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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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नृसिंहषट्चक्रोपनिषत्

ॐ देवा हः वै सत्यं लोकमायंतं प्रजापतिमपृच्छन्नार- सिंहचक्रन्नो ब्रूहीति । तान्प्रजापमिनार्रसिंहचक्रमवोचत् । षड् वै नार्सिंहानि चक्राणि भवन्ति । यत् प्रथमं तच्चतुररं यद्वितीयं तच्चतुररं यत्तृतीयं तदष्टारं यच्चतुर्थं तत्पञ्चारं यत्पञ्चमं तत्पञ्चारं यत् षष्ठं तदष्टारं तदेताति षडेव नार्सिहानि चक्राणि भवन्ति ॥ अथ कानि नामानि भवन्ति । यत् प्रथमं तदाचक्रं यद्- द्वितीयं तत्सुचक्रं यत्तृतीयं तन्महाचक्रं यच्चतुर्थं यत्सकललोक- रक्षणचक्रं यत्पञ्चमं तद्द्यूतचक्रं यद्वै षष्ठं तदसुरान्तकचक्रं तदेतानि षडेव नारसिंहचक्रनामानि भवन्ति ॥ अथ कानि त्रीणि वलयानि भवन्ति । यत्प्रथमं तदान्तर- वलयं भवति । यद्द्वितीयं तन्मध्यमवलयं भवति । यत् तृतीयं तद्बाह्यं वलयं भवति । तदेतानि त्रीण्येव वलयानि भवन्ति । यदा तद्धैतद्बीजं यन्मध्यमं तां नारसिंहगायत्रीं यद्बाह्यं तन्मन्त्रः ॥ अथ किमान्तरं वलयम् । षड्वान्तराणि वलयानि भवन्ति । यन्नारसिंह तत्प्रथमस्य यन्माहालक्ष्म्यं तद्द्वितीयस्य यत्सारस्वतं तत्तृतीयस्य यस्य यत्कामं देवं तच्चतुर्थस्य यत् प्रणवं तत्पञ्चमस्य तत्क्रोधदैवतं तत् षष्ठस्य । तदेतानि षष्णां नारसिंहचक्राणां षडा- न्तराणि वलयानि भवन्ति ॥ ॐ देवताओं ने सत्य स्वरूप व्यापक लोकपिता प्रजापति से कहा हमें नारसिंह चक्र का उपदेश करो । तब उन्हें प्रजापति ने नारसिंह चक्र का उपदेश दिया, जो इस प्रकार है कि नारसिंह चक्र छः हैं । पहला चक्र चार 'अर' वाला ( तांगे आदि के पहियों में जो गोलाकार रूप से Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

[३६८ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत्

कई बारीक-बारीक डण्डे जुड़े रहते हैं उसे अर कहते हैं ) दूसरा भी चार ही अर वाला, तीसरा आठ, चौथा पांच, पांचवां भी पांच अर वाला छठा आठ अर वाला है। सो इस प्रकार छः ही नारसिंह चक्र होते हैं। यह पूछे जाने पर कि उनके नाम क्या हैं ? प्रजापति ने उत्तर दिया—पहला आचक्र, दूसरा सुचक्र, तीसरा महाचक्र, चौथा सकल लोक रक्षण, पांचवां द्यूतचक्र एवं छठा असुरान्तचक्र के नाम प्रसिद्ध है । तो ये छः नारसिंह चक्रों के नाम हैं । ये पूछने पर कि उसके तीन वलय ( वेष्टन ) कौन-कौन हैं ? प्रजापति ने उत्तर दिया पहला आन्तर, दूसरा मध्यम, तीसरा बाह्य । ये तीन ही वलय हैं। इनमें जो मध्यम बीज है वह नारसिंह गायत्री एवं जो बाह्य है वह मन्त्र है। आन्तर वलय कितने हैं ? यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा— आन्तर वलयों की संख्या छः है । नारसिंहम् पहले का, महालक्ष्म्यं का, सारस्वत तीसरे का, जिसका जो नष्ट देव हो वह चौथे का, प्रणव ( ओंकार ) पांचवे का, क्रोध दैवत छठे का नाम है। सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः आन्तर वलय हुआ करते हैं । अथ किं मध्यमं वलयम् । षड्वै मध्यमानि वलयानि भवन्ति । यन्नारं॑सिहाय तत्प्रथमस्य यद्विद्महे तद्द्वितीयस्य यद्व- ञ्रनखाय तत्तृतीयस्य यद्धीमहि तच्चतुर्थस्य यत्तन्नस्तत्पंचमस्य यत्सिंहः प्रचोदयादिति तत् षष्ठस्य । तदेतानि षण्णां नारसिंह चक्राणां षण्मध्यमानि वलयानि भवन्ति ॥ अथ किं बाह्यं वलयम् । षड्वै बाह्यानि वलयानि भवन्ति । यदाचक्रं यादात्मा तत्प्रथमस्य यत्सुचक्रं यत्प्रियात्मा तद्द्वितीयस्य यन्महाचक्रं यज्ज्योतिरात्मा तत्तृतीयस्य यत्सकल- लोकरक्षणचक्रं यन्मायात्मा तच्चतुर्थस्य यदाचक्रं यद्योगात्मा तत्पञ्चमस्य यदसुरान्तकचक्रं यत्सत्यात्मा तत् षष्ठस्य । तदेतानि षण्णां नारसिंहचक्राणां षट बाह्यानि वलयानि भवन्ति ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

