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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १३ ] | सारकाण्डम् | १५७

सर्गः १३ ]सारकाण्डम्१५७

योजनानां पंचशतं वायुवेगेन मारुतिः । राहुस्तस्मिन्दिने दर्शे ययौ सूर्यं रघूत्तम ॥१६५॥ तावद्दृष्ट्वा भर्तुकामं रखेरग्रे कपिं स्थितम् । तदा राहुर्भयादेव रविं मुक्त्त्वेंद्रमाययौ ॥१६६॥ राहुः प्राह शचीनाथ सत्र पीडां करोम्यहम् । दत्तः पूर्वं त्वया सूर्यः पीडां कर्तुं सुरेश्वर ॥१६७॥ अत्र विघ्नं समुत्पन्नं तन्मे शीघ्रं निवारय । तद्राहुवचनादिंद्रः समारुह्य गजोपरि ॥१६८॥ देवैर्वृतो ययौ वेगाद्ददर्श प्लवगं पुरः तदा मुमोच तं वज्रं मघवा मारुतिं प्रति ॥१६९॥ वज्रपातान्मारुतिः खात् पपात गिरिकन्दरे । तदा भग्ना हनुस्तस्य हनुमानिति वै यतः ॥१७०॥ ख्यातिं गतोऽयं सर्वत्र सदा वायुश्चुकोप ह । सांत्वयित्वा हनूमंतं स्वयं स्तब्धोऽभवत्तदा ॥१७१॥ वायुस्तम्भाज्जनाः सर्वे निपेतुर्धरणीतले त्रैलोक्यं शववज्जातं हाहाकारोऽभवद्दिवि । १७२॥ तदा धिक्कृत्य देवेंद्रं वेधा वायुं ययौ जवात् । प्रार्थयामास तं नत्वा पुनर्वायुं वचोऽब्रवीत् ॥१७३॥ देवेन्द्रस्यापराधं त्वं क्षन्तुमर्हसि कंपना। तव पुत्राय दास्यामि वरानद्य हनूमते ।१७४॥ तदा तुष्टोऽभवद्वायुरुचाल पूर्ववत्पुनः । अभूत्सजीवितं सर्वं त्रैलोक्यं क्षणमात्रतः । १७५॥ तदा ददौ वरान् ब्रह्मा मारुतिं पुरतः स्थितम् । भविष्यसि स्वयममरो वज्रदेहो वरान्मम ॥१७६॥ ते कुंठिता गतिर्माऽस्तु कुत्राप्यंजनिसंभव । भविष्यति हरौ भक्तिस्तव नित्यमनुत्तमा ॥१७७॥ त्वं विष्णोरपि साहाय्यं करिष्यसि वरान्मम । इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे वेधा राहुः सूर्यं ययौ पुनः ॥१७८॥

इच्छासे लीलापूर्वक ऊपरको उछले ॥ १६४ ॥ उस समय मारुति वायुवेगसे पांच सौ योजन ऊपर उठ गये थे । हे रघूत्तम ! उसी दर्श ( अमावस्या ) के दिन राहु भी ग्रसनेके लिए सूर्यके पास गया, किन्तु उन्हें पकड़नेकी इच्छासे खड़े हनुमान्‌को देखा । तब राहु डरा और सूर्यको छोड़कर इन्द्रके पास जा पहुँचा ॥१६५॥१६६॥ शचीपति इन्द्रसे राहु बोला—अब मैं आपको ही सताऊँगा । क्योंकि पूर्वकालमे आपने मुझे सतानेके लिये सूर्यको दिया था । १६७ ॥ परन्तु उसमें इस समय विघ्न उपस्थित हो गया है। अतः उसका आप निवारण करें, नहीं तो मैं आपहीको दुःख दूँगा । इस प्रकार राहुके कथनानुसार इन्द्र गजपर सवार होकर देवताओंके साथ सूर्यके पास गये तो वहाँ उनके सामने हनुमान्‌को खड़ा देखा । तत्काल इन्द्रने उनके ऊपर वज्रप्रहार किया ॥ १६८ ॥ १६९ ॥ वज्रके आघातसे हनुमान् नीचे गिरिकन्दरामें जा गिरे और उनकी ठुड्डी टेढी हो गयी । जिससे कि उनका हनुमान् नाम पड़ा ॥ १७० ॥ उनका यह नाम सर्वत्र प्रसिद्ध हो गया । यह देखकर उनके पिता वायुदेवने कुपित होकर अपनी गति बन्द कर दी ॥ १७१ ॥ वायुके बन्द हो जानेसे सब लोग मर-मरकर धरणीपर गिरने लगे । तीनों लोक मृतक जैसे हो गये और देवलोकमें भी हाहाकार मच गया ॥ १७२ । तब ब्रह्मा इन्द्रको धिक्कारकर शीघ्र वायुके पास गये और नमस्कार करके प्रार्थनापूर्वक कहा—॥ १७३ ॥ हे कंपन ! तुम देवेन्द्रके अपराधको क्षमा कर दो । मैं तुम्हारे पुत्र हनुमान्‌को वर देता हूँ ॥ १७४ ॥ तब प्रसन्न होकर वायु पुनः पूर्ववत् बहने लगा । अतः क्षणमात्रमे तीनों लोक फिर जीवित हो गये ॥ १७५ । पश्चात् ब्रह्माने सामने खड़े मारुतिको वर दिया कि तुम मेरे वचनसे वज्रदेह होकर अमर हो जाओगे । १७६ ॥ हे अंजनीपुत्र ! तुम्हारी गति कहीं भी प्रतिहत न होगी और नित्य श्रीहरिमें तुम्हारी उत्तम भक्ति बनी रहेगी ॥१७७॥ मेरे वरदानसे तुम विष्णुकी सहायता करनेमें भी समर्थ होओगे। इतना कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और राहु पुनः

१५८आनन्दरामायणेसर्गः १२

श्रीराम उवाच
देवेन्द्रेण कथं दत्तो रविस्तस्मै स राहवे । तत्सर्वं विस्तरेणैव कथयस्व ममाग्रतः ॥१७९॥

अगस्तिरुवाच
सुधापानादयं राहुर्देत्योऽभूदमरः स्वयम् । ग्रहोऽष्टमोऽभवन्सोऽपि यदाऽवांछद्दूषं सुरान् ॥१८०॥
पीडां कर्तुं तदा देवाः सूर्य सोमं ददुस्तु तं । ज्ञात्वा धर्मैर्जनाः सर्वे निजकर्मादिहेतवे ॥१८१॥
मोचयिष्यन्ति राहोश्च शशिनं भास्करं प्रति । यदा यदा भविष्यत्यापरागों जगतीतले ॥१८२॥
तदा तदा जना धर्मैर्निजप्रत्यर्थमादरात् ।
तोषयित्वा सदा राहुं तौ तस्मान्मोचयन्ति हि । १८३।।
एतत्सर्वं मया प्रोक्तमुपरागस्य कारणम् । जन्म कर्म चराज्ञाने मारुतेश्चापि विस्तरात् । १८४॥
अनन्तद्वलमाहात्म्यं को वा शक्नोति वर्णितुम् । स एकदा मुनीनां हि चाश्रमेषु कुशादिकान् ॥१८५॥
चकारंतस्ततः सर्वान्नर्षयन्मुनिलालकान् । तस्य तत्कर्म मुनिभिर्दृष्ट्वा शप्तोऽञ्जनिसुतः ॥१८६॥
अद्यप्रभृत्य कपिश्रेष्ठ न ज्ञास्यसि स्वपौरुषम् ।
यदाऽन्यस्य मुखात्स्वीयं बलं श्रोष्यसि विस्तरात् ॥१८७॥
भविष्यति तदा पूर्वस्मृतिस्ते पौरुषं पुनः । अतः सुग्रीवसख्ये विस्मृतः स्वपराक्रमः ।१८८॥
यद स्तुतो जांबवता पुरा प्रायोपवेशने तदा स्मृतिस्तस्य जाता स्वबलस्य हनूमतः ।।१८९॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं त्वया पृष्टं मया तत्र । यथा तथा सविस्तार कपिरावणचेष्टितम् ।।१९०।।
राम त्वं परमेशोऽसि सकलं जानासि विज्ञानदृक्
भूतं भव्यमिदं त्रिकालकलनासाक्षी विकल्पोज्झितः ।
भक्तानामनुदर्शनाय सकलां कुर्वन् क्रियासंहति
चाशृण्वन् मनुजाकृतिर्मम वचो भासीह लोकचितः ॥१९१॥


सूर्यके पास गया ।। १७८ ।। श्रीरामजीने पूछा कि देवेन्द्रने सूर्य राहुको क्यों दे दिया था ? हे मुनीन्द्र ! यह कथा आप विस्तारसे कहें ॥ १७९॥ अगस्त्य ऋषि बोले- हे राम, दैत्य राहु सूर्यकालमें सुधापान करके अमरत्वको प्राप्त हो गया था। बादमें जब वह अष्टम ग्रह हो गया, तब उसने देवताओंका दुख देना चाहा। यह देखकर देवताओने सूर्य तथा चन्द्रमा राहुको दे दिया और यह सोचा कि संसारके लोग अपने कामके लिए धर्मके द्वारा राहुसे सूर्य तथा चन्द्रमाको छुड़ा लेंगे। उसीके अनुसार सूर्य-चन्द्रको जब-जब ग्रहण लगता है, तब-तब मनुष्य अपने कार्यसाधनके लिये आदरपूर्वक दान-धर्मसे राहुको सन्तुष्ट करके उससे सूर्य-चन्द्रको छुड़ा लेते हैं ॥ १८०-१८३ ।। इस प्रकार मैंने ग्रहणका कारण तथा मारुतिका जन्म-कर्म आदि वृत्तान्त सविस्तार आपको कह सुनाया ।। १८४ ।। पूरी तरह हनुमान्‌के बल-प्रतापका वर्णन कौन कर सकता है। उन्होंने एक दिन मुनियोंके आश्रममें जाकर उनके बालकोंको डराया-धमकाया और कुशा आदि सब सामग्री इधर-उधर बिखेर दी। उनके इस कामको देखकर मुनियोंने अञ्जनीसुत हनुमान्‌को शाप देते हुए कहा-॥ १८५ ।' हे कपिश्रेष्ठ ! आजसे तुम अपने पुरुषार्थको भूल जाओगे और जब कभी दूसरेके मुखसे अपना बल विस्तारसे सुनोगे ।। १८६ । १८७ ।। तब स्मरण होगा। * सुग्रीवके पास रहते समय इसी कारण अपना पुरुषार्थ भूल गये थे। बादमें समुद्रतटपर उपवासके समय जब जाम्बवान्‌ने उनकी स्तुति करके उनके बलका स्मरण दिलाया, तब हनुमान्‌को तुरन्त अपना बल याद आ गया था । १८८ ॥ १८९ ।। यह सब मैंने आपके पूछनेके अनुसार सविस्तार कपि-हनुमान् तथा रावणका कार्यकलाप कह सुनाया ।। १९० ।। हे राम ! आप परमेश्वर हैं, ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ देखते हैं, विकल्परहित आप भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालकी क्रियाके विज्ञ और सबके साक्षी हैं। भक्तोंके अनुरोधसे आप समस्त क्रियाकलाप करते हुए मनुष्य बनकर मेरे बचनको

सर्गः ११ ] सारकाण्डम् १५१

सर्गः ११ ] सारकाण्डम् १५१

श्रीशिव उवाच स्तुत्वैवं राघवं तेन पूजितः कुंभसंभवः । स्वाश्रमं मुनिभिः सार्धं प्रययौ गुप्तविग्रहः ॥१९२॥ विन्ध्याचलं निजं रूपं स मुनिर्नैव दर्शयन् । पुनरुत्थास्यति गिरिर्श्वेति मन्वा तु तद्भयात् ॥१९३॥ रामस्तु सीतया सार्द्धं भ्रातृभिः सह मंत्रिभिः । संसारीव रमानाथो रममाणोऽभवद्गृहे ॥१९४॥ अनासक्तोऽपि विषयान् बुभुजे प्रियया सह । हनुमत्प्रभृतैः सद्भिवानरैः परिसेवितः ॥१९५॥ राघवे शासति भुवं लोकनाथे रमापतौ । वसुधा सस्यसंपन्ना फलवंतश्च भूरुहाः ॥१९६॥ जनाः स्वधर्मनिरताः पतिभक्तिपराः स्त्रियः । नापश्यन्पुत्रमरणं कश्चिद्राजनि राघवे ॥१९७॥ समारुह्य विमानाग्र्यं राघवः सीतया सह । वानरैर्भ्रातृभि सार्द्धं संचचारार्ववनि प्रभुः ॥१९८॥ अमानुषाणि कर्माणि चकार बहुशो भुवि । लोकानामुपदेशार्थं परमात्मा रघूत्तमः ॥१९९॥ कोटिशः शिवलिंगानि स्थापयामास सर्वतः । अश्वमेधादिविविधान् यज्ञान् विपुलदक्षिणान् ॥२००॥ चकार परमानन्दो मानुषं वपुरास्थितः । सीतां नो रमयामास सर्वभोगैरमानुषैः ॥२०१॥ शशास रामो धर्मेण राज्यं परमधर्मवित् । कथाः संस्थापयामास सर्वलोकमलापहाः ॥२०२॥ एकादशसहस्राणि सैकदशशतानि च । त्रेतायुगभवान्येव वर्षाणि रघुनन्दनः ॥२०३॥ चकार राज्यं धर्मेण लोकवन्द्यपदाम्बुजः । कलेर्मनेन ह्येतानि शताण्येकादशैव हि ॥२०४॥ सैकदशप्लवान्तञ्च रामो राज्यं चकार सः । एकपत्नीव्रतो रामो राजर्षिः सर्वदा शुचिः ॥२०५॥ यस्यैकमेव तच्चासीत् पत्नीवाक्यं शरस्तथा । गृहमेधीयमखिलमाचरन् शिक्षितुं नरान् ॥२०६॥ सीता प्रेम्णाऽनुवृत्त्या च प्रश्रयेण दमेन च । भर्तुर्मनोज्ञा साध्वी चाप्याज्ञां ता दिवा निशाम् ॥२०७॥

