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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ
३९४आनन्दरामायणे[सर्गः २]

ऊचुः परस्परं सर्वे रामन्यस्तेक्षणाः शनैः। किं याचितं हि मुनिना किं रामोऽग्रे करिष्यति ॥१८॥ विना गोवह्निमणिभिः कथमन्नं प्रदास्यति । ततो गते मुनौ रामः पत्रं सौमित्रिणा तदा ॥१९॥ विलिख्य बद्ध्वा बाणे तन्मुमोच शरमुत्तमम् । स शरो वायुवेगेन शीघ्रं गत्वाऽमरावतीम् ॥२०॥ सुधर्मायां सुरैर्युक्तस्येन्द्रस्याग्रे पपात ह । तं शरं सहसा दृष्ट्वा चकितो भयविह्वलः ॥२१॥ कस्यायमिति चोक्त्वा तद्बाणनाम व्यलोकयत् । सुवर्णाङ्कितं बाणपुच्छस्थं पापदारकम् २२॥ ततो ज्ञात्वा राघवस्य शूरोऽयमिति देवराट् । तस्मिन्ग्रन्थं विमुच्याथ पत्रं नत्वा पपाठ च ॥२३॥ एतस्मिन्नन्तरे बाणः पुन श्रीराघवं ययौ । त्रिदशं समनुज्ञाप्य पूर्वस्तूणीगतोऽभवत् ॥२४॥ मघवाऽपि सुधर्मायां श्रावयामास निर्जरान् । राममुद्राङ्कितं पत्रं भयाद्विस्मयसंयुतः ॥२५॥ मघवंस्त्वं सुखं तिष्ठ स्वर्गेऽहं त्वां सदा स्मरे । मन्नियोगं शृणुष्वाथ याचितोऽस्म्यधुना त्वहम् ॥२६॥ विना गोवह्निमणिभिरन्नं शिष्यैर्युतेन च । वरैः षष्टिसहस्रैश्च तथाऽन्यैर्मुनिसत्तमैः ॥२७॥ सहस्राब्दक्षुधितेन क्रोधिनाऽतितपस्विना । दुर्वाससा मुहूर्त्तात्तु मध्यात्त्वंगीकृतं हि तत् ॥२८॥ याचितान्यपि पुष्पाणि तेनादृष्टानि मानवैः । मयाङ्गीकृत्य सकलं स्नानार्थं ते विसर्जिताः ॥२९॥ अतः शीघ्रं कल्पवृक्षपारिजातौ समुद्रजौ । प्रेषयस्व क्षणान्मां त्वमादरात्स्वेन सादरम् ॥३०॥ मा रावणशिरश्छेत्तुः प्रतीक्षां त्वामिषोः कुरु। एवं संश्राव्य तद्यन्त्रं सुरेन्द्रः सुरैः सह ॥३१॥ समभ्याय कल्पवृक्षपारिजातौ विबुद्धमः । विमानेन सुरैर्युक्तः श्रीरामाग्रं ययौ ॥३२॥ इन्द्रागमनमाज्ञाय तं प्रत्युद्गम्य लक्ष्मणः। प्रायोध्यायां विनायेन्द्रं सभास्थं रघुनन्दनम् ३३॥ कल्पवृक्षपारिजातौ मधवा रघुनन्दनम् । समर्प्य नत्वा श्रीरामं स उपाविशदासने ॥३४॥ एतस्मिन्नन्तरे शिष्यं दुर्वासा मुनिरब्रवीत् । गत्वा त्वं पश्य रामं तु किं करोत्यधुना गृहे ॥३५॥


भेज दिया ॥ १८ ॥ इधर लक्ष्मणादिक भ्राता, जानकी और सभासद् आदि भयके मारे सब भयभीत हो गये और वे रामकी ओर निर्निमेष दृष्टिसे देखते हुए अपने मनमें कहने लगे कि मुनिने बड़ी अद्भुत वस्तुएँ मांगी हैं। देखें, राम अब क्या करते हैं। बिना गौ, मणि तथा अग्निके किस प्रकार भोजन तैयार करके देते हैं ॥१७-१८॥ मुनिके चले जानेपर रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे एक पत्र लिखवाया। उसे बाणके सामने बाँध कर धनुषपर चढ़ाया और छोड़ दिया। वह बाण वायुके समान वेगसे अमरावतीपुरीमें जाकर सुधर्मा नामकी देवसभामें इन्द्रके सामने गिरा। उस बाणको इन्द्रने देखा तो वे चकित होकर बोले ॥१९-२०॥ 'यह बाण किसका है !' यह कहकर उसपर लिखे रामके नामको देखा और पत्र संभालकर पढ़ा। पत्र से जान गया बाण वहाँसे फिर रामजीके तूणीरमें लौट आया । २१-२४॥ भय और विस्मय युक्त इन्द्रने वह पत्र सभामे बैठे हुए देवताओंको सुनाया। २५। उस पत्रपर लिखा था—'हे इन्द्र तुम स्वर्गमें सुखी रहो। मैं सदा तुम्हारा स्मरण किया करता हूँ। हाँ, इस समय तुमसे सहाय मांगा दे रहा हूँ। आज एक हजार वर्षके भूखे एवं उग्र क्रोधी दुर्वासा मुनि अपने साठ हजार अच्छे शिष्योंके साथ मेरे यहाँ आये हुए हैं वे ऐसा भोजन चाहते हैं कि जो गौ, मणि अथवा अग्निके द्वारा न बना हो। साथ ही उन्होंने शिवपूजनके लिए ऐसे फूल मांगे हैं, जिन्हें अबतक मनुष्योंने न देखा हो। मैंने उनकी गति स्वीकार करली है इस समय मैंने उन्हें स्नान करनेको भेज दिया है । २६-२९॥ इससे तुम सत्वर कल्पवृक्ष और पारिजात, जो कि क्षीरसागरमें निकले हैं, क्षणभरमें आदरपूर्वक मेरे पास भेज दी। ३०। देखो, कहीं रावणका विनाश करनेवाले मेरे बाणकी प्रतीक्षा न करने लगना,' इस प्रकार वह पत्र देवताओं को सुनाकर इन्द्रदेव गुरुके सबने साथ मन्त्रणा करके कल्पवृक्ष और पारिजात ले तथा देवताओंके समेत विमानपर चढ़कर अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे ॥ ३१-३२॥ लक्ष्मणने जब यह जाना कि देवराज इन्द्र आ गये हैं तो उनके पास गये और आदरपूर्वक अयोध्यामें रामके पास ले आये ॥ ३३ ॥ इन्द्रने पारिजात तथा कल्पवृक्ष रामको अर्पण करके प्रणाम किया। फिर एक

सर्गः २ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९५

सर्गः २ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९५


अस्माकं कल्पितं किंचिदसमस्तमथवा न वा ।
चिंतायुक्तोऽस्ति वा तूष्णीं संस्थितोऽन्यच्च किं कृतम् ॥३६॥
बहिः संपादितं सर्वं मया यद्यन्न याचितम् । रहः स्थितः सुवैर्दृष्ट्वा शीघ्रं त्वं याहि मां पुनः ॥३७॥
इत्येवमुक्त्वा मुनिं शिष्यः स ययौ रामसद्गृहम्। तत्र दृष्ट्वा कल्पवृक्षपारिजातौ सनिर्जरौ । ३८।
सनिर्जरेशं रामं च मुदितं सीतयाऽन्वितम् । ततस्तूर्णं ययौ शिष्यः परावृत्य मुनिं प्रति ॥३९॥
कथयामास सकलं यदाश्चर्यं निरीक्षितम् । तच्छ्रुत्वा शिष्यवचनं दुर्वासा विस्मयान्वितः । ४०॥
ययौ शिष्यैः परिवृतो विवेश नृपतेर्गृहम् । तं मुनिं राघवो दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्य पुनः सुरैः ॥४१॥
नमस्कृत्य मुहुर्वेगाद्ददावासनमुत्तमम् । ततो मुनेः पूजनं स सशिष्यस्य रघूत्तमः ॥४२॥
चकार सीतया सार्द्धं लक्ष्मणारिभिरन्वितः । पारिजातप्रसूनानि नेक्षितान्यत्र मानवैः ॥४३॥
ददौ शंभोः पूजनार्थं रामो दुर्वाससे तदा । तानि दृष्ट्वा मुनिस्तूर्णं वैष्णवेश्वरार्चनम् ॥४४॥
ततः सर्वान्मुरानाहूय परिवेषणकर्मणि । चोदयामास श्रीरामो जानकीं लक्ष्मणेन सः ॥४५॥
तत सा जानकी वेगाद्दिव्यालंकारमण्डिता । कल्पवृक्षपारिजातौ सम्पूज्य नूपुरस्वना ॥४६॥
पात्राणि कल्पवृक्षाधः स्थापयामास कोटिशः । सीता तं प्रार्थयामास कल्पवृक्षं नगोत्तमम् ॥४७॥
क्षीरसागर्सम्भूत देवानां विहितप्रद । दुर्वाससे कल्पवृक्ष सशिष्याय च तोषय ॥४८॥
तन्मतान्यन्नं भूत्वा हेमपात्राणि कोटिशः । विविधैः पूरयामास क्षणात्कल्पतरुस्तदा ॥४९॥
तैरन्नैर्हेमपात्रेषु जानकी परिवेषणम् । शुश्रूषूञ्चकार मुहुः सुर्मिलाचंपिकादिभिः ॥५०॥
ततस्तुष्टो मुनिश्रेष्ठः शिष्यैरशनमादरात् । चकार रघुप्रीरेण प्रार्थितः स मुहुर्मुहुः ॥५१॥
ततः कृत्वा भोजनं हि कराशुद्धिं विधाय सः । तांबूलं दक्षिणां चापि ज्याह रघुनायकात् । ५२।


आसनपर जा बैठे ॥ ३४ ॥ उधर उत्सुक चित्त से दुर्वासाने अपना एक शिष्य भेजा और उससे कहा- "तुम जाकर देखो कि, राम इस समय क्या कर रहे हैं ॥ ३५ ॥ मैंने जो जो बतलाया था, उसमें कुछ अन्न तैयार है या नहीं । अथवा अभी तक चिंतामग्न हुए यूं ही चुपचाप बैठे हैं, ३६ ॥ यदि मेरे आज्ञानुसार काम कर रहे हैं तो अबतक क्या-क्या किया है। मैंने जैसा कहा था, वे सब चीजें इन्होंने इकट्ठी कर लीं या नहीं। कहीं छिपकर चुपचाप वह सब देखो और शीघ्र मेरे पास लौट आओ" । ३७ । "अच्छा" कहकर शिष्य रामचन्द्रजीके भवनमें जा पहुंचा। वहां कल्पवृक्ष, परिजात, इन्द्र, देवताओंकी मण्डली एवं प्रसन्न राम तथा सीताको देखकर फिर दुर्वासा मुनिके पास लौट गया और जैसा देखा था, सब समाचार कह सुनाया। शिष्यकी बात सुनकर दुर्वासाको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३८-४० ॥ इसके बाद शिष्योंको साथ लेकर वे रामचन्द्रजीके सुन्दर भवनमें पहुंचे । मुनि दुर्वासाको देख देवताओंके साथ उठकर रामचन्द्रजीने बड़े आदरके साथ समस्त शिष्यों समेत मुनिको प्रणाम किया और बैठनेके लिये उत्तम आसन देकर सीता तथा लक्ष्मणादिके साथ उनकी पूजा की। मत्र्यगण पारिजातके फूल नहीं देख पे ॥ ४१-४३ ॥ सो उन फूलोंको शिवपूजनके निमित्त मुनिके सामने रखा । दुर्वासाने उन्हें एक बार विस्मित नेत्रोंसे देखा और तुरताव शिव तथा सब देवताओंका पूजन किया ॥ ४४ ॥ इसके अनन्तर सम्यक्प्रकार से लक्ष्मण और जानकीको भोजन परोसनेकी आज्ञा दी ॥ ४५ ॥ तब दिव्यालंकारोंको धारण किये सीताने कल्पवृक्ष और पारिजातका पूजन करके करोड़ों बर्तन लाकर उनके नीचे रख दिया और इस प्रकार प्रार्थना करने लगी-॥ ४६ ४७ ॥ "हे क्षीरसागरसे जायमान तथा देवताओंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष ! आज शिष्यो समेत दुर्वास को आप सन्तुष्ट कर दीजिए" । ४८ । सीताकी प्रार्थना सुनकर क्षणभरमें कल्पवृक्षने करोड़ों पात्रोंको विविध प्रकारका बाञ्छतान्नपियोंसे भर दिया । उन अन्नोंको उर्मिलादिके साथ सीताने सुवर्णके पात्रोंमें परोसा और महर्षि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर अपने समस्त शिष्योंके साथ रामचन्द्रजीके द्वारा प्रार्थित होनेपर भोजन करना आरम्भ किया ॥ ४९-५१ ॥ भोजन करनेके बाद उन्होंने

३९६आनन्दरामायणे[ सर्गः २

ततः सुराणां पुरतो वेदवाक्यैः सविस्तरम् । दुर्वासा राघवं स्तुत्वा तमाहाऽऽनन्दनिर्भरः ॥५३॥
राम राजीवपत्राक्ष त्वं साक्षाज्जगदीश्वरः । अत्र रावणनाशार्थमवतीर्णोऽसि भूतले ॥५४॥
जनांस्त्वत्पौरुषं ज्ञातुं मयैतद्याचितं तव । विना गोवृद्धिमणिभिर्द्विजान्ने रघुनन्दन ॥५५॥
प्रभूतान्यन्नपात्राणि सान्नैर्व्यजनैस्तले । किं राम दुर्घटं तत्र यस्य भूभङ्गमात्रतः ॥५६॥
लयो ब्रह्मादिदेवानां जायते सम्भवोऽपि च । मन्दरं मज्जमानं तु दृष्ट्वा त्वं क्षीरसागरे । ५७ ।
कूर्म्मरूपेण जातोऽसि धर्तुं तु मन्दराचलम् । निष्कासितानि रत्नानि तदा देवैश्चतुर्दश ॥५८॥
तत्र साहाय्यमात्रेण सर्वं जानन्त्यहं प्रभो । लक्ष्मीः सोमः कामधेनुः कौस्तुभश्च सुधा विषम् । ५९ ॥
ऐरावतश्चाप्सरसः कल्पवृक्षो भिषग्वरः । उच्चैःश्रवाः पारिजातो सुरा ज्येष्ठेति राघवः । ६० ॥
चतुर्दश सुरत्नानि विभक्तानि पुरा त्वया । देवेभ्यो यानि तान्येते भोक्ष्यन्ति कृपया तव ॥६१॥
त्वदाज्ञापालिनः सर्वे शङ्कराद्याश्च निर्जराः । सर्वेषां जीवनोपायस्त्वयैव सर्वं पृथक् पृथक् ॥६२॥
कल्पिता येन रामेण तत्र किं दुर्घटं तव । ममाभिलषितं भोज्यं दातुं त्वत्कौतुकं मया ॥६३॥
अद्यावलोकितं राम जनानाग्रे प्रदर्शितम् । त्वं पाता सर्वलोकानां जनकोऽपि पालकः ॥६४॥
अस्माकं मतिदानाञ्च ये क्षमस्वाऽपराधिनम् । एवं नानाविधं स्तुत्वा तं प्रणम्य पुनः पुनः ॥६५॥
राममामन्त्र्य दुर्वासा ययौ शिष्यैः स्वाश्रमम् । अथ तान्निर्जरान् प्राह रामः कनकलोचनः ॥६६॥
कल्पवृक्षपारिजातौ गृहीत्वा सम्पदं दिवम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा बृहस्पतिः प्राह राघवम् ॥६७॥
यावत्कालं निवासाऽत्र भूम्यां तावन्नयात्मनः । अयोध्यायां विमुक्तस्तौ कल्पवृक्षसुहृत्तमौ ॥६८॥
त्वाय वैकुण्ठमायाने दिवं तौ यास्यतो ध्रुवम् । तथेति तमुद्गुरुं प्रोतिनद वचः प्रभुः ॥६९॥


