अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
(40) अगस्त्य-संहिता क्षेत्रे तु तव देवेश यत्र कुत्रापि वा मृताः। कृमिकीटादयोऽप्याशु मुक्ताः सन्तु न चान्यथा।।29।। हे देवेश! आपके क्षेत्र में जहाँ कहीं भी मृत्यु पाकर कृमि, कीट आदि भी शीघ्र ही मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं। त्वत्तो वा ब्रह्मणो वापि लभन्ते ये षडक्षरम्। जीवन्तो मन्त्रसिद्धाः स्युर्मृता मां प्राप्नुवन्ति ते।।30।। आपसें या ब्रह्मा से जो षडक्षर मन्त्र पाते हैं, वे जीवित रहते मन्त्रसिद्ध हो जाते हैं और मृत्यु के बाद मुझे प्राप्त करते हैं। क्षेत्रेऽस्मिन् योऽर्चयेद् भक्त्या मन्त्रेणानेन शंकर। अहं सन्निहितस्तत्र पाषाणप्रतिमादिषु।।31।। हे शंकर! इस क्षेत्र में इस मन्त्र से भक्तिपूर्वक जो मेरी अर्चना करते हैं, मैं उनके समीप रहता हूँ; क्योंकि यहाँ पत्थर आदि की प्रतिमाओं में लीन मैं हूँ। मुमूर्षोर्दक्षिणे कर्णे यस्य कस्यापि वा स्वयम्। उपदेक्ष्यति मन्मन्त्रं स मुक्तो भविता शिव।।32।। हे शिव! जिसकी मृत्यु निकट हो, वैसे किसी के दाहिने कान में दूसरा कोई मेरा मन्त्र कहे या वह स्वयं जपे वह मुक्ति पायेगा। इत्युक्तवति देवेशे पुनरप्याह शंकरः। महान् महाभिमानोऽत्र क्षेत्रे त्रैलोक्यदुर्ल्लभे।।33।। फलं भवतु देवेश सर्वेषां मुक्तिलक्षणम्। मुमूर्षूणां च सर्वेषां दास्ये मन्त्रवरं परम्।।34।। श्रीराम के ऐसा कहने पर पुनः शंकर ने कहा- "यह इस क्षेत्र की बड़ी महिमा होगी, जो तीनों लोको में दुर्लभ है। हे देवेश! सबको मुक्तिस्वरूप फल मिले। जिनकी मृत्यु निकट है, ऐसे सब लोगों को मैं यह मन्त्रराज प्रदान करूँगा। इत्येवमीरितो विष्णुस्तस्मै दत्वा वरान्तरम्। यदभीष्टं पुनस्तत्र तत्रैवान्तरधीयत।।35।। इस प्रकार कहने पर विष्णु ने उन्हें अन्य इच्छित वर देकर फिर वहीं अन्तर्धान हो गये।
अष्टमोऽध्यायः (41)
तदादितदभून्मुक्तिक्षेत्रं त्रैलोक्यपावनम्। तत्र तिष्ठन्ति ये भक्त्या यावज्जीवं नियम्यते।। मुक्तिभाजो भवन्त्येव सत्यं सत्यं न चान्यथा।।३६।। इसके बाद उस समय से तीनो लोकों में पवित्र वाराणसी 'मुक्तिक्षेत्र' हो गयी। वहाँ जो भक्तिपूर्वक वास करते और जीवन पर्यन्त नियम का पालन करते हैं, वे मुक्ति के भागी होते हैं। यह सत्य है, सत्य है; यह अविचल है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये मन्त्रराजमाहात्म्यं नाम सप्तमोध्यायः। अथ अष्टमोऽध्यायः कथं मन्त्रवरं चादौ केन भूमौ ¹ प्रतिष्ठितम्। उपादिश कः ² कस्मै तन्मे ब्रूहि तपोधन।।1।। सुतीक्ष्ण ने पूछा— हे तपोधन अगस्त्य मुनि! किसने सबसे पहले इस पृथ्वी पर इस मन्त्रराज को प्रतिष्ठित किया। किसने किसे उपदेश किया, यह बतलाइए। अगस्तिरुवाच ब्रह्मा ददौ वसिष्ठाय स्वसुताय मनुं ततः।³ स वेदव्यासमुनये ददावित्थं गुरुक्रमात् ⁴।।2।। ब्रह्मा ने अपने पुत्र वसिष्ठ को यह मन्त्र दिया। इसके बाद गुरु परम्परा से वसिष्ठ ने वेदव्यास मुनि को दिया। वेदव्यासमुखेनात्र मन्त्रो भूमौ प्रकाशितः। वेदव्यासो महातेजाः शिष्येभ्यः समुपदिशत्।।3।। वेदव्यास के मुख से यह मन्त्र पृथ्वी पर फैला। महान् तेजस्वी वेदव्यास ने अपने शिष्यों को इसका उपदेश किया था। गुरुः शिष्यगुणानादौ⁵ शौनकायाब्रवीन्मुनिः। स शौनकेन पृष्टः सन्नाह मन्त्रान्तराणि च।।4।। गुरु मुनि वेदव्यास ने पहले शिष्य के गुणों का उपदेश देकर शौनक को इसका उपदेश किया। शौनक ने जब वेदव्यास से पूछा तब उन्होंने दूसरे मन्त्रों का भी उपदेश करते हुए कहा—
- घ. भूमौ केन चादौ। 2. घ. तदादिदेशकः। 3. घ. पुनः। 4. घ गुरुक्रमः। 5. घ. गुरुः शिष्यगणानादौ। Rarest Archiver
(42) अगस्त्य-संहिता
यन्त्रपूजाविधिमपि होमं तर्पणलक्षणम्। पुरश्चरणसंख्यां च होमद्रव्यान्तराणि च।।5।। जपस्थानानि सिद्धिं च यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा। तदुक्तं सम्प्रयच्छामि यदि श्रोतुमिहेच्छसि।।6।। “हे शौनक! यदि सुनना चाहो तो प्राचीन काल में ब्रह्मा ने जिस प्रकार बतलाया था उसी प्रकार यन्त्र-पूजा की विधि, होम, तर्पण, पुरश्चरण की संख्या, हवन-सामग्री, जप-स्थान और सिद्धि के विषय में मैं उपदेश करता हूँ।” सुतीक्ष्ण उवाच सतां सन्दर्शनं लोके तर्पयत्येव मङ्गलम्। मन्दभाग्योऽप्यहं कस्मात् श्रोता कल्प्ये त्वयाधुना।।7।। मुनिवर्याधुनैव त्वं यदुक्तं तत् प्रबोध मे। सुतीक्ष्ण ने कहा– साधुओं का मंगलमय दर्शन ही तृप्ति प्रदान करता है। तब जब आप-जैसे वक्ता इस समय हैं, तो मैं श्रोता होकर कैसे मन्दभाग्य रहूँ? मैं भी आपसे सुनकर श्रोता बनना चाहता हूँ। हे मुनिश्रेष्ठ! ब्रह्माजी ने जो कुछ कहा, वह मुझे अभी सुनाइए। अगस्तिरुवाच देवतोपासकः शान्तो विषयेष्वपि निःस्पृहः। अध्यात्मविद् ब्रह्मवादी वेदशास्त्रार्थकोविदः।।