भारतकोश
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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ९ ] यात्राकाण्डम् २०३

सर्गः ९ ] यात्राकाण्डम् २०३


एवं नानाविधं श्रुत्वा पुष्करस्था जना ध्वनिम् । निशीथे पश्चिमामाशां किमेतद्विवि विह्वलाः ॥ ३९ ॥
केचिदूचुर्नन्दिघंटास्वनोऽयं श्रूयते महान् । केचिदूचुर्विमानेन गच्छतीन्द्रो दिवं प्रति ॥ ४० ॥
केचिदूचुः समायांति रंभाद्यप्सरसश्च खे । केचिन्मेघध्वनिं प्रोचुः केचिदैरावतं स्थिति ॥ ४१ ॥
केचिञ्चोचुः समायाति सागरः किं लयं विना । केचित्प्रोचुस्त्विदं ज्ञेयं वायुपुत्रस्य शब्दितम् ॥ ४२ ॥
केचिन्मन्त्रिराजस्व शब्दितं प्रोचुरूत्तमम् । केचित्प्रोचुश्च गंधर्वा विमानस्था भटंति खे ॥ ४३ ॥
केचिञ्चोचुर्नागकन्याः कुर्वन्तीदं सुगायनम् । कुर्वन्तश्चेति तर्कांश्च ददृशुः पुष्पकं महत् ॥ ४४ ॥
राममागतमाज्ञाय तोषपूर्णा बभूविरे उपायनानि संगृह्य प्रेमनिर्भरमानसाः ॥ ४५ ॥
प्रत्युज्जग्मुस्तदा रामं दृष्ट्वा नत्वा रघूत्तमम् । मेनिरे जन्मसाफल्यं राघवेणाभिमानितः ॥ ४६ ॥
राघवोऽपि विमानाग्र्यादवरुह्य द्विजोत्तमान् प्रणिपत्य समाभाष्य प्रतिपूज्य सविस्तरम् ॥ ४७ ॥
तैस्तीर्थवासिभिर्युक्तो ययौ पुष्करमुत्तमम् स्नात्वा सचैलं विधिना तीर्थश्राद्धं विधाय च ॥ ४८ ॥
दत्त्वा दानान्यनेकानि काश्याःकोट्यधिकानि तु । द्रव्यालंकारवस्त्राद्यैस्तोषयामास भूसुरान् ॥ ४९ ॥
ततस्तैरभ्यनुज्ञातो विमानेन ययौ पुनः । एवं पश्चिमयात्रा ते वर्णिता राघवस्य हि ॥ ५० ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे पश्चिमयात्रावर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥


नवमः सर्गः

( रामकी उत्तरभारतीय तीर्थयात्रा और वहाँसे लौटकर अयोध्या आगमन )

रामदास उवाच

उत्तराभिमुखो रामस्ततः पश्यन् स्थलानि सः । ययौ पर्वततीर्थं च ततो ज्वालामुखों ययौ ॥ १ ॥


हृष्ट तथा पायजेबका मनोहारी निनाद हो रहा था ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ इस प्रकार अनेक प्रकारके शब्दसे मिश्रित तथा वशीभूत ध्वनिको रात्रिके शांत समयमें पश्चिमकी ओर सुनकर पुष्करनिवासी लोग चकित हो गये ॥ ३९ ॥ कोई कहने लगा कि नन्दीश्वरके घंटका यह शब्द सुनाई देता है। कोई कहन लगा कि इन्द्र विमानपर बैठकर स्वर्ग जा रहे हैं ॥ ४० ॥ कोई कहने लगा कि रम्भादि अप्सराएं आकाशमें जा रही हैं। कोई मेघकी गर्जना बतलाने लगे। कोई ऐरावतकी चिघाड़ कहने लगा ॥ ४१ । कोई कहने लगा कि विना प्रलयकालके ही समुद्र उमड़ा आ रहा है। कोई कहने लगा कि वायुपुत्र हनुमान्का गर्जन हो रहा है ॥ ४२ ॥ कोई कहने लगा कि पक्षिराज गरुडका शब्द हो रहा है। कोई बोला कि ये सो गन्धर्व लोग विमानपर बैठकर आकाशमें घूम-फिर रहे हैं । ४३ ॥ कोई कहने लगा कि नागकन्याएं गान कर रही हैं। इस प्रकारके अनेक तर्क-वितर्क करते हुए वे लोग पुष्पकको देखने लगे ॥ ४४ ॥ बादम जब रामचन्द्रजाको आते देखा तो सब लोग बड़े ही प्रसन्न हुए । रामको देखकर सब लोग हाथमें अनेक तरहकी भेंट ले-लेकर प्रेमपूर्वक उनके सामने गये । श्रीरामको प्रणाम करके उन्होंने अपना जन्म सफल माना श्रीरामने भी उन सबका सत्कार किया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ पश्चात् श्रीरामने विमानसे नीचे उतरकर द्विज लोगोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका नमस्कारपूर्वक पूजन किया ओर बादमें उन तीर्थवासियोंके साथ विस्तारसे वार्तालाप करते हुए उत्तम पुष्कर नगरमें प्रवेश किया । वहाँ सचस्त्र स्नान करके विधिवत् तीर्थश्राद्ध किया ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ वहाँपर रामने काशीसे कोटिगुणा अधिक दान-पुण्य किया द्रव्य अलंकार, वस्त्र तथा अन्नादिसे ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया बादमें उनसे आज्ञा लेकर वे विमान द्वारा आगे बढ़े। इस प्रकार हे पार्वती ! मैंने रामकी पश्चिम भारतकी तीर्थयात्रा कह सुनायी ॥ ४९ ॥ ५० ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां पश्चिमयात्रावर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदासने कहा—बादमे श्रीराम अनेक स्थलों एवं उत्तरके पर्वतों तथा तीर्थोंको देखते हुए वहाँसे

२०४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

पश्यन् स्थलानि संप्राप्त स्ततो श्रीमत्कर्णिकाम् । करतोयानदीतोये स्नात्वाऽग्रे न ययौ विभुः ॥ २ ॥ तत्तणे दोषमाकर्ण्य पर्यवर्त्तत राघवः । कर्मनाशानदीस्पर्शात्करतोयाविलङ्घनात् ॥ ३ ॥ गण्डकीबाहुतरणाद्धर्मः स्खलति कीर्त्तनात् । गत्वा देवप्रयागं चालकनन्दातटेन वै ॥ ४ ॥ नरनारायणौ गत्वा दर्शनान्मुक्तिदौ नृणाम् । बदरिकाश्रमे रामः केदारेशं विलोक्य सः ॥ ५ ॥ हिमाद्रौ देवगन्धर्वसंविते धातुमण्डले । महापथं ततो गत्वा ययौ तन्मानसं सरः ॥ ६ ॥ यस्माद्विनिर्गता गंगा सरयूः पापनाशिनी । कञ्जने यत्र हेमाभि यत्र हंसाः सहस्रशः ॥ ७ , रक्तनेत्रांघ्रिवदना मुक्ताभक्षणतत्पराः । यत्प्रदेशेषु चित्रभूम्यौ देवगंधर्वकिन्नराः ॥ ८ ॥ अप्सरोभिस्स्वकीयाभिः क्रीडां कुर्वन्त्यहर्निशम् । तत्र स्नात्वा मानसेऽथ गत्वा बिन्दुसरोवरम् ॥ ९ ॥ स्नात्वा दानादिकं कृत्वा हिमालयगिरिस्थिताम् । दृष्ट्वा ब्रह्मसभां दिव्यां मेरुपृष्ठसदृशीं पराम् ॥ १०॥ राघवः सीतया भ्रातृभिरुह्य स पुष्षकात् प्रणमंतं सुरेंद्रार्यरालिग्य चतुगननम् ॥ ११ ॥ ब्रह्मणा सहितान्देवान्पूजयामास विस्तरैः विधिरतं पूजयामाम कामधेनुं न्यवेदयत् । १२। विमानाग्रे कामधेनु मस्थाप्य रघुनंदनः सुरेंद्रादिभिः साक केलासमगमत्तदा । १३ ॥ राममागमनमाज्ञाय कैलासे गिरिजापतिः । प्रत्युज्जगाम पार्वत्या रामचंद्रं वृषस्थितः ॥ १४ ॥ अभ्यागतमाज्ञाय राघवः पुष्षकाज्जवात् । अवरुह्य नमस्कृत्य शिवेनालिंगितः स्थितः । १५॥ उमाऽपि सीतामालिग्य दिव्यालंकारचंदनैः । पूजयामास वस्त्राद्यैः सूर्यकोटिसमप्रभैः । नाटके नूपुरे दिव्ये केयूरे चूडकद्वयम् । १६। किंकिणीणवमयुक्तरशनां चन्द्राश्ककंगौ । सीमंतभूषणौ डारन्मणिमुक्ताविचित्रितान् । १७।।

जटाशायुत्री गये १। वहाँ अनेक दुर्तेरे स्थानोंको देखते हुए श्रीमत्कर्णिका तीर्थपर जा पहुंचे । वहाँ करतोया नदीमे स्नान किया, परन्तु उसको पार करक आगे नहीं गये ॥ २ ॥ श्रीराम करतोयाका पार करनेमें प्राय- श्चित्त सुनकर वहींसे लौट पड़े। क्योंकि शास्त्रोक्त दिशा है- कर्मनाशा नदीके स्पर्शमात्रसे करतोयाके लांघनेसे, गंडकी में हाथोंद्वारा तैरनेसे तथा धर्मका अपने मुखसे बखान करनाम प्राणीका किया हुआ धर्म नष्ट हो जाता है। वहाँ से देवप्रयाग गये । पश्चात् अलकनन्दाके किनारे किनारे चलकर मनुष्यांका दर्शनमात्रसे मुक्ति देनेवाले नर-नारायणका दर्शन किया। श्रीरामाने बदरिकाश्रमके बाद केदारेश्वरका दर्शन किया ॥ ३-५ । इसके अनन्तर राम अनेक धातुओंम मंडित हिमाद्रिपर गये, जहाँ कि अनेक देवता तथा गन्धर्व निवास करते हैं। बादमें महापथ गये और वहाँसे उस मर्यादित मानसरोवरपर पधारे ॥ ६ । जहाँसे कि पापोंको नष्ट करनेवाली गंगा तथा सरयू निकली है। उस मानसरोवरमे अनेक सुवर्णकमल खिले हुए थे वहाँ मोती चुगनमें तत्पर, लाल नेत्र, लाल पग तथा लाल मुखवाले हजारों राजहंस निवास करते थे। उस प्रदेशकी चित्र विचित्र भूमिपर अप्सराओं तथा स्त्रियांक सहित अनेक देव गन्धर्व और किन्नरांक समूह क्रीड़ा कर रहे थे। उस मानसरोवरमें स्नान करके श्रीराम बिन्दुसरोवर गये ॥ ७-९ । वहाँपर स्नान करक तथा अनेक दान देकर हिमालयपर गये। वहाँ मेरुपर्वतपर स्थित ब्रह्मसभाके समान एक दूसरी मनोहर ब्रह्मसभा देखी ॥ १० ॥ वहाँ राम सीता तथा अन्य सब लोगोंके साथ विमानपरसे उतर पड़े और इन्द्रादिकांको साथ लेकर प्रणाम करते हुए चतुर्मुख ब्रह्माका आलिंगन किया। ब्रह्मा सहित अन्य सब देवताओंकी रामने विस्तारसे पूजा की। पश्चात् ब्रह्माने भी श्रीरामका विधिवूवर्क पूजन किया और उन्हें सादर कामधेनु समर्पित की ॥ ११ ॥ १२ ॥ बादमें रघुनन्दन सब देवताओं सहित ब्रह्माको तथा उस कामधेनुको विमानपर रखकर कैलास पर्वतपर पधारे ॥ १३ ॥ कैलासपर श्रीरामको आते जानकर गिरिजाके पति शिवजी पार्वतीके साथ नन्दीश्वरपर सवार होकर रामचन्द्रको लेने आये । १४ ॥ राम शिवजीको आते देखकर पुष्पकपरसे नीचे उतर गये और शिवजीको प्रणाम किया। शिवजीने रामका आलिङ्गन किया। पार्वती ने भी सीताका आलिङ्गन करके दिव्य चन्दन आदिसे पूजा की । तदनन्तर प्रसन्न होकर उमादेवीने सीता महारानीको सूर्यके समान दीप्तिवाले अनेक आभूषण और वस्त्र दिये।

सर्ग ९] यात्राकाण्डम् २०५

सर्ग ९] यात्राकाण्डम् २०५

ददौ जनकनन्दिन्यै पार्वती तोषपूरिता। ततः शम्भुस्तदा प्राह राघव पूज्य वैभवैः ॥१८॥ राम त्वन्नाभिकमले ब्रह्माऽभूच्चतुराननः। ततो जातो विषंश्चाहं रुदनाद्रुद्रसंज्ञकः ॥१९॥ पौत्रस्तव रघूश्रेष्ठ तवाज्ञापरिपालकः। संहारः क्रियते राम आज्ञया तव चादरात् ॥२०॥ यदा मया तु प्रलये तदा शापं क्व ते मनम्। यत्प्रशस्यवधाच्चापि स्तीर्णश्चाश्वारथां करोषि हि। २१। क्रीडेयं तव राजेन्द्र सुखं कांडस्व सीतया। क्रियत लोकाङ्गुष्ठार्थे जानामि तव चेष्टितम् ॥२२॥ एवं नानाविधैस्तस्य चारित्रैर्गह्वरस्य राघवम्। ददौ सिंहासनं छत्रं चामरे चंपकप्रभम् ॥२३॥ पानपात्रं भोजनस्य पात्रं ह्येवं मनोरमम्। कण्ठे कुण्डले बाहुभूषणे मुकुटोत्तमम् ॥२४॥ राम प्रस्थापयामास बद्धात्वा चिन्तामणिं हृदि। हृदि चिन्तामणिं दृष्ट्वा राघवस्य विदेहजा ॥२५॥ प्राहातिलज्जिता रामं गौर्ये चिन्तामणिस्तव। तथेति राघवोऽप्युक्त्वा विमानेन जनैः सह ।२६। ययौ नत्वा शङ्करं हि कृत्वा यज्ञाधेश्चचनात्। आकाशे विम्वारुह्य विधिं मार्गेकेनाभवत् हि ।२७। भागीरथ्यास्तटेनैव हरिद्वारं ययौ जवात्। कुरुक्षेत्रं विगाद्याथ इन्द्रप्रस्थं ततो ययौ ॥२८॥ दृष्ट्वा मधुवनं रम्यं ययौ वृन्दावनं ततः। गोकुलं वीक्ष्य रामस्तु गोवर्धनमगाच्छनैः ॥२९॥ गत्वाऽथावन्तिकां पुण्यां क्षिप्रातीरेविराजिताम्। महाकाल पुरस्कृत्य पश्यंस्तीर्थान्यनेकशः ॥३०॥ दृष्ट्वा गजद्वयं क्षेत्रं सागरं कूपमेव च। ययौ स नैमिषारण्ये गोमत्यां स विगाह्य च ॥३१॥ सूतं पौराणिकं दृष्ट्वा शौनकादीन् प्रपूज्य च। स्नात्वा तद्रत्नतीर्थेऽसौ रघूत्तमः ॥३२॥ तमसां तां विगाद्याथ ददर्श नगरीं निजाम्। रम्यामागतमाज्ञाय सुमंत्रो वेगवत्तरः ॥३३॥

