चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३१
पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३१
जराव्याधिप्रशमनं देहदाढर्यकरं परम् ।
मेधास्मृतिकरं बल्यं क्षीराशो तत्प्रयोजयेत् ॥ ५३ ॥
पूर्वोक्त विधि से लौह आदि धातुओं के बनाये चूर्ण के साथ शिलाजीत
मिलाकर दूध के साथ पीने से आरोग्ययुक्त दीर्घ आयु मिलती है । लोह आदि
जितने धातु आवश्यक हों उन सबों को मिलाकर या पृथक् २ रूप में शिलाजीत१
के साथ उपयोग करे । [ धातुओं की भस्म त्रिफला क्वाथ के साथ बनाने का
अष्टाङ्ग-सङ्ग्रह में उपदेश है ।। परन्तु रस शास्त्र के आधार से बनी भस्में अधिक
उपयोगी होंगी यह हमारी मान्यता है । ] शिलाजीत के प्रयोग के समय दूध का
ही सेवन करना चाहिये । इसके सेवन से बुढ़ापा और रोग मिटते हैं, शरीर
अतिशय दृढ़ होता है । मेधा और स्मृति बढ़ता है, बल भी बढ़ता है ॥५२-५३॥
प्रयोगः सप्त सप्ताहाद्य्रहश्चैकश्च सप्तकः ।
निर्दिष्टस्त्रिविधस्तस्य परो मध्योऽवरस्तथा ॥ ५४ ॥
पलमर्धपलं कर्षो मात्रा तस्य त्रिधा मता ।
शिलाजीत का प्रयोग तीन प्रकार का है । यथा—पर, मध्य और अवर ।
इनमें सात सप्ताह तक प्रयोग करना ‘पर’ प्रयोग, तीन सप्ताह तक प्रयोग करना
‘मध्यम’, और एक सप्ताह तक प्रयोग करना अवर प्रयोग है । इसी प्रकार
शिलाजतु की मात्रा भी तीन प्रकार की है । जैसे—उत्तम मात्रा एक पल,
मध्यम मात्रा आधा पल और अवर मात्रा एक कर्ष है । आजकल तो २ से ५
रत्ती की मात्रा उचित रहेगा ॥५४॥
जातेर्विशेषं सविधं तस्य वक्ष्याम्यतः परम् ॥ ५५ ॥
हेमाद्याः सूर्यसन्तप्ताः स्रवन्ति गिरिधातवः ।
जत्वाभं मृदु मृत्स्नाच्छं यन्मलं तच्छिलाजतु ॥ ५६ ॥
इसके आगे हम इस शिलाजतु का भिन्न २ जातिया कहते हैं—
ग्रीष्म काल में स्वर्ण आदि धातुओं वाली शिलाओं में से सूर्य की गरमी से
एक प्रकार का रस जो कि स्पर्श में लाख के समान होता है, (रंग में नहीं),
चूने लग जाता है, इसी काले से रंग को ‘शिलाजतु’ (शिलाजीत) कहते हैं ।
इसका रंग मिट्टी के समान होता है ॥५५-५६॥
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१ जैसा ‘संग्रह’ में कहा है—संस्कृत संस्कृत देहे प्रयुक्तं गिरिजाह्वयम् ।
युक्तं व्यस्तैः समस्तैर्वा ताम्रायोरूप्यहेमभिः ।
क्षारेणालोडितं शीघ्रं फलं कुर्याद् रसायनम् ॥
२३२ चरकसंहिता [ अ० १
मधुरश्च सतिक्तश्च जपापुष्पनिभश्च यः ।
कटुर्विपाके शीतश्च स सुवर्णस्य निस्स्रवः ॥ ५७ ॥
रूप्यस्य कटुकः श्वेतः शीतः स्वादु विपच्यते ।
ताम्रस्य बर्हिकण्ठाभस्तिक्तोष्णः पच्यते कटु ॥ ५८ ॥
यस्तु गुग्गुलुकाभासस्तिक्तको लवणान्वितः ।
कटुर्विपाके शीतश्च सर्वश्रेष्ठः स चायसः ॥ ५९ ॥
गोमूत्रगन्धयः सर्वे सर्वकर्मसु यौगिकाः ।
रसायनप्रयोगेषु पश्चिमस्तु विशिष्यते ॥ ६० ॥
इनमें से स्वर्ण-शिलाजीत—तिक्तरसयुक्त मधुर, जपा ( जासुदी ) फूल के
समान लाल, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है ।
रौप्य ( चांदी की शिला से निकला ) शिलाजीत—कटु रस, रंग में श्वेत,
शीतवीर्य, विपाक में मधुर होता है ।
ताम्र ( ताँबे से निःसृत ) शिलाजीत—मोर की ग्रीवा के समान नीली
झाँई लिये, तिक्त रस, उष्णवीर्य और विपाक में कटु होता है ।
आयस ( लोह से निस्सृत ) शिलाजीत—गुग्गुल के समान काला, भूरा,
तिक्त रस, लवण अनुरस, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है । यह शिलाजतु
सब में श्रेष्ठ है ।
[ कहीं कहीं पर छः प्रकार के शिलाजतुओं का वर्णन है । वहाँ पर त्रपु
और सीसक भी गिना है । ]
इन सब शिलाजतु में गोमूत्र की गन्ध आती है, ये सब कार्यों में प्रयुक्त होते
हैं । परन्तु रसायन कार्य में अन्तिम, आयस शिलाजीत ही अधिक श्रेष्ठ है ॥५७-६०॥
यथाक्रमं वातपित्ते श्लेष्मपित्ते कफे त्रिषु ।
विशेषतः प्रशस्यन्ते मला हेमादिधातुजाः ॥ ६१ ॥
खास कर वात पित्त रोग में स्वर्ण शिलाजतु का, कफ-पित्त में रजत शिला-
जतु का, कफ में ताम्र शिलाजतु का और वात-पित्त-कफ में आयस शिलाजतु
का प्रयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥
शिलाजतुप्रयोगेषु विदाहीनि गुरूणि च ।
वर्जयेत्सर्वकालं तु कुलत्थान् १ परिवर्जयेत् ॥ ६२ ॥
ते ह्यत्यन्तविरुद्धत्वादश्मनो भेदनाः परम् ।
लोके दृष्टास्ततस्तेषां प्रयोगः प्रतिषिध्यते ॥ ६३ ॥
१ 'कुनत्थान्' इति च पाठः ।
पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३३
पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३३
शिलाजीत के प्रयोग के समय विदाही और गुरु पदार्थों का तथा कुलत्थी
का एक साल तक ( अथवा जब तक शिलाजतु के गुण शरीर में हों तब तक )
सेवन नहीं करना चाहिये । क्योकि लोक में हम यह स्पष्ट देखते हैं कि पत्थरों
से अत्यन्त विरोध रखने के कारण कुलत्थ पत्थरों तक को फोड़ कर निकलते
हैं। बंजर भूमि में, रोहाड़ों में ही कुलत्थी होती है। [ व्यायाम, धूप, वायु,
ताप, काकमाची और कपोता ये भी वर्जनीय हैं और वर्षा का, कुएं का या
झरने का जल पथ्य है। अष्टागसंग्रह ] ॥ ६२-६३ ॥
पयांसि शुक्तानि¹ रसाः सयूषा-
स्तोयं समूत्रं विविधाः कषायाः ।
आलोडनार्थं गिरिजस्य शस्ता-
स्ते ते प्रयोज्याः प्रसमीक्ष्य कार्यम् ॥ ६४ ॥
शिलाजतु के आलोडन द्रव्य - दूध शुक्त, (सिरका), मास रस, यूष,
जल, गोमूत्र आदि मूत्र, नाना प्रकार के क्वाथ, दोष आदि की विवेचना करके,
शिलाजतु के आलोडन में इनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ६४ ॥
न सोऽस्ति रोगो भुवि साध्यरूपः
शिलाह्वयं य न जयेत् प्रसह्य ।
तत्कालयौगैविधिभिः प्रयुक्त
स्वस्थस्य चोर्जां विपुलां ददाति ॥ ६५ ॥
इति शिलाजतुरसायनम् ।
इस पृथ्वी पर ऐसा कोई भी साध्य रोग नहीं है जिसको शिलाजतु उन