8।। उद्धर्तुञ्चैव संहर्तुं समर्थो ब्राह्मणोत्तमः। तन्त्रज्ञो यन्त्रमन्त्राणां धर्मवित्ता रहस्यवित्।।9।। पुरश्चरणकृत् सिद्धो मन्त्रसिद्धः प्रयोगवित्। तपस्वी सत्यवादी च गृहस्थो गुरुरुच्यते।।10।। अगस्त्य बोले– देवों के उपासक, शान्त चित्तवाले, सांसारिक विषयों से विरक्त, अध्यात्म को जाननेवाले, ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करनेवाले, वेद, शास्त्र आदि के ज्ञानी, उद्धार और संहार दोनों करने में समर्थ, ब्राह्मणश्रेष्ठ, तन्त्रज्ञ, यन्त्र एवं मन्त्र के ज्ञाता, धर्म और रहस्य के ज्ञाता, पुरश्चरण करनेवाले, सिद्धपुरुष, जिन्हें मन्त्र सिद्ध हों तथा जो प्रयोगों का ज्ञान रखते हों, तपस्वी और सत्यवादी गृहस्थ गुरु कहलाते हैं।
अष्टमोऽध्यायः (43) आस्तिको गुरुभक्तश्च जिज्ञासुः श्रद्धया सह। कामक्रोधादिदुःखोत्थं वैराग्यं वनितादिषु ।।11।। सर्वात्मना तितीर्षुश्च भवाब्धेर्भवदुःखितः। ब्राह्मणो धर्ममोक्षार्थी कामार्थं विगतस्पृहः ।।12।। किं वा धर्मार्थमोक्षार्थी निष्कामश्चाथवा द्विजः। मनोवाक्कायधर्मैस्तु नित्यं शुश्रूषको गुरोः।।13।। धर्म में आस्था रखनेवाले, गुरु के भक्त, श्रद्धा के साथ सीखने की इच्छा रखनेवाले, काम, क्रोध आदि से उत्पन्न दुःखों को देखते हुए स्त्रियों के प्रति वैराग्य रखनेवाले, सभी प्रकार से संसार को पार करने की इच्छा रखनेवाले, संसार के दुःखों से दुःखी, ब्राह्मण, धर्म और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले, निष्काम शिष्य होते हैं। अथवा मन, वचन, कर्म, एवं धर्म से गुरु की नित्य सेवा करनेवाले, क्षत्रिय, एवं वैश्य शिष्य होते हैं। स्ववर्णाश्रमधर्मोक्तकर्मनिष्ठः सदाशुचिः। शुचिव्रततमाः शूद्राः धार्मिकाः द्विजसेवकाः।¹।।14।। अपने वर्ण और आश्रम के लिए कथित धर्म के अनुसार कर्म करनेवाले, सदा पवित्र रहनेवाले, पवित्र नियमों का पालन करनेवाले द्विजों की सेवा करनेवाले, धार्मिक शूद्र शिष्य होते हैं। स्त्रियः पतिव्रताश्चान्ये प्रतिलोमानुलोमजाः। लोकाश्चाण्डालपर्यन्तं सर्वेऽप्यत्राधिकारिणः ।।15।। पतिव्रता स्त्रियाँ, चाहे वे प्रतिलोम विवाह से या अनुलोम विवाह से उत्पन्न हो, वे भी शिष्या हो सकतीं हैं। चाण्डाल पर्यन्त सभी व्यक्ति यहाँ अधिकारी हैं। स्वजातिकर्मनिरताः² भक्त्या सर्वेश्वरस्य ये। उपदेशक्रमस्तेषां तत्तज्जात्यनुसारतः ।।16।। अपनी जाति के कर्म में लगे हुए भक्तिपूर्वक जो सर्वेश्वर की आराधना करते हैं, उनके लिए उनकी जाति के अनुसार दीक्षा का क्रम निर्धारित है। अलसाभिमानिनः³ क्लिष्टा दाम्भिकाः कृपणास्तथा। दरिद्राः रोगिणो दुष्टा⁴ रागिणो भोगलालसाः ।।17।।
- घ. शुचिव्रततमाः शुद्धाः धार्मिकाः द्विजसत्तमाः। 2. घ. स्वजातिधर्मनिरताः।
- घ. अलसाः मलिनाः। 4. घ. रुष्टाः।
(44) अगस्त्य-संहिता
असूयामत्सरग्रस्ताः शठाः परुषवादिनः। अन्योपायार्जितधनाः परदाररताश्च ये।।18।। विदुषां वैरिणश्चैव ह्यज्ञाः पण्डितमानिनः। भ्रष्टव्रताश्च ये कष्टवृत्तयः पिशुनाः जनाः।।19।। बद्धाशिनः¹ क्रूरचेष्टा दुरात्मानश्च निन्दकाः।² एवमेवादयोऽप्यन्ये पापिष्ठाः पुरुषाधमाः।।20।। अकृत्येभ्योऽनिवार्याश्च गुरुशिष्यासहिष्णवः। एवंभूताः परित्याज्याः शिष्यत्वेनोपकल्पिताः।।21।। आलसी, अभिमानी, कठोर हृदय वाले, घमण्डी, कृपण, दरिद्र, रोगी, दुष्ट विषयों में आसक्त तथा भोग करने की लालसा रखनेवाले, सन्देह और ईर्ष्या करनेवाले, धूर्त, कठोर वाणी बोलनेवाले, दूसरे तरीके से धन अर्जित करनेवाले, दूसरे की पत्नी में आसक्त, विद्वानों से शत्रुता रखनेवाले, मूर्ख, स्वयं को पण्डित माननेवाले, नियम से च्युत, कठोर कार्य करनेवाले, चुगली करने वाले, शरीर को बाँधकर अर्थात् सिला हुआ वस्त्र पहनकर खानेवाले, क्रूर व्यवहार करनेवाले, दुष्ट, दूसरे की निन्दा करनेवाले - ये सब और अन्य प्रकार के भी पापाचरण करनेवाले नीच पुरुष हैं। बुरे कार्य करने से मना करने पर भी नहीं रुकनेवाले और गुरु एवं उनके शिष्यों के प्रति असहिष्णु व्यक्ति जो शिष्य बनने के लिए परीक्ष्य हों, उनका परित्याग करना चाहिए। यदि तेऽभ्युपकल्पेरन् देवताक्रोधसभाजनाः। भवन्ति हि दरिद्रास्ते पुत्रदारविवर्जिताः। नरकाञ्चैव देहान्ते तिर्यक्षु भवन्ति ते।।22।। यदि ऐसे व्यक्ति शिष्य बनते हैं तो वे शिष्य देवता के कोप के भागी, दरिद्र, सन्ततिविहीन होते हैं; मरणोपरान्त उन्हें नरक मिलता है तथा पुनर्जन्म लेकर पशु-पक्षी आदि तिर्यक् योनि में उत्पन्न होते हैं। ये गुर्वाज्ञां न कुर्वन्ति पापिष्ठाः पुरुषाधमाः। न तेषां नरकक्लेशनिस्तारो मुनिसत्तम।।23।। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! जो गुरु की आज्ञा नहीं मानते वे पापी पुरुषों में नीच हैं। उन्हें नरक के क्लेश से छुटकारा नहीं मिलता है।
