रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
२. द्वितीय अध्याय: ज्वर, अतीसार, ग्रहणी एवं अर्श रोग रस-चिकित्सा
भाषाटीकासहित । ( ११५ ) तिन्दुकजं समांशम् । संमर्द्य वज्रिपयसा मधुना द्विगुञ्जस्त्रैलोक्यडुम्बररसोऽभिनवज्वरघ्नः ॥ ३८ ॥ पारा, ताम्रभस्म, गंधक, पीपल, कुटकी, शुद्ध जमालगोटे, हरड़का छिलका, दक्षिणी निशोथ और कुचला इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर थोहरके दूधमें घोटकर दो दो रत्तीकी गोलियें बनावे; इसकी एक गोलीको शहदके साथ खानेसे तीक्ष्ण विरेचन होकर नवीन ज्वर दूर होता है । इसको त्रैलोक्यडुम्बर रस कहते हैं ॥ ३८ ॥ प्रतापमार्तण्ड रस । विषहिंगुलजैपालटंकणं क्रमवर्द्धितम् । रसः प्रतापमार्त्तण्डः सद्योज्वरविनाशनः ॥ ३९ ॥ तेलिया विष १ भाग, सिंगरफ २ भाग, शुद्ध जमालगोटे ३ भाग, सुहागा ४ भाग इन सबको खरल कर जलके योगसे एक एक रत्तीकी गोली बनावे; यह प्रतापमार्तण्ड रस सब प्रकारके नवीन ज्वरोंको नष्ट करता है ॥ ३९ ॥ तरुणज्वरारि रस । जैपालगन्धं विषपारदञ्च तुल्यं कुमारीस्वरसेन पिष्टम् । अस्य द्विगुञ्जा हि सितोदकेन ख्यातो रसोऽयं तरुणज्वरारिः ॥ ४० ॥ दातव्य एषोऽहनि पञ्चमे वा षष्ठेऽथवा सप्तम एव वापि । जाते विरेके विजितो ज्वरः स्यात्पटोलमुद्गाम्बुनिषेवणेन ॥ ४१ ॥ शुद्ध जमालगोटे, गंधक, विष और पारा इन सबको सम भाग लेकर घीकुमारके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियें बनावे; इसको तरुणज्वरारि रस कहते हैं । इसकी एक गोली खाकर ऊपरसे मिश्रीका शर्बत पीवे तो तरुणज्वर नष्ट होजाता है । इस रसको
( ११६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ज्वरके चढ़नेसे पांचवें अथवा छठे या सातवें दिन खिलाना चाहिये । इसके खानेसे उत्तम विरेचन होकर ज्वर नष्ट होजाता है । इसके ऊपर परवल और मूंगका यूष देना पथ्य है ॥ ४० ॥ ४१ ॥ गदमुरारि रस । रसवह्निशिललोहव्योषताम्राणि तुल्यान्यथ सद्रद- नागं भागमेतत्प्रदिष्टम् । भवति गदमुरारिश्चास्य गुञ्जाद्वयं वैक्षपयति दिवसेन प्रौढमामज्वराख्यम्॥४२ शुद्ध पारा, गंधक, शुद्ध मनसिल, लोहभस्म, त्रिकुटा, ताम्रभस्म, सिंगरफ और नागभस्म इन सबको विधिवत् खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियां बनावे । इसके सेवनसे एक दिनमें ही सब प्रकारके नवीन और पुराने ज्वर नष्ट होते हैं । इस रसको गदमुरारि रस कहते हैं ॥ ४२ ॥ विद्याधर रस । रसो गन्धस्ताम्रं त्रिकटुकटुकीटंकणवरा- त्रिवृद्दन्तीहेमद्युमणिविषमेतत्सममिदम् । समस्तैस्तुल्यं स्याद्विमलजयपालोद्भव रजः ततः स्नुक्क्षीरेण प्रचुरमृदितं दन्तिसलिलैः ॥४३॥ द्विगुञ्जाऽस्य प्रौढं जयति वटिका साममतुलं ज्वरं पाण्डुं गुल्मं ग्रहणिगुदकीलोद्भवरुजः । मरुच्छूलाजीर्णं प्रबलमथ सामं क्रिमिगदं विबद्धं प्लीहानं प्रबलमपि विद्याधररसः ॥ ४४ ॥ पारा, गंधक, ताम्रभस्म, त्रिकुटा, कुटकी, सुहागा, त्रिफला, निशोथ, दंती, धतूरेके बीज, आककी जड़का छिलका और सिंगिया विष यह सब समान भाग लेवे शुद्ध जमालघोटा सबके बराबर लेवे; इन सबको एकत्र कर पहिले दन्तीके क्वाथमें खरल करे फिर थोहरके
भाषाटीकासहित । ( ११७ ) दूधमें खरल कर दो दो रत्तीकी गोलियें बनावे । इसके सेवनसे बलवान् तरुणज्वर, पाण्डुरोग, गुल्म, ग्रहणीरोग, बवासीर, वातजशूल, बढ़ा हुआ आमाजीर्ण, क्रिमिरोग, मलबद्धता और प्लीहारोग यह सब नष्ट होते हैं । इसको विद्याधर रस कहते हैं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ अमृतमञ्जरी रस । हिंगुलं मरिचं टङ्कं पिप्पली विषमेव च । जातीकोषं समं सर्वं जम्बीराद्भिर्विमर्दितम् ॥ ४५ ॥ गुञ्जाद्वयं त्रयं वापि देयञ्च सन्निपातिके । कासश्वासौ जयत्याशु सर्वज्वरविनाशनः ॥ ४६ ॥ सिंगरफ, काली मिरच, सुहागा, पीपल, विष और जावित्री यह औषधि समान लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करे । इस औषधि- मेंसे दो रत्ती अथवा तीन रत्ती प्रमाण लेकर सान्निपातिक रोगमें प्रयोग करे । यह अमृतमंजरी रस खांसी, श्वास और सब प्रकारके ज्वरोंको नष्ट करता है ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ महाज्वरांकुश रस । सूतं गन्धं विषं तुल्यं धूर्त्तबीजं त्रिभिः समम् । चतुर्णां द्विगुणं व्योमचूर्णं गुञ्जाद्वयं हितम् ॥ ४७ ॥ जम्बीरस्य च मज्जाभिरार्द्रकस्य रसैर्युतम् । महाज्वरांकुशो नाम ज्वराष्टकनिषूदनः ॥ ४८ ॥ ऐकाहिकं द्व्याहिकं वा त्र्याहिकञ्च चतुर्थकम् । विषमञ्च त्रिदोषोत्थं हन्ति सर्वं न संशयः ॥ ४९ ॥ पारा, गन्धक और विष यह प्रत्येक औषधि एक भाग धतूरेके बीज तीन भाग और एकत्र मिली हुई त्रिकुटेकी औषधियोंका चूर्ण बारह भाग लेवे, इन सबको एकत्र करके खरल करे और दो दो
( ११८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रत्तीकी गोलियां बना लेवे । इसको महाज्वरांकुश रस कहते हैं, इसके जम्भीरी नींबूकी मज्जा और अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे आठ प्रकारके ज्वर तथा ऐकाहिक, द्वयाहिक, त्र्याहिक और चातुर्थिक विषमज्वर तथा सन्निपातज्वर नष्ट होते हैं ॥ ४७-४९ ॥ ज्वरकेशरिका । शुद्धसूतं विषं व्योषं गंधं त्रिफलमेव च । जयपालं समं कुर्याद् भृङ्गतोयेन मर्दयेत् ॥ ५० ॥ वटिकां गुञ्जमात्रान्तु कृत्वा वैद्यः प्रयत्नतः । प्रमाणं सर्षपाकारं बालानाञ्च प्रशस्यते ॥ ५१ ॥ नारिकेलाम्बुना वापि सर्वज्वरविनाशिनी । नारिकेलजलं शस्तं कर्षत्रयं पिबेदनु ॥ ५२ ॥ शुद्धपारा, विष, त्रिकुटा, गन्धक, त्रिफला और शुद्ध जमालगोटे यह सब औषधि समान भाग लेकर भांगरेके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियां बना लेवे । बालकोंको यदि यह रस देना हो तो सरसोंकी बराबर गोली बनावे । इस औषधिको तीन तोले नारियलके जलके साथ पान करे तो सब प्रकारका ज्वर नष्ट होता है ॥ ५०-५२ सितया च समं पीत्वा पित्तज्वरविनाशिनी । मरिचेन च पीता सा सन्निपातज्वरं जयेत् ॥ ५३ ॥ पिप्पलीजीरकाभ्यां तु दाहज्वरविनाशिनी । विषमज्वरभूतोत्थं ज्वरं प्लीहानमेव च ॥ ५४ ॥ अग्निमान्द्यमजीर्णञ्च श्वयथुञ्च सुदारुणम् । शूलाजीर्णे तथा गुल्मं कुष्ठाष्टादश पित्तजान् । ज्वरकेशरिका ख्याता तरुणज्वरनाशिनी ॥ ५५ ॥
भाषाटीकासहित । ( ११९ ) इसको मिश्रीके साथ सेवन करे तो पित्तज्वर नष्ट हो । काली मिरचोंके चूर्णके साथ सेवन करे तो सन्निपातज्वर नष्ट हो । पीपल और जीरेके चूर्णके साथ सेवन करे तो तरुणज्वर, दाहज्वर, विषमज्वर, भूतोत्थज्वर, प्लीहा, मंदाग्नि, अजीर्ण, शोथ, शूल, गुल्म, अठारह प्रकारके कुष्ठ, सम्पूर्ण पित्तजनित रोग नष्ट होते हैं. इसे ज्वरकेशरिका कहते हैं ॥ ५३-५५ ॥ नवज्वरेभासिंह । शुद्धसूतं तथा गन्धं लोहं ताम्रञ्च सीसकम् । मरिचं पिप्पलीं विश्वां समभागं विचूर्णयेत् ॥५६॥ अर्द्धभागं विषं दद्यान्मर्दयेद्वासरद्वयम् । शृङ्गवेरानुपानेन दद्याद् गुञ्जाद्वयं भिषक् ॥ ५७ ॥ नवज्वरे महाघोरे वातसंग्रहणीगदे । नवज्वरेभसिंहोऽयं सर्वरोगे प्रयोजयेत् ॥ ५८ ॥ शुद्ध पारा, गंधक, लोहभस्म, ताम्रभस्म, सीसाभस्म, मिरच, पीपल और सोंठ यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और विष आधा भाग लेवे । इन सबको एकत्र करके दो दिन खरल करे फिर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे प्रबल नवज्वर, वातरोग, संग्रहणी इत्यादि सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । इसको नवज्वरेभसिंह कहते हैं ॥ ५६-५८ ॥ उदकमञ्जरीरस ( निरामज्वरपर ) सूतो गन्धष्टङ्कणः सोषणः स्यादेतैस्तुल्या शर्करा मत्स्यपित्तैः । भूयो भूयो भावयेत्तत् त्रिरात्रं वल्लो देयः शृंगवेरस्य वारा ॥५९॥ सम्यक् तापे वारिभक्तं
