छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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माता है, प्राण भाई है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है ॥ १ ॥
| प्राणो वा आशाया भूयान्<br><br>कथमस्य भूयस्त्वम् ? इत्याह दृष्टान्तेन समर्थयंस्तद्भूयस्त्वम्—यथा वै लोके रथचक्रस्यारा रथनाभौ समर्पिताः सम्प्रोताः सम्प्रवेशिता इत्येतत्; एवमस्मिँल्लिङ्गसङ्घातरूपे प्राणे प्रज्ञात्मनि दैहिके मुख्ये यस्मिन् परा देवता नामरूपव्याकरणायादर्शादौ प्रतिबिम्बवज्जीवेनात्मनानुप्रविष्टा । यश्च महाराजस्येव सर्वाधिकारीश्वरस्य । "कस्मिन्न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति स प्राणमसृजत" [प्र० उ० ६ । ३] इति श्रुतेः । यस्तु च्छायेवानुगत ईश्वरम्, "तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पितो | प्राण ही आशासे बढ़कर है। इसकी उत्कृष्टता किस प्रकार है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर दृष्टान्तद्वारा उसकी उत्कृष्टताका समर्थन करते हुए [सनत्कुमारजी-] कहते हैं—लोकमें जिस प्रकार रथके पहियेके अरे रथकी नाभिमें समर्पित-सम्प्रोत अर्थात् सम्यक् प्रकारसे प्रवेशित रहते हैं उसी प्रकार लिङ्ग संघातस्वरूप¹ इस प्राण यानी प्रज्ञात्मामें² अर्थात् दैहिक मुख्य प्राणमें, जिसमें कि परादेवताने नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये दर्पणादिमें प्रतिबिम्बके समान जीवरूपसे प्रवेश किया है, जो महाराजके सर्वाधिकार के समान ईश्वरका सर्वाधिकारी है, जैसा कि "किसके उत्क्रमण करनेपर मैं उत्क्रमण करूँगा तथा किसके स्थित होनेपर स्थित होऊँगा—ऐसा ईक्षण करके उसने प्राणकी रचना की" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है तथा जो छायाके समान ईश्वरका अनुगामी |
१—व्यष्टिलिंगदेहोंका समुदायरूप समष्टिसूत्रात्मा।
२—उपाधि प्राण और उपाधिमान् आत्माको एकता मानकर यह विशेषण दिया गया है।
खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थं ७६९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्मा" (कौ०उ० ३।८) इति कौषीतकिनाम् । अत एवमस्मिन्प्राणे सर्वं यथोक्तं समर्पितम् ।<br><br>अतः स एष प्राणोऽपरतन्त्रः प्राणेन स्वशक्त्यैव याति नान्यकृतं गमनादिक्रियास्वस्य सामर्थ्यमित्यर्थः । सर्वं क्रियाकारकफलभेदजातं प्राण एव न प्राणाद्बहिर्भूतमस्तीति प्रकरणार्थः । प्राणः प्राणं ददाति । यद्ददाति तत्स्वात्मभूतमेव । यस्मै ददाति तदपि प्राणायैव । अतः पित्राद्याख्योऽपि प्राण एव ॥ १ ॥ | है, जैसा कि कौषीतकी ब्राह्मणोपनिषद्की श्रुति है कि “जिस प्रकार रथके अरोंमें नेमि अर्पित है और रथकी नाभिमें अरे अर्पित हैं इसी प्रकार यह भूतमात्रा प्रज्ञामात्रामें अर्पित हैं और प्रज्ञामात्रा प्राणमें अर्पित है । वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा है ।” इसीसे इस प्राणमें ही उपर्युक्त सब समर्पित हैं ।<br><br>अतः वह यह परतन्त्र प्राण प्राणसे अर्थात् अपनी शक्तिसे ही गमन करता है । तात्पर्य यह है कि गमनादि क्रियाओंमें जो इसका सामर्थ्य है वह किसी अन्यके कारण नहीं है । सम्पूर्ण क्रिया, कारक और फलरूप भेदसमुदाय प्राण ही है, प्राणसे बाहर इनमें कोई नहीं है—ऐसा इस प्रकरणका तात्पर्य है । प्राण प्राण ( शक्ति ) प्रदान करता है; वह जो कुछ देता है उसका स्वात्मभूत ही है, जिसे देता है वह दान भी प्राणके लिये ही होता है । अतः पितृ आदि नामवाला भी प्राण ही है ॥ १ ॥ |
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</div>७७० | छान्दोग्योपनिषत् | [ अध्याय ७
| ७७० | छान्दोग्योपनिषत् | [ अध्याय ७ |
