कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भूलके न लजाना ठन ठनाना ही हैं, हजरतईशाको साधुका आशीर्वाद, मुहम्मद साहिबको राहिबका आशीर्वाद
उन्मत्त बाल पिशाच मूक जड दशा पञ्च यह लानी ॥
खोय आप अपन पौ सर्वश निज रूप नहि जानी ।
फिर कैवल्य कारण महकारण सूक्ष्म स्थूल समानी ॥
स्थूल सूक्ष्म कारण महकारण कैवल पुनि विज्ञाना ।
भये नष्ट यहि हेरफेरमें कतहूँ नहि कल्याना ॥
कहें कबीर सुनोहो सन्तो खोज करो गुरु ऐसा ।
जेहिते आप अपनपौ जानों मेटो खटका रैसा ॥
साहिबके हंस ऐसेही होते हैं उनकी देहके ये ही गुण क्यों ऐसेही अनेकों गुण होते हैं कोई छटे देहको ही हंसोंका देह मानते हैं यह उनकी भूल है तुमको हंस देह न प्राप्त होगी । जिसको तुमने हंस देह अनुमान कर रखा. वो तुम्हारी भूल और भ्रम है । सद्गुरुकी दया बिना हंसका स्वरूप नहीं प्राप्त हो सकता । हंस रूपके अकथ गुण हैं ।
पाँचों भूमिकाओंके नाम—गता भूमिका, अगता भूमिका, प्राप्ति भूमिका, समता भूमिका, शुद्धि भूमिका ।
पांचदेहके नाम—स्थूल, सूक्ष्म कारण, महाकारण और ब्रह्मरन्ध्र ।
पाँचों वाणियोंका नाम—परा, पश्यन्ति, मध्यमा, वैखरी, और अन्ूपम ।
सर्व मनुष्य अपने २ धर्म—मजहब—और गुरुकी प्रशंसा करते आते हैं, सब कहते हैं कि, हम बड़े, हम बड़े, हमारा गुरु बड़ा, हमारा मजहब बड़ा । यही चरचा चारों ओर फैल रही है अपने २ रङ्गमें सब मस्त हो रहे हैं ।
बीजकका शब्द ।
सबही मदमाते कोई न जाग । सङ्गहि चोर घर मूसनलाग ॥
योगी माते धरि धरि ध्यान । पण्डितमाते पढ़ी पुरान ॥
तपसी माते तपके भेव । सन्यासी माते करी हमेव ॥
मुल्ला माते पढ़ि मसहा । काजी माते करि इनसाफ़ ॥
संसार मति मायाके धार । राजामाते करि हंकार ॥
माते शुक्र देव ऊधो अकरूर । हनुमत माते ले लंगूर ॥
शिवमाते हरि चरणन सेव । कलमा माते निमाजके भेव ॥
सत्य सत्य कह स्मृतीवेद । जस रादण मारे घरके भेद ॥
चञ्चल मनके येहि काम । कहे कबीर भजु सत्य नाम ॥
मद कहिये जिसमें यह जीव मत्त होजावे आगे कुछ न सूझे सब मत्त होकर अचेत होगये मन चोरने सबको लूटा । धैर्य, दया, शील, विचार और सत्य
आदि धनको चुरा लिया। चोरको कोई नहीं पहचानता। सबके साथ रहके लूटता रहता है। पर उसको कोई नहीं पकड़ता। किस किस मदमें कौन कौन मस्त हुये यह सुन लो पहले योगके मदमें शिव गोरख आदि मस्त हुये, उसीमें अचेत होगये, योग क्रिया करते और उन मुनी ध्यान धरते धरते सब अचेत हो गये पारख पदको न पहुँचे। जब पिण्ड और ब्रह्माण्डका नाश हुआ तो योग क्रिया भी नाश होगई। देह छूटी योगी गर्भको प्राप्त हुये। दूसरे, विद्यामें व्यास आदि सर्व पण्डित मस्त हुये। तीसरे, तपके मदमें तपस्वी लोग मस्त हुये। मरकर बनके पशु बनें। चौथे, लोग ब्रह्माण्डका ध्यान करते हैं वे ब्रह्माण्डके संकल्पसे मरकर पक्षी होजाते हैं। पाँचवें, पुराणके अभिमानी लोग गीदड़ हुये। छठे, संन्यासी जो ब्रह्माका दृढ़ संकल्प करते हैं वे भ्रमरूप हो आवागमनमें रहेंगे। कोई भक्तिके मद कोई रूप, कोई बल, कोई धन आदि अनेक भेदोंमें मस्त हो रहे हैं। अपने मनमें अभिमान रखते हैं कि, मैं पूर्णताको पहुँच गया हूँ। इसी तरह सब मस्त हो रहे हैं एक दूसरेको कुछ नहीं समझते। सब कहते हैं कि, मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। जिसने चार पुस्तकें पढ़ली वह जानता है कि, मेरे तुल्य दूसरा कोई नहीं, मैंही सबसे बड़ा बुद्धिमान हूँ, पुस्तकोंके न पढ़नेवाले मूर्ख हैं। जो जिसका उद्यम है जिसको जो हुनर आता है वह उसीमें मस्त हो रहा है, दूसरोंको तुच्छ समझता है। यही मत्तपना अज्ञानी होनेका कारण है। यदि जीव अपने रूप पर न इत-राता उसके आनन्दमें अचेत न होता तो विषय वासनाका बगला न बनता। जब तक इसमें भक्ति न आवे और भली प्रकार अहंकार न छूट जावे तब तक प्रकाशका मार्ग न मिलेगा। सच्चे सन्तोंकी सेवा और सङ्गति तो सन्तोंकी दयासे साहबकी कृपा हो, नहीं तो सतसङ्ग बिना दरदर भटकता फिरता है।
गजल — भटकते कोह दामों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता।
कभी जंगल व्याबों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
जो ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादि उसके बहर कुदरतमें।
है खाते गोता समान कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
चौरासी सिद्ध नौ नाथो अबस तदबीर जम द्वारे।
पड़े जँजीर दरमों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यती जङ्गम समाधी सिद्ध सन्यासी सती सूरै।
हैं फिरते सब परीशों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
वली अल्लाह गौसो कुतुब काज़ी पीर पैगम्बर।
है सबकी अलक हैरों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
योरोपमें साधुओंका दान, पादरियोंकी हंसी, जान मिल्टन साहिबका कथन
चले यह चर्ख चक्की और दले जाते बनी आदम ।
तले गदूर्नगर्दा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
कोइ रोजा निमाजो तीर्थो हज्जो हजाज़ी है ।
हिर्म दैरौ खरामौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
पढ़े कुरआन पोथी है सोसारी बात थोथी है ।
हर्फ एक नाम सुबहौ कुछ नहीं बनता ॥
उठाते पाँव आगे को पड़े एकदाम पीछेको ।
हुआ आदमको खफ़कान कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यहूदी और नसारा है कोई गुरु पीर प्यारा है ।
कोइ हिन्दू मुसलमानौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
पढ़े हैं वेद बानी सारै खाते गोता पानीमें ।
अमीके बहर पैमौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
हुआ इल्मों अमल सारा, मुआ तौ भी अजल मारा ।
हो अगर इल्म उर्फा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यह मलकुल मौत घेरा है करे जिस जाय फेरा है ।
हरदो कून हिरमौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
जफाये चर्ख बर मन दर कफाय शख्त दुश्मन है ।
वफाय यार फर्मा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