( १२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सतक्रं वृन्ताकाढ्यं पथ्यमेव प्रदिष्टम् । अङ्गे रोगं हन्ति सामं प्रभावात्पित्ताधिक्ये मूर्ध्नि वारिप्रयोगः ६० पारा, गंधक, सुहागा और कालीमिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे । और विष ( किसीके मतसे मिश्री ) चार भाग लेवे । इन सबको एकत्र करके रोहू मछलीके पित्तमें अच्छे प्रकारसे खरल करके तीन दिन वारंवार भावना देवे । अधिक संताप उत्पन्न हो तो अदरखके रसके साथ इस औषधिको तीन रत्ती प्रमाण तीन दिन सेवन करे । रोगीको तक्रके साथ ठंडा भात भोजन करावे तथा बैंगनका शाक पथ्य देवे । पित्तकी विशेष प्रबलता हो तो रोगीके मस्तक पर जलकी धारा देवे । ( अथवा बर्फकी थैली मस्तक पर लगावे ) इस औषधिका सेवन करनेसे साम और निराम ज्वर नष्ट होता है । इसको उदकमञ्जरी रस कहते हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥ चन्द्रशेखर रस । अत्र·शर्करास्थाने मनःशिलायां चन्द्रशेखरो भवति ६१ इस उदकमञ्जरी रसमें विष ( किसीके मतसे मिश्री ) के स्थानमें शुद्ध मनसिल मिलानेसे चन्द्रशेखर रस हो जाता है । यह रस अनुपान विशेषसे पूर्वोक्त समस्त गुणोंको करता है ॥ ६१ ॥ पञ्चवक्त्र रस । रसो गन्धष्टंकणः सोषणोऽयं फणी पिप्पलीत्येष धूस्तूरपिष्टः । जयेत्सन्निपात द्विगुञ्जानुपानं भवे- दर्कमूलाम्बुसव्योषचूर्णम् ॥ ६२ ॥ पारा, गंधक, सुहागा, कालीमिरच, शीसाभस्म और पीपल यह सब औषधियें समान भाग लेकर धतूरेके रसमें अच्छी प्रकारके खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको आककी जड़के रसके साथ और त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे सन्निपातज्वर नष्ट होता है । इसको पञ्चवक्त्र रस कहते हैं ॥ ६२ ॥
भाषाटीकासहित । ( १२१ ) पर्पटीरस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं मर्द्यं भृङ्गरसेन च । मृतं ताम्रं लोहभस्म पादांशेन तयोः क्षिपेत् ॥६३॥ लोहपात्रे च विपचेच्चालयेल्लोहचाटुना । तत्क्षिपेत्कदलीपत्रे गोमयोपरि संस्थिते ॥ ६४ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग इन दोनोंको एकत्र भांगरेके रसमें खरल करे फिर इसमें पारे और गंधकसे चौथाई भाग तांबेकी भस्म और लोहभस्म मिलाकर उत्तम विधिसे खरल करे फिर लोहेके कर- छेसे चलाकर लोहेके पात्रमें पकावे । जब देखे कि यह औषधि अच्छी प्रकारसे गल गई तब गोबरके ऊपर केलेका पत्ता रखकर उस पर इस औषधिको डाल देवे और ऊपरसे एक केलेका पत्ता ढक देवे और ऊपरसे गोबरसे दबा देवे । इस प्रकार करनेसे पर्पटी तय्यार होजाती है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ पश्चात्संचूर्णयेत्खल्ले निर्गुण्ड्या भावयेद्दिनम् । जयन्ती त्रिफला कन्या वासाभार्गीकटुत्रिकैः॥६५॥ भृङ्गाग्निमूलमुण्डीभिर्भावयेद्दिनसप्तकम् । अङ्गारैः स्वेदयेत्किञ्चित्पर्पटारख्यो महारसः ॥ ६६ ॥ चतुर्गुञ्जामितं भक्ष्यं सम्यक् श्लेष्मज्वरं जयेत् । पथ्याशुण्ठ्यमृताक्वाथमनुपानं प्रयोजयेत् ॥ ६७ ॥ इस पर्पटीको खरलमें पीसकर सम्हालूके रसमें एक दिन भावना देवे । फिर जयन्ती, त्रिफला, घीकुमार, अडूसा, भारंगी, त्रिकुटा, भांगरा, चित्रककी जड़ और गोरखमुंडी इन सब औषधियोंके क्वाथ और रसमें सात दिन भावना देकर प्रज्वलित अंगारोंपर किंचित् तप्त करे । इसको पर्पटी रस कहते हैं. इसमेंसे चार रत्ती प्रमाण हरड,
