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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

५५६ कथासरित्सागर

५५६ कथासरित्सागर

इति रहसि निशम्य विष्णुदत्तात् सरसकथाप्रकरं स शक्तिदेवः। भुवि कनकपुरीवलोकनेऽपी धृतिमवलम्ब्य निनाय च त्रियामाम् ॥१९८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे चतुरदारिका लम्बके द्वितीयस्तरङ्गः।

तृतीयस्तरङ्गः शक्तिदेवस्य कनकपुरीं प्रति प्रस्थानम् ततस्तत्रोत्स्यरुद्वीपे प्रभाते तं मठस्थितम्। शक्तिदेवं स दाशेन्द्रं सत्यव्रत उपाययौ ॥१॥ स च प्राक्प्रतिपन्नं सङ्घपेटयनमभाषत। प्रह्लांस्त्वदिष्टसिद्धयर्थमुपायश्चिन्तितो मया ॥२॥ अस्ति द्वीपवरं मध्ये रत्नकूटाख्यमम्बुधेः। कृतप्रतिष्ठस्तत्रास्ते भगवान्हरिरम्बिनः॥३॥ आषाढशुक्लद्वादश्यां तत्र यात्रोत्सवे मुदा। आयान्ति सर्वद्वीपेभ्यः पूजाय यत्नतो जनाः ॥४॥ तत्र ज्ञायत कनकपुरी सा जातुचित् पुरी। तदेहि तत्र गच्छावः प्रत्यासन्ना हि सा तिथिः ॥५॥ इति सत्यव्रतेनोक्तं शक्तिदेवस्तथेति सः। जग्राह हृष्टं पाथेयं विष्णुदत्तोपकल्पितम् ॥६॥ ततो वहनमारुह्य स सत्यव्रतढौकितम्। तेनैव साकं त्वरितं प्रायाद् वारिधिवर्त्मना ॥७॥ गच्छंश्च तत्र स द्वीपनि भनक्ते'ऽम्बुतालप । सत्यव्रतं तं पप्रच्छ क्षणमारतया स्थितम् ॥८॥ इतो दूरं महाभोगं किमेतद्दृश्यतेऽम्बुधौ। यदृच्छाप्रोत्सृगतोदप्रसपक्षगिरिविभ्रमम् ॥९॥


१ समुद्रे 'हैल'प्रभृतयो हीनकुत्सा मत्स्या भवन्तीति प्रसिद्धिः।

द्वितीय तरंग समाप्त

विष्णुदत्त से इस प्रकार एकान्त रात्रि में परम कथा सुनकर उस शक्तिदेव ने हृदय में कनकपुरी देखने की अभिलाषा रखते हुए धैर्य के साथ वह रात्रि व्यतीत की ॥२९८॥ द्वितीय तरंग समाप्त

तृतीय तरंग शक्तिदेव का कनकपुर के लिए प्रस्थान तदनन्तर उस उत्स्थल द्वीप के मठ में ठहरे हुए शक्तिदेव के समीप नाविकों का सरदार सत्यव्रत आया ॥१॥ उसने पहले ही शक्तिदेव से कनकपुरी का पता लगाने की प्रतिज्ञा की थी। इसीलिए उसने आकर शक्तिदेव से कहा—'हे ब्राह्मणदेव मैने तुम्हारी इष्ट-सिद्धि का एक उपाय सोचा है ॥२॥ समुद्र के मध्य रत्नकूट नाम का एक द्वीप है। उसमें समुद्र में भगवान् विष्णु की स्थापना की है॥३॥ आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को वहाँ यात्रा का मेला लगता है। उस अवसर पर भगवान् विष्णु के पूजन के लिए सभी द्वीपों से यात्री आते हैं ॥४॥ वहाँ जाने पर सम्भव है कि किसी यात्री से उस कनकपुरी का पता लग सके। इसलिए चलो वहीं चलें। वह तिथि (द्वादशी) भी समीप ही है॥५॥ सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर शक्तिदेव ठीक है ऐसा कहकर चलने को उद्यत हुआ और विष्णुदत्त द्वारा बनाया गया पाथेय उसने साथ ले लिया ॥६॥ तदनन्तर वह सत्यव्रत के चलाए हुए जहाज में उसी के साथ शीघ्र ही समुद्री मार्ग से चला गया ॥७॥ टापुओं के समान बड़े-बड़े मत्स्यों से भरे हुए और आश्चर्यों के भवन उस समुद्र में जाते हुए उसने नाव को ले जाते हुए सत्यव्रत से पूछा कि 'यहाँ से दूर पर महँगा निकला हुआ पक्ष-सहित पर्वत के समान वह क्या दीख रहा है? ॥८-९॥

५५८ कथासरित्सागर

५५८ कथासरित्सागर

ततः सत्यव्रतोऽवादीदसौ दवो वटद्रुमः। अस्याधः सुमहावर्त्तमधस्ताद् वडवामुखम् ॥११०॥ एतच्च परिवर्त्यैव प्रदेशमिह गम्यते । अत्रावर्त्ते गतानां हि न भवत्यागमः पुनः ॥१११॥ इति सत्यव्रते तस्मिन् वदत्यवाम्बुवेगतः । तस्यामेव प्रवृत्ते गन्तुं तद्वहनं दिशि ॥११२॥ तद्दृष्ट्वा शक्तिधव स पुनः सत्यव्रतोऽब्रवीत् । ब्रह्मन् ! विनाशकालोऽय ध्रुवमस्माकमागतः ॥११३॥ यदकस्मात् प्रवहणं पश्यात्रैव प्रमाथ्यते । शक्यत नैव रोद्धुं च कथमप्यधुना मया ॥११४॥ तदावर्त्ते गभीरेऽद्य वयं मृत्योरिवानने। क्षिप्ता एवाम्बुनाकृष्य कर्मणेव' बलीयसा ॥११५॥ एतच्च नैव मे दुःखं शरीरं कस्य हि स्थिरम्। दुःखं तु यन्न सिद्धस्ते कृच्छ्रेणापि मनोरथः ॥११६॥ एतावद् वारयाम्येतदहं प्रवहणं मनाक। तावदस्यावलम्बस्वा- शाखां वटवरोद्गताम् ॥११७॥ कदाचिज्जीवितोपायो भवेद् भव्याकृतेस्तव । विधेर्विलासगम्भीरेष्व तरङ्गानको हि तर्कयेत् ॥११८॥ इति सत्यव्रतस्यास्य धीरसत्त्वस्य जल्पतः । बभूव निकटे तस्म तरोः प्रवहणं क्षणात् ॥११९॥ तत्क्षणं स कृतोत्फालः शक्तिदेवो विसाध्वसः । पृथुलामग्रहीच्छाखां तस्याम्बिटशालिनः ॥१२०॥ सत्यव्रतस्तु महता वेगेन वहनेन च। परावर्त्तस्खलितनात्र विवेश वडवामुखम् ॥१२१॥ शक्तिदेवश्च शाखाभि पूरिताक्षस्य तस्य सः। आधिरूयापि तरो शाखां निराशः समचिन्तयत् ॥१२२॥ न सावस्था च कनकपुरी दृष्टा मया पुरी। अपथे मग्नता तावद्दाक्षेन्द्रेणोऽप्येष माश्रितः ॥१२३॥ यदि वा सततन्यस्तपदा सर्वस्य मूर्धनि। कामं भगवती केन भज्यत भवितव्यता ॥१२४॥


