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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

के आदेश से वहां के सारे सरकारी भवन गिरा दिए गए थे। अपने जाने के बाद वहां अंग्रेजी सेना आएगी और सेना की एक छोटी टुकड़ी वहां रखकर सर कोलिन बरेली जाएगा, यह समझकर उस कुशाग्र मौलवी ने शाहजहांपुर छोड़ा था। अंग्रेजी सेना बरेली में कितनी देर रहेगी, यह पक्का जानकर मौलवी ने ऐसा जाल रचा कि सर कोलिन के जाते ही-शाहजहांपुर में उतरना वहां के मुट्ठी भर अंग्रेजों को मटियामेट कर बरेली का बदला ले लेना है। मौलवी ने दूरदृष्टि से जो सोचा वैसे ही शाहजहांपुर में छोटी सी सेना रह गई और सारे भवन तोड़ दिए जाने के कारण उन्हें मैदान में ही उतरना पड़ा। इस तरह सारी योजना बनती चली गई। 2 मई को वह थोड़ी सी अंग्रेजी सेना भी शाहजहांपुर छोड़कर जानेवाली है-यह ज्ञात होते ही दिन-रात मंजिलें तय करते हुए मौलवी अहमद शाह दौड़ने लगा और उसका असावधान शिकार एकदम उसके पंजे के पास आ गया। परंतु उस मध्यरात्रि में ही हमला न करते हुए मौलवी की सेना किसी की मूर्खता के कारण, किंचित् समय पूर्व चार मील दूर खड़ी हो गई। इतने भर से सारी योजना बिगड़ गई! क्योंकि “Native spies employed by the British were on the alertand one of these flew with the intelligence of his dangerous vicinity to colonel Hale of Shahjahanpur. ’’ उस नेटिव पिशाच के वह समाचार अंग्रेजों को बताते ही उनक ीवह छोटी सेना जेल के मजबूत भवन में घुस गई। मौलवी योजनानुसार वहां पहुंचा। उसने सारा शहर कब्जे में लिया, किला लिया और युद्ध की यथान्याय पद्धति के अनुसार शहर के श्रीमंत लोगों पर रसद कर लगाया। मैलसन लिखता है-“मौलवी ने वही बरताव किया जो यूरोप की युद्ध-नीति में किया जाता है।’ और तुरंत आठ तोपें मंगाकर उसने जेल में छिपी अंग्रेजी सेना पर गोलीबारी शुरू कर दी। यह खबर 7 मई को बरेली पहुंचते ही सर कोलिन की खुशी सातवें आसमानपर पहुंची। पहले मौलवी जब उसके हाथ से निकल भागा था तभी से वह मन-ही-मन बहुत खार खाए था। वह भूल सुधारने का अवसर अब मौलवी ने ही दे दिया। अपने आप शत्रु के जाल में घुसे इस शिकार पर झपट्टा मारने सर कोलिन निकला। इस समय उसने पूरा परीक्षण कर लिया कि जाल में कहीं भी सेंध न रह जाए। 11 मई से उस अकेले मौलवी ओर इस प्रचंड अंग्रेजी सेना की भयंकर लड़ाई आरंभ हो गई। यह समाचार सुनते ही उस लोकप्रिय मौलवी की सहायता के लिए विद्रोहियों के झुंड-के-झुंड दसों दिशाओं से आने लगे। अवध की बेगम, मरूयन साहब मोहम्मदी का राजा, दिल्ली का मिर्जा फीरोजशाह, कानपुर के नाना साहब आदि सारे स्वतंत्रता सेनानियों की सेनाएं 14 मई के पहले ही मौलवी के झंडे तले आ गई। जिस शिकार को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने कोई छेद न छोड़ते हुए जो विशाल बुना था, उस शिकार ने ही 1857 का स्वातंत्र्य समर - 354

उसपर अपने भयानक पंजे फैलाकर चोट कर दी। छेद नहीं छोड़ा, इसलिए वह जाल ही काट डाला और मौलवी फिर से अपनी सेना के साथ शाहजहांपुर से लड़ते-लड़ते बाहर निकल गया। मौलवी के पकड़े आने का सर कोलिन को इस समय इतना विश्वास था कि उसका नाश निश्चित मानकर उसने सेना में नियुक्तियां भी कर दी थी। मौलवी उस जाल से छूटते ही गया किधर? तो अवध में जिसे भारी प्रयास से जीतकर शत्रु-विहीन किया गया था। अंग्रेजों ने अवध जीता तो मौलवी ने रूहेलखंड जीता; अंग्रेजों ने रूहेलखंड जीता तो मौलवी फिर अवध में सेना सहित आ जमा। इस तरह अपने देश के शत्रु से, अपने देश के सम्मान की रक्षा के लिए, अपने देशबंधुओं की ओर से यह देशभक्त मौलवी झगड़ रहा था, तब उसे समाप्त करने का विकट काम कौन करेगा? जिसने सर कोलिन की तलवार को धिक्कार कर हताश कर दिया, उसे अब किसकी तलवार मार सकती है? अब क्या करें? क्या करें? तइनी चिंता किसलिए? अरे पिछला इतिहास देखो, कितनी ही बार हिंदुस्थान के सौभाग्य को आग लगाना अंग्रेज धैर्य रखें, क्योंकि सर कोलिन की तलवार की धार भोथरी करनेवाली हिंदुस्थानी ढाल इस मौलवी की देह अंत में एक हिंदुस्थानी कुलघाती-कुल कलंकी ने फाड़-फूड़कर जला डाली। अवध में घुसने के बाद अंग्रेजों की विजय का जितना प्रतिशोध करना संभव हो, उतना करते हुए मौलवी के ध्यान में आया कि अवध और रूहेलखंड के बीच पोवेन रियासत है, उसका राजा यदि अपने पक्ष में हो गया तो अंग्रेजों के विरूद्ध चल रहे संघर्ष को अधिक मदद मिलेगी। इसलिए उसने इस आशय का संदेश पोवेन के राजा को भेजा। यह हाथ भर की रियासत का राजा शरीर से संडकुसंड, मति से जड़, सुखभोगी और अकर्मण्यता से मतिमंद हो गया था। रण का नाम सुनते ही उसके शरीर पर कांटे खड़े हो गए। फिर भी मौलवी से प्रत्यक्ष मिलने को हम तैयार हैं, यह उसने सूचित किया। फिर बेगम की राजमुद्रा लेकर उसका एक प्रतिनिधि पोवेन शहर की ओर चला। मौलवी ने अपने कुछ अनुयायियों के साथ पोवेन शहर की दीवार के पास आते ही देखा कि दीवार के दरवाजे बंद है और दीवार पर सशस्त्र लोग खड़े हैं तथा वह मोटा राजा जगन्नाथ सिंह अपने भाई के साथ उनके बीच में खड़ा है। इस संशयपूर्ण दृश्य का अर्थ यद्यपि उसने समझ लिया, फिर भी रण-मैदान मे खेला हुआ वह वीर उस दृश्य से घबरानेवाला नहीं था। उसने दीवार के बाहर से ही उस राजा से बातचीत की। अपने ध्येय को पाने के लिए सर्वस्व राख होने तक तलवार नीचे नहीं रखूंगा, यह जिस पुरूष सूर्य की प्रतिज्ञा थी उसका वह तेजस्वी बयान उस दीवार पर खड़े उल्लू को बहुत भयानक लगना स्वाभाविक था। जब मौलवी ने देखा, अब इस डरपोक को डराए बिना 1857 का स्वातंत्र्य समर - 355

