श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
१७८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
ताम्बूलं दक्षिणां दत्त्वा नानाविधंन्नृप आदरात् । मुखशुद्धिं स्वयं कृत्वा तस्थौ सिंहासने पुनः ॥५४॥ श्रुत्वा शास्त्रपुराणानि वेदान्तांश्चापि सादरम् । सायंसन्ध्यादिकं कृत्वा कृत्वा होमं यथाविधि ॥५५॥ सिंहासने समासीनो वेश्यानां नृत्यमुत्तमम् । पश्यन् शृण्वन् गायनं च नीत्वा यामद्वयं निशाम् ५७ ततः सुष्वाप पर्यङ्के सीतया सह राघवः । द्वितीय दिवसे तत्र स्थित्वा रमान्नु कौतुकैः ॥५८॥ नीत्वा समग्रं सुदिनं तृतीये दिवसे पुनः । पूर्ववद्ब्राह्मणोयाद्यैः शनैः स्थानान्तरं ययौ । ५९॥ क्वचिद्दिनमतिक्रम्य क्वचिद्द्वे त्रीणि राघवः । स्थित्वा पश्यन्कौतुकानि प्रीणन् जनकात्मजाम्६०॥ शनैः शनैर्ययौ मार्गं मासेनैकेन राघवः । प्राप जीर्णं मुद्रलेन त्यक्तमाश्रममुत्तमम् । ६१। राममागतमाज्ञाय मुद्गलो नूतनाश्रमात् । भागीरथ्या दक्षिणतः प्राप रामांतिकं तदा । ६२.। तं दृष्ट्वा राघवश्चापि नत्वा सम्पूज्य सादरम् । रामोगेहे समारोप्य पप्रच्छ विनयान्मुनिम् । ६३॥ त्वयाऽयमाश्रमस्त्यक्तः किमर्थं मुनिसत्तम । तत्त्वं वद महाभाग यथावच्च मयिस्तरम् ॥६४॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा मुद्गलो वाक्यमब्रवीत् । अद्य धन्योऽस्म्यहं राम निवृत्तं वनवासतः । ६५। यत्त्वां पश्यामि नेत्राभ्यां चिरकालेन राघव । भरतप्राणरक्षार्थं यदा नीता मदाश्रमात् ॥६६॥ दिव्यौषध्यस्तदा जातं पूर्वं ते दर्शनं मम । मयाऽयमाश्रमन्त्यक्तः किमर्थं तद्व्रवीमि ते ॥६७॥ सान्निध्य नात्र गङ्गायाः सरय्वा अपि नात्र वै । इति मत्वा मया त्यक्तश्चाश्रमोऽयं महत्तमः ॥६८॥ अत्र सिद्धिं गताः पूर्वे शतशोऽथ सहस्रशः । मुनीश्वरा मयाप्यत्र तपस्तप्तं कियदिमम् ॥६९॥ इति राम मयाख्यातमाश्रमस्य च मोचने । कारणं च त्वया पृष्टं किमग्रे श्रोतुमिच्छसि । ७०॥
तथा मित्रोंके साथ बैठकर रामने घृतमिश्रित नाना प्रकारक स्वादिष्ट पकवानोंका भोजन किया । ५४॥ आदरस ब्राह्मणोंको ताम्बूल तथा अनेक प्रकारकी दक्षिणार देकर रामने मुखशुद्धिक लिए ताम्बूल खाया और पुनः सिंहासनपर आ विराज । ५५॥ तदनन्तर वेदान्त आदि सत् शास्त्रों तथा पुराणोंकी कथाको प्रेम और श्रद्धासे शान्तिपूर्वक सुना । सायंकाल होनेपर पुन यथाविधि संध्यावंदन तथा हवन आदिस निवृत्त होकर सिंहासनपर आ सुशोभित हुए । वहां रात्रिके दो पहर तक वेश्याओंका नृत्य-गान देखत सुनते रहे ॥ ५६ ॥ ५७॥ तदनन्तर राम सीताके साथ पलंगपर शयन करनेको चले गये दूसरा भी सारा दिन रामने आनन्दसे वही रहकर विताया तीसरे दिन मानन्द ब्राह्मणोंके साथ धीरेधीरे दूसरे पडावकी ओर बड़े ॥ ५८ । ५९ ॥ इसी प्रकार कहीं एक दिन, कहीं दो और कहीं तीन दिन तक निवास करत हुए गम जानकी को प्रसन्न करने तथा विविध कौतुकोंको देखते रहे ॥ ६० । इस प्रकार एक मास चीत जानेपर वे मुद्गल ऋषिके छोड़ हुए एक पुराने तथा पवित्र आश्रमम जा पहुँचे ॥ ६१ ॥ रामको अपने पुराने आश्रमपर आये सुनकर मुद्गलऋषि भागीरथीके दक्षिण तटपर स्थित अपने नवीन आश्रमसे दर्शन करनेके लिए उनके पास आये ॥ ६२ ॥ राघवने उन्हें देखकर नमस्कार किया और उनकी विधिवत् पूजा की। पश्चात् ताम्बूल देकर आदरपूर्वक आसनपर बैठाया और उनसे नम्रतापूर्वक कहा- । ६३॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! आपने इस आश्रमको क्यों छोड़ दिया ? हे महाभाग इसका कारण विस्तारसे आप हम कह सुन इयं । ६४॥ यह सुनकर मुद्गल्मुनि कहने लगे- हे राम ! मेरा धन्य भाग्य है कि जो मैं आज बहुत दिनां बाद वनवाससे लौट हुए आपको अपनी आंखों देख रहा हूँ । पूर्वकालमें भरतके प्राणोंकी रक्षा करनेके लिए जब आप मेरे आश्रमम दिव्य औषधि ले गये थे, तब मुझे आपका दर्शन मिला था । अब मैने इस आश्रमको क्यों छोड़ दिया, इसका कारण आपसे कहता हूँ । ६५-६७॥ हे प्रभो ! मैनें इस विशाल आश्रमका केवल इसलिए छोड़ दिया है कि यहाँपर गंगा अथवा सरयू इन दोनों पवित्र नदियोंमेसे कोई भी नदी नहीं है ॥ ६८॥ इस आश्रमम निवास करके हजारों मुनीश्वरोंने सिद्धि प्राप्त की है और मैंने भी कुछ दिनों तक यहाँ रहकर तपस्या की है । परन्तु क्या करें, किसी तीर्थके न होनेसे इस स्थानपर बड़ा कष्ट है ॥ ६९॥ हे राम ! यह तो मैंने आपके पूछनेके अनुसार इस आश्रमको छोड़नेका कारण कह
सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १०९
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा पुनस्तं प्राह राघवः । किं कृत्वा मेऽत्र वसतिर्भविष्यति मुने वद ॥७१॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा राघवं प्राह मुद्गलः यद्यत्र सरयूगङ्गाः संगमो हि भविष्यति ॥७२॥
जाह्नव्या सदृशं चात्रं वन्द्ये राम यथार्जुनम् तत्तस्य वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तं पुनः ॥७३॥
किमर्थं सरयूः श्रेष्ठा कुतः प्राप्ता धरातलम् तन्मे वद महाभाग सविस्तारं मयाग्रतः ॥७४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा मुद्गलो वाक्यमब्रवीत् । तवैव चरितं राम सन्मुखाच्छ्रोतुमिच्छसि ॥७५॥
तर्हि ते संप्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व रघूत्तम । शङ्खासुरो महादैत्यो वेदान् पूर्वं जहार हि ॥७६॥
क्षिप्त्वा तांश्च समुद्रे हि स्वयमासीन्महोदधौ । तदर्थं च त्वया मात्स्यं वपुर्धृत्वा महत्प्रभु ॥७७॥
हतः शंखासुरो वेदास्त्वया दत्तास्तु वेधसे । ततो हर्षेण महता पूर्वरूपं त्वया धृतम् ॥७८॥
तदा हर्षेण नेत्रात्ते पतिताश्चाश्रुबिन्दवः । हिमालये ततो जाता नदी पुण्या शुभोदका ॥७९॥
साक्षान्नारायणस्येवेह आनन्दाश्रुसमुद्भवा । उर्वी तैर्विन्दुसारः प्राप्तं तस्माच्च मानसं ययौ ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे राम पूर्वजन्मे महत्तमः । वैवस्वतो मनुर्यष्टुमुद्युक्तो गुरुमब्रवीत् ॥८१॥
अनादिमिद्धाऽयोध्धेयं विशेषेणापि वै मया रचिता निजवासार्थमत्र यज्ञं करोम्यहम् ॥८२॥
यदि ते रोचते चित्ते तच्छ्रुत्वा गुरुरब्रवीत् अत्र तीर्थं वरं नास्ति नास्ति श्रेष्ठा महानदी ॥८३॥
यद्यत्रेवास्ति ते रुच्यं यष्टुं नृपतिसत्तम । आनयस्व नदीं रम्यां मानसात्पातकापहाम् ॥८४॥
तद्गुरोर्वचनाद्राजा मनुर्वैवस्वतो महान् । टणकृत्य महच्चापं सन्दधे शरमुत्तमम् ॥८५॥
स शरो मानसं भित्त्वा तस्मान्निष्काश्य तां नदीम् । अयोध्याम्यानयामास पन्थानं दर्शयन्निव ॥८६॥
शरमार्गानुसारेणायोध्यायां प्राप वै नदी महोदधौ पूर्वदेशे मिलिता रघुनन्दन ॥८७॥
भूताया। आगे क्या करना है, सो कहिये ॥ ७० ॥ मुनिके इस वाक्यको सुनकर रामने कहा— हे मुने अब यह बताइये कि क्या करनेसे आप फिर इस आश्रममें निवास कर सकते हैं? ॥ ७१ ॥ रामके प्रेमपूर्ण वचनको सुनकर मुद्गल ऋषि बोले— यदि यहाँपर सरयू और गंगाका संगम हो जाय तो मैं बड़े सुखसे रह सकता हूँ। इस बातको सुनकर रामने पुनः उनसे प्रश्न किया— ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ हे महाभाग ! सरयू नदीका इतना श्रेष्ठ माहात्म्य क्यों है और वह कहाँसे धरातलपर आयी है ? इन बातोंका विस्तारसे वर्णन करिए ॥ ७४ ॥ मुद्गलने कहा हे प्रभो ! आप अपना ही चरित्र यदि मेरे मुखसे सुनना चाहते हैं ॥ ७५ ॥ तो हे रघूत्तम ! मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिए पवित्र कथा शंखासुर नामका एक बड़ा भारी राक्षस हुआ था। वह सब वेदोंको हर ले गया ॥ ७६ ॥ उसने समुद्रमें जाकर समुद्रमं डुबो दिया तथा स्वयं भी उसी महासागरमे छिप गया उसको मारनेके लिए आपने बड़े भारी मत्स्यका रूप धारण किया ॥ ७७ ॥ और उसको मारकर वेदोंकी रक्षा की। वेदोंको लाकर आपने ब्रह्माको दिया और प्रसन्नतापूर्वक पुन अपना पूर्वरूप धारण कर लिया ॥ ७८ ॥ उस समय आपके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुकी बूंदे टपक पड़ीं। हिमालयपर गिरी हुई आप नारायणके उन हर्षाश्रुकी बूंदोंने एक पवित्र तथा निर्मल जलवाला नदीका रूप धारण कर लिया। आगे चलकर वे कासार और कासारसे मानसरोवरके रूपमें परिणत हो गयी ॥ ७९ ॥ ८० ॥ हे राम ! उसी समय आपके पूर्वज महात्मा वैवस्वत मनुने यज्ञ करनेकी इच्छा करके अपने गुरुसे कहा— ॥ ८१ ॥ इस अयोध्यापुरीके अनादिकालसे स्थित रहनेपर भी मैंने अपने निवासके लिए इसकी कुछ विशेषतापूर्वक रचना करवायी है। इस कारण यदि आप कहें तो मैं इस नगरीमे यज्ञ करूँ। तब गुरुने कहा कि रुशिए, न तो यहाँ कोई पवित्र तीर्थ है और न कोई बड़ी नदी ही है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ इसलिये यदि आपकी यहीं यज्ञ करनेकी इच्छा हो तो हे नृपतियोंमें श्रेष्ठ नृप ! मानसरोवरसे सुन्दर तथा पापोंको नष्ट करनेवाली एक नदीको यहाँ ले आइए ॥ ८४ ॥ गुरुके इस वचनको सुनकर महान् राजा वैवस्वत मनुने अपने विशाल धनुषका बड़ा तथा टंकोर करके बाण चलाया ॥ ८५ ॥ वह बाण मानसरोवरको भेदकर उसमेंसे निकली नदीके आगे-आगे चलकर रास्ता दिखाते हुए अयोध्या ले आया। बाणके मार्गका अनुसरण करती हुई वह नदी अयोध्या आयी तथा वहाँसे आगे जाकर पूर्वी महा-
| १८० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
|---|
आनीता सा शरैरेव सरयूरिति कथ्यते । सरोवरात्समुद्भूता सरयूरिति केचन ॥८८॥
ततो भगीरथेनेयं कपिलक्रोधवह्निना । विनिर्दग्धान् पूर्वजान् वै सागरात् प्रेषितुं दिवम् ॥८९॥
भागीरथी समानीता त्वत्पादाब्जसमुद्भवा । तपसा शङ्करं तोष्य सरय्वा मिलिताऽथ सा ॥९०॥
वरदानाच्छंभोर्गङ्गा ख्यातिं गमिष्यति । अग्रे सागरपर्यन्तमेनां गङ्गां वदन्ति हि ॥९१॥
तव पादसमुद्भूता या विश्वं पाति जाह्नवी । इयं तु नेत्रसंभूता किमत्राग्रे वदाम्यहम् ॥९२॥
कोटिवर्षसहस्रैश्च कोटिवर्षशतैरपि । महिमा सरयूनद्याः कोऽपि वक्तुं न वै क्षमः ॥९३॥
इति राम समाख्यातं यथा पृष्टं त्वया मम । मुनेस्तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः ॥९४॥
सरयूमानयस्वात्र शरं मुक्त्वा ममाज्ञया । तथेति रामवचनाद्गत्वा चापं स लक्ष्मणः ॥९५॥
शरं मुक्त्वा तटं भित्त्वा सरयूमानयन्क्षणात् । सरयू सा द्विधा भूत्वा मुद्गलाश्रममाययौ ॥९६॥
जाह्नव्या मिलिता सावेक्षां दृष्ट्वा राघवोऽब्रवीत् । अत्र स्थित्वा लक्ष्मणेन दारितेयं महानदी ॥९७॥
अतो ददरीति नाम्नाऽत्र नगरी ख्यातिमेष्यति । ददरीयं जगतीमध्ये बदर्याश्च यथाधिका । ९८॥
भविष्यति न संदेहस्त्वत्र रामाग्निसेवनात् । ततः सीतां समाहूय राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥९९॥
मुद्गल्याश्रम एवैषा नीता सरयूनदी । पश्य सौमित्रिणा मुक्त्वा शरं मन्नामचिह्नितम् ॥ १००॥
नारीभिर्मातृभिः सार्धं पुण्यकेनाभिभाष्यता । दृष्ट्वा मां सरयुर्यत्र संगताऽस्ति महानदी ॥१०१॥
जाह्नव्या संगमे स्वं दिगच्छस्व गुरुणा द्विजैः । पूरयित्वा सविस्तारं यथोक्तं वचनं पुरा ॥१०२॥