सुनते हैं। हे ईश ! सब लोगोंसे पूजित होकर आप बड़ी ही शोभाको प्राप्त हो रहे हैं ॥ १९१ ॥ श्रीशिवजी बोले- इस प्रकार रामकी स्तुतिकर तथा उनसे पूजा-सत्कार प्राप्त करके गुप्तविग्रह अगस्त्य मुनि, सब मुनियोंको साथ लेकर अपने आश्रमको चले गये ॥ १९२ ॥ जाते समय मुनिने अपना रूप विन्ध्याचलको इस डरसे नहीं दिखलाया कि वह कही फिर उठकर न खड़ा हो जाय ॥ १९३ ॥ उधर रामचन्द्रजी सीता, मन्त्रिगण तथा भ्राताओंके साथ संसारी जीवोंके समान क्रीडा करते हुए अपने घरमें रहने लगे ॥ १९४ ॥ आसक्त न होते हुए भी अपनी प्रिया सीताके साथ ऐहिक विषयोंका आनन्द लेते रहे। हनुमान् आदि अच्छे वानर श्रीहरिकी सेवामें लग गये ॥ १९५ ॥ रमापति तथा लोकनाथ रामके शासनकालमें धरा धन-धान्यपूर्ण हो गयी, वृक्ष खूब फलने लगे ॥ १९६ ॥ मानवगण अपने-अपने धर्मपथपर चलने लगे और स्त्रियें पतिभक्तिपरायणा होकर रहने लगीं। रामके राज्यमें माता-पिताके जीते जी कहींपर पुत्रमरण नहीं होता था ॥ १९७ ॥ वे प्रभु राम-सीता, लक्ष्मण आदि भाइयों तथा वानरोंके साथ विमानपर सवार होकर अवनीतत्तलपर विचरते थे ॥ १९८ ॥ पृथ्वीपर उन्होंने अनेक लोकोत्तर कार्य किये। परमात्मा रामने लोगोंको उपदेश देनेके लिए सर्वत्र करोड़ों शिव-लिङ्ग स्थापित किये। परमानन्दस्वरूप परमेश्वर रामने मनुष्यका रूप धारण करके बहुतेरी दक्षिणावाले विविध अश्वमेध यज्ञ किये। मनुष्योंको दुर्लभ अनेक भोगसाधनोंसे रामने सीताको सन्तुष्ट किया ॥१९९॥२००॥२०१॥ परम धर्मज्ञ रामने न्यायपूर्वक राज्यका शासन करके लोगोंके पापोंको दूर करनेवाली अनेक कथाएँ स्थापित कीं ॥ २०२ ॥ त्रेतायुगके ग्यारह हजार वर्ष पर्यन्त लोगों द्वारा वन्दनीय चरणकमलवाले रघुनन्दनने धर्मपूर्वक राज्य किया। कलियुगके हिसाबसे रामने यहाँ ग्यारह लाख ग्यारह वर्षतक राज्य किया। राजर्षि राम सर्वदा पवित्र रहकर एकपत्नीव्रतमें स्थिर रहे ॥ २०३-२०५ ॥ जिनके लिए पत्नीका वाक्य और बाण एक समान था। उन्होंने समस्त गृहस्थाश्रमका कार्य एकमात्र लोगोंको शिक्षा देनेके लिए किया था

१६० आनन्दरामायणे [ सर्गः १३

युक्ता सं रञ्जयामास राजानं राघवं मुदा । एवं गिरीन्द्रजे प्रोक्तं रामराज्योत्तरोद्भवम् ॥२०८॥ चरितं रघुनाथस्य यथा पृष्टं त्वया मम । श्रवणात्सर्वपापघ्नं महामंगलकारकम् । २०९॥ सारकांडमिदं देवि ये शृण्वन्ति नरोत्तमाः । तेषां मनोरथाः सर्वे परिपूर्णा भवन्ति हि । २१० ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे अगस्तिरामशिवपार्वतीसंवादे त्रयोदशः सर्गः । १० ॥

प्रथमसर्गे श्लोकाः ॥ १०९ ॥ द्वितीये ॥ ३१ ॥ तृतीये ॥ १६४ ॥ चतुर्थे १७० ॥ पंचमे ॥ १४० । षष्ठे ॥ १३० ॥ सप्तमे ॥ १६१ । अष्टमे ॥ १२५ ॥ नवमे ॥ ३१० । दशमे ॥ २७३ ॥ एकादशे ॥ २८८ । द्वादशे ॥ २०२ ॥ त्रयोदशे ॥ २१० ॥ एवं सारकाण्डस्य पूर्णश्लोकसंख्या ॥ २५५८ ।


॥ २०६ ॥ सीता प्रेमके अनुकूल बर्तावसे, नम्रतासे, लज्जासे, डरसे, पातिव्रत धर्मसे, मनोहरभावसे तथा पतिके मनोभावको जानकर उसके अनुसार व्यवहारसे राजा रामको प्रेमपूर्वक आनन्दित करने लगीं । हे गिरीन्द्रजे ! इस प्रकार मैंने तुमको रामके राज्यकालके बादका सब वृत्तान्त कह सुनाया, जैसा कि तुमने पूछा था । यह रामचरित्र श्रवणमात्रसे सब पापोंका नाशक तथा महामंगलकारी है ॥ २०७-२०९ ॥ हे देवि, जो लोग इस सारकांडको श्रद्धासे सुनते हैं, उन नरश्रेष्ठोंके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ॥ २१० ॥ इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानंदरामायणे वाल्मीकीये सारकांडे अगस्तिरामशिवपार्वतीसंवादे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥

इस सारकाण्डके पहिले सर्गमें १०९ श्लोक दूसरेमें ३१, तीसरेमें १६४, चौथेमें १७०, पाँचवेंमें १४०, छठवें १३०, सातवेंमें १६१, आठवेंमें १२५, नवेंमें ३१०, दसवेंमें २७३, ग्यारहवेंमें २८८, बारहवेंमें २०२ तथा तेरहवेंमें २१० श्लोक हैं । इस प्रकार इस सारकाण्डमें कुल २५५८ श्लोक हैं ।


* इति श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डं समाप्तम् *

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु

॥ श्रीरामचन्द्रो विजयतेतराम् ॥

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गतं

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽऽह्वया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


यात्राकाण्डम्

प्रथमः सर्गः

( रामायणकी उत्पत्तिका वृत्तान्त )

श्रीपार्वत्युवाच

सारकाण्डं त्वया शंभो कीर्तितं बहुपुण्यदम् । मया श्रुतं तु पृच्छामि यत्तद्वक्तुं त्वमर्हसि ॥ १ ॥
कथं कृता वाजिमेधा राघवेण बलीयसा । रामादीनां चतुर्णां हि बन्धूनां सन्ततिं वद ॥ २ ॥
स्वपुत्रबन्धुपुत्राश्च कथं स्त्रीभिः सुयोजिताः । दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥ ३ ॥
तथैकादश वर्षाणि त्रेतायुगमदानि हि । राज्यं कृतं त्वया प्रोक्तं विस्तराद्ब्रूस्व माम् ॥ ४ ॥
यानि यानि चरित्राणि राघवेण कृतानि हि । तानि तानि हि कृत्स्नानि विस्तराद्वक्तुमर्हसि ॥ ५ ॥

इति देविवचः श्रुत्वा शंभुस्तां पुनरब्रवीत् ।

श्रीमहादेव उवाच

सम्यक् पृष्टं त्वया देवि राघवस्य कथानकम् ॥ ६ ॥
ममापि हर्षः संजातस्तद्वदामि तवान्तिकम् । चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ॥ ७ ॥
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् । वाल्मीकिना कृतं पूर्वमेकदा तद्वदामि ते ॥ ८ ॥


श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीपार्वतीजी बोलीं—हे शम्भो ! आपने अतिपुण्यदायक सारकाण्डकी जो कथा कही, सो मैंने सुनी परन्तु अब मैं जो आपसे पूछती हूँ, वह कृपा करके कहें ॥ १ ॥ बलवान् रामने अश्वमेधयज्ञ किस प्रकार किये ? राम आदि चारों भाइयोंकी कौन-कौन-सी सन्ततियां हुईं ॥ २ ॥ रामने अपने पुत्रों तथा भाइयोंके पुत्रोंका किस प्रकार और कौन-कौन-सी स्त्रियोंके साथ विवाह किया ? आपने कहा है कि रामने त्रेतायुगमें ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष पर्यन्त राज्य किया था । अतएव ये सब बातें विस्तारपूर्वक कहें ॥ ३ ॥ ४ ॥ रामने जो जो चरित्र किये हों, वे सब आपके द्वारा सविस्तार कहनेके योग्य हैं ॥ ५ ॥ देवीके इस वचनको सुनकर शम्भुने कहा। श्रीमहादेवजी बोले—हे देवि ! तुमने बहुत अच्छा किया कि जो रामकी कथा पूछी ॥ ६ ॥ इससे प्रसन्न होकर मैं तुमको रघुनाथजीका सौ करोड़ श्लोकोंमें कहा हुआ चरित्र सुनाता हूँ । ७ ॥ जिसका कि एक-एक अक्षर पुरुषोंके महान् पापोंको नष्ट करनेवाला है, वाल्मीकिने जो कार्य

१६२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

वाल्मीकिस्त्वेकदा स्नातुं जगाम तमसां नदीम् । शिष्येण सहितो गत्वा भूमौ स्थाप्य कमण्डलुम् ॥९॥
आवश्यकं तु संपाद्य कृत्वा शौचविधिं ततः । यावच्चलति स्नानार्थं दर्भपाणिः स वै मुनिः ॥१०॥
तावद्ददर्श तमसातीरे कौतुकमुत्तमम् । क्रौञ्चयुग्मे हतः क्रौञ्चो निषादेन पतत्त्रिणा ॥११॥
क्रौञ्ची शोकसमाविष्टा विललापातिदुःखिता । वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा ॥१२॥
ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्रिणा मा हतेन च । तथाविधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् ॥१३॥
ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समजायत । ततः करुणयाऽऽविष्टस्त्वधर्मोऽयमिति द्विजः ॥१४॥
निशम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् । मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ॥१५॥
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् । तस्येत्थं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्षतः ॥१६॥
शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया । चिन्तयन् महाप्राज्ञश्चकार मतिमान् मतिम् ॥१७॥
शिष्यं चैवाब्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुंगवः । पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः । १८॥
शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा । शिष्यस्तु तस्य श्रुवतो मुनेर्वाक्यमनुत्तमम् । १९॥
प्रतिजग्राह संतुष्टस्तस्य तुष्टोऽभवन्मुनिः । सोऽभिषेकं ततः कृत्वा तीर्थे तस्मिन्यथाविधि ॥२०।
तमेव चिंतयन्नर्थमुपावर्तत वै मुनिः । भारद्वाजस्ततः शिष्यो विनीतः श्रुतवान् गुरोः ॥२१॥
कलशं पूर्णमादाय पृष्ठतश्च जगाम ह । स प्रविश्याश्रमपदं शिष्येण सह धर्मवित् ॥२२॥
उपविष्टः कथाश्चान्याश्चकार ध्यानमास्थितः । तत्राजगाम लोकानां कर्ता ब्रह्मा स्वयं प्रभुः । २३।


पहिले एक समयमें किया था, सो तुम्हे सुनाता हूँ ॥ ८ ॥ एक समय वाल्मीकिमुनि अपने शिष्य भारद्वाजको साथ लेकर तमसा नदीपर स्नान करनेके लिए गये, वे रास्ते में जमीनपर कमंडलु रख तथा आवश्यक शौचादि कर्ममें निवृत्त होकर ज्यों ही हाथमें कुशा ग्रहण करके स्नान करनेके लिए चले । ६ ॥ १० ॥ त्यों ही उन्होंने तमसा नदीके तटपर एक उत्तम कौतुक देखा। वह यह कि एक निषादने बाणसे क्रौंच तथा क्रौंचीके जोड़ेमेंसे क्रौंच (बगुले) को मार डाला ॥ ११ ॥ तब क्रौंची शोकातुर होकर अतिदुःखसे विलाप करने लगी। वह बेचारी अपने सहचर, तांबेके समान लाल मस्तकवाले, मत्त और बाणसे मारे गये अपने पति पक्षी से वियुक्त गयी थी। निषादके द्वारा मारे गये उस पक्षीकी दशा देखकर धर्मात्मा वाल्मीकि ऋषिके मनमें बड़ी करुणा उत्पन्न हुई। पश्चात् उस क्रौंचीके दयाजनक रुदनको सुननेसे करुणाक्रान्त हो और 'यह बड़ा अधर्म हुआ' ऐसा विचारकर मुनि बोले- ॥१२-१४॥ अरे निषाद ! तूने एक कामासक्त जोड़ेके क्रौंच पक्षीको मार डाला है, इसलिए तू भी प्रत्युत वर्षोंतक प्रतिष्ठाको नहीं प्राप्त होगा अर्थात् बहुत काल पर्यन्त जीवित नहीं रहेगा ॥ १५ ॥ इस प्रकार अनुष्टुप्-छन्दोबद्ध वाणी सहसा अपने मुखसे निकल पड़नेके कारण आश्चर्य पाकर तथा क्रौंचके शोकसे पीडित उस ऋषिके मनमें 'ओह ! इस निषादको मैने यह क्या कह दिया ! इससे वा मुझे बडा भारी पाप लग गया' ऐसी चिन्ता होने लगी ॥ १६ ॥ ओह ! यह तो मुझसे बड़ा भारी अपयश देनेवाला काम हो गया। ऐसी चिंता करते हुए मनमें कुछ निश्चय करके महामतिमान् मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिने अपने शिष्य भारद्वाजसे कहा-॥ १७॥ वत्स ! शोकवश होकर मैने निषादको शाप दे दिया। यह हुआ तो अनुचित, तथापि शोकसे दुःखित होनेके कारण मेरे मुखसे आठ अक्षरोंवाले चार चरणोंयुक्त समान पदोंसे विशिष्ट तथा ताल-स्वरपर गाने योग्य यह अनुष्टुप् छन्द श्लोकरूपमें (यशरूपमें) ही प्रवृत्त हो अपयशस्वरूप न हो । १८ ॥ पश्चात् मुनिके इन श्रेष्ठ वाक्यों सुनकर उनके प्रसन्नवदन शिष्य भारद्वाजने 'यह श्लोक आपके इच्छानुसार यशरूप ही होगा' ऐसा कहकर उनकी बातका समर्थन किया इससे वाल्मीकि उनके ऊपर प्रसन्न हुए ॥ १९ । तदनन्तर तमसा नदीके जलमें यथाविधि स्नान आदि कृत्य करके वे महर्षि 'मेरा अपयश कैसे यशरूपमें परिणत हो जाय' ऐसा विचार करते हुए अपने आश्रमकी ओर चल दिये ॥ २० ॥ उनके पीछे उनके विद्वान् और विनम्र शिष्य भारद्वाज भी कलश उठायकर चल पड़े ॥२१॥ आश्रममें पहुँचनेपर भी वे "निषादको दिया हुआ शाप यशरूपमें कैसे परिणत हो" इसी बातका मनमें

