१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
दो विभाग तुरंत इकट्ठा हो गए और अपनी पूरी सेना सहित कुंवर सिंह गंगा घाट के अधिक ही पास आ गया। अप्रैल की 17 तारीख को यह थकी हुई अंग्रेजी सेना अथुसिरवा गांग में सो गई। भोर होने पर जब डगलस आगे बढ़ा तो उसने देखा, विद्रोही उससे सत्रह मील आगे है। अतः वह सारा दिन अंग्रेजी घोड़े और तोपखाना विद्रोहियों की खोज में दौड़ता रहा। पर अंग्रेजी पैदल बहुत पीछे पड़ता रहा। तब कुंवर सिंह से चार मील पहले अंग्रेजी सेना एक नींद लेने लग गई। कुंवर के जासूस शत्रु की बात उड़ाने में अति कुशल थे। उन्होंने अंग्रेजों के सौ जाने का समाचार तत्काल कुंवर सिंह को दिया और कुंवर उठा-उसने शत्रु की नींद का लाभ लेने का निश्चय किया। वह अस्सी वर्ष का वृद्ध राजपूत अपनी सारी सेना के साथ उस आधी रात के अंधेरे में तुरंत निकला और सिंकदरपुर आ गया। घाघरा नहीं उतरा, गाजीपुर प्रदेश में घुसा और सीधे मनोहर शहर तक दौड़कर आया और अपनी थकी हुई, पस्त हुई भूखी सेना को कुछ विश्राम देने थोड़ा ठहर गया। कुंवर की सेना अब बहुत ही थक गई थी। मनोहर गांव का स्थान बहुत मजबूत न होते हुए भी उन्हें विश्राम के लिए ठहरना ही पड़ा। इस गांव में विद्रोही आगे जाना असंभव होने से ठहरे हुए हैं, यह सुनते ही डगलस दौड़ने लगा और 20 अप्रैल को मनोहर गांव आ पहुंचा। उस दिन उन थके हुए विद्रोहियों का जोर कम पड़ा और अंग्रेजी सेना ने उन्हें पराजित कर उनकी गाड़ियां-रसद छीन लीं। परंतु वह वृद्ध युवा या उसका धीरज नही हारा। पराजय का चिह्न देखते ही पहले से ही सोचा-समझा आदेश जारी हुआ। कुंवर की सेना पलक झपकते ही छोटी-छोटी टुकड़ियों में बंटकर रणक्षेत्र से तत्काल एक निश्चित समय पर निश्चित स्थान पर एकत्र होने हेतु अदृश्य हो गई। अंग्रेजी सेना इस संबंध में कुछ भी जान न सकी और अपनी विजय निष्फल देख वहीं ठह गई। कुंवर सिंह अपनी सेना के साथ गंगा पाट के बहुत नजदीक हो गया। वह गंगा के पाट के अधिकाधिक पास आ गया। भयानक स्पर्धा जीतकर गंगा पाट से भिड़ भ गया! पीछे अंग्रेजीसेना दौड़ती आ रही थी; परंतु उसका सामना करने की शक्ति या समय अब शेष नहीं था, इसलिए उस चतुर वृद्ध ने एक अलग ही युक्ति भिड़ाई। उसने यह अफवाह फैला दी कि नौका न मिलने से कुंवर सिंह की सेना हाथियों से बाल्टिला के पास गंगा पार होने वाली है। यह समाचार अंग्रेजी जासूसों द्वारा पकड़कर डगलस को सूचित करते ही वह प्रसन्नतापूर्वक अपने जासूसों पर गर्व करने लगा। अब कुंवर सिंह कहां जाएगा? उसका यह गुप्त समाचार मिल जाने से मैं उसके हाथी सहित नष्ट कर दूंगा। इसलिए अंग्रेजी सेना बाल्टिला के पास जाकर उस भारी हाथी की राह देखती रही। ओ शूरवीर ! मजे से छिपकर बैठो। तुम्हारी इस स्वनिर्मित कैद में तुम अटके पड़े हो और कुंवर सिंह का हाथी अब फिर आएगा, इसलिए तब तक नींद निकाल 1857 का स्वातंत्र्य समर — 340
रहे हो, इसी समय सात मील दूर कुंवर सिंह गंगा उतरकर जा रहा था। हाथियों से गंगा पार करने के समाचार से बाल्टिला की ओर उन्हें भेजकर कुंवर ने उतनी नौकाएं तुरंत इकट्ठा कीं और रात-ही-रात में उसकी सेना मेयो घाट से श्री गंगा के जलाशय में प्रवेश कर गई। अंग्रेजों को उनके साथ किया गया धोखा ध्यान में आते ही वे भोर के समय सैदोपुर घाट पर गुस्से से भरे टूट पड़े और उन्होंने पांडे लोगों की एक नौका भी डुबो दी; पर वह अंतिम नौका थी। सारी सेना कुंवर सिंह ने पहले ही गंगा पार उतार दी थी और क्षण-दो क्षण में अपनी सेना को सुरक्षित नदी पार हुआ देखकर वह भी पार हो गया होता; परंतु हाय! हाय! अभिमान, स्वतंत्रता की वह तलवार-राणा कुंवर सिंह! गंगा पाट ममें बीचोबीच पहुंच गया तब शत्रु की एक गोली आई और उसके हाथ में घुस गई। यह देखते ही उस भीष्म ने क्या किया? अश्रु बहाने लगा क्या? रक्त का बहाव रोकने के लिए किसी से सहायता मांगने लगा क्या? क्या उसका आसन उस तीव्र वेदना से किंचित् भी विचलित हुआ? नहीं-नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हाथ पर मक्खी बैठे, उतना भी कंपित नहीं हुआ। उसने एक बार उस गोली की ओर तिरस्कार से देखा और कुंवर सिंह को मैंने एक क्षण भी अस्वस्थ किया, उस फिरंगी गोली को यह अभिमान भी न हो-ऐसा उसे लगा। उसने दूसरे हाथ से अपनी तलवार खींच ली और फिरंगी गोली से भ्रष्ट हुआ हाथ कुहनी से छांट दिया और वह काटा हुआ टुकड़ा गंगा को अर्पण करते हुए कुंवर सिंह ने गंभीर गर्जना की-हे माता, हे गंगा! बालक का यह शेषोपहार स्वीकार करें!154 भागीरथी को हे माता, हे माता कहनेवाले सैंकड़ों पृथजन आज तक जनमे और जनमेंगे, पर कुंवर सिंह, तेरे कारण वह देवी जाह्नवी पुत्रवती हुई है! 'नक्षत्रतारागृहसंकुलापि ज्योतिष्मती चंद्रमसैव रात्रिः!' इस लोकोत्तर पुरुष द्वारा यह अलौकिक उपहार अपनी त्रिलोक विख्यात मातृगंगा को अर्पित करते ही उसकी शीतल फुहारों ने उसका देह सिंचन किया और इस मातृप्रेम से उत्साहित वह वीरवर अपनी सेना के साथ गंगा पार हो गया। उसका पीछा करती अंग्रेजी सेना हताश होकर गंगा के इस ओर ही कुंवर सिंह का नाम लेना छोड़ऋकर बैठी हुई थी । तब वैर भाव से रहित हुआ वह सिंह शाहाबाद प्रांत के अपने जन्मसिद्ध जंगल में फिर एक बार घुसने लगा। 22 अप्रैल को उसने जगदीशपुर में भी प्रवेश किया और इस तरह जिस राजमंदिर से उसे कोई आठ माह पूर्व अंग्रेजों ने निकाल दिया था उसी जगदीशपुर के राजमहल में उसका अपना राजा फिर एक बार विराजने लगा। कुंवर सिंह के गंगा उतरकर आते ही उसका समान वीर बंधु अमर सिंह हजारों सशस्त्र ग्रामीणों के साथ उसे आकर मिल गया। इन लोगों को और गंगा उतरकर आए शूर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 341 154 1. रजनीकांत गुप्त कृत 'आर्य कीर्ति', बंगाल।
