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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८९

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८९

लिङ्ग्यते चिन्त्यते येन भावेन भगवान् शिवः । लिङ्गरूपं स रामेति लिंगं चेति द्विनामकृत् ॥७०॥ बहूनि सन्ति नामानि रामेशस्य महात्मनः । रजांसि गणयेत्कोऽपि मूर्तेर्नावाखिलेशितुः ॥७१॥ तस्मिन्सर्वतोभद्रं हृदयं तन्प्रकीर्तितम् । तत्र पद्ममष्टदलं सकेसरमकणिकम् ॥७२॥ तन्मूर्त्यानं रामलिङ्गस्य ध्यानार्थं परिकल्पितम् । अन्यथा सर्वगण्यास्य कथं देशादिभेदता ॥७३॥ दिव्यैर्पातः परमात्मार्थं स्वमाययावशंगतः । धर्मार्थकाममोक्षार्थं सृष्ट्युपाधिं प्रविष्टवान् ॥७४॥ तस्य चैतन्यचन्द्रस्य षोडशैताः कलाः पराः । चित्प्रकाशा द्वयाभूता घटं दीपेन्द्रियादिवत् । ७५॥ प्रकाशयन्ति गृह्णन्ति सृजन्ति चम्प्रसारत' बुद्धिमन्मात्रमेतस्मिन् संभिकृष्टा श्चित्रम्मनः ॥७६॥ अतो ज्ञानप्रधाना मा नज्ज्ञानं चतुरो दरा प्रमत्तं मत्तप्रच्छादान् ज्ञानान् सुन्दरोदराः ॥७७॥ चतुर्दा वृत्तिभेदेन प्रोक्ता तत्त्वार्थदर्शिभि प्रयोजनं न तेनात्र प्रकृतं नाद्रविष्यते ॥७८॥ क्रियाप्रधानः प्राणश्च पञ्चधाऽसौ व्यवस्थितः । प्राणापानौ तथा व्यानः समानोदानकस्त्विति ॥७९॥ वागादिकर्मेन्द्रियेषु क्रिया प्राणाश्रया मता श्रोत्रं नयनं घ्राणं स्पर्शनेन्द्रियं तथा ॥८०॥ पञ्चैतानि चेन्द्रियाणि ज्ञानद्वाराणि वै विदुः । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाणि च ॥८१॥ एव षोडशसङ्ख्यानं कलानामुच्यते बुधैः । तासु सर्वासु चैतन्यं रामनाथेति विश्रुतम् ॥८२॥ प्रविष्टं टीप्पने प्रज्ञाचेन विश्वं विचेष्टते । अनादिगगनावृत्तः कर्मनूरुफलात्मकः ॥८३॥ देहाभिमानिनो जीवाः फलभागाव पक्षिणः । यथारूपं सुखं दुःखं खादन्ति स्वस्वार्गपतम् ॥८४॥ कश्चिज्जन्मसहस्रेषु ज्ञानवान् जयते यदा । तदान्तस्थं रामरूपं ज्ञात्वा मोक्षी भवत्यलम् ॥८५॥

उन्मूलनमा प्रविर्भूत होते हैं। इसी कारण ऋचाओं ने आकाश के आगान इस परम व्योम कहा है ॥ ६९ ॥ जिस भावसे भगवान् शिवकी पूजा की जाती है, वे ही रूप शिव और राम इन दो नामोसे पुकार जात हैं ॥ ७० ॥ उन महात्मा रामके बहुतसे नाम हैं। सत्र रचना के सं प्राणी पृथ्वीके रजकणोंको भले ही गिन ले । किन्तु भगवान्के नामोंकी गणना कोई भी नहीं कर सकता ॥ ७१ ॥ उसमें जो सर्वतोभद्र है, वही हृदय जानना चाहिए । उसमें आठ पत्तोंका केशर और पखुड़ियों युक्त जो कमल है, वह रामके लिङ्गका ध्यान करनेके लिए ही बनाया जाता है। नहीं तो सर्वव्यापी अभेद इस देशदिनदता किस प्रकार मानी जाती ॥ ७२ ॥ ७३ । चिज्ज्योतिमंय वे परमात्मा अपनी मायाके वशीभूत होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्वर्गको साधन करनेके लिए ही समागम आये थे ॥ ७४ ॥ उस चैतन्य चन्द्रमा षोडश कलाएं सर्वश्रेष्ठ मानी गयी हैं वे संसारको स्व वन्धुआप चित्प्रकाश करते हैं ॥ ७५ ॥ । वे स्वभावसे ही सबका प्रकाशित करते, समय पड़नेपर फिर आह दबा ओर कमा कता सिर अण्डम नष्ट लिया करता है। पचित आत्मावालाक लिए बुद्धिमात्र कला हैं ओर वह तबक पास रहती है ॥ ७६ ॥ इससे यह वस्तु बुद्धि रहित रही ज्ञानप्रधान मानी जाती है। वह शब्दस्पर्शाय संसारके चेह हुए उपाय का अच्छी तरह जानता है ॥ ७७ ॥ यह वृत्तिभेदसे चार प्रकारका मानी गयी है। यहाँ उसके विषयमे विशेष विवेचनकी काई आवश्यकता नहीं बान पड़ती । अतएव इस विषयमे वास्तविक विवेचना करत हैं ॥ ७८ । अपनी वृत्तिके अनुसार प्राणक्रिया प्रधान मानी जाती है ओर इसके पाँच भेद है-प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान ॥ ७९ ॥ वाक् आदि कर्मेन्द्रियों की सारी क्रियाएँ प्राणाश्रयी हुआ करती हैं। श्रवण, नयन, घ्राण (नाक), त्वचा और जीभ ॥ ८० ॥ ये ही पाँच ज्ञानेन्द्री मानी गयी है। वाक्, पाणि (हाथ) पाद पायु (गुदा), उपस्थ (लिङ्ग), ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ है ॥ ८१ ॥ इसलिए कलाओकी सोलह सङ्ख्या कही गयी है। उन सबोंमें उन रमानाथकी चेतन्य शक्ति, विद्यमान रहती है ॥ ८२ ॥ इन्हींके प्रवेशस यह संसार स्वायमान होता है और उन्हींकी चेष्टासे सचेष्ट रहा करता है। वे अनादि संसाररूपी वृक्ष हैं और सबको कर्मानुसार फल देते हैं ॥ ८३ ॥ देहका अभिमान करनेवाले जीव पक्षियोंकी तरह अपने प्रभुके दिये हुए सुख-दुःखरूपी कर्मोंको भोगते हैं ॥ ८४ ॥ हजारों वार जन्म लेनेके बाद कही कोई ज्ञानवान् होता है और अपनी आत्माम स्थित रामका रूप जानकर मोक्षपद-

५१० आनन्दरहमायण [ सर्गः ४

इन्द्रियाणि पराण्याहुस्तेभ्यो बुद्धिः परा मता। ततः परः परमात्मा च सर्वव्यापी विनिश्चितः ॥८६॥ द्वौ सुपर्णावेकवृक्षं समाश्रित्य स्थितौ खगौ। एकः स्वादु फलं खादत्यन्यो विचक्षते ॥८७॥ त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोग्यञ्च यद्भवेत् तेभ्यो विलक्षणः साक्षीन्माहं भाथवणी श्रुतिः ॥८८॥ यच्चास्त्रीह यत्स्फुरति यच्चानन्दयति स्वयम् । यस्मिंश्च महति प्रत्यये सर्वे वेदाः समन्विताः ॥८९॥ विषयादि श्रीपर्यन्तं जडं मतिमतामदः, सम्पर्के च प्रियं चैतमप्रमात्मा महाप्रियः । ९०॥ सर्वेषां प्राणिनां ह्यात्मा परप्रेमास्पदो मतः स तु स्वयंक एव नेह दानास्ति गच्छति । ९१॥ चिन्मयं हृद्गतं ज्ञात्वा योऽसौ सोऽहमितिप्रथा। आचारेऽन्यथा सम्यक् परलोकेऽन गतः । ९२॥ आत्मानमकृतार्थ्यात्फलानुमे परमात्मनि। अप्सद्वयं पुनस्तस्य न कार्यं विद्यते भवे ॥९३। सर्वेऽप्युपायाः शास्त्रेषु यज्ज्ञानार्थं प्रयोजिताः। स चेत्सारसंसारेण इत्यादिः किं परं ततः ॥९४॥ दृष्टेऽस्मिन् रचिते भद्रे यस्य प्रविचायते वक्ष विषे परा प्रीतिर्जायते विदुषां सताम् ॥९५॥ नमो रामाय ज्ञानाय लिङ्गरूपधराय च शम्भवे विष्णवे तुभ्यं शङ्कराय शिवात्मने ।९६। अथवाऽऽद्ये स्थले भद्रं कार्यं नवपदात्मकम्। तिर्यग् भद्रं षट्पदञ्च रक्तपातेऽत्र ते स्मृते ।९७। द्विद्विपदात्मके कार्यं शेषं सर्वं हि पूर्ववत्। रामतोभद्रमेतच्च केवलं रामतुष्टिदम् ॥९८॥ स्थले द्वितीयभद्रं हि रक्तं विंशत्पदात्मकम् । तिर्यग् भद्रं नवपदैः पीतं चित्रे तु शुक्लके ।९९। नन्वंशानं राममानन्दकन्दं मायातीतं निर्विकारं निरीहम् । विद्याधीशं षड्गुणाकाश्रयं च वश्यं भद्रं रामनामांकितं तत् ।१००।


को प्राप्त होता है .. ८५ , पहले तो इन्द्रियाँ ही प्रधान हैं, उनमें बुद्धि श्रेष्ठ है और उससे भी श्रेष्ठ सर्वसाक्षी परमात्मा है ।। ८६ ।। दो पक्षी एक वृक्षपर बैठे हैं, उनमें एक तो फलोंका फल खा रहा है दूसरा दूरपर देख रहा है ॥ ८७ ।। तीनों धामों में जो भोग्य वस्तु, भोक्ता तथा भोग्य पदार्थ हैं। उन सबसे साक्षी परमात्मा विचक्षण है यह अथर्व वेद कहता है ॥८८॥ इस संसारमें जो कुछ प्रकाश युक्त वस्तुएं हैं और जिससे सबोंको आनन्दकी प्राप्त होती है। उसको विषयमें स्वयं यह एकमत होकर कहता है कि विषयसे लेकर बुद्धिपर्यन्त सब वस्तुएं जड़ और ज्ञानहीन हैं। जिसके सम्पर्कसे वह सब प्रिय मालूम होते हैं, वह परमात्मा राम सर्वप्रिय है ।८९।९०॥ सब सब प्राणियोंका अपना आत्मा स्वयं सबसे बढ़कर प्रिय होता है, यद्यपि वह एक है, फिर भी अनेक प्रकार दिखलाई देता है ।९१। जो प्राणी सबमें इस भावनासे चिन्मय रामको अपने हृदयमें सदा वर्तमान समझकर आचरण द्वारा हुई ईर्ष्यासे रामकी उपासना करता है, वह परमात्माका दूर्वा अथवाके फलीभूत होनेपर अनेकों बार इस संसारमें जन्म लेता है, किन्तु जबतक दृढ़ हो जानेपर फिर संसारमें उसे कुछ करना बाक़ी नहीं रह जाता अर्थात् उसकी मुक्ति हो जाती है ।। ९२ ।। ९३ ।। शास्त्रोंमें जितने भी उपाय बतलाये गये हैं, उनका एकमात्र प्रयोजन ज्ञान प्राप्त करना है यदि वह सांसारिक उपायोंसे प्राप्त हो सके तो फिर क्या कहना । ९४ । यदि उक्त प्रकारसे बनाये हुए भद्रका आसन देखकर उसपर विचार किया जाय तो विद्वानांके हृदयम ईश्वरके प्रति महती प्रीतिका उत्पाद होता है ।। ९५॥ शान्ति, लिङ्गरूपधारी, शम्भु, विष्णु, शङ्कर तथा शिवात्मा रामको प्रणाम है ।। ९६ ।। यदि उक्त प्रकारका भद्र आपमकों न रुचे तो नौ पदका भद्र बनावे। इस तिरछे भद्रम छः पाद (कोष्ठक) होंगे और दो भद्र लाल और पीत रहेंगे ।। ९७ ।। फिर दूसरा लाल भद्र बीस पादका होगा। तिरछा भद्र नौ पादका होगा। इसका पीत रङ्ग रहेगा और कई रङ्गाक फलस इसमें दो-दो पादोंकी दा शृङ्खलाएं बनायी जायेंगी ॥ ९८ ॥ बाकी सब पूर्ववन् रहेंगी। इस भद्रका नाम रामतोभद्र है और यह केवल रामचन्द्रको प्रसन्न करनेवाला है ।। ९६ ।। आनन्दकन्द, मायातीत, निर्विकार, निरीह, विद्याके स्वामी और षड्गुणोंके एकमात्र आश्रय जिनका यह भद्र नहीं प्रसन्न कर सकता। इसलिए है

सर्गः ४ ] मत्स्येष्टकाण्डम् ५९१


प्रागुदग्वा द्विसप्तत्येकनवाधिका २९० च रेखाः समाः सुपरिकल्प्य पदेषु तासाम् ।
कोणांगणत्र उपगीदृशकुंकमस्यः २१ रीताश्च ते परिधयः परिकल्पनायाः ॥१०१
कोणाब्जशृङ्खललताः सितकृष्णपीत वर्णानि चित्ररचनान्यरुणानि तानि ।
मुद्राश्च नवतिप्रथमा सिताश्च रक्ताः सपरिघाश्च जलंयंत्रि [निं] मूर्तीनाम् ॥१०२।
मुद्रा तु षष्टिपदसहिता च तत्र पक्षौ विहाय यमवायवदिकनभस्थे ।
प्रत्येककोणकपदानि चतुष्टयादि पंक्तिद्वयं स्मृतगुणंक्रमजंनभश्च ॥१०३॥
कृत्वा पदैकमशनव्यय मप्रमात्स्वेनातिसुन्दरतरं परिभाति भाण्डम् ।
रामेति द्व्यक्षरमुमेशजपं निधानं प्राणप्रयाणसमये जपतां महोदयम् ॥१०४॥
रचयेदादितः सव्यम्पादैद्विशत्यन्तावधि पर्यन्तं राममुद्रासु मध्येषु परिधिद्वयम् ॥१०५॥
आदौ तन्त्वमिता मुद्राश्चे विशन्त्येतानस्ततः द्वाविंशतिर्विंशतिषट्पञ्चद्वयमाप्ताः ॥१०६॥
घट्चतुर्दशत्रयोदशद्वादशद्रकः नवसप्तषट्पञ्च त्रयैकश्चाप्यनुक्रमं तु ॥१०७॥
भद्रं षोडशपदं च त्रिंशन्त्रिंशत्षडधिकम् ।
चन्द्रकं तत्समितं त्रिशत्त्रिमिश्रुविंशकम् ॥१०८।
नन्वषडग्निनेत्रांषुनिशिविंशत्र्यंशाधिकम् ।
षट्त्रिंशत्पाण्डुरपदं तच्चदे त्रिशद्धिमिश्रुयुतम् ॥१००॥
विंशत्कोष्ठं कमादेवं भवेन्पार्श्वेऽनुपूर्पये एकविंशत्पदे अष्टमेकोष्ठे च वापिका ॥११०॥
चतुर्विंशत्पदा कार्या परिध्यन्तेऽरुणावृधम् । अदीवाणि यत्र यत्र पदान्युर्वरितानि च ॥१११॥
तिर्यक् भद्रशृङ्खलार्थं यथेच्छं पूरयेद्धिया मध्ये शृङ्खलाः पश्चपदैरेकादशी लता ॥११२।
त्रिपदश्च शशी ज्ञेयः परिधयो षड्ि क्रमान् । कृष्णरक्तशुकलपीताश्चतुर्दिक्षु समन्ततः ॥११३॥
एतदष्टास्रदशशतं १००८ ज्ञेयं रामस्य भद्रकम् ।
अथवा मनु १४ रेखानां वृद्धिं कृत्वा प्रकल्प्य च ॥११४॥