दो कर्णफूल, दो सुन्दर चूड़िएं, छाट-छाट घुंघरुवाले शब्दसे युक्त करधनी, चन्द्रमाके समान कान्ति- मान दो सीमन्तभूषण और मणि तथा मोतियोंके हार भी दिये । पश्चात् शिवजीने भी अनेक विधियोंसे रामका पूजन करके उनसे प्रश्न किया ॥ १८-१९॥ हे राम ! आपके नाभिकमलसे चतुरानन ब्रह्मा हुए। उन ब्रह्मासे मैं पैदा हुआ और रोदन करनेके कारण मेरा नाम रुद्र पड़ा ॥ १९ ॥ हे रघुनाथ ! इस प्रकार मैं आप- का पौत्र हुआ। हे राम ! आपकी आज्ञाका पालन करते हुए आपके सांकेतिक अनुमार मैं प्रलयकालमें तीनों लोकोंका संहार करता हूँ । तब क्या यह पाप आपका नहीं लगता, जो आज आप साक्षात्परब्रह्म होकर भी रावणवधरूप ब्रह्महत्यारूपी लोकापवादके भयसे प्रायश्चित्तरूपी अश्वमेध यज्ञ करते हैं ? ॥ २० । २१ ॥ अथवा ठीक ही है, मैं समझ गया। हे प्रभो ! आप यह सब लोकशिक्षाके लिये क्रीड़ा मात्र कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो आप धन्य हैं! सीताके सहित क्रीड़ा करें। लोकमर्यादाको स्थापित करनेके अतिरिक्त और कुछ भी आपकी क्रीड़ाका प्रयो- जन नहीं है ॥ २२ ॥ इस प्रकार अनेक रामचरित्रोंका थोराभका स्तुति करनेके बाद शिवजीने उन्हें सिंहासन, एक छत्र, दो चमर, एक उत्तम शय्या, पानका डिब्बा, भोजन करनेके लिये सुन्दर सोनेका थाल, कंकण, कुण्डल, बाहे और मुकुट दिये ॥ २३।२४ ॥ तदनन्तर रामने गलय चिन्तामणि बाँधकर उन्हें विदा किया। सीताने रामके हृदयपर चिन्तामणि देखकर उनसे कुछ लज्जापूर्वक कहा- अच्य, यह चिन्तामणि आपका रही और यह कामधेनु मेरी । श्रीराम भी 'बहुत अच्छा' कहकर वहांसे सब लोगोंके साथ विमानपर सवार हो शंकर भगवान्‌को नमस्कार करके चल दिये । चलते समय वे शंकर भगवान्‌को भावी यज्ञकी सूचना देत गये। ब्रह्माका भी एक मासके बाद होनेवाले यज्ञमें अयोध्या आनेके लिए कहा ॥ २४-२७॥ वहाँसे भागीरथीके किनारे- किनारे हरिद्वार गये । वहाँसे शीघ्र ही कुरुक्षेत्रमें स्नान करके इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) गये ॥ २८ ॥ यहाँसे मनोहर मधुपुरीपुरी देखकर वृन्दावन पधारे । गोकुल देखकर वे गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ २९ ॥ बादमें क्षिप्रा नदीके परम पवित्र अवन्तिका (उज्जैन) नगरीको गये, जो कि क्षिप्रा नदीके किनारेपर विद्यमान है। वहाँ महा- कालेश्वरका दर्शन-पूजन करके अनेक शुभ तीर्थ देखते हुए गजद्वय (हस्तिनापुर) क्षेत्र तथा सागर कूपको देखे। पश्चात् नैमिषारण्य गये। वहाँ गोमतीमें स्नान किया ॥ ३० ॥ ३१ । फिर पौराणिक सूतका दर्शन करके

२०६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९


अयोध्यां धूपयामास प्रोच्छ्रितानांविधध्वजैः। तोरणैश्च पताकाभिः पुष्पहारैर्मनोरमैः ॥३४॥ शोधयित्वा राजमार्गांन् सेचयित्वा तु चन्दनैः । विकीर्णकुसुमं दैव्यैर्बलिदीपैर्विराजितान् ॥३५॥ वप्रणेंद्रं पुरस्कृत्य सेनया परिवेष्टितः । प्रत्युज्जगाम राजेंद्रं पुष्पकस्थं त्वरान्वितः । ३६ । दण्डवत्प्रणिपत्याथ दत्त्वा चोपायनानि तन् । आलिङ्गितो राघवेण मेने स कृतकृत्यताम् ।३७। ततो वाद्यनिनादैश्च नर्तनैर्वारयोषिताम् । वेदघोषैर्द्विजानां च रामतीर्थं ययौ शनैः ॥३८॥ स्नात्वा तन्मग्ग्नयोये यत्न तीर्थे सुपपुण्यदम् । स्वयमेव कृतं पूर्वं नित्यकर्मार्थमादरात् ॥३९॥ वसिष्ठोक्तविधानेन कृत्वा चैकमुपोषणम् । दधिश्राद्धं विधायाथ दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥४० । तृतीये दिवसे रामो विमानेन विहायसा । पुर्यां विलोक्य प्राकारम् हेमरत्नविनिर्मितान् ॥४१ । अयोध्यां शोभितां रम्यां गोपुराट्टालमंडिताम् । वीथीहट्टप्रभायुक्तां चतुष्पथविराजिताम् ॥४२॥ पश्यन् स्वकीयं राजसभाद्वारं प्राप रघूत्तमः । यानं भूमंडल प्राप्य सुखमासीत्स्थिरं तदा ॥४३॥ ततः सुमंत्रपत्नीभिर्दध्योदनविनिर्मिताः । बलयः कांस्यपात्रस्था जलनैर्घटास्तथा ॥४४॥ सीताराघवयोर्देहादुत्तार्य घृतकम्बदा । नीत्वा व्यक्त्वा विदूरे तु स्नात्वा रामगृहं ययुः ॥४५॥ ततो रामो विमानाऽथादवरुह्य स बन्धुभिः । नागरैर्नरभूपैर्नृपतिभिः सभायां सविवेश ह ॥४६॥ तस्थौ सिंहासने रम्येचिन्तामणिविराजितः । तस्यूर्नृपाः सभायां श्रीराघवेणातिमानिताः ॥४७॥ सीताऽपि निजगेह सा विचित्ररत्ननिर्मितम् । कामधेनुं पुरस्कृत्य प्रविष्टज्ञातिहर्षिता ॥४८॥ ततो रामः कामधेनुप्रभूनैस्तपस्तितैः । परमान्नैः षड्रसेश्च भोजयामास भूसुरान् ॥४९॥


शौनकादि ऋषियोंका पूजन और वह्नितीर्थ नामके सरोवरमें स्नान किया ॥ ३२ । तमसा नदीमें अवगाहन करके राम अपनी नगरीको चल पड़े। उधर श्रीरामको आते सुनकर सुमंत्रने झटपट अनेक प्रकारकी बड़ी बड़ी पताकाओं तथा ध्वजाओंसे अयोध्या नगरीको सजवा दिया। अनेक तोरण बँधवा दिये । ३३ ॥ ३४ ॥ राजमार्गोंको साफ कराकर चन्दनके जलसे छिड़काव करा दिया। उनपर दिव्य और नाना रंगके फल बिछवा दिये । जगह-जगह चौराहोंपर दीपक तथा पूजाकी सामग्री रखवा दी । ३५ । पश्चात् सुमन्त्रजी बाणेन्द्र (हाथी) को आगे करके सेनासहित स्वयं पुष्पकस्थित राजा रामकी अगवानी करने गये ॥ ३६ । उन्होंने उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके अनेक उपहार दिये। बादमे मंत्री सुमंत्र रामसे आलिङ्गित होकर अपने आपको कृतकृत्य समझने लगे ॥ ३७। तदनन्तर बाजे-गाजे करांगनाओंके नृत्य तथा ब्राह्मणोंके वेदघोषके साथ राम धीरे-धीरे रामतीर्थपर गये ॥३८ वहाँ जाकर उन्होंने सरयूके जलमें स्नान किया। वह बड़ा पवित्र तथा उत्तम तीर्थ स्वयं रामके ही नित्यकर्मके लिये निर्मित हुआ था ॥ ३९ ॥ वहाँ उन्होंने वसिष्ठजीके कथनानुसार विधिवत् एक उपवास किया, दधिश्राद्ध किया तथा अनेक दान दिये ॥ ४० ॥ तीसरे दिन श्रीराम विमानके द्वारा आकाशमार्गसे नगरके सुवर्णनिर्मित प्राकारोंको देखकर पुरद्वार तथा सुन्दर अटारियोंसे सुशोभित मनोहारिणी अयोध्यामें पधारे। जो गलियों, सड़कों, बाजारों तथा चौराहोंसे बढ़ी ही भली लग रही थी ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ बहुत दिनों बाद आज उन्हें अपनी राजसभाके द्वारका दर्शन प्राप्त हुआ। वहाँ आकर वे यानपरसे उतर पड़े। विमान भी भूतलपर उतरकर सुखपूर्वक खड़ा हो गया ॥ ४३ ॥ तब सुमंत्रकी स्त्रियें दधि-ओदन-से युक्त काँसेके पात्रमें रक्खी हुई बलिर्ग तथा जल-तेलसे पूर्ण सैकड़ों घट सीता तथा रामके देहपरसे उतार तथा दूर ले जाकर छोड़ आयीं और स्नान करके रामके महलमें गयीं ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ श्रीराम भी विमानपरसे उतरनेके बाद नागरिकों तथा अन्य राजाओंके साथ सभाभवनमें पधारे ॥ ४६ ॥ चिन्तामणिसे सुशोभित होनेवाले राम सिंहासनपर जा विराजे तथा उनसे सम्मानित होकर अन्य राजे भी यथास्थान बैठ गये ॥ ४७ ॥ महारानी सीता भी कामधेनुको लेकर प्रसन्नतापूर्वक चित्र-विचित्र रत्नोंसे निर्मित अपने महलमें गयीं ॥ ४८ ॥ पश्चात् श्रीरामने कामधेनुसे प्राप्त घृतसे निर्मित षड्समय उत्तम पक्वानों द्वारा

सर्गः ९ ] यात्राकाण्डम् २०७


अचाण्डालांस्तर्पयित्वा स्वयं कृत्वाऽशनं तदा ।
निद्रार्थं नृपतीन् याने स्थलमाज्ञापयत्तदा ॥ ५० ॥

पञ्चरात्रं नृपान् प्रीत्या स्थापयित्वा स्ववेश्मनि ।
वस्त्रालङ्कारतुष्टैस्तोष्ययित्वा भटैस्ततम् ॥ ५१ ॥

तान् प्रोवाच रमानाथः प्रवृद्धकलशपुरान् ।
मम यज्ञानुगं दृष्ट्वा सन्तृप्तैर्गोः पुनः ॥ ५२ ॥

आगन्तव्यं जनपदैः स्वसैन्यैर्नागरैः सह ।
इत्यज्ञां नृपतीगम्य संगीकृत्य नृपोत्तमाः ॥

ययुः स्वं स्वं पुरं देशं स्वबलैः परिवेष्टिताः ॥ ५३ ॥

सुग्रीवाद्यान्वानरांश्च परिवारसमन्वितान्
आज्ञापयित्वा नद्यानि स्थापयामास स्वानिके ॥ ५४ ॥

राजिमेधानन्तरं हि प्रेषयिष्याम्ब्यहं त्विति ।
अतो दुन्दुभिनिर्घोषं स्वपुर्यां घोषयत्तदा ॥ ५५ ॥

मन्नारम्य जनैः सर्वैरयोग्यमानगर्गस्खिनैः ।
यैः कैश्चिदत्र पथिकैर्भिक्षापार्कर्न युज्यताम् ॥ ५६ ॥

यावत्कण्डम्यहं भूम्यां राज्यं सीतासमन्वितः ।
निजगार्हस्थ्यमालम्ब्य ये वर्तन्ते नरोत्तमाः ॥ ५७ ॥

ते कुर्वन्तु सुखं पार्क स्वस्वगेहेषु भक्तितः
निबंधो मम न ह्येयो वर्तितव्य यथासुखम् ॥ ५८ ॥

इत्याज्ञाप्य जनान् रामः सुखं तस्थौ त सीतया ।
अयोध्यायां तु सर्वत्र वेदघोषो गृहे गृहे ॥ ५९ ॥

मङ्गलानि समुत्साहा नर्तनं वारयोषिताम् ।
बभूवुश्च पुराणानि कीर्तनानि हरेः कथाः ॥ ६० ॥

एवमासीत्सुसंतुष्टा साकेतनगरी शुभा ।
एवं प्रोक्तं मया शिष्य यत्राकाण्डमनुत्तमम् ॥ ६१ ॥

ये शृण्वंति नरा भक्त्या तेषां यात्राफलं भवेत् ।
यात्रार्थनार्थनोयोगे यात्राकाण्डमिदं वरम् ॥ ६२ ॥

पठित्वा ये तु गच्छंति सुखनायांति ते गृहम् ।
ब्रह्महत्यादिपापानि कृतानि भनवैः सकृद् ॥ ६३ ॥

यात्राकाडमिदं जप्त्वा शुद्धिस्तेभ्यो भविष्यति ।
सर्वतीर्थावगाहेन यत्फलं परिकीर्तितम् ॥ ६४ ॥

यात्राकाण्डमिदं श्रुत्वा तत्फलं प्रतिपद्यते ।
धनार्थी धनमाप्नोति कामी कामानवाप्नुयात् ॥ ६५ ॥


