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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ
१६४आनन्दरामायणे[ सर्गः २

तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मन्लोकेषु निवत्स्यसि । इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा स्वयं रामस्य धीमतः । ३९॥
चरित्रं श्रावयामास वेदवाक्यैः सुपुण्यदैः । ततः संपूजितो ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत ॥४०॥
ततः सशिष्यो भगवान् मुनिर्विस्मयमाययौ । तस्य शिष्यास्ततः सर्वे जगुः श्लोकमिमं पुनः ॥४१॥
मुहुर्मुहुः प्रीयमाणाः प्राहुश्च भृशविस्मिताः । समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा ।
शोचन्नुव्याहृतोऽभूद्यः शोकः श्लोकत्वमागतः । ४२॥
तस्य बुद्धिरियं जाता महर्षेर्भावितात्मनः । कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम् ॥४३॥
उदारवृत्तार्थपदैर्मनोगर्भैस्सदाऽस्य रामस्य चकार कीर्तिमान् ।
समाक्षरैः श्लोकवरैर्यशस्विनो मुनिः स काव्यं शतकोटिमितम् ४४॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे श्लोकोत्पत्तिरामायणकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

श्रीशिव उवाच

वाल्मीकिना कृतं देवि शतकोटिप्रविस्तरम् । रामायणं महाकाव्य जगृहुर्मुनयश्च ते ॥ १ ॥
आश्रमे तत्पठंति स्म कथयंति स्म ते मुदा । तच्छ्रोतुममराः सर्वे विमानैश्च दिवि स्थिताः २ ॥
श्रुत्वा सर्वं सविस्तारं वाल्मीकिं पुष्पवृष्टिभिः । ववृषुर्जगदुश्चंदस्ते प्रशशंसुर्मुनीश्वरम् ॥ ३ ॥
ततो देवाः सगंधर्वा यक्षा नागाः सकिन्नरा । मुनीश्वरा गुह्यकाश्च पार्थिवाः पद्मभूस्त्वहम् । ४ ॥
परस्परं ते कलहं चक्रुः कार्यार्थमादरात् ब्रह्माद्या निर्जराः सर्वे पन्नगान्दितिजान्नरान् ॥ ५ ॥
वय काव्यं विनेष्यामो दिव वाल्मीकिना कृतम् । दितिजाः पन्नगाः प्रोचुर्विनेष्यामो रसातले ॥ ६ ॥


सुखसे रहोगे। इतना कहकर स्वयं भगवान् ब्रह्माने पुण्यप्रद वेदवाक्यों द्वारा बुद्धिमान् रामका चरित्र उन्हें कह सुनाया। पश्चात् मुनिसे पूजित होकर ब्रह्मा वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥३९-४०॥ तब शिष्यों सहित भगवान् वाल्मीकि मुनिको बड़ा भारी विस्मय हुआ और उनके शिष्य उस श्लोकका बारम्बार आनन्दसे गान लगे ॥ ४१ ॥ महर्षिने समान अक्षरोंवाला तथा चार चरणों युक्त जिस श्लोकको गाया था, उसको वे शिष्य भी प्रसन्न होकर आश्चर्यसे परस्पर कहने-सुनने लगे ॥ ४२ ॥ उस श्लोकका मुनि शोकरूप बार-बार कहते थे। अन्तमें अहो शोक श्लोक (पद्य) रूपमें परिणत हो गया, पश्चात् उन शुद्धात्मा महर्षिकी यह इच्छा हुई कि मैं इसी प्रकारके श्लोकोंमें समस्त रामायणका निर्माण करूँ ॥ ४३॥ अन्तमें उन कीर्तिमान् मुनिने मनको आनन्द देनेवाला तथा जिससे उदार चरित्र भरे अर्थोंका ज्ञान प्राप्त हो, ऐसे पद और समान अक्षरोंवाले सौ करोड़ श्लोकोंवाला यशस्वी रामका काव्य (रामायण) रचा ॥ ४४॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे भाषाटीकायां श्लोकोत्पत्तिरामायणकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! वाल्मीकि मुनिका बनाया हुआ सौ करोड़ श्लोकात्मक उस महाकाव्य रामायणको सब मुनियोंने अपनाया और वे हर्षपूर्वक उसे अपने आश्रमोंमें पढ़ने तथा सुनने लगे । उसको सुननेके लिए सब देवता विमानोंमें बैठकर आकाशमें छा गये ॥ १ ॥ २ ॥ उन लोगोंने विस्तारपूर्वक सम्पूर्ण रामायण सुना और मुनीश्वर वाल्मीकिजीकी स्तुति करके जयजयकार करते हुए उनपर पुष्पवृष्टि की ॥ ३ ॥ बादमें देवता, गंधर्व यक्ष, नाग, किन्नर, मुनिगण, गुह्यक, राजे-महाराजे, ब्रह्मा तथा मैं सब एक साथ उस रामायण महाकाव्यकी प्राप्तिके लिए परस्पर आदरपूर्वक झगड़ने लगे। ब्रह्मादि देवता पन्नगों, दैत्यों तथा मनुष्योंसे कहने लगे कि इस वाल्मीकीय काव्यको हमलोग स्वर्गमें ले जायँगे दैत्य तथा पन्नग कहने लगे कि हम

सर्गः २ ] यात्राकाण्डम् १६५


इदं काव्यं राघवस्य चारित्रं पावनं शुभम् । सुरासुरा मनुष्यान्ताः प्रोचुः काव्यं हि भूतलात् ॥७॥
नेतुं रसातलं स्वर्गे न दास्यामो वयं क्वचित् । काव्यार्थमिति ते चक्रुः कलहं रोमहर्षणम् ॥८॥
ततो देवि जनान् मर्त्यान्निवार्य वचनैर्हितैः । गत्वाऽहं तंस्तु क्षीराब्धौ शेषपर्यङ्कधायिनम् ॥९॥
विष्णुं स्तुत्वा तु वेदोक्तैर्मन्त्रैर्नानाविधैरपि । नानापूजोपहारैश्च पूजयित्वा सविस्तरम् ॥१०॥
कृतवान् गंतवाद्यादि तेन विष्णुर्बुबुध्यत । पप्रच्छ मां तदा विष्णुः किमर्थं वै त्विनोऽस्म्यहम् ? ॥११॥
वृत्तं सर्वं मया देवि कथितं वृत्तविस्तरम् । काव्यार्थं कलहं श्रुत्वा प्रहस्य जगदीश्वरः । १२॥
त्रिधा विभज्य काव्यं तद् रूपवान् भक्तवत्सलः । त्रयस्त्रिंशत्कोटिसमुद्रेभ्याणि पृथक् पृथक् ॥१३॥
शतानि त्रीणि श्लोकांश्च त्रयस्त्रिंशत्तथापरान् । दशाक्षरमितान्मन्त्रानप्यभजत उमापतिः ॥१४॥
द्वयक्षरे याचमानाय मयं देवे ददौ हरिः । उपदिशाम्यहं काश्यां तेऽन्तकाले नृणां श्रुतौ ॥१५॥
रामेति तारकं मन्त्रं तमेव विद्धि पार्वति । लक्ष्मीगरुडशेषेभ्यो याचमानेभ्य आदरान् ॥१६॥
मन्त्रत्रयं पृथक् विष्णुर्ददौ तेभ्योऽतिहर्षितः । शेषान् निनाय पातालं लक्ष्मीर्वैकुण्ठमादरात् ॥१७॥
पृथिव्यामथ गरुडस्तं दधार महामनुम् । शपुः शेषान्नन्नगाद्याः सर्वे पातालशामिनः ॥१८॥
स्वर्गे प्रापुर्महालक्ष्म्यास्तन् मनुं निजराडयः । काश्यपान्प्रापुर्मटायन्मन्त्रं सर्वे भूतल्वामिनः ॥१९॥
मन्त्रशास्त्रात्तत्स्वरूपं ज्ञयं गुप्त शास्त्रोक्तैः । ततः पूर्वोक्तभागान् ददौ विष्णुः पृथक् पृथक् ॥२०॥
एवं विभागं देवेभ्यो द्वितीयं पाण्डवाः । मुनीश्वरेभ्यो नागेभ्यस्तृतीयं बम्मूनामम् ॥२१॥
ततो देवा निज भागं स्वर्गे निन्युर्मुदान्विताः । पाताले पन्नगाद्याश्च निन्युर्भागं मुदा न्वितम् ॥२२॥


लोग हम रसातलम न जाय । ४-६ । क्योकि इस पावन पवित्र तथा सुन्दर रामचरित्र कवित्त है, सब राजा प्रजा और ऋषि मुनीव कहा कि हम उस काव्यका मूलभाग न तो स्वर्गमे ले जाने देंगे और नहीं पातालम । इस प्रकार व पदरकाव्यके लिए परस्पर गमर्हषक जागृत रूप रहे ॥ ७॥८॥ हे देवि ! पश्चात् मैन उन सबको समझा बुझाकर सन्तुष्ट करनेसे रोका और उन सबका भाव लेकर मैं क्षीर-समुद्रमे शेषशय्यापर शयन करनवाले विष्णुभगवान्‌के पास गया और नाना प्रकारका पूत्रेश्री वन्दश्रीश विस्तारपूर्वक पूजा करके अनेक वेदसवाते उत्तम स्तुति की ॥ ९ ॥ १० ॥ तदनन्तर उनके सामने वात्र बजाना गाना प्रारम्भ किया । उससे विष्णु भगवान् जाग और कहन लगे कि तुमने मुझको क्यों जगाया ? ॥ ११ ॥ देवि ! तब मैने सब हाल साफ साफ कह सुनाया । जगदीश्वर विष्णुभगवान् रामायण पञ्चकाव्यक लिए होने वाले कलहको सुनकर हँस पड़े ॥ १२ ॥ उस भक्तवत्सल भगवान्‌ने क्षणभरम उस काव्यक तीन भाग कर दिये । उनमसे प्रत्येक भाग तेतीस करोड तेतीस लक्ष, तेतीस हजार तान सौ तैतीस श्लोकोंका बना । उन रघुपतिने इस दश अक्षरोवाल मंत्रका का विभाजन किया ॥ १३ ॥ १४ ॥ बाकी दो अक्षर श्रीहरिने दृह अक्षरोको याचना करनवाले मुझ (शिव) को र दिया । मैं काशमे रहता हुआ अंतकालमे उन्हों दो अक्षरोका मनुष्यके कानम उपदेश करता हूँ ॥ १५ ॥ हे पार्वती ! उन दो अक्षरोको ही तुम 'राम' नामका तारक-मंत्र समझो । अर्थात् वही दो अक्षरा 'राम' यह तारक मंत्र है । पश्चात् बड़े आदरसे मांगने-पर विष्णु भगवान् अतिशय प्रसन्न होकर लक्ष्मी, गरुड और शेषन नका भी अलग-अलग तीन मन्त्र प्रदान किये । शेष भगवान् अपने मंत्रका पातलम् लए। वैकुण्ठमे और गरुड उस महामन्त्रको बड़ी यत्नसे पृथ्वीपर ले गये ॥ १६ ॥ १७ ॥ शेषके द्वारा पातालम गया हुआ यह पातालवासी नागोंको प्राप्त हो गया ॥ १८ ॥ स्वर्गमें लक्ष्मीके द्वारा यह मंत्र सब दवताओंका मिला और भूतलवामी लोगोको यह मंत्र गरुडसे प्राप्त हुआ ॥ १९ ॥ हे शरीन्द्रज ! उस मंत्रोंका गुप्तस्वरूप मंत्रशास्त्रोंस जाना जा सकता है । तदनन्तर रामायणके किये हुए तीनों भागोंको विष्णुने अलग-अलग बाँट दिया ॥ २० ॥ उनमेम तैंतीस करोड तैंतीस लाख तैंतीस हजार तान सौ तेतीस ३३३३३३३३३ मत्रोंका एक भाग उन्होंने देवताओंको दिया । ३३३ ३३३३३३ का दूसरा भाग मुनीश्वरोका पृथ्वीलोकक लिए दिया और ३३३३३३३३३ का तीसरा भाग नागोंको दिया । २१ ॥

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सर्गः २ ] यात्राकाण्डम् १६७


क्षीरायुधो व्यरचिनास्तेषां योग्यानि ... । श्रीकृष्णोऽपि पुनर्व्यासो व्यासरूपी भुवि ३९ मानवानां हितार्थाय काव्याद्रामकथान्वितम् । भागद्वयसमाश्रित्य विविधानि हि ४० पृथक् पृथक् सप्तदश पुराणानि करिष्यति । भारतं विनिहत्य च महत्कृत्यं करिष्यति ॥४१। भागोद्भारस्तयोर्नन्तैर्नान्त्याहं विशुद्ध च । मद्भागोऽन्यतरोऽर्थेश्च यदा शान्तिं न गच्छति , ४२ सरस्वत्यास्तटे व्यासो व्यग्रचित्तो भविष्यति । एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा नारदाय महात्मने ।४३ चतुःश्लोकींविष्णुपदेशरूपोपदेशं करिष्यति । लब्ध्वा तान्न नारदश्चापि गरीणां रणयन्मुहुः ॥४४॥ कीर्तयन् सुस्वरं गत्वा मूर्ति म- दर्शयन्निव । तच्छ्लोकान् व्यासमुनये गत्वा ह्युपदेक्ष्यति ।४५ लब्ध्वा व्यासमुनिः श्लोकांस्तान्प्रशणार्थांन्नाम्। शान्तिं लब्ध्वा मनस्तेषां विस्तारं च करिष्यति । तेषामेवार्थमादाय पुराणं परमद्भुतम् अष्टादशसहस्रं हि श्रीमद्भागवताभिधम् ४७। करिष्यत्यष्टादशमं रम्यं जनमनोहरम् । भागवत्यन्त एव वाणी भिन्ना भविष्यति ' ४८॥ पुराणानां च सर्वेषां वाल्मीकीयैव गौः प्रिये , पृथक्तां स्मृतो व्यासः श्रीमद्रामायणे शतम् । ४९ करिष्यति तथान्यानि स व्यासो विविधानि च उपपुराणान्युपपुराणानि मारं मारं विशुह्य च ॥५० भागोद्भासतखण्डान्नर्गताद्रामायणाद्भुवि । करिष्यंति नद्यःन्येऽपि षट्पञ्चाशणि मुनीश्वराः । ५१॥ तस्माद्रामायणादेव मातृमुद्धृत्य सादरान् । यत्किञ्चिदिहिनिर्भूम्यां कीर्त्यते वै कथानकम् ॥५२॥ रामायणांशजं विद्धि श्लोकपद्यमयीह यत् ।