हाथ पाया और राक्षस ताम्बूल दीजियेगा ॥ ५३ ॥ फिर उन देवताओंके सामने ही वेदवाक्यों द्वारा विस्तारपूर्वक रामचन्द्रजीकी स्तुति की और अत्यन्त प्रसन्न होकर कहने लगे ॥ ५४ ॥ हे राम हे कमलदल सदृश नेत्रवाले भगवन् ! मैं जानता हूँ कि तुम साक्षात् जगदीश्वर हो और रावणका विनाश करनेके लिए इस धरातलपर आये हो ॥ ५५ ॥ केवल प्रजाको तुम्हारा पौरुष दिखलानेके लिए ही मैंने गौ-वृद्धि और मणिसे न सिद्ध हुआ अन्न तथा मनुष्योन् न्हीं अनेक प्रकारके विभिन्न भाँति भाँति हे राम ! तुम्हारे लिए यह कुछ दुर्घट कार्य नहीं है तुम्हारे भूभंग मात्र से ही ब्रह्मादिक देवताओंका संहार विनाश एवं उद्भव होता है। जिस समय मंदराचलका क्षीरसागरमें तुमने डूबते देखा ॥ ५५ । ५६ ॥ तब कूर्मरूप धरकर उसे अपनी पीठपर उठा लिया था । उस समय एकमात्र तुम्हारी सहायतासे ही देवताओंने क्षीरसागर से चौदह रत्न निकाले थे ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ जिनके नाम हैं—लक्ष्मी, चन्द्रमा कामधेनु, कौस्तुभ, सुधा, विष, ऐरावत, अप्सराएँ, कल्पवृक्ष, धन्वन्तरि, उच्चैःश्रवा, पारिजात, सुरा और मद्य ॥ ५९ ॥ ६० ॥ उन चौदहो रत्नोंको तुमने चौदह देवताओंको बाँट दिया और तुम्हारी ही कृपासे वे सब आनन्दपूर्वक उनका उपभोग कर रहे हैं ॥ ६१ ॥ शंकरादिक समस्त देवता तुम्हारी ही आज्ञाका पालन करते हैं। इस जगत् में स्थित सब प्राणियोंका जीवनका उपाय तुम्हीं करते हो ॥ ६२ ॥ तब यदि तुमने हमारे इच्छानुसार भोजनकी सामग्रियें जुटा दीं तो इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। यह तो तुमने इन साधारण अज्ञानी मनुष्योंको तुम्हारा कौतुक दिखलाया था, सो दिखा दिया । ६३ ॥ हे राम ! तुम्हीं समस्त लोकोंके रक्षक, स्रष्टा तथा संहारक ज्ञापक हो ॥ ६४ ॥ तुम्हीं हमारे गतिदाता हो । मुझसे जो कुछ त्रुटि हुई हो सो क्षमा कर दो । इस तरह नाना प्रकारके वाक्यों द्वारा स्तुति करके दुर्वासाने बारम्बार प्रणाम किया और रामचन्द्रजीकी आज्ञा लेकर सब शिष्योंको साथ लिये हुए अपने आश्रमको चल दिये । इसके अनन्तर रामचन्द्रजीने उन देवताओंसे कहा—कल्पवृक्ष और पारिजातको लेकर अब आप लोग भी अपने लोकको चले जायें । इस प्रकार रामकी बात सुनकर देवगुरु बृहस्पति कहने लगे ॥ ६५-६७ ॥ "जबतक आप भूमण्डलमें रहेंगे, तबतक कल्पवृक्ष तथा पारिजात ये दोनों भी इस अयोध्यामें ही रहेंगे ॥ ६८ ॥ जब आप अपने वैकुण्ठ लोकको जाने लगेंगे, तब ये भी आपके साथ चले

सर्गः ३ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९७


पुष्पके स्थापयामास कल्पवृक्षसुरद्रुमौ । ततस्ते राघवं नत्वा ययुरिन्द्रादिकाः सुराः ॥७०॥
स्वर्गलोकं सुसंतुष्टा राघवेणातिपूजिताः । एवं प्राप्तौ कल्पवृक्षपारिजातौ भुवं दिवः ॥७१॥
तयोरेतत्त्वकारणं ते प्रोक्तं पृष्टं यथा त्वया । तदारभ्य सुरतरू पुष्परथौ विरेजतुः ॥७२॥
साकेते सीतया रामस्ताभ्यां सुखमवाप सः । कल्पवृक्षतले दिव्यपर्यङ्के सीतया सह ॥७३॥
नानाभोगावाप्तचन्द्रः स बुभोज चिरं सुखम् । अतः पूर्वं मया रामध्यानं कल्पतरोः स्थले ॥७४॥
सहस्रनामसङ्केते प्रोक्तं शिष्य तवाग्रतः । तदारभ्य पारिजातवृक्षांशाः शतशो भुवि ॥७५॥
पारिजातनगा जाता वर्तन्तेऽद्यापि तेऽत्र हि । नानेन सदृशं पुष्प वर्तते रामतोषद्म् ॥७६॥
कल्पवृक्षांशरूपाश्च ज्ञातव्यास्तत्र मानवैः । अश्वत्थाः सेवनाद्यैश्च सर्ववाञ्छितदायकाः ॥७७॥
पुण्याधिक्येन सेवन्ते रोपेक्षन्ते शुभाश्रये । पापाधिक्येनापि सेवां नरा वाञ्छन्ति नो कलौ ॥७८॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे
चम्पिकास्वयंवरो नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

( रामोपासक तथा कृष्णोपासक का परस्पर मधुर विवाद )

विष्णुदास उवाच

रामदास गुरो भूपां रामकृष्णौ परौ भुवि । मया दशावतारेषु ह्यवतारवुभौ पुरा ॥ १ ॥
तयोरपि च कः श्रेष्ठस्तन्मे वद ममाग्रतः । यं श्रुत्वा सर्वदा दस्य श्रोष्येऽहं चरितं शुभम् ॥ २ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं विष्णुदास सावधानमनाः शृणु । रामावतारः श्रेष्ठोऽत्र विशेयः सर्वदा नरैः ॥ ३ ॥
अस्मिन्नर्थे पूर्ववृत्तां कथां शृणु मनोहराम् । द्विजाभ्यां वादरूपेण कीर्तितां पुण्यदायिकाम् ॥ ४ ॥


कार्यंत। रामने सुरगुरु बृहस्पतिकी बात स्वीकार कर ली ॥ ६९॥ देवताओने उन दोनोंको पुष्पक विमानमें रखकर भगवान्‌को प्रणाम किया और राम द्वारा पूजित होकर सब अपने अपने लोकको चल गये । ७० ॥ इस प्रकार कल्पवृक्ष और पारिजात स्वर्गसे मृत्युलोकमें आय , उनके आनेका जो कारण था, वह तुम्हारे प्रश्नानुसार मैंने कह सुनाया। तभीसे दोनों सुरतरु पुष्पकमे विराजमान रहे ॥ ७१ । ७२ ॥ अयोध्यामें सीताके साथ रामचन्द्रजी उन्हीं वृक्षोंके नीचे दिव्य पर्यङ्कपर कार विहार करत हुए विविध प्रकारके सुखोंको भोगते थे ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ इसलिए मैंने रामसहस्रनामक कथन करत समय कल्पवृक्षके नीचे रामका ध्यान करनेको कहा था। तभीसे पारिजातके सैकड़ो अंश पृथ्वीतलमें उत्पन्न हुए और वे आज भी इस धरातलमे विद्यमान हैं। इसके समान रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाला कोई दूसरा फूल नहीं है ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ कल्पवृक्षके अंशसे पीपल वृक्षकी भी उत्पत्ति हुई है उसकी आराधना करनेसे सब प्रकारका कामना पूर्ण होती है ॥ ७७ ॥ अन्य युगोंमें पुण्य अधिक था। इस कारण लोग पीपलके वृक्षकी आराधना करते थे। किन्तु कलियुगमे पापकी अधिकता होनेके कारण लोग उसका पूजन नहीं करना चाहत ७८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचितायां 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते राज्यकांडे पूर्वार्द्ध द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

विष्णुदासने कहा--हे गुरो ! भगवान्‌के दश अवतारोंम राम-कृष्ण दो अवतार श्रेष्ठ माने जाते हैं । यह मैंने बहुसे कई बार सुना है ॥ १ ॥ अब आप हमको यह बतलाइए कि इन दोनों अर्थात् राम और कृष्णमें कौन बड़ा है। जिसको आप श्रेष्ठ बतलायेंगे, मै सर्वदा उसीका चरित्र सुना करूँगा ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा- हे विष्णुदास ! तुमने ठीक प्रश्न किया है सावधान मन होकर सुनो। इन दोनों अवतारोंमें मनुष्यको रामका अवतार ही श्रेष्ठ समझना चाहिए ॥ ३ ॥ इसके लिए एक मनोहर कथा आपसमें दो ब्राह्मणोंके

३९८आनन्दरामायण[ सर्ग ३

अयोध्याविषये कश्चिद्विजो रामाह्वयस्त्वभूत् । द्वारकायां तथा विप्रः कृष्णाख्योऽभूत्परः सुधीः ॥ ५ ॥
भक्त्या संसक्तौ चोभौ सर्वदा रामकृष्णयोः । तावेकदा माधवमासे प्रयागे मिलितौ द्विजौ ॥ ६ ॥
उभौ स्नात्वा त्रिवेण्यां हि माधवं परिपूज्य च । कथां पौराणिकमुखाच्छ्रोतुं तत्पुरः स्थितौ ॥ ७ ॥
शुश्रुतुः कथास्तत्र प्रसङ्गाद्राघवस्य च । रामाख्यो रामभक्तःस श्रुत्वा राघवसत्कथाम् ॥ ८ ॥
तुष्टस्तं पूजयामास मुदा पौराणिकं तदा । कृष्णाख्यः क्रोधसंयुक्तस्तदा वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
किं क्लेशिनोऽद्य रामस्य कथां श्रुत्वाऽतिहर्षितः ।
पूजितोऽपि वृथा व्यासस्त्वं मूढोऽसीति वेद्म्यहम् ॥ १० ॥
नान्यस्यैवं कस्यापि पावनं श्रुतिदोषहम् । यथा कृष्णस्य मे रम्यं नानाक्रोडापुरःसरम् ॥ ११ ॥
तत्कृष्णवचनं श्रुत्वा रामाख्यः प्राह सस्मितः ।

रामोपासक उवाच
रामः क्लेशी कथं प्रोक्तस्त्वया कृष्णः कथं सुखी ॥ १२ ॥
कथं कृष्णस्य ते रम्यं चरितं दुश्चिन्तापहम् । कथं रामस्य मे रम्यं चरितं नेरितं त्वया ॥ १३ ॥
वदाद्य विस्तरेणैव शृण्वन्त्वेते सभासदः ।

कृष्णोपासक उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया राम सावधानमनाः शृणु ॥ १४ ॥
वदामि राघवस्याथ कृष्णस्य चरितं महत् । क्लेशदं तोषदं नृणां शृण्वन्त्वेते सभासदः ॥ १५ ॥
तत्र रामस्य जन्मादौ जातः शापः पितुः पुरा । शापस्यादावपि पुरा तद्वेत्तो रावणेन हि ॥ १६ ॥
लंका वन्दितरौ नादौ प्रारम्भे दुःखमीदृशम् । मम कृष्णस्य जन्मादौ तद्विप्री-सौख्यदायकैः ॥ १७ ॥
विवाहमङ्गलैः कंसः पूजयामास सादरम् ।


विवादरूपां कही गयी थी। वह कथा परम पुण्यदायिता है, उस सुनो । १ एक समय अयोध्यामे राम नामका एक ब्राह्मण रहा करता था। उसी तरह द्वारकापुरीम कृष्ण नामका विद्वान् विप्र रहता था ॥ ५ ॥ वे दोनों सदा राम और कृष्णकी उपासना किया करते थे। एक समय माध म मेवे त्रिवेणी के तटपर उन दानोकी भेंट हुई ॥ ६ । उन्होंने त्रिवेणीम स्नान किया और वेणीमाधवकी पूजा करके दिशा करके एक पौराणिकके पास कथा सुननेकी इच्छासे जा बैठे ॥ ७ ॥ दानां कथा सुन रहे थे। उनम कही राघवका प्रसग आ गया। उसे सुनकर वह राम नामवाला ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और हर्षपूर्वक पौराणिकका भली भांति पूजा की। इससे कृष्ण नामवाला ब्राह्मण मार क्रोधके लाल हो गया और कहने लगा उत्सुका कष्ट देनवाले रामकी कथा सुनने-से तुम्हें क्या लाभ हुआ, जो तुम इतने प्रसन्न हुए और तुमने व्यासकी ऐसी पूजा की ? मेरी समझम तो यही आता है कि तुम बडे मूर्ख हो ॥ ८-१० ॥ मुझे तो और किसोका चरित्र इतना सुन्दर नहीं लगता, जितना श्रीकृष्णका। क्योंकि उस चरित्रमें त्रिविध प्रकारकी लीलाएं भरी हुई हैं ॥ ११ । कृष्ण नामक ब्राह्मणकी यह बात सुनकर रामोपासक मुसकाता हुआ कहने लगा कि तुमने रामचन्द्रको कैसे दुःखी बतलाया और कृष्णको सुखी ॥ १२ ॥ तुमने कृष्णचरित्रको कैसे पापनाशक बतलाया और रामचन्द्रजीका नाम लेना भी पसन्द नहीं किया। तुम इसे विस्तारपूर्वक कहो । जिससे ये सभासद भी सुनें। कृष्णोपासकन कहा-हे राम ! तुमने बहुत ठीक प्रश्न किया है। अब सावधान होकर सुनो ॥ १३ ॥ १४ ॥ मै रामचन्द्र तथा कृष्णचन्द्र इन दानोका चरित्र सुनाता हूँ। उनम रामचरित्र कैसा क्लेशप्रद और कृष्णचरित्र कितना सुखकर है, सो सब सभासद सुनते जायें ॥ १५ ॥ तुम्हारे रामके जन्मके पहले ही उनके पिताको श्रवणके पिताका शाप मिल चुका था। उसके भी पहले उनके माता-पिताको रावण अपनी लंकामे उड़ा ले गया था। इस प्रकार रामके जन्मके पहले उनके माता-पिताको

