कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
२४ कथासरित्सागर
२४ कथासरित्सागर तत्त्वं च नाम विज्ञातं नह्येतत्स्यादकारणम्। तत्प्रेष्य दूतं प्रष्टव्यः किं साबत्सोऽत्र जल्पति ॥११०॥ इति मन्त्रिवचः श्रुत्वा राजा बाहुबलस्ततः। प्रष्टुं तत्ग्राहिणोद्दूतं तस्मै सुखधनाय सः ॥१११॥ स दूतस्तं तदादेशाद् गत्वा मावञ्च पृच्छति। तान्मानपरा सास्मै स्ववृत्तान्तं तमभ्यधात् ॥११२॥ श्रुत्वैव च तदाश्चर्यं रूपं तस्याश्च वीक्षितुम्। गृहे सुखधनस्यागात्सार्थलोमो महीपतिः ॥११३॥ तत्रापश्यत्सुखधने प्रह्वे मानपरां स ताम्। विधातुरपि लावण्यलक्ष्म्या विस्मयदायिनीम् ॥११४॥ पावानतायाः सोऽस्याश्च पृष्टायाश्च स्वयं मुखात्। अशृणोत्तद्यथावृत्तमर्थलोभस्य शुष्पतः ॥११५॥ श्रुत्वा च मत्वा सत्यं तदर्थलोमे निरुत्तरे। तामपृच्छत्स सुमुखीं किमिदानीं भवत्विति ॥११६॥ ततः सा निश्चितावादीद्देव येनास्म्यनापदि। विक्रीतान्यस्य निःसत्त्वं सुखं कथमुरैमि तम् ॥११७॥ एतच्छ्रुत्वा नृपे तस्मिन्साधूक्तमिति वादिनि। अवोचत्सोऽर्थलोमोऽत्र कामक्रोधमपाकुरु ॥११८॥ अयं सुखधनो राजन्नहं चानुचरैर्विना। युध्यावहे स्वसेन्याभ्यां सत्त्वासत्त्वमवेक्षताम् ॥११९॥ इत्यर्थलोमस्य वचः श्रुत्वा सुखधनोऽभ्यधात्। तर्हि युध्यावहे द्वावेव द्वावेव किमु सैनिकैः ॥१२० ॥ यः प्राप्स्यति जयं मानपरा तस्य भविष्यति। श्रुर्वरद् बाढमस्त्वेवमिति राजाऽप्यभाषत ॥१२१॥ ततो मानपरायां च राज्ञि चावेक्षमाणयोः। युद्धभूमिं नृपाख्यां साववातरतामुभौ ॥१२२॥ प्रवृत्ते चाहवे तत्र कुन्ताघातोत्पतद्धयम्। अर्थलोमं सुखधनः पर्यक्षिपदसुपातले ॥१२३॥ तमेव शरारेस्त्रीनन्यान्हत्वाश्च पतितः क्षितौ। वीर्य्यन्धम॑योधी स न् ते सुखधनोऽब्रवीत् ॥१२४॥
सप्तम लम्बक २५
सप्तम लम्बक २५ बिना कारण यह घटना कैसे हुई। इसलिए दूत भेजकर सुखधन को बुलवाना चाहिए। देखिए, वह इस विषय में क्या कहता है ? ॥१११ ॥ मन्त्री की सम्मति मानकर राजा बाहुबल ने सुखधन के पास पूछने के लिए दूत भेज दिया। जब राजा की आज्ञा से दूत ने आकर उससे पूछा तब अर्थलोभ की पत्नी मानपरा ने स्वयं सारा समाचार उसे सुनाया ॥१११-११२॥ इस आश्चर्यमय वृत्तान्त को सुनकर और मानपरा के रूप को देखने के लिए राजा अर्थलोभ को साथ लेकर सुखधन के घर पर आया ॥११३॥ वहाँ सुखधन के प्रणाम स्वीकार करते हुए उसने मानपरा को देखा जो अपने लावण्य से ब्रह्मा को भी चकित करनेवाली थी ॥११४॥ पैरों पर पड़ी हुई मानपरा ने राजा के पूछने पर, अर्थलोभ के सामने ही अपना वृत्तान्त स्वयं कहने लगी। उसका कथन सुनकर, उसे सत्य समझकर और अर्थलोभ के चुप हो जाने पर, राजा ने मानपरा से पूछा कि 'हे सुन्दरी ! अब क्या होना चाहिए ? ॥११५-११६॥ तब वह बोली—'महाराज ! जिस लोभी ने बिना किसी आपत्ति या संकट के आये ही मुझे सिर्फ लोभ से बेच डाला ऐसे लोभी पिशाच के पास फिर कैसे जाऊँ ? ॥११७॥ यह सुनकर जब राजा ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार किया तब काम-क्रोध और लज्जा से भरा हुआ अर्थलोभ बोला—॥११८॥ 'महाराज ! मैं और सुखधन दोनों किसी अन्य की सहायता के बिना अपनी-अपनी सेना से युद्ध करें। आप दोनों के बलाबल का निरीक्षण करें ॥११९॥ अर्थलोभ की बातों को सुनकर सुखधन बोला—'यदि ऐसा हो तो सेना की क्या आव- श्यकता है। हमीं दोनों परस्पर द्वन्द्व-युद्ध करके निपटारा कर लें ॥१२० ॥ इस द्वन्द्व-युद्ध में जो विजयी होगा मानपरा उसी की होगी। यह सुनकर राजा ने भी कहा कि 'ठीक है। यही हो' ॥१२१॥ तदनन्तर, राजा और मानपरा के समक्ष दोनों घोड़े पर चढ़कर युद्ध-भूमि में उतरे। युद्ध में गदाओं से लड़ते हुए उन दोनों में सुखधन ने अर्थलोभ को गदा की मार से पृथ्वी पर गिरा दिया ॥१२२-१२३॥ इसी प्रकार, उसने अर्थलोभ को तीन बार गिराया और उसके घोड़े को मार डाला किन्तु धार्मिक सुखधन ने जबलोभ को प्राणों से वियुक्त नहीं किया ॥१२४॥
२०६ कथासरित्सागर
