अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
42 अपराजितपृच्छा भूराज्यनिवेशनो नाम नवमं सूत्रम् ॥ ९ ॥ अपराजित उवाच - के च देवाः स्थिता लोके सप्तद्वीपेषु के स्थिताः । सिन्धूपकण्ठनिर्वासाः के च शैलाश्रमस्थिताः ॥ १ ॥ कानि क्षेत्राणि द्वीपेषु कास्तथा वासभूमयः । राजानः के च तत्रोक्ताः कथयस्व जगत्प्रभो ॥ २ ॥ अपराजित बोले - सप्त द्वीपों तथा लोकों में कौन-कौन से देवता निवास करते हैं तथा समुद्र के किनारे रहने वाले और पर्वतों के आश्रमों में रहने वाले कौन हैं, किन-किन क्षेत्रों और द्वीपों में रहने वालों की वासभूमि कैसी है, उनके राजा कौन हैं, हे जगत्प्रभो ! आप यह सब कहिए। विश्वकर्मोवाच - शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि द्वीपानां चैव लक्षणम् । प्रमाणं च तथोक्तानां कथये तव साम्प्रतम् ॥ ३ ॥ द्वीपांश्च कथयिष्यामि सप्तद्वीपा तु मेदिनी । पृथक् पृथक् महाराज्यं कथयामि समाहितः ॥ ४ ॥ विश्वकर्मा बोले - हे वत्स सुनो ! मैं तुम्हें द्वीपों के लक्षण तथा उनके कहे गए प्रमाण, लम्बाई-चौड़ाई, विस्तारादि अब कहता हूँ। इस सप्तद्वीपा मेदिनी के पृथक्- पृथक् द्वीपों, महाराज्यों के विषय में विस्तार से कहता हूँ। पृथुश्च कुशक्रौञ्चौ च शाकः शाल्मलिकस्तथा । गोमेदः पुष्कराख्यश्च सप्तद्वीपा नृपैः कृता ॥ ५ ॥ महाराजाभिधानैश्च सप्तद्वीपाभिधानकम् ।
- पृथु, 2. कुश, 3. क्रौञ्च, 4. शाक, 5. शाल्मलि, 6. गोमेद और 7. पुष्कर ये सात द्वीप राजाओं ने किए हैं। इन सप्तद्वीपों के अधिनायक महाराजा के अभिधान (उपाधि, पदवी) से सुशोभित होते हैं। पुष्कराख्यो महाराजः सप्तद्वीपदीपकः ॥ ६ ॥ गोमेदस्य गोमेदः शाल्मलेः शाल्मलो नृपः । शाकश्च शाकद्वीपे च क्रौञ्चः क्रौञ्चाधिपस्तथा ॥ ७ ॥ कुशश्च कुशद्वीपे च महोत्कटा महाबलाः । महारूपाश्च भूपालाः संस्थिता मेरुदक्षिणे ॥ ८ ॥
सूत्र-९ 43 सातवें द्वीप पुष्कर के कीर्तिमान महाराज पुष्कर (अधिपति) नाम से विख्यात है। इसी तरह से गोमेद द्वीप के महाराज गोमेद और शाल्मलि द्वीप के महाराज शाल्मलि नृप कहे गए हैं। शाकद्वीप के महाराज शाक और क्रौञ्च द्वीप के महाराजा क्रौञ्च के नाम से विख्यात है। कुश द्वीप के महाराज परमवीर महाबली कुश नरेश है। इस तरह मेरु के दक्षिणी भाग में महान् रूपों वाले भूपालगण महाराजा विद्यमान हैं। अथ जम्बूद्वीपवर्णनमाह — पृथुः पृथुमहीश्वरः जम्बूद्वीपाधिपः पृथुः । मेरोः प्रदक्षिणे कुक्षौ जम्ब्वाख्यश्च महातरुः । यस्य नाम्ना तु विख्यातो जम्बूद्वीपेतिसञ्ज्ञितम् ॥ ९॥ जम्बू द्वीप के अधिपति महाराज पृथु है और ये पृथु महाराज इस समस्त पृथ्वी के महीश्वर, स्वामी है। मेरु पर्वत के प्रदक्षिण कुक्ष में जम्बू नाम का एक वृक्ष है, इसी के नाम से इस द्वीप का नाम जम्बू विख्यात हुआ है। एक