सर्गः ३] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ३०९


रामोपासक उवाच
रे रे शृणु त्वं दुर्बुद्धे न स शापो वरोऽर्पितः । १८॥
यत्प्रसादादपुत्रस्य नृपस्य तनयश्चतुः । तथा मद्रावमीत्या हौ नीतावपि विसर्जितौ ॥ १९॥
दशास्येन तत्पितरौ जन्मार्दो पौरुषं त्विदम् । तव कृष्णस्य जन्मादौ पित्रोः कारागृहस्थितिः ॥ २०॥
राजभोगनिषेधार्थं शापो यदुकुलाय च । जन्मापि बहिशालायां वियोगश्च तयोरपि ॥ २१॥
सहोदरवधश्चापि उद्वेगोर्मातुलेन हि । न बाहुजश्च वैश्यश्च यस्य तातावुभौ स्मृतौ ॥ २२॥
गोरक्षकस्य तनयः प्रवासः शैशवेऽपि च ।
परेण पोषितश्चापि कनीयान् बलभद्रतः । एव नानाविधं दुःखं तव कृष्णस्य नो सुखम् ॥ २३॥

कृष्णोपासक उवाच
आत्मार्थं तव रामेण त्राटिका स्त्री विदारिता । नार्थाद्विमोचितो बाणः पित्रोः खेदो वियोगतः ॥ २४॥

रामोपासक उवाच
द्विजघ्ना निहता दुष्टा मम रामेण ताटिका । मुनियज्ञरक्षणार्थं मुदा राज्ञाऽर्पितो शिशुः ॥ २५॥
तव कृष्णेन रक्षार्थमात्मनः पूतना हता । तथाऽऽत्मार्थं प्राणिहिंसा बहु तेन कृता ब्रजे ॥ २६॥
गोपैश्च सङ्गतिस्तस्य तथैव गोरक्षणम् । गोवधः सर्पघातश्च स्रगवाजिबधस्तथा ॥ २७॥
रासभवृषघातश्च चौर्यं द्यूतं वनेऽटनम् । कंबलाव्रणं शीतोपर्जन्योग्रप्रपीडनम् ॥ २८॥
क्षुत्तृड्भ्यां पीडनं नित्यं गोपालोच्छिष्टसेवनम् । आत्मार्थे याचितं चान्नं द्विजस्त्रीभ्यो वने मुहुः ॥ २९॥
इन्द्रध्वजपूजनं दिष्ट्वाचाप्रलोपनम् । परस्त्रीगमनं ज्येष्ठनारीभिः क्रीडनं चिरम् ॥ ३०॥


कितना क्लेश हुआ। इसके विपरीत हमारे कृष्णके जन्मके पहले कंसने उनके माता-पिताको वैवाहिक तथा मङ्गलमयी सामग्रियास पूजा की थी। रामोपासकने कहा— अरे दुर्बुद्धे ! वह रामचन्द्रके पिताको शाप नहीं, बल्कि वरदान मिला था। जिसके प्रभावस्वरूप निपुत्र महाराज दशरथके घरमें रामचन्द्रादि चार भाइयोका जन्म हुआ और हमारे मन्दराजके डरसे ही रावण उनके माता-पिताको ले जाकर भी अयोध्यामे लौटा गया था। १८-१९ ॥ जन्मके पहले ही मेरे रामचन्द्रजीमे इतना पौरुष था। तुम्हारे कृष्णके जन्मके प्रथम ही उनके माता-पिता कारागारमे बन्द थे। दूसरे यदुकुलको राजभोगनिषेधके निमित्त पहले ही शाप प्राप्त हो चुका था। उनका जन्म भी हुआ तो जेलखानेमे और वहा थोड़ी ही देरमे माता-पितासे वियोग हो गया। कृष्णके कितने ही सगे भाई मामाके द्वारा पहले ही मार डाले गये। उनको जो कृत्रिम माता-पिता मिले थे, वे न तो क्षत्रिय थे और न वैश्य ॥ २०-२२ ॥ तुम्हारे कृष्ण एक ग्वालेके लड़के बने। इस प्रकार वे शैशवावस्थामें ही प्रवासी हो गये। औरोन उनकी रक्षा की और तुम्हारे कृष्ण बलरामसे छोटे थे। इसीलिए कृष्णको अनेक प्रकार का दुःख मिला, सुख कुछ भी नहीं। २३ । कृष्णोपासक बोला—अपनी रक्षा करनेके लिए तुम्हारे रामने ताड़का नामवाली एक स्त्रीका वध किया और रामके वियोगसे उनके माता पिताको महान् क्लेश हुआ ॥ २४॥ रामोपासकने कहा— हमारे रामन ब्राह्मणांकी हत्या करनेवाली स्त्री ताड़काको मारा था और द्विज यज्ञरक्षाके लिए उन्हें पिता दशरथने प्रसन्नतापूर्वक मुनिके साथ भेजा था। २५। किन्तु तुम्हारे कृष्णने रक्षाके लिए पूतनाको मारा था। इसी प्रकार उन्होंने आत्मरक्षामे लिए ब्रजमे और भी बहुत सी प्राणिहिंसाएं की थीं ॥ २६॥ गोप-ग्वालोंका साथ था और वे गायोंकी ही रक्षा करते थे। उन्होंने गौ (धेनुकासुर) पक्षी (बकासुर) घोड़ा (केसी), रासभ तथा वृष आदिको मारा, चोरी की, जुआ खेले और वनोंमे इधर-उधर घूमत रहे। शीत वर्षा तथा आतपसे बचनेके लिए अपने ऊपर केवल एक कम्बल डाले रहते थे ॥ २७-२८ ॥ भूख-प्याससे दुखी होकर ग्वालोंका जूठन खाते थे अपने लिए उन्होंने वनमें ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंसे बार-बार अन्न माँगा। २९ ॥ इन्द्रध्वज-पूजन आदि वृद्धोंकी कुलपरम्परासे चलनवाली प्रथाका उन्होंने लोप किया। वे परस्त्रियोंके साथ घूमते

१४०आनन्दरामायणे[ सर्ग ३

नग्नस्त्रीदर्शनं वह्निप्राशनं दामबन्धनम् । उन्मूलनं च यमयोर्धूपर्युषितसेवनम् ॥३१॥
रोदनं नवनीतार्थं मृन्मात्रा प्रताडनम् । गोपोपिकासु चास्नेहः पूर्वस्थलविसर्जनम् ॥३२॥
कृता रजकहत्या च युद्धं क्षत्रियवत् कृतम् । गजहत्या मल्लहत्या युद्धं मातुलमर्दनम् ॥३३॥
नैष्ठुर्यमाप्तवर्गेषु राज्यप्राप्तिस्तथैव च । नृपाज्ञायतनं चापि क्रीडा दास्या कुरूपया ॥३४॥
युद्धात्पराजयाश्चापि रिपवे पृष्ठदर्शनम् । गिरौ दग्धः परैर्ज्ञातः स्वांयस्थलविमोचनम् ॥३५॥
अब्धितीरनिवासश्च परस्त्रीहरणं कृतम् । भौमासुरपरद्रव्यहरणं परखनूनतः ॥३६॥
स्वीयगोत्रवधार्थं हि पांडवाग्र्योपदेशितम् । स्तेनैः स्तेयापरोपाश्च वृक्षार्थं सङ्गरः सुरैः ॥३७॥

कृष्णोपासक उवाच

किं त्वं जल्पसि शृण्वद्य तव रामस्य कामिनः । कस्य सा दुहिता ब्रूहि कुतः स वर्णसङ्करः ॥३८॥
शिवचापस्य भङ्गेन शिवस्याप्यपराधितम् । जामदग्न्यमानभङ्गकरणं मुद्गलस्य च ॥३९॥
आज्ञां विना लक्ष्मणेन तदन्वयलटिताः शुभाः । सदारण्यचरः स्वार्थं पशुहिंसापरायणः ॥४०॥
वनाश्रमी वन्यजीवी मांसाहारी धनुर्धरः । व्याधकर्मरतः शीतपर्जन्योष्णप्रपीडितः ॥४१॥
पादगामी चर्मवासा जटावल्कलशाखवी । श्मश्रुधारी तरुच्छाय श्रयी पात्रविवर्जितः ॥४२॥
राक्षसेन हृता पत्नी तव रामस्य कानने । पत्न्यर्थं हि कृतः शोकस्तथा दास्या प्रपूजितः ॥४३॥

रामोपासक उवाच

शरेण मोचिता पत्नी कृता छायामयी पुरा । न सा दासी तु शबरी मुनिसेवनतत्परा ॥४४॥


और अपनेसे बड़ी स्त्रियोंके साथ खेलते फिरते थे। वे नङ्गी नारियोंको देखते थे। उन्होंने मिट्टी खायी और कितने ही बार तो लोगोंके जूठन तक खाये थे। रस्सीसे बाँधे गये तो यमल-अर्जुन नामके दो वृक्षोंको उखाड़ डाला ॥ ३० ॥ ३१ ॥ घोटसे माखनके लिए रोने लगते थे और माता यशोदाके द्वारा बार बार पीटे भी गये। अन्तमें अपनेसे अतिशय प्रेम रखनेवाली गोपिकाओंके प्रति निष्ठुरता करके उस पवित्र वृन्दाबनको छोड़ दिया ॥ ३२ ॥ मथुरामें रजककी हत्या की और (ग्वाले होकर ) क्षत्रियोंके समान युद्ध किया। उन्होंने गजहत्या और मल्लहत्या करक मामाकी भी हत्या की ॥ ३३ ॥ अपनोंके साथ निष्ठुराई करके उन्होंने राज पाया। फिर भी एक दूसरे राजाकी आज्ञामे बंधकर रहे । बादमे एक कुरूप दासीके साथ क्रीड़ा की ॥ ३४ ॥ युद्ध हुआ तो उसम पराजित होकर शत्रुको पीठ दिखायी और पर्वतपर जाकर छिपे। शत्रुओंने अपनी समझसे उन्हें जला ही दिया था। फिर अपन स्थान मथुराको छोड़कर समुद्रके किनारे जाकर रहन लगे। वहाँ भी बरबस बहुतेरी स्त्रियोंका हरण किया। भौमासुरके द्रव्योंका उन्हांने चुराया ॥ ३५ । ३६ ॥ अपन भाइयो तथा कुटुम्बियोंको मारनेके लिए पाण्डवोंको उपदेश दिया। लोगोंपर उन्ह स्यमन्तक मणिकी चोरी लगायी। एक वृक्षके लिए उन्होंने देवताओंके साथ संग्राम किया ॥ ३७ ॥ कृष्णोपासक बोला—क्या व्यर्थ बकवास करते हो, सुनो। आज मैं तुम्हारे कामी रामकी करनी तुम्हें सुनाता हूँ। बताओ, जिसको उन्होंने अपनी भार्या बनायी थी वह वर्णसंकर कन्या थी या नहीं ? ॥ ३८ ॥ शिवजीका धनुष तोड़ करके शिवका अपराध किया। परशुरामका मान भङ्ग किया। मुद्गलकी आज्ञाके बिना ही लक्ष्मण द्वारा उन्होंने लतायें तोड़ मंगवाईं। जङ्गलमे इधर-उधर घूमते हुए पेट भरनेके लिए पशुहिंसा करते थे ॥ ३९ ॥ ४० ॥ बहुत दिनों तक वनमें आश्रम बनाकर रहे। वनके फल-मूल तथा मांस खाने और धनुष धारण किये बहेलियाका काम करते रहे। सर्वदा बेचारे शीत-आतप तथा मेहके सताये रहते थे ॥ ४१ ॥ पैदल चलते, चमड़ा पहिनते, बड़े-बड़े नख तथा जटा-वल्कल धारण किये रहते थे। बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूँछ रखाये पेड़ोंकी छायामें रहकर समय बिताते थे। उनके पास एक पात्र भी नहीं रहता था कि जिसमे खा-पी सकें ॥ ४२ । वनमें उनकी स्त्रीको एक राक्षस चुरा ले गया। उसके लिए विविध प्रकारका विलाप करते रहे और उनकी पूजा एक दासी शबरीने की ॥ ४३ ॥ रामोपासकने

सर्गः २] राघवकाव्यम् (पूर्वार्द्धम्) १०१

सर्गः २] राघवकाव्यम् (पूर्वार्द्धम्) १०१

जीवनमुक्ता त्वत्कृपया मोक्षमाप सुविप्रता । तव कृष्णस्य ताः पत्नीभ्योऽन्येनापि हृतव्रजः ॥४४॥ जित्वाऽर्जुनं बलादेव हृताः पूर्वं सहस्रशः । स्त्रीभिश्च क्षिप्ता दत्तः कस्यचित्स्वं नारदात् ॥४५॥ सर्वासामपि कामपूर्त्यर्थं निशि निद्राविवर्जितः । बंधुभ्यां योषिका भुक्ता मातृतुल्यारयोधिकाः ॥४७॥

कृष्णोपासक उवाच

शत्रुना तव रामस्य वधुभीत्या न निद्रितः । बंधुपत्न्यर्पिता तारा सुग्रीवाय यथासुखम् ॥४८॥ वानरैश्च कृता मैत्री स्पार्शत दुन्दुभेः शवम् । निरर्थकं हतो वाली साहाय्यं वानरैः कृतम् ॥४९॥ वानरो यस्य वै यानं वृथा शाला विदारिता । सागरो रोधितो येन लङ्का सा ज्वालिता वरा ॥५०॥

रामोपासक उवाच

दारिद्र्य सुदाम्ना वै कृष्णेन पत्रिकी कृता । न शेषा वानरास्तेऽपि सर्वे देवांशरूपिणः ॥५१॥ कापट्येन हतो येन जरासंधो निरर्थकः । साहाय्यं सर्वदा यस्य कृतं गोपैर्ब्रजे वने ॥५२॥ गोपालस्य कृतं यानं क्रीडनं सर्वदा वने । ज्वलिता येन सा काशी सुहृत्कंशी विरूपितः ॥५३॥ शिवभक्तेन समरः कृतो बाणेन सादरम् । शिवेनापि कृतं युद्धं चैद्येन निन्दितो मुहुः ॥५४॥ परैः पौत्रो जितो यस्य येन कृष्णेन परम्पराम् । कृता विषमता चात्र पारिजातापणादिभिः ॥५५॥

