अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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सम्राट् हर्षवर्द्धन (६०६-६४७ ई०) के दरबार के महाकवि बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित की प्रस्तावना में कालिदास की कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है और पुलकेशी द्वितीय (६३४ ई०) के ऐहोल नामक ग्राम में प्राप्त शिला पर खुदी हुई प्रशस्ति में भी कालिदास को स्पष्ट उल्लेख है। इससे इसके बाद भी कालिदास नहीं हो सकते। अतः कालिदास का समय ई० पू० प्रथम शताब्दी से लेकर सातवीं शताब्दी के बीच कहीं न कहीं होना चाहिए। इन दो सीमाओं के आधार पर कालिदास की स्थिति के सम्बन्ध में विभिन्न ऐतिहासिक विद्वानों ने तीन मत प्रस्तुत किये हैं, क्योंकि कालिदास ने तो अपने सम्बन्ध में कहीं भी कुछ नहीं लिखा है और अपनी प्रतिभा के प्रकाश से विश्व को आलोकित करने वाले इस महाकवि ने अपना उल्लेख करना आवश्यक नहीं समझा। अपने स्थान और समय की बात को लिखना वे अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं समझते थे। अतिरिक्त इससे दूसरी बात यह है कि उन्हें यह आशा न थी कि मेरी कृतियों को लेकर कभी इतिहास के भव्य भवन का निर्माण होगा। यही कारण है कि अन्य मनीषियों के समान कालिदास ने भी अपने निवास स्थान, समय तथा अपने आश्रयदाता के विवरण को नहीं प्रस्तुत किया।
कालिदास के समय के सम्बन्ध में प्रधानरूप से तीन मत उपस्थित होते हैं :— १—कालिदास षष्ठ शताब्दी के महाकवि हैं। २—कालिदास गुप्त नरेशों के स्वर्णयुग में हुए थे। ३—कालिदास की सत्ता ई० पू० प्रथम शताब्दी मानना आवश्यक है।
(१) प्रथम मत—इतिहास में विक्रम उपाधिधारी चार राजाओं का उल्लेख पाया जाता है जिनके समसामयिक होने के कारण कालिदास का समय विभिन्न शताब्दियों में मानना पड़ता है।
डॉ० हार्नली मानते हैं कि यशोधर्मन ने वलादित्य नरसिंह गुप्त की सहायता से कारूर के युद्ध में हूणवंश के प्रतापी राजा मिहिरकुल को हराकर विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त की और अपने इस बड़े विजय के उपलक्ष्य में विक्रम नाम का एक नया संवत् चलाया। इसे प्राचीन सिद्ध करने की इच्छा से उसने इसे ६०० छः सौ वर्ष पहले से ही प्रचारित किया। कालिदास इन्हीं के सभापण्डित थे। अतः कालिदास का समय छठी शताब्दी है। यह नई कल्पना डॉ० फर्गुसन साहब के मस्तिष्क की उपज है। कालिदास के समय निरूपण के लिए डॉ० हार्नली ने भी इसका उपयोग करते हुए यह दिखलाया है कि यशोधर्मन की राज्य सीमा रघु के दिग्विजय-प्रसंग में वर्णित राज्यसीमा से बिल्कुल मिलती-जुलती है। और एक आलोचक ने कुमारसम्भव की देवस्तुति के सांख्यसिद्धान्त को छठी शताब्दी में लिखी गई ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका के आधार पर अवलम्बित मानकर उसके आशय ग्रहण करनेवाले कालिदास का समय भी छठी शताब्दी माना है। म० म० हरिप्रसाद शास्त्री ने कौतुकपूर्ण अनेक युक्तियों से यह सिद्ध करने प्रयास किया है कि कालिदास भारवि के बाद छठी शताब्दी में हुए थे। मैक्समूलर का भी यही मत है कि कालिदास छठी शताब्दी में उत्पन्न हुए थे क्योंकि उसी समय भारतवर्ष में संस्कृत विद्या का पुनरुज्जीवन हुआ था। साहित्य, कला, विज्ञान आदि की दृष्टि से उत्तम युग था इसमें पुराणों का अन्तिम संस्करण और वैदिक धर्म का प्रचार हुआ था ऐसे समय पर इनका होना ज्यादा संभव है।
समीक्षा—हूणों को पराजित करनेवाले यशोधर्मन हूणारि कहे जा सकते हैं शकारि नहीं। छठी शताब्दी में शकों का कहीं नाम तक नहीं मिलता और न उनके शिलालेखों में
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कहीं विक्रम सम्वत् स्थापना की चर्चा है। ६ सौ वर्ष पहले से यशोधर्मन द्वारा विक्रम की स्थापना भी इतिहास प्रसिद्ध है कि मालव सम्वत् के नाम से यह सम्वत् चला आता था, विक्रमादित्य ने शकों की विजय के उपलक्ष्य में इसका नाम विक्रम सम्वत् रख दिया। दूसरी बात यह है कि मन्दसौर (मध्यभारत) के ई० ४७३ के शिलालेख में कुमारगुप्त की प्रशस्ति के लेखक वत्सभट्टि कवि ने कालिदास के मेघदूत और ऋतुसंहार के बहुत से पद्यों का अनुकरण किया है। इसलिए कालिदास को पञ्चम शताब्दी के बाद मानना अप्रमाणिक और इतिहास विरुद्ध है।
( २ ) दूसरा मत—बहुत से विद्वानों ने सर्वतः समृद्ध शान्तिमय गुप्त नरेशों के स्वर्णयुग में कालिदास की सत्ता मानी है। इनमें भी पूना के प्रोफेसर के० पी० पाठक का मत है कालिदास स्कन्दगुप्त के समकालीन थे। क्योंकि रघुवंश के चतुर्थ सर्ग में वर्णित महाराज रघु के दिग्विजय से स्कन्दगुप्त की विजय में अधिक समानता है। किन्तु डॉ० स्मिथ, कील, मैकडोनल डॉ० रामकृष्ण भण्डारकर, पं० रामावतार शर्मा और बहुसंख्यक पाश्चात्त्य विद्वान् मानते हैं कि कालिदास के आश्रयदाता गुप्तनरेशों में सबसे अधिक प्रभाव-शाली चन्द्रगुप्त द्वितीय थे। क्योंकि शकों को भारत से बाहर निकाल देने वाले विक्रमादित्य पदवीधारी चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज्यकाल में सब तरह से शान्ति थी और भारतीय कला कौशल की उन्नति परम सीमा तक पहुँच गई थी। कालिदास के ग्रन्थों के समान गम्भीर विचार के ग्रन्थ ऐसे ही शान्तिमय समय में स्थिर चित्त से लिखे जा सकते हैं एवं रघुवंश के छठे सर्ग में वर्णित शान्ति का समुचित समय चन्द्रगुप्त द्वितीय का ही समय था—
यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्थं पथे गतानाम्।
इसके अतिरिक्त इन्दुमती के स्वयम्बर में सम्मिलित मगधराज के लिए चन्द्रमा की जो उपमा दी गई उसमें चन्द्रगुप्त नाम का ही संकेत है।
कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम्। नक्षत्र-तारा-ग्रहसंकुलापि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः॥ ६।२३
समीक्षा—मेघदूत का भूगोल गुप्तकाल के भूगोल से समता रखता है। गुप्तकाल के स्वर्णयुग में कालिदास की सत्ता मानना भी ठीक नहीं क्योंकि केवल चन्द्रगुप्त द्वितीय ही विक्रमादित्य नहीं थे, किन्तु इनसे पूर्व मालवा में राज्य करने वाले विक्रमादित्य का पता इतिहास को मालूम है। दूसरी बात यह है कि यदि कालिदास गुप्तकाल में होते तो प्रयाग के स्कन्दगुप्त के स्तम्भ पर कालिदास की रचना न होकर साधारण पण्डित हरिसेन से क्यों लिखवाया जाता। इसलिए कालिदास को गुप्तकाल में मानना सर्वथा असंगत है।
( ३ ) तीसरा मत—उपर्युक्त कल्पनाओं से असन्तुष्ट होकर कुछ विद्वानों ने ६८ इसवी की गाथासप्तशती के पद्य में दानशील राजा विक्रमादित्य के स्पष्ट उल्लेख मिलने के आधार पर ईसा के पूर्व विक्रमादित्य की सत्ता प्रामाणिक रूप से स्थिर मानी है। इसके शकारि होने में भी किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है क्योंकि ईसा से १५० वर्ष पूर्व भारत में आने वाले शकों का पता इतिहास में मिलता है। अतः इन्हीं की सभा में कालिदास की सत्ता मानना युक्तियुक्त एवं प्रामाणिक प्रतीत होता है। रघुवंश के षष्ठ सर्ग के ५९ वें श्लोक—'अथोरगाख्यस्य पुरस्य नाथं' में पाण्ड्यनरेश का वर्णन करते हुए कालिदास ने उरगपुर की उनकी राजधानी बतलाया है। उरियापुर का ही संस्कृत रूप उरगपुर जान
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पड़ता है। इतिहास के अनुसार प्रथम शताब्दी में उरियापुर पाण्ड्य नरेशों की राजधानी थी। इसलिए कालिदास को प्रथम शताब्दी में मानना ठीक ही है।
दूसरी बात यह है कि अभिज्ञान शाकुन्तल के मङ्गलाचरण—'या सृष्टिः स्रष्टुराद्या' में सूचित धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं से भी मालूम पड़ता है कि कालिदास ऐसे समय में हुए थे कि जब लोग बौद्धधर्म के प्रभाव से हिन्दू देवी-देवताओं के विषय में श्रद्धा-विहीन होते जा रहे थे।