एक दूसरा भद्र बतला रहा हूं ॥ १००॥ बहल ... की ओर से २९० रेखा खींचें। उसमें २१ कोष्ठवाले पीले रंगका परिधियां बनाये ॥ १०१ ॥ काणमे कमल बनाकर रूप-२, काले और पीले रंगकी शृङ्खला और लताएं बनावे। उनमें सब गा रू भिन्न भिन्न प्रकारक ... करके रहें। उसमें बनी सफेद और काल रंगकी मुद्राय मूर्तियोंके मध्यम थी अमुग उत्पन्न किये बिना वही रहती ॥ १०२ ॥ इसमें साठ कोष्ठोंकी मुद्रा बनली जात, हे किन्तु दक्षिणमुख तथा दक्षिण काणके पंक्तिही सारी छोड़ दी जाती है। प्रत्येक कोणक चार पाद, दो पक्ति तथा छटी और चौथी पंक्ति काम रङ्गकी रहेंगी ॥ १०३। इसके अतिरिक्त सातवीं पंक्तिके नीच एक पाद काम रङ्गका बनायेगा। वह भद्रके भारका तरह बहुत ही सुन्दर लगेगा। राम यह दो अक्षर शिवजीके जपपुञ्जका एक बड़ा खजाना है। यदि प्राण निकलने समय इसका जप किया जाय तो बड़ा कल्याण हो ॥ १०४ ॥ आदिस लेकर बाईसवे कोष्ठक पर्यन्त भद्रकी रचना करता आय। हर एक राम-मुद्राके बीचमे दो परिधियाँ रहेंगी। १०५ ॥ फिर पश्चात् मुद्रा रहेंगी। इसके बाद बाईस, इक्कीस, बीस, अठारह, सत्रह, सोळह, चौदह, तेरह, बारह ग्यारह, नौ, आठ सात, छ, चार तीन, दो, एक ये मुद्रायें रहेंगी, ॥१०६॥१०७॥ इस भद्रमें बीस, तीस, छत्तीस, बान्ह, पच्चीस, बीस, बयालीस, बास, पच्चीस, छत्तीस, बयालीस ॥ १०८। १०९॥ इस प्रकार बीस बीस कोष्ठ च गे आए रहेंगे। इक्कीस कोष्ठका भद्र रहेगा और भी कोष्ठकोंकी बापी बनेगी ॥ ११० ॥ चौबीस कोष्ठोंमें परिधिके पास कमल बनेगा। जो पाद बाकी बचे हों, उन्हें अपनी बुद्धिस भरें। इसमें पांच पादोंकी शृङ्खला रहेगी और ग्यारह पादोंकी लताएं बनाया जायेंगी ॥ १११ ॥ ११२ ॥ तीन पादोंका चन्द्रमा बनेगा और उदक आस-पास चारों ओर काली, लाल, सफेद तथा

६९२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

परिधिस्तत्र लिङ्गानामेविंशाधिकं शतम् । वाप्यो भद्राणि षट्प्रादिवत्स्र्पार्वेषु योजयेत् ॥११५॥ चतुर्विंशपदं लिङ्गं वाप्यष्टशतपादिका । द्वे भद्रे नव नव पदे ह्यष्ट षट्पदानि षट् ॥११६॥ त्रिंशल्लिङ्गानि वाप्यस्तु सप्तविंशन्मिता मताः । एकस्मिन् पार्श्वके लिङ्गाधिक्ये भद्रे प्रकल्पयेत् ॥११७॥ षष्ट्यष्टपदे शेषाण्यंककोष्ठानि योजयेत् । लिंगं कृष्णं सिता वाप्याः शेषं सर्वं पुरोदितम् ॥११८॥ पदानि शेषभूतानि यत्र यत्रेह तानि च । भद्रश्रृङ्खलयोध्यानि तदर्थे विनियोजयेत् ॥११९॥ कृष्णरक्तशुक्लपीता अन्ते परिधयो मताः । एवं लिंगयुतं रामतोभद्रं परिकीर्तितम् ॥१२०॥ अनेन देवौ सुप्रीतौ रामेशौ सत्रतस्सिव्हदौ । रामस्य पूजनार्थं हि त्विदं प्रोक्तं वरासनम् ॥१२१॥ आचार्यान् ज्ञानसंपन्नम्नत्वा तेषां प्रसादतः । वक्ष्येऽहं रामतोभद्राकृतिं च संभ्रर्मयुताम् ॥१२२॥ प्रकृतिं रामतोभद्रं विकृतिं लिंगसंयुतम् । अन्ये विकृराः संज्ञेया ह्येवं कृतिस्त्रिधोच्यते ॥१२३॥ तिर्यगूर्ध्वमान्यधिकाः शतरेखाः प्रकल्पयेत् । तत्पदेषु परिधयः षट्पडन्ते पडेव तु ॥ १२४॥ पीताः कोणेषु त्रिपदः शुक्लेन्दुः शृङ्खलाऽसिता । पञ्चदशैकादशिका वल्ली भद्रसंकमात् ॥१२५॥ सिन्धुषोडशसूर्येन्दुयुगषोडशकोष्ठकम् । कल्पयेच्चतुष्कोणेषु राममुद्रां हि पूर्ववत् ॥१२६॥ अष्टौ षष्ठ च पञ्चैधिर्धुवद्विश्चन्द्रमिनाः शुभाः तासां सीमापरिधयस्त्वेकान्तु लोहिताः १२७॥ रजनीशनेत्रमिधुपैंक्तिषु मध्यभाश्वपः । मर्यादाख्याः परिधयो भवंति द्विगुणीकृताः ॥१२८॥ अंतिम तु परिव्यन्ते सर्वतोभद्रकं लिखेत् । विशेषस्त्वत्र वापी तु चतुर्विंशपदान्मिका । १२९ । भद्रं नवपदं पद्मं परिष्यंतः सुलोहितम् । पीता नत्कर्णिका कार्या अन्ते परिधयोऽपि च ॥१३०॥

पीली परिधियां रहेंगी । ११३ । यह एक हजार आठ खानेका भद्र है। अथवा चौदह रेखाओको कल्पना करके उनकी वृद्धि करे। उसमे एक सौ इक्कीस कोष्ठोंकी परिधि बनगो वापी-भद्र आदि पहलेकी तरह समझ ॥ ११४ ॥ ११५ । चौबीस कोष्ठोंका लिंग बनेगा और अठारह पादकी वापी बनायी जायगी। दो भद्र नौ-नौ पादके रहेंगे और दस-दस पादोंके छ भद्र बनाये जायेंगे । ११६ ॥ उनमें तीस तथा बीस पादोंके लिंग रहेंगे और सत्त इस पादोंकी वापी बनायी जायगी जो कुछ बाका पाद बच उनमे दस दस पादोंसे दो भद्रोंकी रचना करे ॥ ११७ ॥ बाकी नौ का कोष्ठो यथास्थान रक्खे। इसमें लिंग काला और बापी सफेद रहेगी। बाकी सब पहलेके भद्रोंकी तरह ज्योके त्यों रहगे । ११८ । बाकी जितने पाद हैं, वे सब भद्र और शृङ्खलाके काममे आ जायेंगे ॥ ११९ ॥ काल, लाल, सफेद और पीले रङ्गकी इसकी परिधियां रहेंगी इस प्रकारके लिंगसे रामतोभद्रकी रचना बतलायी गयी ॥ १२० । इस भद्रसे राम तथा शिवजी दोनो प्रसन्न होते हैं। यहाँ रामका पूजन करनेके लिय वरासन बतलाया गया ॥ १२१॥ अब मैं ज्ञानसम्पन्न आचार्योंको प्रणाम करके उनकी कृपासे ह्मभ्रंयुक्त रामतोभद्रकी रचनाका प्रकार बतलाऊँगा ॥ १२२ ॥ इसमें रामतोभद्रको प्रकृति विकृत रहती है और भी कई तरहकी विकृतियाँ इसमें होती हैं ॥ १२३ ॥ खड़ी और बेड़ी कुल एक सो तीन रेखाएँ खींचे। इसमें भी छःछः पादकी परिधियाँ रहेंगी । १२४ ॥ कोनोमें तीन-तीन पाद पीले रङ्गके रहेंगे। चन्द्रमा उज्ज्वल रहेगा और शृङ्खला काले रङ्गकी रहेगा। सोलह पादकी वल्लरी बनायी जायगी । १२५ ॥ चार, सोलह, बारह छ, चार, सोलह पादके क्रमसे कोष्ठोंका पूर्ववत् राममुद्राकी रचना करे । १२६। आठ, छ, पाँच, चार, तीन एक, इस पादक्रमसे इसको परिधियां बनेंगी और एक परिधि लाल रङ्गकी रहेगी । १२७ । एक दो, चार और दस इनकी द्विगुणित क्रमसे मर्यादासंज्ञक परिधियां होतो हैं ॥ १२८ ॥ अन्तिम परिधिके बीचम सर्वतोभद्र बनाना चाहिये । यहाँ यह विशेषता है कि इसमें चौब स चौबीस कोष्ठोकी वापी बनायी जायगी ॥ १२९ ॥ नौ कोष्ठोंका भद्र बनेगा और परिधिके भीतर लाल

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५९३

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५९३

पीतशुक्लरक्तकृष्णवर्णानि यत्र पदानि च । भद्रोर्ध्वं शेषभूतानि तानि युक्त्या प्रपूरयेत् ॥१३१॥
तिर्यग्भद्रमुमुख्याद्यैः पीतचित्रे च ते स्मृते । एतदष्टोत्तरशतं रामतोभद्रमीशितुम् ॥१३२॥
एकं मन्त्राशून्यं मरुत्समुदनिधिं सच्चिदानन्दरूपं
मायायोगेन विश्वात्मकमिदममलं ब्रह्मविष्ण्वीशसंज्ञम् ।
सृष्टिस्थित्यन्तरहेतुं निगमकुविदृतं मन्त्रभूतात्मभूतं
सर्वज्ञं सर्वशक्तिं गुणगणममलं तन्महो भावयेऽहम् ॥१३३॥
नत्वा श्रीदेशिकेन्द्रस्य पादाब्जमप्रदम् । वक्ष्ये चाध्यात्मिकीं मुक्तिं सतां चित्तचमत्कृतिम् ॥१३४॥
पशूनां मत्सगोमादि सर्वमर्थाय कल्पते । मृगस्य नरदेहस्य सृष्टिदोषोयदोदितः ॥१३५॥
एकमेवामुना साध्यं ज्ञानं यन्मध्यरूपदम् । तद्विना तु पशुभ्यश्च नरो हीनतरो मतः ॥१३६॥
प्रतिभागान्पुण्यतमः श्रद्धावान् गुरूबोधते । कोटिष्वेकः स्वयं साक्षादङ्गे नारायणो भवेत् ॥१३७॥
केचिद्रामतोभद्रं मुद्रा मद्रिवदन्त्यिदम् । गयाकिना च मंवद्गं विविच्यन्ते च ते उभे । १.८।
लोकाः सप्त यथाऽङ्गेऽस्मिंस्तथा सप्त प्रकीर्तिताः । तेनैव रचना तुल्या ज्ञेया हस्तसमुद्भवैः । १३९॥
ब्रह्मांडं रामतोभद्रं मुद्रामूतानि मन्महे । रामशेषेणयुक्तानि सम्मतानि तु सूरिभिः ॥ १४०॥
यस्यां स्यान्मुद्रित वस्तु या मुद्रेति निगद्यते मुद्रेव पिहितं चाथ विहितं यदधो भवेत् ॥१४१॥
तद्वन्मवासु चैतासु ब्रह्ममुद्रितमुच्यते । तथाप्यासां मवाद्भातिचैतन्यः संप्रकाशनं ॥१४२।
आच्छादितोऽपिकनकश्चेत् स्फटिकैऽन्तर्बहिः किल । दीपः प्रकाशते क्कन्न लोपयेच्च नतथ्वते । १४३॥
मृण्मयिखनं ताम्रग्मं तदाकारं प्रपद्यते तथा ब्रह्म निगकारं मुद्राकारं विभायते ॥१४४॥

रङ्गका कमल रहेगा। उस कमलके रङ्ग बताये जायेंगे ॥ १३० । पीले, सफेद, लाल और काले
रङ्गको परिमित रहेंगे। भद्रमें बाकी बचे जिनन काष्ट हों, उन्हें युक्ति के साथ रङ्गोंसे पूर्ण कर दें ॥१३१॥ इसकी
शृङ्खला तथा भद्र पीले और विविध रङ्गके होंगे ॥ १३२ ॥ मैं आत्माके उस रूपका ध्यान करता हूँ जो
सदात्म अकेला है, समस्त सुखका विधान है, सच्चिदानन्दरूप आनन्दकन्द है। जिसने अपनी मायाके योगसे इस
निर्मल विश्वके प्रपञ्चोंको ब्रह्मा, विष्णु और शिवके नामसे अंगीकार कर रक्खा है। जो सृष्टि, पालन और
विनाशका हेतु है। जिसके ऋषिलाग बार-बार शास्त्रोंके अनुसार पाणिपात्रका प्राप्त हैं, जो सब कुछ
जानता है, जिसके पास सब प्रकारकी शक्तियां हैं, जो परमात्मा अनन्त और अमृतरूप है ॥ १३३ ॥ अब
मैं श्रीदेशिकेन्द्रके भ्रमरपद प्राप्त करानेवाले चरणकमलोंको प्रणाम करके सज्जनोंके चित्तमें चमत्कार उत्पन्न
करनेवाली आध्यात्मिक मुक्तिका वर्णन करूँगा ॥१३४॥ मृत पशुओके नललोम आदि सब पदार्थ
काम आ जाते हैं, किन्तु मनुष्यके मर जानेपर यह किसी काम नहीं आता है कि विधाताने इसकी
सृष्टि करके बड़ा भारी अपराध किया है ॥१३५ । इस शरीरसे आत्माका स्वरूप पहचान्नेकी साधना
की जा सकती है। यदि यह काम नहीं किया तो यह मनुष्य पशुसे भी हीन माना जायगा ॥ १३६ । करोड़ों
मनुष्योंमें कहीं कोई एक मनुष्य पवित्र गुरु तथा भगवद्भक्त रत्न रूप होता है। जो ऐसा होता है, वह
साक्षात् नारायण ही है ॥ १३७॥ कुछ लोग ऊपर वरणन किये हुए रामतोभद्रकी रचना करके उसमें साठ कोठकीकी
मुद्रा बनाकर इस प्रकार विवेचना करते हैं— ॥ १३८ । जिस प्रकार ऊपर कहे हुए सातों लोक हैं, ठीक उसी तरह यह
रामतोभद्र भी है ॥ १३९ । रामतोभद्र ब्रह्माण्ड है। इसका मुद्रा में ही प्रतिरूपमद् बनता है। उसमें रामरूप
चैतन्य (जीव) है। ऐसा कितने ही तत्त्वदर्शियोंने कहा है ॥ १४० ॥ जिसमें कोई वस्तु मुद्रित हो (अर्थात्
लपेटकर रक्खी हो) उसे लोग मुद्रा कहते हैं। मुद्रितका अर्थ है—पिहित या विहित (घिराया हुआ)।
यह शरीरादिमें ब्रह्मसे मुद्रित है। फिर भी इसके बाहर चैतन्यका प्रकाशन हो रही है ॥ १४१ ॥ १४२॥
स्फटिक मणिका कलश बना और उसके भीतर दीपक रखकर चाहे वह चारों ओरसे ढॉक दिया जाय, फिर
भी दीपकका प्रकाश कोई लुप्त नहीं कर सकता। ठीक यही दशा इस ब्रह्माण्डकी भी है ॥ १४३ ॥ जिस तरह कि

