छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्द्यदेभिरच्छादयँस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥ २ ॥
[ एक बार ] मृत्युसे भय मानते हुए देवताओंने त्रयीविद्यामें प्रवेश किया। उन्होंने अपनेको छन्दोंसे आच्छादित कर लिया। देवताओंने जो उनके द्वारा अपनेको आच्छादित किया वही छन्दोंका छन्दपन है। [ अर्थात् देवताओंको आच्छादित करनेके कारण ही मन्त्रोंका नाम छन्द हुआ है ] ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| देवा वै मृत्योर्मारकाद्विभ्यतः किं कृतवन्तः ? इत्युच्यते—त्रयीं विद्यां त्रयीविहितं कर्म प्राविशन् प्रविष्टवन्तो वैदिकं कर्म प्रारब्धवन्त इत्यर्थः, तन्मृत्योस्त्राणं मन्यमानाः। किं च ते कर्मण्य-विनियुक्तैश्छन्दोभिर्मन्त्रैर्जपहोमादि कुर्वन्त आत्मानं कर्मान्तरेष्वच्छादयंश्छादितवन्तः। यद्यस्मादेभिर्मन्त्रैरच्छादयंस्तत्तस्माच्छन्दसां मन्त्राणां छादनाच्छन्दस्त्वं प्रसिद्धमेव ॥ २ ॥ | प्रसिद्ध देवताओंने मारक मृत्युसे भय मानते हुए क्या किया ? यह बतलाया जाता है—उन्होंने त्रयी विद्यामें—वेदत्रयीद्वारा प्रतिपादित कर्ममें प्रवेश किया। अर्थात् वैदिक कर्मको ही मृत्युसे बचनेका साधन समझकर उन्होंने उसीका आरम्भ कर दिया। तथा कर्ममें जिनका विनियोग नहीं है उन छन्दों—मन्त्रों—से जप एवं होमादि करते हुए उन्होंने अपनेको कर्मान्तरोंमें आच्छादित कर दिया। क्योंकि उन्होंने अपनेको इन मन्त्रोंसे आच्छादित कर दिया था, इसलिये छादन करनेके कारण ही छन्दों यानी मन्त्रोंका छन्दपन प्रसिद्ध ही है ॥२॥ |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि । ते नु विदित्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३ ॥
जिस प्रकार [मछेरा] जलमें मछलियोंको देख लेता है, उसी प्रकार ऋक्, साम और यजुःसम्बन्धी कर्मोंमें लगे हुए उन देवताओंको मृत्युने देख लिया । इस बातको जान लेनेपर उन देवताओंने ऋक्, साम और यजुः सम्बन्धी कर्मोंसे निवृत्त होकर स्वर (ॐ इस अक्षर) में ही प्रवेश किया॥ ३॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तांस्तत्र देवान्कर्मपरान्मृत्युर्यथा लोके मत्स्यघातको मत्स्यमुदके नातिगम्भीरे परिपश्येद्दण्डिशोदकस्रावोपायसाध्यं मन्यमानः, एवं पर्यपश्यद्दृष्टवान्मृत्युः; कर्मक्षयोपायेन साध्यान्देवान्मेन इत्यर्थः। क्वासौ देवान्ददर्श? इत्युच्यते—ऋचि साम्नि यजुषि । ऋग्यजुःसामसम्बन्धिकर्मणीत्यर्थः । ते नु देवा वैदिकेन कर्मणा संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्तो मृत्योश्चिकीर्षितं विदितवन्तः । विदित्वा च त ऊर्ध्वा व्यावृत्ताः कर्मभ्य ऋचः साम्नो | जिस प्रकार लोकमें बंसी लगाने और जल उलीचने आदि उपायोंसे मछलियोंको पकड़ा जा सकता है, यह जाननेवाला मछेरा उन्हें कम गहरे जलमें देख लेता है उसी प्रकार मृत्युने कर्मपरायण देवताओंको वहाँ [छिपे हुए] देख लिया, अर्थात् मृत्युने यह समझ लिया कि देवताओंको कर्मक्षयरूप उपायके द्वारा अपने अधीन किया जा सकता है । उसने देवताओंको कहाँ देखा ? यह बतलाया जाता है—ऋक्, साम और यजुमें अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्ममें। वैदिक कर्मानुष्ठानके कारण शुद्धचित्त हुए उन देवताओंने 'मृत्यु क्या करना चाहता है ?' यह जान लिया। यह जानकर वे ऋक्, साम और यजुःसे अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्मसे निवृत्त |
८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| यजुष ऋग्यजुःसामसंबद्धात्कर्मणोऽभ्युत्थायेत्यर्थः। तेन कर्मणा मृत्युभयापगमं प्रति निराशास्तदपास्यामृताभयगुणमक्षरं स्वरं स्वरशब्दितं प्राविशन्नेव प्रविष्टवन्तः; ॐकारोपासनपराः संवृत्ताः। एवशब्दोऽवधारणार्थः सन्समुच्चयप्रतिषेधार्थः। तदुपासनपराः संवृत्ता इत्यर्थः ॥३॥ | होकर ऊपरकी ओर उठे । उस कर्मसे मृत्युके भयकी निवृत्तिके प्रति निराश होनेके कारण वे उसे छोड़-कर अमृत और अभय गुणविशिष्ट अक्षर यानी स्वरमें—स्वरसंज्ञक अक्षरमें ही प्रविष्ट हो गये अर्थात् ओंकारोपासनामें तत्पर हो गये । यहाँ 'एव' शब्द अवधारणके लिये होकर [ पूर्व स्थानोंके साथ स्वरके ] समुच्चयका प्रतिषेध करनेके लिये है । तात्पर्य यह है कि वे उसीकी उपासनामें तत्पर हो गये ॥ ३ ॥ |