बचशमें जाहिरो बातिन लिया यह देख आजिजने ।
बुजुज मुशिर्द मिहरर्बा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
कबीर साहबकी साखी ।
बैठा रहे सो लानियाँ, खड़ा रहे सो ग्वाल ।
जागत रहे सो पाहूर, तेहि धरि खायो काल ॥
इसी प्रकारसे सब मनुष्योंमें अहङ्कारकी दुर्गन्धि भर गई । मनुष्यके बन्धन का कारण यही है, इसीके कारण सब मनुष्य आवागमनमें रहते हैं । इसी मन शत्रुका सब छल है । इसीने सब मनुष्योंमें अहङ्कारकी दुर्गन्धि भरी है । इसीके फन्देमें सब बँध रहे हैं ।
नज़म - वारब यह देह क्या बला है । है झूठ और बरमला है ॥
जो रिश्तः रहते शिकत है । सब रंजको गंज पंज तन है ॥
जो लेवे क्रार पंजके धार । दीदार तो यार हो पदीदार ॥
है कर्जको फर्ज मर्दों जनमें । आदम न अदा हुआ अदनमें ॥
आफ़त है प्रसाफ़त यह नौ कोश । दोजख़ है किसी किसीको फिर दौस ॥
कोई बन्दः हुआ कोई मौला । मफलूक है कोई शुजाअ दौला ॥
राहत नहीं जीवकी जराहत । मुफ़लिस हुआ छोड़ वादशाहत ॥
हिर्स हैवान रुख़ रवाँ हो । यह खुमस ख़वीस दिले दवाँ हो ॥
दिलदार हिला मिला न दिलदार । को गौहर जोहरी खरीदार ॥
क्या जाने कोई भेद अन्दर । बन्दर है बदस्त दिल कलन्दर ॥
जेरीं व ज़बर खबर से मसरूर । महबूव से डूब के हुआ दूर ॥
गुफ़लत में गरकी गीते जन है । खुश हो कि मेरा कमाल फ़न है ॥
यह उजुव अजब अमक़ि दरिया । सद औज के मौज मय लहरिया ॥
खुद करदः से खुद ऊपर सितम है । जाने के मेरा यह जाम जम है ॥
बातिल को रास्त कर कहे जब । यह इल्म के जेल्ह है मुरकब ॥
भर जाम पिलादे मेरे साक़ी । फिर कोई हवस रहे न बाकी ॥
जा बैठे जो तेरे अनजुन में । सदहा गुल वे लाला जिस चमनमें ॥
हर सिम्त बहार है गुलो मुल । दिल दौरे जहाँ न आव कुल कुल ॥
जह पहुँचे न शेख कुत्बो काज़ी । दिल हलक्का के बीच सब है राज़ी ॥
मक़बूल होय हवस है दिल में । फिर आन फँसे है आबो गिल में ॥
पर बाल न हाल मन गरीबी । क्यों कर करे मेरी तबीबी ॥
तू बन्दः निवाज़ बन्दः परवर । सब औलिया अम्बिआय सरनर ॥
जा पहुँचे जो अपनेही वतन में । फिर आवे कभी न सो वतनमें ॥
जब तक लगे न वह यारका रंग । कर जंग वजहाद नफ़सके संग ॥
जान करदे निसार माल क्या माल । हक्क तेरा यही कभी बहर हाल ॥
दिल देश भदेश भेष दे छोड़ । सब लागसे बाग अपनी को मोड़ ॥
तब देख तमाशा सब जो अपना । हर कूनो मकान मिसल सपना ॥
धर्मकी खोज ।
जब यह जीव अपने स्वरूपको भूलकर भ्रममें पड़ा योगी, जड़म सेवड़ा आदिकके निकट गया, उनको गुरु मानकर उनसे उपदेश लेने लगा, तो उन्होंने कपट करके नानाप्रकारके कम्मेंमें लगाया, उन नानाप्रकारके महात्म सुनाये; जिससे इसके मनमें लोभ उत्पन्न हुआ बुद्धिने उनके वचनपर विश्वास दिलाया । निश्चय हो जानेसे अहङ्कार दृढ़ हो गया । इसको यह पक्षपात उत्पन्न हुआ कहने लगा मेरे तुल्य कोई नहीं मेरा मत सबसे उत्तम है, मेरी मुक्ति सबसे पहले होगी । इसी प्रकार ज्ञानी और ध्यानी घोखेमें पड़े बार बार जनमते और मरते रहते हैं,
साधु फकीरीकी हंसी सच्चे साधुओंके लुप्त होनेका कारण, संग्रह विश्वमित्र
गुरुआ लोगोंने जो मिथ्या विचार बतलाया उसको इस प्रकार दृढ़ कर सत्य मान लिया, उसपर ऐसा दृढ़ विश्वास किया कि, पारख पदको समझाया जाय तो कोई नहीं मानता । जैसे किसीने एक काँचके टुकड़ेको हीरा समझा। बुद्धिने निश्चय करा दिया कि, यह अमूल्य रत्न है इसी मिथ्या विश्वासमें आनन्द मानता रहा । यदि कोई अपनी मूर्खतासे पत्थरको रोटी समझले तो भूखके समय वह काम न आवेगी । जिस समय गुरुआ लोगोंने निकट गया तो उन्होंने नाना प्रकारकी मुद्रा आदि बतलाई, इसने उन्हें बड़े अनुरागसे धारणकर अभ्यास करने लगा । त्राटक करके दृष्टिको एक स्थानमें जमाकर देखने लगा । ऐसा परिश्रम किया कि, पलक न झपके । कुछ देर इस प्रकार देखनेसे पित्त ऊपरको चढ़ा नाना प्रकारके रङ्ग व चकचकाहट दीखने लगे, दृष्टिमें नाना प्रकारके रूप आने लगे । अब और भी अनुराग बढ़ा कि, रात बहुत परिश्रमसे अभ्यास करने लगा । पित्त भी शनैः शनैः बढ़ते बढ़ते यहाँ तक बढ़ा उसकी ऐसी गर्मी फैली कि, उस पर कचेतता प्रगट हुई । अपना आप भूलकर अचेत होकर गिर पड़ा । फिर जब चित्त शान्त हुआ चेत आया तो कहने लगा मैंने समाधि लगाई, गुरुजीकी बड़ी कृपा हुई कि, निर्गुण अलख ब्रह्मको लखा दिया, सहज समाधि उनमनीमें लगा दिया, जिससे सहजानन्दको पहुँचा आत्मा पर प्रमात्माकी एकता हुई यह यथार्थमें भ्रम है, केवल अपनीही कल्पना द्वारा पित्तमें विकार आनेसे अचेतता होगई थी । इसी प्रकारके धोखेमें बड़े बड़े योगी विद्वान् साधु आदिक फँसे हैं, पारख पदकी ओर ध्यान न देनेसे सत्य पदसे वञ्चित रहते हैं ।
जो स्त्री इस जीवकी झाईसे प्रगट हुई थी उसीके साथ यह पागल बना, उसीके संयोगसे एकसे अनेक हुआ, यह न समझा कि मैं जिसको ब्रह्म ठहराता हूँ वह केवल मेरी छाया है, सत्य नहीं भ्रम मात्र है ।
जो लोग विराट पुरुषको साधते हैं वह दूसरा कुछ भी नहीं केवल उसीकी छाया है अपनी ही छाया अपना गुरु बनकर अपनेको सिखलाती है । अपनीही छायाका सिखलाया हुआ सिद्ध बनता है । इसी प्रकार सारा संसार अपनी छायाकी पूजा करता है । इसीकी छाया इसके ऊपर ईश्वरी करती है, उसीका दास बनकर उसीका भजन करता है, भ्रमकी ही सेवा भक्ति है, भ्रमकी ही मुक्ति प्राप्त होती है । जीव क्या है ? इसका भ्रम क्या है ? ब्रह्म जीव और ईश्वर क्या है ? यह अपने भ्रमसे सब कुछ हो गया है यही एक है यही अनेक है इसीके भ्रमने इसको बन्धनमें डाला है । सब सिद्ध साधु भ्रममें पड़े हैं भ्रमसे छूटने की औषधी नहीं मिलती । केवल एक कल्पित नाम ठहरा लिया है ।
सांबर