कृष्णोपासक उवाच

तथापि श्वशुरपुत्रेण सुहृद्धदो रणे जितः । शिवभक्तदशास्येन रामेण समरः कृतः ॥५६॥ द्विजहत्या कृता येन मुनिना निन्दितोऽपि यः । तथा मित्रं जितो यस्य बंधुजेन विभीषणः ॥५७॥ परगेहस्थिता पत्नी पुनर्यैनाभिता सुखम् । वैदुष्यं च कृतं पत्न्यां स्वाङ्गा बाधा न पूरिता ॥५८॥


कहा—हमारे रामने अपनी छायामयी पत्नीको राक्षसके हाथसे छुड़ाया था। जिसकी तुम दासी कह रहे हो, वह दासी नहीं, बल्कि मुनियोंकी सेवामें रहकर शबरी थी ॥४४॥ रामचन्द्रजीकी कृपासे वह जीवन्मुक्त हो गयी और उसे मोक्ष मिल गया। किन्तु तुम्हारे कृष्णकी पत्नियोंको आज भी उनके शत्रुगण मांग रहे हैं ॥४५॥ कृष्णकी हजारों स्त्रियोंको अर्जुनसे डाकुओंने छीन ले गये थे। कृष्ण पूरे दुर्बल थे। उनकी एक स्त्रीने तो उन्हें दान दे दिया था और बादमें उसी सत्यभामाने नारदसे उन्हें खरीदा ॥४६॥ सब स्त्रियोंकी कामपूर्तिके लिए उन्हें रात रात भर जागना पड़ता था। दोनों भाइयोंने उन बड़ी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा की थी, जो माताके समान थीं ॥४७॥ कृष्णोपासकने कहा—तुम्हारे राम शत्रुओंके भयसे रात रात भर जागा करते थे। बड़े भाईकी स्त्री ताराको रामने बड़े हंसी-खुशीके साथ सुग्रीवको दे दी थी। वानरोंके साथ उन्होंने मैत्री की और दुन्दुभी नामक राक्षसके शवका स्पर्श किया। बालि बेचारेको बिना किसी अपराधके मार डाला। वानरोंने उनकी सहायता की ॥४८॥४९॥ वानर ही उनकी सवारीका काम देते थे। बिना किसी प्रयोजनके उन्होंने सात ताल वृक्षोंको काटकर गिरा दिया। सागरमें पुल बनाया और सोनेकी सुन्दर लङ्कापुरी जलवा दी ॥५०॥ रामोपासक बोले—तुम्हारे कृष्णने एक दरिद्र ब्राह्मण सुदामाके साथ मित्रता की थी। जिन्हें तुम वानर कह रहे हो, वे वानर नहीं, बल्कि वानरका शरीर धारण करके सब देवता रामकी सेवाको आये थे ॥५१॥ तुम्हारे कृष्णने कपट करके व्यर्थ जरासंधका वध करवाया था। वनमें सदा गोपगण उनकी सहायता करते रहते थे ॥५२॥ उन्होंने गोपोंको अपनी सवारी बनाया और सदा वनमें इधर-उधर खेलते रहे। उन्होंने काशी नगरीको जलवा डाला और अपने सगे माले रूक्मीको कुरूप कर दिया ॥५३॥ शिवभक्त बाणासुरके साथ उन्होंने युद्ध किया और स्वयं शिवको भी उनके साथ युद्ध करना पड़ा। शिशुपालने उनकी खूब निन्दा की ॥५४॥ शत्रुओंने उनके पौत्रको जीतकर अपने वशमें कर लिया और पारिजातादिको देते समय अपनी स्त्रियोंमें भी उन्होंने भेदभाव किया ॥५५॥ कृष्णोपासकने कहा—तुम्हारे रामके बेटेने भी तो अपने श्वशुर पुत्रको बाँध लिया और रामने शिवभक्त रावणके साथ युद्ध किया था ॥५६॥ उन्होंने ब्रह्महत्या तक कर डाली और मुनि अगस्त्यने उनकी अच्छी तरह निन्दा की। अपना काम बनानेके लिए रामने रावणके भाई विभीषणको फोड़कर मित्र

४०२आनन्दरामायणे[ सर्गः २

यानारूढा कृता पात्रा वेश्याः स्पृष्टास्तथा रहः । पतिव्रतायां सीतायां दोषारोपः कृतोऽपि च ॥५९॥
पुत्रं हंतुं कृता ज्ञाज्ञा शूद्रसिंह्यौ हतौ, पत्नीसक्ताऽऽश्रिता येन पश्यता पालिता नृपैः ॥६०॥
रामोपासक उवाच
अंते कृष्णस्य ते शापादंशच्छेदो ऽभूद्विज । अब्धिना लोपिता यस्य नगरी द्वारका शुभा ॥६१॥
स्वगोत्रस्य वधस्त्वंते मद्यपानादि यत्कुले । दर्शनं चार्ज्युनायान्ते येन मित्राय नार्पितम् ॥६२॥
स्वस्थानं गमनं येन कृतमेकाकिना तथा । स खतोऽपि कृतस्वान्ते व्याधेनाल्पेन पत्रिणा ॥६३॥
कृष्णोपासक उवाच
तव रामेण समरः पुत्रेणापि कृतो महान् । तथा सीता मया त्यक्ता चेति लोकं प्रतार्य च ॥६४॥
वाल्मीकेराश्रमं गत्वा दृष्टौ सीतासुतौ रहः पिण्याकेन तथेङ्गुद्या पिंडदानदिकं कृतम् ॥६५॥
दंडके तव रामेण स्वपित्रे अमताऽर्पितम् । तयैरावणमुक्तायाः स्पृष्टः स नभस्तः स्थले ॥६६॥
तथाऽश्वत्थच्छेदनाथं महान् यत्नः कृतो मुहुः । स्वमन्त्रिणश्च शेषायुःपूत्यर्थं सङ्गरोऽपि च ॥६७॥
कारितो यमराजेन पूर्वजेन लवादिभिः । पुष्पास्वादनमात्रादिपत्न्यः शिक्षा तथा कृता ॥६८॥
मम कृष्णेन बालत्वे लीलया पूतना हता । हतास्तृणासुराद्याश्च धृतोऽङ्गुल्या गिरिस्तथा ॥६९॥
रामोपासक उवाच
मम रामेण बालत्वे लीलया ताटिका हता । मारीचाद्या हताश्चारि पर्वतास्तारिता जले ॥७०॥
कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णस्वरूपेण गोपिका मोहिता व्रजे । मोहिता राधिका श्रेष्ठा मदनस्यापि मोहिनी ॥७१॥
रामोपासक उवाच
मम रामेण देवानां मोहिताः स्त्रीस्वरूपतः । देवपत्न्यो रहो रात्रौ मातृतुल्या विचिन्तिताः ॥७२॥


बनाया ॥ ५७॥ दूसरेके घरम रही हुई स्त्रीको लाकर घरम रख लिया । फिर उसी स्त्रीके साथ निठुराई की । बहुत सी स्त्रियां कामवाञ्छाके लिये पहुंचीं, किन्तु उनकी कामना उन्होंने पूर्ण नहीं की ॥५८॥ सवारीपर चलकर तीर्थयात्रा की । एकान्तमें वेश्यागमन करके पतिव्रता सोतापर झूठमूठका दोषारोप किया ॥ ५९ ॥ उन्होंने अपने पुत्र लव तकको मारनेकी आज्ञा दे दी और शम्बुक शूद्र तथा सिंहिका वध किया । ६० । रामोपासकने कहा-हे द्विज ! अन्तमे तुम्हारे कृष्णका ब्राह्मणके शापसे वंश नष्ट हुआ था । उनकी द्वारिकापुरीको समुद्रने लय कर लिया ॥ ६१ ॥ उन्होंने मद्यपान करवाकर अपने कुटुम्बियोंका वध किया । अन्तिम समयमे अपन अतिप्रिय मित्र अर्जुनको भी दर्शन नहीं दिया ॥ ६२ ॥ उन्होंने अकेले ही यहसि गोलोककी यात्रा की । एक बहेलियेके साधारण बाण द्वारा उन्होंने अपना अन्त किया । ६३ ॥ कृष्णोपासक बोला-तुम्हारे रामने अपने पुत्रके साथ महान् संग्राम किया था। "मैने सीताका परित्याग कर दिया है" ऐसा संसारको दिखलाते हुए भी वाल्मीकिके आश्रमपर जाकर चुपकेसे सीताको और अपने बेटेको देख आये । पिण्याक और इंगुदीके फलसे अपने पिताको पिण्डदान दिया ॥ ६४ ॥ ६५ । सब दण्डकारण्यमें इधर-उधर घूम रहे थे, तब भी इन्हीं फलोंसे पिताका श्राद्ध किया था। ऐरावत द्वारा भोगे हुए मंचको उठाकर पृथ्वीतलमें ले आये ॥ ६६ ॥ अश्वत्थ काटनेके अपराधपर रामने एक महायज्ञ किया। मन्त्रियोंकी शेष आयुकी पूर्तिके निमित्त अपने बड़े बेटेको यमराजसे लड़ा दिया और केवल फूल सूंघ लेनेसे स्त्रियोंको भी उन्होंने दण्ड दिया ॥ ६७ । ६८ । हमारे कृष्णने बाल्यकालमें खेल-खेलमें ही पूतनाको मार डाला। तृणासुर आदि दैत्योंको मारकर गोवर्धन गिरिको अँगुलियोंपर उठा लिया ॥ ६९ ॥ रामोपासकने कहा हमारे रामने बाल्यकालके समय खेल-खेलमे ताटका तथा मारीचादि कितने ही राक्षसोंको मार डाला और पानीमें पत्थर तैराया ॥ ७० ॥ कृष्णोपासक बोला-हमारे प्रभु कृष्णने अपने सुन्दर रूपसे

सर्गः ३ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) १०३


ताः कृतार्थाः स्ववश्यातो जातास्तु गोपिकाः । तांबूलोंच्छिष्टरसं दासी रामस्य भक्तितः ॥७३।
पीत्वा यस्यैव वरतो ब्रजे सा राधिकाऽभूत् । अतो मे राघवो धन्यो यस्यैका दयिताऽत्र हि ॥७४॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन पत्न्यश्च सहस्राणि हि षोडश साष्टोत्तरशतान्यत्रोद्वाहिताश्च विधानतः ॥७५॥

रामोपासक उवाच
मम रामस्वरूपेण सर्वास्ता मोहिताः स्त्रियः । मातृवन्मोहितास्तेन वीरेण पुरुषार्थिना ॥७६॥
कृष्णेन रतिकामेन मोहिता गोपिकाः स्त्रियः ।

* कृष्णोपासक उवाच
गजेन्द्रो मम कृष्णेन लीलया निहतो द्विज ॥७७॥

रामोपासक उवाच
मम रामेण नागेन्द्ररिपुरष्टापदो हतः ।

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णप्रतापेन यमुना खंडिता त्वभूत् । ७८॥

रामोपासक उवाच
मम रामप्रतापेन खंडिता जाह्नवी त्वभूत् ।

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन वै स्वर्गादानीतः सुरपादपः ॥७९॥

रामोपासक उवाच
मम रामेण स्वर्गादानीतौ सुरपादपौ ।

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन स्वगुरोर्मृताश्चापि सुता मृताः ॥८०।
सुजीविताः समानीताः सप्त ताभ्यां निवेदिताः ।


ब्रजकी समस्त गोपियोंको मोहित कर लिया और राधानामवाली उस सुन्दरीको मुग्ध कर लिया था, जो अपने असाधारण सौन्दर्यसे कामदेवको भी लजाती थी ॥७१॥ रामोपासकने कहा-हमारे रामने अपने सौन्दर्य-से देवपत्नियोंको मोहित किया था। वे सब रात्रिके समय एकान्तमें रामके पास पहुँचीं। किन्तु उन्हें रामने अपनी माताके समान माना और वरदान देकर कृतार्थ किया। वे ही जन्मान्तरमें गोपिकायें हुईं। उस समय रामचन्द्रके मुखसे ताम्बूलके निकाले हुए पोयको पीनेवाली दासी दूसरे जन्ममें राधा हुई। इससे मेरे रामचन्द्र धन्य हैं । क्योंकि वे एकपत्नीव्रतधारी हैं ॥७२-७४॥ कृष्णोपासकने कहा—हमारे कृष्णचन्द्रजाने सोलह हजार एक सो आठ स्त्रियोंके साथ विधिवत् विवाह किया था ॥ ७५ ॥ रामोपासकने उत्तर दिया कि हमारे रामचन्द्रजीने अपनी सुन्दरतासे संसारकी समस्त नारियोंको मोह लिया था, किन्तु स्त्रीके भावसे नहीं—अपितु माताके भावसे; क्योंकि हमारे राम वीर और पुरुषार्थी थे ॥ ७६ ॥ कृष्णने गोपियों नारियोंपर मोहिनी डाली थी अपनी कामवासनाकी पूर्तिके लिए। कृष्णोपासकने कहा-हे द्विज ! हमारे कृष्णने खेल खेलमें कुवलयापीड हाथीको मार डाला था ॥ ७७ ॥ रामोपासक बोला—मेरे रामने अष्टापद नामक राक्षसको खेल-खेलमे मार डाला था। कृष्णोपासकने कहा—मेरे कृष्णने अपने प्रतापसे यमुनाकी धारा खण्डित कर दी थी ।। ७८ ॥ रामोपासकने कहा - मेरे रामके प्रतापसे गंगा खण्डित हो गयी थी। कृष्णोपासकने कहा—हमारे कृष्ण अपने पराक्रमसे कल्पवृक्ष ले आये ॥७९॥ रामोपासकने कहा—हमारे

४०४आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

रामोपासक उवाच
मम रामेण साकेते सप्त मर्त्याः सुजीविताः ॥८१॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन पौरुष्याद्विप्रस्य जीविताः सुताः ।

रामोपासक उवाच
मम रामेण सचिवः सुमंत्रो जीवितः पुनः ॥८२॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन द्रौपद्याः संधितं हि फलं तरौ ।

रामोपासक उवाच
मम रामेण वैदेह्याः संधितं तुलसीदलम् ॥८३॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णप्रतापश्च जनान्संदर्शितः पुरा दुर्वाससाऽन्नयाञ्चा सा गोपिकानां कृता वृजे ॥८४॥

रामोपासक उवाच
मम रामप्रतापश्च जनान् मन्दर्शितः पुरा । दुर्वाससाऽन्नयाञ्चा सा कृता रामस्य तत्पुरि ॥८५॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन रूपाणि बहून्यद्य कृतानि हि ।

रामोपासक उवाच
बहूनि राघवेणापि स्वरूपाणि कृतानि हि ॥८६॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन मित्राय दत्तं स्वर्णमयं पुरम् ।

रामोपासक उवाच
मम रामेण मित्राय दत्ता स्वर्णमयी पुरी ॥८७॥

कृष्णोपासक उवाच
सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे स्नानं कृष्णेन मे कृतम् ।


