासुखम् ॥८१॥
प्रयाणकाले रघुनन्दनस्य
भेरीमृदङ्गानकतूर्यघोषः ।
खर्वासिभेरीघनतूर्यशब्दैः
संमूर्च्छितो भूतभयङ्करोऽभूत् ॥८२॥
तथा सीताजीको भी पुत्रीवत्सल जनकजीने अनेकों दिव्य वस्त्र तथा मोती और रत्न-जटित उज्ज्वल हार दिये ॥७८॥ तदनन्तर उन्होंने वसिष्ठादिकी पूजा की फिर भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और राजा दशरथका धन-दानादिसे यथोचित सत्कार कर रघुश्रेष्ठ महाराज दशरथको विदा किया। फिर माताओंने रोती हुई सीताको गले लगा नेत्रोंमें जल भरकर कहा—॥७९-८०॥ “वत्से ! तुम सासुकी सेवा करती हुई सदा रामचन्द्रजीकी अनुगामिनी रह पातिव्रत-धर्मका अवलम्बन कर सुखपूर्वक रहना” ॥८१॥ तदनन्तर रघुकुलतिलक श्रीरघुनाथजीके कूच करते समय भेरी, मृदङ्ग, आनक और तूर्य आदि बाजोंका घोष आकाशमें देवताओंके बजाये हुए भेरी और तूर्य आदिके घनघोर शब्दसे मिलकर प्राणियोंको भय उपजानेवाला हुआ ॥८२॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
बालकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥६॥
सप्तम सर्ग
परशुरामजीसे भेंट
सूत उवाच
अथ गच्छति श्रीरामे मैथिलाद्योजनत्रयम् ।
निमित्तान्यतिघोराणि ददर्श नृपसत्तमः ॥१॥
नत्वा वसिष्ठं पप्रच्छ किमिदं मुनिपुङ्गव ।
निमित्तानीह दृश्यन्ते विषमाणि समन्ततः ॥२॥
वसिष्ठस्तमथ प्राह भयमागामि सूच्यते ।
पुनरप्यभयं तेऽद्य शीघ्रमेव भविष्यति ॥३॥
मृगाः प्रदक्षिणं यान्ति पश्य त्वां शुभसूचकाः ।
इत्येवं वदतस्तस्य ववौ घोरतरोऽनिलः ॥४॥
मुष्णंश्चक्षूंषि सर्वेषां पांसुवृष्टिभिरर्दयन् ।
ततो व्रजन्ददर्शाग्रे तेजोराशिमुपस्थितम् ॥५॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशं विद्युत्पुञ्जसमप्रभम् ।
तेजोराशिं ददर्शाथ जामदग्न्यं प्रतापवान् ॥६॥
सूतजी बोले— श्रीरामचन्द्रजीके मिथिलापुरीसे तीन योजन चले जानेपर नृपश्रेष्ठ दशरथजीने अत्यन्त घोर अपशकुन देखे ॥१॥ तब उन्होंने वसिष्ठजीको प्रणाम करके पूछा—"हे मुनिश्रेष्ठ ! क्या कारण है कि चारों ओर भयङ्कर अपशकुन दिखायी दे रहे हैं?” ॥२॥
वसिष्ठजीने कहा—“इन अपशकुनोंसे किसी आगामी भयकी सूचना होती है, किन्तु (साथ ही यह भी सूचित होता है कि) फिर शीघ्र ही अभय प्राप्त होगा ॥३॥ क्योंकि देखो तुम्हारी दायीं ओर शुभ-सूचक मृगगण जा रहे हैं।" वसिष्ठजीके ऐसा कहते ही बड़ा प्रचण्ड वायु चलने लगा ॥४॥ उसने धूलि बरसाकर सबके नेत्रोंको मूँद दिया। इसी अवस्थामें उन्होंने आगे बढ़कर देखा कि वहाँ मानों एक तेजःपुञ्ज उपस्थित हुआ है ॥५॥ फिर उन्होंने करोड़ों सूर्योंके समान तेजखी, विद्युत्-पुञ्जके समान प्रभा-
३४ अध्यात्मरामायण [सर्ग ७
