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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

३१४ कथासरित्सागर

३१४ कथासरित्सागर व्यतिक्रम्य क्षमम्भवद्भिर्माविनयात् प्रसादयन्द्र मयम्। दृष्टं विनयफलं हि त्वयाद्य यदनेन सद्वरा प्राप्ता ॥४११॥ तच्छ्रुत्वा मयमिन्द्रः पाणावालम्ब्य तोषयामास। सूर्यप्रभाभिभूतः श्रुतधर्मा चामवहदिनेन्दुनिमः' ॥४१२॥ प्रणम्य तमथ क्षमात् सुरपतिर्गुरुं कश्यपं जगाम स यथागतं निखिललोकपालान्वितः। मयप्रभृतयोऽपि ते मुनिवरस्य तस्याज्ञया ततः खलु तवाश्रमात् प्रकृतकार्यसिद्ध्यै ययुः ॥४१३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके द्वितीयस्तरङ्गः तृतीयस्तरङ्गः सूर्यप्रभस्योद्योगः ततो मयसुनीथौ तौ गत्वा सूर्यप्रभश्च सः। कश्यपस्याश्रमात्तस्मात् सम्प्रापुः सर्व एव ते ॥१॥ सङ्गमं चन्द्रभागाया ऐरावत्याश्च यत्र ते। स्थिताः सूर्यप्रभस्यार्थे राजानो मित्रबान्धवाः ॥२॥ प्राप्तं सूर्यप्रभं ते च दृष्ट्वा तत्र स्थिता नृपाः। हृदन्तोऽग्रे समुत्तस्थुर्विषण्णा मरणोन्मुखाः ॥३॥ चन्द्रप्रभादर्शनजां तेषामाद्येक्ष्य दुःखिताम्। सूर्यप्रभोऽब्रवीत् तेभ्यो यथावृत्तं शशंस सन् ॥४॥ तथापि विमनाः पृष्टास्ते तेन कृच्छ्रादवर्णयन्। तस्य भार्यापहरणं विहितं श्रुतधर्मणा ॥५॥ तत्परामवदुःखार्त्तन देहत्यागोद्यमं निजम्। धारितं दिव्यया वाचा तथैवास्मै न्यवेदयत् ॥६॥ ततः सूर्यप्रभस्तत्र प्रतिज्ञामकरोन् नृपः। यदि ब्रह्मादयः सर्वेऽप्यभिरक्षन्ति तं सुराः ॥७॥ १ दिवाते यथा चन्द्रबिम्बं मलिनं भवति, तथा।

अष्टम लम्बक २१५

अष्टम लम्बक २१५ तब इन्द्र की माता अदिति ने कहा—'हे इन्द्र घमंडता छोड़ो मय को प्रसन्न करो। नम्रता के फल को तुमने देखा कि आज मय ने कितने ही अच्छे वर प्राप्त किये' ॥४११॥ यह सुनकर इन्द्र ने मय को हाथों से पकड़कर प्रसन्न किया। उस समय युद्धधर्मा सूर्यप्रभ के आगे दिन में निकले हुए चन्द्रमा के समान निष्प्रभ लग रहा था ॥ ४१२॥ तदनन्तर, लोकपालों के साथ देवराज इन्द्र ने ऋषि को प्रणाम करके अपने लोक को प्रस्थान किया और मय आदि भी मुनि की आज्ञा से प्रस्तुत कार्य को सफल बनाने के लिए उसके आश्रम से अपने निवासस्थान को चले गये ॥४१३॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ नामक लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त तृतीय तरंग सूर्यप्रभ का उद्योग तदनन्तर मय सुनीथ और सूर्यप्रभ ये सभी उस कश्यप-आश्रम से चलकर चन्द्रभागा और इरावती के संगम पर पहुँचे जहाँ सूर्यप्रभ की प्रतीक्षा में उसके मित्र बन्धु, ससुर आदि सभी ठहरे हुए थे ॥१ २॥ सूर्यप्रभ को देखकर वहाँ ठहरे हुए सभी राजा और मित्र बन्धु मरने को तैयार होकर रोते हुए उसके सामने आये ॥३॥ चन्द्रप्रभ को न देखने से उसके प्रति बुरी आशंका से दुःखित उन सब को सूर्यप्रभ ने जो कुछ समाचार था सब कह सुनाया ॥४॥ इस पर भी अत्यन्त व्याकुल हुए सूर्यप्रभ के उनसे पूछने पर उन्होंने श्रुतशर्मा द्वारा उनकी समस्त मर्यादा का अपहरण-वृत्तान्त अत्यन्त कठिनाई से कह सुनाया ॥५॥ श्रुतशर्मा द्वारा किये गये अपमान से दुःखी होकर अपने मरने का निश्चय और आकाशवाणी द्वारा उसका रोका जाना सब उन्होंने कह सुनाया ॥६॥ यह सब समाचार सुनकर सूर्यप्रभ ने क्रोध में यह प्रतिज्ञा की कि यदि ब्रह्मा आदि सभी देवता भी श्रुतशर्मा की रक्षा कर तो भी उन का समूल नाश करूँगा ॥७८॥

१५ कथासरित्सागरं

१५ कथासरित्सागरं तथाप्युन्मूलनीयो मे श्रुतशर्मा स निश्चितम्। परदारापहरणे छद्मप्रागल्भ्यवाञ्छठः ॥८॥ एव कृतप्रतिज्ञश्च गन्तु तद्विजयाय सः। लग्नं निश्चितवान् दृष्ट गणकैः सप्तमेऽहनि ॥९॥ ततस्तं निश्चितं ज्ञात्वा गृहीतविजयोगमम्। द्रढयित्वा पुनर्भूषा प्राह सूर्यप्रभं मयः ॥१०॥ सत्यं कृतोद्यमस्त्वं चेत्तद्वदामि मया तदा। मायां प्रदर्श्य नीत्वा ते पातालं स्थापिताः प्रियाः ॥११॥ एवं त्वं विजयोद्योगं करोषि रभसादिति। नैवमेव तथा ह्यग्निर्ज्वलेद्वातेरितो यथा ॥१२॥ तदेहि यामः पातालं प्रियास्ते दर्शयामि ताः। एवं मयवचः श्रुत्वा ननन्दुः सर्व एव ते ॥१३॥ प्राक्तनं च तेनैव प्रविश्य विवरेण ते। जग्मुश्चतुर्थं पाताल मयासुरपुरःसराः ॥१४॥ तत्रैकस्तो वासगृहान्मयः सूर्यप्रभाय ताः। भार्या मदनसेनाद्या आत्मीयासी समर्पयत् ॥१५॥ गृहीत्वा तास्तमान्याश्च पत्नीस्ताः सोऽसुरात्मजाः। ययौ सूर्यप्रभो द्रष्टुं प्रह्लादं मयवाक्यतः ॥१६॥ मयाच्छ्रुतवरप्राप्तिः प्रणतं तं च सोऽसुरः। ज्ञातायुधोऽथ जिज्ञासुः कृतवक्रोऽधमभ्यधात् ॥१७॥ धृतं मया दुराचार मत्कन्या ह्यददा त्वया। भ्रान्ताजिता मज्ज्येष्ठतास्तत्त्वां हन्म्यद्य पश्य माम् ॥१८॥ तच्छ्रुत्वा निर्विकारस्तं पश्यन् सूर्यप्रभोऽब्रवीत्। मच्छरीरं त्वदायत्तमविनीतं प्रणाधि माम् ॥१९॥ इत्युक्तवन्तं प्रह्लादो विहस्य तमुवाच सः। प्रक्षितोऽसि मया मापदर्पल्पोऽपि नास्ति ते ॥२० ॥ वरं गृहाण तुष्टोऽस्मीत्युक्तस्तेन तथेति सः। भक्तिं गुरुषु धर्मे च वव्रे सूर्यप्रभो वरम् ॥२१॥ ततस्तुष्टेषु सर्वेषु तस्मै सूर्यप्रभाय सः। प्रह्लादो यामिनीं नाम द्वितीयां तनयां ददौ ॥२२॥