उन अवस्थाओं के योग्य यागों के साथ विधिपूर्वक प्रयुक्त होने से बलपूर्वक नष्ट
नहीं कर देता । वह स्वस्थ पुरुषों को भी पर्याप्त बल देता है ॥ ६५ ॥
तत्र श्लोकः - करप्रचितिके पादे दश षट् च महर्षिणा ।
रसायनानां सिद्धानां संयोगाः समुदाहृताः ॥ ६६ ॥
इस करप्रचितीय रसायन पाद में महर्षि ने सोलह सिद्ध रसायनों के प्रयोग
कहे हैं ॥ ६६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
करप्रचितीयो नाम रसायनपादस्तृतीयः ।
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१ 'तक्राणि' इति च पाठः ।
२३४ | चरकसंहिता | [ अ० १ ( चतुर्थः पादः ) अथात आयुर्वेदसमुत्थानीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब हम 'आयुर्वेद समुत्थानीय रसायन पाद' की व्याख्या करते हैं, भग- वान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ ऋषयः खलु कदाचिच्छालीना यायावराश्च ग्राम्यौषध्याहाराः सन्तः सांपन्निका मन्दचेष्टाश्च नातिकल्याणाः प्रायेण बभूवुः । ते सर्वासामि- तिकर्तव्यतानामसमर्थाः सन्तो ग्राम्यवासकृतमात्मदोषं मत्वा पूर्वनि- वास-समपगत-ग्राम्य-दोषं मत्वा शिव पुण्यमुदारं मेध्यमगम्यमसुकृतिभि- र्गङ्गाप्रभवममर-गन्धर्व यक्ष-किन्नरानु चरितमनेकरत्ननिचयमचिन्त्या- द्भुतप्रभावं ब्रह्मर्षि-सिद्ध-चारणानुचरित दिव्य-तीर्थौषधि प्रभवमतिश- रण्यं हिमवन्तममराधिपाभिगुप्तं जग्मुर्भृग्वङ्गिरोऽत्रि-वशिष्ठ-कश्यपा- गस्त्य-पुलस्त्य-वामदेवासित-गौतम-प्रभृतयो महर्षयः ॥ ३ ॥ पहिले किसी समय में शालीन ( घर बना कर रहनेवाले ) सुसम्पन्न और यायावर ( यज्ञशील ) ऋषि नागरिक जनों के आहार के सेवन करने से ऐश्वर्य- शाली पुरुषों के समान मन्द-क्रियाशील हो गये और प्रायः स्वस्थ न रहने लगे । उस समय वसिष्ठ, भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, कश्यप, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव, असित, गौतम आदि महर्षि तपश्चर्या आदि कर्मों में असमर्थ हो गये। तब उनको पता चला कि ग्राम्य ( नगर ) निवास के कारण ही यह दोष उत्पन्न हुआ है। इसलिये वे अपने पुराने स्थान हिमालय में चले गये। यह हिमालय का स्थान ग्राम्य-सम्बन्धी दोषों से रहित, कल्याणकारी, पवित्र, उदार, पुण्य, पापियों से अगम्य, गङ्गा का उत्पत्तिस्थान, अमर ( देव ) गन्धव, यक्ष, किन्नर और चरणों से सेवित, अनेक रत्नों का खज़ाना, अचिन्त्य और आश्चर्यमय प्रभाव से युक्त, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, चारणों की संचार भूमि, दिव्य-तीर्थ और दिव्य औषधियों का उत्पत्ति स्थान, अतिशरण्य देवराज इन्द्र से सुरक्षित था ॥ ३ ॥ तानिन्र्दः सहस्रदृगम रगुरूवरोऽब्रवीत्—स्वागतं, ब्रह्मविदां ज्ञानत- पोधनानां ब्रह्मर्षीणामस्ति मनोग्लानिरप्रभावत्व वैस्वर्यं वैवर्ण्यं च ग्राम्य- वासकृतमसुखमसुखानुबन्धं च। ग्राम्यो हि वासो मूलमशस्तानाम् । तत्कृतः पुण्यकृद्भिरनुग्रहः प्रजानां स्वशरीरमरक्षिभिः । कालश्चायमायु- र्वेदोपदेशस्य । ब्रह्मर्षीणामात्मनः प्रजानां चानुग्रहार्थमायुर्वेदमश्विनौ मह्यं प्रायच्छतां, प्रजापतिरश्विभ्यां च, प्रजापतये ब्रह्मा, प्रजानामल्प-
पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २३५
पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २३५ मायुर्जरा-व्याधि-बहुलमसुखमसुखानुबन्धमल्पत्वादल्प-तपो-दम-नियम- दानाध्ययन-संचयं मत्वा पुण्यतममायुःप्रकर्षकरं जरा-व्याधि-प्रशमन- मूर्जस्करममृतं शिवं शरण्यमुदात्तं मत्तः श्रोतुमर्हथोपधारयितुं प्रकाश- यितुं च प्रजानुग्रहार्थमार्षं ब्रह्मचर्यं प्रति मैत्रीं कारुण्यमात्मनश्चानु- त्तमं पुण्यमुदारं ब्राह्ममक्षयं कर्मेति ॥ ४॥ इन महर्षियों को सहस्र-चक्षु, श्रेष्ठ, देवगुरु इन्द्र ने कहा-आपका स्वागत हो । ब्रह्मज्ञानी ज्ञान और तप के धनी आप ब्रह्मर्षियों में मन की बेचैनी, प्रभाव, कान्ति का न होना, स्वरविकार, विवर्णता, नागरिकनिवास से उत्पन्न रोग, इन रोगों से सम्बद्ध अन्य रोग भी दिखाई पड़ते हैं। सब अधर्म, पाप और रोग आदि बुराइयों का मूलकारण नगर निवास ही है। आप पुण्यकर्मा जनों ने अपने शरीर की परवाह न करके भी अन्य प्रजाओं का बड़ा उपकार किया है और आयुर्वेद के उपदेश के लिये यही उत्तम समय है। इस आयुर्वेद को ब्रह्मा ने प्रजापति को, प्रजापति ने दोनों अश्वियों को, दोनों अश्वियों ने ब्रह्म- र्षियों को, अपने और प्रजाजनों के लाभ के लिये मुझे प्रदान किया था। प्रजा- जनों की आयु छोटी है, वह भी बुढ़ापा, रोग, अनारोग्य आदि दुःखों से भरी है। आयु के थोड़ा होने से इनका तप, दम, नियम, दान, अध्ययन आदि का संचय भी थोड़ा होता है। यह जानकर तुम मुझसे पुण्यतम, आयु को लम्बा करने वाले, बुढ़ापे और रोग को मिटाने वाले, ओज को बढ़ाने वाले, अमृत के समान, कल्याणकारी शरण लेने योग्य, उदार आयुर्वेद को सुनो। [ इन्द्र की सभा में सहस्रों ऋषि इन्द्र के सहस्र चक्षु थे । ] सुनकर उसे हृदयगम करके प्रजा की भलाई के लिये आर्ष सत्त्व, ब्रह्म- चर्य के लिये प्राणियों पर मैत्री और करुणाभाव तथा अपने निज श्रेष्ठ पुण्य, उदार, ब्रह्म ( ज्ञान ) सम्बन्धी अक्षय कर्म को प्रकाशित करने के लिये इस आयुर्वेद का श्रवण करो ॥ ४ ॥ तच्छ्रुत्वा विबुधपतिवचनमृषयः सर्व एवामरवरमृग्भिस्तुष्टुवुः प्रहृष्टाश्च तद्वचनमभिननन्दुश्चेति ॥ ॥ देवराज इन्द्र के वचनों को सुन कर सब ऋषियों ने ऋचा से इन्द्र की स्तुति की और पुलकित होकर इन्द्र के वचनों का अभिनन्दन किया ॥ ५ ॥ अथेन्द्रस्तदायुर्वेदामृतमृषिभ्यः संक्राम्योवाचैतत्सर्वमनुष्ठेयम् । अयं च शिवः कालो रसायनानां, दिव्याश्चौषधयो हिमवतः प्रभवाः प्राप्तवीर्याः, तद्यथा-ऐन्द्री ब्राह्मी पयस्या क्षीरपुष्पी श्रावणी महाश्रावणी
