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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१८२ कथासरित्सागर

१८२ कथासरित्सागर बुद्ध्वा च मिलितग्राम्यवृत्तानुमतया तया। दशमारिकया सोऽथ पथिको जगृहे पतिः॥९५॥ तेन साकं च यावत् सा कालं कमपि तिष्ठति। तावत्तीक्ष्णज्वराक्रान्तः सोऽपि तस्याः क्षयं ययौ॥९६॥ ततः सा हासिनी ग्राम्यामप्येकादशमारिका। खिन्ना गङ्गातटं गत्वा प्रव्रज्यामेव शिश्रिये॥९७॥ इत्युक्त्वा हसितं वत्सराजपुत्रं स गोमुखः। भूयोऽब्रवीत् कथामेतां शृण्विमां दान्तजीविनः॥९८॥ पुमान् कश्चिद्दरिद्रोऽभूद् ग्रामे क्वापि कुटुम्बवान्। एक एव बलीवर्दस्तस्य चाभूद् गृहे धनम्॥९९॥ स निःसत्त्वोऽशनाभावात् सीदत्यपि कुटुम्बके। सोपघातोऽपि तं दान्तं व्यक्रीणीत न लोभतः॥१००॥ गत्वा तु विन्ध्यवासिन्याः पुरतो दर्भसंस्तरे। पतित्वा स तपश्चक्रे निराहारोऽर्थकाम्यया॥१०१॥ उत्सृष्टैको बलीवर्दः सर्वदा धनमस्ति ते। अतस्तमेव विक्रीथ जीविष्यसि सदा सुखम्॥१०२॥ इत्यादिष्टस्तया स्वप्ने देव्या प्रातः प्रबुध्य सः। उत्थाय पारणं किञ्चित् कृत्वा स्वगृहमाययौ॥१०३॥ एत्याप्यधीरो बिभ्रतु नोक्षार्णं तं शशाक च। विक्रीतेऽस्मिन्नहं निस्वो नैव वर्तेय जात्विति॥१०४॥ अथ सं कथितस्वप्नदेव्यादेशं प्रसङ्गतः। उपहासकृधं कश्चिदुवाच सुमतिः सुहृत्॥१०५॥ एक एवास्ति दान्तस्तं त्वं विक्रीथ सर्वदा। जीविष्यसीति दम्भोऽस्त तस्मात् मूढ न त्वया॥१०६॥ तद्विक्रयेणैतमुक्षाणं निर्वाहय कुटुम्बकम्। ततो भविष्यत्यपरस्ततश्चान्यस्ततोऽपरः॥१०७॥ इत्युक्तस्तेन मित्रेण ग्रामीणः स तथाकरोत्। एकैकवृषपण्याच्च जिजीव भृशं सुखी॥१०८॥ एवं फलति भव्यस्य विधिः सत्पानुमारतः। सन्मुग्धो नवन् मत्स्र्द्दीन न शृणुते धियम्॥१०९॥

द्वादश लम्बक १८१

द्वादश लम्बक १८१ यह जानकर गाँव के पंचों ने मिलकर सम्मति प्रदान की और एकादशमारिका ने उस पथिक को ग्यारहवाँ पति बना लिया ॥९५॥ जब वह स्त्री कुछ समय तक ही उस पति के साथ रही थी कि उसे शीतज्वर का आक्रमण हो गया और वह उसका ग्यारहवाँ पति भी मर गया ॥९६॥ तब पत्थरों को भी हँसानेवाली उस एकादशमारिका ने गंगातट पर जाकर संन्यास ले लिया ॥९७॥ यह कथा सुनकर हँसते हुए नरवाहनदत्त से गोमुख ने फिर कहा—'अब बैल से जीवन निर्वाह करनेवाले की कथा सुनो॥९८॥ किसी गाँव में एक निर्धन कुटुम्बी पुरुष रहता था। उसके घर में एकमात्र एक बैल ही उसका धन था ॥९९॥ धनहीन वह सारे कुटुम्ब के और स्वयं भी भोजन बिना उपवास करने पर भी लोभ से उस बैल को बेचता न था ॥१००॥ अन्त में दुःखी होकर वह विन्ध्यवासिनी देवी के सामने जाकर, कुश के आसन पर बैठ- कर धन की कामना से निराहार तप करने लगा ॥१०१॥ 'उठ तेरे भाग्य में सदा एक बैल ही धन है। इसलिए, उसे बेचकर तू सदा सुख से जीवन व्यतीत करना' ॥१०२॥ देवी से स्वप्न में इस प्रकार आदेश दिया गया वह प्रातःकाल ही उठकर व्रत का पारण करके अपने घर चला गया ॥१०३॥ घर आकर भी वह अधीर उस बैल को इसलिए न बेच सका कि इसे बेच देने पर सर्वथा निर्धन होकर मैं कैसे जी सकूँगा ॥१०४॥ तदनन्तर, बातचीत के प्रसंग में स्वप्न में दिये हुए देवी के आदेश को अपने बुद्धिमान् मित्र से कहा। तब उपवास से दुर्बल उससे उसके मित्र ने कहा—॥१०५॥ 'अरे मूर्ख तेरे भाग्य में एक ही बैल है। उसे बेचकर तू सदा जीवित रहेगा। देवी के इस आदेश को तूने नहीं समझा' ॥१०६॥ 'तू इस बैल को बेचकर अपने कुटुम्ब का पालन कर। तब दूसरा बैल होगा। उसे बेचने पर तीसरा' ॥१०७॥ उस मित्र से इस प्रकार कहे गये उस गँवार ने वैसा ही किया। तदनन्तर, एक-एक बैल को बेच-बेचकर वह सुखपूर्वक रहने लगा ॥१०८॥ इस प्रकार, व्यक्तित्व के अनुसार दैव सबको फल देता है। इसलिए, मनुष्य में उत्तम व्यक्तित्व होना चाहिए। सत्त्वहीन पुरुष को लक्ष्मी वरण नहीं करती ॥१०९॥