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| कथं पित्रादिशब्दानां प्रसिद्धार्थोत्सर्गेण प्राणविषयत्वमिति उच्यते । सति प्राणे पित्रादिषु पित्रादिशब्दप्रयोगात्तदुत्क्रान्तौ च प्रयोगाभावात् । कथं तत् ? इत्याह— | 'पितृ' आदि शब्दोंके प्रसिद्ध अर्थका त्याग करके उनका प्राणविषयक होना कैसे सम्भव है ! ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है-- क्योंकि प्राण रहनेपर ही पिता आदिके लिये 'पितृ' आदि शब्दका प्रयोग किया जाता है, उसके उत्क्रमण करनेपर इस प्रकारका प्रयोग भी नहीं होता । किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं— |
स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाचार्यं वा ब्राह्मणं वा किञ्चिद्भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वास्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥ २ ॥
यदि कोई पुरुष अपने पिता, माता, भ्राता, भगिनी, आचार्य अथवा ब्राह्मणके लिये कोई अनुचित बात कहता है तो [ उसके समीपवर्ती लोग ] उससे कहते हैं—'तुझे धिक्कार है, तू निश्चय ही पिताका हनन करनेवाला है, तू तो माताका वध करनेवाला है, तू तो भाईको मारनेवाला है, तू तो बहिनकी हत्या करनेवाला है, तू तो आचार्यका घात करनेवाला है, तू निश्चय ही ब्रह्मघाती है' ॥ २ ॥
| स यः कश्चित्पित्रादीनामन्यतमं यदि तं भृशमिव तदननुरूपमिव किञ्चिद्वचनं त्वङ्कारा- | जो कोई कि पिता आदिमेंसे किसीके प्रति यदि कोई 'भृशमिव'--उनके अननुरूप कोई त्वंकारादि (अरे-तू आदि) से युक्त वचन बोलता |
खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ७७१
| दियुक्तं प्रत्याह तदैनं पार्श्वस्था आहुर्विवेकिनो धिक्त्वास्तु धिगस्तु त्वामित्येवम्। पितृहा वै त्वं पितुर्हन्तेत्यादि ॥ २ ॥ | है तो उसके समीपवर्ती विचारशील लोग उससे 'धिक्त्वास्तु'—तुझे धिक्कार है—ऐसा कहते हैं। 'तू निश्चय ही पितृहा—पिताका हनन करनेवाला है' इत्यादि ॥ २ ॥ |
अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषंदहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥ ३ ॥
किंतु जिनके प्राण उत्क्रमण कर गये हैं उन पिता आदिको यदि वह शूलसे एकत्रित और छिन्न-भिन्न करके जला दे तो भी उससे 'तू पितृहा है' 'तू मातृहा है' 'तू भ्रातृहा है' 'तू बहिनकी हत्या करनेवाला है' 'तू आचार्यका घात करनेवाला है' अथवा 'तू ब्रह्मघाती है' ऐसा कुछ नहीं कहते ॥ ३ ॥
| अथैनानेवोत्क्रान्तप्राणांस्त्यक्तदेहानथ यद्यपि शूलेन समासं समस्य व्यतिषन्दहेद्यत्यस्य सन्दहेदेवमप्यतिक्रूरं कर्म समास-व्यासादिप्रकारेण दहनलक्षणं तद्देहसम्बद्धमेव कुर्वाणं नैवैनं ब्रूयुः पितृहेत्यादि। तस्मादन्वयव्यतिरेकाभ्यामवगम्यत एतत्पित्राद्याख्योऽपि प्राण एवेति ॥ ३॥ | किंतु प्राण निकल जानेपर—देहका त्याग कर देनेपर इन्हींको यदि वह शूलसे समास—एकत्रित करके व्यतिषन्दहन करे अर्थात् छिन्न-भिन्न करके जलावे; उनके देहसे सम्बद्ध समास-व्यासादि क्रमसे दहन करारूप ऐसा अत्यन्त क्रूर कर्म करनेपर भी उससे 'तू पितृहा है' इत्यादि नहीं कहते। अतः अन्वय-व्यतिरेकसे यह ज्ञात होता है कि यह पिता आदि नाम-वाला भी प्राण ही है ॥ ३ ॥ |
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छा० उ० २५—
७७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
७७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| तस्मात्— | अतः— |
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प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥४॥
