अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
ालयस्तथा ॥ 13 ॥ Wait, look at line 7: "एवमक्षयलिङ्गेभ्यः सर्वभूतालयस्तथा ॥ 13 ॥" Is the number "13" in Devanagari or Arabic? Look at: "॥ 13 ॥" It is Arabic numerals: "13"! Wait, let's check all the shloka numbers: Line 7: ॥ 13 ॥ Line 11: ॥ 14 ॥ Line 13: ॥ 15 ॥ Line 15: ॥ 16 ॥ Line 17: ॥ 17 ॥ Line 25: ॥ 18 ॥ Line 27: ॥ 19 ॥ All shloka numbers are in Arabic numerals: 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19! Wait, look at the page number at the top right: "101" (Arabic). Top left: "सूत्र-२२" (Devanagari numerals).
Line : इस संसार की सृष्टि में उत्पन्न सभी द्वीप, क्षेत्र, जो सभी जीवों, प्राणियों के
Line : लिए रहने के स्थान बने हुए हैं, वे सब भी अक्षयलिङ्ग से ही उत्पन्न हुए हैं।
Line : शेषोद्भवस्तथा पुत्र जीवा वै काश्यपादयः । Wait, look at
सूत्र-२३ 103 है। ऐसे विष्णु के जन्म रहस्य के बारे में तुम सुनो जो महाआनन्द देने वाला है। पठन पर यह दशावतार का उत्पत्ति प्रसङ्ग पापों का नाश करने वाला है, उस वैष्णव-स्वरूप के प्रादुर्भाव को मैं कहता हूँ जिसको भक्ति और प्रयत्न पूर्वक पढ़ने वाला व्यक्ति परमगति को प्राप्त कर लेता है। दशावतारनामानि — मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः । रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की च ते दश ॥ 6 ॥ विष्णु के दस अवतार हैं— (1.) मत्स्य, (2.) कूर्म, (3.) वराह, (4.) नरसिंह, (5.) वामन, (6.) परशुराम, (7.) दाशरथीराम, (8.) श्रीकृष्णचन्द्र, (9.) बुध एवं (10.) कल्कि। तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे। चन्द्रार्कपवने नष्टे ज्योतिषि प्रलयं गते ॥ 7 ॥ एवं जाते तदा काले ध्यानयुक्तः पितामहः। सम्भूतो दानवः शङ्खो हृतवान् वेदमर्णवे ॥ 8 ॥ (पूर्वकाल की बात है जब सर्वत्र जल ही था) उस एकार्णव स्थिति में समस्त स्थावर-जङ्गम सृष्टि नष्ट हो गई थी। चन्द्र-सूर्य, पवन भी नष्ट हो गए और ज्योतिष या समस्त् तारागण भी प्रलय में तिरोहित थे। जब सब कुछ इस स्थिति में नष्टभूत थे, पितामह ब्रह्माजी ध्यानस्थ थे। तब शङ्ख नामक दानव उत्पन्न हुआ जो वेदों को चुराकर उस महासागर में डूबो देने को आतुर था। गतश्च विष्णुपाश्र्वे च क्षीराब्धौ च पितामहः। महासुरोऽनन्तरूपो वेदान् हृत्वा गतोऽर्णवे ॥ 9 ॥ वह शङ्ख दानव क्षीरसागर में अनन्त नाग की शय्या पर शयन किए भगवान् विष्णु और उनके नाभिकमल से उत्पन्न, ध्यानस्थ पितामह के पास गया और वह महा असुर अनन्त का रूप धरकर चारों ही वेदों को चुराकर महासागर में ले गया। अवतीर्णकालावधिमाह — कृतेऽष्टलक्षसहस्रशताब्देषु गतेषु च। शताब्दान्ते यथा ख्याते माघे कृष्णप्रतिपदि ॥ 10 ॥ ' पुष्यान्ते च मुहूर्ते च मनुर्नाम शुभप्रदः। महामीनो भविष्यामि सहस्रयोजनायतः ॥ 11 ॥
104 अपराजितपृच्छा ( भगवान् विष्णु की प्रतिज्ञा है कि उक्त स्थिति में) कृत अर्थात् सत्ययुग के आठ लाख एक हजार ( 80, 1000) वर्ष बीतने पर शताब्दी के अन्त में विख्यात माघ माह के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को पुष्य नक्षत्र के अन्तिम चरण में, शुभ मुहूर्त में मनुगणों को शुभफल देने वाले महामीन, एक हजार योजन के आकार वाले मत्स्यावतार के रूप में अवतरित होता हूँ। घनवन्नीलवर्णश्च रताक्षश्च महोत्कटः। भृकुटिस्फुरदशनः कृत्वा कोपं जनार्दनः ॥ 12 ॥ क्रीडन्तमब्धिमध्यस्थं निहितां च कूपकर्तरि। स्यात्कलित लग्नाम्बु पद्म पुष्पोद्भवमालिका ? ॥ 13 ॥ उक्त महा मत्स्यावतार का गहरे नील वर्ण के बादलों के समान नीला वर्ण और महोत्कट- महाभयानक लाल-लाल आँखें, भृकुटि क्रोध से चढ़ी हुईं और दांत कटकटाते हुए भगवान् जनार्दन प्रकट हुए जो उस महासागर के जल के बीच में पुष्पों के बीच कलिका की भाँति क्रीड़ा करते दिखाई दिए। मत्स्यपुच्छाच्च निहतस्तदा चोच्छलिता छटा। छोद्ग्र धाराकुलोत्तरं भग्नं सुरा कुलावर्तपद्म ? ॥ 14 ॥ स्थललता फेनवर्णा ग्रन्थावर्णतकम् दोद्धव ? । यथा अग्र कुलावर्त भङ्गात् पुरतो वनमालिका ! ॥ 15 ॥ हतो महासुरः शङ्खो हृतैर्वेदैस्ततस्तदा। आसनं कृतमुत्सङ्गे ब्रहाणश्चैव नन्दतः ॥ 16 ॥ उन मत्स्य के पूँछ के झपटों से महासागर की जलराशि के उछाल की छटा अद्भुत थी, वे विराट ऊर्मियाँ बारम्बार तटों को स्पर्श करने के लिए उमड़ती थीं। सागर के स्थल पर चारों ओर फेन स्वरूपी बड़े-बड़े आवर्तक लहरों के उठे मानो अग्नि के झंझावाती कुलावर्तों, भँवरों से वनमालिका पूरी तरह भङ्ग हो गई हो। इस संघर्ष में शङ्खासुर मारा गया। तब उसके द्वारा चुराए गए वेद भी वे मत्स्यरूप भगवान् अपनी गोद में भली प्रकार रखकर लाए जिससे ब्रह्मा को भी बहुत आनन्द हुआ। पटहाद्या अवाद्यन्त वेदे प्राप्तेऽनु पञ्चमम्। महोत्सवे ब्रह्मलोके विष्णुलोके तथैव च ॥ 17 ॥ धर्मः प्रस्थापितो लोके सत्यं ज्ञानं च भूतले। लक्ष्म्यायुष्का नराश्चैवमक्लेशा दृढयौवनाः ॥ 18 ॥