आगच्छस्व ततः शीघ्रमुत्र त्वं मम सन्निधौ । विशेषान्मुद्गलस्यापि सन्निधावथ वै पुनः ॥१०३॥
नवीनसरयूनद्या भागीरथ्यास्तु संगमे । पूजनं त्वं मया साकं कर्तुमर्हसि मैथिलि ॥१०४॥
सागरम मिल गयीं ॥८८॥८९॥ शरके द्वारा लायी आनम लोग उसको सरयू नदी कहने लगे । अथवा सरोवरसे निकलकर आनेके कारण उसका 'सरयू' नाम पडा, कुछ लागोंका ऐसा कथन है ॥ ८८ ॥ उसके बाद राजा भगीरथ कपिल मुनिका कोपामिसम अगाये गय अपन पूर्वज सगर पुत्रोंको स्वर्ग भेजनेकी इच्छासे आपके चरणारविन्दसे प्रादुर्भूत भागीरथी गङ्गाको ले आये । बादम शङ्करजीको तपसे प्रसन्न करके उस नदीको सरयूसे ला मिलाया । ८९ ॥९०। शङ्करभगवान्के वरदानस गंगाको बडी भारी प्रसिद्धि हुई तथा समुद्र तक उसको लोग गंगा कहन लगे ॥ ९१ ॥ हे प्रभो आपके चरणकमलोंसे निकली हुई गया समस्त विश्वको पवित्र करने लगी। वैसे ही आपके नेत्रजलसे उत्पन्न होकर यह सरयू भी लोगोंको पावन करने लगी । हे भगवन् ! अब मैं आगे क्या कहूँ ? ॥ ९२ ॥ करोड़ों वर्षोंमें भी इस सरयू नदीकी महिमाका वर्णन कोई नहीं कर सकता ॥ ९३ ॥ हे राम ! आपने जो पूछा था, सो मैंने कह सुनाया । मुनिके इस वाक्यको सुनकर रघुपति रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे कहा- ॥ ९४ ॥ तुम बाण छोड़ तथा सरयूके तटको भेदन करके उसे यहाँ ले आओ । लक्ष्मणने वैसा ही किया और वह सरयू दो भागोंमें विभक्त होकर क्षणभरमें मुद्गलऋषिके प्राचीन आश्रमम आ पहुंची ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ उसको अकेली ही नहीं, किन्तु जाह्नवीके समम सहित आयी हुई देखकर रामने कहा कि लक्ष्मण दारण (चीर) करके इस नदीको यहाँ ले आये हैं ॥ ९७॥ इसलिए इस जगहपर दरी नामकी प्रसिद्ध नगरी बसेगी । वह दरी नगरी पृथ्वीतलमें बदरीनाथ धामम भी जीधर बढ़कर पुनीत होगी ॥ ९८ ॥ इसमें संदेह नहीं है । विशेष करके आपके यहाँ निवास करनेसे इसकी और भी अधिक ख्याति होगी । पश्चात् रामने सीताको बुलाकर कहा-॥६९॥ सीते ! देखो, सुमित्रापुत्र लक्ष्मण मेरे नामसे चिह्नित बाण छोड़कर सरयू नदीको यहाँ मुद्गल मुनिके आश्रमम ले आये हैं ॥ १०० ॥ अब तुम हमारी माताओं, अन्य स्त्रियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंके साथ स तथा इस पुण्यक विमानपर स्वार होकर जहाँ सरयू तथा गंगाका संगम है, वहाँ जाओ और अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार विधिवत् उनकी पूजा कर आओ ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ वहाँसे लौटकर शीघ्र ही मेर हवा इन मुद्गल मुनिके सम्मुख इस नवीन सरयू तथा भगवती भागीरथीके संगमका
सर्गः ५] यात्राकाण्डम् १८१
तथेति रामवचनमङ्गीकृत्य विदेहजा । पूजासंभारमादाय विवेश स्वान्तर्गृहम् ॥ १०६ ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे सरयूशुद्धिकरणं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः
(कुम्भोदरोपाख्यान)
श्रीरामदास उवाच
ततो गृहीत्वा सम्भारान् पूजार्थं जानकी जवात् । कौसल्यादिश्च श्वश्रूभिस्तु पुष्पकं चारुरोह सा ॥ १ ॥
क्षणेन शुद्धा सरयूर्यत्र सा गङ्गया शुभा । सङ्गताऽस्ति महाश्रेष्ठा तत्र प्राप विदेहजा ॥ २ ॥
पतिं विनाऽन्विन्ना नारी सीमामुल्लङ्घ्य न व्रजेत् । स दोषोऽत्र न विज्ञेयः सीतायाश्च विहायसा ॥ ३ ॥
उत्तीर्य सा विमानाग्र्यान्नमस्कृत्याऽथ सङ्गमम् । पुरोधसा चोदिता सा नारिकेलं सवायनम् ॥ ४ ॥
भागीरथ्यै समर्प्याथ स्नात्वा चैव यथाविधि । सङ्गमं पूजयामास चोपस्कारैर्यथाविधि ॥ ५ ॥
सुरामांसोपहारैश्च पक्वान्नैर्बलिभिस्तथा । पट्टकूलादिभिर्वस्त्रैर्मुक्तहारैः सचन्दनैः ॥ ६ ॥
दिव्यैराभरणैश्चित्रैर्वायनाद्यैः सविस्तरम् । ततः सुवासिनीः पूज्य पूजयित्वा त्वरुन्धतीम् ॥ ७ ॥
वसिष्ठं ब्राह्मणांश्चापि भोजयामास विस्तरैः । पट्टकूलादिभिर्वस्त्रैर्दिव्याभरणादिभिः ॥ ८ ॥
सुवासिनीर्ब्राह्मणांश्च तोषयामास मैथिली । स्वयं कृत्वोपहारं न राघवार्यमथोषिता ॥ ९ ॥
ययौ यानेन शीघ्रं सा राघवस्यान्तिकं मुदा । ततः श्रीरामचन्द्रोऽपि सीतया गुरुणा द्विजैः ॥ १० ॥
गङ्गयोः सङ्गमे चक्रे पूजनं स यथाविधि । यथा कृतं च वैदेह्या तस्माच्चापि शताधिकम् ॥ ११ ॥
ततः सहस्रशो विप्रान् भोजयामास सादरम् । दत्त्वा दानान्यनेकानि गोहस्तिरथवाजिनाम् ॥ १२ ॥
ततो भुक्त्वा स्वयं रामः सीतया बन्धुभिर्जनैः । सिंहासने समासीनो सौमित्रिमिदमब्रवीत् ॥ १३ ॥
मेरे साथ मिलकर पूजन करो । १०३ ।। १०४ ।। तब विदेहराजकी पुत्री सीता "जो आज्ञा" कहकर पूजाकी सामग्रियें लेनेको संभ्रम गयी ॥ १०५ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे आकाशांकायां शरयूद्धिकरणं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
श्रीरामदासजीने कहा—बादमें बालकी पूजाका सब सामान लेकर कौसल्या आदि सासुओ तथा अन्य बहुओंके साथ शीघ्रतासे पुष्पक विमानपर जा बैठीं ॥ १ ॥ क्षण भरमें विदेहराजकी पुत्री सीता उस पुराने सङ्गमपर जा पहुँचीं, जहाँपर कि सरयू पवित्र गङ्गा नदीस मिली हैं ॥ २ ॥ पत्नीको पतिके बिना आगेकी सीमा नहीं लांघनी चाहिये । यह दोष यहाँ सीताको नहीं लग सकता । क्योंकि सीताका गमन आकाशमार्गस हुआ था । ३ ॥ वहाँ पहुँचनेपर सीता विमानसे नीचे उतरीं और सङ्गमका नमस्कार किया । पश्चात् पुरोहितके कथनानुसार सीताने वायन (ऐपन) सहित नारियल भागीरथीको समर्पण करके उसमें विधिवत् स्नान किया। फिर सुरा मांस-पक्वान आदिका बलिसे दुपट्टा आदि सुन्दर वस्त्रोंसे, दिव्य आभूषणोंसे, मुक्ताके हारसे, चन्दनसे तथा डायन आदिकी पूजाके उपकरणोंसे विधिवत् तथा विस्तारपूर्वक सीताने संगमका पूजन किया । तदनन्तर पतिनुमन्ती सोहागिन स्त्रियोंको पूजा करके सीताने अरुन्धतीका पूजन किया ॥ ४-७ ॥ तब उनको तथा वसिष्ठ आदि सब ब्राह्मणोको भोजन कराके सुवासिनी स्त्रियोंको दुपट्टो, मोतियों हारों तथा दिव्य आभूषणोसे सीताने संतुष्ट किया । स्वयं निराहार रहकर सीताने रामक कल्याणार्थ उपवास किया ॥८॥९॥ तदनन्तर विमानपर स्वार होकर आनन्दसे शीघ्रतापूर्वक रघुनन्दन रामके पास आ गयीं। रामने भी सीताको, गुरु वसिष्ठको तथा विप्रोंको साथ लेकर सीताकी की हुई पूजासे सौगुने धूम-धाम तथा विधिसे गङ्गा-सरयूके सङ्गमको पूजा की ॥ १० ॥ ११ ॥ वहाँ उन्होने बड़े आदरसत्कारसे हजारों विप्रोंको भोजन कराया । अनेक गायें, हाथी, घोड़े तथा
१८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५
आनन्द्यो मम रामोऽत्र शर्वाणीव पृथूनथ । सीमाचारान् कुरुष्व त्वं शासनं यन्मयोच्यते ॥ १४॥ ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः । यः कश्चिद्वा समायाति पथिकः स ममाज्ञया ॥१५॥ मया संपूजितो नैव गन्तु देयः समन्ततः । मयाऽदृष्टो गतः कश्चिन्दण्ड्यो वः शासनं मम ॥१६॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा तथा चक्रे स लक्ष्मणः । च्यवनो मुनिवर्यस्तु ज्ञात्वा रामं समागतम् ॥१७॥ दर्शनार्थं ययौ शीघ्रं रामेणापि प्रपूजितः । स्थिरमासन वश्येहे राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥१८॥ राम गर्जावपत्राक्ष गङ्गाया दक्षिणे तटे । आश्रम कीकटे देशे ममास्ति परमः शुभः ॥१९॥ कंदमूलफलार्थे हि विघ्नं कुर्वन्ति मागधाः । ममाश्रमे गजांस्तेभ्यो रक्षां विधीयताम् ॥२०॥ च्यवनस्य वचः श्रुत्वा टणत्कृत्य महद्धनुः । बाणं मुक्त्वाऽऽश्रमन्तस्य परितः परिखोपमाम्॥२१॥ चकार रेखां बाणेन दुर्लङ्घ्यां च दुरासदाम् । रामबाणकृता रेखा यत्र तत्र पुरी शुभा ॥२२॥ रामरेखेति नाम्नाऽऽसीत्तथा चैव महा नदी । च्यवनश्च ततो हृष्टो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥२३॥ निंद्यः स कीकटी देशो वर्तते रघुनंदन तव वाक्याद्भविष्यंति तत्र पुण्यस्थलानि हि । २४॥ नहि त्वयाऽद्य वक्तव्यं वचनं मे सुखप्रदम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवं रामस्तमब्रवीत् ॥२५॥ कीकटेषु गया पुण्या नदी पुण्या तु पुनपुना । आश्रमस्ते महापुण्यः पुण्यं राजनन् पदम् ॥२६॥ भविष्यति न सन्देहो मम वाक्यान्मुनीश्वर । च्यवनस्तेन सन्तुष्टो राम दृष्ट्वाऽऽश्रमं ययौ । २७॥ तस्मिन्नन्तरे तस्य सत्रे रामेण निर्मिते । प्रत्यहं कोटिश्रो विप्रा भुञ्जन्ति यतिभिः सह ॥२८॥ कुम्भोदरो मुनिः प्राप्तःसीमाचारान्तिकं तदा । गङ्गायात्राप्रसंगेन गयां गन्तु समुद्यतः ॥२९॥ समागतः प्रयागाच्च दूतान्दृष्ट्वाऽब्रवीद्वचः । हे दूता उत्तरं देयं यूयं कस्याज्ञया स्थिताः ॥३०॥
रथ ऊंट दानमें दिये ॥ १३ । उनका भोजन कराकर बाद भाई-बन्धुओं तथा अन्यान्य लोगोंके साथ सीता तथा स्वयं रामने भी भोजन किया । तत्पश्चात् सिंहासनापर बैठकर उन्होंने लक्ष्मणसे कहा- ॥ १४ ॥ हे रघूत्तम ! मैं इस जगह दो दिन तक निवास करूंगा । इसलिए मेरे कहनेसे तुम सीमापर सब दूतांका आज्ञा दो कि कोई भी यात्री, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी बिना मेरी पूजा ग्रहण किये न जाने पाय । यदि कोई चला गया और मुझे ज्ञात हुआ तो मैं दूतोंको दण्ड दूँगा ॥ १५-१६ ॥ रामके वचन सुनकर लक्ष्मणने वैसी ही आज्ञा दे दी । उधर च्यवन मुनिने जब सुना कि यहाँ रामचन्द्र आए हुए हैं तो वे रामके दर्शनार्थ वहाँ आए । रामन उनकी पूजा की । पश्चात् तस्वमे सुन्दर आसनपर विराजमान होकर मुनिन रामसे कहा- ॥ १७ ॥ १८ ॥ हे कमलपत्रके समान नेत्रोंवाले राम ! मगध देशम गङ्गाके दक्षिणी तटपर मेरा एक परम रमणीक आश्रम है । १९ ॥ परन्तु मेरे उस आश्रमम मगध देशके दून फल-मूल आदि लेनेम बड़ा विघ्न डालते हैं । इसलिए आप उन विघ्नोंसे मेरी रक्षा करें । २० । च्यवनकी बात सुनकर रामने धनुषका टंकोर करके एक बाण छोड़ा। जिससे च्यवन आश्रमके चारो ओर खाईके समान गहरा लकीर खिंच गयी, जिसको लांघना उन दूतोंके लिए असंभव हो गया। जहाँ रामके बाणकी रेखा खिंची थी, वहाँपर "राम-रेखा" नामकी सुन्दर नगरी बसी और रामरेखा नामकी नदी भी प्रवर्तित हो गयी । इसके बाद च्यवनऋषि प्रसन्न होकर रामचन्द्रजीसे बोले-॥ २१-२३ । हे रघुनन्दन ! अभी कीकट देश निन्द्य माना जाता है । आपके कहनेसे यह भी पुण्यस्थान अवश्य बन जायगा। इसलिए आप मुझे सुख देनेवाला कोई वचन आज कहें । मुनिके इस वचनको सुनकर रामजीने महर्षि कहा -॥ २४ । २५ । हे मुनीश्वर ! मेरे कहनेसे कीकट देशमे गया, पुनपुना नदी, आपका आश्रम तथा राजनन् (गजागृह) पुण्यस्थल होंगे। इसम आप कुछ भी संदेह न मानें । श्रीभगवान्के इस कथनसे संतुष्ट होकर च्यवनऋषि रामजी से आज्ञा लेकर अपने आश्रमको चले गये ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसके बाद रामजीके द्वारा स्थापित अन्नसत्रमें प्रतिदिन करोड़ों ब्राह्मण और यति भोजन करने लगे । २८ ॥ ऐसा होनेपर एक दिन गङ्गायात्राके प्रसङ्गम कुम्भोदर नामके मुनि प्रयागसे रामजीकी भोजनशालाके लिए नियत की हुई सीमापर आये । वहाँ दूतोंको देखकर वे बोले-हे दूतो !