प्राण ही ये सब [ पिता आदि ] हैं । वह जो इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार चिन्तन करनेवाला और इस प्रकार जाननेवाला है अतिवादी होता है । उससे यदि कोई कहे कि, 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, अतिवादी हूँ', उसे छिपाना नहीं चाहिये ॥४॥
| प्राणो ह्येवैतानि पित्रादीनि सर्वाणि भवति चलानि स्थिराणि च। स वा एष प्राणविदेवं यथोक्तप्रकारेण पश्यन्फलतोऽनुभवन्नेवं मन्वान उपपत्तिभिश्चिन्तयन्नेवं विजानन्नुपपत्तिभिः संयोज्यैवमेवेति निश्चयं कुर्वन्नित्यर्थः । मननविज्ञानाभ्यां हि सम्भूतः शास्त्रार्थो निश्चितो दृष्टो भवेत् । अत एवं पश्यन्नतिवादी भवति नामाद्याशान्तमतीत्य वदनशीलो भवतीत्यर्थः । | प्राण ही ये सब चर और अचर पिता आदि हैं । वह यह प्राणवेत्ता इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे देखता हुआ अर्थात् फलतः अनुभव करता हुआ¹, इस प्रकार मनन करता हुआ अर्थात् युक्तियोंद्वारा चिन्तन करता हुआ और इस प्रकार जानता हुआ यानी उपपत्तियोंसे संयुक्त करके 'यह ऐसा ही है' इस प्रकार निश्चय करता हुआ, क्योंकि मनन और विज्ञानके द्वारा निष्पन्न हुआ शास्त्रका अर्थ निश्चित देखा जाता है; अतः इस प्रकार देखता हुआ वह अतिवादी होता है; तात्पर्य यह है कि उसका नामसे लेकर आशापर्यन्त सम्पूर्ण तत्त्वोंका अतिक्रमण करके बोलनेका स्वभाव होता है। |
१. यानी स्वरूपतः साक्षात्कार करता हुआ।
खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थे ७७३
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
| तं चेद्ब्रूयुस्तं यद्येवमतिवादिनं सर्वदा सर्वैः शब्दैर्नामाद्याशान्तमतीत्य वर्तमानं प्राणमेव वदन्त्येवं पश्यन्तमतिवदनशीलमतिवादिनं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य हि जगतः प्राण आत्माहमिति ब्रुवाणं यदि ब्रूयुरतिवाद्यसीति । बाढमतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत । कस्माद्ध्यसावपह्नुवीत यत्प्राणं सर्वेश्वरमयमहमस्मीत्यात्मत्वेनोपगतः ॥ ४ ॥ | उससे यदि कहें, अर्थात इस प्रकार अतिवदन करनेवाले यानी जो ऐसा देखता है कि सब लोग सर्वदा सम्पूर्ण शब्दोंद्वारा नामसे लेकर आशापर्यन्त तत्त्वोंका अतिक्रमण करके स्थित हुए प्राणका ही वर्णन करते हैं उस अतिवदनशील अतिवादीसे, जो 'मैं ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्का प्राण यानी आत्मा हूँ' ऐसा कहनेवाला है, यदि कहें कि 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, मैं अतिवादी हूँ' उसे छिपाना नहीं चाहिये। जो सर्वेश्वर प्राणको 'यह मैं हूँ' इस प्रकार आत्मभावसे प्राप्त हो गया है वह किस प्रकार उस (अतिवादित्व) को छिपावेगा ? [ अर्थात् उसके लिये अपने अतिवादित्वको छिपानेका कोई प्रयोजन नहीं है ] ॥ ४ ॥ |
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
षोडश खण्ड
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सत्य ही जानने योग्य है
| स एष नारदः सर्वातिशयं प्राणं स्वमात्मानं सर्वात्मानं श्रुत्वा नातः परमस्तीत्युपरराम । न पूर्ववत्किमस्ति भगवः प्राणाद्भूय इति पप्रच्छयतः । तमेवं विकारानृतब्रह्मविज्ञानेन परितुष्टमकृतार्थं परमार्थसत्यातिवादिनमात्मानं मन्यमानं योग्यं शिष्यं मिथ्याग्रहविशेषाद्विप्रच्यावयन्नाह भगवान्सनत्कुमारः । एष तु वा अतिवदति यमहं वक्ष्यामि न प्राणविद्वतिवादी परमार्थतः । नामाद्यपेक्षं तु तस्यातिवादित्वम् । यस्तु भूमाख्यं सर्वातिक्रान्तं तत्त्वं परमार्थसत्यं वेद सोऽतिवादीत्यत आह— | वे नारदजी सबसे उत्कृष्ट अपने आत्मा प्राणको ही सर्वात्मा सुनकर यह समझकर कि इससे परे और कुछ नहीं है, शान्त हो गये, क्योंकि पूर्ववत् उन्होंने ऐसा प्रश्न नहीं किया कि 'भगवन् ! प्राणसे बढ़कर क्या है ?' इस प्रकार विकाररूप मिथ्या ब्रह्मके ज्ञानसे संतुष्ट हुए, अकृतार्थ तथा अपनेको परमार्थसत्यातिवादी माननेवाले उस योग्य शिष्यको उस मिथ्याग्रहविशेषसे च्युत करते हुए, भगवान् सनत्कुमारने कहा—'मैं जिसका आगे वर्णन करूँगा वही अतिवदन करता है, परमार्थतः प्राणवेत्ता अतिवादी नहीं है । उसका अतिवादित्व तो नामादिकी अपेक्षासे ही है । किंतु अतिवादी तो वही है जो भूमासंज्ञक सर्वातीत परमार्थसत्य तत्त्वको जानता है ।' इसी आशयसे वे कहते हैं— |
एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानोति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७५
[ सनत्कुमार— ] जो सत्य ( परमार्थ सत्य आत्माके विज्ञान ) के कारण अतिवदन करता है वही निश्चय अतिवदन करता है । [ नारद— ] भगवन् ! मैं तो परमार्थ सत्य विज्ञानके कारण ही अतिवदन करता हूँ । [ सनत्कुमार— ] सत्यकी ही तो विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये । [ नारद— ] भगवन् ! मैं विशेषरूपसे सत्यकी जिज्ञासा करता हूँ ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एष तु वा अतिवदति यः सत्येन परमार्थसत्यविज्ञानवत्तयातिवदति सोऽहं त्वां प्रपन्नो भगवन्सत्येनातिवदानि । तथा मां नियुनक्तु भगवान् यथाहं सत्येनातिवदानीत्यभिप्रायः । यद्येवं सत्येनातिवदितुमिच्छसि सत्यमेव तु तावद्विजिज्ञासितव्यमित्युक्त आह नारदः । तथास्तु तर्हि सत्यं भगवो विजिज्ञासे विशेषेण ज्ञातुमिच्छेयं त्वत्तोऽहमिति ॥ १ ॥ | [ सनत्कुमार— ] किंतु अतिवदन तो वही करता है जो परमार्थसत्यविज्ञानके कारण अतिवदन करता है । [ नारद— ] भगवन् ! आपका शरणागत हुआ मैं तो सत्यके ही कारण अतिवदन करता हूँ । तात्पर्य यह है कि भगवान् मुझे इस प्रकार उपदेश करें जिससे कि मैं सत्य ज्ञानके कारण अतिवदन करूँ । 'यदि इस प्रकार तुम सत्यके द्वारा अतिवदन करना चाहते हो तो सत्यकी ही जिज्ञासा करनी चाहिये'—ऐसा कहे जानेपर नारदजी बोले—'ठीक है, अच्छा तो भगवन् ! मैं सत्यकी विजिज्ञासा—आपके द्वारा विशेषरूपसे सत्यको जाननेकी इच्छा करता हूँ' ॥१॥ |
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥
सप्तदश खण्ड
—: ॐ :—
विज्ञान ही जानने योग्य है
यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन्सत्यं वदति विजानन्नेव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
जिस समय पुरुष सत्यको विशेषरूपसे जानता है तभी वह सत्य बोलता है, बिना जाने सत्य नहीं बोलता; अपितु विशेषरूपसे जानने-वाला ही सत्यका कथन करता है। अतः विज्ञानकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये। [नारद—] ‘भगवन्! मैं विज्ञानको विशेष-रूपसे जानना चाहता हूँ’ ॥ १ ॥
| यदा वै सत्यं परमार्थतो विजानाति। इदं परमार्थतः सत्यमिति। ततोऽनृतं विकारजात वाचारम्भणं हित्वा सर्वविकारावस्थं सदेवैकं सत्यमिति तदेवाथ वदति यद्वदति। <br><br> ननु विकारोऽपि सत्यमेव। “नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः” (बृ०उ० १।६।३)। “प्राणा वै सत्यं तेषामेव सत्यम्” (बृ० उ० २।१।२०) इति श्रुत्यन्तरात्। | जिस समय पुरुष सत्यको परमार्थतः जानता है, अर्थात् ‘यह परमार्थतः सत्य है’ ऐसा जानता है उस समय वह वाणीपर अवलम्बित मिथ्या विकारजातको त्यागकर सम्पूर्ण विकारमें स्थित एक सत् ही सत्य है—ऐसा समझकर फिर जो कुछ बोलता है उसीको बोलता है। <br><br> शङ्का—किंतु विकार भी तो सत्य ही है, क्योंकि “नाम और रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है”, “[वागादि] प्राण ही सत्य हैं, यह [मुख्य प्राण] उनका भी सत्य है”, इस अन्य श्रुतिसे भी [यही सिद्ध होता है]। |
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खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७