( १२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सोंठ और गिलोयके क्वाथके साथ सेवन करनेसे कफज्वर सर्वथा नष्ट होजाता है ॥ ६६-६७ ॥ वातपित्तान्तक रस । मृतसूताभ्रमुस्तार्कतीक्ष्णमाक्षिकतालकम् । गन्धकं मर्दयेत्तुल्यं यष्टीद्राक्षामृतारसैः ॥ ६८ ॥ धात्रीशतावरीद्रावैर्द्रवैः क्षीरविदारिजैः । दिनंदिनं विभाव्याथ सिताक्षौद्रयुता वटी ॥ ६९ ॥ माषमात्रं निहन्त्याशु वातपित्तज्वरं क्षयम् । दाहं तृषां भ्रमं शोषं वातपित्तान्तको रसः ॥ सिताक्षीरं पिबेच्चानु यष्टीक्वाथसितायुतम् ॥ ७० ॥ पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, नागरमोथा, तांबेकी भस्म, लोहेकी भस्म, शुद्ध सोनामाखीभस्म, हरितालकी भस्म और शुद्ध गंधक यह सब औषधियें समान भाग लेकर अच्छे प्रकारसे खरल करे फिर मुलैठी, दाख, गिलोय, आमले, सतावर और दूधविदारी इन सब औषधियोंके क्वाथ और रसमें एक एक दिन भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको शर्करा और शहदके साथ सेवन करनेसे वातपित्तज्वर, क्षय, दाह, तृषा, भ्रम और शोष आदि अनेक रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिको सेवन करके मिश्री मिला दूध मिश्री मिला मुलैठीका क्वाथ पान करे । इसको वात- पित्तान्तक रस कहते हैं ॥ ६८-७० ॥ विश्वेश्वर रस । मृतसूतार्कतीक्ष्णञ्च तालं गन्धञ्च कट्फलम् । मेषशृङ्गी वचा शुण्ठी भार्गी पथ्या च बालकम्॥७१॥ धान्यकं मर्दयेत्तुल्यं पर्पटोत्थद्रवैर्दिनम् । मद्यं माषं लिहेत्क्षौद्रैः कफपित्तमदात्यये ॥ ७२ ॥
भाषाटीकासहित । ( १२३ ) रसो विश्वेश्वरो नाम प्रोक्तो नागार्जुनेन च । काकमाचीरसं चानु सैन्धवेन युतं पिबेत् ॥७३॥ पारेकी भस्म, तांबेकी भस्म, लोहेकी भस्म, शुद्ध हरितालभस्म, शुद्ध गंधक, कायफल, मेढाशिंगी, वच, सोंठ, भारंगी, हरड़, सुगंध- वाला और धनिया यह सब औषधि समान भाग लेकर पित्तपापड़ेके क्वाथमें अच्छे प्रकार खरल करके एक दिन भावना देवे । फिर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । नित्य प्रति एक गोली शहदके साथ सेवन करनेसे कफज्वर, पित्तज्वर और मदात्ययरोग नष्ट होता है । इस औषधिका सेवन करके मकोयके रसको सेंधानमकके साथ पान करे । इसको विश्वेश्वर रस कहते हैं । इसको स्वयं नागार्जुनसिद्धने कहा है ॥ ७१–७३ ॥ शीतारि रस । पारदं गन्धकं शुद्धं टंकणञ्च समं समम् । पारदाद् द्विगुणं देयं जैपालं तुषवर्जितम् ॥ ७४ ॥ सैन्धवं मरिचं चिञ्चात्वग्भस्मशर्करापि च । प्रत्येकं सूतकं तुल्यं जम्बीरैर्मर्दयेद्दिनम् ॥ ७५ ॥ द्विगुञ्जस्तप्ततोयेन वातश्लेष्मज्वरापहः । रसः शीतारिनामायं शीतज्वरहरः परः ॥ ७६ ॥ पारा, गंधक और सुहागा यह सब औषधि समान भाग लेवे; शुद्ध जमालगोटे दो भाग लेवे तथा सेंधानमक, कालीमिरच, इमलीकी छालकी भस्म और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, इन सबको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिकी एक एक गोली गरम जलके साथ पान करनेसे वातश्लेष्मज्वर और शीतज्वर नष्ट होता है । इसका नाम शीतारि रस है ॥ ७४–७६ ॥
( १२४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । चिन्तामणि रस । रसविषगन्धकटंकणताम्रयवक्षारकव्योषम् । तालकफलत्रयञ्च क्षौद्रैः खलु शतं वारान् ॥ ७७ ॥ संमर्द्य रक्तिकामितवटिकाः कार्या भिषग्भिः प्राज्ञैः । शुण्ठीपिष्टेन सममेकां द्वे वाथवा तिस्रःसंप्राश्याः७८ पारा, विष, गन्धक, सुहागा, तांबेकी भस्म, जवारखार, त्रिकूटा, हरिताल और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर शहदमें अच्छे प्रकारसे १०० सौ वार खरल करके विद्वान् वैद्य एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । रोगीके दोषोंके बलाबलको विचार कर एक अथवा दो या तीन गोली सोंठके समभाग चूर्णमें मिलाकर देवे ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ नारिकेलजलमनुपेयं सेव्येतसैन्धवं जीरं तक्रं पथ्यं प्रयोक्तव्यम् । प्रशमयति सन्निपातज्वरं तथा जीर्णज्वरं विविधञ्च ॥ ७९ ॥ प्लीहानं चाध्मानकं कासं श्वासं वह्निमान्द्यञ्च । चिन्तामणी रसोऽयं किल स्वयं भैरवेन निर्दिष्टः ॥ ८० ॥ और ऊपरसे नारियलका जल पान करे । इस पर सेंधानम और जीरेका चूर्ण मिलाकर तक्रका पथ्य करे । इन गोलियोंके सेवन कर- नेसे सन्निपातज्वर, अनेक प्रकारका जीर्णज्वर, प्लीहा, आध्मान, खाँसी, श्वास और मंदाग्नि आदि अनेक रोग नष्ट होते हैं । यह चिन्तामणि रस स्वयं भैरवने निर्माण किया है ॥ ७९ ॥ ८० ॥ रसं गन्धं विषं लोहं धूर्त्तबीजन्तु तत्समम् । द्वौ भागौ ताम्रवह्निं च व्योषचूर्णञ्च तत्समम् ॥८१॥ जम्बीरस्य च मज्जाभिरार्द्रकस्य रसैर्युतम् । अस्यानुपानेन वटी ज्वरे देया प्रयत्नतः ॥ ८२ ॥
भाषाटीकासहित । ( १२५ ) गुञ्जाद्वयं वटीं खादेत्सद्योज्वरं व्यपोहति । वातिकं पैत्तिकञ्चापि श्लैष्मिकं सान्निपातिकम्॥८३॥ ऐकाहिकं द्व्याहिकञ्च चातुर्थिकविपर्ययम् । असाध्यञ्चापि साध्यञ्च ज्वरञ्चैवातिदुस्तरम् ॥ ८४॥ अग्निमान्द्येऽप्यजीर्णे च आध्मानेऽनिलसम्भवे । अतिसारे छर्दिते च अरोचकनिपीडिते ॥ ८५ ॥ ज्वरान्सर्व्वान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा । चिन्तामणिरसो नाम सर्व्वज्वरं व्यपोहति ॥ ८६ ॥ अन्यमत–पारा १ भाग, गंधक १ भाग, विष १ भाग, लोहभस्म १ भाग, धतूरेके बीज ४ भाग, तांबेकी भस्म २ भाग, चीतेकी जड़ २ भाग और त्रिकुटेका चूर्ण २ भाग लेवे, इन सबको एकत्र करके जम्भीरीनींबूकी मज्जा (गुद्दा) और अदरखके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। प्रतिदिन एक गोली उचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे शीघ्र ही ज्वर नष्ट हो जाता है। इस औषधिके सेवनसे वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक, ऐकाहिक, द्व्याहिक, त्र्याहिक, चातुर्थिक और इनके विपर्यय ज्वर एवं साध्य और असाध्य, अत्यंत दुस्तरज्वर, मंदाग्नि, अजीर्ण, आध्मान, अतीसार, वमन और अरुचि विनष्ट होती हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे सूर्योदयसे अंधकार नाश होनेके समान सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं। इसको चिंतामणि रस कहते हैं ॥ ८१–८६ ॥ अथ सन्निपातज्वर पर । कुलवधू । शुद्धसूतं मृतं ताम्रं मृतं नागं मनःशिला । तुत्थकं तस्य तुल्यांशं दिनमेकं विमर्दयेत् ॥ ८७ ॥
( १२६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । द्रवैश्चोत्तरवारुण्याश्चणमात्रा वटी कृता । सन्निपातं निहन्त्याशु नस्यमात्रेण दारुणम् । एषा कुलवधूनाम जले घृष्ट्वा प्रयोजयेत् ॥ ८८ ॥ अब सन्निपातज्वरकी चिकित्सा कहते हैं-शुद्ध पारा, तांबेकी भस्म, सीसेकी भस्म, शुद्ध मैनशिल और शुद्ध तूतिया यह सब औषधि समान भाग लेकर इन्द्रायनकी जड़के रसमें एक दिन खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे । एक गोलीको जलमें घिसकर नास देवे । इससे घोरतर सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ८७ ॥ ८८ ॥ जयमंगल रस । भस्मसूताभ्रकं तारं मुण्डतीक्ष्णालमाक्षिकम् । वह्निटंकणकव्योषं समं संमर्दयेद्दिनम् ॥ ८९ ॥ पाठानिर्गुण्डिकायष्टीबिल्वमूलकषायकैः । ततो मूषागतं रुद्ध्वा विपचेद्भूधरे पुटे ॥ ९० ॥ माषैकं दशमूलस्य कषायेण प्रयोजयेत् । अञ्जनेनाथवा नस्यात्सन्निपातं जयेद् ध्रुवम् ॥ ९१ ॥ पारद भस्म या रससिन्दूर, अभ्रककी भस्म, चांदीकी भस्म, मुण्ड- लोह भस्म, तीक्ष्णलोह भस्म, हरिताल भस्म, सोनामाखी भस्म, चित्र- ककी जड़, सुहागा और त्रिकुटा यह सब औषधि समान भाग लेकर पाठ, सम्हालू, मुलैठी और बेलकी जड़के क्वाथमें एक दिन खरल करके सुखा लेवे । फिर मूषामें बंद करके भूधर यन्त्रमें पुटपाककी विधिसे पकावे । इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि लेकर दशमूलके क्वाथसे सेवन करे । अथवा अंजन अथवा नस्यमें प्रयोग करनेसे सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ८९-९१ ॥ नस्य भैरव । मृतसूतार्कतीक्ष्णाग्निं टंकणं खर्परं समम् ।
