अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
xlviii महाराजाधिराजपुरनिवेशो नाम द्वासप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७२ ॥ 398-411 प्राकारोच्छ्रयमाह — 400 प्रवेशद्वारलक्षणं — 400 चत्वरे देवस्थानानि — 401 देवस्य मुखस्थितिं — 401 प्राकारान्तरे परिखप्रमाणादीनां — 402 नृत्यशालिकाः — 404 मठस्थानं — 404 तत्र मण्डपिकादीनां — 405 वर्णादीनां निवेशनं — 407 पुरसुरक्षार्थे प्राकारोपरि यन्त्रनिवेशनं — 409 नाना यन्त्रनामानि — 409 पुरलक्षणं त्रिसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७३ ॥ 411-416 विंश पुरनामानि — 411 नामस्य स्वरूपाणि — 412 पुरस्य फलाफलमाह — 413 इत्यमनन्तर अशुभ पुराकृतिमाह — 414 तस्य फलोच्यते — 415 अथाकारानुसारेण पुरग्रामादीनां प्रमाणमाह — 416 वापीकूपतडादिनिर्णयो नाम चतुःसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७४ ॥ 417-424 दशविध कूपमाह — 417 कूपिका सफलमाह — 418 चतुर्वाप्यः — 418 चतुर्विधकुण्डानि — 419 तत्रैवार्च्चा निर्देशमाह — 420 इत्यमनन्तर तीर्थवर्णनं — 422 सरोवरमाह — 423 पालिप्रमाणमाह — 424 शस्यावतारो नाम पञ्चसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७५ ॥ 425-435 अथात्र प्रशंसामाह — 426
xlix लोकमङ्गलमूलमाह — 427 स्वस्थ देशलक्षणं — 428 दुर्भिक्षनिवारणोपाय — 431 महाराजनिवेशोनाम षट्सप्ततितमं सूत्रम्॥ 76॥ 435-442 उच्चरङ्गिका प्रमाणमाह — 435 अन्य गृहादीनां — 435 सभाष्टकवेदीनिर्णयो नाम सप्तसप्ततितमं सूत्रम्॥ 77॥ 443-447 सभा निर्माण प्रकारलक्षणञ्च — 443 नवांशानुसारेण सुन्दरीशालाः — 443 इत्यमनन्तर वेदीलक्षणं — 445 वर्णानुसारेण वेदीप्रमाणमाह — 445 कार्यानुसारेण वेदीप्रयोगमाह — 446 महाराजाधिकाराजो नामाष्टसप्ततितमं सूत्रम्॥ 78॥ 447-455 चक्रवर्त्यादीनां नृपकोटयः — 448 राज्योत्पत्तिमाह — 449 बृहत् शुश्रूषया मातायात् राज्ञो दिनचर्यायाः — 450 पौरुषोद्भव मातायात्क्रमाह — 452 स्त्रीणामङ्गोद्भवा मातायात्क्रमाह — 453 राजसभासदवर्णनं — 454 गजमातायात्क्रमाह — 454 गजशालाप्रमाणहस्तिलक्षणकमेकोनाशीतितमं सूत्रम्॥ 79॥ 456-467 दन्तिन्यादि षड्विधा गजशालाह — 457 अधुना भद्रादीनां चतुर्विधा गजलक्षणमाह — 458 मृगजातिलक्षणमाह — 461 मन्द्रजातिलक्षणमाह — 462 सङ्कीर्णजातिगजलक्षणमाह — 463 गजवननिरूपणमाह — 464 परस्पर वनस्थितिं — 465 परस्पर गजस्थितिं — 465 अश्वलक्षणशाला नामाशीतितमं सूत्रम्॥ 80॥ 467-473
I अथाश्वोत्पत्तिदेशाः — 468 अथाश्वाश्चातुर्वर्ण्यमाह — 468 तथा चोच्छ्रयादीनां प्रमाणमाह — 470 अशुभाश्वलक्षणमाह — 470 अथाश्वशालालक्षणं — 471 तत्रैव कूरार्थपात्रलक्षणमाह — 471 अश्वशालाप्रमाणं — 472 राजालयसिंहासनछत्रप्रमाणमैकाशीतितमं सूत्रम् ॥ 81 ॥ 473-482 नृपस्य कोट्यानुसारेणनिर्माणमाह — 473 आरोहणमाह — 476 दण्डनायकादीनां भवनप्रमाणमाह — 476 अधुना तलविधानमाह — 476 इत्यमनन्तर सिंहद्वारानुक्रममाह — 477 तोरण प्रयोजनलक्षणञ्च — 478 इत्यमनन्तर आसनविधानमाह — 479 अधुना छत्रप्रमाणमाह — 480 राजभुवनं द्व्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 82 ॥ 482-485 शयनभाण्डागारवारीगृहादीनां — 483 अर्चनागृहमहासनकोष्ठागारशस्त्रागारमाह — 483 राजपदमकराक्षमाह — 483 सभाष्टकानुसारेण पुष्पकसिंहासनमाह — 484 दन्तिशालामाह — 484 एकत्रिपञ्चप्रतोली नाम त्र्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 83 ॥ 485-490 प्रतोल्योच्छ्रयप्रमाणमाह — 485 तत्रैव विस्तारमाह — 486 प्रतोलीचतुष्टये मुखद्वारमाह — 486 पोलसमूहमाह — 487 तस्य प्रकारलक्षणमाह — 488 त्रिपोल्यलक्षणमाह — 489 पञ्चपोल्यलक्षणं — 489
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीभुवनदेवाचार्योक्ता सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशापरनामधेया अपराजितपृच्छा गन्धमादनो नाम प्रथमं सूत्रम् ॥ १ ॥ अथ ग्रन्थस्य निर्बाधपरिसमाप्त्यर्थं परम्परानुमितश्रुतिबोधितकर्त्तव्यताकं स्वाभीष्ट गणाधीशादिदेवानामाशीर्वादस्वरूपं मङ्गलम् — अभीप्सितार्थसिद्धयर्थं पूजितो यः सुरैरपि। सर्वविघ्नच्छिददे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ १ ॥ अपने अभीष्टार्थ की सिद्धि के निमित्त देवगण जिनका पूजन करते हैं जो समस्त विघ्नों का उच्छेदन करने वाले हैं, उन गणाधिपति को नमस्कार है। चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूर्म्मम ( -र्म्म! ) । मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती ॥ २ ॥ चतुर्मुख ब्रह्माजी के मुखरूपी कमलों के वन को हंसवधू अर्थात् हंसिनी के समान अनुरागपूर्ण भाव से निहारती हुई, ब्रह्माजी के मन रूपी मानसरोवर में नित्य रमण करने वाली सर्वशुक्ला अर्थात् श्वेतपुष्प माला व वस्त्रों को धारण करने वाली निर्मल, उज्ज्वल सरस्वती को प्रणाम है। ग्रन्थार्थं गन्धमादनपर्वताश्रये प्रवर्तनमाह — अथ श्रीहिमान्तभागे पर्वते गन्धमादने। विचित्रशिखराकीर्णे चित्रस्फटिकशोभने ॥ ३ ॥ चन्द्रकान्तशिलारम्ये सेव्यामृतनिवासिने। सिद्धामरकन्याकीर्णे क्रीडामणिगुहागृहे ॥ ४ ॥ अब हिमाचल के अन्तिम भाग में विद्यमान गन्धमादन पर्वत का वर्णन किया जा रहा है जो अपने विचित्र शिखरों से युक्त, स्फटिक चित्र-सा शोभित होता है। वहाँ रमणीक चन्द्रकान्त शिला है जो कि देवताओं का निवास है। वहीं पर सिद्ध, देव-कन्याओं के निमित्त क्रीडामणि गुहागृह विद्यमान है।
2 अपराजितपृच्छा हंसकारण्डवाकीर्णे चक्रवाकोपशोभिते ।¹ नीलजीमूतसङ्काशे तरुणादित्यसप्रभे ॥ 5 ॥ उच्छ्रयाकाशशिखरे रत्नधातुपशोभिते । अनन्तगह्वरे रम्ये यथाख्यातात्य (दृ ?) हासके² ॥ 6 ॥ हंस और बतखों के समूहों से भरपूर और चक्रवाकों के शोभित नीले वर्ण के बादलों के समान शोभित और मध्याह्न के सूर्य के समान तेज प्रभाववाले ऊँचे-ऊँचे गगनचुम्बी शिखरों वाला, रत्न और धातुओं से उपशोभित, अनेकों गह्वर गुहाओं से रमणीयता को वैसे ही लिए हुए हैं जैसे कि इतिहासों में उसकी ख्याति है। महाद्रुमलताकीर्णे वनोपवनकानने । दिव्यासनसभारम्ये सरितां तटवासिते ॥ 7 ॥ इदं वै आश्रमं रम्यं पर्वते गन्धमादने । भूर्भुवनेश्वरं देवं तच्छिलापृष्ठशायिनम् ॥ 8 ॥ वहाँ महावृक्षों, लताओं से युक्त वनोप
सूत्र- १ 3 इन पर्वत शिखरों से निकलकर बहने वाली नदियों के नाम हैं— गङ्गा, सरस्वती, पुण्यवती वेदका (वेदिका) मधुमती, पारा, सिन्धु, कावेरी, गोमती और चन्द्रतारका। मज्जन्मातङ्गगण्डच्युतमदमदिरामोदमत्तालिमालं स्नानैः सिद्धाङ्गनानां कुचयुगविगलत्कुङ्कुमासङ्गपिङ्गम्। सायं प्रातर्मुनीनां कुशकुसुमचयच्छिन्नतीरस्थनीरं पायान्नो गाङ्गमम्भः करिमकरकराकान्तरं हस्तरङ्गम्॥ 12॥ इन नदियों के जल में स्नान-मज्जन करने वाले मदमाते हाथियों के गण्डस्थल, कपोलों से बहने वाले हस्तिमद रूपी मदिरा के जल में घुलने से फैली सुगन्ध के मोद में मस्त भँवरों के झुण्ड चारों ओर सर्वत्र उड़ते दिखाई देते हैं। इसी प्रकार इन नदियों के प्रवाह के जल में सिद्ध और महात्माओं की रमणियों के स्नान करने से उनके कुच युगल अर्थात् दोनों स्तनों पर चिपके हुए कुङ्कुम-केसर के लाल रङ्ग के पानी में गलकर बहने से अपूर्व शोभा और सुगन्ध फैल रही है। इसके साथ ही मुनियों द्वारा अपने सायंकाल और प्रातःकाल के स्नान करते समय पूजा-अर्चना में प्रयुक्त कुश, कुसुमादि चयनित पुष्पों के नदियों के किनारे ठहरे हुए जल में एकत्रित हो जाने से वहाँ की वायु में अपूर्व सुरभि का वास मिलता है। गङ्गा नदी के जल में हाथियों के मस्ती में स्नान करने और मकर, सारस आदि जन्तुओं के तैरने और उछालने से जो अन्तरङ्ग जल राशि की उत्ताल तरङ्गे प्रसारित होती हैं, वे ऐसे लगती हैं मानो ओले वाली वर्षा हो। दंष्ट्रिगजेन्द्रवनजाः सिंहव्याघ्रगुहास्तथा। गण्डभल्लूकशार्दूलाः शूकरा महिषा मृगाः॥ 13॥ शुककोकिलकुलायै रम्भं शीशि(चीचि)रवोद्भवैः। वदन्त्येतैते (रे?) व गिरा तपोवननदीस्वराः॥ 14॥ इन विशाल वनों और पहाड़ों की उपत्यकाओं में जंगली हाथियों, गजेन्द्रों, सिंहों, व्याघ्रों को यहाँ की गुहाओं में बसे हुए देखा जा सकता है। इनके साथ ही यहाँ के वनों में गेण्डे, भालू, शार्दूल, शूकर, भैंसे, मृग, तोते, कोयलों के समूहों के गान और चहचहाहट से शिशिर अर्थात् ठण्ठ के मौसम का आभास होने लगता है। इन पशु-पक्षियों की वाणी व नदियों के बहने के स्वरों से यहाँ के तपोवन जीवन्त बने रहते हैं और बड़े ही आनन्दप्रद लगते हैं।¹
- उक्त श्लोकों में ग्रन्थ रचनाकार भुवनदेव की कल्पना ही नहीं, प्रासाद और माधुर्य शब्दशक्ति के प्रयोग के साथ-साथ साहित्य और अलङ्कारिक वर्णन की क्षमता परिलक्षित होती है।
.. 4 अपराजितपृच्छा इत्यमनन्तर अष्टाशीतितपसानां तपश्चर्या — अगस्त्यः कश्यपश्चैव याज्ञवल्क्योऽथ कौशिकः । भारद्वाजो वैश्रवणो वसिष्ठो नारदस्तथा ॥ 15 ॥ पाराशरो जमदग्निर्मार्कण्डेयानकौ तथा। मरीचिर्गौतमोऽग्निश्च भृगुर्वै एकशृङ्गकः ॥ 16 ॥ कपिलः पुलमाहेन्द्रौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसुदेवश्च दुर्वासाः कनकः शौनकस्तथा ॥ 17 ॥ भार्गवोऽर्थ सुराचार्यो ह्यङ्गिरा मनुजल्मुकः । वहाँ अगस्त्य, कश्यप, याज्ञवल्क्य, कौशिक, भारद्वाज, वैश्रवण, वसिष्ठ, नारद, पराशर, जमदग्नि, मार्कण्डेय, मरीचि, गौतम, अग्नि, भृगु, शृङ्गी, कपिल, पुलमाहेन्द्र, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसुदेव, दुर्वासा, कनक, शौनक, भार्गव, सुराचार्य शुक्र, अङ्गिरा, मनुजल्मुक थे। अन्यदप्याह — हरितोत्सङ्गनागेन्द्रा देवन्यः किंशुकस्तथा ॥ 