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर शृणुष्वान्यां कथां चमां धूर्त्तस्यालीकमन्त्रिणः। आसीत् पृथ्बीपतिर्नाम नगरे दक्षिणापथे ॥११०॥ तद्राष्ट्रे कोऽप्यभूद्धूर्त्तः परवञ्चनजीविकः। स एकदा महच्छेत्वावसन्तुष्टो व्यचिन्तयत् ॥१११॥ धूर्त्तत्वेनेदृशा किं मे यथाहारादिमात्रकम्। प्राप्यते महती येन श्रीस्तादृङ् न करोमि किम् ॥११२॥ इत्यालोच्य वणिग्वेषमप्युदारं विधाय सः। उपासत्प्रतीहारं गत्वा द्वारं महीपते ॥११३॥ तमुक्त्वा प्रविश्यान्तं प्राभृतं चोपनीय सः। एकान्तं मेऽस्ति विज्ञप्तिरिति व्यज्ञापयन्नृपम् ॥११४॥ राज्ञापि वेषशान्तेन प्राभृतावर्जितेन च। तथेति रचिताैकान्तस्तमथ स व्यजिज्ञपत् ॥११५॥ दिनं दिने मया साकमास्थाने सर्वसन्निधौ। मूर्तेकान्ते कथालापं क्षणमेकं कुरु प्रभो ॥११६॥ तावताहं प्रतिदिनं दीनारशतपञ्चकम्। ददाम्युपायनं देवस्यार्थये न तु किञ्चन ॥११७॥ तच्छ्रुत्वाचिन्तयद्राजा को दोषः किमयं मम। गृहीत्वा याति दीनारान् ददाति प्रत्युतान्वहम् ॥११८॥ महता वणिजा सार्धं कथालापेन का त्रपा। इति स प्रतिपद्यैतद्राजा तस्य तथाकरोत् ॥११९॥ सोऽपि तस्मै ददौ राज्ञे दीनारांस्ता यथोदितान्। लोकस्तं च महामन्त्रिपदं प्राप्तममन्यत ॥१२ ॥ एकस्मिंश्च दिने धूर्त्तो मुहुः पश्यन्नियोगिनः। साकूतं मुखमस्य चक्रे राज्ञा समं कथाम् ॥१२१॥ निर्गतश्च वहिस्तेन मुखालोकनकारणम्। दृष्ट्याधिकारिणा पृष्टः स स्मेरं च मृषावदत् ॥१२२॥ वेद्मो न लुब्धितोऽनेनेत्येष ते कुपितो नृपः। मयात्वस्ते मुखं दृष्टं शमयिष्याम्यहं च तम् ॥१२३॥ इत्युक्तस्तेन सोऽलीकमन्त्रिणा समयो गृहम्। मागत्याभिकृतं स्वर्णसहस्रं तस्य दत्तवान् ॥१२४॥

अष्टम लम्बक १८५

अष्टम लम्बक १८५ एक धूर्त और झूठे मन्त्री की कथा सुनो। दक्षिणापथ के एक नगर में पृथ्वीपति नाम का एक राजा था। उसके राष्ट्र में दूसरों को ठगने की जीविका करनेवाला कोई धूर्त रहता था। वह बहुत महत्त्वाकांक्षी होने के कारण एक बार असन्तुष्ट होकर सोचने लगा कि मेरी ऐसी धूर्तता से क्या लाभ कि जिससे केवल भोजन आदि का ही काम चल सके जिससे अधिक-से-अधिक धन न कमाया जाय ? ॥१११—११२॥ ऐसा सोचकर और बहुत उत्तम वणिक-वेष धारण करके वह धूर्त राजा के द्वार पर आकर द्वारपाल से मिला। उसके द्वारा अन्दर प्रवेश पाकर और राजा से भेंट करके वह बोला— 'महाराज मैं एकान्त में आपसे कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। उसके बहुमूल्य वेष से प्रभावित और भेंट से आकृष्ट राजा ने सबको हटाकर एकान्त किया। तब उस धूर्त ने राजा से इस प्रकार कहा ॥११३—११५॥ आप प्रतिदिन सभा में एकान्त करके एक क्षण के लिए गुप्त बातचीत किया कीजिए ॥११६॥ इसके लिए मैं आपको प्रतिदिन पाँच सौ दीनार भेंट किया करूँगा। बस इतनी ही प्रार्थना है। और कुछ नहीं' ॥११७॥ यह सुनकर उस राजा ने सोचा—'इसमें क्या हानि है? यह मेरा कुछ ले तो जायगा नहीं बल्कि प्रतिदिन पाँच सौ दीनार ही देगा ॥११८॥ इस बड़े धनी बनिये के साथ वार्तालाप करने में लाज भी क्या ? इसलिए राजा ने उसे स्वीकार कर वैसा ही करना प्रारम्भ कर दिया ॥११९॥ वह धूर्त भी अपने कथनानुसार पाँच सौ दीनार राजा को प्रति दिन देने लगा और राज्य के लोगों ने उसे राज्य के महामन्त्री पद पर प्रतिष्ठित समझ लिया ॥१२०॥ एक दिन उस धूर्त ने किसी अधिकारी की ओर भेद-भरी दृष्टि डालकर राजा से बातचीत करनी प्रारम्भ की ॥१२१॥ बाहर निकलने पर उस अधिकारी के उससे अपने मुंह की ओर देखने का कारण पूछा तो उसने उससे सरासर झूठी बातें कह दीं ॥१२२॥ 'इसने मेरे राज्य को लूट लिया यह समझकर राजा तुझ पर क्रुद्ध हैं। इसलिए मैंने तेरा मुंह देखा। अब मैं राजा को समझाकर शान्त कर दूंगा' ॥१२३॥ उस झूठे मन्त्री से इस प्रकार छले गये और डरे हुए अधिकारी ने उसके घर पर जाकर एक हजार दीनार उसे भेंट किये (घूस में दिये) ॥१२४॥ १२४

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर अन्यद्युश्च समं राज्ञा कथां कृत्वा तमेव सः। निर्गत्य धूर्त्तोऽवादीत् नियोगिनमुपागतम् ॥ १२५॥ युक्तियुक्तैर्मया वाक्यैस्तव राजा प्रसादितः। धीरो भवाधुनाहं ते सर्वच्छिद्रषु रक्षकः ॥ १२६॥ इति स्वीकृत्य स युक्त्या विससर्ज च सोऽपि तम्। अधिकारी सदा तैस्तैस्तूपचारैरुपाहरत् ॥ १२७॥ एवं क्रमेण सर्वेभ्यो नियोगिभ्यः स बुद्धिमान्। राज्येभ्यो राजपुत्रेभ्यः सवकर्म्येषु युक्तिभिः ॥ १२८॥ बह्वीभिराददानोऽप्यनिजग्राह सर्वतः। पञ्च कोटीः सुवर्णस्य कुर्वन् राजा समं कथाः ॥ १२९॥ ततो रहसि राजानं धूर्तमन्त्री जगाद सः। यच्च दत्वापि नित्यं ते दीनारशतपञ्चकम् ॥ १३०॥ त्वत्प्रसादान्मया प्राप्ताः पञ्च काञ्चनकोटयः। तत्प्रसीद गृहाणतत् स्वं स्वर्णमहमत्र कः ॥ १३१॥ इत्युक्त्वा प्रकटं राज्ञः कनकं सन्त्यवेदयत्। राजापि कृच्छ्रात्तत्तस्य जग्राहार्धं ततो धनात् ॥ १३२॥ तुष्टस्य स्थापयामास महामन्त्रिणवं स तम्। सोऽपि प्राप्य श्रियं धूर्त्तो दानभोगैरमानयत् ॥ १३३॥ एवं प्राप्नोति महत् प्राज्ञोऽप्याभातिपापतः। कूपस्नानकबत्प्राप्ते फले दोषं निहन्ति च ॥ १३४॥ इत्युक्त्वा गोमुखः प्राह वत्सराजसुतं पुनः। एकाभिदानीमुदाहृत्सोत्सुकः शृण्विमां कथाम् ॥ १३५॥ बभूव दुर्मदारातिकरीन्द्रकुलकेसरी। रत्नाकराख्ये नगरे नाम्ना बुद्धिप्रभो नृपः ॥ १३६॥ रत्नरेखाभिधानायां राज्ञ्यां तस्योपपद्यत। कन्या हेमप्रभा नाम सर्वलोकैकसुन्दरी ॥ १३७॥ सा च विद्याधरी शापादवतीर्णा यदा तदा। नभोविहारसस्कारमदान्वितक्रीड दोलया ॥ १३८॥ पातभीरुया निषिद्धापि सा छतो न घनाच्च यत्। तत्तस्याः स पिता राजा चपटं कुपितो ददौ ॥ १३९॥