ऊर्ध्वाङ्कित पद्य में 'प्रत्यक्षाभिः' इस पद का प्रयोग करके कालिदास ने देवता विषयक अविश्वास को दूर करने का प्रयास किया है। जिस भूतभावन भगवान् शिव की जल, अग्नि, यजमान, सूर्य, चन्द्रमा, आकाश, पृथ्वी और वायु इन आठ मूर्तियों का हमें सर्वदा प्रत्यक्ष दर्शन होता है उसके विषय में अश्रद्धा कैसे हो सकती है। इसी प्रकार शकुन्तला के षष्ठ अङ्क में दुष्यन्त की अँगूठी को बेचने के समय राजपुरुषों द्वारा पकड़े जाने पर मछली मारना अपनी जाति का कर्तव्य बतलाता हुआ धीवर कहता है कि—भगवान् ने जिस जाति को जो भला-बुरा काम दे दिया है वह छोड़ा नहीं जा सकता। देखिए—पशुओं को मारना तो बुरा काम है, पर बड़े-बड़े दयावान् और वेद जानने वाले ब्राह्मण भी यज्ञ में पशुओं को मारते ही हैं। इस वर्णन से मालूम पड़ता है कि कालिदास ने बौद्धधर्म के प्राबल्य के कारण यज्ञों के विषय में होनेवाली हिंसीजन्य निन्दा और अश्रद्धा को दूर करने का प्रयास करते हुए आवश्यक कर्तव्य होने के कारण हिंसा होने पर भी ब्राह्मणों को यज्ञ करना जातीय धर्म बतलाया है। अतः कुलपरम्परा जाति धर्म का त्याग करना उचित नहीं, यज्ञों का अनुष्ठान करना ब्राह्मणों के लिए सर्वथा श्रेयस्कर है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि कालिदास उस समय में थे जब वर्ण व्यवस्था और यज्ञादि-खण्डन करने के कारण बौद्धधर्म के प्रति अश्रद्धा बढ़ती जा रही थी और ब्राह्मण धर्म का अभ्युदय हो रहा था। यह समय ई० पू० द्वितीय शताब्दी के बाद सुङ्गवंशीय नरेशों के बाद का है। इसलिये कालिदास का जन्म प्रथम शताब्दी में मानना न्यायसंगत है।
पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों को हटाकर वैदिक धर्म की स्थापना की थी। वैदिक संस्कृति की जो महिमा कालिदास की रचनाओं में दीखती है वह उस समय ही हो सकती थी। उस समय संस्कृत एवं काव्य का इतना प्रचार था कि अश्वघोष को भी संस्कृत में रचना करने के लिए विवश होना पड़ा। जब कि स्वयं बुद्ध ने पालि में उपदेश दिये और बौद्ध-ग्रन्थ पालि में ही लिपिबद्ध किये जाते थे।
प्रथम शताब्दी में वर्तमान कनिष्क की सभा के महापण्डित बौद्ध कवि अश्वघोष ने अपने बुद्धचरित में कालिदास के बहुत से पद्यों का अनुकरण किया है। दोनों के काव्यों में अत्यधिक साम्य है। कथानक की सृष्टि और विकास, वर्णन-शैली, अलंकारों का प्रयोग, छन्दों का चयन एवं शब्दों का विन्यास दोनों कलाकारों में से एक-दूसरे से प्रभावित हैं।
जैसे—रघुवंश में—अलं महीपाल तव श्रमेण।
बुद्धचरित में—मोघं श्रम नार्हसि मार कर्तुम्।
इसी प्रकार कालिदास ने रघुवंश के सप्तम सर्ग में इन्दुमती के स्वयम्बर से लौटते हुए अज को देखने के लिए उत्सुक स्त्रियों का जैसा सुन्दर वर्णन किया है। ठीक वैसा ही वर्णन अश्वघोष ने अपने बुद्धचरित के तृतीय सर्ग में शुद्धोदन की समृद्ध नगरी में प्रथम बार
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प्रवेश करते हुए राजकुमार सिद्धार्थ को देखने के लिए अत्युत्कण्ठा पूर्वक दौड़ती हुई नारियों का किया है ।
इन दोनों महाकवियों के वर्णन में बहुत बड़ी समानता है । अश्वघोष द्वारा कालिदास का अनुकरण करने के बल पर यह सिद्ध किया जाता है कि कालिदास अश्वघोष के पहले ई० पूर्व प्रथम शताब्दी ये उत्पन्न महाकवि हैं ।
कालिदास की कविताकला
कविकुलकलाधर कविवर कालिदास की कोमल कमनीय कलेवर कविता विश्व के किस सहृदय के हृदय को आनन्द मग्न नहीं कर देती है ।
इनकी कविता में प्रसाद गुण की, अगाधता, माधुर्य का मधुर सन्निवेश, कोमलकान्त पदावली, उपमा की अपूर्वता, अलंकारों की रमणीयता, छन्दों की छटा और भावसौष्ठव आदि पर्याप्त मात्रा में रहने के कारण उनकी कविता विश्वविख्यात बन गई है । इनके काव्यों को जिस दृष्टि से देखा जाय उसी से काव्य कला की कमनीयता प्रकट होती है । इनकी कविता में सरस, सरल सुबोध तथा सुन्दर-सुन्दर शब्दों एवं भावों का साम्राज्य मन को मुग्ध कर देता है ।
वास्तव में कालिदास की कविता में सहृदयों की तो बात ही क्या है, साधारण व्यक्ति को भी जैसा प्रसाद गुण का रसास्वाद शब्द और अर्थ की निर्दोषता, गुण और अलंकारों का चमत्कार मिलता है । वैसा दूसरे किसी कवि में नहीं मिलता है। व्यङ्ग्यार्थ प्रतिपादन की विलक्षण शैली, रसप्रकर्ष का प्रकाशन, विस्तृत विषय का थोड़े में वर्णन, वर्ण्य विषय को सुन्दर क्रम से रखकर रोचक बनाना, स्वाभाविक भाव के द्वारा लोकोत्तर प्रदान का ढंग आदि कालिदास की कविता का स्वाभाविक गुण है । ध्वनिकाव्य का उत्तम गुण व्यञ्जना-व्यापार कालिदास के सभी ग्रन्थों में अनुस्यूत है ।
कालिदास संस्कृत साहित्य के अद्वितीय महाकवि माने जाते हैं । इनकी कविता की मधुरिमा के सामने अन्य कवियों की कविता फीकी पड़ जाती है । मानव हृदय के सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों का आपने जैसा निरीक्षण किया है वैसा अन्य कवियों ने नहीं ? कालिदास अन्तर्जगत् तथा बाह्यजगत् दोनों के सूक्ष्म निरीक्षक एवं पारखी कवि हैं। समष्टि दृष्टि से इनकी कविता में प्रसाद गुण तो सर्वत्र प्राप्त ही है पर अन्य कवियों की अपेक्षा इनका उपमा अलंकार स्वभाव सुन्दर होता है और वे उपमा के तो बेजोड़ कवि माने जाते हैं ।
वाल्मीकि और व्यास के बाद विद्वत्समाज में सर्वप्रथम महाकवि के नाम से कालिदास ही प्रसिद्ध हैं । कवि में जितने गुण होने चाहिए वे सभी कालिदास में पूर्ण रूप से विद्यमान हैं । इनकी नैसर्गिक रचना में भाषानुकूल भाव रखने की अद्भुत कला है । प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण और मानव हृदय के अन्तर्निहित भावों को व्यक्त करने में कालिदास को स्वतः सिद्धि प्राप्त है, इसीलिए विदेश के समीक्षक विद्वान् भी मुक्त कण्ठ से कालिदास की कविता कला की प्रशंसा करते हुए इनके काव्यों का आदर करते हैं । मल्लिनाथ ने तो स्पष्ट कहा है कि कालिदास की वाणी का वास्तविक रहस्य हमारे जैसे लोग तो नहीं समझ पाते केवल तीन व्यक्ति ही समझते हैं, एक तो विधाता=ब्रह्मा, दूसरी वाग्देवी सरस्वती तथा तीसरे स्वयं कालिदास ।
कालिदासगिरां सारं कालिदासस्सरस्वती ।
चतुर्मुखोऽथवा ब्रह्मा विदुर्नान्ये तु मादृशाः ॥
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कवि ने शकुन्तला के चतुर्थ अंक में निसर्गसुन्दरी शकुन्तला की विदाई के समय केवल आश्रमवासी मनुष्यों को ही नहीं, किन्तु मृग, मयूर, चक्रवाक और निर्जीव वृक्ष लताओं को भी रुला दिया है। यह अद्भुत कला कवि की अपनी विशिष्टता है। शकुन्तला के प्रति महर्षि कण्व का उपदेश और दुष्यन्त के प्रति सन्देश तो प्रत्येक गृहस्थ के लिए आदरणीय, अनुकरणीय और आचरणीय हैं। तपोवन के पावन वातावरण में पली हुई शकुन्तला मानो साक्षात् प्रकृति की कन्या है। यहाँ के निवासी सजीवों एवं निर्जीवों के प्रति उसका हृदय बान्धव स्नेह से आप्लुत है।
रसपरिपाक
यों तो कालिदास ने अपनी रचना में स्थान-स्थानपर सभी रसों का सन्निवेश किया है, पर ये प्रधान रूप से शृङ्गार-रस के रसिक कवि हैं। इनकी रचनाओं में शृङ्गार रस ओत-प्रोत है। इनके काव्यों में सम्भोग शृंगार का प्रकाशमान रूप तथा विप्रलम्भ शृङ्गार का करुणामय रूप पाठक एवं श्रोताओं के हृदय को चमत्कृत कर देते हैं। मेघदूत में विप्रलम्भ और कुमारसम्भव में सम्भोग शृङ्गार का प्राचुर्य है। सम्भोग शृंगार की अपेक्षा इनका विप्रलम्भ शृंगार उच्चकोटि का होता है। उत्तर मेघदूत का उदाहरण देखिए—
त्वामालिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलाया-
मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम्।
अस्रैस्तावन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरलुप्यते मे
क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते संगमं नौ कृतान्तः॥ ४७ ॥
पर्वत के चट्टानों पर गैरिकादि धातुओं से प्रणयकुपिता अपनी प्रियतमा की मूर्ति बनाकर क्षमा के लिए उसके चरणों पर गिरने का प्रयत्न करते समय अश्रुप्रवाह के उमड़ आने से कल्पित सम्भोग में भी बाधा पड़ने के कारण क्षुब्धहृदय यक्ष का क्रूर कृतान्त-विषयक उपालम्भ पढ़कर किस सहृदय का हृदय व्यथित नहीं हो उठता है? निर्जीव मेघ को दूत बनाकर अपनी प्रियतमा के पास प्रेममय सन्देश भेजनेवाले यक्ष के प्रेमोन्माद को पढ़कर कालिदास की काव्यकला की प्रशंसा किये बिना कौन रह सकता है?