१ आप्येनेत्यर्थः ।

पंचम लम्बक ५५५

पंचम लम्बक ५५५ यह सुनकर सत्यव्रत ने कहा—वह वटवृक्ष रूपी देवता है। इसके नीचे आनेवाले आवर्त्त (भँवर) को बड़वानल (समुद्री अग्नि) का मुँह बताते हैं। इसीलिए नाववाल उस स्थान को छोड़कर चलते हैं, क्योंकि उस भँवर म पड़ हुए लोग फिर लौटते नहीं ॥१०-११॥ जबतक सत्यव्रत इस प्रकार कह ही रहा था इतने में ही उसकी नाव पानी के वेग से उसी ओर बढ़ गई ॥१२॥ यह देखकर सत्यव्रत ने शक्तिदेव से फिर कहा—'ब्राह्मण देवता ! हमारे विनाश का समय आ गया है । ॥१३॥ क्योकि यह नाव अकस्मात् उसी ओर बही जा रही है। इसे अब मैं किसी तरह भी नहीं रोक सकता ॥१४॥ हम लोग मृत्य-मुख के समान इस गहरे भँवर म पड़ गये हैं। हमें बलवान् कर्म के समान वेगवान् जल ने इसमें ढकेल दिया है ॥१५॥ मुझे मृत्य का दुख नहीं है किसका शरीर अमर रहा है ? दुःख केवल इसी बात का है कि इतना कष्ट उठाने पर भी तुम्हारे कार्य म सफलता न मिली ॥१६॥ मैं भरसक नाव को कुछ हटाने का यत्न कर रहा हूँ। तुम शीघ्र ही उस वटवृक्ष की शाखा को पकड़ने का यत्न करना ॥१७॥ तुम भव्य (सुन्दर) आकृतिवाले हो। सम्भव है तुम्हारा कल्याण हो। दैव के विधानों और सुदृढ़ तरंगों को कौन जान सकता है ॥१८॥ धैर्यस्वामी सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर नाव वटवृक्ष के पास आ गई। उसी समय शक्तिदेव ने बिना व्याकुलता के उछलकर वटवृक्ष की एक बड़ी शाखा पकड़ ली ॥१९-२ ०॥ किन्तु सत्यव्रत परोपकार के लिए निर्मित नाव से और अपने शरीर से वडवानल के मुख में चला गया ॥२१॥ शक्तिदेव भी शाखाओं से आशा को पूर्ण करनेवाले उस वृक्ष की शाखा पर आश्रय पाकर, निराश हो सोचने लगा। मैंने कनकपुरी अभी तक नहीं देखी और ऐस अवसर पर धीरप्रवर सत्यव्रत को भी खो दिया। मर्त्य के सिर पर पैर रखकर गई अविभव्यता (होनहार) को कौन मिटा सकता है ॥२२-२४॥

५६० कथासरित्सागर

५६० कथासरित्सागर इत्यवस्थोचितं तस्य तत्तच्चिन्तयतस्तदा । विप्रसूनोस्तरुस्कन्धे दिनं तत्पर्यहीयत ॥१२५॥ सायं च सवतंस्तस्मिन् स महाविहगान् बहून् । वनवृक्षां प्रविशतः शब्दापूरितदिगन्तरान् ॥१२६॥ अपश्यत् पृथुसत्पक्षवातधूतानवोर्मिभिः । गुहाम् परिचयप्रीत्या कृतप्रत्युद्गमानिव ॥१२७॥ तत शाखाविलीनानां रा तेषां पक्षिणां मिथः । मनुष्यवाचा संलापं पत्रोच्छेच्छ्रिताञ्च्छृणोत् ॥१२८॥ कश्चिद् द्वीपान्तरं कश्चिद् गिरि कश्चिद् दिगन्तरम् । तदहश्चरणस्थानमर्चं समवर्णयत् ॥१२९॥ एकश्च वृद्धविहगस्तयां मध्यादभाषत । अहं विहर्तुं कनकपुरीमद्य गतोऽभवम् ॥१३०॥ प्रात पुनश्च तत्रैव गन्तास्मि भरित गुहाम् । क्षमावहेन शोण्यो म पितूरगमनेन हि ॥१३१॥ दृश्यवाण्णुपुत्त्यासाग्रदुदेनास्य पक्षिणः । वधमा सान्त्वनाप मन् पक्षिम्वो व्यचिन्तयत् ॥१३२॥ न्ष्टिया मामयब मगरी तत्प्राप्य माययम म । उपाय गमहापाया विम्गो वाहनीकृत ॥१३३॥ इत्यालोच्य धनरदस्य तस्य गृध्यस्य पक्षिण । पुच्छानान्तर गोप्य गस्तित्वा व्यनीयत ॥१३४॥ प्रातश्चतत्रागाध गभणाग्रय पक्षिणु। ग क्त्वा र्गन्ताम्यकान्ताशा विविपया ॥१३५॥ दशास्यन् यन् पूरा गविम्यसमधितम्। शणान्तथ्यकनकपुरी सा पक्षि गुत ॥१३६॥ तथोद्यानान्तर तत्सिप्ररहि विमुक्तम् । ग सच्छित्वा निभृत सन्त गुप्तन्वागात् ॥१३७॥ भाग्येष च गन्ताच्छादाद् भार्या त ग । स गुताश्चन्तश्च कश्चित् त्त याचितो ॥१३८॥ गत्वा नगर च सर्ववृत्तान्तमैक्षत । गोपूपुर इन्दोत्र व षष्ट दमानीता ॥१३९॥

पंचम लम्बक ५६१

पंचम लम्बक ५६१ उस ब्राह्मण युवक के इस प्रकार समयानुसार सोचते हुए वह सारा दिन समाप्त हो गया ॥२५॥ सायंकाल होते ही उसने उस वृक्ष पर अपने शब्दों से दिशाओं को मुखरित करनेवाले बड़े-बड़े पक्षियों को देखा॥२६॥ बड़े-बड़े पंखों की वायु से समुद्र में लहर-सी उठाते हुए मीनों का उसने देखा जो मानों परिचय और प्रेम के कारण उसे लेने के लिए आये हों॥२७॥ तदनन्तर उसने पत्रों की झुरमुट में छिपे हुए और शाखाओं में चिपके हुए एवं मनुष्यों की वाणी में होनेवाले वार्त्तालापों को सुना॥२८॥ वहाँ जो उस दिन चरने गये थे उनमें से कोई किसी नवीन द्वीप का कोई पक्षी किसी पर्वत का और कोई किसी दिशा का वर्णन कर रहा था ॥२९॥ उनमें से एक वृद्ध पक्षी ने कहा— आज मैं चरने के लिए कनकपुरी गया गया था। प्रातःकाल फिर वहीं सुख से चरने के लिए जाऊँगा। व्यर्थ थकावट देनेवाले दूरदेश में जाने से क्या काम ? ॥३०-३१॥ इस प्रकार सहसा अमृत के सार के समान उस पक्षी के वचन से शक्तिदेव का हृदय शान्त हुआ और वह सोचने लगा॥३२॥ भाग्य से कनकपुरी का पता तो लगा किन्तु उसे प्राप्त करने के साधन-स्वरूप अब इस पक्षी को वाहन बनाना है॥३३॥ वह ऐसा सोचकर और धीरे-धीरे चलकर सोये हुए उस वृद्ध पक्षी के पास पहुँचा और उसके पंखों के अन्दर जाकर चिपक गया॥३४॥ प्रातःकाल होते ही अन्य पक्षियों के इधर उधर उड़ जाने पर दैव के समान पक्षपात करता हुआ वह पक्षी भी कन्धे पर छिपे हुए शक्तिदेव को लेकर चरने के लिए क्षणभर में कनकपुरी पहुँचा ॥३५ ३६॥ कनकपुरी के एक उद्यान में उतरकर उस पक्षी के बैठ जाने पर शक्तिदेव धीरे-से उसकी पीठ से नीचे उतर आया॥३७॥ तत्पश्चात् वह उससे दूर हटकर उस उद्यान में घूमने लगा। घूमते हुए उसने पुष्प-चयन में लगी हुई दो स्त्रियों को देखा॥३८॥ शक्तिदेव को देखकर चकित हुई उन स्त्रियों के समीप जाकर उसने पूछा— यह कौन स्थान है और तुम लोगों कौन हो ? ॥३९॥ ७१

