अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
सर्ग १५] युद्धकाण्ड ३२१
पुनश्च सर्वं भवतः प्रसादात्-
प्राप्तं हतो राक्षसदुष्टशत्रुः ॥ ६४॥
जानेपर आपकी कृपासे मुझे वह सब सुख फिर प्राप्त हो गया ॥ ६४ ॥
देवा ऊचुः
हता यज्ञभागा धरादेवदत्ता
मुरारे खलेनादिदैत्येन विष्णो।
हतोऽद्य त्वया नो वितानेषु भागाः
पुरावद्भवष्यिन्ति युष्मत्प्रसादात् ॥६५॥
**देवगण बोले—**हे मुरारे ! हे विष्णो ! इस दुष्ट आदिदैत्यने ब्राह्मणोंद्वारा दिये हुए हमारे समस्त यज्ञ-भागोंको हर लिया था। अब आपने उसे मार डाला, अतः आपकी कृपासे अब हमें फिर पहलेके समान ही यज्ञोंमें भाग मिलने लगेंगे ॥ ६५ ॥
पितर ऊचुः
हतोऽद्य त्वया दुष्टदैत्यो महात्मन्
गयादौ नरैर्दत्तपिण्डादिकान्नः।
बलादत्ति हत्वा गृहीत्वा समस्ता-
निदानीं पुनर्लब्धसत्त्वा भवामः॥६६॥
**पितृगण बोले—**हे महात्मन् ! यह दुष्ट दैत्य गया आदि पुण्य-क्षेत्रोंमें मनुष्योंके दिये हुए हमारे पिण्डोदकादिको बलात्कारसे छीन कर खा लेता था; आज आपने इसे मार डाला। अतः अब अपना भाग प्राप्त करके हम फिर शक्ति प्राप्त कर लेंगे ॥ ६६ ॥
यक्षा ऊचुः
सदा विष्टिकर्मण्यनेनाभियुक्ता
वहामो दशास्यं बलाद्दुःखयुक्ताः।
दुरात्मा हतो रावणो राघवेश
त्वया ते वयं दुःखजाताद्विमुक्ताः ॥६७॥
**यक्ष बोले—**हे रघुनाथजी ! यह रावण हमें बलात्कारसे वेगारमें लगा देता था और हम इसकी पालकी आदिमें जुतकर बड़ा कष्ट मानकर इसे ले चलते थे। अतः आज इस दुरात्माको मारकर आपने हमें अनेकों दुःखोंसे छुड़ा दिया ॥ ६७ ॥
गन्धर्वा ऊचुः
वयं सङ्गीतनिपुणा गायन्तस्ते कथामृतम्।
आनन्दामृतसन्दोहयुक्ताः पूर्णाः स्थिताः पुरा॥६८॥
पश्चादुरात्मना राम रावणेनाभिविद्रुताः।
तमेव गायमानाश्च तदाराधनतत्पराः ॥६९॥
स्थितास्त्वया परित्राता हतोऽयं दुष्टराक्षसः।
**गन्धर्व बोले—**प्रभो ! हम संगीतकुशल लोग आपकी अमृततुल्य कथाओंका गान करते हुए पहले आनन्दामृतसमूहसे युक्त होकर मग्न रहते थे ॥ ६८ ॥ किन्तु फिर दुरात्मा रावणद्वारा आक्रान्त होकर हम उसीके गुणगान और उसीकी सेवामें तत्पर हो गये। इस दुष्ट राक्षसको मारकर अब आपने हमें भी बचा लिया।
एवं महोरगाः सिद्धाः किन्नरा मरुतस्तथा ॥७०॥
वसवो मुनयो गावो गुह्यकाश्च पतत्रिणः।
सप्रजापतयश्चैते तथा चाप्सरसां गणाः ॥७१॥
सर्वे रामं समासाद्य दृष्ट्वा नेत्रमहोत्सवम्।
स्तुत्वा पृथक् पृथक् सर्वे राघवेणाभिवन्दिताः ॥७२॥
ययुः स्वं स्वं पदं सर्वे ब्रह्मरुद्रादयस्तथा।
प्रशंसन्तो मुदा रामं गायन्तस्तस्य चेष्टितम् ॥७३॥
ध्यायन्तस्त्वभिषेकार्द्रं सीतालक्ष्मणसंयुतम्।
सिंहासनस्थं राजेन्द्रं ययुः सर्वे हृदि स्थितम् ॥७४॥
इसी प्रकार सिद्ध, किन्नर, मरुत्, वसु, मुनि, गौ, गुह्यक, पक्षी, प्रजापति और अप्सराओंके समूह सभी भगवान् रामके पास पृथिवीलोकमें आये और उन नयनानन्दवर्धन प्रभुके दर्शन कर उनकी पृथक्-पृथक् स्तुति की तथा उनसे प्रशंसित हो अपने-अपने लोकोंको चले गये। तदनन्तर ब्रह्मा और महादेव आदि भी आनन्दपूर्वक भगवान् रामकी प्रशंसा करते, उनकी लीलाओंका गान करते और सिंहासनपर विराजमान अभिषेकसे आर्द्र राजराजेश्वर श्रीरामचन्द्रजीका सीताजी और लक्ष्मणके सहित हृदयमें ध्यान करते वहाँसे विदा हुए ॥६९-७४॥
४१
युद्धकाण्ड - सर्ग १६: वानरोंकी विदा तथा ग्रन्थप्रशंसा
| :३२२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग १६ |
|---|
| खे वाद्येषु ध्वनत्सु प्रमुदितहृदयै-<br> र्देववृन्दैः स्तुवद्भि-<br>र्वर्षद्भिः पुष्पवृष्टिं दिवि मुनिनिकरै-<br> रीड्यमानः समन्तात् ।<br>रामः श्यामः प्रसन्नस्मितरुचिरमुखः<br> सूर्यकोटिप्रकाशः<br>सीतासौमित्रिवातात्मजमुनिहरिभिः<br> सेव्यमानो विभाति ॥७५॥ | उस समय, जब कि आकाशमें बाजे बज रहे थे, देवताओंका वृन्द स्वर्गमें प्रसन्न हृदयसे स्तुति करता हुआ पुष्प बरसा रहा था तथा महर्षि-मण्डल चारों ओर स्थित होकर स्तुति कर रहा था, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान प्रसन्नतायुक्त मुसकानसे मनोहर मुखवाले श्यामसुन्दर भगवान् राम सीता, लक्ष्मण, हनुमान्, मुनिजन तथा वानरगणोंसे सेवित होकर अत्यन्त सुशोभित हुए ॥ ७५ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥
षोडश सर्ग
वानरोंकी विदा तथा ग्रन्थप्रशंसा।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— |
|---|---|
| रामेऽभिषिक्ते राजेन्द्र सर्वलोकसुखावहे ।<br>वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तो महीरुहाः ॥ १ ॥ | हे पार्वति ! समस्त लोकोंको सुख देनेवाले राजाधिराज भगवान् रामके राज्याभिषिक्त होनेपर पृथिवी धन-धान्यसे पूर्ण हो गयी और वृक्ष फलयुक्त हो गये ॥ १ ॥ |
| गन्धहीनानि पुष्पाणि गन्धवन्ति चकाशिरे ।<br>सहस्रशतसंख्यानां धेनूनां च गवां तथा ॥ २ ॥<br>ददौ शतवृषान्पूर्वं द्विजेभ्यो रघुनन्दनः ।<br>त्रिंशत्कोटिं सुवर्णस्य ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुनः ॥ ३ ॥ | तथा जो पुष्प गन्धहीन थे वे भी सुगन्धयुक्त होकर शोभा पाने लगे । श्रीरघुनाथजी-ने (राज्याभिषिक्त होकर) पहले एक लाख घोड़े, एक लाख दूध देनेवाली गौएँ और सैकड़ों बैल ब्राह्मणोंको दिये और फिर उन्हें तीस करोड़ सुवर्ण-मुद्रा दिये ॥ २-३ ॥ |
| वस्त्राभरणरत्नानि ब्राह्मणेभ्यो मुदा तथा ।<br>सूर्यकान्तिसमप्रख्यां सर्वरत्नमयीं स्रजम् ॥ ४ ॥<br>सुग्रीवाय ददौ प्रीत्या राघवो भक्तवत्सलः ।<br>अङ्गदाय ददौ दिव्ये ह्यङ्गदे रघुनन्दनः ॥ ५ ॥ | तत्पश्चात् उन्होंने प्रसन्न होकर नाना प्रकारके वस्त्र, आभूषण और रत्नादि भी ब्राह्मणों-को दिये । फिर भक्तवत्सल रघुनाथजीने सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त एक सूर्यकी कान्तिके समान चमकती हुई माला अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सुग्रीवको दी और अंगदको दो दिव्य अंगद (भुजबन्ध) दिये ॥४-५॥ |
| चन्द्रकोटिप्रतीकाशं मणिरत्नविभूषितम् ।<br>सीतायै प्रददौ हारं प्रीत्या रघुकुलोत्तमः ॥ ६ ॥ | तदनन्तर रघुकुल-तिलक श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रेमभावसे करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान अमूल्य मणि और रत्नोंसे विभूषित एक हार श्रीजानकीजीको दिया ॥६॥ |
| अवमुच्यात्मनः कण्ठाद्धारं जनकनन्दिनी ।<br>अवैक्षत हरीन्सर्वांन् भर्तारं च मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥<br>रामस्तामाह वैदेहीमिङ्गितज्ञो विलोकयन् । | श्रीजनकनन्दिनी उस हारको अपने गलेसे उतार-कर बारम्बार अपने पतिदेव और वानरोंकी ओर देखने लगीं ॥ ७ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीका संकेत समझ-कर उनकी ओर देखते हुए कहा—"हे सम्पत्ति |
सर्ग १६ ] युद्धकाण्ड ३२३
वैदेहि यस्य तुष्टाऽसि देहि तस्मै वरानने ॥ ८ ॥
हनूमते ददौ हारं पश्यतो राघवस्य च ।
तेन हारेणं शुशुभे मारुतिर्गौरवेण च ॥ ९ ॥
रामोऽपि मारुतिं दृष्ट्वा कृताञ्जलिमुपस्थितम् ।
भक्त्या परमया तुष्ट इदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥
हनूमंस्ते प्रसन्नोऽस्मि वरं वरय काङ्क्षितम् ।
दास्यामि देवैरपि यद्दुर्लभं भुवनत्रये ॥ ११ ॥
हनूमानपि तं प्राह नत्वा रामं प्रहृष्टधीः ।
त्वन्नाम स्मरतो राम न तृप्यति मनो मम ॥ १२ ॥
अतस्त्वन्नाम सततं स्मरन् स्थास्यामि भूतले ।
यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम् ॥ १३ ॥
मम तिष्ठतु राजेन्द्र वरोऽयं मेऽभिकाङ्क्षितः ।
रामस्तथेति तं प्राह मुक्तस्तिष्ठ यथासुखम् ॥ १४ ॥
कल्पान्ते मम सायुज्यं प्राप्स्यसे नात्र संशयः ।
