हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
१. छत्रपति शिवाजी व सम्भाजी महाराज का बलिदान
[ ३१ ] ६. महाराष्ट्र-मण्डल "आहे तितुकें जतन करावें । पुढें आणिक मेळवावें ॥ महाराष्ट्रराज्यचि करावें । जिकडे तिकडे !!" ॐ --रामदास जिस समय औरङ्गजेब का जीवन, उसकी सारी आशा और इच्छाओं के नष्ट हो जाने के कारण, भार-सा हो रहा था और वह दुःख सागर में गोते खा रहा था, उस समय मरहठों ने अवसर पाकर खान देश, गोंडवान, बरार और यहां तक कि गुजरात आदि दूरस्थ प्रदेशों में युद्ध छेड़ दिया। उन्होंने शाहूजी को मुक्त करा लिया तथा दक्खिन के छः सूबों तथा मैसूर, ट्रावनकोर आदि रियासतों से भी, उन्हें लड़ाई में हराकर 'चौथ' और "सरदेशमुखी" वसूल करने लगे। अन्त में मुग़ल सम्राट् को झक मार कर महाराष्ट्र में मरहठों के स्वतन्त्र राज्य का स्वत्व मानना पड़ा। इससे मरहठों की शक्ति पहिले से अधिक बढ़ गई। इस प्रकार मरहठों को अपने घरों का उचित प्रबन्ध करने अपनी बिखरी हुई शक्तियों को संगठित करने तथा व्यक्तिगत दलबन्दियों के भावों को मिटा कर सर्वसाधारण की इच्छानुसार, अपनी सारी स्वाभाविक और अनिवार्य कमज़ोरियों के होते हुए भी, एक संगठन सूत्र में बांधने का सुअवसर मिल गया, जिसका फल ऐसा उत्तम निकला कि महा- राष्ट्र-मण्डल या कॉन्फिडरेसी-सच्चे अर्थों में "हिन्दू-पद-पादशाही" ब- गई। यह केवल नाममात्र को ही नहीं वरन् वास्तविक रूप में सारे भारतवर्ष पर राज्य करने लगी। जिन व्यक्तिगत त्रुटियों और दुर्बलताओं की ओर मैंने ऊपर संकेत किया है ये वास्तविक ही थीं, क्योंकि ऐसी त्रुटियां सब हिन्दुओं के भीतर अब भी वर्त्तमान हैं। हम आगे चलकर पाठक- ॐ जो कुछ तुम्हारे पास है उसे बचाओ और उसकी वृद्धि के लिए प्रयत्न करो। सब ओर महाराष्ट्र साम्राज्य का प्रसार करो।
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को एक एक करके इनको बताने की चेष्टा करेंगे। सब भ्रमों को दूर करने के लिए यह कह देना ही पर्याप्त होगा कि जितना उनके विषय में हमें ज्ञान है उतना और किसी को न होगा। जब हम उन महान् राष्ट्रीय तथा धार्मिक सिद्धान्तों पर दृष्टि डालते हैं तथा उन का प्रकटी- करण करते हैं जिन्हों ने मरहठा जाति को हिन्दू स्वतन्त्रता के युद्ध को जीतने के लिए प्रयत्नशील बनाया उस समय हम उस तथ्य को भुलाना या कम करके दिखाना नहीं चाहते कि कभी कभी विशेष अवसरों पर व्यक्तिगत द्वेष की आग तथा स्वार्थ और लालच भी उनको अपने जातीय कर्तव्य तथा प्रवृत्ति से विचलित कर देता था। यदि उनमें ये अवगुण न होते तो वे मनुष्यों के स्थान पर देवताओं की जाति बन जाती। यदि हम उनके उस महान् कार्य के उच्च उद्देश्य की ओर ध्यान दें तथा उनके अपूर्व प्रयत्न और आत्मसमर्पण द्वारा प्राप्त सफलता में से उनकी व्यक्तिगत बुराइयों को भी कम करदें तो भी प्रत्येक देशभक्त हिन्दू उनके किये हुए कार्यों की अवश्य ही सराहना करेगा। मरहठा सरदार बालाजी विश्वनाथ अपने राज्य प्रबन्ध को सब प्रकार सुदृढ़ कर के तथा अपनी सैनिक शक्ति को पूर्णतया संगठित कर के इतना शक्तिशाली बन गया कि दिल्ली की शाही राजनीति में भी दखल देने का साहस करने लगा। उस समय उनको किसी भी मुसलमान शत्रु का भय न था, यहां तक कि स्वयं मुग़ल बादशाह भी अपने बागी सैनिकों तथा वज़ीरों से सुरक्षित रहने के लिये मरहठों से प्रार्थना किया करते थे और उनकी सहायता के भिक्षुक बने रहे थे। इस से यह स्पष्ट हो जाता है कि मरहठों के आन्दोलन ने मुसलमानी साम्राज्य को जड़ से उखाड़ कर शक्तिहीन कर दिया था। सन् १७१८ ईस्वी में बालाजी विश्वनाथ तथा दाभाडे ने सैय्यद बन्धुओं का पक्ष लेकर उनके मुसलमानी प्रतिद्वंद्वियों के मुक़ाबले में १०,००० मरहठे सिपाहियों के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान किया
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क्योंकि सैय्यद बन्धुओं ने पहिले से ही सारे दक्खिन पर चौथ व सर- देशमुखी वसूल करने का अधिकार मरहठों को दे दिया था। हिन्दुओं की पचास हज़ार सेना को अपनी राजधानी में प्रवेश करते हुए देख कर दिल्ली के मुसलमानों की क्रोधाग्नि भड़क उठी और वे मरहठे-सरदार को मार डालने के लिये षड्यन्त्र रचने लगे। उन्होंने यह निश्चय किया कि जिस समय बालाजी “स्वराज्य” तथा “चौथ” वसूल करने की सनद बादशाह से लेकर दरबार से निकलें, उसी समय धावा करके उन्हें मार डाला जाये। लेकिन क्या मरहठे जासूस इन बातों से अनभिज्ञ थे ? कदापि नहीं। ज्योंही उपर्युक्त समाचार मरहठों की सेना में पहुंचा