- घ. बह्वाशिनः। 2. घ. निन्दिताः
२. मन्त्र-दीक्षा, न्यास व षडङ्ग-पूजा पद्धति
अष्टमोऽध्यायः (45) — — — — — — — — — — — — — — — क्षुद्राः¹ प्रलोभितास्तैस्तैर्निन्दितेभ्यो दिशन्ति ये।² विनश्यत्येव तत्सर्वं सैकते शालिबीजवत् ।।२४।। क्षुद्र बुद्धि वाले, प्रलोभन के फेर में पड़कर जो जो निन्दित कार्य के लिए किसी को उकसाते हैं, उस गुरु का भी सबकुछ बालू की ढेर पर पड़े धान के बीज के समान नष्ट हो जाता है यैः शिष्यैः शश्वदाराध्याः गुरवो ह्यवमानिताः। पुत्रमित्रकलत्रादिसंपद्भ्यः प्रच्युता हि ते।।२५।। जो शिष्य बार बार अपने आराध्य गुरुओं का अपमान करते हैं, वे पुत्र, मित्र, पत्नी और धन सम्पत्ति से विहीन हो जाते हैं। अधिक्षिष्य गुरून् मोहात् परुषं प्रवदन्ति ये। शूकरत्वं भवत्येव तेषां जन्मशतेष्वपि।।२६।। गुरुओं पर आक्षेप लगाकर मूर्खतावश जो गुरु के प्रति कठोर वचन कहते हैं, वे सौ जन्मों तक सूअर होते हैं। ये गुरुद्रोहिणो मूढाः सततं पापकारिणः। तेषां च यावत्सुकृतं दुष्कृतं स्यान्न संशयः।।२७।। जो मूर्ख गुरु से द्रोह करते हुए हमेशा पापाचरण करते हैं उनके द्वारा किये गये अच्छे कार्य भी बुरे फल देते हैं। तारादिर्मुक्तये लक्ष्मीबीजादिर्भुक्तये तथा। वाक्सिद्धये च वाग्बीजं प्रणवान्ते विनिक्षिपेत् ।।२८।। मोक्ष के लिए पंचाक्षर मन्त्र (रामाय नमः) में तार (ॐकार) लगाकर, सुख-सम्पत्ति के लिए लक्ष्मीबीज (श्रीं) लगाकर तथा वाणी की सिद्धि के लिए वाग्बीज(ऐं) लगाकर प्रणव ॐकार अन्त में जोड़कर जपना चाहिए। मान्मथं सर्ववश्याय पदं तत् त्रितयं पुनः। तारान्ते चैव रामादौ सर्वार्थं विनियोजयेत् ।।२९।। सर्ववशीकरण के लिए कामबीज (क्लीं) लगाकर तथा सर्वकामना सिद्धि के लिए तीनों पदों ह्रीं, श्रीं, ऐं के बाद तार (ॐकार) लगाकर रामादि का जप करें।
- घ. क्षुब्धाः। 2. घ. निन्दितानादिशन्ति च।
(46) अगस्त्य-संहिता ————————————————————————————————————————— रामाय नम इत्येव मन्त्रः पञ्चाक्षरो मनुः। रामित्येकाक्षरो मन्त्रो राम इत्यपरो मनुः ।।३०।। 'रामाय नमः' यह एक मन्त्र पाँच अक्षरों का है, 'रां' यह एकाक्षर मन्त्र है तथा 'राम' यह एक अन्य मन्त्र है। चन्द्रान्तश्चैव भद्रान्तः पुनर्द्वेधा विभज्यते। स्वकामशक्तिवाग्लक्ष्मीताराद्यः पञ्चवर्णकः ।।३१।। षडक्षरः षड्विधः स्याच्चतुर्वर्गफलप्रदः। पंचाशन्मातृकामन्त्रवर्णप्रत्येकपूर्वकः ।।३२।। 'रामचन्द्राय नमः' और 'रामभद्राय नमः' इस प्रकार दो मन्त्र हो जाते हैं। स्वबीज (रां), कामबीज(क्लीं), शक्ति(ह्रीं), वाक्(ऐं), लक्ष्मी(श्रीं) तथा तार (ॐ) इन छह बीजों का आदि में प्रयोग करने से पंचाक्षर मन्त्र छह प्रकार के षडक्षर मन्त्र हो जाते हैं। जिनमें पचास मातृकावर्णों के बीजरूप प्रत्येक के आदि में जोड़कर जप किया जाता है। लक्ष्मीवाङ्न्मथादिश्च सर्वत्र प्रणवादिकः। रामश्च चन्द्रभद्रान्तश्चतुर्थ्यन्तो हृदा ^1 सह ।।३३।। बहुधा विद्यते तारसहितोऽयं षडक्षरः। लक्ष्मीबीज, वाक्बीज, कामबीज प्रारम्भ में लगाकर तथा प्रत्येक मन्त्र में तार जोड़कर 'राम' शब्द 'चन्द्र' और 'भद्र' जोड़कर चतुर्थी विभक्ति में 'नमः' के साथ तथा तारक बीज ॐकार के साथ अनेक प्रकार के यह षडक्षर मन्त्र होते हैं। एकधा च द्विधा त्रेधा चतुर्धा पंचधा तथा ।।३४।। षट्सप्ताष्टधा चैव बहुधायं व्यवस्थितः। एकाक्षर, द्वयक्षर, त्र्यक्षर, चतुरक्षर, पंचाक्षर, षडक्षर, सप्ताक्षर, अष्टाक्षर एवं अनेकाक्षर, इन अनेक प्रकार के मन्त्रों का निरूपण किया गया है। मन्त्रोऽयमुपदेष्टव्यो ब्राह्मणाद्यनुरूपतः ।।३५।। संपूज्य विधिवत् तत्र संस्थाप्य कलशं नवम्। तत्सामर्थ्यानुरूपेण मृत्सुवर्णमयं तथा। दात्रा प्रदीयते यद्वन्मन्त्रो देयस्तथा मुने ।।३६।।
- क. नमः।