सर्गः २ ] बालकाण्डम् १५३

चतुर्मुखं महातेजा द्रष्टुं तं मुनिपुंगवम् । भार्यादित्यं तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय वाग्यतः ॥२४॥
प्रांजलिः प्रयतो भूत्वा तस्थौ परमविस्मितः । पूजयामास तं देवं पाद्यार्घ्यासनवन्दनैः ॥ २५॥
प्रणम्य विधिवच्चैनं पृष्ट्वा चैव निरामयम् । अथोपविश्य भगवान्त्ससने परमाविरे ॥ २६॥
महर्षये वाल्मीकये सन्दिदेशासनं ततः । ब्रह्मण समनुज्ञातः सोऽप्युपाविशदासने ॥२७॥
उपविष्टे तदा तस्मिन् साक्षाल्लोकपितामहे । तद्गतेनैव मनसा वाल्मीकिर्ध्यानमास्थितः ॥ २८॥
पापात्मना कृतं कष्टं वैरग्रहणबुद्धिना यस्तादृशं चारुरवं क्रौंच हन्यादकारणम् ।२९॥
शोचन्नेव पुनः कौञ्चीमुपश्लोकमिमं जगौ पुनरंतर्गतमना भूत्वा शोकपरायणः ॥३०॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुंगवम् । श्लोक एष त्वया बद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१॥
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती । रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम ॥ ३२॥
धर्मात्मनो गुणवतो लोके रामस्य धीमतः ॥३३॥
वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् । रहस्यं च प्रकाशं च यद्वृत्तं तस्य धीमतः ॥ ३४॥
रामस्य सह सौमित्रेः कीशानां रक्षसां तथा । वैदेह्याश्चैव यद्वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ॥ ३५॥
तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति । न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ॥ ३६॥
कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् । यावत्स्थास्यंति गिरयः सरितश्च महीतले ॥३७॥
तावद्रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति । यावद्रामायणकथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति ॥३८॥

विचार करते हुए वे धर्मज्ञ मुनि शिष्योंके साथ बैठकर सम्भाषण हास्य करने लगे ॥ २२ ॥ इतनेमें वहीं समस्त लोकोंके कर्त्ता चतुर्मुख प्रभु महातेजस्वी ब्रह्मा उस मुनिश्रेष्ठसे मिलनेके लिए आ पहुँचे ॥ २३ ॥ उनको अचानक आये देखकर वाल्मीकि मुनि विस्मयान्वित तथा अवाक् हो गये। परन्तु वे तुरन्त हाथ जोड़कर नम्रभाव उनके सामने खड़े हो गये ॥ २४ ॥ पश्चात् धीरेसे मनको स्थिर करके मुनिने ब्रह्माजीसे कुशल समाचार पूछा तथा पाद्य, अर्घ्य, आसन, स्तुति, प्रणाम आदिसे उनका सत्कार किया। ब्रह्माजीने भी उनके तप आदिका कुशल पूछा और अपने लिए बिछाये हुए आसनपर स्वयं बैठकर वाल्मीकिजीको भी आसनपर बैठनेके लिए कहा। लोकोंके साक्षात् पितामह ब्रह्माजीके आसनपर बैठ जानेपर उनकी आज्ञासे वाल्मीकि ऋषि भी बैठ गये ॥ २५-२७॥ किन्तु उस समय भी उनका मन क्रौञ्चपक्षीके विषयमें ही सोच रहा था कि पापो अगाध करण तथा निर्दोष जीवोंपर मिथ्या वैरभाव रखनेवाले उस व्याधने यह बड़ा कष्टप्रद काम किया ॥ २८ ॥ जो कि सुन्दर बोली बोलनेवाले, निर्दोष तथा कामके वशीभूत उस पक्षीको बिना कारण ही मार डाला और मैंने भी उस व्याधको शाप दे दिया, सो भी बड़ा खराब काम हुआ। ऐसे विचारमें मन और शोकमें डूबें हुए वाल्मीकि कौञ्चका शोक करते हुए फिर पड़ो बात मनमें सोचने लगे। बादमें उन्होंने व्याधको शाप देते समय जो श्लोक कहा था, उसीको उन्होंने ब्रह्मा के के सम्मुख कहा। उसको सुनकर ब्रह्माजी हँसकर मुनिसे कहने लगे ॥ २९ ५ ३० । हे ब्रह्मन् ! तुम्हारे एकाएक कहा हुआ यह श्लोक यशके रूपमें परिणत हो जायगा। इसमें तुम क्षणिक भी संशय न करना। यह तो मेरी इच्छा तथा प्रेरणासे ही तुम्हारे मुखसे यह सरस्वती प्रवृत्त हुई है ॥ ३१ ॥ हे मुनीश्वर ! तुम मेरी आज्ञासे धर्मात्मा क्षमावान् अखिललोकके स्वामी परम बुद्धिमन् राजा रामका संपूर्ण चरित रचो ॥ ३२ ॥ धैर्यशाली तथा बुद्धिमान् रामका जो चरित्र तुमने नारदसे सुना है, वह तथा और भी गुप्त व प्रकट चरित्र हो, उसको तुम रचकर प्रकाशित करो ॥ ३३ । सुमित्रानुज लक्ष्मण सहित रामचन्द्रका, वानरोंका, सब राक्षसोंका तथा सीताका गुप्त अथवा प्रकट जो भी वृत्तान्त तुम न जानते होगे, वह सब भी मेरी कृपासे जान जाओगे और शुभके चरित्रसे भरे हुए उस काव्यमें निहित तुम्हारी वाणी असत्य नहीं होगी ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ तुम ऐसे श्लोकोंमें ही मनको आनन्द देनेवाली पवित्र रामकथा लिखो। जबतक संसारमें सूर्य-चन्द्र रहेंगे, तबतक तुम्हारे रची हुई रामकथा की लोकमें प्रसारित होती रहेगी। जबतक तुम्हारी रची हुई रामकथा पृथ्वीमण्डलपर स्थित रहेगी, तबतक तुम मेरे ऊपरके तथा नीचेके सब लोकोंमें

१६४आनन्दरामायणे[ सर्गः २

तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मन्लोकेषु निवत्स्यसि । इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा स्वयं रामस्य धीमतः । ३९॥
चरित्रं श्रावयामास वेदवाक्यैः सुपुण्यदैः । ततः संपूजितो ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत ॥४०॥
ततः सशिष्यो भगवान् मुनिर्विस्मयमाययौ । तस्य शिष्यास्ततः सर्वे जगुः श्लोकमिमं पुनः ॥४१॥
मुहुर्मुहुः प्रीयमाणाः प्राहुश्च भृशविस्मिताः । समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा ।
शोचन्नुव्याहृतोऽभूद्यः शोकः श्लोकत्वमागतः । ४२॥
तस्य बुद्धिरियं जाता महर्षेर्भावितात्मनः । कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम् ॥४३॥
उदारवृत्तार्थपदैर्मनोगर्भैस्सदाऽस्य रामस्य चकार कीर्तिमान् ।
समाक्षरैः श्लोकवरैर्यशस्विनो मुनिः स काव्यं शतकोटिमितम् ४४॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे श्लोकोत्पत्तिरामायणकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

श्रीशिव उवाच

वाल्मीकिना कृतं देवि शतकोटिप्रविस्तरम् । रामायणं महाकाव्य जगृहुर्मुनयश्च ते ॥ १ ॥
आश्रमे तत्पठंति स्म कथयंति स्म ते मुदा । तच्छ्रोतुममराः सर्वे विमानैश्च दिवि स्थिताः २ ॥
श्रुत्वा सर्वं सविस्तारं वाल्मीकिं पुष्पवृष्टिभिः । ववृषुर्जगदुश्चंदस्ते प्रशशंसुर्मुनीश्वरम् ॥ ३ ॥
ततो देवाः सगंधर्वा यक्षा नागाः सकिन्नरा । मुनीश्वरा गुह्यकाश्च पार्थिवाः पद्मभूस्त्वहम् । ४ ॥
परस्परं ते कलहं चक्रुः कार्यार्थमादरात् ब्रह्माद्या निर्जराः सर्वे पन्नगान्दितिजान्नरान् ॥ ५ ॥
वय काव्यं विनेष्यामो दिव वाल्मीकिना कृतम् । दितिजाः पन्नगाः प्रोचुर्विनेष्यामो रसातले ॥ ६ ॥


सुखसे रहोगे। इतना कहकर स्वयं भगवान् ब्रह्माने पुण्यप्रद वेदवाक्यों द्वारा बुद्धिमान् रामका चरित्र उन्हें कह सुनाया। पश्चात् मुनिसे पूजित होकर ब्रह्मा वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥३९-४०॥ तब शिष्यों सहित भगवान् वाल्मीकि मुनिको बड़ा भारी विस्मय हुआ और उनके शिष्य उस श्लोकका बारम्बार आनन्दसे गान लगे ॥ ४१ ॥ महर्षिने समान अक्षरोंवाला तथा चार चरणों युक्त जिस श्लोकको गाया था, उसको वे शिष्य भी प्रसन्न होकर आश्चर्यसे परस्पर कहने-सुनने लगे ॥ ४२ ॥ उस श्लोकका मुनि शोकरूप बार-बार कहते थे। अन्तमें अहो शोक श्लोक (पद्य) रूपमें परिणत हो गया, पश्चात् उन शुद्धात्मा महर्षिकी यह इच्छा हुई कि मैं इसी प्रकारके श्लोकोंमें समस्त रामायणका निर्माण करूँ ॥ ४३॥ अन्तमें उन कीर्तिमान् मुनिने मनको आनन्द देनेवाला तथा जिससे उदार चरित्र भरे अर्थोंका ज्ञान प्राप्त हो, ऐसे पद और समान अक्षरोंवाले सौ करोड़ श्लोकोंवाला यशस्वी रामका काव्य (रामायण) रचा ॥ ४४॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे भाषाटीकायां श्लोकोत्पत्तिरामायणकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! वाल्मीकि मुनिका बनाया हुआ सौ करोड़ श्लोकात्मक उस महाकाव्य रामायणको सब मुनियोंने अपनाया और वे हर्षपूर्वक उसे अपने आश्रमोंमें पढ़ने तथा सुनने लगे । उसको सुननेके लिए सब देवता विमानोंमें बैठकर आकाशमें छा गये ॥ १ ॥ २ ॥ उन लोगोंने विस्तारपूर्वक सम्पूर्ण रामायण सुना और मुनीश्वर वाल्मीकिजीकी स्तुति करके जयजयकार करते हुए उनपर पुष्पवृष्टि की ॥ ३ ॥ बादमें देवता, गंधर्व यक्ष, नाग, किन्नर, मुनिगण, गुह्यक, राजे-महाराजे, ब्रह्मा तथा मैं सब एक साथ उस रामायण महाकाव्यकी प्राप्तिके लिए परस्पर आदरपूर्वक झगड़ने लगे। ब्रह्मादि देवता पन्नगों, दैत्यों तथा मनुष्योंसे कहने लगे कि इस वाल्मीकीय काव्यको हमलोग स्वर्गमें ले जायँगे दैत्य तथा पन्नग कहने लगे कि हम