५६२ कथासरित्सागर

५६२ कथासरित्सागर इयं कनकपुर्याख्या पुरी विद्याधरास्पदम्। चन्द्रप्रभेति चैतस्यामास्ते विद्याधरी सती ॥४०॥ तस्याश्चावामिहोद्याने जानीह्युद्यानपालिके। पुष्पोच्चयस्तदर्थोऽयमिति ते च तमूचतुः ॥४१॥ ततः सोऽप्यवदद् विप्रो युवां म कुरुतं तथा। यथाहमपि पश्यामि तां युष्मत्स्वामिनीमिह ॥४२॥ एतच्छ्रुत्वा तथेत्युक्त्वा नीतवत्यावुभे च ते। स्त्रियावन्तर्नगर्भास्तं युवानं राजमन्दिरम् ॥४३॥ सोऽपि प्राप्तस्तदद्राक्षीन्माणिक्यस्तम्भभास्वरम्। सौधमभ्रंलिहस्फोतकेतनं सम्पद्दामिव ॥४४॥ तत्रागतं च दृष्ट्वा तं सर्वः परिजनोऽब्रवीत्। गत्वा चन्द्रप्रभायास्तं मानुषागममद्भुतम् ॥४५॥ साप्यादिश्य प्रतीहारमभिसञ्चितमेव तम्। अभ्यन्तरं स्वमीकेतं विप्रं प्रावेशयत्ततः ॥४६॥ प्रविष्टः सोऽप्यपश्यत्तां तत्र नेत्रोत्सवप्रदाम्। धातुर्युवतिनिर्माणपर्याप्तिमिव रूपिणीम् ॥४७॥ सा च सद्रत्नपर्यङ्काद्दूरादुत्थाय तं स्वयम्। स्वागतेनाद्रुतवती तद्दर्शनवशीकृता ॥४८॥ उपविष्टमपृच्छाञ्च कल्याणिन् कस्त्वमीदृशः। कथं च मानुषागम्यामिमां प्राप्तो भवान्भुवम् ॥४९॥ इत्युक्तः स तया चन्द्रप्रभया सकुतूहलम्। शशंसिदेवो निजं देशं जातिं चाथ नाम च ॥५०॥ मत्पुरीङ्गनपगात्राञ्जु तां राजकन्यकाम्। यथा कनकनरेणाप्राप्तागतस्तदवदत्तत् । ५१ ॥ तद्बुद्ध्वा किमपि ध्यात्वा दीर्घं निःश्वस्य सा ततः । चन्द्रप्रभा च विजनं शशिशेखरमभाषत ॥५२॥ नूनं त्वां दर्शिनं तद्धितैषिणा सुभग! गच्छति। : अगस्त्यो गतिगन्धाढ्यो विद्याधरपतिर्भुवि ॥५३॥ : यष तस्य कनकप्रभः जाता दुहितरः प्रमात् । : उत्पन्ना चन्द्रप्रभाप्यस्मि चन्द्रगति चारु ॥५४॥

पंचम लम्बक ५६३

पंचम लम्बक ५६३ उत्तर में वे बोलीं—'यह कनकपुरी नाम की नगरी विद्याधरों का स्थान है। यहाँ चन्द्र- प्रभा नाम की विद्याधरी है। हमें उसी की उद्यानपालिका (मालिन) समझो। यह पुष्प हम उसी के लिए चुन रही हैं' ॥४०-४१॥ तब वह ब्राह्मण कहने लगा कि 'तुमलोग ऐसा यत्न करो कि जिससे मैं तुम्हारी स्वामिनी को देख सकूँ' ॥४२॥ ऐसा सुनकर और उसे स्वीकार कर वे दोनों उस युवक को नगरी के अन्दर स्थित राजभवन में ले गईं ॥४३॥ राजभवन में जाकर उसने मणिमय के स्तम्भों और सोने की दीवारों से चमकते हुए लक्ष्मी के भवन के समान उस भवन को सम्पत्तियों का निवास-स्थान समझा ॥४४॥ भवन में आये हुए उसे देखकर चन्द्रप्रभा की सभी सेविकाओं ने जाकर अपनी स्वामिनी से मनुष्य के आश्चर्यमय आगमन की सूचना दी ॥४५॥ चन्द्रप्रभा ने भी अपने प्रतीहार को आज्ञा देकर शीघ्र ही उसे भवन के भीतर अपने निकट बुला लिया ॥४६॥ अन्दर आये हुए उस शक्तिदेव ने आँखों को आनन्द-देनेवाली और विधाता के आश्चर्यमय निर्माण की मूर्त्तिमती सीमा के समान उस चन्द्रप्रभा को देखा ॥४७॥ वह चन्द्रप्रभा उसे देखकर सुन्दर रत्नों के पलँग से उठकर उसका स्वागत करने के लिए आदर के साथ आगे बढ़ी ॥४८॥ शक्तिदेव के प्रथम दर्शन-मात्र से ही उसके वश में हुई चन्द्रप्रभा उसके बैठन पर कहने लगी—हे कल्याणमय ! मनुष्यों के लिए अगम्य इस भूमि में तुम कैसे आ गये ? चन्द्रप्रभा द्वारा उत्सुकता से इस प्रकार पूछे जाने पर शक्तिदेव ने अपना देश, अपनी जाति और नाम बताकर यह बताया कि कनकपुरी देखने की प्रतिज्ञा पर राजकुमारी कनकरेखा को प्राप्त करने के लिए यहाँ आया हूँ। इस प्रसंग का समस्त वृत्तान्त उसने चन्द्रप्रभा को सुना दिया ॥४९-५१॥ यह सब सुनकर, कुछ सोचकर तथा लम्बी साँस लेकर चन्द्रप्रभा ने एकान्त में शक्तिदेव से कहा—सुनो, मैं तुमसे यह कहती हूँ। इस भूमि पर शशिखण्ड नाम का विद्याधर राज्य करता है। उसकी क्रमशः हम चार कन्याएँ हैं। सबसे बड़ी चन्द्रप्रभा मैं हूँ दूसरी चन्द्ररेखा है ॥५२-५४॥