| नीलमेघनिभं प्रांशुं जटामण्डलमण्डितम् ।<br>धनुःपरशुपाणिं च साक्षात्कालमिवान्तकम् ॥७॥<br>कार्तवीर्यान्तकं रामं दृप्तक्षत्रियमर्दनम् ।<br>प्राप्तं दशरथस्याग्रे कालमृत्युमिवापरम् ॥८॥ | सम्पन्न महाप्रतापी, तेजोराशि, नीलमेघकी-सी आभा-वाले, उन्नतकाय, जटा-जूटधारी हाथमें धनुष और परशु लिये, प्राणियोंका नाश करनेवाले, साक्षात् कालके समान परशुरामजीको आते देखा ॥ ६-७ ॥ उन्होंने देखा कि कार्तवीर्यका वध करनेवाले और गर्वीले क्षत्रियोंका मानमर्दन करनेवाले परशुरामजी जो दूसरे यमराजके समान हैं, महाराज दशरथके पास खड़े हैं ॥८॥ |
| तं दृष्ट्वा भयसन्त्रस्तो राजा दशरथस्तदा ।<br>अर्घ्यादिपूजां विस्मृत्य त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥९॥<br>दण्डवत्प्रणिपत्याह पुत्रप्राणं प्रयच्छ मे । | उस समय महाराज दशरथ उन्हें देखते ही भयभीत हो गये और अर्ध्यादिसे उनकी पूजा करना भूलकर 'रक्षा करो, रक्षा करो'—ऐसा कहकर पुकारने लगे ॥९॥ और दण्डवत् प्रणाम करके बोले—'मुझे पुत्रके प्राणोंका दान दीजिये।' |
| इति ब्रुवन्तं राजानमनादृत्य रघूत्तमम् ॥१०॥<br>उवाच निष्ठुरं वाक्यं क्रोधात्प्रचलितेन्द्रियः ।<br>त्वं राम इति नाम्ना मे चरसि क्षत्रियाधम ॥११॥<br>द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि वै ।<br>पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ॥१२॥<br>अस्मिंस्तु वैष्णवे चाप आरोपयसि चेद् गुणम् ।<br>तदा युद्धं त्वया सार्धं करोमि रघुकुलध्वज ॥१३॥<br>नो चेत्सर्वान्हनिष्यामि क्षत्रियान्तकरोह्यहम् ।<br>इति ब्रुवति वै तस्मिंश्चचाल वसुधा भृशम् ॥१४॥<br>अन्धकारो बभूवाथ सर्वेषामपि चक्षुषाम् । | इस प्रकार प्रार्थना करते हुए राजाकी ओर कुछ भी ध्यान न देकर उन्होंने क्रोधसे व्याकुल हो कठोर वाणीसे रघूत्तम श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"अरे क्षत्रियाधम ! तू मेरे ही समान 'राम' नामसे विख्यात होकर पृथिवीमें विचरता है ॥१०-११॥ सो यदि तू वास्तवमें क्षत्रिय है तो मेरे साथ द्वन्द्वयुद्ध कर; एक पुराने जीर्ण-शीर्ण धनुषको तोड़कर व्यर्थ ही अपनी प्रशंसा कर रहा है ? ॥१२॥ अरे रघुकुलोत्पन्न ! यदि तू इस वैष्णव धनुषपर रोदा चढ़ा देगा तो मैं तेरे साथ युद्ध करूँगा ॥ १३ ॥ नहीं तो, मैं अभी सबको मार डालूँगा क्योंकि क्षत्रियोंका अन्त करना तो मेरा काम ही है।" परशुरामजीके ऐसा कहनेपर पृथिवी बारम्बार काँपने लगी ॥ १४ ॥ और सबके नेत्रोंके सामने अन्धकार छा गया। |