सर्गः २ ] यात्राकाण्डम् १६५


इदं काव्यं राघवस्य चारित्रं पावनं शुभम् । सुरासुरा मनुष्यान्ताः प्रोचुः काव्यं हि भूतलात् ॥७॥
नेतुं रसातलं स्वर्गे न दास्यामो वयं क्वचित् । काव्यार्थमिति ते चक्रुः कलहं रोमहर्षणम् ॥८॥
ततो देवि जनान् मर्त्यान्निवार्य वचनैर्हितैः । गत्वाऽहं तंस्तु क्षीराब्धौ शेषपर्यङ्कधायिनम् ॥९॥
विष्णुं स्तुत्वा तु वेदोक्तैर्मन्त्रैर्नानाविधैरपि । नानापूजोपहारैश्च पूजयित्वा सविस्तरम् ॥१०॥
कृतवान् गंतवाद्यादि तेन विष्णुर्बुबुध्यत । पप्रच्छ मां तदा विष्णुः किमर्थं वै त्विनोऽस्म्यहम् ? ॥११॥
वृत्तं सर्वं मया देवि कथितं वृत्तविस्तरम् । काव्यार्थं कलहं श्रुत्वा प्रहस्य जगदीश्वरः । १२॥
त्रिधा विभज्य काव्यं तद् रूपवान् भक्तवत्सलः । त्रयस्त्रिंशत्कोटिसमुद्रेभ्याणि पृथक् पृथक् ॥१३॥
शतानि त्रीणि श्लोकांश्च त्रयस्त्रिंशत्तथापरान् । दशाक्षरमितान्मन्त्रानप्यभजत उमापतिः ॥१४॥
द्वयक्षरे याचमानाय मयं देवे ददौ हरिः । उपदिशाम्यहं काश्यां तेऽन्तकाले नृणां श्रुतौ ॥१५॥
रामेति तारकं मन्त्रं तमेव विद्धि पार्वति । लक्ष्मीगरुडशेषेभ्यो याचमानेभ्य आदरान् ॥१६॥
मन्त्रत्रयं पृथक् विष्णुर्ददौ तेभ्योऽतिहर्षितः । शेषान् निनाय पातालं लक्ष्मीर्वैकुण्ठमादरात् ॥१७॥
पृथिव्यामथ गरुडस्तं दधार महामनुम् । शपुः शेषान्नन्नगाद्याः सर्वे पातालशामिनः ॥१८॥
स्वर्गे प्रापुर्महालक्ष्म्यास्तन् मनुं निजराडयः । काश्यपान्प्रापुर्मटायन्मन्त्रं सर्वे भूतल्वामिनः ॥१९॥
मन्त्रशास्त्रात्तत्स्वरूपं ज्ञयं गुप्त शास्त्रोक्तैः । ततः पूर्वोक्तभागान् ददौ विष्णुः पृथक् पृथक् ॥२०॥
एवं विभागं देवेभ्यो द्वितीयं पाण्डवाः । मुनीश्वरेभ्यो नागेभ्यस्तृतीयं बम्मूनामम् ॥२१॥
ततो देवा निज भागं स्वर्गे निन्युर्मुदान्विताः । पाताले पन्नगाद्याश्च निन्युर्भागं मुदा न्वितम् ॥२२॥


लोग हम रसातलम न जाय । ४-६ । क्योकि इस पावन पवित्र तथा सुन्दर रामचरित्र कवित्त है, सब राजा प्रजा और ऋषि मुनीव कहा कि हम उस काव्यका मूलभाग न तो स्वर्गमे ले जाने देंगे और नहीं पातालम । इस प्रकार व पदरकाव्यके लिए परस्पर गमर्हषक जागृत रूप रहे ॥ ७॥८॥ हे देवि ! पश्चात् मैन उन सबको समझा बुझाकर सन्तुष्ट करनेसे रोका और उन सबका भाव लेकर मैं क्षीर-समुद्रमे शेषशय्यापर शयन करनवाले विष्णुभगवान्‌के पास गया और नाना प्रकारका पूत्रेश्री वन्दश्रीश विस्तारपूर्वक पूजा करके अनेक वेदसवाते उत्तम स्तुति की ॥ ९ ॥ १० ॥ तदनन्तर उनके सामने वात्र बजाना गाना प्रारम्भ किया । उससे विष्णु भगवान् जाग और कहन लगे कि तुमने मुझको क्यों जगाया ? ॥ ११ ॥ देवि ! तब मैने सब हाल साफ साफ कह सुनाया । जगदीश्वर विष्णुभगवान् रामायण पञ्चकाव्यक लिए होने वाले कलहको सुनकर हँस पड़े ॥ १२ ॥ उस भक्तवत्सल भगवान्‌ने क्षणभरम उस काव्यक तीन भाग कर दिये । उनमसे प्रत्येक भाग तेतीस करोड तेतीस लक्ष, तेतीस हजार तान सौ तैतीस श्लोकोंका बना । उन रघुपतिने इस दश अक्षरोवाल मंत्रका का विभाजन किया ॥ १३ ॥ १४ ॥ बाकी दो अक्षर श्रीहरिने दृह अक्षरोको याचना करनवाले मुझ (शिव) को र दिया । मैं काशमे रहता हुआ अंतकालमे उन्हों दो अक्षरोका मनुष्यके कानम उपदेश करता हूँ ॥ १५ ॥ हे पार्वती ! उन दो अक्षरोको ही तुम 'राम' नामका तारक-मंत्र समझो । अर्थात् वही दो अक्षरा 'राम' यह तारक मंत्र है । पश्चात् बड़े आदरसे मांगने-पर विष्णु भगवान् अतिशय प्रसन्न होकर लक्ष्मी, गरुड और शेषन नका भी अलग-अलग तीन मन्त्र प्रदान किये । शेष भगवान् अपने मंत्रका पातलम् लए। वैकुण्ठमे और गरुड उस महामन्त्रको बड़ी यत्नसे पृथ्वीपर ले गये ॥ १६ ॥ १७ ॥ शेषके द्वारा पातालम गया हुआ यह पातालवासी नागोंको प्राप्त हो गया ॥ १८ ॥ स्वर्गमें लक्ष्मीके द्वारा यह मंत्र सब दवताओंका मिला और भूतलवामी लोगोको यह मंत्र गरुडसे प्राप्त हुआ ॥ १९ ॥ हे शरीन्द्रज ! उस मंत्रोंका गुप्तस्वरूप मंत्रशास्त्रोंस जाना जा सकता है । तदनन्तर रामायणके किये हुए तीनों भागोंको विष्णुने अलग-अलग बाँट दिया ॥ २० ॥ उनमेम तैंतीस करोड तैंतीस लाख तैंतीस हजार तान सौ तेतीस ३३३३३३३३३ मत्रोंका एक भाग उन्होंने देवताओंको दिया । ३३३ ३३३३३३ का दूसरा भाग मुनीश्वरोका पृथ्वीलोकक लिए दिया और ३३३३३३३३३ का तीसरा भाग नागोंको दिया । २१ ॥

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सर्गः २ ] यात्राकाण्डम् १६७


क्षीरायुधो व्यरचिनास्तेषां योग्यानि ... । श्रीकृष्णोऽपि पुनर्व्यासो व्यासरूपी भुवि ३९ मानवानां हितार्थाय काव्याद्रामकथान्वितम् । भागद्वयसमाश्रित्य विविधानि हि ४० पृथक् पृथक् सप्तदश पुराणानि करिष्यति । भारतं विनिहत्य च महत्कृत्यं करिष्यति ॥४१। भागोद्भारस्तयोर्नन्तैर्नान्त्याहं विशुद्ध च । मद्भागोऽन्यतरोऽर्थेश्च यदा शान्तिं न गच्छति , ४२ सरस्वत्यास्तटे व्यासो व्यग्रचित्तो भविष्यति । एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा नारदाय महात्मने ।४३ चतुःश्लोकींविष्णुपदेशरूपोपदेशं करिष्यति । लब्ध्वा तान्न नारदश्चापि गरीणां रणयन्मुहुः ॥४४॥ कीर्तयन् सुस्वरं गत्वा मूर्ति म- दर्शयन्निव । तच्छ्लोकान् व्यासमुनये गत्वा ह्युपदेक्ष्यति ।४५ लब्ध्वा व्यासमुनिः श्लोकांस्तान्प्रशणार्थांन्नाम्। शान्तिं लब्ध्वा मनस्तेषां विस्तारं च करिष्यति । तेषामेवार्थमादाय पुराणं परमद्भुतम् अष्टादशसहस्रं हि श्रीमद्भागवताभिधम् ४७। करिष्यत्यष्टादशमं रम्यं जनमनोहरम् । भागवत्यन्त एव वाणी भिन्ना भविष्यति ' ४८॥ पुराणानां च सर्वेषां वाल्मीकीयैव गौः प्रिये , पृथक्तां स्मृतो व्यासः श्रीमद्रामायणे शतम् । ४९ करिष्यति तथान्यानि स व्यासो विविधानि च उपपुराणान्युपपुराणानि मारं मारं विशुह्य च ॥५० भागोद्भासतखण्डान्नर्गताद्रामायणाद्भुवि । करिष्यंति नद्यःन्येऽपि षट्पञ्चाशणि मुनीश्वराः । ५१॥ तस्माद्रामायणादेव मातृमुद्धृत्य सादरान् । यत्किञ्चिदिहिनिर्भूम्यां कीर्त्यते वै कथानकम् ॥५२॥ रामायणांशजं विद्धि श्लोकपद्यमयीह यत् ।

पार्वत्युवाच

शंभो ते द्रष्टुमिच्छामि तन्मुखं नारदो मुनिः । ५३ । सर्व ज्ञात्वा विधिमुखाद्रम्यपातकनाशनम् । तन् गवतचतुश्लोकांश्चतुश्लोपदेक्ष्यति ५४॥ यैः करिष्यति स व्यासो मुनिर्भागवतं वरम् । तान्श्लोकांश्चतुर्गन्ध मां कृपया वक्तुमर्हसि ।५५।।


योग्य बनायेगा । हे देवि ! इसके अतिरिक्त स्वयं श्रीकृष्ण भी पृथिवीपर व्यासका रूप धरकर अवतार लेंगे और मनुष्योंके कल्याणके लिए भारतवर्षके भाग्यवान् रामायण कथासे विविध प्रकारके पृथक् पृथक् सत्रह पुराण रचेंगे। वे सर्वोत्तम तथा बड़ा भारी महाभारत नामक सुन्दर इतिहास भी लिखेंगे ॥ ३७-४१ । जो भारतवर्षीय रामायणके भागका सारांश होगा। उन भारत आदि ग्रंथोंका निर्माण करनेपर भी जब व्यासजीको सन्तोष न होगा, तब वे व्यग्र होकर सरस्वती नदीके किनारे बैठेंगे उसी अवसरपर ब्रह्माजी भी विष्णुप्रदत्त चार श्लोकोंका नारदको उपदेश करेंगे नारदजी उन श्लोकोंको प्राप्त करके अपनी सुन्दर वीणाको बारम्बार बजाते तथा सुन्दर स्वरसे गाते हुए सत्यवतीके पुत्र व्यास मुनिके पास जाकर उनको उन श्लोकोंका उपदेश देंगे ॥ ४२-४५॥ व्यास मुनि उस रामायणके चार श्लोकोंको प्राप्त करके बड़े शान्त चित्तसे उनका विस्तार करेंगे। उनके अर्थका आश्रय लेकर परम उदार अर्थवाले, अठारह हजार श्लोकात्मक, रमणीय और मनुष्योंके मनको मोह लेनेवाले अठारहवें 'श्रीमद्भागवत' नामक महापुराणका निर्माण करेंगे। इसलिए भागवतकी भाषा भी भिन्न प्रकारकी होगी अर्थात् अन्यान्य पुराणोंमें उनका लेख विलक्षण होगा ॥ ४६ ॥ ४७ । हे प्रिये ! सब पुराणोंकी भाषा वाल्मीकीयके समान ही है, तथापि शतरामायणके कर्त्ता व्यास अलग ही गिने जायेंगे। वेदव्यास मुनिभ भारतवर्षीय रामायणक भाषाका सार ग्रहण करके और भी बहुतसे मनोहर उपपुराण बनायेंगे इसी प्रकार उस रामायणका सारभाग लेकर अन्यअन्य मुनीश्वर छ. जाम्बाका निर्माण करेंगे। हे गिरजे ! पृथ्वीमण्डलपर और भी जो कुछ श्लोकात्मक तथा पद्यात्मक कथा मिले तो उसे भी तुम रामायणके अंशसे ही उत्पन्न समझो। पार्वतीजी बोलीं-- हे शंभो ! मैं आपके मुखारविन्दसे रामचरित्रके उन चार श्लोकोंको सुनना चाहती हूँ, जिन पापनाशक श्लोकोंको नारदने ब्रह्माके मुखसे सुनकर व्यासको सुनाया था ॥ ४८-५४ । जिनके आधारपर व्यासमुनि अपूर्व भागवत ग्रंथको रचेंगे, उन चार श्लोकोंको कृपा करके

१६८आनन्दरामायणे[सर्गः २

श्रीशिव उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया देवि सावधानमनाः शृणु । नारदोक्तांश्चतुःश्लोकांस्तवाग्रे प्रवदाम्यहम् ॥५६। शारदायापि कथिता विधिना ये पुरा शुभाः । ब्रह्मणे विष्णुना पूर्वं श्रीरामचरिते यदा ॥५७। विभक्तं हि तदा दत्तः शेषभूतः सुपुण्यदः । तान् शृणुष्व चतुःश्लोकान् विष्णूक्तान्स्वयंभुवे ॥ श्रीभगवानुवाच अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥५९॥ ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ६० । यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥६१। एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ६२ । श्रीशिव उवाच एवं श्लोका भगवता चत्वारश्च प्रकीर्तिताः । वेधसे ये नराये ने कीर्तिता देवि ते मया । ६३॥ एते पवित्राः पापघ्ना मर्त्यानां ज्ञानदायकाः । अज्ञाननाशकाः सद्यः कीर्तनीया नगेन्द्रजेः ॥६४॥ एवं देवि त्वया पृष्टं यथा तप्ते निवेदितम् । कथामारंभिता पूर्वमाशुना शृणु वच्म्यहम् ॥६५। ततो रामायणं व्यासो विक्षिप्तं मुनिभिः पुनः । कुर्वकत्र शेषभूतं सप्तकाण्डैर्नतं शुभम् ॥६६। चतुर्विंशति माहस्रं ग्रथिष्यति मुनिस्तदा । अद्याऽन्ते तत्प्रदस्य श्लोकाम्प्रचक्षिपन्ति हि । ६७। चतुर्विंशतिसाहस्रं व्यासस्य ग्रथिता अपि । भविष्यन्ति गिरिजेंद्रे मंगलाचरणादिषु ॥६८।