सिपाहियों को कुंवर सिंह ने जगदीशपुर के चारों ओर के जंगल में निशाने-निशाने पर नियुक्त किया और छापामार युद्ध से विजयश्री माया हुआ वह वीर रणपुरूष रण के लिए सज्जित होकर फिर से रण में उतरा। और फिर युद्ध शुरू हुआ। कुंवर सिंह इतनी तेजी से जगदीशपुर में आ घुसा था कि पास में ही आरा की अंग्रेजी सेना को उसके आगमन की सूचना नहीं मिली। तब जगदीशपुर के राजमहल में कुंवर सिंह फिर से आ धमका है, यह सुनकर आरा का अंग्रेज सेनानी ली ग्रांड गुस्से से आगबबूला हो गया । पूर्व अवध से अंग्रेजी सेना को थप्पड़ मारते-मारते यह कुंवर गंगा उतर आया और खुद मेरे सीने पर से चलकर जगदीशपुर में राज्य करने लगा। पूरे आठ माह नहीं हुए जब होअर इसी जंगल में कुंवर को नरम करने घुसा था। वैसे ही आज मैं भी घुसूंगा और इस सारे अपमान का बदला लेकर वैसी ही विजय भी प्राप्त करूंगा। यह निश्चय कर वह अंग्रेज सेनानी चार सौ सैनिक और दो भयंकर तोपें लेकर 23 अप्रैल को जगदीशपुर पर टूट पड़ा। अब इस युद्ध में कुंवर सिंह कैसे टिका रहे? वह आज तक लगातार लड़ते-लड़ते खड़ा हुआ है, उसकी सेना को कितने ही दिन भरपेट खाने को और घड़ी भर सोने को समय नहीं मिला! कल ही वह इस महायात्रा के बाद जगदीशपुर के राजमहल में आया-उसे और उसकी सेना को एक दिन की भी फुरसत नहीं मिली-उसकी सेना भी इस समय अंग्रेजों की रिपोर्ट के अनुसार-‘उसकी सेना बेतरतीब बिखरी हुई, शस्त्र, अस्त्र, तोपें आदि युद्ध सामग्री से अपूर्ण पंगु-सी बन गई थी।‘' उनके पस एक भी बंदूक नहीं, उनके हताश लोगों की संख्या खींच-तानकर डेढ़ हजार, उनके पास टूटे-मुड़े शस्त्र, उनमें शिक्षित सिपाही नहीं के बराबर और स्वयं उस वृद्ध सेनानी का हाथ कल ही कटा था। पांडे लोगों की ऐसी सेना पर तोपों के साथ, ताजा दम उत्तम शिक्षित आंग्ल सेना के साथ ली ग्रांड का आक्रमण। इस असमान लड़ाई में विजय अंग्रेजों की होगी, यह निश्चित था! वह अंग्रेज बहादुर जगदीशपुर की घनी झाड़ियों में घुस गया। इन झाड़ियों की लंबाई डेढ़ मील ही थी। झाड़ी में घुसते ही कुंवर सिंह के लोगों पर अंग्रेजी सेना गुराते हुए गोले छोड़ने लगी। कुंवर के पास तो तोपें थी ही नहीं, पर ऐसा होते हुए भी कुंवर की सेना अंग्रेजी सेना की तोपों की खिल्ली उड़ाते हुए उसे घेरकर बांधना चाहती थी। फिर अब छोड़ें अंतिम बाण! अंग्रेजी सेना ने जोरदार हमला करने का निश्चय किया। वे कालदूत की तरह कुंवर पर टूट पड़े, कुंवर की सेना झाड़ियों में से उनका सामना करने लगी। अरे! अंग्रेजी सेना की हिम्मत एकदम टूट गई, पीछे लौटने का बिगुल बज उठा। कुंवर ने अंग्रेजी सेना को ऐसी जगह और इस रीति से फांस लिया था कि वहां खड़ा रहना या वहां से भागना-ये दोनों ही समान रूप से घातक थे। इधर कुंवर सिंह के आदेश से उसके राजमहल का सारा महत्त्वपूर्ण सामान दूसरी जगह भेज दिया गया था। वैसे ही सरकारी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 342
कागज आदि न जलाकर उसने सिपाहियों को कहा कि अंग्रेजों को यहां से भगा देने के बाद वास्तविक वसूली और न्याय करने के लिए ये कागज अवश्य रखे जाने चाहिए। लोगों का उसके प्रति इतना आदर था कि उसके सामने कोई धूम्रपान करने की हिम्मत नहीं करता था।¹⁵⁵ 23 अप्रैल को अंग्रेजी सेना को ऐसी धोबी पछाड़ देकर उस वृद्ध युवा राजा कुंवर सिंह ने अपने जगदीशपुर के राजमहल में विजयश्री के साथ प्रवेश किया। यह उसका अंतिम प्रवेश था, क्योंकि विश्व की रंगभूमि पर अब कुंवर सिंह फिर से प्रकट नहीं होगा। उसके हाथ में गंगा पार में जो भयानक घाव हुआ थ वह बहुत बढ़ जाने के कारण वह राजपूत कुलकीर्ति राजा कुंवर सिंह इस विजय के तीसरे दिन 23 अप्रैल को अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित राजमहल में स्वतंत्रता के झंडे के नीचे चिन्मय रूप में लीन हो गया। जब उसका जन्म हुआ था तब उसकी भूमि स्वतंत्र थी और उसका प्राणोत्सर्ग भी स्वतंत्रता के झंडे के नीचे हुआ। जिस दिन वह मरा उस दिन जगदीशपुर के रजवाड़े पर अंग्रेजों का निशान नहीं, उसके स्वदेश एवं स्वधर्म का स्वातंत्र्य थी और उसका प्राणोत्सर्ग भी स्वतंत्रता के झंडे के नीचे हुआ। जिस दिन वह मरा उस दिन जगदीशपुर के रजवाड़े पर अंग्रेजों का निशान नहीं, उसके स्वदेश एवं स्वधर्म का स्वातंत्र्य ध्वज फहरा रहा था। राजपूत के लिए इससे अधिक पुण्यतर मृत्यु कौन सी हो सकती है! उसने अपने अपमान का प्रतिशोध लिया। उसने रणांगण में अत्यल्प साधनों से अंग्रेजी सेना जैसे प्रबल शत्रु के अनेक बार दांत खट्टे किए थे। उसने स्वधर्म से धर्मद्रोह या स्वदेश से देशद्रोह नहीं किया। उसने अपनी भूमि की दास्य श्रृंखला तोड़कर उसे स्वतंत्र किया और युद्ध में आज अस्सी वर्ष के उस वृद्ध कुंवर सिंह का विजयश्री ने अलौकिक आलिंगन किया हुआ है, तो हे सिंह कुमार! यही वह मुहूर्त है और यही वह वेला, हे धर्मपक्षीय भीष्म! यही उत्तरायण है-इसलिए तू अपने वीर तन का त्याग कर! और वह भी रोग से नहीं, युद्ध के घावों से! जैसा तेरा जीवन लोकोत्तर वैसी ही तेरी मृत्यु भी! इसीलिए वह कुंवर सिंह उस दिन मरा। राजपूत के लिए इससे अधिक पुण्यतर मृत्यु कौन सी हो सकती है! श्री कुंवर सिंह की भूमिका किसी वीर काव्य के नायक स्थान पर शोभित हो सकती है। सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में यदि कोई सब प्रकार से योग्य नेता था तो वह कुंवर सिंह ही था। युद्धकला में उसकी बराबरी कर सके, ऐसा कोई नहीं था। स्वातंत्र्य युद्ध में कूट युद्ध का कितना महत्त्व होता है, यह सबसे पहले कुंवर ने पहचाना और शिवाजी के कूट युद्ध का सही-सही नकल कैसे की जाए, उसी अकेले ने सिद्ध किया। तात्या टोपे और कुंवर सिंह के युद्ध चातुर्य की तुलना करें तो कुंवर की कूट पद्धति ही अधिक बेतोड़ थी, ऐसा दिखाई देता है। तात्या ने कूट युद्ध की काट करने में अधिक चतुराई प्रकट की। परंतु कुंवर ने निषेध जैसी ही विधि रूप में भी कूट युद्ध की पूर्णता 1857 का स्वातंत्र्य समर – 343
155 1. रजनीकांत गुप्त कृत 'आर्य कीर्ति', बंगाल।
सिद्ध कर दी। तात्या ने सैनिकों का नाश नहीं होने दिया; परंतु कुंवर ने तो उसके अतिरिक्त शत्रु सेना का यथावसर नाश भी किया। कूट युद्ध में पूर्ण विजय पाने के लिए यह सावधानी रखनी होती है कि बड़े शत्रु के आगे से भागते समय उस पराजय से अपनी सेना हताश या भयग्रस्त न हो। जान-बूझकर स्वीकारी हुई पराजय से उनकी आत्मनिष्ठा दुर्बल न हो और लड़ाई की बार-बार टाला-टूली से लड़ाई के संबंध में उनके मन में कोई स्थायी भय न समा जाए-इसके लिए छापामार युद्ध का सेनानी हमेशा सतर्क रहे। लड़ाई टालना अलग बात है और लड़ाई लड़ते हुए भीरुता के कारण पराजित होकर पीछे हटना अलगा बात। अर्थात् कूट युद्ध में भीरुता के कारण पराजित होकर कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। लड़ाई लड़नी ही पड़े तो ऐसी लड़ें कि शत्रु के मन में अपनी शूरता का भयंकर भय उत्पन्न हो जाए और अपनी सेना आत्मनिष्ठा की स्फूर्ति से भर जाए। सेनानी की मुख्य खूबी यही होनी चाहिए कि अधिक हानि की आशंका की स्थिति मेमं वह सामना टालता जाए। पर जब सामना हो ही जाए तो ऐसी शूरता प्रदर्शित करे कि जैसी बाजी प्रभु ने पावन घाटी में या कुंवर ने तानू नदी के पुल पर दिखाई। सारांश यह कि लाभ में न हो तो लड़ाई टाले, लाभकारी हो तो लड़ाई लड़े, परंतु कभी भी रण में भय या अनुशासनहीनता से अपनी बदनामी न करवाए। शूरता से ऐसी लड़ाई लड़े कि रण में पराजय हो तो भी विश्व में सत्कीर्ति बढ़े। इससे शत्रु डर जाता है, अपनी सेना में