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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

खण्ड १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४९ दशम खण्ड जलकी ब्रह्मरूपमें उपासना जल ही अन्नकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। इसीसे जब सुवृष्टि जल ही हैं। अतः तुम जलकी उपासना करो। वह जो कि नहीं होती तो प्राण [ इसलिये ] दुःखी हो जाते हैं कि अन्न जलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, सम्पूर्ण थोड़ा होगा और जब सुवृष्टि होती है तो यह सोचकर कि कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और तृप्तिमान् होता है। खूब अन्न होगा, प्राण प्रसन्न हो जाते हैं। यह जो पृथ्वी है जहाँतक जलकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती मूर्तिमान् जल ही है तथा जो अन्तरिक्ष, जो द्युलोक, जो पर्वत, है, जो कि जलकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। जो देव-मनुष्य, जो पशु और पक्षी तथा जो तृण, वनस्पति, [ नारद-] 'भगवन् ! क्या जलसे भी श्रेष्ठ कुछ है ?' श्वापद और कीट-पतंग-पिपीलिकापर्यन्त प्राणी हैं वे भी मूर्तिमान् [ सनत्कुमार-] 'जलसे श्रेष्ठ भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ एकादश खण्ड तेजकी ब्रह्मरूपमें उपासना तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है। वह यह तेज जिस ही पहले अपनेको प्रदर्शित कर फिर जलको उत्पन्न करता समय वायुको निश्चल कर आकाशको सब ओरसे तप्त करता है। अतः तेजकी उपासना करो। वह जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है उस समय लोग कहते हैं- 'गर्मी हो रही है, बड़ा ताप है, है' ऐसी उपासना करता है वह तेजस्वी होकर तेजःसम्पन्न, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही पहले अपनेको उद्धत हुआ प्रकाशमान और तमोहीन लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक दिखलाकर फिर जलकी उत्पत्ति करता है। वह यह तेज तेजकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो ऊर्ध्वगामी और तिर्यक्-गामी विद्युत्के सहित गड़गड़ाहटका कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद-] शब्द फैला देता है। इसीसे लोग कहते हैं- 'बिजली 'भगवन् ! क्या तेजसे भी बढकर कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज 'तेजसे बढकर भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ द्वादश खण्ड आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना आकाश ही तेजसे बढकर है। आकाशमें ही सूर्य, चन्द्र करो। वह जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना ये दोनों तथा विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि स्थित हैं। आकाशके करता है वह आकाशवान्, प्रकाशवान्, पीड़ारहित और द्वारा ही एक दूसरेको पुकारते हैं, आकाशसे ही सुनते हैं, विस्तारवाले लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक आकाशकी आकाशसे ही प्रतिश्रवण करते हैं, आकाशमें ही रमण करते गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि हैं, आकाशमें ही रमण नहीं करते, आकाशमें ही [ सब आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद-] पदा °]'उत्पन्न होते हैं और आकाशकी ओर ही [ सब 'भगवन् ! क्या आकाशसे बढकर भी कुछ है ?' जीव एव अङ्कुरादि ] बढते हैं। तुम आकाशकी उपासना [सनत्कुमार-] 'आकाशसे बढकर भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ १-२ ॥ त्रयोदश खण्ड स्मरणकी ब्रह्मरूपमें उपासना स्मर (स्मरण) ही आकाशसे बढकर है। इसीसे यद्यपि न जान ही सकते हैं। जिस समय वे स्मरण करते हैं, उसी बहुत-से लोग [ एक स्थानपर ] बैठे हों तो भी स्मरण न समय सुन सकते हैं, उसी समय मनन कर सकते हैं और करनेपर वे न कुछ सुन सकते हैं, न मनन कर सकते हैं और उसी समय जान सकते हैं। स्मरण करनेसे ही पुरुष पुत्रोंको उ० सं० ५७-५८-

४५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

४५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७ पहचानता है और स्मरणसे ही पशुओंको । तुम स्मरकी प्रकार उपासना करता है । [ नारद-] 'भगवन् ! क्या स्मरसे उपासना करो । वह जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार भी श्रेष्ठ कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] 'स्मरसे भी श्रेष्ठ उपासना करता है, उसकी जहाँतक स्मरकी गति है, वहाँतक है ही ।' [ नारद-] 'भगवान् मेरे प्रति उसका वर्णन स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस करें' ॥ १-२॥ चतुर्दश खण्ड आशाकी ब्रह्मरूपसे उपासना आशा ही स्मरणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। आशासे दीप्त उसकी प्रार्थनाएँ सफल होती हैं। जहाँतक आशाकी गति है, हुआ स्मरण ही मन्त्रोंका पाठ करता है, कर्म करता है, पुत्र वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आशाकी और पशुओंकी इच्छा करता है तथा इस लोक और परलोक- 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद-] की कामना करता है । तुम आशाकी उपासना करो । 'भगवन् ! क्या आशासे बढ़कर भी कुछ है ?' [सनत्कुमार-] वह जो कि आशाकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना 'आशासे बढ़कर भी है ही।' [ नारद-] 'भगवान् मुझे करता है, उसकी सब कामनाएँ आशासे समृद्ध होती हैं । वह बतलावें' ॥ १-२ ॥ पञ्चदश खण्ड प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना प्राण ही आशासे बढ़कर है। जिस प्रकार रथचक्रकी हत्या करनेवाला है, तू तो आचार्यका घात करनेवाला है, तू नाभिमे अरे समर्पित रहते हैं, उसी प्रकार इस प्राणमे सारा निश्चय ही ब्रह्मघाती है। किंतु जिनके प्राण उत्क्रमण कर जगत् समर्पित है। प्राण प्राण (अपनी शक्ति) के द्वारा गये हैं, उन पिता आदि [के प्राणहीन शरीर] को यदि वह शूलसे गमन करता है; प्राण प्राणको देता है और प्राणके लिये ही एकत्रित और छिन्न-भिन्न करके जला दे तो भी उससे 'तू पिताकी देता है । प्राण ही पिता है, प्राण माता है, प्राण भाई है, प्राण हत्या करनेवाला है' 'तू माताकी हत्या करनेवाला है' 'तू भ्राताकी बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है। हत्या करनेवाला है' 'तू बहिनकी हत्या करनेवाला है' 'तू यदि कोई पुरुष अपने पिता, माता, भ्राता, भगिनी, आचार्य आचार्यका घात करनेवाला है' अथवा 'तू ब्रह्मघाती है' ऐसा अथवा ब्राह्मणके लिये कोई अनुचित बात कहता है तो कुछ नहीं कहते। प्राण ही ये सब [पिता आदि] हैं। वह [उसके समीपवर्ती लोग] उससे कहते हैं- 'तुझे धिक्कार जो इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार चिन्तन करनेवाला और है, तू निश्चय ही पिताका हनन करनेवाला है, तू तो माताका इस प्रकार जाननेवाला है, अतिवादी होता है। उससे यदि वध करनेवाला है, तू तो भाईको मारनेवाला है, तू तो बहिनकी कोई कहे कि 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये, कि 'हाँ, अतिवादी हूँ' उसे छिपाना नहीं चाहिये ॥ १-४ ॥ षोडश खण्ड सत्य ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [सनत्कुमार-] 'जो सत्य (परमार्थ सत्य आत्माके सत्य विज्ञानके कारण ही अतिवदन करता हूँ।' [सनत्कुमार-] विज्ञान) के कारण अतिवदन करता है, वही निश्चय 'सत्यकी ही तो विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद-] अतिवदन करता है।' [नारद-] 'भगवन् ! मैं तो परमार्थ 'भगवन् ! मै विशेषरूपसे सत्यकी जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥ सप्तदश खण्ड विज्ञान ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [सनत्कुमार-] 'जिस समय पुरुष सत्यको विशेषरूपसे विज्ञानकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' जानता है, तभी वह सत्य बोलता है, बिना जाने सत्य नहीं बोलता, [नारद-] 'भगवन् ! मैं विज्ञानको विशेषरूपसे जानना अपितु विशेषरूपसे जाननेवाला ही सत्यका कथन करता है। अतः चाहता हूँ' ॥ १ ॥

खण्ड २४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५१ अष्टादश खण्ड मति ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य मनन करता है, ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] तभी वह विशेषरूपसे जानता है, विना मनन किये कोई नहीं जानता, अपितु मनन करनेपर ही जानता है। अतः मतिकी 'भगवन् ! मै मतिके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥ एकोनविंश खण्ड श्रद्धा ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य श्रद्धा करता है, श्रद्धाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] तभी वह 'मनन करता है, विना श्रद्धा किये कोई मनन नहीं करतां । अपितु श्रद्धा करनेवाला ही मनन करता है। अतः 'भगवन् ! मैं श्रद्धाके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥ विंश खण्ड निष्ठा ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय पुरुषकी निष्ठा होती है, विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये ।' [ नारद—] तभी वह श्रद्धा करता है, विना निष्ठाके कोई श्रद्धा नहीं करता, 'भगवन् ! मैं निष्ठाको विशेषरूपसे जानना चाहता अपितु निष्ठा करनेवाला ही श्रद्धा करता है। अतः निष्ठाको ही, हूँ' ॥ १ ॥ एकविंश खण्ड कृति ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य करता है, उस ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] समय वह निष्ठा भी करने लगता है, विना किये किसीकी निष्ठा 'भगवन् ! मैं कृतिकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता नहीं होती, पुरुष करनेपर ही निष्ठावान् होता है। अतः कृतिकी हूँ' ॥ १ ॥ द्वाविंश खण्ड सुख ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार— ] 'जब मनुष्यको सुख प्राप्त होता है, जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] 'भगवन् ! मै सुखकी तभी वह करता है, विना सुख मिले कोई नहीं करता, अपितु सुख मिलनेपर ही करता है, अतः सुखकी ही विशेषरूपसे विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥ त्रयोविंश खण्ड भूमा ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है [ सनत्कुमार—] 'निश्चय जो भूमा है, वही सुख है, जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद—] 'भगवन् ! मैं भूमाकी अल्पमे दुख नहीं है। सुख भूमा ही है। भूमाकी ही विशेषरूपसे विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥ चतुर्विंश खण्ड भूमा ही अमृत है [ सनत्कुमार— ] 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एवं कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता, वह भूमा है। और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है