अष्टम लम्बकं ३१७

अष्टम लम्बकं ३१७ यह मेरा दृढ़ निश्चय है। दूसरों की स्त्रियों का अपहरण करने में वीरता दिखानेवाला वह महान् दुष्ट है॥८८॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके उन पर विजय प्राप्त करने को जाने के निमित्त उसने ज्योतिषियों से आठवें दिन लग्न (मुहूर्त्त) निश्चित किया ॥८९॥ सब विग्रह के लिए उद्योग करते हुए सूर्यप्रभ का दृढ़ निश्चय देखकर उस भावी वाणी से और भी दृढ़ करके मय ने सूर्यप्रभ से कहा—॥९०॥ यदि तुम सचमुच युद्ध के लिए प्रयत्नशील हो तो मैं कहता हूँ कि मैंने ही अपनी माया दिखाकर तुम्हारी स्त्रियों को पाताल में रख लिया है ॥९१॥ ऐसा करने से ही तुम जोश के साथ विग्रह का उद्योग करोगे इसीलिए मैंने ऐसा किया था। आग वैसे उतना ही प्रचंड रूप धारण नहीं करती जैसी वायु से प्रेरित होकर पसरती है ॥९२॥ मय की ऐसी बातें सुनकर सभी लोग आनन्द से प्रसन्न हुए। तब मय ने कहा—तुम पाताल में आओ। मैं तुम्हारी पत्नियों को दिखाता हूँ। तदनन्तर मयासुर के साथ वे उसी पुराने मार्ग से चौथे पाताल में गए ॥९३-९४॥ वहाँ आकर एक मकान से मय ने उसकी मदनसेना आदि सभी स्त्रियों को लाकर उसे सौंप दिया ॥९५॥ उन सब पत्नियों तथा असुर-कन्याओं को साथ लेकर मय से प्रेरित सूर्यप्रभ आदि प्रह्लाद का दर्शन करने गये ॥९६॥ मय से कश्यप द्वारा वर प्राप्ति का समाचार सुनकर असुरनाथ प्रह्लाद ने शस्त्र उठाकर सूर्यप्रभ की परीक्षा के लिए बनावटी क्रोध करते हुए कहा—॥९७॥ 'अरे पापी मैने सुना है कि तूने मेरे भाई द्वारा मारण करके लाई गई उन बारह कन्याओं का अपहरण कर लिया है इसलिए मैं तेरा वध करता हूँ' ॥९८॥ यह सुनकर बिना किसी प्रकार का विकार किये सूर्यप्रभ ने कहा—मेरा शरीर आपके अधीन है। अतः आप मुझ उद्दण्ड पर शासन कीजिए ॥९९॥ ऐसा कहते हुए सूर्यप्रभ से प्रह्लाद ने हँसकर कहा—मैंने तेरी परीक्षा ली है, तुझमें घमण्ड का लेश भी नहीं है। वर माँग, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ। तब सर्वज्ञता व गुरुजनों और शिव में भक्ति बनी रहे यह वर माँगा ॥१००-१०१॥ तब सबके सन्तुष्ट हो जाने पर प्रसन्न प्रह्लाद ने कान्तिमती नाम की दूसरी कन्या भी सूर्यप्रभ को दे दी ॥१०२॥

कथापीठम्

कथापीठम् नृपायै च ददौ तौ द्वौ मायामयंवरौवरम् तमस्मै तन्नियोगाच्च ददौ सोऽपि महीभुजे ॥२७॥ नृपस्तु दृष्ट्वाऽऽनन्देन तयोस्तं रूपसंभवम् तौ देशौशः सम्यक् नरवाहन के सुतौ ॥२८॥ नृपः संमानयामास सानुरूपैर्धनादिभिः । पितुः समीपं तो चापि प्रेषयामास सैनिकैः ॥२९॥ तैस्तत् सूर्यप्रभस्येव व्यकम्पिष्ट महत्पुरम् महीकम्पेनेव ह्यभूत् व्यकम्पिष्टेव मेदिनी ॥३०॥ दृष्ट्वाऽथ सहसा दूता दूतदूतेन कर्म मन्त्रयन्तः स नन्दनं व्याजहार ॥३१॥ इतस्तु सिद्धैः सार्धं सन्तु ते शूरा नृपाः कृतं खल्वैन्द्रिनेत्रेणेत्यभिति योजयेत् ॥३२॥ एवमुक्त्वा बहुदिनान्यन्ये ते मन्त्रयित्वा स्वदेशेषु निवृत्य सर्वं स्थानमन्वयम् । तस्यान्यान् विहाय या देवी दक्षिणाम्भसि । स नृत्यन्कुर्वंश्च यथावत्त्वेन वर्द्धितः ॥३०॥ ददर्शायतनं पूर्णगन्धं स्रवन्तं विभुम् । अविदितं ... मण्डलमण्डितम् ॥३१॥ सर्वे चिरन्तनम् दुष्टदण्डे निकृन्तनम् । यदुन्मदिरे दुर्गन्धलावतापाननम् ॥३२॥ तत्र तन् ... स मुमुदेऽपूजयत् । मदोन्मादावेशपरा दूतात्तो गम्भीरीं स्मरन् ॥३३॥ सदेशस्थाश्च ते स्वं स्वं सैन्यं सूर्यप्रभादिकाः । कात्स्र्न्येनानाययत्सुहृत्कूर्दश्च सुहृदस्तथा ॥३४॥ माययुः प्रथमं सूर्यप्रभस्य श्वशुरात्मजाः । राजपुत्रा महावीरा विद्या संसाध्य सोद्यमाः ॥३५॥ तेषां हरिभटाख्यानां चेष्टितां रथाग्रणीम् द्वे चायुते पदातीनाम् अनुगं बलम् । तदनु स्थितसङ्केता ... । श्वशुर्या र... बान्धवाः