२०६ कथासरित्सागर वारं तु पञ्चमेऽस्त्वेनं पतित्वोपरि ताडितः। अर्थलोमः स निश्चेष्टस्ततो भृत्यैरनीयत ॥१२५॥ ततः सुखधनः सर्वैः साधुवादाभिपूजितम्। स तं बाहुबला राजा यथोचितममानयत् ॥१२६॥ प्राभृतं च तदानीतं तस्मै एव समर्पयत्। अहरच्चार्थलोमस्य सर्वस्वमशुभार्जितम् ॥१२७॥ तत्पते सादरं कृत्वा तुष्टः प्रायात्स्वमन्दिरम्। निवृत्तपापसम्पर्काः सन्तो यान्ति हि निर्वृतिम् ॥१२८॥ सोऽपि प्रसङ्गं विहरन्नासीत्सुखधनः सुखम्। सदिक्षो मानपरया भार्यया चानुरक्तया ॥१२९॥ एवं दाराः पलायन्ते हीनसत्त्वाद्धनानि च। सुसत्त्वस्योपनिष्ठन्ते स्वयमेत्य यतव्रत ॥१३०॥ तदलं चिन्तया निद्रां भजस्व नचिरेण हि। राजपुत्रीमवाप्तासि त्वं तां कर्पूरिकां प्रभो ॥१३१॥ इति राज्यधराच्छ्रुत्वा रात्रौ तत्रार्थवद्वचः। नरवाहनदत्तः स भेजे निद्रां सगोमुखः ॥१३२॥ प्रातश्चात्र कृताहारः क्षणं यावत्स तिष्ठति। तावत्स गोमुखो धीमांस्तं राज्यधरमभ्यधात् ॥१३३॥ कुरु यन्त्रविमानं तन्मत्प्रभोर्यस्य येन तत्। कर्पूरसम्भवपुरं प्राप्य प्राप्नोत्यसौ प्रियाम् ॥१३४॥ नरवाहनदत्तस्य कर्पूरसम्भवद्वोपं प्रस्थितिः एतच्छ्रुत्वा स तक्षास्मै वातयन्त्रविमानकम्। नरवाहनदत्ताय पूर्वक्लृप्तमथोऽकथयत् ॥१३५॥ तत्रारुह्य मनःशीघ्रे खगामिनि सगोमुखः। तद्वीर्यालोकसोत्हासमिवोच्छलितवीचिकम् ॥१३६॥ मकराकरमुल्लङ्घ्य प्राप तत्तीरवर्त्ति सः। नरवाहनदत्तस्तत्पुरं कर्पूरसम्भवम् ॥१३७॥ तत्रावतीर्णाभिमुखो विमानादवरुह्य सः। पुरान्तः परिवभ्राम कौतुकेन सगोमुखः ॥१३८॥ पृष्ट्वाञ्च लोकतो बुद्ध्वा सर्वैवाभीप्सितं पुरम्। प्राप्तं निस्संशयं हृष्टो ययौ राजकुमान्तिकम् ॥१३९॥
सप्तम लम्बक १०७
सप्तम लम्बक १०७ पाँचवी बार में घोड़े के पैरों से भूमिपर रौंदे गये प्राणहीन अपलोभ के शरीर को उसके दास युद्धभूमि से उठाकर ले गये ॥१२५॥ तब दर्शकों द्वारा प्रशंसा किये जाते हुए मुखधन का राजा ने भी समुचित सत्कार सम्मान आदि किया उसे उपहार प्रदान किया एवं अर्थलोभ की पाप से कमाई हुई सारी सम्पत्ति अधिकृत कर ली ॥१२६ १२७॥ और, उसके स्थान पर दूसरे प्रतिहार की नियुक्ति करके राजा राजभवन को गया। सज्जन व्यक्ति दुष्टजनों के सम्पर्क से दूर रहकर ही सुखी रहते हैं ॥१२८॥ वह शुभधन भी प्रेम करनेवाली पत्नी मान्यवरा के साथ मुखभोग करता हुआ आनन्द में विहार करने लगा ॥१२९॥ इस प्रकार, दुर्बल और नीच हृदयवाले कुत्सित पुरुषों से स्त्रियाँ और धन दूर हो जाते हैं और उदारचेता पुरुषों को इधर-उधर से स्वयं आकर मिलते हैं॥१३० ॥ इसलिए, तुम चिन्ता न करो। आनन्द से नींद लो। महाराज ! तुम राजकुमारी कर्पूरिका को अवश्य प्राप्त करोगे' ॥१३१॥ नरवाहनदत्त ने राज्यधर से इस प्रकार रहस्य-युक्त वचन सुनकर गोमुख के साथ नींद ली। प्रातःकाल जब नरवाहनदत्त भोजन करके विश्राम कर ही रहा था कि इतने में बुद्धिमान् गोमुख ने राज्यधर से कहा- 'तुम मेरे स्वामी के लिए ऐसा यन्त्रमय विमान बनाओ कि वह कर्पूरसंभव द्वीप में पहुँचकर अपनी प्राणप्यारी को पा सके' ॥१३२-१३४॥ नरवाहनदत्त का कर्पूरसंभव द्वीप के प्रति प्रस्थान तब उस कुशल शिल्पकार ने पहले से ही तैयार किये हुए वायुयन्त्र-विमान को नर- वाहनदत्त के लिए तैयार कर दिया ॥१३५॥ मनके समान शीघ्र चलनेवाले उस विमान पर बैठकर वायुवेग के साथ नरवाहनदत्त अपने धैर्य को देखकर प्रसन्नता से उछलते हुए समुद्र को लाँघकर उत्तर किनारे पर स्थित कर्पूरसंभव द्वीप में पहुँचा और आकाश से उतरकर कौमुदीश्वर नगर के भीतर भ्रमण करने लगा ॥१३६ १३८॥ लोगों से पूछने पर उसे द्वीप कर्पूरद्वीप समझकर और गरुड़-रहित होकर वह राजभवन समीप पहुँचा ॥१३९॥
२०८ कथासरित्सागर
२०८ कथासरित्सागर तत्रैकं रुचिरं वेश्म वृद्धयाधिष्ठितं स्त्रिया। स विवेश निवासाय नम्रयानुमतस्तया ॥१४०॥ युक्तिं जिज्ञासमानश्च क्षणात्पप्रच्छ तां स्त्रियम्। आर्ये किमभिधानोऽत्र राजापत्यं च तस्य किम् ॥१४१॥ रूपं च तस्य नः शंस यतो वैदेशिका वयम्। इत्युक्ता तेन वृद्धा सा तं विलोक्योत्तमाकृतिम् ॥१४२॥ प्रत्युवाच महाभाग शृणु सर्वं वदामि ते। इह कर्पूरको नाम राजा कर्पूरसम्भवे ॥१४३॥ स धानपत्यः सन्तानहेतोद्दिश्य शङ्करम्। बुद्धिकार्या समं देव्या निराहारोऽकरोत् तपः ॥१४४॥ त्रिरात्रोपोषितं वर्षो हरः स्वप्ने तमादिशत्। उत्तिष्ठ पुत्राभ्यधिका सा ते कन्या जनिष्यते ॥१४५॥ विद्याधराणां साम्राज्यं यस्याः पतिरवाप्स्यति। इत्यादिष्टो हरेणासौ प्रातः प्रबुध्य भूपतिः ॥१४६॥ निवेद्य बुद्धिकार्ये च देव्यै स्वप्नं तदोत्थितः। प्रहृष्टोऽथ तया सार्धं चकार व्रतपारणम् ॥१४७॥ ततस्तस्याधिराद्वाज्ञी राज्ञी गर्भमग्रहीत् सा। काले चासूत सम्पूर्णे कन्यां सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥१४८॥ यया प्रभामितास्तत्र जातवेश्मनि दीपकाः। कज्जलोद्गारमिषतो निःश्वासानमुचन्निव ॥१४९॥ कर्पूरिकेति तस्याश्च निजं नाम ततः पिता। एष कर्पूरको राजा व्यधत्त विहितोत्सवः ॥१५०॥ क्रमाच्च वृद्धिं प्राप्ता सा लोकलोचनचन्द्रिका। कर्पूरिका राजपुत्री यौवनस्याद्य वर्तते ॥१५१॥ पिता चेह नृपस्तस्या विवाह मभिवाञ्छति। पुरुषद्वेषिणी सा तु न मञ्छति मनस्विनी ॥१५२॥ कन्याजन्मफलं कस्माद्विवाहं सखि नेच्छसि। इति मत्सुतया सा च सख्या पृष्टेदमब्रवीत् ॥१५३॥ सखि जातिस्मराया मे प्राग्वृत्तं शृणु कारणम्। अस्ति तीरे महाम्भोघेर्महाश्चन्दनपादपः ॥१५४॥