त्योंही प्रसिद्ध सेनापति भानू अपने सरदार की रक्षा के लिये अपने प्राण देने के लिये कटिवद्ध हो गया अर्थात् यह निश्चय किया गया कि बादशाह से सनद लेकर बालाजी की पालकी किसी गुप्त राह से सेना में पहुंचाई जाय और भानू जी सजधज से बालाजी की पालकी में बैठ कर मुख्य द्वार से लौटे। अन्त में ऐसा ही किया गया। इधर मुसलमानों का क्रोध भरा झुण्ड बहुत देर से पेशवा की पालकी की ताक में था। पालकी पर नज़र पड़ते ही वह झुण्ड एकाएक मधुमक्खियों की तरह उन पर टूट पड़ा और थोड़े से मरहठा सैनिकों के साथ आते हुए, भानूजी को, उन्हें बालाजी समझ कर, फ़ौरन क़त्ल कर दिया। बाला जी बादशाही सनद को कांख के नीचे दबाये हुए किसी गुप्त राह से सकुशल अपने खेमे में पहुंच गया। भानू जी के इस प्रकार निस्वार्थ आत्मसमर्पण ने अपने जातीय इतिहास की धीरता, गौरव, प्रताप और महत्व को चार चाँद लगा दिये। इस प्रकार के महत्व- पूर्ण उदाहरणों को इस संक्षिप्त पुस्तक में जहां तहां दर्शाने का तात्पर्य यह है कि ऐसे जातीय और धार्मिक गौरव के थोड़े उदाहरण, रूखी समालोचनाओं से भरी दर्जनों मोटी किताबों की अपेक्षा, पाठकों के लिये विशेष लाभदायक होंगे।
[ ३४ ] ७. बाजीराव का कर्मक्षेत्र में पदार्पण दिल्ली से लौटते ही बालाजी विश्वनाथ का सन १७२० ई० में देहान्त होगया और उसका लड़का बाजीराव उनके स्थान पर, महाराष्ट्र मण्डल का नेता बना । उस समय मण्डल के सभापति शाहू जी थे । शिवाजी के पश्चात् बाजीराव का राजनैतिक क्षेत्र में उतरना महाराष्ट्र के इतिहास की एक दृढ़ मोड़ बनाता है। यद्यपि बड़ी बड़ी राजनैतिक समस्यायें अभी भी अधूरी पड़ी थीं तथापि महाराष्ट्र को राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त हो चुकी थी। मरहठे इतने शक्तिशाली और संगठित हो चुके थे कि वे देश और धर्म को हर प्रकार की आपत्ति से सुरक्षित रख सकते थे. और यदि चाहते तो शाही राजनीति में न उलझ कर केवल महा- राष्ट्र मण्डल पर ही सन्तोष करके भली भांति शांतिपूर्वक अकंटक राज- सुख भोग सकते थे। यह भाव कई एक नेताओं के हृदय में उत्पन्न भी हुआ और इसे उन्होंने छत्रपति शाहूजी के मन पर बिठाने का प्रयत्न भी किया, किन्तु वे असफल रहे। अगर उनका यह प्रयत्न सारी जाति पर सफल भी होजाता और वे उन लोगों को महाराष्ट्र सीमा के बाहर हिन्दुओं की स्वतन्त्रता की लड़ाई को रोकने के लिये उभारते भी, तो भी इस बात में शंका थी, कि जो कुछ उन लोगों ने विजय करके अपने अधीन किया था, उसका बहुत दिनों तक शांतिपूर्वक उपभोग कर भी सकते या नहीं। अथवा यदि वे महाराष्ट्र को सब प्रकार से सुरक्षित भी रख सकते और भारत के सभी दूसरे प्रान्तों से नाता तोड़ कर, एकांत स्वतन्त्र जीवन व्यतीत कर भी पाते तो प्रश्न यह उठता है कि क्या उन्हें ऐसा करना चाहिये था ? क्या उन लोगों ने केवल क्षुद्र सांसारिक सुख और शान्ति के लिए ही लगातार तीन पीढ़ियों तक घोर लड़ाई करके खून की नदी बहाई थी ? नहीं, ऐसी बात नहीं है और न ही ऐसा करना उनके लिए श्रेय था। क्या इसे सच्चा सुख कहा जा सकता था ? नहीं, नहीं
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कदापि नहीं। शिवाजी ने जिस हिन्दू-पद-पादशाही की नींव डाली थी, उसका उद्देश्य केवल महाराष्ट्र-मात्र के लिये ही न था, बल्कि सारे भारत- वर्ष के लिये एक-सा था और उनके इसी पवित्र उद्देश्य के परिपोषक उनके सारे साथी थे। यह बात तो सच है कि महाराष्ट्र के हिन्दू विदे- शियों के शासन से छुटकारा पा चुके थे, पर अब भी करोड़ों हिन्दू भिन्न- भिन्न प्रान्तों में वर्तमान थे, जो विदेशियों के शासन से असन्तुष्ट और दुखी थे। गुरु रामदास ने तो यह उपदेश दिया था कि--"धर्मासाठीं मरावें" (धर्म के लिये मरो)। और इस बात पर उन्होंने शोक प्रकट किया था कि "तीर्थक्षेत्रें भ्रष्ट झालीं !" (अर्थात् हमारे तीर्थस्थान अपवित्र किये गये हैं)। ऐसी दशा में मरहठे यदि अपने प्रान्त पर ही सन्तुष्ट होकर बैठ जाते तो शिवाजी महाराज का उद्देश्य तथा महात्मा रामदासजी का पवित्र उपदेश निष्फल होजाता और स्वर्ग में भी उनकी आत्माओं को शान्ति न मिलती। भला इस उच्च ध्येय को ध्यान में रखते हुए मरहठे क्योंकर चुपचाप बैठ सकते थे जबकि यवनोंकी हलाली ध्वजा अब भी बड़े गौरवके साथ पवित्र काशी-क्षेत्र मे विश्वनाथ के मन्दिर पर फहरा रही थी। फिर ऐसी दशा में हम किस प्रकार मान सकते हैं कि शिवाजी का हिन्दू-पद-पादशाही का आन्दोलन पूर्ण होचुका था, जबकि दिल्ली में धर्मराज युधिष्ठिर के पवित्र सिंहासन पर मुग़ल विराज रहे हों !