अष्टम लम्बक १९९

[Header] अष्टम लम्बक १९९

और, युद्ध में उसकी सहायता के लिए अपने दो पुत्र भी प्रदान किये। तदनन्तर, सूर्यप्रभ सबके साथ अनीक के पास गया ॥२३॥ उसने भी वर प्राप्ति का समाचार जानकर प्रसन्न होकर अपनी दूसरी कन्या सुखावती का विवाह भी सूर्यप्रभ से कर दिया और युद्ध में सहायता के लिए उसने भी अपने दो पुत्र सूर्यप्रभ को दिये ॥२४॥ तदनन्तर, अन्यान्य असुर-सरदारों की सहायता के लिए सम्मान प्रकट करता हुआ सूर्यप्रभ पत्नियों के साथ वहाँ (पाताल में) कुछ दिन रह गया ॥२५॥ तब मय आदि के साथ सूर्यप्रभ ने सुना कि सुनीथ की तीनों स्त्रियाँ और उसकी सभी स्त्रियाँ गर्भवती हो गई हैं ॥२६॥ दोहद के लिए पूछने पर सबने एक ही इच्छा प्रकट की कि हम लोग महायुद्ध देखना चाहती हैं। यह सुनकर मयासुर प्रसन्न हुआ ॥२७॥ और, बोला कि जो असुर पहले देव-दानव-युद्ध में मारे गये थे वे सब अब इनके गर्भ में आ गये हैं ॥२८॥ इस प्रकार छह दिन व्यतीत हो गये और सातवें दिन मय सूर्यप्रभ आदि स्त्रियों के साथ रसातल से बाहर निकलकर गुफा के द्वार पर आये ॥२९॥ उनके आते ही विद्याधरों ने उनकी तैयारी में विघ्न करने के लिए जो मायामय उत्पात दिखलाये थे उन्हें स्मरण-मात्र से वहाँ आये हुए सुखानुकूलार ने नष्ट कर दिया ॥३०॥ तदनन्तर, राजा चन्द्रप्रभ के दूसरे पुत्र रत्नप्रभ को पृथ्वी के राज्य पर प्रतिष्ठित कर मय सूर्यप्रभ आदि भूतासन नामक विमान पर बैठकर सभी विद्याधरों के राजा सुमेरु के घर पर गये। वहाँ से मय के कथनानुसार वे पहले वंगारक के तपोवन में गये ॥३१-३२॥ वहाँ तपोवन में मित्र भाव से आये हुए उनका सुमेरु ने हार्दिक स्वागत-सम्मान किया। मय ने उसे पहले का सभी वृत्तान्त सुना दिया था और उसने भी पहले से प्राप्त शिवजी की आज्ञा का स्मरण किया ॥३३॥ उसी स्थान पर रहते हुए सूर्यप्रभ ने अपने मित्रों बन्धुओं और सेनाओं को कठिनाई से एकत्र किया ॥३४॥ वहाँ सबसे पहले विघ्नों को सिद्ध करके मय द्वारा प्रेरित होकर सेना-सहित सूर्यप्रभ के साने आये ॥३५॥ : वे हरिमट आदि सोलह थे जिनम एक-एक के साथ दस-दस हजार रथ और बीस-बीस : हजार पैदल सिपाही थे ॥३६॥ : उनके बाद पूर्व निश्चयानुसार भूप्रभ के श्वशुर, साले तथा अन्यान्य सम्बन्धी दैत्य-दानव : आये ॥३७॥

३२ कथासरित्सागर

३२ कथासरित्सागर

हृष्टरोमा महामायः सिंहदंष्ट्रः प्रकम्पनः। तन्तुकच्छो दुरारोहः सुमायो वज्रपञ्जरः ॥३८॥ धूमकेतुः प्रमथनो विकटाक्षश्च दानवः। बहवोऽन्येऽपि चाजग्मुरासप्तमरसातलात् ॥३९॥ कश्चिद्रथानामयुतैः सप्तभिः कश्चिदष्टभिः। कश्चित्यडभिरिस्त्रिभिः कश्चिद्योधैस्त्वल्पोऽप्युसेमः१॥४०॥ पदातीनां त्रिभिर्लक्षैः कश्चित्सप्तदशेन च। कश्चित्कश्चित्तु लक्षेण सकार्धेनाघमस्तु यः॥४१॥ एकैकस्य च हस्त्यश्वमागात्तदनुसारतः। असंख्यमायौ चान्यत् सैन्यं मयसुनीथयोः॥४२॥ सूर्यप्रभस्य चामेयमाजगाम निजं बलम्। वसुदत्तादिभूपानां सुमेरोश्च तथैव च॥४३॥ ततो मयासुरोऽपृच्छच्चिन्तितोपस्थितं मुनिम्। तं सुवासकुमाराख्यं सह सूर्यप्रभादिभिः ॥४४॥ विक्षिप्तमेतद् भगवन् सैन्यं मेहोपलक्ष्यते। तद् ब्रूहि कुत्र विस्तीर्णे युगपद्दृश्यतामिति ॥४५॥ इतो योजनमात्रोऽस्ति कलापग्रामसंज्ञकः। प्रदेशस्तत्र विस्तीर्णे गत्वैतत्प्रविलोक्त्य ताम् ॥४६॥ इत्युक्ते तेन मुनिना सद्युक्ताः ससुमेरुकाः। ययुः कलापग्रामं तं सर्वे ते स्वबलैः सह ॥४७॥ तत्रोभयस्थानगता बभूवुस्ते पृथक् पृथक्। संनिवेश्यासुरोणां च नृपाणां च वरूथिनी ॥४८॥ ततः सुमेरुराह स्म श्रुतधर्मा बलाधिकः। सन्ति विद्याधराधीशास्तस्य ह्येकोत्तरं शतम् ॥४९॥ तेषां च पृथगेकैको राजां द्वात्रिंशत पतिः। ततस्तु भित्त्वा कांश्चित्तान्योजयिष्याम्यहं तव ॥५०॥ तन्मात्ररेतद्गच्छामः स्थानं वल्मीकसंज्ञितम्। फाल्गुनस्यासिता प्रातरष्टमी हि महाविधिः ॥५१॥


१ इतस्ततः प्रसृतम्।

षष्ठम लम्बक ३२१

षष्ठम लम्बक ३२१ उनके नाम थे—दुष्टरोमा, महामाय, छिद्रदंष्ट्र, प्रकम्पन, तनुक्रुद्ध, दुरारोह, सुमाय, वज्रपंजर, धूमकेतु, प्रमथन, विकटाक्ष आदि। इनके अतिरिक्त सातवें पाताल-पर्यन्त से अनेक दानव और असुर आये ॥३८-३९॥ किसी के साथ दस हजार, किसी के साथ आठ हजार और किसी के साथ सात हजार रथ थे और कोई अपने साथ छह लाख, कोई तीन लाख और कोई कम-से-कम दस हजार पैदल सिपाहियों को लेकर वहाँ आया। इसी के अनुसार एक-एक के साथ हाथी और घोड़े भी असंख्य थे। मय और सुनीथ की असंख्य सेना भी इसी प्रकार उसमें सम्मिलित हो गई ॥४०-४२॥ इसके अतिरिक्त सूर्यप्रभ की असंख्य सेना इसी प्रकार ऋतुदत्त आदि की सेनाएं तथा सुमेरु विद्याधरराज की विद्याधर-सेनाएं भी वहाँ एकत्र हुईं ॥४३॥ तब मयासुर ने ध्यान करते ही उपस्थित सुबाहुकुमार से सूर्यप्रभ आदि के साथ कहा—॥४४॥ 'भगवन्, यह इधर-उधर बिखरी हुई सेना एक साथ नहीं दीख रही है। अतः, यह बताइए कि फैली हुई सेना को एक साथ कहाँ से देखें ॥४५॥ मुनि ने कहा—'यहाँ से एक योजन (चार कोश) पर कलापग्राम नामक विस्तृत भू-भाग है। यहाँ जाकर इसका विस्तार देखो' ॥४६॥ सुबाहुकुमार मुनि के ऐसा कहने पर सुमेरु के साथ वे सभी अपनी-अपनी सेनाओं को लेकर कलाप ग्राम में गये ॥४७॥ वहाँ ऊँचे स्थान पर जाकर असुरों और राजाओं की सेनाओं को वे अलग-अलग देख सके ॥४८॥ तब सुमेरु ने कहा—'श्रुतधर्मा अब भी हमसे सेना की दृष्टि से अधिक है। उसके अधीन एक सौ अधिक सौ (एक सौ एक) विद्याधरों के राजा हैं ॥४९॥ उनमें से एक-एक बत्तीस-बत्तीस सरदारों का स्वामी है, किन्तु मैं उनमें से कुछ को फोड़कर अपनी ओर मिला लूँगा ॥५०॥ इसलिए, प्रातःकाल ही वल्मीक नामक स्थान पर जायेंगे; क्योंकि कल प्रातःकाल फाल्गुन मास की कृष्णाष्टमी नामक महातिथि है ॥५१॥ ४१