सर्गः ५ ] यात्राकाण्डम् १८४
सर्गः ५ ] यात्राकाण्डम् १८४
आकाशशुम्बिनाश्चित्रा इमेऽग्रे कस्य वै ध्वजाः । हनुमत्कोविदारोग्रजेयवाणांकिताः शुभाः ॥ ३१॥ श्वेतनीलहरित्पीतवर्णाः परमशोभनाः । दृश्यन्तेऽग्रे पताकाश्च श्रूयते जयनिःस्वनः ॥३२॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा दूताः प्रोचुःप्रहर्षिताः । रामो राजीवपत्राक्षोऽयोध्यायाः पालकः प्रभुः ॥३३॥ सोऽयं यात्रार्थमायातो वयं तस्याज्ञया स्थिताः । मयमद्यैव रामेण निर्मितं चात्र वर्तते ॥३४॥ क्षुपार्तस्त्वं सुखं गच्छ भुक्त्वा पीत्वा सुखं व्रज । ततेषां वचनं श्रुत्वा परिनृत्य मुनिः पुनः ३५॥ आगतो येन मार्गेण तेन मार्गेण मययौ । गच्छन्तं न मुनिं दृष्ट्वा रामदूताम्प्रहर्षिताः ॥३६॥ रुद्ध्वा मार्गे मुनेस्तस्य वचनं प्रोचुरादरात् किमर्थं त्वं परावृत्य मुने गच्छसि वै पुनः ॥३७॥ आगतोऽसि पथा येन तेनैव त्वं वदस्व नः । इति तेषां वचः श्रुत्वा निवन्धान्मुनिसत्तमौ ॥३८॥ तूष्णीं स्थित्वा क्षणन्ध्यात्वा निश्वयं कृतवान् हृदि। इदानीं राघवोऽयोध्यां यात्रां कृत्वा गमिष्यति ३९। नानादेशेषु सर्वत्र नृणां तद्दर्शनं कथम् । भविष्यति तथाऽन्यत्र रामतीर्थानि भूतले ॥४०॥ भविष्यन्ति कथं नृणां महापापहराणि च । कथं रामेश्वरं भूम्यां भविष्यन्ति गतिप्रदाः ॥४१॥ अतः किञ्चित्करिष्येऽद्य येन रामस्तु भूतले । यात्रोद्देशेन सर्वत्र सीतया सह यास्यति ॥४२॥ अनेन लोकशिक्षाऽपि भविष्यति न संशयः । इति निश्चित्य स मुनिः प्राह दूतान्मन्दस्मितः ॥४३॥ दूताः शृणुत मे वाक्यं हतो येन दशाननः । मद्यपुत्रो बन्धुपुत्रैर्न कृतं तीर्थसेवनम् ॥४४॥ तथा यज्ञः कृतो नैव तस्यान्नं नाहमत्तियाम् । दीयतां मम मार्गो हि सर्वमुक्त्वैतन् मम ॥४५॥ कथनीयं राघवाय यात्रायत्नान् करिष्यति । इति तस्य वचः श्रुत्वा विमस्याविशपानमाः ॥४६॥ दत्त्वा मार्गं शापभीत्या दूता रामांतिक ययुः । रामं नत्वा मुनेस्तस्य कर्णे सर्वं न्यवेदयन् ॥४७॥ राघवोऽपि मुनेस्तस्य ज्ञात्वाऽभिप्रायमुत्तमम् । भद्रं वृत्तं सभामध्ये सहासः प्रतिष्टतः स्फुटम् ॥४८॥
इस लए किसकी आश्रम यहां ठहरे हा ? ये सामने गगनस्पर्शी तथा चित्र विचित्र हनुमान्, कोविदार, गरुड और बाणमं चिह्नित श्वेत, नील, हरित एवं पीत रंगका परम सुन्दर पताकाएं किसका फहरा रही हैं ? वह जयकार किसका सुनाई दे रहा है ? ॥ ३१-३२ ॥ मुनिके बचन सुनकर दूत बोले -कमलनयन और अयोध्याके पालक प्रभु रामचन्द्रजी यात्राके लिए यहां आए हुए हैं, उनकी आज्ञासे ही हम लोग यहां उपस्थित हैं। उन्हीं रामजीके द्वारा स्थापित अन्नक्षेत्र यहां है। यदि आप भूखे हों तो सुखस वहाँ चलिए और भोजनादि करके जाइये। उनके वचन सुनकर मुनि लौट पड़े और जिस मागसे आये थे, उसी मार्गसे फिर आने लगे। जाते हुए मुनिको देख शीघ्र दूत लोग उनके। राह रोककर आदर बोले- हे मुने ! आप जिस मार्गसे आये थे, उसी मार्गसे फिर लौट क्यों जा रहे हैं ? आप जिस कार्यसे आये हो, उस हम लोगोंको बताइए। दूतोंके इस आग्रह भरे वचनको सुना तो चुपचाप खड़े होकर थोड़ी देर हृदयम सोच करके मुनिने विचार किया कि यदि इस समय रामचन्द्रजी यात्रा करके अयोध्या चले जायेंगे ॥ ३३-३९ ॥ तब अन्यान्य देशोक मनुष्योंको उनका दर्शन कैसे मिलेगा और दूसरे स्थानोंपर मनुष्योंके बच्चे बड़े पापोंको नष्ट करनेवाला रामतीर्थ कैसे बनेगा ? अनेक मोक्ष-दायक रामेश्वर कैसे स्थापित होंगे ? इस लिए आज मैं कोई ऐसा उपाय करता हूँ कि जिससे रामचन्द्रजी संसारमें सब स्थानोंपर यात्राके उद्देश्यसे सीताजीके साथ जायँ ॥ ४०-४२ ॥ इस यात्रासे लोगोंको शिक्षा भी मिलेगी। इसमें संदेह नहीं है। ऐसा विचार करके कुछ हँसत हुए मुनिने दूतोंसे कहा - ॥ ४३ ॥ हे दूतो ! मेरे बचन सुनो। जिसने बाह्यणपुत्र दशानन रावणको मारा और भाई एवं पुत्रोंके सहित न तीर्थसेवन किया और न यज्ञ ही किया, उस रामके अन्नको मैं नहीं खाऊंगा। आप लोग मुझे जाने दें। मेरी बात रामसे कहियेगा। इसे सुनकर वे अवश्य तीर्थयात्रा तथा यज्ञ करेंगे। मुनिके इस बचनको सुनकर वे घबड़ाये हुए दूत शापके डरसे मुनिको मार्ग देकर रामचन्द्रजीके पास गये। वहाँ पहुँचकर रामजीको प्रणाम करके उनके कानमे उस मुनिकी सबक धीरेसे निवेदन कर दिया ॥ ४४-४७ ॥ श्रीरामने भी मुनिके उस उत्तम अभिप्रायको जानकर सर्व बात
| १८४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५ |
|---|
मंत्रिमित्रैर्बन्धुभिश्च वसिष्ठेन पुरोधसा । मन्त्रयित्वा मुनेर्वाक्यं सत्यं मेने रमापतिः ॥४९॥ ततो निश्चितवान् रामः सभासंस्थे पुरोधसा । आदौ कार्या तीर्थयात्रा यज्ञः कार्यास्ततः परम् ॥५०॥ ततो रामाज्ञया दूता गत्वाऽयोध्यां पुरीं प्रति । तद्वृत्तं च सविस्तारं सुमन्त्राय न्यवेदयन् ॥५१॥ सुमन्त्रोऽपि च तद्वृत्तं श्रुत्वा वस्त्रधनानि च । उष्ट्राश्वस्यनागाद्यैः प्रेषयामास सादरम् ॥५२॥ पुष्पकं च तदा प्राह रामः शक्तिस्तवास्ति हि । यद्यप्यद्य गिरा मे त्वं शीघ्रमेव यथाबलम् ॥५३॥ उष्ट्राश्वानायतीर्नीत्वा च तथोदरे । करिष्यसि सविस्तारं तथा विस्तीर्णतां व्रज ॥५४॥ सर्वथा मत्प्रसादार्थं शक्तिस्तु यथामुखम् । कस्मिन्काले सूक्ष्मरूपं महद्रूपं कदापि च । ५५॥ यथाकामा मया शक्तिस्तव दत्ता न संशयः । तच्छ्रुत्वा रामवचनं पुष्पकं शतयोजनम् ॥५६॥ समन्तस्तथोच्चं हि बभूवाथ द्वियोजनम् । शताट्टालैश्च सोपानैर्हेमरत्नोद्भवैःश्रितम् ॥५७॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशं नानाधातुविचित्रितम् । कलशैः शतसाहस्रैर्हेमरत्नविभूषितैः ॥५८॥ जालरन्ध्रगवाक्षैश्च मुक्ताहारैर्विभूषितम् । कपाटैर्दर्पणैःश्चैतैर्जलयंत्रसुवेष्टितम् ॥५९॥ पुष्पाणां वाटिकाभिश्च नानापक्षिनिनादितम् । अर्धमस्तकतश्च यत्र शतशोऽथ सहस्रशः ॥६०॥ त्रिच्छायां मणवर्णश्च प्रभा विस्मार्यति हि । गोपुराणि च भासन्ते शतशोऽथ सहस्रशः ॥६१॥ तत्र प्राथमिकार्या तु पंक्तौ श्रीराघवज्ञया । उष्ट्राश्वरथनागादीन् दूताश्चारोहयंस्तदा ॥६२॥ द्वितीयायां काष्ठचयान् तृणोलूखलमुसकान् । तृतीयायां धान्वराशीन् पात्राण्यन्नानि वै ततः । ६३॥ पञ्चम्यां तु शतघ्नीश्च ततः सुशस्त्रमनेकशः । तत्र ऊर्ध्वं राजवाहानथश्रेष्ठवरवणान् ॥६४॥ अष्टमायां राजकोशान् वस्त्रधान्यादिनिर्मितान् । हट्टशालास्ततः श्रेष्ठा दासीदासांस्ततः परम् ॥६५॥ भटादीनां ततः शाल्य वाग्मीणां ततः परम् । ततो वीरानधिपांश्च तेभ्यः श्रेष्ठांस्ततः परम् ॥६६॥ गच्छति दुर्गार्यै तान् पञ्चदशार्यपना ततः । रथयोग्यांश्चनोऽत्युच्चैर् गजांश्चैव ततः परम् ॥६७॥
सभामें मुसकाते हुए कहो ॥ ४८ ॥ मंत्रियो, बन्धुओ तथा पुरोहित वसिष्ठजीके साथ परामर्श करके रमापति रामचन्द्रजीने मुनिके वाक्यको सत्यसम्मत माना ॥ ४९ ॥ इसके बाद सभामें पुरोहितके साथ परामर्श करके रामचन्द्रजीने निश्चय किया कि पहले तीर्थयात्रा और उसके बाद यज्ञ करना चाहिए ॥ ५० ॥ ऐसा निर्णय हो जानेके बाद रामचन्द्रजीकी आज्ञामें दूतने अयोध्या जाकर मन्त्री सुमन्त्रसे सब हाल विस्तारपूर्वक कहा । सुमन्त्रने भी उस समाचारको सुनकर सादर वस्त्र-धन आदि ऊंट, घोड़ा, रथ और हाथी आदिपर लदवा-कर रामजीके पास भेजा ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ तब रामने पुष्पकविमानसे कहा—तुम्हारेमें अपार शक्ति है । अतएव तुम अपने बलके अनुसार विस्तृत बनो । यद्यपि तीर्थयात्राके समय ऊंट, घोड़ा, रथ और हाथी आदि की तुम्हारे अन्दर ही निवास करेंगे ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ कामके अनुरूप अर्थात् जैसा कार्य हो, वैसा तुम्हारा रूप भी हो जाय । ऐसी शक्ति तुम्हें मैने दी है । इसमे संशय नहीं है । रामजीके इस वचनको सुनकर सो अट्टालिकाओं और सोने तथा रत्न आदिकी सीढ़ियोंवाला, करोड़ों सूर्योंकी कान्तिवाला, अनेक प्रकारकी धातुओंसे चित्रित, सुवर्ण तथा रत्नजटित सहस्रशः कलशसे युक्त, मोतियोंके द्वारा विभूषित, खिड़कियों तथा चिकोंसे युक्त, काचके फाटकों तथा सैकड़ों फव्वारोंसे शोभित भिन्न-भिन्न प्रकारके पक्षियों द्वारा कलरवित, पुष्पवाटिकाओंसे मण्डित, जिनमें सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें प्रधान द्वार भासित हो रहे थे, इस प्रकार वह पुष्पकविमान सर्वविध साधनोंसे सम्पन्न, शत योजन लम्बा तथा दो योजन ऊंचा हो गया ॥ ५५-६१ ॥ ऐसा हो जानेपर भगवान् रामचन्द्रकी आज्ञासे दूतोंने पहली पंक्ति की अट्टालिकामें ऊंट, घोड़, रथ तथा हाथी आदिको चढ़ा दिया । दूसरी पंक्तिकी अट्टालिकामें काष्ठका ढेर तथा घास, ओखली-मूसल आदि तीसरी अट्टालिकामें अन्नसमूह, चौथेमें भोजनालयके पात्र, पाँचवींमें तोप आदि, छठीमें अन्य विविध प्रकारके शस्त्र, सातवीं अट्टालिकामें राज-घरानेके वाहन, आठवींमें राजकोष, नवों अट्टालिकामें वस्त्र-धन आदिसे युक्त श्रेष्ठ बाजार, दहवों अट्टालिकामें
सर्गः ५ ] यात्राकाण्डम् १८५
आरोहयंस्ततो दूतान्राज्ययोग्याधिकारिणः । स्युःपुत्रजननीभिन्नप्रम्भादालिङ्गतः ।६८।
ततोऽप्यूर्ध्वं राघवस्य सुहृदश्च पुरौकसः । ततो भोजनशालाश्च विंशच्चैव मनोरमाः ।६९।
पाकशालास्ततः पंच स्त्रीणां भोक्तुं ततो दश । तत ऊर्ध्वं हि बन्धूनां मातृणां च गृहाणि च ॥७०॥
तत ऊर्ध्वं राघवस्य सभा सिंहासनन्विता । ततोऽप्यूर्ध्वं च सीताया गेहं नानासखावृतम् ॥७१॥
ततोऽप्यूर्ध्वं राघवस्य क्रीडास्थानं तु सीतया । ततोऽप्यूर्ध्वं पतिव्रतानां राज्ञां सुहृदां स्त्रियः । ७२ ॥
ततः स्त्रीणां सभाथं हि सप्त शालाः शुभावहाः । चित्रशाला द्वादशाथ वयमां पंच वै ततः ॥७३॥
पुष्पारामदिकानां हि पञ्च शालास्ततः शुभाः । ततोऽप्यूर्ध्वं तु शालायां घटीयन्त्रादिकौतुकम् ॥७४॥
व्याघ्रादीनां ततः शाला त्वेका रम्याऽतिविस्तृता ततोऽप्यूर्ध्वमग्निहोत्रशाला श्रीराघवस्य च ॥७५॥
ततः शिवार्चनस्यैका शाला ज्ञेया शुभावहा विप्राणां च ततः शालाः शाला विद्यार्थिनां ततः ॥७६॥
यतीनां च ततः शाला पाठशाला ततः परम् । जलशाला ततः श्रेष्ठा जलयन्त्रान्विता ततः ॥७७॥
ततोऽप्यूर्ध्वमार्द्रवस्त्रशोषणार्थमनुत्तमाः । शतशालास्त्रिभ्यः पूर्णाश्चकृस्ते रामसेवकाः । ७८ ॥
रामोऽपि दृष्ट्वा ताः सर्वा आरुरोह स्वयं तदा । ततो नदत्सु वाद्येषु स्तुवत्सु मागधादिषु । ७९ ।
नर्तन्त्सु वारनारीषु पताकासु चलन्त्सु च । प्रकाशयन् दश दिशो विमानं राघवस्य तत् । ८० ॥
अगमत्पूर्वदिग्भागात् प्रतीचीं तपनोपमम् । विहायसा वायुवेगं किंकिणीजालमण्डितम् ।८१॥
ययौ प्रयाणाभिमुखं श्रीरामध्वजचिह्नितम् ।
विष्णुदास उवाच
कथं रामस्य चन्द्यागे ध्वजाः प्रोक्ताः पुरा त्वया ॥८२।
तन्मे विस्तरेणाद्य श्रोतुमिच्छामि तन्मुखात् ।
श्रीरामदास उवाच