18 ॥ पद्मकः पार्थुकः संपदङ्ग ईक्षण एव च। विश्वामित्रश्च जनको व्यासवाल्मीकिनौ तथा ॥ 19 ॥ मैत्रेयो धर्मकश्चैव प्रचेता वैजयन्तकः । शान्तः समुद्रकश्चैव वैशम्पायनपाचकौ ॥ 20 ॥ जीवध्वनो बाल्यषष्टिः शम्भुश्रुर्णक एव च। शुकात्रियमकाश्चैव विशाला ब्रह्मतेजसा ॥ 21 ॥ शान्तोऽथ विद्रुमश्चैर बहुधान्यो वो ( भ ?ग ) व्यस्तथा। गर्गोऽथ लम्पटः ख्यातो नीलश्च सत्य एव च ॥ 22 ॥ मृगाक्षो वृषचक्रश्च शङ्खवर्णोऽर्थ लोमशः । चन्द्रभानुर्वज्रसूचिः किरातश्चाथ सम्भ्रमः ॥ 23 ॥ सुपर्णः श्यामतुङ्गश्च हेमकान्तिश्च देवलः । शिखिध्वजो महाकान्तिः शिवात्मा चन्द्रशेखरः ॥ 24 ॥ जयश्च विजयश्चैव सिद्धार्थश्चापराजितः । अष्टाशीतिः₈₈ समाख्याता ऋषयो ब्रह्मतेजसः ॥ 25 ॥ अधः शीर्षोर्ध्वपादाश्च वर्षाणां शतसङ्ख्यया। हृष्टास्तुष्टास्तु सर्वेषु ज्ञानध्यानपरायणाः ॥ 26 ॥
सूत्र- १ ५ (इनके अतिरिक्त) हरित, उत्सङ्ग, नागेन्द्र, देवन्य, किंशुक, पद्मक, पार्श्वक, संपदङ्ग, ईक्षण, विश्वामित्र, जनक, व्यास, वाल्मीकि, मैत्रेय, धर्मक, प्रचेता, वैजयन्तक, शान्त, समुद्रक, वैशम्पायन, पाचक, जीवध्वन, बाल्यषष्टि, शम्भु, चर्णक, शुक, अत्रि, यमक, विशाला, ब्रह्मतेजस्, शान्त, विद्रुम, बहुधान्य, गव्य, गर्ग, लम्पट, ख्यात, नील, सत्य, मृगाक्ष, वृषचक्र, शङ्खवर्ण, लोमश, चन्द्रभानु, वज्रसूचि, किरात, सम्भ्रम, सुवर्ण, श्यामतुङ्ग, हेमकान्ति, देवल, शिखिध्वज, महाकान्ति, शिवात्मा, चन्द्रशेखर, जय, विजय, सिद्धार्थ, अपराजित व अठासी महाख्याता ब्रह्मतेजस् ऋषिगण, नीचा सिर और ऊपर पाँव करके सैकड़ों वर्षों तक शीर्षासन की तपस्या करते हुए, सभी ज्ञान ध्यान परायण महात्माओं को प्रसन्न किया और सन्तुष्ट किया। तत्र वनस्पतिवर्णनं — केचित्कन्दफलाहाराः पञ्चगव्योपजीविताः । केचिद् विस्तृतपथ्याश्च केचिन्नक्षत्रभोजनाः ॥ २७ ॥ इनमें से कोई तो कन्द और फलाहारी थे। कोई पञ्चगव्य पर जीवित थे। कोई बहुत ही पथ्यों को पालन करने वाले थे। कोई-कोई नक्षत्रानुसार भोजन करने वाले थे।¹ तत्र विश्वकर्मदिव्याश्रमवर्णनम् — इत्येते ऋषयः सर्वे पृष्ठे वै गन्धमादने। भूर्भुवः स्वर्भृतश्चैव वने दिव्यावतोत्तमे ॥ २८ ॥ ये सभी ऋषिगण गन्धमादन पर्वत के पृष्ठभाग में रहते थे। इनके द्वारा उच्चारित गायत्री मन्त्र जाप के भूः भुवः स्वः के उच्चारण से वन दिव्य और उत्तम हो रहे थे। अनेकधा वने तत्र चन्दनागुरुपादपाः । पुन्नागनागबकुला विविधा वृक्षजातयः ॥ २९ ॥ जातीचम्पकमन्दारा नीलरक्तोत्पलं तथा। कङ्कोलकलवङ्गादि कर्पूरोद्द्रुमपादपाः ॥ ३० ॥ अतीवफलसंयुक्ता लताभिर्विविधाः कृताः । रक्तचन्दनवृक्षाश्च प्रभूततृणपादपाः ॥ ३१ ॥ उक्त वन में अनेक प्रकार के चन्दन, अगरु के पेड़, पुन्नाग, नाग, बकुल आदि
- तुलनीय— केचित्पुष्पफलाहाराः शीर्णपर्णाशिनस्तथा ॥ केचिद्गोमयभक्षाश्च जलाहारास्तथा परे। साग्निहोत्राः सुविद्वांसो मोक्षमार्गार्थचिन्तकाः ॥ (स्कन्द. प्रभास. 22, 21-22)
6 अपराजितपृच्छा के विविध जातियों के वृक्ष थे। जाति-चमेली के पुष्प, चम्पक, मन्दार, नीलकमल, रक्तकमल, कङ्कोल, लवङ्गादि, कर्पूर देने वाले पादप और बहुत ही फलों से लदी विविध प्रकार की लताएँ थीं। रक्तचन्दन के वृक्ष और बहुत से तृण-पादप थे। अगस्त्याम्बुरुहाशोकबिल्ववृक्षाः सचन्दनाः। नागकेसरपनसा द्राक्षाखर्जूरदाडिमाः ॥ ३२ ॥ शालतालतमालाश्च हिन्तालमधुपादपाः। कर्णिकारद्रुमा रम्या नानापुष्पफलान्विताः ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार अगस्त्य, अम्बु वृक्ष, अशोक, बिल्व के वृक्ष चन्दन सहित थे। नागकेसर, पनस, द्राक्षा, खर्जूर, दाड़िम, शाल, ताल, तमाल, हिन्ताल, मधुक के वृक्ष और कर्णिकार के रमणीय वृक्ष नाना पुष्पों और फलों से लकदक थे। चन्द्रकान्तकलाभूमिः क्वचिन्मरकतप्रभा। प्रवालकसमाम्या क्वचित्स्फटिकनिर्मला ॥ ३४ ॥ कर्पूरकुङ्कुमसमपुष्पप्रकरसङ्कुला। सधूपामोदबहुला कुङ्कुमैरिव सिञ्चिता ॥ ३५ ॥ वह भूमि चन्द्रमा के कलाओं-सी दीप्तिमान और कदाचित मरकत की प्रभा जैसी प्रतीति देती थी। वह प्रवालक के समान रम्य और कदाचित स्फटिक के समान मल रहित थी। वहाँ कर्पूर, कुङ्कुम के समान वर्ण वाले पुष्पों का पुञ्ज था और धूपादि से सदा आमोदित रहता था तथा कुङ्कुम की भाँति प्रभविष्णुता से सिञ्चित प्रतीत होता था। इत्येवं भवनं दिव्यं दशयोजन_{10} विस्तरम्। गवाक्षचन्द्रिकोपेतं वातायनसमन्वितम् ॥ ३६ ॥ वहाँ पर दिव्य भवन था जो दस योजन विस्तार लिए हुए था। वह भवन गवाक्ष, चन्द्रिका के साथ ही वातायनों से युक्त था। अभ्रंलिहैर्ध्वजैश्चित्रैश्चामरैश्च विभूषितम्। घण्टाकोटिनिनादाढ्यनैकवादित्रसङ्कुलम् ॥ ३७ ॥ वह मेघों तक समुन्नत ध्वज-पताका, चित्रादि से अलङ्कृत चामरों से युक्त था। वहाँ कोटि-कोटि घण्टाओं का निनाद होता था। नाना वाद्य वादकों का सङ्कुल वहाँ विद्यमान था। किङ्किणीरावणोपेतमर्धचन्द्रैर्विभूषितम्। वितानसाहस्रयुतं चित्रपट्टादिशोभितम् ॥ ३८ ॥