२३६ चरकसंहिता [ अ० १ शतावरी विदारी जीवन्ती पुनर्नवा नागबला स्थिरा वचा छत्राऽति- च्छत्रा मेदा महामेदा जीवनीयाश्चान्याः पयसा प्रयुक्ताः षण्मासा- त्परमायुर्वयश्च तरुणमनामयत्वं स्वरवर्णसंपदमुपचयं मेधां स्मृतिमु- त्तमबलमिष्टांश्चापरान् भावानावहन्ति सिद्धाः ॥ ६ ॥ इतीन्द्रोक्तं रसायनम्। इन्द्रोक्त रसायन—इसके पीछे इन्द्र ने ऋषियों को आयुर्वेदमृत का उपदेश किया। इस सम्पूर्ण आयुर्वेद का पालन करना चाहिये। रसायन सेवन करने का. यह पुण्य, कल्याणकारी समय है। इस समय हिमालय में उत्पन्न होने वाली सब दिव्य औषधियां वीर्य से परिपूर्ण हैं। जैसे—ऐन्द्री, ब्राह्मी, पयस्या (क्षीर-विदारी), क्षीरपुष्पी, श्रावणी (गोरखमुण्डी), महाश्रावणी, शतावरी, विदारीकन्द, जीवन्ती, नागबला, स्थिरा (शालपर्णी), वचा, छत्रा, अतिछत्रा, मेदा, महामेदा, जीवनीय गुण की अन्य ओषधियां (काकोली, क्षीर- काकोली, जीवक, ऋषभक, मुलहठी, मुद्गपर्णी, माषपर्णी), इनको दूध के साथ छः मास तक यथाविधि प्रयोग करने पर दीर्घ आयु, तरुण वय, नीरोगता, स्वर और वर्ण की शुद्धता, वृद्धि, मेधा, स्मृति, उत्तम बल तथा अभिलषित बातों की प्राप्ति होती है* ॥ ६ ॥ ब्रह्मसुवर्चलानामौषधिर्या हिरण्यक्षीरा पुष्कर-सदृश-पत्रा, आदि- त्यपर्णी नामौषधिर्या सूर्यकान्तेति विज्ञायते सुवर्ण-वर्ण क्षीरा सूर्यमण्ड- लाकारपुष्पा च, नारी नामौषधिरश्वबलेति विज्ञायते या बल्वजसदृश- पत्रा, काष्ठगोधा नामौषधिर्गोधाकारा, सर्पा नामौषधिः सर्पाकारा,
- कविराज श्री गंगाधर सेन ने 'ऐन्द्री' का अर्थ इन्द्रायण किया है। छत्रा और अतिछत्रा का अर्थ डल्हण ने 'द्रोणपुष्पी द्वय' किया है। वैसे सोया और सौंफ भी होता है। श्रावणी—अरत्निमात्रस्तृपका पत्रैर्द्वयंगुलसम्मितैः । पुष्पैर्नीलोत्पलाकारैः फलैश्चाञ्जनसन्निमैः ॥ श्रावणी महती ज्ञेया कनकाभा पयस्विनी। श्रावणी पाण्डुराभासा महाभावानिलक्षणा ॥ श्रावणी का एक हाथ भर का पौधा और दो दो अंगुल के पत्ते होते हैं। नील कमल के से आकार के फूल और अञ्जन के समान काले फल होते हैं। महाश्रावणी स्वर्ग के समान पीले रंग के रस की होती है और श्रावणी का रस श्वेत होता है।
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २३७
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २३७ सोमो नामौषधिराजः पञ्चदशपर्णः स सोम इव हीयते वर्धते च, पद्मा नामौषधिः पद्माकारा, पद्मरक्ता, पद्मगन्धा च, अजा नामौषधिस्तु नीलक्षीरा, नीलपुष्पा लताप्रतानबहुला, इत्यासामष्टानामोषधीनां यां यामेवोपलभेत तस्यास्तस्याः स्वरसस्य सौहित्यं गत्वा स्नेहभावितायामा- र्द्रपलाश-द्रोण्यां सपिधानायां दिग्वासाः शयीत, तत्र प्रलीयते षण्मासेन पुनः पुनः संभवति, तस्याजं पयः प्रत्यवस्थापनं, षण्मासेन देवतानुकारी भवति वयो-वर्ण स्वराकृति-बल-प्रभाभिः, स्वयं चास्य सर्ववाचोगतानि प्रादुर्भवन्ति, दिव्यं चास्य चक्षुः श्रोत्रं भवति, गतिर्योजनसहस्रं, दश- वर्षसहस्राण्यायुरनुपद्रवं चेति ॥ ७ ॥ इति द्रोणीप्रावेशिकरसायनम् । द्रोणीप्रावेशिक रसायन—ब्रह्मसुवर्चला नाम की जो ओषधि है, उसका दूध स्वर्ण के समान पीला, पत्ते पुष्कर (कमल) के समान होते हैं। आदित्यपर्णी नाम की जो ओषधि सूर्यकान्ता के नाम से प्रसिद्ध है, इसका दूध (रस) पीला होता है और इसका पुष्प सूर्य मण्डल के समान होता है। नारी नाम की ओषधि अश्वबला के नाम से जानी जाती है इसके पत्ते बल्वज (तृण विशेष) के समान होते हैं। काष्ठगोधा नामक ओषधि का आकार गोधा (गोह) के समान होता है। सर्पा नाम की ओषधि सर्प के समान आकार की है। सोम नामक ओषधि सब ओषधियों का राजा (श्रेष्ठ) है। इसके पन्द्रह पत्ते होते हैं। यह ओषधि चन्द्रमा के साथ साथ शुक्ल पक्ष में बढ़ती है और कृष्ण पक्ष में उसी के साथ साथ ह्रास हो जाती है। पद्मा नाम की ओषधि कमल के आकार की रक्त कमल के समान लाल वर्ण और कमल के समान गन्ध वाली है। अजा नाम की ओषधि को 'अजश्रृंगी' कहते है। नीला नाम की ओषधि का दूध नीला, फूल भी नीले तथा इसका फैलाव बहुत होता है १ । १ सुश्रुत में इन दिव्य ओषधियों का कुछ वर्णन आया है जैसे— कनकाभा जलान्तेषु सर्वतः परि सर्पति । सक्षीरा पद्मिनी प्रख्या देवी ब्रह्मसुवर्चला ॥ मूलिनी पञ्चभिः पत्रैः सरक्ताशुककोमलैः । आदित्यपर्णी विज्ञेया सदादित्यानुवर्त्तिनी ॥ कान्तैर्द्वादशभिः पत्रैः मयूरागुरूहोपमैः । कन्दजा काञ्चनक्षीरा कन्या नाम महौषधिः ॥ काश्मीरेषु सरो दिव्य नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ।
२३८ चरकसंहिता [ अ० १
इन आठ (नवीं सोम ) ओषधियों में जो जो भी ओषधि मिल सके उसका
स्वरस पेट भर कर पीना चाहिये । फिर घी, तैल आदि स्नेह से भावित, ताजे
(गीले) ढाक की लकड़ी से बनी, ढक्कन से युक्त द्रोणी (नांद) में नंगा
होकर लेट जाना चाहिये । वहा पर वह छः मास तक अचेत रहता है। [छः
मास के पीछे अ.हार सेवन से सज्ञा-लाभ होता है ]। इस समय बकरी के दूध
से इसे स्वस्थ रखना चाहिये । [छः मास के पीछे वह वय, वर्ण, स्वर,
करेणुस्तत्र कन्या च छत्रातिच्छत्रके तथा ॥
मण्डलैः कपिलैश्चित्रैः सर्पाभा पञ्चपर्णिनी ।
पश्चारत्निप्रमाणा वा विज्ञेयाऽजगरो बुधैः ॥
दृश्यतेऽजगरी नित्य गोनसी चाम्बुदागमे ।
अजास्तनाभकन्दा तु सक्षीरा क्षुपरूपिणी ॥
अजा महौषधिर्ज्ञेया शङ्खकुन्देन्दुपाण्डुरा ।
छत्रातिच्छत्रके विद्याद् रक्षोघ्ने कन्दसम्भवे ॥
जरामृत्यु निवारिण्यौ श्वेतकापोतसंस्थिते ।
सुश्रुत० चि० अ० ३० ।
(१) ब्रह्म सुवर्चला पीले से, स्वर्ण तुल्य रग की, जल के स्थानों के तीर