ब्राह्मणोंसे लेकर चाण्डाल तकको यथोचित भोजन कराके तृप्त किया । बादम राजाओक हाथ स्वयं भोजन करके राजाओको अपनेपने विश्रामके तथा अन्यान्य महलोंमे जानेकी आज्ञा दी ॥ ५० ॥ इस प्रकार पाँच दिन तक उन लोगोंको बड़े ही प्रेम तथा सत्कारसे रामने अपने भवनमें रक्खा । बादम वस्त्र, अलंकार तथा अश्व आदि दे और उन्हें भलीभाँति प्रसन्न करके अपने-अपने स्थानको आनकी आज्ञा दी । जब वे हाथ जोड़कर जानेके लिए सम्मुख खड़े हुए, तब रमानाथ रामने फिरसे उन यज्ञके मुख्यमुख्यगणपर मस्तक संभूत अश्वके पीछे-पीछे चलनेके लिए ससैन्य और प्रजा सहित आनिक लिये कहा । वे उन इस आज्ञाक स्वीकार करक अपनी-अपनी सेन के साथ अपने-अपन देश तथा नगरकी ओर चल दिये । परिवार सहित सुग्रीव आदि वानरोको रहनेके वास्ते बहुतसे भवन देकर अरने यहाँ रक्खा और कहा कि अश्वमेध यज्ञके पश्चात् तुम लोगोंको विदा करेंगे। बादमें श्रीरामने अपने नगरमें डिंडोरा पिटवाकर कहला दिया कि आजसे लेकर मेरे नगरवासियों तथा अन्य यान्नी लोगोको अल्य भोजन बनाकर नहीं खाना चाहिये। सब लोग तबतक हमारे भोजनालयम भोजन करें, जब तक कि मै भूमिपर राज्य करूँ । हाँ, जो गृहस्थाश्रमी हों, वे भले ही अपने-अपने घरोंमें भक्तिपूर्वक सुखसे भोजन बनाएँ । उनके लिय मेरा आग्रह नहीं है। ५१-५८ ॥ यह आज्ञा देकर राम सीताके साथ सुख-पूर्वक रहने लगे । तबसे अयोध्या नगरीमे घर-घर वेदध्वनि होने लगी । ५९॥ मङ्गलगान होने लगे, सोत्साह वारंगनाओंका नृत्य होने लगा तथा पुराणपाठ और हरिकथाएं होने लगीं ॥ ६० ॥ इस प्रकार वह समस्त पुरी आनन्दित हो उठी । हे शिष्य मैंने तुमको भली भाँति उत्तम यात्राकांड सुनाया ॥ ६१ ॥ जो मनुष्य इस यात्रा-काण्डको भक्तिपूर्वक श्रवण करेगा, उसे समस्त यात्रायें करनेका फल प्राप्त होगा। यदि मनुष्य यात्रामे जानेके समय अथवा धन कमानेके लिये जाते समय इसको सुनकर जाय तो वह सुखपूर्वक और कृतार्थ होकर लौटेगा। यदि मनुष्यने ब्रह्महत्यादि जैसे घोर पाप किये हों तो वे भी इसकी मुजन्स दूर हो जाते हैं और प्राणी शुद्ध हो जाता है। सब तीर्थोंकी यात्रा करनेसे जो फल होता है, वह इस यात्राकाण्डको पढ़ने तथा सुननेसे प्राप्त हो जाता है । धनकी इच्छावालेको धन और कामकी इच्छावालेको काम मिलता है ॥ ६२-६५ ॥ इस

२०८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९


पापी पूतो भवेत्सद्यो यात्राकाण्डश्रवादिना । यः कश्चित्प्रातरुत्थाय कृतशौचविधिर्नरः ॥ ६६ ॥
तीर्थांशं च वरं काण्डमिदं पुण्यं पठिष्यति । तस्य रामश्च संतुष्टः पूरयिष्यति वांछितम् ॥ ६७ ॥
सर्वतीर्थावगाहस्य फल तस्य भवेद्ध्रुवम् । यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च ॥ ६८ ॥
तानि सर्वाणि नश्यन्ति यात्राकाण्डश्रवादिना ॥ ६९ ॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे
रामोत्तरयात्रा-नगरप्रवेशो नाम नवमः सर्गः ॥ ६ ॥

यात्राकांडे च सर्गा वै नव प्रोक्ता मनीषिभिः ।
पंचत्रिंशोत्तराः सप्तशतश्लोका भवापहाः ॥ १ ॥


कांडको सुननेसे पापी पुरुष भी पवित्र हो जाता है । जो प्राणी प्रातःकाल उठ तथा स्नानादि करके इस पवित्र यात्राकाण्डको पढ़ेगा तो श्रीरामकी अनुकम्पासे उसके सब मनोरथ पूरे होंगे ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ उसे सब तीर्थोंकी यात्राका फल मिलेगा जन्म-जन्मान्तरके जो कुछ पाप होंगे वे सब इस यात्राकाण्डको सुननेसे अवश्य नष्ट हो जायेंगे ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकांडे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां रामोत्तरयात्रा-नगरप्रवेशो नाम नवमः सर्गः ॥ ६ ॥

इस यात्राकांडमें नौ सर्ग और भवभयको दूर करनेवाले ७३५ सात सौ पैंतीस श्लोक कहे गये हैं ॥ १ ॥

* इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डं समाप्तम् *

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु

श्रीरामचन्द्रो विजयतेतराम्

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गतं

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽऽह्वया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्

यागकाण्डम्

प्रथमः सर्गः

(अश्वमेध यज्ञके लिए सामग्री एकत्र करनेका निर्देश)

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः सभाध्ये एकदा गुरुमब्रवीत् । कुम्भोदरमुनेर्वाक्यात्तीर्थयात्रा मया कृता ॥ १ ॥
इदानीं तस्य वाक्येन वाजिमेधं करोम्यहम् । यज्ञोपकरणानि त्वं लक्ष्मणाय वदस्व हि ॥ २ ॥
सुमुहूर्ते शुभे लग्ने श्यामकर्णस्त्रिपुच्छकः । तुरङ्गो दिव्यवस्त्राद्यैर्भूषयित्वा विमुच्यताम् ॥ ३ ॥
पृथ्वीप्रदक्षिणार्थं हि तत्पृष्ठेऽयुतसंख्यया । सेनया सह शत्रुघ्नः सुमंत्रेण महाद्युतिः ॥ ४ ॥
तद्राघववचं श्रुत्वा वसिष्ठो मुनिसत्तमः । ज्योतिर्विद्भिःसहितो दृष्ट्वा सुमुहूर्तं शुभोदयम् ॥ ५ ॥
आज्ञापयत्स सौमित्रिं सभायां राजसन्निधौ । सौमित्रेऽद्यदिनात्सप्तमेऽह्नो मुहूर्त्तः सप्तमेऽहनि ॥ ६ ॥
दीक्षार्थं रामचन्द्रस्य वाजिमेधाख्यकर्मणि । रामतीर्थे यज्ञभूमिः शोधनीया हलादिभिः ॥ ७ ॥
सुवर्णनिर्मितैर्दिव्यैर्ब्राह्मणैः सह सत्वरम् । दशक्रोशमिताऽयोध्याबहिः सर्वत्र लक्ष्मण ॥ ८ ॥
समा कंकरहीना तु लिप्ता चन्दनजातिभिः । मण्डपश्च विधातव्यः सर्वदोषखण्डितः शुभः ॥ ९ ॥


श्रीरामदासने कहा इसके अनन्तर एक दिन सभामें रामचन्द्रजी गुरु वसिष्ठसे कहने लगे—हे गुरो ! कुम्भोदर ऋषिके कथनानुसार मैंने तीर्थयात्रा की । अब उन्हींकी बातसे मैं अश्वमेध यज्ञ भी करना चाहता हूँ । यज्ञकी जो-जो आवश्यक वस्तुएँ हों, कृपया आप लक्ष्मणको बतला दीजिए ॥ १ ॥ २ ॥ किसी अच्छे मुहूर्त और शुभ लग्नमें श्याम रङ्गवाले जिसके कान, पैर और पूँछ हों, ऐसे घोड़ेको सुन्दर वस्त्रों और आभूषणोंसे सुसज्जित करके पृथ्वीप्रदक्षिणाके लिए छोड़ा जाय ॥ ३ ॥ तदनन्तर उस यज्ञीय घोड़ेकी रक्षा करनेके लिए दस हजार सेनाके साथ सुमन्त्र और शत्रुघ्न प्रस्थान करें ॥ ४ ॥ रामचन्द्रजी की इन बातोंको सुनकर वसिष्ठजीने ज्योतिषियोंके साथ अच्छे लग्न तथा अच्छे नक्षत्रसे संयुक्त एक बढ़िया मुहूर्त देखा और सभामें ही रामचन्द्रजीके सामने लक्ष्मणजीसे बोले—हे लक्ष्मण ! रामचन्द्रके यज्ञकी दीक्षा लेनेका शुभ मुहूर्त आजसे ठीक सातवें दिन है ॥ ५ ॥ ६ ॥ सबसे पहला काम यह है कि इस अश्वमेध यज्ञके लिए रामतीर्थकी भूमि सुवर्णके बने हुए हलों द्वारा ब्राह्मणोंके साथ जोतकर शुद्ध की जाय । अयोध्याके चारों ओर दस कोस तककी जमीन पटवाकर बराबर कर दी जाय और ऐसी साफ की जाय कि उसमे कहीं कुछ भी कङ्कड़-पत्थर न रहने

२१० आनन्दरामायणे [ सर्गः १

जम्बाम्रादिद्रुमाणां च शाखाभिः कुसुमैरपि । पल्लवैश्च विचित्रैश्च कदलीस्तम्भमण्डितः ॥१०॥ समन्तस्तोरणानि बन्धनीयानि यत्नतः । पुष्पहाराः फलादीनां मालाश्च विविधाः शुभाः ॥११॥ वेद्यः सहस्रशः कार्याः सुधया चेटकादिभिः । करणीयं महत्कुण्डं सप्ताब्धिध्येन मृन्मयम् ॥१२॥ इंटोपरि महत् कार्यं गोमुखं च मनोरमम् । खदिरस्य विचित्रं हि वसोर्धारार्थमुत्तमम् ॥१३॥ सितरक्तासिनेश्चैत्र नीलपीतादिभिः शुभैः । नानावर्षदचूर्णैश्च रूपधातुविनिर्मितैः ॥१४। नानावर्णैर्विलेख्यानि स्वस्तिकानि समन्ततः । कमलानि विचित्राणि तथा चाष्टदलानि च ।१५। शङ्खचक्रगदापद्मवल्ल्यश्च सहस्रशः । कुसुमानि विचित्राणि यज्ञभूम्यां समन्ततः ॥१६॥ चतुर्विंशत्युच्छ्राः कार्या यत्नस्तम्भा महोच्छ्रिताः । विनिर्मिताः सुवर्णेन मुक्ताहारविगुम्फिताः ॥१७॥ त्रितयं सर्वतोभद्रं कुण्डमध्येऽष्टदैवतम् । लेखनीयं तथा कुडं नानावर्णैर्विचित्रितम् ॥१८। दूत कार्याणि पात्राणि यज्ञार्थं मम पश्यतः । हैमाः किलोपकरणा वरुणस्य यथाऽध्वरे ॥१९। आसनानि शूर्याणां च निद्रार्थं च सहस्रशः । वासोगेहानि कार्याणि तृणैः पर्णैश्च खर्परैः ॥२०॥ पाकशाला विधातव्या कार्या शालाऽन्ननस्य च । ऋषिशाला विधातव्याः स्त्रीशालाश्च शुभावहाः ॥२१। यज्ञोपकरणानां च शाला परमसुन्दरी । सभाः कार्या नृपाणां च वस्त्ररत्नैर्विचित्रिताः ॥२२। आसनार्थं महार्हाणि वस्त्राणि च समन्ततः । आस्तीर्याणि तथा राज्ञामुपशाखाश्रयाणि च ॥२३॥ पक्षिपिछैः सुकार्पासभेदैः सम्पूरितानि हि । कश्चिदुपबर्हणानि विचित्राणि महान्ति च ॥२४। स्थापनीयानि सदसि महार्हाणि तु लक्ष्मण । स्थापनीयानि पानार्थं पात्राणि विविधानि च ॥२५। नानारसैः पूरितानि तथा पक्वफलादिभिः । नानासुगन्धद्रव्यैश्च रागैर्नानाविधैरपि ।२६।

पायें । फिर केशर-चन्दन से लीपकर वह भूमि पवित्र करनी होगी । उस भूमिपर ऐसे मण्डप बनाये जायें, जो सुन्दर हों और कहींसे कटे-फटे न हों ॥ ७-९ ॥ जामुन-आम आदि वृक्षोंकी शाखाओं तथा फूलों-पत्तोंसे खूब अच्छी तरह सजाकर केलके खम्भोंके फाटक बनाये जायें और मण्डपके चारों ओर फूलों और फलोंकी मालाएं लटकाई जायें ॥ १० ॥ ११ ॥ मण्डपके भीतर ईंट और चूनेकी पक्की जोड़ाई करके एक हजार वेदियां बनवायी जायें । वहीं ही मिट्टीका एक बड़ा भारी कुण्ड बनाया जाय । लेकिन वह मे अपने सामने बनवाऊंगा । कुण्डके ऊपर खैरकी लकड़ीका एक सुन्दर गोमुख बनाया जाय, जो वसोर्धाराके कामम आयेगा । सफेद लाल, काले, नीले और पीले पत्थरोंका चूर्ण तथा उपधातु (गेरू-मंचक आदि) के चूर्णसे जगह-जगह रङ्ग-बिरङ्गे स्वस्तिक लिखे जायें और अष्टदल कमल बनाये जायें ॥ १२-१५ ॥ जहां तहां शंख चक्र, गदा पद्म तथा फूल-पत्तियोंकी चित्रकारी की जाय ॥ १६ ॥ सोनेके चौबीस यज्ञस्तम्भ बनाये जायें, जो खूब ऊँचे हों और उनपर मोती-माणिक आदिका काम किया गया हो । कुण्डके पास अष्टदेवताके निर्मित सर्वतोभद्र बनाया जाय और वेदीके चारों ओर अच्छे-अच्छे चित्र बनाये जायें । यज्ञके लिए जितने पात्रोंकी आवश्यकता होगी, वे सब मेरे सामने बनाये जायेंगे । प्रायः वे सब पात्र सोनेके होंगे, जैसे वरुणदेवके यज्ञम थे ॥ १७-१९ । ब्राह्मणोंको बैठने और सोनेके लिए उनके, कपडोंके अथवा छप्परोंके हजार घर तैयार करने होंगे ॥ २० ॥ मण्डपकी एक ओर पाकशाला ( रसोईघर ) रहेगी, दूसरी ओर अशनशाला ( भोजनभवन ), तीसरी ओर ऋषि-शाला ( मुनियोंके ठहरनेकी जगह ) और एक ओर सुन्दर स्त्रीशाला ( स्त्रियोंके रहनेकी जगह ) बनेगी ॥ २१ । एक बड़ा सा और सुन्दर मकान यज्ञकी सब सामग्रियें रखनेके लिए बनेगा । अच्छे-अच्छे कपड़ोंसे सजाकर राजाओंके लिए कई महफ़िलें बनायी जायेंगी । बैठनेके लिए बढ़िया बढ़िया कालीन-गलीचे आदि मँगाकर बिछाये जायेंगे । पक्षियोंके पखों या रूईसे भरी कितनी ही सुन्दर तकियें राजाओंको लगानेके लिए रक्खी जायेंगी । सबको जल पीनेके लिए विविध प्रकारके पात्र रक्खे जायेंगे ॥ २२-२४ ॥ सभामवनमें जल पीनेके लिए सुन्दर तथा बहुमूल्य बर्तन रक्खे जायेंगे । कितने ही पके हुए फलोंके शरबतसे भरे