१२२ कथासरित्सागरः

१२२ कथासरित्सागरः तस्यां चोत्पद्यते रत्नं शुक्लपक्षे चक्रमन्तिमम् । तूर्णं विद्याधरा यान्ति तत्कृते चात्र तां तिथिम् ॥५२॥ एव सुमेरुणा प्रोक्ते सैय्यंविधिना दिनम् । नीत्वा प्रातर्ययुस्तत्ते वल्मीकं सबला रथे ॥५३॥ तत्र ते दक्षिणे सानौ हिमाद्रेर्निनदद्बलाः । निविष्टा ददृशुः प्राप्तान् बहून् विद्याधराधिपान् ॥५४॥ ते च विद्याधरास्तत्र कुण्डेष्वादीपितामलाः । होमप्रवृत्ता अभवञ्जपव्यग्राश्च केचन ॥५५॥ यतः सूर्यप्रभोऽप्यत्र वह्निकुण्डं महद्व्यधात् । स्वयं जज्वाल तत्राग्निस्तस्य विद्याप्रभावतः ॥५६॥ तद्दृष्ट्वा तुष्टिरूपेदे सुमेरोर्मत्सरं पुनः । विद्याधराजादुद्भूतवैकस्तमभाषत ॥५७॥ विद्याधरेन्द्रतां त्यक्त्वा धिक्सुमेरोऽनुवर्तसे । सूर्यप्रभाभिधमिमं कथं धरणिगोचरम्¹ ॥५८॥ तच्छ्रुत्वा स सुमेरुस्तं सकोपं निरभर्त्सयत् । सूर्यप्रभं च तन्नाम पृच्छन्तमिवमब्रवीत् ॥५९॥ अस्ति विद्याधरो भीमनामा यस्य च गेहिनीम् । ब्रह्माकामयत स्वैरं तत एषोऽभ्यजायत ॥६०॥ गुप्तं यद्ब्रह्मणो जातो ब्रह्मगुप्तस्तदुच्यते । अत एवैतवेतस्य स्वजन्मसदृशं वचः ॥६१॥ इत्युक्त्वाकारि तेनापि वह्निकुण्डं सुमेरुणा । सत्त सूर्यप्रमस्तेन सहाहौषीत्तदाशनम् ॥६२॥ क्षणाच्च भूमिविवरादुज्जगामातिभीषणः । ²कस्मादजगरो महान् ॥६३॥ तं प्रहीतुमधावत्स विद्याधरपतिर्मदात् । ब्रह्मगुप्ताभिधानोऽथ सुमेरुर्मैनं गहित³ ॥६४॥ स तेनाजगरेणाशु मुखफूत्कारवायुना । नीत्वा हस्तशते क्षिप्तो न्यपतज्जीर्णपर्णवत् ॥६५॥ १ मर्त्यं मानुषमित्यर्थः । २ तत्क्रूरत्वात् क्रूरं वदति । ३ मूलपुस्तके पादार्थं मुद्रितमस्ति ।

अष्टम लम्बक १२३

अष्टम लम्बक १२३ इस तिथि में विद्याधर-चक्रवर्ती के लक्षण प्रकट होते हैं। इसलिए, सभी विद्याधर इस तिथि को यहाँ आते हैं ॥५२॥ सुमेरु के इस प्रकार कहने पर वे सब उस दिन सेना का प्रबन्ध करके प्रातःकाल ही सेनाओं के साथ रथों द्वारा वल्मीक ग्राम को गये ॥५३॥ हिमाचल के रजत शशिन शिखर पर सेनाओं के कोलाहल के साथ उन लोगों ने बहुत-से विद्याधरों को देखा ॥५४॥ वे विद्याधर यहाँ कुंडों में अग्नि जलाकर हवन करने में लग गये और बहुत-से विद्याधर जप करने लगे ॥५५॥ तब सूर्यप्रभ ने भी वहाँ एक विशाल अग्निकुंड बनवाया। उसमें उसकी विद्या के प्रभाव से स्वयं ही अग्नि जल उठी ॥५६॥ यह सुनकर सुमेरु को अत्यन्त सन्तोष हुआ और विद्याधर ईर्ष्या से जल उठे। तदनन्तर, उनमें से एक ने कहा— हे सुमेरु, तुम्हें धिक्कार है कि तुम विद्याधरों का राजत्व छोड़कर सूर्यप्रभ मनुष्य का अनुचरण कर रहे हो ॥५७-५८॥ यह सुनकर क्रुद्ध सुमेरु ने उसे खूब फटकारा और सूर्यप्रभ द्वारा उसका नाम पूछे जाने पर सुमेरु ने कहा— भीम नाम का एक विद्याधर है, उसकी पत्नी की ब्रह्मा ने कामना की थी उसी से यह उत्पन्न हुआ है। चूंकि ब्रह्मा के साथ गुप्त रूप से व्यभिचार करने पर यह उत्पन्न हुआ है इसी से इसका नाम ब्रह्मगुप्त है। इसलिए, अपने जन्म के समान ही वचन यह बोल रहा है ॥५९-६१॥ ऐसा कहकर सुमेरु ने भी अग्निकुंड बनवाया तब सूर्यप्रभ ने उसके साथ ही अग्नि में हवन किया ॥६२॥ क्षण-भर में ही पृथ्वी के एक छिद्र से एक भीषण और विशाल अजगर निकला उसे देखकर वह ब्रह्मगुप्त नामक विद्याधरों का राजा घमंड के साथ उसे पकड़ने के लिए दौड़ा जिसने सुमेरु की निन्दा की थी ॥६३-६४॥ उसे अजगर ने अपनी एक फुफकार से ही सूखे पत्ते की तरह सौ हाथ दूर फेंक दिया ॥६५॥