रामचन्द्रजीने अयोध्यामे बैठे-बैठे स्वर्गसे कल्पवृक्ष तथा पारिजातको मंगा लिया था । कृष्णोपासक बोला—हमारे कृष्णाजी अपने गुरुजीके मरे हुए सात पुत्रोंको यमपुरीसे लाये और उन्हें जीवित करके अपने गुरुजीको दे दिया था। रामोपासकने कहा—हमारे रामचन्द्रजीने अयोध्यामें मरे हुए सात मनुष्योंको जीवित कर दिया था ॥ ८० ॥ ८१ ॥ कृष्णोपासकने कहा—हमारे कृष्णने द्रौपदीके कथनानुसार बिना फलवाले वृक्षमें भी फल लगा दिया था। रामोपासक बोला—हमारे रामने भी सीताके कहनेपर तुलसीदलके दो टुकड़ोंको जोड़ दिया था ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ कृष्णोपासक कहने लगा—हमारे श्रीकृष्णजीने जंगलमे दुर्वासाके अन्न मांगनेपर उनकी मांग पूरी की थी ॥ ८४ ॥ रामोपासक बोला—हमारे रामने भी अयोध्यामें दुर्वासाके अन्न माँगनेपर उनकी इच्छा पूर्ण की थी। इससे हमारे रामका प्रताप सब संसार देख चुका है। ८५ ॥ कृष्णोपासक बोला—हमारे कृष्णने अनेक रूप धारण किये थे। रामोपासकने कहा—हमारे राम भी लंकासे लौटकर अयोध्या आनेपर अनेक रूप धारण करके सबसे एक साथ मिले थे। कृष्णोपासक बोला—श्रीकृष्णने अपने मित्र सुदामाको सुवर्णकी नगरी दे डाली थी। रामोपासकने कहा कि हमारे रामने भी अपने मित्र विभीषणको सोनेकी लंका दे दी थी ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ कृष्णोपासक बोला—हमारे कृष्णने सूर्यग्रहणपर कुरुक्षेत्रम जाकर स्नान किया था। रामो-

सर्गः ३ ] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) २७५

सर्गः ३ ] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) २७५


मृधेऽग्रेऽ कुरुक्षेत्रे शरेणापात्रताहितम् ॥८८॥
मे रामस्य वचश्चैकं सत्यमेव च नान्यथा । ते कृष्णस्य ह्यनेकानि वचनान्यमृषानि हि ॥८९॥
रामस्य ये शरास्त्वेकः शत्रुनिर्दलनक्षमः । विकलास्तव कृष्णस्य बहवोऽप्युशुरार्दभाः ९०॥
एका स्त्री मम रामस्य ते कृष्णस्य बह्वियः । वन्याऽप्यर्था विना नान्या दृष्टा रामस्य वै समम् ९१
स्त्रीणां वृन्दा विना रक्ष्याः स्त्रियः कृष्णस्य वै द्विज । रक्ताश्चितिमप्यद्यूतं प्राप्तेने मम्पुनटे ॥९२॥
अन्येतटे पश्चिमे वै स्थितिः कृष्णस्य वै तरे । भ्रातरो मे रामस्य कृष्णस्यैकं भ्रातृस्तथा ॥९३॥
गौर्मणिः पुष्पकं वृक्षौ कटके मुनिनाऽर्पिते । ऐरावतकुलोद्भूतः सुमुखेभो गजस्तथा ॥९४॥
एतानि मम रामस्य नव रत्नानि संति हि । मणित्वयं पारिजातस्त्वमेकं रत्नत्रयं तव ॥९५॥
कृष्णस्य मति भो विप्र त्वं मं स्तोषिकथं वृथा । सप्तद्वीपेश्वरो भव्यो मम पृथ्वीश्वराचिंतः ॥९६॥
ईशश्च जगदीशश्च सममेव द्वय म्मृतम् । त्वां न मम रामेण तुल्यं कृष्णं विचिन्तय ॥९७॥
यस्य चाप हि कोदण्डं यस्याभयप्रदः करः । विष्टरपूरणं यस्य व्रतं नित्यं द्विजोत्तम ॥९८॥
यस्य निरासनं छत्रं व्यजनं चामरद्वयम् । यस्य यानं पुष्पकं तत्सुतौ तौ पितुः समौ ॥९९॥
अद्यापि पान्यते यस्य दत्त दानं द्विजोत्तमान् । रामनाथपुरस्येह नाम सम्भव मे नृपैः ॥१००॥
तव कृष्णेन किं दत्तं वद महतेऽधुना । सदाह्यहर्निशं शम्भुरपि मे रामचिन्तनम् ॥१०१॥
तारकं मे रामनाम करण्यं संशृण्वन्त्सदा । मृत्योर्मुक्ताप्तिलाभार्थं द्विजोपविशति स्वयम् ॥१०२॥
अतएव जनाश्चापि सर्वत्र मरणोन्मुखात् । ध्यायन्मुहुः शिववृति ध्येयो रामोऽधुना त्विति ॥१०३॥
तथा प्राणिभिवोक्षार्थं सदा तण्डवनायकैः । रामेति रामेति नाम भूत्वामुदीर्यते ॥१०४॥
यन्नाममहिमा सोऽयं त स्तोम्यधुना प्रभुः । वाल्मीकिनाऽप्येत एवपूर्वन्तच्चरितं कृतम् ॥१०५॥

व्यासजीने कहा कि हमारे रामने भी तो कुरुक्षेत्रमे स्नान किया था ॥ ८८ । मेरे राम सदा सत्य वचन बोलते थे, किन्तु तुम्हारे कृष्णकी बहुत सी बातें झूठी हो गयीं थीं ॥ ८९ । मेरे रामका एक बाण शत्रुको मारनेके लिये पर्याप्त होता है, किन्तु तुम्हारे कृष्णके अनेक विकल बाण गधाके मुख हैं ॥ ९० ॥ हमारे रामका केवल एक स्त्री सीता है और तुम्हारे कृष्णकी बहुत सी स्त्रियाँ हैं, पत्नीका मर्यादातिरिक्त हमारे रामको कोई और इच्छा नहीं है, लेकिन तुम्हारे कृष्णका बहुतों स्त्रियाँ हैं, जो बिना रक्षक हैं। हमारे राम समुद्रके तटपर अयोध्यामे रहते हैं । ९१ ।। ९२ । इसके विपरीत तुम्हारे कृष्ण पश्चिमा समुद्रके किनारे रहते हैं। मेरे रामके तीन भाई हैं और तुम्हारे कृष्णके केवल एक भाई हैं ॥ ९३ ॥ हमारे रामके पास कामधेनु गौ, मणि, पुष्पक, कल्पवृक्ष, पारिजात मुनि अगस्त्य द्वारा दिये हुए बाण, तूणीर, ऐरावत वंशमें उत्पन्न सुमुख हाथी ये नौ रत्न सदा विद्यमान रहते हैं। हे विप्र ! तुम्हारे कृष्णके पास दो मणि तथा पारिजात वृक्ष ये ही तीन रत्न हैं ॥ ९४ ।। ९५ ।। तब कहिए तुम कृष्णका क्यों व्यर्थ स्तुति करते हो ? रामचन्द्रजी सात द्वीपोंके स्वामी एवं राजाओंके भी वन्दित हैं ॥ ९६ ॥ राम ईश श्रेष्ठ और जगत्पति थे, उनमे राजा विश्वनाथ है । तब मेरे रामके बराबर कृष्णको मत मानो, उनके पास धनुष है और अभय दायक है। वे भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेका सदा तत्पर रहते हैं ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ जिनका नाम निरासन है, दो चमर एवं छत्र हैं, जिसके पुष्पक विमानकी सवारी है और पिताके सदृश गुणवान् दो बेटे हैं। जिनका दत्त दिया हुआ रामनाथपुर आज भी विद्यमान है। मुष्टी ऋषीको कि तुम्हारे कृष्णका क्या अंश दान दिया है जो आजतक विद्यमान है। साक्षात् शिवजी भी सदा मेरे रामका भजन करते हैं ॥ ९९-१०१ ॥ कल्याण करणाभ्युक्त प्राणियोंका शिवजी घूम-घूमकर रामतारक रूप सुनाया करते हैं। इसीलिए संसारके लोग मरत समय कहते हैं- रामका ध्यान करो भैया, रामका भजन करो" ॥१०२॥१०३॥ मृत जीवोंकी मुक्ति टिके निमित्त ही जटाको उठानेवाले शिव जी रामनामका उच्चारण करत फिरत हैं ॥ १०४ ॥ जिसके नामकी ऐसी महिमा है, मैं उस रामकी स्तुति करता हूँ

४०६आनन्दरामायणम्[ सर्ग ३

शतकोटिप्रमितं श्रेष्ठं यस्मिन् रामायणं कृतम् । कृष्णादीनां चरित्रं हि संति ह्यन्तर्गतानि हि ॥ १०६ ॥

श्रीश्रीमद उवाच

"तथ तयोर्विवदतोस्तत्रोभयोः परस्परम् । बभूवाकाशजा वाणी तां तौ सर्वे च शुश्रुवुः ॥ १०७ ॥ रामस्यात्र स्तुतिः केषाञ्चित् कृते घटेन न इति तां खेचरीं वाणीं श्रुत्वा सर्वे सभासदः ॥ १०८ ॥ चक्रुर्जयाश्वानान्दंर्तन्नांदयंतिति स्म नास्तिकाः । तं रामोपासकाः सर्वे ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ १०९ ॥ निर्जरा अपि ते सर्वे विमानस्था मुदान्विताः । तं रामोपासकं प्रीत्या ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ ११० ॥ तदा कृष्णोपासकः स लज्जया नतमस्तकः तं रामोपासकं नत्वा प्रार्थयामास वै मुहुः ॥ १११ ॥ तदा रामोपासकोऽपि तं नत्वाऽऽश्लिष्य च हृद्यम् । उवाच मधुरं वाक्यं शृणु कृष्ण द्विजोत्तम ॥ ११२ ॥ न नन्दनन्दनोः पृथग्विधो रामो न रामतोऽन्यो वसुदेवसूनुः । तथाऽप्ययोध्यापुरपालकाले मल्लक्ष्मणे धावति मे मतीषा ॥ ११३ ॥ अतः स्तुतो मया रामः कृष्णस्य निदनं कृतम् । तवेर्ष्यया द्विजश्रेष्ठ वेद्मि तौ द्वौ ममाविनि ॥ ११४ ॥ राम एवात्र कृष्णश्च कृष्ण एवात्र राघवः । उभयोरन्तरं विप्र कौतुकाच्च मयेरितम् ॥ ११५ ॥ मानयत्यन्तरं यो वा तयोः श्रीरामकृष्णयोः । परम्परा स निरये पतिष्यति न संशयः । मल्लक्ष्मणेक्षणार्थाय खेचर्या गद्यशः स्तुतः ॥ ११६ ॥ इत्युक्त्वा तोषयित्वा तं रामः कृष्णाह्वयं द्विजम्। तूष्णीं तस्यौ सभामध्ये सभासद्भिः सुपूजितः ॥ ११७ ॥ ततस्तौ माघमासान्ते स्वं स्वं देशं प्रजग्मतुः । तस्माच्छिष्यावतारेषु न रामसदृशः परः ॥ ११८ ॥ अतस्त्वं भज भावेन तस्यैव चरितं शृणु । यदन्मद्रणयाम्यग्रे महामङ्गलकारकम् ॥ ११९ ॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे श्रीरामकृष्णोपासकयोर्विवादो नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


बहुत दिन पहले वाल्मीकिने रामायण बनाया था । १०५ ।। जिसकी श्लोकसंख्या सौ करोड़ है और तुम्हारा समस्त कृष्णचरित्र उसमें समा जाता है ॥ १०६ ॥ श्रीरामदासजी बोले- जिस समय वे दोनों इस प्रकार परस्पर विवाद कर रहे थे, तभी आकाशवाणी हुई—'रामके समान मूर्ति कल्पना सामर्थ्य विश्वमें नहीं है' । उसे उन दोनों तथा अन्य लोगोंने सुना । इस प्रकारकी आकाशवाणी सुनकर बन्धी हुए समस्त सभासद रामकी जय-जयकार करते हुए तालियां बजाने लगे और उस रामोपासक पर पुष्पवृष्टि की ।। १०७-१०९ ॥ इतना ही नहीं, देवतागण भी विमानोंपर आ-आकर हर्षमें रामोपासकपर पुष्प बरसाने लगे । तब लज्जासे नतमस्तक होकर कृष्णोपासकने रामोपासकको प्रणाम करके बार-बार विनती की ॥ ११० ॥ १११ ॥ रामोपासकने भी उसे प्रणाम करके छातीसे लगा लिया और कहा— ।। ११२, हे द्विजोत्तम ! न कृष्णसे पृथक राम हैं, न राम-से पृथक् कृष्ण हैं । फिर भी अयोध्या नगर के बालक मल्लक्ष्मणसहित वात्सल्यद्वारा रामकी ही भलाईकी मेरी इच्छा होती है ।। ११३ ।। इसी कारण अपनी रीतिसे रामकी स्तुति की और कृष्णकी निन्दा । यह सब केवल तुम्हारी ईर्ष्यासे कहा-सुनी हुई । नहीं तो वास्तवमें मैं दोनोंको समान समझता हूँ ।। ११४ ।। राम ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राम हैं। इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। अभी मैंने जो कुछ कहा, वह सब कौतुकमात्र था ॥ ११५ ॥ जो मनुष्य राम और कृष्णमें अन्तर मानता है उसे नरकगामी होना पड़ेगा इसमें कोई संशय नहीं है। केवल तुम्हारा गर्व दूर करनेके लिए अभी आकाशवाणीने भी रामकी स्तुति की थी ॥ ११६ ॥ ऐसा कह तथा कृष्णनामक द्विजको सान्त्वना देकर सभासदोंसे पूजित होता हुआ राम विप्र सभा में चुपचाप बैठ गया ।। ११७ ।। माघमास व्यतीत हो जानेपर वे दोनों अपने-अपने देशको लौट गये । इसलिये मैं कहता हूँ-हे शिष्य ! समस्त अवतारोंमे रामावतारके सदृश कोई भी अवतार नहीं है ॥ ११८ । अतएव तुम उन रामका भजन करो और उनकी वह कथा सुनो जो आगे चलकर मैं सुनाऊँगा ।। ११९ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेज पाण्डेयविरचित ज्योतिष्मतीभाषाटीकासमन्वित राज्यकाण्ड पूर्वार्द्धे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४०९

सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४०९

चतुर्थः सर्गः

( रामका कौवियोंको वरदान एवं मृतकासुरोपाख्यान )