मरहठे पन्धारपुर के मुसलमानी राज्य को जीत कर वहां से हलाली ध्वजा को उखाड़ कर फेंक चुके थे और अब नासिक को धर्मान्ध मुसलमान अपमानित नहीं कर सकते थे। किन्तु उधर काशी, रामेश्वर, कुरु- क्षेत्र और गंगा सागर की क्या दशा थी ? इस पर ध्यान दीजिये। वहाँ यवनोंकी ध्वजा उड़ रही थी। क्या ये तीर्थ उतने ही पवित्रन थे जितने कि पन्धार और नासिक ? उनके पूर्वजों की अस्थियां केवल गोदावरी में ही नहीं पड़ी थीं; बल्कि गंगा में भी पड़ी थीं। उनके देवमन्दिर हिमालय से लेकर रामेश्वर तक और द्वारिका से लेकर जगन्नाथ तक सारे भारत में फैले
हुए थे। अतः स्वामी रामदास जी के कथनानुसार गंगा और यमुना का जल अब भी अपवित्र तथा पूजन कार्य के अयोग्य था, क्योंकि उन पर मुसलमान राजाओं की धार्मिक ध्वजा की छाया अभी तक पड़ती थी और इसीको देखकर स्वामीजी बड़े दुःख भरे शब्दों में कहा करते थे कि — "मुसलमान शक्तिशाली हैं और हिन्दू निर्बल हैं" किन्तु मरहठों को चाहिये कि "धर्म के लिये मरें, मरते-मरते भी अपना राज्य ले लें और महाराष्ट्र साम्राज्य स्थापित करें और हिन्दू धर्म को जीवित करें।" क्या मुसलमानों का अन्यायपूर्ण शासन भारतवर्ष से उठ गया था ? क्या भारतवासियों के पांवों में पड़ी हुई गुलामी की जंजीरें कट गई थीं ? नहीं। जब तक मुसलमानों का प्रभुत्व सारे भारतवर्ष में चूर-चूर न हो जाता, तब तक हिन्दूधर्म के साम्राज्य का गौरव नहीं हो सकता। जब तक भारतवर्ष की एक इंच भूमि भी मुसलमानों के अधिकार में रहेगी, तब तक जिस कार्य के लिये शिवाजी तथा रामदासजी के वंशज मर मिटे थे, वह कार्य अधूरा ही समझा जायगा। विचारवान और कर्मशील मरहठा नेताओं, योद्धाओं और ऋषियों ने जनता के सामने ये युक्तियां रखीं—"जब कि तुमने अपने मन में दृढ़ संकल्प कर लिया है कि जब तक हिन्दुओं की गुलामी की बेड़ी टुकड़े २ नहीं कर डालते तब तक अपनी तलवार को म्यान में न रखेंगे, तब जब तक कि हिन्दू जाति बिना रोकटोक पूर्ण स्वतन्त्रता से अपने सारे धार्मिक कार्य नहीं कर सकती और जब तक एक विशाल शक्तिशाली हिन्दू राज्य स्थापित नहीं हो जाता तब तक तुम युद्ध बन्द करके कैसे शान्तिपूर्वक राज्यसुख को भोग सकते हो ? जब तक विश्वनाथ के पवित्र मन्दिर की जगह मसजिद दिखाई देती है, जब तक मुसलमानों के घुड़- सवार बेरोक टोक सिन्धु नदी को पार करते रहेंगे और जब तक उनके जहाजों की पालें हिन्द महासागर में उड़ती रहेंगी; तब तक क्या तुम इस धर्मयुद्ध से कभी भी मुंह मोड़ सकते हो ? इस धर्मयुद्ध का अंत
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किसी व्यक्ति-विशेष या किसी एक प्रान्त की सुख-शांति पर निर्भर नहीं है, बल्कि इसका अन्त सारे भारतवर्ष में एक महान् हिन्दू-साम्राज्य एवं “हिन्दू-पद-पादशाही” के स्थापित होने के साथ होगा। इस लिये हे महाराष्ट्रवासियो ! उक्त कार्य की पूर्ति के लिये सहस्रों और लाखों की संख्या में तलवार लेकर निकल पड़ो और अपनी गेहुआ ध्वजा को, नर्मदा को पार कर चम्बल के उस पार स्थापित कर दो। गंगा, यमुना, सिन्ध और ब्रह्मपुत्र को पार करते हुए अन्त में समुद्र के किनारे तक पहुंच जाओ और श्रीरामदास जी के महान् के निम्न उपदेश कोस दैव ध्यान में रख कर अपनी मनोरथपूर्ति के लिये प्रयत्न करते जाओ, तथा उसके साथ-साथ अपने पैर भी आगे बढ़ाते जाओ :- "देव मस्तकीं धरावा। अवघा हलकल्लोल करावा ॥ मुलूख बडवा बुडवावा। धर्मसंस्थापनेसाठी ॥ ॐ इन उपरोक्त महान उद्देश्यों ने ही बाजीराव, चिम्माजी अप्पा, ब्रह्मेन्द्र स्वामी, दीक्षित, माथुर बाई आंगरे, इत्यादि महाराष्ट्रीय नेताओं को प्रोत्साहित किया और उन्हें मरहठा कार्यक्रम की वृद्धि करने के लिए बाधित किया। इस समय अब उन लोगों के सामने केवल यही प्रश्न नहीं उठता था कि - "क्या होना चाहिये ?" बल्कि यह होता था कि "क्या किया जाय"। प्रथम तो महाराष्ट्रवासियों का ध्येय कोई विशेष प्रान्तीय हिन्दू-राज्य स्थापित करने का था ही नहीं और यदि ऐसा करने की उनकी इच्छा होती भी, तो उसका पूर्ण होना असम्भव था, क्योंकि महाराष्ट्र के हिन्दुओं का भाग्य उत्तर में सिन्ध से लेकर दक्षिण में समुद्र तक के हिन्दुओं के भाग्य के साथ नत्थी हुआ था। महाराष्ट्र के राजनीतिज्ञ भली भांति जानते थे कि भूतकाल में प्रान्तीय भेदभाव ने ही भारतवर्ष को पराधीन बनाया था, और इसी ॐ देवताओं को पूजनीय मान कर उन को सिर पर धारण कीजिये। चारों ओर धर्म का डंका बजा दो। धर्म की स्थापना के लिये अपना सर्वस्व बलिदान कर देना चाहिये।