४५२ : छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय ७

४५२ : छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय ७ और जो अल्प है, वह मर्त्य है।' [नारद--] 'भगवन् ! यह (भूमा) किसमे प्रतिष्ठित है?' [सनत्कुमार--] 'अपनी महिमामे, अथवा अपनी महिमामे भी नहीं है। इस लोकमे गौ, अश्व आदिको महिमा कहते हैं तथा हाथी, सुवर्ण, दास, भार्या, क्षेत्र और घर इनका नाम भी महिमा है, किन्तु मेरा ऐसा कथन नहीं है; क्योकि अन्य पदार्थ अन्यमे प्रतिष्ठित होता है। म तो यह कहता हूँ'-ऐसा सनत्कुमारजीने कहा ॥ १२ ॥ पञ्चविंश खण्ड भूमा ही सर्वत्र सब कुछ और आत्मा है वही नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है, वही दायीं ओर है, वही बायीं ओर हे और वही यह सब है। अब उसीमे अहङ्कारादेश किया जाता है-मै ही नीचे हूँ, मैं ही ऊपर हूँ, मं ही पीछे हूँ, मे ही आगे हूँ, मे ही दायीं ओर हूँ, मै ही बायीं ओर हूँ और मै ही यह सब हूँ ॥ १ ॥ अब आत्मरूपसे ही भूमाका आदेश किया जाता है। आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है, आत्मा ही दायीं ओर है, आत्मा ही बायीं ओर हे और आत्मा ही यह सब है। वह यह इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार मनन करनेवाला तथा विशेषरूपसे इस प्रकार जाननेवाला आत्मरति, आत्मक्रीड, आत्ममिथुन और आत्मानन्द होता हे, वह स्वराट् हे, सम्पूर्ण लोकोंमें उसकी यथेच्छ गति होती हे। किंतु जो इससे विपरीत जानते हे वे अन्यराट् (जिनका राजा अपनेसे भिन्न कोई और हे, ऐसे) और क्षय्यलोक (क्षयशील लोकोंको प्राप्त होनेवाले) होते हैं। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमे स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥ षड्विंश खण्ड आत्मदर्शनसे सबकी प्राप्ति, आहारशुद्धिसे क्रमशः अविद्याकी निवृत्ति उस इस प्रकार देखनेवाले, इस प्रकार मनन करनेवाले और इस प्रकार जाननेवाले इस विद्वानके लिये आत्मासे प्राण, आत्मासे आशा, आत्मासे स्मृति, आत्मासे आकाश, आत्मासे तेज, आत्मासे जल, आत्मासे आविर्भाव और तिरोभाव, आत्मासे अन्न, आत्मासे बल, आत्मासे विज्ञान, आत्मासे ध्यान, आत्मासे चित्त, आत्मासे संकल्प, आत्मासे मन, आत्मासे वाक, आत्मासे नाम, आत्मासे मन्त्र, आत्मासे कर्म और आत्मासे ही यह सब हो जाता है ॥ १ ॥ इस विषयमें यह मन्त्र है-विद्वान् न तो मृत्युको देखता है, न रोगको और न दुःखत्वको ही। वह विद्वान् सबको [आत्मरूप ही] देखता है, अतः सबको प्राप्त हो जाता है। वह एक होता है फिर वही तीन, पाँच, सात और नौ रूप हो जाता है। फिर वही ग्यारह कहा गया हे तथा वही सौ, दश, एक, सहस्र और बीस भी होता है। आहारशुद्धि (विषयो- पलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि) होनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होती हे; अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर निश्चल स्मृति होती हे तथा स्मृतिकी प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण ग्रन्थियोकी निवृत्ति हो जाती है। [इस प्रकार] जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थीं, उन (नारदजी) को भगवान् सनत्कुमारने अज्ञानान्धकारका पार दिखलाया। उन (सनत्कुमारजी) को 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं, 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं ॥ २ ॥ ॥ सप्तम अध्याय समाप्त ॥ ७ ॥

अष्टम अध्याय

ॐ अष्टम अध्याय प्रथम खण्ड आत्मा ही सत्य है अब इस ब्रह्मपुरके भीतर और जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है और उसके भीतर जो वस्तु है, उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसीकी जिज्ञासा करनी चाहिये। उस (गुरु) से यदि [शिष्यगण] कहें कि इस ब्रह्मपुरमें जो सूक्ष्म कमलाकार गृह है, उसमें जो अन्तराकाश है, उसके भीतर क्या वस्तु है, जिसका अन्वेषण करना चाहिये अथवा जिसकी जिज्ञासा करनी चाहिये ?- तो [ इस प्रकार कहनेवाले शिष्योके प्रति ] वह आचार्य यों कहे ॥ १-२ ॥ जितना यह [भौतिक] आकाश है, उतना ही हृदयान्तर्गत आकाश है। द्युलोक और पृथिवी ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके भीतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु- ये दोनों, सूर्य और चन्द्रमा-ये दोनों तथा विद्युत् और नक्षत्र एव इस आत्माका जो कुछ इस लोकमें है और जो नहीं है, वह सर्व सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ॥ ३ ॥ उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें यह सब समाहित है तथा सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं तो जिस समय यह वृद्धावस्थाको प्राप्त होता अथवा नष्ट हो जाता है, उस समय क्या शेष रह जाता है ? । तो उसे कहना चाहिये 'इस (देह) की जरावस्थासे यह (आकाशाख्य ब्रह्म) जीर्ण नहीं होता। इसके वधसे उसका नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है, इसमें [ सम्पूर्ण ] कामनाएँ सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं, यह आत्मा है, धर्माधर्मसे शून्य है तथा जराहीन, मृत्युहीन, शोकरहित, भोजनेच्छारहित, पिपासाशून्य, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है, जिस प्रकार इस लोकमें प्रजा राजाकी आज्ञाका अनुवर्तन करती है तो वह जिस जिस सन्निहित वस्तुकी कामना करती है तथा जिस-जिस देश या भूभागकी इच्छा करती है, उसी-उसीके आश्रित जीवन धारण करती है। जिस प्रकार यहाँ कर्मसे प्राप्त किया हुआ लोक क्षीण हो जाता है, उसी प्रकार परलोकमे पुण्योपार्जित लोक क्षीण हो जाता है। जो लोग इस लोकमें आत्माको और इन सत्य कामनाओको बिना जाने ही परलोकगामी होते हैं, उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छागति नहीं होती। परन्तु जो इस लोकमें आत्माको तथा सत्य कामनाओको जानकर [परलोकमे] जाते हैं, उनकी समस्त लोकोंमें यथेच्छागति होती है' ॥ ४-६ ॥ द्वितीय खण्ड आत्मज्ञानीकी सङ्कल्पसिद्धि वह यदि पितृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही पितृगण वहाँ उपस्थित होते हे [ अर्थात् उसके आत्मसम्बन्धी हो जाते हे, ] उस पितृलोकसे सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है। और यदि वह मातृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही माताएँ वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उस मातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमा- को प्राप्त होता है। और यदि वह भ्रातृलोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही भ्रातृगण वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उस भ्रातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह भगिनीलोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही वहनें वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उस भगिनीलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह सखाओंके लोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही सखा लोग वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उन सखाओंके लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह गन्धमाल्यलोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही गन्धमाल्यादि वहाँ उपस्थित हो जाने हैं। उस गन्धमाल्यलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह अन्नपानसम्बन्धी लोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही अन्नपान उसके पास उपस्थित हो जाते हैं। उस अन्न-पान-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह गीतवाद्यसम्बन्धी लोककी कामनावाला होता है तो उसके सकल्पसे ही गीत-वाद्य वहाँ प्राप्त हो जाते हैं। उस गीतवाद्यलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है। और यदि वह स्त्री लोककी कामना- वाला होता है तो उसके सकल्पमात्रसे ही स्त्रियां उसके पास उपस्थित हो जाती हैं। उस स्त्री-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमान्वित होता है। वह जिस-जिस प्रदेशकी कामना करने- वाला होता है और जिस-जिस भोगकी इच्छा करता है वह सब उसके सकल्पसे ही उसको प्राप्त हो जाता है। उससे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ १-१० ॥

४५४ -: छान्दोग्योपनिषद् :- [ अध्याय ८

४५४ -: छान्दोग्योपनिषद् :- [ अध्याय ८ तृतीय खण्ड ब्रह्मकी प्राप्तिसे सबकी प्राप्ति, ब्रह्म हृदयमे ही है वे ये सत्यकाम अनृतके आच्छादनसे युक्त हैं। सत्य होनेपर वह यह आत्मा हृदयमें है। 'हृदि अयम्' (यह हृदयमें भी अनृत उनका अधिधान (आच्छादन करनेवाला) है, है) यही इसका निरुक्त (व्युत्पत्ति) है। इसीसे यह क्योंकि इस प्राणीका जो-जो [सम्बन्धी] यहाँसे मरकर जाता 'हृदय' है। इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वर्गलोक- है, वह वह उसे फिर देखनेके लिये नहीं मिलता। तथा इस को जाता है ॥ ३ ॥ लोकमें अपने जिन जीवित अथवा जिन मृतक [पुत्रादि] यह जो सम्प्रसाद है, वह इस शरीरसे उत्थान कर परम को और जिन अन्य पदार्थोंको यह इच्छा करते हुए भी ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे युक्त हो जाता है। यह प्राप्त नहीं करता, उन सबको यह इस (हृदयाकाशस्थित आत्मा है, यही अमृत एव अभय है ओर यही ब्रह्म है- ब्रह्म) में जाकर प्राप्त कर लेता है, क्योंकि यहाँ इसके ये ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका 'सत्य' यह नाम है ॥ ४ ॥ सत्यकाम अनृतसे ढके हुए रहते हैं। इस विषयमें यह वे ये 'सकार' 'तकार' और 'यम्' तीन अक्षर हैं। दृष्टान्त है-जिस प्रकार पृथिवीमे गड़े हुए सुवर्णके खजानेको उनमे जो 'सकार' है, वह अमृत है, जो 'तकार' हे, वह उस स्थानसे अनभिज्ञ पुरुष ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी मर्त्य हे और जो 'यम्' है, उससे वह दोनोंका नियमन करता नहीं जानते, इसी प्रकार यह सारी प्रजा नित्यप्रति ब्रह्मलोकको है, क्योकि इससे वह उन दोनोका नियमन करता है; इसलिये जाती हुई उसे नहीं पाती, क्योंकि यह अनृतके द्वारा हर ली 'यम्' इस प्रकार जाननेवाला प्रतिदिन ही स्वर्गलोकको जाता गयी है ॥ १-२ ॥ है ॥ ५ ॥ चतुर्थ खण्ड आत्माकी महिमा और ब्रह्मचर्यसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति जो आत्मा है, वह इन लोकोंके असम्भेद (पारस्परिक अविद्ध होता है, उपतापी होनेपर भी अनुपतापी होता है, असघर्ष) के लिये इन्हें विक्षेगरूपसे धारण करनेवाला सेतु इसीसे इस सेतुको तरकर अन्धकाररूप रात्रि भी दिन ही है। इस सेतुका दिन-रात अतिक्रमण नहीं करते। इसे न हो जाती है, क्योंकि यह ब्रह्मलोक सर्वदा प्रकाशस्वरूप है। जरा, न मृत्यु, न शोक और न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त ऐसा होनेके कारण जो इस ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्यके द्वारा हो स क्ते हैं। सम्पूर्ण पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि [शास्त्र एव आचार्यके उपदेशके अनुसार] जानते हैं, उन्हीं- यह ब्रह्मलोक पापशून्य है। इसलिये इस सेतुको तरकर पुरुष को यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता हे तथा उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें अन्धा होनेपर भी अन्धा नहीं होता, विद्ध होनेपर भी यथेच्छगति हो जाती है ॥ १-३ ॥ पञ्चम खण्ड ब्रह्मचर्यकी महिमा अब [लोकमें] जिसे 'यज्ञ' (परम पुरुषार्थका साधन) भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही आत्माको कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है वह ब्रह्मचर्यके जानकर पुरुष मनन करता है। तथा जिसे अनाशकायन (नष्ट द्वारा ही उस (ब्रह्मलोक) को प्राप्त होता है। और जिसे न होना) कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जिसे 'इष्ट' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके [साधक] ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त होता है वह यह आत्मा द्वारा पूजन करके ही पुरुष आत्माको प्राप्त होता है। तथा नष्ट नहीं होता। और जिसे अरण्ययन ऐसा कहा जाता है जिसे 'सत्रायण' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि इस ब्रह्मलोकमें 'अर' और क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही सत्-परमात्मासे अपना त्राण प्राप्त 'ण्य' ये दो समुद्र हैं, यहाँसे तीसरे द्युलोकमें ऐरमदीय सरोवर है। इसके सिवा जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है वह है, सोमसवन नामका अश्वत्थ है, वहाँ ब्रह्माकी अपराजिता पुरी है और प्रभुका विशेषरूपसे निर्माण किया हुआ सुवर्णमय