...आप अवश्य मुझमे कहे ॥ ५५ ॥ शिवजीने कहा- हे देवि ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। अब उन इन बातोंको सावधान होकर सुनो। मैं उन नारदने कहे श्लोकोंको सुनाता हूँ ॥ ५६ ॥ उनसे भी पहिले नारद-के समक्ष श्रीरामके चरित्रस्वरूप वे ही चार श्लोक विष्णुने ब्रह्मासे कहे थे ॥ ५७ ॥ ... हे विष्णुने ब्रह्मामे उस समय कहा था, जब कि उन्होंने रामायणका विभाजन किया था । उन बचे हुए पुण्यप्रद तथा विष्णुके द्वारा कहेहुए फिर हुए चार श्लोकोंको मन लगाकर श्रवण करो ॥ ५८ ॥ श्रीभगवान्‌ने कहा था इस चराचर प्रपंचात्मक तथा पाञ्चभौतिक संसारके उत्पन्न होनेके पूर्व न कोई सद्‌वस्तु थी और न असद्वस्तु केवल सबका कारण तथा सृष्टिका बीजरूप मैं ही था। उसी प्रकार प्रलयके पश्चात् भी जो कुछ कार्यसमूहका अधिष्ठान-स्वरूप अवशिष्ट रहता है, वह भी एकमात्र मैं ही हूँ ॥ ५९ ॥ जो वास्तविक वस्तु न होनेपर भी सद्विचारके अभाववश वास्तविकरूपसे जान पड़ता है, परन्तु जब आत्म-अनात्मविषयक तत्त्वविचार किया जाता है, तब आत्माके अतिरिक्त जिसकी कोई सत्ता नहीं जान पड़ती, जड स्वभावकार्य, आस्तित्ववान् आत्माको आच्छादित करनेवाली, आत्मसम्बन्धिनी मायाको मृगमरीचिकाके आभासकी तरह तथा आकाशकी नीलिमाकी तरह मिथ्या जानना चाहिए ॥ ६० । जिस तरह पृथ्वा आदि पञ्चमहाभूत अन्यान्य भौतिक वस्तुसमूहमें अनुस्यूत होनेपर भी उनसे अलग दिखाई देते हैं। उसी तरह ये पञ्चमहाभूतोंमें व्याप्त होनेपर भी उनसे अर्थात् समस्त भौतिक संसारसे अलिप्त रहता हूँ ॥ ६१ ॥ बस, आत्मतत्त्वके जिज्ञासुओंको सदा और सब जगह अन्वय-व्यतिरेक उपयुक्त बातोंका निश्चय करके आत्मतत्त्व तथा मायाका पृथक् पृथक विरुद्ध-धर्मवाली जान लेना चाहिए। यही व्यापक नियम है ॥ ६२ ॥ शिवजी बोले-हे देवि ! भगवान् नारायणने जो चार श्लोक ब्रह्मासे कहे थे, वे मैंने तुम्हें कह सुनाये ॥ ६३ ॥ ये श्लोक पवित्र, पापनाशक, मृत्युलोकके प्राणियोंको उत्तम ज्ञान देनेवाले तथा शीघ्र अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेवाले हैं। अत समझदार मनुष्योंको निरन्तर इनका श्रवण, मनन और कीर्तन करते रहना चाहिए । ६४ ॥ हे देवि ! जो तुमने पूर्वमें प्रारम्भिक कथा पूछी, सो मैंने तुमसे कही। आगे जो कहना हूँ, वह का सुनो ॥ ६५ ॥ बादमें मुनियोंके द्वारा इधर उधर बिखरे हुए रामायणको व्यासमूनि फिरसे एकत्र करके सुन्दर सात काण्डमें चौबीस हजार श्लोकयुक्त बनाकर उसकी रक्षा करेंगे । इसी कारण चौबीस हजार श्लोकोवाली इस रामायणके बादि तथा अन्तमें मंगलाचरण आदिके प्रकरणमें व्यासरचित ओर ओर भी कुछ श्लोक दृष्टिगोचर होगे ॥ ६६-६८ ॥ हे देवि !

सर्गः २ ]यात्राकाण्डम्१६९

रामायणान्यनेकानि पृथगग्रे मुनीश्वराः । भागान्भारतखण्डान्तर्गतांस्तन्मोद्भवाद्ययः ॥ ६९॥
करिष्यन्त्यत्र शतशस्तानि सर्वाणि पार्वति । वाल्मीकीयाद्विना देवि न ज्ञेयानि मनीषिभिः ॥ ७० ।
सारकाण्डं पुरा देवि यदुक्तं च मया तव वाल्मीकीयाच्च तच्चापि सारमुद्धृत्य वै मया ॥ ७१ ।
निवेदितं च सधुना पृष्टं रामकथानकम् सुविस्तारं वदस्वेति त्वया तन्मानस्योदितम् ॥ ७२॥
भानं रामचरित्रस्य शतकोटिप्रविस्तरम् पञ्चाननोऽप्यहं देवि दिव्यैर्वर्षार्बुदैरपि ॥ ७३॥
रामायणं सविस्तारं व्याख्यातुं न क्षमस्त्विह , यन्निर्मितं च मुनिना स्वतपोभिरनुत्तमम् ॥ ७४॥
अतः संक्षेपमात्रं हि सारं सारं त्रिगृह्य च । कथयिष्यामि तन्वङ्गि यात्राकाण्डं शुभावहम् ॥ ७५॥
रामदासो यथायग्रे हि विष्णुदायं वदिष्यति । शतकोटिमतान् ज्ञानदृष्ट्या चाहं तथा तव ॥ ७६ ।

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे रामायणविस्तारकथनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

( गङ्गा-सागरसङ्गमपर जानेकी तैयारीके लिए दूतोंको रामकी आज्ञा )

पार्वत्युवाच

को रामदासः कुत्रस्थो विष्णुदासश्च कः स्मृतः कथं वदिष्यति गुरुस्तन्मां कथय विस्तरात् ॥ १ ॥

शिव उवाच

भारते दण्डकारण्ये गोदानावौ विगजिते । संवेऽब्जके नृसिंहाख्यो मुनिगग्रे भविष्यति ॥ २ ॥
रामनामा तु तत्पुत्रस्तच्छिष्यो विष्णुदित्यपि । गुरुशिष्यौ राममेवाभकौ नित्यं भविष्यतः ॥ ३ ॥
दास्यत्वाज्जानकीजानेस्तावभौ भूसुरोत्तमौ । रामदासोविष्णुदासाविति लोके परां प्रथाम् ॥ ४ ॥
गमिष्यतोऽग्रे भो देवि गौतम्या दक्षिणे तटे रामदासः पितुः श्राद्धं गयायां संविधाय च ॥ ५ ॥
पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि गत्वा यथाक्रमम् । अध्यापयिष्यति ञ्छात्रान् गोदानावौ गृहाश्रमी ६ ॥


भारतवर्षमें प्रचलित रामायणके झाउक आधारपर अगस्त्य आदि अन्य-न्य मुनि भा सेकड़ों रामायण लिखेंगे । पर विचारशील पुरुषोंको उन्हें वाल्मीकीय रामायणसे पृथक् न समझना चाहिये । ६९ । ७० । हे पार्वती ! पहले जो मैंने तुमको सारकाण्ड सुनाया वह भी वाल्मीकीय रामायणका सार ही था ॥ ७१ । उसके बाद जो तुमने रामकी सविस्तर कथा पूछी और मैंने सुनायी, उसका एक अरब श्लोकोंमे विस्तार है । हे देवि ! पञ्चमुखसे में दिव्य अरब वर्षोंमे भी सम्पूर्ण रामायणका व्याख्या करनाम समर्थ नहीं हूँ तब फिर औरोंका तो कहना ही क्या है । इसका रचना वाल्मीकि ऋषिने अपने तपोवलम किया ॥ ७२-७४ । इसलिये सारमात्र लेकर संक्षेपमे मैं तुम्हारी प्रसन्नताके हेतु मनोहार यात्राकाण्ड सुनाऊँगा , ७५ जिस सौ करोड़ श्लोकोंकी रामायणको आगे चलकर रामदास विष्णुदासको सुनाएंगे, वही में ज्ञानदृष्टिसे देख कर तुमको सुनाता हूँ ॥ ७६ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां रामायणविस्तारकथनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

पार्वतीजीने पूछा—हे महाराज ! रामदास कौन और कहाँके हैं ? ये विष्णुदास कौन हैं ? रामदास विष्णुदासको क्यों बिस्तारसे रामायण सुनायेंगे, यह भी कह सुनाइये ॥ १ ॥ शिवजीने उत्तर दिया कि भारतवर्षके दंडकारण्यमें गोदावरीके मध्यप्रदेशीय अम्बक क्षेत्रमे आगे चलकर नृसिंह नामके एक मुनि होंगे ॥ २ ॥ नृसिंहमुनिके पुत्र रामदास और रामदासके शिष्य विष्णुदास होंगे । वे दोनो गुरु-शिष्य निरन्तर रामकी भक्ति करनेवाले होंगे ॥ ३ सीतापति रामके अनन्य दास होनेके कारण ही ये दोनों रामदास तथा विष्णुदास नामसे संसारमें परम प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे । हे देवि ! आगे चलकर वे ही रामदास गौतमी नदीके दक्षिण तटपर रहकर गयामें पिताका श्राद्ध करके पृथ्वीके समस्त तीर्थोंका भ्रमण करनेके बाद गृहस्थाश्रम स्वीकार करके

१७० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

एकदा विष्णुदासः स शृण्वन्नानाविधाः कथाः । रामदासमुखात्सारकाण्डं रामायणोद्भवम् ॥ ७ ॥ श्रुत्वा किञ्चित्पृच्छमना रामदास वदिष्यति । विष्णुदास उवाच गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वक्तुमिहार्हसि ॥ ८ ॥ सारकाण्डं मया त्वत्तः श्रुतं रामायणान्धितम् । न किंचिन्तोऽस्य लेशोऽपि जानक्या राघवस्य च । ९ ॥ श्रुतोऽत्र कापि राज्यस्य विस्तारोऽपि च न श्रुतः । कथं यागाः कृतास्तेन सन्ततिर्नास्य न श्रुता ॥ १० ॥ सुतानां बन्धुपुत्राणां विवाहादिकमश्रुतम् । तत्सर्वं विस्तरच्छ्रोतुमिच्छाम्यहं गुरो ॥ ११ ॥ तन्मे वद महाभाग रघुवीरस्य चेष्टितम् । रम्यं पवित्रमानन्ददायकं पातकापहम् ॥ १२ ॥ रामदास उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स रामचन्द्रकथानकम् । मङ्गलं रघुनाथस्य प्रोच्यते यन्मविस्तरम् ॥ १३ ॥ सावधानमनास्त्वं तच्छृणु पातकनाशनम् । यथा श्रुतं मया पूर्वं तत्पशार्थं ते वदाम्यहम् ॥ १४ ॥ हन्त्वा दशाननं रामो राज्यं निहतकण्टकम् । अयोध्यायां मुक्तिपुर्यां शशास नीतिसंयुतः । १५ । न दुर्भिक्षं न चौर्यं च नापमृत्युर्न चोतयः । न दर्शद्द्रियं भयं चिन्ता व्याधयश्च कदाचन ॥ १६ ॥ न भिक्षार्थी न दुर्जनो न पापान्मा न निष्ठुरः । न क्रोधी न कृतघ्नोऽपि रामे राज्यं प्रशासति ॥ १७ ॥ एकदा जानकी कान्तमेकान्ते प्राह लज्जिता । स्मितवक्त्रा चारुनासा दिव्यालङ्कारमण्डिता ॥ १८ ॥ चामरव्यग्रहस्ता सा विनयावनतानना । शम राजीवपत्राक्ष शत्रुपारे मम प्रभो । १९ ॥ किञ्चिद्विज्ञापतुमिच्छामि यद्यनुज्ञां करोषि हि । विज्ञापयामि तर्हि त्वां धर्ममूलं महोदयम् ॥ २० ॥