कथासरित्सागर

[Page 324] कथासरित्सागर

ततस्तेजःप्रभो नाम तं जिघृक्षुरुपागमत् । सर्पं विद्याधराधीशः सोऽन्यक्षेपि तथाऽमुना ॥६६॥ ततस्तं दुष्टदमनो नाम विद्याधरेश्वरः । उपागात्सोऽपि निःश्वासेनाप्यबलेन विक्षिपे ॥६७॥ ततो विरूपघण्टाख्यः खेचरेन्द्रस्तमभ्यगात् । सोऽपि तेन तथैवास्तः१ श्वासेन सुगहेरया ॥६८॥ अयाम्यधावतां तद्वद्वङ्कारबिज्ज्मकौ । राजानौ युगपत्कौ च दूरे श्वासेन सोऽक्षिपत् ॥६९॥ एवं विद्याधरधीशाः षण्मात्सर्यैऽपि तेन ते। क्षिप्ताः कथम्चिदुत्तस्थुरर्जरामारूषूजिते २॥७०॥ ततो दर्पेण तं सर्पं श्रुतशर्माभ्युपेयिवान् । जिधृक्षुः सोऽपि तेनात्र विक्षिपे श्वासमारुतैः ॥७१॥ मदूरपतितः सोऽथ पुनरुत्थाय धावितः । तेन दूरतरं नीत्वा श्वासेनाक्षेपि भूतले ॥७२॥ विरूक्षे चूर्णिताङ्गेऽस्मिन्नुत्थिते श्रुतशर्मणि । सूर्यप्रभोऽह्वयैद्ग्रहणे प्रेषितोऽभूत्सुमेरुणा ॥७३॥ पश्यतैषोऽप्यजगरं ग्रहीतुमिममुत्थितः । अहो इमे निर्विचारा मर्कटा इव मानुषाः ॥७४॥ अन्येन क्रियमाणं यत्पश्यन्त्यनुहरन्ति तत् । इति विद्याधराः सूर्यप्रभं ते जहसुस्तदा ॥७५॥ तेषां प्रहसतामेव गत्वा सूर्यप्रभेण सः । स्तिमितास्यो गृहीतश्च दृष्टश्चाजगरो द्विधात् ॥७६॥ तत्क्षणं प्रतिपेदे स भुजङ्गस्तूणरत्नताम् । मूर्ध्नि सूर्यप्रभस्यापि पुष्पवृष्टिर्दिवोऽपतत् ॥७७॥ सूर्यप्रभाद्ययं तूणरत्नं सिद्धमिदं तव । तद्गृहाणतदित्युच्चैर्दिव्या वागुदभूत्तदा ॥७८॥ ततो विद्याधरा ग्लानिं ययुः सूर्यप्रभोऽग्रहीत् । तूणं मयसुनीथौ च सुमेरुश्चाभजन्मुदम् ॥७९॥


१ विक्षिप्तः; अशु रूपने बत्तुः । २ प्रस्तराघातेन भग्नेः ।

अष्टम लम्बक ३२५

अष्टम लम्बक ३२५ तेजप्रभ नामक विद्याधरों का राजा उसे पकड़ने के लिए उठा, उसे भी अजगर ने फूंक से दूर फेंक दिया ॥६६॥ तब दुष्टदमन नामक विद्याधर उसे पकड़ने गया, उसे भी अजगर ने दूसरों के समान ही दूर फेंक दिया ॥६७॥ तदनन्तर, विक्रयरुचि नामक विद्याधरराज उसकी ओर गया और उसे भी उसने तिनके के समान दूर फेंक दिया ॥६८॥ इस प्रकार, वहाँ उपस्थित सभी विद्याधरों के राजाओं के उसे पकड़ने का प्रयत्न करने पर उसने सभी को श्वास के झोंकों से ऐसा पटका कि उनके अंग पत्थरों से टकराकर चूर हो गये और किसी भी तरह वे फिर उठ न सके। इसके पश्चात् श्रुतशर्मा बड़े अभिमान से सर्प की ओर दौड़ा और उसे भी सर्प ने अपने श्वास से बहुत दूर फेंक दिया। पत्थरों की टक्कर से चूर-चूर हुए अंगों- वाले और लज्जित श्रुतशर्मा के फेंके जाने पर सुमह ने सूर्यप्रभ को उसे पकड़ने के लिए भेजा। 'देखो यह भी इस सर्प को पकड़ने के लिए उठा है। ये मनुष्य बन्दरों की भाँति विचारहीन होते हैं। दूसरों से जो कुछ भी किया जाता है, उसकी ये नकल करते हैं। इस प्रकार, कहते हुए सभी विद्याधर राजा सूर्यप्रभ की हँसी उड़ाने लगे ॥६९-७५॥ उनके हँसते हुए ही सूर्यप्रभ ने मुँह बन्द किये हुए उस अजगर को पकड़ लिया और बिल से बाहर खींच लिया ॥७६॥ उसी समय वह सर्प तरकस बन गया और सूर्यप्रभ के सिर पर आकाश से पुष्पवर्षा हुई ॥७७॥ तदनन्तर आकाशवाणी हुई—'हे सूर्यप्रभ तुम्हारे लिए यह तूणीर-रत्न सिद्ध हो गया इसे ग्रहण करो ॥७८॥ तब सभी विद्याधर, म्लान और लज्जित हो गये। सूर्यप्रभ ने उसे स्वीकार कर लिया। यह सुनीथ सुमेरु आदि अति प्रसन्न हुए ॥७९॥

३२६ कथासरित्सागर

३२६ कथासरित्सागर श्रुतशर्मणि यातेऽथ विद्याधरबलान्विते । एत्य सूर्यप्रभं दूतस्तदीय इदमभ्यधात् ॥८०॥ त्वां समादिशति धीमाञ्छ्रुतशर्मा प्रभुर्यथा । समर्पयेहस्तूणं मे कार्यं चेज्जीवितेन ते ॥८१॥ सूर्यप्रभोऽथ प्रत्याह दूतेव ब्रूहि गच्छ तम्। स्वचेह एव भविता तूर्णस्ते मन्दरायुधः ॥८२॥ एतत्प्रतिवचः श्रुत्वा गते दूते पराङ्मुखे । प्राहसन् रभसोक्तिं तां सर्वे ते श्रुतशर्मणः ॥८३॥ सूर्यप्रभोऽथ सानन्दमाश्लिष्योने सुमेरुणा। दिष्ट्याद्य शाम्भवं वाक्यं फलितं तदसंशयम् ॥८४॥ तूणरत्ने हि सिद्धेऽस्मिन्सिद्धा ते चक्रवर्तिता । तदेहि साधयेदानीं धनूरत्नं निराकुरु ॥८५॥ एतत्सुमेरोः श्रुत्वा ते तस्मिन्नेवाप्रयायिनि । सूर्यप्रभादयो जग्मुर्हेमकूटाचलं तत ॥८६॥ पार्श्वे तस्योत्तरे ते च मानसाख्यं सरोवरम् । प्रापुः समुद्रनिर्माभे विधातुरिव वर्णकम् ॥८७॥ मुखानि दिव्यनारीणां क्रीडन्तीनां जलान्तरे । निह्नुवानं मधूद्भूतैरुत्फुल्लैः कनकाम्बुजैः ॥८८॥ अवलोकयन्ति यावच्च सरसस्तस्य ते श्रियम् । तावत्तमाययुः सर्वे श्रुतशर्मादयोऽपि ते ॥८९॥ तत सूर्यप्रभस्ते च होमं चक्रुर्घृताम्बुजैः । क्षणाच्चात्रोग्रवायुर्धोरो मेघस्तस्मात् सरोवरात् ॥९०॥ स व्याप्य गगनं मेघो महद्वर्षमवासृजत् । तन्मध्ये च पपातैको नागः कालोऽम्बुदात्ततः ॥९१॥ सुमेर्वाक्यादुत्थाय गाढं सूर्यप्रभेण यत् । गृहीतो विध्यमानोऽपि ततः नागो भवद्धनुः ॥९२॥ तस्मिन् धनुष्ट्वमापन्ने द्वितीयोऽभ्रात्ततोऽपतत् । नागो विषाग्नित्रासात्तस्योच्चैरेववेष्टकः ॥९३॥ सोऽपि सूर्यप्रभेनाशु गृहीतस्तेन पूर्ववत्। धनुर्गुणत्वं सम्प्राप मेघश्चाशु मनाक्ष सः ॥९४॥