सप्तम लम्बक २०९
सप्तम लम्बक २०९ राजभवन के समीप ही एक बूढ़ी औरत के मनोरम मकान को देखकर, उस विनम्र वृद्ध से अनुमति प्राप्त कर वह निवास के लिए उस घर में घुसा ॥१४ ॥ अब राजकुमारी से मिलने की युक्ति सोचते हुए उसने उस स्त्री से कुछ ही देर में पूछा कि हे आर्ये ! यहाँ के राजा का क्या नाम है और उसकी सन्तान क्या है ? और, उसका रूप कैसा है ? यह हमें बताओ। क्योंकि हम विदेशी हैं। राजा नरवाहनदत्त के इस प्रकार पूछने पर वह बूढ़ी उसकी उत्तम आकृति देखकर बोली— ॥१४१-१४२॥ 'हे भाग्यशालिन् ! सुनो मैं सब तुमसे कहती हूँ। इस कर्पूरसम्भव द्वीप में कर्पूरक नाम का राजा है। सन्तान-हीन उस राजा ने सन्तान के लिए, अपनी महारानी बुद्धिकार्या के साथ शंकर की उपासना की। तीन रातों तक उपवास किये राजा को शिवजी ने स्वप्न में आदेश दिया कि उठो तुम्हें पुत्र से भी अधिक प्यारी कन्या उत्पन्न होगी जिसका पति विद्याधरों का राजा होकर साम्राज्य प्राप्त करेगा। शिवजी से इस प्रकार आदेश दिया गया राजा प्रातःकाल उठा ॥१४३-१४६॥ उसने प्रसन्नचित्त होकर रानी बुद्धिकार्या को अपना सपना वह सुनाया और उसके साथ ही व्रत का पारण किया ॥१४७॥ कुछ दिनों बाद उसकी रानी ने गर्भ धारण किया और सम्पूर्ण अच्छे लक्षणोंवाली सर्वोत्तमुन्दरी कन्या उत्पन्न की ॥१४८॥ उस कन्या की शरीर-ज्योति से प्रसूति-गृह के सारे दीपक निष्प्रभ-से हो गये। मानो उजालने के बहाने माना वे अपनी पराजय के कारण सम्मुख होने से डर रहे थे ॥१४९ ॥ तब राजा कर्पूरक ने उत्सव करके और उसका नामकरण-संस्कार करके उसका नाम कर्पूरिका रखा ॥१५०॥ जनता के नेत्रों तथा मन को नया आनन्द देनेवाली वह कर्पूरिका कन्या बढ़ती हुई अब पूर्ण युवावस्था में है ॥१५१॥ उसका पिता उसका विवाह करना चाहता है किन्तु वह पुरुषों से द्वेष रखनेवाली कमलिनी विवाह करना नहीं चाहती ॥१५२॥ उसकी स्नेही देवी माता के यह पूछने पर कि 'अंगि ! ब्याह के काम का क्या विचार है ? तू पुरुष क्यों नहीं चाहती?' —यह पूछने पर वह इस प्रकार बोली—॥१५३॥ 'मातः ! मैं अपने पूर्व जन्म का हाल जानती हूँ। सो देवी आप सुनिये कि विवाह न करने का कारण बताती हूँ। संसार के जितने सब बड़ा आश्चर्य का खेल है ॥१५४॥ २७
२१ कथासरित्सागर
२१ कथासरित्सागर तस्यास्ति निकटे फुल्लनलिनालङ्कृतं सरः। तत्राहमभवं हंसी पूर्वजन्मनि कर्मतः ॥१५५॥ साहम्प्रधितटाज्जातु तस्मिंश्चन्दनपादपे। अकार्या राजहंसेन स्वेन भर्त्रा सहारुयम् ॥१५६॥ तत्रालये वसन्त्या म प्रजातान्योतकान्सुतान्। अकस्मादेत्य बलवान्समुद्रोर्मिरपाहरत् ॥१५७॥ हृतेष्वपत्येष्बोघेन क्रन्दन्त्यहमनश्नती। आसं शुचाब्धितीरस्थशिवलिङ्गाग्रवर्त्तिनी ॥१५८॥ तत स राजहंसो मामुपेत्य पतिरभ्यधात्। उत्तिष्ठ किमपत्यानि व्यतीतान्यनुशोचसि ॥१५९॥ अन्यानि नो भविष्यन्ति सर्वं जीवद्भिराप्यते। इति तद्वाक्यशरेणाहं हृदि विद्धा व्यचिन्तयम् ॥१६०॥ धिगहो पुरुषा पापा बालापत्येष्वपीदृशाः। निस्नेहा निष्कृपाश्चैव स्त्रीषु भक्तिमतीष्वपि ॥१६१॥ तन्मे किममुना पत्या किं वा देहेन दुःखिना। इत्यालोच्य हरं नत्वा कृत्वा भक्त्या व्रतं हृदि ॥१६२॥ तत्रैव पुरतस्तस्य पत्युरहं सस्य पश्यतः। 'जातिस्मरा राजपुत्री भूयास जननान्तरे' ॥१६३॥ इति सङ्कल्प्य तत्क्षिप्तं शरीरं जलधौ मया। ततोऽहं सखि जाताद्य तथाभूतेह जन्मनि ॥१६४॥ पूर्वजातौ च तस्यां तां भर्तुस्तस्य नृशंसताम्। सस्मरन्त्या न कस्मिंश्चिद्वरे रज्यति मे मनः ॥१६५॥ अतो विवाहं नेच्छामि दैवायत्तमतः परम्। इत्युक्तं राजसुतया मत्स्रुतायै तया रहः ॥१६६॥ तया मत्स्रुतयाप्येतन्मद्गृहागत्य वर्णितम्। तदेव ते मया ख्यातं पुत्र यत्पृष्टवानसि ॥१६७॥ तवैष भाविनी भार्या नूनं चैषा नृपात्मजा। सर्वविद्याधराणां हि भविष्यत्येकवल्लभः ॥१६८॥ महिषीयं समादिष्टा पूर्वं देवेन शम्भुना। तलक्षणैश्च युक्तं त्वां पश्यामि त्रिलकादिभिः ॥१६९॥
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२१२ कथासरित्सागर