पार्वत्युवाच

शंभो ते द्रष्टुमिच्छामि तन्मुखं नारदो मुनिः । ५३ । सर्व ज्ञात्वा विधिमुखाद्रम्यपातकनाशनम् । तन् गवतचतुश्लोकांश्चतुश्लोपदेक्ष्यति ५४॥ यैः करिष्यति स व्यासो मुनिर्भागवतं वरम् । तान्श्लोकांश्चतुर्गन्ध मां कृपया वक्तुमर्हसि ।५५।।


योग्य बनायेगा । हे देवि ! इसके अतिरिक्त स्वयं श्रीकृष्ण भी पृथिवीपर व्यासका रूप धरकर अवतार लेंगे और मनुष्योंके कल्याणके लिए भारतवर्षके भाग्यवान् रामायण कथासे विविध प्रकारके पृथक् पृथक् सत्रह पुराण रचेंगे। वे सर्वोत्तम तथा बड़ा भारी महाभारत नामक सुन्दर इतिहास भी लिखेंगे ॥ ३७-४१ । जो भारतवर्षीय रामायणके भागका सारांश होगा। उन भारत आदि ग्रंथोंका निर्माण करनेपर भी जब व्यासजीको सन्तोष न होगा, तब वे व्यग्र होकर सरस्वती नदीके किनारे बैठेंगे उसी अवसरपर ब्रह्माजी भी विष्णुप्रदत्त चार श्लोकोंका नारदको उपदेश करेंगे नारदजी उन श्लोकोंको प्राप्त करके अपनी सुन्दर वीणाको बारम्बार बजाते तथा सुन्दर स्वरसे गाते हुए सत्यवतीके पुत्र व्यास मुनिके पास जाकर उनको उन श्लोकोंका उपदेश देंगे ॥ ४२-४५॥ व्यास मुनि उस रामायणके चार श्लोकोंको प्राप्त करके बड़े शान्त चित्तसे उनका विस्तार करेंगे। उनके अर्थका आश्रय लेकर परम उदार अर्थवाले, अठारह हजार श्लोकात्मक, रमणीय और मनुष्योंके मनको मोह लेनेवाले अठारहवें 'श्रीमद्भागवत' नामक महापुराणका निर्माण करेंगे। इसलिए भागवतकी भाषा भी भिन्न प्रकारकी होगी अर्थात् अन्यान्य पुराणोंमें उनका लेख विलक्षण होगा ॥ ४६ ॥ ४७ । हे प्रिये ! सब पुराणोंकी भाषा वाल्मीकीयके समान ही है, तथापि शतरामायणके कर्त्ता व्यास अलग ही गिने जायेंगे। वेदव्यास मुनिभ भारतवर्षीय रामायणक भाषाका सार ग्रहण करके और भी बहुतसे मनोहर उपपुराण बनायेंगे इसी प्रकार उस रामायणका सारभाग लेकर अन्यअन्य मुनीश्वर छ. जाम्बाका निर्माण करेंगे। हे गिरजे ! पृथ्वीमण्डलपर और भी जो कुछ श्लोकात्मक तथा पद्यात्मक कथा मिले तो उसे भी तुम रामायणके अंशसे ही उत्पन्न समझो। पार्वतीजी बोलीं-- हे शंभो ! मैं आपके मुखारविन्दसे रामचरित्रके उन चार श्लोकोंको सुनना चाहती हूँ, जिन पापनाशक श्लोकोंको नारदने ब्रह्माके मुखसे सुनकर व्यासको सुनाया था ॥ ४८-५४ । जिनके आधारपर व्यासमुनि अपूर्व भागवत ग्रंथको रचेंगे, उन चार श्लोकोंको कृपा करके

१६८आनन्दरामायणे[सर्गः २

श्रीशिव उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया देवि सावधानमनाः शृणु । नारदोक्तांश्चतुःश्लोकांस्तवाग्रे प्रवदाम्यहम् ॥५६। शारदायापि कथिता विधिना ये पुरा शुभाः । ब्रह्मणे विष्णुना पूर्वं श्रीरामचरिते यदा ॥५७। विभक्तं हि तदा दत्तः शेषभूतः सुपुण्यदः । तान् शृणुष्व चतुःश्लोकान् विष्णूक्तान्स्वयंभुवे ॥ श्रीभगवानुवाच अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥५९॥ ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ६० । यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥६१। एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ६२ । श्रीशिव उवाच एवं श्लोका भगवता चत्वारश्च प्रकीर्तिताः । वेधसे ये नराये ने कीर्तिता देवि ते मया । ६३॥ एते पवित्राः पापघ्ना मर्त्यानां ज्ञानदायकाः । अज्ञाननाशकाः सद्यः कीर्तनीया नगेन्द्रजेः ॥६४॥ एवं देवि त्वया पृष्टं यथा तप्ते निवेदितम् । कथामारंभिता पूर्वमाशुना शृणु वच्म्यहम् ॥६५। ततो रामायणं व्यासो विक्षिप्तं मुनिभिः पुनः । कुर्वकत्र शेषभूतं सप्तकाण्डैर्नतं शुभम् ॥६६। चतुर्विंशति माहस्रं ग्रथिष्यति मुनिस्तदा । अद्याऽन्ते तत्प्रदस्य श्लोकाम्प्रचक्षिपन्ति हि । ६७। चतुर्विंशतिसाहस्रं व्यासस्य ग्रथिता अपि । भविष्यन्ति गिरिजेंद्रे मंगलाचरणादिषु ॥६८।


...आप अवश्य मुझमे कहे ॥ ५५ ॥ शिवजीने कहा- हे देवि ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। अब उन इन बातोंको सावधान होकर सुनो। मैं उन नारदने कहे श्लोकोंको सुनाता हूँ ॥ ५६ ॥ उनसे भी पहिले नारद-के समक्ष श्रीरामके चरित्रस्वरूप वे ही चार श्लोक विष्णुने ब्रह्मासे कहे थे ॥ ५७ ॥ ... हे विष्णुने ब्रह्मामे उस समय कहा था, जब कि उन्होंने रामायणका विभाजन किया था । उन बचे हुए पुण्यप्रद तथा विष्णुके द्वारा कहेहुए फिर हुए चार श्लोकोंको मन लगाकर श्रवण करो ॥ ५८ ॥ श्रीभगवान्‌ने कहा था इस चराचर प्रपंचात्मक तथा पाञ्चभौतिक संसारके उत्पन्न होनेके पूर्व न कोई सद्‌वस्तु थी और न असद्वस्तु केवल सबका कारण तथा सृष्टिका बीजरूप मैं ही था। उसी प्रकार प्रलयके पश्चात् भी जो कुछ कार्यसमूहका अधिष्ठान-स्वरूप अवशिष्ट रहता है, वह भी एकमात्र मैं ही हूँ ॥ ५९ ॥ जो वास्तविक वस्तु न होनेपर भी सद्विचारके अभाववश वास्तविकरूपसे जान पड़ता है, परन्तु जब आत्म-अनात्मविषयक तत्त्वविचार किया जाता है, तब आत्माके अतिरिक्त जिसकी कोई सत्ता नहीं जान पड़ती, जड स्वभावकार्य, आस्तित्ववान् आत्माको आच्छादित करनेवाली, आत्मसम्बन्धिनी मायाको मृगमरीचिकाके आभासकी तरह तथा आकाशकी नीलिमाकी तरह मिथ्या जानना चाहिए ॥ ६० । जिस तरह पृथ्वा आदि पञ्चमहाभूत अन्यान्य भौतिक वस्तुसमूहमें अनुस्यूत होनेपर भी उनसे अलग दिखाई देते हैं। उसी तरह ये पञ्चमहाभूतोंमें व्याप्त होनेपर भी उनसे अर्थात् समस्त भौतिक संसारसे अलिप्त रहता हूँ ॥ ६१ ॥ बस, आत्मतत्त्वके जिज्ञासुओंको सदा और सब जगह अन्वय-व्यतिरेक उपयुक्त बातोंका निश्चय करके आत्मतत्त्व तथा मायाका पृथक् पृथक विरुद्ध-धर्मवाली जान लेना चाहिए। यही व्यापक नियम है ॥ ६२ ॥ शिवजी बोले-हे देवि ! भगवान् नारायणने जो चार श्लोक ब्रह्मासे कहे थे, वे मैंने तुम्हें कह सुनाये ॥ ६३ ॥ ये श्लोक पवित्र, पापनाशक, मृत्युलोकके प्राणियोंको उत्तम ज्ञान देनेवाले तथा शीघ्र अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेवाले हैं। अत समझदार मनुष्योंको निरन्तर इनका श्रवण, मनन और कीर्तन करते रहना चाहिए । ६४ ॥ हे देवि ! जो तुमने पूर्वमें प्रारम्भिक कथा पूछी, सो मैंने तुमसे कही। आगे जो कहना हूँ, वह का सुनो ॥ ६५ ॥ बादमें मुनियोंके द्वारा इधर उधर बिखरे हुए रामायणको व्यासमूनि फिरसे एकत्र करके सुन्दर सात काण्डमें चौबीस हजार श्लोकयुक्त बनाकर उसकी रक्षा करेंगे । इसी कारण चौबीस हजार श्लोकोवाली इस रामायणके बादि तथा अन्तमें मंगलाचरण आदिके प्रकरणमें व्यासरचित ओर ओर भी कुछ श्लोक दृष्टिगोचर होगे ॥ ६६-६८ ॥ हे देवि !

सर्गः २ ]यात्राकाण्डम्१६९

रामायणान्यनेकानि पृथगग्रे मुनीश्वराः । भागान्भारतखण्डान्तर्गतांस्तन्मोद्भवाद्ययः ॥ ६९॥
करिष्यन्त्यत्र शतशस्तानि सर्वाणि पार्वति । वाल्मीकीयाद्विना देवि न ज्ञेयानि मनीषिभिः ॥ ७० ।
सारकाण्डं पुरा देवि यदुक्तं च मया तव वाल्मीकीयाच्च तच्चापि सारमुद्धृत्य वै मया ॥ ७१ ।
निवेदितं च सधुना पृष्टं रामकथानकम् सुविस्तारं वदस्वेति त्वया तन्मानस्योदितम् ॥ ७२॥
भानं रामचरित्रस्य शतकोटिप्रविस्तरम् पञ्चाननोऽप्यहं देवि दिव्यैर्वर्षार्बुदैरपि ॥ ७३॥
रामायणं सविस्तारं व्याख्यातुं न क्षमस्त्विह , यन्निर्मितं च मुनिना स्वतपोभिरनुत्तमम् ॥ ७४॥
अतः संक्षेपमात्रं हि सारं सारं त्रिगृह्य च । कथयिष्यामि तन्वङ्गि यात्राकाण्डं शुभावहम् ॥ ७५॥
रामदासो यथायग्रे हि विष्णुदायं वदिष्यति । शतकोटिमतान् ज्ञानदृष्ट्या चाहं तथा तव ॥ ७६ ।

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे रामायणविस्तारकथनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

( गङ्गा-सागरसङ्गमपर जानेकी तैयारीके लिए दूतोंको रामकी आज्ञा )

पार्वत्युवाच

को रामदासः कुत्रस्थो विष्णुदासश्च कः स्मृतः कथं वदिष्यति गुरुस्तन्मां कथय विस्तरात् ॥ १ ॥

शिव उवाच

भारते दण्डकारण्ये गोदानावौ विगजिते । संवेऽब्जके नृसिंहाख्यो मुनिगग्रे भविष्यति ॥ २ ॥
रामनामा तु तत्पुत्रस्तच्छिष्यो विष्णुदित्यपि । गुरुशिष्यौ राममेवाभकौ नित्यं भविष्यतः ॥ ३ ॥
दास्यत्वाज्जानकीजानेस्तावभौ भूसुरोत्तमौ । रामदासोविष्णुदासाविति लोके परां प्रथाम् ॥ ४ ॥
गमिष्यतोऽग्रे भो देवि गौतम्या दक्षिणे तटे रामदासः पितुः श्राद्धं गयायां संविधाय च ॥ ५ ॥
पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि गत्वा यथाक्रमम् । अध्यापयिष्यति ञ्छात्रान् गोदानावौ गृहाश्रमी ६ ॥


भारतवर्षमें प्रचलित रामायणके झाउक आधारपर अगस्त्य आदि अन्य-न्य मुनि भा सेकड़ों रामायण लिखेंगे । पर विचारशील पुरुषोंको उन्हें वाल्मीकीय रामायणसे पृथक् न समझना चाहिये । ६९ । ७० । हे पार्वती ! पहले जो मैंने तुमको सारकाण्ड सुनाया वह भी वाल्मीकीय रामायणका सार ही था ॥ ७१ । उसके बाद जो तुमने रामकी सविस्तर कथा पूछी और मैंने सुनायी, उसका एक अरब श्लोकोंमे विस्तार है । हे देवि ! पञ्चमुखसे में दिव्य अरब वर्षोंमे भी सम्पूर्ण रामायणका व्याख्या करनाम समर्थ नहीं हूँ तब फिर औरोंका तो कहना ही क्या है । इसका रचना वाल्मीकि ऋषिने अपने तपोवलम किया ॥ ७२-७४ । इसलिये सारमात्र लेकर संक्षेपमे मैं तुम्हारी प्रसन्नताके हेतु मनोहार यात्राकाण्ड सुनाऊँगा , ७५ जिस सौ करोड़ श्लोकोंकी रामायणको आगे चलकर रामदास विष्णुदासको सुनाएंगे, वही में ज्ञानदृष्टिसे देख कर तुमको सुनाता हूँ ॥ ७६ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां रामायणविस्तारकथनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

पार्वतीजीने पूछा—हे महाराज ! रामदास कौन और कहाँके हैं ? ये विष्णुदास कौन हैं ? रामदास विष्णुदासको क्यों बिस्तारसे रामायण सुनायेंगे, यह भी कह सुनाइये ॥ १ ॥ शिवजीने उत्तर दिया कि भारतवर्षके दंडकारण्यमें गोदावरीके मध्यप्रदेशीय अम्बक क्षेत्रमे आगे चलकर नृसिंह नामके एक मुनि होंगे ॥ २ ॥ नृसिंहमुनिके पुत्र रामदास और रामदासके शिष्य विष्णुदास होंगे । वे दोनो गुरु-शिष्य निरन्तर रामकी भक्ति करनेवाले होंगे ॥ ३ सीतापति रामके अनन्य दास होनेके कारण ही ये दोनों रामदास तथा विष्णुदास नामसे संसारमें परम प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे । हे देवि ! आगे चलकर वे ही रामदास गौतमी नदीके दक्षिण तटपर रहकर गयामें पिताका श्राद्ध करके पृथ्वीके समस्त तीर्थोंका भ्रमण करनेके बाद गृहस्थाश्रम स्वीकार करके