मध्यम वलयों की कितनी संख्या है ? यह जब पूछा तो प्रजा- पति ने उत्तर दिया-मध्यम वलयों की संख्या भी छः ही है । 'नारसिंहाय' प्रथम का 'विद्महे' दूसरे का 'वज्रनखाय' तीसरे का 'धीमहि' चौथे का 'तन्नः' पांचवे का 'सिंहः प्रचोदयात्' छठे का नाम है । सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः वलय होते हैं । बाह्य वलय कितने तथा क्या हैं ! इसका उत्तर दिया कि वाह्य वलय भी छः ही होते हैं। जो आचक्र तथा आत्मा है वह पहले का, जो सुचक्र तथा प्रियात्मा है वह दूसरे का, जो महाचक्र तथा ज्योतिरात्मा वह तीसरे का, जो सकल लोक रक्षण चक्र तथा मायात्मा है वह चौथे का, जो आचक्र तथा योगात्मा है वह पांचवें का, जो असुराम्त चक्र तथा सत्यात्मा है वह छठे का नाम है । सो ये छः नारसिंह चक्रों के छः बाह्य वलय हैं । क्व तानि न्यस्यानि । यत्प्रथमं तद्धृदये यद्द्वितीयं तच्छि- रसि यत्तृतीयं तच्छिखायां यच्चतुर्थं तत्सर्वेष्वङ्गेषु यत्पंचमं तत्सर्वेषु [!] यत् षष्ठं तत्सर्वेषु देशेषु । य एतानि नारसिंहानि चक्राण्येतेष्वङ्गेषु बिभृयात् तस्यानुष्टुप् सिध्यति । तं भगवान् नृसिंहः प्रसीदति । तस्य कैवल्यं सिध्यति । तस्य सर्वे लोकाः सिध्यन्ति । तस्य सर्वे जनाः सिध्यन्ति । तस्मादेतानि षण्णां नारसिंहचक्राण्यङ्गेषु न्यस्यानि भवन्ति । पवित्रं एतत्तस्य न्यसनम् । न्यसनान्नृसिंहानन्दो भवति । कर्मण्यो भवति । ब्रह्मण्यो भवति । अन्यसानान्न नृसिंहानन्दी भवति । न कर्मण्यो भवति । तस्मादेतत्पवित्रं तस्य न्यसनम् ॥ यो वा एतं नरसिंहं चक्रमधीते स सर्वेषु वेदेष्वधीतो भवति । स सर्वेषु यज्ञेषु याजको भवति । स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति । स सर्वेषु मन्त्रेषु सिद्धो भवति । स सर्वत्र शुद्धो भवति । स सर्वरक्षो भवति । भूतपिशाचशाकिनीप्रेतवन्ताक- नाशको भवति । तदेतन्नाश्रद्दधानाय प्रब्रूयात्तदेतन्नाश्रद्दधाय प्रब्रूयादिति ॥

४०० ] [ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत् ये कहाँ रखने चाहिये इनका न्यास कहाँ करना चाहिये ? यह पूछने पर उत्तर दिया कि—जो पहला है वह हृदय में, जो दूसरा है वह शिर में, जो तीसरा है वह शिखा में, जो चौथा है वह सभी अङ्गों में, जो पाँचवाँ वह सभी (१) जो छठा वह सभी देशों में धारण करने चाहिये । जो इन नारसिंह चक्रों को इन-इन अङ्गों में धारण करता है, उसे अनुष्टुप सिद्धि हो जाती है । उसके ऊपर भगवान् नृसिंह प्रसन्न होते हैं । उसे मोक्ष प्राप्त होती है । उसे सभी लोक सिद्ध होते हैं ( प्राप्त होते हैं ) सभी लोग उसे सिद्ध होते हैं ( उसके वश में हो जाते हैं ।) सो ये छः नारसिंह चक्रों के अङ्गों में न्यास के स्थान हैं। इनका न्यास अत्यन्त पवित्र है इनके न्यास से मनुष्य नृसिंह को आनन्द देने वाला, कर्मण्य, ब्रह्मज्ञाता हो जाता है । इसके विना न्यास के नृसिंह आनन्दित नहीं होते और मनुष्य कर्मण्य ही हो सकता है, सो यह अत्यन्त पवित्र हैं इनका न्यास ही अत्यन्त पवित्र है । जो इस नारसिंह चक्र का अध्ययन करता है वह सभी वेदों का अध्ययनकर्ता समझा जाता है। वह सभी यज्ञों का कर्त्ता समझा जाता है अर्थात् वह सभी यज्ञ कर चुका यह माना जाता है । उसने सभी तीर्थों में स्नान भी कर लिया । उसे सभी मन्त्रों की सिद्धियाँ भी प्राप्त हो जाती हैं । वह सभी जगह शुद्ध हो जाता है । वह सबकी रक्षा करने वाला होता है। भूत, पिशाच, शाकिन, प्रेत तथा वंताक आदि भया वह योनियों का नाश करने वाला भी वह होता है ( उसके पास ये सब फटक नहीं सकते ।) वह निर्भय हो जाता है। इस नारसिंह चक्र का उपदेश श्रद्धाहीन को किसी भी अवस्था में नहीं करना चाहिए । ॥ नृसिंहषट्चक्रोपनिषत् समाप्त ॥ —:०:— Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri दक्षिणामूर्त्युपनिषत ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों एक साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्मावर्ते महाभाण्डीरवटमूले महासत्राय समेता महर्षयः शौनकादयस्त ह समित्पाणयस्तत्त्वजिज्ञासवो मार्कण्डेयं चिरञ्जीवि- नमुपसमेत्य पप्रच्छुः केन त्वं चिरं जीवसि केन वाऽऽनन्दमनु- भवसीति ॥ १ ॥ परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानेनेति स होवाच ॥ २ ॥ किं तत् परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानम् । तत्र को देवः । के मन्त्राः । का निष्ठा । किं तज्ज्ञानसाधनम् । कः परिकरः । को बलिः कः कालः । किं तत्स्थानमिति ॥ ३ ॥ स होवाच । येन दक्षिणामुखः शिवोऽपरोक्षीकृतो भवति तत् परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानम् ॥ ४ ॥ यः सर्वोपरमे काले सर्वान्त्मन्युपसंहृत्य स्वात्मानन्दसुखे मोदते प्रकाशते वा स देवः ॥ ५ ॥ ब्रह्मावर्त में महाभाण्डीर नामक बरगद के नीचे बड़े भारी दीर्घ- कालीन यज्ञ करने के लिये शौनकादि महाऋषि एकत्रित हुए तथा तत्त्व-ज्ञान की जिज्ञासा से हाथों में समिधायें लेकर (कुशहस्त होकर) चिरञ्जीवी मार्कण्डेय के पास आकर पूछा—महाराज ! आप कैसे Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

