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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

138 अपराजितपृच्छा वैष्णवावतारकीर्तन फलमाह — इदं जन्मरहस्यं तु कीर्तयिष्यन्ति ये नरः । सुलभश्च हरिस्तेषां नित्यं वै सर्वजन्मसु ॥ २२ ॥ ॐ नमो वासुदेवाय नमो नारायणाय च । नमः कृष्णायेतिमन्त्राः सर्वप्रापप्रणाशनाः ॥ २३ ॥ हरि के इस प्रकार के जन्म रहस्य को जो लोग गाते रहेंगे, उनको सभी जन्मों में भगवान् विष्णु सदा सुलभ होंगे। उन हरि को कीर्तन द्वारा पाने का उपाय 'ॐ नमो वासुदेवाय', 'ॐ नमो नारायणाय', 'ॐ नमः कृष्णाय' आदि मन्त्र हैं जो समस्त पापों का प्रणाशन करने वाले, शमन करने वाले हैं। शृणोति जन्मरहस्यं ब्रह्महा गुरुतल्पगः । स्त्रीबालघातकश्चैव सुरापो वृषलीपतिः ॥ २४ ॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति। यः पठेत् परया भक्त्या विष्णुजन्मप्रकीर्तितम् ॥ २५ ॥ मर्त्यलोकपरिभ्रष्टो विष्णुलोकं स गच्छति। ईप्सितं लभते राज्यं स्वर्गे वा भूमिशासने ॥ २६ ॥ गतागता निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः । अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः ॥ २७ ॥ श्री हरि के इस जन्म रहस्य को भी सुनते रहेंगे, वे ब्रह्मघाती या गुरुतल्पगामी पापी स्त्रीघाती, बालघाती, सुरापान करने वाला और कुलटा स्त्री के पति भी क्यों न हो, सभी पापों से मुक्त होकर वे विष्णुलोक में जाएँगे। अतः जो भी परम् भक्तिपूर्वक इस विष्णु जन्म की कथा को पढ़ेगा, वह मर्त्यलोक में परिभ्रष्ट होने पर भी विष्णुलोक में ले जाने का अधिकारी हो जाएगा एवं पुनर्जन्म लेने पर वह अपनी इच्छानुसार चाहा हुआ भूमिशासन या स्वर्ग का राज्य प्राप्त करेगा। इस द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का जाप करने वाले को कोई ग्रहबाधा नहीं पहुँचा सकते, सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रहों की पूरी दशाएँ भी आई-गई हो जाती हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां विष्णोर्जन्मरहस्यदशावताराधिकारो नाम नवविंशं सूत्रम् ॥ २९ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विष्णु के जन्म रहस्य, दशावताराधिकार नामक उनतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥

सूत्र-३० 139 विष्णुवाक्योद्भवारण्ये श्रीसोमेश्वरनिर्णयो नाम त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३० ॥ विश्वकर्मोवाच - अथातोऽनन्तरं तत्र पर्वते गन्धमादने। आगतश्च स्वयं विष्णुर्जगदाह्लादकारकः ॥ १॥ उद्धृत्याम्ब्वर्थपात्रं तु त्वष्ट्राद्यैर्मुनिसत्तमैः। सुरासुरैः समस्तैश्च स्तूयमानं जगत्पतिम् ॥ २॥ स्थित्वासने महोत्सवे सिंहरूपायदलङ्कृते। प्रहृष्टं च जगन्नाथं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ३॥ विश्वकर्मा बोले - इसके बाद, गन्धमादन पर्वत पर जगत को प्रसन्न कर देने वाले भगवान् विष्णु स्वयं पधार गए और त्वष्टादि मुनि सत्तमों ने अपने कमण्डलों को हाथ में उठाकर और सभी सुरों व असुरों ने जगत्पति भगवान् विष्णु की स्तुति करने लगे। भगवान् जगन्नाथ को शङ्ख-चक्र-गदादि धारण किए हुए प्रसन्न मुद्रा में सिंह की आकृतियों से अलङ्कृत सिंहासन पर विराजमान करते हुए बड़ा महोत्सव मनाया। त्वष्टाद्याश्च मुनीन्द्राश्च हरिपाश्र्वे तु संस्थिताः। सिंहासने निविष्टं तमादितेजोभवं प्रभुम् ॥ ४॥ ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ ‘ॐ नमो नारायणाय ।’ ‘ॐ नमः कृष्णाय’ इति मूलमन्त्राः सर्वपापप्रणाशनाः ॥ तानुच्चार्य ॥ इसमें त्वष्टादि समस्त मुनिगण भगवान् विष्णु के पास में खड़े हो गए और उन आदि तेजोभव प्रभु को सिंहासन पर निविष्ट करके, आसीन करके ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’, ‘ॐ नमो नारायणाय’, ‘ॐ नमः कृष्णाय’ इत्यादि मूल मन्त्रों का उच्चारण आरम्भ किया जो सर्व पापों का नाश करने वाला है। दण्डवत् प्रणतो भूत्वा पृच्छति त्वपराजितः। दशावताराः श्रीविष्णोः कथिता विश्वकर्मणा ॥ ५॥ त्वष्टा चैव कथं देव कथं तस्य समुद्भवः। कस्मिन्कालेवतारश्च कथयस्व जगत्पते ॥ ६॥ इसी बीच विश्वकर्मा ने दशावतार ग्रहण करने वाले भगवान् विष्णु की ओर सम्मुख हुए कहा कि दण्डवत प्रणाम करके अपराजित यह पूछता है कि हे

140 अपराजितपृच्छा जगतपते ! त्वष्टा$^1$ कौन देवता है और उनका समुद्भव कैसे हुआ तथा उनका अवतार किस समय हुआ, यह कृपा कर कहिए। विष्णुरुवाच — सरस्वत्यर्णवाभ्यां च पुण्यप्रभास आश्रमः। प्रयतात्मा महातीर्थं गत्वा तु हरजन्मदम्॥ ७॥ दृष्ट्वा तु हरते पापं स्नात्वा देवत्वदायकम्। समागतः सोमराजो दृष्ट्वाश्रममथोत्तमम्॥ ८॥ (विश्वकर्मा के प्रश्न पर) भगवान् विष्णु कहने लगे— सरस्वती सागर$^2$ के पास प्रभास आश्रम का पुण्यक्षेत्र है। कोई यदि प्रयत्न करके उस महातीर्थ को जाए तो