7 सूत्र- १ प्रवेशनिर्गमोपेतं नरनारीजनाकुलम्। वे ध्वजादि किङ्किणियों से युक्त और अर्द्धचन्द्रों से विभूषित थे। वहाँ नाना कोणों वाले वितानों की निर्मितियाँ थीं जो चित्रपट्टादि से शोभित थीं। वहाँ प्रवेश और निर्गम मार्ग पर नर-नारियों के समूहों का आना-जाना लगा रहता था। तत्र सङ्गीतादीनामाह – महामुरजशब्दैश्च गीतैश्च विविधैः पुनः ॥ ३९ ॥ मनोहरं गृहं दिव्य देवानाम्पि दुर्लभम्। लास्यहास्यैश्च विविधाः क्रीडन्ते रुद्रकन्यकाः ॥ ४० ॥ देवकन्याश्च विविधा ऋषिनार्यस्तथोत्त्तमाः। सहिता नृत्यमानाश्च मङ्गलैः कौतुकैः सह ॥ ४१ ॥ महामृदङ्गों के निनाद के साथ नाना प्रकार के गीत मनोहर, दिव्य गृहों में गाए जा रहे थे जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ थे और उन गीत, वाद्यों के साथ कई रुद्र कन्याएँ अपने लास्य नृत्य और हास्य से विविध प्रकारेण क्रीड़ा कर रही थीं। वे आमोद-प्रमोद में तत्पर थीं। उक्त रुद्रकन्याओं के सङ्ग में विविध देवकन्याएँ तथा उत्तमोत्तम ऋषि नारियाँ, महिलाएँ भी माङ्गलिक कौतुकों के साथ नृत्य में उनका साथ दे रही थीं। त्रिसङ्गीतैश्च विविधैः प्रेक्षणीयं गणेश्वरैः। गणाः किलकिलायन्ति प्रवल्गन्ति मुहुर्मुहुः ॥ ४२ ॥ इधर, इस प्रकार नाच-गान की तरह ही त्रिसङ्गीत (गायन, वादन व नर्तन) के विविध प्रकारों से दर्शनीय गणेश्वरगण भी बारम्बार किलकिलाकर उछलते-कूदते हैं और हंसते हुए नृत्यादि में मग्न थे। भवनशोभावर्णनमाह – इदं च भुवनं नित्यं शुद्धस्फटिकसन्निभम्। वज्रवैडूर्यखचितं रत्नप्राकारशोभितम् ॥ ४३ ॥ इसी तरह वहाँ के भवनों की शोभा बहुत रमणीक प्रतीत होती थी। मानो वे शुद्ध स्फटिक से निर्मित हो। यह भी लगता था कि मानो उनकी सुन्दरता में उनमें हीरे, वैडूर्य, मणियाँ और नाना प्रकार के रत्नादि विजड़ित हों, ऐसी वहाँ की भित्तियाँ थीं। तोरणैर्दिव्यमाख्यातं पूर्वापरयाम्योत्तरम्। तन्मध्ये दिव्यपर्यङ्कं सिंहव्यालैरलङ्कृतम् ॥ ४४ ॥ हंसतुल्यं समारूढं शिरोद्धारद्वयान्वितम्।
8 अपराजितपृच्छा· उक्त भवनों के पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण में चारों ही ओर दिव्य तोरणों की शोभा है व उनके मध्य में दिव्य पर्यङ्क-शय्या सजी हुई है जिसे सिंह-व्याल आदि के चित्र-कौशल से अलङ्कृत किया हुआ है। इन पर्यङ्कों पर स्वच्छ, श्वेतवर्ण के मसनद (सिरहाने) रखे हुए हैं जो ऐसे दिखाई देते हैं मानो दो हंस वहाँ पर विराजित हों। तत्र भगवान् विश्वकर्माणवर्णनमाह — तत्रस्थं सुखमासीनं विश्वकर्ममहौजसम् ॥ 45 ॥ वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् । सर्व विज्ञानवन्तं च सर्वज्ञं मानसागरम्¹ ॥ 46 ॥ (उन शिरोद्वारों के सहारे ही) वहाँ पर महाओजस् तेजस्वी भगवान विश्वकर्मा सुखासन अवस्था में विराजमान है। भगवान् विश्वकर्मा वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) एवं वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष एवं छन्द) और तत्त्व (कूटस्थ पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहङ्कार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, हस्त, पाद, जिह्वा, लिङ्ग, गुह्याङ्ग, श्रवण, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण तथा मन²) के मर्मज्ञ और सर्वशास्त्रों के विशारद है, सर्वविज्ञानवन्त है और मानादि प्रमाणों के अगाध सिन्धुरूपेण ज्ञान के भी सर्वज्ञ है। चतुर्भुजं ब्रह्मतेजस्तप्तकाञ्चनसन्निभम् । दीप्तकुण्डलशोभाढ्यं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥ 47 ॥ अक्षसूत्रं वामहस्ते दक्षिणे तु कमण्डलुम् । पुस्तकं वामहस्तोर्ध्वे जपमाल्यां तु दक्षिणे ॥ 48 ॥ उनका तेजोमय स्वरूप चतुर्भुज हैं और ब्रह्मतेज से तप्त होकर तपाए गए स्वर्ण, हेमकुन्दन के समान जगमगाहट कर रहा है। उनके कानों में दीप्त कुण्डलों की शोभा वृद्धिस्पद है और उनके विशाल ललाट पर ज्ञान-चक्षु त्रिनेत्र और सिर पर चन्द्रमा का दिव्य दर्शन हैं। उनके वाम हाथ में अक्षसूत्र हैं और दक्षिणी हाथ में कमण्डलु है। इसी प्रकार उनके ऊपर के बाँये हाथ में (शिल्पविज्ञान की) पुस्तक और ऊपरी दायें हाथ में वे जपमाला को धारण किए हैं। ज्ञानदं मोक्षदं चैव विश्वहा सृष्टिकारकम् । तिष्ठन्तं च विनोदेन ह्यनेकँश्च कुतूहलैः ॥ 49 ॥
