भारतकोश
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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

लांगूलोपनिषत् ] [ ४५३ वीर हनुमते... ... ...हीं हीं सागर ह्रीं ह्रीं वं वं सर्वं, मन्त्रार्थायवंच वेदसिद्धि कुरु कुरु स्वाहा ॥६॥ इस प्रकार श्री रामचन्द्र तथा शिवने वीरभद्र को तथा वीरभद्र ने उन दोनों को कहा । इस सारे विधि विधान को पूछा समझा आदि । इसे जो तीनों प्रातः मध्याह्न एवं सायं सन्ध्या के समय पढ़ता है उसको वे सभी वस्तुयें प्राप्त हो जाया करती हैं जो कि ऊपर लिखे मन्त्रों में निर्दिष्ट हैं । ॥ लांगूलोपनिषद् समाप्त ॥

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गायत्री रहस्योपनिष

ॐ स्वस्ति सिद्धम् । ॐ नमो ब्रह्मणे । ॐ नमस्कृत्य याज्ञ- वल्क्यः ऋषिः स्वयंभुवं परिपृच्छति । हे ब्रह्मन् गायत्र्या उत्पत्ति श्रोतुमिच्छामि । अथातो वसिष्ठ स्वयंभुवं परिपृच्छति । यो ब्रह्मा स ब्रह्मोवाच । ब्रह्मज्ञानोत्पत्तेः प्रकृतिं व्याख्यास्यामः । को नाम स्वयंभू पुरुष इति । तेनाङ्गुलीमथ्यमानात् सलिल- मभवत् । सलिलात् फेनमभवत् । फेनाद्बुद्बुदमभवत् । बुद्बुदा- दण्डमभवत् । अण्डाद्ब्रह्माभवत् । ब्रह्मणो वायुरभवत् । वायो- रग्निरभवत् । अग्नेरोङ्कारोऽभवत् । ओंकाराद्व्याहृतिरभवत् । व्याहृत्याः गायत्र्यभवत् । गायत्र्याः सावित्र्यभवत् । सावित्र्याः सरस्वत्यभवत् । सरस्वत्याः सर्वे वेदा अभवन् । सर्वेभ्यो वेदेभ्यः सर्वे लोका अभवन् । सर्वेभ्यो लोकेभ्यः सर्वे प्राणिनोऽभवन् ।

ॐ स्वस्ति (कल्याण, हो) ; सबको ; सिद्धि प्राप्त हो । ब्रह्म को नमस्कार हो । इस प्रकार प्रमाण कर याज्ञवल्क्य स्वयंभुव से पूछते हैं—गायत्री की उत्पत्ति किस प्रकार है ? वह बोले--ब्रह्मज्ञान की उत्पत्ति की प्रकृति के आदि कारण की व्याख्या की जाती है । कौन स्वयम्भू है ? वही पुराण पुरुष । उसने अँगुली का मन्थन करते हुए जल को उत्पन्न किया (उससे जल उत्पन्न) हुआ। जल से फेन, फेन से बुद्बुद बुद्बुद से अण्डा, अण्डे से ब्रह्मा, ब्रह्मा से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से ॐकार, ॐकार से व्याहृति, व्याहृति से गायत्री, गायत्री, से सावित्री, सावित्री से सरस्वती, सरस्वती, से सभी वेद, स। वेदों से सारे लोक और अन्त में सब लोकों से सारे प्राणी उत्पन्न हुए ।

Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

गायत्री रहस्योपनिषत् ] [ ४५५ अथातो गायत्री व्याहृतयश्च प्रवर्तन्ते । का च गायत्री काश्च व्याहृतयः । किं भूः किं भुवः किं सुवः किं महः किं जनः किं तपः किं सत्यं किं तत् किं सवितुः किं वरेण्यं किं भर्गः किं देवस्य किं धीमहि किं धियः किं यः किं नः किं प्रचोदयात् । ॐ भूरिति भुवो लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षलोकः । स्वरिति स्वर्गलोकः । मह इति महर्लोक । जन इति जनोलोकः । तप इति तपोलोकः । सत्यमिति सत्यलोकः । तदति ददसौ तेजोमयं तेजोऽग्निदेवता । सवितुरिति सविता सविता सावित्रमादित्यो वै । वरेण्यमित्यत्र प्रजापतिः । भर्ग इत्यापो वै भर्गः । देवस्य इतीन्द्रो देवो द्योतत इति स इन्द्रस्तस्मात् सर्वपुरुषो नाम रुद्रः । धीमहीत्यन्तन्तरात्मा । धिय इत्यन्तरात्मा परः । य इति सदाशिव- पुरुषः । नो इत्यस्माकं स्वधर्मे । प्रचोदयादिति प्रचोदितकाम इमान् लोकान् प्रत्याश्रयते यः परो धर्म इत्येषा गायत्री । सो यहीं से गायत्री तथा व्याहृतियां प्रवर्तित होती हैं । गायत्री कौन है ? व्याहृतियाँ कौन हैं ? तथा भू भुवः, स्वः, महः जनः, तपः, सत्यं, तत्, सवितु वरेण्यं, भर्गः, देवस्य धीमहि, धियः, यः नः तथा प्रचोदयात् क्या हैं, किं स्वरूप हैं ? उत्तर- ॐ । भूः ये भूलोक का वाचक है, भुवः आकाश का, स्वः स्वर्गलोक का, महः महर्लोक का, जनः जनलोक का, तपः तपोलोक का, सत्यम् सत्यलोक का, तत् तेजस्वी अग्नि देव का, सवितुः ये सूर्य का, वरेण्यम् यह प्रजापति ( ब्रह्मा ) का, भर्गः जल का, देवस्य यह तेजस्वी इन्द्र का ( जो परम ऐश्वर्य का द्योतक सर्वपुरुष नामक रुद्र से प्रसिद्ध है उसका ) धीमहि यह अन्तरात्मा का, धियः ये दूसरी अन्तरात्मा (ब्रह्म) का, यः यह उस सदाशिव पुरुष का, नः यह अपने स्वरूप का ( हमारे इस अर्थ का वाचक ), इस प्रकार सभी यथोक्तक्रम से तत्तत् स्वरूप के बोधक हैं । प्रचोदयात् यह प्रेरणा की इच्छा का द्योतक है । इन सभी लोकों का आश्रयण जो धर्म करादे वही गायत्री है ।