मेरा यह कथन सफल नहीं होगा तब उसने अपने महावत को आदेश दिया कि दीवार का द्वार तोड़ने के लिए हाथी को आगे बढ़ाया जाए। जिसपर वह बैठा था उसी विशाल हाथी का मस्तक उस प्राचीर के द्वार पर धड़ाधड़ टकराने लगा। और एक टक्कर कि उस दरवाजे का निश्चित ही चूरा हो जाएगा। उसी समय राजा के भाई ने बंदूक चलाई और उसकी गोली ने मौलवी अहमद शाह ! मौलवी अहमद शाह को उस परकोटे पर खड़े एक हिंदुस्थानी कुलांगार ने गोली चलाकर मार डाला। तुरंत ही वे दोनों भाई परकोटे के बाहर आए और उन्होंने मौलवी का सिर गरदन से उतार लिया। उस सिर को एक रूमाल में बांधा और वे तेरह मील दूर स्थित शाहजहांपुर दौड़ते गए। अंग्रेज अधिकारी खाना खा रहा था, तभी वह राजा अंदर घुसा। उसने अपने हाथ का रूमाल खोला और रक्त से सने मौलवी के सिर को उसने अंग्रेज के पैरों के पास लुढ़का दिया। दूसरे दिन अंग्रेजों ने शहर कोतवाली पर वह सिर टांग दिया और इस बहादुरी के लिए पोवेन के राजा का पचास हजार रूपए पुरस्कार दिए। पोवेन के राजा ! पोवेन के चांडाल ! तेरे देशद्रोह से यदि सचमुच तन-बदन में आग लगती हो तो इस प्राणी की प्रतिमा हर घर में नरक कूप के दरवाजे टांगी जाए। मौलवी अहमद शाह ऊंचा, इकहरा, कसा हुआ, भारतभूमि के हाथ की किसी सतेज तलवार जैसा था। उसकी नाक सीधी, भौंहें कमान जैसी। उसके मरते ही अंग्रेजों ने कहा, "उत्तर भारत का ब्रिटिशों का भयंकर शत्रु समाप्त हुआ।" अंग्रेजों के इस भयानक शत्रु के संबंध में अंग्रेजी इतिहासकार मैलसर कहता है-'उसके सैन्य नेतृत्व और युद्ध-चातुर्य के विद्रोह में अनेक उदाहरण घटित हुए हैं। उसके अंतिम समय के दावं-पेच तो अप्रतिम थे। सर कोलिन को दो बार भग्नचातुर्य कर बिखेर देने का सम्मान उसके सिवाय अन्य किसी को भी प्राप्त होना असंभव था। इस तरह फैजाबाद का यह मौलवी अहमद शाह रण में चमका। अपने जन्मसिद्ध देश की अन्याय से छीनी हुई स्वतंत्रता वापस लेने जो पुरूष विद्रोही संगठन खड़ा कर युद्ध करता है, वह यदि देशभक्त कहलाता है तो मौलवी अहमद शाह वास्तव में ऐसा ही देशभक्त था ! खून से उसकी तलवार गंदी नहीं हुई, खून के लिए वह सहमत नहीं था। जिसने उसका स्वदेश छीना था उस उचक्के विदेशी से वह लड़ा। वीरोचित लड़ा। रणनीति से लड़ा। दृढ़ता से लड़ा और इसलिए उस लोकोत्तर की स्मृति सारे राष्ट्र के रणवीरों और सत्यप्रियों के आदर की सत्पात्र हो गई थी। "158 1857 का स्वातंत्र्य समर - 356 158 "मौलवी एक असाधारण व्यक्ति था। विद्रोह काल में उसके सैनिक नेतृत्व की योग्यता का परिचय कई प्रसंगों में मिलता है। ' ' 'सर कैंपबेल को दो बार रण में मुंह की खिलाने का साहस दूसरा कोई नहीं कर सकता।" -मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 4, पृष्ठ 380

प्रकरण-10 रानी लक्ष्मीबाई जिन राजाओं ने अपने पीछे राज्य का कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा था, उनका राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी में मिलाने की नीति लॉर्ड डलहौजी ने अपनाई। डलहौजी की इस अपहरण नीति के अंतर्गत गोद लेकर उत्तराधिकारी बनाने का अधिकार भी नहीं दिया गया था। यही बात झांसी के लिए थी। झांसी राज्य भी अंग्रेजों ने हथियाना चाहा। विधवा रानी लक्ष्मीबाई ने विरोध के स्वर में कड़ककर कहा, " क्या मैं झांसी छोड़ूं? नहीं छोडूंगी। किसी की हिम्मत हो तो आजमा ले। मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। झांसी की लक्ष्मी के कंठ से स्वातंत्र्य-कौस्तुभ मणि छीनने का साहस किसमें था? इस समय संपूर्ण दैत्य-दानव एकत्र होकर आएं-साक्षात् मृत्युदेव यमराज भी लक्ष्मीबाई से युद्ध करके झांसी लेना चाहें तो भी झांसी उन्हें नहीं मिल सकती। जब तक लक्ष्मीबाई के अंदर रक्त की एक बूंद भी शेष रहेगी तब तक उसकी स्वातंत्र्य-कौस्तुभ मणि उसके कंठ में ही शोभा पाएगी और उसकी धधकती ज्वाला मेमं देशद्रोही, अंग्रेज नराधम जलकर भस्म होंगे। झांसी, झांसी का राजप्रासाद, जरीपटका (मराठी कपड़ा), राजसिंहासन, उसका सतीत्व आदि सब झांसी की रानी लक्ष्मी के साथ स्वाधीन रहेंगे या स्वाधीनता की यज्ञाग्नि में भस्म हो जाएंगे। अपनी बुलंद आवाज 'नहीं, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। जिसकी हिम्मत हो तो आजमा 1857 का स्वातंत्र्य समर - 357

ले।' के साथ वीरांगना लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा लेने को तत्पर हो गई। संपूर्ण बुंदेलखंड में आगामी क्रांति के लक्षण दिखाई देने लगे। सागर, नौगांव, बांदा, बानापुर, शाहगढ़ और कालपी में प्रतिशोध की भयंकर अग्नि प्रज्वलित होने लगी। अब तक झांसी की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रही । झांसी की प्रजा शांत, सुखी और व्यवस्थित रही; किंतु डलहौजी ने स्वतंत्रता की उस मणि को अपहृत किया, पर लक्ष्मी ने मणि को उससे छीन लिया और विजय गर्व से राज्य-संचालन करती रही। कमलासना लक्ष्मी अब युद्ध देवी के रूप में शोभा पा रही थी। अब उसके युद्धोचित वेश से आंखें चौंधिया जाती थी। नखशिख तक वह शस्त्रों, युद्धोभूषणों से सजी थी। इन दिनों रानी की दिनचर्या इस प्रकार बताई गई है-? ‘प्रातः पांच बजे से जागकर इत्र से सुगंधित जल से स्नान करती थीं। उसके बाद वस्त्र धारण करती थीं। साधारण तथा सफेद चंदेरी साड़ी उन्हें पसंद थी। तदनंतर पूजा पर बैठ जातीं। विधवा होते हुए भी प्रायश्चित्तर्घ्य देतीं, तुलसी वृंदावन में तुलसी की पूजा करती। उसके बाद पार्थिव पूजा होती। दरबारी संगीतज्ञ साम गायन करते। फिर कथावाचक कथा सुनाते। समाप्ति पर मांडलिक सरदार वंदना करते। दरबार के समय साढ़े सात सौ दरबारियों में जब कोई अनुपस्थित रहने का कारण पूछतीं। पूजा-पाठ के बाद प्रातराश (नाश्ता) करती। विशेष जल्दी का कार्य न होता तो नाश्ते के बाद एक घंटे आराम करतीं। उसके बाद भेंट में आए उपहार चांदी के थालों में रखे, रेशमी वस्त्रों से ढके उनके सामने पेश किए जाते। उनमें पसंद की वस्तुओं को स्वीकार करतीं, जो न स्वीकार करतीं, वे नौकरों में वितरित करने के लिए कोठीवालों को दी जातीं। अपराह्न तीन बजे पुरूष वेश में दरबार में जातीं। उस समय की वेशभूषा होती-पाजामा, गहरे नीले रंग का कोट, सिर पर टोप और उसपर सुंदर सी पगड़ी बांधती-बूटे का काम किया हुआ दुपट्टा पतली कमर में बांधती, जिसमें रत्नजटित तलवार लटकती। इस वेश में वह साक्षात् गौरी मालूम देती थीं। पुरुष वेश के अतिरिक्त कभी-कभी स्त्री वेश के भी वस्त्र पहनतीं। विधवा होने के बाद सौभाग्य अलंकरण-नथनी आदि-वह धारण नहीं करती थीं। कलाई में हीरे की चूड़ियां, गले में मोतियों का हार और कनिष्ठा उंगली में हीरे की अंगूठी रहती। बालों का जूड़ा बांधती। सफेद साड़ी और सफेद कंचुकी पहनतीं। इस प्रकार दरबार में कभी पुरूष वेश, कभी स्त्री वेश में बैठतीं। दरबारी लोग उन्हें प्रत्यक्ष नहीं देख पाते थे। उनका कक्ष अलग होता था, जिसका दरवाजा दरबार में खुलता था। सोने के बेलबूटों से सज्जित द्वार पर सोने-चांदी के आवरण में लिपटे दो दंड धारण किए दो वेत्रधारी खड़े रहते; दीवान लक्ष्मणराव उस कमरे के सम्मुख महत्त्वपूर्ण कागजों को लेकर खड़े रहते और उनके पास दरबार का अमात्य बैठता। ‘रानी बुद्धिमान थीं। बात के मर्म को शीघ्र ही ताड़ लेतीं। उनके निर्णय स्पष्ट, संक्षिप्त और निश्चित रहते। कभी-कभी वे अपने हाथ से आज्ञाएं लिखतीं। न्याय के समय वे बहुत 1857 का स्वातंत्र्य समर - 358