५९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

पुश्चक्रे प्रभुः सर्व्वाः पुरः पुरुष आदिशन्। इत्युक्तं जन्मचाभावात्प्रन्यवापि हि पञ्चमे १४४॥ एको वशी सर्वभूतान्तरात्मेति श्रुतेर्वचः। एको देवः सर्वभूतेष्विति चैवापरा श्रुतिः॥१४५॥ पुरः सृष्ट्वा परेशोऽन नैन ताभिरतुष्यथ म सृष्ट्वा मानुषीं मुद्रो परं तोषमगात् सः १४६॥ देवताश्चास्सृजत्पूर्वं दृष्टेमों पौरुषीं तनुम्। रूप तादृक्ष सुकृत बतेति श्रूयते स्फुटम् १४७॥ पुरुषं त्वेवाविशन्मात्मेत्याद श्रुतिः स्वयम्। पुग सृष्टैः सर्वभूतैरगृहायः स्वरट् ॥१४८। श्रद्धावल्लोमणिगण नग दृष्ट्वा मुदं गतः। इत्थस्माभिर्विष्णुतत्व श्रूयते भगवद्वचः ॥१५०। मुदं करोति देवस्य द्रावयेद्दुःखसञ्चये। इति मुद्रानिरुक्तिश्च मन्त्रशास्त्रेऽपि श्रूयते ॥१५१। अतः सर्वेषु देहेषु मनुष्याणां नृणाम् स्वर्गापवर्गयोरादाऽधिकारोऽस्मिन्न चेतरे। १५२॥ लोके प्रसिद्धिर्र्यः कश्चिद्राजमुद्राङ्कितो नरः। अधिकारीति मन्यन्ते पूज्यश्चामरादिभिः १५३। तथान्याङ्कितो जीवोऽधिकार्थं शास्त्रभूमिषु। नान्याभिर्गो विनिर्ज्ञासु शक्यन्ते म्वस्ममनः पदम् १५४॥ तस्मिंश्चैष सोपाधौ पदानि षडि गनि हि । तानि संक्षेपतः सम्यक् प्रदर्श्यन्तेऽवरुद्धये ।१५५॥ अविद्याकामकर्माणि भोक्तृभोगी सुषुप्तिश्च। एतादृशनि न षडानि देहे कारणसञ्ज्ञके । १५६॥ तमोऽज्ञानमविद्येति शब्दा एकार्थवाचिनः। अत्र गुणत्रयो नाव दृश्यते पदमु मो द्विज । १५७। लिंगे पुर्यष्टकेऽविद्याऽऽकामकर्मत्रयं स्मृतः। न साधनं तु हेतुत्वान्त्रयाणां ग्रहणं कृतम् ॥१५८॥ कार्यमस्त्वेष्वथवान्य नाहकारणे कारणात्मना। कामस्य कर्मणश्चात्र स्थितिस सूक्ष्मरूपता १५९॥ अविद्या या मुख्यतोऽत्र विद्यते कारणात्मना। दृश्यतान्तु न कामोऽत्र कामना वा श्रूयेर्तनम् ॥१६०॥

सुवर्णसे साभा ढाला जाता है ता सब उसमें अपने आप पिघल जाता है यही दृष्टान्त इस निराकार ब्रह्मकी भी है ॥ १४४ ॥ प्रभुने पहले इन जीवोंको नासृष्ट किया । उस समय उस पुरुषमें समावेश किया । ऐसा कथन अन्य कहा गया है अन्य स्थान में भी इन पूर्व वाक्यों से नहीं होता उसका ऐसा कहना है ॥ १४५ ॥ श्रुतिका कथन है कि सब प्राणियोंके अन्तरूप में रहनेवाला एक ही परमात्मा है । दूसरी श्रुति भी इस बातकी पुष्ट करती हुई कहती है कि वह एक ही परमात्मा है, जो सबतरफ सब प्राणियोंमें विद्यमान रहता है ॥ १४६ ॥ सृष्टिकर्त्तान पहिले अनेक तरहकी सृष्टियाँ कीं, किन्तु उससे उस ईश्वरको तृप्ति हुई। फिर जब उसने इस मानुषी मुद्राकी सृष्टि की, तब उसे बडा प्रसन्नता हुई ॥ १४७ ॥ अगणित क्षण करके लिए देवताओंने पुरुषका शरीर देखा तो इससे सन्तुष्ट होकर बोले कि आपने यह बहुत अच्छा किया जा इसपर सब लोग सन्तोष करते हैं ॥ १४८॥ विस्तारविशाल मुख्य आत्माका ही श्रुतिने पुरुष कहा है उस परमात्माने अग और प्राणियोंकी सृष्टि की, किन्तु उसका दृश्य प्रसन्न नहीं हुआ और जब उसने इस मानव शरीरका रूप देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुए । हे विष्णुदास इस प्रकार इन भगवान् प्रभुका कथन सुनते हैं ॥ १५०॥ वह उन रचनाओंको प्रसन्न करता हुआ सब दुःखों और पापों को धोने वाला जान फल कहा जाता है इस प्रकार मुद्रांकी निरुक्ति मन्त्रशास्त्र- में भी की गयी है ॥ १५१ ॥ इसलिए उसने सब देहों में मनुष्यों पर अधिकार दिया है । स्वर्ग और अपवर्गका अधिकार भी इसी नरजातिका दिया गया है—औरौंकी नहीं ॥ १५२॥ संसारमें भी यह बात प्रसिद्ध है कि जिस मनुष्यके पास राजाकी मुद्राका प्रमाणपत्र होता है। उसे लोग अधिकारी समझते हैं और उसकी पूजा करते हैं । १५३ । ईसी प्रकार इस राजमुद्रापदकी मुद्रा से अङ्कित जीव शास्त्रभूमिका अधिकारी माना जाता है, अन्य योनिके जीव अवश्य-धरता आत्मपद नहीं जान सकते । १५४ ॥ इस आत्मा उपाधिमें कुल साठ पद हैं । उनकी जानकारी के लिए यहाँ स्वच्छ तरह बतलाते हैं । १५५ । कारणसंज्ञक देहमं अविद्या, काम, कर्म भोक्ता भोग और सुषुप्तिके स्थान हैं ॥ १५६॥ हे द्विज तम, अज्ञान और अविद्या इन तीनों शब्दोंका एक ही मतलब है। इसमें इसमें किस गुणका ग्रहण किया जाना मुझे दीखता ॥ १५७॥ सातवें शरीररूपमें अविद्या, काम और कर्मका ग्रहण किया गया है। फिर भी कारण रूप इन तीनोंको ग्रहण ही करना पड़ता है ॥ १५८॥ कामणका चाहे कोई कार्य हो वा न हो, वहीं कारणरूपसे रहता ही है।

सर्गः ४ ] मनोहराकाण्डम् ५१५


अष्टत्रिंशत्पदानि ह विद्यन्ते सूक्ष्मदेहके । दशेंद्रियाणि पञ्चैव प्राणा बुद्धिम॑हंकृतिः ॥ १६१॥ सप्तदशात्मकं लिंगं प्रसिद्धं शास्त्रसम्मतम् । पञ्चविंशत्यनेण पञ्च कर्मक्रियात्मनः ॥ १६२॥ एष प्राणांख्यव्यापारः सकलश्च निश्वयान्मतिः । ममांश चैव धर्माः प्रसिद्धाः शास्त्रसम्मतः । १६३॥ स्वप्नाभिमानी भोर्गी रजश्चेति चतुष्टयम् । देवानामिंद्रियाणां च व्यापारश्चर्तुरुत्तर पदो १६४। स्थूलदेहे षोडशैव पदानि सम्मतानि हि । गुणाः सप्तदश तेषामपानव्यानयोः पदे ॥ १६५॥ पायूपस्थस्थानयोर्द्वये वाचोऽपि निकेतने । प्राणस्य मनसश्चापि बुद्धिस्थाने पदं विदुः ॥ १६६॥ पदानि द्वादशे मानि धीमद्भिर्येन तथा गुणः अवस्था जागृतिश्चैताः कथितानि मनीषिभिः ॥ १६७॥ मुद्रामेतादृशीं प्राप्य वेद वेदान्तार्थाम्पदम् । तस्य जन्म कृतार्थ स्यान्महतो नहिन्यथा । १६८॥ मुद्रारूपं विविच्यैव यन्नाम्नां भांकिनोनि च । उक्तं तदधुना किंचित्संक्षेपेण निरूच्यते ॥ १६९॥ रामेति लोकरमणाद्रमन्ते योगिनोऽमले । परमानन्दरदं नित्यं तेन राम इतीर्यते । १७०॥ रसेनेवामुना सर्वे जीवा जीवन्ति नान्यथा । इमं रमणथ लब्ध्वा भवन्त्य नन्दिनोऽखिलाः ॥ १७१॥ विशता येन विश्वेषु सर्वं चेतयते जगत् । न तं चेतयते कश्चिन्न राम इति कीर्त्यते । १७२॥ सत्ता येनाखिले विश्वे म देवोऽत प्रकीर्त्यते । अमन्मनाप्रदः साक्षाद्राम इत्यभिधीयते । १७३॥ यथा प्रसिद्धं रामेति ब्रह्मणो नामनायकम् तथा लिंग पदं व्योम निष्कलः परमात्मातः ॥ १७४॥ लीयन्ते यत्र भूतानि निर्गच्छन्ति यतः पुनः । तेन लिंग पद व्योम निष्कलः परमः शिवः ॥ १७५॥ इति शास्त्रविदां वाणी श्रूयते तत्त्वदर्शनाम् । अतः सर्वाणि नामानि स्थाण्वन्तान्तरात्मनः ॥ १७६॥ सति तेन शब्दभेदं रूपभेदेऽपि सर्वथा । तत्त्वतो नैव भेदोऽस्ति व्यर्थैकस्य वस्तुनः ॥ १७७॥


उस शरीरमे काय और कर्म ये दोन तु मलगम रहते है । १५९॥ इस कारणात्मामे अविद्याकी प्रधानता है । आत्मसवे मे इसमे काम रहता है भोक्तृत्व भावका हा रहता है । यह ज्ञानका सिद्धान्त है १६० । इस सूक्ष्म देहमें कुल साठ पद हैं। दस इन्द्रियका पाँच ५ प्राणका, बुद्धि, मन और १ अहङ्कारका सत्रह पद शास्त्रों-में कहा गया है। पाँच ५ विषय ग्रहण करनेवाली इन्द्रियांका, पांच कर्मकारियोंका और पाँच प्राणोंके व्यापाराका कुल सत्रह होकर अड़तालीस पद होते हैं। १६१ - १६३। स्वप्न, अभिमानी, भोग और रज ये चार देवताओं और इन्द्रियोंमें प्रवृत्ति न करने वाले इमलिय स्वप्न अवस्था सम्बन्धी साठ ही पद माने गये हैं। किन्तु गुण सत्रहका ही रहेगा। उनमेंसे दो पद अपान और व्यान वायुका है ॥ १६४। १६५। पायु और उपस्थस्थानका दो पद, वाणी और रसनाका दो पद, प्राण, मन तथा बुद्धिका एक-एक पद ॥ १६६॥ ये बारह पद मान्त्रा और अंतम पांच ५ इन्द्रियोंके गुण, अवस्था तथा जागृति कहा है। १६७। इस प्रकारकी मुद्रा प्राप्त करके प्राणी वेदान्त अर्थवाली पद पाता है। इसको पाकर जन्म कृतार्थ हो जाता है। अन्यथा नष्ट ही हो जाता है॥ १६८। मुद्राके रूपका विवेचन करके उसके नामोंसे संकेतित मुद्राओंकी बात संक्षेप रूपसे बतलाते हैं॥ १६९ । संसारके प्राणियोंको आनन्द देनेके कारण भगवानका 'राम' नाम पड़ा है। योगीलोग इसी अमल परमानन्द पदमें आनन्द लेते हैं। इस लिए भी राम 'राम' कहे जाते हैं ॥ १७०। इसी प्रकार संसारके सब जीव जीते हैं, इस सरस पदको पाकर लोग आनन्दमय हो जाते हैं ॥ १७१। जो भगवन् प्रविष्ट होकर सारे जगत्‌को चैतन्य कर देता है। जिन रामको चैतन्य करनेवाला कोई भी नहीं है, व ही राम 'राम' कहे जाते हैं ॥ १७२। जिन भगवान्‌की सत्ता समस्त विश्वमें है। वे इसी कारण सर्वेश कहलाते हैं। वे भगवन् जगत्में भी अपनी सत्ता बनाये रखते हैं। अतएव लोग उन्हें राम कहते हैं ॥ १७३॥ जिस तरह उनका राम यह नाम प्रसिद्ध हुआ। उसी तरह परमात्माके लिङ्ग और रूप भी हैं।॥ १७४॥ लिंग लिंगका अर्थ इस प्रकार करते हैं-जिसम जगत्के सब प्राणी अन्तमे लीन होते और सृष्टिके आदिमे जिससे प्रादुर्भूत होते हैं उसकी लिंग संज्ञा है। वह लिंग, शून्य निष्कल और परम कल्याणकारी है ॥ १७५॥ इस प्रकार तत्त्वदर्शी शास्त्रोंकी बातें सुनायी पड़ती हैं। इससे यह

५९६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

स ब्रह्मा स शिवश्चाथ स हरिः स सुरेश्वरः। सोऽक्षरः परमश्चैव स स्वराडिति वेदवाक् ॥१७८॥ यस्यैवै सच्चिदानन्दाः स व्यापी सर्ववस्तुषु, नेदानीं नु प्रियं भाति वस्त्वमात्रं प्रदृश्यते ॥१७९॥ वार्तायां च सर्वत्र रामनामाङ्ककीर्तनम्। अत्रिद्विद्यापमानेषु श्रूयते गुरुपुङ्गवात् ॥१८०॥ अग्रेत्वेक आत्मा वा इदमग्रः पुरा जनैः। आसीत्ततैव लोकानां पालानां सृष्टिरिच्छया ॥१८१॥ पुनश्च सर्वदेवानामनुकल्पार्थमीप्सितम्। इन्द्रायतनं तन्न सृष्टेस्तेभ्यस्ततः परम् ॥१८२॥ विचार्य स्वापदां पश्यन्त्सीमाशं प्रविष्टवान्। तदात्मानं ब्रह्म तत दृष्ट्वांशदेतो किल ॥१८३॥ कश्चैष मनि सप्रश्नं येन पश्यन्ति विन्दति। इत्यादिभिर्विभज्यैवं तदेतद्द्रष्ट्रादिभिः ॥१८४॥ संज्ञोऽन्तःसम्य नामानि चोक्त्वाऽन्यच्चेतसोऽयमा। एष ब्रह्मेत्यादिभिश्चेदंश्चोक्तं चाखिलं जगत् ॥१८५॥ प्रज्ञानेत्रं च प्रज्ञाने प्रतिष्ठितन्नेनेव हि। प्रज्ञानं ब्रह्म श्रुत्यान्ते त्रिकाले विनिश्चितम् ॥१८६॥ तद्राम सच्चिदानन्दघनानन्दं न संशयः। तैत्तिरीयस्यशाखायां ब्रह्मण लक्षणं पुरा ॥१८७॥ सत्यं ज्ञानमनन्तं सङ्कीर्त्य वेत्तुगुहादिकम्। यस्माद्वस्तुते कामानामंग्युपपद्येव हि ॥१८८॥ फलं ज्ञानस्य चोक्त्वाऽथ तस्माद्ब्रह्मात्मकं किल। क्रमोत्पत्तिर्हि शुभानां कोश निकवेदनम् ॥१८९॥ तत्फलं तदनात्मत्वं मदष्ट्यानन्दात्मनः पुच्छं ब्रह्मेति निर्णीय तदसत्समशीनितः ॥१९०॥ असन्नेद्भवति ज्ञेयं सत्तीर्त्य च तत परम्। कामयित नदेवेदं सृष्ट्वाऽभूत् जगदात्मना ॥१९१॥ कृत्वा तस्मिन् प्रविष्टेव मच्चामच्चाभवत्किल। अपानप्राणयोश्चेष्टा यस्या सीन्वे प्रजायते ॥१९२॥ अन्यायस्य त्वेव आनन्दयति चाखिलान्। भयहेतुस्तदेवेह त्रासादीनां प्रदर्शकम्। ॥१९३॥ मानुष्यारभ्य ब्रह्मान्ता आनन्दा ये शतोत्तराः। सिद्धस्तत्र परब्रह्मानन्दज्योतिं विनिश्चितम्। ॥१९४॥