यदि ब्रह्मको निर्विकल्प कहा जाय तो अन्तःकरणका गम नहीं, यदि सविकल्प कहा जाय तो चित्तका विषय है। यदि ज्योंका त्यों माना जाय तो बुद्धिका विषय है। द्वैत मनका विषय है। देहाभिमान अहङ्कारका विषय है। यदि आनन्द आदि कहो तो वायुका विषय है, रूप प्रकाश ठहरावे तो अग्निका विषय है। रस, प्रेम आदि जलका विषय है। गन्ध सर्वदेशी माने तो पृथिवीका विषय है यदि इन सबको ब्रह्म बतलावे तो यह सब तुच्छ हैं, इस कारण जब देह छूटेगी तब अवश्य गर्भको प्राप्त होगा। जहां मन बुद्धि और किसी इन्द्रियकी पहुँच नहीं वहां ब्रह्मकी किस प्रकार खोज हो? न कहीं ब्रह्म है, न कहीं ईश्वर है, यह सब जीवके संकल्प हैं, जीव सत्य है सब झूठ है। जैसे २ यह आगेको संकल्प करता गया उसी प्रकार भ्रम भी बढ़ता गया, जिससे भिन्न भिन्न निश्चय होते गये, जहां पर यह थक कर बैठ गया, आगे खोज करना बाकी न रहा, वहां ब्रह्मका संकल्प करके बैठ गया। उसीको ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करके अपने विचार विवेक और खोजको समाप्त कर दिया उसीको अन्त पद समझ बैठ, ऐसेही यह चौरासीमें पड़ा है।
तत्पदसे दो प्रकारका ज्ञान है और त्वं पद दो प्रकारका ज्ञान है अस्ति पद दो प्रकारका विज्ञान है। तत्-त्वं-और-अस्ति, यह तीनों पद भ्रम रूप हैं। इन तीनोंसे भिन्न चौथा पद पारख है। जिसके द्वारा इस जीवको अपना शुद्ध स्वरूप दृष्ट आता है वह उनसे अलग है सो पारख गुरु इसको उन तीनों पदोंके भ्रमको नष्ट कर देता है। जब तक यह जीव पारख गुरुको नहीं प्राप्त होता तब तक सात ज्ञान और सात अज्ञान भूमिकामें भटकता फिरता है।
अज्ञानकी सात भूमिका।
१ अशुचि जाग्रत, २ जाग्रत, ३ महा जाग्रत, ४ स्वप्न, ५ स्वप्न जाग्रत, ६ स्वप्न, ७ सुषुप्ति। ये सात अज्ञानकी भूमिकाके नाम हैं।
१ अशुचि जाग्रत भूमिका—उसे कहते हैं जिसमें जीव पूरा अज्ञानतामें फँसा होता है, जगतको सत्य समझता है शरीरके पोषण पालनको अपना कर्तव्य जानता है।
२ जाग्रत भूमिका—वह है जिसमें जीवको देहाभिमान, वर्णाभिमान, जात्याभिमान, विद्याभिमान तथा रूप और बलका विशेष अहंकार होता है।
३ महाजाग्रत भूमिका—में प्राप्त जीवको यह अहंकार होता है कि, लोक परलोकमें कुछ कर सकता हूँ, मुझमें अमुक प्रकारकी कला कौशल है गुणविद्यामें पूर्ण हूँ अमुकके ऊपर अधिकार धराता हूँ आदि।
पठित मूर्ख, हजरत ईसाकी वाणी
४ जाग्रत स्वप्न भूमिका—वह है जिसमें जीव ऐसा समझता है कि, जो कुछ मैं जानता बूझता हूँ वह सब सत्य है। जो कुछ दूसरे करते हैं वह सब असत्य हैं। मनुष्यको ऐसे समझना चाहिये, जैसे ज्वरकी अधिकतासे मदिराको जल समझता हो।
५ स्वप्न जाग्रतवाला जीव—जो स्वप्न देखता है उसे ज्योंका त्यों याद रखता है।
६ स्वप्न भूमिका—वह है जिसमें प्राप्त हुआ जीव देखे हुये स्वप्नको भूल जाता है।
७ सुषुप्ति—गाढ़ निद्राके समान अचेताको कहते हैं।
अज्ञानकी इन सात भूमिकासे अपनेको बचाना, उनके फन्देसे बाहर होना इनके बदले सात ज्ञानकी सात भूमिकाओंकी इच्छा और उन्हींके लिये प्रयत्न करना उचित है।
ज्ञानकी सात भूमिकाएँ।
१—शुभइच्छा, २—स्वविचारना, ३—समानता, ४—शिशिरान्ति, ५—असंशक्ति, ६—पदार्था भाविनी, ७—तुरिया ये सात ज्ञानभूमिकाएँ हैं।
१ शुभ इच्छा भूमिका—उसको कहते हैं जिसमें प्रवेश करनेसे शुभ कामना उत्पन्न होती हो अज्ञानताको दूर करनेकी इच्छा होती है, ज्ञान और मुक्ति प्राप्त करनेकी सच्ची अभिलाषा होती है, अपनी बीती हुई आयु और किये हुये अशुभ कामोंके ऊपर पश्चात्ताप होता है। कुसङ्गतिसे दूर भागता है शास्त्र विहित शुभ कर्मोंमें लग जाता है।
२ स्वविचारना भूमिका—मैं मनुष्य जब पहुँचता है उस समय यह सत्सङ्गति और शुभकर्मोंको खोजकर उनमें प्रविष्ट हो जाता है।
३ समानता अर्थात् तनुमानसा भूमिका—मैं पहुँचनेपर संसारसे वैराग्य हो जाता है, विषय वासनाको मिथ्या दुःखदाई समझकर उससे विरक्त हो जाता है। वैराग्य करके सब प्रकारके सुखोंको तुच्छ जान ईश्वरमें निमग्न हो जाता है।
५ असंशक्ति भूमिका—मैं पहुँचकर ईश्वरमें भी अधिक निमग्नता होती है।
६ पदार्थाभाविनी भूमिका—मैं पहुँचकर ऐसी दशा हो जाती है कि, बड़े परिश्रमसे दूसरे के जगानेसे आगता है नहीं तो ध्यानमें मग्न रहता है।
७ तुरिया भूमिका—इस भूमिका—मैं पहुँचनेपर दूसरोंके जगानेसे भी नहीं जागता, गुप्त प्रगट ब्रह्ममें लय हो जाता है।
स्वामी रामानन्द वचन, नानकवचन
इन सात ज्ञान और अज्ञान भूमिकाओंका बहुत विस्तृत वर्णन है, यहाँ नाम मात्रही लिखा गया है।
माया दो प्रकारकी है, एकका नाम विद्या और दूसरीका नाम अविद्या है। इन्हीं दोनोंमें सारा ब्रह्माण्ड फँसा हुआ है। विद्याकी दशामें जीव परम ऐश्वर्यको प्राप्त हो, अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति पालन और नाश किया करता है। अविद्यामें सारे जीव बन्धे हुए हैं। यही जीव ईश्वर है और यही जीव है। ज्ञानकी न्यूनता और अधिकताके कारण भिन्न भिन्न नाम हैं। उपरोक्त ज्ञानकी सात भूमिओंमें प्रथमकी तीन भूमिकाएं साधकोंकी हैं शेष चार भूमिकाएं जीवनमुक्तकी हैं। प्रथम तीन भूमिकाओं को जीवकी भूमिका भी कहते हैं इन सबमें भिन्न भन्न अवस्था प्राप्त होती हैं।
इन्हीं सात ज्ञान और अज्ञान की भूमिकाओंमें सब स्वामी सेवक बँधे हुये हैं। इनसे कोई बाहर नहीं है। यहीं तक अपरा विद्याकी पहुँच है।
हंस देहका विशेष वर्णन।
अद्यापि जीवके उन शरीरोंका वर्णन किया जो कि, सत्य स्वरूपसे पतित होनेपर प्राप्त होते हैं। सत्य स्वरूपसे पतित होनेपर उन्हीं छः देह नौकोश और पांच अहंकारोंमें जीवकी स्थिति होती है। ये सब देह और कोश आदि नाशमात्र भ्रममान हैं अब अविनाशी, स्थिर, सत्य सुखमय हंस देहका वर्णन सुनो। हंस देहमें पक्के पांच तत्व और तीन गुण होते हैं, कच्चे और पक्केकी समानता करके देखो उनको ऊपर ध्यान दो।
हंसदेहके पक्के तत्व।
१—धैर्य्य, २—दया, ३—शील, ४—विचार, ५—सत्य ये पांच पक्के तत्वोंकी पक्की देह थी, इन्हींसे हंस देह बनती है। अब इनका त्रिगुण सुनो। सत्य और विचारका गुण विवेक, शील और दयाका गुण गुरु भक्ति साधु भाव और धैर्य्यका गुण वैराग्य।
इन्हीं पक्के पांचतत्व और तीन गुणोंमें जीवका वासा था, अब इनकी पचीस प्रकृति सुनो।