तमाह जानकी प्रीता यत्र कुत्रापि मारुते ॥ १५ ॥
स्थितं त्वामनुयास्यन्ति भोगाः सर्वे ममाज्ञया ।
इत्युक्तो मारुतिस्ताभ्यामीश्वराभ्यां प्रहृष्टधीः ॥ १६ ॥
आनन्दाश्रुपरीताक्षो भूयोभूयः प्रणम्य तौ ।
कृच्छ्राद्ययौ तपस्तप्तुं हिमवन्तं महामतिः ॥ १७ ॥
ततो गुहं समासाद्य रामः प्राञ्जलिमब्रवीत् ।
सखे गच्छ पुरं रम्यं शृङ्गवेरमनुत्तमम् ॥ १८ ॥
मामेव चिन्तयन्नित्यं भुङ्क्ष्व भोगान्निजार्जितान् ।
अन्ते ममैव सारूप्यं प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥ १९ ॥
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यान्याभरणानि च ।
राज्यं च विपुलं दत्त्वा विज्ञानं च ददौ विभुः ॥ २० ॥
रामेणालिङ्गितो हृष्टो ययौ स्वभवनं गुहः ।
जनकनन्दिनि ! तुम जिससे प्रसन्न हो उसे यह हार दे दो" ॥ ८ ॥ तब सीताजीने श्रीरामचन्द्रजीके सामने ही वह हार हनुमान्जीको दे दिया। उस हारको पहन और गौरवान्वित हो श्रीहनुमान्जी अत्यन्त शोभाको प्राप्त हुए ॥ ९ ॥
भगवान् रामने भी सामने हाथ जोड़े खड़े हुए हनुमान्जीसे उनकी भक्तिके कारण अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—॥ १०॥ "हनुमन् ! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो माँग लो। जो वर त्रिलोकीमें देवताओंको भी मिलना कठिन है वह भी मैं तुम्हें अवश्य दूँगा !" ॥ ११ ॥ तब हनुमान्जीने अत्यन्त हर्षित होकर उनसे कहा—"हे रामजी ! आपका नाम-स्मरण करते हुए मेरा चित्त तृप्त नहीं होता ॥ १२॥ अतः मैं निरन्तर आपका नाम-स्मरण करता हुआ पृथिवीपर रहूँ । हे राजेन्द्र ! मेरा मनोवाञ्छित वर यही है कि जबतक संसारमें आपका नाम रहे तबतक मेरा शरीर भी रहे।" श्रीरामचन्द्रजीने कहा—"ऐसा ही हो, तुम जीवन्मुक्त होकर संसारमें सुखपूर्वक रहो ॥ १३-१४॥ कल्पका अन्त होनेपर तुम मेरा सायुज्य प्राप्त करोगे, इसमें सन्देह नहीं।" फिर जानकीजीने उनसे कहा—"हे मारुते ! तुम जहाँ कहीं भी रहोगे वहीं मेरी आज्ञासे तुम्हारे पास सम्पूर्ण भोग उपस्थित हो जायँगे।" अपने प्रभु भगवान् राम और सीताजीके इस प्रकार कहनेपर महामति हनुमान्जी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ १५-१६ ॥ और फिर नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर उन्हें बारम्बार प्रणाम कर बड़ी कठिनतासे, तपस्या करनेके लिये हिमालयपर चले गये ॥ १७ ॥
तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड़े खड़े हुए गुहके पास जाकर कहा—"मित्र ! अब तुम अपने परम रमणीय ग्राम श्रृंगवेरपुरको जाओ ॥ १८ ॥ वहाँ मेरा ही चिन्तन करते हुए अपने शुभकर्मोंसे प्राप्त हुए भोगों-को भोगो । इसमें सन्देह नहीं, अन्तमें तुम मेरा ही सारूप्य प्राप्त करोगे" ॥ १९ ॥ ऐसा कह भगवान् रामने उसे दिव्य आभूषण, बहुत-सा राज्य और तत्त्व-ज्ञानका उपदेश दिया ॥ २० ॥ फिर श्रीरघुनाथजीसे आलिंगित होकर गुह अपने घरको गया । और भी
३२४ अध्यात्मरामायण [सर्ग १६
| ये चान्ये वानराः श्रेष्ठा अयोध्थां समुपागताः ॥२१॥<br>अमूल्याभरणैर्वस्त्रैः पूजयामास राघवः ।<br>सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे वानराः सविभीषणाः ॥२२॥<br>यथार्हं पूजितास्तेन रामेण परमात्मना ।<br>प्रहृष्टमनसः सर्वे जग्मुरेव यथागतम् ॥२३॥ | जो-जो वानरश्रेष्ठ अयोध्यामें आये थे श्रीरामचन्द्रजीने उन सबका भी अमूल्य वस्त्र और आभूषणोंसे सत्कार किया । इस प्रकार विभीषणके सहित सुग्रीव आदि समस्त वानरगण परमात्मा रामसे यथोचित सत्कार पाकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥२१-२३॥ |
| सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे किष्किन्धां प्रययुर्मुदा ।<br>विभीषणस्तु सम्प्राप्य राज्यं निहतकण्टकम् ॥२४॥<br>रामेण पूजितः प्रीत्या ययौ लङ्कामनिन्दितः ।<br>राघवो राज्यमखिलं शशासाखिलवत्सलः ॥२५॥ | सुग्रीवादि समस्त वानरगण प्रसन्न-चित्तसे किष्किन्धाको गये और भगवान् रामसे सत्कृत हो अनिन्दित विभीषण अपना निष्कण्टक राज्य पाकर प्रीतिपूर्वक लंकाको गये तथा सबके ऊपर दया करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी अपने सम्पूर्ण राज्यका शासन करने लगे ॥२४-२५॥ |
| अनिच्छन्नपि रामेण यौवराज्येऽभिषेचितः ।<br>लक्ष्मणः परया भक्त्या रामसेवापरोऽभवत् ॥२६॥ | भगवान् रामने श्रीलक्ष्मणजीको उनकी इच्छा न होनेपर भी युवराज-पदपर अभिषिक्त किया और वे भी अत्यन्त भक्तिपूर्वक रामजीकी सेवामें रहने लगे ॥२६॥ |
| रामस्तु परमात्माऽपि कर्माध्यक्षोऽपि निर्मलः ।<br>कर्तृत्वदिविहीनोऽपि निर्विकारोऽपि सर्वदा ॥२७॥<br>आनन्देनापि तुष्टः सन् लोकानामुपदेशकॄत् ।<br>अश्वमेधादियज्ञैश्च सर्वैर्विपुलदक्षिणैः ॥२८॥<br>अयजतपरमानन्दो मानुषं वपुराश्रितः ।<br>न पर्यदेवन्विधवा न च व्यालकृतं भयम् ॥२९॥<br>न व्याधिजं भयं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति ।<br>लोके दस्युभयं नासीदनर्थो नास्ति कश्चन ॥३०॥ | परमात्मा रामने समस्त कर्मोंके साक्षी, नित्य निर्मलस्वरूप, कर्तृत्वादिसे रहित, सर्वदा निर्विकार और आनन्दतृप्त होकर भी समस्त लोकोंको उपदेश करनेके लिये मनुष्यरूप धारण कर बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले अश्वमेधादि समस्त यज्ञोंका अनुष्ठान किया । महाराज रामके राज्य-शासन करते समय कभी विधवाओंका क्रन्दन नहीं हुआ; सर्पों, व्याधियों और लुटेरोंका भय नहीं था और न कोई अनर्थ ही होता था ॥२७-३०॥ |
| वृद्धेषु सत्सु बालानां नासीन्मृत्युभयं तथा ।<br>रामपूजापराः सर्वे सर्वे राघवचिन्तकाः ॥३१॥ | वृद्धोंके रहते हुए बालकोंकी मृत्युका भय नहीं था, सब लोग भगवान् रामकी पूजा और उनका स्मरण करने-वाले थे ॥३१॥ |
| ववर्षुर्जलदास्तोयं यथाकालं यथारुचि ।<br>प्रजाः स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विताः ॥३२॥ | मेघ सर्वदा ठीक समयपर यथेष्ट जल बरसाते थे, प्रजा अपना-अपना धर्म पालन करने-वाली और वर्णाश्रमके गुणोंसे युक्त थी ॥३२॥ |
| औरसानिव रामोऽपि जुगोप पितृवत्प्रजाः ।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वधर्मपरायणः ॥३३॥<br>दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यमुपास्त सः ॥३४॥ | तथा श्रीरामचन्द्रजी भी अपनी प्रजाका सगे पुत्रोंके समान पितृवत् पालन करते थे, इस प्रकार सर्वलक्षणसम्पन्न, सर्वधर्मपरायण भगवान् रामने दश सहस्र वर्ष राज्य-शासन किया ॥३३-३४॥ |
| इदं रहस्यं धनधान्यक्राद्धिम-<br>दीर्घायुरारोग्यकरं सुपुण्यदम् ।<br>पवित्रमाध्यात्मिकसंज्ञितं पुरा<br>रामायणं भाषितमादिशम्भुना ॥३५॥ | धन-धान्यादि समस्त वैभव देनेवाले तथा दीर्घायु, आरोग्य और पुण्यकी वृद्धि करनेवाले इस आध्यात्मिक रामायण नामक परम पवित्र और गोपनीय रहस्यको पूर्वकालमें श्रीआदिमहादेवने पार्वतीजीको सुनाया |
| सर्ग १६ ] | युद्धकाण्ड | ३२५ | | :--- | :--- |