[ ३८ ] कारण हिन्दुओं की जाति तथा धर्म का नाश हुआ था। इसी बात को दृष्टि में रख कर वे सदैव यह प्रयत्न करते रहे कि जहां तक सम्भव हो, हिन्दूमात्र को संगठित किया जावे। इसी बात को ध्यान में रखकर जिस समय नादिरशाह का आक्रमण भारतवर्ष पर हुआ उस समय बाजीराव ने प्रत्येक हिन्दू-राजा को लिख भेजा था कि मैं आप लोगों को केवल अपने धार्मिक तथा राजनैतिक कार्यों के लिये स्वार्थवश नादिरशाह का सामना करने में सहयोग देने के लिये विवश नहीं करता हूं, बल्कि मैं सोचता हूं कि जब तक आप लोग इस महान हिन्दू जाति की स्वतंत्रता के प्रश्न को सुचारू रूप से हल न करेंगे तब तक आप लोगों का व्यक्तिगत जीवन वास्तविक शान्तिमय जीवन नहीं कहलायेगा। आप को अपने ही सुख भोग पर जीवन व्यतीत करना शोभा नहीं देता है, वरन हम लोगों को एक ऐसा बड़ा राज्य स्थापित करना चाहिये जिस की छत्र-छाया में सारा भारतवर्ष सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सके। यह बात निश्चित है कि जब तक भारत पर विदेशियों का शासन है तब तक कोई भी हिन्दू शान्तिपूर्वक नहीं रह सकता और न ही अपने को पूर्ण हिन्दू कहलाने के योग्य भी प्रमाणित कर सकता है। ऐसी अवस्था में वह अपनी जाति की उन्नति करने में भी असमर्थ होंगे, क्योंकि दूसरों के अन्याय से भयभीत होकर उन्हें सब प्रकार से गुलामी की बेड़ी में बंधा रहने के लिये विवश होना पड़ेगा। इन सब बातों को केवल महाराष्ट्र के प्रमुख नेता ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र का साधारण से साधारण व्यक्ति भी अनुभव कर रहा था कि जब तक वे लोग दिल्ली पर राज्य न करेंगे तबतक पूना और सितारे में राज्य करना व्यर्थ है। जब महाराष्ट्र के सारे नेता, शाहूजी के सभाप- तित्व में उपस्थित होकर भविष्य के राजनैतिक सिद्धान्तों पर विचार करने के लिये एकत्रित हुए तो ऐसा सुअवसर पाकर बाजीराव बोलने के लिए उठे और अपनी शक्ति और उत्साह तथा अपने विषय के महत्त्व को दृष्टि
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में रखकर कहने लगे "हम लोग अब अवश्य सीधे दिल्ली की ओर बढ़ेंगे और यवन राज्य की जड़ से उखाड़ देंगे। ऐ हिन्दू शूरवीरो ! तुम यहां खड़े होकर क्यों आगा-पीछा सोच रहे हो। आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, "हिन्दू-पद-पादशाही" स्थापित करने का समय आ गया है। क्या ऐसा करना असम्भव है ? नहीं, नहीं, कभी नहीं । मैंने अपनी तलवार शत्रुओं की तलवार से नाप ली है-उनकी शक्ति का पता लगा लिया है।" फिर वह छत्रपति को सम्बोधित करते हुए कहने लगे-“ऐ महाराज छत्रपति शाहू जी ! मैं आप से अधिक धन या जन की याचना नहीं करता हूं, केवल आप मुझे आज्ञा दें और साथ ही यह आशीर्वाद भी दें कि मैं सीधे दिल्ली जाऊं और उस हानिकारक वृक्ष की जड़ पर कुल्हाड़ी चला कर उसे शाखाओ सहित नष्ट कर दूं"। बाजीराव के उत्साहपूर्ण तथा पवित्र आन्तरिक भावों से भरे हुए वाक्यों को सुनकर छत्रपति शाहू जी का शरीर रोमांचित हो गया, और उन्हें अनुभव होने लगा कि उनकी नसों में शिवा जी का रक्त प्रवाहित होने लग पड़ा है, और जोश भरे शब्दों में उन्ह ने उत्तर दिया-“ऐ मेरी प्रजा के प्रमुख शूरवीरो ! जाओ, जिधर चाहो, मेरी सेना को विजय-पर-विजय प्राप्त कराते हुए ले जाओ और दिल्ली ही क्या, इस गेरुआ वस्त्र की ध्वजा को, विजय लाभ कराते हुए, हिमालय की चोटी और यदि होसके उसके परे किन्नर खण्ड पर स्थापित कर दो।" यह गेरुआ ध्वजा सोन- चांदी के काम से सुशोभित नहीं थी, बल्कि उन वैरागियों और संन्यासियों के गेरुआ रंग में रंगी हुई थी, जो सांसारिक माया के त्याग, ईश्वर- भक्ति तथा लोक-सेवा की ओर मनुष्यों को ले जाता है। शाहू जी की आज्ञा पाकर मरहठे उस गेरुआ ध्वजा के पीछे चल पड़े। यह गेरुआ ध्वजा उन्हे धार्मिक कर्त्तव्यों का स्मरण कराने तथा उनको सत्पथ पर ले जाने के लिये दी गयी थी । इसी ध्वजा के सहारे मरहठे अपने उच्च आदर्श पर आरूढ़ रह कर धर्म और जाति
[ ४० ] के रक्षक बने तथा शत्रुओं की पराधीनता से उन्होंने अपने देश को मुक्त कराया । तलवार ही मरहठों की पूज्या भवानी थी और भगवे रंग का था उनका झण्डा । उस झण्डे को महात्मा रामदास जी ने उठाया था, वीर शिवा उसी गेरुए झंडे की छाया में लड़ेथे और इसे सह्याद्रि पर्वत की चोटी पर ले जाकर उन्होंने स्थापित किया था। उसी को उनके पौत्र शाहू जी तथा उनके वंशजों ने किन्नर खण्ड की सीमा पर गाड़ने का दृढ़ निश्चय किया । इस प्रकार सभा समाप्त हुई और महाराष्ट्र मंडल का इतिहास सारे भारतवर्ष का आदर्श इतिहास बन गया । ८. दिल्ली की ओर प्रस्थान ❀ "अरे बघतां काय ! चला जोरानें चाल करून ! हिन्दूपादशाहीस आतां उशीर काय !" —बाजी रावो बाजीराव और उस के साथियों की शिवाजी की स्वायत्त में पूर्ण रूप से कैसी शिक्षा दीक्षा हुई थी तथा उन्होंने अपने महान नेता की राजनैतिक विद्या तथा युद्धकला का कितनी सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया था—इन दोनों बातों का स्पष्टीकरण शाहूजी के सभापतित्व में दिये गए बाजीराव के भाषण से भली भांति हो जाता है । बाजीराव ने महाराष्ट्र के नेताओं को संबोधित करते हुए अपने वक्तृत्व में कहा— "जिस समय शिवा जी दक्षिण में हिन्दू जाति की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए प्रयत्न कर रहे थे वह समय अत्यंत ही विकट और आपत्तियों से परिपूर्ण था । पर उस समय की अपेक्षा आज परिस्थिति हमारे अधिक ❀ अरे देखते क्या हो । शक्तिशाली बनो । हिन्दू-पद-पादशाही की स्थापना के लिए अब क्या देर है ।