खण्ड ७ ] ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५५ मण्डप है। उस ब्रह्मलोकमें जो लोग ब्रह्मचर्यके द्वारा इन 'अर' की प्राप्ति होती है। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो और 'ण्य' दोनों समुद्रोंको प्राप्त करते हैं उन्हींको उस ब्रह्मलोक- जाती है ॥ १-४ ॥ षष्ठ खण्ड हृदयगत नाड़ियाँ ही उत्क्रमणका मार्ग हैं अब ये जो हृदयकी नाड़ियाँ हैं वे पिंगलवर्ण सूक्ष्म रसकी है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए [ बन्धुजन ] कहते हैं। वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रसकी हैं, क्योंकि यह हैं- 'क्या तुम मुझे जानते हो ? क्या तुम मुझे जानते हो ?' आदित्य पिंगलवर्ण है, यह शुक्ल है, यह नील है, यह पीत है वह जबतक इस शरीरसे उत्क्रमण नहीं करता, तबतक उन्हें और यह लोहितवर्ण है। इस विषयमें यह दृष्टान्त है कि जिस जानता है। फिर जिस समय यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता प्रकार कोई विस्तीर्ण महापथ इस (समीपवर्ती) और उस है, उस समय इन किरणोंसे ही ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह (दूरवर्ती) दोनों गाँवोंको जाता है, उसी प्रकार ये सूर्यकी 'ॐ' ऐसा [कहकर आत्माका ध्यान करता हुआ] ऊर्ध्वलोक किरणें इस पुरुषमें और उस आदित्यमण्डलमें दोनों लोकोंमें अथवा अधोलोकको जाता है। वह जितनी देरमें मन जाता है, प्रविष्ट हैं। वे निरन्तर इस आदित्यसे ही निकली हैं और इन उतनी ही देरमें आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। यह [आदित्य] नाड़ियोंमें व्याप्त हैं तथा जो इन नाड़ियोंसे निकली हैं वे इस निश्चय ही लोकद्वार है। यह विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकप्राप्तिका आदित्यमें व्याप्त हैं। ऐसी अवस्थामें जिस समय यह सोया द्वार है और अविद्वानोंका निरोधस्थान है। इस विषयमें यह हुआ-भली प्रकार लीन हुआ पुरुष सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न मन्त्र है-'हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनमेंसे एक होकर स्वप्न नहीं देखता, उस समय यह इन नाड़ियोंमें चला मस्तककी ओर निकल गयी है। उसके द्वारा ऊपरकी ओर जाता है, तब इसे कोई पाप स्पर्श नहीं करता और यह तेजसे जानेवाला जीव अमरत्वको प्राप्त होता है, शेष इधर-उधर व्याप्त हो जाता है ॥ १-३ ॥ जानेवाली नाड़ियाँ केवल उत्क्रमणका कारण होती हैं, उत्क्रमण- अब जिस समय यह जीव शरीरकी दुर्बलताको प्राप्त होता का कारण होती हैं [उनसे अमरत्वकी प्राप्ति नहीं होती] ॥४-६॥ सप्तम खण्ड इन्द्र और विरोचनको प्रजापतिका उपदेश जो आत्मा पापशून्य, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, इच्छासे रहे हो ?" उन्होंने कहा-'जो आत्मा पापरहित, क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है, [इन जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, क्षुधाहीन, तृषाहीन, सत्यकाम आठ स्वरूपभूत गुणोंसे युक्त है] उसे खोजना चाहिये और और सत्यसङ्कल्प है, उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसे उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस आत्माका आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर जान लेता अन्वेषणकर उसे विशेषरूपसे जान लेता है, वह सम्पूर्ण लोक है, वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है—इस श्रीमान्‌के है-ऐसा प्रजापतिने कहा। प्रजापतिके इस वाक्यको देवता वाक्यको शिष्टजन बतलाते हैं। उसी आत्माको जाननेकी इच्छा और असुर दोनोंने ही परम्परासे जान लिया। वे कहने लगे- करते हुए हम यहाँ रहे हैं' ॥ १-३ ॥ 'हम उस आत्माको जानना चाहते हैं, जिसे जाननेपर जीव उनसे प्रजापतिने कहा-'यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखायी सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है'-ऐसा देता है, आत्मा है, यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म निश्चयकर देवताओंका राजा इन्द्र और असुरोंका राजा है।' [ तब उन्होंने पूछा-] 'भगवन् ! यह जो जलमें सब विरोचन-ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथोंमें समिधाएँ ओर प्रतीत होता है और जो दर्पणमें दिखायी देता है, उनमें लेकर प्रजापतिके पास आये। उन्होंने बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्य- आत्मा कौन-सा है ?" इसपर प्रजापतिने कहा-'मैंने जिस वास किया। तब उनसे प्रजापतिने कहा-'तुम यहाँ किस नेत्रान्तर्गत पुरुषका वर्णन किया है, वही इन सबमें सब ओर प्रतीत होता है' ॥ ४ ॥

४५६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ ८ अष्टम खण्ड विरोचनका भ्रमपूर्ण सिद्धान्त लेकर लौट जाना 'जलपूर्ण शकोरेमें अपनेको देखकर तुम आत्माके विषयमें जो न जान सको वह मुझे बतलाओ' ऐसा [प्रजापतिने कहा।] उन्होंने जलके शकोरेमें देखा। उनसे प्रजापतिने कहा- 'तुम क्या देखते हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! हम अपने इस समस्त आत्माको लोम और नखपर्यन्त ज्यों-का-त्यों देखते हैं।' उन दोनोंसे प्रजापतिने कहा—'तुम अच्छी तरह अलङ्कृत होकर, सुन्दर वस्त्र पहनकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखो।' तब उन्होंने अच्छी तरह अलङ्कृत हो, सुन्दर वस्त्र धारणकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखा। उनसे प्रजापतिने पूछा, 'तुम क्या देखते हो ?' उन दोनोंने कहा-भगवन् ! जिस प्रकार हम दोनों उत्तम प्रकारसे अलङ्कृत, सुन्दर वस्त्र धारण किये और परिष्कृत हैं, उसी प्रकार हे भगवन् ! ये दोनों भी उत्तम प्रकारसे अलङ्कृत, सुन्दर वस्त्रधारी और परिष्कृत हैं।' तब प्रजापतिने कहा- 'यह आत्मा है, यह अमृत और अभय है और यही ब्रह्म है।' तब वे दोनों शान्तचित्तसे चले गये ॥ १-३ ॥ प्रजापतिने उन्हें [ दूर गया] देखकर कहा-'ये दोनों आत्माको उपलब्ध किये बिना - उसका साक्षात्कार किये बिना ही जा रहे हैं, देवता हों या असुर-जो कोई ऐसे निश्चयवाले होंगे, उन्हींका पराभव होगा।' वह जो विरोचन था, शान्तचित्तसे असुरोंके पास पहुँचा और उनको यह आत्मविद्या सुनायी- 'इस लोकमें यह आत्मा (शरीर) ही पूजनीय है और शरीर ही सेवनीय है। शरीरकी ही पूजा और परिचर्या करनेवाला पुरुष इस लोक और परलोक दोनों लोकोंको प्राप्त कर लेता है।' इसीसे इस लोकमें जो दान न देनेवाला, श्रद्धा न करनेवाला और यजन न करनेवाला पुरुष होता है, उसे शिष्टजन 'अरे ! यह तो आसुर (आसुरीस्वभाववाला) ही है' ऐसा कहते हैं। यह उपनिषद् असुरोंकी ही है। वे ही मृतक पुरुषके शरीरको भिक्षा [गन्ध पुष्प-अन्नादि], वस्त्र और अलङ्कारोंसे सुसज्जित करते हैं और उनके द्वारा हम परलोक प्राप्त करेंगे- ऐसा मानते हैं।४-५। नवम खण्ड इन्द्रका प्रजापतिके पास पुनः आगमन ओर प्रश्न किन्तु इन्द्रको देवताओंके पास बिना पहुँचे ही यह भय दिखायी दिया। जिस प्रकार इस शरीरके अच्छी प्रकार अलङ्कृत होनेपर यह (छायात्मा) अच्छी तरह अलङ्कृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होता है, उसी प्रकार इसके अन्धे होनेपर अन्धा हो जाता है, स्राम होनेपर स्राम हो जाता है और खण्डित होनेपर खण्डित हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह भी नष्ट हो जाता है। 'इस [छायात्मदर्शन] मे मैं कोई भोग्य नहीं देखता।' इसलिये इन्द्र समित्पाणि होकर फिर प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा- 'इन्द्र ! तुम तो विरोचनके साथ शान्तचित्त होकर गये थे,अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा-'भगवन् ! जिस प्रकार यह (छायात्मा) इस शरीरके अच्छी तरह अलङ्कृत होनेपर अच्छी तरह अलङ्कृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत हो जाता है, उसी प्रकार इसके अन्धे होनेपर अन्धा, स्राम होनेपर स्राम और खण्डित होनेपर खण्डित भी हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह नष्ट भी हो जाता है, मुझे इसमें कोई फल दिखायी नहीं देता' ॥ १-२ ॥ 'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है,' ऐसा प्रजापतिने कहा, 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा। अब तुम बत्तीस वर्ष यहाँ और रहो।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और [ ब्रह्मचर्यसे] निवास किया। तब प्रजापतिने उससे कहा ॥ ३ ॥ दशम खण्ड स्वप्नके दृष्टान्तसे आत्माके स्वरूपका कथन 'जो यह स्वप्नमें पूजित होता हुआ विचरता है, यह आत्मा है' ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है।' ऐसा सुनकर वे (इन्द्र) शान्तहृदयसे चले -गये। किन्तु देवताओंके पास बिना पहुँचे ही उन्हें यह भय दिखायी दिया 'यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है तो भी वह (स्वप्नशरीर) अनन्ध होता है, और यदि यह स्राम होता है तो भी वह अस्राम होता है। इस प्रकार यह इसके दोषसे दूषित नहीं होता। यह इस देहके वधसे नष्ट भी नहीं होता

खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७ और न इसकी रुग्णतासे रुग्ण होता है । किन्तु इसे मानो कोई मारता हो, कोई ताडित करता हो, यह मानो अप्रियका अनुभव करता हो और रुदन करता हो—ऐसा हो जाता है, अतः इसमें ( इस प्रकारके आत्मदर्शनमें ) मैं कोई फल नहीं देखता' ॥१-२॥ [ अतः ] वे समित्पाणि होकर फिर [ प्रजापतिके पास ] आये । उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्त होकर गये थे, अब किस इच्छासे पुनः आये हो ?' उन्होंने कहा—'भगवन् ! यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है तो भी वह ( स्वप्नशरीर ) अनन्ध रहता है और यह रुग्ण होता है तो भी वह नीरोग रहता है, इस प्रकार वह इसके दोषसे दूषित नहीं होता । न इसके वधसे उसका वध होता है और न इसकी रुग्णतासे वह रुग्ण होता है, किन्तु उसे मानो कोई मारते हों, कोई ताडित करते हों और [ उसके कारण ] मानो वह अप्रियका अनुभव करता हो और रुदन करता हो—[ ऐसा अनुभव होनेके कारण ] इसमे मै कोई फल नहीं देखता ।' तब प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है, मैं तुम्हारे इस (आत्मतत्त्व) की पुनः व्याख्या करूँगा, तुम बत्तीस वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो ।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और निवास किया, तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ ३-४ ॥ एकादश खण्ड इन्द्र एक सौ एक वर्षके ब्रह्मचर्यके बाद उपदेशके अधिकारी हुए 'जिस अवस्थामें यह सोया हुआ दर्शनवृत्तिसे रहित और सम्यक्रूपसे आनन्दित हो स्वप्नका अनुभव नहीं करता, वह आत्मा है'—ऐसा प्रजापतिने कहा 'यह अमृत है, यह अभय है और यही ब्रह्म है।' यह सुनकर इन्द्र शान्तचित्तसे चले गये, किन्तु देवताओंके पास पहुँचे बिना ही उन्हें यह भय दिखायी दिया—"उस अवस्थामें तो इसे निश्चय ही यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मैं हूँ' ओर न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है; उस समय तो यह मानो विनाशको प्राप्त हो जाता है। इसमें मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता" वे समित्पाणि होकर पुन. प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा—'इन्द्र ! तुम तो शान्तचित्तसे गये थे, अब किस इच्छासे तुम्हारा पुन- आगमन हुआ है ।' इन्द्रने कहा—'भगवन् ! इस अवस्थामें तो निश्चय ही इसे यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह मे हूँ' और न यह इन अन्य भूतोंको ही जानता है, यह मानो विनाश- को प्राप्त हो जाता है । इसमे मुझे इष्टफल दिखायी नहीं देता ।' 'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है'—ऐसा प्रजापतिने कहा 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुन व्याख्या करूँगा। आत्मा इससे भिन्न नहीं है । अभी पाँच वर्ष और ब्रह्मचर्यवास करो ।' उन्होंने पाँच वर्ष और वहाँ निवास किया । ये सब मिलाकर एक सौ एक वर्ष हो गये । इसीसे ऐसा कहते हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास [ करके अधिकार प्राप्त ] किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा—॥ १-३ ॥ द्वादश खण्ड इन्द्रके प्रति प्रजापतिका उपदेश 'इन्द्र ! यह शरीर मरणशील ही है, यह मृत्युसे ग्रस्त है। यह इस अमृत, अशरीरी आत्माका अधिष्ठान है। सशरीर आत्मा निश्चय ही प्रिय और अप्रियसे ग्रस्त है। सशरीर रहते हुए इसके प्रियाप्रियका नाश नहीं हो सकता और अशरीर होने- पर इसे प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं कर सकते । वायु अशरीर है, अभ्र, विद्युत् और मेघध्वनि—ये सब अशरीर हैं। जिस प्रकार ये सब उस आकाशसे उत्पन्न होकर सूर्यकी परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाते है, उसी प्रकार यह सम्प्रसाद इस शरीरसे समुत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। वह उत्तम पुरुष है । उस अवस्थामें वह हँसता, क्रीडा करता और स्त्री, यान अथवा ज्ञातिजनके साथ रमण करता है और अपने साथ उत्पन्न हुए इस शरीरको स्मरण न करता हुआ सब ओर विचरता है। जिस प्रकार घोड़ा या बैल गाड़ीमे जुता रहता है, उसी प्रकार यह प्राण इस शरीरमें जुता हुआ है ॥ १-३ ॥ जिसमे यह चक्षुद्भाग उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है, उसके रूप ग्रहणके लिये नेत्रेन्द्रिय है। जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं इसे सूँघूँ, वह आत्मा है, उसके गन्धग्रहणके लिये नासिका है। जो ऐसा समझता है कि मैं यह शब्द बोलूँ, वही आत्मा है, उसके शब्दोच्चारणके लिये वागिन्द्रिय है। जो ऐसा जानता है कि मैं यह श्रवण करूँ,

५५८ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ८

५५८ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ८

वह भी आत्मा है, उसके श्रवण करनेके लिये श्रोत्रेन्द्रिय है । और करता है । इस आत्माकी देवगण उपासना करते हैं । इसीसे जो यह जानता है कि मैं मनन करूँ, वह आत्मा है। मन उसका उन्हें सम्पूर्ण लोक और समस्त भोग प्राप्त हैं। जो उस आत्मा- दिव्य नेत्र है, वह यह आत्मा इस दिव्य चक्षुके द्वारा भोगोंको को जान और आचार्यके उपदेशानुसार जानकर साक्षात् देखता हुआ रमण करता है ॥ ४-५ ॥ रूपसे अनुभव करता है, वह सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको जो ये भोग इस ब्रह्मलोकमें हैं उन्हें यह देखता हुआ रमण प्राप्त कर लेता है। ऐसा प्रजापतिने कहा, प्रजापतिने कहा ॥ ६ ॥

त्रयोदश खण्ड श्याम ब्रह्मसे शबल ब्रह्मकी प्राप्तिका उपदेश मैं श्याम ( हृदयस्थ ) ब्रह्मसे शबल ब्रह्मको प्राप्त होऊँ तथा राहुके मुखसे निकले हुए चन्द्रमाके समान शरीरको और शबलसे श्यामको प्राप्त होऊँ । अश्व जिस प्रकार रोएँ त्यागकर कृतकृत्य हो अकृत (नित्य) ब्रह्मलोकको प्राप्त होता झाड़कर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापोंको झाड़कर हूँ, ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ ॥ १ ॥

चतुर्दश खण्ड आकाश नामक ब्रह्मका उपदेश आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह के यश, क्षत्रियोंके यश और वैश्योंके यश (यश स्वरूप आत्मा) करनेवाला है । वे (नाम और रूप) जिसके अन्तर्गत हैं, को प्राप्त होना चाहता हूँ । वह मैं यशोंका यश हूँ, मैं बिना वह ब्रह्म है, वह अमृत है, वही आत्मा है । मैं प्रजापतिके दाँतोंके भक्षण करनेवाले लोहितवर्ण पिच्छिल स्त्री-चिह्नको प्राप्त सभागृहको प्राप्त होता हूँ, मैं यश संज्ञक आत्मा हूँ, मैं ब्राह्मणों- न होऊँ, प्राप्त न होऊँ ॥ १ ॥

पञ्चदश खण्ड आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और उसका फल इस पूर्वोक्त आत्मज्ञानका ब्रह्माने प्रजापतिके प्रति वर्णन किया, धार्मिक बनाकर, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थापित प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । नियमानुसार कर शास्त्रकी आज्ञासे अन्यत्र प्राणियोंकी हिंसा न करता गुरुके कर्तव्यकर्मोंको समाप्त करता हुआ वेदका अध्ययन करके हुआ और आयुकी समाप्तिपर्यन्त इस प्रकार वर्तता हुआ आचार्यकुलसे लौटकर गृहस्थाश्रममें स्थित होता है, फिर [ अन्तमें ] वह निश्चय ही ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, और पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ [ पुत्र एव शिष्यादिको ] फिर नहीं लौटता, फिर नहीं लौटता ॥ १ ॥