श्रीरामदास उवाच

एकदा राघवः शिष्यै समाजस्थो जनैर्वृतः । ददर्श द्राक्षावल्लीनां मंडपे काकमुत्तमम् ॥ १ ॥
उभयोर्नेत्रयोरेकनेत्रवृत्तिममन्वितम् । अतिदीर्घं कृशं व्यग्रदृष्टिं दीर्घस्वरं चलन् ॥ २ ॥
मुहुर्मुहुः पश्यन्तमात्मानं शब्दपूर्वकम् । तं दृष्ट्वा बन्धुपार्थिवः स्मृत्वा कोपं पुरा कृतम् ॥ ३ ॥
उवाच काकं श्रीरामः सुखमागच्छ मेऽन्तिकम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा द्राक्षावल्ल्यथ मंडपात् ॥ ४ ॥
शीघ्रमुड्डीय काकस्तु रामाग्रे सदसि स्थितः । रामं पश्यन्द्वीक्ष्यतं स चकार मुहुर्मुहुः ॥ ५ ॥
तदा तं राघवः प्राह दग्ध्वाऽपिक्षीयमानसः । नेत्रं विना चगस्त्यान्मु काक पाथश्च मां प्रति ॥ ६ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा काकः प्राहान्नृपतिम् कृपालोकन राम नद्यास्तु मव सर्वदा । ७
किं वरैरन्यैर्व्यर्थैरित्थ मुहुर्मुहुः । तच्छुत्वावचनं श्रुत्वा गमस्तं वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥
दीपांतरेषु यद्वृत्तं भविष्यं चोत्तरं च यत् । संजातं च भवेत्तन्तेऽक्षिपथेऽस्तु तत् ॥ ९ ॥
भाविकार्याणि सर्वाणि काक त्वं बोधयन्तः । जनाः पश्यंतु ते शष्पा शकुनाथं विनिर्णयम् ॥ १० ॥
स्थिरत्वे स्थिरकार्याणि गते गन्तव्यसिद्धिदम् । भविष्यन्ति हि कार्याणि नृणां शकुन निर्णयैः ॥ ११ ॥
पश्यंतु सकला भूमौ जनाः कार्यविदो । ग्रामे गृहप्रवेशे ते वामभागे न चेद्बहिः ॥ १२ ॥
गमनं दक्षिणं भागं पांथे गमनं तदा । लोकानामस्तु शकुनं महामंगलकारकम् ॥ १३ ॥
अतद्दशाहपिंडाय यदि स्पर्शो भवन्न ते माऽस्तु तद्दिनिर्लेपां प्रेतानां मम वाक्यतः ॥ १४ ॥
अन्तकाले मानरस्य वाञ्छितं नैव पूरितम् । प्रेतदशाहपिंडस्याप्यसंज्ञान्नरतु सन्नराः ॥ १५ ॥
प्रेतस्य वंशजः कश्चिद्यतोऽताथ वाञ्छाए । तन्ने स्पर्शाद्विनिर्दिश्य तु स पदा दूरपिष्यति ॥ १६ ॥


श्रीरामदास कहन...-हे शिष्य ! एक दिन बहुत मनुष्योंस घिरे हुए रामचन्द्रजी सभामे बैठे थे। तभी अंगूरका लताके मंडपपर कौवा देखा कि वह एक ही नेत्रसे दोनों नेत्रोंका काम ले रहा है। कौआ अपनी आकृतिसे अतिदीर्घ, शब्दपूर्वक मुहुर्मुहु देखता और चञ्चल दीखता है ॥ १ ॥ २ ॥ रामचन्द्रजीने देखा कि मुह बार बार मुड़ा और भाग रहा है और कौंव-कौंव करके बोलता भी जाता है। उसकी यह दशा देखकर रामके हृदयमें दया आयी और अपने पूर्व किये हुए कोपका स्मरण करके कौएसे बोले-हे काक ! तू हमारे पास आ जा। यह सुनकर कौवा उस लताके मंडपसे उड़ा और रामके आगे आकर बैठ गया। सभा में वह रामको देखता हुआ बार बार शब्द करने लगा ॥ ३-५ ॥ रामने कौएसे कहा-तू अपने नेत्रोंके सिवाय जो कुछ भी वर मांगना चाहे, मांग ले ॥ ६ ॥ इस प्रकारकी बातें सुनकर पूर्वोक्त रामसे कौआ कहने लगा-हे राम ! मेरे ऊपर इस तरह सदा आपकी कृपादृष्टि बनी रहे ॥ ७॥ केवल इस लोकमें सुख देनेवाले अन्य वरदानोंको लेकर मै क्या करूंगा ॥ ८ ॥ कौएका बात सुनकर रामचन्द्रजीने कहा-किसी द्वीपान्तरमें भी होनेवाला भूत, भविष्य और वर्तमानकी सब बातें तुम्हारे आँखोंके सामने रहेंगी ॥ ९ ॥ होनेवाले अच्छे। भविष्यके सब कार्योंका तुम मर वरदानसे जान लोगे। मनुष्य कहीं जाते समय सदा तुम्हारा शकुन देखा करेंगे ॥ १० ॥ जब तुम बैठ रहोगे, तब देखनेवाले पथिकका काम रुक जायगा और जब चलोगे,दोगे तो उसका कार्य सद्यः पूर्ण हो जायगा। इस प्रकार लोग तुम्हारा शकुन देखेंगे ॥ ११ ॥ ग्रामप्रवेश या गृहप्रवेशके समय तुम जिसकी दाहिनी ओरसे निकल जाओगे, वह परम मङ्गलकारक शकुन होगा ॥ १२ ॥ १३ ॥ प्रेतके दशाहपिण्डको जब तक तुम नहीं छू लोगे, तब तक उस प्रेतकी सद्गति कदापि नहीं होगी ॥ १४॥ यदि प्रेतके दशाहपिण्डको नहीं छुओगे तो उसके घरवाले लोग समझेंगे कि अभी प्रेतकी इच्छा पूरी नहीं हुई है। प्रेतका कोई वंशज, तुम जिन-जिन चीजोंको नहीं छुवोगे,

४०८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

तदा पिंडं स्पृशेन्मे न त्वेवैरन्त्या स्पृशेत् स्त्रिया । अन्यच्चैकं वरं दद्मि लिपिमात्रे तु पुस्तके ॥१७॥
यत् किञ्चिल्लेखकैश्च विस्मृतं तत्र मद्भयात् । कुर्वन्तु पदचिह्नं ते सर्वत्र जगतस्तले ॥१८॥
स्वपदं पुस्तकं दृष्ट्वा वरात् ज्ञास्यतु विस्मृतम् । लिखितं पार्श्वभागेषु लेखकैः पुस्तकस्य यत् । १९॥
इति दत्त्वा वरान् रामस्तूष्णीमासीन्निराकुलान् । काकोऽपि तुष्टः श्रीरामं नत्वा द्रोणं प्रनन्वदा ॥२०॥
एवं नानाचरित्राणि चकार रघुनन्दनः । एकदा शयने रात्रौ पारिजातसरोरुहः ॥२१॥
निद्रितो ह्यभवत्के जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयः विना एतस्मिन्नन्तरे तस्यां रात्रौ ते गन्धर्वकाः ॥२२॥
दृष्ट्वाश्चापि दास्यश्च दास्यानः सकलास्तदा । ययुश्च संनहनं श्रोतुं कापि रामस्य भक्तितः ॥२३॥
एता न ममयं वेगात्कामाज्जगप्रपीडितः । पीवरा स्तनभारनता सर्वामलङ्कारभूषिताः ॥२४॥
तारुण्यमदमत्प्रौढाः दम्भकुम्भपयोधराः चन्द्राननाः शुकघ्राणाः कम्बुकण्ठ्यो मृगीदृशः ॥२५॥
पीतकौशेयवसना रुणन्नूपुरनिःस्वनाः ।
परस्परं ताः संमन्त्र्य प्रथमे वयसि स्थिताः । ययुः सरोः पृथक्ते श्रीराघव रहसि स्थितम् ॥२६॥
काचिन वीजयामास श्रीरामं व्यजनेन हि । कंचिद्धार रामार्थे स्वकरे पुष्पचारिकाम् । २७॥
काचिन्ताम्वूलपात्रं च काचिद्गन्धं हस्ते या । पात्रं निहितवन्त्यन्या या दधार विलासिनी ॥२८॥
दधार चन्दनं काचित्काञ्चिद्विज्ञानपूजनम् । काचित्फलानि नैवेद्यं काचिद्राक्षाफलादिकम् ॥२९॥
एतस्मिन्नन्तरं कश्चित् तत्रागत्य शनैः । रामस्य कर्तुमुद्युक्ता तत्पदं पाणिनाऽस्पृशत् । ३०॥
नेत्ररामः प्रबुद्धोऽभूत्दृष्ट्वाऽदृश्यतः विदेहजान् । केन मे स्वपितः पदस्पर्शश्चेत्यमुद्यविशत् ॥३१॥
नावदर्श श्रीरामः स्वकक्षं शु० स्थिताः । पीवरा प्रमदाः सर्वा मन्द्वालङ्कारमण्डिताः । ३२॥
राम मभ्युत्थितं दृष्ट्वा प्रणेपुस्तास्तदा भुवि । स्वशिरांसि निधायाथ तुष्टुवुर्विविधोक्तिभिः । ३३॥


उसकी अधूरी समझकर जब तक न करे, तब तक उस अन्त्य स्त्रीद्वारा उसकी सद्गति प्राप्त होगी। तुमको उसके दशाङ्गुपिण्डको तभी छूना, जब उसका मृतक कर्म पूर्ण हो जाय। तुमको इमण वरदान यह भी देता हूँ कि जो संसार लिग्वत समय पद भूल जाय, वे संसार तुम्हारे पैरका चिह्न बना दिया करेंगे ॥ १७-१८॥ पुस्तकोंके पार्श्वभागमें पुस्तक देखकर ऐसा विचार आप समझ जायें कि यहाँपर श्लोक छूट गया है ॥ १९ ॥ इस प्रकार दृढ सोचकर वरदान देकर सत्वकर्मयुक्तों द्वारा पूजे गये श्रीरामजी भरत भ्राताको प्रणाम करके वहाँसे उठ गया ॥ २० ॥ इस प्रकार रघुनन्दन विविध प्रकारका नाटक किया करते थे । एक दिन रात्रिके समय पारिजात सुधार नाम शयनस्थान के बीच शय्यापर अकेले शयनकर सो रहे थे। उसी रात्रिमे जिनने भी दास्यवर्ग या, वे सब भक्तिपूर्वक श्री रामके तंबगान के लिए चले गये थे । २१-२३ । उसी समय मौका पाकर वे नारियां विविध प्रकारके शृंगारभूषण धारण किये कामके बाणसे पीडित होकर रामचन्द्रजीके पास जा पहुँचीं। २४। वे सब तरुणाईके मदसे भरी थीं, मदोन्मत्तके समान उनके स्तन थे, चन्द्रमाकी भाँति उनका मुख था, तोतेकी तरह समान उनकी नासिका थी, कम्बुकी तरह उनके पाँव थे और मृगियोंके समान उनके नेत्र थे॥ २५ ॥ वे सब पीले वस्त्र धारण किये थीं। छनक-छनक रुनझुन करके बोल रहे थे। उनकी उमर भी बहुत थोड़ी थी। वे सब परस्पर सम्भाष एकान्तमें सोये हुए रामचन्द्रजीके पास जा पहुँचीं । २६ ॥ कोई पंखा लेकर कोई पंखा करने लगी और कोई अपने हाथमें फूलोंकी माला लेकर उनके उठनेकी प्रतीक्षा करने लगी। किसीने पानदान लिया और किसीने जलका भरा झारी थी, किसीने पाण्डान उठाया, किसी दूसरी विलासिनाने चन्दन लिया, किसाने दिया एकपात्र और कोई नाना प्रकारके फल लेकर रामचन्द्रजीके जागनेकी प्रतीक्षा करने लगी ॥ २७ २९ ॥ इसी बीचमें एक स्त्रीने रामचन्द्रजीका पैर दबानेकी इच्छासे धीरे-धीरे उनका पैर उठाया ॥ ३० ॥ इससे वे चौंक पड़े और सोचने लगे कि सीता तो इस समय अनुध्याय है, तब यह कौन पैर उठा रहा है। यह विचार करते-करते चकित भावसे वे उठ बैठे ॥ ३१ ॥ सब अपने सामने उपस्थित उन सौ नारियोंपर इनकी दृष्टि पड़ी। तब रामने

सर्गः ४ ] गन्धर्वकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४०९


ताः सर्वा राघवः प्राह किमर्थमिह कृत्स्नके । सर्वाभरणसन्नाद्धा मत्समीपं मां कथ्यतां स्त्रियः ॥ ३४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा विलज्जन्यः पुरस्त्रियः । अवाङ्मुखाः सस्मिताश्च तूष्णीमेव समन्ततः ॥ ३५॥
तासु दाक्षिण्यदा रामं लज्जायाऽवाङ्मुदोऽवदत् । वयं प्रजासि प्रभभो यदर्थमागता वयम् ॥ ३६॥
उपेक्षणीया नो राम वयं सर्वाः स्त्रियस्त्वया । इति तद्भावविज्ञाता ज्ञात्वा स रघुनन्दनः ॥ ३७॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं शृणुध्वं प्रमदोत्तमाः । एकपत्नीव्रतं चेदस्ति मातृवन्त्याः स्त्रियो मम ॥ ३८॥
इतराः सकलाः सीताविरहिताश्चेह जन्मनि । गच्छध्वं निजगेहानि मां माऽभ्यर्थयन्तु मयि नृपे ॥ ३९॥
राज्यं क्षमसि नो नार्यः क्षमितं वोऽपराधितम् । इति ता रामवाक्येभ्यः कामबाणप्रपीडिताः ॥ ४०॥
ताडिताश्च त्रिदोषेव निपेतुर्मूच्छिता भुवि । पतितास्ता निरीक्ष्याथ स्री रामोऽतिविह्वलः ॥ ४१॥
ता उवाच पुनः शीघ्रं मधुरारुष्यैः कृपान्वितः । शृणुध्वं मे वचो नार्यः शृङ्गारस्त्वां मया सह । ४२।
युष्माकं न भवेत्तद्विद्रतभङ्गोऽपि मे भवेत् । अतः शृणुत मे वाक्यं यागे पूर्वं मयाऽर्पिताः । ४३।
गुरवे रुक्मजाश्चैव सीतायाः शतपूर्तयः । तासां फलेन युष्माभिर्विहारे ऽहं जनं द्विम् ॥ ४४॥
करिष्यामि न संदेहः कृष्णरूपेण वै सुतम् । वाणनृपाणां युष्माभिर्जनितव्यं राजिवंशजा ॥४५॥
भौमासुरश्च युष्माकं संहरिष्यति वै यदा । तदा ममो मोच्यामि हत्वा तं अवनीसुतम् ॥४६॥
करिष्यामि विवाहांच रुक्मवर्णाङ्ककाञ्चिभिः । सापाडशसहस्राण्यार्द्धमेतोभ्याः शतं महत् ॥४७॥
इति रामवचः श्रुत्वा दृष्टास्ता वृत्तयोषितः । नम्र्वा रामं ययुः सर्वास्तूर्णी स्वं स्वं गृहं प्रति ॥४८॥
तः श्रोस्ता विसर्ज्ज्यायीरामो दानीः समाहयतान् । दृष्ट्वा कामपि नो दत्त्वांगमो दामास्तदाह्वयत् ॥४९॥
तेषामेकं न दृष्ट्वास दूतपालात्समाह्वयत् । तानप्यदृष्ट्वा रामस्तु रक्षकांश्च समाह्वयत् ॥५०॥