धैर्य्यकी पांच प्रकृतियां—१—झूठका त्यागना, २—सत्यका ग्रहण करना, ३—संशय रहित होना, ४—अचल होना, ५—अहंकार नाश करना ये पांच हैं।
दयाकी पांच प्रकृतियां—१—अद्वोह, २—समता, ३—मैत्री ४—निर्भयता, ५—समर्दशिता ये दयाकी पांच प्रकृतियां हैं।
शीलकी पांच प्रकृतियां—१—क्षुधा निवारण, (तितिक्षा)—२—प्रिय
प्रह्लाद वचन, फिक्रिया सिद्धान्त, शिष्टका वचन विद्याभिमानियोंका आधार
वचन, ३—शान्त बुद्धि, ४—प्रत्यक्ष पारख ५—प्रत्यक्ष सुख ये शीलकी पांच प्रकृतियां हैं ।
विचारकी पांच प्रकृतियां—१—अस्ति नास्तिपदका निर्णय करना, २—यथार्थ ग्रहण करना, ३—व्यवहार शुद्ध रखना, ४—शुद्धभावना रखना ५—सच्चि तता (ज्ञान और विज्ञानकी प्राप्ति) करना ये हैं ।
सत्यकी पांच प्रकृतियां—१—निर्णय, २—निर्बन्ध, ३—प्रकाश, ४—स्थिरता, ५—क्षमा । इन्हीं पांचतत्त्व और तीन गुणों और पचीस प्रकृतियोंकी देह थी । इस शरीरमें यह ेवे परवाह और बन्ध रहित था । ने कोई इच्छा थी न विषयवासनाका बन्धन एव न पशु वृत्तिही थी, बरन इसका बड़ा प्रभाव और प्रकाश था । जब इसने अपने प्रकाशको देखा तो सोचने लगा कि, मेरे समान दूसरा कोई नहीं, मेरा रूप और गुण अनुपम हैं । ऐसा संकल्प होतेही इसको परम आनन्द प्राप्त हुआ, उस आनन्दमें यह अचेत हो गया, अपने आपकी कुछ भी सुधि नहीं रही । इसी अचेता अवस्थाका नाम ब्रह्म सच्चिदानन्द रख लिया । यह महान् सुषुप्तिकी अवस्था थी । जब यह ऐसी सुषुप्तिकी अवस्थामें आ अचेत हुआ तो इसके पक्के तत्व गुण और प्रकृति आदिक सब पलट गये । पक्कीसे कच्ची देह होगई ।
स्थूल देह ।
पाँच कच्चे तत्व तीन गुण और पचीस प्रकृति—धैर्यसे आकाश उत्पन्न हुआ, दयासे वायु निकल पड़ी, शीलसे अग्नि प्रगट हुई, विचारसे जलका प्रादुर्भाव हुआ, सत्यसे पृथिवी बन गई, पक्के तत्वसे बने हुये येही कच्चे तत्व हैं । इनके तीन गुण ये हैं—पृथिवी और जलसे सतो गुण हुआ, अग्नि और वायुसे रजोगुण हुआ, आकाशसे तमोगुण स्थित हुआ । उन्हीं पाँच तत्व और तीनों गुणोंका मेल होकर पचीस प्रकृतियाँ प्रगट हुईं ।
कच्चे तत्वकी पचीस प्रकृतियाँ—१ आकाशकी पाँच प्रकृति १ काम, २ क्रोध, ३ लोभ ४ मोह, और ५ भय ।
२—वायुकी पाँच प्रकृति—१ चलना, २ बोलना, ३ बल करना, ४ सकोचना और पसरणा ।
३—अग्नि तत्वकी प्रकृति—१ आलस्य, निद्रा, ३ भूख ४ तृषा और ५ जम्हुआई ।
४—जलकी पाँच प्रकृति—१ रक्त, २ मूत्र, ३ प्रसेब, ४ लार और ५ बिन्द (बीर्य) ।
बुल्लेशाह और शरई
५—पृथिवीकी पाँच प्रकृति—१ अस्थि, (हाड) २ मांस, ३ नाड़ी, ४ चर्म, (त्वचा) ५ रोम ।
इन्हीं तत्व गुण और प्रकृतियोंकी कच्ची देह बनी है इस कारण इसका देह हुआ । हंस देहसे उलटी यह स्थूल देह उत्पन्न हुई, इसी को मनुष्य नामक स्थूल देह कहने लगे इसके प्राप्त होतेही अहंकार उत्पन्न हुआ, इसने अपनेको सबका स्वामी समझा । सुषुप्तिसे उत्थित होतेही दृष्टि उठाकर देखनेसे अपनी छाया दीख पड़ी, वह स्त्रीके स्वरूपमें स्थित हुई । उसीका नाम इच्छा हुआ । यह कामनाओंसे भरी हुई है । यह जीव एकसे दो हुआ इसी कारण नाम ब्रह्म और माया हुआ । दोनोंके संयोगसे स्त्रीको गर्भ रहा उससे तीन पुत्र उत्पन्न हुये, ब्रह्म अन्तर्धान हुआ ।
स्थूल सृष्टि ।
इस जीवसे मन उत्पन्न हुआ, ज्योति मनसे हुई, ज्योतिसे तीनों गुण प्रगट हुए. रजोगुण ब्रह्मा, सतोगुण, विष्णु, तमोगुण शिव हुआ. इस प्रकार यह जीव पक्केसे कच्चा हुआ । पीछे चौरासी लाख योनिकी कल्पना की । आपही आप सब योनियोंमें प्रवेश कर रहा है, आपही जगत है आपही ईश्वर है । अज्ञानताके कारण अपने आपको नहीं जान सकता । अविद्याके भवचक्रक्रममें पड़कर अन्धकारमें बन्ध हो गया । अज्ञान हुआ, अब व्याकुल होकर विचार करने लगा कि, मेरा कर्त्ता दूसरा कोई है । भिन्न कर्त्ताके निश्चय करतेही मिलनेकी इच्छा बढ़ी । अब तो जप, योग, तप आदिक नाना प्रकारकी युक्तियाँ करने लगा पर सफलता नहीं हुई । कुछ तेदेख नहीं पड़ा, तो कहने लगा मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार है । वह बेचून बेचरा किसी प्रकार जाना नहीं जा सकता । उसी बेचून बेचराके वर्णनमें सर्व वेद, शास्त्र ग्रन्थ, किताब आदि बनाए । ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिको भी उसकी पहचान नहीं हुई । कभी कहता है निर्गुण, कभी कहता है सगुण ऐसे भ्रम और धोखेमें पड़ा । यह तो हिन्दुओंका सिद्धान्त हुआ ।
मुसलमानोंका सिद्धान्त सुनो अर्थात् नहीं खुदा, है खुदा, सब धोखे और भ्रमका कलमा पढ़ने लगे ।
इस प्रकारसे जगतसे ईश्वर, ईश्वरसे जगत्, ऐसे नाना सिद्धान्त बनने लगे । सब मनुष्य भ्रममें पड़कर अविद्याके अन्धकारमें भटक रहे हैं । किसीको कुछ भी नहीं सूझता न पता लगता है । इस जीवको कहीं शान्ति नहीं मिलती सब प्रकार दुःखही दुःख उठा रहा है ।
यदि किसी पर विश्वास करे तो उसका खण्डन हो जाता है, न विश्वास
मूतकाचार्योंके शिष्य, उपदेशके अयोग्य
करे तो नष्ट भ्रष्ट होता है, किसी प्रकार सुख नहीं मिलता । यह इस प्रकार आवागमनके रहटमें पड़ा कि, कभी ऊपर जाता तो कभी नीचेको पतित होता है, कभी तो ब्रह्म सच्चिदानन्द बन जाता है, कभी महान् दरिद्र नीच अवस्थाको प्राप्त होता है । किसी प्रकार शान्ति नहीं मिलती, न श्रेय पदको प्राप्त होता है । सदा बन्धनमें ही पड़ा रहता है ।
इसने सहस्रों युक्तियों की तथा करता जाता है, इस कारण इसने नवधा भक्ति, योग युक्ति, षट् दर्शन, छयानबे पाखण्ड आदि नाना प्रकारके मार्ग प्रगट किये, सहस्रों प्रकारके धर्म और मजहब स्थित किये । अनन्त सिद्ध, साधु, पीर, पैगम्बर, औलिया, अम्बिया बीत गये । किसीको अपने यथार्थ स्वरूपमें मिलनेकी राह न मिली । एक दूसरेसे कपट छल करके धोखेमें डाले देते हैं, स्वयं अन्धे बने हैं दूसरोंको मार्ग बतलाते हैं । अन्धे अन्धेको राह बतावें तो दोनों मुंहके बल गिरे । एक राह भूला हुआ पुरुष दूसरेका पथदर्शक बने तो उसकी जैसी गति होगी, वैसेही नाना प्रकारके मतवादियोंकी है । यथार्थमें किसीको मालूम नहीं होता कि, सत्य और असत्य क्या है ?