५६४ कथासरित्सागर

५६४ कथासरित्सागर रुधिरक्ता तृतीया च चतुर्थी च शशिप्रभा । ता वयं क्रमशः प्राप्ता वृद्धिमत्र पितुर्गृहे ॥५५॥ एकदा च भगिन्यो मे स्नातुं तिस्रोऽपि ताः समम् । मयि कन्याव्रतस्थायां जग्मुर्मन्दाकिनीतटम् ॥५६॥ तत्राप्रयतपसं नाम मुनिं यौवनदर्पतः । तोयजन्तून्समसिञ्चन्नारब्धजलकेलयः ॥५७॥ अतिनिर्बन्धिनीस्ताश्च मुनिः क्रुद्धः शशाप सः । शुनकन्यका प्रजायध्वं मर्त्यलोकेऽखिला इति ॥५८॥ तद्बुद्ध्वा सोऽस्मदीयेन पित्रा गत्वा प्रसादितः । पृथक् पृथक् स शापान्तमुक्त्वा तासां यथायथम् ॥५९॥ जातिस्मरत्वं दिव्येन विज्ञानेनोपबृंहितम् । मर्त्यभावेन सर्वासामादिदेश महामुनिः ॥६०॥ ततस्तासु तनूस्त्यक्त्वा मर्त्यलोकं गतासु सः । दत्त्वा मे नगरीमेतां पिता गङ्गाड् गतो वनम् ॥६१॥ अथाहं निवसन्तीं मां देवी स्वप्ने किलाम्बिका । मामुप पुत्रि ! भर्ता ते भवितेति समादिशत् ॥६२॥ ततो विद्याधरांस्तांस्तान् वरानुद्दिशतो बहून् । पितुर्विधारणं कृत्वा कन्यैवाद्याप्यहं स्थिता ॥६३॥ इदानीं चामुनाऽद्यैवमयनागमननेन ते । वपुषा च शरीरेण तुभ्यमवाहमर्पिता ॥६४॥ तद्व्रजामि चतुर्दश्यामागमिष्या भवत्कृते । भर्तुः तातस्य विसृष्टिमृषभागस्य महागिरिम् ॥६५॥ तत्र तस्यां तिथौ सर्वे मिलन्ति प्रतिवत्सरम् । देवं हरं पूजयितुं दिव्या विद्याधरास्तथा ॥६६॥ तत्रागतेन पायासि त्त्वनुगम्यास्य च । इहागच्छाम्यहं तूर्णं मां परिणयस्व माम् ॥६७॥ मनिष्ट मार्थनयुक्त्या मा न विद्याधरोऽपित । अन्यथा शङ्कित मन्त्रयोगप्रभावतः ॥६८॥ तस्य चामुद्रयानेन विख्याताय गृहम् । पराशरस्यास्य गृणनृदनिमञ्जन ॥६९॥

पंचम लम्बक ५६५

पंचम लम्बक ५६५

तीसरी शशिरेखा है और चौथी शशिप्रभा है। हम चारों पिता के घर में बड़ी हुईं। एक बार मुझसे छोटी वे तीनों बहिनें साथ ही गंगा-स्नान के लिए गईं॥५५-५६॥ वे तीनों यौवन-मद में मस्त होकर जलक्रीड़ा करती हुई उतथ्य नामक ऋषि को पानी से सींचने लगीं॥५७॥ ऋषि के बार-बार मना करने पर भी जब बह न मानीं तब क्रुद्ध होकर उसने शाप दिया कि 'तुम तीनों दुष्ट कन्याएँ मर्त्यलोक में उत्पन्न होओ'॥५८॥ इस शाप का समाचार सुनकर हमारे पिता ने ऋषि का अनुनय-विनय करके प्रसन्न किया तो ऋषि उनके शाप का अन्त पृथक्-पृथक् रूप में किया किन्तु दिव्य ज्ञान से जुड़े हुए पूर्वजन्म के स्मरण को मानव-जन्म में भी बने रहने का आदेश दिया॥५९-६०॥ तब उन तीनों के अपने-अपने विद्याधर-शरीर को छोड़कर मर्त्यलोक में चले जाने पर मेरे पिता यह नगरी मुझे देकर वन को चले गये॥६१॥ तदनन्तर यहाँ रहती हुई मुझे स्वप्न में माता पार्वती ने यह आदेश दिया कि 'बेटी तेरा पति मनुष्य होगा'॥६२॥ इसी कारण विद्याधर आदि के अनेक वीरों को छोड़कर मैं अभी तक कन्या ही रह गई॥६३॥ इस समय तुम्हारे इस आश्चर्यमय जयमन्त्र ने और तुम्हारे सुन्दर शरीर ने मुझे अपने वश में कर लिया। फलतः तुम्हारे इन सब आश्चर्यों ने ही मुझे अपने को तुम्हारे लिए अर्पण करने को बाध्य कर दिया है॥६४॥ इसलिए आगामी चतुर्दशी के दिन तुम्हारे इस प्रसंग को पिता को सूचित करने मैं ऋषभ नामक पर्वत पर जाऊँगी॥६५॥ वहाँ प्रतिवर्ष उस अवसर पर शिवपूजन के लिए मेला लगता है और सभी दिशाओं से बड़े बड़े विद्याधर आते हैं॥६६॥ वहीं मेरे पिता भी आते हैं। अतः वहाँ जाकर उनसे आज्ञा लेकर मैं शीघ्र ही आती हूँ तत्पश्चात् तुम मुझसे विवाह कर लो॥६७॥ तबतक यहाँ ठहरो—ऐसा कहकर उसने विद्याधरों के अनुरूप विविध उपचारों से शक्तिदेव का स्वागत-सत्कार किया॥६८॥ वहाँ रहकर उन दिव्य भोगों का उपभोग करते हुए उसे ऐसा सुख प्राप्त हुआ जैसे दावाग्नि से दग्ध (झुलसे हुए) व्यक्ति को अमृत-सरोवर में स्नान करने से होता है॥६९॥