सूत्र-२३ 105 वेदों के प्राप्त हो जाने के हर्ष में पटहा आदि पाँचों प्रकार के वाद्यों का वादन कर ब्रह्मलोक व विष्णुलोक में महोत्सव मनाया गया। इस प्रकार शङ्खासुर के वध के उपरान्त पुनः लोक में धर्म की स्थापना हुई और भूतल पर सत्य व ज्ञान का विस्तार हुआ। इसके फल स्वरूप नर-नारी क्लेश रहित होकर दृढ़ यौवनयुक्त हुए और लाखों वर्षों की आयु प्राप्त करने में सक्षम हुए। एकच्छत्रं नृपो राज्यं प्राप्तवान् वेदसङ्गतौ। चक्रवर्तित्व विज्ञेयो शिवभटं सुदर्शनम् ? ॥ 19 ॥ देवाग्निगुरुपूजा च सतीसत्यं तथोत्तमम्। अग्राहां च प्रजादण्डं अद्वास्यता कृषि वेश्मता ? ॥ 20 ॥ इस समस्त पृथ्वी पर वेद सङ्गत अर्थात् वेदों में दिए गए आदेशों का पालन करने वाला एकछत्र चक्रवर्ती राजा का राज्य प्राप्त हुआ। उस चक्रवर्तित्व को पाने वाला लोकप्रिय सुदर्शन राजा शिवभट नाम से जाना गया। इस राजा के राज्य में देवपूजा, हवनादिक अग्निपूजा और गुरुपूजा तथा सर्वोत्तम सतियों का सत्य अर्थात् पातिव्रत्य पूरी तरह से व्याप्त था फलस्वरूप प्रजा धर्मानुसार चलने के कारण दण्ड प्राप्ति के लिए अग्राह्य हो गई अर्थात् तब दण्ड का प्रचलन नहीं था। सभी नागरिक स्वतन्त्रता से जीवन यापन करते थे। कोई भी व्यक्ति खेती के लिए अथवा गृहादि के लिए दास बनाकर नहीं रखा जाता था। न शोकदुःखदुर्भिक्षं न चौराश्चाभवंस्तदा। धर्मेण पालयन्धात्रीमाज्ञां चक्रे च मेदिनी ॥ 21 ॥ ईप्सितोदकं च मेघात् सर्वसस्या च मेदिनी। लक्षात्परेऽनल्पधना अतिरूपा नराः स्त्रियः ॥ 22 ॥ उस काल में कोई शोक, दुःख, दुर्भिक्ष नहीं था तथा चोरों का भी कोई भय नहीं था। तब पृथ्वी का धर्म से पालन होता था और उस राजा की आज्ञा समस्त संसार में मानी जाती थी। इसी प्रकार के खुशहाल में मेघ भी आवश्यकतानुसार वर्षा करते थे और सारी धरती पर सभी प्रकार के धान्य उत्पन्न होते थे। फलतः यहाँ के नर-नारी अत्यन्त रूपवान और स्वस्थ होते थे और लखपति होते थे, अनल्पधनी होते थे अर्थात् बहुत समृद्ध होते थे। कामिन्य ऋतुगम्याश्च ह्यायुष्काः कान्तिभिर्युताः। लोकाः शास्त्रविशेषज्ञ अग्निहोत्रं गृहेगृहे ॥ 23 ॥ त्रिदशतिथिपूजा च नित्यमेव प्रतिगृहम्।
106 अपराजितपृच्छा न विषं नैव दुःस्थानं गृहे तु धनधान्यकम् ॥ २४ ॥ उस राज्य की कामिनियाँ अर्थात् ऋतुमति नारियाँ ऋतुकाल में ही सहवास करने वाली होने के कारण कान्तियुक्त, सौन्दर्य व तेजयुक्त तथा पूरी आयु तक जीवित रहने वाली होती थी। वहाँ के निवासी लोक और शास्त्रों के विशेषज्ञ होते थे और घर-घर अग्निहोत्र का प्रचलन था। प्रत्येक घर में देवता और अतिथि की नित्य पूजा अवश्य ही होती थी। कहीं भी विष का प्रयोग (नशा) नहीं होता था। इसलिए घरों में खटपट का दुःख भी नहीं था। सभी घर धन-धान्य से परिपूर्ण होते थे। भुञ्जन्ते काञ्चने पात्रे उदते नास्ति गृह्लता ? । सन्तुष्टाः सर्वलोकास्तु धनधान्यैश्च काञ्चनैः ॥ २५ ॥ ईप्सितं तु गवां क्षीरं क्षीरे सर्पिस्तथाधिकम्। इच्छारसश्चेक्षुदण्डे शीधुपानं घटैस्तथा ॥ २६ ॥ उस समय लोग स्वर्णपात्रों में भोजन करते थे और दान देने वालों से भी दान लेने वाले कोई नहीं थे क्योंकि सभी सम्पन्न थे। कोई किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता था। सभी लोग धन-धान्य और स्वर्णादिक से पूर्णतया सन्तुष्ट थे। ऐसे ही धर्म सम्पन्न राज्य में गायें मनचाहा दूध देती थीं और उस दूध में घी भी बहुत होता था। ईखों में पर्याप्त रस होता था, जो इतना मीठा होता था मानो घड़ों में भरा हुआ गन्ने का रस नहीं होकर अमृत हो। त्रिलक्षाब्दं मीनरूपो विष्णुः पर्यैति सागरन्। पुनर्जन्म करिष्यामि उद्धरिष्येऽमृतं यतः ॥ २७ ॥ इस प्रकार यह मत्स्यावतार रूपी विष्णु आगामी तीन लाख वर्षों तक सागर में समस्त दिशाओं में तैरते रहे। उन्होंने यह भविष्यवाणी भी की थी कि 'मैं पुनर्जन्म लूँगा और उसमें अमृत घट का उद्धार करूँगा।' इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां प्रथमहरि- मत्स्यावताराधिकारो नाम त्रयोविंशं सूत्रम् ॥ २३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में प्रथम हरि-मत्स्यावतार अधिकार नामक तेईसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥
सूत्र-२४ 107 कूर्मावतारे मन्दरार्णवमन्थनं चतुर्विशं सूत्रम् ॥ 24 ॥ विश्वकर्मोवाच- कल्पान्ते रत्नजातं यद् श्रीधेनुरमृतादिकम्। अन्योपस्करजातानि क्षीराब्धौ स्थापितानि तु ॥ 1 ॥ याचमानाः समस्तास्तु सुरासुरनरोरगाः। ददस्व भो विभो सर्वं स्थापितं विष्णुना च यत् ॥ 2 ॥ विश्वकर्मा ने (विष्णु के अवतारों के प्रसङ्ग में अपराजित से आगे) कहा-कल्प का अन्त होने पर जिस भाँति से रत्नों की प्राप्ति हुई, जैसे कि श्री, सुरभि, अमृत, आदि और अन्य भी काम की वस्तुएँ प्राप्त हुईं, जो क्षीरसागर में स्थित थी, इन सब रत्न राशियों को समस्त सुर, असुर, नर और उरगों ने प्रमुख माँग बना ली थी। इसलिए ये सभी मिलकर भगवान् विष्णु के पास गए और उनसे प्रार्थना करने लगे कि हे प्रभो! सागर में स्थित समस्त वैभव की वस्तओं को, रत्नों को हमें दिलाने की व्यवस्था करें। इन्द्र उवाच - काष्ठे चाग्निस्तिले तैलं क्षीरमध्ये यथा घृतम्। उद्धरिष्यामि तान् सर्वान् क्षीराब्धित विष्णुना च यत् ॥ 3 ॥ इन्द्र ने (देवों की ओर से विष्णु से) कहा- हे प्रभु! जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि छिपी हुई है और तिल में तेल छिपा हुआ है तथा दूध में घी छिपा है, उसी तरह समुद्र के गर्भ में भी समस्त उपस्कर अर्थात् जीवनोपयोगी वस्तुएँ छिपी हुई है, उन सबको मैं उद्धार करके निकालना चाहता हूँ। चक्रुस्ते मन्थनारम्भं सुरासुरनरोरगाः। मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वाऽथ वासुकिम् ॥ 4 ॥¹ इसी प्रयोजन से समस्त सुर-असुर, नर-उरगों ने मिलकर समुद्र का मन्थन करना आरम्भ किया। इस कार्य के लिए इन सब लोगों ने मन्दराचल पर्वत का मन्थान अर्थात् रवाई या मथनी बनाई और वासुकी नाग को उसे घूमाने के लिए नेत्र (नेतरा, रस्सी) के रूप में काम में लिया। उद्धरिष्यति कस्तत्र क्षीरार्णवे तु मन्दरम्। गतास्ते विष्णुपाश्र्वे तु सुरासुरनरोरगाः ॥ 5 ॥
- तुलनीय विष्णुपुराणे— चकर्ष नागराजानं दैत्यमध्येऽपरेण च॥ (विष्णु. 1, 9, 89) मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्॥ (तत्रैव 1, 9, 77 व 84)
108 अपराजितपृच्छा तदोपरान्त ये सभी सुर, असुर, नर और उरगगण यह जानने के लिए भगवान् विष्णु के पास गए कि क्या वे वहाँ इस क्षीरसागर से मन्दर के प्रयोग द्वारा उन समस्त उपस्करों को, रत्नों को जो क्षीरसागर में स्थित है, उद्धरित करने, निकालने में समर्थ हो सकेंगे ? कूर्मावतारमासतिथ्यादीनां - चतुर्लक्षसहस्त्रादि शतान्ताब्दे कृते गते । फाल्गुने कृष्णपक्षे च द्वितीयायां तिथौ तथा ॥ 6 ॥ मुहूर्ते कार्मुके चैव हस्तान्ते घटिकाद्वयम् । कूर्मावतारो मेदिन्यां मुहूर्ते तत्र चाभवत् ॥ 7 ॥ इस सबके उद्धार के लिए सत्युगके चार लाख, एक हजार एक सौ वर्ष बीत जाने पर, फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की द्वितीया तिथि के दिन, हस्त नक्षत्र के अन्तिम चरण में, दो घटी के बीत जाने पर कार्मुक मुहूर्त में इस मेदिनी पर (भगवान् विष्णु का) कूर्मावतार हुआ। तले तु कूर्मरूपेण हेमकूटनिभं गिरिम्। मन्दरं धारयिष्यामि ह्यमृतार्थेऽपराजित ॥ 8 ॥ इस पर विष्णु भगवान् ने कहा कि 'मैं कूर्म रूप में सागर के तल में रहकर स्वर्ण के स्तम्भ के समान बने हुए इस मन्दराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करूँगा जिससे मेरा अमृतोद्धार का प्रयोजन सिद्ध हो सके।' पीतवर्णो महादिव्यो दृश्यतेऽथानुवर्तुलम् । हारिद्रकश्वेतपादैर्ज्योतिर्दृष्टोऽथ निर्मलैः ? ॥ 9 ॥ शैलेन्द्रस्योत्तरे पार्श्वे क्षीरोदो नाम सागरः । प्रारब्धं मन्थनं तत्र सुरासुरनरोरगैः ॥ 10 ॥ मन्दरं मन्थनं कृत्वा नेत्रं कृत्वा तु वासुकिम् । एकतश्च सुराः सर्वे बलिमेकत्र संस्थिताः ॥ 11 ॥ पीले रङ्ग, महादिव्य वर्तुल की भाँति दिखाई देने वाला हल्दी जैसा, श्वेतपाद वाला निर्मल ज्योति वाले मन्दराचल नामक शैलेन्द्र के उत्तरी पार्श्व में यह क्षीरोद नामक क्षीरसागर था जिसे वहाँ सुर, असुर, नर और उरगों ने मथना प्रारम्भ किया। मन्दराचल को मथनी करके और वासुकी नाग को नेत्र बनाकर एक ओर तो सभी देवता एकत्र हो गए और दूसरी ओर बलि आदि असुरगण एकत्र होकर स्थित हो गए थे।
सूत्र-२४ 109 क्षीरार्णवात् निर्गतरत्नद्रव्यादीनां – क्षीरार्णवे मध्यमाने सफेनोर्मिमहोत्कटे। समुद्भूतानि रत्नानि गुणतेजोमयानि च ॥ 12 ॥ मौक्तिकं वज्रवैडूर्ये पद्मरागश्च नीलकम्। हिरण्याद्यष्टलोहानि मध्यमाने तदुद्भवः ॥ 13 ॥ इस प्रकार दोनों ही ओर से सुरों और असुरों के प्रयास से क्षीरार्णव के मध्य में मन्दराचल के द्वारा मन्थन से फेनयुक्त ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगी। मन्थन के फलस्वरूप गुण और तेजों से युक्त रत्न निकलने लगे। उन रत्नों में मोती, हीरे, वैदूर्य, पद्मराग, नीलम, सोना आदि अष्टलोह धातुएँ समुद्र के बीच से निकलीं। तदोद्भूता कामधेनुर्घृतदध्युद्भवस्ततः। क्षीरं च गोमयं मूत्रं पञ्चगव्यं प्रकीर्तितम् ॥ 14 ॥ सर्वसृष्ट्युद्भवा धेनुः सर्वकामफलप्रदा। सर्वकाममवाप्नोति कामधेनुनमस्कृतिः ॥ 15 ॥ उसी समुद्र मन्थन से कामधेनु निष्पन्न हुई जिससे घी, दही, दूध, गोमय, गोमूत्र निकले जो पञ्चगव्य नाम से जाने जाते हैं। यह कामधेनु सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली है इसलिए समस्त कामों को पूर्ण करने वाली कामधेनु नमस्कृत्य है। ऐरावतो गजेन्द्राणां चन्द्रश्चाप्सरसस्तथा। उच्चैःश्रवास्तुरङ्गाणां सूर्यादीनां च वाहनम् ॥ 16 ॥ इसके उपरान्त, समुद्र मन्थन से जो अन्य अन्य रत्न निकले वे हैं— गजेन्द्रों में ऐरावत हाथी, चन्द्रमा, अप्सराएँ और उच्चैःश्रवा नामक अश्व जो सूर्यादि देवताओं के वाहन बने। अमृतानां सप्तकुम्भा अमृतत्वं च दायिनः। समस्थाली च पात्राणं तलिकातां वा (वो) लुकोद्भवाः ? ॥ 17 ॥ पर्यङ्कमासनं चैव तथा सिंहासनानि च। छत्रचामरालङ्कारा धूपामोद आरार्त्तिकम् ॥ 18 ॥ सिंहासनरुद्रासनवेत्रासनमसूरकम्। गदिका पट्टपं गिट्टि प्रोक्तान्यासनकानि च ॥ 19 ॥ षोडशाभरणं दिव्यं पदादि मुकुटान्तकम्। षट्त्रिंशच्चैव ₃₆ शस्त्राणां निर्गतानि क्षीरार्णवात् ॥ 20 ॥