प्रपंचसे छूटनेके साधन ।
जो कोई सन्त गुरुकी सेवा करे, जिसपर सत्यगुरुकी दया हो उसी पर सत्य परमात्माकी भी कृपा होती है, जिससे पारख गुरुकी प्राप्ति होती है, पारख गुरुके प्राप्त होतेही सब भ्रम और धोखे नष्ट होकर सत्य पदकी प्राप्ति हो जाती है, अपने सत्य स्वरूपको पा लेता है और जहांसे पतित हुआ था उसी स्थान पर फिर पहुँच जाता है ।
पक्के तत्त्वकी प्राप्ति—जब यह जीव पारख पदपर स्थित हो जाता है तो इसके एक अनेकका भ्रम नष्ट हो जाता है । सब दौड़ धूप छूट जाती है, पारखसे ही मन और बुद्धि स्थिर और शुद्ध होते हैं । इसका आवागमन दूर होता है । पक्के तत्त्वकी प्राप्ति होती है । कच्चे तत्त्वका सम्बन्ध छूटता है, पारख गुरुसे मिल कर गुरु रूप हो जानेमें कुछ भी सन्देह नहीं रहता ।
हंस कबीर और दूसरोंमें भेद—हंसदेह तथा पक्के और कच्चे तत्व पर ध्यान देकर विचार करनेसे प्रगट होगा कि, हंस कबीर और दूसरोंमें क्या भेद है ? हंस कबीर सब विषय वासनाओंसे मुक्त होते हैं । दूसरे विषयके बन्धनसे बाहर नहीं हो सकते, सहस्रों युक्तियों किया करते हैं पर बन्धनमेंही पड़े रहते हैं । चौरासीके जीवको सत्यमार्ग नहीं मिलता, अब अचेत हैं । लोगोंका सत्यमार्ग नहीं ऋषि मुनियोंको यह बात स्वप्नमें भी प्राप्त नहीं होती कि, यथार्थ क्या है ?
प्रामाणिकता—यह बचन सत्यगुरु सत्य कबीरका ज्यों का त्यों अनुवाद किया है। जिस किसीको परमात्माने दूरदर्शिता शुद्ध और सूक्ष्म विचार तथा तीव्र बुद्धि प्रदान की हो वही विचारे और समझेगा। जब खूब समझ जायगा तो उसे ज्ञान हो जायगा कि, स्वसम्बेदको और किताबों पर किस प्रकार श्रेष्ठता है? इसमें कौसी सूक्ष्म और अगम्य बातें लिखी हैं, जिससे सारा संसार अचेत है जिसके पथदर्शक था उपदेशक केवल हंस कबीरही हैं।
कथन—कबीर साहब कहते हैं कि, जीव अपने सत्य स्वरूपसे गिरा उसकी दशा बाल, मूक, जड़ और पिशाचके समान हुई। यह पतित होकर इन अवस्थाओंमें पड़ा अपने सत्य स्वरूपको एकदम भूल गया। इस बातकी तनिक भी सुधि न रही कि, मैं पहले क्या था और अब क्या हो गया हूँ।
समस्त संसार और उसके कार्य—जब यह इस प्रकारसे उन्मत्त हुआ एकसे अनेक हो गया, नाना प्रकारके सङ्कल्प विकल्प होने लगे, नानारूप दृश्य आने लगे, जिस प्रकार पागलोंको भ्रम करके नाना प्रकारके स्वरूप दिखाई देते हैं वह उनसे लड़ता झगड़ता और बकबाद किया करता है। एकको सत्य दूसरेको असत्य ठहराता है, एकको छोड़ता है दूसरेको ग्रहण करता है इस प्रकार अनेकोंको ग्रहण करता और छोड़ता है, स्थिर नहीं होता। अपने जाननेमें पागल होशमें अच्छाही करता है। पर सचेत और बुद्धिमान् पुरुषोंके जाननेमें वही पागल होता है। ज्ञान सुषुप्ति और अज्ञान सुषुप्ति दोनों उन्मत्त अवस्थाही हैं, इसी प्रकार तत्त्व-मसिके तीनों पद झूठे हैं, जो कुछ यह कहता और सुनता है सब उसी प्रकार निर्मूल होते हैं कोई ठीक नहीं। यावत् मतमतान्तर हैं सब ऐसेही भ्रमके ऊपर खड़े हैं। जिस अवस्थामें यह संसारही अचेततामें रचा गया है तो उसके कर्म और वाणी बचन सब वैसेही भ्रम और अज्ञान संयुक्त होंगे, उनका माननेवाला बुद्धिमान् विद्वान् अथवा सचेत नहीं समझा जा सकता। इस कारण यह संसार अचेत और अज्ञान है, इसके सारे कार्य अचेतताके ही हैं।
निर्गुण सगुण भ्रम—यह जितना योग, युक्तियाँ, यज्ञ, जप, तप, भजन, भक्ति आदिक करता है सबका यही परिणाम है कि, ब्रह्म सच्चिदानन्दके पदको पहुँच जावे पर हंस देह नहीं पा सकता, इसकी समझमें यह बात नहीं आती इस संसारमें जितने सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर हुये हैं और होंगे किसीमें यह सामर्थ्य नहीं कि, वह यथार्थ पदको बतला सके; सबके सब सगुण निर्गुणमें पड़े हुये हैं, निर्गुण और सगुण सब भ्रम और धोखा है सब इसी निर्गुण और सगुणके बन्धनमें रहा करते हैं, इससे बाहर निकालनेवाला कोई सत्य पथ दर्शक नहीं दीखता।
परमात्माके तुल्य, साधुओंके दर्शनका फल
छाया वासना—यह अपने जानते तो वासनाको त्याग देता है, मनको मार लेता है पर यथार्थमें न तो इसका मन मरता है न वासनाही नष्ट होती है, वासना सर्वदा इसके सङ्ग बनी रहती है । सब ओरसे ज्ञानका सूर्य मध्याह्नको पहुँचता है तो इसकी वासना जो यथार्थमें इसकी छाया है, इसके शरीरमें गुप्त हो जाती है, बाहर नहीं दिखाई देती पर सर्वतः इससे अलग नहीं होती । ज्ञानरूपी सूर्य नीचेको ढलने लगता है तो वासनारूपी छाया फिर प्रगट होने लगती है यह उस छायरूपी स्त्रीसे प्रेम करने लगता है सदैव उसको अपने हृदयमें लगा रखता है, इस कारण वह इससे दूर नहीं होती ।
उसका साथ—यद्यपि यह अपनी तपस्या, भजन भक्ति, और ज्ञानसे पूर्णताको पहुँच जाता है, बहुत ऊँचे पदको प्राप्त करता है तो भी वासना इसको खींच लेती है पूर्वकी अवस्थामें डाल देती है, इसी कारण यह तत्त्वभसिके तीनों पदमें फँस गया है, बाहर निकलनेकी राह नहीं पाता । वासना ही माया है, यही उसकी छाया है यही इसकी प्यारी स्त्री है, यही इसको पकड़ कर नचाया करती है । उसका इससे छूटना कठिन है, इसको पक्के तत्वका घर नहीं मिलता, सदा कच्चे तत्वमें बंधा रहता है ।
कबीरसाहबका शब्द ।
कहु वैकुण्ठ कहाँ रे भाई ।
कितना ऊँचा कितना नीचा केती है चौड़ाई ।
अटकल पञ्चो भरमत डोलें कौन महलको जाही ॥
जिस साहबने किया पसारा ताको चेतत नाहीं ।
करत फिरे सगरी बद फेली चारों गई भुलाई ॥
कोइ कोइ पहुँचे ब्रह्मलोकको धरि माया ले आई ।
आन पड़े यम कालके फन्दे फिरि फिरिगोता खाई ॥
इस प्रकार यह जीव दुःखी और बिकल हुआ इसको कुछ सूझता नहीं कि क्या उपाय करें ?