  1. यहाँ त्वष्टा के सम्बन्ध में पूछा तो गया है किन्तु इस सूत्र में वर्णन नहीं है। द्राविड़ वास्तुग्रन्थ 'मानसार' में आया है कि ब्रह्मादि के समान विश्वकर्मा चार मुख वाले हैं। चारों मुखों में से पूर्वमुख विश्वभू कहलाता है। दक्षिणमुख विश्वविद कहलाता है। उत्तरमुख विश्वस्थ कहलाता है जबकि पश्चिम मुख विश्वसृष्टा कहलाता है। इन्हीं चारों मुख से पहले चार विश्वकर्मा हुए। पूर्वी मुख के विश्वकर्मा, दक्षिण से मय, उत्तर से त्वष्टा तथा पश्चिमी मुख से मनु हुए। विश्वकर्मा का विवाह इन्द्र की पुत्री से, मय का विवाह सुरेन्द्र की पुत्री, त्वष्टा का विवाह वैश्रवण की पुत्री और मनु का विवाह नल की पुत्री से हुआ। विश्वकर्मा के पुत्र स्थपति कहलाए। मय के पुत्र सूत्रग्राही, त्वष्टा के पुत्र वर्धकी और मनु के पुत्र तक्षक कहलाए। ये ही आदि स्थपति है— विश्वकर्मा चतुर्वर्णजाति ब्रह्मादिवर्णवत्। पूर्वोक्तवर्णं चत्वारि नामं वक्ष्ये पृथक् पृथक्॥ विश्वभूरिति नामैतत्पूर्ववक्त्रं प्रकीर्तितम्। दक्षिणे विश्वविद्वक्त्रं विश्वस्थश्च तथोत्तरे॥ पश्चिमे विश्वस्रष्ट्राख्यं वक्त्रमेवं चतुर्विधम्। एतेभ्यः प्रथमो जातो विश्वकर्मा चतुष्टयः॥ पूर्वानने विश्वकर्मा जायते दक्षिणे मयः। उत्तरस्य मुखे त्वष्टा पश्चिमे तु मनुः स्मृतः॥ उपयेमे विश्वकर्मा इन्द्रस्य तनयां तदा। मयः सुरेन्द्रतनयामुपयेमे त्वनन्तरम्॥ त्वष्टा वैश्रवणसुतामुपयेमे त्वनन्तरम्। मनुर्नलस्य तनयामुपयेमे तु तुर्यकम्॥ विश्वकर्माख्यनाम्नोस्य पुत्रः स्थपतिरुच्यते। मयस्य तनयः सूत्रग्राहीति परिकीर्तितः॥ त्वष्टुर्देव- ऋषिः पुत्रो वर्धकीति प्रकथ्यते। मनोः पुत्रस्तक्षकः स्यात्स्थपत्यादि चतुष्टयमये॥ (मानसार 1, 3-10) मानसार के तहत वास्तुशास्त्र प्रणेताओं में भी त्वष्टा का नामोल्लेख हुआ है— अगस्त्यः काश्यपश्चैव भृगुर्गौतमभार्गवाः॥ गालव इति ऋषयः प्रोक्ताः कर्षणायर्चनार्थकम्। तत्तत्तन्त्रवशात्सर्वं कुर्यात् षट् सम्पादस्पदम्॥ तत्तत्तन्त्रविपरीतं चेद् विपत्यं नित्यमावहेत्। अनुक्तं तत्र तन्त्रैस्तु ग्राह्यं दोषो न विद्यते॥ विश्वकर्मा च विश्वेश्र विश्वसारं प्रबोधकः। वृतश्चैव मयश्चैव त्वष्टा चैव मनुर्नलः॥ मानविन्मानकल्पश्च मानसारो बहुश्रुतः। प्रष्टा च मानबोधश्च विश्वबोधो नायकश्च तथा॥ (तत्रैव 1, 2-6)
  2. गुजरात में राजा सिद्धराज के समय में सरस्वतीपुराण का प्रणयन माना जाता है। इसमें सरस्वती के क्षेत्र में नाग जाति के बसी होने का विशेष विवरण मिलता है। यथा— एष उखर संगृह्य अन्धकूपान्महामनः। नागलोके स्वयं गत्वा नागान् सञ्जीवयिष्यति॥ (सरस्वती. अध्याय 15) स्कन्दपुराण के नागरखण्ड में चमत्कारपुर के पास सारस्वतह्रद का वर्णन है जहाँ स्नान के लिए आने वाले विप्रों को नागजन त्रास देते रहते थे। (स्कन्द. नागर. 114, 17-18-83) इसी प्रकार प्रभासक्षेत्र माहात्म्य में आया है— सरस्वत्यां ब्रह्मकुण्डेऽसंख्याता मुनयः स्मृताः। दशार्बुदसहस्राणि कोटित्रितयमेव च॥ ऋषयस्तत्र तिष्ठन्ति यत्र प्राची सरस्वती। ब्रह्महत्या गता यत्र शङ्करस्य च तत्क्षणात्॥ कायः सुवर्णतां प्रापं कपालं पतितं करात्। ज्ञात्वैवं

सूत्र ३० 141

हर, महादेव उसे नया जन्म प्रदान कर देते हैं। उस देवत्वदायक तीर्थ में स्नान करते ही और उसे देखने मात्र से समस्त पाप दूर हो जाते हैं। उस सर्वोत्तम आश्रम के अवलोकन मात्र से सोमराजा तुरन्त प्रकट हो गए। अथाश्रमवर्णनमाह— विविधैर्वनजैः कीर्ण तथा पुष्पैः समाकुलम्। सुरभितामृतोपेतं नानाफलैश्च सङ्कुलम्॥ ९॥ पारिजातप्रभृतिभिः कङ्कोलैश्चैव पादपैः। देवदारुभिराकीर्णं तथा वै रक्तचन्दनैः॥ १०॥ तालतमालाशोकैश्च रम्भाप्रियङ्गुचम्पकैः। पुन्नागनागबकुलैः पाटलैर्बिल्वचन्दनैः॥ ११॥ जातीतगुरुकुमुदानेकपुष्पैः सुपुष्पितम्। विविधैश्च तथा वृक्षैः शोभितं दिव्यमाश्रमम्॥ १२॥ वहाँ विविध प्रकार के वन पुष्पों के समूह थे जिनसे वह स्थान अमृत के समान सुरभित हो रहा था और वहाँ नाना प्रकार के फलों की भरमार थी। पारिजातादि स्वर्ग के वृक्ष और कङ्कोल के पौधे व देवदारु व रक्तचन्दन के पेड़ों से लकदक वह क्षेत्र ताल, तमाल, अशोक, रम्भा, केल, प्रियङ्गु, चम्पक, पुन्नाग, नाग, बकुल, पाटल (गुलाब) और बिल्व व चन्दन, जाती, तगर, कुमुद आदि अनेक प्रकार के पुष्पों से सुपुष्पित विविध वृक्षावलियों से वह दिव्य आश्रम सुशोभित था। विचित्रं हेमरचितं निर्मलं कुमुदेशवत्। विपुलजलं- ? स्फटिकशङ्खवेदी ? ॥ १३॥ तरङ्गभङ्गुरावर्तमुग्रं मीनैरनेकशः। शिशुमारैश्च नक्रैश्चाऽनन्तं दुर्गं शुक्त्यादिभिः॥ १४॥ योजनायुतविस्तीर्णं भीषणीयं ग्रहाकुलैः। भयावहं च गहनं गम्भीरावर्तव्याकुलम्॥ १५॥ इमं समुद्रतीरस्थं माहेन्द्रं विन्ध्यगामिनम्?। रम्याश्रमं प्रभासस्य प्रविष्टस्तारकाधिपः॥ १६॥ इसी प्रकार वहाँ विचित्र रूप से स्वर्ण से बनी हुई, शुद्ध विशाल कमल के


शङ्खिना पूर्वं कृतं तत्र महातपः॥ तुष्टः श्रीशङ्करो देवो लिङ्ग वासवरेण तु। कोटियज्ञफलं स्नाने प्राच्यां लिङ्गस्य पूजन॥ (स्कन्द. प्रभास. 5, 22-25)

142 अपराजितपृच्छा समान अर्थात् कमल दलों में राजा की तरह शोभित, विपुल जलराशि से पूर्व सरोवर में स्फटिक से शङ्ख की रचना जैसी वेदी बनी हुई थी। उस सरोवर में अनेकों मछलियाँ आतुरता से तैरती हुई उग्र तरङ्गों की चक्रियाँ बना रही थीं और उस सरोवर में अनेक शिशुमार (जलमानुष, एक प्रकार का मत्स्य), मगर, और बड़े सीप आदि भी थे। यह सरोवर एक युत (अरब) योजन विस्तार वाला और भीषण, भयङ्कर ग्राहादि जल-जन्तुओं से भरा हुआ, बहुत गहरा और बड़ी-बड़ी विशाल लहरों के भँवरों से उद्वेलित था। इस समुद्र के किनारे विन्ध्याचल पर्वत पर बने सुन्दर आश्रम में तारकाधिप महेन्द्र प्रभास प्रविष्ट हुए। प्रणिपत्य तदा देवं प्रभासं भुक्तिमाप्नुयात्। अस्माकमीश्वरं भक्त्या राधयामि च संयतः ॥ 17 ॥ तदाज्ञया चाश्रमेऽस्मिन् निष्ठाराध्यमहेश्वरम् । तदा लब्ध्वाश्रमं श्रेष्ठं दत्तं प्रभासतुष्टिदम् ॥ 18 ॥ (प्रभास ने) वहाँ प्रणाम किया। इस पर वहां के (महेश्वर) देव ने प्रभास को भुक्ति-मुक्ति प्रदान की। प्रभास ने कहा कि 'आप मेरे ईश्वर हैं और मैं आपकी संयत चित्त से भक्तिपूर्वक आराधना करता हूँ।' 'इस आश्रम में स्थित महेश्वर की निष्ठापूर्वक आराधना करो'— ऐसी आज्ञा के साथ ही यह श्रेष्ठ आश्रम प्रभास को प्रदान किया जिसे पाकर उसे परम शान्ति हुई। मन्वन्तरं शतं सार्धं सोमोऽकार्षीत् तपो नृपः । तोषयित्वा महादेवं प्रत्यक्षं शिवसम्भवम् ॥ 19 ॥ आह्लादितमना भूत्वा दृष्ट्वा च परमेश्वरम् । राजेन्द्र क्षिति कृत्वा तु निश्चलं देवसम्भवम् ? ॥ 20 ॥ इस आश्रम में एक सौ पचास मन्वन्तरों तक सोम राजा ने बड़ा ही कठोर तप किया जिससे उसने महादेव शिव को तप द्वारा सन्तुष्ट करके उनका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया। महादेव शिव स्वयं उस राजा के सामने प्रकट हुए। भगवान् महादेव शिव परमेश्वर को देखकर बड़े ही प्रसन्न मन वाला होकर उस राजेन्द्र सोम ने इस पृथ्वी पर भगवान् शिव के प्राकट्य को निश्चल (प्रतिमा रूप में साकार, स्थापित) किया। ईश्वर उवाच — तुष्टो ऽहं तव राजेन्द्र भक्त्या च परया त्वयि । वरं ब्रूहि च दास्यामि यथेच्छं तारकाधिप ॥ 21 ॥