१७० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

एकदा विष्णुदासः स शृण्वन्नानाविधाः कथाः । रामदासमुखात्सारकाण्डं रामायणोद्भवम् ॥ ७ ॥ श्रुत्वा किञ्चित्पृच्छमना रामदास वदिष्यति । विष्णुदास उवाच गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वक्तुमिहार्हसि ॥ ८ ॥ सारकाण्डं मया त्वत्तः श्रुतं रामायणान्धितम् । न किंचिन्तोऽस्य लेशोऽपि जानक्या राघवस्य च । ९ ॥ श्रुतोऽत्र कापि राज्यस्य विस्तारोऽपि च न श्रुतः । कथं यागाः कृतास्तेन सन्ततिर्नास्य न श्रुता ॥ १० ॥ सुतानां बन्धुपुत्राणां विवाहादिकमश्रुतम् । तत्सर्वं विस्तरच्छ्रोतुमिच्छाम्यहं गुरो ॥ ११ ॥ तन्मे वद महाभाग रघुवीरस्य चेष्टितम् । रम्यं पवित्रमानन्ददायकं पातकापहम् ॥ १२ ॥ रामदास उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स रामचन्द्रकथानकम् । मङ्गलं रघुनाथस्य प्रोच्यते यन्मविस्तरम् ॥ १३ ॥ सावधानमनास्त्वं तच्छृणु पातकनाशनम् । यथा श्रुतं मया पूर्वं तत्पशार्थं ते वदाम्यहम् ॥ १४ ॥ हन्त्वा दशाननं रामो राज्यं निहतकण्टकम् । अयोध्यायां मुक्तिपुर्यां शशास नीतिसंयुतः । १५ । न दुर्भिक्षं न चौर्यं च नापमृत्युर्न चोतयः । न दर्शद्द्रियं भयं चिन्ता व्याधयश्च कदाचन ॥ १६ ॥ न भिक्षार्थी न दुर्जनो न पापान्मा न निष्ठुरः । न क्रोधी न कृतघ्नोऽपि रामे राज्यं प्रशासति ॥ १७ ॥ एकदा जानकी कान्तमेकान्ते प्राह लज्जिता । स्मितवक्त्रा चारुनासा दिव्यालङ्कारमण्डिता ॥ १८ ॥ चामरव्यग्रहस्ता सा विनयावनतानना । शम राजीवपत्राक्ष शत्रुपारे मम प्रभो । १९ ॥ किञ्चिद्विज्ञापतुमिच्छामि यद्यनुज्ञां करोषि हि । विज्ञापयामि तर्हि त्वां धर्ममूलं महोदयम् ॥ २० ॥

गोदावरीके तटवर्ती गांवमें छात्रांको अनेक शास्त्रोंका अध्ययन कराते ॥ ४-६ उसी अवसरपर किसी दिन विष्णुदास रामदासके बहुतसे कथा सुनत-सुनते रामायणका सारकाण्ड सुनकर कुछ प्रश्न करनेकी इच्छासे कहते हे गुरो ! में आपस जो प्रश्न करना इच्छा करता हूं, उसका युक्तसंगत उत्तर देनमें आप समर्थ हैं । हे गुरो मैंने आपस रामायणान्तः सारकाण्ड तो सुन लिया, परन्तु आगे धन-कथा में भी महारानी जानकी अथवा राजा रामचन्द्रका कोई सुम्द संवाद नहीं सुना और न उनके राज्यका विवरण ही सुन पाया । उन्होंने कैसे और किस प्रकार यज्ञ किये ? उनकी संतानांका विस्तार भा नहीं सुननको मिला । राम तथा उनके भाइयोके पुत्रोंके विवाह आदिका वर्णन भी मैं नहीं सुन सका हे गुरो ! यह सब मैं आप श्रीमुखसे विस्तार-पूर्वक सुनना चाहता हूँ । ७-११ ॥ इसलिए हे महाभाग ! श्रीरामचन्द्रजीका वह मनोहर, पावन, आनन्ददायक तथा पापनाशक चरित्र आप मुझसे सुनाइए । १२ । रामदास बाले- हे वत्स ! तुमने रामचन्द्रकथा-विषयक यह बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है। रघुनाथके इस मांगलिक चरित्रको मैं विस्तारसे वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥ उनकी कथा श्रवणमात्रसे जन्म-जन्मान्तक पापकं नष्ट कर देती है। उसको मैंने जैसे सुना है. वैसा ही तुम्हारी प्रसन्नताके लिए कहता हूँ, अब सावधान होकर सुना । १४ ॥ रामचन्द्रजी दशानन रावणको मारकर मोक्षदायिनी अयोध्यानागरीमें रहने हुए शान्तिपूर्वक निष्कंटक राज्य करने लगे । १५ ॥ उनके राज्यमं कभी भी अकाल नहीं पड़ा और चोरी नहीं हुई । किसाका अकाल या कुत्सित मरण नहीं हुआ। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी तथा मूषामे खतीका नाश, पक्षियांस लत्ताका विनाश और राजविद्रोहसे जायमान ईतियों (विपत्तियं) भी उनके राज्यभरमें लांगपर नहीं आया। उनके राज्यमें कोई दरिद्र, भयभीत, चिन्तातुर या रोगपीड़ित नहीं रहता था ॥ १६ ॥ उनके राज्यकालमें कोई भिखारी, दुराचारी, पापी, क्रूर, क्रोधी और कृतघ्न भी नहीं होता था । १७ ॥ ऐसे सुख-शान्तिक समय एक दिन हास्ययुक्तमुख-वाली, सुन्दर नासिकायुक्त एवं देवियोंके योग्य अलंकारामे विभूषित जानका कुछ लज्जापुरक एकान्तमें अपने प्रिय पति रामसे कहने लगी उस समय जानकीके हाथमें मनोहर चमर था । ऐसी दशामे वे विनयसे नीचेका मुख किये हुए बोली-हे कमलपत्रके समान नयनोंवाले रावणके शत्रु तथा मेरे नाथ राम ! यदि

[ सर्गः ३ ]यात्राकाण्डम्१०१

तत्सीतावचनं श्रुत्वा जानकीं प्राह राघवः । हे मान्ये कञ्जनयने मम प्राणसमाश्रये ॥२१॥
शीघ्रं वदस्व यत्तेऽस्ति चित्ते तत्कारयाम्यहम् । इति राघवसम्मानवचनैर्जनकात्मजा ॥२२॥
नितरां तोषभूयैषा पाणिभ्यांऽऽश्लिषत्पतिम् ।

श्रीसीतोवाच

यदा त्वं राघवश्रेष्ठ दण्डकं वचनात्पितुः ॥२३॥
मया सौमित्रिणा साकं त्वं व्यगमस्तदाऽन्तः । शृङ्गवेरपुरं गत्वा जाह्नव्यास्तरणे यदा ॥२४॥
नौकायां स्थितमस्माभिर्भागीरथ्यां तदा पुरा । सङ्कल्पितं मया किञ्चित्तत्त्वां वक्ष्याम्यहं प्रभो ॥२५॥
देवि गङ्गे नमस्तेऽस्तु निवृत्ता वनवासतः । रामेण सहिताऽहं त्वां लक्ष्मणेन च पूजये ॥२६॥
सुरामांसोपहारैश्च नानाबलिभिरावृता । इत्युक्तं वचनं पूर्वं तज्ज्ञातं भवताऽपि च ॥२७॥
ततश्चतुर्दशे वर्षे विमानेन यदाऽऽगतम् । तदा भरतशत्रुघ्नकौसल्याविरहातुरा ॥२८॥
अहं विस्मृता रामा स्मृतिर्जाताऽद्य मे प्रभो । तन्मत्सङ्कल्पपूर्त्यर्थं गन्तुमर्हसि जाह्नवीम् ॥२९॥
मया मातृप्रभृतिभिस्त्वांश्चेति ते प्रार्थयाम्यहम् । रोचते यदि ते चित्ते न त्वामाज्ञापयाम्यहम् ॥३०॥
इति सीतांवचः श्रुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः । सीतामालिङ्ग्य बाहुभ्यां हर्षयन् तामृवाच सः ॥३१॥
एतद्वचनचातुर्यं कुतो जानासि मैथिलि । न तवे वचनं देवि गङ्गां प्रति ममैव तत् ॥३२॥
वचनात्तव वैदेहि श्वो गन्ता जाह्नवीं प्रति । क्व ते वाञ्छाऽस्ति दांपत्ये गङ्गां यन्तुं वदस्व मे ॥३३॥
तच्छ्रुत्वा तत्र वै स्थातुं सेनायोग्यसमं मृदु । ऋजुं कर्तुं हि पन्थानं दूतानाज्ञापयाम्यहम् ॥३४॥
ततः सीताऽब्रवीद्वाक्यं पुनः श्रीरामचोदिता । यत्र गङ्गा च सरयूः सङ्गताऽस्ति रघूद्वह ॥३५॥


आप मुझे आज्ञा दें तो मैं आपसे कुछ निवेदन करना चाहती हूँ। वह मेरा निवेदन धर्मसम्मत तथा अभ्युदयकारी होगा ॥१८-२०॥

राम सीताका बचन सुनकर कहने लगे हेकञ्जनयने ! हे मम प्राणसमाश्रय सीते ! तुम जो कहना चाहो, सो शीघ्र कहो। मै उस अभापूर करनेको वैय रहूँ। इस प्रकार रामक सम्मानभरे वचनास जनकनन्दिनी संतोषका सहगास नितरां लहलहा उठा और पतिम वन्दन लगे श्रीमाताजी बोलो-हे राघवश्रेष्ठ ! जब आप पिताके कहनेपर दण्डकावन जातक लिए मुझे तथा सुमित्रापुत्र लक्षमणको साथ लेकर अयोध्या नगर, से चले थे और जन शृंगवेरपुर जाकर जाह्नवी नदीमें नावपर हमलोग सवार हुए थे । उस समय भगवती भागीरथीका बीच धारामे मन में। संकल्प किया था। हे प्रभो ! वह मै आज आपको सुनाता हूँ ॥२१-२० ।

मै गंगाको नमस्कार करके कहा था-हे देवि ! जब मै राम तथा लक्ष्मणके साथ वनवासस लौटूँगी, उस समय सुराके, मांसके तथा अनेक प्रकारकी पूजासामग्रियोंस तुम्हारी पूजा करूंगी । उस समय कहे हुए इस बचनको आपने भी सुना था ॥२६। २७॥

पश्चात् चौदह वर्ष बाद जब हमलोग विमान द्वारा इसम लोगे तब भरत शत्रुघ्न और माता कौशल्याके वियोगस आतुर होकर तात्पर्ये मै उस बातको भूल गयी । हे प्रभो ! आज मुझे उस बातका पुन, स्मरण आया है । अतएव मरे उस संकल्पको पूरा करनेक लिए माताओं, भाइयों तथा मुझे लेकर आपके गंगाके तटपर चलना चाहिये । यही मेरा आपसे प्रार्थना है। यदि आप उचित समझें तो चलें । मै आपको इस दानका आज्ञा नही देतीं । क्योकि स्त्रीका पतिको आज्ञा देना अधर्म है किन्तु सविनय उचित परामर्श देना न्याय्य और धर्मसम्मत है । २८-३०॥

भार्याके इस वाक्यको सुनकर राम बडे प्रसन्न हुए और आलिङ्गन करके मातासे सहर्ष कहने लगे-॥ ३१ ॥

हे मैथिली ! इस प्रकारका बचनचातुर्य तुमने कहाँस आ गया? तुम्हारा यह वचन गंगाके प्रति नही, प्रत्युत मेरे ही प्रति का ॥३२॥

हे वैदेहि ! तुम्हारे कथनानुसार मै कल ही गंगाजी चलनेके लिए तैयार हूँ । हे प्रिये ! तुम्हारी जिस जगह और जिस तीर्थको चलनेकी इच्छा हो, वह कहो ॥ ३३ ॥

इस बातको जानकर मै वहाँ सेनाको ठहरनक लिए स्थान और मार्ग साफ-सुथरा करनेके लिए दूतोको आज्ञा दे दूँ ।३४।

इस प्रकार रामके पूछनेपर सीताने कहा-हे रघुनन्दन ! जहाँ गंगा और सरयूजीका संगम हुआ है, वहीपर गंगाजीके

१७२आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

तत्र गङ्गांसरे देशे गन्तुमिच्छति मे मनः इति सीतात्रचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा नृपूद्वहः ॥ ३६ ॥
द्वाःस्थं समाहूय बहिर्गच्छाथ जानकीम्, अज्ञापयच्च तं रामः शीघ्रं गच्छ ममाज्ञया ॥ ३७ ॥
लक्ष्मणं वचनं मे त्वं कथयस्व सविस्तरम् । ज्ञापय्यः श्वोममोद्योगः सीतायाश्चैव कौतुकात् ॥ ३८ ॥
सरयूसङ्गमं गङ्गापूजनार्थे त्वया सह । मातृभिर्मन्त्रिभिः सैन्यैः सुहृद्भिर्भरतेन च ॥ ३९ ॥
शत्रुघ्नेन सुरिश्चैव जनैर्विप्रैर्यथासुखम् । सेरानिवेशस्थानानि योजनाद्वान्तराणि च ॥ ४० ॥
पूरितान्यन्नतोयाद्यैः कल्पनीयानि च पृथक् । इति रामवचः श्रुत्वा स भवत्विति त्वरान्वितः ॥ ४१ ॥
आज्ञाप्रमाणमित्युक्त्वा नत्वा रामं पुनः पुनः । कथयामास सौमित्रि रामवाक्यं सविस्तरम् ॥ ४२ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा यौवराज्यपदस्थितः । सभायां मन्त्रिभिर्युक्तो लक्ष्मणो दूतमब्रवीत् ॥ ४३ ॥
अङ्गीकृतं रामवाक्यमिति रामं वदस्व तत् । तच्छ्रुत्वा त्वरितं दूतः कथयामास राघवम् ॥ ४४ ॥
सभायां लक्ष्मणश्चापि दूतानाज्ञापयत्तदा । रुक्मदण्डकरान् चित्रोष्णीषपूत्कन् विषूषितान् ४५ ॥
गच्छध्वं त्वरिता यूयं कथयध्वं जनान्पुरि । अयोध्याया रामचन्द्रः श्वो यात्रार्थं प्रमुद्यतः ॥ ४६ ॥
इत्येवमुक्त्वा जवाहूता गजमार्गेषु सर्वतः । दीर्घस्वरेण ते प्रोचुश्चाश्चं कृत्वाऽऽसन्नरङ्करान् ॥ ४७ ॥
हे जनाः शृणुत स्वस्थाः श्वः सीतारागमोर्युग । मप्रूयोगोऽस्ति पूजार्थे सरय्वाः सङ्गमं प्रति ॥ ४८ ॥
भागीरथ्यां सुहृद्भिश्च सावगेधैर्बलैः सह । इति संभाव्य मकलान् जनान् साकेतवासिनः ॥ ४९ ॥
ते दूता राजभवने लक्ष्मणं तं पुनर्ययुः । समाग्र्य ते जनांश्चाग गमोद्योगं न्यवेदयन् ॥ ५० ॥
सभायां लक्ष्मणश्चापि समाहूयाजुनेजंपात्र् । तक्षकानिष्टकाकारान्मृत्फकमसु नैष्ठिकान् ॥ ५१ ॥
लोहकारान्धर्मकारान भित्तिकर्मादिनिष्ठिकान् । क्रयविक्रयकर्तॄंश्च काष्ठनिर्जातकारिणः ॥ ५२ ॥
वातोद्गृहतिदश्याश्च मर्मिर्जस्त्रवदिनः । नानाकर्मसु निष्णाना रज्जुमुद्रालधारिणः ॥ ५३ ॥