४५६ ] [ गायत्री रहस्योपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सा च किंगोत्रा कत्यक्षरा कतिपादा। कति कुक्षयः । कानि शीर्षाणि । सांख्यायनगोत्रा सा चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री त्रिपादा चतुष्पादा । पुनस्तस्याश्चत्वारः पादाः षट् कुक्षिकाः पञ्च शीर्षाणि भवन्ति । के च पादाः काश्च कुक्षयः कानि शीर्षाणि । ऋग्वेदोऽस्याः प्रथमः पादो भवति । यजुर्वेदो द्वितीयः पादः । सामवेदस्तृतीयः पाद । अथर्ववेदश्चतुर्थः पादः । पूर्वा दिक् प्रथमा कुक्षिर्भवति । दक्षिणा द्वितीया कुक्षिर्भवति । पश्चिमा तृतीया कुक्षिर्भवति । उत्तरा चतुर्थी कुक्षिर्भवति । ऊर्ध्वं पञ्चमी कुक्षिर्भवति । अधः षष्ठी कुक्षिर्भवति । व्याकरणोऽस्याः प्रथमः शीर्षो भवति । शिक्षा द्वितीयः । कल्पस्तृतीयः । निरुक्तश्च- तुर्थः । ज्योतिषामयनमिति पञ्चमः । का दिक् को वर्णः किमाय- तनं कः स्वरः किं लक्षणं कान्यक्षरदैवतानि क ऋषयः कानि छन्दांसि काः शक्तयः कानि तत्त्वानि के चावयवाः । पूर्वादां भवतु गायत्री । मध्यमायां भवतु सावित्री । पश्चिमायां भवतु सर- स्वती । रक्ता गायत्री । श्वेता सावित्री । कृष्णा सरस्वती । पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौरायतनानि । वह किस गोत्र वाली, कितने अक्षर वाली, कितने पाद वाली, कितनी कुक्षि वाली है तथा उसके शीर्षं मूर्धादिस्थान कौन हैं ? उत्त - वह सांख्यायन गोत्र वाली, चौबीस अक्षर वाली गायत्री तीन पाद तथा चार पाद की है । फिर उसके चार पाद, छः कुक्षियाँ तथा पाँच शिर हैं । कौन पाद हैं ? कुक्षियाँ कौन हैं ? शिर कौन हैं ? ऋग्वेद इसका प्रथम पाद है । यजुर्वेद दूसरा, सामवेद तीसरा तथा अथर्ववेद चौथा पाद है । पूर्व दिशा प्रथम कुक्षि, दक्षिण दिशा दूसरी कुक्षि, पश्चिम तीसरी तथा उत्तर दिशा चौथी कुक्षि है । ऊर्ध्वं देश ( आकाश ) पाँचवीं कुक्षि तथा नीचे की भूमियां छठी कुक्षि हैं । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

गायत्री रहस्योपनिषत् ] [ ४५७ व्याकरण इसका पहला शिर, शिक्षा दूसरा, कल्प तीसरा, निरुक्ति चौथा तथा ज्योतिष पांचवां शिर है । किस दिशा में, किस रङ्ग की अधिष्ठात्री देवियां स्थिति हैं ? उनका विस्तार क्या है ? स्वर, लक्षण क्या है ? किन अक्षरों की वह अधिष्ठातृ देवियां हैं ? कौन उनके ऋषि हैं ? कौन छन्द हैं ? कौन शक्तियां हैं ? कौन तत्व हैं तथा कौन अवयव हैं ? पूर्व में गायत्री जिसका रंग लाल है, मध्यम में ( दक्षिण में ) सावित्री, जिसका रंग सफेद है, पश्चिम में सरस्वती, जिसका वर्ण काला है, स्थित हैं । ध्यान करने योग्य हैं । पृथिवी, आकाश तथा स्वर्ग इनके विस्तार स्थल निवास- स्थान हैं । अकारोकारमकाररूपोदात्तादिस्वरात्मिका । सर्वा सन्ध्या हंसवाहिनी ब्राह्मी । मध्यमा वृषभवाहिनी माहेश्वरी । पश्चिमा गरुड़वाहिनी वैष्णवी । पूर्वाह्नकालिका सन्ध्या गायत्री कुमारी । रक्ता रक्ताङ्गी रक्तवासिनी रक्तगन्धमाल्यानुलेपनी पाशांकुशाक्ष- मालाकमण्डलुवरहस्ता हंसारूढा ब्रह्मदैवत्या ऋग्वेदसहिता आदित्यपथगामिनी भूमण्डलवासिनी । मध्याह्नकालिका सन्ध्या सावित्री युवती श्वेताङ्गी श्वेतवासिनी श्वेतगन्धमाल्यानुलेपनी त्रिशूलडमरुहस्ता वृषभारूढा रुद्रदैवत्या यजुर्वेदसहिता आदित्य- पथगामिनी भुवर्लोके व्यवस्थिता । सायं सन्ध्या सरस्वती वृद्धा कृष्णाङ्गी कृष्णवासिनी कृष्णगन्धमाल्यानुलेपनी शङ्खचक्रगदाभय- हस्ता गरुडारूढा विष्णुदैवत्या सामवेदसहिता आदित्यपथगामिनी स्वर्गलोकव्यवस्थिता । ये तीनों अकार, उकार तथा मकार रूप उदात्तादि स्व- रात्मक हैं । प्रातःकालीन जो सन्ध्या है, वह हंस पर बैठने वाली ब्रह्मा के