सावधान रहतीं। मुलकी तथा फौजदारी के निर्णय बड़ी योग्यता के साथ करतीं। “बड़े भक्तिभाव से वे महालक्ष्मी के दर्शन करने जातीं। यह मंदिर एक तालाब के किनारे था, जिसमें सुंदर कमल खिले रहते। हर मंगलवार तथा शुक्रवार को मंदिर जातीं। एक बार मंदिर से लौटकर रानी दक्षिणी दरवाजे से आ रही थीं। वहां हजारों भिखारी रास्ता रोककर खड़े थे। रानी ने मंत्री लक्ष्मणराव पांडे से कारण जानना चाहा। मंत्री ने बताया कि ये लोग अत्यंत गरीब हैं। जाड़े से परेशान हैं। रानी साहिबा से मदद मांगते हैं। दयालु रानी बहुत दुःखी हुईं। आज्ञा दी गई। चौथे दिन एक-एक कुरता, टोपी और कंबल सभी भिखारी तथा गरीबों को इकट्ठा करके रानी ने अपने हाथ से बांटा। नत्थे खां के साथ की लड़ाई में घायलों के घाव धोने के कार्य के लिए रानी हठ करतीं, अपने दुःख में रानी की ऐसी रूचि देखकर उनके घाव अच्छे हो जाते। मंदिर जाते यमय रानी की शोभा देखते ही बनती। कभी पालकी में तो कभी घोड़ें पर बैठकर जातीं। पुरूष वेश में साफे का छोर पीठ पर लहराकर शोभा पाता था। उनके आगे राजध्वज मारू बाजे के साथ चलता था। इस ध्वज के पीछे दो सौ गोरे घुड़सवार रहते। रानी के आगे-पीछे सौ-सौ सवार चलते, कभी सारी सेना जुलूस में रानी के साथ होती। रानी के निकलते ही नगाड़ा और शहनाई बजने लगते।”¹⁵⁹ अब स्वराज्य का नगाड़ा गंभीर घोष कर रहा था। ग्यारह महीने से गूंजनेवाले इस स्वातंत्र्य घोष से संपूर्ण बुंदेलखंड भर गया था। नगाड़े के इस नाद का साथ कालपी से तात्या टोपे की तोपें दे रही थीं। ब्रिध्य से यमुना तक ब्रिटिश सत्ता का कोई चिह्न दिखाई नहीं दे रहा था। कोई उसका-अंग्रेजी राज का-नाम भी नहीं ले रहा था। अब तो ब्राह्मण, मौलवी, सरदार, जागीरदार, सैनिक, पुलिस, राजा, राव, साहूकार और देहाती सभी की एक ही मांग थी, एक ही चाह थी-स्वाधीनता-प्राप्ति। इन सबको एक सूत्र में पिरोने का कार्य लक्ष्मीबाई ने किया। उनकी आवाज में वही दृढ़ता थी-‘अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी˙˙˙'। संसार के सामने दृढ़तापूर्वक कहा गया ‘नहीं’ शब्द बहुत कम आया है। भारत के उदारमना लोगों के मुंह स`अब तक यही एक शब्द सुनाई देता आया है, “मैं दूंगा।” किंतु लक्ष्मीबाई ने यह विलक्षण जयघोष किया-‘मैं नहीं दूंगी।' काश, यह आवाज भारत के हर मुख से गूंजी होती! इसी समय सर हू रोज पांच हजार सैनिकों को लेकर विद्रोहियों को दबाने झांसी की ओर चल पड़ा। सन् 1857 के प्रारंभ में हिमालय से विंध्य तक के समूचे प्रदेश को जीतने की सैनिक योजना पुनः बनाई। यह प्रदेश दो हिस्सों में बांटा गया। प्रत्येक पर अधिकार करने के लिए सेना भेजी गई। सर कैंपबेल इलाहाबाद से गंगा-यमुना के उत्तर की ओर अपनी बड़ी सेनाके साथ बढ़ा; दोआब जीता, गंगा पार कर लखनऊ को नष्ट-भ्रष्ट 1857 का स्वातंत्र्य समर – 359 159 1. दत्तात्रेय बलवंत पारसनी कृत-‘रानी लक्ष्मीबाई का जीवनचरित', पृष्ठ 147-51 ।

किया, बिहार के विद्रोह को दबाया, बनारस के आसपास तथा अवध के बागियों को हराया, सब क्रांतिकारियों को-रूहैलखंड में जहां अंतिम मुठभेड़ हुई-भगाया, उत्तर प्रदेश को क्रांतिकारियों से मुक्त किया। इस सब बातों का उल्लेख पिछले अध्यायों में आ चुका है। जहां कैंपबेल यमुना से उत्तर में हिमालय की ओर बढ़ रहा था, वहां यमुना से दक्षिण में विंध्य तक का प्रदेश जीतने ह्यू रोज आगे बढ़ा। सिखों,, गोरखों तथा कुछ हिंदुस्थानी सैनिकों ने कैंपबेल की सहायता की। ह्यू रोज को विशेष रूप से मद्रास, बंबई तथा हैदराबाद की पलटनों की सहायता मिली। हिंदुस्थानी सैनिकों का सहयोग भी ह्यू रोज को मिला था। सच तो यह है कि मात्र अपनी शक्ति से विजय पाना अंग्रेजों के लिए असंभव था। दक्षिणी भाग को जीतने के लिए हिंदी सेना को दो हिस्सों में बांटा गया। एक भाग ब्रिगेडियर विटलॉक के अधीन रखा गया, जो जबलपुर से आगे बढ़कर मार्ग के सब प्रदेशों को जीतता हुआ ह्यू रोज से मिला। दूसरा भाग ह्यू रोज के ही अधीन था। योजना थी कि जब जबलपुर से विटलॉक चलेगा तभी वह मऊ से प्रस्थान करेगा और झांसी तथा कालपी होकर आगे बढ़ेगा। योजना के अनुसार 6 जनवरी, 1857 को ह्यू रोज मऊ से निकला। एक छोटी लड़ाई करके उसने रायगढ़ जीता। वहां से सागर गया। क्रांतिकारियों द्वारा बंदी बनाए गए गोरों को मुक्त कराया और दक्षिण जाकर 10 मार्च को बानापुर जीत लिया तथा चंदेरी का प्रसिद्ध किला भी जीत लिया। झांसी से चौदह मील की दूरी पर 20 मार्च को इस विजयी सेना ने डेरा डाला। इन मुठभेड़ों के कारण नर्मदा के उत्तर में देश भर में फैले क्रांतिकारी दस्तों की झांसी में भीड़ थी। इसीलिए रोज क्रांतिकारियों के अड्डे को नष्ट-भ्रष्ट करने झांसी की ओर चल पड़ा। इसी बीच लॉर्ड केनिंग तथा कैंपबेल ने उसे आज्ञा दी कि पहले वह चरखारी नरेश की सहायता करे, क्योंकि वह तात्या टोपे से घिरा था। लेकिन वह इस बात को मानता तो झांसी को नष्ट करने का उसका इरादा ही नष्ट हो जाता। बड़ी द्विविधा में था। परिस्थिति विकट थी। झांसी पर चढ़ाई करने में अंग्रेजी शासन का हित था। अतः इस हित को ही सर्वोपरि मान रॉबर्ट हैमिल्टन ने दोनों अधिकारियों की आज्ञा के उल्लंघन का अपराध अपने ऊपर ले लिया और अंग्रेजी राज के हित को ध्यान में रखकर झांसी पर चढ़ाई कर दी। किंतु झांसी की भूमि में पैठते ही उसे बड़े कष्ट उठाने पड़े। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी आज्ञा से आसपास का क्षेत्र उजड़वा दिया था, ताकि शत्रु को रसद न प्राप्त हो सके। न छाया के लिए पेड़ रहे, न खेतों में एक भी भुट्टा रहा; यहां तक कि घास का एक तृण भी नहीं छोड़ा था। जिस प्रकार नीदरलैंड के विलियम ऑफ ऑरेंज ने स्पेनवाले शत्रु के हाथ में देश जाने की अपेक्षा सागर के पानी को अंदर लेना ज्यादा पसंद किया, झांसी की रानी ने भी उसी नीति का अनुसरण किया। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 360