कर्म उपासना भ्रम है—यह अपनीही भूलसे अपने स्वरूपसे भ्रष्ट हुआ स्वयं चौरासी लाख योनिकी कल्पना की आपही प्रत्येक योनियोंमें मारा मारा फिरता है । समस्त संसारमें आपही व्यापक हो रहा है अपने भूलसे आपको नहीं पहचानता । इसको कितनाही सिखलाया जावे नहीं सीखता, अपने हठको नहीं छोड़ता मन इसको जिधर भटकाता है उधरही ठोकर खाता फिरता है, आपही सब कौतुक कर रहा है, अपनेही कौतुकको आप नहीं जानता । कर्म उपासना,
साधुओंके भोजन देनेका फल
योग और ज्ञान असत्य हैं उसी प्रकार अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष निर्मूल और जल तरङ्गवत् हैं।
गजल ।
भूल मत यार यह शराब सुरआब । पिये हुयेमस्त दिल किया है कबाब ॥
झूठ को सच जान गलतीसे । यह खयालात सारे नकश बर आब ॥
पञ्च हंकार है तमाशए दिल । होते और जाते रहते मिसल हबाब ॥
वार सब रह खबर न पार कहै । कौन जानै सो बरतरीन जनाब ॥
लौलियां ह्विस जो जिस्मानी । कर दिया सारे शहरको खराब ॥
और इन्सान किस हकीकत में । औलिया अम्बिया अल्लाह ए हबाब ॥
अस्ल इसरार जाने आजिज कौन । दिल जो चाहे सो राग रङ्गो रबाब ॥
बटमार—जितने जीवन्मुक्त कहलाये सात ज्ञानभूमिकाके अनुरागी हुये किसीका छुटकारा न हुआ । इस कारण यह है कि, उन लोगोंने मनुष्यके यथार्थ धर्म न जाने धर्मके स्वरूप न पहचाने सबके सब एक दूसरेकी चाल पर चले आते हैं, सत्य बातको कोई स्वीकार नहीं करता । यदि कोई सत्यकी ओर झुके तो दूसरे लोग उसको भटका कर फिर अंधेरेमें डाल देते हैं इसको सत्यकी चाल पर नहीं चलने देते । सचार्ई रूपी मार्गमें अनेक बटमार लुटेरे हैं इस कारण सबही डूब रहे हैं ।
चार प्रकारके आनन्द ।
१ अज्ञानानन्द—जो सांसारिक रागद्वेषमें प्रवृत्त हो परलोक तथा ईश्वरी भयसे अचेत रहे, मदिरापान करता हो, मांस खाता और व्यभिचार तथा विषय-भोगमें फस रहा हो देहको सच जानकर उसीके शृंगारमें लगा हुआ हो, सदा स्वाद और विषय लम्पटताका अभिलाषी रहे ।
२ ज्ञानानन्दका—स्वरूप है कि, स्थूल सूक्ष्म और कारण—जो तीनों देह हैं इनके स्वरूप और तीनों अवस्थाको जानें, पांच तत्वके पञ्जीकरण को जानें, चारों अन्तःकरणका स्वरूप जानें, मायाकी उपाधियोंको त्याग करें, समझें कि, सब मायासे हैं, चेतन ज्ञानके सत्यसारमें आनन्द रहे अपने स्वरूप आत्माको श्रेष्ठ मानता रहे उसीमें अहम्भाव (अर्थात् वह मैं ही हूँ) भावना रख वारम्बार अभ्यास करें ।
३ विज्ञानानन्द—अवस्थामें क्रिया कर्ता और कर्म कुछ शेष नहीं रहता आत्मा स्वयम् प्रकाश विज्ञानानन्दमें मग्न रहता है और यह विज्ञान हंस सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।
४ परमानन्द—वह है कि, सुरतीको सत शब्दमें लीनकर देवै सत लोकमें प्रविष्ट हो । यह पदवी सबसे उत्कृष्ट है । स्वसम्बेद इसीकी प्रशंसा करता है । इससे बढ़कर कोई पदवी नहीं है इस आनन्दको पानेपर इसके आगे सब आनन्द तुच्छ हैं । उक्त तीन पदवीमें जीवमुक्ति कहलाती हैं असत्य हैं । यह परमानन्द पद सत्य है ।
तत्त्वमसि इत्यादिका विशद वर्णन ।
यह जीव अपने यथार्थ स्वरूपको भूलकर झोंई को साई कहने लगा, अन्वेषण करते करते थक गया, भी चक्करमें पड़ा, योगी, जड़म सेवड़ा आदिके पास गया, जीव ईश्वरका तत्व पूछने लगा. उन्होंने इसे कर्म उपासना ज्ञान और साधनोंमें लगाया, नानाप्रकारके माहात्म्य बुनाये । चित्त चला बुद्धिने निश्चय करलिया, अहङ्कार उठा इस अहङ्कारकी गांठ पड़ी तो इसमें ऐसा विचार हुआ कि, हम सबसे पहलेही तरेंगे । इस प्रकार ज्ञानी और अज्ञानी सब धोखेमें पड़कर आवागमनमें प्रवृत्त हुये हैं ।
गुरुओंने जो झूठे विचार बतलाये सब मनुष्योंने उन्हींको सच करके मान लिया । उन्हीपर ऐसा निश्चय किया कि, कोई पारख पदको भी समझावें तो भी कोई नहीं मानता । जहाँ मन बुद्धिकी पहुँच नहीं वहाँ ब्रह्मका खोज क्यों कर होगा ? न कहीं, ब्रह्म न कहीं ईश्वर, न अल्लाह न खुदा न राम न रहीम, यह सब जीवके संकल्प मात्र हैं । एक यह जीव सत्य है, सब झूठ हैं, जहाँतक यह दौड़ता गया वहाँतक इसी प्रकार मानता गया । जहाँ पर यह थककर बैठ गया, वहाँ परब्रह्मका स्वरूप समझ लिया । जिसको इसने ब्रह्मका स्वरूप निश्चय कर लिया बोही इसका भ्रम है । इसका भ्रमही ब्रह्म ठहर गया । इस प्रकार यह भुलाकर चौरासीके बन्धनमें पड़ा तत्त्वमसिके तीन पदोंमें जकड़ा गया ।
(१) त्वम् पदसे दो प्रकारके अज्ञानका कथन ।
इस त्वं पदमें सबविषयी बंधे हुये हैं, इसको विशेष अपरोक्ष अज्ञान कहते हैं । जो खाना पीना स्त्री प्रसङ्ग करना, भोगविलास पसन्द करता है, अपने जात्याभिमानमें रहता है, वेद शास्त्र और गुरुको नहीं मानता, बुद्धिमानों और ज्ञानियोंकी निन्दा करता है, साधुओंका ठठुा करता है. उनसे कहता कि, यह अभागे हैं उत्तम सांसारिक सुखोंको छोड़कर धक्के खाते और दुःख उठाते फिरते हैं । मृगनैनीके सुखका आनन्द उनके भाग्यमें नहीं है । मुक्ति कोई पदार्थ नहीं केवल मनकी भ्रममात्र कल्पना है । जब मृत्यु होती है तभी मोक्ष हो जाती है, जबतक शरीर है तभीतक सब कुछ है, पीछे कुछ भी नहीं रहता. जिस प्रकार वृक्षसे पत्ता गिर
जाता है वह फिर वृक्षमें नहीं लगता इसी प्रकार संसाररूप वृक्षमें शरीररूप सब पत्ते लगे हैं। शरीर गिरा तो फिर कुछ शेष नहीं रहता। इस कारण शरीरको दुख देना महान् मूर्खता है। इस अपरोक्ष अज्ञानके दो प्रकार हैं—एक अपनी इच्छासे और दूसरा पर इच्छासे। जो अपनी अज्ञानतासे हो उसे विशेष अपरोक्ष-अज्ञान कहते हैं। जो दूसरोंकी इच्छासे अथवा दूसरोंके बचन पुस्तक आदियोंके सुनने और पढ़नेसे दृढ़ हो उसे समान अपरोक्ष अज्ञान कहते हैं।