—: ० :—
ओंकारका उपयोग और महत्त्व
| कथं पुनः स्वरशब्दवाच्यत्वमक्षरस्य ? इत्युच्यते— | किंतु वह अक्षर 'स्वर' शब्दका वाच्यार्थ किस प्रकार है ? यह बतलाया जाता है— |
|---|
य दा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येवꣲ सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षरमेतदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥ ४ ॥
जिस समय [ उपासक अध्ययनद्वारा ] ऋक्को प्राप्त करता है उस समय वह ॐ ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार वह साम और यजुःको भी प्राप्त करता है । यह जो अक्षर है, वह अन्य स्वरोंके समान स्वर है । यह अमृत और अभयरूप है, इसमें प्रविष्ट होकर देवगण अमृत और अभय हो गये थे ॥ ४ ॥
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
| यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्ये- <br> वातिस्वरत्येवं सामैवं यजुः। एष <br> उ स्वरः। कोऽसौ ? यदेतदक्षरमे- <br> तदमृतमभयम्, तत्प्रविश्य यथा- <br> गुणमेवामृता अभयाश्चाभवन् <br> देवाः ॥ ४ ॥ | जिस समय [ उपासक ] ऋक्को प्राप्त करता है उस समय वह ‘ॐ’ ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार वह साम और यजुको भी प्राप्त करता है । यही स्वर है; वह स्वर कौन है ? यह जो अक्षर है, यह अमृत और अभयरूप है, उसमें प्रविष्ट होकर उसीके गुणके समान देवगण भी अमृत और अभय हो गये थे ॥ ४ ॥ |
ओंकारोपासनाका फल
स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरँ स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ ५ ॥
वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला होकर इस अक्षरकी स्तुति (उपासना) करता है, इस अमृत और अभयरूप अक्षरमें ही प्रवेश कर जाता है तथा इसमें प्रविष्ट होकर जिस प्रकार देवगण अमर हो गये थे, उसी प्रकार अमर हो जाता है ॥ ५ ॥
| स योऽन्योऽपि देववदेवैतदक्ष- <br> रमेवममृतमभयगुणं विद्वान्प्रणौ- <br> ति स्तौति–उपासनमेवात्र स्तुति- | उन देवताओंके समान ही जो दूसरा उपासक भी इस अक्षरको इसी प्रकार अमृत और अभयगुणसे विशिष्ट जानता हुआ उसकी स्तुति करता है– यहाँ स्तुतिका अभिप्राय उपासना |
८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| रभिप्रेता—स तथैवैतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति ।<br><br>तत्प्रविश्य च राजकुलं प्रविष्टानमिव राज्ञोऽन्तरङ्गबहिरङ्गतावन्न परस्य ब्रह्मणोऽन्तरङ्गबहिरङ्गताविशेषः, किं तर्हि ?<br><br>यदमृता देवा येनामृतत्वेन यदमृता अभूवंस्तेनैवामृतत्वेन विशिष्टस्तदमृतो भवति न न्यूनता नाप्यधिकतामृतत्व इत्यर्थः ॥५॥ | ही है—वह उसी प्रकार ( उन देवताओंके ही समान ) इस अमृत और अभयरूप अक्षरमें ही प्रविष्ट हो जाता है ।<br><br>तथा उसमें प्रविष्ट होनेपर, जिस प्रकार राजकुलमें प्रवेश करनेवालोंमें कोई राजाके अन्तरङ्ग रहते हैं और कोई बहिरङ्ग रहते हैं, इस प्रकार परब्रह्मके अन्तरङ्ग-बहिरङ्गताका भेद नहीं रहता । तो फिर क्या रहता है ? जिस अमृतत्वसे देवगण अमर हो गये थे उसी अमृतत्वसे विशिष्ट होकर यह भी उन्हींके समान अमर हो जाता है । इसके अमृतत्वमें न तो न्यूनता रहती है और न अधिकता ही ॥ ५ ॥ |
<div align="center">—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥४॥
पञ्चम खण्ड
ओंकार, उद्गीथ और आदित्यका अभेद
| प्राणादित्यदृष्टिविशिष्टस्योद्गीथ-<br>स्योपासनमुक्तमेवानूद्य प्रणवोद्गी-<br>थयोरेकत्वं कृत्वा तस्मिन्प्राण-<br>रश्मिभेदगुणविशिष्टदृष्ट्याक्ष-<br>रस्योपासनमनेकपुत्रफलमिदानीं<br>वक्तव्यमित्यारभ्यते— | पूर्वोक्त प्राण और आदित्यदृष्टिसे विशिष्ट उद्गीथोपासनाका ही अनुवाद (पुनरुल्लेख) कर प्रणव और उद्गीथकी एकता करते हुए अब उसी प्रसङ्गमें प्राण और रश्मियोंके भेदरूप गुणसे युक्त दृष्टिसे उस अक्षरकी (उद्गीथावयवभूत ओंकारकी) अनेक पुत्ररूप फलवाली उपासनाका निरूपण करना है—इसीलिये [आगेका ग्रन्थ] आरम्भ किया जाता है— |