सर्गः १ ] उत्तरकाण्डम् २११


मदैर्विचित्रैर्मधुरैस्तथा मादकवस्तुभिः । नानासुगंधतैलेश्च काचकुम्भाः सहस्रशः ॥२७॥
स्थापनीयाश्चन्दनैश्च सुगंधैर्गन्धवादिभिः नानोपकरणैर्युक्तानां ताम्बूलानां सहस्रशः ॥२८॥
स्थापनीयानि पात्राणि चामराणि सहस्रशः । व्यंजनानि विचित्राणि तथाऽऽदर्शा विचित्रिताः ॥२९॥
स्थापनीयाश्च क्रीडार्थं क्रीडोपकल्पणानि च । स्थापनीयानि महत्सु नृपाणां चित्राणि च ॥३०॥
मृत्पात्रसम्भराः कार्याः शतशः पुष्पवाटिकाः । जलप्रणालि कार्याणि सर्वत्र विविधानि च ॥३१॥
नानाविवित्रवर्णानां वयसां पंजराः शुभाः । हेमचूर्णमणिक्लैश्च प्रवालैर्नामरत्नैश्च ॥३२॥
कमनीयाश्च भूषास्तैस्तोषणाद्यैः प्रपूरिताः । वधनीया मंडपेषु नर्तितव्योऽप्सरोगणैः ॥३३॥
धूपयंतु सुधूपैश्च सुगायतु हि गायकाः । वादनीयानि वाद्यानि बहूनि विविधानि च ॥३४॥
पूजोपकरणाद्यैश्च शस्त्राणि संस्थितानि हि । पृथक् पृथक् मञ्चांश्चैव स्थापनीयानि लक्ष्मणः ३५॥
तथा ऋषिसभार्या तु दभांश्च समिधस्तथा । दण्डाः कमण्डलुयुताः स्थापनीयाः सहस्रशः ॥३६॥
परिधायांथ कौपीनान् वल्कलाश्चाजिनानि च । पूजाद्रव्याणि हव्यानि जलकुम्भाः सहस्रशः ॥३७॥
शौचार्थे मृत्तिकाः शुद्धा दंतकाष्ठानि पादुकाः । रोविष्ट मुखशुद्ध्यर्थे नानावस्तूनि कल्पप ॥३८॥
तथा नरासभार्या तु पूजकत्राण्यनेकशः । सौभाग्याद्रव्यरत्नानि सुगंधैः पूजितान्यपि ॥३९॥
वायनान् विचित्राणि स्थापजाय नि लक्ष्मण । कतर्यः कज्जाना च पात्राणि कुंकुमानि च ॥४०॥
करउस्थानि रम्याणि भूषणान्युज्ज्वलानि च । हरिद्रादीनि वस्तूनि कञ्चुक्यो वसनानि च ॥४१॥
धारनीयानि व्यञ्जनचमरादीनि सादयम् । सहृदा लेखनीणानि पत्राणि च सभामतः ॥४२॥


के सह कडाव वहाँ उपस्थित रहें। अनेक प्रकारके इत्र, गुलाबजल, केवड़ाजल, कस्तूरी और केसरका चन्दन सबको लगानेके लिए तैयार रहना चाहिए ॥२५, २६। विविध प्रकारके स्वादिष्ट मद्य तथा अनेक मदकर वस्तुएं जुटाई जायें। बहुत किस्मके सुगन्धित तेलोंसे भरे हुए काँचके हजारों घड़े सदा तैयार रहें। बहुतसे बर्तनोंमें सुगन्धित चन्दन और अत्तर रक्खे रहें। विविध सामग्रियोंके साथ हजारों ताम्बूलोंके थालके बीड़े लगा-लगाकर रक्खे जायें ॥२७॥२८॥ हजारों चँवर हाँकनेके लिए मँगा लेने चाहिये। स्नानके लिए तरह तरहके पक्वान्न सर्वथा तैयार रहें। मुँह देखनेके लिए अच्छे अच्छे दर्पण मँगवा लिये जायें खेलनेके लिए जितनी भी सामग्रियां हो सकें मँगवाकर रख ली जावें। देश विदेशके राजाओंके चित्र मँगवाकर सभाभवनमें आगे और टाँग दिये जावें ॥२९॥३०॥ बहुतसे फूलोंके गमले मँगवाकर वहाँ-पर रक्खे जावें। छोटी-छोटी दूरपर हजारों फौहारे बनाये जायें, जिनसे सदा जलकी धारा बहता रहे तोता, पोले, हरे तथा मैनादि आदि सुहावने पक्षियोंके पिंजड़े लाकर मण्डपमें चारों ओर लटका दिये जावें और हीरा, मोती पन्ना और मूंगा आदिके जड़ाऊ वस्त्रों द्वारा वे सजाये जावें। ३१॥३२॥ जिससव इन पक्षियोंक भोजन करनकी सब सामग्री भरी रहे। वहाँपर नाचनेके लिए सुन्दर सुन्दर वेश्याव बुलायी जायें। धूप देनेवाले लोग सुगन्धित धूप देनके लिए नियुक्त किये जावें। गानवाले लोग गाय और बजानेवाले विविध प्रकारके बाज बजावें ॥३३॥३४। सब राजमण्डलाने अलग-अलग पूजन करनकी सामग्रियोंसे पूर्ण बर्तन रक्खे रहें। ऋषिसभाओंके लिए कुशा, दण्ड, कमण्डलु तथा समिधाका विशेष प्रबन्ध रहे। ऊपर पहननेके लिये वस्त्र और नीचे पहननेके लिये कौपीन, वल्कल वस्त्र, मृगचर्म, पूजनकी सब सामग्रियां, हवन करनकी सब वस्तुएं, जलसे भरे हुए हजारो घड़े बादि वहाँपर ला-लाकर रक्खे जायें। हाथ पवित्र करनेके लिए शुद्ध मृत्तिका, दातौन, खड़ाऊं तथा मुखशुद्धिके लिये बहुतसे मंजन आदि वहींपर रक्खे रहें ॥३५-३८॥ इसी तरह नारीसभाके या पूजाके बहुतसे पात्र रहने चाहिये। सोहागके लिये शुभसूचक रोली-सेंदुर आदि सुगन्धित वस्तुयें भी रक्खी रहें। सुन्दर दर्पण लाकर रख्य जायें। काजलके कुमकुमभरे बर्तन आदि भी वहाँ उपस्थित रहें ॥३९॥४०॥ बहुत-सी बाँसकी बनी हुई सन्दूकोंमें सुन्दर और चमकवाते हुए आभूषण रक्खे रहें। हल्दी-रोली आदि चीजें और कंचुकी आदि वस्त्र लाकर रक्खे जायें। पंखे और चमरादिक

७१२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

...समुद्रान्तानथ तथा दूता महाजवाः। जनकाय प्रेषणीयाः केकटाद्यनृपेष्वथौ ॥४३॥
...सख्यायाः सुमंत्राद्याः प्रिनंगं प्रति लक्ष्मण। श्यामांध्रिः श्यामकर्णश्च श्यामपुच्छः सितः शुभः ॥४४॥
महादामार्घ्यवस्त्रैर्दव्यैरागमनेन च शोभनीयाचापवर्गमुक्तादार्ममनागमः । ॥४५॥
हर्म्यभिः शुक्लवस्त्रैश्च वर्णगन्धविभूषणैः । तस्य भाले हेमपत्रे लेखनाय स्फुटाक्षरैः ॥४६॥
कोमलेन्द्रस्य रामस्य यज्ञांगतुरंगमो ह्ययम् । ज्ञेयः सर्वैर्नृपैर्मुक्तः कृतै भुम्पाः प्रदक्षिणाम् ॥४७॥
यस्यास्ति बलं तेनासौ बंधनीयोऽद्यसुत्तमः । नोचेत् क्रोधाच्च मित्राप्त पुरस्कृत्य बलैः सह ॥४८॥
स्वकुटुम्बैर्नागरैश्च तथा जानपदैः सह। आगन्तव्यं नृपतिभिर्यज्ञांगाश्वानुवर्तिभिः ॥४९॥
यज्ञभूमिमवोध्यायां युद्धेर्जित्वा महोद्धतान्। एवं पत्रं बंधयित्वा मुक्तामणिर्विचित्रितैः ॥५०॥
अनन्तरंः साभयित्वा सिद्धः कार्यश्च मण्डपे सिद्धः कार्यः स शत्रुघ्नः सैन्येन परिवेष्टितः ॥५१॥
रथाऽश्वोष्ट्रगजाक्षार्थ सुमन्त्रेण समन्वितः नानापुष्पनदीनां च जलकुभान् सहस्त्रशः । ५२॥
नानादृष्टामृत्तश्चापि शत्रुघ्नेनानयस्व हि। शोभनीया पुरी रम्या पताकाध्वजतोरणैः ॥२३॥
दत्त्वा सुधा देया तथा प्रासादमस्तके । देवालयाभ्यन्तरेऽथ चित्रशाला मनोरमाः ॥५४।
लेखनाया विधातव्या रत्नदीपाः सदैव हि। पूजोपकरणादीनि प्रतिदेवालयेष्वपि ॥५५॥
स्यापयस्व समस्तानि वायन्त्याज्ञापयस्व भोः । राजमार्गः शोधनीयाः सेचनीयाश्च चन्दनैः ॥५६॥
वीथीगोषु मयंत्र चित्राणि विविधानि च। लेखनीयानि रम्याणि मुक्ताहाराः समन्ततः ॥५७॥
प्रवालमणिवैदूर्यकाश्मीरस्फटिकादिभिः नानाविधाश्च कुसुमंहाराः पक्वफलादिभिः ॥५८॥
बधनीयाश्च सर्वत्र जालश्चैविंशेषतः। एवं यच्चन्मया प्रोक्तं तत्कुरुष्वाधिघावरतः ॥५९॥


जाकर रख आयें और अपने मित्रोंके आगे हुई विटिंवां अपना यहाँ खर्चा रह ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ आज ही रामचन्द्रजीका मुहर लगा हुआ पत्र लेकर दूत मिथिलेश जनक, काश्मौर तथा केकय आदि राजाओंके पास जायें । तदनन्तर श्याम पुच्छ तथा श्याम रेंगवाला घोडेका । ४३ । ४४ ॥ बहुमूल्य वस्त्रों और आभूषणोंसे सजाये जाय, उसे म नवां अङ्गार और वस्त्राभूषण आदि पहन पहने जाय । एक सुवर्णपत्रपर ये व से साफ़ अक्षरामे लिखकर उसके माथेपर बाँध दिया जाय-॥ ४५ । ४६ । "कौसल्यादे पह राज गगारन्दन। यह यज्ञीय घाउ भूमिपे प्रदक्षिणा करनेके लिए छोड़ा गया है। सब देश-देशान्तरके राजाओको ज्ञात हो कि जिसमें बल हो, वह इस सुन्दर घोड़ेको बाँध ले, नहीं तो अपने देशवासियां, अपनी सेना तथा कुटुम्बिदाके साथ इस प्र हक पीछे-पीछे चलता हुआ हमारी यज्ञभूमि अयोध्या अगोध्यम आकर मुझसे मिल" ॥ ४७-४९ ॥ इस आशयका पत्र लटकाया जाय । रास्तेमें जो जो उद्दण्ड राज मिले उनसे युद्ध कर-करके उन्हें परास्त कि । जाय अनेक प्रकारके झाड़-फानूस आदिस सजा करके कि सिद्धमंडप बनाया जाय । इसके अनन्तर अपनी पूरी सेनाके साथ शत्रुघ्नजी सुमन्त्रको साथ लिये हुए घोड़ेपर सवार होकर उस यज्ञीय घोड़ेकी रक्षा करनेके लिए प्रस्थान कर । उसके पश्चात् बहुत-सी पवित्र नदियोंकी मृत्तिका और हजारो घड़ोमे जल भर-भरकर शत्रुघ्नजीके द्वारा मँगाया जाय ॥ ५०-५२ ॥ अयोध्यामें जितने भी देवालय हो, उन सबको चुनेसे पुतवाया जाय । सब मकानोंकी भी सफाई की जाय । देवालयोंके भीतर नाना प्रकारके चित्रकारियों की जायँ । हर एक देवालयम हर रोज पूजन करनेकी सामग्रियाँ भेजी जायँ ॥ ५३-५५ ॥ हे लक्ष्मणजी ! आज ही आप सब प्रकारके बाज मँगाकर रखनेकी आज्ञा दे दीजिए अयोध्याके सब राजमार्ग खूब अच्छी तरह साफ किये जायें और उनपर चन्दनका छिड़काव किया जाय । राजमार्गके सब बड़े-बड़े महलोंकी दीवारोंपर विविध प्रकारके चित्र बनानेकी आज्ञा दे दी जाय । जगह जगहपर मोतियोंका मालायें लटकार्या जायं ॥ ५६ । ५७ ॥ प्रवालमणि, वैदूर्यमणि, काश्मीर और स्फटिकादि मणियांकी मालायें, फूलोंकी मालायें तथा पके फलोंकी मालाय हर एक मकानोपर लटकाई जायें । इस प्रकार मैंने जो कुछ बतलाया है, उसे कर

सर्गः १] | सारकाण्डम् | २१३


तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा मूर्ध्नाऽऽकृत्वा स लक्ष्मणः। काम्यं यस्य तन्मर्त्यं गुरोर्वाक्याच्छताधिकम् ॥ ६०।
इति श्रीमत्काटारामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे
यागोपकरणनिवेदनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

(यज्ञमें सावधानी रखनेके लिए रामका लक्ष्मणको आदेश)

श्रीरामदास उवाच
अथ रामः समीतस्तु मुहूर्ते सप्तमेऽहनि । मज्जनोद्वर्तनाद्यैः स्नान्त्वा कुर्व्वांजनादिकम् ॥ १ ॥
तूर्यनादैर्द्विजानां च वेदघोषैर्विशेषतः। पौरस्त्रीणां गायनश्च पौराणां च जयस्वनैः ॥ २ ॥
आगत्य मण्डपे रम्ये तस्यां चित्रासनोपरि। ददौ कौशेयवस्त्राणि गुरुं रामस्स्वयम्भवीम् ॥ ३ ॥
पौराँश्च पौरपत्नीश्च मातृश्चाथ स्नुषांस्तथा । शश्रूश्चापि द्विजान् सर्वान् जनकं सुहृदस्तथा ॥ ४ ॥
बंधूंश्च बंधुपत्नीश्च स्वस्थांश्च जनः परम् । मंत्रिणांश्चाथ वीरांश्च दामदास्रींर्जनांस्तथा ॥ ५ ॥
नटनर्तकवद्यादीन् वारस्त्रींश्च ततः परम्। अचंडालादिकान् दत्त्वा ततः सीतां ददौ वरम् ॥ ६ ॥
हेमतन्तुसमुद्धृतं मुक्तामाणिक्यगुंफितम् । रत्नकान्त्याऽऽनीलार्थमध्ये मध्ये विचित्रितम् ॥ ७।
मुक्ताप्रवालपोपार्थमणिभिः सरंतो वृतम्। आदर्शबिम्बसदृशं विद्युत्तेजौपमं महत् ॥ ८ ॥
वतः स्वयं रामचन्द्रः पतकौशेयमुत्तमम्। हेमतत्त्वाऽऽवृतं नानावल्लीपुष्पादिचित्रितम् ॥ ९॥
दधारण्यत्तुत्तरीयं वामोंऽसलकारमंडितः । व्यजिनाक्षेपमात्रार्थमणिङ्कपविराजितः ॥१०॥
केयूरकुण्डलैर्मुक्ताहारैश्च कटकैर्युतः। ततो वसिष्ठर्द्धर्मस्तं मुक्तानां स्वस्तिकोपरि ॥११॥
निवेश्य राघवः सीतामाहूय बटुकैर्निजैः। निवेश्य रामवामांगे मुनिभिः परिवेष्टितः ॥१२।
रमेश कारयामास विघ्नशादिषूजनम् । पुण्याहादित्रयं चापि ददौ दीक्षा ततस्तयोः ॥१३॥