दशम लम्बक १८७

दशम लम्बक १८७ दूसरे दिन उसी प्रकार राजा से बातचीत करके और बाहर निकलकर वहाँ आये हुए उस अधिकारी से धूर्त ने कहा—'मैंने युक्तिपूर्ण बातों से राजा को तुम पर प्रसन्न कर दिया है। अब घबराओ नहीं धीरज रखो। अब मैं तुम्हारी त्रुटियों (अपराधों) का रक्षक हूँ ॥१२५-१२६॥ इस प्रकार स्वीकार कर उसे विदा किया और उस अधिकारी ने भी विविध प्रकार से उसकी सेवा की ॥१२७॥ इस प्रकार, उस चतुर धूर्त ने सभी अधिकारियों सामन्तों राजपुत्रों और सेवकों से भिन्न-भिन्न युक्तियों द्वारा सभी ओर से राजा से बातें करते हुए पाँच करोड़ दीनार कमा लिये ॥१२८-१२९॥ तब एकबार एकान्त में वह धूर्त मन्त्री राजा से बोला—'स्वामिन् ! आपको पाँच सौ दीनार प्रतिदिन देकर भी मैंने तुम्हारी कृपा से पाँच करोड़ दीनार कमा लिये। इसलिए, यह सोना आप ले लो। इसमें मेरा क्या है ? ऐसा कहकर उसने सोना राजा के सामने रख दिया। राजा ने भी बड़ी कठिनाई से उसमें से आधा ही धन लिया ॥१३० -१३२॥ और, उससे प्रसन्न होकर उसे महामन्त्री बना दिया। उस धूर्त ने भी धन पाकर दान और भोग में उसका उपयोग किया ॥१३३॥ इस प्रकार, बुद्धिमान् व्यक्ति अधिक पाप किये बिना भी धन प्राप्त कर लेते हैं। जिस प्रकार, कुँआ खोदनेवाले को फल की प्राप्ति (जल-लाभ) भी होती है और उसे पाप भी नहीं लगता ॥१३४॥ मन्त्री गोमुख राजकुमार को इस प्रकार कथा सुनाकर बोला—'अब विवाह के लिए उत्सुक दूसरी कथा सुनो ॥१३५॥ रत्नाकर नाम के नगर में बुद्धिप्रभ नाम का एक राजा था जो मदोन्मत्त शत्रु-रूपी हाथियों के लिए सिंह के समान था ॥१३६॥ उसकी रत्नरेखा नाम की रानी से हेमप्रभा नाम की कन्या उत्पन्न हुई। वह कन्या सारे संसार में एकमात्र सुन्दरी थी और शाप के कारण मर्त्यलोक में अवतीर्ण विद्याधरी थी। वह आकाश में विहार करने के पूर्व-संस्कार के कारण झूला झूलने में बहुत रुचि रखती थी ॥१३७-१३८॥ पिता ने गिर जाने के भय से उसे अनेक बार मना किया किन्तु वह न मानी। तब उसके पिता राजा ने उसे एक बार एक चाँटा मार दिया ॥१३९॥

१८८ कथासरित्सागर

१८८ कथासरित्सागर तावता सावमानेन राजपुत्री मनस्विनी। विहारव्यपदेशेन जगामोपवनं बहिः॥१४०॥ पानमत्तेषु भृत्येषु सञ्चरन्ती च तत्र सा। प्रविश्य वृक्षगहनं तेषां दृष्टिपथमत्ययौ ॥१४१॥ गत्वा चैकाकिनी दूरं वनं विरचितोटजा। फलमूलाशिनी तस्थौ हराराधनतत्परा ॥१४२॥ तत्पितापि स राजा तां बुद्ध्वा क्वापि ततो गताम्। अन्वियेष न च प्राप महादुःखमुवाह च॥१४३॥ चिरात् किञ्चित्तनूभूतदुःखश्चित्तं विनोदयन्। बुद्धिप्रभः स निरगान्मृगयायै महीपतिः॥१४४॥ भ्रमंश्च दैवात्तत्राप सुदूरं स वनान्तरम्। तपस्यन्ती सुता सास्य यत्र हेमप्रभा स्थिता॥१४५॥ उटजं तत्र दृष्ट्वा स राजाभ्येत्य तदन्तरे। असंकृतं तपःक्षामां तां ददर्श निजां सुताम्॥१४६॥ सापि दृष्ट्वा समुत्थाय पादयोः सहसाग्रहीत्। आलिङ्ग्य च पिता तां च साश्रुरङ्के न्यवेशयत्॥१४७॥ तौ चान्योन्यं चिराद्दृष्ट्वा तथा रुरुदतुस्ततः। उदश्रवो यथा तत्र वनेऽभूवन् मृगा अपि॥१४८॥ ततः शनैः समाश्वास्य राजावोचत् स तां सुताम्। त्यक्त्वा राजश्रियं पुत्रि किमिदं विहितं त्वया॥१४९॥ तदेहि जननीपार्श्वं वनवासमिमं त्यज। इत्युक्तवांस्तं जनकं सा तं हेमप्रभाभ्यधात्॥१५०॥ दैवेनैव नियुक्तास्मि शक्तिस्तात ममात्र का। न चैष्यामि गृहं भोक्तुं न त्यजामि तपःसुखम्॥१५१॥ इति ब्रुवाणा सा तस्मान्निश्चयान्न चचाल यत्। तद्राजाकारयत्तस्या वने तत्रैव मन्दिरम्॥१५२॥ गत्वा च राजधानीं स्वां प्रेषयामास सोऽन्वहम्। तस्या अतिथिपूजाथं पक्वान्नानि धनानि च॥१५३॥ सा च हेमप्रभा तत्र धनैरन्नैश्च तैः सदा। पूजयन्त्यतिथीनासीत्फलमूलाशिनी स्वयम्॥१५४॥