२१२ कथासरित्सागर किंस्वित्स्वर्थमानीयैतः कोऽपि स्वमिह वेधसा। उत्तिष्ठ तावन्मद्गेहे द्रक्ष्यामः किं भविष्यति ॥१७०॥ इत्युक्त्वोपहृताहारो व्ययाय तया निशाम्। नरवाहनदत्तस्तामनेषीद् गोमुखान्वितः ॥१७१॥ प्रातः सम्मन्त्र्य कार्यं च गोमुखेन समं रहः। महाव्रतिकवेषं च कृत्वा वत्सेश्वरात्मजः ॥१७२॥ तद्द्वितीयोऽत्र हा हसि हा हसीति वदन्मुहुः। गत्वा राजकुलद्वारि बभ्राम जनतेक्षितः ॥१७३॥ तच्चाद्भुतं च स दृष्ट्वा तत्र गत्वैव चेटिका। कर्पूरिकां राजसुतां तामबोधयत्सविस्मया ॥१७४॥ सिंहद्वारे युवा देवि दृष्टोऽस्माभिर्महाव्रती। सद्वितीयोऽपि यो धत्त सौन्दर्येणाद्वितीयताम् ॥१७५॥ नारीजनमहामोहदायिनं मन्त्रमद्भुतम्। उच्चारयति हा हसि हा हसीति दिवानिशम् ॥१७६॥ तच्छ्रुत्वा पूर्वहंसी सा राजपुत्री सकौतुका। आनाययत्तमेताभिस्तद्रूपं पार्श्वमात्मनः ॥१७७॥ ददर्श चैतमुद्दामरूपाढ्यद्भूतभूमिकम् । शङ्करार्चनोपात्तव्रतं नवमिव स्मरम् ॥१७८॥ निजगाद च पश्यन्ती विस्मयोत्फुल्लया दृशा। किमेतद्देव हा हसि हा हसीत्युच्यते त्वया ॥१७९॥ एवं तयोक्तेऽपि तदा हा हसीत्येव सोऽब्रवीत्। ततः सहस्थितस्तस्य गोमुखः प्रत्युवाच ताम् ॥१८०॥ अहन्ते कथयाम्येतच्छृणु देवि समासतः। पूर्वजन्मनि हंसोऽयमभवत्संयोगतः ॥१८१॥ तत्रैव जलधेस्तीरे महतः सरसस्तटे। कृतारम्यं समं हंस्या तस्यै चन्दनपादपे ॥१८२॥ तस्मिंर्दैवाद्गतस्यैषु समुद्राभिलुतेषु सा। एतस्य हंसी शोकार्त्ता तत्रैवात्मानमक्षिपत् ॥१८३॥ ततोऽसौ तद्वियोगात्तं परिजातो विरक्तिमान्। त्यक्तुञ्चाम शरीरं तत्सङ्कल्पमकरोद्यदि ॥१८४॥
सप्तम लम्बक २१३
सप्तम लम्बक २१३ क्या देव ने उसी के लिए तुम्हें यहाँ ला दिया है? तुम मेरे ही घर पर तबतक ठहरो। फिर देखेंगे आगे क्या होता है'? ॥१७१॥ ऐसा कहकर वृद्धा के द्वारा भोजन कराया गया गोमुख के साथ नरवाहनदत्त ने वह रात्रि वहीं व्यतीत की॥१७२॥ प्रातः काल गोमुख के साथ एकान्त में अपना कर्त्तव्य-निर्धारण करके कमलेश्वर के पुत्र ने महाव्रती का वेश धारय किया ॥१७३॥ इस प्रकार का वेश बनाकर गोमुख को साथ लिये हुए 'हा हंसिनी' 'हा हंसिनी !— इस प्रकार बकता-भकता राजभवन के आस-पास घूमने लगा। जनता उनका तमाशा देखने लगी ॥१७३॥ इस प्रकार उसे देखकर राजभवन की दासियां आश्चर्यचकित होकर राजकुमारी कर्पूरिका से बोलीं—॥१७४॥ 'राजभवन के सिंहद्वार पर किसी महाव्रती युवा को हम लोगों ने देखा जो द्वितीय मित्र के साथ रहने पर भी सौन्दर्य में अद्वितीय है ॥१७५॥ वह स्त्रियों के लिए महापाशून मन्त्र के समान दिन-रात 'हा हंसिनी! हा हंसिनी! —इस प्रकार की रट लगाये हुए है ॥१७६॥ यह सुनकर पूर्वजन्म की हंसिनी उस राजकुमारी ने बड़े ही कौतुक से दासियों द्वारा उसे अपने समीप बुलाया ॥१७७॥ और अत्यन्त सुन्दर रूप से शोभित शंकर की शापव्यथा से पुनर्जीवित रूप कामदेव के समान उस (नरवाहनदत्त को) देखा ॥१७८॥ और, विस्मय से विस्फारित नेत्रों से उसे देखते हुए राजकुमारी बोली कि 'तुम 'हा हंसिनी ! हा हंसिनी! यह क्या बार-बार रट रहे हो? ॥१७९॥ राजकुमारी के ऐसा पूछने पर भी उसने उत्तर में 'ओ हा हंसिनी ! —यही कहा। तब उसके साथ गए हुए गोमुख ने कहा—'हे देवि ! मैं संक्षेप से कहता हूँ सुनो। यह अपने पूर्व योग से पहले जन्म में हंस था ॥१८०-१८१॥ उस जन्म में यह मदन-मञ्जरी किसी बड़े सरोवर के किनारे कमल-वृक्ष में अपना आवास बनाकर हंसिनी के साथ रहता था। वहीं पर दैवयोग से गरुड़ की मन्दरा में बच्चों का विनाश होने से दुःख भोगकर इसकी हंसिनी ने व्यथित होकर प्राण त्याग दे दिया ॥१८२-१८३॥ तब हंसनी के वियोग में दुखी होकर पक्षी जाति से विरक्त होकर हृदय से स्मरण किया—॥१८४॥
२१४ कथासरित्सागर
२१४ कथासरित्सागर जातिस्मरोऽहं भूयासं राजपुत्रोऽन्यजन्मनि । एषा च तत्र मे भार्या भूयाज्जातिस्मरा सती ॥१८५॥ इति सङ्कल्प्य तं देहं तदा सस्मृत्य शङ्करम्। विरहानलसन्तप्तं समुद्राम्भस्यपातयत् ॥१८६॥ ततोऽयं वत्सराजस्य कौशाम्ब्यां तनयोऽधुना। नरवाहनदत्ताख्यो जातो जातिस्मरः शुभे ॥१८७॥ असौ विद्याधरेन्द्राणां चक्रवर्ती भविष्यति । इति वागुदभूद्दिव्या जातस्यास्य स्फुटं तदा ॥१८८॥ क्रमण यौवराज्यस्थः पित्राथ परिणायितः । दिव्यां कामरसम्भूतां देवीं मदनमञ्चुकाम् ॥१८९॥ ततो हेमप्रभाख्यस्य विद्याधरपतेः सुता। एत्य स्वयं वृतवती कन्या रत्नप्रभेत्यमुम् ॥१९०॥ तथापि तां स्मरन्नृत्सीं नायं भजति निर्वृतिम्। एतच्च बालभृत्याय मह्यमेतेन वर्णितम् ॥१९१॥ अथास्य मृगयायातस्यासीत्सन्दर्शनं वने । कयापि सिद्धतापस्या मद्वितीयस्य दैवतः ॥१९२॥ कथाप्रसङ्गात्सा चैतमेव सानुग्रहाब्रवीत्। कर्मयोगात्पुरा पुत्र कामो हंसत्वमागतः ॥१९३॥ तस्य चाम्बुनिधीरतस्थचन्दनद्रुमवासिनः । प्रिया भार्याभवद्बत्सी दिव्यस्त्री शापतश्च्युता ॥१९४॥ वेलाजलहुतापरयशोकस्तस्यां च वारिधौ। क्षिप्तात्मनि स हंसोऽपि तत्रेवात्मानमक्षिपत् ॥१९५॥ सोऽद्य शम्भोः प्रसादात्त्वं जातो वत्सेश्वरात्मजः । पूर्वजातिं च तां वत्स वेत्सि जातिस्मरो ह्यसि ॥१९६॥ सा ह्यस्त्येवमेवाम्भोः पारे कर्पूरसम्भवे। पुरे कर्पूरिका नाम जाता राजसुताधुना ॥१९७॥ तद्गच्छ तत्र पुत्र त्वं प्रियां भार्यामवाप्स्यसि । इत्युक्त्वा सा समुत्पत्य तिरोभूत्सिद्धतापसी ॥१९८॥ अयं चास्मत्प्रभुर्जातप्रभृतिस्तत्क्षणं ततः। इतोऽभिमुखमागन्तुं प्रावर्त्तत मया सह ॥१९९॥