४५८ ] [ गायत्री रहस्योपनिषत् स्वरूप के समान, मध्यमा सन्ध्या बैल पर आरूढ़ शंकर स्वरूपिणी तथा अन्तिम सायंकालीन गरुड़ के ऊपर स्थित तथा विष्णु स्वरूप चतुर्भुजा शस्त्रादिवरा हैं । पूर्वाह्नकाल वाली सन्ध्या गायत्री, कुमारी लाल वर्ण, लाल वस्त्र वाली, लाल चन्दन, लाल मालाओं को धारण करने वाली, पाश, अंकुश, अक्षमाला कमण्डलु आदियों से शोभित हाथ वाली, हंस में बैठी, ब्रह्माधि- देवता, ब्रह्मस्वरूपिणी ऋग्वेद सहित, सूर्य के मार्ग में विचरण करने वाली तथा पृथिवी पर निवास करने वाली है । मध्याह्न काल वाली जो सन्ध्या है वह युवती, स्वच्छ सफेद वर्ण वाली, सफेद वस्त्रों को धारण करने वाली, सफेद चन्दन तथा मालायें धारण करने वाली, त्रिशूल तथा डमरू धारण किए, बैल पर बैठी, रुद्राधिदेवता, यजुर्वेद युक्त (यजुर्वेद जिसके एक हाथ में पुस्तक रूप में विराजमान है ) सूर्य मार्ग में सञ्चरण करने वाली, आकाश में स्थित रहने वाली है । सायंकालीन सन्ध्या सरस्वती है । वह बूढ़ी काले रङ्ग की, काले वस्त्रों को धारण करने वाली, काले गन्ध तथा माला का अनुलेपन करने वाली, शङ्ख, चक्र तथा गदा लिए गरुड़ पर स्थित विष्णु अधिदैवत्य ( विष्णु जिसका अधिदेवता है ) सामवेद युक्त सूर्य मार्गगामी तथा स्वर्ग लोक में निवास करने वाली है । अग्निवायुसूर्यरूपाऽऽहवनीयगार्हपत्यदक्षिणाग्निरूपा ऋग्यजुः- सामरूपाभूर्भुवःस्वरितिध्याहृतिरूपाप्रातर्मध्याह्नतृतीयसवनात्मिका सत्वरजस्तमोगुणात्मिका जाग्रत्स्वप्नषुसुप्तरूपा वसुरुद्रादित्यरूपा गायत्रीत्रिष्टुब्जगतीरूपा ब्रह्मशङ्करविष्णुरूपेच्छाज्ञानक्रियाशक्ति- रूपा स्वराड्विराड्वषड् ब्रह्मरूपेति । प्रथममाग्नेयं द्वितीयं प्राजा- पत्यं तृतीय सौम्यं चतुर्थमीशानं पञ्चममादित्यं षष्ठंगार्हपत्यं सप्तमं

गायत्री रहस्योपनिषत् ] ४५६ मैत्रमष्टमं भगदैवतं नवममार्यमणं दशमं सावित्रमेकादशं त्वाष्ट्रं द्वादशं पौष्णं त्रयोदशमैन्द्राग्नं चतुर्दशं वायव्यं पञ्चदशं वामदेवं षोडशं मैत्रावरुणं सप्तदशं भ्रातृव्यमष्टादशं वैष्णवमेकोनविंशं वामनं विंशं वैश्वदेवमेकविंशं रौद्रं द्वाविंश कौबेरं त्रयोविंशमाश्विनं चतुर्विशं ब्राह्ममिति प्रत्यक्षरदैवतानि । प्रथमं वासिष्ठ द्वितीयं भारद्वाजं तृतीयं गार्ग्य चतुर्थमौपमन्यवं पञ्चमं भार्गवं षष्ठं शाण्डिल्यम् सप्तमम् लौहितमष्टमं वैष्णवम् नवमम् शातातपम् दशमम् सनत्कुमारमेकादशम् वेदव्यासम् द्वादशम् शुकम् त्रयो- दशम् पाराशर्यम् चतुर्दशम् पौण्ड्रकम् पञ्चदशम् क्रतुम् षोडशम् दाक्षम् सप्तदशम् काश्यपमष्टादशमात्रेयमेकोनविंशमगस्त्यं विंशमोद्दालकमेकविंशमांगिरसम् द्वाविंशम् नामिकेतुं त्रयोविंशम् मौद्गल्यम् चतुर्विंशमाङ्गिरसं वैश्वामित्रमिति प्रत्यक्षराणामृषयो भवन्ति । ये गायत्री अग्नि वायु सूर्यरूप. आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि वह्निरूप, ऋक्, यजु तथा सामवेद स्वरूप, भूः, भुवः तथा स्व व्याहृति रूप, प्रातः मध्याह्न तथा सायंकालीन यजु की आत्मस्वरूप. सत्व, रज तथा तम गुण वाली, जाग्रत स्वप्न, सुषुप्ति का प्रतीक, वसु, रुद्र तथा आदित्यात्मक गायत्री, त्रिष्टुप् जगती जो छन्द तन्मयी, ब्रह्मा, शंकर एवं विष्णु के स्वरूप वाला, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया रुप जो शक्ति तत्स्वरूप स्वराट्, विराट् तथा वषट् रूप जो ब्रह्म तन्मया हैं। इसका प्रथम अक्षर अग्नि दैवत्य, दूसरा प्रजापति दैवत्य, तीसरा चन्द्र दैवत्य, चौथा ईशान, (शिव), पांचवां आदित्य, छठा गार्हपत्य (अग्नि विशेष), सातवां मैत्र, आठवां भग दैवत्य, नोवां अर्यमा दैवत्य, दसवां सविताधि दैवत्य, ग्यारहवां त्वष्ट्रा, बारहवां पूषा, तेरहवां इन्द्राग्नि, चौदहवां वायु, पन्द्रहवां वामदेव, सोलहवां मैत्रावरुण, सत्रहवां भ्रातृव्य, अठारहवां विष्णु दैवत्य, उन्नीसवां वामन, बीसवां वैश्वदेव,