| रामो दाशरथिर्वीरो वीक्ष्य तं भार्गवं रुषा ॥१५॥<br>धनुराच्छिद्य तद्धस्तादारोप्य गुणमञ्जसा ।<br>तूणीराद्वाणमादाय संधायाकृष्य वीर्यवान् ॥१६॥<br>उवाच भार्गवं रामं शृणु ब्रह्मन्वचो मम ।<br>लक्ष्यं दर्शय बाणस्य ह्यमोघो मम सायकः ॥१७॥<br>लोकान्पादयुगं वापि वद शीघ्रं ममाज्ञया ।<br>अयं लोकः परो वाथ त्वया गन्तुं न शक्यते ॥१८॥ | तब दशरथ-नन्दन वीरवर रामने परशुरामजीकी ओर रोषपूर्वक देखते हुए उनके हाथसे धनुष छीन लिया और उसपर अनायास ही रोदा चढ़ाकर अपने तरकशसे बाण निकालकर उसपर रक्खा और उसे खींचकर भृगुनन्दन परशुरामजीसे कहा—"ब्रह्मन् ! मेरी बात सुनो, मेरा बाण अमोघ है—यह व्यर्थ नहीं जाता। इसके लिये शीघ्र ही लक्ष्य दिखाओ ॥ १५-१७ ॥ (अपने पुण्यसे जीते हुए) लोक अथवा अपने चरण—इन दोनोंमेंसे मेरी आज्ञासे शीघ्र ही किसी एकको बताओ। (उसीको इस बाणसे वेध डालूँगा) अब तुम इस लोक या परलोकमें कहीं नहीं जा सकते ॥१८॥ |
सर्ग ७] बालकाण्ड ३५
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| एवं त्वं हि प्रकर्तव्यं वद शीघ्रं ममाज्ञया । | अब तुम्हारे साथ मेरा जो कुछ कर्तव्य है वह तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही बताओ।” |
| एवं वदति श्रीरामे भार्गवो विकृताननः ॥ १९ ॥<br>संस्मरन्पूर्ववृत्तान्तमिदं वचनमब्रवीत् ।<br>राम राम महाबाहो जाने त्वां परमेश्वरम् ॥ २० ॥ | रामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भृगु-नन्दन परशुराम-जीका मुख मलिन हो गया ॥ १९ ॥ फिर उन्होंने पूर्व-वृत्तान्तको स्मरण कर यह कहा—“हे राम ! हे राम ! हे महाबाहो ! मैंने आप परमेश्वरको जान लिया ॥ २० ॥ |
| पुराणपुरुषं विष्णुं जगत्सर्गलयोद्भवम् ।<br>बाल्येऽहं तपसा विष्णुमाराधयितुमञ्जसा ॥ २१ ॥ | आप साक्षात् संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण, पुराण-पुरुष भगवान् विष्णु हैं । मैं बाल्यावस्थामें विष्णुभगवान्की आराधना करनेके लिये अकस्मात् |
| चक्रतीर्थं शुभं गत्वा तपसा विष्णुमन्वहम् ।<br>अतोषयं महात्मानं नारायणमनन्यधीः ॥ २२ ॥ | परम पवित्र चक्रतीर्थमें पहुँचा और वहाँ प्रति-दिन अनन्यभावसे तपस्या करते हुए मैंने परमात्मा नारायण भगवान् विष्णुको प्रसन्न किया ॥ २१-२२ ॥ |
| ततः प्रसन्नो देवेशः शङ्खचक्रगदाधरः ।<br>उवाच मां रघुश्रेष्ठ प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥ २३ ॥ | हे रघुश्रेष्ठ ! उस समय शङ्ख-चक्र-गदाधारी प्रसन्नवदन देवेश्वर विष्णुने मुझसे प्रसन्न होकर कहा ॥ २३ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>उत्तिष्ठ तपसो ब्रह्मन्फलितं ते तपो महत् ।<br>मञ्चिदांशेन युक्तस्त्वं जहि हैहयपुङ्गवम् ॥ २४ ॥ | **श्रीभगवान् बोले—**हे ब्रह्मन् ! तपस्या छोड़कर खड़े हो, तुम्हारा महान् तप सफल हो गया । तुम मेरे चिदंशसे युक्त होकर, जिसके लिये यह |
| कार्तवीर्यं पितृहणं यदर्थं तपसः श्रमः ।<br>ततस्त्रिःसप्तकृत्वस्त्वं हत्वा क्षत्रियमण्डलम् ॥ २५ ॥ | तपस्या करनेका कष्ट उठाया है उस पितृघाती हैहय-श्रेष्ठ कार्तवीर्यका वध करो और फिर इक्कीस बार समस्त क्षत्रियोंको मारकर ॥ २४-२५ ॥ |