॥ अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥ ॥ सामवेदीय छान्दोग्योपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोद निराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ केनोपनिषद्के आरम्भमें दिया जा चुका है ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ बृहदारण्यकोपनिषद् बृहदारण्यक उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदकी काण्वी शाखाके वाजसनेयि ब्राह्मणके अन्तर्गत है। आकारमें यह सबसे बृहत् (बड़ी) है एव अरण्य (वनमे) अध्ययन की जानेसे इसे आरण्यक कहा जाता है। इस प्रकार 'बृहत्' और 'आरण्यक' होनेके कारण इसका 'बृहदारण्यक' नाम हो गया। शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्‌के प्रारम्भमें दिया जा चुका है। प्रथम अध्याय प्रथम ब्राह्मण यज्ञकी अश्वके रूपमें कल्पना ॐ उषा (ब्राह्ममुहूर्त्त) यज्ञसम्बन्धी अश्वका सिर है, सूर्य कटिसे नीचेका भाग है। उसका जमुहाई लेना बिजलीका सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, वैश्वानर'अग्नि खुला हुआ मुख है चमकना है और शरीर हिलाना मेघका गर्जन है। वह जो और संवत्सर यज्ञिय अश्वका आत्मा है। द्युलोक उसका पीठ मूत्र त्याग करता है वही वर्षा है और हिनहिनाना ही उसकी है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पैर रखनेका स्थान है, दिशाएँ वाणी है ॥ १ ॥ पार्श्वभाग हैं, अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ हैं, ऋतुएँ अङ्ग हैं, अश्वके सामने महिमारूपसे दिन प्रकट हुआ, उसकी मास और अर्द्धमास पर्व (सन्धिस्थान) हैं, दिन और रात्रि पूर्वसमुद्र योनि है। रात्रि इसके पीछे महिमारूपसे प्रकट हुई; प्रतिष्ठा (पाद) हैं, नक्षत्र अस्थियाँ हैं, आकाश (आकाश- उसकी अपर (पश्चिम—) समुद्र योनि है। ये ही दोनों इस स्थित मेघ) मांस हैं, वात ऊवध्य (उदरस्थित अर्धजीर्ण अश्वके आगे-पीछेके महिमासंज्ञक ग्रह हुए। इसने हय होकर अन्न) है, नदियाँ गुदा-नाड़ियाँ हैं, पर्वत यकृत् और देवताओंको, वाजी होकर गन्धर्वोंको, अर्वा होकर असुरोंको हृद्गत मांसखण्ड हैं, ओषधि और वनस्पतियाँ रोम हैं, उदय और अश्व होकर मनुष्योंको वहन किया है। समुद्र ही इसका होता हुआ सूर्य नाभिसे ऊपरका भाग और अस्त होता हुआ बन्धु है और समुद्र ही उद्गमस्थान है ॥ २ ॥ द्वितीय ब्राह्मण प्रलयके अनन्तर सृष्टिकी उत्पत्ति पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। यह सब मृत्युसे-प्रलयसे हुए आचरण किया। उसके अर्चन करनेसे आप (सूक्ष्म जल) ही आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था। हुआ। अर्चन करते हुए मेरे लिये क (जल) प्राप्त हुआ अशनाया ही मृत्यु है। उसने 'मैं आत्मा (मन) से युक्त है; अतः यही अर्कको अर्कत्व है। जो इस प्रकार अर्कके इस होऊँ' ऐसा मन-संकल्प किया। उसने अर्चन (पूजन) करते अर्कत्वको जानता है उसे निश्चय क (सुख) होता है ॥ १ ॥ १ 'अर्चते कम् अर्कम्' अर्थात् जिनके अर्चन करनेवालेको क (जल या सुख) हो उनका नाम अर्क है। इस व्युत्पत्तिसे 'अर्क' अग्निको कहते हैं।

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ब्राह्मण ३ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४६१

ब्राह्मण ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६१ उद्गान किया । घ्राणमें जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और जो कुछ वह शुभ गन्ध सूँघता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके समीप जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अनुचित सूँघता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है । फिर उन्होंने चक्षुसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो।' तब चक्षुने "तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया । चक्षुमे जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और जो कुछ वह शुभ दर्शन करता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अनुचित (निषिद्ध पदार्थोंको) देखता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है । फिर उन्होंने श्रोत्रसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो।' तब श्रोत्रने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया । श्रोत्रमें जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और वह जो शुभ श्रवण करता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अनुचित ( ईश्वरनिन्दा, परनिन्दा, आत्म प्रशंसा आदि) श्रवण करता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है। फिर उन्होंने मनसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो ।' तब मनने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया । मनमें जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और वह जो शुभ सङ्कल्प करता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अनुचित (काम-क्रोध लोभ-वैर- हिंसा आदिके) सङ्कल्प करता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है। इस प्रकार निश्चय ही इन देवताओंको पापका ससर्ग हुआ और ऐसे ही [ असुरोंने ] इन्हें पापसे विद्ध किया ॥ २-६॥ फिर अपने मुखमें रहनेवाले प्राणसे कहा, 'तुम हमा लिये उद्गान करो।' तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर इस प्राणने उनके लिये उद्गान किया । असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध करना चाहा। किंतु जिस प्रकार पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार वे विध्वस्त होकर अनेक प्रकारसे नष्ट हो गये । तब देवगण [ विजेता होकर ] प्रकृतिस्थ हो गये और असुरोंका पराभव हुआ । जो इस प्रकार जानता है, वह प्रजापतिरूपसे स्थित होता है और उससे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य (सौतेले भाई) का पराभव होता है ॥ ७ ॥ वे बोले, 'जिसने हमें इस प्रकार देवभावको प्राप्त करवाया हे, वह कहाँ है ?' [उन्होंने विचार करके निश्चय किया कि] 'यह आस्य ( मुख ) के भीतर है, अतः यह अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि यह अङ्गोंका सार-रस है।' इस पूर्वोक्त देवताका 'दूर' नाम है, क्योकि इससे मृत्यु दूर है । जो ऐसा जानता है, उससे मृत्यु दूर रहता है ॥ ८-९ ॥ उस इस प्राणदेवताने इन वागादि देवताओंके पापरूप मृत्युको हटाकर जहाँ इन दिशाओंका अन्त है वहाँ पहुँचा दिया । वहाँ इनके पापको उसने तिरस्कारपूर्वक स्थापित कर दिया । अतः 'मैं पापरूप मृत्युसे संश्लिष्ट न हो जाऊँ' इस भयसे अन्त्यजनोंके पास न जाय और अन्त दिशामें भी न जाय । उस इस प्राणदेवताने इन देवताओंके पापरूप मृत्युको दूरकर फिर इन्हें मृत्युके पार [ अग्न्यादि देवतात्म- भावको प्राप्त ] कर दिया । उस प्रसिद्ध प्राणने प्रधान वाग्देवताको [ मृत्युके ] पार पहुँचाया। वह वाक् जिस समय मृत्युसे पार हुई, यह अग्नि हो गयी। वह यह अग्नि मृत्युसे परे उसका अतिक्रमण करके देदीप्यमान है। फिर प्राणका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह वायु हो गया। वह यह अतिक्रान्त वायु मृत्युने परे बहता है। फिर चक्षुका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह आदित्य हो गया । वह यह अतिक्रान्त आदित्य मृत्युसे परे तपता है। फिर श्रोत्रका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह दिशा हो गया । वे ये अतिक्रान्त दिशाएँ मृत्युसे परे हैं। फिर मनका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह चन्द्रमा हो गया। वह यह अतिक्रान्त चन्द्रमा मृत्युसे परे प्रकाशमान है। इसी प्रकार यह देवता उसका मृत्युसे अतिवहन करती है -जो कि इसे इस प्रकार जानता है। फिर उसने अपने लिये अन्नाद्यरूपी खाद्यका आवाहन किया, क्योंकि जो भी कुछ अन्न खाया जाता है, वह प्राणके ही द्वारा खाया जाता है तथा उस अन्नमें प्राण प्रतिष्ठित होता है ॥ १०-१७ ॥ वे देवगण बोले, 'यह जो अन्न है, वह सब तो इतना ही है, उसे तुमने अपने लिये आवाहन कर लिया है। अतः

४६२ - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ अध्याय १

४६२ - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ अध्याय १

अब पीछेसे हमें भी इस अन्नमे भागी बनाओ।' [ प्राणने कहा ] 'वे तुमलोग सब ओरसे मुझमे प्रवेश कर जाओ।' तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर वे सब ओरसे उसने प्रवेश कर गये । अतः प्राणके द्वारा पुरुष जो अन्न खाता है उससे ये प्राय भी तृप्त होते हैं। अतः जो इस प्रकार जानता है उसका ज्ञाति-जन सब ओरसे आश्रय ग्रहण करते हैं वह स्वजनोंका भरण करनेवाला उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे चलनेवाला होता है तथा अन्न भक्षण करनेवाला और सबका अधिपति होता है। ज्ञातियोंमेसे जो भी इस प्रकार जानने- वालेके प्रति प्रतिकूल होना चाहता है वह अपने आश्रितोंका पोषण करनेमें समर्थ नहीं होता और जो भी इसके अनुकूल रहता है—जो भी इसके अनुसार रहकर अपने आश्रितोंका भरण करना चाहता है वह निश्चय ही अपने आश्रितोंके भरणमें समर्थ होता है ॥ १८ ॥

वह प्राण अयास्य आङ्गिरस है, क्योकि वह अङ्गोंका रस (सार) है। प्राण ही अङ्गोंका रस है, निश्चय प्राण ही अङ्गोंका रस है क्योंकि जिस किसी अङ्गसे प्राण उत्क्रमण कर जाता है वह उसी जगह सूख जाता है, अतः यही अङ्गोंका रस है। यही वृहस्पति है । वाक् ही बृहती है, उसका यह पति है इसलिये यह बृहस्पति है । यही ब्रह्मणस्पति है। वाक् ही ब्रह्म—वेद है, उसका यह पति है, इसलिये यह ब्रह्मणस्पति है। यही साम है। वाक् ही 'सा' है और यह (प्राण) अम है। 'सा' और 'अम ही साम हैं। यही सामका सामत्व है। क्योकि यह प्राण मक्खीके समान है, मच्छरके समान है, हाथीके समान है, इस त्रिलोकीके समान है और इस सभीके समान है, इसीसे यह साम है। जो इस सामको इस प्रकार जानता है वह सामका सायुज्य और उसकी सलोकता प्राप्त करता है। यही उद्गीथ है। प्राण ही उत् है, प्राणके द्वारा ही यह सब उत्तब्ध—धारण किया हुआ है। वाक् ही गीथा है। वह उत् है और गीथा भी है इसलिये उद्गीथ है ॥ १९-२३ ॥

उस [प्राण] के विषयमे यह आख्यायिका भी है— चैकितानेय ब्रहादत्तने यज्ञमें सोम भक्षण करते हुए कहा, 'यदि अयास्य और आङ्गिरसनामक मुख्य प्राणने वाणीसे युक्त प्राणसे भिन्न अन्य देवताद्वारा उद्गान किया हो तो यह सोम मेरा सिर गिरा दे।' अतः उसने प्राण और वाक्‌ने ही द्वारा उद्गान किया था—ऐसा निश्चय होता है ॥ २४ ॥

जो इस पूर्वोक्त सामसम्बन्धान्य मुख्य प्राणके स्व (धन) को जानता है उसे धन प्राप्त होता है । निश्चय स्वर ही उसका धन है। अतः ऋत्विक् कर्म करनेवालेको वाणीमे स्वरकी इच्छा करनी चाहिये। उस स्वरसम्पन्न वाणीसे ऋत्विक् कर्म करे । इसीसे यज्ञमे स्वरवान् उद्गाताको देखनेकी इच्छा करते ही हैं। लोकमे भी जिसके पास धन होता है [उसे ही देखना चाहते हैं]। जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है। जो उस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है। उसका स्वर ही सुवर्ण है। जो इस प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण मिलता है। जो उस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है वह प्रतिष्ठित होता है। उसकी वाणी ही प्रतिष्ठा है। निश्चय वाणीमे प्रतिष्ठित हुआ ही यह प्राण गाया जाता है। कोई-कोई यह कहते हैं कि 'वह अन्नमे प्रतिष्ठित होकर गाया जाता है ॥ २५-२७ ॥