४६० ] गायत्री रहस्योपनिषत् इक्कीसवां रुद्र दैवत्य, बाईसवां कुवेर दैवत्य, तेईसवां अश्विनी कुमार दैवत्य तथा चोबीसवां अक्षर ब्रह्माधिदैवत्य है । पहले अक्षर का ऋषि वशिष्ठ, दूसरे का भारद्वाज, तीसरे का गर्ग, चौथे का उपमन्यु, पांचवें का भृगु ( भार्गव ), छठे का शांडिल्य, सातवें का लोहित, आठवें का विष्णु, नौवें का शातातप, दसवें का सनत्कुमार, ग्यारहवें का वेद व्यास, बारहवें का शुकदेव, तेरहवें का पाराशर्य, चौदहवें का पौंड्रकमं, पन्द्रहवें का क्रतु, सोलहवें का दक्ष, सत्रहवें का कश्यप, अठारहवें का अत्रि, उन्नीसवें का अगस्त्य, बीसवें का उद्दालक, इक्कीसवें का आङ्गिरस, बाईसवें का नामिकेतु, तेईसवें का मुद्गल, चौबीसवें का अङ्गिरागोत्रज विश्वामित्र ये क्रमशः ऋषि हैं । ( अर्थात् गायत्री के जो चौबीस अक्षर उनके दृष्टा ये चौबीस ऋषि हैं । ) गायत्रीत्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप्‌पङ्‌क्तिर्बृहत्युष्णिगदितिरिति त्रिरावृत्तेन छन्दांसि प्रतिपाद्यन्ते । प्रह्लादिनी प्रज्ञा विश्वभद्रा विलासिनी प्रभा शान्ता मा कान्तिः स्पर्शा दुर्गा सरस्वती विरूपा विशालाक्षी शालिनी व्यापिनी विमला तमोऽपहारिणी सूक्ष्मा- वयवा पद्मालया विरजा विश्वरूपा भद्रा कृपा सर्वतोमुखीति चतुर्विंशतिशक्तयो निगद्यन्ते । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशगन्धरस- रूपस्पर्शशब्दवाक्यानि पादपायूपस्थत्वक्चक्षुःश्रोत्रजिह्वाघ्राण- मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तज्ञानानीति प्रत्यक्षराणां तत्वानि प्रतीयन्ते । चम्पकातसीकुंमपिङ्गलेन्द्रनीलाग्निप्रभोद्यत्सूर्यविद्युत्तारकसरोज- गौरमरकतशुकलकुन्देन्दुशङ्खपाण्डुनेत्रनीलोत्पलचन्दनागुरुकस्तूरी- गोरोचनघनसारसन्निभम् प्रत्यक्षरमनुस्मृत्य समस्तपातकोपपातक- महापातकागम्यागमनगोहत्याब्रह्महत्याभ्रूणहत्या वीरहत्यापुरुष- हत्याऽऽजन्मकृतहत्यास्त्रीहत्यागुरुहत्यापितृहत्याप्राणहत्याचराचर- हत्याऽऽभक्ष्यभक्षणप्रतिग्रहस्वकर्मविच्छेदनस्वाम्यतिहीनकर्मकरण-- परधनापहरणशूद्रान्नभोजनशत्रुमारणचण्डालीगमनादिसमस्तपाप- हरणार्थम् संस्मरेत् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गायत्री रहस्योपनिषत् ] [ ४६१ गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती, उष्णिक् ये त्रिरावृत ( तीन आवृत्ति युक्त ) छन्द गिनाये जाते हैं । इसकी चौबीस शक्तियाँ इस प्रकार हैं—प्रह्लादिनी, प्रजा, विश्वभद्र, विलासिनी प्रभा, शान्ता, मा, कान्ति, स्पर्धा, दुर्गा, सरस्वती, विरूपा, विशालाक्षी, शालिनी, व्यापिनी, विमला, तमोऽपहारिणी, सूक्ष्मा- वयवा, पद्मलया, विरजा, विश्वरूपा, भद्रा, कृपा तथा सर्वतोमुखी । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, वाक्य, पैर, मल मूत्रेन्द्रियां, त्वचा, आंख, कान, जीभ, नाक, मन, बुद्धि, अहङ्कार, चित्त तथा ज्ञान ये गायत्री के प्रत्येक अक्षर के तत्व हैं । चम्पा, अतसी, ( एक नीला फूल ) कुंकुम, पिंगल, इन्द्र, नील, अग्निप्रभा, उद्यत्सूर्य, विद्युत्तारक, सरोज, गौर मरकत, शुक्ल, कुन्द, इन्दु, शङ्ख, पांडु नेत्र नील कमल चन्दन अगुरु, कस्तूरी, गोरोचना, कपूर के समान इन प्रत्येक अक्षरों का आश्रय सभी पाप उपपातक, महापातक, अगम्यागमन ( जिनसे योनि सम्बन्ध नहीं होना चाहिये उनसे योनि सम्बन्ध करना आदि ), गोहत्या, ब्रह्म हत्या, भ्रूण ( गर्भपात ) हत्या, वीर हत्या, पुरुष हत्या, सारे जन्मों में की हुई हत्यायें, स्त्री हत्या, गुरु हत्या, पितृ हत्या, आत्मघात, चराचर जीवों की हत्या, जो खाने लायक नहीं उन्हें खाने से होने वाली हत्या, दान व अपने कर्म का त्याग, स्वामी की सेवा से पराङ्मुख कर्म करने वाला. दूसरे के धन को चुराने से होने वाले पाप, शूद्र के अन्न को खाने, शत्रु घात, चाण्डाली से योनि सम्बन्ध रखना आदि सारे पापों के हरण के लिए याद करना चाहिये । मूर्धा ब्रह्मा शिखान्तो विष्णुर्ललाटं रुद्रश्चक्षुषी चन्द्रादित्यौ कर्णौ शुक्रबृहस्पती नासापुटे अश्विनौ दन्तोष्ठावुभे सन्ध्ये मुखं मरुतः स्तनौ वस्वादयौ हृदयं पर्जन्यं उदरमाकाशो नाभिरग्निः कटिरिन्द्राग्नी जघनं प्राजापत्यमूरू कैलासम्पूलं जानुनी विश्वेदेवौ