पर फैला करते हैं । वह दूध वाली पद्मिनी के समान होती है (२) आदित्य
पर्णी—मूलवाली, खूब लाल नाडियों वाले कोमल २ पाच पत्तों वाली, सदा सूर्य
के अनुसार रहती है। (३) कन्या—सुन्दर मोर के पँखों के समान १२ पत्र
होते हैं, मूल में एक छोटा सा गोल कन्द होता है दूध सोने के समान पीला होता
है । काश्मीर में क्षुद्रक मानस ( छोटा मानसरोवर ) नामक एक दिव्य बड़ा
तालाव है। वहा करेणु, कन्या, छत्रा अति छत्रा नाम की ओषधिया उत्पन्न
होती हैं। (४) अजगरी—पीले चितकबरे, गोल २ चकत्तों मे चित्रित, उसका
रूप साप के सामान होता है, उसके पाच पत्ते होते हैं, उसकी लम्बाई भी पाच
बालिश्त होती है, वर्षा काल में वह दीखती है। (५) गोनसी—इसी प्रकार
गोनसी नाम की ओषधि भी वर्षा काल में ही दीखती है। (६) अजा—अजा
ओषधि शख या कुन्द के पुष्प के समान श्वेत रंग की है, उसका छोटा सा
पौधा होता है, जड़ में बकरी के स्तन के समान कन्द होता है। (७-८)
छत्रा और अतिछत्रा ये दोनों कन्द से उत्पन्न होती हैं श्वेत कबूतर के समान
दिखाई देती हैं, वे दोनों दुष्ट आत्माओं के बुरे प्रभाव को नाश करने वाली,
बुढ़ापा और मौत को दूर करती हैं ।
पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २३६ आकृति, जरु और प्रभा में देवताओं की तुलना करने लगता है ] सब विद्यायें, भाषायें स्वयं ही उपस्थित हो जातो हैं ( वह उनको जान जाता है )। कान और आंखें दिव्य हो जाती हैं, एक हजार योजन तक बिना थके चल सकता है, बिना रोग आदि उपद्रवों के एक हजार वर्ष की आयु भोगता है । * [ दूध देने के लिये ढक्कन में मुख की सीध में छेद बना कर नाली द्वारा दूध देना चाहिये । जिससे वह लेटा लेटा दूध पी सके । श्वास के लिये अन्य छिद्र रखने चाहियें ] ॥ ७ ॥ भवन्ति चात्र—दिव्यानामौषधीनां यः प्रभावः स भवद्विधैः । शक्यः सोढुमशक्यस्तु स्यात् सोढुमकृतात्मभिः ॥ ८ ॥ ओषधीनां प्रभावेण तिष्ठतां स्वे च कर्मणि । भवतां निखिल श्रेयः सर्वमेवोपपत्स्यते ॥ ६ ॥ वानप्रस्थैर्गृहस्थैश्च प्रयत्नैर्नियतात्मभिः । शक्या ओषधयो ह्येताः सेवितु विषयाम्भिजाः ॥ १० ॥ तासु क्षेत्रगुणैस्तेषां मध्यमेन च कर्मणा । मृदुवीर्यतया तासां विधिज्ञेयः स एव तु ॥ ११ ॥ पर्यैष्टुं ताः प्रयोक्तुं वा येऽसमर्थाः सुखार्थिनः । रसायनविधिस्तेषामयमन्यः प्रशस्यते ॥ १२ ॥ दिव्य औषधियों का जो प्रभाव है, उसको आप जैसे ही सहन कर सकते हैं । पापी पुरुषों के लिये उनका सहन करना असम्भव है। अपने मार्ग में ( शम, तप आदि साधन करते हुए ) स्थिर रहते हुए औषधियों के प्रभाव से आप लोगों को सम्पूर्ण श्रेय प्राप्त हो जायेगा। वानप्रस्थी, गृहस्थी तथा जो प्रयत्नशील और संयमी पुरुष हैं, वे भी अपने योग्य पुण्य देश में उत्पन्न औष- धियों का सेवन कर सकते है। दिव्य औषधियां अपुण्य देश में उत्पन्न होती ही नहीं, यदि कदाचित् हो जायें तो निर्वीर्य हो जाती हैं। इन साधारण देशों में उत्पन्न दिव्य औषधियों का वीर्य हिमालय की औषधियों से मृदु ( हीन ) रहता है। इसका कारण क्षेत्र ( जहाँ पर ये उत्पन्न होती हैं ), गुण और कर्म ( जरा, व्याधि-नाश रूप ) का मध्यम होना है। इनके प्रयोग की विधि वही है, जो कि हिमालय में उत्पन्न औषधियों की है। सुख, आरोग्य को चाहने वाले जो व्यक्ति इन दिव्य औषधियों को ढूंढने या प्रयोग करने की मेहनत नहीं कर सकते उनके लिये दूसरी रसायन विधि हितकर है ॥ ८-१२ ॥
- प्रलीयते का अर्थ अदृश्य होना भी कहते हैं ।
२४० चरकसंहिता [ अ० १
बल्यानां जीवनीयानां बृहणीयाश्च या दश ।
वयसः स्थापनीनां च खदिरस्यासनस्य च ॥ १३ ॥
खर्जूराणां मधूकानां मुस्तानामुत्पलस्य च ।
मृद्वीकानां विडङ्गानां वचायाश्चित्रकस्य च ॥ १४ ॥
शतावर्याः पयस्यायाः पिप्पल्या जोङ्गकस्य च ।
ऋद्धया नागबलायाश्च हरिद्राया धवस्य च ॥ १५ ॥
त्रिफलाकण्टकार्योश्च विदार्याश्चन्दनस्य च ।
इक्षूणां शरमूलानां श्रीपर्ण्यास्तिनिशस्य च ॥ १६ ॥
रसाः पृथक् पृथग्ग्राह्याः पलाशक्षार एव च ।
एषां पलांन्मितान् भागान् पयो गव्यं चतुर्गुणम् ॥ १७ ॥
द्वे पात्रे तिलतैलस्य द्वे च गव्यस्य सर्पिषः ।
तत्साध्यं सर्वमेकत्र सुसिद्धं स्नेहमुद्धरेत् ॥ १८ ॥
तत्रामलकचूर्णानामाढकं शतभावितम् ।
स्वरसेनेव दातव्यं क्षौद्रस्याभिनवस्य च ॥ १६ ॥
शर्कराचूर्णपात्रं च प्रस्थमेकं प्रदापयेत् ।
तुगाक्षीर्याः सपिप्पल्याः स्थाप्यं संमूर्च्छितं च तत् ॥ २० ॥
सुचौक्षे मृत्तिके कुम्भे मासार्धं घृतभाविते ।
मात्रामग्निसमां तस्य तत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् ॥ २१ ॥
हेमताम्रप्रवालानामयसः स्फटिकस्य च ।
मुक्तावैदूर्य्यशङ्खानां चूर्णानां रजतस्य च ॥ २२ ॥
प्रक्षिप्य षोडशो मात्रां विहायायासमैथुनम् ।
जीर्णे जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा ॥ २३ ॥
सर्वरोगप्रशमनं वृष्यमायुष्यमुत्तमम् ।
सत्त्वस्मृतिशरीराग्निबुद्धीन्द्रियबलप्रदम् ॥ २४ ॥
परमूर्जस्करं चैव वर्णस्वरकरं तथा ।
विषालक्ष्मीप्रशमनं सर्ववाचोगतप्रदम् ॥ २५ ॥
सिद्धार्थतां चाभिनवं वयश्च प्रजाप्रियत्वं च यशश्च लोके ।
प्रयोज्यमिच्छद्भिरिदं यथावद्रसायनं ब्राह्ममुदारवीर्यम् ॥ २६ ॥
इतीन्द्रोक्तरसायनमपरम् ।
इन्द्रोक्त रसायन—सूत्रस्थान में वर्णित बल्य, जीवनीय, बृंहणीय और
वयःस्थापक गण की सब दस औषधियां, खैर, असन, खजूर, महुवा, मोथा,
पा० ४] १६ चिकित्सितस्थानम् २४१