उत्तरी तटपर जानेका मेरा मनमें इच्छा है। सीताका इस इच्छाको सुनकर रामने 'बहुत अच्छा' ऐसा कहा ॥ ३५ । ३६ । तदनंतर जानकीको महलके भीतर भेज तथा द्वारपालको बुलाकर रामने कहा—तुम मेरी आज्ञासे अभी लक्ष्मणके पास जाकर मेरा आदेश उससे कह दो, उनसे कहना कि कल प्रातःकाल माताकी इच्छासे तुम्हारे, माताओं, मन्त्रियों, सेनाका, भरत-शत्रुघ्न, सुग्रीवादि तथा तथा साकेतके साथ सरयूके संगम-पर गङ्गाजीका पूजन करनेके लिए धूम धामसे मेरा जाना निश्चित हुआ है। इस लिये रास्तेमें दो दो कोसपर अन्न जलसे परिपूर्ण शिविर तैयार कराओ। रामके इस बचनको सुनकर वह दूत 'बहुत अच्छा, जो आज्ञा' कह तथा रामको बारम्बार नमस्कार करके वहाँसे शीघ्र चल पड़ा, लक्ष्मणके पास जाकर उसने विस्तारसे रामकी आज्ञा सुना दी । ३७-४२ ॥ युवराजपदपर स्थित तथा मन्त्रियोंके साथ सभा में विराजमान लक्ष्मणने जब रामके आदेशको दूतके मुखसे सुना तो उससे कहे—॥ ४३ ॥ तुम जाकर श्री रामसे कहो कि आपकी आज्ञाके अनुसार सब कार्य ठीक हो जायगा। दूतने जाकर शीघ्र ही रामको यह सन्देश सुना दिया । ४४ । तब लक्ष्मणने सोनेके दण्ड धारण करनेवाले रंग-बिरंगो पगड़ी सिरपर बांधे तथा सुन्दर पोशाक पहिने हुए बहुतसे सिपाहियोंको बुलाकर उन्हें यह आज्ञा दी - ॥ ४५ । तुमलोग शीघ्र नगरभरमें घूमकर सब नगरवासियोंको रामचन्द्रजीके कल यात्राके लिए प्रस्थान करनेका समाचार सुना आओ । ४६ ॥ 'तथास्तु' कहकर वे दूत नगरकी सड़कोंपर घूम घूम तथा हाथ उठा उठाकर ऊँचे स्वरसे सब लोगोंको सुनाने लगे— ॥ ४७। 'हे नगरवासियो ! ध्यान देकर सुनो, राम और सीता कल अन्तःपुर वासिनी स्त्रियां, सगे-सम्बन्धियों और सेनाको साथ लेकर सरयूनदीके संगमपर गङ्गाका पूजन करनेके लिए जायेंगे' अयोध्यावासी लोगोंको यह समाचार सुनाकर वे पुन लक्ष्मणजीके पास आगये और बोले कि हमलोग नगरके सब लोगोंको रामचंद्रजीकी यात्राका समाचार सुना आये । ४८-५० ॥ तदनन्तर लक्ष्मण नौकरोंके द्वारा तक्षण बढ़ई, ईंट पाथनेवाले कुम्हार, शय्याके काममें कुशल संगतरास ॥ ५१ ॥ लोहार, चमार, भीत-मकान आदि बनानेमें चतुर, राजगीर, सौदा बेचने तथा खरीदनेवाले बनिये, लकड़हारे, कपड़ेके डेरा-तम्बूके

सर्गः ३ ] यात्राकाण्डम् [ १७३

एतानाज्ञापयामास तोषयित्वा धनादिभिः । समानिनान्य तीर्थेभ्यित्र कल्पयामास सादरम् ॥५४॥ समुद्योगो राघवस्य सीतायाः श्वो बलैः सह । ऋजुमार्गा विधातव्याः समाः कर्तुमयत्नितः ॥५५॥ निम्ना भूमिः समा कार्या उच्चा भूमिः समत्विच । छिद्यन्तां पावना वृक्षा मार्गस्था दुःखदायकाः ॥५६॥ वाप्यः कूपास्तडागाश्च शोधनायाः सहस्रशः । नवीनाश्चापि कर्तव्याः सतोया निर्जने वने ॥५७॥ सेनानिवेशस्थानानि योजनाद्वै सविस्तरे । कल्प्यं पानि सुगन्धिः पूरितान्यम्वारिभिः ॥५८॥ सुन्दर्यो रम्या विधातव्याः पाकशालाः सुभाजयः । वर्ष्मगवेहाणि कार्याणि तूर्णञ्चापि सहस्रशः ॥५९॥ आरक्तमुपरं गच्छद्वित्तानि चित्रितारिन हि । नानागृहाणि कार्याणि पूरितान्यम्ववारिभिः ॥६०॥ पुष्पाणां वाटिकाः कार्याः शतशोऽथ सहस्रशः । मार्ग मार्ग कौतुकार्थ चित्राण्यनेकशः ॥६१॥ नरस्कन्धगताश्चित्रवाटिकाश्च सहस्रशः । पुष्पाणां वाटिकाश्चारूत्स्वानिर्दिताः शुभाः ॥६२॥ मार्गे मार्गे गायकानां स्थलान्यपि सहस्रशः । सर्वानिवेशस्थानेषु हर्म्य्यश्चरथवाजिनाम् ॥६३॥ सहस्रशो विधाक्तव्याः शालाः पर्णाम्बुवारिभिः । सुगन्धचर्दनमार्गाः सेचनीयाः समंततः ॥६४॥ नेमिरेखाऽपि मा मार्गे विचित्रवर्मनर्गृहाः । पुष्पन्च्छादनीयास्ते हृद्याः सन्तु समंततः ॥६५॥ मृगैर्गर्गेतचित्रेय हस्त्युष्ट्ररथवाजिनः । वस्त्रासङ्घारघण्टाभिः शोभनीयाः सहस्रशः ॥६६॥ शकटेषु तथोष्ट्रेषु वृषलेषु व्यादेषु । शलक्यः परिघा बाणाः शक्तयः कार्मुकान्यपि ॥६७॥ स्थापनीयानि शतशो विधातव्या ध्वजा अपि । चतूर्ष्वपि विधातव्या ध्वजा रामरथेपु हि ॥६८॥ हनुमत्कोविदागण्डवैष्णवाङ्किताः शुभाः । चतूर्ष्वपि बध्नीयाः पताकाः स्यदनेषु हि ॥६९॥ हरितश्वेतपीतन लक्षणाः पन्चतीमनाः । गङ्गपृष्ठे शश्वदार्थं हरिद्रार्गाङ्कितान्वरम् ॥७०॥


निर्माणमे निपुण दर्जी, रंगरेज इन्जन जल छानवाले शिल्पी तथा अन्यान्य नाना कर्मोमें कुशल, रस्सी बटने-वाले और मुद्रार चलानेवाले आदिको एकत्र बुलाकर वस्त्र आदिसे सत्कार करके प्रसन्न किया और आदरपूर्वक उनसे कहा- ॥ ५४ ॥ कल राम सीता से इस रम्य तीर्थयात्राके लिए जानेवाले हैं। सो तुम लोग उनके सम्पूर्ण मार्गको कंकड पत्थर बीनकर साफ-सुथरा कर दो। ५५। रास्तेकी ऊंची-नीची जमीन बराबर कर दो। मार्ग में रुकावट पडते हु वृक्षोंको काट डालो ॥ ५६ ॥ रास्तेकी बावड़ी, कूपों तथा तालावोंको साफ कर दो और निर्जन वनमें नये सैकड़ा तालाब कूप आदि खाद दो ॥ ५७ ॥ आधे आधे योजनपर सेनाके लिए शिविर बनाकर अच्छे जलसे परिपूर्ण कर दो ॥ ५८ ॥ सुन्दर दशा में सही करके भोजनलय और चूल्हे तयार करो, जगह जगह घास तथा घासके भण्डार लगा दो ॥ ५९ ॥ पक्के हुए लाल कपड़ास छाये हुए चित्र विचित्र उत्तम प्रचुरभोजन अन्न फल संचित करके रक्खा हो । ६० ॥ मध्यम स्थान स्थानपर कपड़ा लगा हुआ तम्बुओंमें आनन्द करनेके लिए दीवारोंपर रंग बिरंगे चित्र खीच दो तथा मनाविनोदके लिए बाह्य बाष्प पुष्पवाटिकाएं लगा दो । ६१ ॥ नर पुतलियोंके कंधेपर रक्खे हुए सूर्यांग समान अथवा आभान्तर शोभा के फूलों से गमलोंको सजाकर स्थान स्थानपर सैकड़ों हजारों वाटिकाएं तयार कर दो । ६२ ॥ पथ-पथपर गायकोंको गायनशालायें रख दो। सेनाके हर एक संनिवेशस्थानपर दान तथा धाममें पूर्ण अनेक अश्वशालायें और हस्तिशालाये तयार कर रक्खो, चन्दन तथा गुलाब आदिके सुगन्धित जल सब रास्तेमें छिड़कवा दो तथा चित्र-विचित्र झारोवाले रुपेहले तम्बू बनाकर जगह-जगह गाड़ दो और उनपर विविध रंगके पुष्पमालाएँ टांग दो। उनके चारों ओर बाजार लगा हो ॥ ६३-६५ ॥ तमाम हाथी घोड़े, ऊँट तथा रथोंको वस्त्र अलंकारसे अलंकृत करक तथा घण्टे आदि वाधकर सुसज्जित कर दो ॥ ६६ ॥ बैलगाड़ियोंमें ऊँटोंपर और रथ आदिपर धनुष-बाण, मुद्गर, शक्तियें, तोप अथवा बन्दूकें रख दो। ६७ ॥ छतोंके चौतरफा और दरवाजे आदिपर ध्वजाएं गाड़ तथा बांध दो। रामजीके चारों रथापर भी ध्वजाएं बांध दो । ६८ ॥ उन चारों स्यन्दनोंपर हनुमान्, कोविदार, गरुड़ और बाणके चिह्नोंवाली पताकाएं होनी चाहिये ॥ ६९ ॥ वे ध्वजाएं हरे,

१७४आनन्दरामायणं[ सर्गः ४

रुक्ममाणिक्यरचितं सितच्छत्रोपशोभितम् । स्थापनीयं महादिव्यं मुक्ताहारविराजितम् ॥७१॥
सीतार्थं करिणीपृष्ठे नीलवर्णं महासनम् । रुक्मविद्रुमरत्नौघैरत्नमुक्ताविराजितम् ॥७२॥
मुक्ताफलहेमतन्तुगणैराच्छादितं वरम् । सिद्धं कार्यं महादिव्यं स्वर्णकुंभविराजितम् ॥७३॥
पुष्पमालास्तोरणानि बध्नीयानि वै पथि । नृत्यंतु वारवेश्याश्च स्तुतिं कुर्वन्तु वन्दिनः ॥७४॥
द्रव्यैर्वस्त्रैराभरणैः पूजाद्रव्यैश्च गोरसैः । पात्रैर्नानाविधैर्दिव्यैः पूर्णार्थ्याश्चोत्तमाः ॥७५॥
अन्यच्चापि मया नोक्तं यद्यद्योग्यं हि तत्पथि । सिद्धं कार्यं हि योगेन येन तुष्यति राघवः ॥७६॥
इति संदिश्य मेधावी लक्ष्मणः सह मंत्रिभिः । साय सन्ध्यादिकं कर्तुं जगाम निजमन्दिरम् ॥७७॥
सौमित्रेराज्ञया तदपि तथा चक्रुर्यथोदिताः । संतुष्टास्ते यथायोग्यं रामसन्तोषहेतवे ॥७८॥
रामोऽपि सीतया सार्द्धं मन्दिरे रत्ननिर्मिते । मञ्चके पुष्पशय्यायां सीतामालिङ्ग्य वै दृढम् ॥७९॥
रुक्मनेपथ्ययुक्ताभिर्दासीभिश्च मुहुर्मुहुः । वीजितौ बालव्यजनैर्निशि सुप्तः सुखं तदा ॥८०॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे दूताज्ञाकरणं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


चतुर्थः सर्गः

( रामका सरयूके दो खण्ड करना )

रामदास उवाच
राज्ञः प्रातः समुत्थाय श्रुत्वा वाद्यध्वनिं तथा । गायनं वन्दिभिर्गीतं सीतया सह राघवः ॥ १ ॥
कृत्वा नित्यविधिं सर्वं दत्त्वा दानानि विस्तृतम् । ज्योतिर्विदं समाहूय गोपालाभिख्यमुत्तमम् ॥ २ ॥
नमस्कृत्याऽथ संपूज्य गणकं गद्यवीक्ष्य तम् । भो गोपाल महाबुद्धे त्वां पृच्छेऽहं द्विजोत्तम ॥ ३ ॥


पीले, श्वेत और नीले रंगकी सुन्दर बनी हों। रामचन्द्रजीके लिए हाथपर हरे रंगके मखमलको गद्दा-तकिया लगाकर उसपर मुक्ताके हार टांग देने चाहिये और सोना तथा माणिक्योंसे रचित बहुमूल्य, दिव्य, परम सुन्दर तथा श्वेत छत्र भी लगा देना चाहिए। ७०-७१ । हे दूतम! हथियाके पीठपर महारूप दिव्य सुवर्ण, विद्रुम (मूँगे), वैदूर्यमणि, रत्न मोती तथा गजमुक्ता लगा हुआ हरा जरीदार एवं बहुमूल्य अच्छा विछावर तैयार करो और उसके होदेपर बहुतसी छोटे २ स्वर्णके कलश भी लगा दो जिससे कि वह अधिक सुन्दर प्रतीत होने लगे ॥ ७२-७३ । रास्तेमे फूलोंकी मालाएं और तोरण बाँध दो। रण्डियां नाचन तथा बन्दीगण स्तुतिपाठ करने लग जायँ ॥ ७४ ॥ बहुतसे स्थान वस्त्र, आभूषण, दुग्ध, दही, पूजाके द्रव्य तथा अच्छे-अच्छे बरतन आदि भर लिये जायें ॥ ७५ ॥ जो कुछ मैंने न कहा हो, सो भी सब जरूरी सुविधाएं सुलभ रहना चाहिए। जिन्हे देखकर रामचन्द्रजी प्रसन्न हो जावें । हे बुद्धिमान् लक्ष्मणजी आज्ञा देकर सायंकालीन संध्या-वन्दन करनेके लिए मंत्रियोंके साथ सभामवनसे बाहर आकर अपने महलमें चले गये ॥ ७७ । लक्ष्मणकी आज्ञाके अनुसार कारीगर लोगोंने प्रसन्नतासे रामजीके गुणके लिये यथायोग्य सब सामान ठीक कर दिया । ७८ । उधर रामचन्द्रजी भी अपने रत्ननिर्मित भवनमे फूलोकी शय्यापर सीताजीको दृढ़ आलिङ्गन करके रात्रिको सुखपूर्वक सोये। सोनेकी जरीदार साडियाको पहिन दासियां बार-बार उनपर बालव्यजन ( पंखा ) डुलाने लगीं ॥ ७९-८० । इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे भाषाटीकायां दूताज्ञाकरणं नाम तृतीयः सर्गः । ३ ॥

रामदास बोले—प्रातः कालके समय वन्दियोंके गायन और बाजोंके मधुर शब्दको सुनकर सीतासहित राम जागे । १॥ तब नित्यकर्मसे निवृत्त होकर उन्होंने अनेक तरहके दान दिये और गोपाल नामके ज्योतिषीको बुलवाकर रामने नमस्कार तथा पूजा करके कहा-हे ब्राह्मणोंमे श्रेष्ठ और महाबुद्धिमान् गोपाल महाराज !