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ४६२ ] . : [ गायत्री रहस्योपनिषत् जङ्घे शिशिरः गुल्फानि पृथिवीवनस्पत्यादीनि नखानि महती अस्थीनि नवग्रहा असृक्के तुर्मासमृतुसन्धयः कालद्वमास्फालनं संवत्सरोनिमेषोऽहोरात्र मिति वाग्देवीं गायत्रीं शरणमह प्रपद्ये । य इदं गायत्रीरहस्यमधीते तेन ऋतसहस्रभिष्ट भवति । य इदं गायत्रीरहस्यमधीते दिवसकृत पापं नाशयति । प्रातर्मध्या- ह्नयोः षण्मासकृतानि पापानि नाशयति । सायं प्रातधीयानो जन्मकृतं पापं नाशयति । य इदं गायत्रीरहस्य ब्राह्मणः पठेत् तेन गायत्र्याः षष्टिसहस्रलक्षानि जप्तानि भवन्ति । सर्वान् वेदान- धीतो भवति । सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति । अपेयपानात् पूतो भवति । अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति । वृषलीगमनात् पूतो भवति । अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी भवति । षङ्क्तिषु सहस्रपानात् पूतो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति । इत्याह भगवान् ब्रह्मा । मैं ऐसी वाणी की अधिष्ठात्री देवी गायत्री का आश्रय लेता हूँ कि शिर ब्रह्ममय, शिखान्त भाग विष्णु, ललाट ( मस्तक) रुद्र, आँखें सूर्य तथा चन्द्रमा कान, शुक्राचार्य तथा बृहस्पति नाक के रन्ध्र अश्विनी- कुमार दाँतों के होठ दोनों संध्यायें मुख मरुत् ( वायु ) स्तन वसु आदि, हृदय बादल, पेट आकाश, नाभि अग्नि, कमर इन्द्र तथा अग्नि जाँघ प्राजापत्य ऊरुद्वय कैलाश के मूलस्थल, घुटने विश्वेदेव, जाङ्घायें शिशिर, गुल्फ ( पृथ्वी की वनस्पति आदि ) नख महान् तत्व हड्डियाँ नवग्रह, अन्तड़ियाँ केतु, मांस ऋतु सन्धियाँ, दोनों कालों का ( गमन ) बोधक, वर्ष तथा निमेष दिन एव रात हैं । जो इस गायत्री का अध्ययन करता है उसने तो मानो हजारों यज्ञ कर लिए । जो इस गायत्री रहस्य को पढ़ाता है वह दिन में किए पापों को नष्ट कर देता है । जो सुबह एवं मध्याह्न में इसे पढ़ता है, वह अपने छः महीने के पापों से मुक्त हो जाता है । जो प्रतिदिन प्रातः सायं इसका अध्ययन

गायत्री रहस्योपनिषत् ] [ ४६३ करे, वह सारे जन्म के पापों को नष्ट कर देता है। जो ब्राह्मण इस गायत्री रहस्य को पढ़े तो उसने मानों गायत्री मन्त्र को साठ हजार लाख बार जप लिया है। उसने सारे वेदों का अध्ययन कर लिया। सभी तीर्थों में उसने स्नान कर लिया। न पीने लायक (शराब आदि) को पीने से जो पाप होता है उससे भी मुक्त हो जाता है। न खाने लायक को खाने से हुए पाप से मुक्त हो जाता है। ब्रह्मचारी न भी हो तो ब्रह्मचारी के समान तेजस्वी हो जाता है। पंक्तियों में हजार बार (अपेय) पान कर पवित्र हो जाता है। तथा आठ ब्राह्मणों को इसका ग्रहण करवाकर, बताकर समझाकर ब्रह्मलोक को चला जाता है। ये सब भगवान् (प्रजापति) ब्रह्मा ने इस प्रकार उत्तर देकर समझाया। ॥ गायत्री रहस्योपनिषद् समाप्त ॥ —:o:—