110 अपराजितपृच्छा इसी प्रकार अमरता देने वाले अमृत से भरे सात अमृतकुम्भ प्राप्त हुए। पकाने के लिए स्थाली- वटलोई आदि पात्र और ताम्बे की करधनी- कमरपेटी, कमरबन्ध, पर्यङ्क, आसन, सिंहासनादि, छत्र, चामर सहित अलङ्कार और आरती में प्रयुक्त होने वाले धूप-गन्धादि, सिंहासन, रुद्रासन, बेंत का आसन, मसूरक अर्थात् मसहरी या मच्छरदानी, गदला, पट्ट अर्थात् रेशम के महीन वस्त्र, गिट्टी आदि के अनेक आसन, सोलह प्रकार के दिव्य आभूषण जो कि पैर से सिर तक धारण करने योग्य थे और छत्तीस प्रकार के आयुध भी उस समुद्र से निर्गत हुए। कवचानि च रत्नानि बलीवर्दोत्सवास्तथा। पुष्पकादिविमानानि श्रीवत्सस्वस्तिकानि च ॥ 21 ॥ क्षीरार्णवे मध्यमाने निमज्जद्भिः सुरासुरैः । तत्रोत्पन्नो महावृक्षो नाम्नासुरतरुस्तथा ॥ 22 ॥ इसी प्रकार कवच¹, अन्य रत्न, बैलों से होने वाले समस्त उत्सव, पुष्पकादि विमान, श्रीवत्स, स्वस्तिकादि प्राप्त हुए। इसी क्षीरसागर का सुर व असुरगणों द्वारा मन्थन किए जाने पर इसके बीच निमज्जित हुआ सुरतरु नाम का महावृक्ष उत्पन्न हुआ अर्थात् कल्पवृक्ष प्राप्त हुआ। अथ कल्पवृक्षवर्णनमाह — नानापुष्पसमाकीर्णो नानापत्रसमाकुलः । नानाफलसमायुक्तो पञ्चशाखासमन्वितः ॥ 23 ॥ पुण्यानि तस्य पत्राणि दृष्ट्वा तीर्थमहाफलम्। तस्यानुक्रमरूपं च जातिभेदं च लक्षणम् ॥ 23-1 ॥ देशजातिकुलस्थानं वर्णभेदमतः परम्। शाखानुक्रमयुक्ती च कथयामि समासतः ॥ 23-2 ॥ उक्त कल्पवृक्ष तरह-तरह के पुष्पों से लदा हुआ था और नाना प्रकार के पत्तों से पूरी तरह लकदक था। तरह-तरह के फल इसकी पाँचों शाखाओं में लगे हुए थे। इस कल्पवृक्ष के दर्शन करने मात्र से सभी तीर्थों की यात्रा का महापुण्य फल
- कौटिलीय अर्थशास्त्र में पाँच प्रकार के कवचों का वर्णन हुआ है— लोहजाल (सिर से पाँव तक ढँकने वाला), लोहजालिका (सिर के अतिरिक्त शेष समस्त देह को ढँकने वाला), लोहपट्ट (भुजाओं को छोड़कर समस्त शरीर को ढँकने वाला), लोहकवच (केवल वक्ष व पीठ को ढँकने वाला), सूत्रकण्टक (सूत का कवच) और पँचचर्मवर्म (मत्स्य, गेंडा, नीलगाय, गज एवं वृषभ के चर्म, खुर व शृङ्ग से निर्मित कवच)। (अर्थशास्त्र अधिकरण 2, 34, 18)
सूत्र-२४ 111 मिल जाता है। उनका क्रमवार रूप, जाति भेद और लक्षण, इनके देश, जाति, कुल-स्थान, वर्णभेद और इसके बाद शाखा अनुक्रम से मैं संक्षेप से कहता हूँ। नागरं द्राविडं चैव कालिङ्गं यामुनं तथा। निश्वेश्वरं समाख्यातं पञ्चपत्रसमुद्भवम् ॥ २३-३ ॥ नागरा चोत्तरा शाखा द्राविडा दक्षिणोद्भवा। कालिङ्गा पश्चिमा शाखा यामुना पूर्वदिग्भवा ॥ २४ ॥ विश्वेशा ऊर्ध्वशाखायां एञ्जातिमहोत्सवाः। एकैकं पञ्चभेदाश्च₅ कथयाम्यपराजित ॥ २५ ॥ इसके पाँच पत्र भी उत्पन्न हुए जिनके 1. नागर, 2. द्राविड़, 3. कलिङ्ग, 4. यामुन और 5. विश्वेश्वर आदि पाँच नाम विख्यात है। इनमें नागर उत्तरी शाखा के हैं और द्राविड़ दक्षिणी शाखा से उत्पन्न हुए हैं। कलिङ्ग पश्चिम शाखा से और यामुन पूर्वी शाखा से उत्पन्न हुए हैं। विश्वेशा ऊर्ध्वशाखा से उद्भूत हुए। ये पाँचों जाति महोत्सवा रूप में मान्य हैं। इनके भी पाँच-पाँच भेद हैं जिन्हें हे अपराजित ! मैं अब कहता हूँ। प₅ जातिर्दश₁₀ भेदास्तथा षोडश₁₆ वै कलाः। मासपत्रं चतुर्जातमर्बुदादिसमुद्भवम् ॥ २६ ॥ जलजं स्थलजं पत्रं मेघजं गिरिकोद्भवम्। जीवपत्रं निभाकारं भेदभिन्नं व्यवस्थितम् ॥ २७ ॥ इनकी पाँच जातियाँ हैं जिनके दस भेद हैं और उनकी सोलह-सोलह कलाएँ हैं ओर इनके हर मास चारों से उत्पन्न होने वाले अर्बुदादि (अरबों की) संख्या में हैं। जल से उत्पन्न होने वाले, स्थल से उत्पन्न होने वाले, बादलों से उत्पन्न होने वाले, पहाड़ों में उत्पन्न होने वाले जीवपत्रों के समान भिन्न-भिन्न रूपों में व्यवस्थित हैं। सर्वाभरणसंस्थानं हारकेयूरकादिकम्। स्तम्भे द्वारे गृहे शुद्धं प्रासादेषु च सर्वतः ॥ २८ ॥ × × × × × × × × × × × × ॥ २९ ॥ इस कल्पवृक्ष के द्वारा उत्पन्न होने वाले सभी आभूषणों के संस्थान में हार- केयूर आदि हैं। सर्वतः स्तम्भ, द्वार, गृह सभी शुद्ध प्रासादों के उपयुक्त हैं। ××××। यत्र तद् दृश्यते पत्रं स्त्रियस्तत्र हितेक्षणाः। तत्रोत्पन्नं तु कलशमष्टामङ्गल्यसम्भवम् ॥ ३० ॥