आओ। तुम उनके विषयमे कुछ मत सोचो विचारो। मैंने स्वयं सब सोच लिया है। इस प्रकार गुरुवरकी आज्ञा पाकर लक्ष्मणने सिर झुकाकर स्वीकार किया और सब काम उससे भी सौगुना बढ़-चढ़कर किया, जैसा कि गुरु वसिष्ठजीने कहा था ॥ ५८-६० ॥ इति श्रीमत्काटारामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे भाषा-टीकायां यागोपकरणनिवेदनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीरामदासने कहा — इसके बाद सातवें दिन सीताजीके साथ-साथ रामचन्द्रने मज्जन आदिका उबटन लगाकर स्नान किया, अंजन लगाया और तुरही आदि बाजो, वेदमंत्रों, नगरकी स्त्रियोंके गीतों और पुरवासियोका जयध्वनिके साथ ॥ १।२॥ आकर उस सुन्दर मंडपमें एक चित्रासनपर बैठे। तब गुरु वसिष्ठतथा अरुन्धतीको उन्होने सुन्दर-सुन्दर रेशमी वस्त्र दिये। इसके अनन्तर पुरवासियोंको, पुरवासिनी नारियोंको, माताओंकोको, बहुओंको, साधुओंको, नगरनिवासी सब विप्रोंको, मित्रोंका, बान्धवोंको, परिवारके लोगोंको, बान्धवोंकी भारियाको, समवयस्क मित्रोंको, मत्रियोंको, सेन पतियोंको, सैनिकोको, दास-दासियाको, ॥ ३-५ ॥ नटो, नतकोंको, बन्दीजनोंको, वेश्याओंको और चाण्डालसे लेकर ऊँच जाति तकके प्रत्येक मनुष्यको अच्छे-अच्छे कपड़े देकर जिसमे सुनहले तारका काम बना हुआ था, मोतियों-माणिक आदिके झुम्बे चारो ओर लटक रहे थे, ऐसे नीलम तथा पुखराज आदि मणियोंसे सुसज्जित एक सुन्दर वस्त्र सीताजीको दिया ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥ तब दर्पणकी तरह चमकती हुई एवं बिजलीकी तरह जिसमें तेज था और सुवर्णके तारका जगह-जगह बेल-बूटा बना हुआ था, ऐसे एक वस्त्रको लेकर रामचन्द्रजीने स्वयं पहिना ॥ ८ ॥ ९॥ ऊपरसे एक उपरना धारण किया। तरह-तरहके आभूषण पहने। जब रामचन्द्रन के कानोंम कुण्डल झूकने लगे, मोतियोंकी मालाएं गलेमें पड़ गयीं और हाथोंके सब गहने हाथोंमें पहन लिये गये। तब वसिष्ठजीने मोतियोंके चौरुके ऊपर रामचन्द्रजी तथा

२१४ आनन्दरामायणे [ सर्गः २

ध्वजारोपणविधानेन स्थापयित्वा ध्वजोत्तमम् । रामेण कारयामास गुरुः षोडश ऋत्विजः ॥१४॥ याज्ञवल्क्यं सराजऽध्वयुः सकलकर्मवित् । ब्रह्माऽभूच्च स्वयं ब्रह्मा होता गाधिसुतो बभूव ॥१५॥ उद्गाताऽभूच्छतानन्दो गुरुर्यो जनकस्य च । शमो बभूव शमिता कश्यपाद्या मुनीश्वराः ॥१६॥ दृष्टा राज्ञोऽश्वमेधं हि राघवेण महात्मना । ऋत्विजः षोडशैश्चक्रुरन्ये च नवकर्मसु । १७॥ पृथक् पृथक् संवृणानाः संवृणस्ते मुनीश्वरः कुण्डेऽग्निमथ संकृत्या पात्राण्यासाद्यविस्तरात्॥१८॥ दशमकर्णे जपित्वा मोक्षयामास भूतले । सव्यं प्रदक्षिणो कर्तुं तस्य संरक्षणाय हि ॥१९॥ न्यस्तं सुमंत्रेण सैन्यैनावृतमंशुपया शत्रुघ्नं प्रेषयित्वाऽथ तूष्णीं तस्थौ द्विजेर्गुरुः ॥२०॥ यज्ञवाटे मुनिगणैःपूर्णे नरपूतटै । समाऽपि सीतया तूष्णीं तस्थौ शृण्वन् कथाः शुभाः ॥ २१ ॥ कृष्णा जिनधरो दान्तः कुशपाणिः कृतान्वितः कोटिसूर्यप्रभाऽशश्वत्तथ्यो य गुरुसन्निधौ ॥२२॥ तदाज्ञायां प्रवृत्तायां भ्रातरः पुक्कन्ध्रजः । स्नाताः सुवासमः सर्वे रेजियरे सुष्टुवलकृताः ॥२३॥ कण्ठहिक्यश्च मुदिता निष्कवन्त्यः सुवाससः दीक्षाशालामुपाजग्मुर्हस्ताग्रा वस्तुपाणयः ॥२४॥ तदा विनेदुर्वादामि ननृतूश्चाप्सरोऽपिचः एवमस्मिन्नन्तर तत्र समाजग्मु मुनीश्वराः ॥२५॥ दिने दिनेऽश्वमेधस्य वार्ता श्रुत्वा, महर्षयः कश्यपोऽत्रिरथद्वाजौ विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥२६॥ मार्कण्डेयो मुकुण्डश्च च्यवनो मुङ्गलोऽसितः । जमदग्म्यो देवलश्च व्यासो नागपणः क्रतुः । २७ । विभाण्डको नारदश्च तुम्बुरुगालवो मुनिः । शिवदासो भानुदासो हरिदासो महानराः । २८ । शिवशर्मा रुद्रवर्मा शिवशर्मा मुनावधः । एकशृङ्गश्चतुः शृङ्गः मप्तशृङ्गस्त्रिशृङ्गकः । २९॥ तिलभांडो भृगुश्चैव भार्गवो राक्षपास्तस्तथा। धौम्यः दण्डश्चकपादश्चिपादश्चोर्ध्वबाहुकः । ३० ।


माताजीको बिठाया और अपने शिष्यों तथा ऋत्विजके साथ-साथ मन्त्रम पढके रामचन्द्रजीके द्वारा गणेश-गौरी आदिका पूजन तथा पुण्याहवाचन कराया और सीता तथा रामचन्द्रजीका यज्ञक दीक्षा दी। ध्वजारोपणको जो विधि होता है, उसके अनुसार ध्वजारोपण और रामचन्द्रजक द्वारा सोलह ऋत्विजोका वरण कराया ॥ १०-१४ ॥ सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता वसिष्ठ स्वयं अध्वर्यु बने । स्वयं ब्रह्माजी ब्रह्मा बने और होता का विश्वामित्रजी । सतानन्द उद्गाता बने, जो जनकके गुरु थे। इसके अनन्तर कश्यपादि मुनियोंका रामचन्द्रजीने ऋत्विक् बनाकर वरण किया ॥ १५-१७ ॥ इसके अतिरिक्त जो सैकडो ऋत्विजका रामचन्द्रजीने अन्यान्य कार्योंको करनेके लिए वरण किया। उन सबने यथासमय कुण्डमें अग्नि स्थापन करके यज्ञके पात्रोंको अपने-अपने स्थानपर रक्खा, विधियुवक श्यामकर्ण घोडका पूजन कराया और पृथ्वीकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करनेके लिए उसे छोड़ दिया ॥ १८, १९ ॥ उसकी रक्षाके लिए समन्तके साथ शत्रुघ्नको भेजकर भगवान् रामचन्द्रजी अपने गुरुजीके पास चुपचाप जा बैठे। उस यज्ञभूमिमें जहाँ हजारो ऋषि आकर बैठे हुए थे रामचन्द्रजी भी सीताजीके साथ एक किनारे बैठकर शुभ कथायें सुनने लगे उस समय रामचन्द्रजी केवल काले मृगका चर्म धारण किये और हाथमें कुशा लिये हुए एक साधारण वस्त्रमें थे फिर भी उनमें करोडो सूर्योका तेज था और वे गुरु वसिष्ठके पास बैठे थे ॥ २०-२२ । यज्ञकी दीक्षा हो जानेपर सब भ्राता फूलका मालायें तथा अच्छे-अच्छे कपडे पहिने बहुत ही सुन्दर दीख पडते थे । उनकी स्त्रियाँ भी गलेमें सोनेके कण्ठे और शरीरमें सुन्दर वस्त्र पहिन हंसती-खेलती अनेक वस्तुओंका उपहार लिये हुए उसी यज्ञशालामें आ पहुँची ॥ २३ । २४ । इसके अनन्तर बाजे बजे और अप्सराएँ नाचने लगीं । उसी समय बहुतसे ऋषिलोग आ पहुंचे अश्वमेध यज्ञका खबर पाकर हजारो महर्षिलोग आकर एकत्रित होते जा रहे थे। जैसे कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, मार्कण्डेय, मुकण्ड, च्यवन, मुद्गल, असित, जामदग्नि, देवल, व्यास, नारायण, क्रतु, विभाण्डक, नारद, तुम्बुरु, गालव, शिवदास, भानुदास, महातपस्वी हरिदास, शिवशर्मा, रववर्मा, मुनावराः शिवशर्मा, एकशृंग, द्विशृङ्ग, चतुःशृङ्ग, सप्तशृङ्ख ॥ २५-२६ ॥ विरूभाण्ड,

सर्गः २ ] यागकाण्डम् २१५

सर्गः २ ] यागकाण्डम् २१५

ऊर्ध्वपादश्चोर्ध्वनेत्र और्ध्वस्यस्त्रिशिखास्तथा । वृद्धगौतममान्धाव्य पर्णादश्चन्द्रसंज्ञकः ॥३०॥ ऋष्यशृङ्गो मतङ्गश्च जाबालिः कुम्भसंभवः । दधीचिः शौनकः सूतः सुमन्तुश्च लोमशस्तथा ॥ ३१ ॥ वाल्मीकिश्चापि दुर्वासा मुनिर्वेदनिधिर्महान् । एते चान्ये च मुनयः स्वाशिष्यतनयादिभिः ॥३२॥ केचित्पर्णाशनाः केचिद्वायुभक्षास्तथाऽपरे । कुशाग्रजलपानाश्च केचित्त्यक्ताशनास्तथा ॥ ३४ ॥ भिक्षाशनास्तथा केचित् पादसाधनाः परे । अयाञ्चाव्रतिनः केचिन्नोक्तसंभाषणाः परे ॥३५॥ केचिद्वल्कलसंवीताः केचित्काषायवासिणः मृगचर्मधराः केचित् केचिदाकाशावासिणः ॥३६॥ वृक्षपत्रवस्त्राश्च केचित्पञ्चाग्निसाधकाः । धूमपानव्रताः केचित् केचित्त्यक्तेषणाः परे ॥३७॥ एवं नानावनागमंगिग्दिग्देशान्तरादिषु । रामिनस्ते समायाताः सदारश्च सबालकाः ॥३८॥ सशिष्या रामचन्द्रस्य द्रष्टु यज्ञोत्सवं वरम् दशदिग्भ्यो मुनिश्रेष्ठाः कोटिशश्च दिने दिने । ३९. तान्सर्वान् रामचन्द्रोपि प्रत्युत्थानासनादिभिः । मधुपर्कादिपूजाभिरतोषयाम्यम् सादरम् ॥४०॥ यज्ञवाटे महारम्ये कामधेनुं शुचन्तः पूजयामास विधिवत्सर्वसम्पन्नपि ॥४१॥ सुवर्णशृंगभूषाभिः किंकिणीनूपुरादिभिः । एव ता शोभयित्वाऽथ प्रार्थयामास राघवः ॥४२॥ धेनो सागरसम्भुते त्वमन्नानि द्विजादिकान् दानमहैंस्त्वमध्वरे मे प्रसीद जगदम्बिके ॥४३॥ एवं संप्राथ्यं तां कामधेनु रामः प्रणम्य च बबन्ध पाकशालायां पट्टकूलामनोपरि ।४४॥ अथ सा सुरभिस्तुष्टा षड्रसाश्नानि सादरम् ददौ जनकनन्दिन्यै सा देवान्पद्मकर्मणि ॥४५॥ नाग्निकार्यं च तत्रासीत् पाकशालासु चैकता । इच्छाशनेः सदा पुष्टा बभूवुर्मुनिपुंगवाः ॥४६॥


भृगु भार्गव बृहस्पति, पौष्य, कण्व एकाद, त्रिपाद, ऊर्ध्वपाद ऊर्ध्वनेत्र ऊर्ध्वस्य, त्रिशिखा वृद्धगौतम, पर्णाद, चन्द्रसंज्ञक, । ३० । ३१ ॥ ऋष्यशृंग, मतङ्ग, जाबालि, अगस्त्य, दधीचि, शौनक, सूत सुमन्तु, लोमश, वाल्मीकि दुर्वासा ये एकसे एक विद्वान मुनिगण तथा और भी कितने ही ऋषि अपनी स्त्री-पुत्रों तथा शिष्योंके साथ आज आ रहे थे ॥ ३२ । ३३ ॥ उनमें बहुतसे ऐसे थे, जो केवल पत्ते खाकर रहते थे। कोई वायु पीकर रहते थे। कोई कुशक अग्रभागमें जल लेकर पीते और उसस काल यापन कर रहे थे । कुछ ऐसे थे जो जिन्होंने भोजनको त्याग ही दिया था ॥ ३४ ॥ कुछ ऋषि भिक्षान्न खाते थे, कोई दूसरेके हाथसे भोजनको करते थे (अपने हाथसे आग नहीं छूते थे) और कितने ही ऐसे थे जो किसीसे माँगना पसन्द नहीं करते थे। कोई कोई तो किसीसे सम्भाषण ही नहीं करते थे ॥ ३५ ॥ कुछ मुनि वल्कल वस्त्र पहनते हुए थे कोई गेरुआ कपड़ा धारण किये थे, कोई मृगचर्म पहने थे और कोई दिगम्बर (नंगे) थे ॥ ३६ ॥ कुछ महर्षि वृक्षके पत्तोंसे शरीर ढके हुए थे, कोई पंचाग्नि तापनेवाले थे, कोई धूम्रपान (गाँजेऔर चरस) का यत्न किये थे और कोई-काई ऐसे थे, जिनकी सब प्रकारकी इच्छाएं समाप्त हो गयी थीं ॥ ३७॥ इसी प्रकार कितने ही अङ्गों वनोंको पर्वतों, किन्हीं और आश्रमोंके निवासी ऋषि अपनी स्त्री तथा बच्चोंके साथ वहाँ आ पहुंचे थे । ३८ ॥ रामचन्द्रके उस अश्वमेध यज्ञको देखनेके लिए दशों दिशाओंसे करोड़ों ऋषि इसी तरह अपने शिष्यादिकोंके साथ वहाँ प्रतिदिन आ रहे थे। रामचन्द्र भी उनका प्रत्युत्थान आसन, मधुपर्कादिसे पूजन तथा आदर करते थे ॥ ३९ ॥ ४० ॥ उसी यज्ञभूमिमें रामचन्द्रजी विधिवूवर्क अनेक वस्त्रों और आभूषणोंसे कामधेनुका पूजन किया। उसकी सींगे सोनेसे मढ़ाईं तथा किंकिणी और नूपुर आदि पहनाये। इसी तरह उसको अलंकृत करके रामचन्द्रजीने प्रार्थना की—॥४१ ॥ ४२ । हे क्षीरसागरसे उत्पन्न होनेवाली कामधेने तुम हमारे अतिथिरूपमें आये हुए ब्राह्मणों को अन्नादिक दानसे तृप्त रखना। हे जगदम्बिके ! तुम मेरेपर प्रसन्न होओ ॥ ४३। इस प्रकार विनती करके एक गलीचा बिछाकर भोजनशाला (रसोईघर) में ले आकर कामधेनुको बाँध दिया । ४४ । इसके पश्चात् उस सुरभीने प्रसन्न होकर आदरपूर्वक छहों रसके अन्न सीताको दिये । उससे पाकशालामें न तो कोई भट्ठी जलती थी और न कोई पदार्थ बनाया जाता था। लेकिन