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७५

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७५

यात्रार्थे जाह्नवीतीरं गन्तुमिच्छामि भांश्वन् । अतो मुहूर्तं दातव्यं मय्यनुगृह्या विचिन्त्य च ॥४॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा गोपालः प्राह राघवम् । पञ्चाङ्गञ्च विस्तार्य तत्र दृष्ट्वा बलाबलम् ॥५॥ राम राजीवपत्राक्ष शृणुष्वाद्य वचो मम । रविवारे महाऽह्वेषुः पुष्यनक्षत्रमंडितः ॥६॥ तस्य वक्ष्ये फलं राजन् सावधानमनाः शृणु । शृण्वन्तु मुनयः सर्वं शृणोतु ते गुरुर्महान् ॥७॥ न योगयोगं न च लग्नलग्नं न तारकाचन्द्रबलं गुरोश्च । योगिन्य सम्मुखे तर्हि काले सर्वाणि कार्याणि करन्ति पुष्यः ॥८॥ अस्मिन्नाम सुसंस्त्रं प्रस्थानं कुरु मेधया । दत्तो मया मुहूर्तोऽय यात्रार्थे रघूनायक ॥९॥ इति तस्य वचः श्रुत्वालक्ष्मणं राघवोऽब्रवीत् । भेरीमृदङ्गपणवकाहलाऽऽनकगोमुखैः ॥१०॥ तालघण्टादृढैर्भीभिर्भेषिध नवभिर्महान् । सेनायाः सूचनाथै हि कर्त्तव्यः प्रथमो ध्वनिः ॥११॥ तथेति रामवचनाल्लक्ष्मणाज्ञापयनदा । नववाद्यध्वनिं तेऽपि चक्रुर्मङ्गलसुस्वरम् ॥१२॥ ततो रामो द्विजैर्युक्तो वासिष्ठेन पुरोधसा । घृतेन प्रभुर श्राद्ध गणेशदीन् प्रपूज्य च ॥१३॥ पचार प्रोक्तविधाना रमिष्ट प्राह वं ततः । अग्निहोत्राणि संड्वैश्व स्थापितानि तु पुष्यके ॥१४॥ नेतुमर्हसि मे मातॄर्वेशुभिः पुरवामिनः । विमान करिणंचा पुष्पामालाऽतिशोभिता ॥१५॥ मोतांगस्पर्शनां मार्गो मां स्पृशंतु गजैरथम् । ततः पप्रच्छ वैदेही केन यानेन मैथिलि ॥१६॥ गमिष्यसि वद त्वं मां तदवाज्ञापयान्यहम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता ध्यात्वा तण हृदि ॥१७॥ सा प्राह मुदिता राम करिण्या गमनं मम । रोचने यदि ते चित्ते सर्वमस्तु रघूनायक ॥१८॥ तस्या वचनं श्रुत्वा दानमाज्ञाप्य लक्ष्मणम् । सीतायै दिव्यवस्त्राणि ददौ मातॄस्तथैव च ॥१९॥


मैं आपसे एक प्रश्न पूछता हूँ ॥२।३॥ आज मैं तथा यात्रा करनेके लिए गंगाजीके तटपर जाना चाहता हूँ । अतः अब खूब विचारकर कोई अच्छा मुहूर्त बतलाइए । ४ । रामचन्द्रजीके प्रश्न सुनकर गोपाल पण्डितने पञ्चाङ्ग देख तथा ग्रहोंके बलाबलका विचार करके रामसे कहा- ५ । हे कमलदलके समान सुन्दर नयननेवाले राम ! आज प्रथम प्रहरमें पुष्यनक्षत्रमे युक्त बडा अच्छा मुहूर्त है ॥ ६ उसका फल में आपसे कहता हूँ । हे राजन् ! आप, सब मुनि लोग तथा आपके गुरु वसिष्ठजी भी उसको ध्यानसे सुनें । ७ । अच्छे योगसे युक्त न हो, फिर भी, अच्छे लग्नमें लग्न न होकर भी तारा चन्द्रमा और गुरुके बलसे शून्य होनेपर भी, शुभ योगिनीके अभावम भी तथा अनिष्टकारी राहुके संनिकट होनेपर भी केवल एक पुष्य नक्षत्रके रहनेमात्रसे ही यात्राके सब दृष्ट कार्य सिद्ध होजाते हैं । ८ । हे राम इस शुभ नक्षत्रम आप सीताके साथ प्रस्थान करें । हे रघुनायक ! यात्राके लिए मैंने यह अच्छा मुहूर्त बतलाया है । ९ । उनका यह वचन सुनकर रामजीने लक्ष्मणसे कहा- हे लक्ष्मण ! समस्त सेनाको सूचना देनेके लिए भेरी, मृदंग, पणव नगाडे ढोल सुदृही, घण्टा तथा दुन्दुभी ये नौ प्रकारके बाजे जोरसे बजाये जायें ॥ १०। ११ । 'बहुत अच्छा' कहकर रामकी आज्ञाके अनुसार लक्ष्मणने दुहाई बजानेवाले उनहोंने मधुर रीतिसे नवौं बाजे बजवाये ॥ १२ ॥ इसके बाद रामने ब्राह्मण तथा अपने पुरोहित वशिष्ठजीके साथ रहकर गणपतिपूजन किया और घीसे अधिवासन श्राद्ध करके वशिष्ठजीसे कहा कि मेरा वेदोक्त रीतिसे स्थापित कराई अग्नियोंको, माताओंको तथा श्रेष्ठ पुरवासियांको विमानपर चढ़ाकर आप चलें । यहन लोगोंसे अतिशय सुशोभित तथा सीताके अङ्गस्पर्शसे पवित्र होकर रथको मार्गमें मिलें । इसके उपरान्त रामने पूछा- हे मैथिलि ! तुम किस सवारीपर सवार होना पसन्द हो, उस सवारके लिए मैं आज्ञा दे दूँ । रामचन्द्रजीके इस वाक्यको सुनकर सीताजीने एक क्षण मनमें विचार किया ॥१३-१७॥ फिर प्रसन्न होकर रामसे कहा-हे रघुनायक ! यदि आप कहें तो मेरी इच्छा हथनीपर चलनेकी है। १८ । सीताके इस इच्छाको जानकर रामजीने लक्ष्मणको सीताके लिये श्रेष्ठ उपहार करवानेकी आज्ञा दी। पश्चात् रामने सीताको तथा अपनी माताओंको पहिननेके लिए

१७६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

तथा दत्त्वा बंधुपत्न्यादेभ्यो योषिद्भ्यो विशेषतः । ततो दत्त्वा वसिष्ठाय विप्रेभ्यश्च ततः परम् ॥२०॥ दत्त्वा वस्त्राणि बंधुभ्यः स्वयं नूतनमाददे । वस्त्रैश्च शस्त्राण्यनेकानि स्थापयित्वा विदेहजाम् ॥२१॥ नत्वा मातॄंस्तथा च सचिवैश्च परिवेष्टितः । आरुह्य शिविकां रामः सभां प्रति समाययौ ॥२२॥ ततः सिंहामने स्थित्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः । द्वितीयाः सूचनायै हि नववाद्यध्वनिः पुनः ॥२३॥ आज्ञाप्यतां त्वं सौमित्रे तच्छ्रुत्वा राघवौचनम् । आज्ञापयामास निन्युस्तदाऽऽज्ञामग्रतोऽग्रतः ॥२४॥ कर्तुं दूतजनैश्चापि बहुघोषं मेघोपमम् ततः । ततः प्राह रघूद्वहः पुनः सौमित्रिमागतम् ॥२५॥ सुमन्त्रः स्थाप्यतां पुर्यां रक्षणाय ममाज्ञया । गच्छत्वग्रे तु भरतः पश्चाच्छत्रुघ्न संज्ञकः ॥२६॥ तत्पृष्ठे त्वं समागच्छ ततः सीताऽनुगच्छतु । तस्याः पृष्ठे च त्वत्पत्नी सुमित्रा मात्रनुगच्छतु ॥२७॥ तत्पृष्ठे मांडवी रम्या कौसल्या भरतस्य मा । अनुगच्छतु तत्पृष्ठे श्रुतकीर्त्त्यनुगच्छतु ॥२८॥ शत्रुघ्नस्य प्रिया भार्या विमानैः पूर्वशोभितैः । मातृभिस्ताः समायांतु पश्यन्त्यः कौतुकं मुदा ॥२९॥ सीताद्याः करिणीष्वेवं स्थापयित्वा ममाज्ञया। आगच्छ त्वं मया सार्द्धं ततोऽहं गजमाश्वये ॥३०॥ तथेति रामवचनात्तथा ताः करिणीषु सः । आरोहयित्वा श्रीगमं समागच्छल्लक्ष्मणस्त्वितः ॥३१॥ समागते लक्ष्मणे तु दृष्ट्वा रामो महामनाः । सुमन्त्राय ददौ वस्त्रं तद्रक्षार्थं पुरीं व्यधात् ॥३२॥ ततो मुहूर्तसमये धृत्वा लक्ष्मणमत्करम् । महामनामभूत्तीयं महानागान्तिकं ययौ ॥३३॥ गजं प्रदक्षिणं कृत्वा सोपानैन स राघवः । गजदन्ताङ्कवेनाऽऽरोह नागं शुभे शनैः ॥३४॥ तदा दुन्दुभिनिर्घोषम् नववाद्यस्यानु चगान् । वादद्यामासुरुद्वेगात् राजदूताः सहस्रशः ॥३५॥ बभूवुर्यन्त्रशब्दाश्च ननृतुर्वारयोषितः । वादयन्ति स्म वाद्यानि गजवाजिस्थायिनः ॥३६॥ जयशब्दान् वेदघोषान् द्विजाश्चक्रुर्महास्वनेः । केऽपि पिच्छोद्धृतं चित्रं रत्नदण्डविराजितम् ॥३७॥

दिव्य वस्त्र दिये ।२०। अपने भाइयोंका, उनका स्त्रियोंको और गृहदासीयोंको सुन्दर वस्त्र दिये, उनके बाद गुरु-वसिष्ठजीको और ब्राह्मणोंको तथा अपने बन्धुओंको नये कपडे देकर स्वयं रामने भी नूतन वस्त्र पहना, अनेक प्रकारके शस्त्र भी बाँध लिये और सीताको शृंगार करनेके लिए कहा ॥ २० ॥ २१ ॥ तदनन्तर रामजी गुरु तथा माताओंको नमस्कार कर तथा मन्त्रिगणोंके साथ २ पालकीपर सवार होकर सभाभवन (कचहरी) गये ॥ २२ ॥ वहाँ सिंहासनपर आरूढ होकर रामने लक्ष्मणसे कहा कि दूसरी सूचना देनेके लिए पुनः नौ प्रकारके बाजे बजानेकी आज्ञा दे दो । लक्ष्मणने 'जो आज्ञा' कहकर दूतोंको उत्तम रीतिसे बाजे बजवानेकी आज्ञा दी । आदेश पाते ही उन दूतोंने मेघघटाके समान बाजाका निनाद किया । इसके उपरान्त रामने पुनः लक्ष्मणसे कहा—॥२३-२५॥ हे भाई ! मेरी आज्ञाके अनुसार तुम यहीं नगरकी रक्षा करनेके लिए सुमन्त्रको छोड़ दो । आगे भरत और उनके पीछे शत्रुघ्न चलें तथा मेरे पीछे तुम चलो । तुम्हारे पीछे सीता और सीताके पीछे तुम्हारी स्त्री उर्मिला चले ॥ २६ । २७ ॥ उनके पीछे भरतकी प्राणप्रिया सुन्दरी मांडवी और माण्डवीके पीछे शत्रुघ्नके प्रिया भार्या श्रुतकीर्ति चले ॥ २८ । नगरकी स्त्रियोंके साथ माताएँ विमान-पर सवार होकर आनन्दसे सभागोष्ठ देखती हुई आवें ॥ २९ । तुम जाकर सीता आदि सब स्त्रियोंको हथिनियोंपर चढ़ा आओ। उसके बाद मैं गजपर सवार होऊँगा ॥३०॥ सो सुनकर लक्ष्मण तुरन्त चल दिये और उन सबकी हथिनियोंपर सवार कराकर शीघ्र ही रामके पास लौट आये ॥ ३१ ॥ लक्ष्मणके आ जानेपर मतिमान् रामने मन्त्री सुमन्त्रको पारितोषकरूप वस्त्र दिये तथा रक्षाके लिये नगर सौंप दिया ॥ ३२ । उसके बाद शुभ मुहूर्तमें लक्ष्मणके सुन्दर हाथोंको पकड़कर राम सिंहासनसे उठ और उत्तम हाथीके पास गये ॥ ३३ ॥ हाथीकी प्रदक्षिणा करके राम मयूरपङ्खकी बनी हुई सीढ़ीपर पांव रखकर सुखपूर्वक धारसे उसपर सवार हो गये ॥३४॥ उस समय हजारों राजसेवक सुन्दर एवं गम्भीर शब्द करनेवाले दुन्दुभि आदि नवविध वाद्योंको बजाने लगे ॥ ३५ । वहाँपर अनेक प्रकारके शब्द होने लगे, वेश्याएं नाचने लगीं और हाथी तथा घोड़ोंपर नाना प्रकारके बाजे बजाये जाने लगे । ३६ ॥ विप्रलोग उच्च स्वरसे जयजयकार और वेदध्वनि करने लगे। एक