रानी के स्वर में वही कठोरता, वही गर्जना है। बानापुर का राजा मर्दान सिंह क्रोध से उन्मत्त है, शाहगढ़ का राजा शूर ठाकुर जान हथेली पर लिये है, बुंदेलखंड के सरदार, देश की आजादी के लिए अड़े उनके अनुयायी-ये सभी प्रतिशोध की अग्नि में धधक रहे थे। राजध्वज 'जरीपटका' क्रोध की ज्वाला की तरह ऊपर उठ रहे हैं। इन सब शक्तियों का केंद्रीभूत रानी ही हैं। स्वराज्य की साक्षात् मूर्ति, जो दुर्गा की अवतार हैं। उजाड़ भूमि में से भूख-प्यास का कष्ट उठाती हुई अंग्रेज सेना झांसी की ओर बढ़ रही है। धिक्कार है शिंदे तथा टिहरी नरेश को, जिन्होंने 'अंग्रेज निष्ठा' के कारण इस लड़ाई में सारी सेना को घास, ईंधन और फल-मेवों से भरपूर सहायता की।160 शिंदे और टिहरी नरेश अंग्रेजों की सहायता कर रहे हैं। विश्वासघात और देशद्रोह का बोलबाला है। अब तुम्हारी विजय के आसार नहीं दिखाई देते। तो फिर क्यों न अंग्रेजों की शरण में जाकर सर्वनाश से बचतीं? पर क्या झांसी की रानी के मन में देशद्रोहियों, विश्वासघातियों के प्रबल जोर के कारण यह बात आएगी? क्या शरण लेने पर रानी ही क्या, महामंत्री लक्ष्मणराव, मोरोपंत, शूर ठाकुर, सरदार तथा सभी वीर बच जाएंगे। पर इनके स्वर-में-स्वर मिलाकर पूरी झांसी का उत्तर था- 'जातस्य कि ध्रुवो मृत्युः ˙˙संभावितस्य चाऽकीर्ति मरिणादतिरिच्यते'-अर्थात् जो जन्म पाता है वह अवश्य मरता है, तो फिर व्यर्थ में कीर्ति को क्यों कलंकित किया जाए? सो देश की आन-बान की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लड़ना निश्चित रहा। झांसी की सेना अपनी रानी के साथ युद्ध की तैयारी में निमग्न हो गई। उसकी सेना में वीरों की कमी नहीं थी, पर कुशल, शिक्षित सैनिक कम थे। अनुशासन का भी अभाव था। फिर भी रानी ने संपूर्ण सेना का नेतृत्व किया। वह हर बुर्ज पर, हर द्वारा पर घूमती हुई नजर आती थीं। तोपों की कुरसियां बनने और उन्हें मोरचे पर लगाने की जगह वह स्वयं उपस्थित रहतीं। चतुर तोपचियों का चुनाव करने में वह संलग्न थीं। इधर-उधर घूमकर निराश हृदयों में उत्साह का संचार कर रही थीं। इधर झांसी की जनता में भी पूरा उत्साह था। झांसी के पंडित मंदिरों में स्वाधीनता के लिए प्रार्थनाएं कर रहे थे। पुजारियों ने रण में जानेवाले सैनिकों को आर्शीवाद दिए और घायल होने पर उनकी शुश्रूषा भी की। झांसी के कारीगर गोला-बारूद तथा युद्ध की अन्य सामग्री बनाने में व्यस्त रहते। झांसी की जनता ने तोपों के काम में भरपूर सहयोग दिया। बंदूकें भरने का काम किया और तलवारों की धारें तेज कीं। वहां की स्त्रियों ने भी पूरा सहयोग दिया-गोला-बारूद पहुंचाईं, तोपों की कुरसियां बनाईं और समय पर रसद भी पहुंचाई। स्वयं ह्यू रोज ने अपनी आंखों देखा बयान किया है-“स्त्रियां तोपखाने में गोला-बारूद पहुंचाने आदि 1857 का स्वातंत्र्य समर – 361


160 1. मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 5, पृष्ठ 110 ।

कामों में व्यस्त दिखाई दीं।‘‘ इस प्रकार रात को नगर भर में युद्ध के नगाड़े बजने लगे और किले के बीच में मशालें जलती दिखाई दीं। पहरेदारों ने पूरी चौकसी बरती। 24 का सेवरा हुआ। अब क्या देर थी। ‘घन-गर्ज’ तोप ने अपना काम शुरू किया। उसकी गर्जना बड़ी भयंकर थी। झांसी के घेरे का आंखों देखा वर्णन दत्तात्रेय पारसनी कृत ‘रानी लक्ष्मीबाई का जीवनचरित’, पृष्ठ 187-193 के आधार पर इस प्रकार है- “25 तारीख से दोनों ओर से बराबर मुठभेड़ शुरू हुई। अंग्रेजी तोपें दिन-रात आग बरसा रही थीं। रात को किले के अंदर और शहर में गोले गिरने लगे। बड़ा भयंकर दृश्य था। पचास-साठ पौंड का गोला टेनिस की गेंद की तरह, किंतु अंगार-सा दीख पड़ता था। दिन की धूप में ये अस्पष्ट दीखते थे, पर रात में खूब चमकते और रात को भयंकर बना देते थे। 26 तारीख की दोपहर को दक्षिणी द्वार की अपनी तोपें अंग्रेजों ने निकम्मी कर दी थी। एक भी व्यक्ति वहां नही टिक पाता था। सब धैर्य खो बैठे थे। तब पश्चिमी द्वार के तोपची ने अपनी तोप का मुंह घुमाया और अंग्रेजों पर गोले फेंकने लगा। तीसरे गोले से अंग्रेजों का कुशल तोपची मारा गया और तोप भी बेकार हो गई। इससे रानी ने प्रसन्न होकर तोपची को चांदी का कड़ा इनाम में दिया। उस बहादुर तोपची का नाम था-गुलाम गोश खान। नत्थे खां के साथ हुए युद्ध में भी उसने ऐसा ही काम किया था। “पांचवे-छठ दिन उसी तरह युद्ध हुआ। चार-पांच घंटों तक रानी की तोपों ने अच्छा काम किया, अतः अंग्रेजों की तोपों की भीषण मार से रानी की तोपें बंद निकम्मी हुई। कोई वहां खड़ा नहीं हो सकता था। अंग्रेजों के गोलों में मुंडेर ढह पड़ी। किंतु रात मे ही कंबलों में छिपाकर ग्यारह राज वहां लाए गए और सुबह होने से पहले मुंडेर का काम पूरा हो गया। अंग्रेज इस व्यवस्था को देखकर दांतों तले अंगुली दबा गए। रानी की तोप ठीक काम कर रही है, इस बात से अंग्रेज बेखबर थे। उनको बहुत हानि उठानी पड़ी। उनकी तोपें लंबे अरसे तक बेकार रहीं। “आठवें दिन सवेरे ही अंग्रेजों ने शंकर किले पर हमला किया। अंग्रेजों के पास आधुनिक दूरबीनें थीं। इनकी मदद से किले के जलाशय पर तोपों से आग बरसाने लगे। पानी लाने के लिए नियुक्त छह-सात कहारों में से चार मारे गए। शेष बरतन वहीं फेंक भाग गए। चार घंटे तक पानी न मिलने से बड़ा कष्ट हुआ। अब पश्चिमी तथा दक्षिणी द्वारों पर से गोलाबारी करके अंग्रेजी तोपों को बेकार कर दिया गया। उन तोपों के बेकार होने से ही पीने और नहाने का पानी मिल पाया। इमली कुंज में बारूद का कारखाना था। दो मन बारूद तैयार होते ही तहखाने में भेज दी जाती। उस कारखाने का तोप का 1857 का स्वातंत्र्य समर - 362

गोला पड़ा, तीस आदमी और आठ औरतें वहीं समाप्त हो गए। उस दनि घमासान लड़ाई हुई। तोपों और बंदूकों की कर्णभेदी आवाज कायरों के दिलों को फोड़े डाल रही थीं। तुरहियां और करताल जोरों से बज रहे थे। धूल और धुएं ने आकाश ढक लिया था। बुर्जों के कई तोपची तथा सैनिक मारे गए। उनके स्थान पर नए आ गए। रानी स्वयं भाग-दौड़कर बहुत कार्य कर रही थीं। हर छोटी-बड़ी बात पर रानी का ध्यान था। तुरंत आज्ञा होती। झट से कच्चे स्थान की मरम्मत हो जाती। रानी के इस व्यवहार से सैनिकों का हौंसला बढ़ता और वे जी-जान से लड़ते। इस कठोर प्रतिकार से अंग्रेज पर्याप्त शक्ति होने पर भी 31 मार्च (सन् 1858) तक किले में प्रवेश नहीं कर पाए।'' पग-पग पर संकटों का सामना था। युद्धकार्य में व्यस्त रानी लक्ष्मीबाई बड़ी उत्सुकता से एक दिशा की ओर उन्मुख होकर देख रही हैं। क्यों? रानी के होंठों पर मुस्कुराहट बिखर गई। मुस्कान मुद्रा के साथ आदेश हुआ। मान वंदना में तोपें दागो। गंभीर गर्जन की आवाज में विजय के ढोल बजने लगे। रणोल्लास से आकाश गूंज उठा। बात यह थी कि झांसी की सहायता के लिए तात्या टोपे सेना लेकर आ रहा है। तात्या टोपे विंडहम और कानपुर को पराजित कर तथा कैंपबेल से पराजित होकर, गंगा पार कर नाना साहब की छावनी में पहुंच गया। यहां से आगे चलकर कालपी के निकट यमुना को पार किया। अतः उस देशद्रोही चरखारी नरेश पर आक्रमण कर दिया। तात्या ने उसे हराकर उससे जुर्माना वसूल किया, चौबीस तोपें छीन लीं। फिर वह कालपी की ओर मुड़ा। वहां उसे लक्ष्मीबाई का पत्र मिला, जिसमें झांसी पर पड़े अंग्रेजों के घेरे को तोड़ने की प्रार्थना थी। तात्या ने झांसी के प्रधानमंत्री रावसाहब को पत्र भेजा और उनकी आज्ञा पाते ही अंग्रेजों की पिछाड़ी पर टूट पड़ा। इसी सहयोग से रानी के होंठों पर मुस्कुराहट दौड़ गई। बचपन में तात्या और लक्ष्मीबाई ब्रह्मवर्त के राजमहल में साथ-साथ खेला करते थे। और आज भी वे सजग होकर खेल रहे हैं-युद्धभूमि में। रानी झांसी की घेराबंदी में आग की लपटों में खड़ी हैं और तात्या बाईस हजार की सेना के साथ बेतवा के पास खड़ा है। बचपन के उनके खेल पर कौन ध्यान देता था। आज सारा विश्व उनके इस रण-खेल को देख रहा है। इतनी बड़ी सेना को लेकर तात्या को आते देख अंग्रेज घबरा गए। उस समय थोड़े सैनिक होने से उन्हें बड़ा धोखा था, क्योंकि समाने से लक्ष्मीबाई सामना कर रही थी और पीछे से तात्या पिछाड़ी दाब रहा था। तात्या शेर अपने बाईस हजार पंजों से अंग्रेजों पर टूट पड़ रहा था। जैसे ह ीवह शेर झपटने को था कि उसके बाईस हजार पंजे लुंज-पुंज हो गए। बिना पंजों के शेर क्या करता? उसके सैनिकों ने बेतवा के किनारे कायरता का बड़ा लज्जास्पद प्रदर्शन किया। रानी का सामने से और तात्या का पीछे से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 363