अनीति नहीं बढ़ती, अनुशासन नहीं छूटता, उत्साह बढ़ने लगता है, शूरता का उत्कर्ष होता है, विजय पक्की होती है। शत्रु ने हमें शूरता से जीता है, ऐसा कभी न होने देना ही कूट युद्ध की कुंजी है। तात्या टोपे ने छापामार युद्ध के विधिरूप का अवलंबन अधिक बार नहीं किया था। जब वे नर्मदा उतरे और जब कुंवर सिंह गंगा उतरे तब दोनों के युद्ध-कौशल में क्या अंतर था, यह स्पष्ट दिखता है। तात्या टोपे की सेना को डर के कारण बार-बार पराजय स्वीकार करनी पड़ी। परंतु कुंवर ने पीछे हटते हुए भी शत्रु अपनी शूरता की डींग हांके, ऐसी स्थिति नहीं बनने दी और जब-जब अवसर मिला तब-तब शत्रु को ऐसा झापड़ लगाया कि रण में उसकी सेना में अधिक आत्मनिष्ठा और वीरस्फूर्ति बनी रहती। तात्या अधिकतर अपनी इच्छा के अनुसार चल नहीं पाते होंगे और इसलिए उनको जो चाहिए था उस परिस्थिति में वे उतना नहीं कर पाते थे; पर कुंवर सिंह ने छापामार युद्ध लड़ते हुए शिवभूप की तरह ही सेना में कातरता और अनीति नहीं घुसने दी और लड़ाई टालना और लड़ाई करना-इस विधि-निषेध से वक्र युद्ध के दोनों ही अंगों का खेल करने में अप्रतिम युद्ध-कौशल दिखाया। इसीलिए वह अंग्रेजी सेना के सीने पर तांडव करते-करते पवित्र विजयानंद में, अपने राजभवन में, स्वतंत्रता के झंडे तले और देवदूतों के पंखों के नीचे पुण्य पावन मृत्यु प्राप्त कर सके। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 344
सन् 1857 की 26 अप्रैल को इस दिव्य पुरूष के देवलोक जाते ही उसके सिद्धांतों का, उसके ध्येय का, उसकी सेना का और उसके ध्वज का सारा भार अपने सिर लेकर कुंवर सिंह का कनिष्ठ बंधु अमर सिंह गद्दी पर बैठा। कुंवर सिंह का यह कनिष्ठ बंधु अमर सिंह, एक ही सिंहनी की गर्भगुहा से संभव हुए थे, वे दो केसरी किशोर अपने प्रखर नखों की तीक्ष्णता में परस्पर तुल्य थे। भाई की मृत्यु के कारण इस लड़ाई में जरा भी ढील न देकर पूरे चार दिन भी विश्राम न करते हुए यह रणपंडित अमर सिंह भी आरा शहर का दरवाजा ठोकने लगा। ली ग्रांड की पराजय सुनकर पीछे गंगा किनारे ही खड़ा ल्यूगार्ड व ब्रिगेडियर डगलस दोनों अपनी-अपनी सेना के साथ अमर सिंह पर 3 मई को चढ़ आए। मिहिया, हंतमपुरा, दलितपुरा में विद्रोहियों पर हर दो-तीन दिन बाद अंग्रेज गोलीबारी करते। जगदीशपुर भी अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया। उस सबल सेना के पंजे से छूटने तथा पराभव टालने को अमर सिंह ने एक अप्रतिम युक्ति खोज ली थी। उसने रणक्षेत्र में अपनी सेना की छोटी-छोटी टोलियां बनाईं और पराजय का रंग दिखते ही वे टोलियां शीघ्र ही इधर-उधर हो जाती। उस प्रदेश के इंच-इंच की जानकारी उन्हें होने से नियत समय पर सारी टोलियां नियत स्थान पर इकट्ठा होतीं और फिर से अंग्रेजों को बिलकुल दिखती ही नहीं थी। किसी भूत-प्रेत की तरह उस सारे प्रदेश में अंग्रेजी सत्ता के कण-कण को पछाड़ते हुए भी अमर सिंह उन्हें प्रत्यक्ष कहीं नहीं दिख रहा था। एक टोली राजपुर होती, दूसरी दमरान तो तीसरी कर्मनाशा पर बने रेल कारखाने धूल में मिला देती। जंगल के इस छोर से अमर सिंह को निकालें तो वह जंगल का दूसरा छोर जीत लेता, जंगल के उस छोर की ओर अंग्रेजी सेना दौड़ती तो इस छोर पर अमर सिंह फिर राज्य करने लगता। शाहाबाद प्रदेश के समस्त लोकसमूह की सहानुभूति और सहकर मिलते रहने से अमर सिंह के साथ रण का खेल-खेलते हुए ल्यूगार्ड और उसकी विशाल सेना की हड्डियां नरम पड़ गईं। 15 जून को वह निराश-हताश अंग्रेज सेनापति इस्तीफा देकर इंग्लैंड चला गया और उसकी थकी हुई सेना आराम करने छावनी में चली गई। यह देखते ही सारी छोटी-छोटी टोलियां एकत्र हो गईं और जगदीशपुर का राजा अमर सिंह और उसकी सेना रण-मैदान में फिर से प्रकट हो गई। उस विजय आवेश से भरी उस सेना ने गया में कैद सारे विद्रोहियों को वहां की अंग्रेजी पुलिस से मुक्त कराया और इस तरह गया शहर स्वतंत्र हो गया और आरा की अंग्रेजी सेना को युक्ति से शहर के बाहर बुलवाकर उसपर अमर सिंह का झंडा लगा दिया। इस तरह हर ओर अमर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 345
सिंह का कहर बरपा और जुलाई में उसने फिर एक बार जगदीशपुर में प्रवेश किया। जुलाई बीती, अगस्त बीता, सितंबर बीता फिर भी जबदीशपुर में स्वतंत्रता का झंडा हर दिन की सूर्यकिरण में फहराता ही रहा। ब्रिगेडियर डगलस जैसा अंग्रेज सेनानी और सात हजार अंग्रेजी सेना उस छोटे से राजा पर दांत भींचकर टूटते रहे, उसका सिर काटने या उसकी योजना भंग करने का अनेक देशद्रोही भी उसकी सेना में धन का लालच देकर भेजे गए। जंगल में नए रास्ते बनाए गए, नाके-नाके पर अंग्रेजी सेना की पक्की कतार बांधी गई। परंतु कुछ भी करें, जगदीशपुर का राजा परेशान नहीं हा पाया। उसके अनंत दाव-घातों की सारी कथाएं यहां स्थानाभाव के कारण नहीं दी जा सकती । इतना कहना काफी है कि स्वतंत्रता के पुण्य रण में वह वीर अमर सिंह आमरण ऐसे ही पूर्ण साहस से समरांगण में भिड़ा रहा। अंत में उसे जगदीशपुर में ही कैद करके गाढ़ देने के उद्देश्य से अलग-अलग सात अंग्रेजी सेनाएं जगदीशपुर के सारे रास्ते बंद करती हुई चढ़ आईं। प्रदेश भर से सारे विद्रोहियों को इस जाल से भगाते-भगाते 17 अक्तूबर को वह कालपाश जगदीशपुर की सीमा से जा भिड़ा। हाय! हाय! अब इस कालपाश में वह स्वतंत्रता-प्रेमी सिंह पकड़ा जाएगा! नियत समय पर ये सातों बलशाली सेनाएं अचानक जगदीशपुर को घेर लें, उसे कड़ा आदेश जारी हुआ और उस आदेश के अनुसार चारों ओर से बंद उस जगदीशपुर के पिंजड़े के अमर सिंह पर कठोर वार हुआ। पर शाबाश रे अमर सिंह, शाबाश! इस कठोर वार को पिंजड़ा मिला, पर सिंह वहां नहीं मिला तो नहीं मिला! क्योंकि छह सेनाएं छह रास्तों से अचूक आ गईं, फिर भी सातवीं सेना आने में पांच घंटे की देर हो गई और इस विलंब का कुशाग्र अमर सिंह सुशीघ्र लाभ लेकर उसी रास्ते से और उन्हीं पांच घंटों में सेना के साथ फरार हो गया। इस सात डोरियों के जाल की सातवीं डोरी टूटते ही सिंह मुस्कुराता हुआ बाहर निकला और भक्ष्यार्थ लगाया गया वह जाल उसी के नखों में फंसकर पूरी तरह फट गया। अतः अब ऐसे जाल बुनते बैठने की बात भूलकर अंग्रेजों ने चुने हुए घुड़सवारों की एक टोली तैयार की और वह टोली विद्रोहियों का लगातार पीछा करे, यह आदेश दिया। यह अंखड पीछा अमर सिंह की पीठ को लगते ही उसे तनिक भी विश्राम असंभव हो गया। यह अखंड पीछा अमर सिंह की पीठ को लगते ही उसे तनिक भी विश्राम असंभव हो गया। साथ ही अंग्रेजों के पास अब एन्फील्ड राइफल जैसी नई बंदूकें आ गई थी। उनकी मार लंबी थी और उनके सामने विद्रोहियों की मस्कट बंदूके अच्छा काम नहीं कर सकती थीं। 19 अक्तूबर को अंग्रेजों ने एक गांव में पहले क्रांतिकारियों को पीछे से घेरा और उनमें से तीन सौ लो काट डाले। शेष बचे एक सौ लोग एक गांव खेड़े में लड़ते बाहर के खेत में पागल बाघों जैसे घुस गए। परंतु उनको भी अंग्रेजों की नई कुमुक ने घेर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 346