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७७

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७७

चामरं वीजयामास विजयः पार्श्वमस्थितः । अन्यस्तु बालव्यजनं वीजयामास पृष्ठतः ॥३८॥ कस्तूरैः क्षतसारैश्चैर्मुक्ताहारैस्तु शोभितम् । रत्नदण्डं सुविस्तीर्णं छत्रमन्यो दधार तम् ॥३९॥ हस्त्युद्वहं गजमारुह्य लक्ष्मणः शीघ्रमाययौ । सीताद्यास्ताः समाजग्मुः सौमित्रिगजपृष्ठतः ॥४०॥ पश्यन्त्यः कौतुकान्येव जलन्ध्रैः समंततः । पुष्पकं चापि गगनमार्गेणैव शनैः शनैः ॥४१॥ अमात्य संस्थितास्तत्र पुरनार्यो रघूत्तमम् । पश्यन्त्योऽथ कौतुकानि दवदुः पुष्पवृष्टिभिः ॥४२॥ ततस्ते तुरगारूढा गजारूढा रथे स्थिताः । नेमिरेस्योपमाः सर्वे स्थितान्ते रामपार्श्वयोः ॥४३॥ बाहुः प्रणामान् श्रीरामं संस्थिता हारवत्तवत् । रामोऽपि कंडहस्ताभ्यां प्रणामानन्ववन्दयत् ॥४४॥ एवं गच्छति राजेन्द्रे राघवेन्द्रे शनैः पथि । गजोपरि सर्वाणास्ते नटा गाने प्रचक्रिरे ॥४५॥ एवं पश्यन् स रामोऽपि पुष्पागमदिकौतुकम् । दृष्ट्व चित्राणि वेश्यानां नृत्यानि विविधानि च॥४६॥ सुस्वराण्यथ वाद्यानि शृण्वन् मार्गे शनैः शनैः । वेष्टितश्चतुरंगिण्या सेनया स समंततः ॥४७॥ प्राप सेनानिवासाय कल्पितां शयनूत्तमाम् । अयोध्यामिव तां दृष्ट्वाऽवतरद्राघवो गजात् ॥४८॥ अभिनंद्य प्रणामंश्च पुनर्वारकृतान् मुहुः । लक्ष्मणस्य करं धृत्वा स्वकक्षां समापविः ॥४९॥ स्त्यनेहं संप्रविश्य तस्यां सिंहासनने पुनः । सीताह्यास्ताः स्त्रियः सर्वा विविशुश्चस्वगणानि ।५०।। ततः श्रीरामचन्द्रोऽपि लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । सांतायाः क्रोशमात्रेऽथ ह्यनृतान् पृथक्पृथक् ॥५१॥ एकैकस्यां दिशि त्वं मे वचनात्स्थापयस्व भोः । योजनोपरि सौमित्रि त्वंहादेतु समंततः ।५२।। नियोजयस्व शतशो वाजिवाहान् समाज्ञया । तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपि तथा सर्वं चकार सः ॥५३॥ स्तो विप्रैः सुहृद्भिश्च विविधाम्नर्मनोरथैः । घृतेन श्राद्धदानेन भोजनं राघवो व्यधात् ॥५४॥


और खड़ा होकर विजय रत्नजड़ित दण्डवाला तथा मयूरपंखसे निर्मित चमर लेकर रामके आगे स्थान ... पीछेकी ओर दूसरा जयनामक सेवक पखा करने लगा ॥ ३८ ॥ तीसरा सेवक मरुजंकक्षसे सुलिखित, हजारों मुक्तागम्जाओंसे मण्डित तथा रत्नजड़ित डण्डेवाला सुविशाल छत्र तानकर खड़ा हो गया ॥ ३९ ॥ उनके पीछे हाथीपर सवार होकर लक्ष्मण शीघ्रतासे चल दिये। लक्ष्मणके हाथीके पीछे सीता आदि स्त्रियें जालिदोंमेंसे सारी ओरके दृश्योंको देखती हुई चलीं। पुष्पकविमान भी धीरे-धीरे आकाशमार्गमे उड़ता हुआ चला ॥ ४० ॥ ४१ ॥ उसपर बैठी नगरनिवासिनी स्त्रियें कौतुक देखती हुई रामचन्द्रजीके ऊपर आनन्दसे पुष्पवृष्टि करने लगी ॥ ४२ ॥ तदनन्तर घुड़सवार, गजसवार और रथसवार सैनिक रामके दोनो ओर पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो गये ॥ ४३ ॥ हारकी तरह कतारबद्ध खरे उन सैनिकोंने रामको प्रणाम किया। रामने भी अपने करकमलोंसे उनके प्रणामोंको स्वीकार किया । ४४ ॥ जब इस प्रकार श्रीराम राजेन्द्रपर सवार होकर धीरे धीरे चले, तब दूसरे गजोंपर बैठे हुए गायकगण अपनी-अपनी वीणा लेकर मधुर गान करने लगे ॥ ४५ ॥ रामचन्द्रजी रास्तेमें फुल्लाके महावन बागोंका दृश्य, अनेक तरहके बाजारोंका अवलोकन करते, वेश्याओंके विविध नृत्योंके देखने, मनको हरण करनेवाले बाजोंको सुनते, सम्बन्ध्य कौतुकोंको निहारते तथा चारों ओर चतुरङ्गिणी सेनासे घिरे हुए धीरे धीरे सेनानिवासके लिए कल्पित उत्तम शिविरमें आ पहुँचा। उस स्थानको दूसरी अयोध्याके समान सुरक्षित देखकर राम हाथीसे उतर पड़े। ४६-४८॥ उस समय स्त्री संनिवाके द्वारा बारम्बार किये हुए प्रणामोंको स्वीकार करके अपने हाथमे लक्ष्मणका हाथ पकड़कर रमापति राम तम्बूमें गये और वहाँ सिंहासनपर विराजमान हो गये। सीता आदि स्त्रियें भी अपनी-अपनी सवारियोसे उतरकर तम्बुओंमें जा विराजीं ॥ ४९ ॥ ५० ॥ पश्चात् श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा कि तुम मेरे आज्ञानुसार सीमाकी सब दिशाओंमें एक-एक कोसकी दूरीपर सैकड़ों सिपाही अलग अलग खड़े कर दो और बाकी दिशाओमे एक-एक योजनकी दूरीपर सैकड़ों घुड़सवार नियुक्त कर दो। "जो आज्ञा" कहकर लक्ष्मणने सब वैसा ही प्रबन्ध कर दिया ॥ ५१-५३ ॥ पश्चात् ब्राह्मणों

१७८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

ताम्बूलं दक्षिणां दत्त्वा नानाविधंन्नृप आदरात् । मुखशुद्धिं स्वयं कृत्वा तस्थौ सिंहासने पुनः ॥५४॥ श्रुत्वा शास्त्रपुराणानि वेदान्तांश्चापि सादरम् । सायंसन्ध्यादिकं कृत्वा कृत्वा होमं यथाविधि ॥५५॥ सिंहासने समासीनो वेश्यानां नृत्यमुत्तमम् । पश्यन् शृण्वन् गायनं च नीत्वा यामद्वयं निशाम् ५७ ततः सुष्वाप पर्यङ्के सीतया सह राघवः । द्वितीय दिवसे तत्र स्थित्वा रमान्नु कौतुकैः ॥५८॥ नीत्वा समग्रं सुदिनं तृतीये दिवसे पुनः । पूर्ववद्ब्राह्मणोयाद्यैः शनैः स्थानान्तरं ययौ । ५९॥ क्वचिद्दिनमतिक्रम्य क्वचिद्द्वे त्रीणि राघवः । स्थित्वा पश्यन्कौतुकानि प्रीणन् जनकात्मजाम्६०॥ शनैः शनैर्ययौ मार्गं मासेनैकेन राघवः । प्राप जीर्णं मुद्रलेन त्यक्तमाश्रममुत्तमम् । ६१। राममागतमाज्ञाय मुद्गलो नूतनाश्रमात् । भागीरथ्या दक्षिणतः प्राप रामांतिकं तदा । ६२.। तं दृष्ट्वा राघवश्चापि नत्वा सम्पूज्य सादरम् । रामोगेहे समारोप्य पप्रच्छ विनयान्मुनिम् । ६३॥ त्वयाऽयमाश्रमस्त्यक्तः किमर्थं मुनिसत्तम । तत्त्वं वद महाभाग यथावच्च मयिस्तरम् ॥६४॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा मुद्गलो वाक्यमब्रवीत् । अद्य धन्योऽस्म्यहं राम निवृत्तं वनवासतः । ६५। यत्त्वां पश्यामि नेत्राभ्यां चिरकालेन राघव । भरतप्राणरक्षार्थं यदा नीता मदाश्रमात् ॥६६॥ दिव्यौषध्यस्तदा जातं पूर्वं ते दर्शनं मम । मयाऽयमाश्रमन्त्यक्तः किमर्थं तद्व्रवीमि ते ॥६७॥ सान्निध्य नात्र गङ्गायाः सरय्वा अपि नात्र वै । इति मत्वा मया त्यक्तश्चाश्रमोऽयं महत्तमः ॥६८॥ अत्र सिद्धिं गताः पूर्वे शतशोऽथ सहस्रशः । मुनीश्वरा मयाप्यत्र तपस्तप्तं कियदिमम् ॥६९॥ इति राम मयाख्यातमाश्रमस्य च मोचने । कारणं च त्वया पृष्टं किमग्रे श्रोतुमिच्छसि । ७०॥

तथा मित्रोंके साथ बैठकर रामने घृतमिश्रित नाना प्रकारक स्वादिष्ट पकवानोंका भोजन किया । ५४॥ आदरस ब्राह्मणोंको ताम्बूल तथा अनेक प्रकारकी दक्षिणार देकर रामने मुखशुद्धिक लिए ताम्बूल खाया और पुनः सिंहासनपर आ विराज । ५५॥ तदनन्तर वेदान्त आदि सत् शास्त्रों तथा पुराणोंकी कथाको प्रेम और श्रद्धासे शान्तिपूर्वक सुना । सायंकाल होनेपर पुन यथाविधि संध्यावंदन तथा हवन आदिस निवृत्त होकर सिंहासनपर आ सुशोभित हुए । वहां रात्रिके दो पहर तक वेश्याओंका नृत्य-गान देखत सुनते रहे ॥ ५६ ॥ ५७॥ तदनन्तर राम सीताके साथ पलंगपर शयन करनेको चले गये दूसरा भी सारा दिन रामने आनन्दसे वही रहकर विताया तीसरे दिन मानन्द ब्राह्मणोंके साथ धीरेधीरे दूसरे पडावकी ओर बड़े ॥ ५८ । ५९ ॥ इसी प्रकार कहीं एक दिन, कहीं दो और कहीं तीन दिन तक निवास करत हुए गम जानकी को प्रसन्न करने तथा विविध कौतुकोंको देखते रहे ॥ ६० । इस प्रकार एक मास चीत जानेपर वे मुद्गल ऋषिके छोड़ हुए एक पुराने तथा पवित्र आश्रमम जा पहुँचे ॥ ६१ ॥ रामको अपने पुराने आश्रमपर आये सुनकर मुद्गलऋषि भागीरथीके दक्षिण तटपर स्थित अपने नवीन आश्रमसे दर्शन करनेके लिए उनके पास आये ॥ ६२ ॥ राघवने उन्हें देखकर नमस्कार किया और उनकी विधिवत् पूजा की। पश्चात् ताम्बूल देकर आदरपूर्वक आसनपर बैठाया और उनसे नम्रतापूर्वक कहा- । ६३॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! आपने इस आश्रमको क्यों छोड़ दिया ? हे महाभाग इसका कारण विस्तारसे आप हम कह सुन इयं । ६४॥ यह सुनकर मुद्गल्मुनि कहने लगे- हे राम ! मेरा धन्य भाग्य है कि जो मैं आज बहुत दिनां बाद वनवाससे लौट हुए आपको अपनी आंखों देख रहा हूँ । पूर्वकालमें भरतके प्राणोंकी रक्षा करनेके लिए जब आप मेरे आश्रमम दिव्य औषधि ले गये थे, तब मुझे आपका दर्शन मिला था । अब मैने इस आश्रमको क्यों छोड़ दिया, इसका कारण आपसे कहता हूँ । ६५-६७॥ हे प्रभो ! मैनें इस विशाल आश्रमका केवल इसलिए छोड़ दिया है कि यहाँपर गंगा अथवा सरयू इन दोनों पवित्र नदियोंमेसे कोई भी नदी नहीं है ॥ ६८॥ इस आश्रमम निवास करके हजारों मुनीश्वरोंने सिद्धि प्राप्त की है और मैंने भी कुछ दिनों तक यहाँ रहकर तपस्या की है । परन्तु क्या करें, किसी तीर्थके न होनेसे इस स्थानपर बड़ा कष्ट है ॥ ६९॥ हे राम ! यह तो मैंने आपके पूछनेके अनुसार इस आश्रमको छोड़नेका कारण कह

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १०९


तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा पुनस्तं प्राह राघवः । किं कृत्वा मेऽत्र वसतिर्भविष्यति मुने वद ॥७१॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा राघवं प्राह मुद्गलः यद्यत्र सरयूगङ्गाः संगमो हि भविष्यति ॥७२॥
जाह्नव्या सदृशं चात्रं वन्द्ये राम यथार्जुनम् तत्तस्य वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तं पुनः ॥७३॥
किमर्थं सरयूः श्रेष्ठा कुतः प्राप्ता धरातलम् तन्मे वद महाभाग सविस्तारं मयाग्रतः ॥७४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा मुद्गलो वाक्यमब्रवीत् । तवैव चरितं राम सन्मुखाच्छ्रोतुमिच्छसि ॥७५॥
तर्हि ते संप्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व रघूत्तम । शङ्खासुरो महादैत्यो वेदान् पूर्वं जहार हि ॥७६॥
क्षिप्त्वा तांश्च समुद्रे हि स्वयमासीन्महोदधौ । तदर्थं च त्वया मात्स्यं वपुर्धृत्वा महत्प्रभु ॥७७॥
हतः शंखासुरो वेदास्त्वया दत्तास्तु वेधसे । ततो हर्षेण महता पूर्वरूपं त्वया धृतम् ॥७८॥
तदा हर्षेण नेत्रात्ते पतिताश्चाश्रुबिन्दवः । हिमालये ततो जाता नदी पुण्या शुभोदका ॥७९॥
साक्षान्नारायणस्येवेह आनन्दाश्रुसमुद्भवा । उर्वी तैर्विन्दुसारः प्राप्तं तस्माच्च मानसं ययौ ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे राम पूर्वजन्मे महत्तमः । वैवस्वतो मनुर्यष्टुमुद्युक्तो गुरुमब्रवीत् ॥८१॥
अनादिमिद्धाऽयोध्धेयं विशेषेणापि वै मया रचिता निजवासार्थमत्र यज्ञं करोम्यहम् ॥८२॥
यदि ते रोचते चित्ते तच्छ्रुत्वा गुरुरब्रवीत् अत्र तीर्थं वरं नास्ति नास्ति श्रेष्ठा महानदी ॥८३॥
यद्यत्रेवास्ति ते रुच्यं यष्टुं नृपतिसत्तम । आनयस्व नदीं रम्यां मानसात्पातकापहाम् ॥८४॥
तद्गुरोर्वचनाद्राजा मनुर्वैवस्वतो महान् । टणकृत्य महच्चापं सन्दधे शरमुत्तमम् ॥८५॥
स शरो मानसं भित्त्वा तस्मान्निष्काश्य तां नदीम् । अयोध्याम्यानयामास पन्थानं दर्शयन्निव ॥८६॥
शरमार्गानुसारेणायोध्यायां प्राप वै नदी महोदधौ पूर्वदेशे मिलिता रघुनन्दन ॥८७॥