| [विकारस्य परमार्थसत्यत्वनिरासः] <br><br> सत्यम्, उक्तं सत्यत्वं श्रुत्यन्तरे विकारस्य न तु परमार्थापेक्षमुक्तम् । किं तर्हि ? इन्द्रियविषयाविषयत्वापेक्षं सच्च त्यच्चेति सत्यमित्युक्तम् । तद्द्वारेण च परमार्थसत्यस्योपलब्धिर्विवक्षितेति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यमिति चोक्तम् ।<br><br>इहापि तदिष्टमेव, इह तु प्राणविषयात्परमार्थसत्यविज्ञानाभिमानाद्व्युत्थाप्य नारदं यत्तत्सदेव सत्यं परमार्थतो भूमाख्यं तद्विज्ञापयिष्यामीत्येष विशेषतो विवक्षितोऽर्थः । नाविजानन्सत्यं वदति । यस्त्वविजानन्वदति सोऽग्न्यादिशब्देनाग्न्यादीन्परमार्थसद्रूपान्मन्यमानो वदति । न तु ते रूपत्रयव्यतिरेकेण परमार्थतः सन्ति तथा तान्यपि रूपाणि सदपेक्षया | समाधान— ठीक है, श्रुत्यन्तरमें विकारका सत्यत्व अवश्य बतलाया गया है, परंतु वह परमार्थकी अपेक्षासे नहीं बतलाया गया । तो फिर क्या बात है?—इन्द्रियोंके विषय होने और न होनेकी अपेक्षासे सत् और त्यत् हैं, इस प्रकार वहाँ सत्यका उल्लेख किया गया है । तथा उसके द्वारा वहाँ परमार्थ सत्यकी उपलब्धि ही विवक्षित है । इसीसे वहाँ यह कहा गया है कि ‘[वागादि] प्राण ही सत्य है, यह [मुख्य प्राण] उनका भी सत्य है ।’<br><br>यहाँ भी वह इष्ट ही है । परंतु यहाँ विशेषरूपसे सनत्कुमारजीको यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है कि नारदजीको प्राणविषयक परमार्थ सत्य विज्ञानके अभिमानसे निवृत्त कर जो भूमासंज्ञक सत् ही परमार्थ सत्य है, उसे विशेषरूपसे समझाऊँगा । उसे विशेषरूपसे जाने बिना कोई सत्य नहीं बोलता । जो कोई उसे बिना जाने बोलता है वह ‘अग्नि’आदि शब्दसे अग्नि आदिको ही परमार्थ सद्रूप समझकर बोलता है । किंतु परमार्थतः वे रूपत्रय (रक्त, शुक्ल और कृष्णरूप) से अतिरिक्त हैं नहीं । तथा वे रूप भी सत्की अपेक्षा |
७७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७
| ७७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७ |
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| नैव सन्तीत्यतो नाविजानन्सत्यं वदति । विजानन्नेव सत्यं वदति ।<br><br>न च तत्सत्यविज्ञानमविजिज्ञासितमप्रार्थितं ज्ञायत इत्याह—<br><br>विज्ञानंत्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । यद्येवं विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति । एवं सत्यादीनां चोत्तरोत्तराणां करोत्यन्तानां पूर्वपूर्वहेतुत्वं व्याख्यातव्यम् ॥ १ ॥ | तो हैं ही नहीं। अतः परमार्थको बिना जाने कोई सत्य नहीं बोल सकता। सत्यका विशेष ज्ञान होनेपर ही पुरुष सत्य बोल सकता है।<br><br>किन्तु वह सत्यविज्ञान बिना जिज्ञासा किये—बिना उसकी प्रार्थना किये नहीं जाना जाता; इसीसे कहते हैं कि 'विज्ञानकी* ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद—] 'यदि ऐसी बात है, तो भगवन्! मैं विज्ञानको विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करता हूँ। इसी प्रकार सत्यसे लेकर [आगे बाईसवें खण्डके] 'करोति' पर्यन्त उत्तरोत्तर पदार्थोंके पूर्व-पूर्व पदार्थ कारण हैं—ऐसी व्याख्या करनी चाहिये ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥
* 'विज्ञान' शब्द अष्टम खण्डके प्रथम मन्त्रमें भी आया है। परन्तु वहाँ उसका तात्पर्य केवल शास्त्रज्ञान है और यहाँ विशेष ज्ञान अर्थात् वास्तविक ज्ञान है।
अष्टादश
—: ० :—
मति ही जानने योग्य है.
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य मनन करता है तभी वह विशेषरूपसे जानता है; बिना मनन किये कोई नहीं जानता, अपितु मनन करनेपर ही जानता है । अतः मतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं मतिके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥
| यदा वै मनुत इति । मतिर्मननं तर्को मन्तव्यविषय आदरः ॥१॥ | जिस समय मनन करता है इत्यादि । 'मति' अर्थात् मनन—तर्क—मन्तव्य विषयके प्रति आदर। |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्यायेऽष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥
एकोनविंश खण्ड
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श्रद्धा ही जानने योग्य है
यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दध-
देव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति । श्रद्धां
भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य श्रद्धा करता है तभी वह मनन करता है; बिना श्रद्धा किये कोई मनन नहीं करता । अपितु श्रद्धा करनेवाला ही मनन करता है । अतः श्रद्धाको ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं श्रद्धाके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥१॥
| आस्तिक्यबुद्धिः श्रद्धा ॥१॥ | आस्तिक्य बुद्धिका नाम श्रद्धा है ॥ १ ॥ |
—: • :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकोन-
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
विंश खण्ड
—: ० :—
निष्ठा ही जानने योग्य है
यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति नानिस्तिष्ठञ्छ्रद्द- धाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञा- सितव्येति । निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] जिस समय पुरुषकी निष्ठा होती है तभी वह श्रद्धा करता है; बिना निष्ठाके कोई श्रद्धा नहीं करता, अपितु निष्ठा करनेवाला ही श्रद्धा करता है। अतः निष्ठाको ही विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं निष्ठाको विशेषरूपसे जानना चाहता हूँ' ॥ १ ॥
| निष्ठा गुरुशुश्रूषादिस्तत्परत्वं <br> ब्रह्मविज्ञानाय ॥ १ ॥ | निष्ठा गुरुशुश्रूषा आदिको कहते हैं। उसमें ब्रह्मविज्ञानके लिये तत्पर रहना ॥ १ ॥ |
—:००:—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २० ॥
एकविंश
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कृति ही जानने योग्य है
यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य करता है उस समय वह निष्ठा भी करने लगता है; बिना किये किसीकी निष्ठा नहीं होती, पुरुष करनेपर ही निष्ठावान् होता है । अतः कृतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ?' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं कृतिकी विशेष-रूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥
| यदा वै करोति । कृतिरिन्द्रियसंयमश्चित्तैकाग्रताकरणं च । सत्यां हि तस्यां निष्ठादीनि यथोक्तानि भवन्ति विज्ञानावसानानि ॥ १ ॥ | जिस समय मनुष्य करता है । 'कृति' इन्द्रियसंयम और चित्तकी एकाग्रता करनेको कहते हैं । उसके होनेपर ही उपर्युक्त [विपरीत क्रमसे] निष्ठासे लेकर विज्ञानपर्यन्त समस्त साधन होते हैं ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २१ ॥
द्वाविंशं
सुख ही जानने योग्य है
यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] 'जब मनुष्यको सुख प्राप्त होता है तभी वह करता है; बिना सुख मिले कोई नहीं करता, अपितु सुख पाकर (पानेकी आशा रखकर) ही करता है; अतः सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद—] 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥१॥
| सापि कृतिर्यदा सुखं लभते | वह कृति भी, जिस समय सुख मिलता है अर्थात् जिस समय ऐसा |
|---|---|
| सुखं निरतिशयं वक्ष्यमाणं | मानता है कि मुझे आगे बतलाया जानेवाला निरतिशय सुख प्राप्त |