लिया और तलवारों से उन्हें भी काट डाला। केवल तीन असामी पास के गन्ने के खेत में छिपे थे, इसलिए बचे। और इन तीन लोगों में ही अमर सिंह भी था। यहां से बचकर अमर सिंह की सेना कैमूर पर्वतों में घुस गई। उसके पीछे-पीछे अंग्रेजी सेना भी घुसी। इसलिए उस वर्तत के हर टीले और हर शिखर पर लड़ाई करते-करते पांडे लोगों की उस स्वातंत्र्य पूतना (पलटन) ने दिसंबर के अंत में रण में रक्त समाधि पाई। इस तरह बिहार प्रदेश के स्वतंत्रता समर की बहार उजड़ गई। फिर भी राजा अमर सिंह शत्रु के हाथ अभी तक नहीं आई। अंतिम वृत्तांत किसी को भी पता न चलने देकर सदेह स्वर्ग गमन की अनुमति कभी भूलोक के मनुष्यों को यदि स्वर्गलोक के देव, गंधर्व देते होंगे तो उस सम्मान के योग्य इस मर्त्य विश्व में केवल अमर सिंह ही था, यह निर्विवाद है।
1857 का स्वातंत्र्य समर – 347
प्रकरण-9 मौलवी अहमद शाह लखनऊ की पराजय के बाद अवध एवं रुहेलखंड के विद्रोहियों का अब कोई सबल मुख्य केंद्र नही रहा था। दोआब और बिहार में अंग्रेजों की पुनर्विजय की लहर सामने आते बांध-बंधनों को धक्के-पर-धक्के देती बड़े वेग से आगे ब़ने लगी, इस कारण वहां भी पांडे पक्षीय नेताओं को आश्रय नहीं मिलने वाला था। ऐसी स्थिति में उन्हें विद्रोह के प्रारंभ में जो युद्ध पद्धति सूझी, वह सहज सूझ गई और उसका अवलंबन कर उन्होंने अंग्रेजों से यह तुमुल युद्ध जारी रखने का निश्चय किया; अंतर इतना ही था कि विद्रोह के प्रथम आवेश में यदि आज पराजय से दुर्बल होकर उस रास्ते पर कदम बढ़ाने से अंतिम सफलता तक पहुंचना बहुत दुष्कर हो गया था। तथापि दुष्कर हो, सुकर हो, म्यान से बाहर खींची तलवार समर्पण करके नीचे नहीं रखनी है, इस संकल्प से अवध के विद्रोही नेताओं ने लखनऊ गिरते ही कूटयुद्ध पद्धति स्वीकार करके रुहेलखंड के विद्रोहियों की अलग-अलग टोलियों को यह प्रख्यात आदेश जारी किया- “फिरंगियों की संगठित सेना से आमने-सामने लड़ने का प्रयास न करें; क्योंकि व्यवस्था, अनुशासन और कवायद में वे सेनाएं आपसे श्रेष्ठ हैं और उनके पास बड़ी-बड़ी तोपें हैं। इसलिए उनसे खुले मैदान की लड़ाई न लड़कर छापे मारकर उनके आवागमन को रोकते रहें। नदी के सारे घाट दबाए रहें, उनका आवागमन तोड़ दें। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 348
उनकी रसद और डाक लूट लें। उनके थानों पर हमले करें और उनके शिविर के चारों ओर अखंड चक्कर लगाते रहें। फिरंगियों को विश्राम नहीं मिलना चाहिए।''156 इस स्फूर्तिदायक और गुरिल्ला युद्ध लेख का प्रत्यक्ष में उतारने के लिए मौलवी अहमद शाह कोई उनतीस मील दूर अंग्रेजों की लखनऊ की सेना पर नजर गड़ाए बारी के पास ससैन्य बैठा था और दूसरी ओर बेगम हजरत महल भी छह हजार लोगों के साथ बिरौली के पास डटी हुई थीं। इन दोनों सेनाओं को पीटने के लिए होप ग्रांट तीन हजार सैनिकों और प्रबल तोपखाने के साथ लखनऊ के पहले बिरौली की ओर चला। दूसरे दिन उसका जहां शिविर लगा था वहां एक परम साहस की बात प्रकट हुई। अंग्रेजी सेना अपने ऊपर हमला करने आ रही है-यह सुनते ही उस सेना की पूरी जानकारी प्राप्त करने मौलवी ने अपने जासूस भेजे। उस रात इन जासूसों की टोली अंग्रेजी छावनी में बिना संकोच जब घुसने लगी तो अंग्रेजी पहरेवालों ने पूछा, "कौन जा रहा है?'' "हम 12वीं पलटन के लोग हैं।'' यह उत्तर उन्होंने सुना। यह उत्तर पूरी तरह सत्य था। क्योंकि ये सारेजासूस 12वीं रेजिमेंट के ही थे। परंतु यह 12वीं पलटन तो वह थी जिसने गत जुलाई में विद्रोह करके अपने गोरे अधिकारी का कत्ल कर दिया था। यह उस अंग्रेजी पहरे वाले को क्या मालूम ! उनका बिना संकोच घुसना, निश्छल उत्तर देना, संकोचहीनता और सावधानी देखकर वह पहरेदार 'ऑल वेल' कहकर चुप बैठ गया और यह टोली अंग्रेजी कैंप में शांति में घुस गई। वहां जो जासूसी करनी थी वह सब करके मौलवी के वे जासूस बाहर निकल आए और इस तरह मृत्यु के मुंह के दांत गिनकर ये दूत अपने मौलवी के पास लौट गए। जासूसों से प्राप्त सूक्ष्म समाचार सुनते ही उस युद्ध विशारद नेता ने अपनी योजना तुरंत बना ली। उसने अपनी सेना के साथ चार मील हटकर एक छोटा सा गांव कब्जे में लिया। उस गांव के सामने एक नदी थी और उसका किनारा ऊंचा था। वह स्थान बहुत मजबूत था। मौलवी की चाल थी कि उस गांव में वह अपनी पैदल सेना के साथ छिप बैठा रहे और उसी समय उसके घुड़सवार एक दूर के मार्ग से जाकर अंग्रेजों के बाजू पर हमला करने को तैयार रहें। मौलवी को यह भलीभांति ज्ञात था कि अंग्रेजी सेना कल भोर में असावधान स्थिति में वही आएगी। विद्रोही उस गांव में न होकर बारी में हैं, इस विश्वास से निस्संकोच आनेवाला यह शिकार बंदूक की मार में आते ही, मौलवी सामने से मारे और उसके शुरू होते ही घुड़सवार अंग्रेजों के बाजू पर टूट पड़ें। मैलसन कहता है-"मौलवी की यह योजना बड़ी चतुरतापूर्ण थी। उसकी व्यूह-रचना के ज्ञान का आभास इसी से हो जाता है।'' इस शत्रु को भी चकित कर डालनेवाली यह उत्तम चाल सफल हो, इसके लिए दो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 349 156 1. डा. रसेल की डायरी, पृष्ठ 276।
बातें आवश्यक थी। पहली यह कि अंग्रेजों को उस गांव तक आने के पूर्व अपनी सेना उन्हें न दिखें-इस प्रकार छिपाकर रखना; और दूसरा गांव से गोलीबारी शुरू होने के पूर्व तक बगल में छिपे घुड़सवारों का शांत बैठे रहना। मौलवी ने अपने कार्य बड़ी तत्परता से पूरे किए। रात-ही-रात पैदलों के संग वह गांव उसने चुपचाप ले लिया। अपने घुड़सवार उसने तत्काल इष्ट मार्ग से बगल की ओर रवाना किए और उस गांव में अपनी सेना का अस्तित्व इतनी उत्कृष्ट रीति से छिपाए रखा कि सुबह अंग्रेजी सेना असावधान, धीरे-धीरे आ गई। घंटे-आधे घंटे की देर थी कि पांडे सेना क विजय निश्चित थी। परंतु उस आधे घंटे में ही मौलवी का बनाया हुआ यह उत्कृष्ट जाल घुड़सवारों ने बिगाड़ दिया। अंग्रेजी सेना के उस जाल के पास पहुंचते ही नियत किए अनुसार घुड़सवारों ने उनकी पीठ पर उत्तम स्थान भी घेर लिया। वहां से असावधान छह हजार अंग्रेजी सैनिकों पर हमला करना बहुत सुलभ हो गया था, परंतु इतने में घुड़सवारों के अधिकारी अंग्रेजों की दो असुरक्षित तोपें देखकर लालच में आ गए और मौलवी का आदेश भूलकर उन पर आक्रमण कर बैठे। तुरंत ही तोपें उनके हाथ में आ गई। पर क्षण भर बाद वे तोपें ही नहीं बल्कि मौलवी का सारा जाल अंग्रेजों ने छीन लिया; क्योंकि यह पीछे की भीड़ देखते ही वे पूरी तरह सावधान हो गए और सामने का गड़ढ़ा भी उन्हें दिखाई दे गया। थोड़ी सी हाथापाई होते ही अपने घुड़सवारों की लापरवाही से नष्ट हुआ जाल फेंककर मौलवी एक और अवसर खोजने आगे निकल गया। 