अष्टम लम्बक ३२७

अष्टम लम्बक ३२७ तब विद्याधरों की सेना के साथ श्रुतशर्मा के चले जाने पर उसका दूत आकर सूर्यप्रभ से इस प्रकार बोला—॥८०॥ 'जैसा कि हमारे स्वामी श्रुतशर्मा तुमको आज्ञा देते हैं कि यदि तुम्हें अपने जीवन से कार्य है, तो इस तरकस को मुझे दे दो' ॥८१॥ तब सूर्यप्रभ ने उत्तर दिया—'दूत उससे जाकर कह दो कि मेरे बाणों से छिदा हुआ तेरा शरीर ही तरकस बन जायगा' ॥८२॥ उत्तर सुनकर दूत के चले जाने पर वे सब श्रुतशर्मा की मूर्खता-पूर्ण बातों पर हँसने लगे ॥८३॥ तब सुमेरु ने सूर्यप्रभ का आलिंगन करके उससे कहा—'भाग्य से ही आज शिवजी की बात निःसन्देह सफल हुई ॥८४॥ इस तूणीर-रत्न के सिद्ध हो जाने पर तेरी चक्रवर्तिता सिद्ध हुई। अब आओ धनुष-रत्न को सिद्ध करें' ॥८५॥ सुमेरु के वचन सुनकर और उसी के आगे-आगे चलने पर सूर्यप्रभ आदि उसके पीछे-पीछे वहाँ से हेमकूट पर्वत पर गये ॥८६॥ वे उसके समीप ही उत्तर की ओर मानस-सरोवर पर पहुंचे जो सरोवर समुद्र के निर्माण के लिए मानों ब्रह्मा का साधन हो ॥८७॥ जलक्रीडा करती हुई देवांगनाओं के मुखों से मानों वह सरोवर खिले हुए स्वर्ण-कमलों से अपने को छिपा रहा था ॥८८॥ जबतक वे लोग मानस-सरोवर की शोभा देखते हैं, तबतक श्रुतशर्मा आदि विद्याधर वहाँ आ गये ॥८९॥ तब सूर्यप्रभ और वे सब विद्याधर घृत और कमलों से हवन करने लगे। उसी क्षण उस सरोवर से एक भयानक बादल निकला ॥९०॥ वह मेघ आकाश में जाकर घोर वर्षा करने लगा उसी वर्षा में मेघ से एक भीषण काला साप गिरा ॥९१॥ सूर्यप्रभ के कहने पर सुमेरु ने उसे कसकर पकड़ा। बाणों से बींधा जाता हुआ भी वह काला साप उसी क्षण धनुष बन गया ॥९२॥ उस साप के धनुष बन जाने पर दूसरा साप फिर गिरा उसके मुख से निकलते हुए विष और आग की लपटों के भय से सभी आकाशचारी विद्याधर भयभीत हो काँपने लगे ॥९३॥ पहले साप के समान ही उस साप के भी सूर्यप्रभ द्वारा पकड़े जाने पर वह (साप) धनुष की डोरी बन गया और वह मेघ भी नष्ट हो गया ॥९४॥

३९८ कथासरित्सागर

३९८ कथासरित्सागर सूर्यप्रभामितबल सिद्धमेतद्धनुस्तव । अच्छेद्यश्च गुणोऽप्येष रत्ने एते गृहाण तत् ॥९५॥ इत्यभावि च वाग्दिव्या पुष्पवृष्टिपुरःसरा । सूर्यप्रभश्च सगुणं धनूरत्नं तदग्रहीत् ॥९६॥ श्रुतशर्माप्यमाद्विग्नः सानुगः स तपोवनम् । सूर्यप्रभोऽथ सर्वे च हर्षमापुर्महाधियः ॥९७॥ पृष्टोऽथ धनुरुत्पत्तिं तैः सुमेरुरुवाच सः । इह कीचकवेणूनां दिव्यमस्ति वनं महत् ॥९८॥ सद्यो ये कीचकाश्छित्त्वा क्षिप्यन्तेऽत्र सरोवरे । महान्त्येतानि दिव्यानि सम्पद्यन्ते धनूंषि ते ॥९९॥ साधितानि च तान्येव दृप्तैस्तैस्तैः पुरातनैः । असुरैरथ गन्धर्वैस्तथा विद्याधरोत्तमैः ॥१००॥ भिन्नानि तेषां नामानि चक्रवर्तिष्वमूंषि तु । भत्रामृतबलाख्यानि निक्षिप्तानि पुरा सुरैः ॥१०१॥ तानि चैतैः परिक्लेशैः सिध्यन्ति शुभकर्मणाम् । कदाचिद्विश्वरेच्छातः भविष्यच्चक्रवर्तिनाम् ॥१०२॥ तच्च सूर्यप्रभस्यैतत् सिद्धमद्य महद्धनुः । स्वोचितानि वयस्यास्तत् साधयन्त्वस्य तान्यमी ॥१०३॥ येषां हि सिद्धविद्यानां वीराणामस्ति योग्यता । यथामुरूपं भव्यानां सिध्यन्त्यद्यापि तानि हि ॥१०४॥ एतद् सुमेरुवचनं श्रुत्वा सूर्यप्रभस्य ते । वयस्याः कीचकवनं तत् प्रभासाद्यो ययुः ॥१०५॥ तद्रक्षकं च राजानं चण्डदण्डं विजित्य ते । आनीय कीचकांस्तत्र निक्षिप्युः सरसोऽन्तरे ॥१०६॥ तत्तीरोपोषितानां च जपतां जुह्वतां तथा । सिध्यन्ति स्म धनूंष्येषां सप्ताहात् सत्यशालिनाम् ॥१०७॥ प्राप्तैस्तैस्तत्त्ववृत्तान्तैर्मयाद्यैश्च सहाय सः । आगात् सूर्यप्रभस्तावत् तत् सुमेरोस्तपोवनम् ॥१०८॥ तत्रोवाच सुमेरुस्तं जितो वेणुवनेश्वरः । त्वन्मित्रैश्चण्डदण्डो यवजेयोऽपि तदद्भुतम् ॥१०९॥