५९९ कथासरित्सागर

५९९ कथासरित्सागर प्राप्तायां च चतुर्दश्यां सा तं चन्द्रप्रभाब्रवीत्। अद्य गच्छामि विज्ञाप्य तातस्याहं भवत्कृतम् ॥७०॥ सर्वं परिजनश्चायं मयैव सह यास्यति। त्वया त्वकाकिना दुःखं न भाव्यं दिवसद्वयम् ॥७१॥ एकेन पुनरतस्मिन्मन्दिरेऽप्यवतिष्ठता। मध्यमा भवता भूमिर्नारोढव्या कथञ्चन ॥७२॥ इत्युक्त्वा सा युवानं स यस्तस्थिता तदन्तिके। तदीयचित्तानुगता ययौ चन्द्रप्रभा ततः ॥७३॥ सोऽप्येकाकी ततस्तत्र स्थितश्चन्ता विनोदयन्। स्थानस्थानञ्च बभ्राम शक्तिदेवा महर्द्धिषु ॥७४॥ किंसविदद्य निषिद्धं मे तया पृष्ठेऽधिरोहणम्। विद्याधरदुहित्रेति जातकौतूहलोऽथ सः ॥७५॥ तस्यैव मध्यमां भूमिं मन्दिरस्यारुगेह् ताम्। प्रायो वारितवामा हि प्रवृत्तिर्मनसो नृणाम् ॥७६॥ आरूढस्तत्र चापश्यद् गुप्तान् स्त्रीन् रत्नमण्डपान्। एकं चोद्घाटितद्वारं तन्मध्यात् प्रविवेश सः ॥७७॥ प्रविश्य चान्तः सद्रत्नपर्यङ्के न्यस्ततूलिके। पटावगुण्ठिततनुं शयानं कञ्चिदक्षत ॥७८॥ वीक्षते यावदुत्क्षिप्य पटं सार्थमृतां तथा। परोपकारिनृपतस्तनयां वरनयकाम् ॥७९॥ दृष्ट्वा चाचिन्तयत्तत्सोऽप्यं किमिदं महदद्भुतम्। किमप्रयोधमुप्तेयं किं वा भ्रान्तिरथाथवा ॥८०॥ यस्याः कृते प्रवासोऽयं मम सर्वेह तिष्ठति। ममाद्यपगतप्राणा तत्र देशे च जीवति ॥८१॥ अम्लानकान्तिरस्याश्च तद् विद्याया मम ध्रुवम्। कमापि चारुनटमिन्द्रजालं वितन्यते ॥८२॥ इति सञ्चिन्त्य विगत्य तावन्यौ मण्डपौ क्रमात्। प्रविश्यान्तं च ददर्श तदृकन्ये च कस्यके ॥८३॥ ततोऽपि निर्गतस्तस्य साश्चर्यो मन्दिरस्य सः। उपविष्टः स्थितोऽपश्यद् वापीमभ्यस्तमामयम् ॥८४॥

कुछ समय पश्चात् चतुर्दशी के आने पर चन्द्रप्रभा शक्तिदेव से कहने लगी—'आज मैं तुम्हारे लिए पिता से निवेदन करने जाती हूँ, मेरे सभी सेवक मेरे साथ ही जायेंगे। इन दो दिनों तक तुम अकेले दुःखी न होना ॥७०-७१॥ इस भवन में अकेले रहते हुए भी तुम बीच की मञ्जिल में कभी न जाना' ॥७२॥ उस युवक को ऐसा कहकर और उसी में अपने हृदय को रखकर तथा इसी प्रकार उसके हृदय को चन्द्रप्रभा अपने साथ लेकर वहाँ से चली गई ॥७३॥ वह शक्तिदेव अब वहाँ अकेला रहता हुआ मन बहलाने के लिए, इधर-उधर अत्यन्त समृद्धि-सम्पन्न उन मकानों में घूमता रहता था ॥७४॥ 'उस विद्याधर-कन्या ने मेरा ऊपर (बीच की मञ्जिल में) जाना क्यो वारित किया' इस प्रकार के कुतूहल से वह उसी मञ्जिल में पहुँचा। मनुष्यों के मन की प्रवृत्ति प्रायः निषेध के विपरीत ही चलती है ॥७५॥ ऊपर चढ़कर उसने मूर्त रूप से सुरचित तीन मंडपों को देखा ॥७६॥ उसमें प्रविष्ट होकर उसने सुन्दर बिछावनों से युक्त रत्नों के पलंग पर दुपट्टा ओढ़ने से ढंके हुए शरीर से शयन करते हुए किसी व्यक्ति को देखा ॥७७-७८॥ जब उसने कपड़ा उठाकर उसे देखा तब तो उसे परोपकारी राजा की मरी हुई कन्या कनक-रेखा दिखाई पड़ी ॥७९॥ उसे देखकर शक्तिदेव सोचने लगा—'यह क्या महान् आश्चर्य है? क्या यह अचेतनावस्था (बेहोशी) में सोई है या मुझ ही भ्रम हो रहा है ॥८०॥ जिसके लिए मेरी इतनी लम्बी और कष्टप्रद यात्रा हुई वह निर्जीव होकर यहाँ पड़ी है और वहाँ (वर्धमान में) जीवित है ॥८१॥ इसकी मुखकान्ति भी मलिन नहीं पड़ी है। प्रतीत होता है कि विधाता ने किसी कारण वश मेरे लिए असमय ही यह इन्द्रजाल रचा है ॥८२॥ ऐसा सोचते-सोचते उसने दूसरे दोनों मंडपों के अन्दर क्रमशः जाकर उसी प्रकार सोई हुई और दो कन्याएँ देखीं ॥८३॥ उन मंडपों से निकलकर आश्चर्यचकित शक्तिदेव ने ऊपर बैठ हुए वहीं से नीचे एक अत्यन्त सुन्दर बावली देखी और उसके किनारे पर रत्नों की जीनवाले एक सुन्दर घोड़े को देखा ॥८४॥


१. 'अरेबियन नाइट्स' में तीन राजपोतों की कहानी में ऐसी राजकन्याओं की चर्चा है और इसी प्रकार एक मंजिल देखने की मनाही है। वहाँ ऐसे ही एक घोड़े का वर्णन भी है।—अनु.

५९८ कथासरित्सागर

५९८ कथासरित्सागर सत्तीरे रत्नपर्याणं¹ ददर्शैकं च वाजिनम्। तत्रावतीर्यथ तत्तत्पार्श्वं कौतुकाश्रयो ॥८५॥ इयेष च समारोढुं शून्यं दृष्ट्वा स तेन च। अश्वेनाहत्य पादेन तस्यां वाप्यां निक्षिक्षपे ॥८६॥ तन्निमग्नः स च क्षिप्रं वर्धमानपुराभिजात्। उद्यानदीर्घिकामध्यादुन्ममज्ज ससम्भ्रमम् ॥८७॥ ददर्श जन्मभूमीं च सद्यो वापीजले स्थितम्। आत्मानं कुमुदैस्तुल्यं दीनं चन्द्रप्रभां विना ॥८८॥ वर्धमानं पुरं क्वेदं क्व सा वैद्याधरी पुरी। अहो किमेतदाश्चर्यमायाडम्बरजृम्भितम् ॥८९॥ कष्टं किमपि केनापि मन्दभाग्योऽस्मि वञ्चितः। यदि वा कोऽत्र जानाति कीदृशी भवितव्यता ॥९०॥ इत्यादि चिन्तयन्सोऽथ वापीमध्यात् समुत्थितः। सविस्मयः शक्तिदेवो ययौ पितृगृहं निजम् ॥९१॥ तत्रापदिष्टपटहभ्रमणं कृतकौतुकः। पित्राभिनन्दितस्तस्थौ सोत्सवे स्वजने सह ॥९२॥ द्वितीयेऽह्नि बहिर्गेहान्निर्गतश्चाशृणोत् पुनः। घोष्यमाणं सपटकं पुरे तस्मिन्निदं वचः ॥९३॥ विप्रक्षत्रियमध्यात्कनकपुरी येन तत्त्वतो दृष्टा। ब्रवीतु स तस्मै तनयां सयौवराज्यां ददाति नृपः ॥९४॥ तच्छ्रुत्वैव स गत्वा तान् पटहोद्घोषकान् कृती। मया दृष्टा पुरी सेति शक्तिदेवोऽब्रवीत्पुनः ॥९५॥ तस्तूर्णं नृपतेरग्रे स नीतोऽभून्नृपोऽपि तम्। प्राग्जन्मने परिज्ञाय पुनर्वितथवादिनम् ॥९६॥ मिथ्या बह्मि न मया दृष्टा सा नगरी यदि। तदिदानीं शरीरस्य निग्रहेण पणो मम ॥९७॥ अथ सा राजपुत्री मां पृच्छत्वित्यभ्यधत्त तत्। गत्वा चान्तःपुरे राजा तत्रैवानाययत् सुताम् ॥९८॥ १ रत्नजटितमश्वपृष्ठास्तरणम्।