भाषाटीकासहित । ( १२७ ) सव्योषमर्कदुग्धेन दिनं संमर्दयेद्दृढम् । अर्कक्षीरयुतं नस्यं सन्निपातहरं परम् ॥ ९२ ॥ पारद भस्म या रससिन्दूर, तांबेकी भस्म, तीक्ष्णलोह भस्म, चीतेकी जड़, सुहागा, खपरिया और त्रिकुटा यह सब औषधि समान भाग लेकर आकके दूधमें एक दिन खरल करके गोली बनावे । फिर इन गोलियोंको आकके दूधमें भावना देकर नस्य ग्रहण करे तो सन्नि- पातज्वर नष्ट होता है ॥ ९२ ॥ अंजन भैरव । सूततीक्ष्णकणागन्धमेकांशं जयपालकम् । सर्वैस्त्रिगुणितं जम्बुवारिणा च सुपेषितम् ॥ नेत्राञ्जनेन हन्त्याशु सर्वोपद्रवमुद्धतम् ॥ ९३ ॥ पारा, तीक्ष्णलोह भस्म, पीपल और गंधक यह सब औषधि एक एक भाग और जमालगोटे सबसे तिगुने लेवे, इन सबको एकत्र करके जामुनके रसमें खरल करके नेत्रोंमें आंजनेसे सन्निपातज्वर और अत्यंत वृद्धिको प्राप्त हुए सन्निपातके उपद्रव दूर होते हैं ॥ ९३ ॥ गन्धेशं लशुनाम्भोभिर्मर्दयेद्याममात्रकम् । तस्योदकेन संयुक्तं नस्यं तत्प्रतिबोधकृत् । मरिचेन समायुक्तं हन्ति तन्द्राप्रलापकान् ॥ ९४ ॥ गंधक १ भाग और पारा १ भाग इन दोनोंकों एकत्र खरल करके कज्जली बनावे । फिर लहसुनके रसमें एक प्रहर खरल करे । फिर इसको लहसुनके रसमें मिलाकर नस्य देनेसे संज्ञा रहित सन्निपात रोगी भी संज्ञाको प्राप्त होता है । काली मिर्चोंके साथ इस औषधिकी नस्य देनेसे तन्द्रा और प्रलाप दूर होते हैं । इसे अंजनरस कहते हैं॥९४
: it looks like 'आं'! Wait, DOES it look like 'आ'? Wait, let me look really closely at : "मासे, धतूरेके पत्तोंका रस ४ मासे, [???] रस ४" Wait: Character 1: looks like 'भ'? No, wait, look at 'अ' in 'अंजन' [L5, L8]: Top curve, bottom curve, middle bar connecting to vertical line. In : top curve, bottom curve, middle bar connecting to vertical line, then an 'ा' (aa matra) with an anusvara 'ं' on top! Wait, is that 'आं'?! Why would it be 'आंगरेका'? Wait, could it be 'भांगरेका'? Look at the top of the character: Is there a loop like 'भ'? No! There is NO loop! Wait, is there an open top like 'भ'? No, the top bar covers the entire letter, just like 'अ' or 'आ' (or wait, in modern Hindi sometimes 'भ' is covered, but here top bar of 'भ' in 'भाग' has a broken bar!). In 'भाग' , the top bar is broken over the left of 'भ'! In 'भांगरेका'? The top bar is NOT broken, OR is it? Wait, look at the left
भाषाटीकासहित । ( १२९) ज्वर और कोष्ठगतज्वर नष्ट होते हैं। जो इस औषधिके सेवन कर- नेसे शरीरमें सन्ताप हो तो नारियलका जल पीना चाहिये। जो राईकी बराबर गोली गुण न करे तो एक एक रत्तीकी गोली बनावे। इसको सन्निपातनाशक त्रैलोक्यसुन्दर रस कहते हैं ॥ ९६-९९ ॥ स्वच्छन्द भैरव रस । रसगन्धकयोः शाणं प्रत्येकं कज्जलीकृतम् । सुवर्णमाक्षिकं शाणं शुद्धञ्चैकत्र कारयेत् ॥१००॥ रुद्रजटा सिन्दवारो नागरामलकी तथा । विषकण्टालिका चैषां स्वरसं शाणमात्रकम्॥१०१॥ दत्त्वा संशोध्य संमर्द्य कार्या मुद्गसमा वटी । आर्द्रकस्य रसैः पेया जीरकञ्चानु भक्षयेत् ॥१०२॥ स्वच्छन्दो भैरवाख्योऽयं सन्निपातोग्रहन्मतः । ग्रहणीसूतिकातङ्कं नाशयेदविचारतः ॥ १०३ ॥ पारा ४ मासे और गन्धक ४ मासे लेवे दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर उसमें ४ मासे शुद्ध सोनामाखीभस्म फिर रुद्रजटा, सम्हालू, सोंठ, आमले और बांझककोड़े इन प्रत्येकके चार चार मासे स्वरसमें खरल करके मूंगके बराबर गोलियें बनावे। इनमेंसे एक गोली अदर- खके रसके साथ खावे ऊपरसे थोड़ासा जीरा चबावे तो यह स्वच्छन्द भैरव रस उग्र सन्निपातको दूर करता है एवं ग्रहणी तथा प्रसूति रोगको झट नष्ट कर देता है ॥ १००-१०३ ॥ शीतांग सन्निपातके लक्षण । शीतं शरीरं शीताङ्गे छर्द्यतीसारकम्पनम् । क्षुद्विघातोऽङ्गमर्दश्च हिक्का श्वासः श्रमोऽरतिः ॥ सर्वांगशिथिलत्वञ्च सन्निपाते प्रजायते ॥१०४॥