शैब्ये नृपगतौ स्वपितुःस्यन्दनस्थितः ।॥८३।
द्वादशवेंम वेश्याओको, तेरहवेम पहलवानोको, चौदहवेम पैदल चलनेवालोम, पंद्रहवेम श्रेष्ठ घुडसवारतने, सोलहवेम हाथियो तथा हाथीपर सवारो करनेवालोको, सत्रहवेम बन्दूक आदि छोडनेवालोकी अठारहवेम राज्यके अधिकारी दूतोको और उन्नीसवेम रामचन्द्रके मित्र राजाओने अपने पुत्रा एवं स्त्रियो आदिके साथ स्थान पाया । बीसवी कक्षाम नगरके मित्रोका स्थान मिला । इसके बाद बीस भोजनशाला बनी, भातपकानेका ऊपर पाँच शालागृहको स्थान मिला और उनके ऊपर स्त्रियोके दस आश्रमगृह बने, उनके ऊपर भाइयो तथा माताओ के गृह, बादम सिहासनसे अलंकृत राजसभा, राजसभाके ऊपर बहुत-सी सखियो युक्त सीताजीका गृह बना और सीताजीके गृहके ऊपर सीता सहित रामका क्रीडागार बनाया गया । क्रीडास्थानके ऊपर मित्रोकी स्त्रियोको स्थान मिला । इसके बाद स्त्रियोकी सभाके लिये कल्याणदायक सात अट्टालिकाए निर्मित की गयीं । स्त्रीसभास्थानके बाद बारह चित्रशालाये और पाँच पक्षिशालाय निर्मित की गयी । पक्षिशालाके बाद सुन्दर पुष्प आदिके पाँच स्थान बनाये गये । उसके ऊपर की शालामें सात घटीयन्त्र आदि रखे गये । बादमें अति विस्तृत एवं रम्य एक शाला व्याघ्रादि जन्तुओके लिए निर्माण की गयी । उसके ऊपर अग्निहोत्रगृह और अग्निहोत्रगृहके ऊपर शिवजीके पूजनका स्थान, इसके बाद ब्राह्मणोकी विश्रामशाला, विद्यार्थियोका, सन्यासिशाला, पाठशाला, जलयन्त्रादि युक्त सुन्दर जलशाला और जलशालाके बाद गीले वस्त्रोको सुखानेका उत्तम स्थान बना । इस प्रकार रामचन्द्रजीके सेवकोने इन सौ प्रभागोंसे उन अट्टालिकाओंको पूर्ण किया ॥ ६२-७८ ॥ इस प्रकार सर्वथा पूर्ण देखकर रामचन्द्रजी स्वयं विमानपर बैठे । रामचन्द्रजीके बैठनेके बाद बाजे बजने और भाटोके द्वारा स्तुति करने एवं वेश्याओके नाचनेपर दसो दिशाओको प्रकाशित करता हुआ सूर्यके समान तेजस्वी तथा पवनके समान वेगवाला रामचन्द्रजीकी ध्वजासे चिह्नित वह विमान रामके आज्ञानुसार पूर्वदिशासे पश्चिमकी ओर प्रस्थानके लिए चला
१८६ आनन्दरामायणे [सर्गः ५]
अतः सोऽप्यस्य रामस्य कोविदारध्वजः स्मृतः । बाणध्वजाङ्कितरथमारुह्य ताटिकां वने ॥८४॥
जघानेकेन बाणेन तस्माद्वाणध्वजः स्मृतः । छिन्नं वज्रध्वजं दृष्ट्वा रावणेन स राघवः ॥८५॥
ध्वजेऽकरोद्वायुपुत्रं तस्मान्प्रोक्तः कपिध्वजः । रथे विमूर्च्छितं दृष्ट्वा रामो मातलिं तदा ॥८६॥
स्थितः स्वीयरथे दिव्ये तस्माच्च गरुडध्वज शुक्लायां हि पताकायां कोविदारोऽस्ति वै शुभः ८७॥
बाणःशुभोऽस्ति नीलायां हरितायां तु मारुतिः पीतायां गरुडो ज्ञेयः श्रीरामस्यदनोपरि ॥८८॥
चतुर्षु स्यन्दनेष्वेवं चत्वारः कीर्तिता ध्वजाः । कोविदारध्वजो रामः श्रीरामो मार्गणध्वजः ॥८९॥
कपिध्वजो राघवेन्द्रो भूपेशो गरुडध्वजः । एवं नामान्यनन्तानि प्रोच्यन्ते राघवस्य हि । ९०।
तस्माद्रामध्वजाः प्रोक्ताश्चत्वारश्च मया तव । वज्रध्वजाङ्कितरथे स्थित्वा रामेण संगरः ॥९१॥
कृतस्तस्माद्राघवेन्द्रं तं वदन्त्यशनिध्वजम् । अतो रामध्वजस्यैकमेव चिह्नं न विद्यते ॥९२॥
तस्मात्क्षिप्व मया प्रोक्ताश्चत्वारो रथध्वप्रियाः । कोविदाराङ्कितरथे सुमन्त्रः सारथिः स्मृतः ।९३।
बाणध्वजाङ्कितरथे सुमित्रूथः स्मृतः । वायुपुत्राङ्कितरथे सारथिर्विजयः स्मृतः ॥९४॥
रामस्य दारुकः सूतः स्यंदने गरुडाङ्किते । एवं शिष्य त्वया पृष्ट श्रीरामध्वजकारणम् ॥९५॥
तया पूर्वं मया तच्च तवाग्रेऽद्य निवेदितम् ॥९६॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे कुम्भोदरोपाख्यानं नाम पंचमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठः सर्गः
( पूर्वदेशके तीर्थोंकी यात्रा )
श्रीरामदास उवाच
ततो राघो विमानेन गत्वा किंचित् पश्चिमाम् । दिशं ययौ प्रयागं च त्रिवेणी यत्र वर्तते ॥ १ ॥
विष्णुदासने कहा कि आप ( रामदास ) ने रामकी चार ध्वजायें जो पहले कही थीं, उन्हें अब विस्तारसे कहें । श्रीरामदास बोले बाल्यकालमे रघुनाथजी अपने पिताके रथपर बैठेथे ७२-८३ । इसलिये वह रामका रथ कोविदारध्वज कहा जाता है । वाण-ध्वजासे चिह्नित रथपर बैठकर एक ही बाणसे वनमे ताड़काको मारनेके कारण वे बाणध्वज कहलाये । रावणके द्वारा वज्रध्वजा कटनेके बाद महावीर हनुमान्का ध्वजापर बैठानेसे वे कपिध्वज नामसे प्रसिद्ध हुए । रथमे मातलिको मूर्च्छित देखकर अपने रथपर गरुड़को बैठानेसे गरुड़ध्वज हुए । किस ध्वजामें किसका चिह्न है, सो बताते हैं। श्वेत पताकामें कोविदार, नील पताकामे बाण, हरितमें मारुति, पीत पताकामे गरुड़ । इस प्रकार रामजीके रथपर स्थित चिह्नोंको जानना चाहिए ॥ ८४-८८ ॥ इस तरह चारों रथोपर चार ध्वजायें मैने कहीं । कोविदार ध्वजावाले राम बाण ध्वजावाले श्रीराम ॥ ८९ ॥ कपिसे चिह्नित ध्वजावाले राघवेन्द्र और गरुड़से चिह्नित ध्वजावाले भूपेश । इस प्रकार रामचन्द्रके अनन्त नाम हैं ॥ ९० ॥ इसलिए मैने तुम ( विष्णुदास ) से रामकी चार ही ध्वजायें कहा है वज्रसे अंकित ध्वजावाले रथपर बैठकर रामचन्द्रजीने युद्ध किया था । राघवेन्द्र नामवाले रामको अशनिध्वज कहते हैं । रामचन्द्रकी ध्वजाका एक ही चिह्न नहीं है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ इसलिए मैने छांटकर रामकी अति प्रिय ध्वजाओको ही कहा है । कोविदार ध्वजासे चिह्नित रथपर सुमन्त्र, बाणध्वजमे चिह्नित रथपर चित्ररथ और कपिध्वजसे अंकित रथपर विजय नामके सारथी कहे गये हैं । रामके गरुड़ांकित रथपर दारुक सारथी रहता है । इस प्रकार ओ तुम (विष्णुदास) ने श्रीरामकी ध्वजाका कारण पूछा, सो मैने आज तुमसे कहा है ॥ ९३-९६ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकांडे भाषाटीकायां कुम्भोदरीपाख्यानं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
श्रीरामदासने कहा- बादमें श्रीराम विमान द्वारा कुछ पश्चिम दिशाकी ओर जाकर प्रयाग पहुँचे ।
सर्गः ६ ] | यात्राकाण्डम् | १८७
| सर्गः ६ ] | यात्राकाण्डम् | १८७ |
|---|
क्रोशमात्रे विमानं तन्मुक्त्वा रामः ससीतया । पद्ध्या शनैः शनैरेव त्रिवेणीमगमत्तदा ॥ २ ॥ नारिकेलं सवस्त्रेन समर्प्य रघुनंदनः चतुर्गुलमानं हि केशबन्धं सभूषणम् ॥ ३ ॥ हस्ते संछिय सीतायाः स्वयं संस्पर्शनाद्व्रतेः । लक्ष्मणस्यार्य्यसूनुश्च वपनं रघुनंदनः ॥ ४ ॥ मातृभिः कारयामास कृत्वा चैकमुपोषणम् । द्वितीये दिवसे प्राप्ते कृत्वा भ्रातृ स्तर्पणम् ॥ ५ ॥ मासमात्रं माघमासे वासं कृत्वा सविस्तरम् । प्रहतीर्थीं ततो गत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥ ६ ॥ दृष्ट्वाऽक्षयवटं रम्यं निद्रास्थानं निजाम्बये । किंचिद्धिहस्य श्रीरामः सीतया भ्रातृभिः सह ॥ ७ ॥ पूजां कृत्वा त्रिवेण्याश्च वस्त्रैर्दिव्यैः सुभूषणैः । गङ्गाजलैः कामकुम्भान् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥ पूरयित्वा विमानाग्र्ये स्थाप्य तीर्थं पुरोहितान् पूजयित्वा सविस्तारं नत्वा चैव पुनः पुनः ॥ ९ ॥ तान् पृष्ट्वा पुष्पके स्थित्वा वयावकाशवर्त्मना । विन्ध्याचल समाश्रित्य यत्र दुर्गा तु वर्तते ॥ १० ॥ तत्र स्नात्वा तीर्थविधि पूर्ववच्च विधाय सः । तां विन्ध्यवासिनी पूज्य वस्त्रैराभरणादिभिः ॥ ११ ॥ कृत्वा दानान्यनेकानि तोष्य तीर्थपुरोहितान् । ययौ काशीं पुष्पकस्थः श्रीरामः सीतया सुखम् ॥ १२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा काशिस्याः पुष्पकं तु तत् । कोटिसूर्यप्रतीकाशं दृष्ट्वा पश्चिमततो दिशम् ॥ १३ ॥ यत् प्राचीं काश्याभिमुखमागच्छन्तं महोज्ज्वलम् । चक्रस्येवान्निदीर्घाश्च शतशोऽथान्तसंस्थिताः ॥ १४ ॥ केचिदूचुश्च दावाग्निस्तस्य पर्वत मस्तके सूर्य्यश्च विस्मृतः पन्था भ्रमणाद्भ्रान्तिमावमः ॥ १५ ॥ इति केचित्पुनः प्रोचुः केचिदुत्तुङ्गय मुनिः । नारदस्तु समायाति केचित्तत्र समाधिरे ॥ १६ ॥ वान्वभौ रविः स्वर्गात् केचिद्रोणाचलस्त्वितः । वायुपुत्रोऽयमिति ते प्रोचुः काशीनिवासिनः ॥ १७ ॥ केचिदूचुः शशी स्वर्गात्त्योम विनिपातितः । केचित्पुत्रश्च विप्रश्च केचित्सुः सुदर्शनम् ॥ १८ ॥
जहाँपर कि पण्डितराजका त्रिस्थली विद्यमान है ॥ १ ॥ त्रिवेणी से एक कोस दूर श्रीराम जानकीजीके साथ विमानसे उतर पड़े और धीरे धीरे पैदल ही त्रिवेणीके संगमपर गये ॥ २ ॥ वहाँ जाकर रघुनन्दनने त्रिवेणीको नारियल समर्पण करके भूषणोंसे गूँथा हुआ जानकीका केशपाश (जूड़ा) चार अँगुल लम्बा काटकर त्रिवेणीमें प्रवाहित कर दिया। पश्चात् स्वयं भी "प्रयागे मुण्डनं श्रेष्ठं" के अनुसार क्षौर करवाया। राघव उसी प्रकार माताओं, भाइयों तथा अन्यान्य सर्व-सम्बन्धियोंका भी क्षौर करवाया। तदनन्तर सबने उपवास करके दूसरे दिन तर्पण तथा श्राद्ध किया। पश्चात् यथाविधि माघ महीने-भर वहीं कल्पवास किया। उसके उपरान्त प्रयागके प्रसिद्ध त्रिवेणी, वेणीमाधव, सोमनाथ, भारद्वाज, नाग-वासुकी, अक्षयवट, रथा भ्रमर आदि तीर्थों (महातीर्थों) की यात्रा की और विप्रोंको अनेक प्रकारके दान दिये। ३-६ ॥ अपने प्रलयकालीन निद्रास्थान अक्षयवटको देखकर राम कुछ मुस्कुराये। पश्चात् सीता तथा भाइयोंके साथ मिलकर सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणोंसे त्रिवेणी महाराजकी पूजा की। उसके बाद हजारों कांवड़ गङ्गाजलसे भरवाकर अपने विमानपर रखवा दिये। तोषक पुरोहितोंका विस्तारसे पूजा तथा सत्कार किया। तदनन्तर उनको नमस्कार किया और उनकी आज्ञा लेकर राम विमानपर सवार हो गये। तत्पश्चात् आकाशमार्गसे विन्ध्याचल पधारे। जहाँ विन्ध्यवासिनी दुर्गाजीका दिव्य मन्दिर है ॥ ७-१० ॥ वहाँ रामने स्नान किया और पूर्ववत् वहाँपर का तीर्थविधिका पालन किया। वस्त्र तथा आभरण आदि सामग्रीसे विन्ध्यवासिनी देवीकी पूजा की ॥ ११ ॥ अनेक दान देकर वहाँके पुरोहितोंको प्रसन्न किया। पश्चात् श्रीराम सीताके साथ पुष्पक विमानपर सवार होकर सुखपूर्वक काशीको चले ॥ १२ ॥ उस समय काशीनिवासी जन उस करोंड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान् तथा अतिउज्ज्वल विमानको पश्चिम दिशासे काशीकी ओर आते देखकर हजारोंकी संख्यामें महलोंकी छतोंपर चढ़ गये और उसके विषयमें अनेक तर्क-वितर्क करने लगे ॥ १३ ॥ १४ ॥ कोई कहने लगा कि यह पर्वतके ऊपर दावाग्नि जल रही है। कोई कहता कि सूर्य रास्ता भूलकर इधर-उधर भटक रहा है। १५ ॥ कोई कहता कि यह तो नारद मुनि आकाशसे आ रहे हैं। किसीने कहा कि स्वर्गसे सूर्य नीचे गिर रहा है। कोई कहता कि यह द्रोणाचलको लिये हनुमान्जी आ रहे हैं ॥ १६ ॥ १७ ॥ कोई कहने
१८८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