| कृत्स्नां भूमिं कश्यपाय दत्त्वा शान्तिमुपावह ।<br>त्रेतामुखे दाशरथिर्भूत्वा रामोऽहमव्ययः ॥ २६ ॥ | सम्पूर्ण पृथिवी कश्यपजीको दे शान्ति लाभ करो । मैं अविनाशी परमात्मा त्रेतायुगमें दशरथके यहाँ 'राम' नामसे जन्म दूँगा । |
| उत्पत्स्ये परया शक्त्या तदा द्रक्ष्यसि मां ततः ।<br>मत्तेजः पुनरादास्ये त्वयि दत्तं मया पुरा ॥ २७ ॥ | उस समय मेरी परमशक्ति (सीता) के सहित तुम मुझे देखोगे । तब (पहले) इस समय तुम्हें दिया हुआ अपना तेज मैं फिर ग्रहण कर लूँगा ॥ २६-२७ ॥ |
| तदा तपश्चरंश्छार्कं तिष्ठ त्वं ब्रह्मणो दिनम् ।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तथा सर्वं कृतं मया ॥ २८ ॥ | तबसे तुम तपस्या करते हुए कल्पान्त-पर्यन्त पृथिवीमें रहोगे । ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये; और मैंने जैसा उन्होंने कहा था वैसा ही किया ॥ २८ ॥ |
| स एवं विष्णुस्त्वं राम जातोऽसि ब्रह्मप्रार्थितः ।<br>मयि स्थितं तु त्वत्तेजस्त्वयैव पुनराहृतम् ॥ २९ ॥ | हे राम ! आप वही विष्णु हैं । ब्रह्माकी प्रार्थनासे आपने जन्म लिया है । आपका जो तेज मुझमें स्थित था वह आज आपने फिर ले लिया ॥ २९ ॥ |
| अद्य मे सफलं जन्म प्रतीतोऽसि मम प्रभो ।<br>ब्रह्मादिभिरलभ्यस्त्वं प्रकृतेः पारगो मतः ॥ ३० ॥ | हे प्रभो ! आज मेरा जन्म सफल हो गया जो मैंने आपको पहचान लिया क्योंकि आप तो ब्रह्मा आदिसे भी अप्राप्य और प्रकृतिसे भी परे माने गये हैं ॥ ३० ॥ |
| त्वयि जन्मादिषड्भावा न सन्त्यज्ञानसंभवाः।<br>निर्विकारोऽसि पूर्णस्त्वं गमनादिविवर्जितः ॥ ३१ ॥ | आपमें अज्ञान-जन्य जन्मादि छः भाव-विकार नहीं हैं तथा आप गमनादिसे रहित निर्विकार और पूर्ण हैं ॥ ३१ ॥ |
३६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ७
| यथा जले फेनजालं धूमो वह्नौ तथा त्वयि ।<br>त्वदाधारा त्वद्विषया माया कार्यं सृजत्यहो ॥३२॥ | अहो ! जलके फेन-समूह और अग्निके धूँएँके समान आपके आश्रित और आपहीको विषय करनेवाली माया नाना प्रकारके विचित्र कार्योंकी रचना करती है ॥ ३२ ॥ |
| यावन्मायावृता लोकास्तावत्त्वां न विजानते ।<br>अविचारितसिद्धैषाऽविद्या विद्याविरोधिनी ॥३३॥ | मनुष्य जबतक मायासे आवृत्त रहते हैं तबतक आपको नहीं जान सकते । विद्याकी विरोधिनी यह अविद्या जबतक विचार नहीं किया जाता तभी-तक रहती है ॥ ३३ ॥ |
| अविद्याकृतदेहादिसङ्घाते प्रतिबिम्बिता ।<br>चिच्छक्तिर्जीवलोकेऽस्मिन् जीव इत्यभिधीयते॥३४॥ | अविद्याजन्य देहादि संघातोंमें प्रतिबिम्बित हुई चित्-शक्ति ही इस जीव-लोकमें 'जीव' कहलाती है ॥ ३४ ॥ |