कालिदास के करुण रस का वर्णन भी स्वाभाविक होता है। कुमारसम्भव के चतुर्थ सर्ग में शङ्कर की क्रोधाग्नि से कामदेव के भस्मसात् हो जाने पर रति का विलाप तथा रघुवंश के अष्टम सर्ग में आकाश से गिरी हुई पुष्पमाला के आघात से इन्दुमती के मर जाने पर अज का विलाप करुण रस के मर्मस्पर्शी उदाहरण हैं। इन्दुमती के मर जाने पर अज विलाप करते हुए कहते हैं—
स्रगियं यदि जीवितापहा हृदये किं निहिता न हन्ति माम्।
विषमप्यमृतं क्वचिद्भवेदमृतं वा विषमीश्वरेच्छया॥ ८।४६
कुमारसम्भव में भगवान् शङ्कर के ललाटस्थ तृतीय नेत्र से निर्गत अग्नि से भस्मसात् हुए अपने पति के शरीर को देखकर रति विलाप करती हुई कहती है—
शशिना सह याति कौमुदी सह मेघेन तडित् प्रलीयते।
प्रमदाः पतिवर्त्मगा इति प्रतिपन्नं हि विचेतनैरपि॥ ४।३३
अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के चतुर्थ अङ्क में शकुन्तला को अपने पति के घर जाते समय का कवि ने ऐसा मर्मस्पर्शी करुण रस का चित्रण अङ्कित किया है कि विषयसुख से
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२ शा० भू०
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विमुख कण्व जैसे धीर महर्षि भी रोये बिना नहीं रहे। कण्व मुनि कहते हैं—आज शकुन्तला अपने पति के घर जायेगी। इस विचार में मेरा हृदय दुःख से भर गया है, कण्ठ गद्गद हो रहा है। चिन्ता से दृष्टि जड़ हो रही है। मैं अरण्यवासी होकर भी कन्या के प्रेम से इतना व्याकुल हो रहा हूँ, तो गृहस्थ लोगों की कन्या के विरह में क्या दशा होती होगी ?
यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया कण्ठः स्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्। वैक्लव्यं मम तावदीदृशमहो स्नेहादरण्यौकसः पीड्यन्ते गृहिणः कथं न तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः ॥ ४।५
कालिदास की कविता में हास्य रस भी ऊँचे दर्जे का है। इनकी कविता पढ़कर पाठक मुस्करा देता है, ठहाके की हँसी नहीं हँसता। कुमारसम्भव महाकाव्य के पञ्चमसर्ग में पार्वती के आश्रम पर आकर भगवान् शङ्कर की निन्दा करता हुआ कपटवटु पार्वती का उपहास करता हुआ कहता है—
द्वयं च तेऽन्य पुरतो विडम्बना यदूढया वारणराजहार्यया। विलोक्य वृद्धोक्षमधिष्ठितं त्वया महाजनः स्मेरमुखो भविष्यति ॥ ५।७
साहित्य जगत् के समालोचक शेक्सपियर को अन्तर्जगत् का तथा कालिदास को बाह्य-जगत् का कलाकार कवि कहते हैं। प्रकृति के मनोरम चित्रण में कालिदास अद्वितीय हैं। इनके प्रकृति-चित्रण में रमणीयता, भव्यता, सजीवता तथा स्वाभाविकता ओत-प्रोत है।
प्रकृति के साथ कालिदास की अपूर्व सहानुभूति है। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों का उद्घा-टन जैसा इन्होंने किया है वैसा संस्कृत-जगत् का कोई अन्य कवि नहीं कर पाया है। इन्होंने प्रकृति के अनुपम दृश्यों का सच्चा चित्र खींचा है। ये कोमल रूप के उपासक हैं, भवभूति के समान उग्र रूप से इनका प्रेम नहीं है। ये प्रायः शान्त तपोवन, नदी-तट, उपवन, प्रासाद, भ्रमर, मृग तथा कोकिल आदि का वर्णन करने में अपना सौभाग्य समझते हैं। इन्हें विन्ध्याचल पर्वत की अपेक्षा हिमालय से अधिक प्रेम है। इन्होंने अपने कुमार-सम्भव में हिमालय का सजीव वर्णन किया है। इन्हें ६ ऋतुओं में ग्रीष्म और वसन्त ऋतु बहुत ही प्रिय हैं।
जहाँ पाश्चात्य कवियों के प्रकृतिवर्णन नग्न होते हैं, वहाँ भारतीय कवियों का प्रकृति-वर्णन अलंकृत होता है। पाश्चात्य कवि बिना किसी आवरण के प्रकृति को उसके असली रूप में उपस्थित कर देते हैं, परन्तु भारतीय कवि प्रकृति को मनोरम मुग्धकारी विविध आभूषणों से सुसज्जित कर पाठकों के समक्ष उपस्थित करते हैं। महाकवि कालिदास में इस अलंकृत वर्णनशैली की ही निपुणता है। इतना ही नहीं, इनके प्रकृति-वर्णन में वैज्ञानिक ज्ञान का पर्याप्त परिचय मिलता है।
रघुवंश के नवम सर्ग में वायु से हिलाई गई लता को लक्ष्य कर वसन्त ऋतु का कैसा मनोरंजक वर्णन है—
श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतयः कुसुमकोमलदन्तरुचो बभुः। उपवनान्तलताः पवनाहृतैः किसलयैः सलयैरिव पाणिभिः ॥ ६।३५
स्त्री और पुरुषों के विविध मनोभावों का इन्हें पूर्ण ज्ञान है, उसे व्यक्त करने के लिए
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इन्होंने अभिधा शक्ति का प्रयोग न कर व्यंजना शक्ति से ही काम लिया है। इससे इनकी कविता में और भी चमत्कार आ जाता है।
जब अङ्गिरा ऋषि हिमालय के पास आकर कहने लगे कि अपनी पुत्री पार्वती का विवाह भगवान् सदाशिव के साथ कर दीजिए। उस समय पार्वती का वर्णन करते हुए अन्तर्जगत् के पारखी कालिदास कहते हैं कि—अङ्गिरा ऋषिके इस प्रकार कहने समय अपने पिता हिमालय के पास खड़ी हुई पार्वती लज्जावश मुँह नीचे करके हाथ में लिए लीलाकमल के पत्तों को गिनने लगी—
एवं वादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी।
लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती॥ ६।८४
इस श्लोक में कवि ने लज्जा शब्द का प्रयोग नहीं किया है; किन्तु लज्जा के उदय होने पर पार्वती ने जो कार्य किया है, उसी का वर्णन किया है, वही कार्य हृदयगत लज्जाभाव को व्यक्त कर देता है।
कालिदास की प्रियवस्तुयें
पर्वतों में हिमालय, नगरियों में उज्जयिनी, देवताओं में शिव, छन्दों में मन्दक्रान्ता, अलङ्कारों में उपमा, रसों में शृङ्गार और ऋतुओं में वसन्त कालिदास को परम प्रिय थे।
संस्कृत साहित्य के लक्षणकार आचार्यों ने गौडी पाञ्चाली, वैदर्भी और लाटी नाम की चार रीतियाँ तथा माधुर्य, ओज और प्रसाद ये ३ गुण माने हैं गौडी रीति में बड़े-बड़े समास तथा पाञ्चाली में छोटे-छोटे समास होते हैं। वैदर्भी रीति में समास प्रायः नहीं के बराबर होते हैं। गौडी में ओज गुण, पाञ्चाली में माधुर्य गुण और वैदर्भी में प्रसाद गुण की प्रधानता होती है।
कालिदास की कविता में वैदर्भी रीति और प्रसाद गुण ओत-प्रोत है। प्रसाद गुण का प्राधान्य होने के कारण कालिदास की कविता शीघ्र ही समझ में आ जाती है।
कालिदास का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। इनकी भाषा व्याकरण से परिष्कृत सरल, सरस एवं सुबोध होती है। ये—‘च, तु, हि, वै, किल, खलु’ आदि का प्रयोग केवल पाद की पूर्ति के लिए नहीं करते हैं; किन्तु उनका जहाँ प्रयोग करते हैं वहाँ वे सार्थक होते हैं। इनके शब्द नपे-तुले होते हैं, और इनके वाक्यों में क्रियापद प्रायः स्पष्ट होते हैं। ये किसी बात को घुमा-फिरा कर कहने की अपेक्षा सीधे कह देना अधिक पसन्द करते हैं। थोड़े शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने की प्रवृत्ति इनमें विशेषरूप से दीख पड़ती है।
जैसे भिन्न-भिन्न वर्णों के उच्चारण के लिए भिन्न-भिन्न कण्ठ-ताल्वादि के आघातों के भेद हैं और भिन्न-भिन्न वर्ण, भिन्न-भिन्न रस, भाव एवं अलङ्कारों के व्यञ्जक हैं वैसे ही विभिन्न रसों को व्यक्त करने के लिए विभिन्न छन्द भी हैं। शृङ्गार रस के व्यञ्जक वर्णों के द्वारा ही शृङ्गार रस की पुष्टि तथा वीर रस के व्यञ्जक वर्णों से वीर रस की पुष्टि हो सकती है, अन्य वर्णों से नहीं। तथापि केवल शब्द योजना ही काव्य में रस सिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है उसके लिये छन्द की योजना भी अपेक्षित है। क्षेमेन्द्र ने अपने सुवृत्ततिलक में कहा है कि काव्य में रस तथा वर्णनीय वस्तु के अनुसार छन्दों का विनियोग करना चाहिये—
काव्ये रसानुसारेण वर्णनानुगुणेन च।
कुर्वीत सर्ववृत्तानां विनियोगं विभाववित्॥
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कालिदास का छन्द-विषयक ज्ञान भी गम्भीर और पूर्ण है। इन्होंने अपने काव्यों में प्रायः सभी प्रमुख छन्दों का प्रयोग किया है। ये छन्दों का चुनाव रस और वर्ण्य वस्तु के अनुकूल ही करते हैं। कालिदास मन्दाक्रान्ता छन्द के सिद्धहस्त कवि माने जाते हैं।
इन्होंने अपने खण्ड काव्य मेघदूत को केवल मन्दाक्रान्ता छन्द में ही लिखा है—
सुवशा कालिदासस्य मन्दाक्रान्ता प्रवल्गति ।
सदश्वस्य दमस्येव कम्बोजतुरगाङ्गना ॥
कालिदास की विशेषता
प्रत्येक कवि में किसी न किसी विषय की खास एक विशेषता रहती है। कविवर कालिदास उपमा अलंकार के आचार्य माने जाते हैं। तत्तत् कवियों की विशेषता व्यक्त करते हुए एक आलोचक ने बहुत ठीक कहा है—
उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम् ।
दण्डिनः पदलालित्यं त्रयोऽप्येकैकतोऽधिकाः ॥
उपमा की छटा