( १३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शीतांग सन्निपातमें मनुष्यका शरीर अत्यंत शीतल होता है, तथा वमन, अतिसार, कम्प, क्षुधाका नाश, अंगमर्दन, शरीरकी पीड़ा, हिचकी, श्वास, श्रम, बेचैनी और संपूर्ण शरीरमें शिथिलता होती है ॥ १०४ ॥ आनन्द भैरव । हिंगुलञ्च विषं व्योषं मरिचं टंकणं कणा । जातीकोषसमं चूर्णं जम्बीरद्रवमर्दितम् ॥ १०५ ॥ रक्तिमानां वटीं कुर्यात्खादेदार्द्रकसंयुताम् । वटीद्वयं त्रयं वापि सन्निपाते सुदारुणे ॥ १०६ ॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति तथाऽतीसारनाशनः । जीर्णज्वरहरश्चैव तथा सर्वाङ्गभेदकः ॥ १०७॥ सिंगरफ, विष, त्रिकुटा, कालीमिरच, सुहागा, पीपल और जाय- फल यह सब औषधि समान भाग लेकर जम्भीरीनींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंमेंसे दो गोली अथवा तीन गोली लेकर अदरखके साथ घोरतर सन्निपातज्वरमें देवे । यह औषधि आठ प्रकारके ज्वर, अतिसार, जीर्णज्वर, शरीर- भेद और आमवातादि रोगोंको नष्ट करती है । इसको आनन्दभैरव कहते हैं ॥ १०५-१०७ ॥ आनंद भैरवी । विषं त्रिकटुकं गन्धं टंकणं मृतशुल्वकम् । धूस्तूरस्य च बीजानि हिंगुलं नवमं स्मृतम् ॥१०८॥ एतानि समभागानि दिनैकं विजयाद्रवैः । मर्दयेच्चणकाभां तु वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १०९ ॥
भाषाटीकासहित । ( १३१ )
भक्षयेच्च पिबेच्चानु रविमूलकषायकम् । सव्योषं हन्ति नो चित्रं सन्निपातं सुदारुणम् ॥११० विष, त्रिकुटा, गंधक, सुहागा, ताम्रभस्म, धतूरेके बीज और सिंगरफ यह नव ९ औषधि समान भाग लेकर भांगके रसमें अथवा जयंतीके रसमें खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे। एक गोली खाकर और ऊपरसे आककी जड़का क्वाथ पीवे। त्रिकुटेके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे घोरतर सन्निपातज्वर नष्ट होता है। इसको आनन्दभैरवीरस कहते हैं ॥ १०८-११० ॥ शीतांगे सन्निपाते वा सामान्ये वा त्रिदोषजे । धान्याकं पिप्पली शुण्ठी कटुकी कण्टकारिका॥११॥ पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं चतुर्गुञ्जा च पर्पटी । सन्निपातज्वरं हन्ति वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ १२ ॥ मूलञ्च कटुरोहिण्याः समं बिल्वं सजीरकम् । दध्ना पिष्टं पिबेच्चानु वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ १३ ॥ धनिया, पीपल, सोंठ, कुटकी और कटेरीके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर शीतांग सन्निपात अथवा साधारण सन्निपातमें इन आनन्दभैरवी गोलियोंका सेवन करना चाहिये । अथवा चार रत्ती परिमाण पर्पटी रसको लेकर इसी अधिकारमें कहे हुए इसी क्वाथसे सेवन करे तो सन्निपातज्वर नष्ट होता है । समान भाग कुटकीकी जड़, बेल और जीरा इन औषधियोंको दहीमें पीसकर आनन्दभैरवी- रसके अंतमें अनुपान सेवन करे ॥ ११-१३ ॥ सन्निपातातिसारघ्नी पथ्यं शाकविवर्जितम् । आनन्दभैरवीं पीत्वा क्वाथं वरुणसम्भवम् ॥ १४ ॥ पाययेदश्मरीं हन्ति सप्तरात्रान्न संशयः । वागुजीसम्भवैस्तैलैर्वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १५ ॥