| यावद्देहमनःप्राणबुद्ध्यादिष्वभिमानवान् ।<br>तावत्कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखदुःखादिभाग्भवेत् ॥३५॥ | यह जीव जबतक देह, मन, प्राण और बुद्धि आदिमें अभिमान करता है तभीतक कर्तृत्व, भोक्तृत्व और सुख-दुःखादिको भोगता है ॥ ३५ ॥ |
| आत्मनः संसृतिर्नास्ति बुद्धेर्ज्ञानं न जात्विति ।<br>अविवेकाद्द्वयं युङ्क्त्वा संसारीति प्रवर्तते ॥३६॥ | वास्तवमें आत्मामें जन्म-मरणादि संसार किसी भी अवस्थामें नहीं है और बुद्धिमें कभी ज्ञान-शक्ति नहीं है। अविवेकसे इन दोनोंको मिलाकर जीव 'संसारी हूँ' ऐसा मानकर कर्ममें प्रवृत्त हो जाता है ॥ ३६ ॥ |
| जडस्य चित्समायोगाच्चित्त्वं भूयाच्चितेस्तथा ।<br>जडसङ्गाज्जडत्वं हि जलाग्न्योर्मेलनं यथा ॥३७॥ | जल और अग्निका मेल होनेसे जैसे जलमें उष्णता और अग्निमें शान्तता उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार जड (बुद्धि) का चेतन (आत्मा) से संयोग होनेसे उसमें चेतनता और चेतन आत्मा-का जड-बुद्धिसे संयोग होनेसे उसमें (कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि) जडता प्रकट हो जाती है ॥३७॥ |
| यावत्त्वत्पादभक्तानां सङ्गसौख्यं न विन्दति ।<br>तावत्संसारदुःखौघान्न निवर्तेन्नरः सदा ॥३८॥ | हे राम ! जबतक मनुष्य आपके चरण-कमलोंके भक्तोंका संगसुख निरन्तर अनुभव नहीं करता तबतक संसारके दुःख-समूहसे पार नहीं होता ॥ ३८ ॥ |
| तत्सङ्गलब्धया भक्त्या यदा त्वां समुपासते ।<br>तदा माया शनैर्याति तानवं प्रतिपद्यते ॥३९॥ | जब वह भक्तजनों-के सङ्गसे प्राप्त हुई भक्तिद्वारा आपकी उपासना करता है तब आपकी माया शनैः-शनैः चली जाती है और वह क्षीण होने लगती है ॥ ३९ ॥ |
| ततस्त्वज्ज्ञानसम्पन्नः सद्गुरुस्तेन लभ्यते ।<br>वाक्यज्ञानं गुरोर्लब्ध्वा त्वत्प्रसादाद्विमुच्यते ॥४०॥ | फिर उस साधकको आपके ज्ञानसे सम्पन्न सद्गुरुकी प्राप्ति होती है और उन सद्गुरुदेवसे महावाक्यका बोध पाकर वह आपकी कृपासे मुक्त हो जाता है ॥ ४० ॥ |
| तस्मात्त्वद्भक्तिहीनानां कल्पकोटिशतैरपि ।<br>न मुक्तिशङ्का विज्ञानशङ्का नैव सुखं तथा ॥४१॥ | अतः आपकी भक्तिसे शून्य पुरुषोंको सौ करोड़ कल्पोंमें भी मुक्ति अथवा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होनेकी सम्भावना नहीं है और इसीलिये उन्हें वास्तविक सुख मिलनेकी भी सम्भावना नहीं है ॥ ४१ ॥ |
| अतस्त्वत्पादयुगले भक्तिर्मे जन्मजन्मनि ।<br>स्यात्त्वद्भक्तिमतां सङ्गोऽविद्या याभ्यां विनश्यति ॥ | अतः मैं यही चाहता हूँ कि जन्म-जन्मान्तरमें आपके चरण-युगलमें मेरी भक्ति हो और मुझे आपके भक्तोंका सङ्ग मिले क्योंकि इन्हीं दोनों साधनोंसे अविद्याका नाश होता है ॥ ४२ ॥ |