[ ४१ ]
अनुकूल है। ऐसा सुअवसर मिलने पर, हम लोग उन के वंशज होते हुए भी उत्तरीय भारत में लड़ाई ठानने का साहस करने के स्थान पर नाना प्रकार की शंकाओं और विचारों में पड़े हुए हैं। इस समय हम निज़ाम, बंगश तथा मुग़ल सेनाओं पर बड़ी सफलता के साथ धावा बोल सकते हैं। सर्वप्रथम हमें निज़ाम के विरोध को नष्ट करना चाहिये क्योंकि वर्तमान काल में मुसलमानों में वही सब से सुयोग्य सेनापति और राजनीतिज्ञ है'। बाजीराव ने जिस प्रकार अपनी ओजस्विनी वाग् शक्ति द्वारा अपना मनोरथ सफलता पूर्वक महाराष्ट्र मण्डल के सामने प्रकट किया उसी प्रकार कर्मक्षेत्र में भी अपने आपको अपने कर्त्तव्य द्वारा शिवाजी का एक सुयोग्य शिष्य और अनुयायी प्रमाणित कर दिया। ७ अगस्त, सन् १७२७ ईस्वी को, जबकि मूसलाधार वर्षा हो रही थी, बाजीराओ अपनी शिक्षित सेना को लेकर रणक्षेत्र में कूद पड़ा और औरंगाबाद में प्रवेश करके उस पर विजय प्राप्त कर ली। उसके पश्चात् निज़ाम के अधीनस्थ जलना तथा आस पास के जिलों से अपने बाहुबल से लड़ाई खर्च का चन्दा वसूल करना आरम्भ कर दिया। ज्योंही निज़ाम की सेना इवाज़खां की अध्यक्षता में उसका मुक़ाबिला करने के लिये पहुंची बाजीराओ ने उन्हें अपनी चतुरता से थोड़ी देर तक निरुत्साहिता प्रकट करते हुए फंसाये रक्खा और फिर अचानक ही अपने दुश्मनों की सेना को छोड़ कर माहुर की ओर कूच कर दिया। फिर वहां से औरंगाबाद की तरफ बढ़ गया और यह बात फैला दी कि उस नगर से भी चन्दा वसूल किया जायगा। निज़ाम ने जब यह सुना तो वह उस धनी देश को बचाने के लिये, इवाज़खां के साथ सम्मिलित होने के उद्देश्य से शीघ्रता से उसी ओर बढ़ा। जब बाजीराओ ने अपनी इस चाल में सफलता देखी और देखा कि निज़ाम इस धोखे में आ गया है तो उसने खानदेश को छोड़कर गुजरात में प्रवेश किया और वहां के मुग़ल वायसराय को, विकट हंसी करते हुए, सूचना दे दी कि मैं इस देश पर निज़ाम की आज्ञा पा कर चढ़ाई कर रहा हूं।
[ ४२ ]
निज़ाम बड़ी तेज़ी के साथ औरङ्गाबाद की तरफ जा रहा था । उसे यह सुन कर बड़ी निराशा हुई कि वह जिस शत्रु से औरङ्गाबाद की रक्षा करने जा रहा है, वह शत्रु तो गुजरात में पहले ही पहुंच चुका है। बाजीराव्रो की इस चाल पर निज़ाम को बड़ा क्रोध आया और उसने भी उसी की नीति का अनुकरण करके अपनी चालाकी से बाजीराव्रो पर विजय प्राप्त करने का विचार निश्चित किया अर्थात् निज़ाम ने सोचा कि जिस समय बाजीराव्रो पूना की राजधानी में न रहे, उस समय अचानक धावा करके पूना को लूट लेना चाहिये । परन्तु बाजीराव्रो की इस युद्ध- कला को सीखने में भी निज़ाम पीछे ही रहा, क्योंकि बाजीराव्रोने इसकी यह सब बातें जानकर पहिले ही गुजरात छोड़ दिया और बड़ी शीघ्रता से निज़ाम राज्य में फिर आ पहुंचा ।
जब निज़ाम पूना लूटने के विचार से बड़ी तेज़ी से उस ओर आ रहा था, और सोच रहा था कि वह एक शानदार वीरतापूर्ण कार्य करने जा रहा है, तब उसे यह सुनकर बड़ा दुःख हुआ कि बाजीराव्रो के पूना लूटने के पहले ही उसका सारा राज्य बाजीराव्रो द्वारा लूट लिया गया है। इसलिये वह पूना लूटने की आयोजना को त्याग कर बाजीराव्रो से गोदावरी के किनारे पर मुक़ाबला करने के लिए शीघ्रता से लौटा । इस चक्कर में पड़कर निज़ाम की सेना बड़ी थक गई थी । यद्यपि निज़ाम की इच्छा उस समय, अपनी सेना की दशा देखकर, सामना करने की न थी तथापि बाजीराव्रो ने उसे युद्ध करने के लिये हठात् विवश कर दिया और पहले की भांति भागने तथा सामना न करने की अपेक्षा ऐसी चालाकी तथा बुद्धिमानी दिखाई कि उसके फेर में पड़कर निज़ाम की सेना बाजी- राव्रो की इच्छानुसार पालखेद् नामक स्थान पर जा डटी । बाजीराव्रो ने अब सहसा उन पर आक्रमण कर दिया । इससे पहले वह निज़ाम से टक्कर लेने में हिचकता रहा था ।
यद्यपि निज़ाम के पास बड़ी २ तोपें और बन्दूकें मौजूद थीं, तथापि