नवमोऽध्यायः (47) हे मुनि सुतीक्ष्ण! ब्राह्मण आदि जाति के शिष्यों को उनके अनुरूप विधानपूर्वक पूजा कर सामर्थ्य के अनुसार सोने का या मिट्टी के नवीन कलश की स्थापना कर यह मन्त्र उसी प्रकार शिष्य को दें जैसे कोई दाता किसी को धन देता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये गुरुशिष्यलक्षणं नामाष्टमोऽध्यायः।।8।। अथ नवमोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच किं तन्मन्त्रं वद ब्रह्मन् स्वरूपन्तस्य चानघ। कैर्मन्त्रैर्वा कथं कुत्र लेख्यः किं तेन वा भवेत्।।1।। हे ब्रह्मन्! मुनि अगस्त्य! वह मन्त्र क्या है? इसका स्वरूप क्या है? किस मन्त्र से किस प्रकार और किस स्थान पर उपासना करनी चाहिए तथा अंकित करने योग्य यन्त्र कैसा है, यह सब हमें बतलायें। सुतीक्ष्ण उवाच किं तद्यन्त्रं वद ब्रह्मन् स्वरूपं चास्य चानघ। कैर्मन्त्रैर्वा कथं कुत्र जाप्यं किं तेन वा भवेत्।।1।। सुतीक्ष्ण बोले- हे मुनि अगस्त्य! वह यन्त्र क्या है, इसका स्वरूप क्या है और किन मन्त्रों से कैसे कहाँ जप करना चाहिए और उसका क्या फल मिलेगा? अगस्त्य उवाच मनोरथकराण्यत्र नियम्यन्ते तपोधन। कामक्रोधादिदोषोत्थदीर्घदुःखनियन्त्रणात् ।¹।2।। यन्त्रमित्याहुरेतस्मिन् रामः प्रीणाति पूजितः। यन्त्रं मन्त्रमयं प्राहुर्देवता मन्त्ररूपिणी।।3।। अगस्त्य बोले- यहाँ में मनोरथ पूरा करनेवाले यन्त्रों की विधि बतलाता हूँ। काम, क्रोध आदि दोषों से उत्पन्न दुःखों को नियन्त्रित करने के कारण इसे यन्त्र कहा जाता है। इसपर पूजित श्रीराम प्रसन्न होते हैं। मन्त्र से युक्त यन्त्र होता है, जिसमे मन्त्र-स्वरूप देवता स्वयं होते हैं।
- घ. कामक्रोधादिदोषोत्थदीर्घयन्त्रनियन्त्रणात्।
(48) अगस्त्य-संहिता यन्त्रेणापूजितो रामः सहसा न प्रसीदति। श्रीरामः पूजितो नित्यं सीतया सह यन्त्रितः।।4।। यदिष्टं तत्करोत्येव तत्तन्मन्त्रवरादृते। यन्त्र के बिना पूजित राम शीघ्र प्रसन्न नहीं होते हैं। किन्तु श्री सीता के साथ यन्त्र पर निर्दिष्ट श्रीराम पूजित होकर उस मन्त्रराज के बिना भी इष्ट सिद्धि करते हैं। शरीरमिव जीवस्य रामस्य मनुरुच्यते।।5।। यन्त्रे मन्त्रं समाराध्य यदभीष्टं तदाप्नुयात्।¹ ²यन्त्रे मन्त्रं समाराध्य प्रसादयति राघवम्।।6।। जैसे जीव का आश्रय शरीर होता है, उसी प्रकार श्रीराम मन्त्र में विराजमान होते हैं। यन्त्र पर मन्त्र की आराधना करने से कामना की पूर्ति होती है तथा श्रीराम प्रसन्न होते हैं। ³सर्वेषामपि मन्त्राणां यन्त्रे पूजा प्रशस्यते। यन्त्रस्वरूपं वक्ष्यामि ब्रह्मा प्राह यथा पुरा।'।7।। सभी मन्त्रों की पूजा यन्त्र पर प्रशस्त मानी जाती है। ब्रह्मा ने जिस प्रकार प्राचीन काल में कहा था वैसा ही मैं भी कहता हूँ। आदौ षट्कोणमुद्धृत्य ततो वृत्तं लिखेन्मुने। दलानि विलिखेदष्टौ ततः स्याच्चतुरस्रकम्।।8।। सबसे पहले षट्कोण लिखकर तब वृत्त लिखना चाहिए। इसके बाद आठ दल लिखकर चतुरस्र (वर्ग) बनाना चाहिए। सर्वलक्षणसम्पन्नं व्यक्तं सर्वमनोहरम्। तदन्तरेऽपि सुव्यक्तं साध्याख्या कर्मगर्भितम्।।9।। सभी लक्षणों से युक्त, स्पष्ट और सुन्दर यन्त्र लिखकर उसके मध्य में स्पष्ट अक्षरो में अभीष्ट वस्तु और कर्म लिखना चाहिए। तद्बीजं विलिखेद् भूयस्तत् क्रोडीकृतमन्मथम्। ततस्तु पञ्चबीजानि पुनरावर्तयेन्मुने।।10।। पुनर्दशाक्षरेणैव तदेव परिवेष्टयेत्।
- घ. समाप्नुयात्। 2-3. घ. में अनुपलब्ध। Rarest Archiver
नवमोऽध्यायः (49) तब बीज मन्त्र के दोनों ओर कामबीज (क्लीं) लिखें। इसके बाद पाँचो बीजाक्षर फिर दोहराएँ। पुनः दशाक्षर मन्त्र से वेष्टित करें। षडङ्गान्यग्निकोणादि कोणेष्ववक्रमाल्लिखेत् ।। 11 ।। तथा कोणकपोलेषु ह्रीं श्रीं च विलिखेन्मुने। हुं बीजं प्रतिकोणाग्रं केसराग्रेषु च स्वरान् ।। 12 ।। फिर अग्निकोण से प्रारम्भ कर कोणों में विपरीत क्रम से षडङ्गों को लिखें और कोणों के दोनों ओर 'ह्रीं' और 'श्रीं' लिखें। प्रत्येक कोण के अग्रभाग में 'हुं' बीज लिखें और केसर के अग्रभागों में स्वरों को लिखें। मालामन्त्रस्य वर्णाः स्युः चत्वारिंशच्च पञ्च च। वर्णाः सप्तदलेष्वेव षट् षट् पश्चाष्टमेदले ।। 13 ।। पूर्वतो वेष्टयेत् काद्यैः तत्सर्वं च तपोधन। बीजद्वयं च विलिखेत् नरसिंहवराहयोः ।। 14 ।। दिग्विद्दिक्ष्वपि पूर्वस्मात् ¹ भूगृहे चतुरस्रके। यन्त्रेस्मिन् सम्यगाराध्य भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।। 15 ।। मालामन्त्र में पैंतालीस वर्ण होते हैं, जिनमें सात दलों में छः छः वर्ण लिखें और आठवें में पाँच वर्ण लिखें। पूर्व से 'क' आदि से सबको वेष्टित करें और वराह एवं नरसिंह के बीज (क्रौं) चारो दिशाओं एवं चारो कोणों में वर्गाकर भूपुर पर लिखें। इस यन्त्र पर आराधना कर भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। यद्वा मध्ये लिखेत्तारं षट्सु कोणेष्वपि क्रमात्। मूलमन्त्राक्षराण्येव सन्धिष्वग्रं च मान्मथम् ।। 16 ।। मायां गण्डेषु किंजल्के स्वराणां लेखने मतम्। मन्त्रेषु पूर्ववन्मालामन्त्रो लेख्यः क्रमेण हि ।। 17 ।। दशाक्षरेण संवेष्ट्य कादीनि व्यञ्जनानि च। दिग्विंदिक्षु लिखेद् बीजे नारसिंहवराहयोः ।। 18 ।। अथवा मध्य में तथा छः कोणों में क्रम से तार (ॐ कार) लिखें। इसके बाद मूल मन्त्र के अक्षर कोण की सन्धियों पर लिखकर उसके आगे कामबीज (क्लीं) लिखें। कोणों के दोनों बगल में तिरछी रेखा पर माया बीज (ह्रीं) तथा केसर पर