केचिदूचुः स्वर्णाद्रिं केचिन्प्रोद्गामुरुत्थतम् , कोऽप्यत्रिजाजातं केचित्तु प्रलयानलम् ॥१९॥ केचिन्त्याहुर्महाघोरं बाणमस्त्रं केन मोचितम् । केचित्प्रोचुः सहस्रास्यस्वरूपं फणिराजितम् ॥२०॥ एवं वदंस्तस्ते यानं ददृशुः पुष्पकं महत् । महाकोलाहलं चक्रुः प्रोचुस्स्वयं समागतः ॥२१॥ रामोऽयोध्यापतिः श्रीमान् मार्गे कर्तुं मनागर । विश्वनाथोऽपि तच्छ्रुत्वा पार्वत्या वृषमस्थितः ॥२२॥ प्रयुञ्छानं काशीस्थैः परिवेष्टितः । उपायनं राघवस्य गृहीत्वा बहुविस्तरम् ॥२३॥ एतस्मिन्नन्तरे रामस्ते देहलिविनायकम् । पूज्यं ढुंढेश्वरं दृष्ट्वा ननाम शिरसा तदा ॥२४॥ आलिङ्गितः शिवेनश्च गृहीत्वोपायनं शिवात् । स्वयं वस्त्रैराभरणैः पूजयामास शङ्करम् ॥२५॥ विवेश काशिनाथस्य धृत्वा हस्तेन मन्करम् । तावुभौ वाहनं मुक्त्वा जग्मतुर्मणिकर्णिकाम् ॥२६॥ ततः सीतापती रामश्चक्रपुष्करिणीजले । समर्प्य श्रीफलं स्नात्वा सर्चत धीरपूर्वकम् ॥२७॥ नित्ययात्रां विधायाथ कृत्वा चैकोपवेषणम् । तीर्थश्राद्धादि सग्नाय पञ्चतीर्थी विधाय च ॥२८॥ अन्तर्गृहीं महायात्रां मानसमन्दमेव च । द्विचत्वारिंशल्लिङ्गानि षड्लिङ्गानि वै ततः ॥२९॥ षट्पञ्चाशच्च गणपांस्तथाष्टौ भैरवान् पुनः । योगिनीश्च चतुःषष्टीस्तथा दुर्गाश्च वै नव ॥३०॥ तथाऽष्टादिक्पतींश्चापि तथा चैव नवग्रहान् क्षेत्रप्रदक्षिणां पञ्चक्रोशीयात्राम् रघूत्तमः ॥३१॥ चतुर्दशेमा यात्रारतु कृत्वा चैव सविस्तरम् । रामेश्वरं महालिङ्गं वरुणायास्तटे शुभे ॥३२॥ काश्या वायव्यदिग्भागे सीतया स्थाप्य चोत्तमम् । रामनाथं त्वयन्नाम्ना मार्गारब्धां चकार सः॥३३॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र वायुपुत्रः समागतः । वृत्तं श्रुत्वा राघवस्य यात्राः कर्तुं गतोऽस्त्विति ॥३४॥ सीतारामौ नमस्कृत्य स्नात्वा भगीरथे जले । स्वनाम्ना शङ्करं तीर्थमकरोद्जाह्रवीतटे ॥३५॥
लगा कि सुपने स्वर्गसे चन्द्रमाको नीचे गिरा दिया है। कोई उसको विष्णु, कोई सुमेरु पर्वत, कोई अरुन्धती तारा, कोई गरुड और कोई प्रलयाग्नि बताने लगा ॥१८-१९॥ कोई कहने लगा कि किसने महाघोर बाणयास्र छोडा है। कोई कहने लगा कि यह सहस्रमुख सर्प है॥२०॥ इस प्रकार वे सब तर्क वितर्क कर ही रहे थे कि पुष्पकविमान उनके पास आ पहुँचा। यह देखकर सब लोग कोलाहल करते हुए आश्चर्यपूर्वक एक-दूसरेसे कहने लगे कि यह तो साक्षात् अयोध्याधिपति श्रीमान् राम नगरवासियोंके साथ यहाँ यात्राके लिये पधारे हैं। यह सुनकर स्वयं काशीविश्वनाथजी बहुत-से भेंट लेकर बैलपर सवार हुए और नगरवासियोंको साथ लेकर रामके समक्ष आ उपस्थित हुए ॥२१-२३॥ इस बीच रामने देहलीविनायक तथा ढुंढिराजके दर्शन कर ही लिये । जब उन्होंने शिवजीको प्रत्यक्ष देखा तो सिर नवाकर प्रणाम किया ॥२४॥ शिवजीने रामका आलिङ्गन किया। शिवजीकी दी हुई भेंट स्वीकार करके स्वयं रामने भी वस्त्र तथा अलङ्कारसे शिवजीकी पूजा की ॥२५॥ तदनन्तर अपने हाथसे काशिनाथके सुन्दर हाथको पकड़कर रामने काशीमें प्रवेश किया। पश्चात् वे दोनों वाहन छोड़कर मणिकर्णिका गये ॥२६॥ वहाँ सीता सहित रामने और आदि करवाकर चक्रपुष्करिणी कुण्डमें श्रीफल समर्पण करके सहर्ष स्नान किया ॥२७॥ नित्ययात्रा करके एक दिनका उपवास किया। तदुपरा ब्लॉक... तीर्थश्राद्धादि कर्म करनेके बाद पञ्चतीर्थी की ॥२८॥ बादम अन्तर्गृही, महायात्रा, दोनों मानसकी यात्रा तथा बयालीस और आठ लिङ्गोंकी यात्रा की ॥२९॥ छप्पन गणपालोंकी यात्रा, आठ भैरवोंकी यात्रा, चौंसठ योगिनियोंकी यात्रा, नव दुर्गाओंकी यात्रा, ॥३०॥ आठ दिक्पालोंकी यात्रा और क्षेत्रकी प्रदक्षिणारूपिणी पञ्चक्रोशीकी यात्रा की ॥३१॥ इस प्रकार रामने उपर्युक्त चौदहों यात्राओंको विधिवत् पूर्ण किया । तदनन्तर काशीके वायव्यकोणकी सीमामें वरुणा नदीके तटपर श्रीमान् परम पवित्र तथा मनोहर रामेश्वर नामक महालिङ्ग स्थापित करके अपने नामसे भगवती भागीरथी के तटपर रामतीर्थ अर्थात् रामघाट भी स्थापित किया ॥३२॥३३॥ राम यात्रा करने निकले हैं, यह समाचार सुनकर वायुपुत्र हनुमान्जी भी वहाँ आ पहुँचे ॥३४॥ वहाँ उन्होंने सीता तथा रामको प्रणाम करके गङ्गामें स्नान किया। फिर जाह्नवीके किनारे उन्होंने
सर्गः ६ ] यात्राकाण्डम् १८९
घट्टं बबन्ध गङ्गायास्तटे रम्यं दृढन्मयम् । काश्यामद्यापि तन्नाम्ना घट्टोऽस्ति परमः शुभः ॥ ३६ ॥
तथा चकार रामोऽपि घट्टञ्चञ्चन्मृण्मयम् । दृश्यते प्रत्यहं यत्र काश्यां रामः ससीतया ॥ ३७ ॥
चकार पञ्चगङ्गायां कार्तिकस्नानमुत्तमम् । काशीवासं वर्षमेकं चकार धर्मतत्परः ॥ ३८ ॥
तीर्थवासिनः सर्वान् सन्तर्प्य च पृथक् पृथक् । रत्नैर्हिरण्यैर्वासोभिश्चाभरणैर्धेनुभिः ॥ ३९ ॥
विविधैश्च दक्षाऽन्नैः स्वर्णशृंग्यादिनिर्मितैः । अमृतस्वादुपक्वान्नैः पायसैश्च सशर्करैः ॥ ४० ॥
सगोभिरन्नदानैर्धान्यदानैरनेकशः । गन्धचन्दनकर्पूरैस्ताम्बूलैश्चामरैः ॥ ४१ ॥
सतूलैर्मृदुपर्यङ्कैर्दीपिकादर्पणासनैः । शिबिकादावदासीभिवाहनैः पशुभिर्गृहैः ॥ ४२ ॥
चित्रध्वजपताकाभिश्चूलोद्यद्यंत्रचारुभिः । नानावस्त्रैर्महाहैः सच्छत्राशफामादाभ्यः ॥ ४३ ॥
वर्णाश्रमप्रदानैश्च गृहोपस्करसंयुतैः । उपानत्पादुकाभिश्च यतेश्चापि तपस्विनः ॥ ४४ ॥
योग्यैः पट्टदुकूलैश्च मृत्स्नैश्चित्रेकम्बलैः । दण्डैः कमण्डलुयुतैराजनैर्मृगचर्मभिः ॥ ४५ ॥
कौपीनैरुच्चमञ्चैश्च परिवारककाञ्चनैः । मठाविद्यार्थिनाम्नेनाश्रयार्थं महाधनैः ॥ ४६ ॥
बहुषोधप्रदानैश्च भिषजां जीवनादिभिः । महत्पुस्तकसभारैर्लेखकानां च जीवनैः ॥ ४७ ॥
म्यायनेसमूल्यैश्च पत्रदानैरनेकशः । ग्रैष्म प्रपात्रद्यूषणहैमन्तेऽम्नाष्टकेन्धनैः ॥ ४८ ॥
छत्राच्छादनकार्यैश्च वर्षाकालोचितैर्बहु । रात्रौ पाठप्रदपैश्च शराभ्यञ्जनकादिभिः । ४९ ॥
पुराणपाठकांश्चापि प्रतिदेवालयं धनैः । देवालये नृत्यगानकराण्याचरन्नकशः । ५० ॥
देवालये सुधाकार्यैर्जीर्णोद्धारैरनेकशः । चित्रलेखनमून्यैश्च रङ्गशालादिसम्डनैः । ५१ ॥
जातीर्तिकर्पूग्मुलैश्च दशंशादिमुपूवकैः । कस्तूरिकार्थेश्च दत्वाचाचरन्नकशः । ५२ ॥
एक कल्याणकारी तीर्थ बनाया ॥ ३५ ॥ गङ्गाजीके तटपर उन्होंने सुन्दर पक्काका एक घाट बनवाया, जो कि अभी भो काशीम हनुमानघाट के नामसे प्रसिद्ध है ॥ ३६ ॥ इस प्रकार रामनन्दन भी उत्तम घाट बनवाया, जो कि आज दिन भा काशामे रामघट के नामसे वर्तमान है। पश्चात् रामन सताक साथ पञ्चगङ्गाम स्नान किया उस समय कार्तिकका उत्तम मास था। इस प्रकार रामनं १ वर्षभर काशाम धर्मतत्पर होकर निवास किया ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ पश्चात् समस्त तीर्थवासियों को पृथक् पृथक् रत्न सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, आभरण, गाय, सोना-चांदाक विभिन पत्र, अमृततुल्य पकवान तथा शर्कर मिश्रित दुग्धदानस प्रसन्न किया ॥ ३९ ॥ ४० ॥ व सयुक्त अन्नदान तथा धान्यदानस भो उन्ह सन्तुष्ट किया। बहुतको सुगन्धित चन्दन, कपूर, ताम्बूल, मनोहर चमर, कोमल तूला भरे हुए गर्म तकिए, दीवट, दर्पण, आसन, पालका, दास दासी, वाहन, पशु तथा भवन देकर प्रसन्न किया ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ बहुतोको चित्र-विचित्र ध्वज-पताका, चन्द्रमाका नासिका समान निमल छतरी, शालिग्राम, बड़े-बड़े छत्र दान करक ध्वजारोपण, वर्णाश्रमदान तथा गृहस्थाका सामग्री देकर प्रसन्न किया। विप्राकी उपानह तथा संन्यासी यतियों और तपस्वियोंको खडाऊं, उनके योग्य कमलरोगरहित वस्त्र, कम्बल, दण्ड-कमण्डलु, चित्र-विचित्र मृगचर्म, कौपीन, ऊंचे-ऊंचे खटोले, सदक, मठ, उसका रत्ताक लिए तथा विद्यार्थी और अतिथिसत्कारक लिए सुवर्ण तथा बहुत-सा धन देकर संतुष्ट किया ॥ ४३-४६ ॥ वैद्याको उनकी जीविकाक साधनभूत बहुतसे औषध दान देकर, लेखकोंकी जीविकाके साधनभूत बहुतसे पुस्तकसमूह देकर, बहुतोंको बहुमूल्य रसायन दान देकर और बहुतोंके लिए अन्नक्षेत्र खोलकर सन्तुष्ट किया। बहुतोंका ग्रीष्मऋतुमे पीनेके वास्त जन दकर तथा बहुतोंको हेमन्तक योग्य काष्ठ बादिके वास्ते द्रव्य देकर प्रसन्न किया ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ बहुतोंको वर्षाकालोचित छत्र तथा आच्छादन देकर आनन्दित किया । बहुतोंको रात्रिके समय पढ़नेके लिए दीवादिका प्रबन्ध कर दिया। बहुतोंको शरीरमें अभ्यङ्ग ( मालिश ) करनेके लिए तैल आदि सुगन्धित द्रव्योंका दान देकर राजी किया। ४९ ॥ हर एक देवालयमे पुराणपाठ करनेवालोंको धन देकर संतुष्ट किया। देवालयोंमें अनेक नृत्य गीत करवाये। उनका जीर्णोद्धार करवाकर चूना पुतवा दिया। उनमें बहुतेरे चित्र बनवा दिये। उनमें केशर बादि रङ्ग तथा माला आदिका प्रबन्ध करवा दिया ॥ ५० ॥ ५१ ॥ देवपूजाके
१२० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
पञ्चामृतानां स्नपनैः सुगन्धस्नपनैरपि । देवार्थं मुख्यताम्बूलैः देवोद्यानैर्नैकशः ॥५३॥ महापूजार्थं माल्यादिगुम्फनार्थं त्रिकालतः । शङ्खभेरीमृदङ्गादिवाद्यनादैः शिवालये । ५४॥ घण्टामृदङ्गकुम्भादिस्नानोपकरणाननैः । श्वेतमार्जनवस्त्रैश्च सुगन्धैर्यक्षकर्दमैः ॥५५॥ जपहोमैः स्तोत्रपाठैः शिवनामोच्चचारणैः । रासक्रीडादिसंयुक्तश्चामरैः प्रदक्षिणैः ॥५६॥ एवमादिभिरुद्दण्डैः क्रियाकाण्डैर्नैकशः वर्षमेकमुषित्वा तु कृत्वा तीर्थान्यनेकशः ॥५७॥ दीनानाथांश्च सन्तर्प्य नत्वा विश्वेश्वरं विभुम् । ब्रह्मचर्यादिनियमैर्ऋतुकालगमेन च ॥५८॥ मत्स्यसम्भाषणेनापि तीर्थमेवं प्रभाव्य च । नत्वा पुनर्विश्वनाथं कालराजं गणाधिपम् ॥५९॥ अन्नपूर्णां दण्डपाणिं दृष्ट्वा स्तुत्या प्रणम्य च । अनुज्ञातः शिवेनाथ विमानेन रघूत्तमः ॥६०॥ ययावाकाशमार्गेण गङ्गाया दक्षिणे तटे । कर्मनाशां नदीं दृष्ट्वा च्यवनस्याश्रमं ययौ ॥६१॥ रामचन्द्रः पुष्पकस्थः स्नात्वा नत्वा मुनीश्वरम् रामतीर्थं च रामेशं चकार तत्र राघवः । ६२। निजबाणकृतां रेखां दर्शयामास तान् जनान् । काश्या अप्यधिकान्यत्र दत्त्वा दानान्यनेकशः ६३॥ ययौ यानेन दिव्येन स्वर्णभद्रस्य सङ्गमम् । यानि यानि हि तीर्थानि राघवश्च गमिष्यति । ६४॥ उत्तरोत्तरतस्तेषु दानाधिक्यं करिष्यति । यत्र यत्र रघुश्रेष्ठो गमिष्यति ससीतया । ६५॥ तत्र तीर्थान्यनेकानि भविष्यन्ति महान्ति च शेषोऽपि तेषां संख्यां हि वक्तुं नात्र क्षमो भवेत् ॥६६॥ तेषु तीर्थानि श्रेष्ठानि षड् ज्ञेयानि मनीषिभिः । बन्धूनां चैव चत्वारि सीतायाः पञ्चमं स्मृतम् । ६७॥ षष्ठमञ्जनिपुत्रस्य सर्वत्रैव विनिश्चयः । रामः स्नात्वा स्वर्णभद्रगङ्गयोः सङ्गमे मुदा ।६८। त्रिरात्रं समतिक्रम्य गण्डकीसंगमं ययौ । कस्मिंस्तीर्थे त्रिरात्रं च पञ्चरात्रमथ क्वचित् ।६९॥