- यहाँ मानसागर से आशय रचनाकार के समय में प्रचलित कोई गणित-मपित ग्रन्थ भी हो सकता है।
- शुक्रनीति (4, 48); तुलनीय सांख्यदर्शन।
सूत्र- १ 9 ऐसी सुख मुद्रा में भगवान् विश्वकर्मा ज्ञानप्रदाता, मोक्षप्रदाता और विश्व के दुखों के निवारक और सृष्टिकर्ता के रूप में अनेकों कुतूहल, आश्चर्यजनक कार्यों को करते हुए विनोदपूर्वक, प्रसन्नचित्त से विराजित हैं। अथ विश्वकर्मनामपर्यायदीनां — विश्वकृद्विश्वकर्माणं त्वष्टारं देववर्धकिम्। भूर्भुवर्भुवनेशस्य स्वर्गदेवस्य विश्रुतम् ॥ 50 ॥ भगवान् विश्वकर्मा के अनेक नाम विश्रुत हैं। जैसे— विश्वकृत, विश्वकर्मा, त्वष्टा, देववर्द्धिकी, भूर्भुवः भुवनेश, स्वर्गदेव आदि।¹ पुनरुच्चार्य नामाथ प्रभाससूनुनन्दनम्। दण्डवत् प्रणतो भूत्वा जानुभ्यां धरणीतले ॥ 51 ॥ भक्तिमान् भो महाभूत पृच्छति त्वपराजितः । और भी, कहें तो वे प्रभावसुनन्दन हैं। अस्तु, इन परमप्रभु विश्वकर्मा को भूमि पर साष्टाङ्ग प्रणाम करके, दण्डवत् लेटकर, प्रणत होकर भक्तिभाव से अभिभूत होकर अपराजित उनसे प्रश्न करते हैं। अथापराजित प्रश्नं — समचित्तं च सम्बोध्य ह्यज्ञानां ज्ञानदो भवान् ॥ 52 ॥ सूत्रशास्त्रार्णवमध्यादुद्धृतं सारबीजकम्। सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं गुह्यं मध्यादुद्धरतो यथा ॥ 53 ॥ अपराजित बोले कि हे (महाभूत) प्रभु! आप मुझे समचित्त होकर सम्बोधित करके मेरे अज्ञान को हटाते हुए मुझे ज्ञान प्रदान करें जिससे मैं समस्त सूत्रशास्त्रों को, शिल्पज्ञान के शास्त्रों के महासागर के मध्य से अद्भुत सार बीज निकाल सकूँ जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर होने और गुह्य होने पर भी मैं उसका उद्धार करके समझ सकूँ। निशाकरे चास्तमिते उदिते च दिवाकरे। सूत्रार्थस्य प्रवक्तुवै ज्ञानं चक्षुः प्रकाशनम् ॥ 54 ॥
- तुलनीय : विश्वकर्म विमना आदिद्धाया धाता च विधाता परमोत संदृक्। तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषिन् पर एक माहुः ॥ (ऋग्वेद 10, 82, 2) देखें यास्क भाष्य : विश्वकर्मा विभूतमनाः व्याप्ता धाता च विधाता च परमः च संद्रष्टा भूतानां । तेषां इष्टानि वा। कान्तानि वा। गतानि वा। मतानिं वा। नतानि वा। अद्भिः समोदन्ते। यत्र एतानि सप्त ऋषीणि ज्योतींषि। तेभ्यः परः आदित्य। तानि एतस्मिन् एकं भवन्ति। इति आदि दैवतम् । (निरुक्त : यास्कभाष्य 10, 26)
10 अपराजितपृच्छा जिस प्रकार निशाकर के अस्त होने पर दिवाकर भगवान् सूर्य के उदित होने से सर्वत्र प्रकाश प्रसारित हो जाता है, वैसे ही मेरे ज्ञान चक्षुओं में सूत्रार्थ का प्रकाश प्रसारित हो जाएँ। यद्यत्पृच्छामि तदहं सूत्रशास्त्रप्रकाशकम्। देहि ज्ञानं प्रसादेन तारा तिमिरहरं यथा ॥ ५५ ॥¹ हे प्रभु ! मैं जो-जो भी प्रश्न सूत्रशास्त्र के प्रकाश करने के सम्बन्ध में करूँ, उस पर कृपा करके मुझे ऐसा उज्ज्वल ज्ञान प्रदान करें जैसे तारों के प्रकाश को सूर्य का प्रकाश हर लेता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रो(प्रयो)क्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजित पृच्छायां गन्धमादनाधिकारो नाम प्रथमं सूत्रम् ॥ १ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गन्धमादन अधिकार संज्ञक पहला सूत्र समाप्त हुआ ॥ १ ॥ सूत्रलक्षणं द्वितीयं सूत्रम् ॥ २ ॥ अथ सूत्रधारेण ज्ञातव्य विषयाः । अपराजित उवाच - सृष्टिकौतूहलं देव उत्पत्तिर्भूतधातृभिः । ब्रह्माण्डं च कथं प्रोक्तं केन सङ्ख्या प्रमाणतः ॥ १ ॥ अपराजित (विश्वकर्मा के प्रति कहने लगे) हे देव ! आप इस सृष्टि के कुतूहल, ब्रह्मा ने उसकी उत्पत्ति कैसे की, ब्रह्माण्ड की रचना कैसे हुई, उसका संख्या प्रमाण क्या है, यह सब बताएँ । कया युक्त्या समुत्पन्नं वर्द्धितं केन हेतुना। विकासः केन सञ्जातः कैराधारैश्च धार्यते ॥ २ ॥ धरायाः केचिदाधारा आकाशस्य कथं विदुः । के च मेर्वादयः शैलाः कैराधारेः कुलाचलाः ॥ ३ ॥ किस युक्ति से ब्रह्माण्डादि की रचना हुई, किस हेतु से उसका विस्तार होता है,
- 'यछत्पृच्छामि तब्यं हं सूत्रशास्त्र प्रद्योतक। तासु ज्ञानं प्रज्ञाहेन तारातिमिरहं यथा' इति 'न' पाठः ।
- इस अध्याय में ग्रन्थ में प्रतिपादित विषयों के बारे में कहा गया है। एक प्रकार से यह इस ग्रन्थ की विषय सूची भी है। संयोग से किञ्चित विषयों को छोड़कर प्रस्तुत पाठ में समस्त विषय आ गए हैं। जहाँ कहीं विषय खण्डित मिला है, प्रस्तुत पाठ में अन्य पाठ या ग्रन्थान्तर से उक्त विषय की पूर्ति का प्रयास किया गया है।