( १३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लेहयेन्निष्कमात्रान्तु गलत्कुष्ठञ्च नाशयेत् । दधिमस्तुसिताक्षौद्रैः वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १६ ॥ भक्षयेन्मूत्रकृच्छ्रार्त्तो यवक्षारं सितान्वितम् । गोदुग्धं कथितञ्चानु शीतलं मधुना पिबेत् ॥ १७ ॥ गुञ्जामूलं पिबेत्क्षीरैरनुपानं प्रशस्यते । अनेन चानुपानैन वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ देया रुद्रजटाक्षौद्रैः सर्वमेहप्रशान्तये ॥ १८ ॥ इस आनन्दभैरवी गोलीके सेवन करनेसे त्रिदोषज अतीसार नष्ट होता है । इस औषधि पर शाकरहित पथ्य सेवन करे । इस औष- धिका सेवन करके ऊपरसे वरनेकी छालका क्वाथ पान करनेसे सात दिनमें अश्मरीरोग नष्ट होता है । बावचीके तेलके साथ निष्क प्रमाण इस औषधिके सेवन करनेसे गलत्कुष्ठ नष्ट होता है । मूत्रकृच्छ्ररोगी दहीके तोड़, मिश्री
भाषाटीकासहित । ( १३३ ) शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक १ भाग और शुद्ध विष आधा ,भाग लेवे । इन सब औषधियोंको मुसलीके रसमें तीन दिन तक खरल करे, फिर एक आतशी शीशीमें भरकर उसका मुख बंद करके ऊप- रसे सात वार कपड़मिट्टी करके सात वार सुखावे, पश्चात् कुम्भीपुटमें पकावे, जब स्वांगशीतल होजावे तब उसमेंसे निकाल कर एक दिन खरल करे ॥ १९-२१ ॥ अजाजीजीरकं हिंगुसर्जिकाटङ्गणैर्युतम् । गुग्गुलुः पञ्चलवणं यवक्षारो यमानिका ॥ २२ ॥ मरिचं पिप्पली चैव प्रत्येकञ्च समांशतः । एषां कषायेण पुनर्भावयेत्सप्तधाऽऽतपे ॥ २३ ॥ नागवल्लीदलैर्युक्तं पञ्चगुञ्जं रसेश्वरम् । दद्यान्नवज्वरे तीव्रे कोष्णं वारि पिबेदनु ॥ २४ ॥ प्राणेश्वररसो नाम्ना सन्निपातप्रकोपजित् । शीतज्वरे दाहपूर्वे गुल्मे शूले त्रिदोषजे ॥ २५ ॥ वाञ्छितं भोजनं दद्यात्कुर्याच्चन्दनलेपनम् । तावदेव प्रशमनो नानातीसारनाशनः । भवेच्च नात्र संदेहः स्वास्थ्यञ्च लभते नरः ॥ २६ ॥ फिर कालाजीरा और सफेद जीरा, हींग, सज्जी, सुहागा, गूगल, पांचों नमक, जवाखार, अजवायन, कालीमिरच और पीपल यह सब औषधि समान भाग लेकर क्वाथ बनाकर इनके क्वाथमें सात वार भावना देकर धूपमें सुखावे । इसमेंसे पांच रत्ती औषधि लेकर पानमें रखकर खावे और ऊपरसे गरम जल पीवे । इसको प्राणेश्वर रस कहते हैं । इसके सेवन करनेसे नवज्वर, सन्निपातज्वर, शीतज्वर, दाहपूर्वकज्वर, गुल्म, शूल और त्रिदोषज रोग नष्ट होते हैं । इसका सेवन करके इच्छानुसार पथ्य सेवन करे और शरीर पर चन्दनादिक
( १३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लेप करे। यह औषधि अनेक प्रकारके अतिसारोंको नष्ट करती है तथा स्वस्थताको उत्पन्न करती है ॥ २२-२६ ॥ सन्निपातभैरव । ताम्रं गन्धं रसं श्वेतगुञ्जा मरिचपूतना । समीनपित्तजैपालांस्तुल्यानेकत्र मर्दयेत् ॥ २७ ॥ गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य नवज्वरहरं परम् । ज्वरांकुशः सन्निपातभैरवोऽयं प्रकाशितः ॥ २८ ॥ तांबा भस्म, गंधक, पारा, सफेदचोंटली, कालीमिरच, हरड़, रौहू- मछलीका पित्ता और जमालगोटे इन सबको समान भाग लेकर एकत्र अच्छे प्रकारसे खरल कर इस औषधिको चार रत्ती परिमाण सेवन करनेसे तत्काल नवीनज्वर नष्ट होजाता है। यह ज्वररूपी हस्तीके लिये अंकुशके समान है। इसको सन्निपातभैरव रस कहते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥ शीतभञ्जी रस । रसो हिंगुलगन्धश्च जैपालं सम्मितं त्रिभिः । दंतीक्वाथेन संमर्द्य रसो ज्वरहरः परः ॥ २९ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव दापयेद्रक्तिकाद्वयम् । नवज्वरं महाघोरं नाशयेद्याममात्रतः ॥ १३० ॥ शर्करादधिभक्तञ्च पथ्यं देयं प्रयत्नतः । शीततोयं पिबेच्चानु इक्षुमुद्गरसो हितः । शीतभञ्जीरसो नाम सर्वज्वरकुलांतकः ॥ ३१ ॥ पारा, सिंगरफ और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और जमालगोटे तीन भाग लेवे, इन सबको एकत्र दंतीके क्वाथमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। एक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारका ज्वर नष्ट होता है।