षष्ठ लम्बकः ३२९

षष्ठ लम्बकः ३२९ 'सूर्यप्रभ यह अनन्त फलशाली धनुष रत्न तुझे सिद्ध हो गया और इसके साथ कभी न टूटनेवाली डोरी भी तुझे प्राप्त हो गई। ये दोनों रत्न तुझे सिद्ध हुए, अब इन्हें स्वीकार कर' ॥१५-१६॥ इस प्रकार की आकाशवाणी सुनकर सूर्यप्रभ ने उन दोनों रत्नों को ग्रहण कर लिया और श्रुतशर्मा भी व्याकुल होकर अपने अनुचरों के साथ निराश होकर तपोवन को चला गया। तदनन्तर मय सुनीथ सूर्यप्रभ आदि सभी प्रसन्न हुए ॥१७॥ उस धनुष की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सुमेरु ने कहा— यहाँ पर वायु से दग्ध करनेवाले बाँसों का एक महान् और दिव्य जंगल है, उससे काटकर जो बड़े-बड़े बाँस इस सरोवर में फेंके जाते हैं, वे सभी दिव्य धनुष बन जाते हैं। उन्हीं धनुषों को पहले समय में देवताओं ने असुरों ने गन्धर्वों ने तथा विद्याधरों ने अपने लिए सिद्ध किया है ॥१८-१ ९ ॥ उनके अलग-अलग नाम हैं। इस सरोवर में पुराने समय में देवताओं ने अमृतबल नाम के धनुष भी छोड़े हैं, जो चक्रवर्तियों के धनुष हैं। वे बड़े ही कष्ट से किसी भावी चक्रवर्ती को ईश्वर की कृपा होने पर ही सिद्ध होते हैं ॥१ ९-१०२॥ वही चक्रवर्ती धनुष आज सूर्यप्रभ को सिद्ध हुआ है। उसके ये प्रभास आदि मित्र भी अपने अपने योग्य धनुषों की साधना करें ॥१ १॥ जिन सिद्धविद्य कुशाग्र वीरों की योग्यता होती है, उन्हें आज भी उन धनुषों की सिद्धि प्राप्त होती है ॥१ २॥ सुमेरु के वचन सुनकर सूर्यप्रभ के मित्र प्रभास आदि बाँसों के जंगल में गये और उस जंगल के रक्षक चंड-दंड को जीतकर वहाँ से बाँस लाये और उन्हें सरोवर में फेंक दिया ॥१०५-१ ६॥ इसके बाद सूर्यप्रभ के मित्रों ने सरोवर के किनारे बैठकर जप और हवन प्रारम्भ किया। उन शस्त्रशाली मित्रों को सात दिन में धनुष सिद्ध हो गये ॥१ ७॥ सात दिनों के पश्चात् सिद्ध हुए मित्रों से धनुष-सिद्धि का समाचार जानकर सूर्यप्रभ उन मित्रों और मय आदि के साथ सुमेरु के तपोवन में लौट आये ॥१ ८॥ वहाँ पर सुमेरु ने उनसे कहा कि तुम्हारे मित्रों ने वेणु-दंड के रक्षक चंड-दंड को जीत लिया, यह आश्चर्य की घटना है ॥१ ९॥ ४२

३३० कथासरित्सागर

३३० कथासरित्सागर तस्यास्ति मोहिनी नाम विद्या तेन स दुर्जयः। नूनं सा स्थापिता तेन प्रधानस्य रिपोः कृते॥११०॥ अत प्रयुक्ता नैतेषु स्वद्वयस्येषु सम्प्रति। सकृच्च हि सा तस्य फलदा न पुनः पुनः॥१११॥ गुरावेव हि सा तेन प्रभावावेक्षणाय भोः। प्रयुक्ताऽभूवत क्षापस्तेन वसोऽस्य तादृशः॥११२॥ तच्चिन्त्यमेतद्विद्यानां प्रभावो हि दुरासदः। तत्कारणं च भवता पृच्छ्यतां भगवान् मयः॥११३॥ अस्याग्रे किमूहं वच्मि कः प्रदीपो रखेः पुरः। एवं सुमेरुणा सूर्यप्रभस्योक्ते मयोऽब्रवीत्॥११४॥ सत्यं सुमेरूमोक्तं ते सङ्क्षेपाच्छृणु वच्म्यहम्। 'अव्यक्तात् प्रभवन्तीह तास्ताः शक्त्यनुशक्तयः॥११५॥ तत्रोद्गतः प्राणशक्तेर्नादो बिन्दुपधाश्रितः। विद्यादिमन्त्रतामेति परतत्त्वकलान्वितः॥११६॥ साक्षां च मन्त्रविद्यानां ज्ञानेन तपसापि वा। सिद्धांश्या वा सिद्धानां प्रभावो दुरतिक्रमः॥११७॥ तत्पुत्र सर्वविद्यास्ते सिद्धा द्वाभ्यां तु हीयसे। मोहिनीपरिवर्त्तिन्यौ न विद्ये साधिते त्वया॥११८॥ याज्ञवल्क्यश्च त वेत्ति तद् गच्छ प्रार्थयस्व तम्' । एव मयोक्त्या तस्यायेंययौ सूर्यप्रभोऽन्तिकम्॥११९॥ स मुनिस्तं च सप्ताहं निवास्य भुजगह्रदे। अग्निमभ्ये भ्यहं चैव तपश्चर्यमकारयत्॥१२०॥ ददौ सोढाद्बिदंशस्य सप्ताहाच्चास्य मोहिनीम्। विद्यां विसोढवह्न्यर्चि भ्याहाद्विपरिवर्त्तिनीम्॥१२१॥ प्राप्तविद्यस्य भूयोऽपि दक्षिणाद्रुतप्रधानम्। तस्यादिदेश स मुनिः स तथेत्यकरोञ्च तत्॥१२२॥ तत्तारणं च महापद्मविमानं तस्य कामगम्। अभूदुपगतं सूर्यप्रभस्य गगनचरम्॥१२३॥ अष्टोत्तरेण पत्राणां पुराणां च शतेन यत्। असङ्ख्य महारत्ननानारूपविनिर्मितम्॥१२४॥

अष्टम लम्बक २११

अष्टम लम्बक २११ उसके पास मोहिनी विद्या है, जिसके कारण वह जीता नहीं जा सकता। अनुमान है कि उस विद्या को उसने अवश्य ही प्रधान शत्रु के लिए सुरक्षित रखा होगा॥११०॥ इसीलिए, उसने तुम्हारे इन मित्र पर इस समय उसका प्रयोग नहीं किया, क्योंकि वह उस विद्या का एक ही बार प्रयोग कर सकता है, बार-बार नहीं॥१११॥ चंड-दंड ने गुरु पर ही उस विद्या का प्रभाव जानने के लिए उसका प्रयोग किया था। अतः गुरु ने ही उसे वैसा शाप दिया॥११२॥ यह विचारणीय है। ऐसी विद्याओं का प्रभाव कठिनाई से ही प्राप्त होता है। इसका कारण आप लोग मय से पूछें। उसके रहते मैं क्या कहूँ। सूर्य के सामने दीपक की क्या बात है? सूर्यप्रभ से सुमेरु के ऐसा कहने पर मय ने कहा—॥११३-११४॥ 'सुमेरु ने सच कहा है, इसे मैं बताता हूँ, सुनो। अव्यक्त परमात्मा से वे शक्तियाँ और अनुषक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। उसी अव्यक्त से बिन्दु-मात्र पर आवृत्त प्राण-शक्ति का उद्गम हुआ। वही परमात्मतत्त्व की कला से युक्त होकर विद्या के मन्त्रों का रूप धारण करती है॥११५-११६॥ उन्हीं मन्त्र-विद्याओं के ज्ञान में या तप से अथवा सिद्धा की आज्ञा से सिद्धि प्राप्त करने वालों का प्रभाव बहुत कठिन हो जाता है॥११७॥ तो हे पुत्र, तूने सभी विद्याओं की साधना तो कर ली और वे सिद्ध भी हो गईं। किन्तु, दो विद्याएँ अभी तुझे नहीं आईं—एक मोहिनी और दूसरी परिवर्त्तिनी। इनकी सिद्धि तूने नहीं की है॥११८॥ इन दोनों विद्याओं को याज्ञवल्क्य ऋषि जानता है। अतः उसके समीप जाकर उससे प्रार्थना करो। मय के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ याज्ञवल्क्य ऋषि के पास गया॥११९॥ उस मुनि याज्ञवल्क्य ने सूर्यप्रभ को सात दिनों तक अग्नि में रखकर तपस्या कराई॥१२०॥ ज्वाला के दर्शन का सहन किये हुए सूर्यप्रभ को सात दिनों में मोहिनी विद्या और तीन दिनों तक अग्नि-ताप सहन कर लेने पर विपरिवर्त्तिनी विद्या उस थी॥१२१॥ विद्या प्राप्त कर लेने पर मुनि ने उसे फिर अग्नि-कुण्ड में प्रवेश करने के लिए कहा और उसने आज्ञानुसार अग्नि में प्रवेश किया॥१२२॥ उसी क्षण सूर्यप्रभ को इच्छानुसार चलनेवाला महापद्म नामक आकाश-यान प्राप्त हुआ। यह विशाल एक सौ आठ पंगोंवाला था और एक-एक पग में एक-एक नगर था। इस प्रकार, सौ नगर उसमें बने थे। अनेक प्रकार के रत्न उसमें जड़े हुए थे और विचित्र प्रकार से उसकी रचना की गई थी॥१२३-१२४॥