[ ४१ ] वह बड़ी बुरी तरह फँस गया । उसे अब दृढ़ विश्वास होगया कि अब मरहठों से छुटकारा पाना असम्भव है । वह विषाद सागर में डूब गया । अब उसके सामने दो ही रास्ते थे या तो वह अपनी सारी सेना को बरबाद करा लेता या बाजीराव की इच्छानुसार संधि करता । बड़ी उधेड़बुन के बाद निज़ाम ने अपने हृदय में बाजीराव से संधि करने का विचार निश्चित किया और शाहूजी को महाराष्ट्र का स्वतन्त्र राजा मान लिया और जितनी चौथ और 'सरदेशमुखी' बाकी थी सब पाई पाई देना स्वीकार कर लिया तथा इस शर्त को भी मान लिया है कि उसके राज्य में पुनः मरहठे 'कर' वसूल करने के लिये नियुक्त किये जायेंगे । इस प्रकार दोनों में संधि हो गई । इस उपरोक्त लड़ाई का विस्तारपूर्वक वर्णन यहां इसलिए किया गया हैक्योंकि यह मरहठा युद्धकला का आदर्श-स्वरूप उदाहरण है और इसमे यह भी प्रकट होता है कि महाराज शिवाजी ने अपनी जाति को जिन जिन शिक्षाओं से भली प्रकार शिक्षित किया था, उनके वंशजों ने उन्हे आज तक उसी प्रकार स्मरण ही नहीं रक्खा वरन् उन शिक्षाओं को और भी उन्नत किया तथा समयानुकूल घोर लड़ाइयों में प्रायः उन गुणों से बहुत ही काम लेकर विशेष सफलता के साथ विजय प्राप्त करते रहे । मालवा का मुगल वायसराय भी दक्खिन के मुगल वायसराय से किसी दशा में उत्तम सिद्ध नहीं हुआ । सन् १६६८ से लेकर, जबकि उदाजी पवार ने मालवा पर आक्रमण किया था और मण्डबा में अपना खेमा गाड़ दिया था, मरहठे लोग हर तरफ से मुगलों की सेना पर धावा करते रहे और उन्हें सुख की नींद न सोने दिया । उस प्रान्त के हिन्दू, जो मुसलमानों के अन्यायपूर्ण शासन से पीड़ित थे, अपने धर्म की रक्षा के लिये हर तरह विधर्मियों से सताये जाते थे । उन लोगों का भी, शिवाजी के उठाये हुये धार्मिक आन्दोलन के प्रति भाव बदला और वे अनुभव
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करने लगे कि वास्तव में मरहटों का यह आन्दोलन प्रान्तीय या व्यक्ति- गत नहीं है, वरन् धार्मिक और सार्वजनिक है। इस कारण वहां के हिन्दू, जिनके नैसर्गिक नेता वहां के जमींदार, ठाकुर और उनके पुरोहित थे, उक्त आंदोलन के पक्षपाती हो गये और इस कार्य को सब ने अपना मुख्य कर्त्तव्य समझ लिया। उनमें मरहटों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई और उन्हें पूर्णरूप से ज्ञान हो गया कि मरहटों की यह विशाल शक्ति ही केवल देश और धर्म को विदेशियों के पंजे से मुक्त कराने का उस समय एकमात्र सर्वश्रेष्ठ साधन है। भाग्यवश मालवा के हिन्दुओं को वहां प्रसिद्ध तथा प्रभावशाली राज- कुमार मिला हुआ था जो कि हिन्दू-स्वतन्त्रता का बहुत ही समर्थक था। उसका शुभ नाम सवाई जयसिंह था। था वह जयपुर का राजा। महा- राज छत्रसाल ने जब अनुभव किया कि हम अपने छोटे से राज्य को विदेशियों के आक्रमण से रक्षा करने में पूर्णतया असमर्थ हैं तो उन्होंने देशभक्ति से प्रेरित होकर तथा प्रान्तीय भेदभाव को त्याग कर हिन्दू स्वतन्त्र राज्य के आन्दोलन से सहानुभूति रखना पसन्द किया और इस बात की परवाह नहीं की कि इस आन्दोलन के जन्मदाता कौन हैं। चाहे मरहठे हों या राजपूत हों, चाहे भिल अथवा कोई अन्य हिन्दू सम्प्रदाय क्यों न हो, उन्होंने दिल्ली के 'मुसलमानी राज्य के सामने सिर झुका कर जीना पसन्द नहीं किया। वह इसी विचार पर अटल भी रहा। छत्रसाल के इसी उत्तम विचार का अनुकरण जयसिंह ने भी किया। जयसिंह ने बड़ी वीरता के साथ मालवानिवासी पीड़ित हिन्दुओं का पक्ष ग्रहण किया। वे क्षत्रिय, ब्राह्मण तथा अन्य जातिवाले मुसलमानों द्वारा नियुक्त शासकों के अन्यायपूर्ण करों से पीड़ित हो रहे थे। वे लूटमार तथा अपने जाति और धर्म की अवनति तथा अपमान से विह्वल हो रहे थे। यह सब कुछ सहन करना उनकी शक्ति से बाहर हो रहा था। उन सबको जयसिंह ने अपने पास बुलाकर अपनी सम्मति दी कि सभी
[ ४५ ] मालवा-निवासी मिलकर मरहठों को बुलायें ताकि वे इनको स्वतन्त्र करा सकें और हिन्दू राज्य की स्थापना कर सकें। क्योंकि इस समय सिवाय मरहठों के हिन्दूधर्म का रक्षक दूसरा कोई दिखाई नहीं दिया तब उसके सामने दो परिस्थितियां उपस्थित हुईं, या तो वह मरहठों से सहा- यता मांग कर उनके अधीन होकर रहता या वह विदेशी यवनों के अधीन होकर फलता फूलता। उस समय उस विचारशील राजकुमार ने भली भांति समझ लिया था कि इस समय भारतवर्ष में जितने हिन्दू-शासक हैं, उनमें से केवल महाराष्ट्र-मंडल ही एक ऐसी सुसंगठित शक्ति है, जो मुसलमानों का उचित रूप से सामना करके रणक्षेत्र में उन्हे नीचा दिखा सकती है और हिन्दुओं को एकत्रित करके एक सूत्र में बांध सकती है। उसने सोचा कि यदि मैं अग्रसर होकर अपने बाहुबल से इस पीड़ित हिन्दू-जाति को मुसलमानों के अन्याय से मुक्त नहीं करा सकता, तो मेरा अपनी जाति के प्रति अवश्य यह कर्त्तव्य होना चाहिये कि अपनी सारी इच्छा, आशा और तृष्णा को त्याग कर, अपने सर्व नीच विचारों को तथा पारस्परिक वैर-भाव को तिलांजलि देकर उन महापुरुषों का सहायक बनूं जो हिन्दू- जाति को स्वतन्त्र बना सकते हैं और बनायेंगे। प्रभावशाली ठाकुर नंदलाल मांडवी ने उक्त राजकुमार के विचारों का सादर अनुमोदन किया और बड़े हर्ष-पूर्वक मालवा निवासी हिन्दुओं की ओर से अपनी जाति एवं धर्म की मान रक्षा के लिए तथा म्लेच्छों को मार भगाने के लिए मरहठों को पत्र द्वारा आमन्त्रित किया। मरहठों ने, जिनका जीवन ही धर्म की रक्षा के लिये हुआ है, मालवा निवासी अपने सहधर्मियों के निमंत्रण-पत्र को पाकर बड़ी प्रसन्नता के साथ शीघ्र ही चिम्माजी (बाजीराव के भाई) की अध्यक्षता में सारे प्रांत पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया। उधर मुग़ल वायसराय ने यह समाचार पाकर एक बड़ी संख्या में अपनी सेना एकत्रित की, लेकिन मरहठे लड़ाई के समय उनकी तनिक भी परवाह न करके तिल भर भी रण-क्षेत्र से न हटे