- क. सर्वासु।
(50) अगस्त्य-संहिता स्वर लिखें। पूर्व की तरह मालामन्त्र दलों पर लिखकर दशाक्षरी मन्त्र से संवेष्टित कर ‘क’ आदि व्यञ्जन लिखें तथा दिशा और उसके कोणों में नरसिंह (क्ष्रौं) और वराह के बीज (ह्रौं) लिखें। एतद्यन्त्रान्तरं चात्र साङ्गावरणमर्चयेत्। सौवर्णे राजते भूर्जे लिखित्वाचनमाचरेत् ।।19।। इस यन्त्र अथवा दूसरे यन्त्र की पूजा अंगों एवं आवरण के साथ करें। इस यन्त्र को सोना, चांदी या भूर्जपत्र पर लिखकर पूजा प्रारम्भ करें। हुं जानकीवल्लभाय स्वाहा क्षौ हं विनिर्देशेत्। दशाक्षरो वराहस्य नृसिंहस्य मनुः स्मृतः ।।20।। “हुं जानकीवल्लभाय स्वाहा क्षौं हं” यह नृसिंह और वराह का दशाक्षर मन्त्र है। ह्रीं श्रीं क्लीं चोंन्नमो ब्रूयात् ततो भगवते पदम्। रघुनन्दनायेति पदं ¹ रक्षोघ्नविशदाय च ।।21।। मधुरेति प्रसन्नेति वदनाय पदं वदेत्। विशेषणं पञ्चमं च ब्रूयादमिततेजसे ।। 22 ।। ततो बलाय रामाय विष्णवे नम इत्यपि। ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोघ्नविशदाय मधुरप्रसन्नवदनाय अमिततेजसे बलाय रामाय विष्णवे नमः । ² मालामन्त्र का स्वरूप - "ह्रीं श्रीं क्लीं ॐ नमः' बोलें। इसके बाद 'भगवते' यह शब्द बोलें। इसके बाद 'रघुनन्दनाय' यह शब्द, फिर 'रक्षाघ्नविशदाय' भी बोलें। तब 'मधुर' 'प्रसन्न' और 'वदनाय' बोलें। तब विशेष रूप से पाँचवाँ पद 'अमिततेजसे' यह बोलें। तब 'बलाय' 'रामाय' और 'विष्णवे नमः' यह भी बोलें। इस प्रकार मन्त्र का ऐसा स्वरूप होगा- ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोघ्नविशदाय मधुरप्रसन्नवदनाय अमिततेजसे बलाय रामाय विष्णवे नमः। मालामन्त्रोऽयमुद्दिष्टो नृणां चिन्तामणिः स्मृतः। ॐश्रीं सीतायै वह्निजाया तु सीतामन्त्र उदाहृतः ।।23।।
- घ. रघुनन्दनाय पदं ब्रूयाद्रक्षोघ्नविशदाय च। 2. घ. में अनुपलब्ध।
दशमोऽध्यायः (51)
यह मालामन्त्र कहा जाता है जो साधकों के लिए 'चिन्तामणि के रूप में धारण किया जाता है।' ॐ श्रीं सीतायै' के साथ वह्निजाया (स्वाहा) लगाकर सीतामन्त्र है। यन्त्रेऽस्मिन् राममाराध्य साङ्गावरणमादरात्। आराध्य गुलिकीकृत्य ¹ धारयेद्यन्त्रमन्वहम्।।24।। इस यन्त्र पर आदरपूर्वक अंग-पूजा और आवरण-पूजा के साथ श्रीराम की आराधना कर इस यन्त्र को मोड़कर गोल बनाकर प्रतिदिन धारण करना चाहिए। दारिद्र्यदुःखशमनं पुत्रपौत्रप्रदन्तथा। ऐश्वर्यकृद् वश्यकरं शत्रुसंहारकारकम्।।25।। विद्याप्रदं सौख्यकरं रोगशोकनिवारणम्।।26।। पराभिचारकृत्येषु वज्रपञ्जरमुच्यते। किं मन्त्रं बहुनोक्तेन सर्वसिद्धिप्रदं मुने।।27।। यह यन्त्र दारिद्र्य और दुःख का शमन करता है; पुत्र और पौत्र प्रदान करनेवाला है, ऐश्वर्य देता है, सबको वश में ला देता है शत्रुओं का संहार करता है। यह विद्या देनेवाला, सुख देनेवाला, रोग और शोक को हटानेवाला है। दूसरे पर अभिचार कर्मों में 'वज्रपंजर' कहलाता है। अनेक बार मन्त्र जपने से क्या लाभ? यह यन्त्र ही सभी सिद्धियों को प्रदान करनेवाला है। इत्यगस्त्यसंहितायां यन्त्रविधिर्नाम नवमोऽध्यायः।।9।। दशमोऽध्यायः अगस्त्य उवाच पूजाविधानं वक्ष्यामि नारदाभिमतं च यत्। वाल्मीकये मुनीन्द्राय द्वारपूजादिकं तथा।।1।। आकर्णय मुनिश्रेष्ठ सर्वाभीष्टफलप्रदम्।।2।। अगस्त्य बोले- हे मुनि श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! नारद ने मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि को जो पूजा तथा द्वार पूजा विधि बतलायी थी वह में कहता हूँ, उसे सुनो इससे सभी मनोरथ सफल हो जाते हैं।
- क. गुटिकीकृत्य।
(52) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————— श्रीरामद्वारपीठाङ्गपरिवारतया स्थिताः। ये सुरास्तानिह स्तौमितन्मूलाः सिद्धयो यतः। श्रीराम के द्वार पर, पीठ पर, अङ्ग के रूप में तथा परिवार के रूप में जो देवगण उल्लिखित हैं, उनकी स्तुतियाँ मैं करता हूँ; क्योंकि सिद्धियाँ उन्ही के द्वारा प्राप्त होतीं हैं। वन्दे गणपतिं भानुं त्रिलोकस्वामिनं शिवम्।।३।। क्षेत्रपालं तथा धात्रीं विधातारमनन्तरम्। गृहाधीशं गृहं गङ्गां यमुनां कुलदेवताम्।।४।। प्रचण्डचण्डौ च तथा शंखपद्मनिधी अपि। वास्तोष्पतिं द्वारलक्ष्मीं गुरुं वागधिदेवताम्।।