सिद्ध हुआ कि उस सच्चिदानन्द ही नाम और रूपान्तर बहुत हुए भी वास्तवमें सब एक हैं। इसकी वास्तविक् स्थितिमें कोई भी अन्तर नहीं आता ॥१७८॥ १७९॥ वही ब्रह्मा, वे ही शिव, वे ही विष्णु और वे ही देवराज इन्द्र हैं। वे ही अक्षर ब्रह्म और वही सर्वव्यापक तथा विश्वरूप स्वराट् हैं ॥१७८॥ वे ही सब वस्तुमात्र रूप चित् और आनन्द रूपसे आनन्दरूप हैं। जिसके कारण सब चीज अच्छी लगती हैं ॥१७९॥ सब वेदोंमें रामरूपी ब्रह्मका कीर्तन विद्यमान है। गुरुकुल के अनुग्रहसे आदि, मध्य, अन्त सब समयमें रामहीका कीर्तन सुनायी पड़ता है ॥१८०॥ ऐतरेय उपनिषदमें लिखा है कि सर्वप्रथम यह आत्मा अकेला था। उसकी यह इच्छा हुई कि हम लोक और लोकपालोंकी सृष्टि करें ॥१८१॥ ऐसा विचार होनेपर उसने सृष्टिके अनन्तर नाना प्रकारके इन दानादिक और उत्तम प्रकारके जीवोंकी सृष्टि की ॥१८२॥ तदनन्तर उन्होंने अपने-अपन स्वरूपमितका विचार किया और एक सधाम देवनगरोंके राजा इन्द्र बने ॥१८३॥ जो कि इस संसारका देवता तथा संसारको चलानेवाला कौनसा है वह कौन है? इसका ज्ञान आदि नाम बतलाते हुए "यह आत्मा ही सब कुछ है" आदि वाक्यसे उन्होंने इस प्रश्नको हल कराया ओर बतलाया कि सन्, चित्, आनन्दम् लेकर चुने नयन नाम हो गया है। पूर्व समय तैत्तिरीयक श्रुतिमें ब्रह्मका लक्षण बतलाते हुए रामने सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप उपाधि दी है। इस संसारमें जो कुछ दृश्य साधनका भोक्ता और खाने-पीनेका है, वह ब्रह्म ही है। इनमें से, यह ले पाया गया कि समस्त सृष्टि ब्रह्ममयी है। सब प्राणियोंका क्रम-उत्पांत, पंचकोशका ज्ञान और आत्माकी विभिन्नता आदि दिखाकर बतलाया है कि सत् और असत्‌का प्रतीयमान इन सबका मूल कारण ब्रह्म ही है। १८४-१९०॥ फिर कहकर कहा कि सत् और असत् यह क्या वस्तु है? इस प्रश्नको हल करते हुए कहते हैं कि जो अदृश्य अव्यक्त और जगत्‌का आत्मा बनकर कामनाओंको धारणा हुआ उसमें लीन हो जाता है वही सत् है। जिसके अस्तित्त्वमें प्राण और अपानकी चेष्टा जायमान होती है, उसे असत् कहते हैं ॥१९१॥ १९२॥ यह आत्मा ही सारे संसारको आनन्दित करता है। वास्तविका एकमात्र ब्रह्म भयहेतु है ॥१९३॥ मनुष्यसे लेकर ब्रह्मपर्यन्त तथा इसके भी आगे जो आनन्दविन्दु है, वह एकमात्र परब्रह्मानन्दका ही आभास है।

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् १९७


म यस्यायं नरोपाश्चादित्येवञ्च वर्तते । स एक इति ज्ञात्वा' पापं पुण्यं कृतञ्चने ॥१९५॥
न संतापयतस्स्वेवं सम्यक् सर्वं प्रकीर्तितम् । यत्प्रब्रह्म हेयापेक्ष्यः सङ्गत्स्येति न संशयः ॥१९६॥
छांदोग्येऽपि स वेदेति मन्त्रोपक्रम्य प्रक्रणः । तेजोऽन्नादिका सृष्टिः यन्मूला मा स्थितिरितिः १७ ।
जीवात्मना प्रवेशश्च व्याकृतिर्नाम रूपयोः अनेकत्वान्नपदस्य मन्यर्दनेकत्वताऽपि च ।
मदर्थभावना-! च मनुष्ये च बहूक्तिता । १९८।
लज्जाने च गुगेतांन ज्ञानन्मोक्षोःपुनर्भवः ।
मध्यब्रह्माभिमंन्ग्रन्येव मन्त्रब्रह्मकीर्तनम् । तद्रामान परं ब्रह्म सृष्टिस्थित्यन्तहेतुकम् ।।१९९।।
अन्यस्यामपि शाखायां प्रश्नप्र-युक्तिः स्फुटम् । मनःप्र, णेन्द्रियाणां यन्मनः प्राणैन्द्रियं हि तत् ॥२००॥
सर्वपामनुभूतेः सन्निष्टितारिद्वितात्परम् विषयो नेन्द्रियाणामित्युक्त्वा तस्य शभापनम्२०१ ।
सर्वदर्शी सर्ववेतृदेवना जयकारणम् । तदत्ताने च देवानां गुरुह्यानुपूर्णात्निता ॥२०२।
धैर्यन्न नान्यन्मानुष्यं प्राप्य जन्म न वेत्त चेत् । विनाष्टिमहती तस्य चेति प्रोक्त ततः परम् ॥२०३।
अध्यात्माधिदैवसिद्धा विद्यापाश्चमत्र च ब्रह्मज्ञालिन राज्ञाना हानिन्मन्प्रमितित्ययम् ॥२०४॥
मम्रजो महिमा श्रुत्या कीर्तितो ह्यामना मण्म् । तद्रामपि गुरोश्चेय नान्यथा ग्रन्थकाटिभिः ॥२०५॥
मुडकेऽपि परा विद्या शिष्या जय ब्रह्मणः । सृष्टिश्चानेकदृष्टांतरुक्ता तस्मिन्न मस्थिता ॥२०६॥
लपन्नासि हि सर्वत्र विश्वं मत्र हि गन्मयम् तारुण धनुषा चैव लक्ष्य आत्मानपर्ण तथा ।।२०७।

एषा लिखा है। जो मनुष्यका उपाधिय भूत विद्यमान है। उस एकमात्र प्रभुका ज्ञान सत्तपद कर्म-अधर्म तथा पाप पुण्य कुछ शेष नहीं रह जाता, १९४ । १९५, तब किसी प्रकारका सन्ताप नहीं करना पड़ता। ये सब गुण जिसमें हैं, वह ब्रह्म ही है। उसको आत्मा देखकर निश्चित होता है कि वह ब्रह्म आराधनकारी ही है। इसमें संशय नहीं है ॥१९६॥ छान्दोग्य उपनिषदमें यह कहा है कि ब्रह्मसे ही अन्नादिका सृष्टि हुई है और उसीके आधारसे इस जगत्का पालन-पोषण होता है । १९७ । जीवात्माके द्वारा ही जगतका प्रवेश होता है, किन्तु देहके अभाववश उसके नाम और रूपमें अन्तर पड़ जाता है। स्वस्वरूपका उसके विचार शिक्षा ही का विषय मात्र था, इसलिये साव एकता ज्ञान ही मुक्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन है। जब तक मनु पदका ज्ञान नहीं होता, तब तक एकता रहता है और सद् ब्रह्म विद्यमान रहनेपर एकताके स्थानपर बहुत्व आ जाता है। उस मन् पदका ज्ञान होनेपर गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान प्राप्त होकर पुनर्जन्मविमुक्त मोक्षपद प्राप्त होता है॥ १९८॥ शाखाके सद्ब्रह्म जिसका कथन उपमानों है, उसका इतना ही यथार्थकीर्तन है कि वह राम ही परब्रह्म हैं। उन्हींके द्वारा इस जगत्की सृष्टि, पालन और प्रलय होता है ।१९९॥ अन्य शाखाओंमें भी प्रश्न और उत्तरके रूपमें अनेक प्रश्न और प्रत्युक्तियां हुई हैं। उनसे भी यही सिद्ध होता है कि मन, प्राण और इन्द्रियोंका जो मन, प्राण और इन्द्रिय है। वह ब्रह्म ही है। वह प्रत्यक्षदृश्य प्रकृत जन और अज्ञान इन दोनोंसे परे है। यह सबका अनुभव है। किन्तु वह इन्द्रियोंके विषयगोचर नहीं होता अर्थात् अनुभवसे ही जाना जाता है। यह कहकर उसका समापन किया गया है ।। २०० ।। २०१ ।। वह प्रत्यक्ष सब कुछ देखता है सब जानता है देवताओंके विजयका कारण है और वह देवताओंके लिए भी अज्ञात रहता है। गुरुका उपासन करनेसे ही ज्ञानकी प्राप्ति होती है॥ २०२॥ विद्या ही मनुष्यका मनुष्यत्व है। इस संसारमें जन्म पाकर जिसने विद्या नहीं पायी तो यह उसका एक बहुत बड़ा विनाश है। ऐसा कहा गया है ॥ २०३ ॥ अधिदैवका भी अदर्शन करनेवाला बह्मज्ञानका विद्याका साधन होता है, परोक्ष ज्ञान होता है और अन्तमें उसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है ।। २०४ ।। श्रुतिने स्वयं विस्तारपूर्वक ब्रह्मकी महिमाका गान किया है। इसलिए जिज्ञासुको चाहिए कि वह गुरुसे रामका ज्ञान प्राप्त करे। वैसे करोड़ों ग्रन्थ पढ़नेसे भी उनका सच्चा ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता ॥२०५॥ मुण्डक उपनिषदमें कहा गया है कि ब्रह्म और ब्रह्मका विषय जाननेके लिए गुरु प्रधान हैं। उक्त उपनिषदने अनेक दृष्टान्तोंसे सृष्टिका वर्णन किया है ॥ २०६ ॥ वह कहता है कि यह सारी सृष्टि उसी ब्रह्ममें स्थित है और अन्तमें उसीमें

५५८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

महिमातिशयस्तस्य तद्भावा भाव्यशेषकम् । अगोचरं च सर्वेषां ध्यायमानोऽनुपश्यति ॥२०८॥ वेद हि तं गुहायां योऽविद्याग्रंथिं भिनत्त्यसः । कृपया वृणुते ब्रह्म यं कश्चित् सुमधस्करम् ॥२०९॥ तेनैव लभ्यतं साक्षान्नान्यथा यत्नतोऽपि हि । अथवा य परब्रह्म प्राप्तुमिच्छेन्न भावकः ॥२१०॥ तेनैव हेतुना लभ्यो नान्यथा साधनान्तरैः । दलहीनादिर्भानेदं लभ्यते तैस्तु लभ्यते ॥२११॥ मन्थामयोगतः सत्त्वं शुद्धं येषां विचारतः । ते परान्तेन कालेन परिमुच्यन्ति नान्यथा ॥२१२॥ यथा नद्यः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपतः । तथा विद्वान्कलावैद्यप्रतिष्ठाणं च भक्ष्यम् ॥२१३॥ प्रारब्धकर्मणां साक्षान्मोक्षमप्युपतेभवेत् । यो वेद परं ब्रह्म स ब्रह्म भवतीति च ॥२१४॥ सर्वं ममुदितं दृश्यानन्दामत्रकाचदूषणम् । पूर्णमदः पूर्णामिदं काण्डकाया सनातनः ॥२१५॥ आदिमध्यावसानेषु पूर्णं ब्रह्मव निश्चितम् । पूर्णं पराक्षरूपेण ज्ञातं तत्पदमक्षिरम् ॥२१६॥ प्रत्यक्षं त्वपदारूप्येन स्थितं भूतमयेषु च । पूर्णातिरूपज्ञान्पूर्णं सोपाधिकमिहोच्यते ॥२१७॥ सम्पूर्ण शाखग्राम्दृष्ट्यां स्वाविद्यानाशतः स्वयम् । प्रत्यग्दण्डमय लक्ष्यावाशेषविशद्रिग ॥२१८॥ विगतापाधिकं सर्वं पूर्णमेवावशिष्यते । तद्रामं परमं ब्रह्म योगिध्येयं सनातनम् ॥२१९॥ सर्वधर्मानवेधंन श्रुतिगान परात्परम् । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥२२०॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव २२१ इत्याह भगवान् साक्षाद्वेदाव तज्जलानांते । एवं मयामु श्रुतिषु स्मृत्यादिषु यदीरितम् ॥२२२॥

लय सा हो जायगा क्योंकि समस्त विश्व उसका स्वरूप है ... कि जैसे धनुर्धारी एक लक्ष्य-फोड़ धनुषसे लक्ष्य बंधना सीखता है। उसीतरह व ध र-२... ब्रह्मके लिए आत्मसमर्पण करना सुगम ॥ २०७ ॥ उस ब्रह्मकी बड़ी महिमा है। उसका जन्म बहुत दूर सकता है। वह सबसे छुपा हुआ है, किन्तु ध्यान द्वारा देखा भी जा सकता है॥ २०८ ॥ जो प्राणी हृदयके उस बन्द हुए ब्रह्मको जान लेता है, वह अविद्याका कठिन पाश काट... सा है। वही प्राणी इन सबनाम उसे साक्षात् उस प्राण... प्राप्त हो सकता। इसके अतिरिक्त जिस किसी भी साधन द्वारा ईश्वरको प्राप्त करनेका अभिलाषी प्रयत्नपूर्वक साधनासे ही वह प्राप्त हो सकता है अन्यथा कदापि नहीं ॥ ... प्राप्त कर सकता। बहुधा, उद्धारका हित सकता है, विचार द्वारा जिसका चित्त एवं पवित्र व शुद्ध हो जाता है, वे सब लोग महापदको प्राप्त होकर कल्पके अन्तमें मुक्त होते हैं ... । जिस तरह कि नदियाँ नाम और रूपके साथ अन्तमें समुद्रमें जाकर मिल जाती हैं उसी प्रकार कलाके मोहका त्याग तथा कलाकी प्रतिष्ठामें लीन हो जाता है ॥ २१३ ॥ वह अपने प्रारब्ध कर्मोंके भोगनेके पश्चात् ऐसा प्राप्त होता है कि जो उस परब्रह्मको जानता है वह साक्षात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २१४ ॥ ... संसार बना है, वह सब ही चिदानन्दरूप ब्रह्म ही है। काण्डक श्रुति भी संसारके लिए इस प्रकार कहा गया है कि बस, वह ही पूर्ण है बाकी सब अपूर्ण है ॥ २१५ ॥ आदि, मध्य और अन्तमें सब पूर्ण ही पूर्ण है वह निर्विकल्प है पराक्षर रूप भी वही पूर्ण माना जा चुका है। २१६ ॥ वह प्रत्यक्षमें सब प्राणमयमें रहता है। इस पूर्णके निरूपणसे वह सोपाधि कहा जाता है ॥ २१७ ॥ वह शास्त्र और शाखा इन भारोंसे स्वयं अपनी अविद्यानावका नाश करता हुआ उपनिषद्‌की आलोक आधारपर सब काम करता है ॥ २१८ ॥ जबकि उसकी उपाधि नष्ट हो जाती है तो वह पूर्णरूपसे शेष होकर अकेला रह जाता है। जो दुख हरण करनेवाला है, वे योगियोंके ध्येय एकमात्र राम हैं ॥ २१९ ॥ समस्त धर्मोका निर्णय करते हुए श्रुतियों द्वारा भगवान्‌ने स्वयं यह कहा है कि मैं इस संसारका प्रभव (उत्पन्नकर्ता), और प्रलय (नाशक) हूँ ॥ २२० ॥ हे धनंजय मुझसे परे और कुछ है ही नहीं। यह समस्त विश्व मुझमें उसी तरह पिरोया हुआ है, जैसे धागेमें मणियाँके दाने पिरोये रहते हैं ॥ २२१ ॥ ऐसा भगवान्‌ने वेदोंमें कहा है। उसी तरह श्रुतियों और स्मृतियोंमें भी कहा है कि परब्रह्म राम जी