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सावित्र्युपनिषत्

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निरा- कुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों; वाणी, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र, बल और सब इन्द्रियाँ वृद्धि को प्राप्त हों । सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं । मुझ से ब्रह्म का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे । ऐसे ब्रह्मरत रहते हुये मुझको उपनिषदों में प्रतिपादित ब्रह्म की प्राप्ति हो । ॐ शान्ति, शान्तिः शान्तिः । कः सविता का सावित्री ? अग्निरैव सविता पृथिवी सावित्री स यत्राग्निस्तत् पृथिवी यत्र वा पृथिवी तत्राग्निस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥१॥ कः सविता का सावित्री ? वरुण एव सविताऽऽपः सावित्री स यत्र वरुणस्तदापो यत्र वा आपस्तद्वरुण- स्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥२॥ कः कविता काः सावित्री ? वायुरेव सविताऽऽकाशः सावित्री स यत्र वायुस्तदाकाशो यत्र वा आकाशस्तद्वायुस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ३ ॥ कः सविता का सावित्री ? यज्ञ एव सविता छन्दांसि सावित्री स यत्र यज्ञस्तच्छ- न्दांसि यत्र वा छन्दांसि स यज्ञस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥४॥ कः सविता का सावित्री ? स्तनयित्नुदेव सविता, विद्युत् सावित्री

सावित्र्युपनिषत् ] [ ४६५

स यत्र स्तनयित्नुस्तद्विद्युत् यत्र वा विद्युत्त स्तनयित्नुस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ५ ॥ कः सविता का सावित्री ? आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री स यत्रादित्यस्तद् द्यौर्यत्र वा द्यौस्तदादि- त्यस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ६ ॥ कः सविता का सावित्री ? चन्द्र एव सविता नक्षत्राणि सावित्री स यत्र चन्द्रस्तन्नक्षत्राणि यत्र वा नक्षत्राणि स चन्द्रमास्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ७ ॥ कः सविता का सावित्री ? मन एव सविता वाक् सावित्री स यत्र वा मनस्तद्वाक् यत्र वा वाक् तन्मनस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथु- नम् ॥ ८ ॥ कः सविता का सावित्री ? पुरुष एव सविता स्त्री सावित्री स यत्र पुरुषस्तत् स्त्री यत्र वा स्त्री तत् पुरुषस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ९ ॥

सविता किसे कहते और सावित्री किसे ? अग्नि सविता और पृथिवी सावित्री हैं। जहाँ अग्नि हैं वहीं पृथिवी हैं और जहाँ पृथिवी हैं वहाँ अग्नि हैं । वे दोनों योनि अर्थात् संसार के जन्मदाता हैं, वे दोनों एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? वरुण देव ही सविता हैं और जल ही सावित्री, जहाँ वरुण देवता हैं वहीं जल है और जहाँ जल है वहीं वरुण देवता हैं । दोनों योनि अर्थात् संसार के उत्पत्ति- कर्ता हैं । वे दोनों एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? वायु सविता हैं और आकाश सावित्री । जहाँ वायु देव हैं वहीं आकाश है । जहाँ आकाश है वहीं वायु देव हैं । ये दोनों योनि हैं, एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? यज्ञ देव सविता हैं और छन्द सावित्री । जहां यज्ञ देव हैं वहीं छन्द हैं । जहाँ छन्द हैं वहीं यज्ञ देव हैं । वे दोनों योनि हैं एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? गरजन करने वाले बादल सविता हैं और विद्युत सावित्री । जहाँ गरजन करने वाले बादल हैं वहीं विद्युत हैं । जहाँ

विद्युत हैं वहीं गरजन करने वाले बादल हैं। वे दोनों एक योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? सूर्य को सविता कहते हैं और द्युलोक को सावित्री। जहां सूर्यदेव हैं वहीं द्युलोक हैं, जहां द्युलोक हैं, वहीं सूर्यदेव हैं। वे दोनों योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते और सावित्री किसे ? चन्द्रदेव को ही सविता कहते हैं और नक्षत्र को सावित्री। जहां चन्द्रदेव हैं वहीं नक्षत्र हैं। जहाँ नक्षत्र हैं वहीं चन्द्रदेव हैं। वे दोनों एक योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? मन को ही सविता कहा गया है और वाणी को सावित्री, जहाँ मन है वहीं वाणी है, जहाँ वाणी है वहीं मन है। वे दोनों एक योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? पुरुष को ही सविता कहा गया है और स्त्री को सावित्री। जहाँ पुरुष है वहीं स्त्री है, जहाँ स्त्री है वहीं पुरुष है। वे दोनों एक योनि हैं। एक युग्म हैं ॥ १-६ ॥ तस्या एव (ष) प्रथमः पादो भूस्तत्सवितुर्वरेण्यमित्यग्नि- र्वै वरेण्यमापो वरेण्यं चन्द्रमा वरेण्यम् ॥ १० ॥ तस्या एव (ष)- द्वितीयः पादो भर्गमयो भुवो भर्गो देवस्य धीमहीत्यग्निर्वै भर्ग आदित्यो वै भर्गश्चन्द्रमा वै भर्गः ॥ ११ ॥ तस्या एष तृतीयः पादः स्वधियो यो नः प्रचोदयादिति स्त्री चैव पुरुषश्च प्रजयनतः ॥ १२ ॥ यो वा एतां सावित्रीमेवं वेद स पुनर्मृत्युं जयति ॥ १३ ॥ सावित्री का पहला पाद—'भूः—तत्सवितुर्वरेण्यम' है। अग्नि, जल व चन्द्रमा देवता ही वरेण्य हैं। सावित्री का दूसरा पाद है 'भुवः— भर्गो देवस्य धीमहि' वह तेजोमय है। अग्नि, सूर्य व चन्द्रमा देवता ही वह भर्ग तेज हैं। सावित्री का तीसरा पाद है 'धियो योनः प्रचोदयात्।'