सूत्र-२ 11 किस प्रयोजन से विकास होता है और उसको कौन धारण करता है, धरती का आधार कौन है, आकाश किस प्रकार स्थित है, मेरू आदि पर्वत और कुलाचल शैल का आधार क्या है, यह भी कहें। किं धरित्र्याः प्रमाणं च सप्त,द्वीपा वसुन्धरा। समुद्राश्च कथं प्रोक्ता वनोपवनकाननम् ॥ 4 ॥ द्वीपद्वीपेषु क्षेत्राणां प्रमाणानि कथं विदुः । जम्बूद्वीपस्य मध्ये तु नवक्षेत्राणि, कानि च ॥ 5 ॥ सात द्वीपों को धारण करने वाली वसुन्धरा का प्रमाण क्या है, इस पर विद्यमान समुद्र, वन-उपवन, कानन, द्वीप, उपद्वीप के क्षेत्रों का प्रमाण भी कहें। इस जम्बूद्वीप के बीच कौन-कौन से नवद्वीप हैं, बताएँ। उत्तमं भारतं क्षेत्रं तत्प्रमाणं च ख्यातु मे। स्वेदाण्डोर्ध्वजरायुजो भूतग्रामः कथञ्चन ॥ 6 ॥ को धर्मः कुत्र क्षेत्रेषु रम्यकादौ वदेद्भगवान् । ये देशा भारते क्षेत्रे आश्रमा ग्रामसङ्ख्यया ॥ 7 ॥ इस उत्तम भारत क्षेत्र का प्रमाण क्या है, बताइए। स्वेदज, अण्डज, पिण्डज और जरायुज जैसे भूत प्राणियों के विषय में बताएँ। किस क्षेत्र का क्या धर्म है, कौन क्षेत्र रमणीय है, हे भगवान् ! आप बताएँ। इस देश की आश्रम व्यवस्था, ग्राम संख्या आदि को भी स्पष्ट करें। को धर्मः कुत्र देशे तु भरतक्षेत्रमध्यतः । कृतत्रेताद्वापरे तु चतुर्थे₄ वा कलौ युगे ॥ 8 ॥ युगान्ते च कथं धर्मो युगरूपानुदेवताः । धर्मः कृतयुगादीनां द्विजदेवयज्ञादयः ॥ 9 ॥ इस भरत क्षेत्र के बीच के किस देश का कौनसा धर्म है, कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और चौथे कलियुग के विषय में, युगान्त के धर्म, युगानुरूप देवताओं और कृतयुगादि के धर्म, द्विज, देवयज्ञादि के विषय में भी कहें। कश्च धर्मः कथं कीर्त्तिर्द्विजदेवालयादितः । आलयः सर्वसत्त्वानां वेश्महर्म्यप्रसाधनम् ॥ 10 ॥ वास्तूत्पत्तिः कथं तात देवादेश्च निघण्टुकम्। एकपादादिकं वास्तु यावत्पदसहस्रकम् ॥ 11 ॥ हे तात ! इसी प्रकार धर्म के विषय में भी कहो और द्विजों की कीर्ति, देवालयों,
12 अपराजितपृच्छा समस्त लोगों के लिए भवन, हवेलियों व प्रसाधनों, वास्तु की उत्पत्ति को भी कहो। इसी प्रकार निघण्टु और एक पद से लेकर हजार पद तक के वास्तु पद विन्यास को भी कहो। मर्मोपमर्मवंशाश्च रेखाषट्कसंख्यादिकम्। वज्रत्रिशूललाङ्गलं हस्तसूत्रादिपद्मकम् ॥ 12 ॥ बलिकर्मविधिं ब्रूहि वास्तुपादनिवासिनाम्। विद्यात् स्थानानि सर्वाणि प्रासादभवनादितः ॥ 13 ॥ इसी प्रकार मर्म, उपमर्म, वंश, रेखा षट्क, संख्याओं, वज्र, त्रिशूल, हल, हस्त सूत्रादि पद्मक, बलिकर्म की विधि भी कहो। वास्तुपदानुसार वहाँ न्यसित देवताओं के विषय में कहो और समस्त प्रासाद, भवनों के स्थानों के विषय में कथन करें। हस्तलक्षणमानं च देवतापादसम्भवम्। मानोन्मानप्रमाणं च सर्वकर्मादिकारणम् ॥ 14 ॥ सूत्रधारो हि जानीयाद्वर्णकं रुतमेव च। इसी क्रम में हस्त लक्षण, हस्तमान, हस्त के पदानुसार वहाँ के देवताओं, मान-उन्मान के प्रमाण और उनका समस्त कर्मों में उपयोग, सूत्रधार की परीक्षा, वर्णादि के विषय में भी कहें। भूपरीक्षां शल्योद्धारं कीलिकारोपणादिकम् ॥ 15 ॥ वर्णगन्धरसास्वादप्लवादिभूमिलक्षणम्। दीपवर्त्तिप्राग्विशुद्धिं दिशां च साधनादिकम् ॥ 16 ॥ भूमि की परीक्षा, शल्योद्धार, कीलिकारोपणादि के साथ ही वर्ण, गन्ध, रस, स्वाद, प्लवादि के अनुसार भूमि के लक्षण, दीये की बाती के अनुसार पूर्वादि दिशाओं का ज्ञान जिस विधि से सम्भव हो, उसको भी कहें। प्रस्तारक्रमसूत्रं च राजधान्याः पुरादिकम्। पुरग्रामनगराद्यं खेटं कूटं च कर्वटम् ॥ 17 ॥ पुरप्राकारपरिखाप्रतोलीमार्गगोपुरम्। वेश्मानि राजवेश्यामानि सभां शालां गजाश्वयोः ॥ 18 ॥ भवनादि के लिए प्रस्तार क्रमसूत्र, राजधानी योग्य पुरों के अतिरिक्त जनवास के उपयोगी पुर, ग्राम, नगर, खेट, कूट, कर्वट के विषय में कहें। पुर की चहारदिवारी, परिखा, प्रतोली, मार्ग, गोपुर, योग्य महल, राजभवन, सभा, अश्व- गजशालाओं के बारे में कथन करें।
सूत्र-२ 13 सूत्रपातविधिं ज्ञात्वाऽऽयव्ययादेश्च लक्षणम् । ज्योतिषे केवलं ज्ञानं स्त्रीपुरुषादिलक्षणम् ॥ 19 ॥ निर्माण कार्य के लिए सूत्रपात की विधि और आय-व्ययादि के लक्षण, ज्योतिष, स्त्री-पुरुष लक्षणों के विषय में भी कहें। प्रासादप्रतिमालिङ्गःजगतीपीठमण्डपान् । प्रासादान् विविधाकारान् वैराज्यकुलसम्भवान् ॥ 20 ॥ अष्टजातिक्रमच्छन्दो देशानुरूपसूत्रणे। प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ, मण्डप, वैराज्यादि कुलों से बनने वाले नाना प्रकार के प्रसादों, आठ जाति के छन्द और देशानुरूप सूत्र-प्रमाण के विषय में भी कहने का कष्ट करें। रेखाश्च विविधास्तत्र प्रासादे शिखरे मताः ॥ 21 ॥ घण्टाकलशध्वजानां प्रमाणं सृष्टिसम्भवम् । प्रतिष्ठा सप्तधा ख्याता कूर्माद्या च ध्वजान्तगा ॥ 22 ॥ प्रासादों के शिखरों के लिए प्रयुक्त होने वाली नाना प्रकार की रेखाओं, शिखरोपयोगी घण्टा, कलश, ध्वजादि के निर्माण के प्रमाण, कूर्मादि सहित सात प्रकार की प्रतिष्ठा और ध्वजान्तगामी विधियाँ कहें। प्रासादे गर्भद्वारे च देवतानामनुक्रमः । द्वारदृष्टिपदस्थानं दिग्द्वारं च कथञ्चन ॥ 23 ॥ प्रासाद के गर्भद्वार और देवता नामानुक्रम, द्वार दृष्टि, पद स्थान, दिशाओं के द्वार के विषय में भी कहने की कृपा करें। द्वारलक्षणं प्रोक्तव्यं दारुकर्मरथारुहे (त्मके) । सिंहकर्णकपोतालीनिर्यूहच्छाद्यकं लुमम् ॥ 24 ॥ वितानानि विचित्राणि क्षिप्तान्युत्क्षिप्तकानिं च। पद्मकं नाभिच्छन्दं च सभामार्ग मन्दारकम् ॥ 25 ॥ इसके अतिरिक्त, द्वार के लक्षण, काष्ठादि के लक्षण, सिंहकर्ण, कपोताली, निर्यूह, छाद्यक, लुमा, वितान, चित्र-विचित्र क्षिप्त-अनुक्षिप्त, पद्मक, नाभिच्छन्द, सभा, मार्ग, मन्दारक आदि के विषय में भी बताएँ। प्रतिमालक्ष्मस्थानानि दृष्टिस्थानादिकं तथा। भृत्यचारप्रभेदाश्च स्वस्वयानादिकं तथा ॥ 26 ॥
14 अपराजितपृच्छा प्रतिमा, लाञ्छन के स्थान, दृष्टिस्थानादि, सेवकाचार के भेद और उनके यानादि, वाहनों के विषयों में भी कहें। तालप्रस्तारगीताद्यं वादित्रैः स्याच्चतुर्विधम्। चित्रपट्टप्रभेदाश्च रेखाचित्रसमुद्भवाः ॥ 27 ॥ इसी प्रकार सङ्गीत में ताल, प्रस्तार छन्द, गीतादि, चार प्रकार के वाद्यों (तत्, सुषिर, घन, आबद्ध), चित्रपट्ट के भेद, रेखाचित्रों के बनने की विधि कहें। वर्णरूपरसवृत्तिभावानुभावकोद्भवाः। शुद्धाबबद्धानि चित्राणि पत्राणि पञ्च एव च ॥ 28 ॥ शालभञ्जी प्रतांचारी लास्यताण्डवकादिकम्। वर्ण, रूप, रस, वृत्ति, भाव, अनुभाव से बनने वाले, शुद्ध, आबद्ध चित्रों, पाँच पत्रों, शालभञ्जिका, नृत्य में चारी, लास्य, ताण्डवादि नृत्यों के विषय में कहें। भूषणानि विचित्राणि देवासुरनृणां किल ॥ 29 ॥ छत्रं सिंहासनं शय्यां यानानि चायुधानि च। वेदिकानामलङ्कारं रत्नधातूद्भवं तथा ॥ 30 ॥ देवताओं, असुरों और मनुष्यों के नाना आभूषणों, छत्र, सिंहासन, शय्या, यान- विमान, आयुध, वेदिका, अलङ्कार, रत्नों-धातुओं की उत्पत्ति के विषय में कहें। एतत्सर्वं प्रसादेन कथय स्वयमीश्वर। भक्तवत्सल देव त्वं प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ 31 ॥ हे स्वयं ईश्वर! भक्त वत्सल देव!! उक्त समस्त विषयों के विषय में आप प्रभु! मेरे प्रति कहने का अनुग्रह करें। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सूत्रलक्षणाधिकारो नाम द्वितीयं सूत्रम् ॥ 2 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सूत्र लक्षण अधिकार नामक द्वितीय सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 2 ॥ ब्रह्माण्डोत्पत्तिर्नाम तृतीयं सूत्रम् ॥ 3 ॥ विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स प्रयत्नेन यत्त्वया परिपृच्छितम्। कथयामि न सन्देहस्तव भ्रान्तिहरं च तत् ॥ 1 ॥
सूत्र- ३ 15 (अपराजित के प्रश्न करने पर) विश्वकर्मा बोले— सुनो पुत्र! तुमने परिश्रम से जो-जो प्रश्न किए हैं, मैं तुम्हारा सन्देह और भ्रान्ति दूर करने को कहता हूँ। ब्रह्माण्डोत्पत्ति वर्णनमाह — पूर्वं ब्रह्माण्डमुत्पन्नं संसाराधारकं च तत्।¹ ततस्तस्मिन् समस्तं च जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २ ॥ पहले ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई और संसार को धारण करने वाले की उत्पत्ति हुई। इसके बाद उस पर समस्त स्थावर, जङ्गम जगत की उद्भावना हुई। आद्योद्भवसृष्टिसूत्रं ब्रह्मज्ञानादिकोद्भवम्। तदनुक्रमयुक्ती च कथयामि च साम्प्रतम् ॥ ३ ॥² आदिकाल में सृष्टि किस रीति से उत्पन्न हुई, वैसे ही किस प्रकार ब्रह्मज्ञान का उद्भव हुआ, ऐसी ही समस्त युक्तियों का मैं यहाँ अब कथन कर रहा हूँ। नैव भूर्वायुराकाशं नैव चन्द्रार्कतारकम्। देवासुरमनुष्याणां नोत्पत्तिं प्रलये विदुः ॥ ४ ॥³ पूर्वकाल में न तो पृथ्वी थी, न वायु न ही आकाश था, न चन्द्रमा था, न सूर्य और न ही तारागणादि थे। इसी प्रकार न तो देवता थे, न असुर; मनुष्यों की उत्पत्ति भी नहीं हुई थी, ऐसा विद्वज्जन कहते हैं। न पृथ्वी सागरा द्वीपाः शैला मेर्वादयस्तथा। भूतग्रामः समस्त्वेवं स्वेदाण्डोड्भिज्जरायुजाः ॥ ५ ॥⁴ तब पृथ्वी पर न सागर थे न द्वीप और न ही मेरु आदि पर्वत ही थे। इसी प्रकार न कोई ग्रामादि बस्ती थी। इसके बाद, यहाँ समस्त स्वेदज (पसीने से उत्पन्न होने वाले जीव), अण्डज (अण्डों से पैदा होने वाले जीव), जरायुज (जर से उत्पन्न होने वाले जीव) पैदा हुए। अन्ये च बहवो जीवाः कीटसर्पपतत्रिणः। चतुरशीति लक्षाणि जीवयोनिरनेकधा ॥ ६ ॥⁵
- पूर्वं ब्रह्माण्डोत्पत्ति संसारोधारकोद्भवं इति पाठः ।