गोदावरीके तटवर्ती गांवमें छात्रांको अनेक शास्त्रोंका अध्ययन कराते ॥ ४-६ उसी अवसरपर किसी दिन विष्णुदास रामदासके बहुतसे कथा सुनत-सुनते रामायणका सारकाण्ड सुनकर कुछ प्रश्न करनेकी इच्छासे कहते हे गुरो ! में आपस जो प्रश्न करना इच्छा करता हूं, उसका युक्तसंगत उत्तर देनमें आप समर्थ हैं । हे गुरो मैंने आपस रामायणान्तः सारकाण्ड तो सुन लिया, परन्तु आगे धन-कथा में भी महारानी जानकी अथवा राजा रामचन्द्रका कोई सुम्द संवाद नहीं सुना और न उनके राज्यका विवरण ही सुन पाया । उन्होंने कैसे और किस प्रकार यज्ञ किये ? उनकी संतानांका विस्तार भा नहीं सुननको मिला । राम तथा उनके भाइयोके पुत्रोंके विवाह आदिका वर्णन भी मैं नहीं सुन सका हे गुरो ! यह सब मैं आप श्रीमुखसे विस्तार-पूर्वक सुनना चाहता हूँ । ७-११ ॥ इसलिए हे महाभाग ! श्रीरामचन्द्रजीका वह मनोहर, पावन, आनन्ददायक तथा पापनाशक चरित्र आप मुझसे सुनाइए । १२ । रामदास बाले- हे वत्स ! तुमने रामचन्द्रकथा-विषयक यह बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है। रघुनाथके इस मांगलिक चरित्रको मैं विस्तारसे वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥ उनकी कथा श्रवणमात्रसे जन्म-जन्मान्तक पापकं नष्ट कर देती है। उसको मैंने जैसे सुना है. वैसा ही तुम्हारी प्रसन्नताके लिए कहता हूँ, अब सावधान होकर सुना । १४ ॥ रामचन्द्रजी दशानन रावणको मारकर मोक्षदायिनी अयोध्यानागरीमें रहने हुए शान्तिपूर्वक निष्कंटक राज्य करने लगे । १५ ॥ उनके राज्यमं कभी भी अकाल नहीं पड़ा और चोरी नहीं हुई । किसाका अकाल या कुत्सित मरण नहीं हुआ। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी तथा मूषामे खतीका नाश, पक्षियांस लत्ताका विनाश और राजविद्रोहसे जायमान ईतियों (विपत्तियं) भी उनके राज्यभरमें लांगपर नहीं आया। उनके राज्यमें कोई दरिद्र, भयभीत, चिन्तातुर या रोगपीड़ित नहीं रहता था ॥ १६ ॥ उनके राज्यकालमें कोई भिखारी, दुराचारी, पापी, क्रूर, क्रोधी और कृतघ्न भी नहीं होता था । १७ ॥ ऐसे सुख-शान्तिक समय एक दिन हास्ययुक्तमुख-वाली, सुन्दर नासिकायुक्त एवं देवियोंके योग्य अलंकारामे विभूषित जानका कुछ लज्जापुरक एकान्तमें अपने प्रिय पति रामसे कहने लगी उस समय जानकीके हाथमें मनोहर चमर था । ऐसी दशामे वे विनयसे नीचेका मुख किये हुए बोली-हे कमलपत्रके समान नयनोंवाले रावणके शत्रु तथा मेरे नाथ राम ! यदि

[ सर्गः ३ ]यात्राकाण्डम्१०१

तत्सीतावचनं श्रुत्वा जानकीं प्राह राघवः । हे मान्ये कञ्जनयने मम प्राणसमाश्रये ॥२१॥
शीघ्रं वदस्व यत्तेऽस्ति चित्ते तत्कारयाम्यहम् । इति राघवसम्मानवचनैर्जनकात्मजा ॥२२॥
नितरां तोषभूयैषा पाणिभ्यांऽऽश्लिषत्पतिम् ।

श्रीसीतोवाच

यदा त्वं राघवश्रेष्ठ दण्डकं वचनात्पितुः ॥२३॥
मया सौमित्रिणा साकं त्वं व्यगमस्तदाऽन्तः । शृङ्गवेरपुरं गत्वा जाह्नव्यास्तरणे यदा ॥२४॥
नौकायां स्थितमस्माभिर्भागीरथ्यां तदा पुरा । सङ्कल्पितं मया किञ्चित्तत्त्वां वक्ष्याम्यहं प्रभो ॥२५॥
देवि गङ्गे नमस्तेऽस्तु निवृत्ता वनवासतः । रामेण सहिताऽहं त्वां लक्ष्मणेन च पूजये ॥२६॥
सुरामांसोपहारैश्च नानाबलिभिरावृता । इत्युक्तं वचनं पूर्वं तज्ज्ञातं भवताऽपि च ॥२७॥
ततश्चतुर्दशे वर्षे विमानेन यदाऽऽगतम् । तदा भरतशत्रुघ्नकौसल्याविरहातुरा ॥२८॥
अहं विस्मृता रामा स्मृतिर्जाताऽद्य मे प्रभो । तन्मत्सङ्कल्पपूर्त्यर्थं गन्तुमर्हसि जाह्नवीम् ॥२९॥
मया मातृप्रभृतिभिस्त्वांश्चेति ते प्रार्थयाम्यहम् । रोचते यदि ते चित्ते न त्वामाज्ञापयाम्यहम् ॥३०॥
इति सीतांवचः श्रुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः । सीतामालिङ्ग्य बाहुभ्यां हर्षयन् तामृवाच सः ॥३१॥
एतद्वचनचातुर्यं कुतो जानासि मैथिलि । न तवे वचनं देवि गङ्गां प्रति ममैव तत् ॥३२॥
वचनात्तव वैदेहि श्वो गन्ता जाह्नवीं प्रति । क्व ते वाञ्छाऽस्ति दांपत्ये गङ्गां यन्तुं वदस्व मे ॥३३॥
तच्छ्रुत्वा तत्र वै स्थातुं सेनायोग्यसमं मृदु । ऋजुं कर्तुं हि पन्थानं दूतानाज्ञापयाम्यहम् ॥३४॥
ततः सीताऽब्रवीद्वाक्यं पुनः श्रीरामचोदिता । यत्र गङ्गा च सरयूः सङ्गताऽस्ति रघूद्वह ॥३५॥


आप मुझे आज्ञा दें तो मैं आपसे कुछ निवेदन करना चाहती हूँ। वह मेरा निवेदन धर्मसम्मत तथा अभ्युदयकारी होगा ॥१८-२०॥

राम सीताका बचन सुनकर कहने लगे हेकञ्जनयने ! हे मम प्राणसमाश्रय सीते ! तुम जो कहना चाहो, सो शीघ्र कहो। मै उस अभापूर करनेको वैय रहूँ। इस प्रकार रामक सम्मानभरे वचनास जनकनन्दिनी संतोषका सहगास नितरां लहलहा उठा और पतिम वन्दन लगे श्रीमाताजी बोलो-हे राघवश्रेष्ठ ! जब आप पिताके कहनेपर दण्डकावन जातक लिए मुझे तथा सुमित्रापुत्र लक्षमणको साथ लेकर अयोध्या नगर, से चले थे और जन शृंगवेरपुर जाकर जाह्नवी नदीमें नावपर हमलोग सवार हुए थे । उस समय भगवती भागीरथीका बीच धारामे मन में। संकल्प किया था। हे प्रभो ! वह मै आज आपको सुनाता हूँ ॥२१-२० ।

मै गंगाको नमस्कार करके कहा था-हे देवि ! जब मै राम तथा लक्ष्मणके साथ वनवासस लौटूँगी, उस समय सुराके, मांसके तथा अनेक प्रकारकी पूजासामग्रियोंस तुम्हारी पूजा करूंगी । उस समय कहे हुए इस बचनको आपने भी सुना था ॥२६। २७॥

पश्चात् चौदह वर्ष बाद जब हमलोग विमान द्वारा इसम लोगे तब भरत शत्रुघ्न और माता कौशल्याके वियोगस आतुर होकर तात्पर्ये मै उस बातको भूल गयी । हे प्रभो ! आज मुझे उस बातका पुन, स्मरण आया है । अतएव मरे उस संकल्पको पूरा करनेक लिए माताओं, भाइयों तथा मुझे लेकर आपके गंगाके तटपर चलना चाहिये । यही मेरा आपसे प्रार्थना है। यदि आप उचित समझें तो चलें । मै आपको इस दानका आज्ञा नही देतीं । क्योकि स्त्रीका पतिको आज्ञा देना अधर्म है किन्तु सविनय उचित परामर्श देना न्याय्य और धर्मसम्मत है । २८-३०॥

भार्याके इस वाक्यको सुनकर राम बडे प्रसन्न हुए और आलिङ्गन करके मातासे सहर्ष कहने लगे-॥ ३१ ॥

हे मैथिली ! इस प्रकारका बचनचातुर्य तुमने कहाँस आ गया? तुम्हारा यह वचन गंगाके प्रति नही, प्रत्युत मेरे ही प्रति का ॥३२॥

हे वैदेहि ! तुम्हारे कथनानुसार मै कल ही गंगाजी चलनेके लिए तैयार हूँ । हे प्रिये ! तुम्हारी जिस जगह और जिस तीर्थको चलनेकी इच्छा हो, वह कहो ॥ ३३ ॥

इस बातको जानकर मै वहाँ सेनाको ठहरनक लिए स्थान और मार्ग साफ-सुथरा करनेके लिए दूतोको आज्ञा दे दूँ ।३४।

इस प्रकार रामके पूछनेपर सीताने कहा-हे रघुनन्दन ! जहाँ गंगा और सरयूजीका संगम हुआ है, वहीपर गंगाजीके

१७२आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

तत्र गङ्गांसरे देशे गन्तुमिच्छति मे मनः इति सीतात्रचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा नृपूद्वहः ॥ ३६ ॥
द्वाःस्थं समाहूय बहिर्गच्छाथ जानकीम्, अज्ञापयच्च तं रामः शीघ्रं गच्छ ममाज्ञया ॥ ३७ ॥
लक्ष्मणं वचनं मे त्वं कथयस्व सविस्तरम् । ज्ञापय्यः श्वोममोद्योगः सीतायाश्चैव कौतुकात् ॥ ३८ ॥
सरयूसङ्गमं गङ्गापूजनार्थे त्वया सह । मातृभिर्मन्त्रिभिः सैन्यैः सुहृद्भिर्भरतेन च ॥ ३९ ॥
शत्रुघ्नेन सुरिश्चैव जनैर्विप्रैर्यथासुखम् । सेरानिवेशस्थानानि योजनाद्वान्तराणि च ॥ ४० ॥
पूरितान्यन्नतोयाद्यैः कल्पनीयानि च पृथक् । इति रामवचः श्रुत्वा स भवत्विति त्वरान्वितः ॥ ४१ ॥
आज्ञाप्रमाणमित्युक्त्वा नत्वा रामं पुनः पुनः । कथयामास सौमित्रि रामवाक्यं सविस्तरम् ॥ ४२ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा यौवराज्यपदस्थितः । सभायां मन्त्रिभिर्युक्तो लक्ष्मणो दूतमब्रवीत् ॥ ४३ ॥
अङ्गीकृतं रामवाक्यमिति रामं वदस्व तत् । तच्छ्रुत्वा त्वरितं दूतः कथयामास राघवम् ॥ ४४ ॥
सभायां लक्ष्मणश्चापि दूतानाज्ञापयत्तदा । रुक्मदण्डकरान् चित्रोष्णीषपूत्कन् विषूषितान् ४५ ॥
गच्छध्वं त्वरिता यूयं कथयध्वं जनान्पुरि । अयोध्याया रामचन्द्रः श्वो यात्रार्थं प्रमुद्यतः ॥ ४६ ॥
इत्येवमुक्त्वा जवाहूता गजमार्गेषु सर्वतः । दीर्घस्वरेण ते प्रोचुश्चाश्चं कृत्वाऽऽसन्नरङ्करान् ॥ ४७ ॥
हे जनाः शृणुत स्वस्थाः श्वः सीतारागमोर्युग । मप्रूयोगोऽस्ति पूजार्थे सरय्वाः सङ्गमं प्रति ॥ ४८ ॥
भागीरथ्यां सुहृद्भिश्च सावगेधैर्बलैः सह । इति संभाव्य मकलान् जनान् साकेतवासिनः ॥ ४९ ॥
ते दूता राजभवने लक्ष्मणं तं पुनर्ययुः । समाग्र्य ते जनांश्चाग गमोद्योगं न्यवेदयन् ॥ ५० ॥
सभायां लक्ष्मणश्चापि समाहूयाजुनेजंपात्र् । तक्षकानिष्टकाकारान्मृत्फकमसु नैष्ठिकान् ॥ ५१ ॥
लोहकारान्धर्मकारान भित्तिकर्मादिनिष्ठिकान् । क्रयविक्रयकर्तॄंश्च काष्ठनिर्जातकारिणः ॥ ५२ ॥
वातोद्गृहतिदश्याश्च मर्मिर्जस्त्रवदिनः । नानाकर्मसु निष्णाना रज्जुमुद्रालधारिणः ॥ ५३ ॥

उत्तरी तटपर जानेका मेरा मनमें इच्छा है। सीताका इस इच्छाको सुनकर रामने 'बहुत अच्छा' ऐसा कहा ॥ ३५ । ३६ । तदनंतर जानकीको महलके भीतर भेज तथा द्वारपालको बुलाकर रामने कहा—तुम मेरी आज्ञासे अभी लक्ष्मणके पास जाकर मेरा आदेश उससे कह दो, उनसे कहना कि कल प्रातःकाल माताकी इच्छासे तुम्हारे, माताओं, मन्त्रियों, सेनाका, भरत-शत्रुघ्न, सुग्रीवादि तथा तथा साकेतके साथ सरयूके संगम-पर गङ्गाजीका पूजन करनेके लिए धूम धामसे मेरा जाना निश्चित हुआ है। इस लिये रास्तेमें दो दो कोसपर अन्न जलसे परिपूर्ण शिविर तैयार कराओ। रामके इस बचनको सुनकर वह दूत 'बहुत अच्छा, जो आज्ञा' कह तथा रामको बारम्बार नमस्कार करके वहाँसे शीघ्र चल पड़ा, लक्ष्मणके पास जाकर उसने विस्तारसे रामकी आज्ञा सुना दी । ३७-४२ ॥ युवराजपदपर स्थित तथा मन्त्रियोंके साथ सभा में विराजमान लक्ष्मणने जब रामके आदेशको दूतके मुखसे सुना तो उससे कहे—॥ ४३ ॥ तुम जाकर श्री रामसे कहो कि आपकी आज्ञाके अनुसार सब कार्य ठीक हो जायगा। दूतने जाकर शीघ्र ही रामको यह सन्देश सुना दिया । ४४ । तब लक्ष्मणने सोनेके दण्ड धारण करनेवाले रंग-बिरंगो पगड़ी सिरपर बांधे तथा सुन्दर पोशाक पहिने हुए बहुतसे सिपाहियोंको बुलाकर उन्हें यह आज्ञा दी - ॥ ४५ । तुमलोग शीघ्र नगरभरमें घूमकर सब नगरवासियोंको रामचन्द्रजीके कल यात्राके लिए प्रस्थान करनेका समाचार सुना आओ । ४६ ॥ 'तथास्तु' कहकर वे दूत नगरकी सड़कोंपर घूम घूम तथा हाथ उठा उठाकर ऊँचे स्वरसे सब लोगोंको सुनाने लगे— ॥ ४७। 'हे नगरवासियो ! ध्यान देकर सुनो, राम और सीता कल अन्तःपुर वासिनी स्त्रियां, सगे-सम्बन्धियों और सेनाको साथ लेकर सरयूनदीके संगमपर गङ्गाका पूजन करनेके लिए जायेंगे' अयोध्यावासी लोगोंको यह समाचार सुनाकर वे पुन लक्ष्मणजीके पास आगये और बोले कि हमलोग नगरके सब लोगोंको रामचंद्रजीकी यात्राका समाचार सुना आये । ४८-५० ॥ तदनन्तर लक्ष्मण नौकरोंके द्वारा तक्षण बढ़ई, ईंट पाथनेवाले कुम्हार, शय्याके काममें कुशल संगतरास ॥ ५१ ॥ लोहार, चमार, भीत-मकान आदि बनानेमें चतुर, राजगीर, सौदा बेचने तथा खरीदनेवाले बनिये, लकड़हारे, कपड़ेके डेरा-तम्बूके