112 अपराजितपृच्छा जहाँ-जहाँ ये पत्र दिखाई देते हैं, वहाँ-वहाँ मनोहारी दृष्टि युक्त स्त्रियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उनसे अष्ट माङ्गल्य प्रदान करने वाले कलश उत्पन्न हो जाते हैं। संछन्नं फलपुष्पैश्च पत्रैश्च वलयीकृतम्। अभिषेके पट्टबन्धे प्रतिष्ठोद्वहनादिषु ॥ 31 ॥ प्रासादे राजभवने कलशं विनिवेदयेत्। षोडशाभरणैर्युक्ता लक्ष्मीस्तत्र विनिर्गता ॥ 32 ॥ द्वादशादित्यसङ्काशास्त्रैलोक्यम(पि )णिदीपिका। ¹( यस्य प्राप्ये न दारिद्र्यं सा देवी प्रकीर्तिता ॥ 33 ॥ ) (वे कलश) फल और पुष्पों से आच्छादित और उनके चारों ओर वलयाकार में पत्र से निर्मित सजावट लिए होते हैं, जो अभिषेक के अवसर पर, पट्टबन्ध के अवसर पर और प्रतिष्ठा के लिए कलशों में विवाह व गङ्गोज यात्रा आदि में, प्रासादों और राजप्रासादों में इन गङ्गाजल के कलशों को आदरपूर्वक स्थपित करें। उन पर से षोडशाभरणों से युक्त महालक्ष्मी वहाँ आ जाती है। जो बारह्रों आदित्यों के समान जाज्वल्यमान प्रकाश को प्रसारित करने वाली, तीनों लोकों को आलोकित करने वाली मणिदीप की भाँति शोभायमान होती है और जिसके प्राप्त होने पर दारिद्र्य नहीं रहता जो ऐसी देवी के रूप में प्रसिद्ध है। अमृतं सर्वदेवेषु ह्यैरावतः सुराधिपे। अश्वश्च भास्करे देवेऽपस्करः सर्वतः समः ॥ 34 ॥ (मन्थन के उपरान्त) सभी देवताओं को अमृत दिया गया और इन्द्र को ऐरावत तथा सूर्य को (उच्चैःश्रवा अश्व) दिया गया। ये वस्तुएँ सभी को समान रूप से दी गई। पुनर्मन्थनात् अलक्ष्मीनिर्गतं — पुनश्च मन्थनं कृत्वा अलक्ष्मीस्तत्र निर्गता। समुपेता पञ्चगुणैर्दत्ता ऽ या तु पितामहे ॥ 35 ॥ अतिक्षुधा च दीनत्वं याचनं भ्रमणं तथा। अलक्ष्म्याः पञ्चमुद्राश्च करपात्रं च यष्टिकम् ॥ 36 ॥ (जब देवासुरों ने) पुनः क्षीरसागर का मन्थन किया तो अलक्ष्मी सागर से निकली जिसको पितामह ने एक साथ पाँच गुण दिए। अतिक्षुधा, दीन-मलीन, याचना के लिए भटकाव और भिक्षापात्र तथा यष्टि— ये पाँचों मुद्राएँ अलक्ष्मी को
- प्रकाशित पाठे न लभ्यते।
२. सूत्र ५१-१००: चतुर्दश प्रासाद, पीठ, शिखर, मण्डप एवं रेखा-प्रासाद निर्माण
सूत्र-२४ 113 प्रदान की गई।$^1$ तथा च मन्थने विषप्राप्तिं — पुनर्मन्थनं कृत्वा तु विषं तत्र विनिर्गतम् । न तद् गृह्णन्ति वै देवा दानवैर्नैवगृह्यते ॥ ३७ ॥ नीलकण्ठे मयूरे च तद्रूपं वृषभध्वजे । तद्रूपेण तथेशेन तस्मात्तद्भक्षितं परम् ॥ ३८ ॥ (इसके उपरान्त) पुनर्मन्थन किए जाने पर उसमें से हलाहल विष निकला जिसे न तो देवताओं ने स्वीकारा न ही दानवों ने। ऐसे में वृषभध्वज भगवान् शिव और मयूर ने उसे ग्रहण किया। इससे शिव नीलकण्ठ हो गए और मयूर भी उस विष का भक्षण करने से नीलकण्ठ रूप हो गया। इत्यमनन्तर वारुणी कलिकोद्भवं — पुनर्वनिर्गता चैव मदिरा कलिकोद्भवा ।
- ऋग्वेदोक्त श्रीसूक्त में लक्ष्मी की ज्येष्ठभगिनी के रूप में अलक्ष्मी का उल्लेख है। उसका स्वरूप क्षुधा- तृष्णा से
114 अपराजितपृच्छा तां च पीत्वा कलिर्जातो मथनस्य विसर्जनम् ॥ ३९ ॥ अर्थक्षया शौचभ्रंशा गूढमन्त्रप्रकाशिका । नष्टकार्या तनुकृष्टा चागम्यागमपापदा ॥ ४० ॥ (एक बार) पुनः सागर का मन्थन किए जाने पर उसमें से कलियुग (क्लेश) स्वरूप मदिरा निकली जिसको पीने से कलियुग का प्रादुर्भाव हो गया और सागर मन्थन का अन्त हो गया। तब से मदिरा पीने वाले में कई अवगुण प्रकट होने लगे। यथा— वह व्यक्ति के धन का क्षय करती, उसकी पवित्रता का विनाश करती, उसके गुप्त विचारों को प्रकट कर देती और उसके समस्त कार्यों को नष्टकर डालती है, वह उसके विवेक का हरण कर लेती है जिससे वह बहन-बेटी, माता-गुरुपत्नी आदि अगम्या के साथ भी दुराचार करने में प्रवृत्त कर देती है और ऐसे जघन्य पाप करवाती है। अधर्मकलिकोद्भावा गृहच्छिद्रादिकारिका । तथा त्यक्तोत्तमस्नेहा मृतनिर्गतचेतना ॥ ४१ ॥ एवं निन्द्यगुणैर्युक्ता मदिरा पानतः कृता । मुक्ता यैः सा स्वहितैश्च तेषां श्रीर्बलवर्द्धिनी ॥ ४२ ॥ इसी प्रकार कलियुग के सभी अधर्मों को कराने वाली, गृह की रहस्यों को खोलकर परिवार के स्नेह, प्रेम व्यवहार को छुड़ा देती है और मदिरा पीने वाले व्यक्तियों की चेतना को मृत कर देती है। इस प्रकार के निन्द्य गुणों से मदिरापायीयुक्त होकर बरबाद हो जाता है। इसके विपरीत, जो समझदार व्यक्ति इसके अवगुणों को समझकर इससे मुक्त हो जाता है, वह अपना स्वयं का ही हित कर लेता है और ऐसे लोगों का धन व बलवर्धिनी वह त्यागी गई मदिरा स्वयं बन जाती है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां कूर्मावतारे मन्दरमन्थनाधिकारो नाम चतुर्विंशं सूत्रम् ॥ २४ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में कूर्मावतार मन्दार मन्थन अधिकार नामक चौबीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥ वराहावतारो नाम पञ्चविंशं सूत्रम् ॥ २५ ॥ अपराजित उवाच — पृथिव्यां सागरा द्वीपाः सशैलवनकाननाः ।