सप्तम लम्बक २१५
सप्तम लम्बक २१५ कि 'मैं अगले जन्म में पूर्व जन्म का स्मरण करनेवाला राजपुत्र बनूँ और यह मेरी सती पत्नी भी पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाली राजकुमारी बने'। ऐसा संकल्प करके और मन में शंकर का ध्यान कर इसने भी समुद्र में कूदकर प्राण दे दिये। तदनन्तर वह हंस इस जन्म में कौशाम्बी नगरी में वत्सराज उदयन के यहाँ नरवाहनदत्त नामक पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ और यह पूर्व जन्म का स्मरण करता है॥१८५-१८७॥ 'यह विद्याधर-राजाओं का चक्रवर्ती सम्राट् होगा'—ऐसी दिव्य वाणी उसके उत्पन्न होने पर स्पष्ट रूप से हुई थी॥१८८॥ क्रमशः युवराज-पद पर अभिषिक्त इसका विवाह पिता ने किसी कारण-वश मनुष्य जाति में उत्पन्न दिव्य कन्या मदनमञ्चुका के साथ करा दिया॥१८९॥ तदनन्तर हेमप्रभ नामक विद्याधर-राज की कन्या रत्नप्रभा ने स्वयं आकर इसका वरण किया है॥१९०॥ तो भी यह अपने पूर्वजन्म की प्राणप्यारी पत्नी हंसिनी को याद करके क्षण भर भी सुख या शान्ति नहीं प्राप्त करता है। यह बात इसने अपने बालमित्र मुझसे पहले कही थी॥१९१॥ तदनंतर, एक बार मेरे साथ जंगल में शिकार खेलते हुए उसे किसी सिद्ध तपस्विनी के दर्शन हुए। वार्तालाप के सिलसिले में तपस्विनी ने कहा कि 'पुत्र ! तुम कामदेव किसी कर्मवश पूर्वजन्म में हंस के रूप में अवतीर्ण हुए थे और वह तुम्हारी हंसी भी शाप से च्युत कोई दिव्य रमणी थी जो चन्दन-वृक्ष में घोंसला बनाकर तुम्हारे साथ रहती थी॥१९२-१९४॥ समुद्र की लहरों द्वारा बच्चों के बहा ले जाने पर उनके शोक से हंसिनी ने समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर ली और उसके शोक से तुमने भी ऐसा ही किया ॥१९५॥ अतः शिवजी की कृपा से तुम वत्सराज उदयन के पुत्र हुए और हे पुत्र ! तुम अपने पूर्वजन्म को जाननेवाले जातिस्मर हो॥१९६॥ वह हंसिनी भी समुद्र के पार कर्पूरसंभव द्वीप में कर्पूरिका नाम से राजकुमारी के रूप में अवतीर्ण हुई है॥१९७॥ तो हे पुत्र ! तुम जाना। वहाँ तुम अपनी प्यारी पूर्वपत्नी को प्राप्त करोगे।—ऐसा कहकर वह सिद्ध तपस्विनी अन्तर्धान हो गई ॥१९८-१९९॥
२१६ कथासरित्सागर
२१६ कथासरित्सागर त्वत्स्नेहाकृष्यमाणश्च पणीकृत्य स्वजीवितम्। उत्तीर्य कान्तारशतं प्राप दग्धोऽम्बुधस्तटम् ॥२००॥ तत्र हेमपुरस्थोऽस्म वेश्या राज्यधराभिध। मद्द्वितीयाय मिश्रितं प्रादाच्चक्रविमानकम् ॥२०१॥ तस्मिन्नारुह्य भयदं हा मूर्त्तं इव साहसे। अब्धिकान्तरमुल्लङ्घ्य प्राप्तावावामिदं पुरम् ॥२०२॥ एतदर्थमसावद्य हा हंसीति वदन्निह। भ्रान्तो देवि मम स्वामी यावत्प्राप्तस्त्वदन्तिके ॥२०३॥ इदानीं स्वमुखाकाररागारमणदर्शनात्। असंस्यदुःखसन्धिप्यन्तमताप्यातिमदनुते ॥२०४॥ तदृदृष्टिनीरुजनलिनखआजय महाविधिम् ॥२५॥ एव वचो विरचितं गोमुखस्य निशम्य सा। संवादप्रत्ययात् सत्यं मेने कर्पूरिका तदा ॥२०६॥ अहो मय्यार्यपुत्रस्य स्नेहोऽमुष्य मुधैव मे। विरक्तताभूदित्यन्तः प्रेमार्द्रा विममर्श सा ॥२०७॥ उवाच नाहं सत्यं सा हंसी यन्मां च यत्कृते। एवं जन्मद्वये क्लेदामार्यपुत्रोऽनुभूतवान् ॥२०८॥ तदहं वोऽधुना दासी प्रेमप्रीतेति वादिनी। नरवाहनदत्तं च स्नानाद्यैः समभागयत् ॥२०९॥ ततः परीवारमुखेनेदत् सर्वमबोधयत्। पितरं स्वं स चोपागात्तद् बुद्ध्वैव स्वदन्तिकम् ॥२१०॥ तत्रोत्पन्नविवाहेच्छां सुतां सो तद्वरं यथा। नरवाहनदत्तं च सम्प्राप्तमुचितं चिरात् ॥२११॥ विद्याधरमहाचक्रवर्त्तिलक्षणलाञ्छितम् । दृष्ट्वा कृतार्थमात्मानं यसोऽमन्स्यत तथा नृपः ॥२१२॥ प्रहृष्टो चात्मजामन्तां तस्मै कर्पूरिकां ततः। नरवाहनदत्ताय यथाविधि स सादरम् ॥२१३॥ प्रादात्तस्मै च जामात्रे प्रतिपत्तिप्रदक्षिणम्। कोटीस्तिस्रः सुवर्णस्य कर्पूरस्य च तावतीः ॥२१४॥
सप्तम लम्बक २१७