मेर्वावृत्त्या प्रदक्षिण्यै रम्यको मुक्तिभूतल । मेरोश्च पुरतो भागे इलाख्यः केतुमालिका ॥ 14 ॥ दक्षे हरिर्भारतश्च किम्पुरुषश्च पुष्करे। अब्ध्यन्तः कुरुभद्राश्वौ मेरोश्चैवोत्तरे स्थिताः ॥ 15 ॥ मेरु के घेरे में दक्षिण की ओर भूतल पर मुक्ति का रम्यक धाम है। मेरु के अग्रभाग (पूर्व) में इला नामक केतुमालिका है। मेरु के दक्षिण में हरिभारत, किम्पुरुष और पुष्कर हैं। मेरु के उत्तर भाग में स्थित समुद्र के अन्त तक फैले हुए कुरु और भद्राश्व प्रदेश हैं। तत्रैव गन्धर्वविद्याधराक्षनिवासिनामाह — मेरुवृत्ताङ्गे दक्षिणे रम्यकस्योर्ध्वमालिका। गन्धर्वनगरी रम्या नाम्ना गन्धर्वमालिनी ॥ 16 ॥ विद्याधरास्तदूर्ध्वे तु यक्षाश्चैवं तदूर्ध्वतः । तदूर्ध्वं वैदेवाः ख्याता देवाश्चैवं तदूर्ध्वतः ॥ 17 ॥ इसी प्रकार मेरु के
सूत्र-१० 45 तत्र शम्भुमहादेवो ह्यव्यक्तं परमं पदम्। प्राचीना च भवेन्मूर्तिः सूर्यतेजरसमुद्भवा ॥ २१ ॥ यहाँ पर सभी प्रकार के रत्न जैसे हीरा, वैदूर्य, गोमेद, पुष्पराग, इन्द्रनील आदि सब द्वादश आदित्यों के तेज से युक्त और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशयमान हैं। यहीं पर महादेव शम्भू अव्यक्त रूप से परमपद में अवस्थित है और यह मूर्ति अति प्राचीन है जो सूर्य के तेज से समुद्भूत हुई है। ब्रह्मविष्णु ततो जातौ संसारसृष्टिकोद्भवौ। ब्रह्मतेजस्समुत्पन्नः काश्यपो मुनिपुङ्गवः ॥ २२ ॥ सृष्टिस्तदुद्भवा त्वेवं जगत्स्थावरजङ्गमम्। चतुर्विधो भूतग्रामः पृथक् पृथक् शरीरिणाम् ॥ २३ ॥ इन्हीं शम्भू से ब्रह्मा और विष्णु का जन्म हुआ है जो संसार की सृष्टि के उद्भव के कारक हैं। ब्रह्मा के तेज से मुनि पुङ्गव काश्यप उत्पन्न हुए। उन्हीं से यह सृष्टि उद्भूत हुई है जिसमें स्थावर-जङ्गम जगत बना और चार प्रकार के प्राणी समूह अलग-अलग देहधारण किए उत्पन्न हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां भूराज्यनिवेशनाधिकारो नाम नवमं सूत्रम् ॥ ९ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भू राज्य निवेशन अधिकार नामक नवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥ संसारभूतग्रामोत्पत्तिपञ्चतत्त्वनिर्णयो नाम दशमं सूत्रम् ॥ १० ॥ अपराजित उवाच - केनोत्पत्तिः समस्तानां भूतानां च तथालयः। केनासौ कलते कालो लयं यान्ति च सर्वशः ॥ १॥ केनासौत्र नाति कालन्यानास्यासः ? वद प्रभो। ज्ञानं तनु युक्तोद्रव्यं पश्यन्ते च परस्परं विदुः ? ॥ २ ॥ अपराजित बोले- संसार में समस्त भूत प्राणियों की और उनके आवास की उत्पत्ति किसके द्वारा हुई तथा किसके द्वारा यह काल-कलित हो रहा है ? किसके द्वारा ये सब पूरी तरह से विलीन होकर मिट जाते हैं ? यहाँ कौन ऐसे हैं जो काल से भी प्रभावित नहीं होते ? ऐसे ज्ञान स्वरूप तन युक्त द्रव्य को जो परम विद्वान परस्पर देखते हैं, उनके विषय में हे प्रभु ! आप कुछ कहिए।