| शृणोति भक्त्या मनुजः समाहितो<br>भक्त्या पठेद्वा परितुष्टमानसः।<br>सर्वाः समाप्नोति मनोगताशिषो<br>विमुच्यते पातककोटिभिः क्षणात्॥३६॥<br><br>रामाभिषेकं प्रयतः शृणोति यो<br>धनाभिलाषी लभते महद्धनम्।<br>पुत्राभिलाषी सुतमार्यसम्मतं<br>प्राप्नोति रामायणमादितः पठन् ॥३७॥<br><br>शृणोति योऽध्यात्मिकरामसंहितां<br>प्राप्नोति राजा भुवमृद्धसम्पदम्।<br>शत्रून्विजित्यारिभिरप्रधर्षितो<br>व्यपेतदुःखो विजयी भवेन्नृपः ॥३८॥<br><br>स्त्रियोऽपि शृण्वन्त्यधिरामसंहितां<br>भवन्ति ता जीविसुताश्च पूजिताः।<br>वन्ध्यापि पुत्रं लभते सुरूपिणं<br>कथामिमां भक्तियुता शृणोति या॥३९॥<br><br>श्रद्धान्वितो यः शृणुयात्पठेन्नरो<br>विजित्य कोपं च तथा विमत्सरः।<br>दुर्गाणि सर्वाणि विजित्य निर्भयो<br>भवेत्सुखी राघवभक्तिसंयुतः ॥४०॥<br><br>सुराः समस्ता अपि यान्ति तुष्टतां<br>विघ्नाः समस्ता अपयान्ति शृण्वताम्।<br>अध्यात्मरामायणमादितो नृणां<br>भवन्ति सर्वा अपि सम्पदः पराः ॥४१॥<br><br>रजस्वला वा यदि रामतत्परा<br>शृणोति रामायणमेतदादितः।<br>पुत्रं प्रसूते ऋषभं चिरायुषं<br>पतिव्रता लोकसुपूजिता भवेत् ॥४२॥<br><br>पूजयित्वा तु ये भक्त्या नमस्कुर्वन्ति नित्यशः।<br>सर्वैः पापैर्विनिर्मुक्ता विष्णोर्यान्ति परं पदम्॥४३॥<br><br>अध्यात्मरामचरितं कृत्स्नं शृण्वन्ति भक्तितः।<br>पठन्ति वा स्वयं वक्त्रात्तेषां रामः प्रसीदति ॥४४॥<br><br>राम एव परं ब्रह्म तस्मिंस्तुष्टेऽखिलात्मनि। | था ॥ ३५ ॥ जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक समाहित-चित्तसे सुनता अथवा प्रसन्न-चित्तसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह अपने मनकी समस्त कामनाओंको प्राप्त करता है और एक क्षणमें ही करोड़ों पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३६ ॥ जो धनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष इस रामाभिषेकका एकाग्र-चित्तसे श्रवण करता है वह महान् सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो पुत्राभिलाषी इस ग्रन्थका आरम्भसे ही पाठ करता है वह सत्पुरुषोंद्वारा सम्मान पानेयोग्य पुत्र पाता है ॥ ३७ ॥ जो राजा इस अध्यात्मरामायणका श्रवण करता है वह धन-धान्यसम्पन्न पृथिवी प्राप्त करता है और शत्रुओंसे अपमानित न होकर सब प्रकारके दुःखसे छूटकर विजय लाभ करता है ॥ ३८ ॥ स्त्रियोंमें भी जो कोई इस आध्यात्मिक रामसंहिताको सुनती हैं उनकी सन्तान चिरजीवी होती है और वे स्वयं उनसे सम्मानित होती हैं तथा जो वन्ध्या भी इस कथाका भक्तिपूर्वक श्रवण करती है वह सुन्दर रूपवान् पुत्र प्राप्त करती है ॥३९॥ जो मनुष्य क्रोधको जीतकर ईर्ष्यारहित हो इसे श्रद्धापूर्वक सुनता या पढ़ता है वह समस्त अवगुणोंको जीतकर निर्भय, सुखी और रामभक्तिसे सम्पन्न हो जाता है ॥ ४० ॥ इस अध्यात्मरामायणका आरम्भसे ही श्रवण करनेवाले पुरुषोंसे समस्त देवगण प्रसन्न हो जाते हैं, उनके सम्पूर्ण विघ्न दूर हो जाते हैं और उन्हें सब प्रकारकी उत्तम सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ ४१ ॥ यदि रजस्वला स्त्री भगवान् रामका स्मरण करती हुई आदिसे ही इस रामायणका श्रवण करे तो अति उत्तम और दीर्घायु पुत्र उत्पन्न करती है और वह स्वयं संसारसे सम्मानित पतिव्रता होती है ॥ ४२ ॥ जो लोग इसका भक्तिपूर्वक पूजन कर इसे नित्यप्रति नमस्कार करते हैं वे समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके परम धामको प्राप्त होते हैं ॥ ४३ ॥<br><br>जो पुरुष इस सम्पूर्ण अध्यात्मरामायणको भक्तिपूर्वक सुनते अथवा स्वयं अपने मुखसे ही पढ़ते हैं उनसे भगवान् राम प्रसन्न होते हैं ॥ ४४ ॥ भगवान् राम ही परब्रह्म हैं; अतः उन सर्वात्मा रामके प्रसन्न |
| ३२६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १६ |
|---|
धर्मार्थकाममोक्षाणां यद्यदिच्छति तद्भवेत् ॥४५॥ श्रोतव्यं नियमेनैतद्रामायणमखण्डितम् । आयुष्यमारोग्यकरं कल्पकोट्यघनाशनम् ॥४६॥ देवाश्च सर्वे तुष्यन्ति ग्रहाः सर्वे महर्षयः । रामायणस्य श्रवणे तृप्यन्ति पितरस्तथा ॥४७॥ अध्यात्मरामायणमेतदद्भुतं वैराग्यविज्ञानयुतं पुरातनम् । पठन्ति शृण्वन्ति लिखन्ति ये नरा- स्तेषां भवेऽस्मिन्न पुनर्भवो भवेत् ॥४८॥ आलोड्याखिलवेदराशिमसकृ- द्यत्तारकं ब्रह्म त- द्रामो विष्णुरहस्यमूर्तिरिति यो विज्ञाय भूतेश्वरः । उद्धृत्याखिलसारसङ्ग्रहामदं सङ्क्षेपतः प्रस्फुटं श्रीरामस्य निगूढतत्त्वमखिलं प्राह प्रियायै भवः ॥४९॥ | होनेपर धर्म, अर्थ, काम, मोक्षमेंसे जिसकी इच्छा हो वही मिल सकता है ॥ ४५ ॥ इसलिये आयु और आरोग्यकी देनेवाली तथा करोड़ों कल्पोंके पापसमूहका नाश करनेवाली इस रामायणका निरन्तर नित्यप्रति नियमपूर्वक श्रवण करना चाहिये ॥४६॥ इसका श्रवण करनेसे समस्त देवगण, सम्पूर्ण ग्रह एवं महर्षिगण प्रसन्न हो जाते हैं तथा पितृगण भी तृप्ति लाभ करते हैं ॥४७॥ जो पुरुष ज्ञान-वैराग्यसे युक्त इस अति अद्भुत प्राचीन अध्यात्मरामायणको पढ़ते, लिखते अथवा सुनते हैं उनका इस संसारमें फिर जन्म नहीं होता ॥ ४८ ॥ भूतनाथ भगवान् शंकरने बारम्बार समस्त वेद-राशिका मन्थन करके यह निश्चय किया कि तारक मन्त्र 'राम' विष्णु-भगवान्की गुप्त मूर्ति है । अतः उन्होंने समस्त वेदों-के सार (उपनिषदों) का संग्रहरूप यह भगवान् रामका सम्पूर्ण गुप्त तत्त्व अपनी प्रिया श्रीपार्वतीजीको संक्षेपसे सुनाया ॥ ४९ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
समाप्तमिदं युद्धकाण्डम् ।
उत्तरकाण्ड
श्रीसीतारामभ्यां नमः
अध्यात्मरामायण
उत्तरकाण्ड
यद्रूपराकेशमयूखमालाऽनुरञ्जिता राजरमाऽपि रेजे ।
तं राघवेन्द्रं विबुधेन्द्रवन्द्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥
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क्रीडा-विपिनमें श्रीराम-सीता
लसत केलिवनबीच सिय-सियपिय-जोरी सुभग।
उमगत आनंद-वीचि उर-अम्बुधि छवि-ससि निरखि ॥
उत्तरकाण्ड - सर्ग १: अगस्त्यादि मुनीश्वरोंका आना और रावणादि राक्षसोंका पूर्वचरित्र
ॐ
अध्यात्मरामायण
उत्तरकाण्ड
प्रथम सर्ग
भगवान् रामके यहाँ अगस्त्यादि मुनीश्वरोंका आना और रावणादि राक्षसोंका पूर्वचरित्र सुनाना।
जयति रघुवंशतिलकः कौसल्याहृदयनन्दनो रामः।
दशवदननिधनकारी दाशरथिः पुण्डरीकाक्षः ॥१॥
अनुवाद: श्रीकौसल्याजीके हृदयको आनन्दित करनेवाले, दशवदन रावणको मारनेवाले, रघुवंशतिलक दशरथकुमार कमलनयन भगवान् रामकी जय हो ॥१॥
पार्वत्युवाच
अथ रामः किमकरोत्कौसल्यानन्दवर्धनः ।
हत्वा मृधे रावणादीन् राक्षसान्भीमविक्रमः ॥ २ ॥
अभिषिक्तस्त्वयोध्यायां सीतया सह राघवः ।
मायामानुषतां प्राप्य कति वर्षाणि भूतले ॥ ३ ॥
स्थितवान् लीलया देवः परमात्मा सनातनः ।
अत्यजन्मानुषं लोकं कथमन्ते रघूद्वहः ॥ ४ ॥
एतदाख्याहि भगवन् श्रद्दधत्या मम प्रभो ।
कथापीयूषमास्वाद्य तृष्णा मेऽतीव वर्धते ।
रामचन्द्रस्य भगवन् ब्रूहि विस्तरशः कथाम् ॥ ५ ॥
अनुवाद: श्रीपार्वतीजी बोलीं—कौसल्याजीके आनन्दको बढ़ानेवाले महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें रावणादि राक्षसोंको मारकर अयोध्यापुरीमें सीताजीके सहित राज्याभिषिक्त होनेके अनन्तर कौन-सा कार्य किया ? लीलाहीसे माया-मानव भावको प्राप्त हुए वे सनातन परमात्मा पृथ्वीतलपर कितने वर्ष रहे ? तथा अन्तमें उन रघुनन्दनने इस मर्त्यलोकका किस प्रकार त्याग किया ? ॥२-४॥ हे प्रभो ! मुझ श्रद्धावतीको आप यह सब वृत्तान्त सुनाइये । हे भगवन् ! श्रीरामकथामृतको आस्वादन करनेसे मेरी तृष्णा बहुत ही बढ़ती जाती है, इसलिये आप श्रीरामचन्द्रजीकी कथा विस्तारपूर्वक कहिये ॥५॥
श्रीमहादेव उवाच
राक्षसानां वधं कृत्वा राज्ये रामे उपस्थिते ।
आययुर्मुनयः सर्वे श्रीराममभिवन्दितुम् ॥ ६ ॥
विश्वामित्रोऽसितः कण्वो दुर्वासा भृगुराङ्गिराः ।
कश्यपो वामदेवोऽत्रिस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः॥ ७ ॥
अनुवाद: श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! राक्षसोंका वध करनेके अनन्तर भगवान् रामके राजपदपर विराजमान होनेपर समस्त मुनिजन उनका अभिवादन करनेके लिये आये ॥६॥ उस समय विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि तथा निर्मल स्वभाव सप्तर्षिगण और अपने शिष्यों तथा अन्यान्य मुनिजनोंके सहित अगस्त्यजी आये । उन अगस्त्यजी.