| लोके त्वद्भक्तिनिरतास्त्वद्धर्मामृतवर्षिणः ।<br>पुनन्ति लोकमखिलं किं पुनः स्वकुलोद्भवान्॥४३॥ | संसारमें आपकी भक्तिमें तत्पर और भगवद्धर्म-रूप अमृत-की वर्षा करनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण लोकको पवित्र |
सर्ग ७] बालकाण्ड ३७
नमोऽस्तु जगतां नाथ नमस्ते भक्तिभावन ।
नमः कारुणिकानन्त रामचन्द्र नमोऽस्तु ते॥४४॥
देव यद्यत्कृतं पुण्यं मया लोकजिगीषया ।
तत्सर्वं तव बाणाय भूयाद्राम नमोऽस्तु ते ॥४५॥
ततः प्रसन्नो भगवान् श्रीरामः करुणामयः ।
प्रसन्नोऽस्मि तव ब्रह्मन् यत्ते मनसि वर्तते ॥ ४६॥
दास्ये तदखिलं कामं मा कुरुष्वात्र संशयम् ।
ततः प्रीतेन मनसा भार्गवो राममब्रवीत् ॥४७॥
यदि मेऽनुग्रहो राम तवास्ति मधुसूदन ।
त्वद्भक्तसङ्गस्त्वत्पादे दृढा भक्तिः सदास्तु मे॥४८॥
स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु भक्तिहीनोऽपि सर्वदा ।
त्वद्भक्तिस्तस्य विज्ञानं भूयादन्ते स्मृतिस्तव॥४९॥
तथेति राघवेणोक्तः परिक्रम्य प्रणम्य तम् ।
पूजितस्तदनुज्ञातो महेन्द्राचलमन्वगात् ॥५०॥
राजा दशरथो हृष्टो रामं मृतमिवागतम् ।
आलिङ्ग्यालिङ्ग्य हर्षेण नेत्राभ्यांजलमुत्सृजत्॥५१॥
ततः प्रीतेन मनसा स्वस्वचित्तः पुरं ययौ ।
रामलक्ष्मणशत्रुघ्नभरता देवसंमिताः ।
स्वां स्वां भार्यामुपादाय रेमिरे स्वस्वमन्दिरे ॥५२॥
मातापितृभ्यां संहृष्टो रामः सीतासमन्वितः ।
रेमे वैकुण्ठभवने श्रिया सह यथा हरिः ॥५३॥
युधाजिन्नाम कैकेयीभ्राता भरतमातुलः ।
भरतं नेतुमागाच्छत्स्वराज्यं प्रीतिसंयुतः ॥५४॥
प्रेषयामास भरतं राजा स्नेहसमन्वितः ।
शत्रुघ्नं चापि संपूज्य युधाजितमरिन्दमः ॥५५॥
कर देते हैं, फिर वे अपने कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषोंको पवित्र कर देते हैं, इसमें तो कहना ही क्या है? ॥४३॥ हे जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है । हे भक्तिभावन ! आपको नमस्कार है । हे करुणामय ! हे अनन्त ! आपको नमस्कार है । हे रामचन्द्र ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे देव ! मैंने पुण्यलोक-प्राप्तिके लिये जो कुछ पुण्य-कर्म किये हैं वे सब आपके इस बाणके लक्ष्य हों । हे राम आपको नमस्कार है" ॥४५॥ तब करुणामय भगवान् श्रीरामचन्द्रने प्रसन्न होकर कहा—"हे ब्रह्मन् ! मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो-जो कामनाएँ हैं उन सभीको मैं पूर्ण करूँगा, इसमें सन्देह न करना ।” तब परशुरामजीने प्रसन्न-चित्त होकर रामसे कहा— ॥ ४६-४७ ॥ "हे मधुसूदन राम ! यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो मुझे सदा आपके भक्तोंका संग रहे और आपके चरण-कमलोंमें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो ॥ ४८ ॥ तथा कोई भक्तिहीन पुरुष भी यदि इस स्तोत्रका पाठ करे तो उसे सर्वदा आपकी भक्ति मिले और ज्ञान प्राप्त हो तथा अन्तमें आपकी स्मृति रहे" ॥ ४९ ॥