| लब्धव्यं मयेति मन्यते तदा | करना चाहिये, तभी होती है। जिस प्रकार लौकिक कृति दृष्टफलजनित |
| भवतीत्यर्थः । यथा दृष्टफल- | सुखके लिये होती है उसी प्रकार इस प्रसंगमें भी बिना सुख मिले |
| सुखाकृतिस्तथेहापि नासुखं | कोई नहीं करता। यद्यपि वह फल भविष्यत्कालिक होता है तो भी |
| लब्ध्वा करोति । भविष्यदपि | 'लब्ध्वा' (पाकर) ऐसा [पूर्वकालिक क्रियारूपसे] कहा जाता |
| फलं लब्ध्वेत्युच्यते तदुद्दिश्य | है, क्योंकि उसीके उद्देश्यसे प्रवृत्ति होनी सम्भव है। |
| प्रवृत्त्युपपत्तेः । |
७८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| अथेदानीं कृत्यादिषूत्तरोत्तरेषु सत्सु सत्यं स्वयमेव प्रतिभासत इति न तद्विज्ञानाय पृथग्यत्नः कार्य इति प्राप्तं तत इदमूच्यते—सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमित्यादि । सुखं भगवो विजिज्ञास इत्यभिमुखीभूतायाह ॥ १ ॥ | अब यह प्राप्त होता है कि—कृतिसे लेकर उत्तरोत्तर साधनोंके होनेपर सत्य स्वयं ही अनुभव हो जायगा, उसके विज्ञानके लिये पृथक् प्रयत्न नहीं करना चाहिये—इसीसे यह कहा गया है कि 'सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये' इत्यादि । फिर 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' इस प्रकार [ सुखविज्ञानके प्रति ] अभिमुख हुए नारदजीसे सनत्कुमारजी कहते हैं ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वाविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २२ ॥
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त्रयोविंश खण्ड
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भूमा ही जानने योग्य है
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति । भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] ‘निश्चय जो भूमा है वही सुख है, अल्पमें सुख नहीं है। सुख भूमा ही है। भूमाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।’ [नारद—] ‘भगवन्! मैं भूमाकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ ॥ १ ॥
| यो वै भूमा महन्निरतिशयं बह्विति पर्यायास्तत्सुखम् । ततोऽर्वाक्सातिशयत्वादल्पम् । अतस्तस्मिन्नल्पे सुखं नास्ति । अल्पस्याधिकतृष्णाहेतुत्वात् । तृष्णा च दुःखबीजम् । न हि दुःखबीजं सुखं दृष्टं ज्वरादि लोके । तस्माद्युक्तं नाल्पे सुखमस्तीति । अतो भूमैव सुखम् । तृष्णादिदुःखबीजत्वासम्भवाद्भुम्नः ॥ १ ॥ | निश्चय जो भूमा है—महान्, निरतिशय और बहु—ये इसके पर्याय हैं—वही सुख है। उससे नीचेके पदार्थ सातिशय (न्यूनाधिक) होनेके कारण अल्प हैं। अतः उस अल्पमें सुख नहीं है; क्योंकि अल्प तो अधिक तृष्णाका हेतु है और तृष्णा दुःखका बीज है। तथा लोकमें दुःखके बीजभूत ज्वरादि सुखरूप नहीं देखे गये। अतः ‘अल्पमें सुख नहीं है’ यह कथन ठीक ही है। इसलिये भूमा ही सुखरूप है; क्योंकि भूमामें दुःखके बीजभूत तृष्णादिका होना असम्भव है ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥ —:००:—
चतुर्विंश खण्ड
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भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन
| किंलक्षणोऽसौ भूमेत्याह— | यह भूमा किन लक्षणोंवाला है, सो बतलाते हैं— |
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यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति। स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता वह भूमा है। किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एवं कुछ और जानता है वह अल्प है। जो भूमा है वही अमृत है और जो अल्प है वह मर्त्य है।'
[नारद—] 'भगवन् ! वह (भूमा) किसमें प्रतिष्ठित है?'