सूत्र-३० 143 धर्मार्थकाममोक्षाणां ददामि यत्त्वदीप्सितम्। नासत्यं नान्यथा चैवं त्वद्भक्त्या रोहिणीपते ॥ 22 ॥ (इस पर) ईश्वर बोले— हे तारकाधिप सोमराज! मैं तुम्हारी पराभक्ति से परम तुष्ट हुआ हूँ अतः तुम कोई वर माँगो क्योंकि मैं तुम्हें यथेच्छ वर देना चाहता हूँ। हे रोहिणीपति सोम, चन्द्रराजा तुम्हारी पर भक्ति के फलस्वरूप जिस तुम्हारे चाहे हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कराने वाला वर मैं तुम्हें दे रहा हूँ, वह कभी भी असत्य नहीं होगा न ही किसी तरह अन्यथा होगा।¹ चन्द्र उवाच — अस्माकमात्मनः पार्श्वे मानसाङ्गं सुधार्यकम् ? । ममाभिधानतश्चैवाऽवतारस्तव साम्प्रतम् ॥ 23 ॥ (वर माँगते समय) चन्द्र बोले— हे प्रभु! मैं तो यह वर माँगता हूँ कि आप मेरे आत्मा के पास मानस अङ्ग धारण करके मेरे गात्र को ही अपना स्थान बनाते हुए तुरन्त अवतरित हों। देव्युवाच — शशाङ्क देवदेवेश तिलकत्ववाप्नुहि। अथातस्त्वं तत्तिलके तथा तिष्ठ मम प्रिय ॥ 24 ॥ (इस बीच पार्वती) देवी बोली— हे शशाङ्क! मैं तुम्हारे मस्तक पर देवदेवेश महादेव शिव का तिलक लगा देती हूँ जिससे ज्योंहि यह तिलक तुम्हारे मस्तक पर लगेगा, त्योंहि मेरे प्रिय स्वामी महादेव शिव तुम्हारे तिलक में स्थित हो जाएँगे। ईश्वर उवाच — त्वयेप्सितं वरं यच्च प्रयच्छामि हितैषिणे। इच्छयात्ममुखनैवाऽसारसंसारमोक्षदम् ॥ 25 ॥ निश्चितात्मसुखैरेवं शान्तावस्था मुखबोधिनी ? । स्वप्रावस्थायां न सौख्यमात्मनो राहिणीपतेः ॥ 26 ॥ स्वप्रावस्थो यदा दृष्टो भस्मोद्धूलिततापसः। स्कन्धारुह्य हतं चौरै ? अस्मत्त्वयि विनिवेदयेत् ? ॥ 27 ॥

  1. आद्य जगद्गुरु शङ्कराचार्य ने सोमनाथ की आराधना इस प्रकार की है— सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावंतसम्। भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्यते ॥ (द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्र)

144 अपराजितपृच्छा ईश्वर ने कहा कि तुम्हारे माँगे हुए जिस वरदान को मैं हित भावना से दे रहा हूँ, वह इस असार संसार से मुक्ति दिलाने वाला है। मेरे मुख से जो यह ज्ञान तुम्हें मिला है, यह निश्चित ही आत्मसुख एवं शान्तावस्था और हे रोहिणीपति सोम! तुम्हारी आत्मा को भी सुख देने वाला है परन्तु तुम्हारी स्वप्नावस्था में नहीं, जागृत रहने पर ही यह सम्भव है। यदि स्वप्नावस्था में तुम्हें भस्म-धूलि लगाए हुए कोई तपस्वी दिखाई पड़ जाए जो किसी मारे गए चोर को अपने कन्धे पर उठाए हुए हो और अपने बारे में तुम्हें ऐसा कहे कि- तापस उवाच - अहं सोम जगत्कर्ता वैरं स्यात्तु लङ्काधिपे। त्वद्भक्तयाऽऽगतोऽहं वत्स चन्द्रनामाऽवतारतः ॥ २८ ॥ योगावस्थास्थितस्वेवं चिन्तात्मा रोहिणीपते। उदकोल्लङ्घनं कृत्वा ऐन्द्रीं गतो दिशां प्रति ॥ २९ ॥ (उक्त तापस कहे कि) - हे सोम! मैं ही इस जगत का कर्ता भगवान् विष्णु हूँ जिसका लङ्काधिपति रावण से वैर हो गया था वही मैं तुम्हारी भक्ति से हे वत्स! चन्द्र नामावतार से आ गया हूँ। हे रोहिणीपति! इस प्रकार की योग स्थिति में चिन्तात्मा होकर समुद्र को लाङ्घकर मैं, पूर्वदिशा की ओर गया। कैलासाल्लिङ्गमानीय दानवेन्द्रो लङ्काधिपः। आगमिष्यामि ? क्षेत्रैषु तस्य वाचा प्रबलोद्भवम् ? ॥ ३० ॥ ददामि ते त्वहं सोम सोमे वदति दुर्धरः। क्षणार्धं तु धृतं विप्र यदाहं भो क्षितौ ततः ? ॥ ३१ ॥ गृहीत्वा सोमराजेन्द्रो लङ्कावधि वनैः स्थित ?। उक्तं लिङ्गं तु राजेन्द्र क्षितौ भूत्वा तु निश्चलम् ? ॥ ३२ ॥ वह दानवेन्द्र लङ्कापति रावण कैलाश पर्वत से शिवलिङ्ग लाकर समस्त क्षेत्र में उसकी प्रबल वाचा का उद्घोष करेगा कि मैं आ गया हूँ। हे सोम! वही शिवलिङ्ग मैं तुम्हें देता हूँ और वह सोम को बड़े ही भयानक उद्धत ढंग से कहता है कि हे विप्र! थोड़ी देर के लिए इस शिवलिङ्ग को थामे रहो जब तक कि मैं पृथ्वी पर खड़ा रहूँ। उसे ग्रहण करके सोम राजेन्द्र तब तक ठहरा रहा जब तक लङ्काधिपति रावण उस वन में स्थिर रहा और उसके आने की अवधि तक प्रतीक्षारत रहा परन्तु जब रावण बड़ी अवधि तक नहीं आया तो शिवलिङ्ग को सोम राजेन्द्र ने धरती पर रख दिया और निश्चल अर्थात् वहीं पर प्रतिष्ठित कर दिया।