५।। सर्वप्रथम गणेश, सूर्य, तीनों लोकों के स्वामी शिव, क्षेत्रपाल तथा धात्री की पूजा करें। इसके बाद ब्रह्मा की पूजा करें। फिर वास्तु के स्वामी, वास्तु, गंगा, यमुना और कुलदेवता की पूजा करें। प्रचण्डा, चण्ड, शंख, पद्म, निधि, वास्तोष्पति, द्वारलक्ष्मी, गुरु और वाक् की देवता सरस्वती की पूजा करें। एताः संपूज्य भक्त्याहं श्रीरामद्वारदेवताः। महामण्डूककालाग्निरुद्राभ्यां प्रणमाम्यहम्।।६।। आधारशक्तिकूर्माभ्यां नागाधिपतये तथा। पृथिव्यै च तथा लक्ष्म्यै सागराय¹ नमो नमः।।७।। श्वेतद्वीपाय रत्नाद्रौ कल्पवृक्षाय ते नमः। सुवर्णमण्डपायाथ पुष्पकाय महार्हते।।८।। विमानायाष्टरत्नाय सम्यक्सिंहासनाय च। उद्यदादित्यसंशोभिपद्माय तदनन्तरम्।।९।। श्रीराम के इन द्वार-देवताओं की पूजा कर प्रार्थना करें- 'महामण्डूक और कालाग्निरुद्र को प्रणाम करता हूँ। आधारशक्ति और कूर्मदेव को प्रणाम। शेषनाग को प्रणाम। पृथ्वी, लक्ष्मी और सागर को प्रणाम। श्वेतद्वीप और रत्नपर्वत पर स्थित कल्पवृक्ष को प्रणाम। सुवर्ण-मण्डप और विशाल पुष्पक विमान को प्रणाम। आठो रत्नों को और सुन्दर सिंहासन को प्रणाम। इसके बाद उगते हुए सूर्य के समान शोभायमान कमल पुष्प को प्रणाम।
- क. क्षीरसागराय
दशमोऽध्यायः (53) नमामि धर्मज्ञानाभ्यां वैराग्याद्यग्नितः क्रमात्। ऐश्वर्याय नमो धर्मज्ञानाभ्यां पूर्वतस्तथा।।10।। अवैराग्याय च तथानैश्वर्याय नमो नमः। इसके बाद धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य को अग्निकोण से आरम्भ चारो कोणों में प्रणाम। पूर्व में धर्म और अज्ञान, दक्षिण में ज्ञान और अवैराग्य पश्चिम में वैराग्य और अनैश्वर्य तथा उत्तर में ऐश्वर्य और अधर्म को प्रणाम। अं अर्कमण्डलायाहमुपुर्युपरि सर्वदा।।11।। सत्त्वाय रजसे नित्यं तमसेपि नमो नमः। चं चन्द्रमण्डलमिति ध्यात्वाध्यात्वा नमाम्यहम्।।12।। रमग्निमण्डलायेति सम्पूज्यैव प्रयत्नतः। विमलोत्कर्षिणीज्ञानाक्रियायोगाभ्य इत्यपि।।13।। नमामि प्रह्वीसत्याभ्यामीशानायै दलान्तरे। पूर्वावितोऽनुग्रहायै प्रणमामि तदन्तरे।।14।। यन्त्र पर सूर्यमण्डल के ऊपर हमेशा सत्त्व, रजस् और तमस् को प्रणाम। चन्द्रमण्डल को बार-बार ध्यान कर प्रणाम। ‘रं’ स्वरूप अग्निमण्डल को प्रणाम। इस प्रकार यत्नपूर्वक पूजित दलों के मध्य में- विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या और ईशाना' को पूर्व से प्रारम्भ कर प्रणाम। इसके बाद अनुग्रहा को प्रणाम। नमो भगवते तद्वद् विष्णवे तदनन्तरम्। सर्वभूतात्मने चेति वासुदेवाय इत्यपि¹।।15।। ततः सर्वात्मकायेति योगपीठात्मने नमः।। प्रणवादिनमोऽन्ताय मन्त्रपीठात्मने नमः।।16।। इसके बाद भगवान् विष्णु को प्रणाम। प्रत्येक प्राणी की आत्मा में रहनेवाले वासुदेव को प्रणाम। तब सभी की आत्मा के स्वरूप योगपीठ स्वरूप सिंहासन को प्रणाम। आदि में प्रणव (ॐकार) और अन्त में ‘नमः’ से युक्त मन्त्र पीठस्वरूप को प्रणाम। यजामहे स्वरामोँ ह्रीं आत्मना संव्यवस्थितौ। नमोऽन्ताय रामाय ससीताय नमो नमः।।17।।
- घ. इत्यथ। Rarest Archiver
(54) अगस्त्य-संहिता
सान्निध्याधारयोगेन नियतेन षडात्मना। व्यवस्थिताय रामाय नमोऽनन्ताय विष्णवे¹।।18।। श्रीबीजाद्योऽपि सीतायै स्वाहान्तोऽयं षडक्षरः। तदेतन्मन्तरूपाय रामाय ज्योतिषे नमः।।19।। ॐ रां रां यजामहे, ॐ ह्रीं आत्मने नमः, ॐ रामाय नमः, ॐ ससीताय नमः। सान्निध्य और आधार के संयोग से नियत रूप में जो छह स्वरूपों में स्थित हैं, ऐसे श्रीराम को प्रणाम। ॐ अनन्ताय नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ श्रीं सीतायै स्वाहा ये षडक्षर मन्त्र हैं। इन मन्त्रों के स्वरूप ज्योतिःस्वरूप राम को प्रणाम। सानुस्वारस्वरान्ताय वह्नये हृदयाय च। नमश्चैव स्वरान्ताय स्वाहान्ताय कृशानवे।।20।। शिरसेऽप्यग्नये चान्तः शिखायै वषडात्मने।। ऐमस्त्राय हृदे नित्यं कवचाय हुं ते नमः²।।21।। चतुर्दशस्वरान्ताय सानुस्वाराय वह्नये।। नेत्राभ्यां वौषडान्ताय परोऽस्त्राय, फडत्मने।।22।। अनुस्वार के साथ अन्त में रेफ लगाकर वह्निदेव से न्यस्त हृदय को प्रणाम। वृद्धि के स्वामी अग्नि को प्रणाम। (एधेश्वराय कृशानवे स्वाहा) शिर पर न्यस्त वकार सहित अग्नि को प्रणाम (वं अग्नये शिरसे स्वाहा) वषट्कार जो शिखा पर न्यस्त हैं उन्हें प्रणाम। (‘शिखायै वषट्’) ऐं सहित वह्नि, जो नित्य कवच स्वरूप हैं उन्हें प्रणाम (ऐं वह्नये कवचाय हुम्) अनुस्वार सहित चतुर्दश स्वरों के साथ वह्नि जो वौषट् स्वरूप दोनों नेत्रों में न्यस्त हैं उन्हें प्रणाम (अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं लॄं एं ऐं ओं औं वह्नये नेत्राभ्यां वौषट्) इसके बाद फट् स्वरूप अस्त्र को प्रणाम (अस्त्राय फट्) एवं नमः षडङ्गाय रामाय ज्योतिषे नमः। आत्मान्तरात्मपरमज्ञानात्मभ्योऽग्नितः क्रमात्।।23।। इस प्रकार आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा स्वरूप जो ज्योतिः स्वरूप राम क्रमशः अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य और ईशान कोण में स्थित हैं, उन्हें प्रणाम। निवृत्त्यै च प्रतिष्ठायै विद्यायै ते नमाम्यहम्। शान्त्यै चात्मादिशक्तित्वे स्थित्यै तद्रूपिणे नमः।।24।।