| ३३० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १ |
|---|
अगस्त्यः सहशिष्यैश्च मुनिभिः सहितोऽभ्यगात् ।<br>द्वारमासाद्य रामस्य द्वारपालमथाब्रवीत् ॥ ८ ॥<br>ब्रूहि रामाय मुनयः समागत्य बहिःस्थिताः ।<br>अगस्त्यप्रमुखाः सर्वे आशीर्भिरभिनन्दितुम् ॥ ९ ॥ | ने भगवान् रामके द्वारपर पहुँचकर द्वारपालसे कहा—<br>॥ ७-८॥ तुम महाराज रामसे जाकर कहो कि आपका<br>आशीर्वादोंसे अभिनन्दन करनेके लिये अगस्त्य आदि<br>समस्त मुनिगण आये हैं और बाहर खड़े हुए हैं ॥ ९ ॥ प्रतीहारस्ततो राममगस्त्यवचनाद्द्रुतम् ।<br>नमस्कृत्याऽब्रवीद्वाक्यं विनयावनतः प्रभुम् ॥ १० ॥<br>कृताञ्जलिरुवाचेदमगस्त्यो मुनिभिः सह ।<br>देव त्वद्दर्शनार्थाय प्राप्तो बहिरुपस्थितः ॥ ११ ॥<br>तमुवाच द्वारपालं प्रवेशय यथासुखम् ।<br>पूजिता विविशुर्वेश्म नानारत्नविभूषितम् ॥ १२ ॥<br>दृष्ट्वा रामो मुनीन् शीघ्रं प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः।<br>पाद्यार्घ्यादिभिरापूज्य गां निवेद्य यथाविधि ॥ १३॥<br>नत्वा तेभ्यो ददौ दिव्यान्द्यासनानि यथार्हतः ।<br>उपविष्टाः प्रहृष्टाश्च मुनयो रामपूजिताः ॥ १४ ॥<br>सम्पृष्टकुशलाः सर्वे रामं कुशलमब्रुवन् ।<br>कुशलं ते महाबाहो सर्वत्र रघुनन्दन ॥ १५ ॥<br>दिष्ट्येदानीं प्रपश्यामो हतशत्रुमरिन्दम ।<br>नहि भारः स ते राम रावणो राक्षसेश्वरः ॥ १६ ॥<br>सधनुस्त्वं हि लोकांस्त्रीन् विजेतुं शक्त एव हि ।<br>दिष्ट्या त्वया हताः सर्वे राक्षसा रावणादयः ॥ १७ ॥<br>सह्यमेतन्महाबाहो रावणस्य निबर्हणम् ।<br>असह्यमेतत्सम्प्राप्तं रावणेर्न्निषूदनम् ॥ १८ ॥<br>अन्तकप्रतिमाः सर्वे कुम्भकर्णादयो मृधे ।<br>अन्तकप्रतिमैर्बाणैर्हतास्ते रघूसत्तम ॥ १९ ॥<br>दत्ता चेयं त्वयाऽस्माकं पुरा ह्यभयदक्षिणा ।<br>हंत्वा रक्षोगणान्सङ्ख्ये कृतकृत्योऽद्य जीवसि ॥ २० ॥ | तब द्वारपाल अगस्त्यजीके कहनेसे तुरन्त ही<br>भगवान् रामको नमस्कार कर उनसे अति विनयपूर्वक<br>यों कहने लगा ॥ १० ॥ वह हाथ जोड़कर बोला— "देव !<br>आपके दर्शनोंके लिये मुनियोंके सहित श्रीअगस्त्यजी<br>आये हैं और बाहर खड़े हुए हैं" ॥ ११ ॥ भगवान्<br>रामने द्वारपालसे कहा— "उन्हें आनन्दपूर्वक भीतर<br>ले आओ।" तब मुनियोंने विधिवत् पूजित होकर<br>नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित महलमें प्रवेश किया<br>॥ १२ ॥ भगवान् राम मुनियोंको देखते ही तुरन्त<br>हाथ जोड़कर खड़े हो गये और अर्घ्य-पाद्यादिसे<br>उनका पूजनकर उन्हें विधिपूर्वक एक-एक गौ भेंट की<br>॥ १३ ॥ फिर उन सबको नमस्कार कर यथायोग्य दिव्य<br>आसन दिये। उनपर वे मुनिगण भगवान् रामसे<br>पूजित होकर अति हर्षपूर्वक विराजमान हुए ॥ १४ ॥<br>श्रीरामचन्द्रजीद्वारा कुशल पूछे जानेपर सबने अपनी<br>कुशल कही और उनसे बोले— "हे रघुनन्दन ! हे<br>महाबाहो ! तुम्हारे राज्यमें तो सर्वत्र कुशल है न !<br>॥ १५ ॥ हे शत्रुदमन ! आज हम बड़े भाग्यसे आप-<br>को शत्रुहीन देख रहे हैं। हे राम ! आपके लिये<br>राक्षसराज रावण (का मारना) कुछ भारी नहीं<br>था ॥ १६ ॥ क्योंकि आप धनुष धारण करनेपर तीनों<br>लोकोंको जीतनेमें भी समर्थ हैं । (हमारे) सौभाग्यसे<br>आपने रावण आदि सभी राक्षसोंको मार डाला ॥ १७ ॥<br>और हे महाबाहो ! रावणका मारना तो फिर भी<br>सुगम था परन्तु रावणके पुत्र मेघनादका वध करना<br>तो बड़ा ही दुष्कर कार्य था ॥ १८ ॥ ये कुम्भकर्णादि<br>सभी राक्षस युद्धमें कालके समान थे। हे रघुश्रेष्ठ !<br>वे सब आपके कालके समान कराल बाणोंसे मारे<br>गये ॥ १९ ॥ आपने हमें तो पहले ही अभयदान दे<br>दिया था । अब आप स्वयं भी इन राक्षसोंको युद्धमें<br>मारकर कृतकृत्य हुए जीवित हैं ॥ २० ॥
सर्ग १ ] उत्तरकाण्ड [ ३३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा तु भाषितं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।<br>विस्मयं परमं गत्वा रामः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥२१॥<br><br>रावणादीनतिक्रम्य कुम्भकर्णादिराक्षसान् ।<br>त्रिलोकजयिनो हित्वा किं प्रशंसथ रावणिम् ॥२२॥ | उन आत्मनिष्ठ मुनीश्वरोंका भाषण सुन श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त विस्मित हो उनसे हाथ जोड़कर पूछा ॥ २१॥ “हे मुनिगण ! आपलोग त्रिलोकविजयी रावण और कुम्भकर्णादि राक्षसोंको छोड़कर रावणके पुत्र मेघनादकी ही प्रशंसा क्यों करते हैं ?” ॥२२॥ |
| ततस्तद्वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः ।<br>कुम्भयोनिर्महातेजा रामं प्रीत्या वचोऽब्रवीत् ॥२३॥ | महात्मा रघुनाथजीके ये वचन सुनकर परम तेजस्वी मुनिवर अगस्त्यजीने उनसे अति प्रीतिपूर्वक कहा—॥२३॥ |
| शृणु राम यथा वृत्तं रावणे रावणस्य च ।<br>जन्म कर्म वरप्रदानं सङ्क्षेपाददतो मम ॥२४॥ | “हे राम ! तुम रावण और उसके पुत्रके जन्म, कर्म और वर-प्राप्ति आदिका वृत्तान्त सुनो; मैं उनका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ ॥ २४ ॥ |
| पुरा कृतयुगे राम पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः ।<br>तपस्तप्तुं गतो विद्वान्मेरोः पार्श्वे महामतिः ॥२५॥ | हे राम ! पूर्वकालमें सतयुगमें ब्रह्माके पुत्र महामति विद्वान् पुलस्त्यजी तप करनेके लिये सुमेरु पर्वतपर गये ॥२५॥ |
| तृणबिन्दोराश्रमेऽसौ न्यवसन्मुनिपुङ्गवः ।<br>तपस्तेपे महातेजाः स्वाध्यायनिरतः सदा ॥२६॥ | वे महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ तृणबिन्दुके आश्रममें रहने लगे और वहाँ निरन्तर स्वाध्याय ( प्रणव-जप ) में तत्पर रह तप करने लगे ॥ २६ ॥ |
| तत्राश्रमे महारम्ये देवगन्धर्वकन्यकाः ।<br>गायन्त्यो ननृतुस्तत्र हसन्त्यो वादयन्ति च ॥२७॥<br><br>पुलस्त्यस्य तपोविघ्नं चक्रुः सर्वा अनिन्दिताः ।<br>ततः क्रुद्धो महातेजा व्याजहार वचो महत् ॥२८॥ | उस महा-रमणीय आश्रममें देवता और गन्धर्वोंकी सुन्दरी कन्याएँ गाती, बजाती और हँसती हुई नाचने तथा पुलस्त्यजीके तपमें विघ्न डालने लगीं तब महातेजस्वी पुलस्त्यजी अत्यन्त क्रुद्ध होकर बोले—॥२७-२८॥ |
| या मे दृष्टिपथं गच्छेत्सा गर्भं धारयिष्यति ।<br>ताः सर्वाः शापसंविग्ना न तं देशं प्रचक्रमुः ॥२९॥ | “जिस (देव या गन्धर्व) कन्यापर मेरी दृष्टि पड़ जायगी वही गर्भवती हो जायगी ।” तब उस शापसे भयभीत होकर उनमेंसे कोई भी उस स्थानपर न आयी ॥२९॥ |