पा० ४] १६ चिकित्सितस्थानम् २४१ नीला कमल, काली द्राक्षा, वायविडंग, चीता, बच, शतावरी, पयस्या (क्षीर- विदारी), पिप्पली, जोङ्गक (अगरू), ऋद्धि, नागबला, द्वारदा (सागोन, हरिद्रा पाठान्तर में हल्दी), यव, त्रिफला, कण्टकारी, विदारी, लाल चन्दन, गन्ने की जड़, सरकण्डे की जड़, श्रीपर्णी (गम्भारी), तिनिश (आबनूस, रथद्रुम), इनका पृथक् पृथक् रस ३२ प्रस्थ, कल्कार्थ पलाश क्षार १ पल, गाय का दूध १२८ प्रस्थ, तिल तैल १६ प्रस्थ, गोघृत १६ प्रस्थ इनका यथा- विधि स्नेहपाक करके छान लेना चाहिये। इन छने स्नेह में आवलों के रस से सौबार भावना दिये आवले का चूर्ण एक आढक मिला देना चाहिये। फिर ताजा शहद दो आढक, शर्कराचूर्ण एक आढक, बसलोचन और पिप्पली प्रत्येक ६४ तोले, मिलाकर आलोड़ित कर देना चाहिये। फिर घी से भावित मिट्टी के पात्र में पन्द्रह दिनों तक रख देना चाहिये। पीछे से स्वर्ण, ताम्र, प्रवाल (मूंगा), लोह, स्फटिक (बिल्लौर), मोती, वैडूर्य (लहसुनिया), शंख और चांदी इनकी भस्मों का एक का १६ वा भाग मिलाना चाहिये। इसके पश्चात् अग्नि बल के अनुसार इसका प्रयोग करना चाहिये। (आमलकादि चूर्णयुक्त घृत की अपेक्षा से एक का १६ वा भाग लेना चाहिये)। इसके सेवन करते समय परिश्रम और मैथुन का त्याग करना चाहिये। मात्रा के जीर्ण होने पर साठी के चावलों को दूध और घी के साथ खाना चाहिये १। यह रसायन सब रोगों को नाश करता है, शुक्रवर्धक, आयुवर्द्धक श्रेष्ठ है। सत्त्व, स्मृति, कायाग्नि, बुद्धि और इन्द्रियों के बल को बढ़ाता है। विष तथा दरिद्रता को दूर करता है। सब वाणियों को उपस्थित कर देता है। कामना सिद्धि, नूतन वय (तारुण्य), जनता में सत्कार, संसार में यश चाहने वाले को इस ब्राह्म तथा उदार-वीर्य रसायन का विधिपूर्वक सेवन करना चाहिये ॥ १३-२६ ॥ समर्थनामरोगाणा धीमता नियतात्मनाम् । कुटीप्रवेशः क्षमिणां परिच्छदवता हितः ॥ २७ ॥ अतोऽन्यथा तु ये तेषा सौर्यमारुतिको विधिः । ताभ्यां श्रेष्ठतरः पूर्वो विधिः स तु सुदुष्करः ॥ २८ ॥ रसायनविविभ्रंशाज्जायेरन् व्याधयो यदि । यथास्वमौषधं तेषां कार्यं मुक्त्वा रसायनम् ॥ २९ ॥ १ षोडशी का अर्थ गंगाधर सन के मत से सम्पूर्ण औषध का एक का १६ वा भाग प्रत्येक भस्म लेना किया है। जयदेव ने षोडशी का अर्थ एक पल किया है। इसमें प्रमाण—‘प्रकुञ्च षोडशी बिल्व पलकं वात्र कीर्त्यते’दिया है।
२४२ चरकसंहिता [ अ० १ जो पुरुष समर्थ ( शक्तिशाली, ऐश्वर्यवान् ) हों, नीरोगी हों, बुद्धिमान हों और जितेन्द्रिय हों, तथा अपने कार्य धंधे में स्वतंत्र हों, क्षमाशील हों और साधनों से सम्पन्न हों उनके लिये कुटी-प्रावेशिकविधि हितकारी है। इन उप- रोक्त गुणों से जो रहित हों उनके लिये सूर्य मारुतिक (वातातपिक) विधि हितकारी है। इन दोनों विधियों में कुटीप्रावेशिक-विधि अधिक श्रेष्ठ और करने में अति दुष्कर है रसायन विधि के मिथ्या आचरण से यदि कोई रोग उत्पन्न हो जाय, तो तुरन्त रसायन का प्रयोग छोड़कर रोगानुसार औषध करनी चाहिये ॥ २७-२६ ॥ सत्यवादिनमक्रोधं निवृत्तं मद्यमैथुनात् । अहिंसकमनायास प्रशान्तं प्रियवादिनम् ॥ ३० ॥ जप शौचपरं १ धीरं दाननित्यं तपस्विनम् । देवगोब्राह्मणाचार्यगुरुवृद्धार्चने रतम् ॥ ३१ ॥ आनृशंस्यपरं नित्यं नित्यं करुणवेदिनम् । समजागरणस्वप्नं नित्यं क्षीरघृताशिनम् ॥ ३२ ॥ देशकालप्रमाणज्ञं युक्तिज्ञमनहंकृतम् । शस्ताचारमसंकीर्णमध्यात्मप्रवणेन्द्रियम् ॥ ३३ ॥ उपासितारं वृद्धानामास्तिकानां जितात्मनाम् । धर्मशास्त्रपरं विद्यान्नरं नित्यरसायनम् ॥ ३४ ॥ गुणैरेतैः समुदितै प्रयुङ्क्ते यो रसायनम् । रसायनगुणान् सर्वान् यथोक्तान् स समश्नुते । इत्याचाररसायनम् । आचार-रसायन—सत्यवादी, क्रोध न करनेवाले मद्य मैथुन से पृथक् , अहिंसक ( मन, वचन, कर्म से ), अनायास [ श्रम न करनेवाले ], शान्त, प्रियवादी, यज्ञ-पवित्रता के पालक, धीर, दानी, तपस्वी, द्वन्द्व को सहनेवाले, देवता, गौ, ब्राह्मण, आचार्य, गुरु, इनकी पूजा में सदा तत्पर, नित्य क्रूरता से परे, सदा प्राणियों पर करुणा भाव रखनेवाले, युक्त मात्रा में सोने और जागने वाले, नित्य दूध और घी को खानेवाले, देश, काल मात्रा को जाननेवाले, युक्ति को समझनेवाले, अहंकार से शून्य, सदाचार युक्त, असंकीर्ण (उदारचेता) आत्मज्ञान की ओर झुके, वृद्ध पुरुषों आस्तिकों तथा जितात्मा पुरुषों के पास बैठने वाले, उनकी सेवा में तत्पर, नित्य धर्मशास्त्र का पाठ करनेवाले तथा १. 'याज्यशौच' इति च पाठः ।
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २४३
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २४३ अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति को सदा रसायनसेवी ही जाने । इन सद् वृत्तों के पालनसे रसायनका सेवन करता है, उसको रसायनके पूर्ण गुण मिलते हैं ॥३० ३५॥ यथा स्थूलमनिर्हृत्यदोषाञ्छारीरमानसान् । रसायनगुणैर्जन्तुर्युज्यते न कदाचन ॥ ३६ ॥ योगा ह्यायुःप्रकर्षार्था जरारोगनिबर्हणाः । मनःशरीरशुद्धानां सिध्यन्ति प्रयतात्मनाम् ॥ ३७ ॥ तदेतन्न भवेद्वाच्यं सर्वमेव हतात्मसु । अरजोभ्यो¹ द्विजातिभ्यः शुश्रूषा येषु नास्ति च ॥ ३८ ॥ ये रसायनसयोगा वृष्ययोगाश्च ये मताः । यच्चौषधं विकाराणा सर्वं तद्वैद्यसंश्रयम् ॥ ३६ ॥ प्राणाचार्यं बुधस्तस्माद्धीमन्तं वेदपारगम् । अश्विनाविव देवेन्द्रः पूजयेदतिशक्तितः ॥ ४० ॥ शारीरिक एव मानसिक दोषों को दूर किये बिना जो व्यक्ति रसायन का सेवन करता है, वह रसायन के मोटे मोटे गुणों को छोड़कर शेष सूक्ष्म गुणों को प्राप्त नहीं करता । आयु को लम्बा करनेवाले तथा बुढ़ापे को दूर करने वाले रसायन के प्रयोग उन्हीं पुरुषों में सफल होते हैं, जो जितेन्द्रिय हैं, जिनके शरीर और मन शुद्ध हैं। जिनका आत्मा सदा पापों मे लिप्त रहता हो उनको रसायन विधि नहीं सुनानी चाहिये । जो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) पीड़ा से हीन, शारीरिक, मानसिक रोग, रज, तम आदि से रहित हों, जो श्रद्धा से रसायन के गुणों को सुनना नहीं चाहते, उनको भी नहीं बताना चाहिये । जो रसायन के योग हैं, और जो वृष्य प्रयोग हैं, तथा जो ज्वरादि रोगों की औषध हैं, ये सब वैद्य के ही अधीन है। इसलिये विद्वान् का कर्तव्य है कि बुद्धिमान वेद (आयुर्वेद) में निष्ठ, प्राणाचार्य (वैद्य) का पूर्ण शक्ति के साथ ऐसे पूजन-सत्कार करे जिस प्रकार कि देवराज इन्द्र ने अश्वियों की पूजा की थी ॥ ३६–४० ॥ अश्विनौ देवभिषजौ यज्ञवाहाविति स्मृतौ । यज्ञस्य² हि शिरश्छिन्नं पुनस्ताभ्या समाहितम् ॥ ४१ ॥