15 अप्रैल के आसपास होप ग्रांट द्वारा बारी और बिरटौली से लखनऊ के विद्रोहियों को ऊपर धकेलते हुए उधर रूइया किले के पास अवध और अंग्रेजों की एक भिड़ंत हो रही थी। पीछे दोआब में विद्रोह को नष्ट करने कानपुर में जैसे अंग्रेजी सेना चारों ओर से विद्रोहियों को एक साथ दबाती फतेहगढ़ की ओर गई थी वैसे ही अब विद्रोहियों को अवध से समाप्त करने का कार्यक्रम कमांडर-इन-चीफ ने लखनऊ में आयोजित किया। 157 अवध के पूर्व भाग और बिहार प्रांत में ल्यूगार्ड (जिसका उल्लेख पूर्व में भी आया है) और डगलस को भेजा, बारी-बिरौली से सर होप ग्रांट और वालपोल गंगा किनारे से ऊपर-ही-ऊपर विद्रोहियों को रूहेलखंड में छापा जाए और वहीं उनसे अंतिम मारा-मारी की जाए। इस कार्यक्रम के अनुसार 9 अप्रैल को वालपोल सर्वांगपूर्ण सबल सेना ले, लखनऊ से निकलकर गंगा किनारे से ऊपर चला । 15 अप्रैल को वह लखनऊ के उत्तर में इक्यावन मील पर स्थिति रूइया के किले तक पहुंचा। यह किला बहुत बड़ा नहीं था और उसका मालिक नरपत सिंह भी एक छोटा
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157 1. On the first of April 1858 there were 96,000 British soliders in India besides a large body of reliable native troops, raised in haste some of whom had already shown that they were capable of doing good service-a very different state of affairs from the one which prevailed six months before. & Roberts, Vol. 1
जमींदार था। फिर भी स्वतंत्रता का यह महायज्ञ शुरू हो जाने के बाद से नरपत सिंह ने उसी की स्थंडिल पर अपना सर्वस्व अर्पण किया था। आज उसपर एक जाज्वल्य तोपखाने के साथ प्रचंड अंग्रेजी सेना ने हमला किया है। उसके पास किले में सौ-डेढ़ सौ लोग भी नहीं थे। फिर किला खाली कर विद्रोही बिना शर्त समर्पण करेंगे ही, अंग्रेजों को यह विश्वास होने लगा। पर उस दिन प्रातः नरपत सिंह की कैद से एक यूरोपियन छूटकर आया। उसने अंग्रेजों को बताया कि नरपत सिंह कहता है, “किला खाली करेंगे, पर रण में चार हाथ कर लेने के बाद।” रण में? यह विद्रोही नरपत हमें रण में हाथ दिखाएगा? और फिर किला खाली करेगा? वालपोल ने कहा, “उसे उसके किले सहित उसी जगह पर गाड़ डालें, चलों!” सदैव की भांति अंग्रेजी सेना ने खबर फैलाई कि किले में दो-तीन सौ नहीं, पंद्रह सौ लोग हैं! नरपत को हम अवश्य मसल देंगे, जबकि उसकी सेना हमसे बहुत भारी है। यह समाचार फैलाने के पहले उसे जीतने में गौरव ही क्या? इसलिए वालपोल ने भी कहा, “ठीक है, नरपत पंद्रह सौ सैनिक होने के कारण ही ऐसे उद्धत बोल बोल रहा होगा। किले में कैद रहे युरोपियन ने जो प्रत्यक्ष देखा कि डेढ़ सौ लोग हैं वह केवल ठोकी होगी।” किले पर सेना चलने लगी और वह भी किले के किसी दुर्बल गिरे हुए भाग की ओर नहीं, सामने की मजबूत दीवार पर। किले के सामने की झाड़ी से यह अंग्रेजी सेना घुसते देखकर नरपत के मजबूत योद्धा गोलियां चलाने लगे। अंग्रेजों के खंदक से भिड़ते ही मारा-मारी बहुत हुई। काफे के एक सौ बीस लोगों में से छियालीस लोग वहीं-के-वहीं मारे गए। काफे पीछे हटा। उधर ग्रूव को भी विद्रोहियों ने उसकी जगह पर ही मरने के लिए बांधे वालपोल अपनी तोपें लेकर खंडहर पार्श्व से आता यह अकल्पित संकट देखनेवाला योद्धा वालपोल अपनी तोपें लेकर खंडहर बाजू की ओर गया। और उसने तोपें इतनी कुशलता से चलवाई कि अंग्रेजी सेना का इस ओर गया। और उसने तोपें इतनी कुशलता से चलवाई कि अंग्रेजी सेना का इस ओर से दागा हुआ गोला किले का लांघकर दूसरी ओर विद्रोहियों की सेना के ऊपर जाकर गिरता। केवल शत्रु से लड़नेवाले सेनानी बहुत हुए और होंगे, पर शत्रु और स्वयं से समान वीरता से लड़नेवाला सव्यसाची वीर वालपोल के सिवाए दूसरा नहीं मिलना। वालपोल का समर चातुर्य देखकर अंग्रेज योद्धा होप उस रणक्षेत्र में अंग्रेजी पक्ष संवारने आया तो वह भी मारा गया। विद्रोहियों की मार से ग्रूव भी पीछे हटने लगा। इधर-उधर त्राहिमाम। बुरी तरह भ्रम में पड़ी अंग्रेजी सेना उन ढाई सौ विद्रोहियों के धिक्कार के साथ रण छोड़कर चली गई। होप जैसा योद्धा बलि चढ़ गया, यह सुनकर इधर-उधर हाहाकार मच गया। लॉर्ड केनिंग, सर कोलिन, सारा इंग्लैंड शोक-विह्वल हो गया। हजारों अंग्रेज लोग मरे होते तो भी इतना दुःखी न होता जितना उस लोकप्रिय होप की मृत्यु से इंग्लैंड देश दुःखी हो गया। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 351
अंग्रेजी सेना की पूर्ण पराजय और होप की मृत्यु! उस बहादुर नरपत सिंह ने अपनी कही सच करके दिखाई। रण में शत्रु को हाथ दिखाऊंगा। अपने ढाई सौ अनुयायियों के साथ उसने वह किला तुरंत छोड़ दिया। अपनी इन अलग-अलग अंग्रेजी सेनाओं से अवध के सारे विद्रोहियों को रूहेलखंड में दबोचते ले जाने पर अपनी अलग-अलग सेना इकट्ठी करके कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन रुहेलखंड की ओर चला। अवध से भगाए गए विद्रोही नेता शाहजहांपुर में इकट्ठा हो गए थे। वहीं मौलवी अहमद शाह भी थे। इस जोड़ी को पकड़ने के लिए सर कोलिन ने आज तक कितनी ही बार दीर्घ प्रयास किए थे, परंतु वे दोनों ही अभी तक अजित-के-अजित बने रहे। अतः वे रूहेलखंड में शाहजहांपुर में इकट्ठा हैं, यह समझते ही सर कोलिन ने बहुत परिश्रम से उस शहर को घेरने का प्रयास किया और वे दोनों प्रथित पुरूष बस हाथ में आ ही गए हैं, ऐसा समझक रवह 30 अप्रैल को शाहजहांपुर से आ तो भिड़ा, पर उन दोनों पंछियों के उड़ जाने के बाद। सर कोलिन का मन विषाद से भर गया। उसने चारों दिशाओं से चार सेनाएं शाहजहांपुर और बरेली भेजी थीं और उसे विश्वास था कि उसके जाल से एक भी विद्रोही छूटेगा नहीं। परंतु वस्तुस्थिति यह थी कि अति प्रबल विद्रोही उस जाल से निकलकर पार हो गया और वह भी स्वयं कमांडर-इन-चीफ की डोरी को झटका देकर। मौलवी और नाना तो भाग ही गए, परंतु अब बरेली का दांव भी असफल न हो। जाए, इसलिए शाहजहांपुर में चार तोपों के साथ एक अंग्रेजी सेना रखकर उदास कमांडर-इन-चीफ बरेली के लिए चला और 4 मई को एक दिन के अंतर पर आकर उतरा। बरेली में खानबहादुर खान अभी तक राज्य कर रहे थे। दिल्ली और लखनऊ हार जाने पर निराधार हुए विद्रोहियों के नेता इसी स्वतंत्र राजधानी में आकर रह रहे थे। दिल्ली के राजवंश का रणकुशल