कालिदास की उपमायें एक से एक बढ़कर हैं। इन्होंने नई-नई उपमाओं की उद्भावना की है। इनकी उपमाओं के विशेष चमत्कार का कारण यह है कि प्रायः इनकी उपमायें अन्तर्जगत् और बाह्य जगत् दोनों से ली गई हैं। इन्होंने उपमाओं में उपमान तथा उपमेय के वचन और लिंग तक का भी विचार किया है। रघुवंश के षष्ठ सर्ग में इन्दुमती के स्वयंवर में उपस्थित राजाओं की दशा का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—स्वयम्बर में उपस्थित जिन-जिन राजाओं को छोड़कर जब इन्दुमती आगे बढ़ जाती थी तब वे राजे दीपशिखा के द्वारा छोड़े गये महलों के समान प्रतीत होते थे। यहाँ निराश राजाओं की विषण्णता तथा खिन्नता की अभिव्यक्ति इस उपमा के द्वारा बड़ी सुन्दरता से दी गई है।
सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रियं यं व्यतीयाय पतिम्बरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥ ६।६७
इस श्लोकमें इन्दुमती की उपमा स्त्रीवाची दीपशिखा शब्द से दी गई है और राजा की उपमा पुंलिङ्ग अट्ट शब्द से दी गई है। लिंग की समता के साथ-साथ वचन की समता भी दर्शनीय है। इसी उपमासौष्ठव पर मुग्ध होकर साहित्यिक विद्वत्समुदाय ने इस महाकवि को दीपशिखा कालिदास कहना आरम्भ कर दिया।
रघुवंश के द्वितीय सर्ग में सायंकाल के समय जब दिलीपं वसिष्ठजी की गाय नन्दिनीको चराकर आश्रम की ओर लौटते हैं और लाल रंग की गाय आगे आगे है, शुभ्रवस्त्रधारी दिलीप पीछे पीछे हैं हरितवस्त्र धारिणी सुदक्षिणा उनकी प्रतीक्षां करती हुई स्वागत करने के लिए खड़ी है, दोनों के बीच में स्थित नन्दिनी की शोभा जैसी प्रतीत हो रही है जैसे दिन और रात के मध्य रक्तवर्णा सन्ध्या।
पुरस्कृत्य वर्त्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या ।
तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्य ॥ २।२०
यहाँ राजा की उपमा दिनसे, सुदक्षिणा की उपमा रात्रि से और गाय नन्दिनी की उपमा लाल सन्ध्या से दी गई है। और भी देखिए—
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शरीरसादादसमग्रभूषणा मुखेन सालक्ष्यत लोध्रपाण्डुना ।
तनुप्रकाशेन विचेयतारका प्रभातकल्पा शशिनेव शर्वरी ॥ ३।२
शरीर की दुर्बलता के कारण कुछ ही आभूषण पहनी हुई उस सुदक्षिणा की लोध्रपुष्प सदृश पीले मुख से ऐसी शोभा हुई जैसे प्रातःकाल टिमटिमाते हुए ताराओं से युक्त रात की शोभा पीले वर्ण के चन्द्रमा से होती है। यह भाव व्यक्त करने के लिए कवि ने लोध्रपाण्डु मुख से चन्द्रमा की एवं एकाध तारायुक्त प्रभातकल्पशर्वरी से सुदक्षिणा की उपमा देते हुए कितने सुन्दर ढङ्ग से पूर्णोपमा व्यक्त की है। इस प्रकार कालिदास की कविता में स्थल-स्थल पर अनूठी उपमा का चमत्कार मिलता है। इनकी उपमाओं में स्वाभाविकता का उत्कर्ष है जिससे पाठक का हृदय सहसा चमत्कृत हो उठता है।
कुमारसंभव में तपस्या के लिए आभूषणों का परित्याग कर केवल वल्कल वस्त्र धारण करने वाली पार्वती चन्द्रमा तथा ताराओं में मण्डित अरुणोदय युक्त रजनी के समान बतलाई गई है। स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई आतप सदृश लालवस्त्र धारण की हुई पार्वती फूलों के गुच्छों से झुकी हुई नवीन लाल पल्लवों से सुशोभित संचारिणी लता के समान प्रतीत होती थी—
पर्याप्तपुष्पस्तनभारनम्रा सञ्चारिणी पल्लविनी लतेव ।
रघुवंश के प्रथम सर्ग में कवि की उपमा देखने योग्य है। वशिष्ठ की नन्दिनी गौ का शरीर नये पत्तों के समान कोमल एवं लाल है, उसके मस्तक पर भूरे बालों की वक्र रेखा बनी हुई है जिससे वह ऐसी शोभा पा रही है जैसे लाल सन्ध्या के भाल पर द्वितीया का चन्द्रमा चढ़ आया हो—
ललाटोदयमाभुग्नं पल्लवस्निग्धपाटला ।
बिभ्रती श्वेतरोमाङ्कं सन्ध्येव शशिनं नवम् ॥ १।८३
श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत् २।२, जुगोप गोरूपधरामिवोर्वीम् । २।३
नादसौन्दर्य की प्रसूतिके लिए अनुप्रास अलङ्कार की योजना उनकी रचनाओं में नितान्त मनोरम बन गई है। जैसे रघुवंश में—
जीवन् पुनः शश्वदुपप्लवेभ्यः प्रजाः प्रजानाथ ! पितेव पासि ॥ २।४८
अर्थान्तरन्यास का उदाहरण शकुन्तला में देखिए—
इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी ।
किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ॥ १।१६
रघुवंश में इन्दुमती स्वयंम्बर में—
नासौ न काम्यो न च वेद सम्यग्द्रष्टुं न सा भिन्नरुचिहि लोकः । ६।३०
पूर्वमेघ में—
इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे ।
कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु ॥ ५ ॥
उत्तरमेघ में—
कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा ।
नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥ ५२ ॥
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शकुन्तला के प्रथम अंक में हरिण भाग रहा है। राजा दुष्यन्त उसका पीछा कर रहा है। उसके धनुष पर बाण चढ़ा हुआ है। तपस्वी राजा को रोकते हुए कहता है—राजन् ! पुष्पराशि की तरह सुकोमल शरीर वाला यह हरिण आपके अग्नितुल्य बाणों को क्या बर्दाश्त कर सकेगा। अहह, कहाँ बेचारों हरिणों का अति चंचल प्राण और कहाँ तीक्ष्ण प्रहार करने वाले वज्र के समान कठोर आपके बाण। अतः आप इस पर बाण प्रहार न करें—
न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन् मृदुनि मृगशरीरे पुष्पराशाविवाग्निः। क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं क्व च निशितनिपाता वज्रसाराः शरास्ते ॥ १०
इसी प्रकार शकुन्तला को पुष्पित लता के समान बतलाकर कालिदास ने उसके सौन्दर्य में कितनी मादकता भर दी है। राजा दुष्यन्त की दृष्टि में शकुन्तला लता से जरा भी कम नहीं है। उसके अनुपम सौन्दर्य की छटा अत्यन्त लोभनीय है। शकुन्तला का अधरोष्ठ नव पल्लव के समान लाल है, दोनों भुजायें कोमल शाखाओं के सदृश हैं। इसके अङ्गों में फूल की तरह लुभावना यौवन व्याप्त है।
अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू। कुसुममिव लोभनीयं यौवनमङ्गेषु सन्नद्धम् ॥ १२१
इस प्रकार प्रायः कालिदास सभी प्रचलित अलङ्कारों के प्रयोग में दक्ष हैं किन्तु उपमा अलंकार पर इनका चमत्कारिक अधिकार है। केवल संस्कृत के ही नहीं, अपितु विश्व का भी कोई ऐसा कवि नहीं है। जो इनकी उपमा कला की समता कर सके। इनकी रचनाओं में उपमा की प्रचुरता के साथ ही उसका सौष्ठव भी देखते ही बनता है। इनकी उपमाओं की रसपेशलता अत्यन्त हृदयावर्जक है। सन्दर्भ को सुन्दर बनाने की कला में वे पारङ्गत हैं।
कालिदास के अध्ययन-स्थल की कल्पना
प्राचीन काल में विविध विद्याओं के गम्भीर अध्ययन के लिए भारत में अनेक विद्या-पीठ थे पंजाब में तक्षशिला, मगध में नालन्दा, सौराष्ट्र में वलभी और मालवा में उज्जैन। इनके अतिरिक्त जगह-जगह विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा स्थापित अनेक गुरुकुल थे, जिनमें वेद, वेदाङ्ग, व्याकरण, ज्योतिष, धर्मशास्त्र दर्शन आदि का अध्ययन ही नहीं होता था बल्कि सुधामधुर काव्यों के निर्माण के लिए भी प्रोत्साहन मिलता था। कालिदास के ग्रन्थों के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि उनकी शिक्षा भी ऐसे ही किसी गुरुकुल में हुई होगी। क्योंकि वे आश्रमों का वर्णन साङ्गोपाङ्ग करते हैं। कालिदास ने एक स्थल पर कहा है कि ऐसे गुरुकुलों में चौदह विद्याओं का अभ्यास कराया जाता है। याज्ञवल्क्यस्मृति में चार वेद, शिक्षा, व्याकरण आदि छः अङ्ग, पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र ये मिलकर धर्म के मूलभूत चौदह विद्याएँ हैं—
पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥
कालिदास के विचार
कालिदास को वैदिक धर्म पर पूर्ण विश्वास है और ये वर्णाश्रम व्यवस्था को पूर्णरूप
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से मानते हैं। इन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर अपार श्रद्धा है। ये सभी को त्याग और तपस्या की शिक्षा देते हैं। इनको नगर निवास की अपेक्षा तपोवन का जीवन बहुत अच्छा लगता है।
ये आशुतोष भगवान् सदाशिव के परम उपासक महाकवि हैं। इन्होंने अपने तीनों नाटकों में भगवान् शङ्कर का ही स्मरण किया है और रघुवंश के मङ्गलाचरण में शिव पार्वती की वन्दना की है इनके सभी ग्रन्थों में शिव की महिमा विशेष रूप से वर्णित पाई जाती है। इनके नाटकों के भरतवाक्य से मालूम होता है कि ये भगवान् सदाशिव से विश्व कल्याण की कामना रखते थे। ये व्यक्ति की अपेक्षा समाज को अधिक महत्त्व देते हैं और सभी को लोककल्याणार्थ कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ये आशावादी कवि हैं, निराशावादी नहीं। ये सत्कार्यों के सम्पादन द्वारा परलोक मार्ग को सुगम बनाना मानव जीवन का वास्तविक सदुपयोग और अन्तिम लक्ष्य समझते हैं। अभिज्ञानशाकुन्तल के भरत वाक्य में भगवान् सदाशिव से पुनर्जन्म को दूर करने के लिए प्रार्थना करते हुए कहते हैं—