दशम लम्बक १८९

दशम लम्बक १८९

इस कारण कन्या ने अपना अपमान समझा और जंगल में जाने की सोचने लगी। एकबार वह भ्रमण के बहाने नगर के बाहर उद्यान में गई। वहाँ सेवकों के मद्य-पान से उन्मत्त हो जाने पर वह वृक्ष की झुरमुट में छुपकर उनकी आँखों से ओझल हो गई ॥१४० - १४१॥

अकेली ही जंगल में जाती हुई वह बहुत दूर निकल गई और वहाँ एक पर्णकुटी बनाकर फल-मूल खाती हुई वह शंकर की आराधना में तन्मय हो गई ॥१४२॥

उसके पिता उस राजा ने अपनी पुत्री को कहीं चली गई समझकर उसे बहुत ढूँढ़वाया और उसके न मिलने पर राजा को बहुत कष्ट हुआ ॥१४३॥

बहुत दिनों के पश्चात् कष्ट के कुछ शान्त हो जाने पर मनोरंजन करने के निमित्त वह राजा बुद्धिप्रभ शिकार खेलने के लिए निकला ॥१४४॥

और, जंगल में भटकता हुआ वह दैवयोग से बहुत दूर उस दूसरे जंगल में पहुँच गया जहाँ उसकी कन्या हेमप्रभा तपस्या करती हुई रहती थी। राजा को वहाँ कुटी दिखाई पड़ी उसके भीतर निःशंक भाव से प्रवेश करने पर राजा ने देखा कि उसी की पुत्री हेमप्रभा तपस्या करती हुई

९९ कथासरित्सागर

९९ कथासरित्सागर एकदा चाययौ तस्या राजपुत्र्यास्तमाश्रमम्। प्रव्राजिकैका भ्राम्यन्ती कौमारब्रह्मचारिणी ॥१५५॥ स तयाभ्यर्चिता हेमप्रभया स्वकथान्तरे। प्रव्रज्याकारणं पृष्टा बालप्रव्रजिकाब्रवीत् ॥१५६॥ संवाहयन्ती चरणावहं क्वापि सती पितुः। सीदत्करयुगाभूवं निद्राकुञ्चितलोचना ॥१५७॥ किं निद्रासीति पादेन ततः पित्राहमाहता। तन्मन्युना प्रव्रजिता निर्गत्यैवास्मि तद्गृहात् ॥१५८॥ इति प्रव्राजिकामुक्तवतीं हेमप्रभाय सा। समानधीस्सुप्रीता तां वनवाससखीं व्यधात् ॥१५९॥ एकदा तामवोचत् सा प्रातः प्रव्राजिकां सखीम्। सखि स्वप्नेऽद्य जानेऽहमुत्तीर्णा विपुलां नदीम् ॥१६०॥ आरूढाऽस्मि ततः श्वेतगजं तदनु पर्वतम्। तत्राग्रे मे मया दृष्टो भगवानम्बिकापतिः ॥१६१॥ तदग्रे प्राप्य वीणां च गायन्त्यहमवादयम्। ततोऽद्राक्षं च पुरुषं दिव्याकारमुपागतम् ॥१६२॥ तं दृष्ट्वा च त्वया साकमहमुत्पतिता नभः। इत्यदृष्ट्वा प्रबुद्धास्मि व्यतिक्रान्ता च यामिनी ॥१६३॥ एतच्छ्रुत्वा तां हेमप्रभामाह स्म सा सखी। शापावतीर्णा कापि त्वं दिव्या कस्यापि निश्चितम् ॥१६४॥ प्रत्यासन्नं च शापान्तं तव स्वप्नो वदत्यसौ। ध्रुवत्यमभ्यनन्दत् सा राजपुत्री सखीवचः ॥१६५॥ ततो भूयिष्ठमुदिते जगद्दीप दिवाकरे। आययौ तुरगारूढो राजपुत्रोऽत्र कश्चन ॥१६६॥ स तां हेमप्रभां दृष्ट्वा तापसीवेषधारिणीम्। जातभ्रांतिरुपगत्य ववन्दे मुक्तवाहनः ॥१६७॥ सापि तं रचितातिथ्या कृतासनपरिग्रहम्। मन्वानप्रणयापृच्छन् महात्मन्को भवानिति ॥१६८॥ राजपुत्राय सोऽवदन्महाभाग महीपतिः। प्रद्युम्नस्य व्यमनि शुभनामानुकीर्तन ॥१६९॥

दशम लम्बक १९१

दशम लम्बक १९१ एकबार उस राजपुत्री के आश्रम में एक आजन्म ब्रह्मचारिणी सन्यासिनी विचरन करती हुई आ पहुँची ॥१५५॥ हेमप्रभा से समुचित आतिथ्य-सत्कार प्राप्त कर अपनी कथा के मध्य में सन्यास का कारण पूछे जाने पर वह बाल-सन्यासिनी बोली-॥१५६॥ मैं अपने कन्यापन में अपने पिता के पैर दबा रही थी। आँखों में निद्रा भर जाने के कारण मेरे दोनों हाथ शिथिल हो गये ॥१५७॥ ‘क्या सो रही है?’ ऐसा कहकर पिता ने पैर से मुझे ठोकर मारी। उसी क्रोध से मैं घर से निकलकर सन्यासिनी हो गई’ ॥१५८॥ इस प्रकार कहती हुई सन्यासिनी से हेमप्रभा ने अपने समान स्वभाव और चरित्र से प्रसन्न होकर उसे अपनी बनवास की सखी बना लिया ॥१५९॥ एकबार हेमप्रभा ने प्रातःकाल उस सन्यासिनी सखी से कहा—‘सखि आज मैंने स्वप्न में देखा कि मैं एक विस्तीर्ण नदी को पार कर गई। उस पार कर श्वेत हाथी पर चढ़ी और उसके पश्चात् पर्वत पर। उस पर्वत पर एक आश्रम में भगवान् अम्बिकापति शिव को देखा। उनके सामने गाती हुई मैंने वीणा बजाई। तब एक दिव्य पुरुष को अपने पास आया हुआ देखा। उसे देखने पर मैं तेरे साथ आकाश में उड़ गई। इतना देखकर मेरी नींद खुल गई और रात्रि भी व्यतीत हो गई’ ॥१६०-१६३॥ यह सुनकर वह सखी हेमप्रभा से बोली—हे कल्याणी यह निश्चय है कि तू शाप के कारण पृथ्वी पर अवतीर्ण कोई दिव्य स्त्री है और तेरे शाप का अन्त भी समीप है। यह स्वप्न यही कहता है। यह सुनकर राजपुत्री ने उसकी बात का समर्थन किया ॥१६४-१६५॥ तदनन्तर, जगत् के दीपक भगवान् भास्कर के पर्याप्त ऊपर आ जाने पर घोड़े पर चढ़ा हुआ कोई राजकुमार उस आश्रम में आया ॥१६६॥ वहाँ तपस्विनी के वेष में राजपुत्री को देखकर उसे उसके प्रति प्रीति उत्पन्न हुई। और उसने वाहन को छोड़कर उसे प्रणाम किया ॥१६७॥ राजपुत्री ने भी उसका आतिथ्य सत्कार किया और उसे आसन दिया। आसन पर बैठे हुए उसकी ओर आकृष्ट होकर प्रेम से उसने पूछा कि आप कौन हैं? ॥१६८॥ तदनन्तर, उस राजपुत्र ने कहा—‘हे महाभाग्यशालिनी शुभ नाम और चरित्रवाला प्रतापसेन नाम का एक राजा है ॥१६९॥