देखा कि वे सब पुरवासिनी स्त्रियाँ सुवर्णके अलङ्कार पहिने हैं। भगवान् रामको उठा हुआ देखकर उन्होंने प्रणाम किया और अपना मस्तक पृथ्वीपर रखकर विविध प्रकारसे भगवान्की स्तुति करने लगीं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ उनसे रामने पूछा कि तुम सब यहाँ इतना रुचिर किस लिए आयी हो ? मुझ सब-सब बतला दो ॥ ३४ ॥ रामको बात सुनकर वे पुरवासिनी स्त्रियाँ लज्जित हुई हुई माथा नाव करके चुपचाप खड़ी रह गयीं ॥ ३५ ॥ किन्तु उनमेंसे एक लज्जित होकर कहा—हे प्रभो ! आप सब जानते हुए भी हमसे आनेका कारण पूछ रहे हैं ? हम जिस लिए आयी हैं, आप वह सब जानन ही हैं ॥ ३६ ॥ हे राम ! अब आप हमारी उपेक्षा न कीजिये । इस प्रकारकी बातींस राम उनका अभिप्राय समझ गये और मीठी वाणीमें समझाते हुए कहने लगे- हे मन्दिरोंगी ! मैं एकपत्नीव्रतधारी हूँ। मेरे लिए इस जन्ममें सीताके सिवाय संसारकी सब नारियाँ माताके समान हैं ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ तुम सब अपने-अपने घरोंको चली जाओ । मैं राजा हूँ। भरे ऊपर तुम सब याचना मतदो ॥ ३९ ॥ जब तक में प्रजाका शासक हूँ तबतक ऐसा अनर्थ नहीं हो सकता । जाओ, मैंने तुम्हारा अपराध क्षम किया। यह सुना तो कामवाणसे पीडित वे स्त्रियाँ राघवं वाक्यरूपी बाणमें विड और मूच्छित होकर पृथ्वोपर गिर पड़ीं। उनका इस प्रकार गिरी देखकर रामचन्द्रजी बहुत विह्वल हो गये ॥ ४० ॥ ४१ ॥ वे कृपापूर्वक उनसे कहने लगे—हे राष्ट्रियो ! मैं तुम्हारा मनोभाव जानता हूँ, किन्तु केवल एक बारकी पतित तुम लोगोंकी इच्छा रही भगेगी और मेरा व्रत का भंग हो जावेगा। इसलिए मेरी बात सुनो--अभ यत् नहुत किया पग्ले यज्ञमें मैंने सीताको सौ सुवर्णकी मूर्तियाँ दान दी हैं। उन्हींके फलसे द्वापरमें में कृष्ण होकर बहुत विलासक तुम सब के साथ क्रीडा करूँगा ॥ ४२-४३ ॥ तुम सब उस समय अनेक राजाओंकी पुत्नी होकर जन्म लोगी । जब भौमासुर तुम सबको चुरा ले जायगा तब मैं वहाँ पहुंचकर उस मारूँगा और तुम्हें उससे छुड़ाऊँगा। तुम सबका विवाह द्वारका-पुरीमें होगा । उस समय तुम्हारी संख्या सोलह हजारसे भी ऊपर रहेगी और में भी दो रहूँगा ॥ ४४-४७ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने भगवान्‌को प्रणाम किया और चुपचाप अपने-अपने घरोंको लौट गयी उस स्त्रियोंको विदा करके रामचन्द्रजीने दासियोंको बुलाया, किन्तु

४१० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

वैष्णव्येकं न दृष्ट्वा स गत्वाऽसीन्निशिस्मितः । विमानाट्टालमारुह्य सौमित्रिं वै समाह्वयत् ॥५१॥ ऊर्मिला रामवाक्यं तच्छ्रुत्वा तु चालयत्पतिम् । ऊर्मिलाचालनाच्चाऽथ प्रबुद्धोऽभूत्स लक्ष्मणः ॥५२॥ रामशब्दं सोऽपि श्रुत्वा रतिशालाद्बहिर्ययौ । दत्त्वा प्रत्युत्तरं रामं ययौ वेगेन लक्ष्मणः ॥५३॥ एतस्मिन्नन्तरे रामो रोदनं नगराद्बहिः । शुश्राव स्त्राकृतं घोरं किमिदं चेति विस्मितः ॥५४॥ ततो दृष्ट्वा स सौमित्रं सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् । लक्ष्मणा रामवाक्यं तच्छ्रुत्वा दत्तास्तिजस्तदा ॥५५॥ प्रेष्य दूतान्कीर्तनस्थानादाहूयामास वेगतः । रामदूतास्तदाऽऽयान् कथं श्रीरामकीर्तनम् ॥५६ । असमाप्य विहायाद्य गच्छेम स्वामिनं प्रति नैवेद्य केचिदूचुस्ते पालनीया तु सेवकैः ॥५७॥ प्रभोराज्ञाऽद्य चास्माभिर्नो चेन्नः पातकं स्पृशेत् । केचिदूचुर्निदं तस्य कीर्तनं मङ्गलप्रदम् ॥५८॥ स्वाप्याज्ञाभङ्गादोषघ्नं कथं त्यक्त्वा प्रगच्छताम् । केचिदूचुः कीर्तनस्मान् श्रुत्वाऽस्मान् सुखी भवेत् ५९ इति संदिग्धचित्तास्ते न तदा राघव ययुः । ततो लक्ष्मणदूतास्ते रामं वृत्तं न्यवेदयन् ॥६०॥ ततः किंचित्क्रोधयुक्तः सौमित्रिं प्राह राघवः । मत्कीर्तनसमाग्रान्नाहं दण्डयितुं क्षमः ॥६१॥ तथाप्येतन्न योग्यं हि किंचिच्छिक्षां करोम्यहम् । इत्युक्त्वा तां तु रुदतीं पुनः श्रुत्वा बहिः प्रभुः ॥६२॥ विमानं प्राह गच्छाद्य बहिः पुर्याः स्त्रियं प्रति । तथेति गत्वाऽग्येन ययौ तन्नगराद्बहिः ॥६३॥ यत्र साऽतिविलापं स्त्री करोति सरयूतटे । तामञ्जनाभां रागे रुदतीं राघवोऽब्रवीत् ॥६४॥

राम उवाच

किं ते दुःखं वरस्त्राय का त्वं रोदिषि वै कथम् इति रामावचः श्रुत्वा सा रामं राक्षसमब्रवीत् ॥६५॥ चिरकालं करोम्यत्र रोदनं रघुनन्दन अद्य श्रुतं त्वया राम किंचिच्छ्रुयन्नयाम्बुनेः ॥६६॥

यहाँ कोई दासी नहीं दिखायी दी। सब सेवकोंको बुलाया। उनमेंसे भी कोई नहीं बोला। तब पहरेदारोंको पुकारा, किंतु उनमेंसे भी कोई नहीं बोला। जिससे रामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ और विमानके ऊपरवाली अँटारीसे लक्ष्मणको पुकारा। रामचन्द्रकी आवाज उर्मिलाको सुनायी दी और उसने तुरन्त लक्ष्मणको जगाया। जागनेपर लक्ष्मणने भी रामकी आवाज सुनी और तत्काल उनकी बातका प्रत्युत्तर देकर तुरन्त रतिशालाके बाहर आकर वेगसे रामचन्द्रजीकी ओर चले ॥ ५१-५३ ॥ इधर रामचन्द्रजीने नगरके बाहर किसी स्त्रीका रोदन सुना : "है, यह क्या है !" यह कहकर वे बड़े विस्मित हुए ॥ ५४॥ तब तक लक्ष्मण भी आ पहुँचे और रामने उन्हें सब वृत्तान्त सुनाया। लक्ष्मणने तुरन्त अपने दूतोंको उस स्थानपर जानेकी आज्ञा दी, जहाँपर कीर्तन हो रहा था। लक्ष्मणके दूतोंने वहाँ पहुंचकर रामके दूतांत कहा—चलो, रामचन्द्रजी कबसे तुम सबको बुला रहे हैं। उन सबने जवाब दिया कि बिना रामकीर्तन समाप्त हुए मधूरा छोड़कर हम सब कैसे आयें। उनमेंसे किसीने कहा कि सेवकोंका धर्म है, स्वामीकी आज्ञाका पालन करना। ५५-५७ ॥ यदि उनकी आज्ञा न मानगे तो हमको पातक लगेगा। उनमेंसे कोई बोल उठा कि यह रामकीर्तन तो विविध प्रकारके पातकोंको नष्ट करनेवाला है। अब इसको छोड़कर कहाँ जायेंगे ॥ ५८ ॥ कुछ लोगोंने कहा कि जब वे हमको कीर्तनमें आया सुनेंगे तो प्रसन्न होयेंगे ॥ ५९ ॥ इस प्रकार असमञ्जसमें पडकर वे लोग रामके पास नहीं आये। इधर लक्ष्मणके दूतोंने रामके पास आकर उनका हाल सुनाया। ६०॥ तब किंचित् क्रोधयुक्त रामने लक्ष्मणसे कहा कि यद्यपि मैं कीर्तन सुननेमें मग्न सेवकोंको दण्ड नहीं दे सकता ॥ ६१ ॥ किन्तु यह भी उचित नहीं है कि मै उन सबको कुछ शिक्षा भी न दूँ। इतना कहकर रामने फिर वह नगरके बाहरवाला रोदन सुना ॥६२॥ तब उन्होने विमानको आज्ञा दी कि नगरके बाहर कोई स्त्री रो रही है, तुम उसके पास चलो। 'बहुत अच्छा' कहकर विमान चल पडा और सरयूके तटपर जा पहुँचा, जहाँपर वह स्त्री विलाप कर रही थी। अञ्जनके समान उस काली-कलूट्टी स्त्रीको देखकर रामने पूछा—॥ ६३ । ६४ ॥ तुम्हे क्या कष्ट है ? तुम कौन हो और क्यों इस प्रकार रो रही हो ? रामकी बात सुनकर उस नारीने कहा—॥ ६५ ॥

सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४११

सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४११

निर्मिता विधिना पूर्वं निद्रानाम्नी त्वहं प्रभो । दत्तं तेन मम स्थानं कुम्भकर्णे चिरं सुखम् ॥६७॥
यावत्कालं स्थिता राम स त्वया निहतो रणे । ततो मद्भवनान्नाशं गता शीघ्रं विधिं प्रति ॥६८॥
तेन त्वां प्रेषिता राम ततः प्राप्ता त्विमां पुरीम् । सोमाचारमयादस्यां नगर्यां न गतिर्मम ॥६९॥
अत्रैव संस्थिता राम शोचंती सरयूतटे । मे स्थानं वद रामाद्य यत्र स्वाप्यामहं सुखम् ॥७०॥
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् । स्मृत्वा दूतकृतं पूर्वं तदा क्रोधेन बोदितः ॥७१॥
निद्रे शृणु वचो मेऽद्य ते स्थानं कीर्तयाम्यहम् । पापात्मानो नरा भूम्यां ये शृण्वंति हि कीर्तनम् ॥७२॥
पुराणश्रवणं वेदपठनं पूजनं जपम् । तपो ध्यानं च होमादि यद्यत् कुर्वन्ति पापिनः ॥७३॥
तेषु त्वं तिष्ठ मद्धाक्याद्धीनदेवनरेष्वपि । जडे बालेऽथ गुर्विण्यामुपवासाप्रभोजने ॥७४॥
तथा विद्यार्थिनि भ्रांते नर्ते जागरूकामुके । एतेषु ते स्थलं दत्तमेतान्मोहय मद्धरात् ॥७५॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सा तुष्टा प्रणनाम तम् । ययौ रामः स्वनगरीं सुखं निद्रां चकार वै ॥७६॥
तदारभ्य पुरोक्तेषु दाने निद्राऽकरोन्मुखम् । पापात्मनामतो निद्रा बाधते पुण्यकर्मसु ॥७७॥
तदारभ्य सेवकेषु नरेष्वप्यवनीतले । निद्राप्रस्तेषु पुण्यात्मा सङ्ख्येऽपि कश्चन ॥७८॥
शुश्राव संकीर्तनादि चकार पूजनादिकम् ।

श्रीरामदास उवाच
अथान्यां सम्प्रवक्ष्यामि कथां सीतापयस्कराम् ॥७९॥
कुम्भकर्णस्य पुत्रस्य निकुम्भस्य च गर्भिणी । प्रसूत्यर्थं पितुर्गेहं गता द्वीपांतरं प्रिया । ८०॥
रावणादिक्षये जाते तस्यां जातस्तु पोलुकः । मायापुर्यां सनक्रिश्च प्रतयदन्तरः पुनः ॥८१॥