सावित्र्युपनिषत् ] [ ४६७ इस सावित्री देवी को जो स्त्री और पुरुष गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए समझते हैं वे मृत्यु से छूट जाते हैं अर्थात् पुनः जन्म नहीं लेते ॥ १०–१३ ॥ बलातिबलयोर्विराट् पुरुष ऋषिः । गायत्री छन्द । गायत्री देवता । अकारोकारमकारा बीजाद्याः । क्षुधाऽऽदिनिरसने विनि- योगः । क्लामित्यादि षडङ्गम् । ध्यानम्— अमृतकरतलाग्रौ सर्वसंजीवनाढ्या- वघहरणसुदक्षो वेदसारे मयूखे । प्रणवमयविकारौ भास्कराकारदेहौ सततमनुभवेऽहं तौ बलातिबलान्तौ ॥ ओ३म् ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विधपुरु- षार्थसिद्धिप्रदे तत्सवितुर्व्वरदात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्त वर- दात्मिके अतिबले सर्वदयामूर्ते बले सर्वक्षुच्छ्रमोपनाशिनी धीमहि धियो यो नजर्ति प्रचुर्या या प्रचोदयात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हुं फट् स्वाहाः ॥ १४ ॥ एवं विद्वान् कृतकृत्यो भवति सावित्र्या एव सलोकतां जयतीत्युपनिषत् ॥ १५ ॥ बलि अतिबलि नाम की दो विद्याओं के ऋषि विराट पुरुष हैं और उनका छन्द और देवता गायत्री हैं । उसका 'अ'कार बीज है और 'उ'कार शक्ति । उनका 'म'कार कीलक है । भूख की निवृत्ति के लिए इसका विनियोग है । क्लीं के माध्यम से इनका षडङ्गन्यास करना चाहिए । ॐ क्लीं हृदयाय नमः, ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्लीं शिखायै वषट्, ॐ क्लीं कवचाय हुम, ॐ क्लीं नेत्रयाय वौषट्, ॐ क्लीं अस्त्राय फट् ।' अब ध्यान का वर्णन किया जाता है । मैं उन बला अतिबला

४६८ ] [ सावित्र्युपनिषत् विद्याओं के देवताओं को सदैव अनुभव करता हूं जो सूर्य के समान चमकते हुए शरीर वाले, प्रणव स्वरूप, किरणात्मक, वेदों के साररूप, पापों को समाप्त करने में दक्ष, सब तरह की सञ्जीवनी शक्तियों से अधिष्ठित हैं और जिनके हाथ अमृत से भरे हुए हैं। बलि और अतिबलि दोनों विद्याओं के देवताओं का मन्त्र इस प्रकार है:-- ॐ ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धि- प्रदे तत्सवतुर्वरात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्य वरदात्मिके अतिबले सर्व- दयामूर्ते बले सपंक्षुत्भ्रमोपनाशिनि धीमहिधियो या नो जाते ऽप्रचुर्य या प्रचोदयात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हुं फट् स्वाहा । इस तरह इन विद्याओं को जानने वाला धन्य हो जाता है। वह सावित्री देवी के लोक में पहुंचने की सामर्थ्य रखता है । यह उपनिषद् है ॥ १४ ॥ ॥ सावित्र्युपनिषद् समाप्त ॥

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सरस्वतीरहस्योपनिषत् ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमा- विरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेना- धीतेनाहोरात्रात्संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारमवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्तिपाठ—ॐ मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर हो, हे स्वयं प्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ । हे वाणी और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो, इसलिये मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो । इस वेदाभ्यास ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत करता हूँ । मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ऋषयो ह वै भगवन्तमाश्वलायनं संपूज्य पप्रच्छु— केनोपायेन तज्ज्ञानं तत्पदार्थविभासकम् । यदुपासनया तत्त्वं जानासि भगवन् वद ॥१॥ सरस्वतीदशश्लोक्या संऋचा बीजमिश्रया । स्तुत्वा जप्त्वा परां सिद्धमलभं मुनिपुंगवाः ॥२॥ ऋषय ऊचुः— कथं सारस्वतप्राप्तिः केन ध्यानेन सुव्रत । महासरस्वती येन तुष्टा भगवती वद ॥३॥