राजपुत्र मिर्जा फीरोजशाह, श्रीमंत नाना साहब, मौलवी अहमद शाह, राजा तेजसिंह और अन्य कितने ही नेता खानबहादुर खान के अभी तक स्वतंत्र इस राज्य में घुसे होने से बरेली शहर पर अंग्रेजों की बड़ी आंख थी। पर ख ानबहादुर खान और तत्पक्षीय नेताओं का उस शहर में यों ही दृढ़ता से लड़ते रहने की अपेक्षा एक-दो-हाथ होते ही छोड़कर पहले की गई प्रख्यात घोषण के अनुसार प्रदेश में धींगामुश्ती करने का विचार निश्चित था। अंग्रेजी सेना एक दिन की दूरी पर आते ही बरेली में अपने को बंद करने के अंग्रेजी प्रयास विफल करने के लिए शहर छोड़ने की तैयारी करके उन्होंने बाहर जाने का रास्ता रोके रखा। परंतु फिरंगी शत्रु को एक तगड़ा झापड़ लगाने के पूर्व और अपना रण कर्तव्य कुछ तो भी पूरा किए गिना बाहर निकलने को वह तेजस्वी के पूर्व और अपना रण कर्तव्य कुछ तो भी पूरा किए बिना बाहर निकलने को वह तेजस्वी रक्त तैयार नहीं था। इसलिए 4 मई को वे अंग्रेजों का सामना करने रण में उतरे। इस रणभूमि में जो अंग्रेजी सेना थी वह अभूतपूर्व थी और प्रबल थी। उनका 1857 का स्वातंत्र्य समर – 352
भयंकर बड़ा तोपखाना, उनकी उत्कृष्ट घुड़सवार सेना, अनुशासित पैदल सेना और इस बहुसंख्य तीक्ष्ण सेना पर स्वयं सर कोलिन का सेनापतित्व! इस सेना पर खानबहादुर की तोपों का कोई प्रभाव नहीं हुआ, वे बरेली पर बिना रुके चढ़ते चले आए। 5 मई को तोपें छोड़कर विद्रोहियों ने तलवार निकाली। विजय की कोई आशा न होते हुए भी या यूं कहें, वैसी आशा नहीं थी, तभी तो रण-मैदान से वापस न लौटकर हंसते-हंसते मृत्यु का आलिंगन करनेवाले भयंकर गाजी की यह तलवार थी। किसी भी धर्मयुद्ध में शत्रु का प्राण लेना या लेते हुए मरना माने स्वर्ग के दरवाजे धड़ाधड़ खुलवाना होता है, यह जिसकी दृढ़मल अनिवार्य श्रद्धा है, यह उन धर्मवीरों की तलवार थी। किसी भी धर्मयुद्ध में शत्रु का प्राण लेना या लेते हुए मरना माने स्वर्ग के दरवाजे धड़ाधड़ खुलवाना होता है, यह जिसकी दृढ़मूल अनिवार्य श्रद्धा है, यह उन धर्मवीरों की तलवार थी। वही तलवार खींच ये गाजी लोग अकस्मात् अंग्रेजी सेना पर टूट पड़े। दाढ़ी के बाल बढ़े हुए, हरे साफे सिर पर बंधे, कमरबंद कसा हुआ, अंगुली में चांदी की चपटी मुद्रा और उसपर कुरान के धर्म वाक्य खुदे हुए, ऐसे भव्याकृति वीर दाहिनी ओर तीर की तरह घुसे और अंग्रेजी सेना पर टूट पड़े। अपनी ढाल साधे और तलवारें सूर्यप्रकाश में चमकाते ‘दीन-दीन’ की गर्जना के साथ नाचते वे शत्रु पर टूटे। उनके टूटते ही अंग्रेजी सेना झटके से पीछे हट गई। 42वें हायलैंडर्स आगे आए। उनपर यह वज्राघात हुआ। उन्होंने तेजी से फिरंगियों को काटना शुरू किया। उनके कुछ लोग आगे घुसे और अंग्रेज पीछे चले गए। गाजियों की टोली में से एक भी पीछे नहीं लौटा। मारते, छांटते, काटते उनमें से हर एक जहां लड़ा वहीं कटा। एक अवश्य काटे जाने के पहले रण में गिर गया, क्यों? रूको, एक क्षण पूछो, नहीं-यह देखो, उधर से अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ एकदम पास आ गया। उसे देखते ही मरने का नाटक करके सोया यह आदमी शेर की भांति झपटकर उछला। पर पास के एक तैयार सिख ने उसकी गर्दन तत्काल अलग कर दी। विश्व इतिहास में अप्रतिम साहस, ध्येय-निष्ठा, शहादत और मृत्युंजयता के जितने भी उदाहरण होंगे उनमें से कोई उदाहरण बरेली के इस स्वातंत्र्य समर के गाजियों में से भी नहीं होगा। दूसरे दिन सर कोलिन का जाल तोड़-ताड़ खानबहादुर खान सेना सहित बरेली से बाहर निकले और 7 मई को अंग्रेजों ने बरेली पर कब्जा कर लिया। खानबहादुर खान ने रण-चपलता में अपने दांव-पेच विफल कर दिए। इससे उदास होकर कमांडर-इन-चीफ बरेली में प्रवेश कर ही रहा था तभी उसके और सारी अंग्रेजी सेना के बीच एकाएक मौलवी! मौलवी! ऐसी आश्चर्यजनक कानाफूसी प्रारंभ हो गई। हां, आश्चर्यचकित करनेवाला ही एक दांव उधर शाहजहांपुर की ओर मौलवी ने डाला था। सर कोलिन को पूरी तरह छकाकर मौलवी और नाना साहब जो सटके वे केवल लड़ाई टालने के लिए ही नहीं सटके थे। शाहजहांपुर से निकलने के पूर्व-नाना 1857 का स्वातंत्र्य समर – 353
के आदेश से वहां के सारे सरकारी भवन गिरा दिए गए थे। अपने जाने के बाद वहां अंग्रेजी सेना आएगी और सेना की एक छोटी टुकड़ी वहां रखकर सर कोलिन बरेली जाएगा, यह समझकर उस कुशाग्र मौलवी ने शाहजहांपुर छोड़ा था। अंग्रेजी सेना बरेली में कितनी देर रहेगी, यह पक्का जानकर मौलवी ने ऐसा जाल रचा कि सर कोलिन के जाते ही-शाहजहांपुर में उतरना वहां के मुट्ठी भर अंग्रेजों को मटियामेट कर बरेली का बदला ले लेना है। मौलवी ने दूरदृष्टि से जो सोचा वैसे ही शाहजहांपुर में छोटी सी सेना रह गई और सारे भवन तोड़ दिए जाने के कारण उन्हें मैदान में ही उतरना पड़ा। इस तरह सारी योजना बनती चली गई। 2 मई को वह थोड़ी सी अंग्रेजी सेना भी शाहजहांपुर छोड़कर जानेवाली है-यह ज्ञात होते ही दिन-रात मंजिलें तय करते हुए मौलवी अहमद शाह दौड़ने लगा और उसका असावधान शिकार एकदम उसके पंजे के पास आ गया। परंतु उस मध्यरात्रि में ही हमला न करते हुए मौलवी की सेना किसी की मूर्खता के कारण, किंचित् समय पूर्व चार मील दूर खड़ी हो गई। इतने भर से सारी योजना बिगड़ गई! क्योंकि “Native spies employed by the British were on the alertand one of these flew with the intelligence of his dangerous vicinity to colonel Hale of Shahjahanpur. ’’ उस नेटिव पिशाच के वह समाचार अंग्रेजों को बताते ही उनक ीवह छोटी सेना जेल के मजबूत भवन में घुस गई। मौलवी योजनानुसार वहां पहुंचा। उसने सारा शहर कब्जे में लिया, किला लिया और युद्ध की यथान्याय पद्धति के अनुसार शहर के श्रीमंत लोगों पर रसद कर लगाया। मैलसन लिखता है-“मौलवी ने वही बरताव किया जो यूरोप की युद्ध-नीति में किया जाता है।’ और तुरंत आठ तोपें मंगाकर उसने जेल में छिपी अंग्रेजी सेना पर गोलीबारी शुरू कर दी। यह खबर 7 मई को बरेली पहुंचते ही सर कोलिन की खुशी सातवें आसमानपर पहुंची। पहले मौलवी जब उसके हाथ से निकल भागा था तभी से वह मन-ही-मन बहुत खार खाए था। वह भूल सुधारने का अवसर अब मौलवी ने ही दे दिया। अपने आप शत्रु के जाल में घुसे इस शिकार पर झपट्टा मारने सर कोलिन निकला। इस समय उसने पूरा परीक्षण कर लिया कि जाल में कहीं भी सेंध न रह जाए। 11 मई से उस अकेले मौलवी ओर इस प्रचंड अंग्रेजी सेना की भयंकर लड़ाई आरंभ हो गई। यह समाचार सुनते ही उस लोकप्रिय मौलवी की सहायता के लिए विद्रोहियों के झुंड-के-झुंड दसों दिशाओं से आने लगे। अवध की बेगम, मरूयन साहब मोहम्मदी का राजा, दिल्ली का मिर्जा फीरोजशाह, कानपुर के नाना साहब आदि सारे स्वतंत्रता सेनानियों की सेनाएं 14 मई के पहले ही मौलवी के झंडे तले आ गई। जिस शिकार को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने कोई छेद न छोड़ते हुए जो विशाल बुना था, उस शिकार ने ही 1857 का स्वातंत्र्य समर - 354