४०२ ]CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri[ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् चिरकाल से जीवित रह रहे हो ? तथा कैसे आप अपार आनन्द का अनुभव करते रहते हो ? । २ । तब उन्होंने उत्तर दिया कि परम गुप्त जो शिव-तत्व का ज्ञान है वही मेरे चिरजीवी होने में कारण है। २ । तब शौनकादि, ऋषि बोले—वह परम गुप्त शिवतत्व ज्ञान क्या वस्तु है ? उसका आराध्य कौन देवता है ? मन्त्र कौन से हैं ? आस्था क्या है ? उस ज्ञान के साधन कौन से हैं ? (क्या सामग्री चाहिये) क्या बलि उसमें अपेक्षित है ? क्या काल है ? उसकी प्राप्ति का स्थान कौन-सा है ? । ३ । मार्कण्डेय बोले—जिससे दक्षिणा मुख नामक शिव दृष्टिगोचर होते हैं वही परम गुप्त शिवतत्व ज्ञान है । ४ । जो सकल विश्व के समाप्ति के समय सारे चराचर को अपने अन्दर लीन करके अपने आप आत्मानन्द के सुख में प्रसन्न रहते हैं (अर्थात् आत्माराम हो जाते हैं ) तथा स्वयं प्रकाशित होते हैं वही इस तत्वज्ञान के देव हैं । ५ । अत्रैते मन्त्र रहस्यश्लोका भवन्ति अस्य श्रीमेधादक्षिणा- मूर्तिमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । देवता दक्षिणाऽऽस्यः । मन्त्रेणाङ्गन्यासः ॥ ६ ॥ ॐ आदौ नम उच्चार्य ततो भगवते पदम् । दक्षिणेति पदं पश्चान्मूर्तये पदमुद्धरेत् ॥७ अस्मच्छब्दं चतुर्थ्यन्तं मेधां प्रज्ञां पदं वदेत् । समुच्चार्य ततो वायुबीजं च्छं च ततः पठेत् ॥ अग्निजायां ततस्त्वेष चतुर्विंशाक्षरो मनुः ॥७ ध्यानम् स्फटिकरजतवर्णं मौक्तिकीमक्षमाला- ममृतकलशविद्यां ज्ञानमुद्रां कराग्रे । दधतमुरगकक्षं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं विधृतविविधभूषं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥८ मन्त्रेण न्यासः— आदौ वेदादिमुच्चार्य स्वराद्यं सविसर्गकम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

पञ्चार्णं तत उद्धृत्य अतरं सविसर्गकम् । अन्ते समुद्धरेत्तारं मनुरेष नवाक्षरः ॥६॥ मुद्रां भद्रार्थदात्रीं सपरशुहरिणं बाहुभिर्वाहुमेकं जान्वासक्तं दधानो भुजग विलसमाबद्धकक्ष्यो वटाधः । आसीनश्चन्द्रखण्डप्रतिघटिजटाक्षीरगौरस्त्रिनेत्रो दद्यादाद्यः शुकाद्यैर्मुनिभिरभिवृतो भावशुद्धिं भवो नः ॥१० इस विषय में मन्त्रों के रहस्य को प्रकट करने वाले श्लोक इस प्रकार हैं—इस मेधादक्षिणामूर्ति मन्त्र का ऋषि ब्रह्मा है, छन्द गायत्री है, तथा देवता दक्षिणामुख है। ६। ( मन्त्र के द्वारा अङ्गन्यास ) ( नीचे दिये गये श्लोकों से मन्त्र निकलता है । ) प्रारम्भ में 'ॐ नमः' उच्चारण करके तब 'भगवते' इस पद को पुनः 'दक्षिणा' यह शब्द फिर 'मूर्तये' यह पद तत्पश्चात अस्मद् शब्द का चतुर्थी का एक वचन अर्थात् 'मह्यं' पद एवं 'मेधां प्रज्ञां' इन पदों का उच्चारण करना चाहिये । 'प्र' उच्चारण कर तब वायु का बीज मन्त्र 'य' और उसके बाद 'च्छ' शब्द को पढ़े उसके बाद अग्निदेव की स्त्री अर्थात् 'स्वाहा' बोले—यही चौबीस अक्षर वाल मनु मन्त्र है । भावार्थ यह हुआ कि 'ॐ नमो भगवते दक्षिण मूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा' यह मन्त्र पढ़ना चाहिए । ७। (ध्यान) मैं ऐसी दक्षिणामूर्ति की स्तुति करता हूँ जो कि स्फटिक मणि तथा चाँदी के समान गोरे वर्ण वाली है तथा जिसके हाथ में ज्ञान की मुद्रा स्वरूप तथा अमृततत्वदात्री विद्या स्वरूपिणी मोतियों की माला है । एवं जिसके शरीर पर साँप घूम रहे हैं और जिसके सिर पर चन्द्रमा है तथा जिसकी तीन आँखें हैं तथा जो अनेकों वेषों की धारणा किये हुए है । ८ । मन्त्र द्वारा न्यास — प्रारम्भ में विसर्ग सहित स्वरों के आदि अक्षरों को एवं वेद के आदि अक्षर को अर्थात् 'ॐ' (अः उ म्) (ओ अः स्.) को पुनः पंचार्ण