? Wait, look at the Hindi translation: "भगवान् विष्णु के पास पुकार करने पहुँचे" "के पास" translates "पार्श्वे" (locative) or "पार्श्वम्" (accusative). In Sanskrit, "विष्णुपाश्र्वे गताः" or "विष्णुपाश्र्वं गताः"? Either way, let's look at the character: it looks like विष्णुपाश्र्वंorविष्णुपाश्र्वे? Wait, look at the dot: is there a dot? No, wait! There is no dot! That little speck is just paper texture, or is it a dot? Wait, look at the stroke: it is विष्णुपाश्र्वे! Wait, let me look at विष्णुपाश्र्वंagain. Actually, let's look atपादोऽधर्मस्यin L13:दोhas an o-matra. Wait, let's look atविष्णुपाश्र्वं: Wait, between पाandगताः: Letter is: प, ा, श, ्, र, व, े ? Wait, look at the loop: is it श्र्वorश्व? In विश्वकर्मोवाच(L5):श्वhasशjoined toव. Notice how शjoinsव`: it doesn't have a full vertical bar, the round part connects directly
116 अपराजितपृच्छा कृतयुग के आधे बीत जाने पर चैत्र मास के कृष्णपक्ष की जया तिथि (तृतीया) को सूर्य नामक मुहूर्त (तृतीय मैत्र¹ संज्ञक मुहूर्त) के अन्त में, हस्त नक्षत्र के अन्तिम चरण में, दो घटिका शेष रहते महोत्कट महाविशाल, अकल्पनीय प्रमाण वाले वराह के रूप में फड़कती हुई भ्रुकुटी और किटकिटाते हुए दाँतों और अत्यन्त प्रकाशमान तेजपुञ्ज से समुद्भव अर्थात् उत्पन्न होकर इस शैल-द्वीप-सागर से युक्त पृथ्वी को अपने दाढ़ के आगे के भाग पर धारण करके सभी देवताओं से सम्पूजित होकर पृथ्वीधर होता हुआ पुनः आऊँगा। तथा च वराहावतार वर्णनं — पुष्करे परमेश्वरो नासाग्रे पवनात्मकः। वलिका ऊर्ध्वकेशेषु शम्भुसृष्टिसमुद्भवः॥ 9 ॥ (देवताओं को इस आश्वासन के बाद) भगवान् विष्णु परमेश्वर जल के तालाब में नाक से आगे पवन की फुफकार छोड़ते हुए अपने आयाल के ऊँचे-ऊँचे केशों सहित भगवान् शिव की सृष्टि में उत्पन्न हुए। अधरैश्चाधकोद्भूतं ? दंष्ट्रायां शैलसम्भवः। सरस्वती च जिह्वायां तालुकेऽमरकोटयः ॥ 10 ॥ ग्रीवायां सुरसङ्घाश्च ओष्ठयोश्चासुरास्तथा। कपाले कार्मुककरश्चन्द्राकौ चेव नेत्रयोः ॥ 11 ॥ कर्णयोश्चैव गन्धर्वास्त्रिकोटिः सार्धमस्तके। पृष्ठोपरि तथा मेरुर्लिङ्गाकारेण संस्थितः ॥ 12 ॥ अधरों के नीचे से निम्न भाग उद्भूत होता जान पड़ा तो दाढ़ों से पहाड़ बने हों, ऐसी छवि थी। जिह्वा में सरस्वती को बसाकर और तालू में करोड़ों देवताओं को बसाकर, गले में देवताओं के समूहों को बसाकर और ओठों पर असुरों को
- मुहूर्ततत्त्व में आया है कि दिन के 15 मुहूर्तों के लिए दिनमान में 15 का भाग देकर एक मुहूर्त का घट्यात्मक मान निकाला जा सकता है। दिन के ये मुहूर्त-स्वामी क्रमशः निम्नलिखित हैं- 1. ईश, 2. सर्प, 3. मित्र, 4. पितृ, 5. वसु, 6. सलिल, 7. विश्वेदेव, 8. अभिजित् (विधि), 9. विधाता, 10. इन्द्र,
- इन्द्राग्नि, 12. राक्षस अथवा निर्ऋति, 13. अम्बुनाथ, 14. अर्यमा और 15. भग¬ अह्रीशः सर्पमित्रौपितृवसुसलिलं विश्वकौकश्च वज्रीन्द्राग्नी रक्षोम्बुनाथार्यमभगमथोर्ध्वेभिज्धान इष्टः । (मुहूर्ततत्त्व 1,
- विष्णुधर्मोत्तरपुराण में वज्र के प्रश्न पर मार्कण्डेय का कथन है- दिनरात्र्योस्समारम्भे ह्यर्धं भवति पार्थिव॥ तयोर्मध्ये च सततमभिजित्त्वाभिधीयते। तयोर्द्वित्वान्मया त्रिंशन्मुहूर्ता विहितास्तव॥ नक्षत्रैर्दैवतैस्तेषां देवताः परिकीर्तिताः। केवलं क्रमहानिश्च क्रमस्तेषां निबोध मे॥ रौद्रस्सार्पस्तथा मैत्रः पैत्रो वासव एव च। आप्यो वैश्वस्तथा राजन्केश्वरः शक्रदैवतः॥ ऐन्द्राग्नेयो नैर्ऋतस्तु वारुणश्च महीपते।
सूत्र-२५ 117 बसाकर, कपाल में धनुषाकार को, चन्द्रमा व सूर्य को नेत्रों में धारण करके, कानों और मस्तक में साढ़े तीन करोड़ गन्धर्वों को, पीठ पर और मेरु पर्वत को लिङ्गाकार में स्थापित किया। पञ्चवक्त्रो महादिव्यो व्योमव्यापी सदाशिवः। तस्य प्रदक्षिण मेरुर्भुवनानि चतुर्दश₁₄ ॥ 13 ॥ स्थिताश्चैकादश₁₁ रुद्रा द्वादशादित्यकास्तथा₁₂ । चतुर्दशमन्वश्च₁₄ त्रिदशास्स्युरनेकधा ॥ 14 ॥ (इसी प्रकार) यह महान वराह का स्वरूप एक प्रकार से महादिव्य व्योम व्यापी सदाशिव का ही पञ्चवक्त्र स्वरूप है जिसके मेरु शिखर के चतुर्दिक चौदह भुवन प्रदक्षिणा करते हैं। इस वराह अवतार के स्वरूप में एकादश रुद्र और द्वादश आदित्य, चौदह मनु और अनेक देवता अवस्थित हैं। उभयोर्गिरिगोत्राश्च भुजयोः शैलजास्तथ। कर्णिकायां च संसारो मणिबन्धे महोत्कटाः ॥ 15 ॥ इन्द्रः खुरेषु गन्धर्वाः क्षुररन्ध्रुषु पन्नगाः। क्षुराग्रे चाश्विनौ देवौ जानुसन्धौ च रुग्व्ययः ॥ 16 ॥ अहिला( ?जा ) हृदयदेशे जठरे जगतो धृतिः। कुक्षौ ससार्णवाः प्रोक्ताः पुच्छे सृष्टिकरस्तथा ॥ 17 ॥ भगवान् वराह की दोनों भुजाओं में गिरिगोत्रा, पहाड़ों का समूह तथा शैलजा पहाड़ी चोटियों का समूह स्थित है। श्रीवराह के कानों में और कलाइयों में महोत्कट संसार स्थित है। उनके पाँवों के खुरों में इन्द्र और गन्धर्वों का वास है जबकि खुरों के मध्य में रन्ध्र, रिक्त स्थान में पन्नग-सर्पों का वास है। खुरों के अग्रभाग में अश्विनीकुमारों का वास है। जङ्घा के सन्धि में सभी रोगों का नाश करने वाले तत्त्वों का वास है। अहिला (जा) साँपों के वंशज वराह के हृदयदेश में और समस्त जगत को वराह ने अपने पेट में धारण कर रखा है। श्रीवराह के दोनों कुक्षों में सातों महासागरों का वास कहा है और श्रीवराह की पुच्छ में सृष्टिकार ब्रह्मा का वास है। तदूर्ध्वं कूर्मरूपं तु कूर्मोर्ध्वे गरुडो मतः। पञ्चद्वे₂₅ तत्त्वानि यतः स्मृतः सृष्टिसमुद्भवः ॥ 18 ॥ पञ्चतत्त्वोद्भवा सृष्टिः ख्यातः संसारसागरः । एवमाद्योद्भवो देवः संसाराच्च समुद्धरेत् ॥ 19 ॥