उसपर अपने भयानक पंजे फैलाकर चोट कर दी। छेद नहीं छोड़ा, इसलिए वह जाल ही काट डाला और मौलवी फिर से अपनी सेना के साथ शाहजहांपुर से लड़ते-लड़ते बाहर निकल गया। मौलवी के पकड़े आने का सर कोलिन को इस समय इतना विश्वास था कि उसका नाश निश्चित मानकर उसने सेना में नियुक्तियां भी कर दी थी। मौलवी उस जाल से छूटते ही गया किधर? तो अवध में जिसे भारी प्रयास से जीतकर शत्रु-विहीन किया गया था। अंग्रेजों ने अवध जीता तो मौलवी ने रूहेलखंड जीता; अंग्रेजों ने रूहेलखंड जीता तो मौलवी फिर अवध में सेना सहित आ जमा। इस तरह अपने देश के शत्रु से, अपने देश के सम्मान की रक्षा के लिए, अपने देशबंधुओं की ओर से यह देशभक्त मौलवी झगड़ रहा था, तब उसे समाप्त करने का विकट काम कौन करेगा? जिसने सर कोलिन की तलवार को धिक्कार कर हताश कर दिया, उसे अब किसकी तलवार मार सकती है? अब क्या करें? क्या करें? तइनी चिंता किसलिए? अरे पिछला इतिहास देखो, कितनी ही बार हिंदुस्थान के सौभाग्य को आग लगाना अंग्रेज धैर्य रखें, क्योंकि सर कोलिन की तलवार की धार भोथरी करनेवाली हिंदुस्थानी ढाल इस मौलवी की देह अंत में एक हिंदुस्थानी कुलघाती-कुल कलंकी ने फाड़-फूड़कर जला डाली। अवध में घुसने के बाद अंग्रेजों की विजय का जितना प्रतिशोध करना संभव हो, उतना करते हुए मौलवी के ध्यान में आया कि अवध और रूहेलखंड के बीच पोवेन रियासत है, उसका राजा यदि अपने पक्ष में हो गया तो अंग्रेजों के विरूद्ध चल रहे संघर्ष को अधिक मदद मिलेगी। इसलिए उसने इस आशय का संदेश पोवेन के राजा को भेजा। यह हाथ भर की रियासत का राजा शरीर से संडकुसंड, मति से जड़, सुखभोगी और अकर्मण्यता से मतिमंद हो गया था। रण का नाम सुनते ही उसके शरीर पर कांटे खड़े हो गए। फिर भी मौलवी से प्रत्यक्ष मिलने को हम तैयार हैं, यह उसने सूचित किया। फिर बेगम की राजमुद्रा लेकर उसका एक प्रतिनिधि पोवेन शहर की ओर चला। मौलवी ने अपने कुछ अनुयायियों के साथ पोवेन शहर की दीवार के पास आते ही देखा कि दीवार के दरवाजे बंद है और दीवार पर सशस्त्र लोग खड़े हैं तथा वह मोटा राजा जगन्नाथ सिंह अपने भाई के साथ उनके बीच में खड़ा है। इस संशयपूर्ण दृश्य का अर्थ यद्यपि उसने समझ लिया, फिर भी रण-मैदान मे खेला हुआ वह वीर उस दृश्य से घबरानेवाला नहीं था। उसने दीवार के बाहर से ही उस राजा से बातचीत की। अपने ध्येय को पाने के लिए सर्वस्व राख होने तक तलवार नीचे नहीं रखूंगा, यह जिस पुरूष सूर्य की प्रतिज्ञा थी उसका वह तेजस्वी बयान उस दीवार पर खड़े उल्लू को बहुत भयानक लगना स्वाभाविक था। जब मौलवी ने देखा, अब इस डरपोक को डराए बिना 1857 का स्वातंत्र्य समर - 355
मेरा यह कथन सफल नहीं होगा तब उसने अपने महावत को आदेश दिया कि दीवार का द्वार तोड़ने के लिए हाथी को आगे बढ़ाया जाए। जिसपर वह बैठा था उसी विशाल हाथी का मस्तक उस प्राचीर के द्वार पर धड़ाधड़ टकराने लगा। और एक टक्कर कि उस दरवाजे का निश्चित ही चूरा हो जाएगा। उसी समय राजा के भाई ने बंदूक चलाई और उसकी गोली ने मौलवी अहमद शाह ! मौलवी अहमद शाह को उस परकोटे पर खड़े एक हिंदुस्थानी कुलांगार ने गोली चलाकर मार डाला। तुरंत ही वे दोनों भाई परकोटे के बाहर आए और उन्होंने मौलवी का सिर गरदन से उतार लिया। उस सिर को एक रूमाल में बांधा और वे तेरह मील दूर स्थित शाहजहांपुर दौड़ते गए। अंग्रेज अधिकारी खाना खा रहा था, तभी वह राजा अंदर घुसा। उसने अपने हाथ का रूमाल खोला और रक्त से सने मौलवी के सिर को उसने अंग्रेज के पैरों के पास लुढ़का दिया। दूसरे दिन अंग्रेजों ने शहर कोतवाली पर वह सिर टांग दिया और इस बहादुरी के लिए पोवेन के राजा का पचास हजार रूपए पुरस्कार दिए। पोवेन के राजा ! पोवेन के चांडाल ! तेरे देशद्रोह से यदि सचमुच तन-बदन में आग लगती हो तो इस प्राणी की प्रतिमा हर घर में नरक कूप के दरवाजे टांगी जाए। मौलवी अहमद शाह ऊंचा, इकहरा, कसा हुआ, भारतभूमि के हाथ की किसी सतेज तलवार जैसा था। उसकी नाक सीधी, भौंहें कमान जैसी। उसके मरते ही अंग्रेजों ने कहा, "उत्तर भारत का ब्रिटिशों का भयंकर शत्रु समाप्त हुआ।" अंग्रेजों के इस भयानक शत्रु के संबंध में अंग्रेजी इतिहासकार मैलसर कहता है-'उसके सैन्य नेतृत्व और युद्ध-चातुर्य के विद्रोह में अनेक उदाहरण घटित हुए हैं। उसके अंतिम समय के दावं-पेच तो अप्रतिम थे। सर कोलिन को दो बार भग्नचातुर्य कर बिखेर देने का सम्मान उसके सिवाय अन्य किसी को भी प्राप्त होना असंभव था। इस तरह फैजाबाद का यह मौलवी अहमद शाह रण में चमका। अपने जन्मसिद्ध देश की अन्याय से छीनी हुई स्वतंत्रता वापस लेने जो पुरूष विद्रोही संगठन खड़ा कर युद्ध करता है, वह यदि देशभक्त कहलाता है तो मौलवी अहमद शाह वास्तव में ऐसा ही देशभक्त था ! खून से उसकी तलवार गंदी नहीं हुई, खून के लिए वह सहमत नहीं था। जिसने उसका स्वदेश छीना था उस उचक्के विदेशी से वह लड़ा। वीरोचित लड़ा। रणनीति से लड़ा। दृढ़ता से लड़ा और इसलिए उस लोकोत्तर की स्मृति सारे राष्ट्र के रणवीरों और सत्यप्रियों के आदर की सत्पात्र हो गई थी। "158 1857 का स्वातंत्र्य समर - 356 158 "मौलवी एक असाधारण व्यक्ति था। विद्रोह काल में उसके सैनिक नेतृत्व की योग्यता का परिचय कई प्रसंगों में मिलता है। ' ' 'सर कैंपबेल को दो बार रण में मुंह की खिलाने का साहस दूसरा कोई नहीं कर सकता।" -मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 4, पृष्ठ 380
प्रकरण-10 रानी लक्ष्मीबाई जिन राजाओं ने अपने पीछे राज्य का कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा था, उनका राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी में मिलाने की नीति लॉर्ड डलहौजी ने अपनाई। डलहौजी की इस अपहरण नीति के अंतर्गत गोद लेकर उत्तराधिकारी बनाने का अधिकार भी नहीं दिया गया था। यही बात झांसी के लिए थी। झांसी राज्य भी अंग्रेजों ने हथियाना चाहा। विधवा रानी लक्ष्मीबाई ने विरोध के स्वर में कड़ककर कहा, " क्या मैं झांसी छोड़ूं? नहीं छोडूंगी। किसी की हिम्मत हो तो आजमा ले। मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। झांसी की लक्ष्मी के कंठ से स्वातंत्र्य-कौस्तुभ मणि छीनने का साहस किसमें था? इस समय संपूर्ण दैत्य-दानव एकत्र होकर आएं-साक्षात् मृत्युदेव यमराज भी लक्ष्मीबाई से युद्ध करके झांसी लेना चाहें तो भी झांसी उन्हें नहीं मिल सकती। जब तक लक्ष्मीबाई के अंदर रक्त की एक बूंद भी शेष रहेगी तब तक उसकी स्वातंत्र्य-कौस्तुभ मणि उसके कंठ में ही शोभा पाएगी और उसकी धधकती ज्वाला मेमं देशद्रोही, अंग्रेज नराधम जलकर भस्म होंगे। झांसी, झांसी का राजप्रासाद, जरीपटका (मराठी कपड़ा), राजसिंहासन, उसका सतीत्व आदि सब झांसी की रानी लक्ष्मी के साथ स्वाधीन रहेंगे या स्वाधीनता की यज्ञाग्नि में भस्म हो जाएंगे। अपनी बुलंद आवाज 'नहीं, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। जिसकी हिम्मत हो तो आजमा 1857 का स्वातंत्र्य समर - 357