|---|
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥
निश्चय ही जो उद्गीथ है वही प्रणव है और जो प्रणव है वही उद्गीथ है। इस प्रकार यह आदित्य ही उद्गीथ है, यही प्रणव है; क्योंकि यह (आदित्य) 'ॐ' ऐसा उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है ॥ १ ॥
| अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो बह्वृचानाम्, यश्च प्रणव- | निश्चय ही जो उद्गीथ है वही ऋग्वेदियोंका प्रणव है तथा उनका |
|---|
८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| स्तेषां स एव छान्दोग्य उद्गीथ-शब्दवाच्यः। असौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणवः। प्रणवशब्दवाच्योऽपि स एव बह्वृचानां नान्यः।<br><br>उद्गीथ आदित्यः, कथम् ?<br><br>उद्गीथाख्यमक्षरमोमित्येतदेष हि यस्मात्स्वरन्नुच्चारयन्ननेकार्थत्वाद्धात्तूनाम्, अथवा स्वरन्नाच्छन्नेति; अतोऽसावुद्गीथः सविता ॥ १ ॥ | जो प्रणव है वही छान्दोग्य-उपनिषद्में 'उद्गीथ' शब्दसे कहा गया है। यह आदित्य ही उद्गीथ है, यही प्रणव है; अर्थात् ऋग्वेदियोंके यहाँ प्रणवशब्दवाच्य भी वही है, कोई और नहीं है।<br><br>आदित्य उद्गीथ है—सो कैसे ? क्योंकि यह उद्गीथसंज्ञक अक्षरको 'ॐ' इस प्रकार स्वरन्—उच्चारण करते हुए जाता है [ यद्यपि 'स्वर आक्षेपे' इस धातुसूत्रके अनुसार 'स्वरन्' का अर्थ आक्षेप या गमन करते हुए होना चाहिये तथापि] धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं [इसलिये 'स्वरन्' का अर्थ 'उच्चारण करते हुए' भी होता है] अथवा स्वरन् यानी चलनेवाला सूर्य [ प्राणोंकी प्रवृत्तिके प्रति 'ॐ' इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ ] जाता है। अतः यह सविता उद्गीथ ही है ॥ १ ॥ |
रश्मिदृष्टिसे आदित्यकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल
एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मीꣳस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥
'मैंने प्रमुखतासे इसका गान किया था; इसीसे मेरे तू एक ही पुत्र है'—ऐसा कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा। अतः तू रश्मियोंका [ आदित्यसे ] भेदरूपसे चिन्तन कर। इससे निश्चय ही तेरे बहुत-से पुत्र होंगे। यह अधिदैवत उपासना है ॥ २ ॥
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
| तमेतममु एवाहमभ्यगासिषमाभिमुख्येन गीतवानस्म्यादित्यरश्म्यभेदं कृत्वा ध्यानं कृतवानस्मीत्यर्थः । तेन तस्मात्कारणान्मम त्वमेकोऽसि पुत्र इति ह कौषीतकिः कुषीतकस्यापत्यं कौषीतकिः पुत्रमुवाचोक्तवान् । अतो रश्मीनादित्यं च भेदेन त्वं पर्यावर्तयात्पर्यावर्तयेत्यर्थः, त्वं योगात् । एवं बहवो वै ते तव पुत्रा भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | ‘निश्चय इसीका मैंने आभिमुख्य ( प्रमुखता ) से गान किया था; अर्थात् मैंने आदित्य और उसकी रश्मियोंका अभेद करके ध्यान किया था । इसी कारणसे मेरे तू एक ही पुत्र है’—ऐसा कौषीतकि—कुषीतकके पुत्र कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा । अतः तू सूर्य और रश्मियोंका भेदपूर्वक चिन्तन कर । श्रुतिमें कर्तृपद ‘त्वं’ होनेके कारण पर्यावर्तयात् [ इस प्रथमपुरुषकी ] क्रियाके स्थानमें ‘पर्यावर्तय’ यह मध्यमपुरुषकी क्रिया समझनी चाहिये । इस प्रकार [ उपासना करनेसे] तेरे बहुत-से पुत्र उत्पन्न होंगे। यह अधिदैवत उपासना है ॥ २ ॥ |
मुख्यप्राणदृष्टिसे उद्गीथोपासना
अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥
इसके आगे अध्यात्म उपासना है—यह जो मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे, क्योंकि यह ‘ॐ’ इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ गमन करता है ॥ ३ ॥