- आद्योद्भवसृष्टिसूत्रं (स्तत्र) ब्रह्माण्डादिकटोद्भवम् ( ?)। तस्यायुक्ति अनुक्रमेण कथयामि च साम्प्रतमिति पाठः।
- न च भूमि चराकाशान् चन्द्रादितारकान् च। देवासुरमनुष्याणां तस्योत्पत्ति प्रलायाम्बिभू इति पाठः ।
- न च पृथ्वी सागरोविद्व पमेवीदि शिलोद्भवन् । भूतग्रामोग्राममस्त्व वंस्वेत जाण्डद्विजा रज इति पाठः ।
- अन्येषां बहवोजीवाकीट सर्पपतङ्गादयः । चतुराशी तीगणांनि जीवयोनि अनेकधा इति पाठः ।
16 अपराजितपृच्छा इसी प्रकार कीट, सर्प, पतङ्गादि बहुत प्रकार के जीव हुए— कुल चौरासी लाख जीव योनियाँ कही गई हैं। सृष्ट्यनन्तरे सम्भूताः सर्वे जीवानुरूपकाः। सृष्टिस्तत्र यथान्यायं कथ्यते च यथाक्रमम्॥ ७॥ सृष्टि निर्माण के अनन्तर समस्त जीवरूपों की उत्पत्ति हुई, इस सृष्टि के विषय में जैसा न्याय में कहा गया है, मैं यथाक्रम कहता हूँ। कल्पान्तसम्भवा सृष्टिः संसारसृष्टिसञ्जिता। मन्वन्तरमनुकान्तं युगान्तं चैव यादृशम्॥ ८॥¹ कल्प के अन्त में सृष्टि की उत्पत्ति हुई जिसको संसार नाम से कहा गया है। इस मन्वन्तर के क्रम से, युगान्त की क्रिया को मैं कहता हूँ। वर्षान्ते भावरूपाश्च ऋत्वन्ते तामसोद्भवः। पक्षान्ते च सिताः कृष्णा दिनान्ते शर्वरी यथा॥ ९॥² यहाँ वर्ष के अनन्तर (प्रकृति के) भावरूप ऋतुओं, (उजाले व) अन्धेरे की उत्पत्ति हुई। पक्ष में शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष हुए और दिन के साथ ही रात्रि आदि हुए। एतद् दृष्ट्वा विशेषेण कल्पान्त एवमुद्भवः। कल्पे कल्पे पुनः सृष्टिर्जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ १०॥ इस प्रकार अनेक विशेषताओं के साथ कल्पान्त में रचना होती है। प्रत्येक कल्प के अन्त में पुनः पुनः स्थावर-जङ्गम वाली जगत सृष्टि होती है। अपराजित उवाच — आदिसृष्ट्युद्भवो देव ब्रह्माण्डादिसमुद्भवः। ब्रह्माण्डं कथमुत्पन्नं कथं च द्वीपशैलयोः॥ ११॥ ब्रह्मा विष्णुः शशी सूर्य इन्द्रः स्कन्दो हुताशनः। नैव भूर्वायुराकाशं न देवासुरमानुषाः॥ १२॥ वेदोद्भवा च या सृष्टिः कर्म चैव सनातनम्। अस्माकं भक्तियुक्तानां कथयस्व परेश्वर॥ १३॥ अपराजित बोले— हे परमेश्वर! मैं भक्तिपूर्वक आपसे निवेदन करता हूँ कि मुझे आदिकाल में सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई; ब्रह्माण्डादि का उद्भव कैसे हुआ और इस ब्रह्माण्ड
- कल्पान्तोद्भवासृष्टी संसारासृष्टीकोद्भवा। मन्तरस्तनुक्रान्ता युगान्तामेव यादृशी इति पाठः।
- वर्षान्तो भावरूपाश्चरित्त्वर्तो मासोद्भवा। पक्षान्त शित कृष्णादि दिनान्ते शर्वशा यथा इति पाठः।
सूत्र- ३ 17 में कैसे द्वीप-पर्वतादि उत्पन्न हुए; कैसे ब्रह्मा, विष्णु, चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, अग्नि हुए? तब न तो भूमि थी, न वायु न ही आकाश और देव-असुर और मानव ही थे फिर वेदोद्भावा यह सृष्टि कैसे सनातनतः कर्म वाली हुई, कृपया इस विषय को कहिए। विश्वकर्मोवाच — अनादेरादिसम्भूतादन्धकारोद्भवं तमः। आदौ तथान्धतमसं निराधारं निरन्तरम्॥ 14 ॥¹ अनादि काल में यह सृष्टि उत्पन्न हुई। लय के बाद जब इसकी उत्पत्ति हुई तब अन्धकार ही था, अन्य कोई नहीं। आदिकाल में यह अन्धकार ही था जो निराधार और निरन्तर था। निराकारादकारश्च अकारादम्भउद्भवः। अम्भसो रूपमाख्यातमम्बुदो रूक्षसुदूर्ध्वतः ? ॥ 15 ॥² उस काल में निराकारादकार से ही आकाराद का उद्भव हुआ था। तब जलार्णव से रूप सम्भूत रूप हुआ जो रूक्षरूप (जलाण्ड या बुलबुला) में उठा हुआ था। अव्यक्ताद् व्यक्तमापन्नमवर्णे वर्णतां विदुः। व्यक्ताख्यं वर्णरूपं च फेनस्थानसमुत्थितम्॥ 16 ॥³ उक्त अव्यक्त से व्यक्त बुद्बुद अवर्णवत् हुआ, जैसा कि मनीषियों ने वर्णन किया है, वह बाद में व्यक्त नाम से वर्णरूप हुआ और फेन के स्थान पर उठा हुआ दिखाई देता था। फेनवर्णे निबद्धं च ह्यण्डके रूपमाश्रितम्। शनैः शनैः प्रवर्द्धन्ते लोलकाकाररूपिणः॥ 17 ॥⁴ वह अण्ड फेन के ही वर्ण से निबद्ध होने लगा और रूपाश्रित होने लगा। धीरे-धीरे वह बड़ा होने लगा और दोलायमान रूप में आया। वृद्धेर्वृद्धिः पुनस्त्वेवं शनैश्चापि महोद्भवः। महोद्भवो महावृद्धिः शनैश्चापि विवर्द्धते॥ 18 ॥⁵
- अनाद्यानादि सम्भूता तमध्वजान्धकोद्भवा। यदा अन्धतमन्धश्च निरन्धाश्च निरन्तरा इति पाठः।
- निरन्धारे अकारेश्च अंकारेशुं भुकोद्भवा। अम्भोद्बवरूपाख्याता आशुकोद् इत उर्ध्वत इति पाठः।
- अव्यक्ताव्यक्तोपमानां अवर्णे वर्णित विभु। वर्णरूपं व्यक्ताकारं च फनस्थाने च सम्भवम् इति पाठः।
- फवर्णैन विबन्धश्च अण्डकं रुपमा स्थितः। शनैशनै प्रवर्द्धन्तो गोलाकाररुपिणः इति पाठः।
- वृद्धि पुस्त्यं शतैश्चापि महोद्भवम्। वृद्धीते महतोद्भग विअधोदे पृष्ठमावृत्तमिति पाठः।