अंग्रेजों को घेरना सचमुच सराहनीय कार्य था। अंग्रेजों को निराशा हो रही थी, फिर भी अंग्रेजों ने तात्या पर हमला किया, झांसी पर तोपों से आग बरसाई और इस प्रकार क्रांतिकारियों के दोनों मोर्चों को अंग्रेजों ने ठंडा कर दिया। शिवाजी या कुंवर सिंह के रणधीर योद्धाओं की तरह हमला होता तो यह निश्चय था कि यूनियन जैक तथा उसके अनुयायियों की लाशों पर गिद्धों को दावत मिलती। पर हाय री कायरता! कायर सैनिक आगे बढ़ने से हिचकिचाए। तोपों से एक गोला भी न चला। सेना और सेनापति बुरी तरह डरकर भाग गए। इस गड़बड़ से बहुत सी युद्ध सामग्री अंग्रेजों के हाथ लगी। तात्या की सभी तोपें रखी गईं और पंद्रह सौ सैनिक मारे गए-भागते हुए एक हजार पांच सौ मरे। भागते हुए कायरों की मौत मरने की अपेक्षा हिम्मत से सामना करते हुए मरते तो उसकी सेना का सफाया निश्चित था और सच्ची वीरगति पाकर हुतात्मा बनकर यश के भागी बनते। फिर भी, हम तुम पर यों तरस खाते हैं कि कैसे ही सही, तुम लोग स्वतंत्रता के लिए ही मारे गए हो। परमात्मा तुम्हें क्षमा करे। वीर तात्या के कायर सैनिकों! तुम्हारी मृत्यु से देशवासियों को इतना पाठ अवश्य मिलेगा कि जो जीने के लिए भागते हैं, वे मारे जाते हैं और जो मरने के लिए रणक्षेत्र में जूझते हैं, वे जीवित रहते हैं, अमर हो जाते हैं। रानी लक्ष्मीबाई मृत्यु को चुनौती देती हुई जूझ रही थीं। पर सरदारों, ठाकुरों और सिपाहियों ने एकाएक लाचारी दिखाई। नौ दिन और नौ रातें आग बरसाती हुई तोपों के सामने ये लोग खड़े रहे। इन्हें आशा थी कि तात्या तोपें की दैवी सहायता अचानक ही मिलेगी और ज बवह आया तो इन्होंने आनंद के नारे लगाए। 1 अप्रैल को तात्या की हार हुई, तब उनका आनंद ही नहीं, विजय की आशा ही मिट गई। जिस रसद को विश्वासघाती शत्रु के हाथ से हजारों सैनिकों का बलिदान देकर छीना था, वह अब अनायास ही गोरों के हाथ लग गई। तात्या की तोपें तथा गोला-बारूद अंग्रेजों के हाथ लगे। फिर भी निराशा क्यों? विजयी होकर शत्रु न जीने दे तो भी मृत्यु के बाद की अमर कीर्ति को वह तुमसे नहीं छीन सकता। हे वीरों! दृढ़ निश्चय करके वीरता की मूर्ति रानी के मुख से उसका स्वर सुनो- "अब तक झांसी पेशवा के बलबूते पर नहीं जूझ रही थी। आगे युद्ध जारी रखने के लिए भी उनके सहयोग की विशेष आवश्यकता नहीं है। अब तक तुमने आत्माभिमान साहस, दृढ़ता एवं वीरता का सराहनीय परिचय दिया है। अब भी तुम उसी तरह काम लो। और मैं तुमसे आग्रह करती हूं कि धैर्य और प्राणपण से लड़ो।" “हां, प्राणपण से लड़ो। मारू बजने दो। वीर गर्जन से आकाश गूंजने दो। बड़ी-बड़ी तोपों को धड़धड़ाने दो। 3 अप्रैल क प्रभात किरणें पृथ्वी पर आ चुकी हैं और अंग्रेजों का आखिरी हमला झांसी पर हो चुका है। चारों ओर से उनका दबाव बढ़ गया 1857 का स्वातंत्र्य समर - 364

हैं। इसलिए अब डटकर प्राणपण से लडो। देखो, युद्ध की देवी ने कैसी तलवार संभाली है और वीरता की पराकाष्टा दिखाने के लिए शत्रु के हरावल को विचलित कर रही है! रानी बिजली की तरह घूम रही हैं। किसी को सोने के कड़े, किसी को पोशाक बांट रही हैं। किसी की पीठ ठोकती है तो किसी को अपनी मुस्कान से उत्साहित कर रही हैं। गुलाम गोश खां और कुंवर खुदाबख्श, तोपों से आग बरसाओ। शत्रु मुख्य द्वार तोड़ रहा है, किलाबंदी तोड़ रहा है, आठ जगह नसैनियां लगाई गई हैं। 'हर-हर महादेव' की गूंज के साथ किले से, बुर्जों से, हर घर से गोलियों की बौछार हुई। बाढ़ों का तांता बंध गया। तोपें लाल गोले उगल रही हैं। आवाजें आती हैं-फिरंगी को मारो'। यह देखो, क्या यह युद्ध देवता है या रणचंडी, काली माता स्वयं भीषण युद्ध कर रही हैं। लेफ्टिनेंट डिक और लेफ्टिनेंट माइकल जोहान सीढ़ियां चढ़ रहे हैं और अपने आदमियों को चढ़ने के लिए ललकार रहे हैं। तोपों का धड़ाका हुआ। साहसी अंग्रेज काल के गाल में चले गए। और कोई है उनके पीछे आनेवाला? लेफ्टिनेंट बोनस और लेफ्टिनेंट फॉक्स, तुम मरना चाहते हो? बड़ी कठिनाई से चढ़े हुए इन चार वीरों को गिरते देख नसैनियां भी कांपने लगीं। अंग्रेजों ने पीछे हटने का बिगुल बजाया । सेना पीछे भागी। हर सिपाही चट्टान की ओट लेकर छिपते हुए भागा। इस तरह प्रमुख द्वार पर डटकर प्रतिकार हुआ। उधर दक्षिण बुर्ज पर कोई कराह रहा है। मालूम पड़ता है, विश्वासघाती नीच ने मोरचा द्वार गंवाया होगा। यह सच है कि अंग्रेजों ने देशद्रोहियों के बल पर ही फतह पाई है और अंग्रेज बुर्ज पर चढ़कर फुरती से आगे बढ़ रहे हैं। उस दिन सबके मन में एकमात्र भाव था-'मारेंगे या मरेंगे।' अंग्रेजों ने शहर में मार-काट मचा दी। एक के पीछे एक मोरचे पर कब्जा करते गए। कत्ल, आगजनी और विध्वंस का बाजार गरम था। वे राजमहल तक पहुंचे। राजप्रासाद पर अधिकार कर हजारों रूपए लूटे गए। पहरेदारों को मार डाला गया। ईंट-से-ईंट बजा दी गई। आखिरकार झांसी अंग्रेजों के हाथों में चली गई। परकोटे पर खड़ी रानी ने एक बार झांसी पर दृष्टि डाली। दक्षिण दरवाजे पर हुए भीषण कांड का दृश्य उनकी आंखों में तैर गया। शत्रु के स्पर्श से उनकी झांसी अपवित्र हो गई। क्रोध से रानी पागल हो उठीं। आंखों से क्रोध की चिंगारियां छूट रही थीं। उन्होंने अपनी तलवार संभाली, हजार-पंद्रह सौ सैनिक साथ लिये और किले को चल पड़ीं। अपने बच्चे को छेड़नेवाले पर भी शेरनी इतनी फुरती से नहीं झपटती जितनी तेजी से वह दक्षिण द्वार पर तैनात अंग्रेजों पर झपटीं। तलवारों से तलवारें भिड़ गईं। दोनों दल थोड़ी देर के लिए एक-दूसरे में समा गए। खनाखन की मार बजी, बहुत से गोरे मारे गए। शेष शहर की ओर भागे और ओट में छिपकर शिकार खेलने लगे। फिरंगी के खून से उस महाकाली का क्रोध कुछ शांत हुआ। ध्यान में आया कि किले से इतनी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 365