| अथानन्तरमध्यात्ममुच्यते ।<br>य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथ- | इसके आगे अध्यात्म उपासना<br>कही जाती है—यह जो मुख्य प्राण |
८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| मुपासीतेत्यादि पूर्ववत् । तथो- | है, उसीकी दृष्टिसे उद्गीथकी उपासना करे—इस प्रकार पूर्ववत् समझना चाहिये । तथा यह प्राण भी 'ॐ' इस प्रकार कहता हुआ अर्थात् वागादिकी प्रवृत्तिके लिये 'ॐ' इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ-सा गमन करता है । मरणकालमें मरनेवाले पुरुषके समीप रहनेवाले लोग प्राणका 'ॐ' उच्चारण करना नहीं सुनते [ इसीलिये 'अनुज्ञा करता हुआ-सा' कहा है ] । इसी सादृश्यके कारण आदित्यमें भी ओंकारोच्चारण केवल अनुज्ञामात्र समझना चाहिये ॥ ३ ॥ | | मिति शेष प्राणोऽपि स्वरन्नेत्यो- | | | मिति ह्यनुज्ञां कुर्वन्निव वागा- | | | दिप्रवृत्त्यर्थमेतीत्यर्थः । न हि | | | मरणकाले मुमूर्षोः समीपस्थाः | | | प्राणस्योंकरणं शृण्वन्तीति । | | | एतसामान्यादादित्येऽप्योंकरण- | | | मनुज्ञामात्रं द्रष्टव्यम् ॥ ३ ॥ | |
प्राणभेददृष्टिसे मुख्य प्राणकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल
एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणाꣳस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥
'मैंने प्रमुखतासे केवल इसीका ( मुख्य प्राणहीका ) गान किया था, इसलिये मेरे तू अकेला ही पुत्र हुआ'— ऐसा कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा 'अतः तू 'मेरे बहुत-से पुत्र होंगे' इस अभिप्रायसे भेदगुण-विशिष्ट प्राणोंका प्रमुखतासे गान कर' ॥ ४ ॥
| एतमु एवाहमभ्यगासिषमित्यादि पूर्ववदेव । अन्नो वागादीन् | 'एतमु एवाहमभ्यगासिषम्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् ही |
|---|
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
| मुख्यं च प्राणं भेदगुणविशिष्ट- मुद्गीथं पश्यन्भूमानं मनसाभिगायतात् पूर्ववदावर्तयेत्यर्थः । बहवो वै मे मम पुत्रा भविष्यन्तीत्येवमभिप्रायः सन्नित्यर्थः । | समझना चाहिये । अतः तू वागादि और मुख्य प्राण इनकी दृष्टिसे उद्गीथको भेदगुणविशिष्ट देखता हुआ उसका मनसे बहुत्वरूपसे अभिगान अर्थात् पूर्ववत् आवर्तन कर । तात्पर्य यह है कि 'मेरे बहुत-से पुत्र होंगे' ऐसे अभिप्रायसे युक्त होकर [ उसकी उपासना कर ] । | | प्राणादित्यैकत्वोद्गीथदृष्टेरेकपुत्रत्वफलदोषेणापोदितत्वाद्रश्मिप्राणभेददृष्टेः कर्तव्यता चोद्यतेऽस्मिन्काण्डे बहुपुत्रफलत्वार्थम् ॥ ४ ॥ | एकपुत्रप्राप्तिरूप फलके दोषसे प्राण और आदित्यके एकत्वरूप उद्गीथदृष्टिकी निन्दा की जानेके कारण इस खण्डमें अनेक पुत्ररूप फलकी प्राप्तिके लिये रश्मि और प्राण इनकी भेददृष्टिका प्रतिपादन किया गया है ॥ ४ ॥ |
—: ० :—
प्रणव और उद्गीथका अभेद
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनु समाहरतीति ॥ ५ ॥
निश्चय ही जो उद्गीथ है, वही प्रणव है तथा जो प्रणव है, वही उद्गीथ है—इस प्रकार [उपासना करके] उद्गाता होताके कर्ममें किये हुए उद्गानसम्बन्धी दोषका अनुसन्धान (संशोधन) करता है, अनुसन्धान करता है ॥ ५ ॥
८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| अथ खलु य उद्गीथ इत्यादि प्रणवोद्गीथैकत्वदर्शनमुक्तं तस्यैतत्फलमुच्यते—होतृषदनाद्धोता यत्रस्थः शंसति तत्स्थानं होतृषदनं हौत्रात्कर्मणः सम्यक्प्रयुक्तादित्यर्थः । न हि देशमात्रात् फलमाहर्तुं शक्यम् । किं तत् ? हैवापि दुरुद्गीतं दुष्टमुद्गीतमुद्गानं कृतमुद्गात्रा स्वकर्मणि क्षतं कृतमित्यर्थः, तदनुसमाहरत्यनुसंदधत इत्यर्थः । चिकित्सयेव धातुवैषम्यसमीकरणमिति ॥ ५ ॥ | 'अथ खलु य उद्गीथः' इत्यादि वाक्यसे प्रणव और उद्गीथकी एकताका प्रतिपादन किया गया है । उसीका यह फल बतलाया जाता है—होतृषदनात्—जहाँ स्थित होकर होता शंसन कर्म करता है उस स्थानका नाम होतृषदन है, [ उससे ] अर्थात् सम्यक् प्रकारसे अनुष्ठान किये हुए होताके कर्मसे—क्योंकि केवल देशमात्रसे किसी फलकी प्राप्ति नहीं हो सकती । क्या होता है ? उद्गाताद्वारा जो दुरुद्गीत–दोषयुक्त उद्गान किया होता है अर्थात् अपने कर्ममें कोई दोष किया होता है उसका वह (उद्गाता) समाहार अर्थात् अनुसन्धान (सुधार) कर देता है, जिस प्रकार कि चिकित्साद्वारा धातुओंकी विषमताको ठीक कर दिया जाता है ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