दिए आरती गुगुल दशांग, धूप, दीप, कपूर आदि अनेक वस्तुयें दिलवायीं ॥ ५२ ॥ देवताओंके लिए पंचामृतके स्नानका प्रबन्ध, सुगंधित गुलाबजल आदिसे स्नानका प्रबन्ध मुख्यताम्बूल पान आदिका प्रबन्ध, तथा उनके लिए उद्यान आदिका प्रबन्ध भी करवा दिया ॥ ५३ ॥ सब शिवालयोंमें त्रिकाल पूजाके लिए माला गूँथनेका प्रबन्ध, शंख, नगाड़ा मृदंग आदि बाजोंका प्रबन्ध एवं घडी घंटा कलश गड़वा तथा स्नानके सामानका प्रबन्ध कर दिया। मार्जनके लिए श्वेत वस्त्र तथा सुगंधित द्रव्य चन्दन, केशर, अगर, तगर, कपूर आदिके लेपनका भी स्वयं ही प्रबन्ध करवा दिया। उसी प्रकार देवालयोंमें जप, होम, स्तोत्रपाठ, उच्च शिवनामोच्चारण प्रदक्षिणा तथा चँवर लेकर रासक्रीड़ा आदि अन्यान्य क्रियायें करते हुए रामने काशीमें एक वर्ष बिताया वहाँके अनेक तीर्थ किये । उन्होंने दीनानाथ विश्वेश्वर भगवान् शिवका सन्तुष्ट किया, ऋतुकालमें ही ब्रह्मचर्य धारणकर तथा मत्स्यसंभाषणका अनुष्ठान करके वीर्यके नियमोंका पालन किया। अनन्तर विश्वनाथको, कालभैरवको, गणाधिपको, अन्नपूर्णाको तथा दण्डपाणिको बारंबार नमस्कार करके तथा उनकी स्तुति करके उनसे जानेकी आज्ञा माँगी । उनसे अनुज्ञात होकर रघूत्तम राम विमानपर सवार हुए ॥ ५४-६० ॥ और आकाशमार्गसे गङ्गानदीके दक्षिण तटकी ओर चल दिये । रास्तेमें उनको कर्मनाशा नदी मिली । बादमें च्यवनमुनिके आश्रमपर पहुँचे ॥ ६१॥ पुष्पक विमानसे उतरकर रामचन्द्रजीने स्नान करके मुनिके दर्शन किये और यहाँ अपने नामसे रामेश्वर तथा रामतीर्थ स्थापित किया ॥ ६२ ॥ वहाँ अपने साथवालोंको अपनी बनायी हुई बाणका रेखा दिखलायी अन्तमें वहाँपर काशीसे भी अधिक दान पुण्य करके दिव्य विमानके द्वारा शोणभद्र तथा गङ्गाके सङ्गमपर गये। उसी प्रकार आगे भी राम जिन-जिन तीर्थोंमें जायेंगे, वहाँ-वहाँ उत्तरोत्तर अधिक दान करेंगे जहाँ जहाँ राम सीताके साथ पधारेंगे वहाँ वहाँ अनेक बड़े बड़े तीर्थ बनेंगे । जिनकी संख्याको शेष-नाग भी नहीं बता सकते ॥ ६३-६६॥ परन्तु विचारशील लोगोंको उनमें भी छः तीर्थोंको मुख्य समझना चाहिये। चार चार भाइयोंके, पाँचवाँ सीता तथा छठवाँ हनुमानका। इनके विषयमें कभी भी संदेह नहीं करना चाहिये । श्रीराम शोणभद्र तथा गङ्गाके सङ्गममें स्नान करनेके पश्चात् वहाँ तीन रात निवास करके प्रसन्न मनसे
सर्गः ६] यात्राकाण्डम् १९१
सप्तरात्रं क्वचिच्चापि पक्षमेकमथ क्वचित्। अष्टादशैकविंशद्वा त्रिमासं च क्वचित्प्रभुः ॥७०॥
चकार वासं तीर्थेषु धर्मान् कुर्वन् यथामखम्। गंडकीसंगमे स्नात्वा नेपाले जगदीश्वरम् ॥७१॥
दृष्ट्वा हरिहरक्षेत्रं ययौ रघुकुलोद्वहः। एवं कुर्वन् स तीर्थानि सर्वाणि रघुनन्दनः ॥७२॥
पुनः पुनः सगाम च ययौ जाह्नविदक्षिणे। वैकुण्ठनगरं गत्वा जरासन्धपुरं ययौ ॥७३॥
वैकुण्ठाख्ये जले स्नात्वा ततो रामो ययौ गयाम्। फल्गुनद्यास्तटे पूर्व मुक्त्वा तद्यानमुत्तमम् ॥७४॥
नत्वा विष्णुपदं दिव्यं पुनर्यानान्तिकं ययौ। तां निशां गमयित्वाथ प्रभाते रघुनन्दनः ॥७५॥
स्नातुं फल्गुनदीतीर्थे ययौ तीर्थं द्विजैः सह। एतस्मिन्नन्तरे सीता सखीभिः परिवेष्टिता ॥७६॥
ययौ स्नातुं फल्गुन्यां स्नात्वा पूज्य सुवामिनीः। सैकते सा क्षणं तस्थौ पूजनार्थं महेश्वरीम् ॥७७॥
वालुकापञ्चपिंडैश्च दुर्गां कर्तुं समुद्यता। गृहीत्वा वामहस्तेन माद्रीं सा सिकतां तदा ॥७८॥
सव्येन कृत्वा पिंडं तु यावत्सा पाणिना भुवि। स्थापयामास तावत्तु ददर्श अगतीतलात् ॥७९॥
विनिर्गतं हस्तमथ श्वशुरस्य करं शुभम्। दक्षिणं निजहस्तात्तु गृहीत्वा विष्णुरूपधृक् ॥८०॥
गच्छन्तं भूतलं रम्यं तद्दृष्ट्वा कौतुकं पुनः। द्वितीयं स्थापयामास भुवि पिंडं तु सैकतम् ॥८१॥
सोऽपि नीतः पूर्ववच्च ह्यवमष्टात्तरं शतम्। ददौ पिडान कौतुकेन ततः श्रान्ता विदेहजा ॥८२॥
मनसा पूज्य दुर्गां सा ययौ यानं स्वरान्विता। तद्वृत्तं न सखीभिस्तु ज्ञातं रामेण वाऽपि न ॥८३॥
तथापि कथितं नैव किं रामो मां वदिष्यति। इति भीत्या ततो रामः पञ्चतीर्थं विगाह्य च ॥८४॥
प्रेतपर्वतमासाद्य पिंडदानमथाऽकरोत्। कनिष्ठिकाया निष्कास्य निजनामांकितां शुभाम् ॥८५॥
कांचनीं मुद्रिकां गव्यां दक्षिणाभिमुखस्तदा अपहतेति मंत्रेण चकार भुवि राघवः ॥८६॥
गंडकीके सङ्गमकी ओर सिधारे। श्रीराम प्रथम जिस स्थानपर तीन रात, कहीं पाँच रात कहीं सात रात, कहीं एक पक्ष, कहीं अठारह दिन, कहीं इक्कीस दिन और कहीं तीन मास पर्यन्त सुखसे निवास किया। गंडकीके सङ्गममें स्नान करके श्रीहरि नेपालम पशुपतिनाथका दर्शन के गये। ६७-७०॥ बादन रघुकुलभूषण राम हरिहरक्षेत्र गये। इस प्रकार रघुनन्दन राम तं र्थाटन समय बीच बीचम बार-बार गङ्गाके दक्षिण सङ्गमपद पधारत थे। बाइस वैकुण्ठ नगर होते हुए जरासन्धक राजगृह नगर गये ॥ ७१ ७३ ॥ पश्चात् वैकुण्ठके जलमे स्नान करके गयाजी गये, फल्गुनदीक पूर्वतटपर विमानको छोड़कर दिव्य विष्णुपदके दर्शनार्थ गये। दर्शन करनक बाद पुनः यानके पास लौट आय और रात्रिको वही व्यतीत करके सवेरे ब्राह्मणोके साथ फल्गुनदीके पवित्र तीर्थमे स्नान करन गये। इसाम सखियोंग घिरा हुई साताजी फल्गुतीरपर स्नानार्थं पधारौं। वहाँ उन्होने स्नान करके सोहागिन स्त्रियोंकी पूजा की। पश्चात् देवी महेश्वरीकी पूजा करनेके लिए सैकत-प्रदेशमें जाकर बालूके पाँच पिण्डोंमें दुर्गाजीकी प्रतिमा बनानेको उद्यत हुई। बायें हाथमें गीली बालुका लेकर उन्होंने दाहिने हाथसे पिण्ड बनाकर ज्यों ही पृथ्वीपर रखना चाह, त्या ही उन्हें पृथ्वीतलसे निकलता हुआ अपने श्वशुर महाराज दशरथका सुन्दर हाथ दिखायी दिया। उनका दाहिना हाथ सीताके हाथसे उस उत्तम पिण्डको लेकर पुनः धरतीमे प्रविष्ट हो गया। यह देखकर सीताके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ। बादमें फिर सीताने पिण्ड बनाकर जमीनपर रक्खा, उसको भी पूर्ववत् वह हाथ ले गया। इस प्रकार सीताने एक-एक करके एक सौ आठ पिण्ड दुर्गाकी पूजाके लिये रक्खे और उन सबको श्वशुरका हाथ ले गया। यह देखकर सीता हार गयीं ॥ ७४-८२ ॥ अन्तमें उन्होंने दुर्गाका मन ही मन पूजा की और विमानके पास लौट आयीं। उस वृत्तान्तको न तो सखियें जान सकीं और न राम ही जान पाये ॥ ८३ ॥ सीतानें भा राम हमको क्या कहेंगे, इस डरके मारे उस वृत्तान्तको छिपा रखा बादमे रामने जब पञ्चतीर्थ करके बाद प्रेतशिलापर जाकर पिण्डदान दिया और उन्होंने अपने हाथकी अनामिका अँगुलसि रामनाम खुदी हुई सुन्दर सुवर्णकी अँगूढी निकालकर दक्षिण-की ओर मुख करके 'अपहता' इत्यादि मंत्रसे जमीनपर खींच रेखाएं खींची, जो कि यहाँ अभी भी स्पष्ट
११२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
रेखात्रयं तदद्यापि दृश्यते तत्र वै स्फुटम् । आस्तीर्य स कुशांस्तत्र पिण्डान् मक्तुमयाञ्छुभान् ॥८७॥ तिलाज्यमधुसंयुक्तान् दातुं रामः समुद्यतः । सव्येन पाणिना पिण्डं गृहीत्वा रघुनन्दनः ॥८८॥ यावत्पश्यति भूम्यौ तु न ददर्श पितुः करम् । तदाश्चर्येण विप्रास्ते राममूचुस्त्वरान्विताः ॥८९॥ निष्क्रामन्त्यत्र सर्वेषां पितॄणां दक्षिणाः कराः । न दृश्यते तव पितुः कारणं नात्र विद्महे ॥९०॥ रामोऽपि विस्मयाविष्टश्चकितः प्राह लक्ष्मणम् । जानीषे कारणं किंचिदत्र त्वं बुद्धिमानसि ॥९१॥ स प्राह राघवास्माभिर्यदा गोदावरीं गतम् । इङ्गुदीफलपिण्याकपिण्डदाने तदा करः ॥९२॥ अस्माभिः स्वपितुर्दृष्टः सोऽत्र नैव प्रदृश्यते । ममापि ज्ञानमाश्चर्यं सीतां त्वं प्रष्टुमर्हसि ॥९३॥ तच्छ्रुत्वा जानकी शीघ्रं प्राह किंचिद्भयातुरा । मयाऽपराधिकं किंचिन्नखमस्व रघूत्तम ॥९४॥ वत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तां पुनः । वद तथ्यं न भेतव्यं कारणं किं ममातिकम् ॥९५॥ यथा श्रुतं तया सर्वं राघवाय निवेदितम् । तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह कः साक्षी तव कर्मणि ॥९६॥ सा प्राह चूतवृक्षोऽस्ति दृष्टः स नेत्युवाच ह । तदा शप्तः सीतया स फलहीनः स कीटतः ॥९७॥ भव मे वचनाज्झट भतो मिथ्या त्वयेरितम् । पुनः सा राघव प्राह फल्गुः साक्ष्यं प्रदास्यति ॥९८॥ साऽपि रामेण पृष्टाऽथ नेत्युवाच भयातुरा । साऽपि शप्ता रामपत्न्याऽधोमुखी भव वाक्यतः ॥९९॥ बह यस्मान्मृषा चोक्तं त्वया मन्येपि कर्मणि । ततः सीता पुनः प्राह साक्ष्यं मेऽत्र निवासिनः ॥१००॥ दास्यंति मे द्विजाः सर्वे तदा मन्निकटस्थिताः । तेऽपि पृष्टा राघवेण नेत्युचुर्भयविह्वलाः ॥१०१॥ दृष्टः साक्ष्यं नहिं रामः शापं नप्तु प्रदास्यति । निवारिता कथमियं तदा सीतेति चिन्त्यते ॥१०२॥ ताँस्तदा जानकी शापं ददौ तीर्थनिवासिनः । युष्माकं नात्र मद्धत्तिः कदा दूर्यर्थमविष्यति ॥१०३॥
दिखायी देती हैं। पश्चात् उन्होंने कुशा बिछाकर उसपर तिल घृत मधुचादिसं युक्त सत्तूका पिंड रखना प्रारम्भ किया। रामने जब दाहिने हाथमें पिण्ड लेकर अथात्रकी ओर देखा तो उन्हें अपने पिताका हाथ नहीं दीखा। महकि ब्राह्मण भी आश्चर्यान्वित होकर रामसे कहने लगे—॥८७-८८॥ यहाँ सब लोगोंके पितरोंके दाहिने हाथ पिंड लेनेके लिये निकलते हैं, पर आपके पिताका हाथ क्यों नहीं निकला। इसका कारण समझमें नहीं आता ॥९०॥ तब रामने विस्मित होकर लक्ष्मणसे पूछा—हे लक्ष्मण! तुम बुद्धिमान् हो, क्या कुछ इसका कारण जानते हो? ॥९१॥ लक्ष्मणने कहा—हाँ भाई ! जब हम लोग गोदावरा गय थे, तब तो इङ्गुदीफलके पिसानका पिण्डदान देते समय अपने पिताका हाथ दिखाई दिया था, वह यहाँ नहीं दिखाई देता। इस बातका हमको भी आश्चर्य है, आप इसका कारण जानकीसे तो पूछें॥९२। ६३॥ यह सुनकर जानकानी घबड़ा उठीं और बोलीं-हे रघुराज! आप क्षमा करें। मुझसे कुछ अपराध हो गया है। ९४॥ यह सुनकर रामने कहा कि घबराने तथा डरनेकी कोई बात नहीं है जो हो, सो साफ-साफ कहो ॥९५॥ तब जानकीने जो घटना घटी थी, सो स्पष्ट कह सुनायी । यह सुनकर रामने पूछा--इस बातका साक्षी कौन है कि हमारे पिताने तुम्हारे हाथसे पिण्डदान ग्रहण किया है ? ॥९६॥ सीताने अपना गवाह पासके आम्रवृक्षको बताया, परन्तु उससे पूछनेपर वह इन्कार कर गया। तब सीताने उसका शाप दिया कि अरे दुष्ट! तू झूठ बोला है इसलिए मध्यदेशम तू फलशून्य होकर रहेगा। तब सीताने फल्गुनदीको अपना साक्षी बताया ॥९७॥९८॥ परन्तु रामके पूछनेपर वह भी भयसे इंकार कर गयी। इसपर सीताने उसको भी शाप दिया कि तू सत्य बातमें भी झूठ बोली है, इसलिए तू मधापुखी (अन्तःमुखी) होकर बहेगी। तब सीताने कहा कि मेरी साक्षी यहाँके रहनेवाले उस समय मेरे पास खड़े ब्राह्मण देंगे। उन्होंने भी विह्वल होकर रामके पूछनेपर ना कर दिया ॥९९ १०१॥ वे लोग विचारने लगे कि "यदि ऐसा था तो तुम लोगोने सीताकी उस समय पिण्ड देनेसे रोका क्यों नहीं। ऐसा कहकर कही हरय कहनेपर राम हमको शाप न दे दें" सोताने उनको भी शाप दिया कि आओ, तुमलोग द्रव्यसे कभी तृप्त न होकर मारे-मारे फिरोगे। इस बातकीने