पंचम लम्बक ५६९

पंचम लम्बक ५६९ उसे देखकर वह बीच की मंजिल से उतरकर कौतुक के साथ उस घोड़े के समीप आया ॥८५॥ वहाँ एकान्त देखकर उसने घोड़े पर चढ़ने की इच्छा प्रकट की। ज्यों ही उसने उस पर चढ़ने का प्रयत्न किया त्यों ही घोड़े ने लात मारकर उसे पासवाली बावली में गिरा दिया। बावली में गिरा हुआ वह शक्तिदेव अकस्मात् ही वर्धमान नगर-स्थित अपने घर के उद्यान की बावली में आ निकला ॥८६-८७॥ और उसने बावली के जल में खड़े हुए अपने को चन्द्रप्रभा के बिना मुरझाए हुए कुमुद के समान अपनी जन्मभूमि में पाया ॥८८॥ शक्तिदेव का पुनः वर्धमाननगर में आगमन वह सोचने लगा कहाँ यह वर्धमान नगर और कहाँ वह विद्याधरों की कनकपुरी नगरी! यह क्या आश्चर्य है। क्या मायाजाल है? दुःख है कि किसी ने मुझ अभागे को ठग लिया है। या यह कौन जानता है कि आगे क्या होनेवाला है॥८९-९०॥ इन सब बातों को सोचता हुआ वह चकित शक्तिदेव बावली से निकला और अपने पिता के घर गया ॥९१॥ वहाँ पर वह राजा की घोषणा के अनुसार कनकपुरी का भ्रमण-वृत्तान्त किसी को न बताकर, और इधर-उधर की झूठी बातें बनाकर पिता द्वारा प्यार किया गया वह शक्तिदेव उसके आने की प्रसन्नता मनाते हुए घर के व्यक्तियों के साथ घर में ही रह गया ॥९२॥ दूसरे दिन घर से बाहर निकलकर उसने उसी ढिंढोरे को फिर से सुना जो उस नगर में पीटा जा रहा था ॥९३॥ 'कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय-युवक जिसने कनकपुरी देखी हो वह कहे और राजकन्या तथा युवराज-पद प्राप्त करे' ॥९४॥ यह सुनकर वह सफल शक्तिदेव ढिंढोरा पीटनेवालों के पास गया और बोला— मैंने वह नगरी देखी है' ॥९५॥ उन लोगों ने उसे शीघ्रता से राजा के पास ले जाकर खड़ा कर दिया और राजा ने भी उसे पहचानकर पहले के समान झूठ बोलनेवाला समझा ॥९६॥ तब वह शक्तिदेव कहने लगा—'यदि मैं झूठ बोल रहा हूँ कि वह नगरी मैंने नहीं देखी है तो मुझे प्राणदंड दिया जाय ॥९७॥ 'आज यह राजपुत्री मुझसे (शक्ति देव से) उस नगरी के सम्बन्ध में पूछे ऐसा कहकर राजा ने अपने सेवकों से राजकुमारी को वहीं बुलवा लिया ॥९८॥ ७२

५७ कथासरित्सागर

५७ कथासरित्सागर सा दृष्टा दृष्टपूर्वं तं विप्रं राजानमभ्यधात् । तात मिथ्यैव भूयोऽपि किञ्चिद् वक्ष्यत्यसाविति ॥९९॥ शक्तिदेवस्ततोऽवादीदहं सत्यं नृपाय वा । वच्मि राजसुते त्वं तु वदैव मम कौतुकम् ॥१००॥ मया कनकपुर्यां त्वं पर्यङ्के गतजीविता । दृष्टा ऽहह न पश्यामि जीवन्तीं भवतीं कथम् ॥१०१॥ इत्युक्ता शक्तिदेवेन साभिज्ञानं नृपात्मजा । सद्यः कनकरेखा सा जगादैव पितुः पुरः ॥१०२॥ तात दृष्टामुना सत्यं नगरी सा महात्मना । अचिराच्चैष भर्ता मे तत्रस्थाया भविष्यति ॥१०३॥ तत्र मद्भगिनीश्चान्यास्तिस्रोऽप्य परिनेष्यति । विद्याधराधिराज्यं च तस्यां पुरि करिष्यति ॥१०४॥ मया त्वद्य प्रवेष्टव्या स्वा तनुश्च पुरी च सा । मुनेः शापादहं ह्यत्र जाताऽभूवं भवद्गृहे ॥१०५॥ यदा कनकपुर्यां ते गेहमालोक्य मानुषः । मर्त्यभावभृतस्तत्स्वप्रतिभवं करिष्यति ॥१०६॥ तदा ते शापमुक्तिश्च स च स्यान्मानुषः पतिः । इति मे च स शापान्तं पुनरेवाऽदिशन्मुनिः ॥१०७॥ जातिस्मरा च मानुष्येऽप्यहं ज्ञानवती तथा । तद्ब्रजाम्यधुना सिद्धये निजं वैद्याधरं पदम् ॥१०८॥ इत्युक्त्वा राजपुत्री सा तनुं त्यक्त्वा तिरोदधे । तुमुलश्चोदभूत्तस्मिन्नाक्रन्दो राजमन्दिरे ॥१०९॥ शक्तिदेवोऽप्युभयतो भ्रष्टस्तत्रैवुदत्तरे । श्लेशे प्राप्यापि न प्राप्ते ध्यायस्ते द्वे अपि प्रिये ॥११०॥ निन्दन्खिन्नोऽपि चात्मानमसम्पून्नमनोरथः । निर्गत्य राजभवनात् क्षणादेवमचिन्तयत् ॥१११॥ अभीष्टं भावि मे तावदुक्तं कनकरेखया । तत्किमर्थं विषादामि सत्त्वाधीना हि सिद्धयः ॥११२॥ पथा तेनैव कनकपुरीं गच्छामि तां पुनः । भूयोऽप्यवश्यं दैव मे तत्रोपायं करिष्यति ॥११३॥ इत्यालोच्यैव स प्रायाच्छक्तिदेवो पुरस्ततः । असिद्धार्था निवर्तन्ते नहि धीराः कृतोद्यमाः ॥११४॥