| तृणबिन्दोस्तु राजर्षेः कन्या तन्नाशृणोद्वचः ।<br>विचचार मुनेरग्रे निर्भया तं प्रपश्यती ॥३०॥ | किन्तु राजर्षि तृणबिन्दुंकी कन्याने ये वाक्य नहीं सुने; इसलिये वह मुनीश्वरके सामने निर्भयतापूर्वक उन्हें देखती हुई घूमती रही ॥३०॥ |
| बभूव पाण्डुरतनुर्व्यञ्जितान्तःशरीरजा ।<br>दृष्ट्वा सा देहवैवर्ण्यं भीता पितरमन्वगात् ॥३१॥ | इससे वह (गर्भा-वस्थाको प्राप्त होकर) पीली पड़ गयी, तथा उसके स्तन (स्थूल होकर) साफ प्रकट होने लगे। अपने शरीरको विवर्ण हुआ देख वह डरती हुई अपने पिताके पास आयी ॥ ३१ ॥ |
| तृणबिन्दुश्च तां दृष्ट्वा राजर्षिरमितद्युतिः ।<br>ध्यात्वा मुनिकृतं सर्वमवैद्विज्ञानचक्षुषा ॥३२॥ | जब उसे महातेजस्वी राजर्षि तृणबिन्दुने देखा तो उन्होंने ध्यानद्वारा अपनी ज्ञानदृष्टिसे मुनिवर पुलस्त्यका सब कृत्य जान लिया ॥३२॥ |
| तां कन्यां मुनिवर्याय पुलस्त्याय ददौ पिता ।<br>तां प्रगृह्याब्रवीत्कन्यां बाढमित्येव स द्विजः ॥३३॥ | तब पिता तृणबिन्दुने वह कन्या मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यको दी और उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कह उसे स्वीकार कर लिया ॥३३॥ |
| शुश्रूषणपरां दृष्ट्वा मुनिः प्रीतोऽब्रवीद्वचः । | उसे अत्यन्त शुश्रूषापरायण देख मुनिवर पुलस्त्यने उससे प्रसन्न होकर कहा— |
३३६ अध्यात्मरामायणं [ सर्ग १
दास्यामि पुत्रमेकं ते उभयोर्वंशवर्धनम् ॥३४॥
ततः प्रासूत सा पुत्रं पुलस्त्याल्लोकविश्रुतम् । विश्रवा इति विख्यातः पौलस्त्यो ब्रह्मविन्मुनिः ३५ तस्य शीलादिकं दृष्ट्वा भरद्वाजो महामुनिः । भार्यार्थं स्वां दुहितरं ददौ विश्रवसे मुदा ॥३६॥ तस्यां तु पुत्रः सञ्जज्ञे पौलस्त्याल्लोकसम्मतः । पितृतुल्यो वैश्रवणो ब्रह्मणा चानुमोदितः ॥३७॥ ददौ तत्तपसा तुष्टो ब्रह्मा तस्मै वरं शुभम् । मनोऽभिलषितं तस्य धनेशत्वमखण्डितम् ॥३८॥ ततो लब्धवरः सोऽपि पितरं द्रष्टुमागतः । पुष्पकेण धनाध्यक्षो ब्रह्मदत्तेन भास्वता ॥३९॥ नमस्कृत्याथ पितरं निवेद्य तपसः फलम् । प्राह मे भगवान् ब्रह्मा दत्त्वा वरमनिन्दितम् ॥४०॥ निवासाय न मे स्थानं दत्तवान्परमेश्वरः । ब्रूहि मे नियतं स्थानं हिंसा यत्र न कस्यचित् ॥४१॥ विश्रवा अपि तं प्राह लङ्कानाम पुरी शुभा । राक्षसानां निवासाय निर्मिता विश्वकर्मणा ॥४२॥ त्यक्त्वा विष्णुभयाद्दैत्या विविशुस्ते रसातलम् । सा पुरी दुष्प्रधर्षान्यैर्मध्ये सागरमास्थिता ॥४३॥ तत्र वासाय गच्छ त्वं नान्यैः साऽधिष्ठिता पुरा । पित्रादिष्टस्त्वसौ गत्वा तां पुरीं धनदोऽविशत् ॥४४॥ स तत्र सुचिरं कालमुवास पितृसम्मतः ।
कस्यचित्त्वथ कालस्य सुमाली नाम राक्षसः ॥४५॥ रसातलान्मर्त्यलोकं चचार पिशिताशनः । गृहीत्वा तनयां कन्यां साक्षाद्देवीमिव श्रियम् ॥४६॥ अपश्यद्धनदं देवं चरन्तं पुष्पकेण सः ।
"मैं तुझे दोनों वंशों (मातृपक्ष और पितृपक्ष) को बढ़ानेवाला एक पुत्र दूँगा" ॥३४॥
तब उस कन्याने पुलस्त्यजीद्वारा एक त्रिलोक- विख्यात पुत्रको जन्म दिया, जो पुलस्त्य-पुत्र ब्रह्म- वेत्ता मुनिवर विश्रवाके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३५ । विश्रवाका शील-स्वभावादि देखकर महामुनि भरद्वाजने प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी ॥ ३६ ॥ उससे पुलस्त्यनन्दन विश्रवाने एक त्रिलोकमें प्रतिष्ठित पुत्र उत्पन्न किया । वह विश्रवाका पुत्र अपने पिता- हीके समान था तथा ब्रह्माजीने भी उसकी प्रशंसा की थी ॥ ३७ ॥ उसके तपसे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने उसे मनोवाञ्छित श्रेष्ठ वर देकर अखण्डित धनेश्वरता दी ॥ ३८ ॥ ब्रह्माजीके वरदानसे धनाध्यक्ष होकर वह उन्हींके दिये हुए महातेजस्वी पुष्पक विमानपर चढ़कर अपने पितासे मिलनेके लिये आया ॥ ३९ ॥ और उन्हें अपने तपका फल निवेदन कर प्रणाम करके बोला— "भगवान् ब्रह्माजीने मुझे यह अत्युत्तम वर दिया है ॥ ४० ॥ किन्तु उन परमेश्वरने मुझे रहनेके लिये कोई स्थान नहीं दिया । अतः आप मुझे कोई ऐसा निश्चित स्थान बताइये जहाँ रहनेसे किसीकी हिंसा न हो" ॥ ४१ ॥ तब विश्रवाने उससे कहा— "(दानवोंके) विश्वकर्माने लंका नामकी एक सुन्दर पुरी राक्षसोंके रहनेके लिये बनायी है ॥ ४२ ॥ किन्तु दैत्य- लोग विष्णुभगवान्के भयसे उसे छोड़कर रसातलको चले गये हैं। उस पुरीका किसी शत्रुसे आक्रान्त होना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि वह समुद्रके बीचमें बसी हुई है ॥ ४३ ॥ तुम वहीं रहनेके लिये जाओ । उस पुरीपर इससे पहले और किसीका अधिकार नहीं हुआ।" तब धनपति कुबेरने पिताकी आज्ञासे जाकर उस पुरीमें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥ वहाँ अपने पिताकी सम्मतिसे उन्होंने बहुत समयतक निवास किया ।
किसी समय सुमाली नामक एक मांस-भोजी राक्षस साक्षात् लक्ष्मीदेवीके समान रूपवती अपनी छोटी पुत्री- को साथ लिये रसातलसे आकर मर्त्यलोकमें घूम रहा था ॥ ४५-४६ ॥ उसने भगवान् कुबेरको पुष्पक विमान- पर चढ़कर विचरते देखा । तब महामति सुमाली
सर्ग ९] उत्तरकाण्ड ३३३
| हिताय चिन्तयामास राक्षसानां महामनाः ॥४७॥<br>उवाच तनयां तत्र कैकसीं नाम नामतः ।<br>वत्से विवाहकालस्ते यौवनं चातिवर्तते ॥४८॥<br>प्रत्याख्यानाच्च भीतैस्त्वं न वरैर्गृह्यसे शुभे ।<br>सा त्वं वरय भद्रं ते मुनिं ब्रह्मकुलोद्भवम् ॥४९॥<br>स्वयमेव ततः पुत्रा भविष्यन्ति महाबलाः ।<br>ईदृशाः सर्वशोभाढ्या धनदेन समाः शुभे ॥५०॥<br>तथेति साऽऽश्रमं गत्वा मुनेरग्रे व्यवस्थिता ।<br>लिखन्ती भुवमग्रेण पादेनाधोमुखी स्थिता ॥५१॥<br>तामपृच्छन्मुनिः का त्वं कन्याऽसि वरवर्णिनि ।<br>साऽब्रवीत्प्राञ्जलिर्ब्रह्मन् ध्यानेन ज्ञातुमर्हसि ॥५२॥<br>ततो ध्यात्वा मुनिः सर्वं ज्ञात्वा तां प्रत्यभाषत ।<br>ज्ञातं तवाभिलषितं मत्तः पुत्रानभीप्स्यसि ॥५३॥<br>दारुणायां तु वेलायामागतासि सुमध्यमे ।<br>अतस्ते दारुणौ पुत्रौ राक्षसौ सम्भविष्यतः ॥५४॥<br>साऽब्रवीन्मुनिशार्दूल त्वत्तोऽप्येवंविधौ सुतौ ।<br>तामाह पश्चिमो यस्ते भविष्यति महामतिः ॥५५॥<br>महाभागवतः श्रीमान् रामभक्त्यैकतत्परः ।<br>इत्युक्ता सा तथा काले सुषुवे दशकन्धरम् ॥५६॥<br>रावणं विंशतिभुजं दशशीर्षं सुदारुणम् ।<br>तद्रक्षोजातमात्रेण चचाल च वसुन्धरा ॥५७॥<br>बभूवुर्नाशहेतूनि निमित्तान्यखिलान्यपि ।<br>कुम्भकर्णस्ततो जातो महापर्वतसन्निभः ॥५८॥<br>ततः शूर्पणखा नाम जाता रावणसोदरी ।<br>ततो विभीषणो जातः शान्तात्मा सौम्यदर्शनः॥५९॥<br>स्वाध्यायी नियताहारो नित्यकर्मपरायणः ।<br>कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा द्विजान् सन्तुष्टचेतसः ॥