- घ. वह्नये। 2. घ. हुमेव च।
दशमोऽध्यायः (55) वासुदेवाय ते नित्यं तथा संकर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय श्रियै शान्त्यै नमो नमः।।25।। प्रीतै रत्यै नमो राम द्वितीयावरणात्मने। निवृति, प्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति जो आत्मा आदि चारों की शक्तियाँ हैं, उन्हें प्रणाम। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध इन चारो को प्रणाम। पुनः श्रीः, शान्ति, प्रीति और रति जो इनकी शक्तियाँ हैं, उन्हें द्वितीयावरण में प्रणाम। अग्रे हनूमान् सुग्रीवो भरतश्च विभीषणः ।।26।। लक्ष्मणोऽप्यङ्गदश्चैव शत्रुघ्नो जाम्बवाँस्तथा। धृष्टिर्जयन्तो¹ विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्द्धनः ।।27।। अकोपो धर्मपालश्च सुमन्तश्चाष्टमन्त्रिणः। एतेभ्यो रामरूपेभ्यो युष्मभ्यं प्रणमाम्यहम् ।।28।। आगे में हनूमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न, जाम्बवान्, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्द्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त ये आठ मन्त्री हैं। ये सोलह, जो रामस्वरूप हैं, उन्हें प्रणाम। इन्द्राग्नियमदेवेभ्यो सायुधेभ्यो नमो नमः। नमो निर्ऋतये तुभ्यं वरुणाय नमो नमः।।29।। वायवे धनदायाथ रुद्रायेशाय ते नमः। ब्रह्मणेऽनन्तरूपाय दिक्पालायात्मने नमः।।30।। अपने अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, रुद्र, ब्रह्मा और अनन्त इन दश दिक्पालों को प्रणाम। तदायुधाय वज्राय शक्तये दण्डकाय च। नमः खड्गाय पाशाय ध्वजाय च गदात्मने ।।31।। त्रिशूलायाम्बुजायाथ चक्राय सततं नमः। इनके अस्त्र-शस्त्र स्वरूप वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, त्रिशूल, कमल और चक्र को सदा प्रणाम। वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिर्गौतमस्तथा।।32।। भरद्वाजः कौशिकश्च वाल्मीकिर्नारदस्तथा।
- घ. धृतिर्जयन्तो ।
(56) अगस्त्य-संहिता
वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, गौतम, भरद्वाज, कौशिक, वाल्मीकि और नारद ये आठ पार्षद ऋषि हैं। नलं नीलं च गवयं गवाक्षं गन्धमादनम् ।।33।। सुरभिश्चापि मैन्दं च द्विविदं च जपेत् क्रमात् ।¹ नल, नील, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, सुरभि, मैन्द और द्विविद का भी क्रमशः जप करना चाहिए। शङ्खचक्रगदापद्मशार्ङ्गबाणात्मने नमः ।।34।। गरुत्मते नमस्तुभ्यं विष्वक्सेनादिकाश्च ये। शंख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्ग और बाण इन शस्त्रास्त्रों को प्रणाम। हे गरुड़ आपको प्रणाम, शार्ङ्ग धारण करने वाले विष्वक्सेन आदि को प्रणाम। सर्वैश्वर्यस्वरूपाय ज्योतिषे सततं नमः ।।35।। मनोवाक्कायसहितं कर्म यद् वा शुभाशुभम् ।। तत्सर्वं प्रीतये भूयान्नमो रामाय शार्ङ्गिणे ।।36।। सभी प्रकार के ऐश्वर्य के स्वरूप तथा प्रकाशस्वरूप श्रीराम को प्रणाम। मेरे मन, वचन तथा शरीर से जो भी शुभ अथवा अशुभ कर्म किये गये हैं उन सबसे श्रीराम प्रसन्न हों। शार्ङ्ग धनुषधारी श्रीराम को प्रणाम। एतद् रहस्यं सततं प्रत्यूषसि समाहितः। यः पठेद् राममाहात्म्यं सर्वैश्वर्यनिधिर्भवेत् ।²।37।। विनाशयेदसौभाग्यं दारिद्र्यौघं निकृन्तयेत्। उपद्रवांश्च शमयेत् सर्वलोकं वशं नयेत् ।।38।। यः पठेत् प्रातरुत्थाय ब्रह्मार्पणधियान्वहम्। स याति शाश्वतं ब्रह्म पुनरावृत्तिदुर्ल्लभम् ।।39।। जो प्रतिदिन प्रातःकाल इस रहस्यमय राम माहात्म्य का पाठ करते हैं, वे सभी ऐश्वर्यों के भण्डार बन जाते हैं। यह माहात्म्य दुर्भाग्य का विनाश करता है; दरिद्रताओं को काटता है, उपद्रवों को शान्त करता है, सबको वश में ला देता है। जो प्रातःकाल उठकर ब्रह्म को समर्पित करने की बुद्धि से प्रतिदिन स्तोत्र का पाठ करते हैं। वे उस अविनाशी ब्रह्म को पा लेते हैं, जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।
- घ. ये चार चरण में अनुपलब्ध। 2. घ. विश्वैश्वर्य० Rarest Archiver