सूत्र-३० 145 पूजितं लिङ्गराजेन्द्रं लङ्कावधि स्वस्थचेतसा ? । सोमाभिधानदेवत्वं सोमनाथ इति श्रुतम् ॥ ३३ ॥ शशाङ्कं मुकुटे धृत्वा तन्नाम शशिभूषणः । ईश्वरः सोमनाथाख्योऽवतरितः सोमेश्वरः ॥ ३४ ॥ जब तक लङ्काधिपति रावण के आने की अवधि हो, तब तक उसकी प्रतीक्षा में वह सोमराजा बड़े स्वस्थचित्त से उस शिवलिङ्ग राज की पूजा में रहे। इसलिए सोमराज राजा के द्वारा पूजित होने के कारण शिव वहाँ सोमाभिधान देवत्व के रूप में सोमनाथ नाम से विख्यात् हुए। इस प्रकार चन्द्रमा को अपने मुकुट में धारण करके और उसके ही नाम से शशिभूषण अर्थात् सोमनाथ नाम धरकर स्वयं ईश्वर शिव ही सोमनाथ कहलाकर सोमेश्वर के रूप में अवतरित हुए हैं। तदा सुरतरोर्वत्स प्रभासे भक्तिस्वागतः । जगन्नाथः सोमनाथस्त्रैलोक्ये चाऽपि दुर्लभः ॥ ३५ ॥ आरामनगरे रम्ये जगदाह्लादकारकः । जगन्नाथः सोमनाथस्त्रैलोक्ये चाऽपि दुर्लभः ॥ ३६ ॥ तब से ही हे वत्स! यह सुरतर देव प्रभास क्षेत्र में भक्ति के स्वागत से जगन्नाथ सोमनाथ से आए हैं जो तीनों ही लोकों में दुर्लभ है। अस्तु, यह सदा ध्यान में रखना चाहिए, बाग-बगीचों में, सुन्दर नगरों में ऐसे जगत को आनन्द प्रदान करने वाले जगन्नाथ सोमनाथ तीनों लोकों में भी दुर्लभ हैं। नाम्ना कैलासनगरे सोमनाथो महेश्वरः । संसारतारणो देवः संसारपाशछेदनः ॥ ३७ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां वाञ्छितार्थफलप्रदम् । सर्वतीर्थ महोत्साहं स्वर्गादिभोगभुक्तिदम् ॥ ३८ ॥ कैलास नामक नगर में भी सोमनाथ नाम के महेश्वर देव हैं जो कि संसार से तारण करवाकर संसार में पुनरागमन के पाश को ही काट देते हैं। ये सोमनाथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के वाञ्छित फल के दाता हैं और समस्त तीर्थों में सबसे महान और स्वर्गादिक भोग और मुक्ति प्रदाता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां विष्णुवाक्योद्धवारण्ये श्रीसोमेश्वरनिर्णयाधिकारो नाम त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३० ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विष्णु वाक्यानुसार अरण्य में उद्धूत श्रीसोमेश्वर निर्णय अधिकार नामक उनतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥

146 अपराजितपृच्छा विष्णुवाक्योद्भवसोमनाथोक्तद्वादशशिवरात्रिं निर्णयो नामैकत्रिंशं सूत्रम् ॥ ३१ ॥ विष्णुरुवाच — ततश्चानन्तरं वत्स प्रभासे भुक्तिमुक्तिदे। कृत्वा सोमेश्वरे भक्तिं पूजा स्यात्तु महोत्सवः ॥ १ ॥ चन्दनागुरुकङ्कोलकर्पूरैः कुङ्कुमादिकैः । पञ्चामृतादिस्नानैश्च धूपाद्यैश्च सुगन्धिभिः ॥ २ ॥ मन्त्रस्तोत्रगीतवाद्यैर्नृत्यैश्च सुरयोषिताम् । इन्द्राद्याश्च सुराः सर्वे ब्रह्माद्याश्च मुनीश्वरः ॥ ३ ॥ विष्णुश्च भगवान् देवो मरीचिः काश्यपो गणाः । सूर्याद्याश्च ग्रहाश्चैव तथा चैवं गणोत्तमाः ॥ ४ ॥ अष्टौ च वसवः सिद्धा वासुक्याद्याश्च पन्नगाः । पृथिव्यां यानि तीर्थानि पार्थिवाश्चैव भूतले ॥ ५ ॥ पातालस्वः सप्तके च पृथिव्यां सप्तकं तथा । आनीताश्च त्रयो लोकाः सुरासुरनरोरगैः ॥ ६ ॥ प्रभासेन कृता पूजा देवदेवजगद्गुरोः । तुष्टः प्रभासं देवेशः पुत्रत्वं समुपागमत् ॥ ७ ॥ विष्णु बोले — हे वत्स! इसके उपरान्त ही भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाले प्रभास क्षेत्र में भगवान् सोमेश्वर की भक्तिपूर्वक पूजा करके महोत्सव होने लगे। चन्दन, अगरु, कङ्कोल, कर्पूर, कुङ्कुम और पञ्चामृत आदि से स्नान, धूप, सुगन्धित द्रव्यों से, मन्त्र-स्तोत्र, गीत-वाद्य-नृत्यों से देवाङ्गनाएँ और इन्द्रादि देवगण, ब्रह्मादि मुनीश्वर, भगवान् विष्णु देव, मरीचि, काश्यप गण, सूर्यादि सभी ग्रह और ऐसे ही अनेक उत्तम गणों और आठों वसु, सिद्धगण, वासुकि आदि समस्त नाग पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ क्षेत्र और भूतल पर जितने भी राजा, सातों पातालों, सातों पृथ्वी मण्डलों और तीनों लोकों के सुर-असुर-नर और नागों को निमन्त्रित करके प्रभास क्षेत्रवासियों ने देव देव जगद्गुरु महेश्वर की पूजा की जिससे सन्तुष्ट होकर देवेश भगवान् शिव महेश्वर ने प्रभास को पुत्रत्व प्रदान किया। वाचस्पतेर्भागिनेयं वसुहृन्नन्द्रदायकम्। प्रोवाच वचनं पुत्र एकादश ममांशकाः ॥ ८ ॥

सूत्र-३१ 147 सोमनाथः प्रभासश्च कर्दमः शशिभूषणः। निष्कदाख्यः सहस्राक्ष ऋणमुक्तिः पापान्तकः ॥ ९ ॥ अर्कस्थाल्यमनार्कस्वरं ? तवपुत्रा एकादश । एकादशैते रुद्राक्ष प्रभासक्षेत्रसम्भवाः ॥ १० ॥ इस प्रकार बृहस्पति के भानजे और वसु के हृदय को आनन्द देने वाले उनके पुत्र प्रभास को भगवान् शिव महेश्वर ने वचन दिया कि तुम्हारे ग्यारह पुत्र होंगे जो मेरे ही अंशरूप होंगे। इनके नाम होंगे— 1. सोमनाथ, 2. प्रभास, 3. कर्दम, 4. शशिभूषण, 5. निष्कद, 6. सहस्राक्ष, 7. ऋणमुक्ति, 8. पापान्तक, 9. अर्कस्थाली, 10. अनार्क और 11. स्वर। ये तुम्हारे ग्यारह पुत्र कहलाएँगे। ये सभी प्रभास क्षेत्र में उत्पन्न एकादश रुद्रों के ही समान समझें।¹ विश्वकृद् विश्वकर्मा च त्वष्टा स्याद् देववर्धकः। भूर्भुवर्भुवनेशश्च तथा भुवनदेवकः ॥ ११ ॥ पुनरुच्चार्य नामानि विश्वेशः त्रिदशेश्वरः। विश्वश्च विश्वनिरतस्स्वयं च सृष्टिकोद्भवः ॥ १२ ॥ नासत्यावश्विनौ दस्रौ प्रोक्तौ देवचिकित्सकौ । जगत्कर्ता च रुद्रश्च प्रभासो वसुनन्दनः ॥ १३ ॥ सृष्टा च सर्वशिल्पानां जगन्नेत्रस्तदुद्भवः। चतुर्दश्यां समुत्पन्नः स्त्रष्टा विश्वपतिस्तथा ॥ १४ ॥ कार्तिक्यां कृष्णपक्षे तु दीपोत्सवसमुद्भवः। महोत्सवास्तथा पञ्च तृतीयो ²यावतीदिनी ॥ १५ ॥ स्वयं साक्षाद् रुद्रमूर्तिर्विश्वकृद् विश्वशेखरः। विश्वकृद्, विश्वकर्मा, त्वष्टा, देववर्धकी, भूर्भुवः भुवनदेव, भुवनदेवक— इन नामों को पुनः कहते हुए विश्वेश, त्रिदशेश्वर, विश्व, विश्वनिरत और सृष्टिकोद्भव, नासत्य, अश्विनी, दस्र, देव चिकित्सक, जगतकर्ता, रुद्र, प्रभाव, वसुनन्दन, सृष्टा और सभी शिल्पियों के जगतनेत्र³ स्वरूप आपकी उत्पत्ति चतुर्दशी को हुई। कार्तिकमास में

  1. इन्हीं से सोमपुरा शिल्पियों की एकादश गोत्रों का प्रवर्तन माना जाता है।
  2. 'यावनोदिनी ?' प्रकाशित पाठः। शब्दकल्पद्रुम में 'यावतिथः' शब्द के लिए कहा है— यावत्+ तस्य पूरणे डट्। ऐसे में मनुस्मृति का यह वचन प्रमाण है— आद्याद्यस्य गुणांस्त्वेषामाप्नोति परःपरः। योयो यावतिथश्चैषां सस तावद्गुणः स्मृतः ॥ (मनु. 1, 20)
  3. ये विश्वकर्मा के नाम हैं। विश्वकर्मापुराण में विश्वकर्मा के सौ नामों की सूची है। यह यहाँ प्रासङ्गिक ही