६०॥ | राक्षसोंके हितका उपाय सोचने लगा ॥ ४७ ॥ वह कैकसी नामवाली अपनी कन्यासे बोला—"बेटी ! तेरे विवाहका समय और यौवनकाल बीता जा रहा है॥ ४८॥ किन्तु हे सुन्दरि ! 'तू छोड़ देगी' इस भयसे तुझे कोई वर वरण नहीं करता । अतः तेरा कल्याण हो, तू स्वयं ही जाकर ब्रह्माजीके वंशमें उत्पन्न हुए मुनिवर विश्रवाको वरण कर । हे शुभे ! उनसे तेरे इस कुबेरके समान सर्वशोभासम्पन्न महाबलवान् पुत्र उत्पन्न होंगे ॥ ४९-५० ॥<br><br>तब वह 'बहुत अच्छा' कह मुनीश्वरके आश्रमपर जाकर खड़ी हो गयी और नीचेको मुख किये चरणनखसे पृथिवी कुरेदने लगी ॥ ५१ ॥ मुनीश्वरने उससे पूछा—"हे सुन्दरवर्णवाली ! तू कौन और किसकी कन्या है ? (तथा किसलिये यहाँ आयी है?)" कैकसीने हाथ जोड़कर कहा—"ब्रह्मन् ! आप ध्यानद्वारा सभी कुछ जान सकते हैं" ॥ ५२ ॥ तब मुनिवरने ध्यानद्वारा सब बात जानकर उससे कहा—"मैं तेरी अभिलाषा जान गया, तू मुझसे पुत्रोंकी इच्छा करती है ॥ ५३ ॥ किन्तु, हे सुन्दरि ! तू इस दारुण समयमें आयी है इसलिये तेरे पुत्र भी दो महाभयंकर राक्षस होंगे" ॥ ५४ ॥ उसने कहा—"हे मुनिश्रेष्ठ ! क्या आपके द्वारा भी ऐसे पुत्र होने चाहिये ? तब मुनीश्वरने उससे कहा—"उनके पश्चात् तेरे जो पुत्र होगा वह महाबुद्धिमान्, परम भगवद्भक्त, श्रीसम्पन्न और एकमात्र रामभक्तिमें ही तत्पर होगा।"<br><br>मुनीश्वरके ऐसा कहनेपर उसने यथासमय दश शिर और बीस भुजाओंवाले अति भयंकर रावणको जन्म दिया । उस राक्षसके जन्म लेते ही पृथिवी काँपने लगी ॥ ५५–५७ ॥ और संसारके नाशके समस्त कारण उपस्थित हो गये । उसके पश्चात् महापर्वतके समान बड़े डील-डौलवाला कुम्भकर्ण उत्पन्न हुआ ॥ ५८ ॥ फिर रावणकी बहिन शूर्पणखाका जन्म हुआ और उसके पीछे अति शान्तचित्त सौम्यमूर्ति विभीषण उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त स्वाध्यायशील मिताहारी और नित्यकर्मपरायण था । अत्यन्त दारुण दुष्टात्मा कुम्भकर्ण सन्तुष्टचित्त ब्राह्मण और ऋषियोंके समूहोंको |
| ३३४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
|---|
भक्षयन्नृपिसङ्घांश्च विचचारातिदारुणः।
रावणोऽपि महासत्त्वो लोकानां भयदायकः।
ववृधे लोकनाशाय ह्यादयो देहिनामिव ॥६१॥
राम त्वं सकलान्तरस्थमभितो जानासि विज्ञानदृक्
साक्षी सर्वहृदि स्थितो हि परमो नित्योदितो निर्मलः।
त्वं लीलामनुजाकृतिः स्वमहिमन् मायागुणैर्नज्यसे
लीलार्थं प्रतिचोदितोऽद्य भवता वक्ष्यामि रक्षोद्भवम् ॥६२॥
जानामि केवलमनन्तमचिन्त्यशक्तिं
चिन्मात्रमक्षरमजं विदितात्मतत्त्वम्।
त्वां राम गूढनिजरूपमनुप्रवृत्तो
मूढोऽप्यहं भवदनुग्रहतश्चरामि ॥६३॥
एवं वदन्तमिनवंशपवित्रकीर्तिः
कुम्भोद्भवं रघुपतिः प्रहसन्नभाषे।
मायाश्रितं सकलमेतदनन्यकत्वा-
न्मत्कीर्तनं जगति पापहरं निबोध ॥६४॥
भक्षण करता हुआ पृथिवीपर घूमने लगा। तथा सम्पूर्ण लोकोंको भयभीत करनेवाला महाबली रावण भी प्राणियोंका नाश करनेवाले रोगके समान त्रिलोकीको नष्ट करनेके लिये बढ़ने लगा ॥५९--६१॥
हे राम ! आप सबके अन्तःकरणोंमें विराजमान हैं और साक्षीरूपसे अपनी ज्ञानदृष्टिद्वारा सबके हृदयस्थित विचारोंको भली भाँति जानते हैं। आप परम श्रेष्ठ, नित्य-प्रबुद्ध और निर्मल हैं। हे अपनी महिमामें स्थित रहनेवाले परमेश्वर ! आपने लीलासे ही यह मनुष्यरूप धारण किया है, किन्तु आप मायाके गुणोंसे लिप्त नहीं होते। आपने लीलावश मुझसे पूछा है, इसीलिये मैं यह राक्षसोंका जन्मवृत्तान्त सुना रहा हूँ ॥ ६२ ॥ हे राम! मैं आपको एकमात्र, अनन्त, अचिन्त्यशक्ति, चिन्मात्र, अक्षर, अजन्मा और आत्मबोधस्वरूप जानता हूँ तथा (मायाके द्वारा) अपने स्वरूपको गुप्त रखनेवाले आपमें (भजनद्वारा) परायण हो मैं मूढ़ भी आपकी कृपासे स्वच्छन्द विचरता रहता हूँ ॥ ६३ ॥ अगस्त्यजीके इस प्रकार कहनेपर सूर्यवंशके सुयशस्वरूप श्रीरघुनाथजीने अगस्त्यजीसे हँसकर कहा—"यह सम्पूर्ण संसार मायामय है, क्योंकि वास्तवमें यह मुझसे पृथक् नहीं है; हे मुने ! तुम मेरे गुण-कीर्तनको ही इस संसारमें सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला जानो ॥ ६४ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे प्रथमः सर्गः॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
राक्षसोंके राज्यस्थापनका विवरण।
श्रीमहादेव उवाच
श्रीरामवचनं श्रुत्वा परमानन्दनिर्भरः।
मुनिः प्रोवाच सदसि सर्वेषां तत्र शृण्वताम् ॥ १ ॥
अथ वित्तेश्वरो देवस्तत्र कालेन केनचित्।
आययौ पुष्पकारूढः पितरं द्रष्टुमञ्जसा ॥ २ ॥
दृष्ट्वा तं कैकसी तत्र आजमानं महौजसम्।
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! रघुनाथजीके ये वचन सुनकर अगस्त्य मुनि अत्यन्त आनन्दसे भर गये और उस सभामें सबके सुनते हुए फिर कहने लगे—॥ १ ॥ "हे राम! किसी समय धनपति कुबेरजी अकस्मात् अपने पितासे मिलनेके लिये पुष्पक विमानपर चढ़कर आये ॥ २ ॥ जब राक्षसी कैकसीने महातेजस्वी कुबेरको पिताके पास विराजमान देखा तो
सर्ग २ ] उत्तरकाण्ड ३३५
| राक्षसी पुत्रसामीप्यं गत्वा रावणमब्रवीत् ॥ ३ ॥ | वह अपने पुत्र रावणके पास जाकर बोली—॥ ३ ॥ |
| पुत्र पश्य धनाध्यक्षं ज्वलन्तं स्वेन तेजसा । | "बेटा ! अपने तेजसे प्रकाशमान इस धनपतिको देखो |
| त्वमप्येवं यथा भूयास्तथा यत्नं कुरु प्रभो ॥ ४ ॥ | और हे समर्थ ! तुम भी वही प्रयत्न करो जिससे ऐसे हो जाओ" ॥४॥ यह सुनकर रावणने तुरन्त ही बड़े रोषसे |
| तच्छ्रुत्वा रावणो रोषात् प्रतिज्ञामकरोद्द्रुतम् । | प्रतिज्ञा की—"हे शुभव्रतवाली ! तुम खेद न करो, |
| धनेन समो वाऽपि ह्यधिको वाऽचिरेण तु ॥ ५ ॥ | देखो, मातः ! मैं शीघ्र ही कुबेरके समान अथवा इससे भी अधिक ऐश्वर्यशाली हो जाऊँगा।" |
| भविष्याम्यम्ब मां पश्य सन्तापं त्यज सुव्रते । | |
| इत्युक्त्वा दुष्करं कर्तुं तपः स दशकन्धरः ॥ ६ ॥ | ऐसा कह भाइयोंके सहित रावण इच्छित फल-प्राप्तिके लिये गोकर्ण-क्षेत्रमें दुष्कर तपस्या करने चला |
| अगमत्फलसिद्धयर्थं गोकर्णं तु सहानुजः । | गया । वहाँ वे तीनों भाई अपने-अपने व्रतमें दृढ़ रहकर |
| स्वं स्वं नियममास्थाय भ्रातरस्ते तपो महत् ॥ ७ ॥ | समस्त लोकोंको तपानेवाला अति महान् तप करने |
| आस्थिता दुष्करं घोरं सर्वलोकैकतापनम् । | लगे । उनमेंसे कुम्भकर्णने दश हजार वर्ष तप किया |
| दशवर्षसहस्राणि कुम्भकर्णोऽकरोत्कषः ॥ ८ ॥ | ॥ ५–८ ॥ सत्यधर्मपरायण धर्मात्मा विभीषण भी |
| बिभीषणोऽपि धर्मात्मा सत्यधर्मपरायणः । | पाँच हजार वर्षतक एक ही पाँवसे खड़े रहे ॥ ९ ॥ |