सर्गः ४ ] मनोहरणकाण्डम् ५९९

सर्गः ४ ] मनोहरणकाण्डम् ५९९


तन्नाम परमं ब्रह्म योगिगम्यमनामयम् । अनन्तनामरूपैश्च विधाकारं स्वमायया ॥२२३॥
भूत्वा सर्वेषु भूतेषु वशार्कं भूतचालकम् । स्फुटमप्यस्फुटं तेषामज्ञानं स्वात्मनः सदा ॥२२४॥
ब्रह्मज्ञाने परो हेतुः सर्वोऽपि परिवेष्टितः । मन्त्राः सन्ति तेनेदं विद्वद्ब्रह्म न प्रकाश्यते ॥२२५॥
परांचि खानि प्रभुणा सृष्टानि देवते तथा । नाऽऽस्ते सांतरात्मानं प्रसिद्धं श्रुत्युदाहृतम् ॥२२६॥
सर्वोऽपि मनुजो दम्भो गृहपुत्रात्मसम्भवम् । किञ्च कामदामोय तनाराध्यश्च काञ्चने ॥२२७॥
यदि भूतात्मदामन्यः स्वात्मानं परमुच्यते । तदा कस्याथ रोषेण व्यथयेद्यस्त्वयं हि ॥२२८॥
आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥२२९॥
इत्याह च श्रुतिः साध्वी बृहदारण्यगाऽभवत् । यस्यान्तरातिरात्रं स्यादामनत्रय मानवः ॥२३०॥
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते । इति भागवतश्चाथोपनिषाय प्रोक्तराञ्चयम् ॥२३१॥
भोगासक्तः पुमान्देवमेकाही रहने न च । तृष्णात्रयसम्पन्नो वारंवारं विपद्यता ॥२३२॥
स लोकैगुहार्थं श्रुत्वा दुर्बलः कामजः । जाया सम्पादयेत्यादावित्यूचेऽत्र गृहार्थः ॥२३३॥
पुत्रानुत्पाद्य देवेभ्यो देवानर्चयेत्ततः । पुत्राभावे स्वयं यजेदर्थं च धनेच्छया ॥२३४॥
अनिशं हूयते चित्ते न कामोज्झेद् व्यपेत्यतु । शास्त्रज्ञोऽप्यनिकेतश्चानन्नश्वाथः प्रतिग्रहम् ॥२३५॥
धनेच्छी याचयन्येवं ग्रामे भ्रमति सर्वदा । वायुभक्षाननां तु का वार्त्ता ब्रह्मचिन्तने ॥२३६॥
अनेकपुण्यपुञ्जैः सद्कुले जन्माऽथ लब्धिभिः । भजंत सद्गुरूनेव मार्गोऽहि पदा सदा ॥२३७॥
रामचन्द्रदर्शनार्थं मुद्रां स्वां पूरयन्मुदा । दृष्ट्वा गजादलपामन्त्रं स्वपादसलक्षणंक्वचित् ॥२३८॥

योगियोंके गम्यमान और कल्याणमय उस अनन्तब्रह्मने अपनी माया द्वारा विश्व आकारावाले बनकर सब प्राणियोंमें विद्यमान रहकर उनको सञ्चालन करते हैं। यद्यपि वह सबसे वशीभूत हैं, उनके आगे स्फुट या अस्फुट भावसे सामने होता हुआ भी वह ईश्वर नहीं दीखता ॥२२३-२२४॥ इस प्रकार ज्ञानमें अपनी आत्मा ही सर्वप्रधान है किन्तु मन्त्रोंकी शक्ति उसपर आवरण डाले रखती है। यही कारण है कि उस पर विद्वत्स्वरूप ब्रह्मज्ञान नहीं होता ॥२२५॥ एक प्रसिद्ध श्रुतिमें भगवान्ने कहा है कि प्राणियोंकी आंखें मैंने बाहर बनायी हैं; इसलिए लोग अन्तरात्माको नहीं देख पाते ॥२२६॥ संसारके सब मनुष्य अपने धन, स्त्री और पुत्रके दास बन रहे हैं। इसी कारण अन्तरात्मा उन्हें दीखती ही नहीं ॥२२७॥ यदि उनका ज्ञान न होकर सदा आत्मानन्दस्वरूप विष्णुमें परे रहें और आत्मा आत्माकी साक्षी बनाकर सब काम करे तो उन्हें लज्जाका बात ही नहीं रहता अथवा यदि जीव आत्माको जानकर यह समझ ले कि मैं ही वह परम पूज्य ब्रह्म हूँ तो फिर किसके लिए अपने शरीरका सांसारिक ज्वालामें भूने? यह बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा गया है। इसके अतिरिक्त साक्षात् स्वयं भगवान्ने बहुतसा कहा है कि जो प्राणी और दिशा ओर अपना चित्तवृत्ति न लगाकर आत्मासे प्रेम करता है, आत्मामें ही तृप्त रहता है और आत्मामें सन्तोष करता है। उसके लिए संसारमें कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता अर्थात् उस से उसकी सब काम पूर्ण हो जाता है ॥२२९-२३१॥ भोगोंमें आसक्त प्राणी पहले एकाएक इस ओर नहीं झुकता । वह तो तीन प्रकारकी इच्छाओंके चक्करमें पड़कर सदा धन पानेकी चेष्टा करता रहता है ॥ २३२ ॥ गृह सूत्र विधाने यदि स्वयं को अपुत्री समझता है तो पुत्रके उत्पादनमें तत्पर हो जाता है और इसके लिए 'जगतू यज्ञ' कर सकता है, करता है । २३३ । दैवतअं तथा तीर्थोंकी सेवासे यदि पुत्र उत्पन्न कर लेता है तो सूत्रात्मक भरण-पोषण तथा यज्ञके लिए धनकी इच्छासे मन ही मन रात दिन जला करता है, फिर भी अपनी कामना नहीं पूर्ण कर पाता। चाहे शास्त्रका पण्डित तथा सर्वज्ञ विद्यावान् हो क्यों न हो, यदि वह धनका अर्थी है तो प्रतिग्रह घर कुत्तेकी तरह दौड़ता रहता है। फिर यदि कोई अयुगपन्मति (समझदार) नहीं है तो इसके लिए आत्मचिन्तनकी चर्चा किस कामकी ॥ २३४-२३६ । अनेक प्रकारके पुण्य एकत्रित होनेपर प्राणी अच्छे कुलमें जन्म और सत्संगोंकी संगति पाता है। फिर उनकी बातोंपर चलता हुआ कथञ्चित् रामरूप ब्रह्माके दर्शनार्थ मुद्राओंकी भी पूर्ण करनेका उपाय करता है और

६०० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

तं पूरणप्रकारं तु संक्षेपेणोच्यतेऽधुना । यथा लोकेऽञ्जनेन सम्यक्संवाद्य पूर्वतैस्सिद्धैः ॥ २३९॥ निधिः प्रत्यक्षतस्तस्य दर्शनं याति नान्यथा । एवमत्रापि सम्पूर्य साधनं यच्चतुष्टयम् । २४० । सम्पाद्य लभते शुद्धं रामेति पदमव्ययम् । मायाविद्येत्यितवर्णं यद् द्वयं तन्माधनं यथा ॥ २४१॥ शुद्धाविद्यामयं चेति प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः । साध्यं साधनं च शास्त्रञ्च मिथ्याऽविद्यामयं त्रयम् २४२॥ ज्ञानोत्तरमिति मतं तस्मात्तद्दुर्गमीरितम् । चतुष्पादसाधनं सम्पूर्णमित्यभिधीयते । प्रत्येकं साधनं यच्च चतुःसाधनमुच्यते ॥ २४३॥ विवेकवैराग्यशमादिषट्कं मुमुक्षुता चेति प्रसिद्धमेतत् । लक्षणानि प्रत्येकमुत्तमानि प्रोक्तान्यमीषां स्मृतिभूमिकासु २४४॥ साधनानां चतुष्कं च ह्येषणात्यागपूर्वकम् । संन्यासश्च गुरोः सेवाश्रवणादित्रयं ततः ॥ २४५॥ पूर्वोत्तरसमाधी च पुञ्ज एकादशात्मकः । एतेषां तु मयः साक्षान्प्राणाद्या मङ्गतिर्मया ॥ २४६॥ मुमुक्षया तु न्यासादि षष्णां साक्षाद्विहोच्यते । समाधिरुत्तराक्षापि पृथगेवेति सम्मतः ॥ २४७॥ पूर्वत्रयाणां न विना मुमुक्षा द्योममन्तः । पर्नेः सदानमर्चत्र पदानि पूरयन्त्यलम् ॥ २४८ सर्वाणि तानि प्रोच्यन्ते श्रोतृणामवबुद्धये । दशेन्द्रियाणि नैषां तु गोलकानि नवैव तु ॥ २४९। प्राणापानौ मनोबुद्धी तस्माद्धर्मश्च तन्मिताः । बुद्धर्शने यथाऽपीश क्रिया तन्वत्रता मता ॥ २५०॥ उभयेन्द्रियधर्माणामन्योऽमीसाधनाग्रहः । सप्तविंशतिसंख्यानि पदान्येतानि साधनैः २५१। योग्यानि लाञ्छितुं सम्यक् पूरयन्त्वेन सर्वथा । तदा यत्परमं ब्रह्म रामेति पदमव्ययम् । २५२॥ याति प्रत्यक्षतस्तेन कृतकृत्यो हि जायते । एतद्धता विधानेन रामतोभद्रमुद्रिके ॥ २५३। रामश्च कथितश्चाथ सर्वतोभद्रमीयन । स्वानतो नामरूपाणि संशयस्यापनुत्तये ॥ २५४॥

यदि उसके साथ सज्जन गुणिसे उसे सही समयपर ले जायँ तो वह अपनी साधना पूरा कर लेता है ॥२३७॥२३८॥ उसको पूर्ण करनेका प्रकार मैं यहाँ संक्षेपमें व्यक्त करता हूँ, जैसे संसारमें देखा जाता है कि आँखमें एक प्रकारका अंजन लगाकर गँवा दिए हुए खजानेको भी प्रत्यक्ष देख लेते हैं। उसी प्रकार पूर्वजो द्वारा बताये हुए मार्ग साधनाका सम्पादन करके प्राणो 'राम' इस शुद्ध और नाशरहित पदको प्राप्त कर लेता है। जिस तरह कि मायाया और अमित वर्णोंके शब्द सद्रूपकी प्राप्तिका साधन है, उसी तरह तत्त्वदर्शिंयोंने शुद्ध और विद्यमान साधन बतलाये हैं। साध्य, साधन और शास्त्र ये तीनों मिथ्या और अविद्यामय हैं ॥२३९-२४२॥ सकाम जितने भी सिद्धान्त हैं वे सब प्राणीको ज्ञानके पास पहुँचाते हैं। जितने चतुष्पाद साधन हैं, वे पूर्ण कहे जाते हैं और प्रायः सब साधन सङ्ख्यासे ही हुआ करते हैं ॥ २४३ ॥ स्मृतिकी भूमिकामें विवेक वैराग्य, शम, दम बादि ६ धर्म और मोक्षकी इच्छाका उत्पन्न होना ये सबके उत्तम चिह्न बतलाये गये हैं। २४४॥ इन सबमेंसे सबसे पहला साधन इष्णाओंका त्याग करना है। फिर संन्यास, गुरुकी सेवा, श्रवण, भजन, कीर्तन, पूर्वात्तर समाधि तथा एकादश प्रकारके पुञ्ज ही साधन हैं। इन सबके साथ प्राण आदिकी संगति होती है। २४५ ॥ - २४६ ॥ मोक्ष पानेके लिए षष्ठीवर छः प्रकारके न्यास आदि कार्य्य ज्ञान चाहिये। किन्तु उत्तर समाधि इसमें अलग ही रहेगी, यह बात सब लोग मान चुके हैं ॥ २४७ ॥ पूर्वके तीन समाधियोंके बिना मोक्ष नहीं प्राप्त हो सकता, इन साधनसमूहसे सब पद सरल होनेसे पूर्ण हो जाते हैं ॥ २४८ ॥ सुननेवालोंको बोध करानेके लिए उनके यहाँ बतला रहे हैं। उनके विचारमें कुल दस इन्द्रियां हैं और नौ गोलक हैं । २४९ । अनन्तर प्राण अपान, मन, बुद्धि, इन दोनोंके जितने प्रकार-के धर्म उत्पन्न हुए। बुद्धिसे ज्ञानकी उत्पत्ति हुई । ज्ञानेन्द्रिय अपने इच्छानुसार जो चाहे वह करे उसके लिए कोई नियम नहीं है । २५० । ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों प्रकारका इन्द्रियोंके धर्मसे और उनके धर्मसे कोई सम्बन्ध नहीं है । इस तरह इन सत्ताइस प्रकारके पदोंको साधन करके पूर्ण करना चाहिए। ऐसा करनेपर जो अव्यय परब्रह्म रामका पद है वह प्रत्यक्ष दीखने लगता है। जिससे प्राणी कृतकृत्य हो

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ६०१


कल्याणं सर्वतः पुंसां चिंतनाद्यस्य ब्रह्मणः तद्ब्रह्मवाचक मुख्यं मंगलानां च मंगलम् ॥२५५॥
यत्र यद्व्यज्यते साक्षान्नाम्ना तदुदीर्यते । अधिदैवं तथाऽध्यात्मं सर्वतोभद्रमुच्यते ॥२५६॥
विविच्यतेऽत्रोभयं च प्रोच्यते वस्तुव्यक्तये । अधिदैवे तु यद्ब्रह्म तद्वाह्यमुदनेऽमरम् ॥२५७
अंडहृद्गतलोकोस्तु सर्वतोभद्रमुच्यते । तेनैव भद्र सर्वेषां लोकानामिति हि स्थितिः ॥२५८
तत्र स्वर्णमयं वेश्म निर्मितं प्रभुणा स्वयम् । दक्षपाणिरिति ज्ञेय यत्र कार्यचितिः स्वयम् । २५९
न्यासेन सर्वसत्त्वानां गतानां सर्वयोगिनाम् प्राणोपासननिष्ठानां त्रयणां नित्यकल्पने २६०
ब्रह्मणा सह ते सर्वे इति स्मृतिरुशामसः । क्रममुक्तेर्भयं पथाः श्रुतिस्मृतिमतोऽमलः । २६१
आध्यात्म हृदये यत्तत्सर्वतोभद्रमीर्यते । तेन भद्रेण कल्याणं सर्वेष्ववयवेष्विह २६२
तत्र यत्पुण्डरीकं तद्ब्रह्मणः स्थानमुच्यते । श्रुतावेव प्रसिद्धिरिति दहरश्रुत्यवेक्षनम् २६३
साधनसम्पन्नंयुक्ताश्निन्दिन्यन्ते तु समाहिताः । गुरुपदिष्टया युक्त्या तेषां ब्रह्म प्रकाशते ।२६४
परमः पुरुषो भूमौ न म्वाधमन्धयोरि । इत्यादिश्रुता यन्प्रोक्तं तच्च पारोक्ष्यमित्यपि । २६५
आह चाहमेवाधस्तादित्यादिसमदशामिताम् । गूढःनासां॑पि सर्वषां देहेऽहमिति दृश्यते २६६ ।
माभून्भ्रम इत्याधपारुवाक्यानि पुनर्वचः । एकात्मरूपयोरूषयोर्भेदशङ्कानिवृत्तये । २६७।
सर्वाषूपनिषत्स्वेवं ब्रह्म द्वैतं सुनिश्चितम् । ब्रह्मैवेददमृतमित्याह चाथर्वणः श्रुतः । २६८-
तत्त्वमेव त्वमेवैतदिति कण्ठव्यगं वचः तत्त्वमसीति छांदोग्ये ब्रह्माऽत्मैक्यं न भेदधीः २६९।
एकत्वं पदयोः स्पष्टं श्रुत्या यत्प्रतिपादितम् । साक्षात्मुक्तेः कारणं तद्वाधान्नैषां स एव हि ॥२७०॥