दूर अकेली का लड़त्रना महामूर्खता थी। अब इस असाधारण साहिसिक वीरता की प्रतिध्वनि शहर के हर रास्ते से मिलेन लगी। हालांकि सारा शहर, राजप्रासाद अंग्रेजों की तलवारों ने खून से रंग दिया। उनमें से हर वीर ने अपनी शक्ति भर अधिक-से-अधिक गोरों का सामना किया। उनके मर-मिटने पर ही घुड़साल शत्रु के हाथ लगी। अंग्रेजों ने अब तक शहर को खंडहर बना डाला था। उनके सामने जो भी आता-भले पांच वर्ष का बालक हो या अस्सी साल का बूढ़ा-उनकी तलवार का शिकार हो जाता । नगर भर आग से जल उठा। घायलों, मरनेवालों की चीखों से आकाश गूंज उठा। किले का परकोटा बहुत पक्का होने के कारण अंग्रेजों ने उसे तोड़ने का विचार दूसरे दिन का रखा। रानी परकोटे पर खड़ी करूणापूर्ण दृश्य को देख रही थीं। उन्हें अत्यंत दुःख हुआ। उनकी आंखे डबडबा आईं। रानी लक्ष्मीबाई रोईं। उनकी सुंदर आंखें रोने से लाल हो गई। उसकी झांसी की यह दशा! एक बार फिर सिर ऊंचा करके देखा, झांसी की किलाबंदी पर पराधीनता का दाग, फिरंगी का झंडा गाड़ा गया है। उन रोनेवाली आंखों में एक विलक्षण तेज चमक उठा। धन्य हैं वे आंखें, वह हृदय और वह धैर्य! इतने में बेतहाशा दौड़ता हुआ एक दूत आया और कहने लगा, "रानी सरकार! किले के प्रमुख द्वार-रक्षक सरदार कुंवर सिंह, दोनों तोपचियों खुदाबख्श और गुलाम गोश खां को अंगेजों ने गोली से उड़ा दिया है।" पहले से ही दुःखी हृदय पर यह कितना भयंकर आघात! संकट-पर-संकट आ रहे हैं। रानी का अब एक ही निश्चय है-स्वाधीनता की कौस्तुभ मणि झांसी की लक्ष्मी के गले से नहीं गिरनी चाहिए। उस दूत से, जो एक बूढ़ा सरदार था, रानी न कहा, "देखो, मैं इस किले में अपने हाथों बारूद के भंडार में आग लगाकर बाहर निकल जाना चाहती हूं।" अपने जरीपट के साथ स्वाधीनता के झंडे को लिये हुए या तो वह राजसिंहासन पर विराजमान होंगी या फिर चिता पर। यह सुनकर उस बूढ़े सरदार ने शांति से कहा, "सरदार, यहां रहना अब खतरनाक है। शत्रु की छावनी को चीरकर आपको आज रात किला छोड़कर चले जाना चाहिए और पेशवा की सेना में पहुंचना चाहिए। और यदि मार्ग में ही मृत्यु मिल जाए तो समरांगण-तीर्थ की पवित्र धारा में गोता लगाकर स्वर्ग द्वार में प्रवेश हो सकता है।" "मैं मैदान में लड़ते-लड़ते मरना अधिक पसंद करती हूं।" रानी का जवाब था, "किंतु मैं स्त्री हूं। मेरे शरीर की कहीं विडंबना हुई तो?" यह सुनकर सब सरदारों ने एक स्वर से कहा, "जब तक हममें से एक भी जीवित है तब तक आपके शरीर को छूनेवाले के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे।" रात हुई। रानी ने अपनी प्रजा को बुलाकर अंतिम बार आर्शीवाद दिया। रानी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 366

का झांसी छोड़ने का इरादा देख प्रजा की आंखें गीली हो गईं, शायद फिर न लौटें। रानी ने चुनिंदा घुड़सवारों को अपने साथ लिया। आभूषणों से सजाया हुआ एक हाथी उनके बीच रखा गया। 'हर-हर-महादेव' के घोष के साथ वे किले से उतरने लगीं। पुरुष वेश बनाया था। फौलादी कवच ने शरीर की रक्षा की थी। कमरबंद में एक जमिया पड़ा था और एक पैनी तलवार लटक रही थी। अंचल में एक प्याला बंधा था, रेशमी धोती से पीठ पर उनका दत्तक पुत्र दामोदर बंधा हुआ था। सफेद घोड़े पर सवार रानी साक्षात् लक्ष्मी लगती थीं। उत्तरी दरवाजे के निकट पहुंचने पर देशद्रोही टिहरी नरेश के पहरेदार ने टोका, "कौन है?'' "टिहरी की सेना सर ह्यू रोज की सहायता के लिए कूच कर रही है।'' उत्तर मिला और प्रहरी ने जाने दिया। रानी आगे बढ़ीं। एक गोरे प्रहरी को भी इसी तरह टाला गया। रानी के अंगरक्षकों में एक दासी, एक बारगीर और दस-पंद्रह घुड़सवार थे। इस तरह से यह सेना शत्रु की छावनी की बीच से कालपी तक सुरक्षित पहुंच गई। किंतु रानी के अन्य घुड़सवारों को संदेह में अंग्रेजों ने रोका और वहीं ठन गई। मोरोपंत तांबे घायल होने पर भी दतिया तक निकल गए; किंतु दतिया के देशद्रोही दीवान ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और अंग्रेजों को सौंप दिया। अंग्रेजों ने उन्हें फांसी के झूले पर झुला दिया। लक्ष्मी ने घोड़े को एड लगाई, क्योंकि लेफ्टिनेंट बॉकर चुने हुए घुड़सवारों के साथ रानी को पकड़ने के लिए पीछा करता हुआ आ रहा है। हे रानी के अश्व! तुम्हारी पीठ पर जो पवित्र निधि है उसकी रक्षा के लिए पूरा बल लगाकर दौड़ो। देश के मानव भले ही देशद्रोही बनें, पर देश के पशु तुम तो ईमानदार ही रहोगे। तुम्हारे पशुत्व के आगे देशद्रोहियों के मनुष्यत्व पर हजार बार लानत है। और हे रजनी! तुम भी रानी और घुड़सवारों को छिपाने के लिए अपनी काली चादर फैला दो! और हे भारत के मार्ग! तुम उस घोड़े को कोई बाधा मत देना। और आकाश में चमकते तारागणों! शत्रु को प्रकाश मत दो। हां, इतना प्रकाश अवश्य दो कि कमल के समान कोमल रानी उत्साह के साथ अपने मार्ग पर अग्रसर हो सकें। अब उषा का आगमन हुआ है और वीर रानी, तुम वायु के पंखों पर रात भर उड़ी चली आ रही हो। सो अब मंडेर गांव के पास कुछ विश्राम लो। वहां का लंबरदार तुम्हारे प्यार दामोदर को खिलाएगा। सुबह का नाश्ता करके रानी तुरंत कालपी की ओर चल पड़ीं। लेकिन पीछे से गुबार उड़ रहे हैं। रानी, घोड़े को तेज करो, दामोदर को संभालो और आगे बढ़ो। अपनी तलवार संभालों। बॉकर नजदीक आ चुका है। 'तो नीच बॉकर, अपनी नीचता का पुरस्कार ले! तलवार उठी और बॉकर लड़खड़ाता हुआ घोड़े से गिर पड़ा। पीछा करनेवाले अंग्रेज और रानी के दस-पंद्रह घुड़सवारों में प्राणघातक मुठभेड़ हुई। उनमें से जो बचे वे लक्ष्मी की रक्षा के लिए आगे बढ़े। घायल बॉकर और उसके साथियों ने पीछा करने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 367