४०४ ] [ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् अर्थात् 'दक्षिणामूर्तिः' शब्द को तत्पश्चात् विसर्ग सहित अतर शब्द को अर्थात् 'अतरः' को और अन्त में तार अर्थात् 'ॐ' का उच्चारण करे। यह नवाक्षर मनु-मन्त्र कहलाता है। ९। (ध्यान) ऐसे आद्य भगवान् शंकर हमें भावबुद्धि प्रदान करें जो कि शुकदेव आदि मुनियों से घिरे रहते हैं तथा जिनका एक हाथ कल्याणमय अभयदान की मुद्रा में है तथा अन्य दो हाथों में जिन्होंने फरसा तथा (हिरण) हरिण धारण कर रखा है। एवं जिनका एक हाथ जांघ पर रखा है तथा जो बरगद के नीचे बैठे हैं जिनके शरीर पर बड़े-बड़े साँप घूम रहे हैं। साथ ही दूज के चांद से जिनकी जटा सुशोभित है एवं जो कि दूध के समान गोरे रङ्ग के हैं तथा जिनकी तीन आँखें हैं। १०। मन्त्रेण न्यासः— तारं ब्लूं नम उच्चार्य मायां वाग्भवमेव च । दक्षिणापदमुच्चार्य यतः स्यान्मूर्तये पदम् ॥११ ज्ञानं देहि पदं पश्चाद्वह्न्रिजायां ततो न्यसेत् । मनुरष्टादशार्णोऽयं सर्वमन्त्रेषु गोपितः ॥१२ भस्मव्यापाण्डुराङ्गः शशिशकलधरो ज्ञानमुद्राक्षमाला- वीणापुस्तैर्विराजत्कमलधरो योगपट्टाभिरामः । व्याख्यापीठे निषण्णो मुनिवरनिकरैः सेव्यमानः प्रसन्नः सव्यालः कृत्तिवासाः सततमवतु नो दक्षिणामूर्तिरीशः ॥१३ मन्त्रेण न्यासः — तारं परां रमाबीजं वदेत् साम्बशिवाय च । तुभ्यं चानलजायां तु मनुर्द्वादशवर्णकः ॥१४ वीणां करैः पुस्तकमक्षमालां बिभ्राणमभ्रा भगलं वराढ्यम् । फणीन्द्रकक्ष्यं मुनिभिः शुकाद्यैः सेव्यं वटाधः कृत- नीडमीडे ॥ १५ ॥

दक्षिणामूर्त्युपनिषत् ] [ ४०५ प्रथम तारं अर्थात् 'ॐ' 'ब्लू' नमः' उच्चारण करके माया अर्थात् ह्रीं वाग्भव अर्थात् ऐं तथा दक्षिणा पद को कहकर पुनः 'मूर्तये' तथा 'ज्ञानंदेहि' और अन्त में 'अग्नि की स्त्री' अर्थात् 'स्वाहा' शब्द का उच्चारण करें अर्थात् 'ॐ' ब्लू नमो ह्रीं ऐं दक्षिणा मूर्तये ज्ञानं देहि स्वाहा' इस अठारह अक्षर वाले मनु मन्त्र का उच्चारण करे । यह सब मन्त्रों में अत्यन्त गोपनीय है । ११-१२ । (ध्यान) भस्म से जिनका सारा शरीर सफेद हो रहा है तथा जो कि चन्द्रमा के टुकड़े को धारण किये हैं एवं जो करकमल में ज्ञानमुद्रा (अभयदान की मुद्रा) रुद्राक्ष माला, वीणा एवं पुस्तक को धारण किये हैं तथा जो कि योगियों के पास रहने वाले पट्ट से (लकड़ी का बना हुआ भुजाटेकने का) सुशोभित हैं। एवं जो कि व्यास पीठ पर विराजमान हैं तथा श्रेष्ठ श्रेष्ठ मुनिजन जिनकी सेवा सुश्रूषा में लगे हैं और जो प्रसन्न मुख सर्पों से शोभित तथा व्याघ्र चर्म को धारण किये हैं ऐसे दक्षिणामूर्ति भगवान हमारी निरन्तर रक्षा करें । १३ । (मन्त्र द्वारा न्यास) प्रथम ओं, ह्रीं, श्रीं, कहे पुनः 'साम्ब शिवाय' पुनः 'तुभ्यं' अन्त में स्वाहा—यह बारह अक्षर वाला मनुमन्त्र है । १४ । ध्यानः— जिन्होंने हाथों में वीणा, पुस्तक तथा रुद्राक्ष माला धारण कर रखी है एवं (एक हाथ अभदान की मुद्रा में हमेशा ही रहता है) तथा जिसके गले की शोभा काले घने बादल के समान है । और जो श्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ हैं सर्प जिनके शरीर पर लपलपा रहे हैं एवं जो शुकदेव आदि मुनियों द्वारा सेवित किये जा रहे हैं और जो कि बरगद के नीचे ( वास किये ) विराजमान हैं ऐसे भगवान की मैं स्तुति करता हूँ । १५ । विष्णु ऋषिरनुष्टुप् छन्दः । देवता दक्षिणाऽऽस्यः । मन्त्रेणन्यासः । तारं नमो भगवते तुभ्यं वटपदं ततः । मूलेति पदमुच्चार्य वासिने पद मुद्धरेत् ॥१६ वागीशाय पदं पश्चान्महाज्ञानपदं ततः ।