जाता है इतने विचारोंसे रामनेभद्रकी मुद्राएं बनायी और रामस्वरूप को बतलाया अब सन्देह नष्ट करनेके लिए प्रसंगवश सर्वतोभद्रका स्वरूप बतला रहे हैं ॥२५१-२५४॥ जिस ब्रह्मका स्मरण करनेसे प्राणियोंका सब प्रकार कल्याण होता है उसे लोग भद्र कहते हैं। भद्र एक वस्तु है और मङ्गलका भी मङ्गलकारी है ॥ २५५ । जहां कि वह ब्रह्म साक्षात् रूपमें अधिदेव या अध्यात्म रीतिसे व्यवसमान होता है, उसीको लोग सर्वतोभद्र कहते हैं ॥ २५६ ॥ अब यहाँ इसकी वास्तविक्ताको दिखानेके लिए उन दोनों प्रकारोंको दिखलाते हैं। अधिदैवके अन्तर्गत जो भद्र रहता है उस विप्रस्त भद्रका पहल बतलाते हैं ॥ २५७ ॥ इस अण्डको हरण करनेवाला लोक ब्रह्मलोक कहलाता है और उसीकी सर्वताभद्र संज्ञा भी है क्योंकि उसी लोकसे सबका कल्याण होता है और उसीके सहारे सब प्रजाका स्थिति बनी हुई है ॥ २५८ ॥ वहाँपर प्रभुने स्वयं एक सुवर्णमय घर बनाया है। उसे पक्ष या फाजंको नेत्राता, जो चाहे भी कह ली ॥ २५९ ॥ न्यासके द्वारा सब प्राणीभी सब वाशिदों तथा प्राणकी उपासना में लगे हुए प्रणियोंका वह नित्य पद दीखन लगता है ॥ २६० ॥ इससे ब्रह्म भी भासमान होने लगता है। यह स्मृतिका मत है और वेद भी इसी मतको स्वीकार करत है वास्तवम तो यह पवित्र मार्ग श्रुति और स्मृति इन दोनोंको मान्य है ॥ २६१ ।, अध्यात्मका जो हृदय है उसे लोग सर्वत भद्र कहते हैं । उस भद्रसे सब अवयवयोंका कल्याण होता है । २६२ ॥ वहाँपर जो कमल है, वह ब्रह्मका स्थान है, श्रुतियोंमें भी यह बात प्रसिद्ध है कि साधनरूपा सम्पत्तिके सम्पत्तिशाली जो लोग यहाँ रहते हैं उन लोगोंको गुरुजनोंकी उपदिष्ट मुक्ति द्वारा ब्रह्म प्रकाशमान दीखने लगता है । २६३ , २६४॥ नीचे, ऊपर तथा मध्य इन तीनों स्थानोंमें वह दृश्य विद्यमान रहता है । इन श्रुतिओग जो कुछ कहा गया है, वह परोक्षमे नहीं प्रत्यक्ष ही जानना चाहिये ॥ २६५ ॥ प्रभुने स्वयं कहा है कि सूर्य आदिके मध्य में संसारमें व्याप्त रहता हूँ और सबारी मृगोंके शरीरमे भी रहता हूँ ॥ २६६ ॥ किसीको भ्रम न हो इस विचारमे 'आत्मा एव' आदि वाक्योंको फिर-फिर दुहराया गया है । 'एकात्मारूपी उस आत्मार्क बदकी शंकाको निवृत्त करनंक लिए सब उपनिषदोंमे उस ब्रह्मको अद्वैत बतलाया गया है । 'ब्रह्म एव इदं अमृतं' आदि अथर्व वेदन कहा गया है ॥ २६७ ॥ २६८ ॥ 'त्वमेवेद' तथा 'त्वमेवैतत्' इन श्रुतियोहि तथा 'तत्त्वमसि इस छान्दोग्यके महावाक्यसे ब्रह्मके एकत्वका प्रति-

६०२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

यच्च किञ्चिज्जगत्यत्र दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥२७१॥ इदं सर्वं यदयमात्मैकमेवाद्वितीयकम् । सर्वं खल्विदमिन्त्यादिश्रुत्यो यत्प्रवदन्ति हि ॥२७२॥ सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । संपश्यन्नात्मयाजीति परमात्मा मनोर्वचः ॥२७३॥ एतादृशेन वै धेनो भूत्वा जगत्स्वरूपकः । कृतकृत्यः स्वयं तीर्त्वा सर्वांस्तारयतीति च २७४॥ अत्राक्तं श्रूयतेऽथाय ज्ञात्वाऽन्तं दृढनिश्चयम् । किं बहुक्तेन चोद्दिष्टं संक्षेपेणोपसंहृतम् ॥२७५॥ नारायणाच्युत जनार्दन वासुदेव गोविन्द माधव मुकुन्द रमेश विष्णो । मत्स्यैणपार नरसिंह परावरात्मन्सामोपनाय शिव वामन पाहि विश्वम् । २७६ । येनेदं विकृतं विश्वं विशता येन चेतनम् । यस्मिन् यत्प्रतिष्ठं च तस्मै सर्वात्मने नमः२७७॥ इदानीं रामतोभद्रस्याहोसरड्लस्य च । नानाभेदाः प्रकल्प्यन्ते लघुमुद्रान्वितस्य हि ॥२७८॥ पूर्वोक्तंऽष्टाविंशतीनां रेखावृन्दं प्रकल्पयेत् । परिधी द्वादशैकां तन्वन्तरकोष्ठकानि योजयत् ।२७९॥ प्रथमे लिखित्त्वेकाशावृतुषोडशपादकम्तः चाप्यः षोडशपादानांनवेष्टादशदान्विता, २८०॥ भद्रं नत्वमिमं चाथ द्वितीयेऽर्कमिताः शिवः । वाष्यत्योदशमिता रूपाष्टादशदान्विताः २८१॥ भद्रमर्कपदं शेषं पथार्थं प्रकल्पयेत् । ध्वट् यास्मनोभद्रप्रत्र च वषत्परम् ।२८२। अथवाऽऽद्ये रसमुद्रा ग्समा वापिकाश्च परः । त्रयोदश पदाः कार्या १६ नन्दस्वसंयतकम् ।२८३॥ द्वितीये पञ्च मुद्राश्च लिङ्गषट्क च वापिकाः । तन्मिाथ भद्रकर्मपदंमण्डूष्मावधि ।२८४॥ तुर्यपञ्चतुर्यनेत्रचन्द्रसम्स्याथ मुद्रिका । पर्णनेत्रनेत्रनवनेत्रेन्दुसंख्यानेका ॥२८५॥ भद्रं षट्पदसङ्कीर्ण षट्पदं विंशपादकम् । षोडशां त्रिशुमपादं क्रमाज्ज्ञेय विचक्षणैः ।२८६॥

पावन किया गया है। वही मुक्तिका कारण है और उसका वोध होनमे तो प्राणी साक्षात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २६६ । २७० ॥ इस जगन्म बाहिर-भीतर जो कुछ देखा और सुना जाता है, उन मबम व्याप्त होकर वह नारायण स्थित है। २७१ ॥ इस जगन्म जो कुछ है उभम एकमात्र वही अद्वितीय आत्मा है। "सर्व खल्विदं ब्रह्म" आदि वाक्योस श्रुतियां भी यही बात कहती है ॥ २७२ ॥ जो प्राणी संसारकी सब वस्तुओमे अपनेको देखता है और सब प्राणियोंका प्राणांदवन् अपनेमे देखता है। उन अ माज्ञानक लिये यह कोई साधारण बात नहीं है। यह मनु भगवानका कथन है ॥ २७३ ॥ इस प्रकारक ज्ञानस ता बंधी दृढ होकर अपनीको कृतकृत्य मानते हुए स्वयं तो तरते ही है साथ ही अपने अन्य जनोंको भी यह श्लोकाहूत पिलाकर भवसागरसे पार उतार देते हैं २७४ ॥ यहांपर बतलाया हुआ इतिहाव वशिष्ठादिका विद्वान लोग अच्छी तरह जानते हैं। अधिक कहना सुनना व्यर्थ है। संक्षेपम इस श्लोकका उपसंहार कर दिया गया है। २७५॥ हे नारायण, अच्युत जनार्दन, वासुदेव, गोविन्द, माधव, मुकुन्द, रमेश, विष्णो, मत्स्य, मण्डूक, कच्छप, सूकर, नृसिंह, परावरगत्मन्, राम, गरुडगामिन्, शिव, वामन ! आप इस त्रिष्णकी रक्षा क जिए ॥ २७६ ॥ सर्वव्यापी जीवोंमें प्रविष्ट होकर जिसने इस विश्वको सचेत किया है, जिसमें सब जीव स्थित हैं, जिसमें सब प्रतिष्ठित हैं, ऐसे सर्वात्मा रामको प्रणाम है । २७७ । अब लघुमुद्रार्क साथ-साथ एक सौ आठ रामतोभद्रोक अनेक भेद बतलाते हैं ॥ २७८ ॥ पूर्वोक्त २८ रेखाओंका वृत्त करे । उसमें २१ परिधि अधिक बनावे। फिर उनमें विलो- की योजना करे ॥ २७९ ॥ प्रथम पंक्तिमे १४ ईश और सोलह पादाका २४ भद्र बनाते ॥ २८० ॥ फिर दूसरे पंक्तिम १२ शिव और १८ पादाकं १२ वापी बनाना चाहिए । पहलोकी तरह १८ पादोंका भद्र बनावे । यह रामतोभद्र १०८ रुपका है । २८१ ॥ २८२ ॥ अथवा ६ मुद्रा, ६४ ईश और १३ पादसे छै वापिकायें बनावे और १६ पादका भद्र बनावे ॥ २८३ ॥ दूसरी पंक्तिम पांच मुद्रा बनावे और लिंग तथा छ ही वापी बनावे। आगे आठवी पंक्तिमे लेकर चार, पांच, दो, एक, इन संख्याओंके मुद्राय बनावे। फिर छ, दो, दो, दो, दो, एक इस क्रमसे शिवकी रचना करे इनमें छः पदका, बारह पदका, दो पादका बीस पादका सोलह पादका, चार पादका क्रमशः प्रत्येक पंक्ति यमे भद्र बनेंगें । ऐसा विद्वानों को जानना चाहिए ।२८४-२८६॥

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ६०३

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ६०३

अथवाऽष्टपदे मुद्रां विधाय तन्मलिङ्गकम् । स्वयंव्यक्तस्यके तुर्य भद्रं विश्रन्दाभ्यहम् ॥२८७॥ सर्वत्र सममुद्रामु मध्ये च परिधित्रयम् मुद्रा सीमांगलान्ता श्चत्वार्दा तुर्यकोष्ठका ॥२८८॥ लिङ्गस्कन्धगता कोष्ठा वर्करिष्ठैः प्रकल्पयेत् । वह्निवाप्योरनेष्ण्यानि पदान्युक्तांस्त्व तु ॥२८९॥ भद्रसङ्ख्यायोग्यानि तदर्थं त्नानयोजनम् अथवाऽष्टौ दश मुद्रा सीमापरिव्यवस्थया ॥२९०॥ भद्रमर्कपद मध्ये परिधी द्वे प्रकल्पयेत् । एवमग्र परिव्यस्तैस्तैषट्त्रिंशत् मुद्रिकाः ॥२९१॥ चतुष्पादात्मकं भद्र पश्च मुद्राश्च पञ्चच प्रकल्प्याश्चक भद्र नात्र तु परिधी स्मृतौ ॥२९२॥ सममेऽग्रिमिता मुद्रा भद्र तुर्यपदाम्मकम् । द्वये त्रयोदशैकाश्च वाप्यश्चापि चतुर्दश ।२९३। भद्रं तत्त्वमितं तुर्ये वनेशा दश वापिका । भद्रं तत्त्वमितं षष्ठे पंचेशा वापिकाश्च षट् ॥२९४। भद्रं तत्त्वमितं शेषं यथापूर्वं प्रकल्पयेत् । अथवाऽग्रे पञ्चदश शिवा नत्रेऽष्ट मुद्रिकाः ।२९५॥ त्रिवद्वयं त्रिपदपाद त्रिपद्पादा च मुद्रिकाः । षट्नुर्ये पंच मुद्राः स्युर्वापि त्रिसुमितास्तथा ॥२९६। पृष्ठे द्वे मुदिके मुद्रा मिंगे मुद्रा गजेन्धवा । शिवद्वयं वापिक च मममान्नं भद्रमिदम् ।२९७॥ भद्रमानं तत्तारेष्ट्र षट्पदमुदरिंतु च । वियने दशविधापि क्रमेणैव प्रकल्पयेत् ।।२९८। यद्वा द्वौ मुद्रिके येकां मध्यांग प्रकल्पयेत्, भद्रमिदुतूलं कृत्वा वहिङ्ग रमयेद्धजे ॥२९९। मद्रे गजे तत्त्वकोष्ठ शेषं सर्व तु पूर्ववत् अथवाऽग्रिपङ्क्तिषु पञ्चाङ्गानिमेनाऽञ्जाना।३००॥ मुद्रामध्ये नियोज्यं च मर्यादां परिधिंस्तथा । भद्रसंख्या न प्रथमा षट्पदा च द्वयार्थिका ।३०१। द्वितीया त्रिंशत्कोष्ठामु कुण्डैर्वह्त्योश्चलिंगके अनयेनार्थयोः सम्यक् शेषं सर्वं पुरोदितम् ।।३०२।। अथवोक्ताः प्रथमतः मग वटाश्चतुर्षकाः । वह्निन्द्रवन्द्रमुद्राः सीमापर्याप्यमन्यथा ।।३०३, षट्त्तु स्थानेषु च शिश्वास्तूर्णिमगा मुन्द्रा । विशेषत्तु लिंगद्वय वर्णीत्रिपट् त्रिपद् पदम् ।।३०४।।


अथवा आठ पादक मुद्रा बनाकर बांध रूप में लिंगका रचना करे और नम पादका भद्र बनावे ॥ २८७ ॥ जितनी समसंख्य मुद्रा हैं, उन सब रूप मे दो परिधि बनावे । लिंगकी सीमामें मुद्रा चार चार पादकी वापी बनावे ॥ २८८ ॥ लिंगके कन्धेके पासके अपने इच्छानुसार किसी रूपमें रख दे । बाबी और वापीके बीचवाले बच काष्ठकाका, पदव भद्र नया गिरद। रचनामें भद्र ही ता उस उसके कामम ले आवे । अथवा आदिकी दस मुद्राओ्रं ओर सीमाकी परिधिकोका अग्रिम व्यतीत कर दे । २८९ ॥ २९० ॥ मध्यम बारह पादका भद्र बनावे और द पां विपाकी रचन करे । इस तरह तीस मुद्रिन केवल भद्र मुद्राओंकी योजना करे ॥ २९१ ॥ चार पादका भद्र बनाव और पांच त्य नय मुद्रान्दे यथाक्षर बारह पादक भद्र बनावे । विशेषता केवल इतनी होगी कि इनम दो परिधियाँ नहीं रहेंगी। और चार पादका भद्र बानगा। इनमें पन्द्रह भद्र और चौदह वापियों बनेंगी । २९२। २९३॥ चौदह पद भद्र बनेगा, ती ईमें पच्चीस दस वापी बनेंगी और २५ भद्र बनेंगे। छठमें पांच ईश, छ बापी, पच्चास भद्र, ब का सब पूर्ववत रहेगा। अथवा अग्रिम पन्द्रह शिव अट्ठाइस मुद्रार, नौ पादक दा शिव ओर नौ ही पाद की मुद्राय बनेगे। चौदह छ पा पीव मुद्रायें, पांचवेम सात मुद्रायें, छठवे दो मुद्राय, सातवेमें एक मुद्र, आठवेमे एक मुद्रा, दी शिव और दो दापी रहेगा। यह कम आदिसे लेकर सातवे स्थान तक चलेगा । २९४-२९७ ॥ ईनम भद्रका मान पच्चीस, छः सोल्ह, बारह, दस, सोलूह, दस प्रकार है । बनानेवाकका चाहिए कि दशरा इसके मानना करे ॥२९८॥ अथवा दू मुद्राये बनाकर एकको लिंग- के मध्यमें रखे और सोल्ह क उत्कीका भद्र बनाकर सनवेस लिङ्गकी रचना करे । २९९ । मातवमं पच्चीस काष्ठकोका भद्र बनावे ब का सब पूर्ववत् रखे । अथवा आफ्रिक तान पंक्तियोंम पांच, सात तीन, मण्डलां का शिव बनावे ।। ३०० । मुद्राके मध्यमे मर्यादा और परिधिकी रचना करे। भद्रकी संख्या पहले जित ती ही रहेगी और छ, दो या बारह पाद उनम रहेगा । ३०१ दूसरा पंक्ति बस कोष्ठक रहेगी और लिंगके बगलमें दो वापियाकी रचना कर ब की सब पूर्ववत् रहेगा । ३०२ ॥ अथवा आदिसे लेकर छठी पंक्ति तथा सात, छः,