से मुंह मोड़ लिया । भारत माता की तलवार विजयी होकर चमकती हुई आगे बढ़ीं। आकाश में सूर्य और धरती पर लक्ष्मी-दोनों आगे बढ़ रहे थे। दोपहर हुई। रानी नहीं रुकीं। सांझ हुई। सूर्यदेव थककर क्षितिज के पीछे जा छिपे। रानी नहीं थकी। वह बढ़ती गई। दौड़ते-दौड़ते रानी कालपी पहुंची। एक सौ दो मील का सफर और वह भी बॉकर जैसे योद्धा के साथ जूझते हुए-पीठ पर एक बालक का बोझ लेकर रानी ने तय किया। वह घोड़ा कालपी तक रानी को सुरक्षित पहुंचाने के लिए ही प्राण धारण किए हुए था। अमूल्य रत्न को अपनी पीठ पर से उतारने के बाद वह लड़खड़ाता और स्वर्ग सिधार गया। छह आदमियों को उसकी अंतिम क्रिया में तुरंत लगाया गया। वह घोड़ा रानी को अत्यंत प्यारा था। जिस घोड़े ने इतनी ईमानदारी से अपने प्राण देकर भी अपने जिस कर्तव्य का पालन किया, उसकी स्मृति सदा के लिए प्यारी रहेगी। रानी ने सवेरे तक आराम किया। सुबह रानी और राव साहब पेशवा का हृदयवेधक साक्षात्कार हुआ। दोनों को अपने पूर्वजों का स्मरण हुआ, जिन्होंने असंभव को संभव बनाने के लिए बड़े-बड़े काम किए। ऐसे महापुरुषों में जन्म लेने का सौभाग्य दोनों को प्राप्त था उन्हें इस बात से प्रेरणा मिलती थी मराठों का झंडा अटक पर लहराने का कारण था-शिंदे, होलकर, गायकवाड़, बुंदेले और पटवर्द्धन का स्वराज्य के लिए अपने प्राणों के उत्सर्ग के लिए कृतसंकल्प होना। जिसके लिए उनके पूर्वजों ने अपना खून बहाया था, उसी झंडे, उसी स्वराज्य के लिए शुरू हुए युद्ध को अंत तक निभाने के लिए दोनों ने प्रण किया। स्वदेश को भ्रष्ट करनेवालों से वह युद्ध लड़ा जा रहा था। पुनः लक्ष्मीबाई तथा तात्या टोपे ने घनघोर संग्राम की सिद्धता के लिए युद्ध शुरू किया। इन दोनों को युद्ध में तत्पर छोड़ अब हम ब्रिगेडियर विटलॉक की गतिविधि पर सरसरी निगाह डालेंगे, जिसे हम कुछ पहले छोड़ चुके हैं। नर्मदा तथा गंगा-यमुना के प्रदेश को फिर से जीतने के लिए दो सेनाएं चली थीं। उनमें एक ने ह्यू रोज के नेतृत्व में झांसी को जीत लिया। झांसी जीतने के बाद वहां अराजकता फैली। लूट के काम में तो नादिरशाह की बराबरी की गई। मंदिर-मूर्तियां तोड़ी गई। भयंकर हत्याकांड हुआ। उसके बाद मुहिम जारी रखने के लिए यह सेना कालपी की ओर बढ़ने वाली थी। इसका अंतिम भाग पूरा करने का भार ब्रिगेडियर विटलॉक को सौंपा गया। विटलॉक काली पलटन, गोरा और काला रिसाला और उत्कृष्ट तोपखाना था। बड़ी शान के साथ उसने सागर में प्रवेश किया। अंग्रेजभक्त आरेछा नरेश उससे मिला। यहां से यह सेना बांदा के नवाब को जीतने चली, जो उस प्रांत के मुख्य क्रांति-नेता थे। क्रांति की पहली लहर में झांसी, सागर और अन्य स्थानों में क्रूर कत्ल थे। वहां के गोरे जहां शरण मिली वहां जान बचाने भाग गए। बांदा के नवाब ने उन्हें अपने राजमहल में सुरक्षित रखा था और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 368

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किरवी रियासत खालसा में मिलाई गई। विजित प्रदेश में ‘शांति’ स्थापना के लिए विटलॉक महोबा में छावनी डाल रहा था। दरअसल उसने अपनी मुहिम पूरी की थी। बुंदेलखंड का पूर्वी भाग जीत लिया था। एक-दो छोटी जगहों में शांति कायम करने के लिए कुछ दस्ते भेजे थे। अब विटलॉक को यहीं छोड़ झांसी की रानी के पवित्र चरणों का दर्शन करें।

अब रानी ने पेशवा की सेना के साथ कालपी से बयालीस मील दूर कंच गांव को कूच किया। लेकिन ऐसा अनुमान है कि रानी की सूचना के अनुसार सेना की व्यूह-रचना राव साहब ने नहीं की थी। ध्यान रहे, राव साहब या तात्या टोपे के लिए पूरी तरह प्रबंध करना असंभव-सा था। यद्यपि उनके साथ बांदा का नवाब, शाहगढ़ नरेश, बानापुर के राजा-ये सब एक ही झंडे के नीचे इकट्ठे हुए थे; फिर भी एक विशाल सैनिक संगठन के अंतर्गत अनुशासित होकर नहीं आए थे। कोई ऐसा संगठन नहीं था जो एक स्वर से संचालित हो, एक सुनिश्चित विधान के अनुसार चले। प्रत्येक अपनी अलग योजना बनाता, इससे किसी की योजना पर पूरा अमल न हो पाता था। दूसरी ओर शत्रु दल के नेताओं में कोई झगड़ा न था; उनका संगठन व्यवस्थित और अच्छी तरह अनुशासित था। सर ह्यू रोज के सेनानी नियुक्त होने से पहले अफवाहों और मतभेदों का बाजार गरम रहा। लेकिन एक बार जब उसकी नियुक्ति हुई कि उसका मत ही सबका मत था। वह जो भी आज्ञा देता वह ठीक मानी जाती, उसका पालन होता। किसी साधारण सेनानी की आज्ञा का भी, चाहे वह गलत ही हो, पालन एकता के साथ हो तो सफलता निश्चित ही है। इसके विपरीत, यदि सैनिक अपनी सनक को महत्त्व दें, शासन में संगठन न हो, सुयोग्य सेनानी की विचारपूर्ण आज्ञा भी पराजय का कारण बनती है। यदि यह तथ्य गलत है तो कंच गांव में जो पराजय हुई, वह कभी न होती।

झांसी सेसर ह्यू रोज के आते ही क्रांतिकारियों से कंच गांव में मुठभेड़ हुई। दोपहर की कड़ी धूप गोरे सह नहीं सकते, यह जानकर क्रांतिकारियों के एक आज्ञापत्र में लिख था-‘सवेरे दस बजे के पहले फिरंगियों से कोई मुठभेड़ न करे, सदा ही दस के बाद लड़ाई हो।’इस सूझ-बूझकर आज्ञा का उस दिन पालन हुआ। जैसाकि अन्य स्थानों में हुआ था, दस बजने के बाद जहां लड़ाई शुरु होती, अंग्रेजों की छावनी में कुहराम मच जाता, आज ऐसा ही हुआ। इसपर भी कंच गावं में क्रांतिकारियों की हार हुई और उन्हें कालपी की ओर हटना पड़ा। जिस सराहनीय ढंग से पीछे हटे, जिस संगठित ढंग से

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162 — बागी माना जाए। इस नीचता का कारण यह था कि गोरे सैनिकों को उनकी कठिन लड़ाइयों तथा चिलचिलाती धूप में कष्ट उठाने का पुरस्कार किरवी के खजाने में ही भरा पड़ा था। वहां के तहखाने आदि में अनमोल हीरे तथा जेवरात थे। इस संपत्ति के लालच में यह अन्याय किया गया।‘‘ –के एवं मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 5, पृष्ठ 140–41

मोर्चे छोड़ते गए, शत्रु ने इसकी अत्यंत प्रशंसा की है।163 काश, यह असंगठन अनुशासनहीनता पराजय से पहले दूर कर दी जाती! ˙ ˙ इसके बाद क्रांतिकारी कालपी पहुंचे और पराजय का दोष एक-दूसरे पर मढ़ने लगे; पैदल सेना ने रिसाले को कोसा, सिाले ने झांसीवालों की निंदा की और सब मिलकर तात्या टोपे की गलती बताई। किंतु इस आपसी बखेड़े को देखने तात्या कालपी पहुंचा ही न था। वह तो जालवण के पास चरखी गांव में अपने पिता से मिलने गया था। ध्यान रहे, रास्ते में ग्वालियर पड़त्रता है, उसके बाद वह और कहां जा सकता है? हम आशा करते हैं कि पिता-पुत्र की भेंट अत्यंत प्रेमपूर्वक तथा आनंद से हो; और फिर इस महान् क्रांतिकारी नेता को अपनी योजनाओं के कार्यान्वयन में यश प्राप्त हो। इस मनचाही यात्रा में तात्या के चले जाने के बाद रानी लक्ष्मीबाई पेशवा के शिविर में गईं। कंच गांव के पराभव से पेशवा को बड़ा दुःख हुआ। अपने ओजपूर्ण शब्दों से उनकी उदासी को दूर करते हुए तथा धीरज बंधाते हुए वीरांगना रानी ने कहा, “आप यदि सेना को फिर से संगठित करें तो शत्रु उसपर कभी विजय नहीं पा सकता।‘‘ रानी के शब्दों से बांदा के नवाब को उत्साह प्राप्त हुआ। ओजपूर्ण शब्दों में रचे घोषणापत्र फिर से क्रांति-सेना में वितरित हुए । आज यमुना के किनारे भीड़ जमा हो रही थी। तलवारें और तोपें चमकती हैं; मातृभूमि की साधना में रत सिपाही यमुना मैया से आशीर्वाद मांग रहे हैं। इस तरह का मेला यमुना किनारे पहले कभी किसी ने नहीं देखा होगा। सब ओर मातृभूमि और धर्म की जय-जयकार हो रही है-‘जय यमुना मैया! तुम्हारा पवित्र जल हाथ में लेकर हम प्रतिज्ञा करते हैं कि फिरंगी नष्ट होगा। देश स्वतंत्र होगा। स्वधर्म की पुनःस्थापना होगी। मां यमुना! यह सब होगा, तभी हम जिंदा रहेंगे, नहीं तो रणभूमि में सदैव के लिए सो जाएंगे। कालिंदी माता, हम तीन बार प्रतिज्ञा करते हैं।‘ तीन बार शपथ ग्रहण किए वीरों! मैदान में बढ़ो। रण-लक्ष्मी तुम्हें उत्तर की ओर बुला रही है। राव साहब सारी सेना का नेतृत्व करेंगे। ह्यू रोज के नेतृत्व में चलने वाली 1857 का स्वातंत्र्य समर - 371 163 सं. 49 ‘‘फिर बागियों ने वह काम किया जिसकी प्रशंसा उनके शत्रुओं को भी करनी पड़ी। पीछे हटने का कार्यक्रम उन्होंने इस तरह पूरा किया कि उसका जोड़ पाना असंभव है। अंग्रेज अफसरों ने उन्हें जो पाठ अच्छी तरह पढ़ाए थे, उनको ठीक तरह ध्यान में रखा गया था। किसी प्रकार की जल्दबाजी, अव्यवस्था तनिक भी न थी, पीछे भागने का नाम नहीं। रणक्षेत्र का संचालन आदि सबकुछ व्यवस्थित था। दो मील लंबी मुठभेड़ का हरावाल हाने पर भी किसी पर भी किसी जगह घबराहट नहीं थी। सैनिक गोली चलाते, फिर पीछे की पाती की ओर दौड़ते और अपनी बंदूकें भरते। फिर आगेवाले गोलियां चलाते और पीछे अपनी जगह पर हट जाते। पीछा करनेवाले यदि बहुत जोर करते तो वे डटकर खड़े हो जाते और घमासान लड़ाई पर मजबूर करते।‘‘-मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 5, पृष्ठ 124 । (शत्रु द्वारा की गई इस प्रशंसा से ‘पांडे’ की सेना का श्रेष्ठतव निखर पड़ता है।)