सप्तम लम्बक २१७ उसी समय से यह समाचार जानकर हमारा स्वामी यह राजकुमार तुम्हारे स्नेह से खिचकर अपने जीवन की बाजी लगाकर और सैकड़ों देशों को पार कर समुद्र के किनारे पहुँचा ॥२ ॥ वहाँ पर हेमपुर के राजा चित्रकार राज्यधर ने यन्त्र से चलनेवाला विमान दिया ॥२ १॥ मूर्त्तिमान् साहस के समान उस भयंकर विमान पर चढ़कर समुद्र के दुर्गम भाग को पार कर हम दोनों यहाँ पहुँचे हैं ॥२ २॥ इसीलिए, यह मेरा मालिक तुम्हारे लिए 'हा हंसिनी ! हा हंसिनी !'—इस प्रकार बकता-बकता व्याकुल हो गया है और तुम्हारे पास तक यहाँ आया है ॥२ ३॥ अब यह तुम्हारे आनन्द-दायक मुख चन्द्र के दर्शन से असंख्य दुःख-रूपी अन्धकार से इसका छुटकारा हो रहा है। इसलिए अत्यन्त कष्ट और उत्कण्ठा से आये हुए इस अतिथि को दृष्टिरूपी नील कुमुदों की माला से सत्कृत करो' ॥२ ४२ ५॥ राजकुमारी कर्पूरिका ने भी गोमुख की बनावटी बातों को अपने पूर्वजन्म के वृत्तान्त-क्रम से मिलाकर सत्य समझा ॥२ ६॥ और सोचने लगी कि ओह ! मेरे पति का मुझ पर इतना स्नेह है। इस पर मेरा क्रोध व्यर्थ ही था। मुझे इससे विरक्तता भी भ्रम के कारण हुई—ऐसा सोचकर वह स्नेह से पिघल गई और बोली—॥२ ७॥ 'वह हंसिनी मैं ही हूँ। और धन्य हूँ कि मेरे लिए आर्यपुत्र को जो यम तक कष्ट उठाना पड़ा । सो अब मैं प्रेम से खरीदी गई आप लोगों की दासी हूँ। ऐसा कहकर उसने नरवाहनदत्त को स्नान भोजन आदि से सम्मानित किया ॥२ ८२ ९॥ तब अपने दास-दासियों के द्वारा यह बात उसने अपने पिता को कहला दिया और स्वयं भी पिता के पास गई ॥२९ ॥ विवाह की इच्छा प्रकट करती हुई कन्या और उसके योग्य वर नरवाहनदत्त को आया हुआ जानकर तथा उसे विद्याधर चक्रवर्ती के लक्षणों से युक्त जानकर राजा ने अपने को धन्य-धन्य माना ॥२११ २१२॥ और, उसने कन्या कर्पूरिका को बड़े आदर के साथ विधिपूर्वक नरवाहनदत्त को दे दिया ॥२१३॥ राजा कर्पूरक ने जामाता को प्रत्येक अग्नि-प्रदक्षिणा के अवसर पर तीन-तीन करोड़ सोना और उतना ही कपूर प्रदान किया ॥२१४॥ २८
२१८ कथासरित्सागर
२१८ कथासरित्सागर यन्नाशयो बभुस्तत्र शोभां द्रष्टुमिवागताः। गिरिजोद्वाहदृश्या नो मेरु कैलाससानवः ॥२१५॥ पुनस्तद्वस्त्रकोटीश्च दश दासीशतत्रयम्। स्वलङ्कृतं ददौ सोऽस्मै कृती कर्पूरको नृपः ॥२१६॥ ततस्तस्यो कृतोद्वाहः स कर्पूरिकया सह। नरवाहनदत्तोऽत्र समं प्रीत्येव मूर्त्तया ॥२१७॥ कस्य नाभून्मनःप्रीत्यै स वधूवरयोस्तयोः। सङ्गमो माधवीवल्लीवसन्तोत्सवयोरिव ॥२१८॥ एहि व्रजाव कौशाम्बीमित्यन्येद्युश्च सोऽब्रवीत्। नरवाहनदत्तस्तां कृती कर्पूरिकां प्रियाम् ॥२१९॥ ततः प्रत्यब्रवीत् सा तं यद्येषा तरङ्गगामिना। तेनैव त्वद्विमानेन व्रजामस्त्वरितं न किम् ॥२२०॥ तच्चेत् स्वल्पं तदपरं विस्तीर्णं नौक्याम्यहम्। इह प्राणधराख्यो हि तक्षा यन्त्रविमानकृत् ॥२२१॥ आस्ते देशान्तरायातस्तच्छीघ्रं कारयाम्यवः। इत्युक्त्वा सा प्रतीहारमानाय्य क्षत्तुरादिशत् ॥२२२॥ गत्वा तं यन्त्रतक्षाणं ब्रूहि प्राणधरं महत्। व्योमगामि विमानं नः प्रस्थानायोपकल्पय ॥२२३॥ एवं विसृज्य क्षत्तारं राजे कर्पूरिकाथ सा। चेटीमुखेन पित्रे तां प्रस्थानेच्छां न्यवेदयत् ॥२२४॥ स च मुदंवैव तथाबदायास्यन्नैव भूपतिः। नरवाहनदत्तोऽन्तस्तावदेवमचिन्तयत् ॥२२५॥ तक्षा राज्यधरभ्राता सोऽस्य प्राणधरो ध्रुवम्। राजभीत्या स्वदेशाद्यो विद्रुतस्तेन वर्णितः ॥२२६॥ इत्यस्मिंश्चिन्तयत्येव राज्ञि च क्षिप्रमागते। आगात् प्रतीहारयुतस्तक्षा प्राणधरोऽत्र सः ॥२२७॥ व्यजिज्ञपच्च सुमहद् विमानं कृतमस्ति मे। यन्मानुषसहस्राणि वहत्यद्यावहेलया ॥२२८॥ इत्युक्तवन्तं तक्षाणं साध्वित्युक्त्वाभिपूज्य च। नरवाहनदत्तोऽथ तं पप्रच्छ स सादरम् ॥२२९॥
सप्तम लम्बक २१९
सप्तम लम्बक २१९ राजा द्वारा दिये गये सोने आदि दहेज के ढेर, ऐसे मालूम होते थे मानो पार्वती का विवाह देखने के लिए सुमेरु और कैलास शिखर आकर बैठे हों ॥२१५॥ इस पर करोड़ों वस्त्र और आभूषणों से सजी हुई तीन सौ दासियाँ राजा कर्पूरक ने दहेज में दीं। तदनन्तर शरीरधारिणी प्रीति के समान कर्पूरिका से विवाहित नरवाहनदत्त उस नगर में रहने लगा ॥२१६-२१७॥ मालतीलता और वसंत के सुयोग के समान उन दोनों का समागम किसके आनन्द के लिए नहीं हुआ? ॥२१८॥ किसी एक दिन सफलमनोरथ नरवाहनदत्त ने कर्पूरिका से कहा कि 'चलो कौशाम्बी नगरी को चलें। तब वह बोली कि यदि चलना है, तो उसी आकाशगामी यान से क्यों न चलें? ॥२१९-२२ ॥ यदि वह छोटा हो तो उससे मैं दूसरा बड़ा विमान मँगाती हूँ। यहाँ पर (कर्पूरसंभव द्वीप में) प्राणधर नामका शिल्पी (बढ़ई) यन्त्रवाले विमानों का बनानेवाला रहता है ॥२२१॥ वह किसी दूसरे देश से आया है। तो मैं उससे दूसरा विमान बनवाती हूँ। ऐसा कहकर द्वारपाल को बुलाकर उसने प्राणधर को विमान बनवाने की आज्ञा प्रदान की—॥