ले।' के साथ वीरांगना लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा लेने को तत्पर हो गई। संपूर्ण बुंदेलखंड में आगामी क्रांति के लक्षण दिखाई देने लगे। सागर, नौगांव, बांदा, बानापुर, शाहगढ़ और कालपी में प्रतिशोध की भयंकर अग्नि प्रज्वलित होने लगी। अब तक झांसी की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रही । झांसी की प्रजा शांत, सुखी और व्यवस्थित रही; किंतु डलहौजी ने स्वतंत्रता की उस मणि को अपहृत किया, पर लक्ष्मी ने मणि को उससे छीन लिया और विजय गर्व से राज्य-संचालन करती रही। कमलासना लक्ष्मी अब युद्ध देवी के रूप में शोभा पा रही थी। अब उसके युद्धोचित वेश से आंखें चौंधिया जाती थी। नखशिख तक वह शस्त्रों, युद्धोभूषणों से सजी थी। इन दिनों रानी की दिनचर्या इस प्रकार बताई गई है-? ‘प्रातः पांच बजे से जागकर इत्र से सुगंधित जल से स्नान करती थीं। उसके बाद वस्त्र धारण करती थीं। साधारण तथा सफेद चंदेरी साड़ी उन्हें पसंद थी। तदनंतर पूजा पर बैठ जातीं। विधवा होते हुए भी प्रायश्चित्तर्घ्य देतीं, तुलसी वृंदावन में तुलसी की पूजा करती। उसके बाद पार्थिव पूजा होती। दरबारी संगीतज्ञ साम गायन करते। फिर कथावाचक कथा सुनाते। समाप्ति पर मांडलिक सरदार वंदना करते। दरबार के समय साढ़े सात सौ दरबारियों में जब कोई अनुपस्थित रहने का कारण पूछतीं। पूजा-पाठ के बाद प्रातराश (नाश्ता) करती। विशेष जल्दी का कार्य न होता तो नाश्ते के बाद एक घंटे आराम करतीं। उसके बाद भेंट में आए उपहार चांदी के थालों में रखे, रेशमी वस्त्रों से ढके उनके सामने पेश किए जाते। उनमें पसंद की वस्तुओं को स्वीकार करतीं, जो न स्वीकार करतीं, वे नौकरों में वितरित करने के लिए कोठीवालों को दी जातीं। अपराह्न तीन बजे पुरूष वेश में दरबार में जातीं। उस समय की वेशभूषा होती-पाजामा, गहरे नीले रंग का कोट, सिर पर टोप और उसपर सुंदर सी पगड़ी बांधती-बूटे का काम किया हुआ दुपट्टा पतली कमर में बांधती, जिसमें रत्नजटित तलवार लटकती। इस वेश में वह साक्षात् गौरी मालूम देती थीं। पुरुष वेश के अतिरिक्त कभी-कभी स्त्री वेश के भी वस्त्र पहनतीं। विधवा होने के बाद सौभाग्य अलंकरण-नथनी आदि-वह धारण नहीं करती थीं। कलाई में हीरे की चूड़ियां, गले में मोतियों का हार और कनिष्ठा उंगली में हीरे की अंगूठी रहती। बालों का जूड़ा बांधती। सफेद साड़ी और सफेद कंचुकी पहनतीं। इस प्रकार दरबार में कभी पुरूष वेश, कभी स्त्री वेश में बैठतीं। दरबारी लोग उन्हें प्रत्यक्ष नहीं देख पाते थे। उनका कक्ष अलग होता था, जिसका दरवाजा दरबार में खुलता था। सोने के बेलबूटों से सज्जित द्वार पर सोने-चांदी के आवरण में लिपटे दो दंड धारण किए दो वेत्रधारी खड़े रहते; दीवान लक्ष्मणराव उस कमरे के सम्मुख महत्त्वपूर्ण कागजों को लेकर खड़े रहते और उनके पास दरबार का अमात्य बैठता। ‘रानी बुद्धिमान थीं। बात के मर्म को शीघ्र ही ताड़ लेतीं। उनके निर्णय स्पष्ट, संक्षिप्त और निश्चित रहते। कभी-कभी वे अपने हाथ से आज्ञाएं लिखतीं। न्याय के समय वे बहुत 1857 का स्वातंत्र्य समर - 358
सावधान रहतीं। मुलकी तथा फौजदारी के निर्णय बड़ी योग्यता के साथ करतीं। “बड़े भक्तिभाव से वे महालक्ष्मी के दर्शन करने जातीं। यह मंदिर एक तालाब के किनारे था, जिसमें सुंदर कमल खिले रहते। हर मंगलवार तथा शुक्रवार को मंदिर जातीं। एक बार मंदिर से लौटकर रानी दक्षिणी दरवाजे से आ रही थीं। वहां हजारों भिखारी रास्ता रोककर खड़े थे। रानी ने मंत्री लक्ष्मणराव पांडे से कारण जानना चाहा। मंत्री ने बताया कि ये लोग अत्यंत गरीब हैं। जाड़े से परेशान हैं। रानी साहिबा से मदद मांगते हैं। दयालु रानी बहुत दुःखी हुईं। आज्ञा दी गई। चौथे दिन एक-एक कुरता, टोपी और कंबल सभी भिखारी तथा गरीबों को इकट्ठा करके रानी ने अपने हाथ से बांटा। नत्थे खां के साथ की लड़ाई में घायलों के घाव धोने के कार्य के लिए रानी हठ करतीं, अपने दुःख में रानी की ऐसी रूचि देखकर उनके घाव अच्छे हो जाते। मंदिर जाते यमय रानी की शोभा देखते ही बनती। कभी पालकी में तो कभी घोड़ें पर बैठकर जातीं। पुरूष वेश में साफे का छोर पीठ पर लहराकर शोभा पाता था। उनके आगे राजध्वज मारू बाजे के साथ चलता था। इस ध्वज के पीछे दो सौ गोरे घुड़सवार रहते। रानी के आगे-पीछे सौ-सौ सवार चलते, कभी सारी सेना जुलूस में रानी के साथ होती। रानी के निकलते ही नगाड़ा और शहनाई बजने लगते।”¹⁵⁹ अब स्वराज्य का नगाड़ा गंभीर घोष कर रहा था। ग्यारह महीने से गूंजनेवाले इस स्वातंत्र्य घोष से संपूर्ण बुंदेलखंड भर गया था। नगाड़े के इस नाद का साथ कालपी से तात्या टोपे की तोपें दे रही थीं। ब्रिध्य से यमुना तक ब्रिटिश सत्ता का कोई चिह्न दिखाई नहीं दे रहा था। कोई उसका-अंग्रेजी राज का-नाम भी नहीं ले रहा था। अब तो ब्राह्मण, मौलवी, सरदार, जागीरदार, सैनिक, पुलिस, राजा, राव, साहूकार और देहाती सभी की एक ही मांग थी, एक ही चाह थी-स्वाधीनता-प्राप्ति। इन सबको एक सूत्र में पिरोने का कार्य लक्ष्मीबाई ने किया। उनकी आवाज में वही दृढ़ता थी-‘अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी˙˙˙'। संसार के सामने दृढ़तापूर्वक कहा गया ‘नहीं’ शब्द बहुत कम आया है। भारत के उदारमना लोगों के मुंह स`अब तक यही एक शब्द सुनाई देता आया है, “मैं दूंगा।” किंतु लक्ष्मीबाई ने यह विलक्षण जयघोष किया-‘मैं नहीं दूंगी।' काश, यह आवाज भारत के हर मुख से गूंजी होती! इसी समय सर हू रोज पांच हजार सैनिकों को लेकर विद्रोहियों को दबाने झांसी की ओर चल पड़ा। सन् 1857 के प्रारंभ में हिमालय से विंध्य तक के समूचे प्रदेश को जीतने की सैनिक योजना पुनः बनाई। यह प्रदेश दो हिस्सों में बांटा गया। प्रत्येक पर अधिकार करने के लिए सेना भेजी गई। सर कैंपबेल इलाहाबाद से गंगा-यमुना के उत्तर की ओर अपनी बड़ी सेनाके साथ बढ़ा; दोआब जीता, गंगा पार कर लखनऊ को नष्ट-भ्रष्ट 1857 का स्वातंत्र्य समर – 359 159 1. दत्तात्रेय बलवंत पारसनी कृत-‘रानी लक्ष्मीबाई का जीवनचरित', पृष्ठ 147-51 ।