४०६ ] [ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् दायिने पदमुच्चार्य मायिने नम उद्धरेत् ॥१७ आनुष्टुभो मन्त्र राजः सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः ॥१८ मुद्रापुस्तकवह्निनागविलसद्बाहुं प्रसन्नननं मुक्ताहारविभूषणं शशिकलाभास्वत्किरीटोज्ज्वलम् । अज्ञानापहमादिमादिमगिरामर्थं भवानीपतिं न्यग्रोधान्तनिवासिनं परगुरुं ध्यायाम्यभीष्टाप्तये ॥१९ प्रथम 'ओं नमो भगवते तुभ्यं' पुन 'वट' शब्द तब 'मूल' शब्द फिर 'वासिने' शब्द कहकर 'वागीशाय' पुनः 'महाज्ञान' एवं 'दयिने' और 'मायिने' का उच्चारण कर अन्त में नमः शब्द का उच्चारण करे । अर्थात् 'ओं नमो भागवते तुभ्यं' वट मूल वासिने वागीशाय महाज्ञानदायिने मायिने नमः' । यह आनुष्टुभ मंत्रराज है जो कि सभी श्रेष्ठ मन्त्रों में उत्तम है। १६-१७-१८ । ( ध्यान )—अभय ज्ञान मुद्रा, पुस्तक तथा भयानक सर्पों से जिनके हाथ सुशोभित हैं और जो कि प्रसन्नमुख हैं। मोतियों के हार जिनकी शोभा बढ़ा रहे हैं और चन्द्रमा की कला से चमकने वाले मुकुट से जो अधिक शोभायमान लग रहे हैं। साथ ही जो अज्ञान को नाश करने वाले हैं और जो कि आदि पुरुष हैं और वाणी के जो विषय नहीं हैं (यत्र वाचो निवर्तंको) ऐसे पार्वती के पति जो कि सबके गुरु हैं और बरगद के पेड़ के नीचे रहने वाले हैं, उनका मैं अपनी इच्छित वस्तु की प्राप्ति के लिये ध्यान करता हूँ ॥१९॥ सोऽहमिति यावदास्थितिः सा निष्ठा भवतिः ॥२० तदभेदेन मन्त्राम्रेडनं ज्ञानसाधनम् ॥२१ चित्ते तदेकतानता परिकरः ॥२२ अङ्गचेष्टार्पणं बलिः ॥२३ त्रीणि धामानि कालः ॥२४ द्वादशान्तपदं स्थानमिति ॥२५

दक्षिणामूर्त्युपनिषत् [ ४०७ शरीर के नष्ट होने तक 'सोऽहं' मैं वही परब्रह्म हूँ, यही ब्रह्म- निष्ठा है ।२०। उस परब्रह्म से अभिन्न मानकर पूर्व कहे गये मनुमन्त्रों का बार-बार निरन्तर उच्चारण ही ज्ञान का साधन है । २१ । चित्त से उस परमतत्त्व में एकता लगाकर ध्यान करना ही परिकर 'उपकरण' सामग्री है। २२। अंगों की चेष्टाओं का अर्पण ही बलि है अर्थात् हाथ पाँव आदि चलाना ( भगवत्कार्य में ) ही उसकी पूजा है । २३। स्वअविद्यापद, स्थूल तथा सूक्ष्म बीजरूप तीन धाम ही काल है । २४। द्वादशांत पद अर्थात् हृदय किंवा सहस्रार (सहस्रदलकमल) ही परमात्मा की प्राप्ति का स्थान होने के कारण स्थान है। २५ । ते ह पुनः श्रद्दधानास्तं प्रत्यूचुः—कथं वाऽस्योदयः । किं स्वरूपम् । को वाऽस्योपासक इति ॥ २६ ॥ स होवाच- वैराग्यतैलसंपूर्णे भक्तिवर्तिसमन्विते । प्रबोधपूर्णपात्रे तु ज्ञप्तिदीपं विलोकयेत् ॥२७ मोहान्धकारे निः सारे उदेति स्वयमेव हि । वैराग्यमरणं कृत्वा ज्ञानं कृत्वा तु चित्रगुम् ॥२८ गाढतामिस्रसंशून्यै गूढमर्थं निवेदयेत् । मोहभानुजसंक्रान्तं विवेकाख्यं मृकण्डुजम् ॥२९ तत्त्वाविचारपाशेन बद्धं द्रुतभयातुरम् । उज्जीवयन्निजानन्दे स्वस्वरूपेण संस्थित ॥३० शेमुषी दक्षिणा प्रोक्ता सा यस्याभीक्षणे मुखम् । दक्षिणाभिमुखः प्रोक्तः शिवोऽसौ ब्रह्मवादिभिः ॥३१ सर्गादिकाले भगवान् विरञ्चिरुपास्यैनं सर्गसामर्थ्यमाप्य । तुतोष चित्ते वाञ्छितार्थांश्च लब्ध्वा सोऽस्योपासको भवति धाता ।३२।

४०८ ] [ दक्षिणामृत्यु षपनित् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri य इमां परमरहस्यशिवतत्त्वविद्यामधीते स सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति । य एवं वेद स कैवल्यमनुभवतीत्यु- पनिषत् ॥ ३३ ॥ श्रद्धा से युक्त उन ऋषियों ने पुनः मार्कण्डेय से पूछा—इसका उदय कैसे होता है ? क्या इसका स्वरूप है ? और कौन इसका उपासक है ? । २६ (वह बोले) वैराग्यरूपी तेल से लबालब भरे हुये भक्ति रूपी बत्ती से युक्त प्रबोध के ( ज्ञान के ) पूर्व मात्र में ( बर्तन में ) ज्ञप्ति रूपी (अपने अन्दर तथा चराचर में व्याप्त ईश्वर को अपनी आत्मा मानना ) दीप का दर्शन होता है। २७। अर्थात् वैराग्य भक्ति तथा ज्ञान से ही ईश्वर दर्शन होता है ) सारहीन अपनी अज्ञता से कल्पित महान् अज्ञान रूपी अंधकार में वह दीप स्वयं ही उदित होता है। वैराग्य को अरणी बनाकर तथा अपने ज्ञान को ही मथने का डण्डा बनाकर गहन अज्ञान रूपी घने अन्धकार की समाप्ति के लिये गुप्त अर्थ को (परम तत्व को) जानना चाहिये । (अर्थात् निरन्तर वैराग्य तथा ज्ञान के परि- शीलन से ही उस परम तत्व का दर्शन सम्भव है ) तथा परमतत्त्व का विचार न करना रूपी जो पाश उससे बँधे हुए, द्वैतवाद के भय से व्याकुल एवं मोहरूपी शनि या मृत्यु के मुख में पड़े हुये विवेकरूपी मृकंडु के पुत्र (मार्कण्डेय) को ( अपने अज्ञान से ) पुनः उज्जजीवित करते हुए आत्माराम रूपी परमानन्द में अपने स्वरूप से स्थित हो जाता है । । २८--२६--३० । तथा तत्वज्ञानरूपिणी ब्रह्म प्रकाशिक बुद्धि ही जिसमें दक्षिणा है और वही जिस परमतत्व के अभीक्षण में अर्थात् साक्षात्कार में मुख अर्थात् द्वार है वह ब्रह्मवादियों द्वारा दक्षिणामुख नामक शिव Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