२२२॥ कि जाकर प्राणधर नामक शिल्पी से कहो कि हम लोगों के जाने के लिए आकाश में उड़नेवाला विमान बना दो ॥२२३॥ इस प्रकार सत्था¹ को आज्ञा देकर कर्पूरिका ने दासी के मुंह से अपने जाने की बात राजा के लिए कहलवाई ॥२२४॥ यह समाचार जानकर जैसे ही राजा वहाँ आता है नरवाहनदत्त अपने मन में सोचता है ॥२२५॥ यह प्राणधर नामक शिल्पी वही है, जो राज्यधर का भाई है। जो कांची-नरेश के भय से भागा था ॥२२६॥ ऐसा सोचते ही द्वारपाल से निवेदित राजा वहाँ आया और उसी समय वह प्राणधर शिल्पी भी वहाँ उपस्थित हुआ ॥२२७॥ और बोला— मैंने एक बड़ा वायुयान बनाकर रखा है जो अभी एक हजार व्यक्तियों को सहज ही ले जा सकता है ॥२२८॥ ऐसा कहते हुए शिल्पी प्राणधर का अभिनन्दन करते हुए नरवाहनदत्त ने आदर के साथ उससे पूछा—२२९॥ १ पार्श्ववर्ती सेवक।
२२० कथासरित्सागर
२२० कथासरित्सागर कञ्चिद्राज्यधरस्य त्वं भ्राता प्राणधरोऽग्रजः । नानायन्त्रप्रयोगाणां कर्ता सुमहतामपि ॥२३०॥ स एव तस्य भ्राताऽहं देवो वसितु मां कृतः । इति प्राणधरः सोऽपि प्रणतः प्रत्युवाच तम् ॥२३१॥ ततो यथा राज्यधरेणोक्तं दृष्टो यथा च सः । नरवाहनदत्तस्तत्तथा तस्मै शशंस सः ॥२३२॥ अथ तेन मुदा प्राणधरेण समुपाहुते । महाविमानेऽनुमतः श्वशुरेणाथ भूभुजा ॥२३३॥ तमामन्त्र्य समारोप्य दासीकर्पूरकाञ्चनम् । तेन राज्ञाविसृष्टेन सह प्राणभरेण सः ॥२३४॥ तेन च शत्रुमुख्येन स्वश्वशुरचितमङ्गलः । कर्पूरिकां राजपुत्रीं नवामादाय तां वधूम् ॥२३५॥ दत्तदानो द्विजातिभ्यः सहस्रनिचयैश्च तैः । नरवाहनदत्तोऽसावारुरोह सगोमुखः ॥२३६॥ पूर्वं गच्छेस्तटं तावद्धामो राज्यधरान्तिकम् । ततो गृहमिति प्राणधरं तं निजगाद सः ॥२३७॥ ततस्तनाहृतनाशु विमाने मोत्पपात सः । नभो मनोरथेनेव पूर्णेन सपरिग्रहः ॥२३८॥ क्षणादुत्तीर्य जलधिं पुनस्तत्सीरवर्ति च । प्राप हेमपुरं धाम तस्य राज्यधरस्य यत् ॥२३९॥ तत्र राज्यधरः प्रह्वं प्रहृष्टः भ्रातृदर्शनात् । दासीभिस्तमदासीक संविभेजे च सोत्सवम् ॥२४०॥ आपृच्छ्य च तमुदार्यं कथमप्युज्झिताग्रजम् । ययौ तेनैव कौशाम्बीं विमानेन सर्वैव सः ॥२४१॥ तत्राम्बरादशङ्कितमवतीर्णं वरविमानबृहन् घम् । सानुचरं नववध्वा युक्तं दृष्ट्वा विसिस्मये जनता ॥२४२॥ पौरोत्साहे प्रवृत्तं पुत्रं बुद्ध्वा पितास्य वत्सेशः । प्रीतो निरगादग्रे देवीसचिवस्तनुपादिभिः सहितः ॥२४३॥ दृष्ट्वा विमानवाहनमूचितभवितव्यसचरसाभाग्यम् । स सोऽभिमन्दत सुतं राजा धरण्यानतं वधूसहितम् ॥२४४॥
सप्तम लम्बक २२१
सप्तम लम्बक २२१ 'क्या तुम राज्यधर के बड़े भाई हो जो भिन्न-भिन्न प्रकार के महान् यन्त्रों का जानकार है? ॥२३१॥ 'हाँ मैं वही उसका भाई प्राणधर हूँ। आप हम दोनों को कैसे जानते हैं स्वामी! — प्राणधर ने नम्र होकर यह कहा ॥२३२॥ तब नरवाहनदत्त ने उसे जिस प्रकार देखा था और राज्यधर ने जैसा कहा था वह सब प्राणधर को सुना दिया ॥२३३॥ तदनन्तर, प्राणधर द्वारा लाये गये महाविमान पर अपने श्वशुर राजा कर्पूरक से आज्ञा प्राप्त करके नरवाहनदत्त दहेज में प्राप्त दासियाँ सोना कपूर के ढेर राजा से प्राप्त प्रतीहार¹ और विमानचालक (प्राणधर) के साथ बैठा ॥२३४-२३५॥ उसकी सास ने प्रस्थानिक मंगलाचार किया और नरवाहनदत्त ने नववधू कर्पूरिका का हाथ बिठा दिया। इस प्रकार, अपने मित्र गोमुख के साथ नरवाहनदत्त ने ब्राह्मणों को वस्त्र आदि दान देकर प्रस्थान किया ॥२३५-२३६॥ और, प्राणधर से कहा कि चलो समुद्र के पूर्वतट पर राज्यधर के समीप तक चलें। तब अपने घर की ओर चलेंगे ॥२३७॥ तदनन्तर चालक द्वारा चलाये गये उस विमान से वह अपने साथियों और सामान के साथ आकाश में उड़ा और कुछ ही क्षणों में समुद्र के पार बंधे हुए राज्यधर के हेमपुर नगर में पहुँचा ॥२३८-२३९॥ नरवाहनदत्त ने वहाँ पर नमस्कार करते हुए और भाई को देखने से प्रसन्न तथा दासी-हीन उस राज्यधर का दासियों द्वारा सत्कार किया और आँसू बहाते हुए तथा किसी प्रकार छोटे भाई (राज्यधर) से बिदा लिये हुए प्राणधर के साथ उसी विमान द्वारा नरवाहनदत्त कौशाम्बी पहुँचा ॥२४०-२४१॥ बिना किसी शंका के निर्भय होकर आकाश से उतरते हुए और पत्नी एवं दासियां आदि के साथ आये हुए नरवाहनदत्त को देखकर कौशाम्बी की जनता आश्चर्यचकित हो गई ॥२४२॥ नागरिकों के उत्साह को देखकर और अपने पुत्र को आता हुआ समझकर उसका पिता वत्सराज अपनी महारानियों मन्त्रियों और बहुओं के साथ प्रसन्न होकर उसे लेने के लिये आगे आया ॥२४३॥ विमान पर चढ़ने के कारण विद्याधर-चक्रवर्ती होने की सूचना देते हुए राजा उदयन ने चरणों में झुके वधू-सहित पुत्र नरवाहनदत्त का अभिनन्दन किया ॥२४४॥