३३२ कथासरित्सागर

३३२ कथासरित्सागर

चक्रवर्त्तिविमानं ते सिद्धमेतदमूष्य च। पुरेष्वन्तःपुराख्येषु सर्वेषु स्थापयिष्यसि ॥१२५॥ येन तान्यप्रधृष्याणि भविष्यन्ति भवद्विषाम्। इत्यन्तरिक्षाद्गीर् समुवाचाथ सरस्वती ॥१२६॥ ततः स याज्ञवल्क्यं स गुरुं प्रह्वो व्यजिज्ञपत्। आदिश्यतां प्रयच्छामि कीदृशीं दक्षिणामिति ॥१२७॥ निजाभिषेककाले मां स्मरेरेषैव दक्षिणा। गच्छ तावत् स्वकं सैन्यमिति तं सोऽब्रवीन्मुनिः ॥१२८॥ मत्वा ततस्तं स मुनिं विमानं चाधिरुह्य तत्। तत्सुमेरुनिवासस्थं सैन्यं सूर्यप्रभो ययौ ॥१२९॥ तत्राख्यातस्ववृत्तान्तं ससुनीथसुमेरवः। सिद्धविद्याविमानं तमभ्यनन्दन् मयादयः ॥१३०॥ ततः सुनीथः सस्मार तं सुवासकुमारकम्। स चागत्य मयादींस्ताञ्जगादैव सरात्रकान् ॥१३१॥ सिद्धं विमानं विद्याश्च सर्वाः सूर्यप्रभस्य तत्। उदासीनाः किमद्यापि स्थिताः स्थ रिपुनिर्जये ॥१३२॥ तच्छ्रुत्वा स मयोऽवादीद्युक्तं भगवतोदितम्। किन्तु प्राक्प्रेष्यतां दूतो नीतिस्तावत् प्रयुज्यताम् ॥१३३॥ एवं मयासुरेणोक्ते सोऽब्रवीन् मुनिपुत्रकः। अस्मद्देवं का क्षतिस्तर्हि प्रहस्तः प्रेष्यतामयम् ॥१३४॥ एष सप्रतिभो वाग्मी गतिज्ञः कार्यकाक्षयोः। कर्मक्षमश्च सहिष्णुश्च सर्वदूतगुणान्वितः ॥१३५॥ इति तद्वचनं सर्वे श्रद्धाय व्यसृजंस्ततः। प्रहस्तं दत्तसन्देशं वीराय श्रुतशर्मणे ॥१३६॥ तस्मिन् गतेऽब्रवीत् सूर्यप्रभस्तान्निखिलाभिजान्। श्रूयतां यन्मया दृष्टमपूर्वं स्वप्नकौतुकम् ॥१३७॥ 'जानेऽद्य क्षीयमाणायां पश्यामि रजनावहम्। यावन्महाजलौघेन वयं सर्वे ह्रियामहे ॥१३८॥ ह्रियमाणाश्च नृत्यामो न मज्जामः कथञ्चन। अथाद्य स परावृत्तः प्रतिकूलेन वायुना ॥१३९॥

अष्टम लम्बक १३३

अष्टम लम्बक १३३ इतने में आकाशवाणी हुई कि यह चक्रवर्ती विमान तुम्हें सिद्ध हुआ है। इसके सभी नगरों (पुरा) में अपनी-अपनी रानियाँ रखोगे तो वे शत्रुओं की बाधा से सुरक्षित रहेंगी ॥१२५ १२६॥ तब उसने प्रणाम करके गुरु याज्ञवल्क्य से निवेदन किया कि आज्ञा दीजिए कि किस प्रकार गुरु-दक्षिणा अर्पण करूँ ॥१२७॥ अपने चक्रवर्ती-अभिषेक के समय मुझे स्मरण करना यही मेरी दक्षिणा है। अब तुम अपने सेना शिविर में जाओ ॥१२८॥ मुनि के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ मुनि को प्रणाम कर और उस विमान पर बैठकर सुमेरु के आश्रम में स्थित अपने सेना-शिविर में आया ॥१२९॥ वहाँ सब समाचार सुनाते हुए उसे मय सुनीथ और सुमेरु ने विमान और विद्या प्राप्ति पर बधाई दी ॥१३० ॥ तब सुनीथ ने सुवासकुमार का स्मरण किया। उसने आकर मय आदि तथा अन्य राजाओं से कहा—'सूर्यप्रभ को विमान भी सिद्ध होगया और सब विद्याएँ भी सिद्ध हो गईं। अब आप लोग शत्रु पर विजय प्राप्त करने में उदासीन क्यों हो रहे हैं ? ॥१३१ १३२॥ यह सुनकर मय ने कहा— आपने सच कहा किन्तु पहले दूत भेजा जाय तो ठीक हो। यहाँ नीति का प्रयोग करना चाहिए' ॥१३३॥ यह सुनकर मुनि-पुत्र ने कहा—'ऐसा ही करो। हानि क्या है ? प्रहस्त को दूत के रूप में भेजो' ॥१३४॥ यह (प्रहस्त) प्रतिभाशाली गम्भीर भाषण करनेवाला कार्य और काल की स्थिति को जाननेवाला कठोर और सहिष्णु है। इसमें दूत के सभी गुण हैं' ॥१३५॥ इस प्रकार, सुवासकुमार के वचनों पर श्रद्धा करके मय आदि ने सन्देश देकर प्रहस्त को श्रुतशर्मा के प्रति भेजा ॥१३६॥ उसके चले जाने पर सूर्यप्रभ ने अपने उन सभी साथियों से कहा— मैंने आज जो एक कौतूहलपूर्ण सपना देखा है उसे सुनिए—'आज रात के अन्त में मैंने देखा कि हम सभी प्रबल जल- धारा में बहे जा रहे हैं। बहाये जाने हुए हमलोग नाच रहे हैं पर डूबते नहीं। कुछ समय बाद उस जलका प्रवाह विपरीत वायु के कारण बदल गया ॥१३७-१३९॥