पञ्चम लम्बक ५७१

पञ्चम लम्बक ५७१ राजकन्या पहले ही हँसे हुए उस ब्राह्मण-युवक को देखकर बोली—'पिताजी यह फिर भी कुछ इधर-उधर की मनमानी झूठ बोलेगा'॥१९१॥ तब शक्तिदेव ने राजकुमारी से कहा—'मैं सच हूँ या झूठ लेकिन राजकुमारी तू मरे एक कौतुक को दूर कर, मैं कहता हूँ मैंने कनकपुरी में तुझे पलंग पर मरी हुई पड़ी देखा है। यहाँ यह बात नहीं देख रहा हूँ तू कैसे जी रही है यह रहस्य मुझे बता ॥१९२॥ शक्तिदेव द्वारा सच्ची जानकारी व गाव इस प्रकार कहने पर वह राजकन्या कनकरेखा पिता के सामने बोली—॥१९३॥ पिताजी इसने सचमुच वह नगरी देखी है। अतः यह शीघ्र ही कनकपुरी में जाने पर मेरा पति होगा॥१९४॥ वहाँ पर मेरी और भी तीन बहिनों को ब्याहेगा और नगरी में विद्याधरों पर राज्य करेगा॥१९५॥ अब आज ही मुझे अपनी नगरी और अपने पूर्व कलेवर में प्रवेश करना चाहिए। मुनि के शाप से मैं तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई थी॥१९६॥ शाप देने के पश्चात् मुनि ने शाप का अन्त इस प्रकार कहकर किया था कि जब कोई मनुष्य कनकपुरी में तेरा मृत शरीर देखकर मनुष्य-शरीर धारण करनेवाली तेरा रहस्य प्रकट करेगा तब तेरी शाप से मुक्ति होगी और वह मनुष्य तेरा पति होगा॥१९७॥ मानव-शरीर पाकर भी मैं पूर्वजन्म का स्मरण करती थी और मुझे सब ज्ञान था। सो अब मैं अपनी सिद्धि के लिए अपने विद्याधरस्थान को जाती हूँ॥१९८॥ इतना कहकर राजपुत्री अपना शरीर त्यागकर अन्तर्हित हो गई और राजभवन में जोर से रोना-चिल्लाना मच गया॥१९९॥ दोनों ओर से मारा गया शक्तिदेव उन उन रत्नों को प्राप्त करके भी इन दोनों (चन्द्र- प्रभा और कनकरेखा) प्रेयसियों में से एक को भी न पाकर स्तब्ध-सा रह गया॥१११॥ अनन्तर मनोरथभंग या निष्फता से अपनी निन्दा करता हुआ उसी समय राजभवन से निकलकर सोचने लगा—॥१११॥ कनकरेखा ने कहा है जब मेरी अभिलाषा पूर्ण होगी ही तब क्यों व्यर्थ दुःखी होऊँ, स्थितियाँ मनोरथ के अधीन होगीं? ॥११॥ तो मैं फिर उसी मार्ग से कनकपुरी को जाऊँ। भाग्य फिर भी अवश्य मेरी सहायता करेगा। ऐसा सोचकर वह शक्तिदेव वर्धमान नगर से चल पड़ा। कष्ट है उसकी ओर उस दिशा सम्बन्धी प्रयत्न किये प्रयत्न से दुःख नहीं॥११३॥११७॥

५७२ कथासरित्सागर

५७२ कथासरित्सागर गच्छंश्चिराच्च सम्प्राप जलधेः पुलिनस्थितम्। तद्विटङ्कपुरं नाम नगरं पुनरेव सः ॥११५॥ तत्रापश्यच्च वणिजं तं सम्मुखमुपागतम्। येन साकं गतस्याब्धिं पोतमादावभज्यत ॥११६॥ सोऽयं समुद्रदत्त स्यात् क्व च पतितोऽम्बुधौ। उत्तीर्णोऽथ न वा चित्रमहमवे मिदर्शनम् ॥११७॥ इत्यालोच्य स यावत्तमभ्येति वणिजं द्विजः। तावत्स स परिज्ञाय हृष्टः कण्ठेऽग्रहीद् वणिक् ॥११८॥ अनेषीच्च निजं गेहं कृतातिथ्यश्च पृष्टवान्। पोतमग्ने त्वमम्भोधावे कथमत्तीर्णवानिति ॥११९॥ क्षपितवोऽपि वृत्तान्तं तथा च कृत्स्नमब्रवीत्। यथा मत्स्यनिगीर्णः प्रागुत्स्थलोद्वीपमाप सः ॥१२० ॥ अनन्तरं च तमपि प्रत्यपृच्छद् वणिग्वरम्। क्व तदा त्वमप्यब्धिमुत्तीर्णो वर्ण्यतामिति ॥१२१॥ अथाब्रवीत्सोऽपि वणिक् सवाहं पतितोऽम्बुधौ। दिनत्रयं भ्रमन्नासमकं फलहकं श्रितः ॥१२२॥ ततस्तेन पथाऽकस्मादेकं वहनमागतम्। तत्रस्थैश्चाहमाक्रन्दन् दृष्ट्या चात्रारोपितः ॥१२३॥ मारूढञ्चात्र पितरं स्वमपश्यमहं तदा। गत्वा द्वीपान्तरं पूर्वं चिरात्तत्कालमागतम् ॥१२४॥ स मां दृष्ट्वा परिज्ञाय कृतकण्ठग्रहः पिता। स्वमपृच्छद् वृत्तान्तमहं चैव तमब्रुवम् ॥१२५॥ चिरकालप्रयातेऽपि तात त्वय्यनुपागते। स्वधमं इति वाणिज्यं स्वयमस्मि प्रवृत्तवान् ॥१२६॥ ततो द्वीपान्तरं गच्छंस्तह वहनभङ्गतः। अधाम्बुधौ निमग्नः सन् प्राप्य युष्माभिरित्युभूत् ॥१२७॥ एवं मयोक्तस्तातो मां सोपालम्भमभाषत। आरोहसि किमर्थं त्वमीदृशान् प्राणसंशयान् ॥१२८॥ धनमस्ति हि मे पुत्र! स्थितश्चाहं तदर्जने। पश्यानीतं मयेदं ते वहनं हेमपूरितम् ॥१२९॥ इत्युक्त्वाश्वास्य तेनैव वहनेन निजं गृहम्। विटङ्कपुरमानीतस्तेनेवेदमहं ततः ॥१३ ०॥