- प्रशीर्णा दशनाः पूष्णो नेत्रे नष्टे भगस्य च । वज्रिणश्च भुजस्तम्भस्ताभ्यामेव चिकित्सितः ॥ ४२ ॥ १. 'अब्जेभ्यो' इति च पाठः । २. 'दक्षस्य' इति च पाठः ।
२४४ चरकसंहिता [ अ० १ चिकित्सितस्तु १शीतांशूर्गृहीतो राजयक्ष्मणा । सोमाभिपतितश्चन्द्रः कृतस्ताभ्यां पुनः सुखी ॥ ४३ ॥ भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः । वीतवर्णस्वरोपेतः कृतस्ताभ्यां पुनर्युवा ॥ ४४ ॥ एतैश्चान्यैश्च बहुभि कर्मभिर्भिषगुत्तमौ । बभूवतुर्भृशं पूज्याविन्द्रादीनां महात्मनाम् ॥ ४५ ॥ ग्रहाः स्तोत्राणि मन्त्राणि तथाऽन्यानि२ हवींषि च । धूमाश्च पशवस्ताभ्यां प्रकल्प्यन्ते द्विजातिभिः ॥ ४६ ॥ प्रातश्च सवने सोमं शक्रोऽश्विभ्या सहाश्नुते । सौत्रामण्यां च भगवानश्विभ्यां सह मोदते ॥ ४७ ॥ इन्द्राग्नी चाश्विनौ चैव स्तूयन्ते प्रायशो द्विज । स्तूयन्ते वेदवाक्येषु न तथाऽन्या हि देवताः ॥ ४८ ॥ अमरैरजरैस्तावद्विबुधैः साधिपैर्ध्रुवैः । पूज्येते प्रयतरेवमश्विनौ भिषजाविति ॥ ४९ ॥ मृत्युव्याधिजरावश्यैर्दुःखप्रायैः सुखार्थिभिः । कि पुनर्भिषजो मर्त्यैः पूज्याः स्युर्नातिशक्तितः ॥ ५० ॥ अश्वियो के कार्य—देवों के चिकित्सक अश्वियों को यज्ञवाहक कहा जाता है । जब तक इनको भाग नहीं मिलता तब तक कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता३ । प्राचीन काल मे दक्ष (यज्ञ) का शिर कट गया था, इन्होने ही फिर से उसको जोड़ा था । पूषा के दात टूट गये थे, भग की आँखें नष्ट हो गई थीं, इन्द्र को भुजस्तम्भ होगया था इन अश्वियों ने ही सब की चिकित्सा की थी । चन्द्रमा को जब यक्ष्मा रोग हो गया था, तब इन्होने ही चिकित्सा की थी । चन्द्रमा का जब सोम (वीर्य) नष्ट हो गया था, तब इन्होने ही इसको स्वस्थ किया था । भृगुवंश में उत्पन्न च्यवन ऋषि अत्यन्त कामी होने से शीघ्र वृद्ध हो गये थे, उनके वर्ण, स्वर नष्ट हो गये थे, इन अश्वियों ने पुनः उनको युवा कर दिया था । इन उपरोक्त कार्यों से तथा अन्य कार्यों के कारण चिकित्सा मे श्रेष्ठ दोनों अश्विगौ इन्द्र आदि महात्माओं के अत्यन्त पूजापात्र हो गये थे । द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) लोग अश्वियों के लिये ग्रह (सोम पान के पात्र), स्तोत्र, मंत्र, अन्य १. 'चिकित्सितः शशी ताभ्या' इति च पाठः । २. 'तथा नाना' इति च पाठः । ३. अश्वियों के यज्ञ-भाग की कथा के लिये महाभारत में च्यवन ऋषि की कथा देखिये ।
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २४५
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २४५ हवि ( आहुतिया, अन्न ) और धूम्रवर्ग के पशुओं की कल्पना किया करते थे १ । इन्द्र प्रातःसवन में ( यज्ञस्थान में ) अश्वियों के साथ सोमपान करते हैं । सौत्रामणि यज्ञ मे भगवान् अश्वियों के साथ प्रसन्न होते हैं । द्विज लोग प्रायः इन्द्र, अग्नि और अश्वियों की स्तुति करते हैं। वेद वाक्यों में अन्य देवताओं की ऐसी स्तुति नहीं की जाती, जैसी कि अश्वियों की है। जरारहित, मृत्युरहित, बुद्धिमान् और स्थिर देवगण भी अपने राजा इन्द्र के साथ बड़े प्रयत्न से चिकित्सक अश्वियों की पूजा करते हैं, तो फिर मृत्यु, रोग तथा बुढ़ापे से निश्चय रूप में पीड़ित होने वाले परन्तु सुख की चाह रखने वाले मनुष्य किस लिये अपनी पूर्ण शक्ति के साथ इनकी पूजा न करें। अवश्य वैद्यों की पूजा मनुष्यो को करनी चाहिये ।; ५० ॥ शीलवान्मतिमान् युक्तो द्विजातिः शास्त्रपारगः । प्राणिभिर्गुरुवत्पूज्यः प्राणाचार्यः स हि स्मृतः ॥ ५१ ॥ विद्यासमाप्तौ भिषजस्तृतीया२ जातिरुच्यते । अश्नुते वैद्यशब्दं हि न वैद्यः पूर्वजन्मना ॥ ५२ ॥ विद्यासमाप्तौ ब्राह्मं वा सत्त्वमार्षमथापि वा । ध्रुवमाविशति ज्ञानात्तस्माद्वैद्यद्विजः३स्मृतः ॥ ५३ ॥ नाभिध्यायेन्न चाक्रोशेदहितं न समाचरेत् । प्राणाचार्यं बुधः कश्चिदिच्छन्नायुरनित्वरम् ॥ ५४ ॥ चिकित्सितस्तु संश्रुत्य यो वाऽसंश्रुत्य मानवः । नोपाकरोति वैद्याय नास्ति तस्येह निष्कृतिः ॥ ५५ ॥ भिषगप्यातुरान् सर्वान् स्वसुतानिव यत्नवान् । आबाधेभ्यो हि संरक्षेदिच्छन् धर्ममनुत्तमम् ॥ ५६ ॥ सुशील, बुद्धिमान्, द्विजाति आयुर्वेद शास्त्र में निष्ठा व्यक्ति को 'प्राणाचार्य' कहते हैं। इस व्यक्ति की पूजा लोगों को गुरु के समान करनी चाहिये । आयु- र्वेद की समाप्ति पर ही चिकित्सक की तीसरी (दूसरी) जाती होती है। पूर्वजन्म से कोई वैद्य नहीं होता, आयुर्वेद का ज्ञान गुरुमुख से पढ़ने पर 'वैद्य' कहाता है, विद्या की समाप्ति पर ही ब्राह्म सत्त्व या आर्ष सत्त्व ( मन ) १ 'मत्राणि' के स्थान पर 'शस्त्राणि' पाठ भी है। 'वषट्कार से युक्त मन्त्र ही 'शस्त्र' कहाते हैं। धूम्र के स्थान पर 'धूम' पाठ करने पर 'धूप' अगरबत्ती आदि का धूम लेना चाहिये। २. 'भिषजो द्वितीया' इति च पाठः । ३. 'वैद्यो द्विजः' इति च पाठः ।
२४६ चरकसंहिता [ अ० १ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