148 अपराजितपृच्छा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उत्पत्ति हुई तब हे विश्वपति ! दीपोत्सव मनाया गया और अन्य महोत्सव रूप में पाँच तृतीया भी अगली तिथि (के पूर्ण अथवा उदयव्यापिनी) सहित मानी गई है। आप स्वयं साक्षात् रुद्रमूर्ति विश्वकृत और विश्वशेखर है। विश्वकर्मोवाच — दीपोत्सवः कथं देव किमर्थश्च तदुद्भवः। सुरोरगासुरनराः कुर्वन्ति कथमुत्सवम्॥ 16 ॥ विश्वकर्मा बोले — हे प्रभु ! दीपोत्सव क्या है और इसका प्रचलन किसलिए है? देवता, नाग, असुर और मानवगण यह उत्सव कैसे मनाते हैं, सो कहिये। ईश्वर उवाच — द्वादश₁₂ दीपोत्सवानां श्रेष्ठाः स्युः कार्त्तिकादितः। शिवरात्रयो द्वादश व्रतानामुत्तमा मताः॥ 17 ॥ आद्या मार्गशिरे कृष्णचतुर्दश्यां तिथौ भवेत्। त्रयोदश्यामेकभोजी ह्युपोष्या च चतुर्दशी॥ 18 ॥ स्नानं कृत्वा चोदकेन यस्तिष्ठेलिङ्गमाश्रितः। दिनान्ते च निशाप्राप्तौ कुर्याद् वै दन्तधावनम्॥ 19 ॥ ईश्वर बोले — कार्त्तिकादित¹ या कार्तिक से आरम्भ होने वाले बारह (मासों के) दीपोत्सव श्रेष्ठ है और बारह शिवरात्रियों को व्रतों के लिए उत्तम माना गया है। होगी— अज, अतुल, अधिकर्मिक, अधिनायक, अधिष्ठाता, अधीश्वर, अभिधेय, अभिनन्द्य, अभिरक्षक, अभ्युदयकारी, अमन्द, अर्चनीय, आढ्यङ्कुर, आदिकर, आदिकर, आनन्त्य, आनन्दन, आयःशूलिक, आराधनीय, ईरेश, ईक्षक, ईश्वर, उच्छण्ड, उत्तमश्लोक, उत्पादक, उद्यमी, एकाक्षर, एकान्त, ऐकात्म्य, ऐश्वर्यवन्त, ओजस्वी, औपमिक, क, कष्टक विशोधक, कल्याणक, कार्मुक, कालाध्यक्ष, कालक्ष, कीर्तिकीय, कुशाग्रबुद्धि, कृतकार्य, कृताभरण, कृतायास, कृतधी, कृतप्रतिज्ञ, कृतलक्षण, कृतसङ्कल्प, कृतहस्त, कृती, कृत्य, कृपालु, केवक, केलिमुख, कौतुकप्रिय, क्रतुप्रिय, क्रतुपति, क्रियापटु, क्वाचित्क, क्षन्ता, क्षिप्रकारी, ख्यातिप्राप्त, गणितज्ञ, गण्डकघ्न, गमनीय, गुणी, चक्रवर्ती, चक्री, चक्षुर, चण्ड, चण्डविक्रम, चारक, चित्रकार, चिन्मय, छत्वरक, जगतीश्वर, जगत्स्त्रष्टा, जनाश्रय, जागरूक, जिष्णु, तक्षक, तितिक्षु, तक्षिणकर्मी, त्यागी, त्रिकालविद्, त्वष्टा (त्वष्ट्र), दक्ष, दाता, दिव्य, दिष्णु, दृस, देववर्धिक , धृतात्मा, नन्दक, नमस्य, नित्य, निपुण, नियामक, निरज, पटु, पारङ्गत, पृथु, ब्रह्मवत्, विश्वात्मा, विश्वकर्मा, सर्वेश्वर और सृष्टिकर्ता। (शिल्पशास्त्रम् : सम्पादक-अनुवादक : श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, 2008 ई., भूमिका, पृष्ठ 15)

  1. यहाँ कार्त्तिकादि वर्षारम्भ का सङ्केत है जो कि मेवाड़ के बाद गुजरात आदि में अद्यावधि प्रचलन में है। अन्यत्र चैत्रादि या श्रावणादि वर्षारम्भ किया जाता है। ग्रन्थ के 19वें सूत्र (14-15) में भी इसी क्रम से गणना है। विष्णु आदि पुराणों से ज्ञात होता है कि पूर्व गुप्तकाल तक नक्षत्रों की गणना कृत्तिकादित थी, वराहमिहिर ने प्रथमतः अश्वन्यादित गणना की। यहाँ बारह शैवव्रतों का विधान किया गया है।

सूत्र-३१ 149 मार्गशीर्ष मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि आद्या होती है और उसके लिए त्रयोदशी को एकासन रखे तथा चतुर्दशी को उसका पारणा करें। जल से स्नान करके शिवलिङ्ग के आश्रय में रहे और दिन के अन्त में आने पर दन्तधावन करें। ततः शिवालये गत्वा पुष्पधूपादिसंयुतः। पञ्चामृतैः स्नापयित्वा धूपैर्वै लेपनादिभिः ॥ २० ॥ पूजां कृत्वा त्रिरात्र्यन्तं स्तोत्रमन्त्रकगीतकैः । वादित्रैर्विविधैश्चैव स्वेच्छया चात्मशक्तितः ॥ २१॥ स्वयंभुवि तथा बाणे घाट्ये स्वगृहलिङ्गे । यामे यामे गते रात्रौ पूजां कृत्वा महोत्सवम् ॥ २२ ॥ इसके बाद शिवालय में जाकर पुष्प, धूपादि से संयुक्त होकर, पञ्चामृत और धूप लेपनादि से स्नान कराके अपने सामर्थ्य के अनुसार पूरी श्रद्धा से तरह-तरह के स्तोत्र मन्त्र, गीत आदि वाद्यों से तीन रात्रियों के अन्त तक पूजा करके स्वयंभुवि लिङ्ग अथवा बाणलिङ्ग या फिर घड़े हुए अपने-अपने घर में पूजार्थ रखे शिवलिङ्ग की रात्रि के प्रत्येक प्रहर बीतने पर पूजा करते हुए यह महोत्सव मनाया करे। शिवरात्र्योत्सवविधिं- शिवरात्र्युत्सवे चाल्यं शिवं स्तुत्वा समस्तकम्। पुराणश्रवणं कृत्वा दानं चैव समानयेत् ॥ २३ ॥ प्रतियामोत्सवं कृत्वा स्वगृहं भावतो व्रजेत्। दन्तधावनस्नानार्चाः कृत्वा चैव महोत्सवम् ॥ २४ ॥ अग्निपूजां ततः कृत्वा दत्त्वा चाहुतिपञ्चकम्। द्वे द्वे कृत्वा मण्डले च बाह्ये मध्ये गृहेऽथवा ॥ २५ ॥ आत्मपादौ च प्रक्षाल्य तापसानां तथैव च। भुक्तिस्थानं गृहमध्ये मण्डलेषु प्रदीयते ॥ २६ ॥ शिवरात्रि के उत्सव में चलकर जाना चाहिए और शिव की स्तुति करके साष्टाङ्ग प्रणाम करें, पुराण (वायुपुराण, लिङ्गपुराण, शिवपुराणादि कथा) का श्रवण करना चाहिए। दानपुण्य भी करने चाहिए। प्रतिदिन भी अपने घर में हर प्रहर इसी

जाबालश्रुति के दस शैवव्रतों का वर्णन शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता के अध्याय 37 में आया है। वहाँ पर माघ मास के कृष्णपक्ष में शिवरात्रि तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। जिस दिन आधी रात के समय तक वह तिथि विद्यमान हो, उसी दिन उसे व्रत के लिए ग्रहण करना चाहिए। शुक्लपक्ष से मास का आरम्भ मानने से फाल्गुन मास की कृष्णपक्ष की त्रयोदशी माघ मास की कही जाती है।