दूसरेका नाम परोक्ष अज्ञान है, इसको समानाधिकरण बोलते हैं। जो इस अज्ञानमें होता है वह ईश्वरको अपनेसे भिन्न जानकर नाना प्रकारके साधन और तप आदिक करता है, इसके भी दो प्रकार हैं, एक सांसारिक, दूसरा पारलौकिक पारलौकिक। प्रथममें—सांसारिक कामनाओंकी पूर्णताके लिये देवताओंकी पूजा और उपासना भक्ति करते हैं। मनमें यह आशा रखते हैं कि, स्त्री, पुत्र, लक्ष्मी मान बड़ाई आदि प्राप्त हो। दूसरा वह है कि, जो अपने उद्धारके लिये नानाप्रकारके यम नियम आदिको धारण करते हैं। मनमें आशा रखते हैं कि, मेरी मुक्ति हो जावे। यह दूसरे प्रकारका साधन करनेवाला पुरुष बड़ा भाग्यवान् है इसीमें सब साधुलोग लगे हैं। नानाप्रकारके संयमों और तपस्याओंमें निमग्न हो रहे हैं। त्वंपदमें सब आज्ञानी लोग फँसे हैं इस अज्ञानका कुछ पारावार नहीं, अनन्त हो रहा है। कर्म उपासना, योग, ज्ञान आदिक जो कुछ तीन लोकमें तो रहा है वो सब लौकिक पारलौकिक विचार अज्ञानकी दशामें है। इसी अज्ञानमें सब पड़े हुए डुब डुब कर रहे हैं।
तत्पदसे दो प्रकारके ज्ञानका कथन।
तत्पदसे दो प्रकारका ज्ञान समान और विशेष है। जो उपाधि और ऋद्धि सिद्धि सहित हो। जिसको विशेष ज्ञान होता है, उसीको ईश्वर कहते हैं। जिसको समान ज्ञान होता है वह ज्ञानी कहलाता है, वह अपने सब गुण दोषोंको जानकर दूसरोंके भी सुख दुःखको जानता है, सब बातका विवेक रखता है। तीनों अवस्थाएँ और सब विषय वासनाके कर्तव्योंको मिथ्या समझता है, सारे संसारको स्वप्नके समान नाममात्रका जानता है, सारे संसारको स्वप्न और सङ्कल्पके समान निश्चित करता है, अपने आपको सत्य और शेष समझता है, इस ज्ञानका नाम परोक्ष ज्ञान है। यह भी दो प्रकारका है। एक तो यह कि, जिसमें सब प्रकारकी शक्ति ऋद्धि सिद्धि आदि साथ हो; जिसमें ईश्वरके छः ऐश्वर्य हों दूसरे ज्ञानका नाम समान ज्ञान है, इस ज्ञानवाला सब प्रकारके ऐश्वर्यको तुच्छ मिथ्या और दुखदाई एवं उपाधिमात्र समझता है। उसका निश्चय होता है कि,
तिमिर लिंगको रोटीका फल, शास्त्र जैन साहित्यका दृष्टान्त
मैं त्रिगुणसे परे हूँ, मुझे कोई भी नहीं जान सकता, मैं सर्वका साक्षी द्रष्टा हूँ । यह परोक्ष ज्ञानका वर्णन हुआ ।
अब अपरोक्षका वर्णन सुनो । अपने शरीरके अन्तर बाहरके दोषोंको भली प्रकार जानता है इसी प्रकार दूसरोंके शरीरकी उपाधिको भी जानता है, तीनों अवस्थायोंके दुःख सुखसे भली प्रकार विज्ञ होकर जाग्रत स्वप्न-सुषुप्तिकी सब सुधि रखता है । इन्द्रियोंके कर्म्मोंसे भली प्रकार विज्ञ होता है सारे संसारको नाशमान् और अपनेको अविनाशी जानता है, अपने आपको सब शक्तिमान् समझता है, सब प्रकारकी सामर्थ्य रखता है, होनीको अनहोनी और अनहोनीको होनी कर देखलाता है । इस प्रकार षट् ऐश्वर्य जिसमें हो वह जगत्का ईश्वर कहलाता है, सब प्रकारकी ऋद्धि सिद्धि उसके आधीन होती है, सृष्टिकर्ता करके पूजा जाता है । यह प्रथम अपरोक्ष ज्ञान कहलाता है ।
अब दूसरे अपरोक्ष ज्ञानका वर्णन करता हूँ—जिसको तीनों कालका ज्ञान हो, जिसकी दृष्टिसे तीनों काल उठ गये हों, जिसकी दृष्टिसे सर्व त्रिकुटी नष्ट होगई हो, जिसका कुछ भी शेष न हो, मैं सत्य हूँ मुझसे अतिरिक्त सब असत्य है, अर्थात् तीन कालमें आत्मभिन्न कुछ हुआही नहीं । ऐसे ज्ञानीको शिव कहते हैं ।
असिपदसे दो प्रकारके विज्ञानका कथन ।
जो कोई जान बूझकर जड़ अवस्थाको धारण करले और ऐसा बन जावे जैसे मछप मतवाला बनजाता है, एक अनेककी सुध नहीं रहती है, परम आनन्दमें निमग्न होजाता है । इसमेंभी दो प्रकार होता है—एक तो असत्यविज्ञानी जो बनावटसे ऐसी दशाको धारण कर लेता है अर्थात् मनमें द्वैतका लेश रहता है परंतु हठसे अथवा बनावटसे दम्भ करके ऊपरसे बाल मूक पिशाच जड़की अवस्था दिखलाता है । सत्य विज्ञान धार्मिक पुरुष वह है जिसकी दृष्टिमें द्वैतका लेश भी न हो आपहीको जगत्, आपहीको ब्रह्म, आपही को कर्ता, आपहीको कर्म्म, आप हीको द्रष्टा, आपहीको दर्शन, आपहीको दृश्य, जो कुछ बोलता और सुनता है सो आपही है, आपही डोलता है आपही डोलाता है अपनीही लीला सब प्रगट है । दूसरा कोई दृष्टि नहीं आता है जिसकी दृष्टिमें ऐसा हो उसे सत्य विज्ञानी कहते हैं । यही तत्वमसिके तीनों पदका संक्षेप विवरण है ।
पारखपद ।
अब स्वसम्बेदके अनुसार पारख पदका वर्णन करता हूँ — तत्वमसिके तीनों पद भ्रम और मिथ्या हैं । उनमें अन्धकार रहता है जिसके कारण अपने
स्वरूपकी सूक्ष्मताको नहीं जान सकते। तत्वमसिके तीनों पदोंके ऊपर पारखपद है। वही सत्यपद है, उसीसे जीवोंकी मुक्ति होती है। जो कोई पारख पदको प्राप्त कर लेता है वह पारखी कहलाता है। पारखी गुरु सब धर्म और धोखेको नष्ट कर देता है। एक, अनन्त, बाहर, भीतर, पिण्ड, ब्रह्माण्ड सबके भेद कसर खोटको भिन्न २ करके परखा देता है। पारख पदको प्राप्त हुआ पुरुष फिर कभी उससे पतित नहीं होता। तत्वमसिके तीनों पदको इस जीवने मानकर निश्चय कर रखा है इस कारण ये सत्य दीखते हैं, नहीं तो यथार्थमें तीनों पद निर्मूल और भ्रम मात्र हैं क्योंकि जो कुछ इसने अपने मनसे मान लिया निश्चय कर लिया वो सब भ्रम और धोखा है यह मन आशा तृष्णामें फँसाकर भव सागरमें डुबाने-बाला है, इसके उपदेशसे किस प्रकार तर सकता है? इससे तरनेकी आशा रखना मृगतृष्णाके जलसे प्यास बुझानेके समान है। पारख गुरु हंसपद प्राप्त होता है। तत्वमसिके अभिमानी शुद्ध स्वरूपको नहीं पा सकते, सब प्रकारसे अहङ्कारको त्याग करही पारख गुरुसे सत्य स्वरूप प्राप्त होता है।
जन्म मरणकी सात शाखायें।