अब आगे पवमान नामक सामोंका ही अभ्यारोह कहा जाता है। वह प्रस्तोता निश्चय सामका ही प्रस्ताव (आरम्भ) करता है। जिस समय वह प्रस्ताव करे उस समय इन मन्त्रोको जपे—'असतो मा सङ्गमय 'तमसो मा ज्योतिर्गमय'• 'मृत्योर्माऽमृतं गमय' ।* वह जिस समय कहता है—'मुझे असत्से सत्की ओर ले जाओ यहाँ मृत्यु ही असन् है और अमृत सन् है । अतः वह यही कहता है कि मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ अर्थात् मुझे अमर कर दो। जब कहता है—'मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले जाओ तो यहाँ मृत्यु ही अन्धकार है और अमृत ज्योति है। यानी उसका यही कथन है कि मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ—मुझे अमर कर दो। मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ—इसमें तो कोई बात छिपी है ही नहीं। इनके पीछे जो अन्य स्तोत्र हैं उनमे अपने लिये अन्नाद्यका आगान करे । उनका गान किये जानेपर यजमान वर माँगे और जिस भोगकी इच्छा हो, उसे माँगे । इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिस भोगकी कामना करता है उसीका आगान करता है। वह यह प्राणदर्शन लोकप्राप्तिका साधन है। जो इस प्रकार इस सामको जानता है उसे लोक-प्राप्ति न होनेकी आशा तो होती ही नही ॥ २८ ॥


  • 'मुझे असत्‌से सत्‌की ओर ले जाओ', 'मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले जाओ', 'मुझे मृत्युसे अमृतत्वकी ओर ले जाओ।'

ब्राह्मण ४ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४६३

ब्राह्मण ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६३ चतुर्थ ब्राह्मण ब्रह्मकी सर्वरूपता और चातुर्वर्ण्यकी सृष्टि पहले यह पुरुषाकार आत्मा ही था। उसने आलोचना करनेपर अपनेसे भिन्न और कोई न देखा। उसने आरम्भमें 'अहमस्मि' ऐसा कहा, इसलिये उसका 'अहम्' नाम हुआ। इसीसे अब भी पुकारे जानेपर पहले 'अयमहम्' ऐसा ही कहकर उसके पश्चात् अपना जो दूसरा नाम होता है वह बतलाता है। क्योंकि इस सबसे पूर्ववर्ती उस [आत्मसञ्ज्ञक प्रजापति] ने समस्त पापोंको उपन-दग्ध कर दिया था इसलिये यह पुरुष हुआ। जो ऐसी उपासना करता है, वह उसे दग्ध कर देता है, जोउससे पहले प्रजापति होना चाहता है ॥ १ ॥ वह भयभीत हो गया। इसीसे अकेला पुरुष भय मानता है। उसने यह विचार किया 'यदि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं है तो मैं किससे डरता हूँ १' तभी उसका भय निवृत्त हो गया। किंतु उसे भय क्यों हुआ ? क्योंकि भय तो दूसरेसे ही होता है। वह [ अकेला ] रमण नहीं करता था। इसी कारण अब भी एकाकी पुरुष रमण नहीं करता। उसने दूसरेकी इच्छा की। जिस प्रकार परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुष होते हैं, वैसा ही उसका परिमाण हो गया। उसने इस अपनी देहको ही दो भागोंमें विभक्त कर डाला। उससे पति और पत्नी हुए। इसलिये यह शरीर अर्द्धबृगल (द्विदल अन्नके एक दल) के समान है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। इसलिये यह [ पुरुषार्द्ध ] आकाश स्त्रीसे पूर्ण होता है। वह उस (स्त्री) से संयुक्त हुआ, उसीसे मनुष्य उत्पन्न हुए हैं। उस (शतरूपा) ने यह विचार किया कि 'अपनेसे ही उत्पन्न करके यह मुझसे क्यों समागम करता है ? अच्छा, मैं छिप जाऊँ' अतः वह गौ हो गयी, तब दूसरा यानी मनु वृषभ होकर उससे सम्भोग करने लगा, इससे गाय-बैल उत्पन्न हुए। तब वह घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ हो गया। फिर वह गर्दमी हो गयी और मनु गर्दभ हो गया और उससे समागम करने लगा। इससे एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए। तदनन्तर शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा हो गया। फिर वह भेड़ हो गयी और मनु मेढ़ा होकर उससे समागम करने लगा। इससे बकरी और भेड़ोंकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार चींटीसे लेकर ये जितने मिथुन (स्त्री-पुरुषरूप जोड़े) हैं, उन सभीकी उन्होंने रचना कर डाली ॥ २-४ ॥ १ मैं हूँ। २ यह मैं हूँ। उस प्रजापतिने 'मैं ही सृष्टि हूँ' ऐसा जाना। मैने इस सबको रचा है। इस कारण वह 'सृष्टि' नामवाला हुआ। जो ऐसा जानता है वह इस (प्रजापति) की सृष्टिमें [ स्रष्टा ] होता है। फिर उसने इस प्रकार मन्थन किया। उसने मुखरूप योनिसे दोनों हाथोंद्वारा [ मन्थन करके ] अग्निको रचा। इसलिये ये दोनों भीतरकी ओरसे रोमरहित हैं, क्योंकि योनि भी भीतरसे रोमरहित ही होती है। अत [ याज्ञिक लोग अग्नि, इन्द्र आदिको ] एक-एक (भिन्न-भिन्न) देवता मानते हुए जो ऐसा कहते हैं कि 'इस (अग्नि) का यजन करो, इस (इन्द्र) का यजन करो' सो वह तो इस एक ही देवकी विसृष्टि है। यह [ प्रजापति ] ही सर्वदेवरूप है। इसके बाद जो कुछ यह द्रवरूप है, उसे उसने वीर्यसे उत्पन्न किया, वही सोम है। इतना ही यह सब अन्न और अन्नाद है। सोम ही अन्न है और अग्नि ही अन्नाद है। यह ब्रह्माकी अति- सृष्टि है कि उसने अपनेसे उत्कृष्ट देवताओंकी रचना की— स्वयं मर्त्य होनेपर भी अमृर्तोंको उत्पन्न किया। इसलिये यह अतिसृष्टि है। जो इस प्रकार जानता है वह इसकी इस अति- सृष्टिमें ही हो जाता है ॥ ५-६ ॥ यह पूर्वोक्त जगत् उस समय (उत्पत्तिसे पूर्व) अव्याकृत था। वह नाम-रूपके योगसे व्यक्त हुआ, अर्थात् 'यह इस नाम और इस रूपवाला है' इस प्रकार व्यक्त हुआ। अतः इस समय भी यह अव्याकृत वस्तु 'इस नाम और इस रूपवाली है' इस प्रकार व्यक्त होती है। वह यह (व्यक्तात्मा) इस (शरीर) में नखाग्रपर्यन्त प्रविष्ट किये हुए है, जिस प्रकार कि क्षुरा क्षुरेके घरमें छिपा रहता है अथवा विश्वका भरण करनेवाला अग्नि अग्निके आश्रय (काष्ठादि) में गुप्त रहता है। परन्तु उसे लोग देख नहीं सकते। वह असम्पूर्ण है; प्राणनक्रियाके कारण ही वह प्राण है, बोलनेके कारण वाक् है, देखनेके कारण चक्षु है, सुननेके कारण श्रोत्र है और मनन करनेके कारण मन है। ये इसके कर्मानुसारी नाम ही हैं। अतः इनमेंसे जो एक एककी उपासना करता है, वह नहीं जानता। वह असम्पूर्ण ही है। वह एक एक विशेषणसे ही युक्त होता है। अतः 'आत्मा है' इस प्रकार ही उसकी उपासना करे, क्योंकि इस (आत्मा) में ही वे सब एक हो जाते हैं। यह जो आत्मा है, वही इन सबका प्राप्य है, क्योंकि यह

४६४ - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ अध्याय १

  • ४६४ - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ अध्याय १ आत्मा है, उस आत्माके ज्ञात होनेसे ही मनुष्य इस सब जगत्‌को जानता है। जिस प्रकार पदों (खुर आदिके चिन्हों) द्वारा [खोये हुए पशुको] प्राप्त कर लेते हैं, उसी प्रकार जो ऐसा जानता है, वह इसके द्वारा यश और इष्ट पुरुषोंका सहवास प्राप्त करता है। वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे अधिक प्रिय है, धनसे अधिक प्रिय है, और अन्य सबसे भी अधिक प्रिय है, क्योंकि यह आत्मा उनकी अपेक्षा अन्तरतर है। वह जो आत्मप्रियदर्शी है यदि आत्मासे भिन्न (अनात्मा) को प्रिय कहनेवाले पुरुषसे कहे कि 'तेरा प्रिय नष्ट हो जायगा' तो वैसा ही हो जायगा, क्योंकि वह समर्थ होता है। अतः आत्मारूप प्रियकी ही उपासना करे। जो आत्मारूप प्रियकी ही उपासना करता है उसका प्रिय अत्यन्त मरणशील नहीं होता ॥ ७-८ ॥ [ब्राह्मणोंने] यह कहा कि ब्रह्मविद्याके द्वारा मनुष्य 'हम सर्व हो जायँगे ऐसा मानते हैं, [सो] उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्व हो गया ?' ॥ ९ ॥ पहले यह ब्रह्म ही था, उसने अपनेको ही जाना कि मैं 'ब्रह्म हूँ'। अतः वह सर्व हो गया। उसे देवोंमेंसे जिस जिसने जाना, वही तद्रूप हो गया। इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्यों- मेंसे भी [जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया]। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना-'मैं मनु हुआ और सूर्य भी।' उस उस ब्रह्मको इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि मैं 'ब्रह्म हूँ', वह यह सर्व हो जाता है। उसके पराभवमें देवता भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है। और जो अन्य देवताकी 'यह अन्य है और मैं अन्य हूँ' इस प्रकार उपासना करता है, वह नहीं जानता। जैसे पशु होता है, वैसे ही वह देवताओंका पशु है। जैसे लोकमें बहुत से पशु मनुष्यका पालन करते हैं, उसी प्रकार एक एक मनुष्य देवताओंका पालन करता है। एक पशुका ही हरण किये जानेपर अच्छा नहीं लगता, फिर बहुतोंका हरण होनेपर तो कहना ही क्या है? इसलिये देवताओंको यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य [ब्रह्मात्मतत्त्वको] जानें ॥ १० ॥ आरम्भमें यह एक ब्रह्म ही था। अकेला होनेके कारण वह विभूतियुक्त कर्म करनेमे समर्थ नहीं हुआ। उसने अति- शयतासे क्षत्र रूप प्रशस्त रूपकी रचना की। अर्थात् देवताओं- में क्षत्रिय जो ये इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, मेघ, यम, मृत्यु और ईशानादि हैं, उन्हें उत्पन्न किया। अतः क्षत्रियसे उत्कृष्ट कोई नहीं है। इसीसे राजसूय यज्ञमें ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रियकी उपासना करता है, वह क्षत्रियमे ही अपने यशको स्थापित करता है। यह जो ब्राह्मण है, क्षत्रियकी योनि है। इसलिये यद्यपि राजा उत्कृष्टताको प्राप्त होता है तो भी [राजसूयके] अन्तमे वह ब्राह्मणका ही आश्रय लेता है। अतः जो क्षत्रिय इस (ब्राह्मण) की हिंसा करता है, वह अपनी योनिका ही नाश करता है। जिस प्रकार श्रेष्ठकी हिंसा करनेसे पुरुष पापी होता है, उसी प्रकार वह पापी होता है ॥ ११ ॥ वह (ब्रह्म) विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने वैश्यजातिकी रचना की। जो ये वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुत् इत्यादि देवगण गणशः कहे जाते हैं [उन्हें उत्पन्न किया]। [फिर भी] वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने शूद्रवर्णकी रचना की। पूषा शूद्रवर्ण है। यह पृथिवी ही पूषा है, क्योंकि यह जो कुछ है, यही उसका पोषण करती है ॥ १२-१३ ॥ तब भी वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने अतिशयतासे श्रेयरूप धर्मको रचा। यह जो धर्म है, क्षत्रियका भी नियन्ता है। अतः धर्मसे उत्कृष्ट कुछ नहीं है। इसलिये जिस प्रकार राजाकी सहायतासे [प्रबल शत्रुको भी जीतनेकी शक्ति आ जाती है] उसी प्रकार धर्मके द्वारा निर्बल पुरुष भी बलवान्‌को जीतनेकी इच्छा करने लगता है। वह जो धर्म है, निश्चय सत्य ही है। इसीसे सत्य बोलनेवालेके विषयमें कहते हैं कि 'यह धर्म भाषण करता है' तथा धर्म भाषण करनेवालेसे कहते हैं कि 'यह सत्य भाषण करता है', क्योंकि ये दोनों यही (धर्म ही) हैं ॥ १४ ॥ वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं। [इन्हें उत्पन्न करनेवाला] ब्रह्म अग्निरूपसे देवताओंमें ब्राह्मण हुआ। तथा मनुष्योंमे ब्राह्मणरूपसे ब्राह्मण, क्षत्रियरूपसे क्षत्रिय, वैश्यरूपसे वैश्य और शूद्ररूपसे शूद्र हुआ। इसीसे अग्निमें ही [कर्म करके] देवताओंके बीच कर्मफलकी इच्छा करते हैं तथा मनुष्योंके बीच ब्राह्मणजातिमें ही कर्मफलकी इच्छा करते हैं, क्योंकि ब्रह्म इन दो रूपोंसे ही व्यक्त हुआ था। तथा जो कोई इस लोकसे आत्माका दर्शन किये बिना ही चला जाता है, उसका यह अविदित आत्मलोक [शोक मोहादिकी निवृत्तिके द्वारा] वैसे ही पालन नहीं करता, जैसे कि बिना अध्ययन किया हुआ वेद अथवा बिना अनुष्ठान किया हुआ कोई अन्य कर्म। इस प्रकार (आत्माको) न जाननेवाला पुरुष यदि इस लोकमे कोई महान् पुण्यकर्म भी करे, तो भी अन्तमे उसका वह कर्म क्षीण हो ही जाता है; अतः