भूताया। आगे क्या करना है, सो कहिये ॥ ७० ॥ मुनिके इस वाक्यको सुनकर रामने कहा— हे मुने अब यह बताइये कि क्या करनेसे आप फिर इस आश्रममें निवास कर सकते हैं? ॥ ७१ ॥ रामके प्रेमपूर्ण वचनको सुनकर मुद्गल ऋषि बोले— यदि यहाँपर सरयू और गंगाका संगम हो जाय तो मैं बड़े सुखसे रह सकता हूँ। इस बातको सुनकर रामने पुनः उनसे प्रश्न किया— ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ हे महाभाग ! सरयू नदीका इतना श्रेष्ठ माहात्म्य क्यों है और वह कहाँसे धरातलपर आयी है ? इन बातोंका विस्तारसे वर्णन करिए ॥ ७४ ॥ मुद्गलने कहा हे प्रभो ! आप अपना ही चरित्र यदि मेरे मुखसे सुनना चाहते हैं ॥ ७५ ॥ तो हे रघूत्तम ! मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिए पवित्र कथा शंखासुर नामका एक बड़ा भारी राक्षस हुआ था। वह सब वेदोंको हर ले गया ॥ ७६ ॥ उसने समुद्रमें जाकर समुद्रमं डुबो दिया तथा स्वयं भी उसी महासागरमे छिप गया उसको मारनेके लिए आपने बड़े भारी मत्स्यका रूप धारण किया ॥ ७७ ॥ और उसको मारकर वेदोंकी रक्षा की। वेदोंको लाकर आपने ब्रह्माको दिया और प्रसन्नतापूर्वक पुन अपना पूर्वरूप धारण कर लिया ॥ ७८ ॥ उस समय आपके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुकी बूंदे टपक पड़ीं। हिमालयपर गिरी हुई आप नारायणके उन हर्षाश्रुकी बूंदोंने एक पवित्र तथा निर्मल जलवाला नदीका रूप धारण कर लिया। आगे चलकर वे कासार और कासारसे मानसरोवरके रूपमें परिणत हो गयी ॥ ७९ ॥ ८० ॥ हे राम ! उसी समय आपके पूर्वज महात्मा वैवस्वत मनुने यज्ञ करनेकी इच्छा करके अपने गुरुसे कहा— ॥ ८१ ॥ इस अयोध्यापुरीके अनादिकालसे स्थित रहनेपर भी मैंने अपने निवासके लिए इसकी कुछ विशेषतापूर्वक रचना करवायी है। इस कारण यदि आप कहें तो मैं इस नगरीमे यज्ञ करूँ। तब गुरुने कहा कि रुशिए, न तो यहाँ कोई पवित्र तीर्थ है और न कोई बड़ी नदी ही है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ इसलिये यदि आपकी यहीं यज्ञ करनेकी इच्छा हो तो हे नृपतियोंमें श्रेष्ठ नृप ! मानसरोवरसे सुन्दर तथा पापोंको नष्ट करनेवाली एक नदीको यहाँ ले आइए ॥ ८४ ॥ गुरुके इस वचनको सुनकर महान् राजा वैवस्वत मनुने अपने विशाल धनुषका बड़ा तथा टंकोर करके बाण चलाया ॥ ८५ ॥ वह बाण मानसरोवरको भेदकर उसमेंसे निकली नदीके आगे-आगे चलकर रास्ता दिखाते हुए अयोध्या ले आया। बाणके मार्गका अनुसरण करती हुई वह नदी अयोध्या आयी तथा वहाँसे आगे जाकर पूर्वी महा-

१८०आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

आनीता सा शरैरेव सरयूरिति कथ्यते । सरोवरात्समुद्भूता सरयूरिति केचन ॥८८॥
ततो भगीरथेनेयं कपिलक्रोधवह्निना । विनिर्दग्धान् पूर्वजान् वै सागरात् प्रेषितुं दिवम् ॥८९॥
भागीरथी समानीता त्वत्पादाब्जसमुद्भवा । तपसा शङ्करं तोष्य सरय्वा मिलिताऽथ सा ॥९०॥
वरदानाच्छंभोर्गङ्गा ख्यातिं गमिष्यति । अग्रे सागरपर्यन्तमेनां गङ्गां वदन्ति हि ॥९१॥
तव पादसमुद्भूता या विश्वं पाति जाह्नवी । इयं तु नेत्रसंभूता किमत्राग्रे वदाम्यहम् ॥९२॥
कोटिवर्षसहस्रैश्च कोटिवर्षशतैरपि । महिमा सरयूनद्याः कोऽपि वक्तुं न वै क्षमः ॥९३॥
इति राम समाख्यातं यथा पृष्टं त्वया मम । मुनेस्तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः ॥९४॥
सरयूमानयस्वात्र शरं मुक्त्वा ममाज्ञया । तथेति रामवचनाद्गत्वा चापं स लक्ष्मणः ॥९५॥
शरं मुक्त्वा तटं भित्त्वा सरयूमानयन्क्षणात् । सरयू सा द्विधा भूत्वा मुद्गलाश्रममाययौ ॥९६॥
जाह्नव्या मिलिता सावेक्षां दृष्ट्वा राघवोऽब्रवीत् । अत्र स्थित्वा लक्ष्मणेन दारितेयं महानदी ॥९७॥
अतो ददरीति नाम्नाऽत्र नगरी ख्यातिमेष्यति । ददरीयं जगतीमध्ये बदर्याश्च यथाधिका । ९८॥
भविष्यति न संदेहस्त्वत्र रामाग्निसेवनात् । ततः सीतां समाहूय राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥९९॥
मुद्गल्याश्रम एवैषा नीता सरयूनदी । पश्य सौमित्रिणा मुक्त्वा शरं मन्नामचिह्नितम् ॥ १००॥
नारीभिर्मातृभिः सार्धं पुण्यकेनाभिभाष्यता । दृष्ट्वा मां सरयुर्यत्र संगताऽस्ति महानदी ॥१०१॥
जाह्नव्या संगमे स्वं दिगच्छस्व गुरुणा द्विजैः । पूरयित्वा सविस्तारं यथोक्तं वचनं पुरा ॥१०२॥
आगच्छस्व ततः शीघ्रमुत्र त्वं मम सन्निधौ । विशेषान्मुद्गलस्यापि सन्निधावथ वै पुनः ॥१०३॥
नवीनसरयूनद्या भागीरथ्यास्तु संगमे । पूजनं त्वं मया साकं कर्तुमर्हसि मैथिलि ॥१०४॥


सागरम मिल गयीं ॥८८॥८९॥ शरके द्वारा लायी आनम लोग उसको सरयू नदी कहने लगे । अथवा सरोवरसे निकलकर आनेके कारण उसका 'सरयू' नाम पडा, कुछ लागोंका ऐसा कथन है ॥ ८८ ॥ उसके बाद राजा भगीरथ कपिल मुनिका कोपामिसम अगाये गय अपन पूर्वज सगर पुत्रोंको स्वर्ग भेजनेकी इच्छासे आपके चरणारविन्दसे प्रादुर्भूत भागीरथी गङ्गाको ले आये । बादम शङ्करजीको तपसे प्रसन्न करके उस नदीको सरयूसे ला मिलाया । ८९ ॥९०। शङ्करभगवान्के वरदानस गंगाको बडी भारी प्रसिद्धि हुई तथा समुद्र तक उसको लोग गंगा कहन लगे ॥ ९१ ॥ हे प्रभो आपके चरणकमलोंसे निकली हुई गया समस्त विश्वको पवित्र करने लगी। वैसे ही आपके नेत्रजलसे उत्पन्न होकर यह सरयू भी लोगोंको पावन करने लगी । हे भगवन् ! अब मैं आगे क्या कहूँ ? ॥ ९२ ॥ करोड़ों वर्षोंमें भी इस सरयू नदीकी महिमाका वर्णन कोई नहीं कर सकता ॥ ९३ ॥ हे राम ! आपने जो पूछा था, सो मैंने कह सुनाया । मुनिके इस वाक्यको सुनकर रघुपति रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे कहा- ॥ ९४ ॥ तुम बाण छोड़ तथा सरयूके तटको भेदन करके उसे यहाँ ले आओ । लक्ष्मणने वैसा ही किया और वह सरयू दो भागोंमें विभक्त होकर क्षणभरमें मुद्गलऋषिके प्राचीन आश्रमम आ पहुंची ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ उसको अकेली ही नहीं, किन्तु जाह्नवीके समम सहित आयी हुई देखकर रामने कहा कि लक्ष्मण दारण (चीर) करके इस नदीको यहाँ ले आये हैं ॥ ९७॥ इसलिए इस जगहपर दरी नामकी प्रसिद्ध नगरी बसेगी । वह दरी नगरी पृथ्वीतलमें बदरीनाथ धामम भी जीधर बढ़कर पुनीत होगी ॥ ९८ ॥ इसमें संदेह नहीं है । विशेष करके आपके यहाँ निवास करनेसे इसकी और भी अधिक ख्याति होगी । पश्चात् रामने सीताको बुलाकर कहा-॥६९॥ सीते ! देखो, सुमित्रापुत्र लक्ष्मण मेरे नामसे चिह्नित बाण छोड़कर सरयू नदीको यहाँ मुद्गल मुनिके आश्रमम ले आये हैं ॥ १०० ॥ अब तुम हमारी माताओं, अन्य स्त्रियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंके साथ स तथा इस पुण्यक विमानपर स्वार होकर जहाँ सरयू तथा गंगाका संगम है, वहाँ जाओ और अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार विधिवत् उनकी पूजा कर आओ ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ वहाँसे लौटकर शीघ्र ही मेर हवा इन मुद्गल मुनिके सम्मुख इस नवीन सरयू तथा भगवती भागीरथीके संगमका

सर्गः ५] यात्राकाण्डम् १८१


तथेति रामवचनमङ्गीकृत्य विदेहजा । पूजासंभारमादाय विवेश स्वान्तर्गृहम् ॥ १०६ ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे सरयूशुद्धिकरणं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

(कुम्भोदरोपाख्यान)

श्रीरामदास उवाच

ततो गृहीत्वा सम्भारान् पूजार्थं जानकी जवात् । कौसल्यादिश्च श्वश्रूभिस्तु पुष्पकं चारुरोह सा ॥ १ ॥
क्षणेन शुद्धा सरयूर्यत्र सा गङ्गया शुभा । सङ्गताऽस्ति महाश्रेष्ठा तत्र प्राप विदेहजा ॥ २ ॥
पतिं विनाऽन्विन्ना नारी सीमामुल्लङ्घ्य न व्रजेत् । स दोषोऽत्र न विज्ञेयः सीतायाश्च विहायसा ॥ ३ ॥
उत्तीर्य सा विमानाग्र्यान्नमस्कृत्याऽथ सङ्गमम् । पुरोधसा चोदिता सा नारिकेलं सवायनम् ॥ ४ ॥
भागीरथ्यै समर्प्याथ स्नात्वा चैव यथाविधि । सङ्गमं पूजयामास चोपस्कारैर्यथाविधि ॥ ५ ॥
सुरामांसोपहारैश्च पक्वान्नैर्बलिभिस्तथा । पट्टकूलादिभिर्वस्त्रैर्मुक्तहारैः सचन्दनैः ॥ ६ ॥
दिव्यैराभरणैश्चित्रैर्वायनाद्यैः सविस्तरम् । ततः सुवासिनीः पूज्य पूजयित्वा त्वरुन्धतीम् ॥ ७ ॥
वसिष्ठं ब्राह्मणांश्चापि भोजयामास विस्तरैः । पट्टकूलादिभिर्वस्त्रैर्दिव्याभरणादिभिः ॥ ८ ॥
सुवासिनीर्ब्राह्मणांश्च तोषयामास मैथिली । स्वयं कृत्वोपहारं न राघवार्यमथोषिता ॥ ९ ॥
ययौ यानेन शीघ्रं सा राघवस्यान्तिकं मुदा । ततः श्रीरामचन्द्रोऽपि सीतया गुरुणा द्विजैः ॥ १० ॥
गङ्गयोः सङ्गमे चक्रे पूजनं स यथाविधि । यथा कृतं च वैदेह्या तस्माच्चापि शताधिकम् ॥ ११ ॥
ततः सहस्रशो विप्रान् भोजयामास सादरम् । दत्त्वा दानान्यनेकानि गोहस्तिरथवाजिनाम् ॥ १२ ॥
ततो भुक्त्वा स्वयं रामः सीतया बन्धुभिर्जनैः । सिंहासने समासीनो सौमित्रिमिदमब्रवीत् ॥ १३ ॥


मेरे साथ मिलकर पूजन करो । १०३ ।। १०४ ।। तब विदेहराजकी पुत्री सीता "जो आज्ञा" कहकर पूजाकी सामग्रियें लेनेको संभ्रम गयी ॥ १०५ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे आकाशांकायां शरयूद्धिकरणं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