हे प्रभो यह बहुत समयकी बात है कि जब ब्रह्माने मुझे बनाया था । मेरा नाम निद्रा है और ब्रह्माने मुझपर दया करके कुम्भकर्णके देहम रहनेका स्थान दिया । तब मैं बड़े आनन्दसे उसमें रहन लगी ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ लेकिन आपने उसे भी मार डाला । मेर रहनेका एक अखाड़ा था, उसे भी आपने उजाड़ दिया । ऐसा व्यवस्थान रहतो-करावली हुई में ब्रह्माक पास गया और उन्ह अपनी गाथा सुनायी । उन्होंने मुझ आपके पास भेजा ओर मै इस जगह आ पहुंची। सगरक्षाकोंके भयस इस नगराम घुसनका माहस नहीं हुआ । इसलिए इसा सरयूके किनारे बैठी बैठी विलाप किया करती हू । हे राम ! अव आप कृपा करके मेर रहनक लिए कोई स्थान बतला दीजिए, जहाँ मै रह सकूं ॥ ६८-७० ॥ इस प्रकार उसकी बात सुनकर रामचन्द्रको पहले दूतकी बातें सोचकर कुछ गुस्सा आ गया और विद्वास बाल-॥ ७१ । हे निद्रे ! सुना, मै तुम्हें तुम्हारे रहनेके लिए स्थान बतलाता हूँ । जो पापी मनुष्य मेरा कीर्तन सुनने जायँ और वे पुराणश्रवण, वेदपाठ, पूजन, जप, ध्यान आदि जो कुछ भी करने लगें, उनमें तुम अपना रङ्ग जमाओ जो लोग हीन प्रकृतिक हों, न चाहे देता हों या मनुष्य, जड़, बालक, गर्भिणी स्त्री, अत्रोसर भोजन करनेवाल, विद्यार्थी और थके हुए मनुष्योंमें तुम रहो । जो लोग उसकी भगत हों, उन लोगोंमे मे तुम्हें रहनक लिए स्थान देता हूँ । मेर बरदानसे तुम इन्होंपर अपना मोहजाल फैलाओ ॥ ७२-७५ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर वह प्रसन्न हुई और उसने भगवान्-को प्रणाम किया । उधर रामचन्द्र भी अपनी नगरीमं लोट आये और रातभर खूब अच्छी तरह सोये ॥ ७६ ॥ तभीसे ऊपर कहे हुए लोगांम निद्रा निवास करने लगी । इसीलिए यदि पापी मनुष्य कोई पुण्यकर्म करने लगता है, तब उसे निद्रा सताती है ॥ ७७ ॥ तभीसे पृथ्वीमण्डलमें निद्राने सेवकोंपर अपना मोहजाल फैलाया । सहस्त्रों निद्रानु अनुरक्तोंमें कहीं एक मनुष्य ही मुश्किलसे ऐसा मिलेगा, जो श्रवण-कीर्तन आदि शुभ कर्म करनेवाला पुण्यात्मा हो ॥ ७८ ॥ श्रीरामदास कहने लगे—अब मै सीताके यशसे भरी एक दूसरी कथा सुना रहा हूँ ॥ ७९ ॥ कुम्भकर्णके बेटे निकुम्भकी गर्भिणी स्त्री बच्चा पैदा करनेके लिए किसी दूसरे द्विपमें रहनेवाले अपने पिताके घर गयी थी ॥ ८० ॥ जब रामके साथ युद्ध करके रावण वंश समेत नष्ट हो

४१२आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

घ्राणानदीतटे चक्रेऽद्रावणः सौरमादरे । महाकायश्चतुर्हस्तश्चोद्वेजयन्निवा विभीषणम् ॥८२॥
शताननेन वै सार्धं लङ्काराज्यं चकार स । ततो विभीषणो रामं गत्वा सर्वं न्यवेदयत् ॥८३॥
सीताविभीषणाभ्यां वै रामो लङ्कां ययौ द्रुतम् । निहत्य रावणं सैन्या युद्धे रामे जितेऽथ तम् ॥८४॥
विभीषणाय तां लङ्कां दत्त्वा तं पौण्ड्रकं दृढौ । अथैकदा सभामध्यं स्वधाम विभीषणः ॥८५॥
ययौ विषण्णः सचिवैश्चतुर्भिः संयुतः क्षितौ । नत्वा रामं साश्रुनेत्रश्चाऽब्रूवं कपितत्परः ॥८६॥
उवाच सकलं वृत्तं लङ्कायाः प्रम्लवद्गिरः । राम राजीवपत्राक्ष त्राहि मां शरणागतम् ॥८७॥
मूलर्क्षे कुम्भकर्णस्य जातः पुत्रः पुरा वने । दैवोत्पन्नो वृक्षवृक्षे बालस्तत्र शयिनः ॥८८॥
मक्षिकाभिः स्ववमनजलस्य बिंदुभिर्मुदुः । पालितो रहसः श्रुत्वा न्यक्तेनैश्वर्यकुलक्षयम् ॥८९॥
तपसा तोष्य ब्रह्माणं नडरेणानिर्गजितः । पातालस्थै राक्षसैश्च लंकायां समुपागतः । ९० ।
मया सेन तु षण्मासं कृतं युद्धं महत्तमम् । मां जित्वा म पुरीं धास्ताददात् सचिवैः श्शिशौ ॥९१॥
मधुत्रौ गुप्तमार्गेण भ्रामर्जन पलायिनः । शनैर्विश्रमर्गेण लङ्काया योजनोपरि । ९२ ।
रात्रौ बहिर्निर्गत्य विडान्तरं समागतः । मूलर्क्षे यः समुत्पन्नस्तन्मूले विवर्द्धितः ९३॥
मूलकासुरनाम्नाऽतः पगं ख्यातिं गतोऽधुना । सगरं तेन मामुक्तमादौ त्वां तु विभीषणम् । ९४।
हत्वा लङ्कापुरीं पश्चात् ततो गच्छामि राघवम् । यन्विना निहतो येन विहतं सकलं कुलम् । ९५॥
त राम सगरं हत्वाऽऽनृण्यं गन्ताऽहह पितुः । आगमिष्यति सोऽत्रापि त्वां योद्धं रघुनन्दन । ९६।
इदानीं यद्धितं यत्र तस्कुरुष्व मृत्तम । ततस्य सकलं वृत्तं श्रुत्वा रामोऽतिविस्मितः ॥९७॥
लक्ष्मणं प्राह बेगेन वारिपन्तु जगतातले । स्वस्वरूपावस्थितन्वमन्वर्गकारवाधुना ॥९८॥

भया ना इस गर्भ पौण्ड्रक नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, ८१॥ दण्डकारण्यके अन्दर मायापुरी नामकी नगरी-में एक सौ सिरवाला रावण रहता था उसके १०० सुतायें थीं। पौण्ड्रकने उस रावणकी सहायतासे विभीषण-को परास्त कर दिया और शतानन रावणके साथ लङ्काका राज्य स्वयं करने लगा। उस समय विभीषण रामके पास गये और उन्होंने अपना सब वृत्तान्त सुनाया ॥८२-८३॥ मिसकी इस दुःखभरी कहानीको सुनकर राम सीता और विभीषणके साथ लङ्काको चल दिये। वहाँ पहुंचकर उन्होंने उस सौ मूँहवाले रावण तथा पौण्ड्रकको मारा और फिर विभीषणको लङ्काके सिंहासनपर बिठाकर अयोध्या लौट आये। इसके बाद एक दिन राम अपनी सभामें बैठे थे। उस सभामें स्त्री, पुत्र तथा मन्त्रियक साथ विषण्ण भावसे बैठे हुए विभी-षणने कहा-हे राम, हे राजीवपत्राक्ष ! मैं आपकी शरणमें हूँ, मेरी रक्षा कीजिए । ८४-८७ ॥ बहुत दिनों-की बात है, जब मूल नक्षत्रम कुम्भकर्णक एक पुत्र हुआ था । कुम्भकर्णने दुष्टों द्वारा उस लड़केको जङ्गलमें छोड़वा दिया। वहीं मधुमक्खियोंने उसके मुंहमें मधुकी एक-एक बूंद टपकाकर उसकी रक्षा की। वह इस समय बड़ा हुआ है। जब उसने लोगोंके मुंहसे यह सुना कि रावण और पिता तथा कुटुम्बियोंका नाश किया है ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ तब उग्र तपस्या द्वारा उसने ब्रह्माको सन्तुष्ट करके वर प्राप्त कर लिया। वरके प्रभावसे गर्वित होकर पातालनिवासी राक्षसोंकी सहायतासे उसने लङ्कापर चढ़ाई कर दी। मैंने छह महीने तक उसके साथ घमासान युद्ध किया। अन्तमें उसने मुझे परास्त करके लङ्कापर अधिकार कर लिया। ऐसी अवस्थामें मैं आधी रातको अपने पुत्र, स्त्री एवं मन्त्रियोंके साथ एक गुप्तमार्गसे गमभ्य भागा ॥ ९०-९२ । एक योजन दूर भाग आनपर ठहर गया जब रात्रि व्यतीत हो गयी। तब आगे बढ़ और आपके पास आ पहुँचा। वह मूल नक्षत्रमें पैदा हुआ तथा वृक्षोंके नीचे उसका पालन-पोषण हुआ है। इसीलिए लोग इसे मूलकासुर कहते हैं। युद्ध करते-करते एक बार उसने मुझसे कहा था कि इस रणभूमिमें पहले तुझको मारकर लङ्कापर अधिकार कर लेने-के बाद मैं उस रामके पास आऊँगा, जिसने मेरे पिता तथा मेरे कुलका संहार किया है ॥९३-९५॥ रणाभूमिमें तुझको मारकर मैं अपने पितृऋणसे उऋण हो जाऊँगा। हे रघुनन्दन मैं अनुमित जानता हूँ, शीघ्र ही वह आप-से भी युद्ध करनेके लिए आयेगा ॥ ९६ ॥ ऐसा अवस्यामे आप जो उचित समझे सो कर । विभीषणका हाल

सर्ग ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४२१

सर्ग ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४२१

तथेति रामवचनाद्गताश्चान्यनदाः। लक्ष्मणस्तेऽपि वेगेन गत्वा दूताः समायताः ॥९९॥
प्रोचुः समार्था श्रीरामनृपाणां वचनाजिते। केचिन्न्ृपाः पालयंति तवाज्ञां रघुनन्दन ॥१००॥
केचित्तु पालयन्त्याज्ञां तत्र तत्कारण श्रृणु। चम्पकायाः सुकन्यायाः स्वयंवरसमुद्भवम् ॥१०१॥
दुःखं हृदयमध्यस्थं यत्तदद्यापि वर्तते हि। शुकैरंशनशातस्तैर्विदार्यतेऽबला पुनः ॥१०२॥
स्मृत्वा मदनसुन्दर्या दुःखं काम्युद्भव नृपाः। आज्ञां न पालयन्त्यद्य तत्र राघव मन्मथो ॥१०३॥
पालिता यैस्तवाज्ञा ते सुग्रीवाद्या नृपोत्तमाः। मध्यकोटिबलैर्युक्ताः समायाताः महत्तरः ॥१०४॥
तद्दूतवचनं श्रुत्वा रामो गर्तत्रलोचनः। प्राह मात्सर्यतास्तेने स्पृहयंति नृराधमाः ॥१०५॥
मादौ हन्त्वा कौम्भकर्णि तान्गच्छामि ततश्चहम्। इत्युक्त्वा सुदिने रामः सेनया बहुभिर्जगात् ॥१०६॥
मूलबाणुरघाताथंषादी पूर्वा प्रदिदिशे। विचिन्त्यैतत्पुरे दुग्र्यां युपकेतुं न्यवेशयत् ॥१०७॥
कुशाद्याः सप्त बालान्ते रामेण सह निर्ययुः। विमाने मरुतां सेनां स्थापयामास राघवः ॥१०८।
तादृशे पार्थिवाः सर्वे नानावाहनमाश्रिताः। रेणेताः स्वस्वसैन्यैश्च नन्वा रामं पुरःस्थिताः ॥१०९॥
तान् रामः स्थापयामास विमाने सैन्यसंयुतान्। अष्टादशपरमिर्तैः कपिभिः कपिराड् ययो ॥११०॥
आरुरोह विमानग्रं कपिमी राघवस्ततः। ततः सीतां विना रामः स्वय स्थित्वा तु पुष्कके ॥१११॥
पश्यन्मानाविधान् देशान्ययौ लङ्कां विहायसा। यात्राकाले यथा वानरवताऽऽसीत्तथा पुनः ॥११२॥
ततो राम समायातं श्रुत्वा स मूलकासुरः। ययौ लङ्काबहिर्येद्धुं राघवेण बलीयसा ॥११३॥
दशकोटिमित्रां सेनां विभ्रन् स बलदर्पितः। तत्तन्ते राक्षसाः पट्टिशैर्निघ्न्युः प्लवगान मुहुः ॥११४॥
वानरा राक्षसांश्चापि निघ्न्युश्चन्द्रवलर्गैः। एवं बभूव तद्युद्धं तुमुलं दिनसप्तकम् ॥११५॥


सुनकर राम बड़े विस्मित हुए ।९९॥ तब लक्ष्मणने उनसे कहा कि संसारमें जितने राज हैं, उनके पास दूत भेजकर शीघ्र बल्वा लो । ९८ ॥ लक्ष्मणके वचनके आज्ञानुसार दूत भेजे। दूतोंने शीघ्र लौटकर रामसे कहा- हम लोग सब राजाओंके पास हो आय। उनमें कुछ राजे ही आपकी आज्ञाका पालन कर रहे हैं और कुछ नहीं ।९९॥ १००॥ इसका कारण यह है कि चम्पिकाके और सुप्रतीक स्वयंवरके समय उनके हृदयपर जो लोभ उपजा था, वह अब तक ज्योंका त्यों बना है। फिर पुत्र विरहके शोकसे उनका हृदय अलग विदीर्ण हो चुका है । १०१॥१०२॥ जब वे मदनसुन्दरीकी उस अनर्थी व्यथाको याद करते हैं तो उनका कलेजा टुकड़े-टुकड़े हो जाता है। इन्ही कारणोंस वे आपकी आज्ञाका पालन नहीं करना चाहते ॥ १०३॥ जिन सुग्रीव आदि नृपतियोंने आपकी आज्ञाका पालन किया है, वे अपने दल-बल समेत अयोध्या आ रहे हैं ॥ १०४ ॥ दूतकी बात सुनकर रामचन्द्रने कहा-वे नीच राजे व्यर्थपर हमारे साथ ईर्ष्याभाव रखते हैं? अस्तु, पहले कुम्भकर्णके बेटे मूलकासुरको मारकर उन लोगोंपर भी चढ़ाई करूँगा। इस प्रकार निश्चय करके रामने शुभ दिन और मुहूर्तमें अपनी विशाल सेना तथा लक्ष्मण भरत आदि भ्राताओंके साथ मध्यकासुरको मारनेके लिए अवधेशार प्रस्थान कर दिया ॥१०५, १०६॥ पुरीके बाहर आकर उन्होंने कुछ सेनाके साथ यूपकेतुको अयोध्याकी रक्षाके लिए छोड़ दिया और बाकी कुश आदि सात लड़कोंको अपने साथ ले गये। राघव यात्राके समय सारी सेनाको पुराक विमानपर बिठा लिया ॥ १०७॥ १०८ ॥ रास्तेमें रामके अनुगामी राजा भी अपनी-अपनी सेनाके साथ आकर रामसे मिल गये ॥ १०९॥ उन लोगोंको भी रामने विमानमें बिठा लिया। इस यात्रामें सुग्रीव अठारह पद्म बन्दरोंके साथ गये थे ॥ ११०॥ उनको भी रामने पुष्पकपर बिठाल लिया। इसके अनन्तर सीताको छोड़कर राम विमानपर बैठे। आकाशमार्गमें अनेक देशोंको देखते हुए वे लङ्काकी ओर बढ़े और अल्प समयमें ही निर्दिष्ट स्थानपर पहुँच गये उधर जब मूलकासुरने यह समाचार सुना ता रामचन्द्रके साथ युद्ध करनेके लिए दस करोड़ सेना लेकर लङ्काके शहरवाले मैदानमें आ डटा ॥ १११-११३ ॥ उस समय ब्रह्माके वरदानसे वह बड़े घमण्डमें था। फिर क्या होना था, राक्षसगण बानरोंको लाठीसे मारने लगे। वानरयूहने पहाड़के बड़े-बड़े टुकड़ों तथा वृक्षोंसे