ब्राह्मण ५ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४६५

ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६५ आत्मलोककी ही उपासना करनी चाहिये। जो पुरुष आत्मलोक- की ही उपासना करता है, उसका कर्म क्षीण नहीं होता। इस आत्मासे पुरुष जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, उसी- उसीको प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥ यह आत्मा (गृही कर्माधिकारी) समस्त जीवोंका लोक (भोग्य) है। वह जो हवन और यज्ञ करता है, उससे देवताओंका भोग्य होता है; जो स्वाध्याय करता है, उससे ऋषियोंका, जो पितरोंके लिये पिण्डदान करता है और सन्तानकी इच्छा करता है, उससे पितरोंका, जो मनुष्योंको वासस्थान और भोजन देता है, उससे मनुष्योंका और जो पशुओंको तृण एव जलादि पहुँचाता है, उससे पशुओंका भोग्य होता है। इसके घरमें जो [कुत्ते-बिल्ली आदि] श्वापद, पक्षी और चींटीपर्यन्त जीव-जन्तु इसके आश्रित होकर जीवन धारण करते हैं, उससे यह उनका भोग्य होता है। जिस प्रकार लोकमें सब अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं, उसी प्रकार यों जाननेवालेका सब जीव अविनाश चाहते हैं। इस (हवन आदि) कर्मकी अवश्यकर्तव्यता [पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें] ज्ञात है और [अवदानप्रकरणमें] इसकी मीमांसा की गयी है ॥ १६ ॥ पहले एक यह आत्मा ही था। उसने कामना की कि 'मेरे स्त्री हो, फिर मैं सन्तानरूपसे उत्पन्न होऊँ। तथा मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ।' बस, इतनी ही कामना है। इच्छा करनेपर इससे अधिक कोई नहीं पाता। इसीसे अब भी एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं सन्तान- रूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो तो फिर मैं कर्म करूँ। वह जबतक इनमेंसे एकको भी प्राप्त नहीं करता, तबतक वह अपनेको अपूर्ण ही मानता है। उसकी पूर्णता इस प्रकार होती है—मन ही इसका आत्मा है, वाणी स्त्री है, प्राण सन्तान है और नेत्र मानुष-वित्त है, क्योंकि वह नेत्रसे ही गौ आदि मानुष-वित्तको जानता है। श्रोत्र दैव-वित्त है, क्योंकि श्रोत्रसे ही वह उसे (दैव-वित्तको) सुनता है। आत्मा (शरीर) ही इसका कर्म है, क्योंकि आत्मासे ही यह कर्म करता है। यह आत्मदर्शनरूप यज्ञ पाङ्क्त है, पशु पाङ्क्त है, पुरुष पाङ्क्त है तथा यह कर्म एव साधनरूप जो कुछ है, सब पाङ्क्त है। जो ऐसा जानता है, वह इन सभीको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ पञ्चम अन्नकी उत्पत्ति और , मन, वाणी और प्राणके रूपमें सृष्टिका विभाग पिता (प्रजापति) ने विज्ञान और कर्मके द्वारा जिन सात अन्नोंकी रचना की, उनमेंसे इसका एक अन्न साधारण है (अर्थात् वह सभी प्राणियोंका भोग्य है), दो अन्न उसने देवताओंको बाँट दिये, तीन अपने लिये रक्खे, एक पशुओंको दिया। उस (पशुओंको दिये हुए अन्न) में, जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सभी प्रतिष्ठित हैं। ये अन्न सर्वदा खाये जानेपर भी क्षीण क्यों नहीं होते? जो इस (अन्नके) अक्षयभावको जानता है, वह मुखरूप प्रतीकके द्वारा अन्न भक्षण करता है। वह देवताओंको प्राप्त होता है तथा अमृतका भोक्ता होता है। इस विषयमें ये श्लोक (मन्त्र) हैं—॥ १ ॥ 'यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता' इसका यह अर्थ प्रसिद्ध है कि पिताने ज्ञान और कर्मके द्वारा ही अन्नोंको उत्पन्न किया। उसका एक अन्न साधारण है। अर्थात् यह जो खाया जाता है, वही इसका साधारण अन्न है। जो इसीके परायण रहता है, वह पापसे दूर नहीं होता; क्योंकि यह अन्न मिश्र (समस्त प्राणियोंका सम्मिलित धन) है। दो अन्न उसने देवताओंको बाँटे—वे हुत और प्रहुत हैं। इसलिये गृहस्थ पुरुष देवताओंके लिये हवन और बलि अर्पण करता है। कोई ऐसा भी कहते हैं कि ये देवताओंके दो अन्न दर्श और पूर्णमास हैं, इसलिये इन्हें कामनापूर्वक न करे। एक अन्न पशुओंको दिया, वह दुग्ध है। मनुष्य और पशु पहले दुग्धके ही आश्रय जीवन धारण करते हैं, इसलिये उत्पन्न हुए बालक- को पहले घृत चटाते हैं, या स्तनपान कराते हैं, तथा उत्पन्न हुए बछड़ेको भी अतृणाद (तृण भक्षण न करनेवाला) कहते हैं। जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सब इस (पश्वन्न) में ही प्रतिष्ठित हैं। अर्थात् जो प्राणन करते हैं और जो नहीं करते, वे सब हवि दुग्धमे ही प्रतिष्ठित हैं। अतः ऐसा जो कहते हैं कि एक सालतक दुग्धसे हवन करने- वाला पुरुष अपमृत्युको जीत लेता है, सो ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह जिस दिन हवन करता है, उसी दिन अपमृत्युको जीत लेता है [एक सालकी अपेक्षा नहीं करता]। इस प्रकार जाननेवाला (उपासना करनेवाला) पुरुष देवताओं- को सम्पूर्ण अन्नाद्य प्रदान करता है, किंतु सर्वदा खाये जानेपर भी वे अन्न क्षीण क्यों नहीं होते ? इसका कारण यह है कि पुरुष अविनाशी है, वही पुनः-पुनः इस अन्नको उ० अं० ५९—