“ममापि च क्षपयतु नीललोहितः पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः।”
कवि ने कुमारसंभव के द्वितीय सर्ग में देवताओं की प्रार्थना का उत्तर देते समय स्वयं ब्रह्मा जी से कहवाया है मुझे और विष्णु को भी शिवजी के प्रभाव का ज्ञान नहीं होता—
स हि देवः परं ज्योतिस्तमः पारे व्यवस्थितम्। परिच्छिन्नप्रभावर्द्धि न मया न च विष्णुना ॥ २।१५
अतः कालिदास के शिवोपासक होने में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है।
कालिदास भारतीय संस्कृति के सच्चे उपासक महाकवि थे। इसका आभास उनके काव्यों में स्थान-स्थान पर मिलता है। जैसे रघुवंश महाकाव्य में कालिदास ने रघुवंशी राजाओं को निमित्त बनाकर उदारचरित पुरुषों का स्वभाव पाठकों के समक्ष रखा है और उनकी योग्यता का वर्णन करने के बहाने कितने ही प्रकार के रमणीय उपदेश प्राणिमात्र के लिए दिये हैं। चक्रवर्ती राजा दिलीप द्वारा २१ दिन महर्षि वशिष्ठ की नन्दिनी गौ की सेवा कराकर वरदान के रूप में पुत्रप्राप्तिरूप मनोरथ सिद्धि एवं इन्द्र द्वारा दिलीप के आश्वमेधिक अश्वहरण के बाद गोमूत्र को नेत्र में लगाते ही रघुको दिव्य दृष्टि प्राप्त करना आदि से गो-सेवा का अलौकिक फल दिखाकर संसार को गो-सेवा से अपने-अपने मनोरथ को पूर्ण करने का निर्देश किया है, और गो-सेवा की अपूर्व महिमा बतलाई है। इसी प्रकार महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्स को अपार धनराशि देकर अज को पुत्र रूप में प्राप्त करना ब्राह्मणभक्ति एवं दानशक्ति का अनुपम उदाहरण है। श्रीराम के चरित्र के समान भारतीय संस्कृति के आदर्श का दिग्दर्शन तो कहीं अन्यत्र उपलब्ध ही नहीं हो सकता है। महाराजा रघु द्वारा कौत्सको सत्कार तथा अपार धनराशि देकर भारतीयों का अनुपम आदर्श अतिथि-सत्कार और विद्या-दान के प्रति अटल श्रद्धा व्यक्त की है। कुमारसम्भव में दिव्य नायक का दिव्य चरित्र वर्णित है, किन्तु लौकिक काम और शृङ्गार रस की सूक्ष्म भावनाओं का वर्णन करने के लिए उन्होंने खण्डकाव्य मेघदूत लिखा है।
अपने अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में तो इन्होंने आदर्श राजा दुष्यन्त तथा आदर्श नारी शकुन्तला का मार्मिक चित्र खींचकर यह दिखा दिया है कि भारतीय नारी किसी कारण-वश पति द्वारा अपमानित होने पर भी उसका अपमान नहीं करती अपितु संयमद्वारा पुनः
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उसे अनुकूल कर लेती है। शकुन्तला में कुलपति कण्व के उपदेश-सन्देश में लोक कल्याण की कामना का भाव तो सार्वभौम ही है।
यद्दुष्करं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुस्तरम् ।
तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमः ॥
कुमारसम्भव में तीव्र तपस्या के द्वारा पार्वती के शिव विषयक मनोरथ की सफलता का वर्णन करते हुए कविवर कालिदास ने तपस्या में अपना अटल विश्वास व्यक्त किया है। इनका मत है कि जो वस्तु किसी प्रकार से भी प्राप्त नहीं हो सकती, वह तपस्या द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है।
उग्र तपस्या द्वारा प्राप्त शक्ति से उद्दण्ड होकर संसार को दुःख देनेवाले वज्रनाभ के पुत्र दुर्दान्त तारकासुर को मारने के लिए देवताओं का प्रयास विश्व-कल्याण की भावना की ओर संकेत करता है।
कालिदास के ग्रन्थों का अनुशीलन करने से प्रतीत होता है कि उन्होंने धर्म, दर्शन, पुराण, ज्योतिष समाजशास्त्र, राजनीति, शिक्षा आदि विविध शास्त्रों का गम्भीर मनन किया था जिसके प्रभाव से पाठक चमत्कृत हो उठता है। अन्त में यही कहना पड़ता है कि लोकोत्तर महापुरुषों के हृदय को कौन जान सकता है—
लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति ।
शकुन्तलानाटक में रसविमर्श
रसव्यञ्जना की दृष्टि से अभिज्ञानशाकुन्तल का महत्त्व सर्वोपरि है। शकुन्तला में संभोग तथा विप्रलम्भ दोनों तरह का शृङ्गार है। दोनों शृंगारों की ऐसी ललित एवं हृदय-स्पर्शी मन्दाकिनी इसमें प्रवाहित हुई है कि सहृदय भावुक उसमें अवगाहन करते नहीं अघाता। फिर भी संभोग शृङ्गार अङ्गी और विप्रलम्भ शृंगार, वीर, अद्भुत, करुण, हास्य, भयानक, रौद्र, वत्सल और शान्तरस अङ्ग हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें विप्रलम्भ शृंगार अधिक व्याप्त होने के कारण उसे ही अङ्गी रस मानना चाहिए। पर यह मत ठीक नहीं है, क्योंकि संस्कृत के नाटक दुःखान्त नहीं होते, वे सुखान्त ही होते हैं।
तृतीय और सप्तम अङ्क में सम्भोग शृंगार है। शृङ्गार-रस के नाटक विप्रलम्भपूर्वक अवश्य होते हैं क्योंकि विप्रलम्भ के बाद आने वाला सम्भोग अधिक आनन्ददायक होता है। नाटक की समाप्ति पर जिस रस का मन पर प्रभाव हो उसे ही प्रधान रस मानना सम्प्रदाय सिद्ध है। अन्तिम सप्तम अङ्क में होने वाले नायक-नायिका के स्थायी मिलन के सुख का प्रभाव प्रेक्षकों के मन पर अधिक काल तक स्थायी रहता है। अतः अभिज्ञानशाकुन्तल को सम्भोग शृङ्गार-रस प्रधान ही मानना तर्कसंगत और न्यायोचित प्रतीत होता है। पहले के तीन अङ्कों में शृंगार का साम्राज्य है फिर भी प्रसङ्ग से अनेक रसों का उसमें मिश्रण है। जैसे—
प्रथम अङ्क के आरम्भ में दुष्यन्त के सामने अपनी जान बचाने के निमित्त भगाते हुए मृग के तथा अन्त में सैनिक गज द्वारा किये गये उपद्रव में भयानक रस, द्वितीय अङ्क में विदूषक के विनोदी भाषण एवं अङ्गभङ्ग में हास्य रस, पुनः तृतीय अङ्क के अन्त में राक्षसों के विघ्नवर्णन में भयानक रस का शृंगार में मिश्रण हुआ है। चतुर्थ अङ्क में आकाशवाणी तथा वनदेवता द्वारा दिये गये वस्त्र और आभूषणों के वर्णन में अद्भुतरस की छटा है।
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किन्तु उस अंक का प्रधान रस करुण ही है। पाचवें अंक में दुष्यन्त तथा शकुन्तला के वाक्कलह के मनोरम प्रसंग के साथ-साथ राजा के निराकरण से सन्तप्त शकुन्तला के भाषण में रौद्र रस, आगे उसके असहाय स्थिति में करुण तथा अन्त में अप्सरातीर्थ के पास उसके अदृश्य हो जाने से अद्भुतरस है। छठे अंक में करुण तथा विप्रलम्भ शृंगार का परिपोष उत्तम हुआ है। राजा के करुण शृंगार को विदूषक के हास्य रस में जोड़ दिया गया है। अन्त के सप्तम अङ्क में सर्वदमन एवं राजा दुष्यन्त की भेंट के प्रसंग में अद्भुत और वत्सल तथा अन्त में कश्यप ऋषि के सान्निध्य में अनेक रसों का अनुभव करने पर भी शान्त रस में पर्यवसान हो जाता है।
कालिदास का प्रकृति प्रेम
कालिदास के काव्यों में प्रकृति की छवियों के मनोरम एवं प्रभावशाली चित्रण उपलब्ध होते हैं।
कालिदास प्रकृति को सजीव एवं सचेतन मानते हैं। मेघदूत में अचेतन मेघ दौत्य कर्म ही नहीं करता, बल्कि वहिः प्रकृति विरही यक्ष विरहिणी यक्षप्रिया की समस्त मर्मद्रावक वेदना को परस्पर बाँट देता है। कालिदास की पार्वती और शकुन्तला प्रकृति सुकुमारियां हैं। प्रकृति और मनुष्य का आत्मीयता बोध कालिदास के अनेक सन्दर्भों में व्यक्त हुआ है।
कालिदास प्रकृति को मनुष्य जीवन से भिन्न वस्तु नहीं समझते। उनके विचार में दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। उन्हें मनुष्य जीवन में प्रकृति का तथा प्रकृति में मनुष्य जीवन का दर्शन मिलता है। कालिदास की कुमारियां लता-पादपों को स्नेह से सींचती हैं, और विनोदपूर्ण संलाप भी करती रहती हैं। निसर्गसुन्दरी शकुन्तला के सान्निध्य में उन्हें आम्रवृक्ष लता-युक्त दिखाई पड़ता है। अभिज्ञान शाकुन्तल के प्रथम अङ्क में प्रियम्वदा कहती है—सखि शकुन्तले ! थोड़ी देर यहाँ ही ठहरो तुम्हारे पास रहने से यह आम्र का वृक्ष लता-सनाथ सा दीखता है—त्वया समीपस्थितया लतासनाथ इव अयं चूतवृक्षः प्रतिभाति। वे नवमल्लिका तथा सहकार वृक्ष में वरवधू का सम्बन्ध बताते हैं—अनसूया शकुन्तला से कहती है—सखि शकुन्तले ! यह नवमल्लिका आम्र वृक्ष की स्वयम्वरवधू है। तुम्हीं ने तो इसका नाम वनज्योत्स्ना रखा है, क्या तू इसे भूल गई ? हला शकुन्तले इयं स्वयम्वरवधूः सहकारस्य त्वया कृतनामधेया वनज्योत्स्नेति नवमल्लिका एनां विस्मृतासि ?