बनता है। ज्ञान के कारण ही ब्रह्मत्व या आर्षत्व आता है। इसलिये वैद्य को त्रिज (द्विज) कहते हैं। उसका यह ती (दू) सरा जन्म होता है जो बुद्धिमान् मनुष्य अपनी दीर्घ आयु चाहे उसको चाहिये कि प्राणाचार्य वैद्य का न तो तिरस्कार करे, न उसकी निन्दा करे और न उसका कुछ बुरा ही करे। जो पुरुष वैद्य द्वारा चिकित्सा कराके धन आदि देने की प्रतिज्ञा करके अथवा न करके भी वैद्य का प्रत्युपकार नही करता, उसकी कहीं भी निष्कृति (कल्याण) नहीं। वैद्य का कर्त्तव्य है कि रोगियों को अपने पुत्र के समान समझे। सर्वो- त्तम धर्म की इच्छा रखते हुए इनको रोगों से बचावे ॥ ५१-५६ ॥ धर्मार्थं नार्थकामार्थमायुर्वेदो महर्षिभिः । प्रकाशितो धर्मपरैरिच्छद्भिः स्थानमक्षरम् ॥ ५७ ॥ नार्थार्थं नापि कामार्थमथ भूतदयां प्रति । वर्तते यश्चिकित्सायां स सर्वमतिवर्तते ॥ ५८ ॥ कुर्वते ये तु वृत्त्यर्थं चिकित्सापण्यविक्रयम् । ते हित्वा काञ्चनं राशिं पाशुराशिमुपासते ॥ ५६ ॥ धर्मपरायण महर्षियों ने अक्षय स्थान (मुक्ति, ब्रह्म-साक्षात्कार) की चाहना से धर्म के लिये आयुर्वेद का प्रकाश किया है। धन की इच्छा से आयुर्वेद का प्रकाश नहीं किया। जो वैद्य केवल प्राणिमात्र के दया भाव से चिकित्सा कार्य में प्रवृत्त होता है, किसी धन की इच्छा (स्वार्थ) से प्रवृत्त नहीं होता, वह सब पुण्य कार्यों को अतिक्रमण कर जाता है। जो व्यक्ति पेट के लिये चिकित्सा को दुकानदारी बनाते हैं, वे लोग स्वर्ण की राशि को छोड़ कर (धर्म को छोड़ कर), धूल की ढेरी बाँधते हैं। (पाप की गठरी सिर पर धरते हैं) ॥ ५६ ॥ दारुणैः कृष्यमाणानां गदैर्वैवस्वतक्षयम् । छित्त्वा वैवस्वतान् पाशाञ्जीवितं च प्रयच्छति ॥ ६० ॥ धर्मार्थसदृशस्तम्य दाता नेहोपलभ्यते । न हि जीवितदानाद्धि दानमन्यद्विशिष्यते ॥ ६१ ॥ परो भूतदया धर्म इति मत्वा चिकित्सया । वर्तते यः स सिद्धार्थः सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ ६२ ॥ कठिन पीड़ा देने वाले, रोगों से पीड़ित यमालय की ओर जाते हुए व्यक्तियों को यम के पास काट कर छुड़ाता है, उनको जीवन देता है, उसके समान धर्म-अर्थ का दाता इस संसार में और कोई नहीं है। क्योंकि जीवन-दान से बढ़कर और कोई दान संसार में नहीं है। प्राणियों पर दया करना उत्कृष्ट
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४७
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४७ धर्म है, ऐसा समझ कर चिकित्सा में जो प्रवृत्त होता है उसकी सब कामनायें पूर्ण होती हैं, उसको अत्यन्त सुख मिलता है ॥ ६०-६२ ॥ तत्र श्लोकः- आयुर्वेदसमुत्थानं दिव्यौषधिविधिः शुभः । अमृतालपान्तरगुणं सिद्धं रत्नरसायनम् ॥ ६३ ॥ सिद्धेभ्यो ब्रह्मचारिभ्यो यदुवाचामरेश्वरः । आयुर्वेदसमुत्थाने तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ ६४ ॥ आयुर्वेद की उत्पत्ति, दिव्य ओषधियों का हितकर विधान, अमृत से थोड़े कम गुण रखने वाले सिद्ध रसायन, जिन को देवराज इन्द्र ने सिद्ध, ब्रह्मचा- रियों को उपदेश किया था, वह सब भगवान् पुनर्वसु ने इस 'आयुर्वेद-समुत्थान' अध्याय में कह दिया ॥ ६३-६४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने आयुर्वेद- समुत्थानीयो नाम रसायनपादश्चतुर्थः ॥ ४ ॥ समाप्तश्चायं प्रथमो रसायनाध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः ( प्रथमः पादः ) [ स्वस्थ पुरुष के ऊर्ज को बढ़ाने के लिये रसायन और वाजीकरण हैं । रसायन के पीछे वाजीकरण औषध प्रयोग करने चाहियें । तभी इनका प्रभाव उत्तम होता है । इसलिये इस अध्याय का अवतरण करते हैं । ] अथातः संप्रयोगशरमूलीयं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब आगे 'संप्रयोग-शरमूलीय' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं, भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ वाजीकरणमन्विच्छेत् पुरुषो नित्यमात्मवान् । तदायत्तौ हि धर्मार्थों प्रीतिश्च यश एव च ॥ ३ ॥ पुत्रस्याऽऽयतनं ह्येतद् गुणाश्चैते सुताश्रयाः । जितेन्द्रिय पुरुष प्रतिदिन वाजीकरण की इच्छा करे । इसके ऊपर ही धर्म, अर्थ, प्रीति और यश आश्रित हैं । यह वाजीकरण पुत्रोत्पत्ति का कारण है और धर्म, अर्थ, प्रीति, यश आदि समस्त गुण पुत्र के ऊपर आश्रित हैं ॥ ३ ॥
२४८ चरकसंहिता [ अ० २ वाजीकरणमग्र्यं च क्षेत्रं स्त्री या प्रहर्षिणी ॥ ४ ॥ इष्टा ह्येकैकशोऽप्यर्थाः परं प्रीतिकराः स्मृताः । किं पुनः स्त्रीशरीरे ये सङ्घातेन व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥ सङ्घातो हीन्द्रियार्थानां स्त्रीषु नान्यत्र विद्यते । स्त्र्याश्रयो हीन्द्रियार्थो यः स प्रीतिजननोऽधिकम् ॥ ६ ॥ स्त्रीषु प्रीतिविशेषेण स्त्रीष्वपत्यं प्रतिष्ठितम् । धर्मार्थौ स्त्रीषु लक्ष्मीश्च स्त्रीषु लोकाः प्रतिष्ठिता ॥ ७ ॥ सुरूपा यौवनस्था या लक्षणैर्या विभूषिता । या वश्या शिक्षिता या च सा स्त्री वृष्यतमा मता ॥ ८ ॥ सब से प्रधान वाजीकरण— सब से श्रेष्ठ वाजीकरण 'क्षेत्र' है, और हर्ष को उत्पन्न करने वाली स्त्री 'क्षेत्र' है । [ स्त्री में बीज का वपन अर्थात् आधान होता है, इसलिये स्त्री को 'क्षेत्र' कहते हैं । ] एक एक भी मनचाहा ग्राह्य विषय रूप, रस, गन्ध आदि अत्यन्त प्रीति को उत्पन्न करता है । परन्तु ये सब रूप आदि विषय सम्मिलित होकर स्त्री के शरीर में उपस्थित होते हैं, तब फिर क्यों न उसमें प्रीति उत्पन्न हो, अवश्य होगी । स्त्रियों में आश्रित इन्द्रियों के विषय ही प्रीति को अधिक उत्पन्न करते हैं, अन्य स्थानों में आश्रित विषय इतनी प्रीति को उत्पन्न नहीं करते । मनुष्य की स्त्रियों में ही विशेषतः प्रीति अर्थात् ( स्नेह की मात्रा अति अधिक रहती है ) । सन्तान स्त्रियों में ही प्रति- ष्ठित है । धर्म, अर्थ और लक्ष्मी भी स्त्रियों में ही प्रतिष्ठित है । स्त्रियों में ही सब लोक प्रतिष्ठित हैं । जो स्त्री रूपवती, युवती, ( काम-शास्त्र में वर्णित ) उत्तम २ लक्षणों से सुभूषित, वश में रहनेवाली, ( कामशास्त्र में वर्णित ६४ कलाओं में ) शिक्षित, निपुण हो, वह स्त्री सबसे उत्तम वाजीकरण है ॥