| [सर्गः ६ ] | यात्राकाण्डम् | १९३ |
|---|
द्रव्यार्थं सकलान् देवान् भ्रमध्वं दीनरूपिणः। ततः सा जानकी प्राह ओतुःसाक्ष्यं प्रदास्यति ॥१०४॥ सोऽपि पृष्टो नेत्युवाच रामं सीता शशाप तम्। पुच्छाद्य स्वपुरः कृत्वा परा मन्मर्कटोऽपि सन् ॥१०५॥ भूयोऽति यत्तत्त्वन्मात्पुच्छे सम्पूर्य्यतां भव। ततः सा जानकी प्राह गौर्मे साक्ष्यं प्रदास्यति ॥१०६॥ साऽपि पृष्टा नेत्युवाच रामं सीता शशाप ताम्। अपवित्रा भवाऽद्ये त्वं मम वाक्येन धेनुके ॥१०७॥ ततः सीताऽश्वत्थवृक्षं साक्ष्यार्थं प्राह राघवम्। स पृष्टो नेत्युवाचाथ तं सीताऽशापक्रुधा ॥१०८॥ भवाचलदलस्त्वं हि मदिराऽभ्यन्यपादप। पुनः सीता पतिं प्राह मम साक्षी प्रभाकरः ॥१०९॥ स पृष्टः प्राह तथ्यं हि सुप्तिर्जाता पितुस्तव । एतस्मिन्नन्तरे तत्र विमानेनार्कवर्चसा ॥११०॥ राजा दशरथो राममागम्यालिङ्ग्य वै दृढम् ॥
प्राह त्वया तारितोऽहं नरकादतिदुस्तरात् । मैथिल्याः पिण्डदानेन जाता मे तृप्तिरुत्तमा ॥१११॥ तथापि लोकशिक्षार्थं गयाश्राद्धं त्वमाचर । पितरं प्राह रामोऽपि किमर्थं हि त्वयाऽत्र वै । ११२॥ त्वरया सिक्तापिण्ड संगृहीतो वदस्व माम्। स प्राहारत्र गयायां तु बहुविघ्नानि राघव ॥११३॥ मर्त्तवि श्राद्धसमये कृता तस्मात्त्वरा मया । इति रामं समाभाष्य गृहीत्वा राघवादपि ॥११४॥ किञ्चित्कव्यं विमानेन ययौ दशरथस्तदा । ततो रामः प्रेतगिरौ पिण्डदानं विधाय च ॥११५॥ गत्वा प्रेतशिलायां च दत्त्वा काकबलिं ततः धर्मारण्यं ततो गत्वा कुर्व्वकोनपदेषु हि ॥११६॥ सक्तूना च तिलानाञ्च पायसैश्च सशर्करैः । पृथग्वे पिण्डदानानि वटश्राद्धं विधाय च ॥११७॥ अष्टतीर्थी ततः कृत्वा ततः संध्यां स्थलत्रये कृत्वा यथाविधानेन दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥११८॥ गदाधरं ततः पूज्य महाविभवपूर्वकम् । सेचनायाम तोयैश्च नृत्त्येभं सर्कर्कटम् ॥११९॥ एको मुनिः कुमकुशाम्रदलश्रुतस्य मूले मलिन्नं दधार। आश्रम भिक्तः पितरश्च तृप्ता एका क्रिया द्वयर्थकरे प्रसिद्धा ॥१२०॥
बिलावको साक्षी देनेके लिए कहा । उसने भी पूछनेपर ना कह दिया। सीताने उसे भी शाप देते हुए कहा कि उस समय मेरे समक्ष पूंछ किये खड़े रहनपर भी आ मून ना कर दिया है। इसलिए आज तेरी पूंछ भञ्जन हो जायगी। तब जानकीजीने गौका साक्षी देनेके लिए कहा । १०२-१०६ ॥ रामके पूछनेपर उसने भी ना कह दिया । सीताने कहा हे धेनु ! मर शापसे तेरा मुख अपवित्र हो जायगा । १०७ ॥ पश्चात् सीताने पीपलके वृक्षको साक्षी देनेके लिए रामके सम्मुख उपस्थित किया । जिसका नाम अश्वत्थ था, परन्तु जब वह भी इन्कार कर गया तो सीताने श्राप करके शाप दिया कि तू आजसे चञ्चलदल हो जायगा । तब अन्तमें सीताने कहा कि सूर्य मेरी साक्षी देंगे । रामके पूछनेपर सूर्यने कहा कि यह बात सत्य है । इस कार्यसे आपके पिता अवश्य सन्तुष्ट हुए हैं। इतनेमें सूर्यके समान कान्तिमान् विमानपर सवार होकर स्वयं महाराज दशरथ वहीं आ पहुंचे। रामका दृढ़ आलिङ्गन करके वे बोले हे राम ! तुमने यथार्थमें हमको तार दिया है। मैथिलीके पिण्डदानसे हमें बड़ी ही तृप्ति मिली है ॥ १०८-१११ । तो भी लोकशिक्षाके लिए तुम गयाश्राद्ध अवश्य करो । रामने पितासे पूछा कि आपने यहाँ इतनी जल्दी बालूकापिंड क्यों ग्रहण किया ? इसका क्या कारण है ? दशरथने कहा हे राम ! गयामें पिंडदानके समय बड़े बड़े विघ्न उपस्थित होते हैं । इसीलिए मैंने त्वरा की थी । इतना कहकर राजा दशरथ रामके हाथसे भी कुछ कव्य (पितृ-अन्न ग्रहण करके विमान द्वारा वहाँसे चले गये । पश्चात् रामने प्रेतपर्वतपर पिण्डदान दिया ॥ ११२-११५ ॥ वहाँसे वे प्रेतशिला गये। वहाँ काकबलि देनेके बाद धर्मवन गये । वहाँ एकोनपद् स्थानोंमें तिल-पायस तथा शर्करासे युक्त सत्तूके पृथक्-पृथक् करके अनेक पिंड दिये और वटश्राद्धाव भी सम्पादन किया ॥ ११६ ॥ ११७ ॥ तदनन्तर अष्टतीर्थी की । तीनों नियतस्थानोंमें सन्ध्यावन्दन करनेके बाद विधिवत् बहुतसे दान दिये ॥ ११८ ॥ अनेक विभवोंसे गदाधरकी पूजा की और मतंगेश्वरस्य आम्रवृक्षका जलसे सेचन किया ॥ ११९ ॥ कहा भी है किसी
| १९५ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ६ |
|---|
कृत्वा विष्णुपदे पूजां विमानारोहणादिभिः । मासत्रयमतिक्रम्य गयायां रघुनन्दनः ॥१२१॥ विमानेन ययौ प्राचीं दिवि सन्तोषयन् जनान् । फल्गुतीरात्तटे पूर्वं विमानं यत्र संस्थितम् ॥१२२॥ तत्र रामगयानाम्नी भूमिविप्रेरुदाहृता । रामेश्वरो रामतीर्थं वर्तते तत्र पावनम् ॥१२३॥ रामोऽपि फल्गुनाद्याश्च गङ्गायाः संगमं ययौ । गयाबहिः फल्गुरेव ज्ञेया सा तु महानदी ॥१२४॥ ततो ययौ मुद्गलस्य नूतनाश्रममुत्तमम् । यस्मिन्नुदग्वहा गङ्गा जाह्नवी पापनाशिनी ॥१२५॥ ततोऽग्रे जानकीं ज्ञात्वा भूमौ दिव्यं प्रदास्यति । तस्या दिव्यस्थले रामस्तीर्थपादौ चकार सः ॥१२६॥ भ्रातॄणां च पृथक् तत्र मत्रि तीर्थानि सर्वतः । सीतया च कृतं तत्र स्वनाम्ना तीर्थमुत्तमम् ॥१२७॥ ज्ञात्वा भविष्यदग्रे मत्तीर्थं चेति सविस्तरम् । यदा भूमौ प्रहास्यामि दिव्यं तीर्थं तदाऽस्तु मे ॥१२८॥ रामस्ततो विमानेन गतश्चोत्तरवाहिनीम् । नाम्ना पुरीं तथा गङ्गां यत्रास्ति परमांगदा ॥१२९॥ पर्वतो यत्र गङ्गायामस्ति विन्ध्येश्वरोऽपि च । ततः श्रीवैद्यनाथेशं नत्वा रावणनिर्मितम् ॥१३०॥ ततः पुनर्विमानेन पश्यन्नानास्थलानि सः । ययौ भागीरथीमप्यात्र भिन्ना भिन्ना पुनः ॥१३१॥ प्रयागाद्योजनशतान् देशे रघूद्वहः । ततो गङ्गाब्धिसमीपं संगमञ्च पुष्षकेन सः ॥१३२॥ गत्वा स्नात्वा ततो यत्र कालिंदी संगताऽर्णवे । तत्र गत्वा रघुश्रेष्ठस्ततः पश्यन् स्थलानि सः ॥१३३॥ नानापुण्यानि तीर्थानि दृष्ट्वा श्रीपुरुषोत्तमम् । पूर्वसागरतीरस्थं दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥१३४॥ ततः शनैः पुष्षकेण दृष्ट्वा नानाविधान् सुरान् । दृष्ट्वा नाना नदीः सर्वा नानादेशान्विलङ्घ्य च ॥१३५॥ गोदातीरे स्वनाम्ना तु कृत्वा गिरिममुत्तमम् । सप्तगोदावरीभेदसंगमेषु महोदधौ ॥१३६॥
एक मुनिने कुशयुक्त हाथमें जलका घड़ा लेकर आम्रवृक्षके मूलमें जल दिया। उसमे आम्रवृक्ष सिंच गया और पितर भी तृप्त हो गये। इसीके आधारपर 'एक क्रिया द्वयर्थकरी' यह कहावत प्रचलित हुई ॥ १२० ॥ इसी प्रकार प्रतिदिन विष्णुपदकी पूजा करते और विमानपर चढ़कर घूमत फिरत हुए रामने गयामे एक वर्ष व्यतीत किया ॥ १२१ ॥ पश्चात् सब लोगोको आश्वासन दे तथा विमानपर सवार होकर रघुनन्दन पूर्वकी ओर चल दिये। फल्गुनदीके किनार जहाँ रामका विमान खड़ा हुआ था ॥ १२२ ॥ उस जगहको वहाँके विप्र रामगया कहन लगे। पवित्र रामेश्वर नामका रामतीर्थ अभी भी वहाँ विद्यमान है ॥ १२३ ॥ राम वहाँसे चल-कर फल्गु तथा गंगाके सङ्गमपर आये। गयाके बाह्री भागमे फल्गुनदी है उसका विस्तार बहुत बड़ा है ॥ १२४ ॥ बादमे मुद्गल ऋषिके नवीन आश्रमकी ओर गये। जहाँपर पाप हरण करनेवाली गंगा उत्तरवाहिनी होकर बहती है ॥ १२५ ॥ आगे चलकर एक जगह जहाँ कि उन्हें विश्वास था कि यहाँ जानकी भूमिमे प्रवेश करके दिव्य रूप धारण करेगी, अपने नामका एक उत्तम तीर्थ स्थापित किया ॥ १२६ ॥ उसके बाद लक्ष्मण आदि भाइयोके नामसे भी उनके तीर्थ स्थापित किये। सीताने भी वहीं, यह विचारकर कि भविष्यमे मेरे नामका यहाँ बड़ा भारी तीर्थ होगा एक अपने नामका तीर्थ स्थापित किया। उन्होने यह विचार कि जब मै दिव्य रूप धारण करूंगी, तब यहाँ दिव्य तीर्थ होगा ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ पश्चात् राम विमानमे बैठकर उस जगह गये, जहाँ कि कल्याणकारिणी उत्तरवाहिनी नामकी गंगा तथा एक नगरी विद्यमान थी ॥ १२९ ॥ और जहाँपर बीच गंगामे विन्ध्येश्वर नामका पर्वत खड़ा है। वहाँसे आगे चलकर श्रीरामने रावण द्वारा स्थापित वैद्यनाथजीका दर्शन किया ॥ १३० ॥ तदनन्तर विमानमें बैठकर अनेक वनोंकी शोभा देखत हुए वहाँ गये, जहाँपे कि श्वेतजल युक्त गंगा बीचोबीचसे दो भागोमे बँट गयी है ॥ १३१ ॥ वह स्थान प्रयागसे सौ योजनकी दूरीपर था। पश्चात् राम विमानके द्वारा वहाँ जा पहुँचे, जहाँ कि गंगा सहस्रमुखी हो-कर समुद्रमे मिली है ॥ १३२ ॥ उस जगह गंगा-समुद्रसङ्गममें स्नान करनेके बाद कालिन्दी-समुद्रके सङ्गममे स्नान किया। वहींपर रामने अनेक मनोहर पुष्पित वनोपवन देखे, अनेक तीर्थोके दर्शन किये और साथ ही पूर्वी सागरके तटपर स्थित भगवान् परम पुरुषोत्तमके भी दर्शन किये तथा अनेक दान दिये ॥ १३३ ॥ १३४ ॥ बहुरि चलकर अनेक देवताओके दर्शन करते हुए अनेक नदियोको लाँघकर गोदावरीके
सर्गः ७ ] यात्राकाण्डम् [ १०५
सर्गः ७ ] यात्राकाण्डम् [ १०५
स्नात्वा दक्षिणाशां च ततो रामो ययौ पुनः । पूर्वदेशे नृपैर्निमानितः पूजितोऽपि च ॥१३७॥
गृहीत्वा स्वकरं तेभ्यस्तैः सहैव शनैः शनैः । विमानेन सुखेनैव तीर्थान्यन्यानि सेवितुम् ॥ १३८॥
श्रीरामो याम्यदिग्भ्रान्ति दक्षिणाभिमुखो ययौ, एवं प्रोक्ता पूर्वदेशयात्रा रामेण या कृता ॥१३९ ।
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे पूर्वदेशतीर्थयात्रावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः । ६ ।।
सप्तमः सर्गः
( श्रीरामके द्वारा दक्षिणभारतकी तीर्थयात्रा )
श्रीरामदास उवाच
ततो रामः समुल्लङ्घ्य मत्स्यनीथं मनोरमम् । तीर्त्वा महानदीं कृष्णां पश्यन् पुण्यस्थलानि सः ॥ १ ॥
ततो ययौ नार्गलहं रामः पानकनामकम् । कृष्णाब्धिसंगमे स्नात्वा दत्त्वा दानं निजेच्छया ॥ २॥
पश्यन्नानास्थलच्छेयं ययौ श्रीशैलपर्वतम् । स्नात्वा स नीलगङ्गायां दृष्ट्वा श्रीमल्लिकार्जुनम् ॥ ३ ॥
तत्रैव कृष्णा सा गङ्गा नीलगङ्गेति नामतः श्रीमल्लेशशिरो दृष्ट्वा पुनर्जन्मनिवारकम् ॥४।
शिखरेश्वरस्य शिखराद्ब्रह्मकुण्डे विगाह्य च भीमकुण्डे ततः स्नात्वा नयां निर्वृतिसंगमे ॥५॥
तुङ्गभद्रासंगमेऽपि महानदीसरोवरे विगाह्य भवनाशिन्यां वशो दृष्ट्वा महोबलम् । ६।।
नारसिंह ततो नत्वा कृत्वा स्तम्भप्रदक्षिणाः गत्वा पुष्पगिरी तत्र पिनाकीमगदात्तथा ॥७॥
पश्यन् पुण्यस्थलानीशं च दृष्ट्वा पम्पामरोवरम् । किष्किन्धायां ततो गत्वा सुग्रीवाद्यैः सुपूजितः ॥८॥
सुग्रीवाद्यैर्वानरैश्च विमानेन विहायसा । प्रवर्षणगिरिं स्वीयगुहां रम्यां प्रदर्शयन् ॥९॥
वैदेहीं कौतुकाद्रामः किंचित्कृत्वा विमाननम् द्वितीये भीमकुण्डेऽथस्नात्वा गत्वा षडाननम् ।१० ।
स्नात्वाऽगस्त्यकुण्डमध्ये षडाननार्चार्थमनेकशः कनकगिरिस्थं शंभुं नत्वा सुपूज्य राघवः ।।११।