पुनः अनसूया कहती है—अरी शकुन्तले ! मैं समझती हूँ कि पिताजी इन आश्रम के पौधों को तुमसे अधिक प्यार करते हैं, नहीं तो चमेली कली जैसे कोमल अङ्गवाली तुम्हें इनके थालों में पानी भरने का काम नहीं देते। इस पर शकुन्तला कहती है—में केवल पिताजी को आज्ञा से ही इन्हें नहीं सींचती हूँ, किन्तु मैं भी इन्हें सहोदर जैसा प्यार करती हूँ—न केवलं तातनियोग एव ममापि एतेषु सहोदरस्नेहः।
शकुन्तला केसर के वृक्ष को देखकर पुनः कहती है—सखि ! यह केसर का वृक्ष पवन के झोंके से हिलती हुई पत्ती रूपी अङ्गुलियों से मुझे बुला रहा है। जाऊँ, इसका भी मन रख दूँ—एष वातेरित पल्लवाभिरङ्गुलिभिः किमपि व्याहरतीव मां चूतवृक्षः। शकुन्तला के चतुर्थ अंश में तो प्रकृति और मनुष्य दोनों एकदम समीप आ गये हैं। महर्षि कण्व ने तपोवन के वृक्षों से शकुन्तला के उनके प्रति मधुर स्नेह का स्मरण करते हुए
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अनुरोध किया है कि वे उसे पतिगृह जाने की अनुमति प्रदान करें—सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्। अनन्तर शकुन्तला वनज्योत्स्ना लता को याद कर उनके निकट जाकर कहती है—वनज्योत्स्ने ! आम्रसंगता होने पर भी आज तुम अपनी शाखा रूपी भुजाओं को इधर फैलाकर एक बार मेरा प्रत्यालिङ्गन करो। आज मैं तुमसे बहुत दूर जा रही हूँ। शकुन्तला जाते समय वनज्योत्स्ना को अपनी दोनों सहेलियों के हाथ सौंपती है—हला ! एषा द्वयोर्युवयो हस्ते निक्षेपः ।
कालिदास के मत से प्रकृति की गोद में विहार करते समय मनुष्य के जीवन का पूरा आनन्द मिलता है और प्रकृति के सच्चे सौन्दर्य का दर्शन होता है। शकुन्तला के प्रथम दर्शन के समय राजा दुष्यन्त के मुख से सहसा निकल पड़ता है कि यदि महलों के लिए दुर्लभ यह स्वरूप आश्रमवासिनी बालिकाओं में दीख रहा है तो मानो वनलताओं ने अपने गुणों से उद्यान की लताओं को जीत कर लिया है—
शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य ।
दूरीकृता खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः ॥
इनके मत से कृत्रिम वातावरण की अपेक्षा वन के प्राकृतिक वातावरण में अधिक सौन्दर्य है। कालिदास के विचार से प्रकृति जड़ पदार्थ नहीं है उन्हें वह भी चेतनों सा व्यवहार करती दिखाई पड़ती है। जैसे चेतन प्राणी दूसरे के सुख-दुःख में सहायता करते हैं वैसे ही प्रकृति भी करती है। शकुन्तला की विदाई के समय तपोवन के वृक्ष विविध प्रकार के वस्त्र एवं आभूषण देकर कण्व का सहयोग करते हैं। पर्वतों के वर्णन में कालिदास अधिक सावधान हैं। मेघदूत में रामगिरि और अलका के मध्यमार्ग में पड़ने वाले पर्वतों का रम्य वर्णन है। कुमारसम्भव में भी हिमालय के वर्णन में उन्होंने कमाल कर दिया है। इसी प्रकार नदी वन आश्रमों के वर्णन में वे तन्मय दिखाई पड़ते हैं। गंगानुराग उन्हें उल्लसित कर देता है। वृक्षों के वर्णन में इन्हें आनन्द मिलता है। कुसुमों की सुषमा से वे अभिभूत हैं। कालिदास का प्रकृतिज्ञान केवल सहानुभूति मूलक ही नहीं है, अपितु सूक्ष्मतया सटीक है। हिमालय की हिमराशि, पवन का सङ्गीत, एवं गंगा की शक्तिशालिनी धारा ही नहीं, किन्तु छोटी-छोटी सरिताएँ विटप पुष्प भ्रमर आदि भी उनकी सृष्टिव्यापिनी दृष्टि से ओझल नहीं हैं। कालिदास के आराध्यदेव भगवान् सदाशिव हैं उन्हें उनका दर्शन भी प्रकृति के आठ रूपों में ही होता है। इसीलिए उन्होंने शकुन्तला के मङ्गलाचरणमें अष्टमूर्ति भगवान् शङ्कर से ही विश्वकल्याण की कामना के साथ-साथ अपना भी कल्याण चाहा है—
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः ।
इन्होंने रघुवंश में समुद्र से नदियों के मिलने का दृश्य अत्यन्त सरस चित्रित किया है। जैसे दूसरे लोग केवल स्त्रियों का अधर पान करते हैं, अपना अधर उन्हें नहीं पिलाते, किन्तु समुद्र का ढंग निराला है, क्योंकि जब नदियाँ ढीठ होकर अपना मुँह इसके सामने बढ़ाती हैं तब यह बड़ी चतुरता से अपना तरङ्गरूपी अधर उन्हें पिलाता है उनका अधर स्वयं पीता है—
मुखार्पणेषु प्रकृतिप्रगल्भाः स्वयं तरङ्गाधरदानदक्षः ।
अनन्यसामान्यकलत्रवृत्तिः पिबत्यसौ पाययते च सिन्धुः ॥
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कालिदास का शास्त्रीय ज्ञान
महाकवि कालिदास की रचनाओं के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि उन्हें संस्कृत साहित्य के मौलिक ग्रन्थों का पर्याप्त ज्ञान था। उनकी कृतियों में यत्र-तत्र प्रसंगवश उपनिषद्, पुराण, महाभारत, दर्शन, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्यशास्त्र आदि के सिद्धान्तों के स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध होते हैं। महाकाव्य रघुवंश के मङ्गलाचरण—
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥
में उन्होंने काव्य का लक्षण “शब्दार्थौ काव्यम्” निर्दिष्ट किया है। इसी प्रकार वे अपने व्याकरण ज्ञान की प्रौढता को भी व्यक्त करते चलते हैं। वागार्थाविव इस अंश में ‘इवेन सह समासो विभक्त्यलोपश्च’ इस वार्तिक का तथा ‘पितरौ’ में “पिता मात्रा १।२।७०” इस पाणिनीय सूत्र का स्मरण दिलाते हुए वे अपनी व्याकरण विदग्धता को प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रकार पन्द्रहवें सर्ग में बालिवध के प्रसङ्ग पर व्याकरण में उपमा की हृदयाकर्षक छटा दिखाते हैं—
स हत्वा बालिनं वीरस्तत्पदे चिरकाङ्क्षिते।
धातोः स्थान इवादेशं सुग्रीवं सन्न्यवेशयत्॥ १२।५८
अर्थात् उस राम ने बालि को मारकर धातु के स्थान पर आदेश के समान (अस् धातु के स्थान पर ‘अस्तेर्भू’ सूत्र से विहित भू आदेश के समान तथा पा धातु से पाघ्राध्मा सूत्र से विहित आदेश के समान) सुग्रीव को चिरकाल से अभिलषित उस बालि के स्थान पर रखा। रघुवंश के तृतीय सर्ग में उनका ज्योतिष विषयक परिपक्व ज्ञान परिलक्षित होता है—
ग्रहैस्ततः पञ्चभिरुच्चसंश्रयैरसूर्यगैः सूचितभाग्यसम्पदम्।
असूूत पुत्रं समये शचीसमा त्रिसाधना शक्तिरिवार्थमक्षयम्॥ ३।१३
अर्थात् अनन्तर इन्द्राणी के समान रानी सुदक्षिणा ने प्रसव का समय (दसवां महीना) होने पर उच्च स्थान में स्थित सूर्य के सान्निध्य से अस्त को नहीं प्राप्त हुए पांच ग्रहों के द्वारा जिसकी भाग्य सम्पत्ति सूचित हो रही है। ऐसे पुत्र को प्रभाव, उत्साह एवं मन्त्र इन तीन उपायों से सम्पन्न होने वाली शक्ति जैसे अक्षय अर्थ को उत्पन्न करती है वैसे ही उत्पन्न किया।
शकुन्तला के पञ्चम अङ्क में रानी हंसपदिका के सस्वर गीत को सुनकर राजा दुष्यन्त उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि ‘अहो रागपरिवाहिणी गीतिः’ रघुवंश के प्रथम सर्ग में रानी सुदक्षिणा और राजा दिलीप को अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में जाते समय कवि ने अपनी संगीत विदग्धता का परिचय देते हुए कहा है—
मनोऽभिरामा शृण्वन्तौ रथनेमिस्वनोन्मुखैः।
षड्जसंवादिनीः केका द्विधाभिन्ना शिखण्डिभिः॥ १ ३६
अर्थात्—रथ के चक्रप्रान्ति के शब्द को सुनकर ऊपर मुख किये हुए मयूरों द्वारा दो प्रकार की हुई षड्ज स्वर का अनुसरण करने वाली तथा मन को प्रसन्न करने वाली वाणी को सुनते हुए वे दोनों सुदक्षिणा और दिलीप चले।
कुमार संभव के द्वितीय सर्ग में ब्रह्म और जगत् की एकात्मकता, ब्रह्म की जगत् रूप
( २४ )
कार्य के रूप में परिणत आदि बातें बड़ी चारुता के साथ काव्यात्मक सरल शैली में वर्णित की गई हैं। जैसे—
नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं प्राक् सृष्टेः केवलात्मने । गुणत्रयविभागाय पश्चात् भेदमुपेयुषे ॥ २।४
अर्थात् हे भगवन् ! संसार को रचने के पहले एक ही रूप में रहने वाले पर, जब संसार रचने लगते थे उस समय सत्त्व, रज एवं तम तीन गुण उत्पन्न करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश नाम से तीन रूप के बन जाने वाले आपको प्रणाम है।
इसी प्रकार रघुवंश के प्रथम सर्ग में—
वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् । आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥ १।११
आदि श्लोकों से वे यज्ञ आदि-कर्मकलाप के ज्ञान के साथ ही वेदोच्चारणविधि का प्रचार भी सूचित करते हैं तथा उनकी कृतियों में नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा पुराणों की प्रधान प्रधान बातें यथावसर व्यक्त होती रहती हैं । रघुवंश में रघु और इन्द्र के साथ युद्ध से तथा अभिज्ञानशाकुन्तल के सप्तम अङ्क में विदूषक पर आक्रमण के समय दुष्यन्त के शब्दवेधी बाण चलाने की कला से कविवर कालिदास के युद्धविषयक ज्ञान की सूचना मिलती है । तथा शकुन्तला के षष्ठ अङ्क में तूलिका से दुष्यन्त द्वारा चित्रित शकुन्तला विषयक चित्रकला और मूर्तिकला अनुशीलन करने पर कालिदास की चित्रकला का पर्याप्त ज्ञान प्रतीत होता है । इस प्रकार रघुवंश कुमारसम्भव शकुन्तला आदि में विभिन्न शास्त्रों के ज्ञान के पर्याप्त उदाहरण भरे पड़े हैं ।
संस्कृत नाटकों के उद्भव तथा विशेषता का विवेचन
संस्कृत साहित्य में नाटकों की एक विशिष्ट परम्परा रही है। लोकप्रियता के कारण भारत में नाट्यकला का प्रयोग अत्यन्त प्राचीन काल से होता चला आया है। ऋग्वेद के सूक्तों में सोमविक्रय के समय मनोरञ्जनात्मक अभिनय का संकेत प्राप्त होता है । पुरुरवा-उर्वशी, यम-यमी, इन्द्र-इन्द्राणी, वृषाकपी आदि के संवाद सूक्तों में नाटकीय कथनोपकथन उपलब्ध होते हैं। यजुर्वेद में शैलूष शब्द का स्पष्ट उल्लेख है, जो नट अथवा अभिनेता का समानार्थी है। वाल्मीकीय रामायण में नट, नर्तक तथा शैलूष शब्दों का उल्लेख है ।
इस प्रकार तत्कालीन जन जीवन में धार्मिक अवसर, संगीत समारोह तथा नृत्योत्सवों से नाटक का विशेष सम्बन्ध था ।
उत्तरवर्ती साहित्य में नाट्यकला की शिल्पविधियों का पूरा इतिहास दिखाई देता है । रामायण के एक प्रसंग में कहा गया कि नटों, नर्तकों और गायकों की मण्डलियों की कर्ण सुखद वाणियों को जनता पूरी तन्मयता से सुनती थी—
नटनर्तकसंघानां गायकानां च गायताम् । यतः कर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः ॥
महाभारत में नट, नर्तक, गायक, सूत्रधार आदि का निर्देश है । हरिवंश पुराण में रामचरित नाटक प्रदर्शित किये जाने का संकेत है । महाभारत के अनुसार प्रद्युम्नविवाह के प्रसंग में वसुदेव जी के यज्ञ के अवसर पर भद्रनामक नट ने अपने आकर्षक नाट्य-प्रदर्शन से उपस्थित ऋषि-महर्षियों को प्रसन्न किया था जिसके फलस्वरूप उसने आकाश-
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विचरण तथा स्वेच्छया रूप धारण करने का वरदान प्राप्त किया था। महर्षि पाणिनी ने अपनी अष्टाध्यायी में शिलालि तथा कृशाश्व के द्वारा रचित नाट्य सूत्रों का उल्लेख किया है। भगवान् पतञ्जलि ने अपने महाभाष्य में कंसवध तथा बालिवध नामक नाटकों के अभिनय का वर्णन किया है। वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में नागरिकों के मनोवर्णन करते हुए नटों के द्वारा अभिनीत नाटकों के प्रदर्शन का उल्लेख किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अध्ययन से पता चलता है कि ललित कला की शिक्षा के लिए उस समय राज्य की ओर से पूर्ण प्रबन्ध था। इन बातों से प्रमाणित होता है कि वैदिक काल से ईसा की प्रथम शताब्दी तक हमारे देश में नाटकों का अभिनय क्रमशः चला आ रहा था।
इसलिए यह निर्विवाद सत्य है कि संस्कृत साहित्य में नाटकों के निर्माण की परम्परा बहुत पुरानी है और आदि काल से ही भारतीय जन जीवन के मनोरंजन के लिए नाटकों को श्रेष्ठ माध्यम के रूप में अपनाया जाता था।
भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में जो नाटकीय कला की उत्पत्ति का विवरण उपस्थित किया है उसके अनुसार इन्द्रादि-देवताओं के अनुरोध पर स्वयं ब्रह्माजी ने ऋग्वेद से पाठ, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से गान, और अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यवेद नामक पञ्चम वेद की रचना की तथा धर्म, क्रीडा, हास्य, युद्ध आदि भावों का प्रदर्शन इसका विषय कह कर इसे देवता और दैत्य दोनों के लिए ग्राह्य बताया और नाट्यशास्त्र में अभिनय के लिए वर्ग, आयत, या त्रिभुज के आकार वाले प्रेक्षागृहों के निर्माण की नियमविधि का उल्लेख किया है। इस प्रकार नाट्यकला का मूल सम्बन्ध धर्म से था, आगे चलकर इसने स्वतन्त्र साहित्यिक रूप ग्रहण कर लिया। संस्कृत के नाटककारों ने अपने नाटकों की कथावस्तु धर्म ग्रन्थों से लेकर जनता की रुचि में ढालकर देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार जनरञ्जन की दृष्टि से नाटकों की योजना की। भरत मुनि के मतानुसार नाट्य तीनों लोकों के भावों का अनुकरण है त्रैलोक्यस्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्तनम्। भरतमुनि का सिद्धान्त है कि नाटक में सभी प्रकार का ज्ञान, शिल्प, विद्याएं और शास्त्र समन्वित रहते हैं। वह वेदविद्या है इतिहास है और उसमें योग सदाचार एवं समाज को विनोद प्रदान करने के साधन विद्यमान हैं। इस मत का अनुमोदन महाभाष्य के कंसवध और बालिवध के अभिनय के वर्णन में किया गया है—
न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। न स योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ १।१०६
पाश्चात्य विद्वानों ने इस परम्परानुमोदित मान्यता को अस्वीकार करते हुए अन्यान्य मूल कारणों की उद्भावना की। डा० कीथ के मतानुसार प्राकृतिक परिवर्तनों को जन-साधारण के सामने मूर्तरूप दिखाने की अभिलाषा से ही नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ।
जर्मनी के विद्वान् पिशेल ने नाटकों की उत्पत्ति पुत्तलिका नृत्य से बताई है। उसके कथनानुसार उस नृत्य की उत्पत्ति भारतवर्ष में हुई और यहां से इसका प्रचार एवं प्रसार अन्य देशों में हुआ। सूत्रधार एवं स्थापक जैसे शब्दों से इस मत की पुष्टि की गई है। डा० लूडर्स के मत से नाटकों की उत्पत्ति छाया-नाटकों से हुई। इसका समर्थन दूताङ्गद नाम छाया-नाटक से किया गया। नेपाल आदि देशों में प्रचलित इन्द्रध्वज महोत्सव से नाटकों की उत्पत्ति मानी। अनेकों ने सम्वाद सूत्रों से नाट्य का उद्गम प्रतिपादित किया है।
वस्तुतः संस्कृत नाटक भारतीय प्रतिभा की स्वतन्त्र सूझ है और अभिनय की कला में
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भी वह स्वतन्त्र उद्भावना के आश्रित रहा है। संस्कृत के प्राचीन नाटकों के रंगमञ्च पर बालकों के द्वारा नियोजन किये जाने के उदाहरण उपलब्ध हैं। जैसे शकुन्तला का सर्वदमन शेर के बच्चे से खेलते हुए दिखाया गया है। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों के लिए विभिन्न प्रकार की भाषाओं का उपयोग है। नायक तथा प्रमुख पात्र संस्कृत बोलते हैं लेकिन स्त्रियां एवं निम्नकोटि के पात्र प्राकृत के भिन्न-भिन्न रूपों का व्यवहार करते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था विश्व के किसी अन्य नाटक परम्परा में प्राप्त नहीं होती।
समीक्षकों ने महाकाव्यों के अनन्तर संस्कृत नाटकों का प्रादुर्भाव भास कवि के स्वप्नवासवदत्तम् तथा प्रतिज्ञायौगन्धरायण नामक नाटकों से माना है। जिनके कथानक रामायण और महाभारत से लिये गये हैं। नाटकों की निर्माण परम्परा में भास कवि के अनन्तर कालिदास का नाम आता है। कालिदास ने अपने मालविकाग्निमित्र की प्रस्तावना में भास, सौमिल्ल, कविपुत्र आदि प्रागवर्ती नाटककारों की चर्चा की है।
संस्कृत साहित्य के उपवन में कालिदास का आगमन एक वसन्त दूत के रूप में माना गया है जिसके कारण उपवन का कोना-कोना पुष्पित हो उठा है। इन्होंने नई साज सज्जाएँ, नई दिशाएँ नये विचार अभिनव भाव, नई-नई पद्धतियाँ प्रस्तुत की हैं ये संस्कृत में सबसे बड़े कवि और सर्वश्रेष्ठ नाटककार हुए हैं।