श्रीरामदासजीने कहा—बादमें बालकी पूजाका सब सामान लेकर कौसल्या आदि सासुओ तथा अन्य बहुओंके साथ शीघ्रतासे पुष्पक विमानपर जा बैठीं ॥ १ ॥ क्षण भरमें विदेहराजकी पुत्री सीता उस पुराने सङ्गमपर जा पहुँचीं, जहाँपर कि सरयू पवित्र गङ्गा नदीस मिली हैं ॥ २ ॥ पत्नीको पतिके बिना आगेकी सीमा नहीं लांघनी चाहिये । यह दोष यहाँ सीताको नहीं लग सकता । क्योंकि सीताका गमन आकाशमार्गस हुआ था । ३ ॥ वहाँ पहुँचनेपर सीता विमानसे नीचे उतरीं और सङ्गमका नमस्कार किया । पश्चात् पुरोहितके कथनानुसार सीताने वायन (ऐपन) सहित नारियल भागीरथीको समर्पण करके उसमें विधिवत् स्नान किया। फिर सुरा मांस-पक्वान आदिका बलिसे दुपट्टा आदि सुन्दर वस्त्रोंसे, दिव्य आभूषणोंसे, मुक्ताके हारसे, चन्दनसे तथा डायन आदिकी पूजाके उपकरणोंसे विधिवत् तथा विस्तारपूर्वक सीताने संगमका पूजन किया । तदनन्तर पतिनुमन्ती सोहागिन स्त्रियोंको पूजा करके सीताने अरुन्धतीका पूजन किया ॥ ४-७ ॥ तब उनको तथा वसिष्ठ आदि सब ब्राह्मणोको भोजन कराके सुवासिनी स्त्रियोंको दुपट्टो, मोतियों हारों तथा दिव्य आभूषणोसे सीताने संतुष्ट किया । स्वयं निराहार रहकर सीताने रामक कल्याणार्थ उपवास किया ॥८॥९॥ तदनन्तर विमानपर स्वार होकर आनन्दसे शीघ्रतापूर्वक रघुनन्दन रामके पास आ गयीं। रामने भी सीताको, गुरु वसिष्ठको तथा विप्रोंको साथ लेकर सीताकी की हुई पूजासे सौगुने धूम-धाम तथा विधिसे गङ्गा-सरयूके सङ्गमको पूजा की ॥ १० ॥ ११ ॥ वहाँ उन्होने बड़े आदरसत्कारसे हजारों विप्रोंको भोजन कराया । अनेक गायें, हाथी, घोड़े तथा

१८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५

आनन्द्यो मम रामोऽत्र शर्वाणीव पृथूनथ । सीमाचारान् कुरुष्व त्वं शासनं यन्मयोच्यते ॥ १४॥ ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः । यः कश्चिद्वा समायाति पथिकः स ममाज्ञया ॥१५॥ मया संपूजितो नैव गन्तु देयः समन्ततः । मयाऽदृष्टो गतः कश्चिन्दण्ड्यो वः शासनं मम ॥१६॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा तथा चक्रे स लक्ष्मणः । च्यवनो मुनिवर्यस्तु ज्ञात्वा रामं समागतम् ॥१७॥ दर्शनार्थं ययौ शीघ्रं रामेणापि प्रपूजितः । स्थिरमासन वश्येहे राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥१८॥ राम गर्जावपत्राक्ष गङ्गाया दक्षिणे तटे । आश्रम कीकटे देशे ममास्ति परमः शुभः ॥१९॥ कंदमूलफलार्थे हि विघ्नं कुर्वन्ति मागधाः । ममाश्रमे गजांस्तेभ्यो रक्षां विधीयताम् ॥२०॥ च्यवनस्य वचः श्रुत्वा टणत्कृत्य महद्धनुः । बाणं मुक्त्वाऽऽश्रमन्तस्य परितः परिखोपमाम्॥२१॥ चकार रेखां बाणेन दुर्लङ्घ्यां च दुरासदाम् । रामबाणकृता रेखा यत्र तत्र पुरी शुभा ॥२२॥ रामरेखेति नाम्नाऽऽसीत्तथा चैव महा नदी । च्यवनश्च ततो हृष्टो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥२३॥ निंद्यः स कीकटी देशो वर्तते रघुनंदन तव वाक्याद्भविष्यंति तत्र पुण्यस्थलानि हि । २४॥ नहि त्वयाऽद्य वक्तव्यं वचनं मे सुखप्रदम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवं रामस्तमब्रवीत् ॥२५॥ कीकटेषु गया पुण्या नदी पुण्या तु पुनपुना । आश्रमस्ते महापुण्यः पुण्यं राजनन् पदम् ॥२६॥ भविष्यति न सन्देहो मम वाक्यान्मुनीश्वर । च्यवनस्तेन सन्तुष्टो राम दृष्ट्वाऽऽश्रमं ययौ । २७॥ तस्मिन्नन्तरे तस्य सत्रे रामेण निर्मिते । प्रत्यहं कोटिश्रो विप्रा भुञ्जन्ति यतिभिः सह ॥२८॥ कुम्भोदरो मुनिः प्राप्तःसीमाचारान्तिकं तदा । गङ्गायात्राप्रसंगेन गयां गन्तु समुद्यतः ॥२९॥ समागतः प्रयागाच्च दूतान्दृष्ट्वाऽब्रवीद्वचः । हे दूता उत्तरं देयं यूयं कस्याज्ञया स्थिताः ॥३०॥

रथ ऊंट दानमें दिये ॥ १३ । उनका भोजन कराकर बाद भाई-बन्धुओं तथा अन्यान्य लोगोंके साथ सीता तथा स्वयं रामने भी भोजन किया । तत्पश्चात् सिंहासनापर बैठकर उन्होंने लक्ष्मणसे कहा- ॥ १४ ॥ हे रघूत्तम ! मैं इस जगह दो दिन तक निवास करूंगा । इसलिए मेरे कहनेसे तुम सीमापर सब दूतांका आज्ञा दो कि कोई भी यात्री, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी बिना मेरी पूजा ग्रहण किये न जाने पाय । यदि कोई चला गया और मुझे ज्ञात हुआ तो मैं दूतोंको दण्ड दूँगा ॥ १५-१६ ॥ रामके वचन सुनकर लक्ष्मणने वैसी ही आज्ञा दे दी । उधर च्यवन मुनिने जब सुना कि यहाँ रामचन्द्र आए हुए हैं तो वे रामके दर्शनार्थ वहाँ आए । रामन उनकी पूजा की । पश्चात् तस्वमे सुन्दर आसनपर विराजमान होकर मुनिन रामसे कहा- ॥ १७ ॥ १८ ॥ हे कमलपत्रके समान नेत्रोंवाले राम ! मगध देशम गङ्गाके दक्षिणी तटपर मेरा एक परम रमणीक आश्रम है । १९ ॥ परन्तु मेरे उस आश्रमम मगध देशके दून फल-मूल आदि लेनेम बड़ा विघ्न डालते हैं । इसलिए आप उन विघ्नोंसे मेरी रक्षा करें । २० । च्यवनकी बात सुनकर रामने धनुषका टंकोर करके एक बाण छोड़ा। जिससे च्यवन आश्रमके चारो ओर खाईके समान गहरा लकीर खिंच गयी, जिसको लांघना उन दूतोंके लिए असंभव हो गया। जहाँ रामके बाणकी रेखा खिंची थी, वहाँपर "राम-रेखा" नामकी सुन्दर नगरी बसी और रामरेखा नामकी नदी भी प्रवर्तित हो गयी । इसके बाद च्यवनऋषि प्रसन्न होकर रामचन्द्रजीसे बोले-॥ २१-२३ । हे रघुनन्दन ! अभी कीकट देश निन्द्य माना जाता है । आपके कहनेसे यह भी पुण्यस्थान अवश्य बन जायगा। इसलिए आप मुझे सुख देनेवाला कोई वचन आज कहें । मुनिके इस वचनको सुनकर रामजीने महर्षि कहा -॥ २४ । २५ । हे मुनीश्वर ! मेरे कहनेसे कीकट देशमे गया, पुनपुना नदी, आपका आश्रम तथा राजनन् (गजागृह) पुण्यस्थल होंगे। इसम आप कुछ भी संदेह न मानें । श्रीभगवान्‌के इस कथनसे संतुष्ट होकर च्यवनऋषि रामजी से आज्ञा लेकर अपने आश्रमको चले गये ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसके बाद रामजीके द्वारा स्थापित अन्नसत्रमें प्रतिदिन करोड़ों ब्राह्मण और यति भोजन करने लगे । २८ ॥ ऐसा होनेपर एक दिन गङ्गायात्राके प्रसङ्गम कुम्भोदर नामके मुनि प्रयागसे रामजीकी भोजनशालाके लिए नियत की हुई सीमापर आये । वहाँ दूतोंको देखकर वे बोले-हे दूतो !

सर्गः ५ ] यात्राकाण्डम् १८४

सर्गः ५ ] यात्राकाण्डम् १८४

आकाशशुम्बिनाश्चित्रा इमेऽग्रे कस्य वै ध्वजाः । हनुमत्कोविदारोग्रजेयवाणांकिताः शुभाः ॥ ३१॥ श्वेतनीलहरित्पीतवर्णाः परमशोभनाः । दृश्यन्तेऽग्रे पताकाश्च श्रूयते जयनिःस्वनः ॥३२॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा दूताः प्रोचुःप्रहर्षिताः । रामो राजीवपत्राक्षोऽयोध्यायाः पालकः प्रभुः ॥३३॥ सोऽयं यात्रार्थमायातो वयं तस्याज्ञया स्थिताः । मयमद्यैव रामेण निर्मितं चात्र वर्तते ॥३४॥ क्षुपार्तस्त्वं सुखं गच्छ भुक्त्वा पीत्वा सुखं व्रज । ततेषां वचनं श्रुत्वा परिनृत्य मुनिः पुनः ३५॥ आगतो येन मार्गेण तेन मार्गेण मययौ । गच्छन्तं न मुनिं दृष्ट्वा रामदूताम्प्रहर्षिताः ॥३६॥ रुद्ध्वा मार्गे मुनेस्तस्य वचनं प्रोचुरादरात् किमर्थं त्वं परावृत्य मुने गच्छसि वै पुनः ॥३७॥ आगतोऽसि पथा येन तेनैव त्वं वदस्व नः । इति तेषां वचः श्रुत्वा निवन्धान्मुनिसत्तमौ ॥३८॥ तूष्णीं स्थित्वा क्षणन्ध्यात्वा निश्वयं कृतवान् हृदि। इदानीं राघवोऽयोध्यां यात्रां कृत्वा गमिष्यति ३९। नानादेशेषु सर्वत्र नृणां तद्दर्शनं कथम् । भविष्यति तथाऽन्यत्र रामतीर्थानि भूतले ॥४०॥ भविष्यन्ति कथं नृणां महापापहराणि च । कथं रामेश्वरं भूम्यां भविष्यन्ति गतिप्रदाः ॥४१॥ अतः किञ्चित्करिष्येऽद्य येन रामस्तु भूतले । यात्रोद्देशेन सर्वत्र सीतया सह यास्यति ॥४२॥ अनेन लोकशिक्षाऽपि भविष्यति न संशयः । इति निश्चित्य स मुनिः प्राह दूतान्मन्दस्मितः ॥४३॥ दूताः शृणुत मे वाक्यं हतो येन दशाननः । मद्यपुत्रो बन्धुपुत्रैर्न कृतं तीर्थसेवनम् ॥४४॥ तथा यज्ञः कृतो नैव तस्यान्नं नाहमत्तियाम् । दीयतां मम मार्गो हि सर्वमुक्त्वैतन् मम ॥४५॥ कथनीयं राघवाय यात्रायत्नान् करिष्यति । इति तस्य वचः श्रुत्वा विमस्याविशपानमाः ॥४६॥ दत्त्वा मार्गं शापभीत्या दूता रामांतिक ययुः । रामं नत्वा मुनेस्तस्य कर्णे सर्वं न्यवेदयन् ॥४७॥ राघवोऽपि मुनेस्तस्य ज्ञात्वाऽभिप्रायमुत्तमम् । भद्रं वृत्तं सभामध्ये सहासः प्रतिष्टतः स्फुटम् ॥४८॥


इस लए किसकी आश्रम यहां ठहरे हा ? ये सामने गगनस्पर्शी तथा चित्र विचित्र हनुमान्, कोविदार, गरुड और बाणमं चिह्नित श्वेत, नील, हरित एवं पीत रंगका परम सुन्दर पताकाएं किसका फहरा रही हैं ? वह जयकार किसका सुनाई दे रहा है ? ॥ ३१-३२ ॥ मुनिके बचन सुनकर दूत बोले -कमलनयन और अयोध्याके पालक प्रभु रामचन्द्रजी यात्राके लिए यहां आए हुए हैं, उनकी आज्ञासे ही हम लोग यहां उपस्थित हैं। उन्हीं रामजीके द्वारा स्थापित अन्नक्षेत्र यहां है। यदि आप भूखे हों तो सुखस वहाँ चलिए और भोजनादि करके जाइये। उनके वचन सुनकर मुनि लौट पड़े और जिस मागसे आये थे, उसी मार्गसे फिर आने लगे। जाते हुए मुनिको देख शीघ्र दूत लोग उनके। राह रोककर आदर बोले- हे मुने ! आप जिस मार्गसे आये थे, उसी मार्गसे फिर लौट क्यों जा रहे हैं ? आप जिस कार्यसे आये हो, उस हम लोगोंको बताइए। दूतोंके इस आग्रह भरे वचनको सुना तो चुपचाप खड़े होकर थोड़ी देर हृदयम सोच करके मुनिने विचार किया कि यदि इस समय रामचन्द्रजी यात्रा करके अयोध्या चले जायेंगे ॥ ३३-३९ ॥ तब अन्यान्य देशोक मनुष्योंको उनका दर्शन कैसे मिलेगा और दूसरे स्थानोंपर मनुष्योंके बच्चे बड़े पापोंको नष्ट करनेवाला रामतीर्थ कैसे बनेगा ? अनेक मोक्ष-दायक रामेश्वर कैसे स्थापित होंगे ? इस लिए आज मैं कोई ऐसा उपाय करता हूँ कि जिससे रामचन्द्रजी संसारमें सब स्थानोंपर यात्राके उद्देश्यसे सीताजीके साथ जायँ ॥ ४०-४२ ॥ इस यात्रासे लोगोंको शिक्षा भी मिलेगी। इसमें संदेह नहीं है। ऐसा विचार करके कुछ हँसत हुए मुनिने दूतोंसे कहा - ॥ ४३ ॥ हे दूतो ! मेरे बचन सुनो। जिसने बाह्यणपुत्र दशानन रावणको मारा और भाई एवं पुत्रोंके सहित न तीर्थसेवन किया और न यज्ञ ही किया, उस रामके अन्नको मैं नहीं खाऊंगा। आप लोग मुझे जाने दें। मेरी बात रामसे कहियेगा। इसे सुनकर वे अवश्य तीर्थयात्रा तथा यज्ञ करेंगे। मुनिके इस बचनको सुनकर वे घबड़ाये हुए दूत शापके डरसे मुनिको मार्ग देकर रामचन्द्रजीके पास गये। वहाँ पहुँचकर रामजीको प्रणाम करके उनके कानमे उस मुनिकी सबक धीरेसे निवेदन कर दिया ॥ ४४-४७ ॥ श्रीरामने भी मुनिके उस उत्तम अभिप्रायको जानकर सर्व बात