अनेक प्रकारकी आधिदैविक उद्गीथोपासनाएँ
| अथेदानीं सर्वफलसंपत्त्यर्थमुद्गीथस्य उपासनान्तरं विधित्स्यते— | *अब समस्त फलकी प्राप्तिके लिये श्रुति उद्गीथसम्बन्धिनी अन्य प्रकारकी उपासनाओंका विधान करना चाहती है। |
|---|
इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयत इयमेव साग्निरमस्तत्साम ॥ १॥
यह (पृथिवी) ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह यह [अग्निसंज्ञक] साम इस ऋक्में अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। यह पृथिवी ही 'सा' है और अग्नि 'अम' है; इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥१॥
| इयमेव पृथिवी ऋक्, ऋचि पृथिवीदृष्टिः कार्या। तथाग्निः साम, सामन्यग्निदृष्टिः। कथं पृथिव्यग्न्योर्ऋक्सामत्वम् ? इत्युच्यते—तदेतत्तदेतदग्न्याख्यं सामैतस्यां पृथिव्यामृच्यध्यूढमधिगतमुपरिभावेन स्थितमित्यर्थः, | यह पृथिवी ही ऋक् है, अर्थात् ऋक्में पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये। तथा अग्नि साम है, साममें अग्निदृष्टि करनी चाहिये। पृथिवी और अग्नि ऋक् एवं साम किस प्रकार हैं ? सो बतलाया जाता है—यह जो अग्नि-संज्ञक साम है, इस पृथिवीसंज्ञक ऋक्-में अध्यूढ—अधिगत अर्थात् उपरि-भावसे स्थित है, जिस प्रकार कि साम |
|---|
* यहाँतक पुत्रादिप्राप्तिरूप एकदेशीय फलवाली उपासनाओंका वर्णन किया गया है।
६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| ऋचीव साम । तस्मादत एव कारणादृच्यध्यूढमेव साम गीयत इदानीमपि सामगैः ।<br><br>यथा च ऋक्सामनी नात्यन्तं भिन्ने अन्योन्यं तथैतौ पृथिव्याग्नी । कथम् ? इयमेव पृथिवी सा सामनामार्धशब्दवाच्या । इतरार्धशब्दवाच्योऽग्निरमस्तदेतत्पृथिव्यग्निद्वयं सामैकशब्दाभिधेयत्वमापन्नं साम । तस्मान्नान्योन्यं भिन्नं पृथिव्यग्निद्वयं नित्यसंश्लिष्टमृक्सामनी इव। तस्माच्च पृथिव्यग्न्योर्ऋक्सामत्वमित्यर्थः ।<br><br>सामाक्षरयोः पृथिव्यग्निदृष्टिविधानार्थमियमेव साग्निरम इति केचित् ॥ १ ॥ | ऋक्में अधिष्ठित रहता है । अतः इस समय भी सामगान करनेवाले द्विजोंद्वारा ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है ।<br><br>जिस प्रकार ऋक् और साम परस्पर अत्यन्त भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार ये पृथिवी और अग्नि भी अत्यन्त भिन्न नहीं हैं । यह किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] यह पृथिवी ही ‘सा’—‘साम’ नामके आधे शब्दद्वारा प्रतिपाद्य है तथा उसके अन्य नामार्ध ‘अम’ शब्दका वाच्य अग्नि ‘अम’ है । इस प्रकार ‘साम’ इस एक शब्दके वाच्यत्वको प्राप्त हुए वे ही ये पृथिवी और अग्नि दोनों साम कहे जाते हैं । अतः ऋक् और सामके समान सर्वदा मिले-जुले रहनेके कारण ये पृथिवी और अग्नि एक-दूसरेसे भिन्न नहीं हैं । भाव यह कि इसीसे पृथिवी और अग्निको ऋक् एवं साम कहा गया है । किन्हीं-किन्हींका मत है कि ‘साम’ शब्दके अक्षरोंमें पृथिवी और अग्निदृष्टिका विधान करनेके लिये ही ‘इयमेव सा अग्निरमः’ ऐसा उपदेश किया गया है ॥ १ ॥ |
—: ० :—
खण्ड ६] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
अन्तरिक्षमेवर्ग्यायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳ साम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत्साम ॥ २ ॥
अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है। वह यह साम इस ऋक्में अधिष्ठित है; अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। अन्तरिक्ष ही 'सा' है और वायु 'अम' है। इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ २ ॥
द्यौ रेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳ साम। तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते। द्यौरेव सादित्योऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥
द्यौ ही ऋक् है और आदित्य साम है। वह यह [ आदित्यरूप ] साम इस [ द्यौरूप ] ऋक्में अधिष्ठित है अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। द्यौ ही 'सा' है और आदित्य 'अम' है। इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ३ ॥
| अन्तरिक्षमेवर्ग्यायुः सामेत्यादि पूर्ववत् ॥ २-३ ॥ | अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ २-३ ॥ |
|---|
-: ० :-
नक्षत्राण्येवर्क्चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥ ४ ॥
नक्षत्र ही ऋक् हैं और चन्द्रमा साम है। वह यह [ चन्द्रमारूप ] साम इस [ नक्षत्ररूप ] ऋक्में अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। नक्षत्र ही 'सा' है और चन्द्रमा 'अम' है, इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ४ ॥
५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| नक्षत्राणामधिपतिश्चन्द्रमा<br>अतः स साम ॥ ४ ॥ | चन्द्रमा नक्षत्रोंका अधिपति है इसलिये [नक्षत्रोंके ऋक्स्थानीय होनेपर] वह साम है ॥ ४ ॥ |
— : ० : —
अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते ॥ ५ ॥
तथा यह जो आदित्यकी शुक्लज्योति है वही ऋक् है और उसमें जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता दिखायी देती है वह साम है । वह यह [ नीलवर्णरूप ] साम इस [ शुक्लज्योतीरूप ] ऋक्में अधिष्ठित है । अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है ॥ ५ ॥
| अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः शुक्ला दीप्तिः सैवर्क् । अथ यदादित्ये नीलं परः कृष्णं परोऽतिशयेन कार्ष्ण्यं तत्साम, तद्ध्येकान्तसमाहितदृष्टेर्दृश्यते ॥ ५ ॥ | तथा यह जो आदित्यकी शुक्ल प्रभा—शुक्ल दीप्ति है वही ऋक् है । तथा आदित्यमें जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता है वह साम है; किन्तु वह तो एकमात्र समाहित दृष्टिवाले पुरुषको ही दिखायी देती है ॥ ५ ॥ |
— : ० : —
अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्सामाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥
तथा यह जो आदित्यका शुक्ल प्रकाश है वही 'सा' है और जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता है वही 'अम' है, ये ही दोनों मिलकर साम हैं। तथा यह
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३
जो आदित्यमण्डलके अन्तर्गत सुवर्णमय-सा पुरुष दिखायी देता है, जो सुवर्णके समान श्मश्रुओंवाला (दाढ़ी-मूँछोंवाला) और स्वर्णसदृश केशोंवाला है तथा जो नखपर्यन्त सारा-का-सारा सुवर्ण-सा ही है ॥ ६ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| ते एवैते भाः शुक्लकृष्णत्वे सा चामश्च साम। अथ य एषोऽन्तरादित्य आदित्यस्यान्तर्मध्ये हिरण्मयो हिरण्मय इव हिरण्मयः। न हि सुवर्णविकारत्वं देवस्य संभवति ऋक्सामगेष्णत्वापहतपाप्मत्वासंभवात्। न हि सौवर्णेऽचेतने पाप्मादिप्राप्तिरस्ति येन प्रतिषिध्येत। चाक्षुषे चाग्रहणात्। अतो लुप्तोपम एव हिरण्मयशब्दो ज्योतिर्मय इत्यर्थः। उत्तरेष्वपि समाना योजना। | वे ही ये शुक्लत्व एवं कृष्णत्वरूप प्रकाश क्रमशः 'सा' और 'अम' होनेके कारण साम हैं। तथा यह जो आदित्यके अन्तर्गत—आदित्यके मध्यमें हिरण्मय—सुवर्णमयके सदृश होनेके कारण सुवर्णमय [साक्षात् सुवर्णका नहीं], क्योंकि सूर्यदेवका सुवर्णके विकाररूप होना, सम्भव नहीं है; [विकाररूप होनेपर] उनका ऋक् एवं सामरूप पंखोंवाला तथा निष्पाप होना सम्भव न होगा; क्योंकि सुवर्णमय अचेतन पदार्थोंमें तो पाप आदिकी सम्भावना ही नहीं है, जिसके कारण उनका प्रतिषेध किया जाय। इसके सिवा, नेत्रस्थ उपास्य पुरुषमें सुवर्णविकारत्वका ग्रहण भी नहीं किया जाता। इसलिये यह हिरण्मय शब्द लुप्तोपम ही है* अतः इसका अर्थ ज्योतिर्मय है। आगेके हिरण्मयादि शब्दोंका अर्थ भी इसीके समान लगाना चाहिये। |