[ ४६ ] प्रत्युत् सुअवसर पाते ही मुसलमानी सेना पर अचानक टूट पड़े और देवास की लड़ाई में वायसराय का काम तमाम कर दिया । किन्तु मुग़ल सम्राट मालवा जैसे धनशाली प्रान्त को, इस प्रकार सहज ही अपने हाथ से खो देने के लिये कदापि तैयार न था, इसलिये उसने मरहठों का सामना करने के लिए एक नया वायसराय मालवा भेजा । उधर महरठों से सहानुभूति रखने वाले सभी मालवा निवासी मरहठा फ़ौज में शामिल हो गये । नये मुग़ल अधिनायक ने अपनी विशाल सेना के साथ एक भयंकर उपाय सोचकर मरहठों का मांडव घाट के दरों तथा अन्य दूसरी घाटियों में नाश करने का विचार किया। लेकिन मरहठों ने मालवा निवासी हिन्दुओं की सहायता से चिम्माजी अप्पा तथा पिलाजी की संरक्षता में, मुग़ल सेना को तिराल नामक स्थान पर, एक घमासान लड़ाई करके पूर्णरूप से पराजित किया और उनके नये वायसराय को भी मार डाला तथा मुगलों को मालवा से बिलकुल निराश कर दिया । इस प्रकार दूसरी बार विजय के समाचारः को सुनकर मालवा के हिन्दुओं की प्रसन्नता की सीमा न रही । वे आनन्दसागर में निमग्न हो गये । आज उनके लिये एक महान् गौरव का दिन सामने आया। सैंकड़ों वर्ष की हार और पराजय के पश्चात् अब फिर उन्होंने विजय के साथ हिन्दू-ध्वजा को स्वतन्त्र फहराते हुए देखा । उस ध्वजा की छाया से उन की नसों में जीवन रक्त का संचार होने लगा । उनका हृदय देशभक्ति, जातीय प्रेम तथा धार्मिक भावों से भर गया । उनके मुक्ति-दाता मरहठे जिस ओर जाते थे, बड़ी धूम-धाम से उनका स्वागत करके उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जताते थे । स्वयं जयसिंह ने भी एक मानपूर्वक पत्रद्वारा सारे मरहठे सेना- पतियों को, जिन्होंने लड़ाई में अपूर्व साहस तथा वीरता का परिचय दिया था, इस अद्भुत सफलता पर बहुत २ बधाई देते हुए तथा उनका
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सहस्रवार धन्यवाद करते हुए लिखा कि आप की विजय अति शोभापूर्ण है। आपने मुसलमान शत्रुओं को मालवा प्रान्त से निकाल कर, मालवा निवासी हिन्दुओं को यवनों की दास्ता की बेड़ी से मुक्त करा के हिन्दू- धर्म के साथ जो उपकार किया है, उसके लिये हम लोग आजन्म आपके ऋणी हैं और जो कुछ आपके प्रति कहा जाय, सब कुछ थोडा है। केवल सहस्रों धन्यवाद देकर ही मैं अपने आपको कृतकृत्य समझता हूं। मरहठे सरदारों ने शीघ्र ही देश मे शान्ति स्थापित कर दी और मुगल-प्रतिनिधियों को मालवा से निकाल कर उस पर महाराष्ट्र के एक सूबे की भांति, शासन करने लगे। इतने पर भी, दिल्ली का बादशाह पूर्ण निराशा में भी आशा की किरण ढूंढने का प्रयत्न करने लगा। उसने पुनः एक नये वायसराय को भेजा जिस का नाम मुहम्मदखां बंगश था। वह एक बहादुर शेरदिल रुहेला पठान था। उसने लड़ाइयों में अपनी वीरता से मुसलमानी सेना के अन्दर बड़ा नाम पैदा किया हुआ था। उसे मुगल बादशाह की तरफ से पुरस्कार में 'रणसिंह' की उपाधि मिली हुई थी। दिल्ली-दरबार की ओर से उसे सब मे पहिले बुन्देला-सरदार छत्रसाल की बढ़ती हुई शक्ति का नाश करने और तत्पश्चात् मालवा से मरहठों का नामोनिशान मिटा देने का भार सौंपा गया। बुन्देला-सरदार छत्रसाल, कुछ दिनों से मुसलमानों की गुलामी की बेड़ी को अपने परिश्रम से तोड़ कर, स्वतन्त्र राजनैतिक जीवन व्यतीत कर रहा था। छत्रसाल शिवाजी का एक अनन्य भक्त था, शिवाजी की आदर्शपूर्ण शिक्षा ने उसके हृदय मे स्वतन्त्रता की नींव रखी थी। उसने यौवन काल से ही शिवाजी को अपना गुरु तथा पथ- दर्शक स्वीकार किया हुआ था। तब से ही वह शिवाजी की सम्मति अनुसार बुन्देलखण्ड के हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के लिये प्रयत्नशील रहा और अंत में बड़ी सफलतापूर्वक उसने अपने देश और धर्म को स्वतन्त्र
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बना लिया । इसी कारण इसकी सारी प्रजा इसको 'हिन्दू-धर्म की ढाल' के नाम से बुलाने लगी थी । मुहम्मद बंगश ने एक बड़ी भारी सेना के साथ बुन्देलों के छोटे से राज्यपर, बादशाह की आज्ञानुसार, आक्रमण कर दिया । वृद्ध बुन्देले सरदार ने जब देखा कि मुझ जैसे छोटे राज्य को विध्वंस करने की शाही-आज्ञा लहर मार रही है तो वह कुछ चिन्तित हुआ । पर शिवाजी जैसे गुरु तथा रामदास और प्राणनाथ प्रभु जैसे महात्माओं की हिन्दू-पद- पादशाही की शिक्षाओं से पूर्णतया प्रभावित छत्रसाल का ध्यान अपने गुरुभाई बाजीराओं की ओर गया । बाजीराओ के रक्त में न केवल शिवाजी का उत्साह ही भरा हुआ था बल्कि उनमें अपने पूर्वजों के उद्देश्य की पूर्ति की लगन भी लगी हुई थी । छत्रसाल ने एक करुणा-पूर्ण