९९ कथासरित्सागर

९९ कथासरित्सागर एकदा चाययौ तस्या राजपुत्र्यास्तमाश्रमम्। प्रव्राजिकैका भ्राम्यन्ती कौमारब्रह्मचारिणी ॥१५५॥ सा तयाभ्यर्चिता हेमप्रभया स्वकथान्तरम्। प्रव्रज्याकारणं पृष्ट्वा बालप्रव्राजिकाब्रवीत् ॥१५६॥ संवाहयन्ती चरणावहं कन्या सती पितुः। सीदत्करमुगाभूवं निद्राकुञ्चितलोचना ॥१५७॥ किं निद्रासीति पादेन ततः पित्राद्रुमाहता। तन्मन्युना प्रव्रजिता निर्गत्यैवास्मि तद्गृहात् ॥१५८॥ इति प्रव्राजिकामुक्तवतीं हेमप्रभाथ सा। समानशीलप्रीतां तां वनवाससखीं व्यधात् ॥१५९॥ एकदा तामवोचत् सा प्रात प्रव्राजिकां सखीम्। सखि स्वप्नेऽद्य जाह्नव्युत्तीर्णा विपुलां नदीम् ॥१६०॥ आरूढाऽस्मि ततः श्वेतगजं तदनु पर्वतम्। तत्राश्रमे मया दृष्टो भगवानम्बिकापतिः ॥१६१॥ तदग्रे प्राप्य वीणां च गायन्त्यहमवादयम्। ततोऽद्राक्षं च पुरुषं दिव्याकारमुपागतम् ॥१६२॥ तं दृष्ट्वा च त्वया साकमहमुत्पतिता नभः। इत्यहं दृष्ट्वा प्रबुद्धास्मि व्यतिक्रान्ता च यामिनी ॥१६३॥ एतच्छ्रुत्वैव तां हेमप्रभामाह स्म सा सखी। शापावतीर्णा कापि त्वं दिव्या कल्याणि निश्चितम् ॥१६४॥ प्रत्यासन्नं च शापान्तं तव स्वप्नो यदयसौ। श्रुत्वैतदभ्यनन्दत् सा राजपुत्री सखीवचः ॥१६५॥ ततो भूयिष्ठमुदिते जगद्दीपे दिवाकरे। आययौ तुरगारूढो राजपुत्रोऽत्र कश्चन ॥१६६॥ स तां हेमप्रभां दृष्ट्वा तापसीवेषधारिणीम्। जातप्रीतिरुपागत्य नम्रश्च मुक्तवाहनः ॥१६७॥ सापि तं रञ्जितातिथ्या कृतासनपरिग्रहम्। सञ्जातप्रणयाप्राक्षीन् महात्मन्को भवानिति ॥१६८॥ राजपुत्रोऽथ सोऽवादीन्महाभागे महीपतिः। प्रतापसेन इत्यस्ति शुभनामानुकीर्तनः ॥१६९॥

अष्टम लम्बक १९१

अष्टम लम्बक १९१ एकबार उस राजपुत्री के आश्रम में एक बालम ब्रह्मचारिणी सन्यासिनी विचरन करती हुई आ पहुँची ॥१५५॥ हेमप्रभा से समुचित आतिथ्य-सत्कार प्राप्त कर अपनी कथा के मध्य में सन्यास का कारण पूछे जाने पर वह बाल-सन्यासिनी बोली—॥१५६॥ मैं अपने कन्यापन में अपने पिता के पैर दबा रही थी। साँझ में निद्रा भर आने के कारण मेरे दोनों हाथ शिथिल हो गये ॥१५७॥ 'क्या सो रही है?' ऐसा कहकर पिता ने पैर से मुझे ठोकर मारी। उसी क्रोध से मैं घर से निकलकर सन्यासिनी हो गई' ॥१५८॥ इस प्रकार कहती हुई सन्यासिनी से हेमप्रभा ने अपने समान स्वभाव और चरित्र से प्रसन्न होकर उसे अपनी वनवास की सखी बना लिया ॥१५९॥ एकबार हेमप्रभा ने प्रातःकाल उस सन्यासिनी सखी से कहा—'सखि आज मैंने स्वप्न में देखा कि 'मैं एक विशाल नदी को पार कर गई। उसे पार कर श्वेत हाथी पर चढ़ी और उसके पश्चात् पर्वत पर। उस पर्वत पर एक आश्रम में भगवान् अम्बिकापति शिव को देखा। उनके सामने गाती हुई मैंने वीणा बजाई। तब एक दिव्य पुरुष को अपने पास आया हुआ देखा। उसे देखने पर मैं तेरे साथ आकाश में उड़ गई। इतना देखकर मेरी नींद खुल गई और रात्रि भी व्यतीत हो गई' ॥१६०–१६३॥ यह सुनकर वह सखी हेमप्रभा से बोली—'हे कल्याणी यह निश्चय है कि तू शाप के कारण पृथ्वी पर अवतीर्ण कोई दिव्य स्त्री है और तेरे शाप का अन्त भी समीप है। यह स्वप्न यही कहता है। यह सुनकर राजपुत्री ने उसकी बात का समर्थन किया ॥१६४-१६५॥ तदनन्तर, जगत् के दीपक भगवान् भास्कर के पर्याप्त ऊपर आ जाने पर घोड़े पर चढ़ा हुआ कोई राजकुमार उस आश्रम में आया ॥१६६॥ यहाँ तपस्विनी के वेष में राजपुत्री को देखकर उसे उसके प्रति प्रीति उत्पन्न हुई। और उसने वाहन को छोड़कर उसे प्रणाम किया ॥१६७॥ राजपुत्री ने भी उसका आतिथ्य सत्कार किया और उसे आसन दिया। आसन पर बैठे हुए उसकी ओर आकृष्ट होकर प्रेम से उसने पूछा कि आप कौन हैं? ॥१६८॥ तदनन्तर, उस राजपुत्र ने कहा—'हे महाभाग्यशालिनी शुभ नाम और चरित्रवाला प्रतापसेन नाम का एक राजा है ॥१६९॥