तदनन्तर रघुनाथजीके 'ऐसा ही हो' इस प्रकार कहनेपर परशुरामजीने उनकी परिक्रमा कर उन्हें प्रणाम किया और उनसे पूजित हो उनकी आज्ञासे महेन्द्र-पर्वतपर चले गये ॥ ५० ॥ राजा दशरथने रामको मानों मृत्युसे लौटे हुए समझ अत्यन्त हर्षसे बारम्बार आलिंगन किया और नेत्रोंसे आनन्दाश्रुओं-की वर्षा करने लगे ॥ ५१ ॥ तदनन्तर वे सब प्रसन्न-चित्तसे अपनी अयोध्यापुरीमें आये । वहाँ पहुँचकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ देवताओंके समान अपने अपने महलोंमें रमण करने लगे ॥ ५२ ॥ सीताके सहित श्रीरामचन्द्रजी अपने माता-पिताओंका आनन्द बढ़ाते हुए इस प्रकार रमण करने लगे जैसे वैकुण्ठ-लोकमें भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ विहार करते हैं ॥ ५३ ॥
इसी समय कैकेयीके भाई भरतजीके मामा युधाजित् भरतको प्रीतिपूर्वक अपने यहाँ ले जानेके लिये आये ॥ ५४ ॥ शत्रुदमन महाराज दशरथने भी युधाजित्का सत्कार कर उनके स्नेहवश भरत और शत्रुघ्नको उनके साथ भेज दिया ॥ ५५ ॥
| ३८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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कौसल्या शुशुभे देवी रामेण सह सीतया ।<br>देवमातेव पौलोम्या शच्या शक्रेण शोभना ॥५६॥<br>साकेते लोकनाथप्रथितगुणगणो-<br>लोकसङ्गीतकीर्तिः<br>श्रीरामो सीतयाऽऽस्तेऽखिलजननिकरा-<br>नन्दसन्दोहमूर्त्तिः ।<br>नित्यश्रीर्निर्विकारो निरवधिविभवो<br>नित्यमायानिरासो<br>मायाकार्यानुसारी मनुज इव सदा<br>भाति देवोऽखिलेशः ॥५७॥ | तदुपरांत देवी कौसल्या राम और सीताके सहित इस प्रकार सुशोभित हुईं जैसे पुलोम-पुत्री शची और इन्द्रके सहित देवमाता अदिति शोभायमान होती हैं ॥ ५६ ॥ जिनके गुणगण ब्रह्मा आदि सकल लोकपालोंमें प्रसिद्ध हैं, जिनकी कीर्ति सम्पूर्ण लोकोंमें गायी जाती है, जो सारे मनुष्योंके आनन्द-समूहकी मूर्ति हैं, जो नित्य, शोभाधाम, निर्विकार, अनन्त-वैभव, और सदा मायातीत होकर भी माया-कार्योंका अनुसरण करते हुए सदा मनुष्यके समान प्रतीत होते हैं वे अखिलेश्वर भगवान् राम सीताजीके साथ साकेत (अयोध्या) धाममें विराजने लगे ॥ ५७ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
समाप्तमिदं बालकाण्डम्
अयोध्याकाण्ड
श्रीसीतारामाभ्यां नमः
अध्यात्मरामायण
अयोध्याकाण्ड
श्रुत्वैव यो भूपतिमात्तवाचं वनं गतस्तेन न नोदितोऽपि ।
तं लीलयाऽऽह्लादविषादशून्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥
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