२१६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २

यन्त्यान्कामान् रामचन्द्रश्चिन्तयामास चेतसि । तांस्तानुभौ मणी शीघ्रं कल्पयामासतुर्द्रुतम् ॥४७॥ यथार्थान्ताऽपि यान् कामांश्चिन्तयामास चेतसि। कामधेनुर्ददौ तांस्ताञ्छीघ्रं त्रैलोक्यदुर्लभान् ॥४८॥ सर्वत्र यज्ञवाटे हि द्विजार्यैश्च समन्ततः। पङ्क्तिषु भूमिजादीनां परिवेषणकर्मणि ॥४९॥ स्त्रीणां कङ्कणनादश्च शुश्रुवे नूपुरध्वनिः। अथ रामश्च सौमित्रिं समाहूयेदमब्रवीत् ॥५०॥ सीमाचारान्समाहूय मम वाक्यञ्च सादरम् । आज्ञापयस्व शीघ्रं त्वं शासनं यन्मरोच्यते ॥५१॥ ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽश्रमी यतिः। यःकश्चिद्याममायाति पथिकः स समाज्ञया। ५२॥ निवारणीयो युष्माभिर्न कदाप्यध्वरे मम। ममाज्ञां न प्रतीक्षध्वं कोपः कार्यो न कस्यचित्। ५३॥ इति रामवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः। सीमाचारान समाहूय राघवोक्तं न्यवेदयत् ।५४॥ ततो रामः पुनः प्राहः समाहूयाथ लक्ष्मणम्। ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः। ५५॥ मुनीनां दायिनां दाराः शिष्याः सम्बन्धिनास्तथा। पौरा जानपदाश्चास्तु तेषां संबधिनः स्त्रियः ॥५६॥ दासीदासजनाः सर्वे यद्यद्वाञ्छन्ति लक्ष्मण। मामपृष्ट्वा तु सर्वेषां दातव्यं ह्यविचारितम् । ५७॥ अन्त्यजावधि सर्वान्हि तोषयस्व निरन्तरम् । न केषामभिलाषा च विफला हि विधीयताम् ॥५८॥ अयोध्यां कामधेनुं च जानकीं कौस्तुभं मणिम् । चिन्तामणिं पुष्पकं च राज्यं कोशादिकं च मे ॥५९॥ एतेष्वपि च यो यद्वै याचयिष्यति तन्नया। न दत्तं चेति वै श्रुत्वा ममानोषो भविष्यति ॥६०॥ अतो ज्ञात्वा भयं मत्तो दत्तस्व ह्यविचारत। याञ्चाभङ्गः कृतश्चेद्धि मन्छिरोद्रोहो भविष्यति ॥६१॥ सदा स्मर शिरं मे त्वमिमां लक्ष्मण सादरम्। इति रामकृतां शिक्षाङ्गीकृत्य स लक्ष्मणः ॥६२॥ तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण शिक्षितम् ॥६३॥ इति श्रीमन्महीपतिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे लक्ष्मणाज्ञाकरणं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

वहाँपर आये हुए सब ऋषि इच्छ भोजन कर करके प्रसन्न हो रहे थे । ४५ । ४६ ॥ जिन जिन वस्तुओंको राम- चन्द्रजीने अपने मनमें चाहा उन सबको उनके दो मणियों (कौस्तुभमणि तथा चिन्तामणि) ने बातकी बातमें पूर्ण कर दिया ॥ ४७॥ इसी तरह सीताजीने जो कुछ चाहा, सो कामधेनुने त्रैलोक्यकी दुर्लभ वस्तुओंको भी देकर उनकी इच्छा पूरी की । यज्ञभूमिके चारों ओर जब ब्राह्मणोंक मण्डली भोजन करनेके लिए बैठती थी और स्त्रियाँ उनका भोजन परोसनेके लिए आती थीं तब उनके भूषणोंकी मधुर ध्वनि सुनायी देती थी। इसके तदनन्तर रामचन्द्रजीने लक्ष्मणको बुलाकर इस प्रकार समझाया - । ४८। ४९॥ ५०॥ हमारे यज्ञभूमिके आस- पास रहनेवाले निवासियोंको सादर बुलाकर हमारी तरफसे यह समझा दो कि आश्रम लेकर जो कोई ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ सन्यासी मुनियोंके पण्डितों, उनके वस्त्र, शिष्य सम्बन्धी, पुरवासी, देशनिवासी और उनके सम्बन्धी, जो कोई यहाँ आ जाय, उसे कोई न रोके । उसका सत्कार करनेके लिए मेरी आज्ञाकी प्रतीक्षा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ५१-५३ ॥ रामचन्द्रजीके आज्ञानुसार लक्ष्मणजीने सब आस-पासके निवासियोंको जाकर समझा दिया। कुछ देर बाद रामचन्द्रजीने फिर लक्ष्मणको बुलाकर कहा कि मुनियोंकी स्त्रियों तथा बच्चों आदिको अथवा दास दासियोंको जिस किसी वस्तुकी आवश्यकता हो, वह बिना मुझसे पूछे उनके इच्छानुसार देते जाओ ॥ ५४-५७॥ चाण्डालसे लेकर विप्रतक प्रत्येक प्राणीको सन्तुष्ट करो। किसी को किसी प्रकारका कष्ट न होने पाये। किसीकी कोई अभिलाषा विफल न हो। अयोध्या, कामधेनु, सीता, कौस्तुभमणि पुष्पक विमान, राज्य तथा कोशादिक इन सब वस्तुओंको भी देनेसे यदि तुमने इनकार किया तो मैं तुम्हारे ऊपर बहुत नाराज होऊँगा। इसलिए मेरे क्रोधसे डरते हुए बिना किसी प्रकारका विचार किये सब अभ्यागतोंको उनकी अभिलषित वस्तुएँ देते जाओ। तुम किसीकी माँग खाली करोगे तो तुम्हें मेरा सिर काटनेका पातक लगेगा ॥५८-६१॥ हे लक्ष्मण ! सदा मेरी इन बातोंका ख्याल

सर्गः ३ ] यागकाण्डम् २१७

सर्गः ३ ] यागकाण्डम् २१७


तृतीयः सर्गः

(रामके यज्ञीय अश्वका सब ओर घूमकर अयोध्या लौटना)

श्रीरामदास उवाच

अथ मुक्तस्तदा वाजी राघवेण महात्मना । यज्ञांगः श्यामकर्णः स पूर्वदेशं ययौ जवात् ॥१॥
शत्रुघ्नेन च सैन्येन प्राप्तो भागीरथीपटम् । एतस्मिन्नन्तरे रामः स्वप्रतापं प्रदर्शयन् ॥२॥
चकार कौतुकं तत्र शत्रुघ्नस्य पुरो महत् । ब्रह्मावर्ते महादेशं त्यक्त्वा गङ्गातटं प्रति ॥३॥
यावत्प्राप्ताः श्यामकर्णश्चावदामूर्द्धनेर्निधा । गङ्गायां च महापूरो यत्र नौकाऽपि कुण्ठिता ॥४॥
शत्रुघ्नेनापि तद्दृष्ट्वा कुण्ठितां गतिमीक्ष्य च । कालानिक्रमभीत्या स निश्चिन्तं व्यचिन्तयन् ॥५॥
आदावेवापि मे विघ्नमुत्पन्नं गमने महत् । ग्रामे प्राथमिके यद्वन्मक्षिकापतनं तथा ॥६॥
तदीदानीं रामचन्द्रप्रतापेनास्तु मे गतिः । निश्चित्येत्थं स शत्रुघ्नो रथस्थो जाह्नवीतटे ॥७॥
स्थित्वा प्रोवाच गङ्गां प्रतिपूज्य मवित्वरम् । शृण्वन्तु सर्वलोकेषु मुनिदेवगणेषु च ॥८॥
देवि गङ्गे महापुण्ये यदि सत्यं शृणुष्वमे । दीयतां तर्हि पंथा मे शीघ्रं सैन्ययुतस्य च ॥९॥
इति शत्रुघ्नवचनं श्रुत्वा सा जाह्नवी तदा । स्ववेगं मंदयामास इरोदरं चाप्रदर्शयत् ॥१०॥
पद्भित्रोंऽजो तदा शीघ्रं परं तीरं ययौ क्षणात् । तथा सैन्येन शत्रुघ्नः ससुमन्त्रः ममाययौ ॥११॥
मागधाख्यं महादेशं स एव कीकटः स्मृतः । पूर्वरूपं महापूरो जाह्नव्यां मयभूव ह ॥१२॥
प्रतापं रामचन्द्रस्य सर्ववुद्ध्या महाद्भुतम् । चक्रुन्ते जयशब्दांश्च सीतारामस्यच मुहुः ॥१३॥
श्यामकर्णस्ततः शीघ्रं ययौ पूर्वांदिशं प्रति । मगधेशो नृपश्चाथ श्रुत्वा तुरंगमागतम् ॥१४॥
प्रत्युज्जगाम सैन्येन पुरुरुन्द्याथ वारणम् । निनायाश्वं पठित्वा मङ्गलपत्रं पुरं निजम् ॥१५॥


रखना भूलना नही। रामचन्द्रजीका शिक्षाका अनुकरण करके लक्ष्मणजीने वैसा ही किया, जैसा रामने कहा था ॥ ६२।६३ ॥ इति श्रीशतकोटिपरिमितहरिकथामृतान्तर्गतानन्दरामायणे राज्यकाण्डेयश्वमेधविधौत 'ज्येत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते यागकाण्डं लक्ष्मणाज्ञाकरणं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

श्रीरामदासजी फिर कहने लगे—रामचन्द्रजीके द्वारा छोड़ा हुआ वह यज्ञका अङ्गरूप श्यामकर्ण घोड़ा अयोध्यासे बड़े वेगके साथ पूर्व दिशाकी ओर चला ॥ १ ॥ पतन चलते शत्रुघ्न, सुमन्त तथा विशाल सेनाके साथ वह अश्व जाकर भागीरथी गङ्गा तटपर पहुंचा। इधर रामचन्द्रजीने अपना महिमा दिखाकर इच्छासे शत्रुघ्नजीके सामने एक विचित्र कौतुक उपस्थित किया वह यह कि ब्रह्मावर्त देशको छोड़कर गङ्गातट पहुंचत-पहुंचते उनके कान जा जुड़ा औ बन था वह सब समाप्त हो गया। गङ्गाका बाढ़से एक स्थानपर उनकी नौका भी रुक गयी ॥ २-४ ॥ शत्रुघ्न उस दारुण समयको देखा तो देर हो जानेके भयसे मन ही मन सोचने लगे और 'पहिले ही आवाम इतना बड़ा विघ्न आ पहुंचा। यह वही कहावत चरितार्थ हुई कि 'पहल ही ग्रासमे मक्खी आ गिरी' ॥ ५ । ६ ॥ अब मुझे इस समय केवल रामचन्द्रजीके प्रतापका भरोसा है। उसीसे मेरा निस्तार होगा । इस प्रकार निश्चय करके शत्रुघ्नजी रथपर बैठे ही बैठे जाह्नवीके तटपर आकर कहने लगे—॥ ७ ॥ हे महापुण्यशालिनी गंगे ! यदि आप यदि भगवान् रामचन्द्रजी सच्चरित्र हो तो आप सेनासहित मुझे रास्ता दे दीजिए । ८ । ९ ॥ इस प्रकार शत्रुघ्नके वचनको सुनकर गङ्गाजीने वेगको मन्द करके अपने मध्य भागसे शत्रुघ्नको रास्ता दे दिया । १० ॥ तब क्षणभरमें घोड़े और पैदल सैनिक चलकर गङ्गाके उस पार पहुंच गये । इस तरह समन्य शत्रुघ्न सुमन्त्रके साथ मगधदेश मध्यम जा पहुंचे, जिस देशको कीकट भी कहते है उन के घोड़े पार उतर जानेके बाद गङ्गाका प्रवाह पूर्वरूप वेगवान् हो गया॥११ ।१२॥ मगधनिवासी लोग रामचन्द्रके अद्भुत प्रतापको समझकर सीतारामके नामके जयजयकार करने लगे ॥ १३ ॥ वहाँसे अश्वमेध यज्ञके लिए छोड़ हुआ श्यामकर्ण घोड़ा पूर्व दिशाकी ओर चला। राजा मगधेश घोड़ेको आया हुआ सुनकर हाथीकी सवारीपर चढ़ तथा सेनाको लेकर अगवानीके लिए गये । घोड़ेके मस्तकपर बँधे हुए पत्रको पढ़कर उसकी नगरमें ले गये

२१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

पूज्यादरात्स्वमर्त्यै तं शत्रुघ्नं विभवैर्निजैः । समस्तं निजकोशादि समर्प्य मघवाधिपः ॥१६॥ पौराञ् जानपदान्स्वस्त्रीः सुहृद्बान्धवमन्त्रिणः । पौरपत्नीर्जानपदपत्नीर्विप्रान् पुरोधसम् ॥१७॥ प्रेषयामास यानेने वाहनेश्च प्रति । स्वयं सैन्येन तुरगचरणान्नुलक्ष्य च ॥१८॥ शत्रुघ्नस्यागुवर्ती बद्धहस्तपुटो ययौ । एवं सर्वेऽपि राजानो ज्ञातव्याः सर्वदिक्स्थिताः ॥१९॥ न केनापि श्यामकर्णो बद्धो नृपतिना भुवि । इन्द्राद्यैर्निर्जरैर्नापि नासुरैः कदाचन ॥२०॥ ततो बाजी पूर्वदेशान्वङ्गवङ्गकलिङ्गकान् । तथा नानाविधान्देशान् विलंध्य जलधेस्तटम् ॥२१॥ दृष्ट्वा नृपकुलैर्युक्तो दक्षिणाभिमुखो ययौ । गोदावरीं नदीं तीर्त्वा देशांश्च च द्राविडम् ॥२२॥ अतिक्रम्यारवारारुणं देशं समतिक्रम्य च । काञ्चीप्रदेशान्सकलान्वंशन्नानाविधान्त्सुभान् ॥२३॥ कावेरीं समतिक्रम्य चोलदेशं विलङ्घ्य च सेतुबन्धं ततो दृष्ट्वा पश्चिमाभिमुखो ययौ ॥२४॥ ताम्रपर्णीं विलङ्घ्याथ समतिक्रम्य केरलान् । त्रिषट्प्रकारान् देशांश्च गोकर्णं च ततो ययौ ॥२५॥ कृष्णातौरप्रदेशांश्च समतिक्रम्य घोटकः । कर्णाटकं महादेशं समतिक्रम्य सत्तरम् ॥२६॥ कोंकणं समतिक्रम्य तत्तद्देशनृपैः सह । भीमान्देशान्म सकलाञ्छ्यामकर्णः शुभावहः ॥२७॥ पश्यन् ययौ महाराष्ट्रं गौतमीं तां विलङ्घ्य च । विदर्भ समतिक्रम्य ययावाभीरमंडलम् ॥२८॥ मालवं समतिक्रम्य तीर्त्वा पुण्यां महानदीम् । वीर्त्वा स श्रमनीं पुण्यां समतिक्रम्य गुर्ज्जरम् ॥२९॥ प्रभासं च ततो गत्वा ययावानर्त्तमुत्तमम् । सौवीरान् समतिक्रम्य ययौ बाजी स माधुरान् । सौराष्ट्रान्व्यतिक्रम्य मरुदेशं ययौ हयः ॥३०॥ धन्वदेशमतिक्रम्य ययौ सारस्वतातटम् । मत्स्यान् देशानतिक्रम्य ययौ बाजी म माठरान् ॥३१॥ शूरसेनानतिक्रम्य पांचालांस्तुङ्गरो ययौ । कुरुक्षेत्रं ततो गत्वाऽतिक्रम्य कुरुजांगलान् ॥३२॥ देशं कैकेयमुल्लंध्य ययौ काश्मीरमुत्तमम् भिल्लदेशं गौडदेशं यवनदेश ययौ हयः ॥३३॥ यवनांम्नाग्रदेशांश्च समतिक्रम्य वेगतः । पश्यन्नानाविधान् देशान् करतोयातटेन वै ॥३४॥