१. द्वारपाल
२३२ कथासरित्सागर
२३२ कथासरित्सागर
माता वासवदत्ता पद्मावत्या समं तमाश्लिष्य। विगलितमिव तद्दर्शनदुःखग्रन्थिं जहौ बाष्पम्॥२४५॥ रत्नप्रभा च भार्या सानन्दा मदनमञ्जुका च तया। तस्य प्रेमहतेर्यै धरणी हृदयं च जगृहतुस्तुल्यम्॥२४६॥ यौगन्धरायणादीन् पितृसखियान् स्वांश्च सोऽथ नृपसूनुः। मरुभूतिमुख्यान् प्रगताननन्दयत् कृतयथार्हसत्कारः॥२४७॥ सर्वे च ते विभूषितसुदशार्हकुलेन जलधिमाक्रम्य। समुपाभृतां स्वपतिना व्यक्तं सोदर्यसूर्त्तिममृतस्य॥२४८॥ अजराजनाशतयुतामायातीं श्रियमिवाभ्यनन्दंस्ताम्। कर्पूरिकां नववधू वत्सेशाद्या यथोचितावनताम्॥२४९॥ तस्याश्च पैतृकं तं वत्सेश्वरोऽपूजयत् प्रतीहारम्। अर्पितविमानवाहितकाञ्चनकर्पूरवस्त्रकोटिद्वयम् ॥२५०॥ आख्यातं नरवाहनदत्तेन ततो विमानकर्त्तारम्। उपकारिणं स राजा प्राणधरं तमपि मानयामास॥२५१॥ कथमेषा राजसुता सम्प्राप्ता कथमितश्च यातौ स्वः। इति पप्रच्छ सहर्ष संम्नाय स गोमुखं नृपतिः॥२५२॥ अथ मृगयावनगमनात् प्रभृति यथा दर्शनं तपस्विन्याः। राज्यधरसमासादितविमानयुक्त्या यथा च तीर्णोऽब्धिः॥२५३॥ कर्पूरिका विवाहे विमुखापि च सम्मुखी यथा विहिता। प्राणधरसामलब्धेनागमनं भ्राम्यया विमानेन॥२५४॥ युक्त्यैकान्ते स तथा तदशेषं गोमुखो यथावृत्तम्। कथयाञ्चकार तस्मै सदारसचिवाय वत्सराजाय॥२५५॥ क्वासौट क्व च तापसी क्व च तमोदन्वत्तटे यन्त्रवि- च्छक्षा राज्यधरस्मदीयवहननोल्लङ्घनं क्वाम्बुधेः। तत्पारे च विमानकर्तुरपरस्यास्य क्व पूर्वं गति- र्भव्यानां शुभसिद्धयुपायरचनाचिन्तां विधत्ते विधिः॥२५६॥ इति तैरखिलैः सविस्मयप्रमदाकम्पितमस्तकैस्ततः। जगदे विन्ष्टे च गोमुख प्रभुभक्तिस्तुतिरत्न सादरेः॥२५७॥ रत्नप्रभा च राज्ञीं पतिव्रताधर्मजनितपरितोषाम्। प्रशशंसुस्ते भर्तुर्निजविद्याविहितपररक्षाम्॥२५८॥
सप्तम लम्बक २२१
सप्तम लम्बक २२१ पद्मावती के साथ उसकी माता वासवदत्ता ने पुत्र को लिपटाकर आँसू बहाये। चिरकाल से उसे न देखने के कारण हृदय में बनी हुई दुख की गाँठ मानों बह निकली ॥२४५॥ आनन्द से भरी हुई उसकी दोनों पत्नियों—मदनमञ्जुका और रत्नप्रभा—ने उसके प्रेम से ईर्ष्या को छोड़कर उसके चरणों और हृदयों को साथ ही ग्रहण किया ॥२४६॥ तदनन्तर यौगन्धरायण आदि पिता के मन्त्रियों तथा मरुभूति आदि अपने मन्त्रियों को नरवाहनदत्त ने यथायोग्य प्रणाम नमस्कार आदि से सत्कार-सम्मान किया ॥२४७॥ अपने उच्च कुल को अपनी परिस्थिति से अलंकृत करनेवाले पति के साथ समुद्र को पार करके आई हुई अमृत की सहोदरा भगिनी के समान और सैकड़ों युवती स्त्रियों से लक्ष्मी के समान घिरी हुई और नम्र भाव से स्थित उस नववधू कर्पूरिका का वत्सराज आदि ने समुचित अभिनन्दन आदि किया। और, वत्सराज ने उसके साथ आये हुए उसके पिता के प्रतीहार को पुरस्कार आदि से सम्मानित किया। उस प्रतीहार ने भी विमान पर लदे हुए सोना वस्त्र कर्पूर आदि दहेज की सामग्री सम्बन्धी उदयन को समर्पित की ॥२४८-२४९॥ उदयन ने नरवाहनदत्त द्वारा परिचित कराये गये विमान-निर्माता शिल्पी प्राणधर का भी समुचित सत्कार किया ॥२५०॥ तदनन्तर राजा उदयन ने गोमुख का अभिनन्दन करके पूछा कि यह राजकुमारी कैसे प्राप्त हुई और तुम लोग यहाँ से वहाँ कैसे पहुँचे? ॥२५२॥ तदनन्तर गोमुख ने महारानियों और मन्त्रियों के साथ बैठे हुए महाराज उदयन को शिकारवाले वन से भटक जाने और तपस्विनी का दर्शन होने से लेकर राज्यधर के विमान द्वारा द्वीप में पहुँचन विवाह से विमुख कर्पूरिका को अपनी ओर लाने तथा प्राणधर द्वारा निर्मित विमान से पुनः लौट आने आदि का सारा वृत्तान्त सबको क्रमशः सुना दिया ॥२५३-२५५॥ कहाँ शिकार ! कहाँ वह बूढ़ी तपस्विनी ! कहाँ समुद्र के किनारे वह शिल्पी कारीगर राज्यधर ! कहाँ समुद्र पार करना ! समुद्र के पार भी दूसरे विमान-निर्माता का मिलना और फिर उसका पहले स्थान पर आना—यह सब असम्भव और अघटित घटनाएँ हैं। यह सत्य है कि भाग्यवान् व्यक्ति के कल्याण-कार्यों को सफल करने के उपाय दैव स्वयं ही घटित कर देता है ॥२५६॥ इस प्रकार, इस घटना को सुनकर अत्यन्त आनन्द से सिर हिलाते हुए उन सभी ने गोमुख की स्वामी-भक्ति की अत्यन्त प्रशंसा की ॥२५७॥ अपनी विद्या के प्रभाव से अपने पति की नाव में रक्षा करनेवाली पतिपरायणा रत्नप्रभा की भी सबने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥२५८॥