25वीं पैदल पलटन को भगा दो। ये सब अहिंदी हैं-इन देशद्रोहियों को भगा दो। यह मेजर आर्क बढ़ा क्या? उसकी भी वही गत कर दो। कालपी के सामने के मैदान में हिलोरनेवाले हिस्से की सेना को सुरक्षित रखने पर हमारी स्थिति लगभग अजेय है। देखो, सेना मुख पीछे हट रहा है। वह बहुत अधिक आगे बढ़ गया था और पीछे से पूरी सहायता न मिलने पर उसे पीछे हटना पड़ा है। रान लक्ष्मी, तुम उनकी रक्षा के लिए दौड़ो। तलवार हाथ में लिये हुए अपनी सेना को बचाने बिजली की तरह वह दौड़ पड़ी। अंग्रेजों के दाएं पार्श्व पर लाला गणवेशधारी सवारों के साथ टूट पड़ी। अंग्रेज एकदम ठंडे पड़े-हमला इतना जोरदार था! लाचार हो पीछे हटने लगे। इक्कीस साल की लड़की की बिजली-सी झपट, उसके घोड़े का वायु वेग से दौड़ना, दांह-बाएं गाजर मूली की तरह उसका अंग्रेजों को काटना-इन सबको देख कौन होगा जो लड़ने को तत्पर न होगा? रानी ने अपने रण-कौशल से सभी क्रांतिकारियों का उत्साह बढ़ाया। भीषण युद्ध शुरू हुआ। हलकी तोपों पर धावा बोल दिया। तोपची भागे। घोड़ों पर चलनेवाला तोपखाना तितर-बितर हो गया। क्रांतिवीर चारों ओर से आगे बढ़ने लगे। आज तक हाथ में न आनेवाले फिरंगी को मटियामेट करने का मौका मिलने से वे आनंदित हो उठे। उन सबके आगे रानी लक्ष्मीबाई चल रही थीं। इस आकस्मिक धावे को देखकर ह्यू रोज चौंक पड़ा। वह अपने इमदादी ऊंटों को लेकर आगे बढ़ा; किसी तरह ऊंटों को कारण अंग्रेजों ने अपनी प्राणरक्षा की । एक अंग्रेज का कथन है, "यदि पंद्रह मिनट और बीत जाते तो क्रांतिकारियों ने हमारा सफाया कर दिया होता। इमदादी डेढ़ सौ ऊंटों ने ही उस दिन हमारा उद्धार किया। और उसी दिन से सचमुच मैं ऊंट को प्यार की नज़र से देखने लगा।" केवल ऊंटों के काफिले ने 22 मई को पेशवा की सेना को कालपी तक पीछे हटने को मजबूर किया। कुछ मुठभेड़ों के बाद 24 मई को ह्यू रोज कालपी में घुस पड़ा। तात्या टोपे तथा पेशवा राव साहब द्वारा कालपी किले में एकत्र की गई-सामग्री अनायास ही अंग्रेजों के हाथ लगी। साठ हजार रतल बारूद भूमि में गड़ी पाई गई। नई बंदूकें, पीतल की तोपों के गोलें, उन्हें बनाने के यंत्र, ढेरों सैनिक गणवेश, झंडे, मारू बाजे, फ्रांसीसी तुरहियां, यूरोप में बनी गरनाल तोपें तथ कई प्रकार के शस्त्रास्त्र आदि युद्धोपयोगी सामग्री अंग्रेजों के हाथ लगी। अगर हाथ न लगे तो शूरवीर चिरस्मरणीय क्रांति नेता, क्योंकि कालपी का संपूर्ण पतन होने के पहले एक सप्ताह तक राव साहब, बांदा का नवाब, रानी लक्ष्मीबाई और अन्य नेता वहां से गायब होकर किसी अज्ञात स्थान को चले गए थे। निस्सहाय, निःशस्त्र इन नेताओं को मारे-मारे फिरकर, भूखों भटककर या तो शत्रु के चंगुल में पकड़ा जाने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 372

या आत्महत्या करने के अतिरिक्त और कोई चारा न था। इस तरह, यमुना के उत्तर कांठे का प्रदेश फिर से हड़पकर विजयी कैंपबेल हिमालय तक पहुंच गया। इधर ह्यू रोज और विटलॉक ने नर्मदा से प्रारंभ कर यमुना के दक्षिणी कांठे के प्रदेश पर दखल किया। क्रांतिकारियों का पूरा सफाया करने पर अंग्रेजों को हक था किवे अपना अभिनंदन करें। ह्यू रोज ने अपने सैनिकों का अभिनंदन इन शब्दों में किया है—“वीर सैनिकों! तुमने एक हजार मील का प्रदेश रौंदकर शत्रु से सौ तोपें छीन ली हैं। नदियों को तैरकर, पहाड़–टीले लांघकर, जंगलों, दर्रों, उपत्यकाओं में शत्रु का सफाया कर असीम प्रदेश अपने देश की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए हैं। वीर तो तुम हो ही, पर अनुशासन के साहसी वीरता का मूल्य नहीं होता। अत्यंत कठिन परिस्थितियों में , कठोर यंत्रणाओं में भी तुमने अपने अधिकारियों की आज्ञा का पालन ज्यों-का-त्यों किया है। आज्ञा भंग करने या उददंडता का तनिक भी परिचय नहीं दिया। यमुना से नर्मदा तक तुमने अपने अद्वितीय सैनिक अनुशासन से महान् महान विजय प्राप्त की है।” वीर स्तुतिपूर्ण और प्रभावशाली वक्तव्य देकर ह्यू रोज स्वास्थ्य के कारण सैनिक सेना से निवृत्त हुआ। उसकी विजयी सेना भी शत्रु की पूरी हार होने से छुटकारे की सांस लेकर आराम की अपेक्षा करने लगी। लेकिन अंग्रेज सैनिकों, अभी आराम की क्यों सोचते हो? अभी तो तात्या और लक्ष्मीबाई जीवित हैं। और यदि स्वेच्छा से रण के लिए तैयार नहीं होंगे तो ग्वालियर की सेना युद्धभूमि में खदेड़ने के लिए कटिबद्ध है। कालपी से छिटककर सभी क्रांति नेता आगामी योजना बनाने के लिए गोपालपूर में जमा हो गए। वास्तव में इस समय विजय के कोई आसार नहीं थे। नर्मदा से यमुना तक और यमुना से हिमाचल तक सारा प्रदेश अंग्रेज फिर से जीत चुके थे। क्रांतिकारियों के पास सैन्यबल नहीं था, किले आदि भी नहीं थे, बराबर हार होते रहने से नई सेना का संगठन करना भी असंभव-सा ही था। परंतु तात्या जीवित है, यही पर्याप्त है। रानी लक्ष्मी भी वहां थीं, तात्या गोपालपुर लौट आया था। लोगों में यह खबर उड़ी कि वह अपने पिता से मिल आया है। खबर झूठ हो या सच, पर इतिहास इसका कोई प्रमाण नहीं देता। अब ह्यू रोज ने अपना धूर्त दांव कालपी में चलाया। तभी एकाएक तात्या को अपने पिता के दर्शन की सनक आ गई। और पितृ-दर्शन की यह धुन आगे चलकर युद्ध की विस्मृति कराने लगी और अपनी इस इच्छा पर काबू न रखते हुए वह चरखी चला गया। इस सनक का रहस्य क्या हो सकता है? यही कि कालपी का पतन होने पर क्रांतिकारियों के हाथ में कोई-न-कोई सुरक्षित स्थान या किले का होना अत्यंत आवश्यक था। नई सेना मिल जाए, यह भी अच्छा था। इसी कारण क्रांति का अग्रदूत तात्या कालपी से छिटककर ग्वालियर में घुस पड़ा। अब 1857 का स्वातंत्र्य समर — 373