और बडे आदरके साथ अपनी संपत्तिसे शत्रुघ्नकी पूजा की । समस्त निज कोषादि शत्रुघ्नको अर्पण करके पुरवासियोंको, अपने कुटुम्बको, जनपदवासियोंको एवं अपन मित्र-बान्धवोंको वाहनांक साथ अश्वमेध यज्ञमें अगाड्या भेज दिया । किन्तु स्वयं सेनाके साथ जनुघ्नके दनुवर्ती होकर गणीय अश्वके चरणोंके लक्ष्य करके साथ-साथ चले । इसी तरह सब देशोंके राजा लोग शत्रुघ्नके वशवर्ती होकर अश्वके पीछे-पीछे चले ॥ १४-१९॥ पृथ्वीपर किसी भी राजाने श्यामकर्ण घोडंको नहीं बाँधा, न स्वयमें इन्द्रादि देवताओने और न पाताललोकके असुरोने उसे बाँधा । २० ॥ उसके बाद घोडा वङ्ग वङ्ग-कलिङ्गादि अनेक देशोंमें होता हुआ समुद्रतटपर पहुंचा । २१ ॥ बहसि नृपसमूहके साथ यह दक्षिण दिशामे गया । फिर गोदावरी नदीको पार करके आध्र, द्रविड, कारवार नामक देशोका अतिक्रमण करक नाना प्रकारके मनोहर प्रदेशोंमें घूमता हुआ कावेरी नदीको पार करके चोलदेशमें जा पहुंचा । वहांसे समुद्रतटपर सेतुबन्ध रामेश्वर होकर पश्चिम दिशामे गया ॥ २२-२४ ॥ बहसि वह घोड़ा ताम्रपर्णी नदीको लांघ तथा केरल देशका अतिक्रमण करके गोकर्ण तीर्थम जा पहुंचा ॥ २५ ॥ वहांसे कृष्णा नदी उतरकर वह घोड़ा कर्णाटकमें पहुंचा ॥ २६ ॥ वहाँसे कोंकण देशको पार करके सत्तरेशीय राजाओके साथ भीमा नदीको लांघता हुआ महाराष्ट्रमे जा पहुंचा ॥२७॥ वहाँपर गौतमी नदीको लांघकर विदर्भ देशमे होता हुआ आभीरमण्डलमे पहुँचा ॥ २८ ॥ वहाँस मालवा होता हुआ महानदी पुण्याका अतिक्रमण करके गूज्र्जरम पहुँचरा ॥ २९ ॥ वहाँसे प्रभास तीथम अ.कर आनत्त देशको गया । फिर सोवार आदि देशोंको पार करके घोड़ा मथुरा प्रदेशम गया । वहाँस सौराष्ट्र देशको लांघकर मरु-देश ( मारवाड ) में पहुंचा ॥ ३० ॥ उसके बाद धन्व नामक देशका अतिक्रमण करके सरस्वतीके तौरपर गया । वहाँसे मत्स्य देशमे घूमता हुआ माठर देशमें गया । ३१ ॥ उसके बाद वह श्यामकर्ण घोड़ा शूरसेन, पञ्चाल, कुरुक्षेत्र, जांगल एवं कैकय देशमें भ्रमण करता हुआ कश्मीर गया । वहाँसे भिल्लदेश,

सर्ग ११ ] यागकाण्डम् २१९

सर्ग ११ ] यागकाण्डम् २१९

ययौ वाजी वायुगत्या शीघ्रं ज्वालामुखों प्रति । दोषभास्यां फल्गोयां वीक्षा नैवाद्रतो गतः ॥३५॥ कर्मनाशाजलस्पर्शात् फल्गोराचमनात्। गंडक्यां बहुनागाधर्मः स्खलति कीर्तनात् ॥३६॥ हरिद्वारं ययौ बाजी ततो गङ्गातटेन हि। हिमाद्रेः सन्निधौ देशान् समतिक्रम्य वेगवान् ॥३७॥ बद्रिकाश्रममालोक्य कलापग्रामवासिभिः। संमानितस्तदा बाजी गत्वा तन्मानसं सरः ॥३८॥ दृष्ट्वा हरिसरक्षेत्रं मिथिलां प्राप सेनया। नानादेशानतिक्रम्य ह्यर्यावर्तं ययौ हयः ॥३९॥ दृष्ट्वा काशीं त्रिवेणीं च शतंर्वादीं ययौ जवात्। शृङ्गवेरपुरं गत्वा तमसां तां विलंघ्य च ॥४०॥ सरत्वा च नैमिषारण्यं समुल्लंघ्याथ गोमतीम्। ब्रह्मावर्ते सरो गत्वा पश्यन् देशान् मनोरमान् ॥४१॥ कोसलाख्यं महादेशं दृष्ट्वा बाजी मनोहरम्। ततः साकेतविषये यय्वभौ प्राप वाश्वरम् ॥४२॥ नानादेशनृपैः सार्धं शत्रुघ्नेनाभिरक्षितः। अगात श्यामकर्णं तं श्रुत्वा सीतापतिस्तदा ॥४३॥ आज्ञापयच्च सौमित्रिं सोऽपि प्रत्युज्जगाम तम्। पञ्चेन्द्रं पुरस्कृत्य मेरीदुन्दुभिनिःस्वनः ॥४४॥ ऋत्विग्भिर्वेदवेदांगपारगैर्जगैः। संपूज्याथ श्यामकर्णं नृपतींश्च सविस्तरम् ॥४५॥ मानयामास सौमित्रिः शनैरध्वरमण्डपम्। महात्मरो महान् सन्मदा तुरङ्गदर्शने ॥४६॥ दशयोजनपर्यन्तं सर्वत जनसंकुलम्। व्याप्तं सर्वं ततोऽप्योषपात्रहिंतृवर्णसंसदा ॥४७॥ हय सर्वत्र रक्षन्तः पूर्वसंदर्शिताञ्जनान्। पौरान् जानपदान्त्रांश्च बहुसंधा अमरापमाः ॥४८॥ मैन्चन् वभ्रमुः सर्वे स्वीयदर्श नकामुकाः। न प्रापुःशन तेषां उनीपेऽध्वरमण्डपे ॥४९॥ केचिचे दर्शनं स्वानां प्रपुष्यत्र परेऽहनि। केचित्तृतीये दिवसे पंचमे सप्तमेऽथ वा ॥५०॥ केचिद्दूरद्वियोगेन प्रापुः स्वानां दर्शनम्। केचित् पक्षानन्तरं हि मासेनानन्तर जनाः ॥५१॥ केषां वियोग एवापाद्दिग्भ्रमात् तदानुचर। तज्ज्ञात्वा रामचन्द्रोऽपि लक्ष्मणं प्राह सादरम् ५२।


चौहद्दर, कुरुक्षेत्र, ज्वालामुखी देश एवं मानसरोवर निमन्त्रण करता हुआ तथा उक्त तटवर्ती नानाविध मनोहर दृश्योंको देखता हुआ बड़े वेगसे ज्वालामुखक पावर्ती प्रदेशमें गया ॥ ३५-३८ ॥ वहाँसे कुरुक्षेत्रादि प्रदेशोंको पार करके अवध प्रदेश में आ गया। क्योंकि कर्मनाशा नदीका स्पर्श करनेसे, फल्गु नदीका आचमन करनेसे, गंडकी नदीकी बहुधा द्वारा तरंग और धार्मिक कर्म करके उसका आचमन करनेमें धर्मका क्षय होता है ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ यहाँसे वह गङ्गाके तट ही तट होकर हरिद्वार गया। पश्चात् हिमालयके प्रान्तमें जाकर बद्रिकाश्रम पहुँचा। वहाँसे कलापग्रामनिवासियोँका आतिथ्य सत्कार वह पाण्डि आर्यावर्त देशमें गया ॥ ३७-३९ ॥ वहाँसे काशी और गङ्गाके तटपर घूमता हुआ वेगपूर्वक अवधदेशमें गया। फिर शृङ्गवेरपुरमें जाकर तमसाको पार करके नैमिषारण्यमें गया। वहाँसे गोमती और ब्रह्मावर्त सरोवरको जाकर मनोहर दृश्योंको देखता हुआ कोसल देशमें पहुँचा। इस प्रकार सब ब्रह्माण्डको घूमता हुआ वह अश्व फिर अयोध्याके निकटवर्ती अश्वमेधके यज्ञमण्डप में पहुँचा ॥ ४०-४२ ॥ अनेक देशके राजाओंके साथ शत्रुघ्नसे अभिरक्षित दशार्योहित हुआ श्यामकर्ण अश्वको आया हुआ सुनकर सीतापति रामचन्द्रजीने उसको लानेके लिए लक्ष्मणको आज्ञा दी। लक्ष्मणजी हाथीपर बैठकर बड़े उत्साहके साथ उसकी अगवानी करनेके लिए गये, ऋषियोंयुक्त सब मण्डलपालों और राजाओंकी पूजा करके उस अश्वसहित यज्ञमण्डपमें ले आये। उस समय घोड़ेका देखनेके लिए प्रजावर्गमें बड़ा उत्साह था ॥ ४३-४५ ॥ यज्ञारम्भके समय अयोध्याके बाहर दस योजनतक सम्पूर्ण पृथ्वामण्डलके संग्रामी, राजाओं तथा अमीर-उम-रावोंसे भरा था ॥ ४७ ॥ यजन होता ही था कि श्यामकर्ण अश्वके साथ भ्रमण करके लौट हुए राजा लोग पहिलेसे बहुमूल्य अपने-अपने शुभ आश्रयको त्यागकर तुरन्त उसको देखनेकी इच्छामें इधर उधर घूमने लगे पर उस प्रकारनिक जनसमुदायमें उन लोगोंका प्राप्त नहीं कर सके ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ कोई परिजन सज्जन दूसरे दिन मित्र-बान्धवोंसे मिल सका। कोई तीसरे दिन कोई पांचवें रोज और कोई सातवें रोज मिला ॥ ५० ॥ किसीकोके मण्डपका द्विविध स्वतंत्रतोंका पता चला। किसीको एक पखवाड़ेके बाद और किसीको एक माहके बाद पता लगा ॥ ५१ ॥ किसीको वियोगका फल पता ही नहीं लगा। यह सुनकर भगवान रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे

२२०आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

परस्परं वियोगोऽत्र संमर्देन तु लक्ष्मण जायते तत्र युक्तिं त्वं मत्तः श्रुत्वा कुरुष्व ताम् ॥५३॥
तमसायास्तटे शालां कृत्वाऽथ महतीं शुभाम् घोषणां च सर्वत्र महादुन्दुभिनिःस्वनैः ॥५४॥
येषां वियोगस्तैर्गत्वा तमसातटशोभिनाम् । शालां प्रवेश्यध्वं द्वि स्वानां योगोऽस्तु तत्र हि ॥५५॥
चतुष्पदादिवस्तूनि ज्ञात्वा यस्य लघून्यपि । तत्रैव स्थापनीयानि स्वं स्वं गृह्णन्तु ते जनाः ५६॥
इति रामवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः तथा चकार तन्मर्त्यं येन योगः परस्परम् ॥५७॥
सर्वे तत्र जनाः प्रापुः स्वानां स्त्रीबालमित्रिणाम् । चतुष्पदादिवस्तूनां तत्र लाभो बभूव ह ॥५८॥
यत्किंचिद्विस्मृतं येन दृष्ट्वाऽन्येन च कदा । शालायां स्थापितं दृष्ट्वा स्वयं जग्राह तत्र सः ॥५९॥
एवं श्रीरामयज्ञे हि संमर्दः संबभूव ह । न तत्र शुश्रुवे शब्दः कर्णेऽप्युक्तो जनैस्तदा ॥६०॥
तत्तन्ते पार्थिवाः सर्वे तस्थुर्वेश्मनरास्रसु ॥६१॥
इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानंदरमायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे अश्वगमनं नाम तृतीयः सर्ग ॥ ३ ॥


चतुर्थः सर्गः

( रामका कुम्भोदर मुनिसे साक्षात्कार )
श्रीरामदास उवाच

अथ ते ऋत्विजः सर्वे मंगलैर्विधिभिः शुभैः । सम्यक् प्रवर्त्तयामासुर्वाजिमेधं यथाविधि ॥ १ ॥
तत्रर्त्विजो वाजिमेधे रत्नक्रीडेशयाम्बराः । मसदृश्या विरेजुस्ते यथा वृत्रहणोऽध्वरे ॥ २ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सुरैयसहितैः सुरैः । स्वामिना विघ्नराजेन पार्वत्या वृषमस्थितः । - ।
महेश्वरो यज्ञवाटं रामाहूतो ययौ गणैः । शिवमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्याथ लक्ष्मणः । ४ ।
वारणेंद्र पुरस्कृत्य पताकाध्वजसंरणैः । नानाव्याद्यसुघोषश्च वारस्त्रीणां प्रनर्त्तनैः , ५ ॥