दक्षिणामूर्त्युपनिषत् [ ४०९ कहे गये हैं । ३१ । सृष्टि ( संसार ) की रचना के प्रारम्भ में भगवान् ब्रह्मा, इनकी उपासना करके सृष्टि निर्माण की शक्ति को पाकर तथा अपने मनोरथ का लाभ करके हृदय में प्रसन्न हुये अतः वही इनके उपासक हैं । ३२ । जो इस अत्यन्त गुप्त शिवतत्व विद्या को पढ़ता है वह सभी पापों से मुक्त होता है, और जो इसको भली भांति जानता है, इसका मनन करता है गुह कैवल्यपद का ( मोक्ष का ) अनुभव करता है । ३३ । ॥ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् समाप्त ॥

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शरभोपनिषत्

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिए जो आयुष्य नियत कर दिया है, उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ अथ हैनं पैप्पलादो ब्रह्माणमुवाच भो भगवन्ब्रह्मविष्णु- रुद्राणां मध्ये को वा अधिकतरो ध्येयः स्यात्तत्त्वमेव नो ब्रूहीति । तस्मै स होवाच पितामहश्च हे पैप्पलाद शृणु वाक्यमेतत् । बहूनि पुण्यानि कृतानि येन तेनैव लभ्यः परमेश्वरोऽसौ । यस्याङ्गजोऽहं हरिरिन्द्रमुख्याः मोहान्न जानन्ति सुरेन्द्रमुख्याः ॥१॥ प्रभुं वरेण्यं पितरं महेशं यो ब्रह्माणं विदधाति तस्मै । वेदांश्च सर्वान्प्रहिणोति चाग्र्यं तं वै प्रभुं पितरं देवतानाम् ॥२॥ ममापि विष्णोर्जनकं देवमीड्यं योऽन्तकाले सर्वलोकान्संजहार ॥ ३ ॥ स एकः श्रेष्ठश्च सर्वशास्ता स एव वरिष्ठश्च । यो घोरं वेषमास्थाय शरभाख्यं महेश्वरः । नृसिंहं लोकहन्तारं संजघान महा- Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

शरभोपनिषत् ] [ ४११ बलः ॥ ४ ॥ हरि हरन्तं पादाभ्यामनुयान्ति सुरेश्वराः । माधवोः पुरुषं विष्णुं विक्रमस्व महानसि ॥ ५ ॥ कृपया भगवान्विष्णु विददार नखैः खरैः । चर्माम्बरो महावीरो वीरभद्रो बभूव ह ॥ ६ ॥ एक समय पैप्पलाद ऋषि ने ब्रह्माजी से कहा—"हे भगवन् ! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र इन तीनों में से अधिकतर ध्यान के योग्य कौन है, यह आप ही बतलाइये ? ॥ १ ॥ पितामह ब्रह्मा ने कहा—"हे पैप्पलाद ! मेरे कथन को सुनो कि जिस परमेश्वर के अङ्ग से मैं उत्पन्न हुआ हूँ वह किसी बहुत पुण्यशाली को ही प्राप्त होता है, मुख्य विष्णु, इन्द्र और सुरेन्द्र भी मोहवश उसे नहीं जान पाते ॥१॥ वह सबका प्रभु है, श्रेष्ठ है, पिता है, परमेश्वर है, वही ब्रह्मा को धारण करता है, वही वेदों का पहले निर्णय करता है वही सबका प्रभु और देवताओं का पिता है ॥२॥ वह मेरा और विष्णु का भी पिता है, उसको नमस्कार है, वही अन्तकाल में समस्त विश्व का संहार करता है ॥ ३ ॥ वही एक मात्र सबसे श्रेष्ठ, सबका नियामक और वरिष्ठ है। उसी महाबलशाली ने शरभ का घोर रूप धारण करके नृसिंह को मार दिया ॥ ४ ॥ जब रुद्र विष्णु को पैर पकड़कर ले जा रहे थे तब सब देवताओं ने उनके पीछे-पीछे जाकर उनकी प्रार्थना की "दया करके पुरुषोत्तम विष्णु का वध मत कीजिये आप महान् हैं, आपकी जय हो।" तब रुद्र ने तीक्ष्ण नखों से विष्णु को विदीर्ण किया और वे चर्माम्बर वाले रुद्र महावीर और वीरभद्र के नाम से कहे जाने लगे ॥ ५-६ ॥ स एको रुद्रो ध्येयः सर्वेषां सर्वसिद्धये । यो ब्रह्मणः पंचम- वक्त्रहन्ता तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ७ ॥ यो विस्फुलिङ्गेन ललाटजेन सर्वं जगद्भस्मसात्संकरोति । पुनश्च सृष्ट्वा पुनरप्य- रक्षदेवं स्वतन्त्रं प्रकटीकरोति ॥ तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ८ ॥ यो वामपादेन जघान कालं घोरं पपेऽथो हलाहलं दहन्तम् ।