एकादशोऽध्यायः (57) ———————————————————————————————— नारदीयमिदं स्तोत्रं सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम। पठितव्यं प्रयत्नेन रामार्चनपरायणैः।।40।। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! यह नारदोक्त स्तुति है जिसे श्रीराम की उपासना करनेवालों को प्रयत्नपूर्वक पढ़ना चाहिए। गणपत्यादयः सर्वे द्वाराङ्गावृत्तिरूपिणः। प्रणवादिचतुर्थ्यादिनमोन्ताः स्वस्वनामभिः।।41।। पूजनीयाः प्रयत्नेन गन्धपुष्पाक्षतादिभिः। उपचारैः षोडशभिः तथैकादशभिर्मुने¹।।42।। पंचभिर्वा प्रयत्नेन स्वशक्त्यानुरूपतः। गणपति आदि सभी जो द्वारदेवता, अङ्ग देवता और चारो ओर फेरा लगानेवाले (परिक्रमा करनेवाले) देवता हैं, उनकी पूजा गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि से प्रणव (ॐकार) आरम्भ में तथा नमः अन्त में लगाकर अपने अपने नाम के चतुर्थ्यन्त पद से पंचोपचार, एकादशोपचार तथा षोडशोपचार से अपनी शक्ति के अनुसार करें। गणपत्यादयोऽप्येवं पूजनीयाः प्रयत्नतः।। ²गणपत्यादयो ह्येते पूजिताः पूजयन्त्यपि।।43।। ³तस्मात् सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रमेतत् समभ्यसेत्।।44।। इसी प्रकार गणपति आदि की भी पूजा करनी चाहिए। ये गणपति आदि पूजित होकर स्वयं श्रीराम की पूजा करते हैं, अतः सभी उपायों से इस स्तोत्र का अभ्यास करना चाहिए। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये पूजाविधिर्नाम दशमोऽध्यायः।
- घ. पुनः। 2.-3. घ. में अनुपलब्ध।
(58) अगस्त्य-संहिता एकादशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच शरीरं शोधयेदादावधिकारार्थमन्वहम्। तीर्थावगाहनं बाह्येऽप्यन्तर्भूतविशोधनम्।।1।। मातृकान्यासयोगैश्च शोधयेद् विध्यनुष्ठितः। अगस्त्य बोले- प्रतिदिन पूजा के अधिकारी बनने के लिए सबसे पहले शरीर की शुद्धि करें। बाह्य शोधन के लिए जल में डुबकी लगावें तथा आन्तरिक शोधन के लिए विधिपूर्वक मातृकावर्णों का न्यास करें। पूजाद्रव्याणि च ततः शोधयेत् प्रोक्षणादिभिः।।2।। पूजापात्राणि शङ्खञ्च शोधयेत् क्षालनादिना। शुद्धश्च शुद्धद्रव्यैश्च पूजयेत् पुरुषोत्तमम्।।3।। एवमाराधितो देवः सम्यगाराधितो भवेत्। न चेन्निरर्थकं सर्वं सिन्धुसैकतवृष्टिवत्।।4।। इसके बाद पोंछकर पूजा में प्रयुक्त सामग्रियों का शोधन करें। पूजा की थाली, लोटा, शंख, आदि को जल से धोवें। पवित्र पात्रों और सामग्रियों से पुरुषोत्तम की पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार आराधना करने से देवता अच्छी तरह प्रसन्न होते हैं, नहीं तो समुद्र की रेत पर हुई वर्षा के समान सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। शौचाचमनहीनस्य स्नानसन्ध्यादिकाः क्रियाः। निष्फलाः स्युर्यथा चेतो ह्यन्तरेण भवेत्तथा।।5।। शौच और आचमन किये विना जो स्नान, सन्ध्या आदि करते हैं, उनकी समस्त क्रियाएँ व्यर्थ हो जाती हैं, जैसे चेतन के विना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। संशोध्य पूजाद्रव्याणि स्वस्यापि बहिरन्तरम्। शङ्खञ्च पूजयेत् पूर्वं पूज्यं पूजार्हतां व्रजेत्।।6।। पूजा-सामग्रियों को पवित्र कर स्वयं भी बाहर और भीतर से पवित्र होकर शंख की पूजा करें। पहले पूजित शंख पूजा का साधन बनने योग्य होता है।
एकादशोऽध्यायः (59) पूजकस्याथ पूज्यस्यापावनस्य कृतं वृथा। अपावनान्यपूज्यानि साधनानि विवर्जयेत्।।7।। अपवित्र पूजक और पूज्य दोनों द्वार किए गये कार्य व्यर्थ हो जाते हैं। अतः अपवित्र एवं अपूज्य साधन का त्याग कर देना चाहिए। अतः स्नात्वा प्रकुर्वीत भूतशुद्धिं विधाय च। विन्यस्य मातृकां पूर्वं वैष्णवीं केशवादिकाम्।।8।। इसलिए स्नान करके भूत-शुद्धि कर पहले वैष्णव और केशव की मातृका का न्यास करें। विधाय तत्त्वन्यासञ्च न्यासं तन्मूर्तिपञ्जरम्। तदृषिच्छन्दसोन्यासं¹ तथा तन्मन्त्रदेवताम्।।9।। विन्यस्यैव षडङ्गानि तत्तद्बीजाक्षराणि च। इसके बाद तत्त्वन्यास, मूर्ति-पंजरन्यास, ऋषि-न्यास, छन्दोन्यास, मन्त्र- न्यास तथा देवता-न्यास करें। इस छह अंगों का न्यास कर उनके बीजाक्षरों का भी न्यास करें। अथातो देवताध्यानं ततः पूजनमन्ततः।।10।। ततो निवेद्य तत्सर्वं जपेन्मन्त्रमनन्यधीः। ततो विज्ञाप्य देवेशं परिवारांश्च पूजयेत्।।11।। एवं सम्पूजितो देवः सर्वान् कामान् प्रयच्छति। इसके बाद देवता का ध्यान कर पूजन करें। इसके बाद सब कुछ निवेदित कर अनन्यचित्त होकर मन्त्र का जप करें। तब मुख्य देव श्रीराम को सबकुछ ज्ञापित कर श्रीराम के परिजनों की पूजा करें। इस प्रकार पूजित देव सभी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। बाह्यपूजां ततः कुर्यादैहिकाभ्युदयाय वै।।12।। विलिप्य वेदिकां सम्यङ्मण्डलं तत्र कारयेत्। तब सांसारिक उन्नति के लिए बाह्य पूजा करें। तब वेदिका को लीप कर वहाँ उचित रीति से यन्त्र का निर्माण करावें।
- घ. छन्दसौऽभ्यासं।