[सनत्कुमार—] 'अपनी महिमामें, अथवा अपनी महिमामें भी नहीं है' ॥ १ ॥
| यत्र यस्मिन्भूम्नि तत्त्वे नान्यद्द्रष्टव्यमन्येन करणेन द्रष्टान्यो विभक्तो दृश्यात्पश्यति तथा नान्यच्छृणोति। नामरूपयोरेवान्तर्भावाद्विषयभेदस्य, तद्ग्राहक- | जहाँ—जिस भूमातत्त्वमें दृश्यसे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा किसी अन्य द्रष्टव्य विषयको अन्य इन्द्रियके द्वारा नहीं देखता और न कुछ सुनता ही है। विषयभेदका अन्तर्भाव नाम और रूपमें ही हो जाता है; अतः उनका ग्रहण |
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| खण्ड २४] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८७ |
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| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| योरेवेह दर्शनश्रवणयोर्ग्रहणम्, अन्येषां चोपलक्षणार्थत्वेन। मननं त्वत्रोक्तं द्रष्टव्यं नान्यन्मनुत इति, प्रायशो मननपूर्वकत्वाद्विज्ञानस्य। तथा नान्यद्विजानाति; एवंलक्षणो यः भूमा। | करनेवाली दर्शन और श्रवण इन दो इन्द्रियोंका ही यहाँ अन्य इन्द्रियोंके उपलक्षणार्थ ग्रहण किया गया है। किंतु मननका यहाँ 'नान्यन्मनुते' ऐसा कहकर अलग उल्लेख किया गया है—ऐसा जानना चाहिये, क्योंकि विज्ञान प्रायः मननपूर्वक हुआ करता है; तथा जहाँ कुछ और जानता भी नहीं—जो ऐसे लक्षणोंवाला है वह भूमा है। |
| किमत्र प्रसिद्धान्यदर्शनाभावो भूम्युच्यते नान्यत्पश्यतीत्यादिना ? अथान्यन्न पश्यत्यात्मानं पश्यतीत्येतत् ? | गुरु—यहाँ [यह विचारना है कि] 'नान्यत्पश्यति' इत्यादि वाक्यसे भूमामें लोकप्रसिद्ध अन्य दर्शनका अभाव बतलाया गया है अथवा अन्यको नहीं देखता, इसलिये अपनेको ही देखता है—यह बतलाया गया है ? |
| किं चातः ? | शिष्य—इससे क्या [हानि-लाभ] है ! |
| यद्यन्यदर्शनाद्यभावमात्रमित्युच्यते तदा द्वैतसंव्यवहारविलक्षणो भूमेत्युक्तं भवति। अथान्यदर्शनविशेषप्रतिषेधेनात्मानं पश्यतीत्युच्यते तदैकस्मिन्नेव | गुरु—यदि इस वाक्यद्वारा अन्य पदार्थके दर्शनादिका अभाव ही बतलाया गया हो तब तो यह बात कही जाती है कि भूमा द्वैतव्यवहारसे विलक्षण है और यदि अन्यदर्शनविशेषका प्रतिषेध करके यह कहा गया हो कि वह अपनेको देखता है तो एकमें |