४-८॥ नानाभक्त्या तु लोकस्य दैवयोगाच्च योषिताम् । तं तं प्राप्य विवर्धन्ते नरं रूपादयो गुणाः ॥ ६ ॥ लोगों की भिन्न भिन्न रुचि होने के कारण और दैवयोग से स्त्रियों के रूप आदि गुण उस उस प्रकार की रुचि वाले पुरुष के मिलने से बढ़ते हैं । [स्त्रियों के गुणों के अनुकूल यदि पुरुष मिल जाये तब तो गुण बढ़ते हैं, अन्यथा घट जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं ] ॥ ६ ॥ वयोरूपवचोहावै १ र्या यस्य परमाङ्गना । प्रविशत्याशु हृदयं दैवाद्रा कर्मणोऽपि वा ॥ १० ॥ हृदयोत्सवरूपा या या समानमनोरमा २ । १. 'मृजाहावै' इति च पाठः । २. 'समानमनःशया' इति च पाठः ।
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४६
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४६ समानसत्त्वा या वश्या या यस्य प्रीयते प्रियैः ॥ ११ ॥ या पाशभूता सर्वेषामिन्द्रियाणां परैर्गुणैः । यया वियुक्तो निस्त्रीकमरतिर्मन्यते जगत् ॥ १२ ॥ यस्या ऋते शरीरं ना धत्ते शून्यमिवेन्द्रियैः । शोकोद्वेगारतिभयैर्य्यां दृष्ट्वा नाभिभूयते ॥ १३ ॥ याति यां प्राप्य विस्रम्भं दृष्ट्वा हृष्यत्यतीव याम् । अपूर्वामिव यां याति नित्यं हर्षातिवेगतः ॥ १४ ॥ गत्वा गत्वाऽपि बहुशो या तृप्तिं नैव गच्छति । सा स्त्री वृष्यतमा तस्य नानाभावा हि मानवाः ॥ १५ ॥ जो स्त्री आयु, रूप, वाणी, हाव ( शृंगार आदि चेष्टा ) आदि के द्वारा या दैवयोग से अथवा अन्य कर्मों से मनुष्य के हृदय में उतर जाती है, जो हृदय में आनन्द का सञ्चार करती है, जिसकी कामचेष्टा मनुष्य के समान होती है, जिसका सत्त्व ( चित्त ) पुरुष के समान है, जो पुरुष के वश में रहती है, जो स्त्री पुरुष की प्रिय वस्तुओं से प्रसन्न होती है। जो स्त्री अपने उत्कृष्ट गुणों के कारण पुरुष की समस्त इन्द्रियों के लिये जाल रूप है ( जिसमे पुरुष फसा रहता है ), जिससे छूटकर रति रहित, बेचैन होकर पुरुष समस्त संसारको स्त्री से शून्य मानता है, जिस स्त्री के बिना पुरुष अपने शरीर को इन्द्रियों से रहित मानता है जिसको देखकर शोक, उद्वेग, बेचैनी, भय आदि सब भूल जाता है, जिसको देखते ही शान्ति अनुभव करता है, जिसके दर्शन से अत्यन्त खुशी अनुभव करने लगता है, जिस स्त्री के साथ नित्य प्रति अत्यन्त हर्ष (कामोद्वेग) के कारण नूतन स्त्री के रूप में सम्भोग करता और बार बार मैथुन करने पर भी तृप्त नहीं होता वह स्त्री उस पुरुष के लिये सबसे उत्तम वृष्य ( वाजी- करण रसायन ) है ॥ १०-१५ ॥ अतुल्यगोत्रां वृष्यां च प्रहृष्टां निरुपद्रवाम् । शुद्धस्नातां व्रजेन्नारोमपत्यार्थी निरामयः ॥ १६ ॥ सन्तान की चाह रखनेवाला पुरुष स्वय रोगरहित होकर अपने से भिन्न गोत्रवाली, वृष्यतम, हर्षयुक्त [ प्रसन्न मन ], रोग आदि उपद्रवों से रहित, रजोधर्म के पीछे स्नान कर शुद्ध हुई स्त्री के साथ सहवास करे ॥ १६ ॥ अच्छायश्चैकशाखश्च निष्फलश्च यथा द्रुमः । अनिष्टागन्धश्चैकश्च निरपत्यस्तथा नरः ॥ १७ ॥ चित्रदीपः सरः शुष्कमधातुर्धातुसन्निभः ।
२५० चरकसंहिता [ अ० २ निष्प्रजस्तृणपूलीति ज्ञातव्या पुरुषाकृतिः ॥ १८ ॥ अप्रतिष्ठश्च नग्नश्च शून्यश्चैकेन्द्रियश्च ना। मन्तव्यो निष्क्रियश्चैव यस्यापत्यं न विद्यते ॥ १६ ॥ अपत्यरहित पुरुष—जिस प्रकार अकेला वृक्ष छायारहित, एक शाखावाला, फलरहित तथा अनिष्ट गन्धवाला होता है, उसी प्रकार से पुत्ररहित मनुष्य भी अकेला है। जिस प्रकार चित्र मे बना दीपक हो जैसा सूखा हुआ तालाब हो, जैसे बिना धातु के, धातु के समान चमकने वाला पदार्थ हो, जैसे चाँदी के समान चमकने वाला सीप हो, इसी प्रकार पुत्ररहित मनुष्य है। उसे तिनकों वा घास की पूली से बना पुरुष के आकार का पुतला ही समझना चाहिये । जिस पुरुष के सन्तान नहीं होती उसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं होती । वह नंगा, अकेला (निःसहाय), शून्य, एक ही इन्द्रियवाला और निष्क्रिय होता है ॥ १७-१६॥ बहुमूर्तिर्बहुमुखो बहुव्यूहो बहुक्रियः । बहुचक्षुर्बहुज्ञानो बह्वात्मा च बहुप्रज ॥ २० ॥ मङ्गल्योऽय प्रशस्तोऽयं धन्योऽय वीर्यवानयम् । बहुशाखोऽयमिति च स्तूयते ना बहुप्रजः ॥ २१ ॥ बहुत सन्तानवाला पुरुष—जिस पुरुष के बहुत सन्तान होती है, वह बहुत सी मूर्तियोंवाला, बहुत से मुखोंवाला, बहुत से व्यूह (सघात) वाला, बहुत सी क्रियाओंवाला, बहुत सी आँखोंवाला, बहुत ज्ञानवाला, बहुत से आत्माओंवाला होता है ! बहुत सन्तानवाले पुरुष की लोग स्तुति करते हैं कि वह मंगलमय है, धन्य है, वीर्यवान् है, बहुत शाखाओंवाला है ॥ २०-२१ ॥ प्रीतिर्बल सुख वृत्तिर्विस्तारो विपुल कुलम् । यशो लोकाः सुखोदर्कास्तुष्टिश्चापत्यसश्रिता ॥ २२ ॥ तस्मादपत्यमन्विच्छन् गुणांश्चापत्यसश्रितान् । वाजीकरणनित्यः स्यादिच्छन् कामसुखानि च ॥ २३ ॥ प्रीति, बल, सुख, वृत्ति, विस्तार, कुल का विस्तार, यश, सुख देनेवाले लोक, सन्तोष ये सब गुण सुतों पर आश्रित हैं। इसलिये सन्तान की चाह रखने वाला तथा सन्तान पर आश्रित गुणों की कामना करनेवाला पुरुष सदा बाजी- करण का सेवन करे और काम्य सुखों की भी इच्छा करे ॥ २२-२३ ॥ उपभोगसुखान् सिद्धान् वीर्योपत्यविवधनान् । वाजीकरणसंयोगान् प्रवक्ष्याम्यत उत्तरम् ॥ २४ ॥ इसके आगे उपभोग में सुख देने वाले, वीर्य और अपत्य को बढ़ाने वाले, सिद्ध, वाजीकरण प्रयोगों का उपदेश करूंगा ॥ २४ ॥