* अर्थात् इसके आगे उपमावाचक 'इव' शब्दका लोप हुआ है।
९४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
९४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| पुरुषः पुरि शयनात्पूरयति वा स्वेनात्मना जगदिति, दृश्यते निवृत्तचक्षुर्भिः समाहितचेतोभिर्ब्रह्मचर्यादिसाधनापेक्षैः । तेजस्विनोऽपि श्मश्रुकेशादयः कृष्णाः स्युरित्यतो विशिनष्टि— हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश इति । ज्योतिर्मयान्येवास्य श्मश्रूणि केशाश्चेत्यर्थः । आप्रणखात्प्रणखो नखाग्रं नखाग्रेण सह सर्वः सुवर्ण इव भारूप इत्यर्थः ॥ ६ ॥ | [ ऐसा जो हिरण्मय ] पुरुष, [ शरीररूप ] पुरमें शयन करनेके कारण अथवा अपनेद्वारा सारे जगत्-को पूर्ण करता है इसलिये यह पुरुष कहलाता है, जिनकी इन्द्रियाँ बाह्य विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं उन समाहित चित्त और ब्रह्मचर्यादि-साधनवान् पुरुषोंको दिखायी देता है—तेजस्वी होनेपर भी उसके दाढ़ी-मूँछ आदि तो काले ही होंगे, अतः श्रुति उसकी विशेषता बतलाती है—जो सुनहली श्मश्रु और सुनहले केशोंवाला है; अर्थात् इसके दाढ़ी-मूँछ और केश भी ज्योतिर्मय ही हैं । तात्पर्य यह है कि यह नख-पर्यन्त अर्थात् नखाग्रसे लेकर सारा-का-सारा सुवर्णके समान प्रकाशस्वरूप ही है ॥ ६ ॥ |
तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥
उसके दोनों नेत्र बन्दरके बैठनेके स्थान (गुदा) के सदृश अरुण वर्णवाले पुण्डरीक (कमल) के समान हैं । उसका 'उत' ऐसा नाम है, क्योंकि वह सम्पूर्ण पापोंसे ऊपर गया हुआ है ! जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही सम्पूर्ण पापोंसे ऊपर उठ जाता है ॥ ७ ॥
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तस्यैवं सर्वतः सुवर्णवर्णस्याप्य- | इस प्रकार · सब ओरसे सुवर्ण- |
| वर्ण होनेपर भी उसके नेत्रोंमें एक | |
| क्ष्णोर्विशेषः । कथम् ? तस्य | विशेषता है । किस प्रकार ? उस |
| देवके, जैसा कि कप्यास होता है | |
| यथा कपेर्मर्कटस्यासः कप्यासः, | उसके सदृश लाल पुण्डरीक (कमल)के |
| समान अत्यन्त तेजस्वी नेत्र हैं। कपि- | |
| आसेरुपवेशनार्थस्य करणे घञ्, | मर्कट (बंदर) के आसका नाम |
| कप्यास है; उपवेशन (बैठने) अर्थके | |
| कपिपुष्ठान्तो येनोपविशति । | वाचक 'आस्' धातुसे करणमें 'घञ्' |
| प्रत्यय होनेपर 'आस' शब्द सिद्ध | |
| कप्यास इव पुण्डरीकमत्यन्त- | होता है । अतः 'कप्यास' का अर्थ |
| वानरकी पीठका अन्तिम भाग (गुदा) | |
| तेजस्वि, एवमस्य देवस्या- | है, जिससे कि वह बैठता है । |
| [यहाँ 'पुण्डरीक' को 'कप्यास' से | |
| क्षिणी । उपमितोपमानत्वान्न | उपमित किया गया है और नेत्रोंको |
| पुण्डरीककी उपमा दी गयी है; इस | |
| हीनोपमा । | प्रकार] उपमितोपमान होनेके कारण |
| यह हीनोपमा नहीं है । | |
| तस्यैवं गुणविशिष्टस्य गौण- | ऐसे गुणवाले उस आदित्यान्तर्गत |
| मिदं नामोदिति। कथं गौणत्वम् ? | पुरुषका 'उत' यह गौण नाम है । |
| इसकी गौणता किस-प्रकार है ? | |
| स एष देवः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः | वह यह देव सम्पूर्ण पापोंसे अर्थात् |
| पाप्मना सह तत्कार्येभ्य इत्यर्थः। | पापोंसहित उनके कार्योंसे उदित |
| अर्थात् ऊपर गया हुआ है, इसलिये | |
| 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि | वह 'उत' नामवाला है । जैसा कि |
| वक्ष्यति । उदित उद् इत उद्गत | 'जो आत्मा पापसे हटा हुआ है' |
| इत्यादिरूपसे श्रुति आगे कहेगी । | |
| इत्यर्थः, अतोऽसावुन्नामा । | ऐसे गुणसे युक्त उस 'उत' नामवाले |