स तप्यमानः पुत्रार्थं हरस्याराधनं तपः। तेनादिश्यत शर्वेन प्रादुर्भूय प्रसादिना॥ १७०॥ विद्याधरावतारस्ते पुत्र एको भविष्यति। स च शापक्षयं लोके निजमेव प्रपत्स्यते॥ १७१॥ द्वितीयस्तु सुतो भावी वंशराज्यधरस्तव। इत्युक्तं शम्भुनोत्थाय हृष्टश्चक्रे स पारणम्॥ १७२॥ कालेन जातस्तस्यैको लक्ष्मीसेनाभिधः सुतः। शूरसेनाभिधानश्च द्वितीयो नृपतेः क्रमात्॥ १७३॥ तदिमं मां विजानीहि लक्ष्मीसेनं वरानने। आनीतमिह वातोत्थनाकृष्ट्याखेटनिर्गतम्॥ १७४॥ इत्युक्ता तेन साप्युक्त्वा स्वोदन्तं तस्य पृच्छतः। सख्यो हेमप्रभा जातिं स्मृत्वा हृष्टा जगाद तम्॥ १७५॥ त्वयि दृष्टे मया जातिर्विद्याभिः सह संस्मृता। साकं सख्यानया शापच्युता विद्याधरी ह्यहम्॥ १७६॥ त्वं च विद्याधरः शापच्युतः स्वसचिवान्वितः। भर्त्ता मे त्वं च मत्सख्या अस्यास्त्वत्सचिवश्च सः॥ १७७॥ क्षीणश्च ससखीकायाः स शापो मम साम्प्रतम्। लोके बद्धाधरे भूयः सर्वेषां नः समागमः॥ १७८॥ इत्युक्त्वा दिव्यहस्तञ्च प्राप्य सख्या समं तया। हेमप्रभा समुत्पत्य सा स्वलोकमगात्तदा॥ १७९॥ लक्ष्मीसेनश्च यावत् स साश्चर्योऽत्र स्थितः क्षणात्। तावत्स सचिवस्तस्य चिन्वानो मार्गमाययौ॥ १८०॥ तस्मै स राजपुत्रश्च सख्ये यावद्ब्रवीति तत्। तावद्बुद्धिप्रभोऽप्यागात् स राजा स्वसुतोत्सुकः॥ १८१॥ सोऽदृष्ट्वैव सुतां दृष्ट्वा लक्ष्मीसेनं च पृष्टवान्। तस्याः प्रवृत्तिं सोऽप्यस्मै यथादृष्टं शशंस तत्॥ १८२॥ ततो बुद्धिप्रभे खिन्ने लक्ष्मीसेनः समन्वितः। स्मृत्वा शापक्षयाज्जातिं स्वर्लोकं नभसा ययौ॥ १८३॥ प्राप्य हेमप्रभां भार्यामागत्य च तया सह। बुद्धिप्रभं समामन्त्र्य व्यसृजत् स निजं पुरम्॥ १८४॥

दशम लम्बक ९९३

दशम लम्बक ९९३

उसने पुत्र के लिए शिवाराधन-तप किया। तब प्रसन्न शिवजी ने उसके आगे प्रकट होकर आदेश दिया कि 'तुझे एक पुत्र उत्पन्न होगा और वह विद्याधर का अवतार होगा। अन्त में शाप का क्षय होने पर वह अपने लोक को चला जायगा ॥१७० -१७१॥ दूसरा पुत्र तेरे वंश और राज्य को चलानेवाला होगा। शम्भू के इस प्रकार वाग्दान से प्रसन्न राजा ने उठकर व्रत की पारणा की ॥१७२॥ समय आने पर उसके यहाँ लक्ष्मीसेन नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ और क्रम से दूसरा पुत्र शूरसेन नाम का हुआ ॥१७३॥ इसलिए, तुम मुझे उस राजा का ज्येष्ठ पुत्र लक्ष्मीसेन समझो। मेरा यह वेगवान् घोड़ा आखेट के लिए निकले मुझे यहाँ ले आया है' ॥१७४॥ उसके द्वारा इस प्रकार कही गई राजपुत्री अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके उससे अपना वृत्तान्त कहकर इस प्रकार बोली—॥१७५॥ तुम्हारे कहने पर मैंने भी विद्याओं के साथ अपनी जाति का स्मरण कर लिया। मैं इस सखी के साथ शापच्युता विद्याधरी हूँ ॥१७६॥ तू अपने मन्त्री के साथ शापच्युत विद्याधर मेरा पति है। और, तेरा वह मन्त्री इस मेरी सखी का पति है ॥१७७॥ सखी के साथ मेरा वह शाप अब क्षीण हो गया है। अब हम सब का विद्याधर-लोक में फिर समागम होगा' ॥१७८॥ इस प्रकार कहकर और अपने दिव्य विद्याधर-रूप को प्राप्त कर, हेमप्रभा अपनी सखी के साथ आकाश में उड़कर, अपने लोक को चली गई ॥१७९॥ लक्ष्मीसेन वहाँ बैठकर जब इन सब घटनाओं को आश्चर्य के साथ देख रहा था कि तभी उसे ढूँढ़ता हुआ उसका मन्त्री उसी मार्ग से वहाँ आ गया ॥१८० ॥ राजपुत्र लक्ष्मीसेन जब अपने मित्र मन्त्री को वहाँ का समाचार सुना ही रहा था इतने में ही अपनी कन्या को देखने के लिए उत्सुक राजा बुद्धिप्रभ भी वहाँ आ गया ॥१८१॥ उसने भी अपनी कन्या हेमप्रभा को वहाँ न देखकर लक्ष्मीसेन से उसका समाचार पूछा। लक्ष्मीसेन ने जो कुछ देखा सुना था वह सब उससे कह सुनाया ॥१८२॥ तब बुद्धिप्रभ के व्याकुल होने पर, और लक्ष्मीसेन अपने मन्त्री के साथ शाप-मुक्त होने तथा पूर्वजाति का स्मरण करने पर, आकाश में अपने विद्याधर-लोक को गया ॥१८३॥ और, वहाँ जाकर पूर्वजन्म की पत्नी हेमप्रभा को पाकर उसे अपने पिता बुद्धिप्रभ से मिलाया उसके बाद बुद्धिप्रभ अपने नगर को लौट गया ॥१८४॥ १२५