जीव अपने सत्यस्वरूपसे पतित होकर विरह और प्रेममें फँसकर अपने यथार्थ स्वरूपको विस्मरण कर देता है। फिर इधर उधर दूँढने लगता है कुछ आधार नहीं पाता तो थककर कहने लगता है कि, मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार है बेचून बेचरा है। इस प्रकार आदिमें जब जीवोंने नानाप्रकारकी कल्पना और निश्चय करके कुछ प्राप्त नहीं किया तो दुखीके दुखी रहे, शिव ब्रह्मा और सनकादिक ऋषियोंने नाना प्रकारकी वाणी बनाई सब जीवोंको विरह लगाया सब जीवोंको वाणीका विष चढ़ गया। जब उसमें अचेत हुए तब आशा और भय अर्थात् रौचक और भयानकमें नाना प्रकारकी आशा करके फँसे उसीको जन्म मृत्युका बीज कहते हैं। उसी बीजसे सात शाखायें उत्पन्न हुईं।
ॐ श्रीं रं सौं ऐं ह्रीं क्लीं।
अ इ उ ए व ह म
आशा तृष्णासे ये सातबीज उत्पन्न हुये, इन बीजोंमेंसे प्रत्येककी भिन्न २ सात शाखायें हुईं। १ कर्म, २ उपासना, ३ योग, ४ ज्ञान, ५ उत्पत्ति, ६ स्थिति और ७ नाश। इन सातोंमेंसे प्रत्येककी सात शाखायें हुईं, जिनका विस्तार बहुत है पर यहाँ संक्षेपसे लिखता हूँ।
१ कर्मकी सात शाखायें—अ-अर्थात् कर्मकी नाना प्रकारकी रीतियाँ हैं— १ यजन, २ याजन, ३ अध्ययन, ४ अध्यापन, ५ दान, ६ प्रतिग्रह, ७ मैथुन।
यजन—इसलोककी, याजन—पर लोककी, अध्ययन—विद्याभ्यास करना, अध्यापन—अभ्यास कराना, दान देना, प्रतिग्रह (संग्रह करना—अर्थात् दान लेना) और मैथुन कर्मोंकी यही सात शाखायें हैं ।
२ उपासनाकी सात शाखायें—इ—अर्थात् श्री बीज—१ शिव, २ विष्णु, ३ गणपति, ४ सूर्य, ५ शक्ति ६ राम, ७ कृष्ण ये शाखायें हैं, इनके सात करोड़ महामंत्र हैं । जारण, मारण, वशीकरण, उन्मत्तता, आकर्षण स्तम्भन मोहन येही फल हैं ।
३ योगकी सात शाखायें—इसका बीज रं है, १ हठयोग, २ कुण्डलिनी योग, ३ लम्बिका योग, ४ तारक योग, ५ लय योग, ६ अमनस्क योग, ७ साङ्ख्य योगये शाखायें हैं । समाधि फूल और सिद्धि फल है ।
४ ज्ञानकी सात शाखायें—सोहं बीजका ज्ञान अंकुर है उसकी सात शाखायें हैं—२ शुभइच्छा, २-स्वविचार, ३-तनुमानसा, ४ सत्त्वापत्ति, ५ असंशक्ति, ६-पदार्थाभाविनी, ७ तुरिया । परोक्ष ज्ञान फूल है । अपरोक्ष ज्ञान फल है ।
५ उत्पत्तिकी सात शाखायें—ऐं बीज है, उत्पत्ति अङ्कुर है, उसकी सात शाखा हैं—१ शब्द, २ स्पर्श, ३ रूप, ४ रस, ५ गन्ध, ६ इच्छा और ७ वासना ।
शब्द—बादलके गरजनसे और नाना प्रकारके शब्दोंसे कीड़े, मकोड़े और मँढक, जोंक आदि उत्पन्न होते हैं ।
(२) स्पर्श—मैथुनसे जो जीव उत्पन्न होते हैं ।
(३) रूप—अनल पक्षी आदिक बहुतसे जीवधारी केवल दृष्टिसे उत्पन्न होते हैं, वे सब रूप सृष्टि कहलाते हैं ।
(४) रस—इससे समस्त जलके जीवोंकी उत्पत्ति है, वृक्षोंके फलके कीड़ोंकी उत्पत्ति भी इससे ही होती है ।
(५) गन्ध—इससे उषमज योनिकी उत्पत्ति होती है ।
(६) इच्छा सिद्धि योनि है—योगेश्वर लोग अपनी इच्छासे चाहें जैसा स्वरूप धारण करलें जहाँ चाहें चले जाय, एकका अनेक स्वरूप बना लें, लघु दीर्घ आदिक हो जावें, इसीको सिद्धि योनि कहते हैं ।
(७) वासना—वासनासे देवता भूत प्रेतादिककी देह बनती है, यही सात प्रकारकी उत्पत्ति है । स्त्री फूल है । पुरुष फल है ।
दूसरा दृष्टान्त
६ स्थितिकी सात शाखायें—(ह्रीं) अथवा (म) स्थितिका बीज है। १ अन्न, २ पानी, ३ घास आदि, ४ मिट्ठी, ५ पत्ती, ६ फूल, फल आदि।
७ नाशकी सात शाखायें—क्लीं—अथवा हूँ—यह नाशका बीज है, इनसे सात शायायें निकली हैं। वह ये हैं—१ पृथिवी, २ जल, ३ वायु, ४ अग्नि, ५ पग, ६ हाथ, दांत। इसके अतिरिक्त नाशके लिये सहस्रों प्रकारके हथियार बने हैं, सो सब इन्हींके अन्तर्गत हैं।
जीवका भ्रम।
जीवने अपने सत्यरूपसे गिरकर इन्हीं सात शाखाओंमें बासा लिया। इन्हींके वशमें पड़ा हुआ बारम्बार जन्म मृत्युको प्राप्त होता है, कहीं सुख नहीं मिलता। यद्यपि यह बहुत युक्तियाँ करता है पर इसके छूटनेकी आशा नहीं होती, जिस गुरु अथवा आचार्यके निकट जाता है, वेही अपने स्वार्थ और मान बड़ाईके वश होकर नाना प्रकारकी रीति रसम और पाखण्डोंमें फँसाकर अपने आधीन करनेकी इच्छा करते हैं पर अज्ञानियोंको कुछ भी सुधि नहीं होती कि, मुक्ति किसे कहते हैं? और बन्धन किसको है?
भवसागरमें जितने लोग अपनेको ज्ञानी और ध्यानी समझते हैं, जीवन्मुक्त मान रहे हैं, विदेह मुक्तिकी आशा रखते हैं वे सब मिथ्या भ्रममें पड़े हैं। वे लोग जिनको जीवन्मुक्त कहते हैं वे कर्मोंके पाशमें बँधे बारम्बार भगवत्सागरमें फेरा खाया करते हैं। यदि एक दरिद्रीका नाम राजा रख दिया जावे तो क्या वह इससे यह राजा हो सकता है? उसकी दरिद्रता नष्ट हो सकती है।? कदापि नहीं। वह नाममात्रको राजा कहलाता है, यथार्थमें नहीं कहला सकता। इसी-प्रकार वेदने जिनको जीवन्मुक्त बतलाया है वे सब जीवन्बन्ध हैं, जीवन्मुक्त कोई नहीं। वे सब कर्मके रहटमें पड़े हुये हैं; जैसे रहटमें बरतन भरके नीचेसे ऊपरको आता है ऊपर आके फिर नीचेको जाता है, इसी प्रकार यह जीव भी कर्मोंसे ईश्वर पदको प्राप्त करता है, नीचे पड़के नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकता है। इन सात शाखाओंमें पड़ा हुआ पुरुष छूटनेका मार्ग भी नहीं पाता।
संसारके जीवधारी इन्हीं सप्त शाखाओंमें पड़े हुये बारम्बार आवागमन करते हैं। यही कालपुरुषका पंजा है जिसमें पड़े हुये जीवका छूटना दुस्तर है।
सर्व मत मतान्तरको जो ऋषि मुनि जीवन मुक्ति और विदेह मुक्तिकी कथा किया करते हैं। उनकी जीवन मुक्ति हुमा पक्षीके समान है। जिसको न किसीने कभी देखा, न उनका निवास स्थान ही जानते हैं, जो कि, जाकर देख लें, केवल लोगोंकी बनावट और कल्पनाकी ही बातें हैं।