| तमेवंगुणसंपन्नमुन्नामानं यथोक्तेन | पुरुषको जो पूर्वोक्त प्रकारसे जानता |
| प्रकारेण यो वेद सोऽप्येवमेवो- | है वह भी इसी प्रकार सम्पूर्ण |
९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
| देत्युद्गच्छति सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः। हं वा इत्यवधारणार्थौ निपातौ उदेत्येवेत्यर्थः ॥ ७ ॥ | पापोंसे ऊपर उठ जाता है। 'ह' और 'वै' ये निश्चयार्थक निपात हैं—अर्थात् ऊपर उठ ही जाता है ॥ ७ ॥ |
—: ० :—
| तस्योद्गीथत्वं देवस्यादित्या-<br>दीनामिव विवक्षितत्वादाह— | आदित्यादिके समान उस [ उद्-<br>संज्ञक ] देवका उद्गीथत्व कहना<br>इष्ट होनेके कारण श्रुति कहती है— |
तस्यर्क् साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात्त्वे-<br>वोद्गातैतस्य हि गाता । स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो<br>लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥
उस देवके ऋक् और साम—ये दोनों पक्ष हैं। इसीसे वह देव उद्गीथरूप है, और इसीसे [ इसका गान करनेवाला ] उद्गाता कहलाता है, क्योंकि वह इस (उत्) का ही गान करनेवाला होता है। वह यह उत् नामक देव जो इस ( आदित्यलोक ) से ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंकी कामनाएँ हैं, उनका शासन करता है। यह अधिदैवत उद्गीथोपासना है ॥ ८ ॥
| तस्यर्क् साम च गेष्णौ<br><br>पृथिव्याद्युक्तलक्षणे पर्वणी ।<br><br>सर्वात्मा हि देवः। परापरलोक<br><br>कामेशितृत्वादुपपद्यते पृथिव्य-<br><br>ग्न्यादृक्सामगेष्णत्वम्, सर्वयो-<br><br>नित्वाच्च । | उस देवके ऋक् और साम गेष्ण हैं अर्थात् पूर्वोक्त पृथिवी और अग्नि आदि उसके दोनों पक्ष हैं, क्योंकि वह देव सर्वरूप है। वह परलोक और इहलोकसम्बन्धी कामनाओंका शासन करनेवाला है; अतः उसका पृथिवी और अग्नि आदिरूप ऋक् और साममय पंखोंसे युक्त होना उचित ही है। तथा सबका कारण होनेसे भी [ उसका ऋक्-सामरूप पक्षोंवाला होना उचित है ] । |
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यत एवमुन्नामा चासावृक्सामगेष्णश्च तस्मादृक्सामगेष्णत्वप्राप्तमुद्गीथत्वमुच्यते परोक्षेण परोक्षप्रियत्वाद्देवस्य, तस्मादुद्गीथ इति। तस्मात्त्वेव हेतोरुदं गायतीत्युद्गाता। तस्माद्ध्येतस्य यथोक्तस्योन्नाम्नो गातासावतो युक्तोद्गातेति.नामप्रसिद्धिरुद्गातुः। | इस प्रकार क्योंकि वह 'उत्' नामवाला है तथा ऋक् और साम उसके पक्ष हैं, इसलिये ऋक्-साम-रूप पक्षोंवाला होनेसे उसमें प्राप्त उद्गीथत्वका परोक्षरूपसे प्रतिपादन हो जाता है; क्योंकि वह देव परोक्ष प्रिय* है। इसलिये वह उद्गीथ है ऐसा कहा। इसी हेतुसे, क्योंकि [यज्ञमें उद्गान करनेवाला] उत्का गान करता है इसलिये वह उद्गाता कहलाता है। इस प्रकार क्योंकि वह उपर्युक्त 'उत्' नामक देवका गान करता है इसलिये उद्गाताका 'उद्गाता' ऐसा नाम प्रसिद्ध होना उचित ही है। |
| स एष देव उन्नामा ये चामुष्मादादित्यात्पराञ्चः परागञ्चनादूर्ध्वा लोकास्तेषां लोकानां चेष्टे न केवलमीशितृत्वमेव चशब्दाद्धारयति च, “स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्” (यजु० २५। १०) इत्यादिमन्त्रवर्णात्। किं च देवकामानामीष्ट इत्येतदधिदैवतं देवताविषयं देवस्योद्गीथस्य स्वरूपमुक्तम् ॥ ८ ॥ | वही यह उत् नामक देव इस आदित्यलोकसे परे जानेके कारण जो पराङ् यानी ऊपरके लोक हैं उन लोकोंका ईश्वर (शासक) है। वह केवल शासनकर्ता ही नहीं है 'च' शब्दसे यह भी सिद्ध होता है कि वह उनका धारण भी करता है; जैसा कि “उसने इस पृथ्वीको और द्युलोक-को धारण किया” इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। यही नहीं, वह देवताओंकी कामनाओंका भी शासक है-इस प्रकार यह उस देवका--उद्गीथका अधिदैवत--देवताविषयक स्वरूप कहा गया ॥ ८ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
* देवताओंकी परोक्षप्रियता 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः' इस श्रुतिसे प्रमाणित होती है।