150 अपराजितपृच्छा भाव का आचरण करता रहे। दन्तधावन, स्नान, अर्चा-पूजादि महोत्सव करता हुआ हवन करे और पञ्चक आहुति प्रदान करें। इसके लिए घर में, घर के मध्य में अथवा घर के बाहर दो-दो मण्डल बनाए। (भोजन से पूर्व) पहले अपने पाँवों का प्रक्षालन करे। तदोपरान्त इस अवसर पर आमन्त्रित तपस्वी साधुओं के पाँवों का प्रक्षालन करके उन्हें घर मध्य में भोजनशाला में भोज-प्राङ्गण में ले जाना चाहिए। सम्प्राश्य शिवनैवेद्यं ततो दद्यातु भोजनम्। भोजनानन्तरं दद्याद् दक्षिणां वस्त्रसंयुताम् ॥ २७ ॥ यज्ञोपवीतं पट्टं च पादुकां छत्रसंयुताम्। क्षमापयेच्छिवं देवं मठं सम्प्राप्य तापसम् ॥ २८ ॥ (इसके बाद) उन तपस्वीगणों को शिव-नैवेद्य का प्रसाद प्रदान कर बाद में सन्तोषपूर्वक भोजन करवाएँ और भोजनोपरान्त उन्हें वस्त्र के साथ दक्षिणा भी प्रदान करे। यज्ञोपवीत, पट्टवस्त्र, पादुका, छाता भेंटकर भगवान् शिव से क्षमापन करते हुए उन समस्त आगन्तुक तपस्वियों को उनके मठ तक आदरपूर्वक पहुँचाने जाए। द्वादशोत्सवनामानि — एवमुक्ता कृष्णचतुर्दशी मार्गशिरादिका। मार्गादि कार्तिकान्तं च तासां नामानि द्वादश₁₂ ॥ २९ ॥ इस प्रकार से मृगशिरादिक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के विषय में कहा गया है। यहाँ कहे गए मार्गादि से कार्तिकान्त तक आने वाले बारहौं चतुर्दशी उत्सवों (शैवव्रतों) की नामावली इस प्रकार है— शिवा शान्ता सिद्धिदा च जया चैव मनोरमा। कान्ताह्लादा च सौम्या च शुभा स्यात्तु मणिप्रभा ॥ ३० ॥ विश्वा विश्वकृदुद्भावा चेत्थं नामानि द्वादश₁₂। मार्गादि कार्तिकान्तं च कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ ३१ ॥ (1.) शिवा, (2.) शान्ता, (3.) सिद्धिदा, (4.) जया, (5.) मनोरमा, (6.) कान्ता, (7.) आह्लादा, (8.) सौम्या, (9.) शुभा, (10.) मणिप्रभा, (11.) विश्वा और (12.) विश्वकृदुद्भवा— ये मार्गादि से आरम्भ होकर कार्तिक के अन्त तक, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशियों के नाम हैं। अथ मासानुसार चतुर्दश्यां फलञ्च — मार्गपौषयोर्मध्ये च शिवा स्वर्गादिभोगदा। पौषमाघयोर्मध्ये च शान्ता कल्याणकारिणी ॥ ३२ ॥

सूत्र-३१ 151 मार्गशीर्ष और पौष के मध्य में पड़ने वाली शिवा संज्ञक चतुर्दशी स्वर्गादि भोग देने वाली है और पौष व माघ के मध्य पड़ने वाली शान्ता नामक चतुर्दशी कल्याणकारिणी है। माघफाल्गुनयोर्मध्ये सिद्धिदा सर्वसिद्धिदा। ख्याता जया फाल्गुनान्ते विजयस्वर्गराज्यदा ॥ ३३॥ माघ व फाल्गुन के मध्य में आने वाली सिद्धिदा चतुर्दशी समस्त सिद्धियों को देने वाली है और फाल्गुन के अन्त में आने वाली जय नाम से ख्यातिलब्ध चतुर्दशी विजय व स्वर्ग का राज्य देने वाली है। मनोरमा च चैत्रार्धे मनोरथप्रदायिनी। वैशाखज्येष्ठयोर्मध्ये कान्ता च स्वर्गभुक्तिदा ॥ ३४॥ चैत्र मास के मध्य में आने वाली मनोरमा चतुर्दशी मनोरथों को पूर्ण करने वाली और वैशाख व ज्येष्ठके मध्य में आने वाली कान्ता चतुर्दशी स्वर्ग और मुक्ति देने वाली कही गई है। ज्येष्ठाषाढयोर्मध्ये च आह्लादाऽऽह्लाददायिनी । आषाढार्धे तथा ख्याता सौम्या देवत्वदायिनी ॥ ३५॥ ज्येष्ठ व आषाढ़ के मध्य में आने वाली आह्लादा चतुर्दशी आह्लाद देने वाली है जबकि आषाढ़ के आधे में आने वाली सौम्या चतुर्दशी देवत्व देने वाली के रूप में प्रसिद्ध है। श्रावणार्धे शुभा ख्याता तेजः सौभाग्यवर्द्धनी। मणिप्रभा भाद्रपदे संसारे च मणिप्रदा ॥ ३६॥ श्रावण मास के आधे में पड़ने वाली शुभा चतुर्दशी तेज और सौभाग्यवर्द्धिनी के रूप में विख्यात है और भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी मणिप्रभा के नाम से संसार में मण्यादि रत्न प्रदान करने वाली है। आश्विने च तथा मासे विश्वा त्रैलोक्यतोषदा । कार्तिके कृष्णपक्षे तु तथा विश्वकृदुद्भवा ॥ ३७॥ इसी प्रकार आश्विन मास में पड़ने वाली विश्वा चतुर्दशी तीनों ही लोकों में सन्तुष्टि प्रदान करने वाली है जबकि कार्तिक मास के कृष्णपक्ष में पड़ने वाली चतुर्दशी को विश्वकृदुद्भवा कहा गया है। तास्तु समस्तदेशेषु दीपोत्सवसमुद्भवाः । कैलासे च पुरे रम्ये विख्याताश्च महीतले ॥ ३८॥

152 अपराजितपृच्छा इन सभी चतुर्दशियों में समस्त देशों में दीपोत्सव मनाए जाते हैं जो कैलाश में, नगरों में और पृथ्वीतल पर सर्वत्र विख्यात हैं। शिवरात्रिमाहात्म्यमाह — शिवरात्रिसमं पुण्यं नास्ति यज्ञसहस्रकैः ।¹ मासे मासे कृष्णपक्षे या भवेच्चं चतुर्दशी ॥ 39 ॥ शिवरात्रिस्तु सा ज्ञेया व्रतानामुत्तमोत्तमा। शिवरात्रि के समान कोई भी पुण्य हजारों यज्ञ करने पर भी नहीं मिल सकता अतः प्रत्येक मास में जब-जब कृष्णपक्ष की चतुर्दशी हो, उसको शिवरात्रि के रूप में जाने (और व्रत करें) जो व्रतों में उत्तम व्रत है। अन्यदप्याह — त्रिरूपा कृष्णवर्णा सा देवी कल्याणवर्द्धिनी ॥ 40 ॥ ललाटे मुकुटे लिङ्गे कर्णयोः स्कन्धयोस्तथा। प्रकोष्ठे मणिबन्धे च कण्ठे ऊर्वोः स्तने तथा ॥ 41 ॥ मेखलायां कटिसूत्रं कटिमालादितस्तथा। लिङ्गाधारमयाः सर्वे ऊर्ध्वाः करपुटैः कृताः ॥ 42 ॥ तंद्रूपा शिवसामर्थ्यात् शिवरात्रिः शिवशासना। द्वादशोद्भवन्ति मर्त्ये नाम्नैवं शिवरात्रयः ॥ 43 ॥ वह देवी तीन रूपों वाली, कृष्णवर्ण की है और कल्याणवर्द्धिनी है। उसके ललाट पर, सिर, कानों, स्कन्धों, प्रकोष्ठ, मणिबन्ध, कण्ठ, वक्ष, स्तनों पर मेखलाएँ हैं। वह कटिसूत्र व कटिमालादि सहित शिवलिङ्गाधारमय होती है। इसके करपुट ऊर्ध्वस्थ कल्पित किए जाएँगे। इस रूप में शिव के सामर्थ्यवशात् शिवरात्रि से शिवशासन सिद्धि होगी। (इस प्रकार यहाँ) बारह शिवरात्रियों को नामानुसार कहा गया जो कि मर्त्यलोक में होती है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां विष्णुवाक्योद्भवसोमनाथोक्तद्वादशशिवरात्रिनिर्णयाधिकारो नामैकत्रिंश सूत्रम् ॥ 31 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विष्णु के वाक्यानुसार उद्भूत सोमनाथोक्त बारह शिवरात्रि निर्णय अधिकार नामक इकतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 31 ॥