४६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १

४६६ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय १ उत्पन्न कर देता है । जो भी इस अक्षयभावको जानता है अर्थात् पुरुष ही क्षयरहित है, वही इस अन्नको ज्ञान और कर्मद्वारा उत्पन्न कर देता है, यदि वह इसे उत्पन्न न करता तो यह क्षीण हो जाता—[ ऐसा जो जानता है ] वह प्रतीकके द्वारा—मुख ही प्रतीक है, अतः मुखके द्वारा अन्न भक्षण करता है । वह देवताओंको प्राप्त होता है और अमृतका भोक्ता होता है । यह ( फलश्रुति ) प्रशंसा है ॥ २ ॥ उसने तीन अन्न अपने लिये किये अर्थात् मन वाणी और प्राणको उसने अपने लिये नियत किया । ‘मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं देखा, मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैने नहीं सुना' [ ऐसा जो मनुष्य कहता है, इससे निश्चय होता है कि ] वह मनसे ही देखता है और मनसे ही सुनता है । काम, सङ्कल्प, सशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति (धारणशक्ति), अधृति, लज्जा, बुद्धि, भय—ये सब मन ही हैं । इसीसे पीछेसे स्पर्श किये जानेपर मनुष्य मनसे जान लेता है। जो कुछ भी शब्द है—वह वाक् ही है, क्योंकि यह वाच्यार्थके कथनमें रत है, इसलिये प्रकाश्य नहीं, प्रकाशक है । प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन—ये सब प्राण ही हैं। यह आत्मा ( शरीर ) वाङ्मय, मनोमय और प्राणमय ही है ॥ ३ ॥ तीनो लोक ये ही हैं। वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है । तीनों वेद ये ही हैं । वाक् ही ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है और प्राण सामवेद है । देवता, पितृगण और मनुष्य ये ही हैं। वाक् ही देवता है, मन पितृगण है और प्राण मनुष्य हैं। पिता, माता और सन्तान ये ही हैं। मन ही पिता है, वाक् माता है और प्राण सन्तान है। विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं । जो कुछ विज्ञात है वह वाक्का रूप है । वाक् ही विज्ञाता है। वाक् इस (अपने ज्ञाता) की विज्ञात होकर रक्षा करती है । जो कुछ जिज्ञासाके योग्य है, वह मनका रूप है। मन ही विजिज्ञास्य है । मन विजिज्ञास्य होकर इसकी रक्षा करता है। जो कुछ अविज्ञात है, वह प्राणका रूप है। प्राण ही अविज्ञात है । प्राण अविज्ञात होकर इसकी रक्षा करता है ॥ ४-१० ॥ उस वाक्का पृथिवी शरीर है और यह अग्नि ज्योतीरूप है । इनमे जितनी वाक् है, उतनी ही पृथिवी है और उतना ही यह अग्नि है । तथा इस मनका द्युलोक शरीर है, ज्योतीरूप यह आदित्य है; इनमें जितना मन है, उतना ही द्युलोक और उतना ही वह आदित्य है । वे (आदित्य और अग्नि) मिथुन (पारस्परिक संसर्ग) को प्राप्त हुए। तब प्राण उत्पन्न हुआ । वह इन्द्र है और वह असपत्न— शत्रुहीन है, दूसरा [अर्थात् प्रतिपक्षी ] ही सपत्न होता है । जो ऐसा जानता है, उसका सपत्न नहीं होता । तथा इस प्राणका जल शरीर है, वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है । इनमें जितना प्राण है, उतना ही जल है और उतना ही वह चन्द्रमा है । ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं । जो कोई इन्हें अन्तवान् समझकर उपासना करता है, वह अन्तवान् लोकपर जय प्राप्त करता है और जो इन्हें अनन्त समझकर उपासना करता है, वह अनन्त लोकपर जय प्राप्त करता है ॥ ११-१३ ॥ इस सवत्सररूप प्रजापतिकी सोलह कलाएँ ( अङ्ग ) हैं। उसकी तिथियाँ ही पन्द्रह कलाएँ हैं, इसकी सोलहवीं कला ध्रुवा (नित्य) है। वह तिथियोंके द्वारा ही [ शुक्लपक्षमें ] वृद्धिको प्राप्त होता है तथा [कृष्णपक्षमें] क्षीण होता है । अमावास्याकी रात्रिमें वह (चन्द्रमा ) इस सोलहवीं कलासे इन सब प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट हो फिर [ दूसरे दिन ] प्रातःकालमें उत्पन्न होता है। अतः इस रात्रिमें किसी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे, यहाँतक कि इसी देवताकी पूजाके लिये [ इस रात्रिमें ] गिरगिटके भी प्राण न ले ॥ १४ ॥ जो भी यह सोलह कलाओंवाला सवत्सर प्रजापति है, यह वही है जो कि इस प्रकार जाननेवाला पुरुष है। वित्त ही उसकी पंद्रह कलाएँ हैं तथा आत्मा (शरीर) ही उसकी सोलहवी कला है । वह वित्तसे ही बढता और क्षीण होता है । यह जो आत्मा (पिण्ड) है, वह नभ्य ( रथचक्रकी नाभिरूप) है और वित्त प्रधि (रथचक्रका बाहरका घेरा— नेमि) है । इसलिये यदि पुरुष सर्वस्वहरणके कारण ह्रासको प्राप्त हो जाय, किंतु शरीरसे जीवित रहे, तो यही कहते कि केवल प्रधिसे ही क्षीण हुआ है ॥ १५ ॥ अब मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक—ये ही तीन लोक हैं । वह यह मनुष्यलोक पुत्रके द्वारा ही जीता जा सकता है, किसी अन्य कर्मसे नहीं । तथा पितृलोक कर्मसे और देवलोक विद्या (उपासना) से जीते जा सकते हैं। लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ है, इसलिये विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥ अब सम्प्रत्ति [ कही जाती है—] जब पिता यह समझता है कि मैं मरनेवाला हूँ तब वह पुत्रसे कहता है— 'तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है।' वह पुत्र बदलेमें कहता

ब्राह्मण ५ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४६७

ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६७ है—'मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।' जो कुछ भी स्वाध्याय है, उस सबकी 'ब्रह्म' यह एकता है। जो कुछ भी यज्ञ हैं, उनकी 'यज्ञ' यह एकता है। और जो कुछ भी लोक हैं, उनकी 'लोक' यह एकता है। यह इतना ही गृहस्थ पुरुषका सारा कर्तव्य है। [ फिर पिता यह मानने लगता है कि ] यह मेरे इस भारको लेकर इस लोकसे जानेपर मेरा पालन करेगा। अतः इस प्रकार अनुशासन किये हुए पुत्रको 'लोक्य' (लोकप्राप्तिमें हितकर ) कहते हैं। इसीसे पिता उसका अनुशासन करता है। इस प्रकार जाननेवाला वह पिता जब इस लोकसे जाता है, तब अपने इन्हीं प्राणोंके सहित पुत्रमें व्याप्त हो जाता है। यदि किसी कोणाच्छिद्र (प्रमाद ) से उस (पिता) के द्वारा कोई कर्तव्य नहीं किया होता है तो उस सबसे पुत्र उसे मुक्त कर देता है। इसीसे उसका नाम 'पुत्र' है। वह पिता पुत्रके द्वारा ही इस लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर उसमें ये हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृत प्राण प्रवेश करते हैं ॥ १७ ॥ पृथिवी और अग्निसे इसमे दैवी वाक्‌का आवेश होता है। दैवी वाक् वही है, जिससे पुरुष जो जो भी बोलता है, वही- वही हो जाता है। द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मनका आवेश हो जाता है। दैव मन वही है, जिससे यह सुखी ही होता है, कभी शोक नहीं करता। जल और चन्द्रमासे इसमें दैव प्राणका आवेश हो जाता है। दैव प्राण वही है, जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न नष्ट ही होता है। इस प्रकार जाननेवाला वह समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है। जैसा यह देवता (हिरण्यगर्भ) है, वैसा ही वह हो जाता है। जिस प्रकार समस्त प्राणी इस देवताका पालन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करनेवालेका समस्त भूत पालन करते हैं। जो कुछ ये जीव शोक करते हैं, वह (शोकादिजनित दुःख) उन्हींके साथ रहता है। इसे तो पुण्य ही प्राप्त होता है, क्योंकि देवताओंके पास पाप नहीं जाता ॥ १८-२० ॥ अब यहाँसे व्रतका विचार किया जाता है। प्रजापतिने कर्मों (कर्मके साधनभूत वागादि करणों) की रचना की। रचे जानेपर वे एक दूसरेसे स्पर्धा करने लगे। वाक्‌ने व्रत किया कि 'मैं बोलती ही रहूँगी' तथा 'मै देखता ही रहूँगा' ऐसा नेत्रने और 'मै सुनता ही रहूँगा' ऐसा श्रोत्रने व्रत किया। इसी प्रकार अपने-अपने कर्मके अनुसार अन्य इन्द्रियोने भी व्रत किया। तब मृत्युने श्रम होकर उनसे सम्बन्ध किया और उनमे व्याप्त हो गया। उनमें व्याप्त होकर मृत्युने उनका अवरोध किया। इसीसे वाक् श्रमित होती ही है, नेत्र श्रमित होता ही है, श्रोत्र श्रमित होता ही है; किंतु यह जो मध्यम प्राण है, इसमें वह (मृत्यु) व्याप्त न हो सका। तब उन इन्द्रियोंने उसे जाननेका निश्चय किया। 'निश्चय यही हममें श्रेष्ठ है, जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न क्षीण ही होता है। अच्छा, हम सब भी इसीके रूप हो जायँ'—ऐसा निश्चयकर वे सब इसीके रूप हो गयीं। अतः वे इसीके नामसे 'प्राण' इस प्रकार कही जाती हैं। इसीसे जो ऐसा जानता है, वह जिस कुलमें होता है, वह कुल उसीके नामसे बोला जाता है। तथा जो ऐसे विद्वान्‌से स्पर्धा करता है, वह सूख जाता है और सूखकर अन्तमें मर जाता है। यह अध्यात्म-प्राणदर्शन है ॥ २१ ॥ अब अधिदैवदर्शन कहा जाता है—अग्निने व्रत किया कि 'मैं जलता ही रहूँगा।' सूर्यने नियम किया, 'मैं तपता ही रहूँगा।' तथा चन्द्रमाने निश्चय किया, 'मै प्रकाशित ही होता रहूँगा।' इसी प्रकार अन्य देवताओंने भी यथादैवत (जिस देवताका जो व्यापार था, उसीके अनुसार) व्रत किया। जिस प्रकार इन वागादि प्राणोंमें मध्यम प्राण है, उसी प्रकार इन देवताओंमें वायु है, क्योंकि अन्य देवगण तो अस्त हो जाते हैं, किंतु वायु अस्त नहीं होता। यह जो वायु है, अस्त न होनेवाला देवता है ॥ २२ ॥ इसी अर्थका प्रतिपादक यह मन्त्र है—'(जिस (वायुदेवता) से (चक्षुरूप) सूर्य उदय होता है और जिसमें वह अस्त होता है' इत्यादि। यह प्राणसे ही उदित होता है और प्राणमें ही अस्त हो जाता है। उस धर्मको देवताओंने धारण किया है। वही आज है और वही कल भी रहेगा। देवताओंने जो व्रत उस समय धारण किया था, वही आज भी करते हैं। अतः एक ही व्रतका आचरण करे। प्राण और अपान-व्यापार करे। मुझे कहीं पापी मृत्यु व्याप्त न कर ले—इस भयसे [ इस व्रतका आचरण करे]। और यदि इसका आचरण करे तो इसे समाप्त करने- की भी इच्छा रक्खे। इससे वह प्राणरूप इस देवतासे सायुज्य और सालोक्य प्राप्त करता है ॥ २३ ॥

४६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १

४६८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय १ षष्ठ नाम-रूप और कर्म यह नाम, रूप और कर्म—तीनका समुदाय है। उन नामोंकी 'वाक्' यह उक्थ (कारण) है, क्योंकि सारे नाम इसीसे उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है। यही सब नामोंमें समान है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त नामोंको धारण करती है। अब, रूपोंका चक्षु समन्वय है, यह इसका उक्थ है। इसीसे सारे रूप उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त रूपोंके प्रति सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त रूपोंको धारण करता है। अब, कर्मोंका समन्वय आत्मा (शरीर) है। यह इनका उक्थ है। इसीसे सब कर्म उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त कर्मोंके प्रति सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त कर्मोंको धारण करता है। ये तीन होते हुए भी एक आत्मा हैं और आत्मा भी एक होते हुए इन तीन रूपोंमें है। वह यह अमृत सत्यसे आच्छादित है। प्राण ही अमृत है और नाम रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है ॥ १-३ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