नाटकों के क्षेत्र में कालिदास ने तीन नाटकों का प्रणयन किया है—मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय और अभिज्ञानशाकुन्तल। इनमें मालविकाग्निमित्र कवि की आरम्भिक कृति है, जिसमें नाटक नियमों की दृष्टि से कथानिर्वाह, घटनाक्रम, पात्रयोजना आदि सभी नाटककार के असाधारण कौशल की छाप है। अभिज्ञानशाकुन्तल उनकी अन्तिम कृति है, किन्तु उसकी गणना आज विश्व साहित्य की पहली कृति के रूप में की जाती है। प्रेम और सौन्दर्य का ऐसा सरस, हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्शी चित्रण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। उसमें ओज के साथ मनोज्ञता और लघुत्व के साथ प्राञ्जलता का अद्भुत समन्वय हैं। शकुन्तला की सरलता अपराध में, दुःख में, अज्ञानता में, धैर्य में और क्षमा में परिपक्व है गम्भीर तथा स्थायी है। गेटे की आलोचना के अनुसार शकुन्तला के आरम्भिक तरुण सौन्दर्य ने मंगलमय परम परिणत सफलता लाभ करके मर्त्य को स्वर्ग के साथ संमिलित कर दिया है।
गणदास ने कहा है कि यह नाट्य देवताओं के नेत्रों का प्रसाधन करने वाला यज्ञ है। स्वयं शिवजी ने उमा से विवाह करके अपने शरीर में इसके अपने शरीर दो भाग कर दिये एक ताण्डव और दूसरा लास्य। इनमें सत्त्व, रज और तम तीनों गुण भी दिखाई पड़ते हैं। और अनेक रसों में लोकचरित लक्षित होते हैं। इसलिए भिन्न भिन्न रुचि वालों के लिए प्रायः नाटक ही एक ऐसा उत्सव है, जिससे सबको समान आनन्द मिलता है—
देवानामिदमामनन्ति मुनयः शान्तं क्रतु चाक्षुषं रौद्रेणैतदुमाकृतव्यतिकरे स्वाङ्गे विभक्तं द्विधा। त्रैगुण्योद्भवमत्र लोकचरितं नानारसं दृश्यते नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधकम् ॥
अभिज्ञानशाकुन्तल का उत्कर्ष
कालिदास का काव्य सरस्वती का सर्वोत्कृष्ट प्रसाद अभिज्ञान शाकुन्तल है। सौन्दर्य
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की मादकता, प्रेम की निश्चलता, प्रकृतिजन्य सरलता, ऋषिकुल की उदारता, महर्षि कण्व का आदर्श वात्सल्य, दुर्वासा का निर्ममदण्ड, वासना का प्रक्षालन, आत्मा का निर्मलीकरण तथा संस्कृति के पीयूष संमिलन, श्रेयस् एवं प्रेयस् मनोग्राही ग्रन्थिबन्ध इन सभी उपादानों को एक साथ मिश्रित कर कविवर कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तल में जो प्रपाणक रस तैयार किया है वह भारतीय जीवन के निमित्त नितान्त मूल्यवान् है। इस नाटक के प्रथम चार अंकों को भोग-भूमि पाँच एवं छः दो अंकों को दण्डभूमि और अन्तिम सप्तम अंक को सिद्धभूमि माना गया है। इस प्रकार यह नाटक कवि की प्रतिभा का अनुपम फल है।
अभिज्ञानशाकुन्तल में कवि की निपुणकला भारतीय संस्कृति के सौरभ में सनकर अधिक अभिराम तथा प्रभविष्णु बन गई है। महाभारत की चालाक तथा बिना शील वाली युवती शकुन्तला नाटक में लजीली सम्मानपूर्ण करुणोत्पादक नायिका में रूपान्तरित हो गई है। इसी प्रकार स्वार्थपरायण राजा दुष्यन्त जो महाभारत में नीति के अनुरोध से उसे न पहचानने का व्याज करता है वही यहां नाटक में ऐसी विस्मृति से अभिभूत चित्रित किया गया है, जिसके लिए उसकी भर्त्सना नहीं की जा सकती, उसका नैतिक चरित्र ऊँचा उठ गया है और वह पराई स्त्री सम्पर्क से विमुख एक आदर्श राजा बन गया है।
अपनी काव्यात्मक प्रतिभा के सहारे कालिदास को दो रूपों सफलता मिली है। प्रथमतः वे काव्योचित भावों के धनी हैं, जिन्हें वे बड़ी निपुणता से चरित्र के साथ मिला देते हैं तथा द्वितीयतः उनमें संयम एवं सन्तुलन की काव्यात्मक भावना है जो किसी नाटककार के लिए सफलता की आवश्यक हेतु हैं। विद्वानों का कथन है कि कालिदास ने अपने नाटकों में नाट्य शास्त्रों के विधानों का प्रायः अनुसरण किया है उनकी रचनाओं में अधिकांश नियमों का प्रतिबिम्ब झलकता है।
यद्यपि कालिदास ने संस्कृत में तीन नाटक लिखे हैं (१) मालविकाग्निमित्र (२) विक्रमोर्वशीय तथा (३) अभिज्ञानशाकुन्तल, किन्तु नाटककार के रूप में उनकी कीर्ति सर्वाङ्गसुन्दर अभिज्ञानशकुन्तल से स्थिर हो सकी है।
समालोचकों ने चरित्रचित्रण, रसपरिपाक भाषासौष्ठव, संविधान के चातुर्य की दृष्टि से अभिज्ञानशाकुन्तल को संस्कृत नाटकों में सर्वश्रेष्ठ माना है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सर विलियम जोंस ने एक संस्कृत के पण्डित की सहायता से १७८६ ई० में अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का अंग्रेजी में अनुवाद किया। जिसने यूरोपीय विद्वानों की मनोदृष्टि भारतीय नाट्य प्रतिभा की प्रतीति से चकित एवं मुग्ध कर दिया। उसके अनन्तर कई यूरोपीय भाषाओं में उसके अनुवाद भी हुए। इस समय तो विश्व की कोई भी ऐसी भाषा नहीं है, जिसमें अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक का अनुवाद न हुआ हो।
इस नाटक के सप्तम अंक में सर्वदमन का अकृत्रिम हास्य, तोतली बोली का वर्णन तथा शेर के बच्चों के साथ बालक्रीड़ा पढ़कर शेजी नाम के एक फ्रेञ्च विद्वान् को इतना आनन्द आया कि वह नाचने लगा। विश्वविख्यात जर्मनकवि गेटे ने इस नाटक का अनुवाद पढ़कर आनन्द विभोर होकर कहा था कि यदि स्वर्ग और पृथ्वी को बातें एक जगह देखना हो तो अभिज्ञान शाकुन्तल का अध्ययन करो। इस प्रकार अभिज्ञान शाकुन्तल को लोकप्रिय होने के कारण समीक्षकों का यह कहना सर्वथा संगत प्रतीत होता है कि कालिदास के ग्रन्थों में अभिज्ञान शाकुन्तल सर्वोत्कृष्ट है—कालिदासस्य सर्वस्वमभिज्ञानशाकुन्तलम्।
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अनन्त कथारत्नों के सागर महाभारत के आधार पर कालिदास ने इस नाटक की रचना की है। कालिदास के अनुपम रचनाकौशल से यह नाटक लोकोत्तर बन गया है। इस नाटक की भाषा अत्यन्त प्रसाद युक्त और रमणीय है। इसमें उपमा अलंकार, उत्प्रेक्षा, स्वभावोक्ति, अर्थान्तरन्यास, काव्यलिङ्ग आदि अलङ्कारों की बहुलता है। इसमें कहीं भी क्लिष्टता, कल्पना की खींचातानी, दूरान्वय आदि दोष नहीं हैं। प्रत्येक पात्र के अनुरूप भाषा रखने में कवि ने पर्याप्त सावधानी रखी है। शकुन्तला तथा उसकी सखियां हमेशा लता वृक्ष आदिकों के सहवास में खेलने और रहने वाली हैं। इसलिए उनकी उक्तियों में आम्र, अतिमुक्तलता, नवमल्लिका आदि वृक्ष एवं लता का उल्लेख है। 'क इदानीं सहकारमन्तरेणातिमुक्तलतां पल्लवितां सहते' 'को नामोष्णोदकेन नवमल्लिकां सिञ्चति।' महर्षि कण्व हमेशा यज्ञ-याग से निरत और अध्यनाध्यार्पन में निमग्न रहते हैं। अतः वे ऐसे दृष्टान्तों का प्रयोग करते हैं जिनका सम्बन्ध यज्ञ एवं अध्ययन से है—'दृष्ट्या धूमाकुलितदृष्टेः यजमानस्य पावके एवाहुतिः पतिता'; 'वत्से ! सुशिष्यपरिदत्ता विद्येवाऽशोचनीया संवृत्ता।' हमेशा खाद्यलोलुप और विनोदी विदूषक के स्वभाव का प्रतिबिम्ब उसके कथन में पड़ा है—'यथा कस्यापि पिण्डखजूरैरुद्वेजितस्य तिन्तिण्यामभिलाषो भवेत् तथैव स्त्रीरत्नपरिभोगिणो भवत इयमभ्यर्थना।' किसी पात्र के भाषण में छोटे-छोटे चटकीले होने से उनको पढ़ते हुए पाठक के मन प्रसन्न हो जाता है।
तत्र श्लोकचतुष्टयम्
अभिज्ञानशाकुन्तल की विशेषता में समालोचकों का कहना है कि संस्कृत के काव्यों में नाटकों की उत्तमता है। उन सबों में अभिज्ञान शाकुन्तल अत्यन्त रमणीय है। उसमें उसका चतुर्थ अङ्क अत्युत्तम है, उसमें भी चार श्लोक आदर्श पूर्ण हैं—
काव्येषु नाटकं रम्यं तत्रापि च शकुन्तला ।
तत्राप्यङ्कस्तुरीयस्तु तत्र श्लोकचतुष्टयम् ॥
ये चारों श्लोक इस प्रकार हैं—
( १ )
यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
कण्ठस्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम् ।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः ॥ ४।२
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पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम् ।
आद्ये वः कुसुमप्रसूतसमये यस्या भवत्युत्सवः
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम् ॥ ४।८
( ३ )
अस्मान् साधु विचिन्त्य संयमधनानुच्चैः कुलं चात्मनः
त्वय्यस्याः कथमप्यबान्धवकृतां स्नेहप्रवृत्तिं च ताम् ।