  1. यह श्लोक हेमाद्रि के निम्न श्लोक से तुलनीय है— शिवरात्रिसमं नास्ति कृत्वा यज्ञसहस्रकम् ॥ न ते यमपुरस्थास्तेयैः कृतेयं शिवप्रदा। भुक्तिमुक्तिप्रदा देवि सत्यं सत्यं वरानने ॥ (चतुर्वर्गचिन्तामणि व्रतखण्ड भाग 2, पृष्ठ 88)

सूत्र-३२ 153 विश्वकर्मावतारो नाम द्वात्रिंशं सूत्रम् ॥ 32 ॥ विश्वकर्मोवाच — नमस्कृत्वा सोमनाथमज्ञानां ज्ञानदो भवान् । तव प्रसादाद् देवेश तथाऽस्माभिश्च दृश्यते ॥ 1 ॥ कथं चान्यब्रह्माण्डसृष्ट्युत्पत्तिप्रलयादिकम् । ब्रह्मा विष्णुः शशी सूर्य इन्द्राग्नी चान्यसम्भवः ॥ 2 ॥ कुर्वेतं देवदेवेश प्रसादं पार्वतीपते । ज्ञानोपदेशं सन्देहच्छेदनं च जगत्प्रभोः ॥ 3 ॥ विश्वकर्मा बोले — हे सोमनाथ ! आप अज्ञानियों को भी ज्ञान प्रदान करने वाले हैं, मैं आपको नमस्कार करके प्रार्थना करता हूँ कि आप अपने ज्ञानरूपी प्रसाद से हमें दिखाएँ कि किस प्रकार इन अन्य ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति और प्रलय होता है और ब्रह्मा, विष्णु, शशि-सूर्य-इन्द्र-अग्नि और अन्य देवता कैसे उत्पन्न हुए ? हे पार्वतीपति देव-देवेश ! कृपा करके हे जगत्प्रभो हमारे सन्देह का निवारण कीजिए। ईश्वर उवाच — पूर्वं ब्रह्मभवा सृष्टिर्जगत्स्थावरजङ्गमम् । समांशेन समुत्पन्नावुभौ ब्रह्मा तथा हरिः ॥ 4 ॥ ब्रह्मा तु सृष्टिकर्ता च पालकस्तु जनार्दनः । तस्मात्तथाऽपरे नैव ब्रह्माविष्णुसदाशिवाः ॥ 5 ॥ पूर्व ब्रह्म में होने वाली यह सृष्टि जगत में स्थावर, जङ्गमयुक्त हुई और समान अंशों से दोनों ही ब्रह्मा और विष्णु उत्पन्न हुए। ब्रह्मा तो सृष्टिकर्ता हुए और इसके पालनकर्ता जनार्दन विष्णु हुए। इनसे बाद में इसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव हुए। गन्तव्यं ब्रह्मलोकेषु यत्र तौ परमेष्ठिनौ । तत्रोद्भूता च या सृष्टिस्त्वमवाग्रतो भवेत् ? ॥ 6 ॥ पुष्पकारूढः स्रष्टा च युक्तः पुत्रैश्च मानसैः । जयश्च विजयश्चैव सिद्धार्थश्चापराजितः ॥ 7 ॥ (उक्त तीनों ही) परमेष्ठिगण जब ब्रह्मलोक की ओर जाने को तत्पर हुए तब आप ही इस सृष्टि के रचनार्थ उनके साथ अग्रसर हुए और पुष्पक विमान में आरूढ़ होकर स्रष्टा के पद से युक्त होकर अपने मानस पुत्रों— जय, विजय, सिद्धार्थ और अपराजित को साथ ले गए।

154 अपराजितपृच्छा पुष्पकस्य च स्रष्टा वै स्वयं त्वं सृष्टिसम्भवः । पुष्पविमानमारूढश् छत्रादिझल्लरीयुत् ॥ 7-1 ॥ कलशकनकदण्डै रत्नैर्नैकेर्विभूषितम् । घण्टारवकोपेतं वै नैकविद्याधराकुलम् ॥ 7-2 ॥ तरुणादित्यसङ्काशं तप्तकाञ्चनसप्रभम् । प्रभासक्षेत्रसम्भूतं द्वितीयमिव भास्करम् ॥ 8 ॥ पुष्पक विमान के स्रष्टा तो आप स्वयं हैं जिनसे समस्त सृष्टि रचना सम्भव होती है। पुष्पक विमान में आरूढ़ होने योग्य छत्रादि और झल्लरीयुक्त कलश, स्वर्णदण्ड, अनेकों रत्नों से विभूषित सजावट, घण्टाघोष आदि ध्वन्योपस्कर और अनेक विद्याधरों के समूह तरुण सूर्य के समान प्रकाशमान, जगमगाते हुए तथा तपाए गए सोने की चमक के समान, प्रभास क्षेत्र में उत्पन्न हुए। ऐसा लगता था कि दूसरे भास्कर ही हों। विष्णुः शक्रश्च सूर्यश्च स्वामी चैव गणाधिपः । रुद्रतेजः समुद्भूताः स्वयं वा सृष्टिकर्मणा ॥ 9 ॥ जटामुकुटशोभाढ्यः कुण्डलाभ्यालङ्कृतः । चतुर्भुजो महातेजा दिव्यहंसकवाहनः ॥ 10 ॥ अक्षसूत्रं करे याम्ये वामे चैव कमण्डलुः । पुस्तकं वामहस्तोर्ध्वे दक्षोर्ध्वे कम्बिका तथा ॥ 11 ॥ वे विष्णु, इन्द्र, सूर्य, कार्तिकस्वामी, गणाधिप और रुद्र के तेज से समुद्भूत स्वयं सृष्टि कर्म करने वाले विश्वकर्मा जयमुकुट की शोभा से भरपूर और कानों में सुन्दर कुण्डलों से अलङ्कृत चतुर्भुज स्वरूप, महातेजस्वी, दिव्य हंस पर सवारी करने वाले, हाथों में अक्षमाला और सूत्र दाहिने हाथ में धारण किए हुए और बायें हाथ में कमण्डलु धारण किए हुए तथा बायें ऊपरी हाथ में पुस्तक (शिल्पवेद) तथा दायें ऊपर के हाथ में कम्बिका या हस्त-गज धारण किए हुए। विश्वकर्मा सदागौरस्तेजः पुञ्जसमुद्भवः । बृहस्पतेर्भागिनेयस्तेजः कूट इवापरः ॥ 12 ॥ सम्प्राप्तो ब्रह्मलोके तु महौजा विश्वकर्मकः । ब्रह्मणो चासनं त्यक्त्वा करयुग्मं च योजितम् ॥ 13 ॥ भगवान् विश्वकर्मा सदा गौरवर्ण और तेजस्विता के पुञ्जरूप उत्पन्न होकर बृहस्पति के भानजे तेजस्विता के शिखर के समान होकर यहाँ से आगे ब्रह्मलोक में