४१२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ शरभोपनिषत् तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ६ ॥ यो वामपादार्चितविष्णुनेत्रस्तस्मै ददौ चक्रमतीव हृष्टः । तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १० ॥ ऐसा एक भद्र ही सब सिद्धियों का दाता और सबका पूजनीय है । जिसने ब्रह्मा का पांचवां मुख नष्ट कर दिया उसको नमस्कार ॥७॥ जो अपने मस्तक के अग्नि द्वारा समस्त जगत को भस्म कर देता है और फिर से उत्पन्न करके उसका पालन भी करता है, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ ८ ॥ जिसने काल को अपने बांये पैर से मार दिया और जलते हुये हलाहल विष को पी लिया, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ ६ ॥ विष्णु ने जिसके वांये पैर पर अपनी आंख निकाल कर चढ़ाई और इससे संतुष्ट होकर जिसने चक्र दे दिया, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ १० ॥ यो दक्षयज्ञं सुरसङ्घान्विजित्य विष्णुं बबन्धोरगपाशेन वीरः । तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ११ ॥ यो लीलयैव त्रिपुरं ददाह विष्णुं कविं सोमसूर्याग्निनेत्रः । सर्वे देवाः पशुतामवापुः स्वयं तस्मात्पशुपतिर्बभूव । तस्मै रुद्रात नमो अस्तु ॥ १२ ॥ यो मत्स्यकूर्मादिवराहसिंहान्विष्णुं अवतार क्रमन्तं वामनमादि- विष्णुम् । विविकलवं पीड्यमानं सुरेशं भस्मीचकार मन्मथं यमं च । तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १३ ॥ एवंप्रकारेण बहुधा प्रतुष्ट्वा क्षमापयामासुर्नीलकण्ठं महेश्वरम् । तापत्रयसमुद्भूतजन्ममृत्यु- जरादिभिः । नानाविधानि दुःखानि जहार परमेश्वरः ॥ १४ ॥ एवं मन्त्रैः प्रार्थ्यमान आत्मा वै सर्वदेहिनाम् । शङ्करो भगवा- नाद्यो ररक्ष सकलाः प्रजाः ॥ १५ ॥ : दक्ष के यज्ञ में सब देवताओं को पराजित कर जिसने विष्णु को भी नागपाश में बांध लिया उस महावीर रुद्र को नमस्कार है ॥ ११ ॥ जिसने लीलामात्र से त्रिपुर को दग्ध कर दिया, जिसके सूर्य, चन्द्र और अग्नि तीन नेत्र हैं, सब देवता जिसके सम्मुख पशुता ( अधीनता ) को : प्राप्त हो गये और इससे जो पशुपति कहलाया, उस रुद्र को नमस्कार Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

शरभोपनिषत् [ ४१३ है ॥ १२ ॥ जो मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन आदि विष्णु के अवतारों को भी श्रमित करता है, जिसने कामदेव और यम को भस्म कर दिया, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ १३ ॥ देवों ने इस प्रकार विविध भाँति से स्तुति करके नीलकण्ठ महेश्वर से क्षमा प्रार्थना की, तब उस परमेश्वर ने तीनों प्रकार के तापों और जन्म, मृत्यु, जरा आदि तथा अन्य तरह-तरह के दुःखों का नाश किया ॥ १४ ॥ इस प्रकार विविध प्रकार के मन्त्रों से प्रार्थना किये जाने पर उस आदि भगवान् शंकर ने आत्मरूप से सब प्रजा की रक्षा की ॥ १५ ॥ यत्पादाम्भोरुहद्वन्द्वं मृग्यते विष्णुना सह । स्तुत्वा स्तुत्यं महेशानमवाङ्मनसगोचरम् ॥ १६ ॥ भक्त्या नम्रनतोर्विष्णोः प्रसादमकरोद्विभुः । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचनेति ॥ १७ ॥ अणोरणी- यान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥१८॥ वसिष्ठ- वैयासकिवामदेवविरिञ्चिमुख्यैर्हृदि भाव्यमानः । सनत्सुजाता- दिसनातनाद्यै रीड्यो महेशो भगवानादिदेवः ॥१९॥ सत्यो नित्यः सर्वसाक्षी महेशो नित्यानन्दो निर्विकल्पो निराख्यः । अचिन्त्य- शक्तिर्भगवान्गिरीशः स्वाविद्यया कल्पितमानभूमिः ।! २० ॥ वाणी और मन से भी जो अगोचर हैं और सब प्रकार की स्तुतियों के योग्य हैं, विष्णु जिनके चरण कमलों को प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हैं ऐसे भगवान महेश्वर भक्तिपूर्वक नमस्कार करने वाले विष्णु पर प्रसन्न हुये । जिसको प्राप्त न करके वाणी मन के साथ लौट जाती है, उस ब्रह्मानन्द का ज्ञाता कभी भी भय को प्राप्त नहीं होता ॥ १६—१७ ॥ यह आत्मा छोटे से भी छोटा और बड़े से भी बड़ा है और सब प्राणियों के भीतर हृदय रूपी गुफा में निवास करता है । उस

४१४ ] [ शरभोपनिषत् दृष्टारूप महान् ईश्वर को शोक से रहित व्यक्ति भगवान् के प्रसाद से ही देखता है ॥ १८ ॥ वसिष्ठ, शुकदेव और वामदेव जैसे ऋषि तथा ब्रह्मादि सब देवता भी जिसका सदैव ध्यान करते हैं और सनत, सनातन आदि जिनकी स्तुति करते रहते हैं, ऐसे आदि भगवान महेश्वर देव हैं ॥ १९ ॥ वे महेश्वर, सत्य, नित्य, सर्वसाक्षी, नित्यआनन्द रूप, निर्विकल्प और कथन न कर सकने योग्य हैं । उनकी शक्ति की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, अज्ञानता से ही हम उनके स्थान आदि की कल्पना करते रहते हैं ॥ २० ॥ अतिमोहकरी माया मम विष्णोश्च सुव्रत । तस्य पादा- म्बुजध्यानाद्दुस्तरा सुतरा भवेत् ॥ २१ ॥ विष्णुर्विश्वजगद्योनिः स्वांशभूतैः स्वकैः सह । ममांशसंभवो भूत्वा पालयत्यखिलं जगत् ॥ २२ ॥ विनाशं कालतो याति ततोऽन्यत्सकलं मृषा । ॐ तस्मै महाग्रासाय महादेवाय शूलिने । महेश्वराय मृडाय तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ २३ ॥ एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकणः । त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २४ ॥ चतु- र्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदत ॥ २५ ॥ हे सुव्रत ! मेरे (ब्रह्मा) और विष्णु के लिये भी उसकी माया अत्यन्त मोहग्रस्त करने वाली है। यद्यपि उसे पार कर सकना अत्यन्त कठिन है तो भी उनके चरण कमलों का ध्यान करने से उसे सुगमता पूर्वक पार किया जा सकता है ॥ २१ ॥ समस्त सृष्टि के उत्पन्न करने वाले विष्णु हैं, वे अपने अंश रूप जीवों के साथ मेरे ही अंश से होते हैं और विश्व का पालन करते हैं ॥ २२ ॥ कालक्रम से सब कुछ नष्ट हो जाता है और इसलिए यह मिथ्या है । इससे सबका महाग्रास करने वाले उस शूलधारी, महादेव, महेश्वर और कृपा करने वाले रुद्र को नमस्कार है ॥ २३ ॥ सब प्रकार की सृष्टि में विष्णु सबसे भिन्न और महान् हैं ।