६०४] आनन्दरामायणे [सर्गः ५

वाच्योऽपि तन्मिताः कार्या भद्राणि वक्ष्यमाणतः तच्चकोष्ठं कला कोष्ठं तुर्यकोष्ठं च षट्पदम् ॥३०५॥ षट्पदं च कलाकोष्ठं शेषं सर्वं पुरोदितम् । अथवा प्रथमाद्यावत्पञ्चमस्थानकाद्वि ॥३०६॥ षट् षट् पञ्च तुर्यवह्निक्षुद्राश्च मध्यशङ्करान् । तुर्यनैऋतिनेत्राक्षिमर्यादापरिधींस्तथा ॥३०७॥ विशेषस्तु लिंगद्वयं वार्ण. षट् त्रिपदं पदम् । भद्रसङ्ख्येन्दुकलेन्दुकलाचतुरस्रम्भिकान् ॥३०८॥ प्रकल्प्यारचयेद्बुद्ध्या शेषं सर्वं पुरोदितम् । एवं नानाविधा भद्रा बहवः सन्ति भो द्विजः ॥३०९॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे श्रीरामदासविष्णुदास- सम्वादे सबहुरामतोभद्रविस्तारो नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

( रामलिंगतोभद्र तथा अनेक लिंगतोभद्रोंका रचनाप्रकार )

श्रीरामदास उवाच

पूर्वोक्तक्षेत्रसुदीर्घे रामतोभद्रविस्तरान् । वदान्यहं तवाग्रे हि विष्णुदास शृणुष्व तान् । १ ॥ तिर्यगूर्ध्वरक्तरेखा एकषष्टिमिताः शुभाः । अन्तःकृष्णान्तरुक्शुक्लपीताः परिधयः क्रमात् । २ । द्वादशांते पीतकृष्णाक्तशुक्लाः पुनः स्मृताः । पञ्चमः पीतवर्णोऽपि सर्वतोभद्रमालिखेत् । ३ । बहिः पंक्तौ द्वादशांते सीमापरिधयः स्मृताः । पीता वा लोहिता कार्या मध्ये द्वौ परिधी स्मृतौ । ४.। ततो मध्यगृहयोर्द्वे मुदिके वेदवर्णके । चतु पार्श्वेषु चत्वारि नामानि पूर्ववल्लिखेत् ॥ ५ ॥ कोणगेहेषु कार्णन्दुस्त्रिपदः शुक्लवर्णकः । एकादशपदा कृष्णा शृङ्खला पीतवर्णका । ६ । दशपदा शृङ्खलाऽन्या बह्विगे हरिता स्मृता । एकोनविंशत्पदजा भद्रं रक्त नवान्तकम् । ७ ॥

चार पाँच, तीन, दो अथवा एक मुद्रा बनावे और सम्मुख परिधियोंकी ओर छट्ठे स्थानोंमें चार-चार शिवोंकी रचना करे । विशेषता केवल इतना रहेगा कि पाँच वा नौ-नौ पदोंके लिंग बनेंगे। बाधियाँ पूर्वोक्त संख्याके अनुसार ही रहेगा, किन्तु भद्रका सङ्ख्या वक्ष्यमाण संख्याके अनुसार रहेगा। कुछ भद्र पच्चीस कोष्ठकका, कुछ सोलह कोष्ठकोंके, कुछ चार कोष्ठकके, कुछ छ कोष्ठकोंके, फिर छः कोष्ठको, कुछ सोलह कोष्ठकोंके, इस प्रकार भद्र बनेंगे। बाकी सब पहलेके समान ही होंगे। अथवा पहली पंक्तिसे पाँचवी पंक्ति पर्यन्त ॥ ३०२-३०६ ॥ छः, पाँच, चार, तीन मुद्राएं बनावे क्रमशः चार, व, दो, दो, दो शिवोंकी रचना करे और मर्यादा तथा परिधियोंको ठीकसे बन कर रखव ३०७, विशेषता इतना है कि पांच, तीन, छ, तीन, छः पदका लिंग बनावे । इसमें भद्रकी संख्या सोलह, सोलह तथा छः रहेगा इस तरह कल्पना करके अपनी बुद्धिसे रचना करे। बाकी सब पूर्ववत् रहेगा। इस प्रकार हे द्विज! इस भद्रके बहुतेरे भेद हैं, ॥ ३०८ ॥ ३०९ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे चतुर्थ सर्ग ॥ ४ ॥

श्रीरामदास कहते हैं - हे विष्णुदास ! अब मैं तुम्हारे आगे पूर्वोक्त रामतोभद्रका विस्तार बतलाता हूँ। उसे तुम सावधान मनसे सुनो ॥ १ ॥ भद्र बनानेके लिए चाहिए कि बड़ा लोट सावों ६१ रेखायें खींचे। बन्तमें काली, लाल, सफेद तथा पीली परिधियाँ बनावे ॥ २ । बारहवीं पंक्ति के आगे पीत, कृष्ण, रक्त तथा शुक्ल रङ्गकी सीमापरिधियाँ रहेंगी। चाहे तो पाँचवां स्थान पीले रङ्गसे भी बना सकता है। बारहके बाद बाहरकी पंक्तिमें पीले या लाल रङ्गकी परिधि रहेगा। बीचम और दो परिधियां बनेंगी ॥ ३ ॥ ४ । इसके अनन्तर मध्यके दोनों घरोंमें चार रङ्गोंको दो मुद्राएं बनेंगी। इसके अनन्तर चारों बगल पूर्ववत् चार नाम लिखने चाहिए ॥ ५ ॥ कोणवाले कोष्ठकमें तीन पाद और शुक्लवर्णका इन्दु बनावे। ग्यारह पादकी शृङ्खला बनावे और उसे कृष्ण वर्णकी रखे । दस पादकी एक दूसरी शृङ्खला पीले रङ्गसे बनावे । हरे रङ्गसे उन्नीस पादकी

सर्गः ५ ] मनोहरकाण्डम् १०५

सर्गः ५ ] मनोहरकाण्डम् १०५

त्रयोदशपदा वापी ... रक्तं भद्रं पीतभद्रं तिर्यङ्नवपदात्मकम् ॥ ८ ॥ अष्टधा भुजगा रक्ता द्विपदा नयनस्तथा । अष्टमुद्रात्मकं रामतोभद्रं ते मयोदितम् ॥ ९ ॥ त्यक्त्वा पाशं भुजगांश्च कृत्वा षोडशपदम् । खण्डत्रयञ्चतुष्पदजं भद्रं लोहितं रसैः ॥ १० ॥ तिर्यक्तेषां पीतवर्णं ततोऽग्रे वेष्टनं तथा त्रिदशार्थं मालिका रक्ता त्रिपदा वा त्रिलोचना ॥ ११ ॥ अष्टमुद्रात्मकं चैतद्रामतोभद्रमुच्यते । पूर्ववत्तु सर्वं शेषमाद्यद्रव्याः सर्वं हि पूर्ववत् ॥ १२ ॥ मुद्रिकारूपपादांश्च षट्कं स्वेच्छं प्रपूरयेत् । चतुर्मुद्रात्मकं चैतन्मलिंगं वापि पूर्ववत् ॥ १३ ॥ तिर्यगूर्ध्वं त्रिमध्यश्च रेखाः कार्या तुल्यास्ततः । तासु चतुर्मुखार्थेषु कार्याः परिधयः क्रमात् ॥ १४ ॥ कुम्भारकशुक्लपीता द्वितीये परिधौ च । कार्यः पुनश्चतुःपार्थे परिधिः पीतवर्णकः ॥ १५ ॥ तदग्रे रक्तवर्णश्च परिधिर्हि नयनस्ततः । ततोऽष्टपदः परितः परिधिः पीतवर्णकः ॥ १६ ॥ ततः षष्ठपदाध्वे च पुनः पीताः प्रकारयेत् । आद्यस्थानं च सीमाख्याः पीता परिधयोऽथवा ॥ १७ ॥ रक्ता वेदांगताः कार्या द्वादशात पदेषु च कोणेष्वष्ट पूर्ववच्च मध्ये च मुद्रिकात्रयम् ॥ १८ ॥ ततो द्वितीयस्थाने हि चन्द्रः कृष्णो च शृंखला । सप्तदा वल्लरी च चतुर्दिक्षु चादिका ॥ १९ ॥ वल्ल्यऽनित्यार्जवं कार्यं रक्तं भद्रं हि षट्पदम् । त्रयोदशपदा कार्या वाप्या वेदांगताः सिताः ॥ २० ॥ षड्विंशन्पदजाः कार्यास्तिस्रः कृष्णपङ्क्तयः । योष्यास्त्रयोदशलक्ष्या हि लिंगमध्ये पदेषु च ॥ २१ ॥ रामाज्ञं राधकान्तेन मूर्ध्ना कण्ठेन पादयोः । मुद्रा चतुष्पदा ज्ञेयाः पदाभ्यां कण्ठ ईरितः ॥ २२ ॥ चतुष्पदा लिंगमथा षट्कं नेत्रं हि षट्पदा शान्त्रयञ्च शुक्लं द्वे पद रचयेद्द्विया ॥ २३ ॥ वाप्युपारष्ठकञ्चापि पीतं वैषट्पदानि च । नूपुरकान्नपादा पत्र पादानि चोपरि ॥ २४ ॥ मध्येऽथ सन्तोभद्रे पूर्ववच्चैव ना परम् । मत्तलक्ष्मामभद्रप्रपञ्च मपेरितम् ॥ २५ ॥

वल्लरी बनाये । ... से बारह पादका वापी बनाये । तीन पादका लाल रङ्गका एक दूसरा भद्र बनावे। इस नौ पादका एक तिरछा भद्र और बनावे ॥ ८ ॥ इन सबके भद्रोंका .... केवल दो पादका रहेगा। इस प्रकार अष्टमुद्रात्मक रामतोभद्र मैंने तुमको बतलाया ॥ ९ ॥ अथवा पाशा शृंखलाको छोड़कर काले रङ्गस नौ पादका लिङ्ग करावे । चार पादका एक खण्डबनावे और छः पदका लाल रङ्गका भद्र बनाय ॥ १० ॥ ऊपर बतलाये तिरछे और पीले पदमें सात या चार पादरूप फिर बनाकर लाल रङ्गका मालिका या तीन पादकं शिव बनावै ॥ ११ ॥ यह अष्टमुद्रात्मक रामतोभद्रभद्र है। पूर्ववत् साया और बडी तिरपन रेखावें खींचे ॥ १२ ॥ मुझे ओर चार प्रकारक छः छः पादांका अपन इच्छानुसार पहलेके समान पूर्ण करे। यह चतु- र्मुद्रात्मक रामो मुद्राभद्र कहता है। इसके सिवाय सब चीज पूर्ववत् रहता है ॥ १३ ॥ सात रेखावे सीधा ओर बड़ी तिहत्तर रेखाएं सब ओर क्रमात् चार बालि पोर घडी बना दे। १४ ॥ बारह पादोंका नाला, लाल तथा शुक्ल वर्णका भद्र बनावे। फिर उसके चारों ओर पल वर्णका परिधि बनावे ॥ १५ ॥ उसके आगे चारो वापस लाल रंगका परिधि बनावे। फिर आठ पादका परिधि उसके चारों तरफ बनावे ॥ १६ ॥ ऊपरके ओर छः पादका परिधि पीले रंगस बनावे। अन्तिम स्थानमें सीमा नामकी परिधियां अथवा लाल रंगस चार परिधियां बनावे। पहलेका तरह कोनक वशाम तान मुद्रायें बनावे ॥ १७ ॥ १८ ॥ इसके अनन्तर दूसर स्थानम चन्द्रमा बनाकर काल वर्णका शृंखला बनावे। सात पादकी वल्लरी अथवा बीरह यात्रीस वल्लरियांका निर्माण करे और लाल रङ्गस छः पादका भद्र बनावे। वास पादस सफेद रंगकी पा वापियां बनाये ॥ १९ ॥ २० ॥ तदनन्तर काल रंगस छब्बीस पादोंके तीन शिव बनावे । लिङ्गके मध्यवाले हाठकाम तरहसे विवो बनावे ॥ २१ ॥ फिर उत्तम स्थानसे कण्ठतक समान रामके नाम लिखे। इसमे चार पदसं मस्तक, दो पादसं कंठ, चार पादस लिंग और पार्श्वभाग, छः पादिसे स्कन्ध, तीन पादस पैर बनावे । सफेद रंगके दो पाद षटका रहने दे ॥ २२ । २३ ॥ अथवा ऊपरसे भो आठ चार डाकी बने क

३०६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

एतद्द्वादशमुद्राभी रामलिङ्गात्मकं शुभम् । प्रालम्ब्य विविधं च रामतोभद्रमादरात् ॥ २६ । तिर्यगूर्ध्वमेकसप्त रेखाः सर्व हि पूजयेत् । चतुर्मुद्रात्मकं तद् यथा तद्वच्च मध्यमे । २७ । आद्ये तिस्रः स्थले मुद्रा मध्यमपारश्वयोस्तथा । मध्ये नवमुद्रा ज्ञेयास्ततो द्वे द्वे शुभे स्मृते ॥ २८ । ततः षोडशमुद्राभी रामतोभद्रमादरात् । अन्तर्गहं कुरु लिङ्गं मलिङ्गं पाङ्‌ङ्गात्मकम् ॥ २९॥ तिर्यगूर्ध्वभूमिवार्याणवेदरैखाः ४२१ सुलोहिताः । अष्टमुद्रा मके मध्य रामतोभद्गके लिखेत् ॥ ३०॥ तिर्यगूर्ध्वं परिधयः षोडशैष समन्ततः । द्वौद्वौत रक्ता वर्णा वा बहिः परिधिपोऽपि च ॥ ३१ । पूर्ववत् कोणगेहेषु मुद्राणां च क्रमोगुना । उक्ते द्वे मुद्रिके पूर्वं तद्वा वेदमुद्रिकाः । ३२ । मध्ये सर्वत्र परिधिद्वयं मान्यन्यथा कदा । ततो रक्तान्तो वद्योवणः पञ्चम स्थले । ३३ । षण्मुद्रिका वेद वाष्यश्चतुर्शीतिपादकाः । मध्यन्तरतुषडंश कृष्णं द्वादशपादकम् ॥ ३४॥ वापीपार्श्वेषु भद्रानि चत्वारि लोहितानि च पृथक् पृथक् पञ्चदशपवैर्गानि तानि हि । ३५ । षष्ठे स्थाने द्वादशैव मुद्रा ह्यग्रे चतुर्दश । पञ्चाष्टादशाय विंशद्विंशमुद्रिकाः ॥ ३६॥ चतुर्विंशाय षड्विंशा ह्यष्टाविंशत्युमुद्रिकाः । निजस्थानस्थितमुद्राणां स्थान षोडष मुद्रिकाः ॥३७॥ वाप्यः षोडश विज्ञेया मध्ये वापीद्वयं स्मृतम् । अष्टादशसहस्र च रामतोभद्रमारितम् । ३८॥ तिर्यगूर्ध्वं द्वि वस्वंङ्कवाणरेखाः सुलाहिताः सर्वाकार नतोभद्रयमक्क पुरातनम् ॥ ३९॥ तदत्र मध्ये लेख्यं हि मध्यमुद्रास्थले ततः । द्वि तत्वपद तप्तारे कृष्णवणे प्रकल्पयेत् । ४०॥ षट्त्रिंशन्नामनामानि वै लेख्यानि च हस्तिना । कर्णिकार्णेषु केश्रीनि चामेव शिरःस्मृतम् । ४१। कटिश्चतुष्पदैः कार्या पार्श्व द्वादशपादकं मध्यानिरीक्ष्यतंव्या मूलं लिङ्गमदात्मकम् ॥४२॥