सूत्र-३२ 155 पधारे जिनको आदर देने हेतु स्वयं ब्रह्मा भी आसन त्याग करबद्ध होकर खड़े हो गए। तस्मै तदासनं दत्त्वा स्थितावासनयोरुभौ । चत्वारो मानसाः पुत्रा विश्वकृत्पार्श्वतः स्थिताः ॥ 14 ॥ एकैके च यथाशक्ति स्वयं वै सृष्टिकारकाः । जयो विजय आख्याताः सिद्धार्थश्चापराजितः ॥ 15 ॥ ब्रह्मा ने उन विश्वकर्मा को वह आसन दिया और दोनों ही एक साथ बैठे। अपने पास में ही विश्वकर्मा के उन चारों मानसपुत्रों को भी खड़ा किया जो अपने आपमें एक-एक भी स्वयं सृष्टिकर्ता के रूप में विख्यात हैं। वे जय, विजय, सिद्धार्थ और अपराजित नाम से विख्यात् हैं। ब्रह्मोवाच — स्वयं रुद्रस्त्वमाख्यातो मया सृष्टो महेश्वरः । न्यूनाधिकां तथा सृष्टिं पूरयामि च साम्प्रतम् ॥ 16 ॥ स्वयं रुद्रो विष्णुः शिवो मम सृष्टिकृतोऽभिधाः । त्रैलोक्येऽमरपदं च सृष्टव्यं विश्वकर्मणा ॥ 17 ॥ (इसके बाद ब्रह्मा कहने लगे कि) स्वयं महेश्वर ने आपको कहा है कि उन्होंने ही मेरी सृष्टि की है उसमें जो भी कमी-वेशी है, मैं उसे अब पूरी कर दूँगा। स्वयं रुद्र (का मत है कि) विष्णु, शिव भी मेरी ही सृष्टि के नामधारी है। अब तीनों लोकों में अमरपद देवताओं की सृष्टि विश्वकर्मा द्वारा होनी है। त्रैलोक्ये चामरपदं सृष्टव्यं विश्वकर्मणा। जानासि त्वं विश्वकर्मन् न किं ब्रह्मसमुद्भवम् ॥ 18 ॥ तीनों लोकों के अमरपद देवता स्वयं विश्वकर्मा के द्वारा की जाने वाली सृष्टि में होते हैं। हे विश्वकर्मा ! आप यह सब जानते हैं। यह ब्रह्म किसी से उत्पन्न नहीं हुआ। यह सब आप ही की सृष्टि है अर्थात् आपसे ही उत्पन्न हुई है। भुवनसृष्ट्यादिदेवो भुवर्देवस्स उच्यते। समीपगताथ तत्र पृथिवी तु भयातुरा । तत्पृष्ठतश्चागतो वै पृथुश्च पृथिवीपतिः ॥ 19 ॥ इस भुवनमय सृष्टि का आदिदेव भुवनदेव विश्वकर्मा को ही कहते हैं। एक बार पृथ्वी भयातुरा होकर भगवान् विश्वकर्मा के समीप पहुँची और उसके पीछे के पीछे पृथ्वीपति राजाधिराज पृथु भी पहुँच गया।

156 अपराजितपृच्छा इत्युक्त विष्णुमाख्यातं विश्वकर्म प्रकथ्यते । पक्षिराजं समारुह्य शङ्खशाङ्गिदिधारिणम् ॥ २० ॥ सप्तकोटिगणैर्युक्तविमानैश्च सङ्कुलम्। सिद्धचारणगन्धर्वैर्ऋषिभिः परिवेष्टितम् ॥ २१ ॥ सुरदुन्दुभिसंनादैर्नैकवादित्रसङ्कुलम्। पुष्यकैश्छत्रमाच्छाद्यं पृथिव्यान्तक्षीरार्णवम् ॥ २२ ॥ अकस्मादागतो विष्णुर्ब्रह्मलोकेऽमृतार्णवात्। गन्धमादनशैलेन्द्रे विश्वकर्मा जगत्पतिः ॥ २३ ॥ ऐसा विष्णु द्वारा कहा प्रसिद्ध है।¹ विश्वकर्मा इसको ही पुनः कहते हैं कि विष्णु भगवान् शङ्ख-शार्ङ्गधनुषादि धारण करके पक्षीराज गरुड़ पर आरूढ़ होकर सात करोड़ गणों को साथ लेकर, जो कि विमानों के समूहों में आए थे और जिनमें सिद्ध, चारण, गन्धर्व ऋषिगण बैठे हुए थे और उन सबसे घिरे हुए स्वर्ग के दुन्दुभि आदि के निनाद से और अनेकानेक वाद्यों के समूह पुष्पक विमान के छत्र के नीचे आच्छादित होकर पृथिवी के अन्त में क्षीरसागर में अकस्मात् आ गए। इस प्रकार विष्णु और ब्रह्मलोक के अमृतसागर से विश्वकर्मा जगत्पति के प्रभाव से पुष्पक विमान द्वारा तत्काल पृथिवी के अन्तिम क्षेत्र में स्थित सागर में गन्धमादन पर्वत पर आकर उतरे। पुनः पृच्छति तं पुत्रः कनिष्ठस्त्वपराजितः । विश्वकर्मा पुनर्वाक्यं श्रुत्वोवाच मुनीन्द्रकः ॥ २४ ॥ तब उन्हें पुनः उनके कनिष्ठपुत्र अपराजित ने प्रश्न प्रारम्भ किए और विश्वकर्मा ने उनको सुनकर हे मुनीन्द्रक ! पुनः उत्तर देने आरम्भ किए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां विश्वकर्मावतारधिकारो नाम द्वात्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३२ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विश्वकर्मा अवतार नामक बत्तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥

  1. यहाँ सम्भवतः 'विष्णुपुराण' की ओर सङ्केत है। पराशरकृत इस पुराण में कहा गया है कि महाराज पृथु अपरा आजगव नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर क्रुद्ध होते हुए पृथ्वी के पीछे दौड़े। तब भय से व्याकुल होकर पृथ्वी गौ का रूप धारण कर भागी और ब्रह्मलोकादि में पहुँची— ततस्तु नृपतिर्दिव्यमादायाजगवं धनुः । शरांश्च दिव्यान्कुपितः सोन्वधावद्वसुन्धराम् ॥ ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा च वसुन्धरा । सा लोकान्ब्रह्मलोकादीनान् सन्त्रासादगमन्मही । यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी । तत्र तत्र तु सा वैन्यं ददृशेऽभ्युद्यतायुधम् ॥ (विष्णु. 1, 13, 69-71)

सूत्र- ३३ 157 पृथुपृथिवीसंवादे भूर्लोके विश्वकर्मागमनं त्रयस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३३ ॥ विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स महाप्राज्ञं संवादं च पृथोः क्षितेः । जम्बूद्वीपे पृथो राज्यमेकच्छत्रं समस्तकम् ॥ १॥ तेनावलोकिता चैव समुद्रान्ता च मेदिनी । पर्वतैः स्थलजैः सर्वैः सूत्रारम्भे समीकृता ॥ २॥ रसवा सर्वबीजानि ह्यात्मन्येव धृतानि च। प्रजाश्च क्लेशितास्तस्माद् गृहीतात्मेच्छया तु सा ॥ ३॥ तदुच्छेदे समारब्धे निःसृता सा भयातुरा । ततः पृथ्वी भयोद्विग्ना पृथोश्च पृथिवीपतेः ॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले — हे महाप्रज्ञ बुद्धिमान वत्स! पृथुराज का संवाद सुनो। समस्त जम्बूद्वीप पर पृथुराजा का एकछत्र सार्वभौमिक राज था। उनकी देखी गई समस्त भूमि को समुद्रान्त तक पर्वतों-पहाड़ियों की उबड़-खाबड़ स्थिति को सूत्रता, समतलता, समान सतह की बना दी गई थी (ताकि वहाँ कृषि-कार्य सरलता से हो सके) ।¹ उस धरा पर सब प्रकार के बीजों को स्वयं अपने हाथ में लेकर प्रजा के क्लेश निवारणार्थ उन्होंने पृथ्वी को अपनी इच्छा के वशीभूत कर उसको इकसार करने को प्रवृत्त हुए तो वह पृथ्वी निःश्वास छोड़ते हुए भयातुर होकर और भय से उद्विग्न होकर पृथुराजा के पास पहुँची। पृथ्वी उवाच — तथागताऽब्रवीत्तत्र यत्र तौ परमेश्वरौ । रक्ष रक्ष महाभूत त्वमेव शरणं प्रभो ॥ ५॥ पास आकर पृथ्वी बोली— आप मेरे परमेश्वर हो, मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। हे प्रभु ! आप ही मेरे लिए उपयुक्त शरण स्थल हो।

  1. विष्णुपुराण में कहा गया है कि पृथु ने अपने धनुष की कोटि से सैकड़ों-हजारों पर्वतों को उखाड़ा व उन्हें एक ही स्थान पर इकट्ठा कर दिया। इससे पूर्व पृथ्वी के समतल न होने से पुर और ग्राम आदि का कोई नियमित विभाग नहीं था। उस समय अन्न, गोरक्षा, कृषि और व्यापार का कोई क्रम नहीं था। यह सब वेनपुत्र पृथु के समय से ही आरम्भ हुआ है— तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः। धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः ॥ न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले । प्रविभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा पुराऽभवत् ॥ न सस्यानि न गोरक्ष्यं न कृषिर्न वणिक्पथः। वैन्यात्प्रभृति मैत्रेय सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ (विष्णु. 1, 13, 82-84)