कहा—॥ ५२ ॥ यहाँ भीडके कारण परस्पर लागोंका वियोग हो जाता है। अतएव मैं एक युक्ति बतलाता हू। उसको करो । ५३ ॥ तमसा नदीके तटपर एक बड़ी आगे शाला बनवाओ और दुन्दुभी पिटवा दो कि भूले-भटकोंको खोजना हो तो तमसा नदीके तटपर जहाँ नयी शाला बनी हुई है, वहाँ जाओ । वहींपर भूले-भटकों-को लोग पाओगे ॥ ५४ । ५५ । लागोंको अशीम लकर छांटा छांटी का खोयी हुई वस्तुएँ स्वाजखाजकर वहाँ रखी हैं। वहाँ जिस-जिसकी जो-जो वस्तु हो, वह अपनी-अपनी वस्तु ले ले। इस प्रकार रामजीके वचन सुनकर लक्ष्मणने कहा—अच्छा महाराज ! ऐसा ही करूँगा । इसके बाद लक्ष्मणजीने ऐसी व्यवस्था की, जिससे सबका अपने वियुक्त बान्धवोंसे मिलाप होने लगा । ५६ । ५७ । वियुक्त बन्धु वहाँ गये और सबको अपने अपने स्त्री-पुत्र-मित्रादि और नतुष्पदादि पशु सभी खोई हुई चीजें मिल गयी। जहाँ-कहींपर जिससे जो वस्तु भूलसे छूट गई, उस वस्तुको राजानुचरोंने तथा जिसने देखी एंव जिसको मिली, उसने वहीं शालामे रखवा दी और जिसकी वह वस्तु थी, उसने वहाँ जाकर ल ली । ५८ ॥ ५९ ॥ इस प्रकार श्रीरामजीके यज्ञम एसी भीड़ हुई वि जिसके कारण कानमे कहा हुआ भी शब्द मनुष्योंको नहीं सुनाई पड़ता था । ६० ॥ सब भगवान्‌के दर्शन करके सब राजा लोग अपने-अपने स्त्री-पुत्र मित्रादिकोका लेकर अलग अलग तम्बूओं (खेमों) में रहने लगे । ६१ । इति श्रीमशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय यागकाण्डे अश्वगमनं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

श्रीरामदास कहने लगे इसके अनन्तर सब ऋत्विक् मंगलमय कृत्योंके साथ-साथ शास्त्रानुसार अश्वमेध यज्ञ करवाने लगे ॥ १ ॥ उस समय यज्ञमें रत्नमय आभरणों और वस्त्रोंको पहिने हुए ऋत्विक् ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे इन्द्रके यज्ञम सुशोभित होते थे ॥ २ ॥ उसी समय वहाँ रामज क बुलावेसे बैलपर चढ़कर महादेव और पार्वतीजी आयीं । उनके संग इन्द्रादि देवता, स्वामिकार्तिकेय, गणेशजी एवं प्रमथादि सब गण भी आये ॥ ३ ॥ महादेवजीका आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर ध्वजा-पताका आदिसे सजाया गया ।

पादप्रक्षालनं शम्भोश्चकार मैथिली प्रभुः । स्वनाभिप्रजया गङ्गा गङ्गादिनिलया ॥ ८॥

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् २२१


संपूज्य शंकरं भक्त्या चानयामास मण्डपम् । एवं सह पदान्यग्रे गत्वा समोद्य शंकरम् ॥ ६ ॥
नमस्कृत्य समानीय निवेश्य गिरिजाधवम् । हेमपात्रे भवेद्भक्त्य हेमपात्रे स्वहस्ततः ॥ ७॥
पादप्रक्षालनं शम्भोश्चकार मैथिली प्रभुः । स्वनाभिप्रजया गङ्गा गङ्गादिनिलया ॥ ८॥
जलधारां यथायोग्यां प्रोक्षयामास जननः। रामेने गता सीता दृष्ट्वा दद्युगणस्तदा ॥ ९॥
अनिमेषाः कंजनेत्रकटाक्षाः मन्दिगतय हि। तन्मयेऽनेधमः सम्मन्न न विदुः के वयं स्थित ॥ १०॥
तुष्टुवुस्तत्र कपिने सुराः श्रीरामयं मुदा। गन्धर्वा तुष्टुवुः केचित् प्रबद्धकरसम्पुटाः ॥११॥
एवं निर्जङ्गमानां मनोपस्त्वं ई शभूत्। अतोवस्य नयेद्दृष्ट्वा रूपं कोटिरविप्रभम् १२॥
अथ रामः सीतया हि शंकरं गिरिजापतिम् । स्वयं मपूज्य सकलान् देवान् सौमित्रिणा ऋषीन् ॥१३॥
पूजयित्वाद्वयंवोढाख्यं शङ्करं लोकशङ्करम् अद्य धन्योऽस्म्यहं दद दर्शनात्तत्र सीतया ॥१४॥
अद्य मे सूर्यवंशेऽस्मिन् जन्म सफलयतः शतम् इति रामस्य वचनं श्रुत्वा स शशिभूषणः ॥१५॥
विहस्य राघवं प्राह वेद्मि मायां हरे तव त्वन्तः सिक्तपले ब्रह्मा ज्ञानस्तस्मात्पुनाभवः ॥१६॥
मरीच्याद्याः मरुद्भृतुः पौत्राः सप्राहतांगजः। मरीचेः कश्यपः पुत्रः सूर्यस्तनिशंशवापकः ॥१७॥
कश्यपात्सविता जज्ञे पौत्रपौत्रम्वरं प्रभा। रवेरत्रानः सूर्यवंशस्तद्वंशे तव जन्म वै ॥१८॥
मद्दंशसम्भवः सूर्यः किं मां मोहयसि प्रभो देवानां कार्यसिद्धयर्थमवतीर्णोऽसि मायया ॥१९॥
कुरु क्रीडां यथेच्छं त्वं यात्रापञ्चारिकीर्मुखैः शिक्षां करोषि लोकानां बहुभ्यहं रोहिते तव ॥२०॥
इति श्रुत्वा शंभुवाक्यं माहागर्वी विहस्य च यज्ञकुण्डसमीपे तु तस्थतुर्गुह्यसन्निधौ ॥२१॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र समाजग्मुः सहस्रशः गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धास्तथा चाप्सरसां गणाः॥२२॥
लोकपालाश्च दिक्पालाः रमानलतिरोहिताः। नवग्रहाः षटृतवः पश्चिनस्थमगस्तथा ॥२३॥


वेश्याओक नाना प्रकारके नाच और अनेक तरह बाजे-गाजके साथ हाथीपर रहकर लक्ष्मणजी उनकी अगवानीके लिए गये ॥ ४॥ ५। व भक्तिपूर्वक शङ्करभगवान्‌का यज्ञमण्डपम ल आए। राजाज भा उनको आते देखा तो पाँव सात पग आगे बढकर शङ्करजीको प्रणाम किया शिव-पार्वतीका सत्कार करक सुवर्णमय सिंहासनपर बैठाया। सत्कार मद्य सदा रामने अपने हाथ स्वर्णखचित एक बडे मणक पात्रम दोनोंका पादप्रक्षालन किया। सवन न० के मस्तकपर गिरिजेश जलदान करते। सम्मुख देवतागण निमेष रहन नेत्रों से उन दोनोंकी अनुपम शोभा देखकर चित्तिलखित-से होगए उनका यह तक ज्ञान नही रहा कि वे कौन हैं। ६-१०। उस समय दवगण मुदित होकर श्रीरामचन्द्र और माता जानकीकी स्तुति करने लगे ॥ ११॥ इस प्रकार मन्त्रिगण भी जानकी कविके समान प्रभावाली अनुपम सौन्दर्य देखकर देवताओंका अभाव प्रसन्नता हुई ॥ १२॥ इसके बाद सीता और लक्ष्मणजी सहित रामजीने शिव-पार्वती तथा सब देवताओंकी पूजा का ॥ १३॥ सर्व सुख कल्याण कत्तव्य से शङ्करकी पूजा करके रामजी कहने लगे-हे भगवन् ! आज में धन्य हुआ॥ १४। आज भयंकर सूर्यवंश में जन्म लेने से मेरा जन्म धारण करना सफल हुआ। इस प्रकार रामजीक बचन सुनकर शशिशेखर श्री शङ्करजी ने कहा-हे राघव ! आपकी मायाको मैं जानता हूँ। आपके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए और उस ब्रह्मासे सम्पूर्ण मुनिगण उत्पन्न हुए हैं ॥ १६॥ उन निष्पाप मरीचि प्रभृति म० मुनि उत्पन्न भये और उन मुनिगणों से सपूर्ण सृष्टि की विस्तृत किया ॥ १७॥ उन कश्यपके पुत्र सूर्य हुए। इस प्रकार आपके पौत्रक परम्परासे सूर्यवंश बना। उस सूर्यवंशम आपका जन्म हुआ यह सब आपकी माया ही है। किस प्रकार मुझे अपनी मायाजालमें फँसाते हैं? आप अपनी मायासे देवताओं के कार्यसिद्धि के लिए पूर्णरूप अवतीर्ण हुए हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥ यात्रा-यज्ञादि कौतुकसे आप यथेच्छ क्रीड़ा करिये। में आपकी सब चष्टाओंको समझता हूँ। आप संसारको शिक्षित करनेके लिए ही ऐसा करते हैं। २०। इस प्रकार शिवजीके कथनको सुनकर सीता और रामजी हंसे। तदनन्तर वे यज्ञकुण्डके समीप स्थित गुह वसिष्ठक पास गये ॥ २१॥ इसी समय हजारों यक्ष, गन्धर्व, किन्नर,

२९२आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

ऋक्षाणि तिथयो योगा करणानि च राशयः । पर्वताम्भरसः सर्वे सागराश्च नदा अपि ॥२४॥ सरोवराणि नद्यश्च वाप्यः कूपह्रदास्तरे । धृत्वा जगद्रूपाणि ययुस्ते यज्ञमण्डपम् ॥२५॥ समागतश्च संपातिर्गुहो मकरध्वजः । प्रहायौ च लङ्काया राक्षसेश विभीषणः ॥२६॥ आतिना राघवेणापि सर्वं तस्थुः प्रपूजिताः । स्वनिर्दिके स्थापिताः पूर्व सर्वेश्वाभूर प्लवंगमाः ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र समायातो मुनीश्वरः । कुम्भोदरो महातेजाः सीमाचार्यावलोकितः ॥२८॥ तं दृष्ट्वा भयभीतास्ते सर्वे प्रोचुः परस्परम् । हा कष्टं पुनरायातः सोऽय कुम्भोदरो मुनिः ॥२९॥ यात्राम्रमो राघवस्य यन्निमित्तो बभूव ह । यद्वाक्यादश्वमेधोऽपि सर्वेषां संबभूव ह ॥३०॥ महान् भ्रमांशपपुष्टे तु श्रमणो जगतीतले । अधुनाऽपि समायातः किमग्रे वै पुनर्भवेत् ॥३१॥ कुप्येत न तदृष्टो राघवस्यापि निंदकः । एवं नानाविधा वाचः सीमाचारगणोरिताः ॥३२॥ शृण्वन् कुम्भोदरस्तूष्णीं ययौ यज्ञभुवं प्रति । सदागमनपूर्वे स सीमाचारैर्निवेदितः ॥३३॥ धावद्भिर्वेपमानैश्च स्थलाद्गामिश्चरान्वितैः । राम राम महाबाहो हे लक्ष्मण शृणु प्रभो ॥३४॥ यात्रायज्ञश्च यद्वाक्यात् समायातः स वै पुनः । कुम्भोदरो मुनिश्रेष्ठो राम त्वय्यपि निष्ठुरः ॥३५॥ तद्द्तवचनं श्रुत्वा सर्वे तद्दर्शनात्सुकाः । त्यक्त्वा स्वीयानिकर्माणि चोत्सुरुस्तद्दिक्षया॥३६॥ ऋत्विजो राघवः सीता न भयं सेजिरे मुनेः । कुम्भोदरो यज्ञवाटं ययौ सर्वविलोकितः ॥३७॥ अतिखर्वः स्थूलशिराः श्याम्यरूपः महोदकः । स्थूलोदरः पिंगनेत्रः सर्पपाना जटाधरः ॥३८॥ चीरवासाः खर्वपादः खर्वहस्तो महामुनिः । पुरा किंचित् श्मश्रुयुक्तो धृतदण्डकमण्डलुः ॥३९॥ तं दृष्ट्वा सकला लोका भयं प्रापुः स्वचेतसि । पूर्वकर्म च संस्मृत्य श्रुत्य च परस्परम् ॥४०॥ एतस्मिन्नन्तरे रामः शीघ्रं प्रत्युद्जगाम तम् । मार्तण्डं प्रणम्येवाथ करं धृत्वा तु मंडपम् ॥४१॥

सिद्ध चारण एवं अप्सराओंका गण आया ॥ २२ ॥ सम्पूर्ण दिक्पाल, दिक्पाल तथा मन्दलनिवासी भी आये । नवो ग्रह, छट्टा ऋतुवें, साठो सम्वत्सर एवं तिथि नक्षत्र योग करण राश पर्वत वृक्ष समुद्र नद नदी कूप तालाब तथा अन्य सूक्ष्म प्राणी सभा अपने जङ्गम रूप धारण करके मण्डप में पधारे ॥२३-२५॥ गृध्रराज संपाति, निषादराज एवं मकरध्वज आये तदनन्तर सभा राक्षसोंके साथ लंकाके विभीषण जी आये ॥ २६ ॥ भगवान् रामने सबकी पूजा का और अपने समीप बैठाया वानर पहिलसे ही वहां टिके थे ॥ २७ ॥ इसी समय महातेजा कुम्भोदर मुनि आये। यज्ञ भूमिकी सीमा पर निवास करनेवालोंने उन्हें आते हुए देखा ॥ २८ । वे देखकर बड़े भयभीत हुए और बोले अहो ! बड़े कष्टकी बात है। यह तो फिर वह कुम्भोदर मुनि आ गये ॥ २९ ॥ जिनके कारण भगवान् रामको यात्राका कष्ट हुआ था, जिनके कारण हम सबका अश्वमेध हो गया ॥ ३० ॥ छःङ्ग के पीछे यज्ञ समाप्त हुआ से उधर उधरसे इधर घूमते हुए अत्यन्त कष्ट भये । अब यह फिर आये हैं। अब आगे क्या होगा, सा हमलोग नही जानते। यह रामचन्द्रका बड़ा निन्दक है ॥ ३१ ॥ इस प्रकार सीमाचारी लोगों की वाणियोको सुनते हुए कुम्भोदर चुपचाप यज्ञभूमिमे आये ॥ ३२ ॥ उनके आनके पूर्व ही बड़े वेगसे भागत-कांपते हुए दूतोंने आकर रामसे निवेदन किया-॥ ३३ ॥ हे राम ! हे महाबाहो लक्ष्मण हे प्रभो ! आप लोग सुने, जिसके वाक्यसे बारात गया और यज्ञ हुआ है वही कुम्भोदर मुनि फिर आये हैं। हे राम आपके ऊपर उनका बड़ा कठोर भाव है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ इस तरह दूतके वाक्य सुनकर सब अपने अपने कार्योंको छोड़कर उन्हें देखनेको उठे ॥ ३६ ॥ ऋत्विक् लोग, सीता तथा रामजी मुनिस भयभीत नहीं हुए। उनके देखते-देखते वे कुम्भोदर मुनि यज्ञभूमिमे आ पहुंचे ॥ ३७॥ जो बड़े नाटे थे जिनका मस्तक बड़ा था जिनका तरुईसा उभार था, जिनके श्यामल रूप था। जो खटाई पहने हुए तथा स्थूल उदरवाले थे पीले-पीले जिनके नेत्र थे। वे कौपीन पहिने तथा जटा धारण किये थे ॥ ३८ ॥ चीर पहिने हुए व छोटे-छोटे हाथोंवाले थे। मुचा होनेसे जिनके मूंछ आ रही थी और जो दण्ड-कमण्डलु धारण किये हुए थे ॥ ३९ ॥ उनका देखकर सम्पूर्ण जनसमुदाय और पहिले के कृत्योंको सुन सुन और स्मरण कर-करके मन ही मन भयभीत हुआ ॥ ४० ॥ उसी समय राम