१९४ कथासरित्सागर

१९४ कथासरित्सागर गत्वा च प्राप्तभार्येण तेन सख्या समं धृतं । पित्रे प्रतापनाय स्वनृत्तान्तमवर्णयत् ॥१८५॥ तेन दत्तं श्रमप्राप्तं राज्यं दत्त्वानुजन्मने । शूरसेनाय स ययौ वैद्याधरपुरं निजम् ॥१८६॥ तत्र विद्याधरैश्वर्यसुखं हेमप्रभामृतं । लक्ष्मीसङ्गं स भुङ्क्त स्म सख्या तेनान्वितश्चिरम् ॥१८७॥ इत्थं कथा निगदिताः किल गोमुखेन शृण्वन्क्रमात्स नरवाहनदत्तदेवः । आसन्नवर्त्तिनवशक्तियशोविवाहसूत्कोऽपि तां क्षणमिव क्षणदां निनाय ॥१८८॥ एवं विनोद्य च दिनानि स राजपुत्र प्राप्त विवाहदिवसे पितुरन्तिकस्थः । वत्सेश्वरस्य नभसः सहसावतीर्णं वैद्याधरं उपनदीप्ति बलं ददर्श ॥१८९॥ सम्भ्र्ये च स्वकदुहितरं विदितां तां गृहीत्वा प्रीत्या प्राप्तं स्फटिकयशसं वीक्ष्य विद्याधरेन्द्रम् । प्रत्युद्गम्य श्वशुर इति तं पूजयामास मूर्द्धा- वत्सशेन प्रथमविहितातिथ्यमर्यादिना सः ॥१९०॥ सोऽप्यावेद्य यथार्हमम्बरचराधीशः क्षणात्कल्पिता- ष्येवञ्चोचितदिव्यवैभवविधिः सिद्धिप्रभावात्ततः । रत्नोभप्रतिपूरिताय विभवद्वत्तेशपुत्राय तां तस्मै स्वां विततार शक्तियशसं पूर्वप्रदिष्टां सुताम् ॥१९१॥ स च नरवाहनदत्तो भार्या विद्याधरेन्द्रतनयां ताम् । सम्प्राप्य शक्तियशसं पद्म इवार्कद्युतिं व्यरुजत् ॥१९२॥ स्फटिकयशत्युपयाते कौशाम्ब्यां पुरि स वत्सराजसुतः । शक्तियशोधवनाम्बुजसन्नवेक्षणषट्पदस्तदा तस्थौ ॥१९३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्ट-विरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशो लम्बके पञ्चमस्तरङ्गः समाप्तश्चायं शक्तियशोळम्बको दशमः।

दशम लम्बक १९५

दशम लम्बक १९५ तब पत्नी-सहित उस मित्र के साथ प्रतापसेन (पिता) के पास जाकर अपना सारा वृत्तान्त शूरमीसेन ने सुनाया ॥१८४॥ और, उसके दिये हुए क्रम से प्राप्त राज्य को अपने छोटे भाई शूरसेन को देकर वह विद्याधर-लोक को गया ॥१८५॥ वहाँ जाकर हेमप्रभा से युक्त लक्ष्मीसेन अपने सपत्नीक मित्र मन्त्री के साथ चिरकाल तक दिव्य आनन्द का उपभोग करता रहा ॥१८६॥ गोमुख द्वारा इस प्रकार कही गई कथाओं को सुनकर, शक्तियशा के आसन्नवर्ती नवीन विवाह के लिए उत्सुक होने पर भी नरवाहनदत्त ने उस रात्रि को क्षण के समान बिता दिया ॥१८८॥ इस प्रकार विवाह-दिवस की अवधि को विनोदपूर्वक व्यतीत करके उस राजकुमार नरवाहनदत्त ने विवाह का दिन आने पर पिता वत्सेश्वर के पास रहते हुए, सहसा आकाश से उतरते हुए और सूर्य के समान चमकते हुए विद्याधरों के दल को देखा ॥१८९॥ उस दल के मध्य दान की इच्छा से अपनी कन्या को लेकर, प्रेम से आये हुए विद्याधरों के राजा स्फटिकयश को देखकर, श्वशुर की अगवानी करके नरवाहनदत्त ने उसकी अभ्यर्थना की और समधी वत्सराज उदयन ने भी अर्घ्य-पाद्य आदि से उसका समुचित सत्कार किया ॥१९०॥ विद्याधरों के उस राजा ने भी वत्सराज से यथार्थ बात निवेदन करके अपनी सिद्धि के प्रभाव से अपने स्वरूप के अनुसार विवाह की दिव्य सामग्री एकत्र करके रत्नों के समूह से भर दिए गए वत्सराज के पुत्र नरवाहनदत्त के लिए पहले से ही कही गई शक्तियशा नाम की अपनी कन्या विधि-पूर्वक प्रदान कर दी ॥१९१॥ वह नरवाहनदत्त भी विद्याधरराज की कन्या उस शक्तियशा को अपनी पत्नी के रूप में प्राप्त करके इस प्रकार खिल उठा जैसे रश्मियों को पाकर कमल खिल उठता है ॥१९२॥ विवाह-संस्कार समाप्त करके स्फटिकयश के अपने लोक को चले जाने पर नरवाहनदत्त अपनी नगरी कौशाम्बी में शक्तियशा के मुख-कमल का भ्रमर बनकर रहने लगा ॥१९३॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का दशम तरङ्ग समाप्त शक्तियश नामक दशम लम्बक समाप्त

वेला नामैकादशो लम्बक

वेला नामैकादशो लम्बक

३८ गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्वोक्षना त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥

प्रथमस्तरङ्गः मङ्गलाचरणम्

नमताघपविघ्नौघवारणं वारणाननम्। कारणं सर्वसिद्धीनां दुरितार्णवतारणम्॥१॥

नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता)

एवं स शक्तियशसं प्राप्याद्यां प्रथमाश्र तां। रत्नप्रभाद्या धनीं च मुख्यां मदनमञ्चुकाम्॥२॥ अतिष्ठद्विहरन् वत्सयुवराजः सुहृद्युतः। नरवाहनदत्तोऽथ कौशाम्ब्यां पितृपादवंग्॥३॥

रुचिरदेवपोतकयोः कथा

एकदा च तमुद्यानगतं देशान्तरागतौ। भ्रातरौ राजपुत्रौ द्वावकस्मादभ्युपेयतुः॥४॥ कृतातिथ्यप्रणतयोस्तयोरकोऽब्रभाण्व तम्। बङ्गाख्यस्य पुरं राज्ञः पुत्रावावां द्विमातृकौ॥५॥ नाम्ना रुचिरदवोऽहं द्वितीयश्चेष पोतकः। जविनी हस्तिनी मद्वैस्ति तुरगो द्वावमूप्य च॥६॥ तन्निमित्तं समुत्पन्ना विवाददपावयोर्द्वयोः। अहू जवादिकां वच्मि हस्तिनीं तुरमाद्वयम्॥७॥

वेला नामक एकादश लम्बक

वेला नामक एकादश लम्बक [प्रारम्भिक पद्य का अर्थ सप्तम लम्बक के प्रथम तरङ्ग के प्रारम्भ में देखें।] प्रथम तरङ्ग मङ्गलाचरण निज भक्तों के समस्त दुःखों और विघ्नों को दूर करनेवाले समस्त सिद्धियों के देनेवाले और पाप-रूपी समुद्र से पार लगानेवाले गजानन को प्रणाम है॥१॥ नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) वत्सराज उदयन का पुत्र नरवाहनदत्त इस प्रकार शक्तियशा नाम की पत्नी को पाकर मदनमञ्चुका आदि पहली रानियों के साथ कौशाम्बी नगरी में अपने मित्रों के सहित पिता के पास रहता हुआ आनन्द-विलास करता था॥२-३॥ रुचिरदेव और पोतक की कथा एक बार जब वह उद्यान में भ्रमण कर रहा था कि अकस्मात् दो राजपूत-बन्धु उसके पास आये॥४॥ नमस्कार, आतिथ्य आदि शिष्टाचार के अनन्तर उन दोनों में से एक ने कहा—'हम दोनों वैशाल नगर के राजा के दो सौतेले पुत्र हैं॥५॥ मेरा नाम रुचिरदेव और इस दूसरे का नाम पोतक है। मेरे पास तेज चलनेवाली एक हथिनी है और इसके पास दो घोड़े हैं ॥६॥ इन पशुओं के कारण हम दोनों में विवाद उत्पन्न हो गया है। मैं कहता हूँ कि हथिनी तेज चलती है और यह कहता है घोड़े ॥७॥