सर्गः ३ ] यात्राकाण्डम् [ १७३

एतानाज्ञापयामास तोषयित्वा धनादिभिः । समानिनान्य तीर्थेभ्यित्र कल्पयामास सादरम् ॥५४॥ समुद्योगो राघवस्य सीतायाः श्वो बलैः सह । ऋजुमार्गा विधातव्याः समाः कर्तुमयत्नितः ॥५५॥ निम्ना भूमिः समा कार्या उच्चा भूमिः समत्विच । छिद्यन्तां पावना वृक्षा मार्गस्था दुःखदायकाः ॥५६॥ वाप्यः कूपास्तडागाश्च शोधनायाः सहस्रशः । नवीनाश्चापि कर्तव्याः सतोया निर्जने वने ॥५७॥ सेनानिवेशस्थानानि योजनाद्वै सविस्तरे । कल्प्यं पानि सुगन्धिः पूरितान्यम्वारिभिः ॥५८॥ सुन्दर्यो रम्या विधातव्याः पाकशालाः सुभाजयः । वर्ष्मगवेहाणि कार्याणि तूर्णञ्चापि सहस्रशः ॥५९॥ आरक्तमुपरं गच्छद्वित्तानि चित्रितारिन हि । नानागृहाणि कार्याणि पूरितान्यम्ववारिभिः ॥६०॥ पुष्पाणां वाटिकाः कार्याः शतशोऽथ सहस्रशः । मार्ग मार्ग कौतुकार्थ चित्राण्यनेकशः ॥६१॥ नरस्कन्धगताश्चित्रवाटिकाश्च सहस्रशः । पुष्पाणां वाटिकाश्चारूत्स्वानिर्दिताः शुभाः ॥६२॥ मार्गे मार्गे गायकानां स्थलान्यपि सहस्रशः । सर्वानिवेशस्थानेषु हर्म्य्यश्चरथवाजिनाम् ॥६३॥ सहस्रशो विधाक्तव्याः शालाः पर्णाम्बुवारिभिः । सुगन्धचर्दनमार्गाः सेचनीयाः समंततः ॥६४॥ नेमिरेखाऽपि मा मार्गे विचित्रवर्मनर्गृहाः । पुष्पन्च्छादनीयास्ते हृद्याः सन्तु समंततः ॥६५॥ मृगैर्गर्गेतचित्रेय हस्त्युष्ट्ररथवाजिनः । वस्त्रासङ्घारघण्टाभिः शोभनीयाः सहस्रशः ॥६६॥ शकटेषु तथोष्ट्रेषु वृषलेषु व्यादेषु । शलक्यः परिघा बाणाः शक्तयः कार्मुकान्यपि ॥६७॥ स्थापनीयानि शतशो विधातव्या ध्वजा अपि । चतूर्ष्वपि विधातव्या ध्वजा रामरथेपु हि ॥६८॥ हनुमत्कोविदागण्डवैष्णवाङ्किताः शुभाः । चतूर्ष्वपि बध्नीयाः पताकाः स्यदनेषु हि ॥६९॥ हरितश्वेतपीतन लक्षणाः पन्चतीमनाः । गङ्गपृष्ठे शश्वदार्थं हरिद्रार्गाङ्कितान्वरम् ॥७०॥


निर्माणमे निपुण दर्जी, रंगरेज इन्जन जल छानवाले शिल्पी तथा अन्यान्य नाना कर्मोमें कुशल, रस्सी बटने-वाले और मुद्रार चलानेवाले आदिको एकत्र बुलाकर वस्त्र आदिसे सत्कार करके प्रसन्न किया और आदरपूर्वक उनसे कहा- ॥ ५४ ॥ कल राम सीता से इस रम्य तीर्थयात्राके लिए जानेवाले हैं। सो तुम लोग उनके सम्पूर्ण मार्गको कंकड पत्थर बीनकर साफ-सुथरा कर दो। ५५। रास्तेकी ऊंची-नीची जमीन बराबर कर दो। मार्ग में रुकावट पडते हु वृक्षोंको काट डालो ॥ ५६ ॥ रास्तेकी बावड़ी, कूपों तथा तालावोंको साफ कर दो और निर्जन वनमें नये सैकड़ा तालाब कूप आदि खाद दो ॥ ५७ ॥ आधे आधे योजनपर सेनाके लिए शिविर बनाकर अच्छे जलसे परिपूर्ण कर दो ॥ ५८ ॥ सुन्दर दशा में सही करके भोजनलय और चूल्हे तयार करो, जगह जगह घास तथा घासके भण्डार लगा दो ॥ ५९ ॥ पक्के हुए लाल कपड़ास छाये हुए चित्र विचित्र उत्तम प्रचुरभोजन अन्न फल संचित करके रक्खा हो । ६० ॥ मध्यम स्थान स्थानपर कपड़ा लगा हुआ तम्बुओंमें आनन्द करनेके लिए दीवारोंपर रंग बिरंगे चित्र खीच दो तथा मनाविनोदके लिए बाह्य बाष्प पुष्पवाटिकाएं लगा दो । ६१ ॥ नर पुतलियोंके कंधेपर रक्खे हुए सूर्यांग समान अथवा आभान्तर शोभा के फूलों से गमलोंको सजाकर स्थान स्थानपर सैकड़ों हजारों वाटिकाएं तयार कर दो । ६२ ॥ पथ-पथपर गायकोंको गायनशालायें रख दो। सेनाके हर एक संनिवेशस्थानपर दान तथा धाममें पूर्ण अनेक अश्वशालायें और हस्तिशालाये तयार कर रक्खो, चन्दन तथा गुलाब आदिके सुगन्धित जल सब रास्तेमें छिड़कवा दो तथा चित्र-विचित्र झारोवाले रुपेहले तम्बू बनाकर जगह-जगह गाड़ दो और उनपर विविध रंगके पुष्पमालाएँ टांग दो। उनके चारों ओर बाजार लगा हो ॥ ६३-६५ ॥ तमाम हाथी घोड़े, ऊँट तथा रथोंको वस्त्र अलंकारसे अलंकृत करक तथा घण्टे आदि वाधकर सुसज्जित कर दो ॥ ६६ ॥ बैलगाड़ियोंमें ऊँटोंपर और रथ आदिपर धनुष-बाण, मुद्गर, शक्तियें, तोप अथवा बन्दूकें रख दो। ६७ ॥ छतोंके चौतरफा और दरवाजे आदिपर ध्वजाएं गाड़ तथा बांध दो। रामजीके चारों रथापर भी ध्वजाएं बांध दो । ६८ ॥ उन चारों स्यन्दनोंपर हनुमान्, कोविदार, गरुड़ और बाणके चिह्नोंवाली पताकाएं होनी चाहिये ॥ ६९ ॥ वे ध्वजाएं हरे,

१७४आनन्दरामायणं[ सर्गः ४

रुक्ममाणिक्यरचितं सितच्छत्रोपशोभितम् । स्थापनीयं महादिव्यं मुक्ताहारविराजितम् ॥७१॥
सीतार्थं करिणीपृष्ठे नीलवर्णं महासनम् । रुक्मविद्रुमरत्नौघैरत्नमुक्ताविराजितम् ॥७२॥
मुक्ताफलहेमतन्तुगणैराच्छादितं वरम् । सिद्धं कार्यं महादिव्यं स्वर्णकुंभविराजितम् ॥७३॥
पुष्पमालास्तोरणानि बध्नीयानि वै पथि । नृत्यंतु वारवेश्याश्च स्तुतिं कुर्वन्तु वन्दिनः ॥७४॥
द्रव्यैर्वस्त्रैराभरणैः पूजाद्रव्यैश्च गोरसैः । पात्रैर्नानाविधैर्दिव्यैः पूर्णार्थ्याश्चोत्तमाः ॥७५॥
अन्यच्चापि मया नोक्तं यद्यद्योग्यं हि तत्पथि । सिद्धं कार्यं हि योगेन येन तुष्यति राघवः ॥७६॥
इति संदिश्य मेधावी लक्ष्मणः सह मंत्रिभिः । साय सन्ध्यादिकं कर्तुं जगाम निजमन्दिरम् ॥७७॥
सौमित्रेराज्ञया तदपि तथा चक्रुर्यथोदिताः । संतुष्टास्ते यथायोग्यं रामसन्तोषहेतवे ॥७८॥
रामोऽपि सीतया सार्द्धं मन्दिरे रत्ननिर्मिते । मञ्चके पुष्पशय्यायां सीतामालिङ्ग्य वै दृढम् ॥७९॥
रुक्मनेपथ्ययुक्ताभिर्दासीभिश्च मुहुर्मुहुः । वीजितौ बालव्यजनैर्निशि सुप्तः सुखं तदा ॥८०॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे दूताज्ञाकरणं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


चतुर्थः सर्गः

( रामका सरयूके दो खण्ड करना )

रामदास उवाच
राज्ञः प्रातः समुत्थाय श्रुत्वा वाद्यध्वनिं तथा । गायनं वन्दिभिर्गीतं सीतया सह राघवः ॥ १ ॥
कृत्वा नित्यविधिं सर्वं दत्त्वा दानानि विस्तृतम् । ज्योतिर्विदं समाहूय गोपालाभिख्यमुत्तमम् ॥ २ ॥
नमस्कृत्याऽथ संपूज्य गणकं गद्यवीक्ष्य तम् । भो गोपाल महाबुद्धे त्वां पृच्छेऽहं द्विजोत्तम ॥ ३ ॥


पीले, श्वेत और नीले रंगकी सुन्दर बनी हों। रामचन्द्रजीके लिए हाथपर हरे रंगके मखमलको गद्दा-तकिया लगाकर उसपर मुक्ताके हार टांग देने चाहिये और सोना तथा माणिक्योंसे रचित बहुमूल्य, दिव्य, परम सुन्दर तथा श्वेत छत्र भी लगा देना चाहिए। ७०-७१ । हे दूतम! हथियाके पीठपर महारूप दिव्य सुवर्ण, विद्रुम (मूँगे), वैदूर्यमणि, रत्न मोती तथा गजमुक्ता लगा हुआ हरा जरीदार एवं बहुमूल्य अच्छा विछावर तैयार करो और उसके होदेपर बहुतसी छोटे २ स्वर्णके कलश भी लगा दो जिससे कि वह अधिक सुन्दर प्रतीत होने लगे ॥ ७२-७३ । रास्तेमे फूलोंकी मालाएं और तोरण बाँध दो। रण्डियां नाचन तथा बन्दीगण स्तुतिपाठ करने लग जायँ ॥ ७४ ॥ बहुतसे स्थान वस्त्र, आभूषण, दुग्ध, दही, पूजाके द्रव्य तथा अच्छे-अच्छे बरतन आदि भर लिये जायें ॥ ७५ ॥ जो कुछ मैंने न कहा हो, सो भी सब जरूरी सुविधाएं सुलभ रहना चाहिए। जिन्हे देखकर रामचन्द्रजी प्रसन्न हो जावें । हे बुद्धिमान् लक्ष्मणजी आज्ञा देकर सायंकालीन संध्या-वन्दन करनेके लिए मंत्रियोंके साथ सभामवनसे बाहर आकर अपने महलमें चले गये ॥ ७७ । लक्ष्मणकी आज्ञाके अनुसार कारीगर लोगोंने प्रसन्नतासे रामजीके गुणके लिये यथायोग्य सब सामान ठीक कर दिया । ७८ । उधर रामचन्द्रजी भी अपने रत्ननिर्मित भवनमे फूलोकी शय्यापर सीताजीको दृढ़ आलिङ्गन करके रात्रिको सुखपूर्वक सोये। सोनेकी जरीदार साडियाको पहिन दासियां बार-बार उनपर बालव्यजन ( पंखा ) डुलाने लगीं ॥ ७९-८० । इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे भाषाटीकायां दूताज्ञाकरणं नाम तृतीयः सर्गः । ३ ॥

रामदास बोले—प्रातः कालके समय वन्दियोंके गायन और बाजोंके मधुर शब्दको सुनकर सीतासहित राम जागे । १॥ तब नित्यकर्मसे निवृत्त होकर उन्होंने अनेक तरहके दान दिये और गोपाल नामके ज्योतिषीको बुलवाकर रामने नमस्कार तथा पूजा करके कहा-हे ब्राह्मणोंमे श्रेष्ठ और महाबुद्धिमान् गोपाल महाराज !