पत्र बाजीराओ के नाम लिखा, जिस में उनके पूर्वजों की कीर्ति तथा उच्च ध्येय का दिग्दर्शन कराते हुए उनके कर्त्तव्यों का स्मरण दिलाया और अपनी इस संकटापन्न अवस्था में सहायता पाने के लिये प्रार्थना की । छत्रसाल की बुद्धिमत्ता तथा लेखन-शक्ति ऐसी थी, कि उसके इस पत्र ने प्रत्येक हिन्दू के हृदय में भ्रातृभाव उत्पन्न कर दिया । मैं उसके पत्र का सार अंकित करता हूं, जो उसकी श्रद्धा का द्योतक है। “जिस प्रकार विष्णु भगवान् ने गजराज के आर्तनाद को सुनकर नंगे पावों जाकर दुष्ट ग्राह के हाथ से उसकी रक्षा की थी उसी प्रकार “ऐ हिंदू-कुल-कमल-दिवाकर बाजीराओ ! आप भी आइये और मुझ दीन को विधर्मियों के भयंकर आक्रमण से बचाइये ।” महाराज शिवाजी के एक पुराने शिष्य तथा मित्र के इस प्रकार मुसलमानों के आक्रमण द्वारा धर्मसंकट में पड़ने परतथा एक हिन्दू के नाते मरहठों से सहायता मांगने पर भला मरहठे इसकी पुकार को कैसे अन- सुना कर सकते थे । उनका तो अस्तित्व ही धर्म की रक्षा के लिए था । पत्र पाते ही मरहठों का उत्साह देशभक्ति के लिये उबलने लगा और तत्काल
ही बाजीराओ, मल्हरराओ, चिम्माजी अप्पा तथा अन्य मरहठे सरदारों ने जितनी शीघ्रता हो सकी, उतनी शीघ्रता से सत्तर हज़ार सेनाओ के साथ कूच कर दिया और महाराज छत्रसाल से धामोराह के स्थान पर जा मिले । छत्रसाल भी अपनी बची बचाई बुन्देला-सेना एकत्रित कर, उनके साथ रवाना हो गये । यद्यपि उस समय मूसलाधार वृष्टि हो रही थी तथापि रणमद में मत्त मरहठों ने इसकी कुछ भी परवह न की । मुहम्मदखां अपनी असंख्य सेना के साथ, एक छोटे से हिन्दू- राज्य पर विजय प्राप्त करके तथा राजा छत्रमाल को उसकी राजधानी से निकाल कर, अपनी वीरता पर बहुत गर्वित हो रहा था । उसने वर्षा- काल में आराम करने का विचार किया । जिस समय मुग़ल-अधिपति इस प्रकार मूर्खों के स्वर्ग में विचर रहा था उसी समय भयानक वर्षाकाल की तनिक भी परवाह न करते हुए धर्मवीर हिन्दू सेनाओं ने मरहठों की छत्र-छाया में अपनी जान हथेली पर रख कर, सघन वनों, दुर्जय पर्वतों तथा विकट मार्गों को पार करके अचानक मुहम्मदखां बंगश पर चढ़ाई कर दी और सन् १७२६ ईसवी में जैतपुर की लड़ाई में उसे भली भांति परास्त कर दिया । उससे जीते हुए राज्य को पुनः छीन लिया । सुख-स्वप्न देखने वाले 'रणसिंह' ने अब अपने आप को शत्रुओं से घिरा हुआ पाया । जान जाने के भय से वह बड़ी नीचता पूर्वक रणक्षेत्र से पीठ दिखा कर भागा और दिल्लीराज से मिली हुई 'लड़ाई के शेर' की उपाधि को अक्षरशः सत्य बनाकर मुसल- मानों का मुख उज्ज्वल किया ! इस प्रकार सारा मालवा व बुन्देल- खण्ड पुनः हिन्दुओं के हाथ आ गया । वृद्ध बुन्देले-सरदार छत्रमाल ने पुनः बड़ी धूमधाम से अपनी राजधानी में प्रवेश किया । नगरनिवासी अपने बिछुड़े हुए सरदार के शुभागमन से कृतकृत्य हुए और उन्होंने आन्तरिक हृदय से उन का स्वागत किया । सारा नगर मरहठों की तोपों की ध्वनि से गूंज उठा ।
[ ५० ] वृद्ध छत्रसाल मरहठों के इतने कृतज्ञ हुए कि उन्होंने बाजीराव को अपना तृतीय पुत्र बना लिया। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके राज्य का तीसरा भाग बाजीराव के हवाले कर दिया गया। बुन्देलों का यह अनु- पम कार्य, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि मरहठों के सिद्धान्त और आदर्श, जिन पर कि उनका निस्वार्थ कार्य निर्भर था, बहुत उच्च थे। इसी कारण से बाजीराव के वंशजों में प्रान्तीय तथा व्यक्तिगत भेद-भाव लेशमात्र भी न बचा, और सभी लोग अपने आपको एक खून, एक जाति तथा एक ही धर्म-सूत्र में बंधा हुआ समझने लग गये। इन ही उच्च आदर्शों ने सबके हृदयों को हिन्दू स्वतन्त्रता प्राप्त करने और एक सुविशाल हिन्दुसाम्राज्य स्थापित करने के पवित्र भावों से भर दिया। तीसरे मुसलमान वायसराय मुहम्मदखां बंगश के मालवा और बुन्देलखण्ड से भाग जाने पर मरहठे सारे देश के स्वामी बन गये। वह स्थान उनके लिये बड़ा ही उपयुक्त सिद्ध हुआ। यहीं से उन्होंने हिन्दू- स्वतन्त्रता की लड़ाई मुगल राज्य के ठीक केंद्र में आरम्भ करने की ठान ली। जिस समय मालवा और बुन्देलखण्ड में ये लड़ाइयां हो रही थीं उसी समय मरहठे गुजरात प्रान्त में अच्छी सफलता प्राप्त कर रहे थे। सेनापति पिलाजी गायकवाड़, कन्थाजी वान्दे और अन्त में स्वयं चिम्मा जी अप्पा ने क्रमशः गुजरात-प्रान्त में मुसलमानी सेनाओं को ऐसा नीचा दिखाया कि विवश होकर मुगल वाइसराय ने "चौथ" और "सरदेश- मुखी" देने की शर्त पर सन्धि कर ली। परन्तु मुगल-बादशाह, मरहठों की ऐसी गर्वपूर्ण विजय पर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने सेनापति अभयसिंह को मरहठों को गुजरात से शीघ्र बाहर करने का भार सौंप कर भेजा। अभयसिंह, जयसिंह से बिल्कुल प्रतिकूल प्रकृति का पुरुष था। उसकी आत्म-प्रतिष्ठा और आत्मिक स्वार्थ ने उसे ऐसा अन्धा