118 अपराजितपृच्छा पापात्समुद्धरेद्येन लीलया धार्यते महीम् । खुणमध्यगतो यस्य मेरुः खुणरखुणायते ॥ २० ॥ इससे ऊपर कूर्म रूप है और कूर्म के ऊपर गरुड़ माना गया है। इससे आगे पच्चीस ( पञ्च द्वे 5 × 5 = 25 ) तत्त्व कहे गए हैं जिनसे सृष्टि उत्पन्न हुई है। यूँ पञ्चतत्त्वों से इस सृष्टि में संसार, सागरादि की उत्पत्ति विख्यात् है। उसी आदिकाल में उत्पन्न होने वाले संसार का श्रीवराहदेव ने बड़ी लीला से अर्थात् खेल-खेल में आसानी से मही अर्थात् पृथ्वी को धारण करके पाप से समुद्धरित किया। पातालं यस्य कुक्षौ सकलशिखरिणो मन्दरो मेरुकाद्याः दंष्ट्राग्रे यस्य लग्ना त्रिभुवनसहिता मेदिनी सागरान्ता । आरक्ते यस्य नेत्रे सुरभिसुरदितं घर्घरं यस्य काले द्वौ कर्णौ भुजगदृष्टि कपट तनुकृत ? पातु वः श्रीवराहः ॥ 21 ॥ श्रीवराह के कुक्षों में पाताल के समस्त गिरि शिखिर मन्दराचल, सुमेरु आदि का वास है और श्रीवराह के दाँतली में त्रिभुवन सहिता यह सागरान्त महि-मेदिनी टिकी हुई है, लगी हुई है। श्रीवराह के लाल-लाल नेत्रों में सुरभि, सुर व दैत्य ( ? ) बसते हैं और उनके घर्घर शब्द में, गुरनी में काल का वास है। दोनों कान ऐसे फैले हैं मानो फन फैलाई हुई भुजङ्ग की दृष्टि हो। इस प्रकार के कपट तनु, छलिया रूप वाले श्रीवराह हमारी रक्षा करें।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वराहावतारनिर्णयाधिकारो नाम पञ्चविंशं सूत्रम् ॥ 25 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वराहावतार निर्णय अधिकार नामक पचीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 25 ॥
- मत्स्यपुराण में यज्ञवराह का स्वरूप इस प्रकार आया है— वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश् चितीमुखः । अग्निजिह्वो दर्भलोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः । अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिविभूषणः ॥ आज्यनासः स्रुवतुण्डः सामघोषस्वनो महान् । सत्यधर्ममयो श्रीमान् कर्मविकर्मसत्कृतः ॥ प्रायश्चित्तनखो घोरः पशुजानुर्मखाकृतिः । उद्गीथहोमलिङ्गोऽथ बीजौषधि महाफलः ॥ वाव्यन्तरात्मा यज्ञास्थितिविकृतिः सोमशोणितः । वेदस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यविभागवान् ॥ प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरन्वितः । दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान् ॥ उपाकर्मौष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः । नानाछन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः । छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छितः ॥ ( मत्स्य आनन्द आश्रम संस्करण पृष्ठ २४० (१३-२८)।
सूत्र-२६ 119 नृसिंहवामनावतारो नाम षड्विंशं सूत्रम् ॥ २६ ॥ अपराजित उवाच - हिरण्यकशिपुर्घोरो जातः कस्मादुपायतः । अफलं वर्धितं केन ? कथयस्व प्रसादतः ॥ १ ॥ अपराजित बोले - महाघोर दुर्दान्त हिरण्यकशिपु किस उपाय से उत्पन्न हुआ ? हे तात ! कृपा करके इस बारे में कहिए कि इससे क्या-क्या अफल-निष्फल कार्य हुए। विश्वकर्मोवाच - हिरण्यकशिपुं पूर्वं कथयिष्यामि साम्प्रतम् । महोत्कटश्च येनाऽसाववध्यो देवदानवैः ॥ २ ॥ तेनस्ववशमानीताः देवासुरनरोरगाः । ससुतं वैष्णवं दिव्यं विष्णुपादसुचिन्तकम् ॥ ३ ॥ हिरण्यकशिपुर्हन्तुं प्रह्लादं प्राञ्जलिं सुतम् । कृत्वा चैवाग्निमध्यस्थं पर्वताद् विनिपातितम् ॥ ४ ॥ निबध्य च जयस्तम्भे शुभं वै वज्रशृङ्खलैः । तेनाऽसौ स्तूयमानश्च विष्णुः स्तम्भार्दनार्चितः ॥ ५ ॥ विश्वकर्मा बोले - अब मैं पहले संक्षेप में हिरण्यकशिपु के बारे में कहता हूँ। इस महोत्कट, भयङ्कर असुर के द्वारा अनेकों देव-दानवों का वध हुआ। उसने समस्त देवता, असुर, मनुष्यों और नागों को अपने वश में कर रखा था। इस दुष्ट ने, विष्णु भगवान् के चरणों में भक्ति रखने वाले अपने दिव्य वैष्णवपुत्र को भी वश में करने के लिए अग्नि के मध्य में जलाने, ऊँचे पर्वत शिखरों से गिराने, बड़ी सुदृढ़ साँकलों से जय खम्भ से बाँधकर तरह-तरह के कष्ट दिए परन्तु प्रह्लाद खम्भे से बन्धे हुए अपनी अञ्जलियों को भगवान् विष्णु की स्तुति करने में जोड़े हुए प्रार्थना करते रहे। अथ नरसिंहावतार कालादीनां - त्रयोदश₁₃ लक्षाब्देषु गतेषु च कृते युगे । राधशुक्लचतुर्दश्यां₁₄ ज्येष्ठान्ते च मुहूर्तके ॥ ६ ॥ ऊर्ध्वं सिंहतनुं कृत्वा चाधो नरतनुं तथा । स्तम्भं संस्फोट्य तं घोरं सूदयिष्यति दानवम् ॥ ७ ॥