किनारे आये। वहाँ उन्होंने अपने नामका एक उत्तम पर्वत नियत किया। बादमें सागरके साथ गोदावरी-सङ्गममें स्नान किया पश्चात् वे दक्षिणापांत पूर्वकी ओर आ गये। वहाँ अन्य राजाओं द्वारा पूजित तथा सम्मानित होकर और उनसे कर लेत हुए उनको भी साथ लेकर धीरे धीरे विमानके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंको देखनेकी इच्छा से दक्षिण भारतकी ओर बने । इस प्रकार रामकी पूर्वप्रदेशकी यात्रा समाप्त हुई ॥१३५-१३९॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां पूर्वदेशयात्रावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
श्रीरामदासने कहा — वहाँसे राम मनोहर मत्स्य देशसे होते हुए महानदी तथा कृष्णाको पार करके अन्यान्य पवित्र स्थानोंको देखते हुए पानक नृसिंहतीर्थ गये। पश्चात् कृष्णा तथा समुद्रके सङ्गममें स्नान करके उन्होंने अनेक दान पुण्य किये ॥ १ । २ । वहाँसे विविध वनोंका सौन्दर्य देखते हुए राम श्रीशैल पर्वतपर पधारे। वहाँ नीलगङ्गामें स्नान करके श्रीमल्लिकार्जुनके दर्शन किये ॥ ३ ॥ यहाँपर कृष्णा नदीका ही नाम नीलगङ्गा पड़ गया है । पुनर्जन्मके निवारक श्रीशैलशिखरको देखकर शिखरेश्वरके शिखरसे निकले हुए ब्रह्मकुण्डमें स्नान किया । इसके अतिरिक्त भीमकुण्ड, निवृत्तिसङ्गम, तुङ्गभद्राके सङ्गम, महानदीके सरोवर और भवनाशिनीमें स्नान किया। वहाँ महाप्रतापी नरसिंहजीका दर्शन किया तथा स्तम्भकी प्रदक्षिणा की। वहाँसे मार्ग पुष्पगिरिपर आकर पिनाकिनी नदीमें स्नान किया ॥४-७॥ बादमें अनेक आश्रमों तथा विविध पुण्यवनोंको देखते हुए पंपासरोवर और वहींसे किष्किन्धा गये। वहाँ सुग्रीव आदिन रामका विधिवत् पूजन-सत्कार किया ॥ ८ ॥ वहाँसे सुग्रीव आदि वानरोंका साथ ले तथा विमानपर आरूढ़ होकर आकाश-मार्गसे प्रवर्षण गिरिपर पधारे। वहाँ जानकीको अपना निवासगुफा दिखलाकर आराम कुछ हँसे। फिर भीमकुण्डमें स्नान करके षडानन कार्त्तिकेय स्वामीका दर्शन करनेके लिए गये ॥९ । १०॥ अगस्त्यकुण्डमें
१९६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ७
श्रीमन्तं त्वा रङ्गं नमस्कृद्वेङ्कटं भुवि । गोविन्दराजं तं नत्वा तृत्तिपत्तत्त्वसंस्थितम् ॥१२॥ स्नात्वा कपिलधारायां नांधयादं विधाय च । ततः शेषाचलं गत्वा स्नात्वा पुष्करिणीजले ॥१३॥ वेङ्कटेशं पूजयित्वा पंचतीर्थावगाह्य च । सुवर्णमुखरीप्रान्तस्थं श्रीकालहस्तिनम् ॥१४॥ पूजयित्वा ययौ काञ्च्यां रामः शिवह्रदाभिधम् । एकाम्रनाथं पूज्य सर्वतीर्थं विधाय च ॥१५॥ कामाक्षीमंबिकां नत्वा स्नात्वा वैगावतीजले । नत्वा वरदराजं च पक्षितीर्थं ततो ययौ ॥१६॥ पद्मं विधुं नामानौ पक्षिणौ बहुवर्षशः । पूजयन्तौ ततः शीघ्रं धीरनद्यां विगाह्य च ॥१७॥ नत्वा त्रिविक्रमं तत्र गतोऽरुणाचलं नलः । मुक्तिदं स्मरणान्नत्वा नत्वा मणिनदीतटम् ॥१८॥ मणिमुक्तानदीतीरे वृद्धाचलमगात्ततः । वृद्धाचलेशं संपूज्य वटशैलं ततो ययौ ॥१९॥ वटशालेश्वरा पूज्य ततः श्रीमृष्टिमथागात् । तत्र यज्ञवराहं च संपूज्य जगदीश्वरम् ॥२०॥ चिदम्बरमथागात्तद्दर्शनादेव मुक्तिदम् । लिखिता यत्र शेषेण शिलायां ताण्डवाकृतिः ॥२१॥ कावेरीं च ततस्तीर्त्वा सिंहक्षेत्रं ततो ययौ । नत्वा अन्नपुरेशं च वैद्यनाथं प्रणम्य सः ॥२२॥ श्वेतारण्यं ततो गत्वा शंखकुण्ड्यां विगाह्य च । छायावनं ततो दृष्ट्वा ययौ गौरीमयूरकम् ॥२३॥ वेदारण्यं ततो गत्वा नत्वा मध्यार्जुनं शिवम् । स्नात्वाऽथ वृद्धकावेर्यां कुंभकोणं विलोक्य च ॥२४॥ श्रीनिवासं ततो दृष्ट्वा दृष्ट्वा वृन्दावनं शुभम् । मारनाथं ततो दृष्ट्वा श्रीरङ्गं च ददर्श सः ॥२५॥ प्रयागमाधवं नत्वा गत्वाऽऽग्रशिरसः स्थलम् । विलोक्याकृष्णनीलाभं यत्वाऽथ कमलालयम् ॥२६॥ त्यागेश्वरं समभ्यर्च्य गयातीर्थे विगाह्य च । दक्षिणारकाख्यां च श्रीगोविंदं प्रणम्य सः ॥२७॥ जैपालाख्यं पुरं गत्वा गत्वा चामयडेश्वरम् । सिद्धेश्वरं नमस्कृत्य पुन सम्धारितं स्वयम् ॥२८॥ स्नात्वा वै नवपाषाणे ययौ वेद्याश्च पूजनम् । स्नात्वा वेतालतीर्थे वै तीर्त्तार्यं सागरस्य च ॥२९॥
स्नान करके अंतक तर्पण दिया। अनन्तर श्रीरंगपर विराजमान रामका दर्शन करके उनका पूजन की ॥ १२॥ बादमें श्रीरंगका दर्शन करके पृथ्वीपर प्रसिद्ध श्रीवेङ्कटको नमस्कार किया। तदनन्तर तृप्तिपत्तन (तिरूपति नगर) में स्थित गोविन्दराजके दर्शन किये ॥ १२ ॥ वहीं कपिलधारापर स्नान करके संध्यावंदनादि किया। बहुरि शेषाचलपर जाकर पुष्करिणीके जलमें स्नान किया ॥ १३ ॥ वेङ्कटेश भगवान्की पूजा-अर्चा करनेके बाद पंचतीर्थमें स्नान किया। इसके सुवर्णमुखरीके तीरपर विराजमान श्रीकालहस्तीश्वरका पूजन करके राम शिव तथा विष्णुके प्रिय शिवकंचीकी ओर विदाव हो गये। वहाँ एकाम्रेश्वरकी पूजा करके सभी तीर्थोंमें अवगाहन किया ॥ १५ ॥ तब कामाक्षी देवीको नमस्कार करके वेगवतीके पवित्र जलमें स्नान किया। वहाँसे आगे वर- दराजका दर्शन करके पक्षितीर्थ गये ॥ १५ ॥ १६ ॥ वहीं पूषा तथा विधाता नामक दो पक्षियोंकी पूजा करके सीताके साथ विमानेपर बैठकर शीघ्र ही धीरनदीपर पधारे, वहाँ स्नान कर और त्रिविक्रमका दर्शन करके अरुणाचल गये । स्मरणमात्रसे मुक्ति देनेवाले अरुणाचलको नमस्कार करके मणिमुक्ता नदीके तटपर स्थित वृद्धाचलपर गये। वहाँ वृद्धाचलेश्वरकी पूजा करके वटशाल गये ॥ १७-१९ ॥ वहाँ वटपालेश्वरीकी पूजा करके सृष्टि- तीर्थ गये । वहीं यज्ञवराहकी पूजा करके दर्शनमात्रसे निर्वाण पद देनेवाले चिदम्बरेश्वरके दर्शनार्थ पधारे। वहाँपर शिलामें शेषनागकी लिखी हुई तांडवचित्रावली देखी ॥ २० ॥ २१ ॥ पश्चात् कावेरीको पार करके सिंहक्षेत्र गये। बादमें अन्नपुरेश और वैद्यनाथको प्रणाम करके श्रीराम श्वेताण्य पधारे वहाँ शंखकुण्डीमें स्नान किया। वहाँसे छायावन होकर गौरीमयूर गये । वहाँसे वेदारण्य आकर मध्यार्जुन शिवका दर्शन किया। पश्चात् वृद्धकावेरीम स्नान करके कुम्भकोण देखा। २२-२४ ॥ वहाँसे आगे श्रीनिवासका दर्शन करके चित्ताकर्षक वृन्दावनकी ओर गये । तदनन्तर सारनाथका दर्शन करके श्रीरंगमके दर्शनार्थ आगे बड़े ॥ २५ ॥ वहाँ प्रयागमें वेणीमाधवका दर्शन करके बालशिरस नामक स्थानपर गये । वहाँही अंतमें चाकाशके समान लीलाकमलालय देखा ॥ २६ ॥ बादमें त्यागेश्वरकी पूजा करके गयातीर्थमें स्नान किया और दक्षिण द्वारका और श्रीगोविन्दको प्रणाम किया ॥ २७ ॥ वहाँसे जैपाल नामक नगरमें जाकर
सर्गः ७ ] यात्राकाण्डम् १९७
स स्नात्वा भैरवे तीर्थे प्रार्थेकांश्च स्थितो निजम् । अवरुह्य विमानाञ्च पदाभ्यां सर्वजनैः सह ॥ ३० ॥
गत्वा लक्ष्मणकुण्डेऽथ स्वकुण्डेऽपि विगाह्य च । अग्नितीर्थे ततः स्नात्वा धनुष्कोट्यां विगाह्य च ॥ ३१ ॥
स्नात्वा जटापुनीर्थे हि गत्वा तं गन्धमादनम् । आदौ नत्वा विश्वनाथं पुङ्गानीतं हनूमता ॥ ३२ ॥
रामेश्वरं ततो नत्वा कृत्वा गंगाभिषेचनम् । काश्यादिकं त्यक्त्वा धनुष्कोट्यां रघूत्तमः ॥ ३३ ॥
कोटितीर्थं धनुष्कोट्यां चकार कूपमुत्तमम् । क्षेत्रपापप्रशांत्यर्थं दृष्ट्वा श्रीसेतुमाधवम् ॥ ३४ ॥
नानादानादिकं कृत्वा स ममेकं विलंघ्य च । बह्वाह्लाददेवानां महोत्साहान्विधाय च ॥ ३५ ॥
क्षेत्रपापप्रशांत्यर्थं कोटितीर्थं विगाह्य च । नत्वा द्वाग्गन्धमगम तीर्त्वाऽथ जलधेः पुनः ॥ ३६ ॥
विहारस्य विमानेन स दर्भशयनं ययौ । स्नात्वा निक्षेपिकायां च ताम्रपर्णीब्धिसंगमे ॥ ३७ ॥
गत्वा स्नात्वा रामचन्द्रो ददौ दानान्यनेकशः । ततोऽब्धितटमभ्येत्य तं स्कन्द मपूजय राघवः ॥ ३८ ॥
ताम्रपर्णीतटेनैव पश्यन्पुण्यस्थलानि सः । नववेंकटनाथांश्चाभ्यर्च्य तोताद्रिमपयौ ॥ ३९ ॥
कन्याकुमारिकां दृष्ट्वा सिन्धुतीरनिवासिनीम् । प्रतीक्षतीं स्वीयमार्गं बिभ्रतीं मालिकां करे ॥ ४० ॥
तामाह रघुपतिश्च वरं वरय सुव्रते । सा प्राह राघवं नत्वा चिरमस्मि प्रनस्थिता ॥ ४१ ॥
अहं मुनिसुता पित्रा सुरेन्द्राय विनिर्मिता । विवाहार्थं समानातः सुरेन्द्रो योजन स्थितः ॥ ४२ ॥
तव श्रोत्रोपमं श्रुत्वा मया चित्ते विनिश्चितम् । आगमिष्यति रामोऽत्र वरयिष्याम्यहं तदा ॥ ४३ ॥
पित्रा मन्निश्चयं ज्ञात्वा सुरेन्द्रो विनिवर्तितः । सोऽपि मन्त्खेदित्स्वास्तु योजनेऽद्यापि वर्तते । ४४ ॥
विवाहोपकरणादि मन्मात्रा यत्कृतं पुरा । पित्रा तन्सागरे क्षिप्तं क्रोधाविष्टेन राघव ॥ ४५ ॥
अग्रयतेश्वरका दर्शन किया । पश्चात् रामचन्द्रने पूर्वसमयमे अपने द्वारा स्थापित विश्वेश्वरका दर्शन किया ॥ २८ ॥ वहाँके नवपाषाणसरमे स्नान करके टंक नगर गये । फिर वैतान्तीर्थमें स्नान करके सागरके अगाध जल-प्रवाहको पार करके । २६ ॥ एकान्तमें स्थित भैरवतीर्थ गये । वहाँसे पैदल चलते हुए सबके साथ आगे बढ़े । आगे जाकर लक्ष्मणकुंद, रामकुड, अग्नितीर्थ, धनुष्कोटितीर्थ और जटापुनीर्थमे स्नान किया । वहाँसे गन्धमादन पर्वतपर गये । वहाँ पूर्वसमयम हनुमान्के द्वारा लाये हुए विश्वनाथका दर्शन किया ॥ ३०-३२ ॥ पश्चात् रामेश्वरको नमस्कार करके उन्ह गंगा जलसे स्नान कराया । बादम राजन् काशो काँवरके घड़ेको धनुष्कोटि तीर्थमे फेंक दिया ॥ ३३ ॥ उस धनुष्कोटि तीर्थमे रामने कोटितीर्थ नामका एक कूप खुदवाया । बादमें क्षेत्रपापकी शान्तिके लिए श्रीसेतुबंध माधवका दर्शन किया ॥ ३४ ॥ वहींपर अनेक दानपुण्य करते हुए रामने एक मास निवास किया । अनेक बह्वाह्लाद देवताओका महोत्सव भी वही कराया ॥ ३५ ॥ पश्चात् पुनः क्षेत्रपापकी शान्तिके लिए कोटितीर्थमे स्नान किया । द्वारपाल वगन्धामको नमस्कार कर तथा विमानके द्वारा समुद्र पार करके दर्भशयन नामके तीर्थको गये वहीं निक्षेपिकाके जलमे और ताम्रपर्णी तथा सागरके संगममे स्नान किया ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ वहीं भी अनेक दान दिये । पश्चात् रामने समुद्रके तटपर विराजमान कार्तिकेय स्वामीकी पूजा की ॥ ३८ । बादमे ताम्रपर्णीके किनारे किनारे राम अनेक पवित्र स्थानोको देखते तथा नववेंकटेशोंकी पूजा करते हुए तोताद्रि गये ॥ ३९ ॥ पश्चात् सिन्धुतीर-निवासिनी कन्याकुमारीके दर्शन किये, जो कि हाथम माला लिये उन्हीं (राम) की राह देख रही थीं ॥ ४० ॥ रामजीने उससे कहा हे सुव्रते ! वर माँगो तब उसने रामको नमस्कार करके कहा हे राघव ! मै बहुत दिनांसे व्रत धारण करके आपकी प्रतीक्षा मे यहीं खड़ी हूँ । ४१ ॥ मैं एक मुनिकन्या हूँ । मेरे पिताने मुझे सुरेन्द्रको देना निश्चित किया ओर उनको विवाहके लिए बुलाया भी था । जो कि अब भी यहाँसे एक योजनकी दूरीपर विद्यमान है ॥ ४२ । परन्तु मैने जब आपकी तीर्थयात्राका समाचार सुना तो मनमें यह निश्चय कर लिया कि राम जब यहाँ यात्राके निमित्त आयेंगे, तब मै उन्हीसे विवाह करूँगी ॥ ४३ ॥ पिताने जब मेरा यह दृढ़ निश्चय देखा तो सुरेन्द्रको लोटा दिया । वह मेरे लिए दुखित होकर एक योजनपर अब भी खड़ा है ॥ ४४ ॥ हे राघव ! मेरी माताने विवाहके लिए जो सामग्री एकत्रित की थी, वह सब मेरे