उनके आदिवात तीन पादाका लाल रहत और सब पत्त रङ्ग राखे । २८ । उनके बादम पूर्ववत् सर्वतोभद्रकी रचना करे। इस प्रकार मैन तुम्हारे पास सर्वतोभद्र बतलाया । २५ । यह द्वादश मुद्राओस युक्त लिङ्गात्मक रामतोभद्र आदरके साथ ध्यान या पूजन करने योग्य है ॥ २६ ॥ सदा ओर बड़ा उचासी रेखाय पहलकी तरहै खींचे । ऊपर जा चतुर्मुद्राके समान बतलाये आये है, उसी तरह बीचमें भद्रको रचना करे । २७ । बर्दिको परम तीन मुद्राये बना, कर पहूद्रक समान सामाका पाराच बनावे । बीचम तीन-तीन और अन्यम भ वतन्यन व वार्या दन शुभ दु । २८ ॥ यह पाङ्गमुद्राका क रामतोभद्र मैन तुमका बतलाया। और इसके मद्येभगव शिवक भारचना कर दा जाय तो यह सलङ्ग- रामतोभद्र हो जायगा ॥ २९ ॥ इनक क्रम इस प्रकार हे-सवा और ताक्ष ४२१ रखाय लाल रसिस खींच। उनके बीचम अष्टमुद्रामक रामत भद्र लिसे । ३० ॥ इसके चारा ओर दस रङ्गोकी पारोवग रहगा, व परिधियो द्वादश पादक अन्दरवर बनाना मङ्ग ॥ ३१ ॥ पहिलेकी तरह बतलाये हुये मुद्राओका क्रम बतला रहे हैं। सबक ऊपर दो मुद्राय और उनके नाचे चार मुद्राय बनावे । ३२ ॥ सब तरफ दो परिधिवां बनावे । इसके बाद छ मुद्राये बनावे फिर आठ मुद्र व बनावे। पचम स्थानम कुछ विषमता हे, सो बत्ताते हैं। ३३॥ इसमे छः मुद्राय, चौरासी पादकी चार वापीयों और वापीके अन्दर १ कृष्ण रङ्गस बारह पादका कुंड बनावे ॥ ३४ ॥ वापीके आस-पास लाल रङ्गके चार भद्र बनाए । व अङ्गल अलग पन्द्रह पादोके बन य जायेंगें । ३५॥ छठी पंक्तिम केवल बारह ही मुद्रायें रहगो । अगे चौदह, फिर बास, बाइस, चौबास, छव्यास, अट्टा- इस, रीस, बतीस, ये मुद्राय रहण । ओर अपन स्थानपर पूर्ववत् व सोलह मुद्राय रहेगा। इसमें वाप्या भी मालह रहेंगी और मध्यम दा वाविया रहगो । इस तरह मैन तुम्ह अष्टादशसहस रामतोभद्रका क्रम बतलाया ॥ ३६-३८ ॥ लाल रङ्गत खङ्ग, बड़ा ओर ५६८ रेखाएं। जैसा कि मैन पहले ही सर्वांतोकारमक रामतोभद्रकी रचनाका प्रकार बतलाया है। उसी तरह यहाँ भी बनावे। उसके बीचमे मुद्राकी जगहपर बहत्तर पादक शिवका रचना करे। इसका कण लाल रहेगा। अथवा हाथसे ३६ रामनाम लिखे। काले रंगसे उनकी कणिका और चार पादसे सिर बनावे ॥ ३९-४१ ॥ चार पदको कटि

सर्गः ६ ]

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् १०७

षट्त्रिंशत्पदजे ज्ञेये द्वे वापीशङ्करे मिने । द्वाभ्यां शिवञ्च वै नेत्रे मिते शेषपदानि हि ॥४३॥ रक्तकानि चत्वारि पीठानि शिवकर्णयोः। स्थाने तृतीये मुद्रश्च शंभो द्वौ शङ्करौ स्मृतौ । स्थाने चतुर्थे मुद्राश्च चत्वारश्शिवाह्वयाः स्मृताः ॥४४॥ एवमग्रे क्रमेणैव विशेषं शृणु सादरम् । स्थाने पञ्चदशे मुद्राश्चतुर्दश शिवाह्वयाः ॥४५॥ पञ्चदशे हि लिङ्गानां षण्णां शिया लिखेत् । काणान्धयोस्तयोः कार्यौ द्वौ शिवौ च त्रिपटपदी ॥४६॥ अष्टमुद्रात्मके भद्रे सरितो न कृती यथा । मण्डलस्यो लिङ्गवृद्धिं कर्तव्या परमावधि ॥४७॥ स्थाने द्वाविंशतितमे भद्रं द्वाभ्यां योजितम् । त्रिपत्रिञ्च लिङ्गानि बहिः परिधयस्ततः ॥४८॥ एवं युक्त्या रचयैवै शेषं सर्वं पुरोदितम् । अष्टोत्तरशतं च रामलिंगात्मकं स्थितम् । समासनं यन्त्रेषु हि सर्वस्वपानितुष्टिदम् ॥४९॥ तिर्यगूर्ध्वं पञ्चाशदभूर्वेखाश्च पूर्ववत् । अष्टमुद्रात्मकं मध्ये परिधयः समन्ततः ॥५०॥ तिर्यगूर्ध्वं द्वादशान्ते बहिः परिधयस्तथा । मध्यं सोपानविध्वंस्यं नान्यत्स्थले कदा ॥५१॥ नैऋत्यन्ते द्वैमुद्रा विनेपत्रं तु सर्वतः । सिता वापीतृतीयाथ ह्यग्रे च चतुर्थके ॥५२॥ पञ्चमे दश तन्मुद्रा ईशे शंभौ पुरोदितम् । अष्टोत्तरशतं रामतोभद्रं ते मयोदितम् ॥५३॥ तिर्यगूर्ध्वं त्रिपूणां रेखाः कार्याश्च पूर्ववत् । स्थापितं रामभद्रत्रयमेके पुरोदितम् ॥५४॥ तदत्र मध्ये लेखा हि सव्यमुद्रा श्वेतेसिता । वापी कार्या द्वादशान्तं परिधयश्च पूर्ववत् ॥५५॥ तिर्यगूर्ध्वं शुभा कार्या बहिः परिधयस्तथा । स्थाने तृतीया मुद्राश्च तिम्रो द्वौ शङ्करौ वरौ ॥५६॥ चतुर्थे वेदमुद्राश्च त्रपग्ने शङ्कराः स्मृताः । पञ्चमे पञ्च मुद्राश्च चत्वारश्च हग वराः ॥५७॥ षष्ठे स्थाने च षण्मुद्राः शिवाः सप्त प्रकीर्तिताः । काणान्धयोस्तयोः कार्या द्वौ हरी च त्रिपटपदी ॥५८॥

बनावे। बारह बादके दोनों पार्श्व में ... बनावे ॥४२॥ छब्बीस पदसे शिव तथा वापी बनावे औ ... ॥४३॥ बाकी काण्डेन्द्रामस पाँच कोष्ठक लाल रङ्गसे, चार पद्मकुण्ड दम्पती तथा शेष ... पण्डित तिन मुद्राय और दो शङ्कर बनावे। चौथी पङ्क्तिमें चार मुद्रायें और तीन शिव बनावे। ॥४४॥ इस प्रकार वसन्तके अग्र पर इसमे जो कुछ विशेषतायें है, उन्हे बतला रहाहूं। चौदहवें पंक्तिमें चौदह मुद्रा और सोलहवें पंक्तिमें शिव बनावे॥४५॥ वही क्रम पन्द्रहवीं पंक्तिमें भी रहेगा। बाकी सत्र ... पूर्ववत् करन चाहिये। द्वावाक काणो अन्धाय नीनो पार्श्व के दो शिव बनावे ॥४६॥ अष्टमुद्रात्मक भद्रक ... लिंगानुसार बनाकर चार प्रलयात्मक मुद्राके अनुसार लिङ्गको वृद्धि करता जाय ॥४७॥ बाईसवीं पंक्तिमें बाईस मुद्रायें बनावे। उन्तीस तीन लिङ्ग बनाकर बाहरकी परिधियाँ भी बनावे ॥४८॥ इस प्रकार युक्ति के साथ इस रामतोभद्रको बनावे। शेष अंश पहलेके समान ही रहेगा। यह मण्डोत्तरशतक चक्र रामतोभद्र रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाला सर्वश्रेष्ठ आसन है॥४९॥ सीधी तथा तिरछी १५५ रेखायें खींचें और अष्टमुद्रात्मक रचना करे। उसके बीचमें भद्र रहेगा। चारो ओरसे बारहवीं पंन्तिके बाद परिधियां रहेगी। मध्यमे सोपानादिच्छिद्र रहेगी और किसी दनिपर कुछ भी नहीं रहेगा। ५०।५१॥ इसकी दूसरा पंक्तिम चार मुद्राय रहेगी। तीसरी पंक्तिमे कुछ विशेषता है, सो बतलाते है। आठवों और चौथी पंक्तिमें क्रमश तीन वापी और तीन मुद्रायें बनावे ॥५२। पाचवी पंक्तिमें दस मुद्रायें बनाकर बाकी पूर्ववत रक्खे। यह मैने तुमको अष्टोत्तरशत रामतोभद्र बतलाया ॥५३॥ सीधी और तीखी २०३ रेखाएं खींच । फिर पूर्वोक्त रीति के अनुसार भद्रत्रयात्मक रामतोभद्रकी रचना करके उसीके समान समस्त लिंगोकी स्थापना करे ॥५४॥ इसके मध्य पहली पंक्तिमें सफेद रंगका एक भद्र और सफेद रङ्गकी ही एक वापी बनावे। फिर पहलेकी तरह बारह पंक्तियोंके बाद परिधियां बनावे ॥५५॥ बाहरको तीखी और सीधी परिधियां बनाकर तीसरी पंक्तिमे पाँच मुद्रा और दो शिव बनावे ॥५६॥ चौथी पंक्तिमें चार मुद्रा और तीन शंकर बनावे पाँचवीं पंक्तिमें पाँच मुद्रा और चार शिवकी रचना करे ॥५७॥

१०८आनन्दरामायणे[ सर्ग ५

अष्टमुद्रान्वके भद्रे मलिमे च कृती यथा । स्थाने च सप्तमे मुद्राः सप्त शिवानि चाष्ट वै ॥५९॥
कोणस्थगृहयोः कार्यों द्वौ हरौ च 'प्रपृष्ठयोः । अष्टोत्तरशतं रामलिङ्गात्मकं स्मृतम् ॥६०॥
षष्ठे स्थाने कोणगेहेऽथवा शम्भुं न कारयेत् । स्थाने तृतीये मुद्रे द्वे वापी द्वौ द्वौ हरावपि ॥६१॥
एकच्छतात्मकं भद्रं रामलिङ्गात्मकं मतम् । अष्टोत्तरसहस्रं रामतोभद्रमीरितम् ॥६२॥
पञ्चैव मुद्राः कर्तव्या अते स्थाने हि पञ्चमे । पंच मुद्राः पञ्च वापीः कृत्वा रामतोभद्रमीरितम् ॥६३॥
अष्टोत्तरसहस्रे श्रीरामतोभद्रके वरे । वापीमुद्रादिषट्कं कर्तव्यं रामतोभद्रमीरितम् ॥६४॥
सहस्रराममुद्राणां रामतोभद्रमीरितम् । अष्टोत्तरसहस्रे श्रीरामतोभद्रमीरितम् ॥६५॥
स्थाने चतुर्दशे कोणगेहे शम्भुं न कारयेत् । मुद्राद्वयं तथा वापीं कुर्यात् शेषेषु न कारयेत् ॥६६॥
सहस्रममुद्राणां रामलिंगात्मकं विदुः । षोडशगवाक्षके कुर्याद्वापीत्रयं तथा ॥६७॥
मध्यमुद्रास्थले वाप्यस्तिस्रः कार्या महत्तमाः । सर्वतोभद्रवत्सर्वं कर्तव्यं रामतोभद्रके ॥६८॥
अथवाऽऽद्यस्थले मध्यमुद्रासु वेददिक्षु च । त्रिष्वेव कोणगेहेषु कुर्याद्वापीत्रयं तथा ॥६९॥
वाप्यश्चतस्रश्चाप्यथ नवमुद्रात्मकं शुभम् । रामतोभद्रसंज्ञं स्याच्छ्रीरामप्रीतिवर्धनम् ॥७०॥
तिर्यगूर्ध्वं बाणपूर्णभूमिरेशाश्च पूर्ववत् । त्रयोदशात्मकं कुर्याद्रामतोभद्रमुत्तमम् ॥७१॥
मुद्रामध्ये हि द्वे वापी परिधयोऽर्कमेधया । कृत्वा द्वौ नवद्रमध्ये परिधयः कृता दृढाः ॥७२॥
बाल्यं रामतोभद्रं तोषदं तत्त्ववादिनाम् । कोणगेहेषु लिङ्गानि नैकस्थाने हि पश्चिमे ॥७३॥
कार्ये वापीस्थले लिंगं पञ्चविंशतिमं परम् । पञ्चविंशतिमूर्ती रामलिंगात्मकं विदुः ॥७४॥
अथोच्यन्ते दैवतानि रामासनगतानि च । मध्येऽथ सर्वतोभद्रे मण्डले तन्मृदात्मकम् ॥७५॥
ततो बहिस्तु लिंगेषु रुद्रं वापीषु वै नलम् । सर्वाश्च देवता मध्ये दिशि दिक्पालकान् क्रमात् ॥७६॥
पीठेषु च गृहस्थासु मुगदं परिकल्पयेत् । एवं पूजाविधिं कुर्यात् मन्त्रैर्वैदिकतान्त्रिकैः ॥७७॥

छठी पंक्तिमें छः मुद्रा तथा सात शिव बनावे, सातवें में भी सात मुद्रा और आठ शिव बनावे ॥ ५९ ॥ लिंगयुक्त अष्टमुद्रात्मक रामतोभद्र बना लेना। उसके सम्बन्धी पूर्ववत् आठ मुद्रा और आठ लिंग बनावे ॥ ५९ ॥ कोणवाले दोनों घरोंमें दो दो पार्वती के शम्भु बनावे। इस तरह अष्टोत्तर-शतलिंगात्मक रामतोभद्र बतलाया ॥ ६० ॥ छठी पंक्तिमें कोणवाले घरमें शिवको न बनावे। तीसरी पंक्तिम एक मुद्रा, दो वापी तथा दो शिवका स्थान बनावे ॥ ६१ ॥ एकशतात्मक रामतोभद्र कहलाता । पूर्वोक्त अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्रके चौदहवें पंक्तिमें केवल छः मुद्रा बनावे । पाँचवी पंक्तिमें पाँच मुद्रा और पाँच वापी बनावे तो इसे लोग अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्र कहते हैं ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ पूर्वोक्त अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्रकी पांचवीं पंक्तिम छः वापी और छः मुद्रा बनानेसे इस अष्टसहस्र रामतोभद्र कहते हैं । रामलिंगात्मक अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्रके चौदहवीं पंक्ति के कोणवाले घरमें शिव-की रचना न करे और मुद्राके स्थानमें बीच-बीच दो वाषिय बनावे और कुछ न बनावे, ६४ ॥ ६५ ॥ ६६ । इसे लोग रामलिंगात्मक सहस्ररामतोभद्र कहते हैं । षोडश रामतोभद्रकी पहली पंक्ति के दोनों दिशामें स्थित मध्यमुद्राके स्थानपे बड़ा बड़ी तीन वावियां बनावे तो लोग इसे रामलिंगात्मक रामतोभद्र कहते हैं ॥ ६७, ६८ ॥ अथवा पहली पंक्ति के मध्यमें मुद्राओं तथा आगे आगे चार वापियां बनावे और तीन दिशामे तीन वापियां रचना करे ॥ ६९ ॥ रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाला यह नौ मुद्रात्मक रामतोभद्र है ॥ ७० ॥ टेढ़ी और सीधी पन्द्रह रेखायें पूर्ववत् त्रयोदशमुद्रात्मक रामतोभद्रके समान खींचे । उसके बीचमें तीन मुद्राएं बनाये ॥ ७१ ॥ मुद्राके बीचमें दो वापियोंकी रचना करे और मध्यम सूर्य बनाकर परिधि बनावे। दो-दो याद्वा परिधियां बनावे इसे लोग तत्त्वमुद्रात्मक रामतोभद्र कहते हैं ॥ ७२ ॥ यह रामतोभद्र तत्त्ववादियोंके लिए आनन्ददायक है। कोने के घरोंमें शीवोंकी रचना करे । पश्चिमकी ओर कुंडके स्थानमें पच्चीस लिंग बनावे । यह पञ्चविंशतिमूर्तिरत्नक रामतोभद्र कहलाता है ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ अब रामासनके देवताओको बतलाते हैं। सर्वतोभद्रके बीच तथा सर्वतोभद्रके