- 'वामनावतारो नाम षड्विंशं सूत्रम्' इति प्रकाशित पाठः।
120 अपराजितपृच्छा
जब कृतयुग के तेरह लाख वर्ष व्यतीत हो जाएँगे, तब वैशाख मास शुक्ला चतुर्दशी (राध¹शुक्ल चतुर्दशी), ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्तिम मुहूर्त में (मैं अवतार लूँगा)। मेरे देह के ऊर्ध्वभाग में सिंह का स्वरूप होगा और नीचे का भाग मानव स्वरूप में होगा। मैं उक्त विशाल स्तम्भ को फाड़कर विकराल रूप में निकलकर उस हिरण्यकशिपु को सूदयिष्यति — मारूँगा। प्रह्लादस्य तथा राज्यं विष्णुर्दास्यति भूतले। एकच्छत्रां स दत्तां च पालयेद्भूतधारिणीम् ॥ 8 ॥ (हे अपराजित!) भगवान नरसिंह का रूप धारण करने वाले विष्णु इस भूतल का राज्य प्रह्लाद को देंगे जो समस्त पृथ्वी का एक छत्र राज्य करके धरती का पालन करेंगे। नरसिंहवर्णनं — यं दृष्ट्वा नारसिंहं विक्रतनखमुखं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालम् पिङ्गाक्षं स्तब्धकर्णं हुतवहसदृशं कुञ्चिताग्रोऽग्रकेशम्। भीतास्ते दानवेन्द्रा असुरवरभटाः शस्त्रमुद्गीर्यहस्तात् हाहा किं किं किमेतत् क्षुभितजनपदः पातु वो नारसिंहः ॥ ९ ॥ जिस नारसिंह रूप को भयानक नख-मुख, तीक्ष्ण और कराल दाँतों, लाल- लाल आँखों, चकित खड़े कानों, भयानक हुताग्नि जैसा और सिर के अयाल भाग के भयानक रूप में बिखरे उठे हुए बालों को देखकर वे सभी दानवेन्द्र, असुर वीर जिनके हाथों में गदा रूपी शस्त्र धारण किए हुए थे, भयभीत होकर हाहाकार करने लगे और डर से काँपते हुए समस्त जनपद के लोग, यह क्या है? यह क्या है?? पुकारने लगे — ऐसे नरसिंह भगवान हमी रक्षा करें। यः स्तम्भाद् गर्जमानो गगडगडगडदू बालचन्द्रार्कदंष्ट्रः व्योमाभुव्याप्यमानः पपटपटपटत् पोट्यमानः शटाभिः। दंष्ट्राभिः खाद्यमानः ककहकहकहतू स्तूयमानः सुरेन्द्रैः निष्क्रान्तो हास्ययुक्तः ककहकहकहतू पातु वो नारसिंहः ॥ १० ॥ इति नृसिंहावतारश्चतुर्थः। जो स्तम्भ फाड़कर उसमें से गर्जन करते हुए गगड-गडगडद शब्द ध्वनि करते
- ग्रन्थान्तर में द्वादश माह के नाम पर्यायानुसार इस प्रकार आए हैं— मधु-चैत्र, माधव-वैशाख, ज्येष्ठ- शुक्र, शुचि- आषाढ़, नभ-श्रावण, नभस्य-भाद्रपद, इष- आश्विन, ऊर्ज-कार्तिक, सहा- मार्गशीर्ष, सहस्य-पौष, तप-माघ, तपस्य-फाल्गुन। ये क्रमानुसार चैत्रादि बारह महीनों के पर्याय हैं— मधुश्च माधवः शुक्रः शुचिश्चापि नभाद्वयः ॥ नभस्य इष ऊर्जश्च सहाख्यश्च सहाख्यश्च सहस्यकः । तपस्तपस्यः क्रमशश्चैत्रादीनां त संज्ञकाः ॥ (नारदसंहिता ३. ४1-४३)
सूत्र-२६ 121 हुए और उदित होते बालचन्द्र, द्वितीया के चन्द्र की तरह तीखे दाँतों वाले, भूमि से लेकर व्योम तक विस्तीर्ण पपटपटपटत् फटकारते हुए भरपूर बालों से युक्त, तीक्ष्ण दाढ़ों से चबाकर खा जाने की तैयारी में दाँतों को कटकटकटकटत् करते हुए भगवान् नरसिंह है— उनकी सुरेन्द्र आदि ने भी निष्प्रभ होते हुए स्तुति की। इससे भगवान् नरसिंह की हंसी छूट गई और वे ककहकहकहत् खिलखिलाकर हंस पड़े— ऐसे नरसिंह भगवान हमारी रक्षा करें। अथ पञ्चम वामनावतारणवर्णनम् — सन्धौ च समनुप्राप्ते त्रेतायाश्च कृतस्य च। अयुक्ताश्च नरा नार्यश्चाल्पशस्या तु मेदिनी ॥ 11 ॥ तीर्थात् पुण्यानि गच्छन्ति लोको दानानि वाञ्छति। दासन्ति विप्राः शूद्रेषु वैश्याश्च नृपपावनाः ॥ 12 ॥ (अब विष्णु के पाँचवें वामन अवतार का वर्णन किया जा रहा है। यहाँ प्रथमतः युगवर्णन है) त्रेतायुग एवं सत्युग के सन्धिकाल के आते-आते नर-नारी के परस्पर सम्बन्ध टूटने लगेंगे और धरती पर कृषि की उपज क्षीण हो जाएगी। ऐसे समय में तीर्थ क्षेत्रों से पुण्य का लोप हो जाएगा। लोग दान एवं भिक्षा की वाञ्छा से भट जाएँगे, विप्र लोग शूद्रों के दास होकर उनकी सेवा में तत्पर होंगे जबकि वैश्यगण भी राजाओं के आदेश बजाने में लगेंगे। भुञ्जते रौप्यपात्रेषु स्मरार्ता विप्रजातयः । नैव साङ्ख्यं नास्ति भाट्टं न दर्शनचतुष्टयम् ॥ 13 ॥ नृपा युद्धानि कुर्वन्ति भूम्यर्थे च परस्परम्। त्रिपादो वर्तते धर्मः पादश्चैकस्त्वकर्मणि ॥ 14 ॥ (तब) स्वर्णपात्रों में खाने वाले विप्रगणों का इतना पतन हो जाएगा कि उनको चाँदी के पात्रों में भोजन करना पड़ेगा, वे स्मरार्ता (कामदेव के वशीभूत) हो जाएँगे। उनमें कथा-पुराण वाचक भट्टगणों के गुण नष्टभूत होंगे और वे दर्शनचतुष्टय¹ को विस्मृत कर जाएँगे। राजा लोग ऐसे समय में अतिक्रमण करने के
- दर्शन चतुष्टय से आशय है— साक्षात्, पत्रिक (पत्राचार-जात), चित्र एवं स्वप्न। इनके प्रतिपाद्य भी चार हैं— हेय (त्याज्य), हेयहेतु (दुःखकारण), हान (दुःखनिवृत्ति), हानोपाय (दुःख से निवृत्ति के उपाय)। भाट्ट से यहाँ आशय नाट्यवृत्ति के उस तीसरे प्रकार से भी हो सकता है जिसके चार भेद हैं— संक्षिति (संक्षिप्त वस्तु रचना), सम्फेट (दो पात्रों के बीच सक्रोध सङ्घर्ष), वस्तूत्थापन (मन्त्रबल और मायाजाल से प्रस्तुत दृश्य) एवं अवपात (किसी पात्र के मञ्च पर उपस्थित होने से भगदड़ मचना)। (दशरूपक 2, 57-59)