| पञ्चवर्षसहस्राणि पादेनैकेन तस्थिवान् ॥ ९ ॥ | रावण एक हजार दिव्य वर्षतक निराहार रहा, फिर |
| दिव्यवर्षसहस्रं तु निराहारो दशाननः । | सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर उसने अपना एक मस्तक अग्नि-में हवन कर दिया। इसी प्रकार उसे नौ हजार दिव्य वर्ष- |
| पूर्णे वर्षसहस्रे तु शीर्षमग्नौ जुहाव सः । | बीत गये ॥ १० ॥ जब दश हजार वर्ष बीतनेको हुए |
| एवं वर्षसहस्राणि नव तस्यातिचक्रमुः ॥१०॥ | और जिस समय रावण अपना दशवाँ शिर भी |
| अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिरः । | काटनेको उद्यत हुआ तो धर्मात्मा ब्रह्माजी प्रकट हुए |
| छेत्तुकामस्य धर्मात्मा प्रादुश्चाथ प्रजापतिः । | और बोले—"बेटा रावण ! मैं प्रसन्न हूँ ॥ ११ ॥ तू |
| वत्स वत्स दशग्रीव प्रीतोऽस्मीत्यभ्यभाषत ॥११॥ | वर माँग, मैं तेरी जो इच्छा होगी वही पूर्ण करूँगा।" |
| वरं वरय दास्यामि यत्ते मनसि काङ्क्षितम् । | यह सुन रावणने अति प्रसन्न होकर कहा—॥१२॥ "हे |
| दशग्रीवोऽपि तच्छ्रुत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥१२॥ | ईश्वर ! यदि आप मुझे वर ही देना चाहते हैं तो मैं अमरता |
| अमरत्वं वृणोमीश वरदो यदि मे भवान् । | माँगता हूँ । मैं गरुड, सर्प, यक्ष, देव और दानव आदि किसीसे भी न मारा जा सकूँ । ( बस, मैं यही वर |
| सुपर्णनागयक्षाणां देवतानां तथाऽसुरैः । | माँगता हूँ ) बेचारे मनुष्य तो तिनकोंके समान हैं— |
| अवध्यत्वं तु मे देहि तृणभूता हि मानुषाः ॥१३॥ | ( उनसे मुझे भय नहीं है) ॥ १३ ॥ तब ब्रह्माजीने 'ऐसा ही हो' यह कहकर रावणसे फिर कहा—"हे |
| तथास्त्विति प्रजाध्यक्षः पुनराह दशाननम् । | असुरश्रेष्ठ ! तुमने अपने जो शिर अग्निमें होम दिये |
| अग्नौ हुतानि शीर्षाणि यानि तेऽसुरपुङ्गव ॥१४॥ | हैं वे पहलेके समान फिर हो जायँगे तथा हे साधुश्रेष्ठ ! |
| भविष्यन्ति यथापूर्वंमक्षयाणि च सत्तम ॥१५॥ | उनका कभी नाश न होगा" ॥ १४-१५ ॥ |
| एवमुक्त्वा ततो राम दशग्रीवं प्रजापतिः । | हे राम ! रावणसे इस प्रकार कह फिर भक्तवत्सल |
| विभीषणमुवाचेदं प्रणतं भक्तवत्सलः ॥१६॥ | ब्रह्माजीने अति विनीत विभीषणसे कहा—॥ १६ ॥ |
| ३३६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| विभीषण त्वया वत्स कृतं धर्मार्थमुत्तमम् ।<br>तपस्ततो वरं वत्स वृणीष्वाभिमतं हितम् ॥१७॥<br>विभीषणोऽपि तं नत्वा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।<br>देव मे सर्वदा बुद्धिर्धर्मे तिष्ठतु शाश्वती ।<br>मा रोचयत्वधर्मे मे बुद्धिः सर्वत्र सर्वदा ॥१८॥<br>ततः प्रजापतिः प्रीतो विभीषणमथाब्रवीत् ।<br>वत्स त्वं धर्मशीलोऽसि तथैव च भविष्यसि॥१९॥<br>अयाचितोऽपि ते दास्ये ह्यमरत्वं विभीषण ।<br>कुम्भकर्णमथोवाच वरं वरय सुव्रत ॥२०॥<br>वाण्या व्याप्त्तोऽथ तं प्राह कुम्भकर्णः पितामहम् ।<br>स्वप्स्यामि देव षण्मासान्दिनमेकं तु भोजनम्॥२१॥<br>एवमस्त्विति तं प्राह ब्रह्मा दृष्ट्वा दिवौकसः ।<br>सरस्वती च तद्वक्त्रान्निर्गता प्रययौ दिवम् ॥२२॥<br>कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा चिन्तयामास दुःखितः ।<br>अनभिप्रेतमेवास्यात्किं निर्गतमहो विधिः ॥२३॥ | "वत्स विभीषण ! तुमने यह श्रेष्ठ तप धर्मसम्पादनके लिये किया है, इसलिये बेटा ! तुम्हें जो हितकर वर अभीष्ट हो माँगो" ॥ १७ ॥ तब विभीषणने उन्हें नमस्कार कर उनसे हाथ जोड़कर कहा—"भगवन् ! मेरी बुद्धि सर्वदा निश्चलरूपसे धर्ममें ही रहे, उसकी कभी किसी अवस्थामें भी अधर्ममें रुचि न हो" ॥ १८ ॥ इसपर ब्रह्माजीने अति प्रसन्न होकर विभीषणसे कहा—"बेटा ! तुम बड़े धर्मनिष्ठ हो, तुम जैसा चाहते हो वैसा ही होगा ॥ १९ ॥ हे विभीषण ! यद्यपि तुमने माँगा नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें अमरत्वका वर और देता हूँ।" तदनन्तर वे कुम्भकर्णसे बोले—"हे सुव्रत ! तुम वर माँगो" ॥ २० ॥ तब कुम्भकर्णने (देवताओंकी प्रेरणासे फैलायी हुई ) सरस्वती देवीकी मायासे मोहित होकर ब्रह्माजीसे कहा—"हे देव ! मैं छः महीने सोऊँ और एक दिन भोजन करूँ" ॥ २१ ॥ ब्रह्माजीने उससे, देवताओंकी ओर देखते हुए कहा—" ऐसा ही हो।" उनके ऐसा कहते ही सरस्वती तुरन्त ही उसके मुखसे निकलकर स्वर्गलोकको चली गयीं ॥ २२ ॥ तब दुष्टचित्त कुम्भकर्णने मन-ही-मन दुःखित होकर सोचा—"अहो ! भाग्यका चक्र तो देखो, जिसकी मुझे इच्छा ही नहीं है ऐसी बात मेरे मुखसे क्यों निकल गयी ?" ॥ २३ ॥ |
| सुमाली वरलब्धांस्तान् ज्ञात्वा पौत्रान् निशाचरान्<br>पातालान्निर्भयः प्रायात् प्रहस्तादिभिरन्वितः॥२४॥<br>दशग्रीवं परिष्वज्य वचनं चेदमब्रवीत् ।<br>दिष्ट्या ते पुत्र संवृत्तो वाञ्छितो मे मनोरथः॥२५॥<br>यद्भयाच्च वयं लङ्कां त्यक्त्वा याता रसातलम् ।<br>तद्गतं नो महाबाहो महद्विष्णुकृतं भयम् ॥२६॥<br>अस्माभिः पूर्वमुषिता लङ्केयं धनदेन ते ।<br>भ्रात्राऽऽक्रान्तामिदानीं त्वं प्रत्यानेतुमिहार्हसि २७<br>साम्ना वाऽथ बलेनापि राज्ञां बन्धुः कुतः सुहृत् । | अपने नाती तीनों राक्षसोंको वर मिलनेका समाचार सुनकर सुमाली प्रहस्तादि राक्षसोंको साथ लिये निर्भयतापूर्वक पातालसे आया ॥ २४ ॥ और रावणको हृदयसे लगाकर बोला—"बेटा ! बड़े आनन्दकी बात है कि आज मेरा चाहा हुआ तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया ॥ २५ ॥ जिसके भयसे हम लंकापुरीको छोड़कर पाताललोकको चले गये थे हे महाबाहो ! आज हमारा वह विष्णुका भय जाता रहा ॥ २६ ॥ इस लंकापुरीमें, जो अब तुम्हारे भाई कुबेरके अधिकारमें है पहले हम रहा करते थे। अब तुम्हें इसे सामनीतिसे अथवा बलपूर्वक फिर लौटा लेना चाहिये, (बन्धुत्वका विचार न करना चाहिये) क्योंकि राजाओंके बन्धु उनके कब हितकारी हुए हैं ? |
उत्तरकाण्ड - सर्ग २: राक्षसोंके राज्यस्थापनका विवरण
सर्ग २] उत्तरकाण्ड ३३७
इत्युक्तो रावणः प्राह नार्हस्येवं प्रभाषितुम् ॥ २८ ॥
वित्तेशो गुरुरस्माकमेवं श्रुत्वा तमब्रवीत् ।
प्रहस्तः प्रश्रितं वाक्यं रावणं दशकन्धरम् ॥ २९ ॥
शृणु रावण यत्नेन नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ।
नाधीता राजधर्मास्ते नीतिशास्त्रं तथैव च ॥ ३० ॥
शूराणां नहि सौभ्रात्रं शृणु मे वदतः प्रभो ।
कश्यपस्य सुता देवा राक्षसाश्च महाबलाः ॥ ३१ ॥
परस्परमयुध्यन्त त्यक्त्वा सौहृदमायुधैः ।
नैवेदानीन्तनं राजन् वैरं देवैरनुष्ठितम् ॥ ३२ ॥