शरभोपनिषत् । [ ४१५ वे यद्यपि सब भूतों में व्याप्त होकर सब प्रकार के भोगों को भोगते हैं फिर भी अव्यय रहते हैं ॥ २४ ॥ जिन विष्णु भगवान को चार, चार दो और पाँच आहुतियां दी जाती हैं, वे विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों ॥२५॥ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २६ ॥ शरा जीवास्तदङ्गेषु भाति नित्यं हरिः स्वयम् । ब्रह्मैव शरभः साक्षान्मोक्षदोऽयं महामुने ॥ २७ ॥ मायावशादेव देवा मोहिता ममतादिभिः । तस्य माहात्म्यलेशांशं वक्तुं केनाप्यशक्यते ॥ २८ ॥ परात्परतरं ब्रह्म यत्परात्परो हरिः । परात्परतरो हीशस्तस्मात्तुल्योऽधिको न हि ॥ २९ ॥ एक एव शिवो नित्यस्ततोऽन्यत्सकलं मृषा । तस्मात्सर्वान्परित्यज्य ध्येयान्विष्ण्वादिकान्सुरान् ॥ ३० ॥ शिव एव सदा ध्येयः सर्व- संसारमोचकः । तस्मै महाग्रासाय महेश्वराय नमः ॥ ३१ ॥ अर्पण हवि ब्रह्म है, उसे ब्रह्म रूप कर्त्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में हवन किया जाता है, यह भी ब्रह्म ही है। इसलिए समाधिस्थ योगी के लिए ब्रह्म ही प्राप्त करने योग्य है ॥ २६ ॥ जीव ही 'शर' है जिसके अङ्ग में स्वयं भगवान नित्य प्रकाशित होते हैं । इस प्रकार ब्रह्म ही 'शरभ' है, जो साक्षात् मोक्ष के प्रदान करने वाले हैं ॥ २७ ॥ जिसकी माया से देवगण भी मोहित रहते हैं, उसकी महिमा एक अल्प अंश भी कोई नहीं कह सकता ॥ २८ ॥ पर से परब्रह्म है, उससे पर विष्णु है, उससे भी पर से पर ईश हैं । उनसे बड़ा या उनके बराबर कोई भी नहीं है ॥ २९ ॥ एक मात्र शिव ही नित्य है और अन्य सब मिथ्या है इसलिये विष्णु आदि समस्त देवों का त्याग कर संसार-बन्धन से छुड़ाने वाले एक मात्र उनका ही ध्यान करना चाहिए । सबका संहार करने वाले उस महेश को नमस्कार है ॥ ३०–३१ ॥ पैप्पलादं महाशास्त्रं न देयं यस्य कस्यचित् । नास्तिकाय

४१६ ] [ शरभोपनिषत् कृतघ्नाय दुर्वृत्ताय दुरात्मने ॥ ३२॥ दाम्भिकाय नृशंस्याय शठायानृतभाषिणे । सुव्रताय सुभक्ताय सुवृत्ताय सुशीलिने ॥३३॥ गुरुभक्ताय दान्ताय शान्ताय ऋजुचेतसे । शिवभक्ताय दातव्यं ब्रह्मकर्मोक्तधीमते ॥ ३४ ॥ स्वभक्ताय दातव्यमकृतघ्नाय सुव्रत । न दातव्यं सदा गोप्यं यत्नेनैव द्विजोत्तम ॥ ३५ ॥ एतत्पैप्पलादं महाशास्त्रं योऽधीते श्रावयेद्द्विजः स जन्ममरणेभ्यो मुक्तो भवति । यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति । गर्भवासाद्वि- मुक्तो भवति । सुरापानात्पूतो भवति । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । ब्रह्महत्यात्पूतो भवति । गुरुतल्पगमनात्पूतो भवति । स सर्वान्वे- दानधीतो भवति । स सर्वान्देवान्ध्यातो भवति । स समस्तमहा- पातकोपपातकात्पूतो भवति । तस्मादविमुक्तमाश्रितो भवति । स सततं शिवप्रियो भवति । स शिव सायुज्यमेति । न स पुनरा वर्तते न स पुनरावर्तते । इत्याह भगवान् ब्रह्मोत्युपनिषत् । इस पैप्पलाद ऋषि को प्राप्त हुये महाशास्त्र को चाहे जिस किसी को न देना चाहिये । नास्तिक, कृतघ्न, दुर्वृत्त, दुरात्मा, दाम्भिक, नृशंस, शठ, असत्यभाषी को इसे कदापि न दे । जो सुव्रतधारी, सच्चभक्त, शुद्धवृत्तिवाला, सुशील, गुरुभक्त, शम दम वाला, धर्म बुद्धिवाला, शिव- भक्त ब्रह्म कर्म में चित्त लगाने वाला हो और अपने में भक्ति रखता हो कृतघ्न न हो उसी को इसे देना चाहिए। यदि ऐसा न मिले तो किसी को न देकर इसकी रक्षा करनी चाहिए ॥ ३२—३५ ॥ पैप्पलाद के इस महा- शास्त्र को जो स्वयं पढ़ता है तथा अन्य ब्राह्मणों को सुनाता है, वह जन्म- मरण से मुक्त हो जाता है। जो इसे जानता है वह अमृतत्व को प्राप्त होता है, गर्भवास से छुटकारा पा जाता है। सुरापान, स्वर्ण की चोरी ब्रह्महत्या गुरुस्त्री गमन जैसे महा पापों से भी वह छूट जाता है । वह सब वेदों का अध्ययन करने वाला हो जाता है। उसे सब देवों के ध्यान