१९८ कथासरित्सागर

१९८ कथासरित्सागर अहू यदि जितस्तत्र पणः सैव करेणुका। अथ यदि जितो वा स्यात्तदश्वावेव तौ पणौ ॥१८॥ सर्वां जवान्तरं ज्ञातुं क्षमो नायस्त्वया विना। तदस्मद्गृहमागत्य तत्परीक्षां कुरु प्रभो ॥१९॥ प्रसीद त्वं हि सर्वार्थप्रार्थनाकल्पपादपः। आवां त्वामभ्यागतौ दूरादेतदर्थं तवार्धिनौ ॥२०॥ एवं रुचिरदेवेन सोऽभितोऽश्ववधारसात्। अनुरोधाच्च वत्सेशसूनुस्तत्प्रत्यपद्यत ॥२१॥ तदुपानीतवाताश्वरूढस्तद्देव सः। प्रतस्थे प्राप वैशाखपुरं ताभ्यां समं च तत् ॥२२॥ कोऽयं स्यात्किंस्विदप्राप्तरतिः कामो नवोद्भवः। किं वा द्वितीयश्चन्द्रोऽयमफलङ्को दिवाचरः ॥२३॥ उत वा पुरुषाकारो धात्रा कामस्य निर्मितः तरुणीहृदयाकाण्डसमूलोन्मूलने घटः ॥२४॥ इत्युन्मदाकुलोत्पक्ष्मलोचनाभिर्विलोक्य सः। वर्ध्यमानः पुरस्त्रीभिस्तद्विवेश पुरोत्तमम् ॥२५॥ शृङ्गारैकमयं तत्र युवराजो ददर्श सः। पूर्वं कृतप्रतिष्ठस्य कामदेवस्य मन्दिरम् ॥२६॥ तस्मिन् रतिप्रीतिप्रदे प्रविश्य प्रणिपत्य तम्। कामदेवं स विश्रम्य क्षणमध्वश्रमं जहौ ॥२७॥ ततस्तद्भवनाभ्यर्णवर्ति विवेश च। प्रीत्या रुचिरदेवस्य मन्दिरं तत्पुरस्कृतः ॥२८॥ वरवाजिगजाकीर्णं तदागमनसोत्सवम्। ऊर्जितर्धि स तत्पश्यन् रेमे वत्सद्वरात्मजः ॥२९॥ तस्तं रुचिरदेवेन सत्कारैः सत्कृतोऽथ सः। तत्र तद्भगिनीं कन्यां ददर्शामृतमञ्जरीम् ॥३०॥ तद्रूपशोभाकृष्टेन वधुपा मानसेन च। न सोऽपश्यत् प्रवासं वा विरहं स्वजनं वा ॥३१॥ सापि दृष्ट्वैव नीलाब्जमालेव प्रफुल्लया। प्रेमनिक्षिप्तया तस्य चकारैव स्वयंवरम् ॥३२॥

एकादश लम्बक १९९

एकादश लम्बक १९९ यदि मैं हार गया तो मेरा पक्ष (दाँव) वही हथिनी है और यदि वह हार गया तो इसके पक्ष में ही दोनों घोड़े ॥८॥ उनके वेग का अन्तर आपके सिवा दूसरा नहीं जान सकता इसलिए हे प्रभो हमारे घर पर पधारकर इसकी परीक्षा कीजिए ॥९॥ आप कृपा करें। आप सभी प्रकार की प्रार्थनाओं के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं। इसीलिए हम दोनों प्रार्थी होकर दूर से आपके पास आए हैं ॥१० ॥ इस प्रकार रुचिरदेव से प्रार्थित नरवाहनदत्त ने घोड़े और हथिनी की प्रतियोगिता के शौक से उसकी बात मान ली ॥११॥ और, वह उसी समय लाये हुए तेज झांझोंवाले रथ पर चढ़कर उन दोनों के साथ वैशाखपुर को चला ॥१२॥ चलते-चलते वह क्रमशः वैशाखपुर नगर में पहुँचा। उसके नगर में प्रवेश करते ही उसे देखकर दीवानी और एकटक निहारती हुई नागरिक स्त्रियाँ नाना प्रकार के तर्क-वितर्क करने लगीं 'यह कौन है ? क्या रति को बिना प्राप्त किया नवीन कामदेव तो नहीं है ? अथवा दिन में दीखनेवाला निष्कलंक चन्द्र तो यह नहीं है या ब्रह्मा ने पुरुष के आकार में कामदेव को निर्मित किया है ? इत्यादि ॥१३-१५॥ वहां (वैशाखपुर में) युवराज नरवाहनदत्त ने शृंगार रसमय और प्राचीन लोगों से प्रतिष्ठित किया गया कामदेव का एक मन्दिर देखा ॥१६॥ रति और प्रीति देनेवाले उस कामदेव के मन्दिर में जाकर और मूर्ति को नमन करके कुछ समय तक विश्राम करके उसने मार्ग की श्रान्ति दूर की ॥१७॥ विश्राम कर लेने के पश्चात् अगवानी किया जाता हुआ वह देवमन्दिर के समीप स्थित रुचिरदेव के घर में प्रेम के साथ प्रवेश किया ॥१८॥ नरवाहनदत्त के आगमन के उत्सव में हाथी और घोड़े की कमी नहीं थी। उनकी विराट् शोभा को देखकर नरवाहनदत्त बड़ा प्रसन्न हुआ ॥१९॥ वहाँ पर रुचिरदेव द्वारा समुचित सत्कार किये गये नरवाहनदत्त ने अत्यन्त आश्चर्य- मय रूपवाली रुचिरदेव की अविवाहिता बहन को देखा ॥२० ॥ उस कन्या के रूप-सौन्दर्य से आकृष्टहृदय और नेत्रवाले नरवाहनदत्त ने प्रवास में होने- वाले अपनी रानियों के विरह का अनुभव नहीं किया। वह उन्हें भी भूल गया ॥२१॥ उस कन्या ने भी नीलकमल की माला के सदृश प्रेम से उसके ऊपर डाली हुई दृष्टि से मानो उसे स्वयं वर लिया ॥२२॥