४७० ] सरस्वतीरहस्योपनिषत् स होवाचाश्वलायनः- अस्य श्रीसरस्वतीदशश्लोकमहामन्त्रस्य-अहमाश्वलायन ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीवागीश्वरी देवता । यद्वागिति बीजम् । देवीं वाचमिति शक्तिः । प्रणो देवीति कीलकम् । विनियोगस्तत्प्रीत्यर्थे । श्रद्धा मेधा प्रज्ञा धारणा वाग्देवता महासरस्वतीत्येतैरंगन्यासः ॥ ४ ॥ एक समय की बात है भगवान् आश्वलायन के निकट ऋषिगण गये और उनकी विधिवत् पूजा कर प्रश्न किया 'भगवन् ! जिस ज्ञान के द्वारा 'तत्' पदात्मक परमेश्वर का स्पष्ट बोध होता है, उस ज्ञान की प्राप्ति किस प्रकार हो ? आपको जिस देवता की उपासना द्वारा तत्त्व- ज्ञान की प्राप्ति हुई है, इसके सम्बन्ध में बताने की कृपा करिये ।' भगवान् आश्वलायन ने कहा- 'ऋषियो ! मैंने बीज मन्त्र सहित दस ऋचाओं वाली सरस्वती दशश्लोकी के द्वारा उपासना करते हुए परासिद्धि को प्राप्त किया है ।' ऋषियों ने पुनः प्रश्न किया- 'हे श्रेष्ठव्रती महर्षे ? उस सारस्वत मन्त्र की उपलब्धि आपको किस ध्यान के द्वारा किस प्रकार हुई, जिससे आप पर भगवती महासरस्वतीजी का अनुग्रह हुआ है। हमारे प्रति भी उस उपाय को कहने की कृपा करें ।' इस पर उन प्रसिद्ध आश्वलायन ने कहा- 'इस श्री सरस्वती दशश्लोकी महामन्त्र का ऋषि मैं ही हूँ। इसका छन्द अनुष्टुप, देवता वागीश्वरी और बीज यद्वाग् है। शक्ति 'देवीं वाचं' कीलक 'प्रणो देवी' है। इसका विनियोग श्री वागीश्वरी देवता के प्रीत्यर्थ है। अंगन्यास श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, धारणा, वाग्देवता और महासरस्वती इन नाम-मन्त्रों से किया जाता है ॥ १-४ ॥ नीहारहारघनसारसुधाकराभा

सरस्वतीरहस्योपनिषत् ] [ ४७१- CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri कल्याणदां कनकचम्पकदामभूषाम् । उत्तुंगपीनकुचकुम्भमनोहरांगीं वाणीं नमामि मनसा वचसां विभूत्यै ॥५ प्रणो देवीत्यस्य मन्त्रस्य—भरद्वाज ऋषिः। गायत्री छंदः। श्रीसरस्वती देवता । प्रणवेन बीज । शक्तिकीलकम् । इष्टार्थे विनियोगः । मन्त्रेण न्यासः ॥ ६ ॥ या वेदांतार्थतत्त्वैकस्वरूपा परमेश्वरी । नामरूपात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वती ॥७ ॐ प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । धीनामवित्र्यवतु ॥८ आ नो दिव इति मन्धूस्य—अत्रिऋर्षिः। त्रिष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । ह्रीमिति बीजशक्तिकीलकम् । इष्टार्थे विनि- योगः । मन्त्रेण न्यास ॥ ६ ॥ या सांगोपांगवेदेषु चतुष्वेंकव गीयते । अद्वैता ब्रह्मणः शक्तिः सा मां पातु सरस्वती ॥१० ह्रीं आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम् । हवं देवी जुजुषाणा घृताची शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥११ पावका न इति मन्त्रस्य—मधुच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । श्रीमिति बीजशक्तिकीलकम् । इष्टार्थे विनियोगः मन्त्रेण न्यास ॥ १२ ॥ या वर्णपदवाक्यार्थस्वरूपेणैव वर्तते । अनादिनिधनाऽनन्ता सा मां पातु सरस्वती ॥१३ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

४७२ ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् श्रीं पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टुं धिया वसुः ॥१४ चोदयित्रीति मन्त्रस्य—मधुच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । ब्लूमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ १५.॥ ध्यान इस प्रकार करना चाहिए—'कल्याण प्रदायिनी, हिम, कपूर, मुक्ता अथवा चन्द्रप्रभा के समान शुभ्र कान्तिवती, सुवर्ण के समान पीले चम्पक पुष्पों की माला से अलंकृत, उन्नत सुपुष्ट वक्ष सहित सुन्दर अंगवाली वागेश्वरी को मन और वाणी द्वारा विभूति की सिद्धि के निमित्त नमस्कार करता हूँ ।' 'ॐ प्रभो देवी' मन्त्र के ऋषि भरद्वाज, छन्द गायत्री और देवता सरस्वतीजी हैं । ॐ नमः' बीज, शक्ति तो है ही, साथ ही कीलक भी हैं । अभीष्ट कार्य की सिद्धि के निमित्त इसका विनियोग और मंत्र के द्वारा अङ्गन्यास किया जाता है । 'जिस सरस्वती का स्वरूप वेदांत का सारभूत ब्रह्मतत्व ही है और जो विभिन्न नाम रूपों में प्रकट हैं, वे सरस्वती मेरी रक्षिका हों ।' दान से सुशोभित होने वाली, स्तोताओं की रक्षिका एवं अन्नवती भगवती सरस्वती हम साधकों को अन्न से परिपूर्ण करें । 'आ नो दिवा०' इस मंत्र के ऋषि अत्रि, छन्द त्रिष्टुभ् और देवता सरस्वती हैं । 'ह्रीं बीज, शक्ति और कीलक है । इच्छित कार्य की सिद्धि के लिए इसका विनियोग तथा इसी मन्त्र द्वारा न्यास किया जाता है । 'वेदों और उनके अङ्ग-उपांगों में जिन एक देव की स्तुति की जाती है तथा जो परमब्रह्म की अद्वैत शक्ति हैं, वे भगवती सरस्वती हमारी रक्षिका हों ॥ ५—१० ॥