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७५

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७५

यात्रार्थे जाह्नवीतीरं गन्तुमिच्छामि भांश्वन् । अतो मुहूर्तं दातव्यं मय्यनुगृह्या विचिन्त्य च ॥४॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा गोपालः प्राह राघवम् । पञ्चाङ्गञ्च विस्तार्य तत्र दृष्ट्वा बलाबलम् ॥५॥ राम राजीवपत्राक्ष शृणुष्वाद्य वचो मम । रविवारे महाऽह्वेषुः पुष्यनक्षत्रमंडितः ॥६॥ तस्य वक्ष्ये फलं राजन् सावधानमनाः शृणु । शृण्वन्तु मुनयः सर्वं शृणोतु ते गुरुर्महान् ॥७॥ न योगयोगं न च लग्नलग्नं न तारकाचन्द्रबलं गुरोश्च । योगिन्य सम्मुखे तर्हि काले सर्वाणि कार्याणि करन्ति पुष्यः ॥८॥ अस्मिन्नाम सुसंस्त्रं प्रस्थानं कुरु मेधया । दत्तो मया मुहूर्तोऽय यात्रार्थे रघूनायक ॥९॥ इति तस्य वचः श्रुत्वालक्ष्मणं राघवोऽब्रवीत् । भेरीमृदङ्गपणवकाहलाऽऽनकगोमुखैः ॥१०॥ तालघण्टादृढैर्भीभिर्भेषिध नवभिर्महान् । सेनायाः सूचनाथै हि कर्त्तव्यः प्रथमो ध्वनिः ॥११॥ तथेति रामवचनाल्लक्ष्मणाज्ञापयनदा । नववाद्यध्वनिं तेऽपि चक्रुर्मङ्गलसुस्वरम् ॥१२॥ ततो रामो द्विजैर्युक्तो वासिष्ठेन पुरोधसा । घृतेन प्रभुर श्राद्ध गणेशदीन् प्रपूज्य च ॥१३॥ पचार प्रोक्तविधाना रमिष्ट प्राह वं ततः । अग्निहोत्राणि संड्वैश्व स्थापितानि तु पुष्यके ॥१४॥ नेतुमर्हसि मे मातॄर्वेशुभिः पुरवामिनः । विमान करिणंचा पुष्पामालाऽतिशोभिता ॥१५॥ मोतांगस्पर्शनां मार्गो मां स्पृशंतु गजैरथम् । ततः पप्रच्छ वैदेही केन यानेन मैथिलि ॥१६॥ गमिष्यसि वद त्वं मां तदवाज्ञापयान्यहम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता ध्यात्वा तण हृदि ॥१७॥ सा प्राह मुदिता राम करिण्या गमनं मम । रोचने यदि ते चित्ते सर्वमस्तु रघूनायक ॥१८॥ तस्या वचनं श्रुत्वा दानमाज्ञाप्य लक्ष्मणम् । सीतायै दिव्यवस्त्राणि ददौ मातॄस्तथैव च ॥१९॥


मैं आपसे एक प्रश्न पूछता हूँ ॥२।३॥ आज मैं तथा यात्रा करनेके लिए गंगाजीके तटपर जाना चाहता हूँ । अतः अब खूब विचारकर कोई अच्छा मुहूर्त बतलाइए । ४ । रामचन्द्रजीके प्रश्न सुनकर गोपाल पण्डितने पञ्चाङ्ग देख तथा ग्रहोंके बलाबलका विचार करके रामसे कहा- ५ । हे कमलदलके समान सुन्दर नयननेवाले राम ! आज प्रथम प्रहरमें पुष्यनक्षत्रमे युक्त बडा अच्छा मुहूर्त है ॥ ६ उसका फल में आपसे कहता हूँ । हे राजन् ! आप, सब मुनि लोग तथा आपके गुरु वसिष्ठजी भी उसको ध्यानसे सुनें । ७ । अच्छे योगसे युक्त न हो, फिर भी, अच्छे लग्नमें लग्न न होकर भी तारा चन्द्रमा और गुरुके बलसे शून्य होनेपर भी, शुभ योगिनीके अभावम भी तथा अनिष्टकारी राहुके संनिकट होनेपर भी केवल एक पुष्य नक्षत्रके रहनेमात्रसे ही यात्राके सब दृष्ट कार्य सिद्ध होजाते हैं । ८ । हे राम इस शुभ नक्षत्रम आप सीताके साथ प्रस्थान करें । हे रघुनायक ! यात्राके लिए मैंने यह अच्छा मुहूर्त बतलाया है । ९ । उनका यह वचन सुनकर रामजीने लक्ष्मणसे कहा- हे लक्ष्मण ! समस्त सेनाको सूचना देनेके लिए भेरी, मृदंग, पणव नगाडे ढोल सुदृही, घण्टा तथा दुन्दुभी ये नौ प्रकारके बाजे जोरसे बजाये जायें ॥ १०। ११ । 'बहुत अच्छा' कहकर रामकी आज्ञाके अनुसार लक्ष्मणने दुहाई बजानेवाले उनहोंने मधुर रीतिसे नवौं बाजे बजवाये ॥ १२ ॥ इसके बाद रामने ब्राह्मण तथा अपने पुरोहित वशिष्ठजीके साथ रहकर गणपतिपूजन किया और घीसे अधिवासन श्राद्ध करके वशिष्ठजीसे कहा कि मेरा वेदोक्त रीतिसे स्थापित कराई अग्नियोंको, माताओंको तथा श्रेष्ठ पुरवासियांको विमानपर चढ़ाकर आप चलें । यहन लोगोंसे अतिशय सुशोभित तथा सीताके अङ्गस्पर्शसे पवित्र होकर रथको मार्गमें मिलें । इसके उपरान्त रामने पूछा- हे मैथिलि ! तुम किस सवारीपर सवार होना पसन्द हो, उस सवारके लिए मैं आज्ञा दे दूँ । रामचन्द्रजीके इस वाक्यको सुनकर सीताजीने एक क्षण मनमें विचार किया ॥१३-१७॥ फिर प्रसन्न होकर रामसे कहा-हे रघुनायक ! यदि आप कहें तो मेरी इच्छा हथनीपर चलनेकी है। १८ । सीताके इस इच्छाको जानकर रामजीने लक्ष्मणको सीताके लिये श्रेष्ठ उपहार करवानेकी आज्ञा दी। पश्चात् रामने सीताको तथा अपनी माताओंको पहिननेके लिए

१७६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

तथा दत्त्वा बंधुपत्न्यादेभ्यो योषिद्भ्यो विशेषतः । ततो दत्त्वा वसिष्ठाय विप्रेभ्यश्च ततः परम् ॥२०॥ दत्त्वा वस्त्राणि बंधुभ्यः स्वयं नूतनमाददे । वस्त्रैश्च शस्त्राण्यनेकानि स्थापयित्वा विदेहजाम् ॥२१॥ नत्वा मातॄंस्तथा च सचिवैश्च परिवेष्टितः । आरुह्य शिविकां रामः सभां प्रति समाययौ ॥२२॥ ततः सिंहामने स्थित्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः । द्वितीयाः सूचनायै हि नववाद्यध्वनिः पुनः ॥२३॥ आज्ञाप्यतां त्वं सौमित्रे तच्छ्रुत्वा राघवौचनम् । आज्ञापयामास निन्युस्तदाऽऽज्ञामग्रतोऽग्रतः ॥२४॥ कर्तुं दूतजनैश्चापि बहुघोषं मेघोपमम् ततः । ततः प्राह रघूद्वहः पुनः सौमित्रिमागतम् ॥२५॥ सुमन्त्रः स्थाप्यतां पुर्यां रक्षणाय ममाज्ञया । गच्छत्वग्रे तु भरतः पश्चाच्छत्रुघ्न संज्ञकः ॥२६॥ तत्पृष्ठे त्वं समागच्छ ततः सीताऽनुगच्छतु । तस्याः पृष्ठे च त्वत्पत्नी सुमित्रा मात्रनुगच्छतु ॥२७॥ तत्पृष्ठे मांडवी रम्या कौसल्या भरतस्य मा । अनुगच्छतु तत्पृष्ठे श्रुतकीर्त्त्यनुगच्छतु ॥२८॥ शत्रुघ्नस्य प्रिया भार्या विमानैः पूर्वशोभितैः । मातृभिस्ताः समायांतु पश्यन्त्यः कौतुकं मुदा ॥२९॥ सीताद्याः करिणीष्वेवं स्थापयित्वा ममाज्ञया। आगच्छ त्वं मया सार्द्धं ततोऽहं गजमाश्वये ॥३०॥ तथेति रामवचनात्तथा ताः करिणीषु सः । आरोहयित्वा श्रीगमं समागच्छल्लक्ष्मणस्त्वितः ॥३१॥ समागते लक्ष्मणे तु दृष्ट्वा रामो महामनाः । सुमन्त्राय ददौ वस्त्रं तद्रक्षार्थं पुरीं व्यधात् ॥३२॥ ततो मुहूर्तसमये धृत्वा लक्ष्मणमत्करम् । महामनामभूत्तीयं महानागान्तिकं ययौ ॥३३॥ गजं प्रदक्षिणं कृत्वा सोपानैन स राघवः । गजदन्ताङ्कवेनाऽऽरोह नागं शुभे शनैः ॥३४॥ तदा दुन्दुभिनिर्घोषम् नववाद्यस्यानु चगान् । वादद्यामासुरुद्वेगात् राजदूताः सहस्रशः ॥३५॥ बभूवुर्यन्त्रशब्दाश्च ननृतुर्वारयोषितः । वादयन्ति स्म वाद्यानि गजवाजिस्थायिनः ॥३६॥ जयशब्दान् वेदघोषान् द्विजाश्चक्रुर्महास्वनेः । केऽपि पिच्छोद्धृतं चित्रं रत्नदण्डविराजितम् ॥३७॥

दिव्य वस्त्र दिये ।२०। अपने भाइयोंका, उनका स्त्रियोंको और गृहदासीयोंको सुन्दर वस्त्र दिये, उनके बाद गुरु-वसिष्ठजीको और ब्राह्मणोंको तथा अपने बन्धुओंको नये कपडे देकर स्वयं रामने भी नूतन वस्त्र पहना, अनेक प्रकारके शस्त्र भी बाँध लिये और सीताको शृंगार करनेके लिए कहा ॥ २० ॥ २१ ॥ तदनन्तर रामजी गुरु तथा माताओंको नमस्कार कर तथा मन्त्रिगणोंके साथ २ पालकीपर सवार होकर सभाभवन (कचहरी) गये ॥ २२ ॥ वहाँ सिंहासनपर आरूढ होकर रामने लक्ष्मणसे कहा कि दूसरी सूचना देनेके लिए पुनः नौ प्रकारके बाजे बजानेकी आज्ञा दे दो । लक्ष्मणने 'जो आज्ञा' कहकर दूतोंको उत्तम रीतिसे बाजे बजवानेकी आज्ञा दी । आदेश पाते ही उन दूतोंने मेघघटाके समान बाजाका निनाद किया । इसके उपरान्त रामने पुनः लक्ष्मणसे कहा—॥२३-२५॥ हे भाई ! मेरी आज्ञाके अनुसार तुम यहीं नगरकी रक्षा करनेके लिए सुमन्त्रको छोड़ दो । आगे भरत और उनके पीछे शत्रुघ्न चलें तथा मेरे पीछे तुम चलो । तुम्हारे पीछे सीता और सीताके पीछे तुम्हारी स्त्री उर्मिला चले ॥ २६ । २७ ॥ उनके पीछे भरतकी प्राणप्रिया सुन्दरी मांडवी और माण्डवीके पीछे शत्रुघ्नके प्रिया भार्या श्रुतकीर्ति चले ॥ २८ । नगरकी स्त्रियोंके साथ माताएँ विमान-पर सवार होकर आनन्दसे सभागोष्ठ देखती हुई आवें ॥ २९ । तुम जाकर सीता आदि सब स्त्रियोंको हथिनियोंपर चढ़ा आओ। उसके बाद मैं गजपर सवार होऊँगा ॥३०॥ सो सुनकर लक्ष्मण तुरन्त चल दिये और उन सबकी हथिनियोंपर सवार कराकर शीघ्र ही रामके पास लौट आये ॥ ३१ ॥ लक्ष्मणके आ जानेपर मतिमान् रामने मन्त्री सुमन्त्रको पारितोषकरूप वस्त्र दिये तथा रक्षाके लिये नगर सौंप दिया ॥ ३२ । उसके बाद शुभ मुहूर्तमें लक्ष्मणके सुन्दर हाथोंको पकड़कर राम सिंहासनसे उठ और उत्तम हाथीके पास गये ॥ ३३ ॥ हाथीकी प्रदक्षिणा करके राम मयूरपङ्खकी बनी हुई सीढ़ीपर पांव रखकर सुखपूर्वक धारसे उसपर सवार हो गये ॥३४॥ उस समय हजारों राजसेवक सुन्दर एवं गम्भीर शब्द करनेवाले दुन्दुभि आदि नवविध वाद्योंको बजाने लगे ॥ ३५ । वहाँपर अनेक प्रकारके शब्द होने लगे, वेश्याएं नाचने लगीं और हाथी तथा घोड़ोंपर नाना प्रकारके बाजे बजाये जाने लगे । ३६ ॥ विप्रलोग उच्च स्वरसे जयजयकार और वेदध्वनि करने लगे। एक