पंचम लम्बक ५७३

[Header] पंचम लम्बक ५७३

चलते-चलते वह बहुत विलंब से समुद्र-तट पर स्थित उस विटंकपुर नगर में फिर पहुँचा ॥११८॥ विटंकपुर में उसने सामने आये हुए उस बनिये को देखा जिसके साथ पहली बार जाने पर समय में जहाज टूट गया था। यह तो वही समुद्रदत्त है जो समुद्र में गिरकर भी बाहर कैसे निकल पाया यह आश्चर्य है ! अथवा इसमें आश्चर्य ही क्या ? मैं ही इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हूँ। ऐसा सोचकर उस ब्राह्मण ने बनिये के पास जाते ही उसे अपना परिचय दिया। बनिये ने उसे गले लगाकर हर्ष प्रकट किया और उसे अपने घर लेजाकर स्वागत-सत्कार करने के पश्चात् पूछा कि नाव के टूटने पर तुम समुद्र से कैसे पार हुए। उत्तर में शक्तिदेव ने अपना सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया कैसे कि मत्स्य के निगले जाने पर उत्स्थल-द्वीप में वह पहुँचा था॥११९-१२० ॥ अपना समाचार सुनाकर शक्तिदेव ने भी उस वैश्य से पूछा कि तुम कैसे समुद्र से बच निकले सुनाओ ॥१२१॥ बनिये ने अपना वृत्तान्त सुनाते हुए उससे कहा—'उस समय समुद्र में गिर जाने पर मैं एक काष्ठपट्ट (तख्ते) के सहारे तीन दिनों तक समुद्र में ही चक्कर काटता रह गया॥१२२॥ तीसरे दिन उसी मार्ग से एक नाव आई। उसमें बैठे हुए लोगों ने मुझे चिल्लाते हुए देखकर उस पर चढ़ा लिया॥१२३॥ उस पर चढ़कर मैंने उसमें अपने पिता को बैठा हुआ पाया, जो बहुत दिनों से गये हुए थे और किसी दूसरे द्वीप से आ रहे थे ॥१२४॥ मेरे पिता ने मुझे देखकर और गले लगाकर रोते हुए मेरा वृत्तान्त पूछा और मैंने सब बताया ॥१२५॥ मैंने उनसे कहा पिताजी बहुत दिन व्यतीत होने पर और आपके न लौटने पर मैं अपना कर्तव्य समझ कर व्यापार में लग गया॥१२६॥ इसी प्रसंग में दूसरे द्वीप को जाते हुए, नाव के टूट जाने से मैं समुद्र में गिरा और आप लोगों ने आकर मेरा उद्धार किया॥१२७॥ तब मेरे पिता ने मुझसे कहा—'मेरे रहते हुए तुम इस जीवन के सन्देह में पड़ जानेवाले कार्यों में क्यों लगते हो ? देखो मैं इस जहाज को सोने से भरा हुआ लाया हूँ ऐसा कहकर धैर्य देते हुए वे मुझे घर ले आये" ॥१२८-१३१ ॥

५७४ कथासरित्सागर

५७४ कथासरित्सागर इत्येतद् वणिजस्तस्माच्छक्तिदेवो निशम्य स। विरम्य च त्रियामां तामन्येद्युस्तमपोचत् ॥१३१॥ गन्तव्यमुत्स्थलद्वीप सार्थवाह! पुनर्मया। तत्कथं तत्र गच्छामि साम्प्रतं कथ्यतामिति ॥१३२॥ गन्तुं प्रवृत्तास्तत्राद्य मदीया व्यवहारिणः¹। तद्यानपात्रमारूह्य श्रयातु सह तैर्भवान् ॥१३३॥ इत्युक्तस्तेन वणिजा स तस्तद्व्यवहारिभिः। साकं तदुत्स्थलद्वीपं शक्तिदेवो ययौ ततः ॥१३४॥ यः स बन्धुर्महात्मा मे विष्णुदत्तोऽत्र तिष्ठति। प्राग्वत्तस्यैव निकटं वस्तुमिच्छामि तन्मठम् ॥१३५॥ इति सम्प्राप्य च द्वीप तंत्कालं च विचिन्त्य सः। विपणीमध्यमार्गेण गन्तुं प्रावर्तत द्विजः ॥१३६॥ तावच्च तत्र दैवात्तं दृष्ट्वा दाशपतेः सुताः। सत्यव्रतस्य तस्यारात् परिज्ञायैवमब्रुवन् ॥१३७॥ तातेन सार्क कनकपुरीं लिन्प्सुस्तिस्त्वया। अह्यप्रगास्त्वमेकश्च कथमत्रागतो भवान् ॥१३८॥ शक्तिदेवस्ततोऽवादीदम्बुराशौ स वः पिता। पतितोऽम्बुभिराकष्टवहनो वडवामुखे ॥१३९॥ तच्छ्रुत्वा दाशपुत्रास्ते क्रुद्धा भृत्यान्बभाषिरे। बध्नीतेनं दुरात्मानं हतोऽनेन स नः पिता ॥१४०॥ अन्यथा कथमेकस्मिन् सति प्रवहणे द्वयोः। वडवाग्नौ पतेदेको द्वितीयश्चोत्तरे ततः ॥१४१॥ तदेष चण्डिका देव्याः पुरस्तात् पितृघातकः। अस्माभिरुपहन्तव्यः श्वः प्रभाते पशूकृतः ॥१४२॥ इत्युक्त्वा दाशपुत्रास्ते भृत्यान्बवन्ध्वैव तं तदा। शक्तिदेवं ततो निन्युर्मयङ्कश्चण्डिकामृहम् ॥१४३॥ शवरूपबलितानेकजीवं प्रबिततोवरम्। कथदृष्टाबलीवन्स्तमाळ मृत्योरिवाननम् ॥१४४॥ १ व्यापारिणः। २ अपशुरपि पशूक्तः कृत इतिभावः।

पंचम लम्बक ५७५

पंचम लम्बक ५७५ वैश्य का समाचार सुनकर शक्तिदेव ने रात को वहीं विश्राम किया और दूसरे दिन उससे कहा— हे व्यापारी मुझे पुनः उत्पस्थल-द्वीप जाना है। सो बताओ मुझे कैसे जाना चाहिए' ॥१३१-१३२॥ वैश्य ने कहा, —'आज ही मेरे व्यापारी वैश्य वहाँ जाने के लिए तैयार हैं तुम उन्हीं के जहाज पर चढ़कर वहाँ जाओ' ॥१३३॥ इस प्रकार उस वैश्य द्वारा वहाँ जाने की सारी व्यवस्था कर देने पर, शक्तिदेव उन्हीं के साथ उत्पलक-द्वीप को गया ॥१३४॥ वहाँ जाकर उसने निश्चय किया कि यहाँ जो मेरा भाई विष्णुदत्त रहता है वह अत्यन्त उदार है पहले उसी के मठ में निवास के लिए जाना चाहिए ॥१३५॥ ऐसा सोचकर वह ब्राह्मण बाजार के बीच से वहाँ जाने लगा ॥१३६॥ इसी बीच दैवयोग से सत्यव्रत नामक निषादराज के पुत्रों ने उसे देखा और पहिचान कर इस प्रकार पूछा —॥१३७॥ 'हे ब्राह्मण तुम तो कनकपुरी को ढूँढ़ते हुए मेरे पिता के साथ यहाँ से गये थे। अब तुम अकेले कैसे आ गये ? ॥१३८॥ तब शक्तिदेव ने कहा—'वह तुम्हारा पिता समुद्री भँवर द्वारा नाव को अपनी ओर खींच लेने पर बड़वानल के मुँह में जा गिरा' ॥१३९॥ यह सुनकर धीवर के पुत्र क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपने सेवकों से कहा— 'इस दुष्ट को बाँध लो। इसने हमारे पिता को मार डाला है ॥१४०॥ अन्यथा एक ही नाव पर एक साथ यात्रा करते हुए कैसे एक व्यक्ति बड़वानल में गिर गया और एक बच गया ॥१४१॥ इसलिए अपने पिता के इस हत्यारे को हम कल प्रातःकाल चंडिका देवी के सामने पशु की तरह इसका बलिदान करेंगे ॥१४२॥ इस प्रकार कहकर धीवर-पुत्रों ने नौकरों से उसे बँधवाकर चंडिका के मन्दिर में पहुँचा दिया ॥१४३॥ वह चंडिका-मन्दिर, निरन्तर प्राणियों को निगलनेवाला विशाल उदरवाला और लटकते हुए घंटे-रूपी दाँतोंवाला मानो मौत का प्रत्यक्ष मुँह था ॥१४४॥