सुमालीके ऐसा कहनेपर रावणने कहा—"आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥ धनपति कुबेर हमारे बड़े हैं।" यह सुनकर प्रहस्तने रावणसे अति नम्रतापूर्वक कहा—॥ २९ ॥ "हे रावण ! मैं जो कुछ कहता हूँ सावधान होकर सुनो । तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। अभी तुमने राजधर्म और नीतिशास्त्रका अध्ययन नहीं किया है ॥ ३० ॥ शूरवीरोंमें भ्रातृत्व नहीं हुआ करता । हे समर्थ ! इस विषयमें मैं जो कुछ निवेदन करता हूँ सुनिये । महर्षि कश्यपजीकी सन्तान देवता और राक्षस बड़े शूरवीर थे ॥ ३१ ॥ इसलिये वे बन्धुत्वको तिलाञ्जलि देकर परस्पर अस्त्र-शस्त्रोंसे लड़ने लगे । हे राजन् ! देवताओंके साथ हमारा वैर कुछ हालहीका नहीं है ( यह तो आरम्भसे ही चला आता है )" ॥ ३२ ॥
प्रहस्तस्य वचः श्रुत्वा दशग्रीवो दुरात्मनः ।
तथेति क्रोधताम्राक्षस्त्रिकूटाचलमन्वगात् ॥ ३३ ॥
दूतं प्रहस्तं सम्प्रेष्य निष्कास्य धनदेश्वरम् ।
लङ्कामाक्रम्य सचिवै राक्षसैः सुखमास्थितः ॥ ३४ ॥
धनदः पितृवाक्येन त्यक्त्वा लङ्कां महायशाः ।
गत्वा कैलासशिखरं तपसाऽतोषयच्छिवम् ॥ ३५ ॥
तेन सख्यमनुप्राप्य तेनैव परिपालितः ।
अलकां नगरीं तत्र निर्ममे विश्वकर्मणा ॥ ३६ ॥
दिक्पालत्वं चकारात्र शिवेन परिपालितः ।
दुरात्मा प्रहस्तके ये वचन सुनकर रावणने कहा—'तो ठीक है।' उस समय उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह तुरन्त ही त्रिकूट पर्वतपर पहुँचा ॥ ३३ ॥ उसने प्रहस्तको अपना दूत बनाकर भेजा और कुबेरको लंकापुरीसे निकालकर उसपर अपना अधिकार किया तथा अपने राक्षस-मन्त्रियोंके सहित वहाँ सुखपूर्वक रहने लगा ॥ ३४ ॥ महायशस्वी कुबेरने लंकापुरीको छोड़कर पिताके कहनेसे कैलास-पर्वतपर जाकर तपस्याद्वारा श्रीमहादेवजीको प्रसन्न किया ॥ ३५ ॥ तथा उनसे मित्रता स्थापित कर उन्हींसे सुरक्षित हो वहाँ विश्वकर्मासे अलका नामकी नगरी बनवायी ॥ ३६ ॥ वहाँ वे भगवान् शंकरकी रक्षामें रहकर दिक्पालत्व ( एक दिशाका अधिकार ) भोगने लगे ।
रावणो राक्षसैः सार्धमभिषिक्तः सहानुजैः ॥ ३७ ॥
राज्यं चकारासुराणां त्रिलोकीं बाधयन्खलः ।
भगिनीं कालखञ्जाय ददौ विकटरूपिणीम् ॥ ३८ ॥
विद्युज्जिह्वाय नाम्नासौ महामायी निशाचरः ।
ततो मयो विश्वकर्मा राक्षसानां दितेः सुतः ॥ ३९ ॥
सुतां मन्दोदरीं नाम्ना ददौ लोकैकसुन्दरीम् ।
इधर, महादुष्ट रावण राक्षसोंसे अभिषिक्त हो अपने भाइयोंके सहित तीनों लोकोंको कष्ट देता हुआ राक्षसोंका राज्य करने लगा । उस महामायावी राक्षसने अपनी विकरालबदना बहिन कालखञ्जके वंशमें उत्पन्न हुए विद्युज्जिह्व नामक राक्षसको विवाह दी। इसी समय, राक्षसोंके विश्वकर्मा दितिपुत्र मयने अपनी त्रिलोकसुन्दरी कन्या मन्दोदरी रावणको दी, और फिर उसे प्रसन्न-चित्तसे एक अमोघ
४३
| .३३८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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रावणाय पुनः शक्तिममोघां प्रीतमानसः ॥४०॥
वैरोचनस्य दौहित्रीं वृत्रज्वालेति विश्रुताम् ।
स्वयन्दत्तामुद्वहत्कुम्भकर्णाय रावणः ॥४१॥
गन्धर्वराजस्य सुतां शैलूषस्य महात्मनः ।
विभीषणस्य भार्यार्थे धर्मज्ञां समुदवहत् ॥४२॥
सरमां नाम सुभगां सर्वलक्षणसंयुताम् ।
ततो मन्दोदरी पुत्रं मेघनादमजीजनत् ॥४३॥
जातमात्रस्तु यो नादं मेघवत्समुमोच ह ।
ततः सर्वेऽब्रुवन्मेघनादोऽयमिति चासकृत् ॥४४॥
कुम्भकर्णस्ततः प्राह निद्रा मां बाधते प्रभो ।
ततश्च कारयामास गुहां दीर्घा सुविस्तराम् ॥४५॥
तत्र सुष्वाप मूढात्मा कुम्भकर्णो विघूर्णितः ।
निद्रिते कुम्भकर्णे तु रावणो लोकरावणः ॥४६॥
ब्राह्मणान् ऋषिमुख्यांश्च देवदानवकिन्नरान् ।
देवश्रियो मनुष्यांश्च निजघ्ने समहोरगान् ॥४७॥
धनदोऽपि ततः श्रुत्वा रावणस्याक्रमं प्रभुः ।
अधर्मं मा कुरुष्वेति दूतवाक्यैर्न्यवारयत् ॥४८॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो जगाम धनदालयम् ।
विनिर्जित्य धनाध्यक्षं जहारोत्तमपुष्पकम् ॥४९॥
ततो यमं च वरुणं निर्जित्य समरेऽसुरः ।
स्वर्गलोकमगात्तूर्णं देवराजजिघांसया ॥५०॥
ततोऽभवन्महद्युद्धमिन्द्रेण सह दैवतैः ।
ततो रावणमभ्येत्य बबन्ध त्रिदशेश्वरः ॥५१॥
तच्छ्रुत्वा सहसाऽऽगत्य मेघनादः प्रतापवान् ।
कृत्वा घोरं महद्युद्धं जित्वा त्रिदशपुङ्गवान् ॥५२॥
इन्द्रं गृहीत्वा बद्ध्वाऽसौ मेघनादो महाबलः ।
मोचयित्वा तु पितरं गृहीत्वेन्द्रं ययौ पुरम् ॥५३॥
ब्रह्मा तु मोचयामास देवेन्द्रं मेघनादतः ।
दत्त्वा वरान्वहूस्तस्मै ब्रह्मा स्वभवनं ययौ ॥५४॥ | शक्ति भी दी ॥ ३७-४० ॥ तदनन्तर रावणने, स्वयं लाकर दी हुई वैरोचनकी धेवती वृत्रज्वालाके साथ कुम्भकर्णका विवाह किया ॥ ४१ ॥ तथा गन्धर्वराज महात्मा शैलूषकी पुत्री सरमाको, जो अति सुन्दरी सर्व-सुलक्षणसम्पन्ना और सुसन्न धर्मको जाननेवाली थी, उसने पत्नीरूपसे विभीषणको विवाह दिया । तत्पश्चात् मन्दोदरीने मेघनाद नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥४२-४३॥ जिसने उत्पन्न होते ही मेघके समान शब्द किया । इसलिये सबने बारम्बार यही कहा कि 'यह मेघनाद है' ॥ ४४ ॥ तदनन्तर कुम्भकर्ण बोला— "प्रभो ! मुझे निद्रा सता रही है !" (उसके सुख-पूर्वक सोनेयोग्य कोई स्थान नहीं था इसलिये) फिर उसने एक बड़ी लम्बी-चौड़ी गुहा बनवायी ॥४५॥ वहाँ मन्दमति कुम्भकर्ण खुर्राटे लेता हुआ सो गया । कुम्भकर्णके सो जानेपर सकल लोकोंको रुलानेवाले रावणने ब्राह्मण, मुख्य-मुख्य ऋषि, देवता, दानव, किन्नर, सर्प और मनुष्य सभीको मारा तथा देवताओंकी सम्पत्ति नष्ट कर दी ॥ ४६-४७ ॥<br><br>भगवान् कुबेरने जब रावणकी उच्छृङ्खलताका समाचार सुना तो उन्होंने दूतके मुखसे यह संदेश भेजकर कि 'अधर्म मत करो' उसे रोका ॥ ४८ ॥ इसपर रावण क्रोधित होकर कुबेरकी पुरीपर चढ़ आया और उन्हें परास्त कर उनका अति उत्तम पुष्पक विमान छीन लाया ॥ ४९ ॥ तदनन्तर वह राक्षस युद्धमें यम और वरुणको भी जीतकर इन्द्रका वध करनेकी इच्छासे तुरन्त ही स्वर्गलोकपर चढ़ आया ॥ ५० ॥ वहाँ इन्द्र और अन्य देवताओंके साथ उसका बड़ा घमासान युद्ध हुआ । इस समय देवराज इन्द्रने आगे बढ़कर रावणको बाँध लिया ॥ ५१ ॥ जब यह समाचार महाप्रतापी मेघनादने सुना तो उसने अकस्मात् आकर देवताओंसे घोर युद्ध किया और उन्हें जीतकर इन्द्रको पकड़कर बाँध लिया । फिर महाबली मेघनादने अपने पिताको छुड़ाया और इन्द्रको अपने साथ लेकर लंकापुरीमें लौट आया ॥ ५२-५३ ॥ फिर ब्रह्माजीने जाकर इन्द्रको मेघनादसे छुड़ाया और उसे बहुतसे वर देकर वे अपने लोकको चले गये ॥ ५४ ॥