विश्वकर्मोवाच — पञ्चात्मकं पञ्चसु वर्तमानं षडाश्रयं षड्गुणयोगयुक्तम्। तं सप्तधातुविमलं तं योनिं चतुर्विधं हारमयं शरीरकम्॥ ३॥ विश्वकर्मा बोले — पाँच से पञ्चात्मक वर्तमान में, छह से छह गुणों का योग बनता है। उसी सप्तधातु रूपी विमल को तथा योनि को और चार प्रकार के मनोमय (यष्टि) शरीरों को समझो। पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च। पञ्चात्मकमिति प्रोक्तं कथयामि गुणोद्भवन्॥ ४॥ (इस शरीर की रचना में) (1.) पृथ्वी, (2.) जल, (3.) तेज, (4.) वायु और (5.) आकाश— इनको पञ्चात्मक कहा गया है। अब इनसे उत्पन्न गुणों को कहता हूँ। कठिना या सा तु पृथ्वी द्रवाश्चापस्तदुद्भवाः। दीप्तं चत्तद्द्वेत्तेजः चलं तत् पवनात्मकम्॥ ५॥ यच्छिद्रं तु तदाकाशं तेभ्यः सर्वसमुद्भवः। इत्थं पञ्चात्मकं भूतं कथितं हि यथाक्रमम्॥ ६॥ जो कठिन या ठोस है, उसे पृथ्वी कहा गया है, जितने भी द्रव्य पदार्थ है, वे जल से उत्पन्न हुए हैं, जितने भी दीप्त स्वरूप पदार्थ हैं वे तेज या अग्नि से उत्पन्न हैं, जो हलचल या चलिष्णुता है वह पवनात्मक है जबकि जो छिद्र जैसी पोल है, वही आकाश है तथा उस आकाश से ही सब कुछ उत्पन्न या प्रकट हुआ है। इस प्रकार इसी को पञ्चात्मक भूतसृष्टि या पञ्चभूतात्मक सृष्टि कहा गया है, जिसे मैंने यथाक्रम कहा है। पृथिवी धारणं कृत्वा द्रवीकरणं तथैव च। तदुद्भवं तेजः पुञ्जस्तेजत्वेषु समुद्भवे ?॥ आकाशस्याधिकारश्च पञ्चात्मकःस्यादनुक्रमात् ?। अब पृथ्वी द्वारा धारण किए गए गुण, जल से द्रवीकरण वाले गुण तेज से प्रकट होने वाले गुण, वायु से होने वाले गुण और आकाश के अधिकार में रहने वाले गुण के पञ्चात्मक को अपने अनुक्रम से कहता हूँ। स्पर्शो रसश्च रूपं च गन्धः शब्दश्च पञ्चमः॥ 7॥ जिह्वयां रस आयाति स्वादस्यैव च कारणम्। रूप च चक्षुषांश्चैव गन्धो घ्राणात् तथा मतः॥ 8॥
सूत्र- १० 47 शब्दो ब्रह्मादि ? सम्भूतः पञ्चतत्त्वानि वै विदुः । गतिर्ग्राहस्तुतिर्व्याप्तिर्विसर्गश्चैव पञ्चकम् ॥ ९ ॥ पृथ्वी से ( 1.) स्पर्श, जल से ( 2.) रस, तेज से ( 3.) रूप, वायु से ( 4.) गन्ध और आकाश से ( 5.) शब्द गुण उत्पन्न जानना चाहिए। जिह्वा से जो रस आता है, उसका कारण स्वाद है। आँखों से रूप का और नासिका से गन्ध का भान होता है, ऐसा माना जाता है। जिसे शब्द कहा है, वह ब्रह्म के आदि में आकाश से सम्भूत हुआ, इन्हीं को विद्वानों से पञ्चतत्त्व कहा है। ( 1.) गति, ( 2.) ग्रहण करना, ( 3.) स्तुति, ( 4.) व्याप्ति और ( 5.) विसर्ग— ये पाँच शारीरिक क्रियाएँ हैं। पादैः स्याद् गतिसंयोगः हस्तैस्तु ग्रहणं भवेत्। उपस्थानैर्व्यापयन्ति विसर्जन्ति गुदेन च ॥ 10 ॥ श्रुतिः श्रोत्रेन्द्रियेणैव जिह्वया च तथा रसः । एवं तत्त्वोद्भवा सृष्टिस्तन्मात्रादिकमुच्यते ॥ 11 ॥ पाँव से गति का संयोग होता है और हाथों से ग्रहण करने का कार्य होता है। उपस्थान से व्याप्ति का कार्य एवं गुदा से विसर्जन का कार्य होता है। श्रोतेन्द्रिय, कानों से सुनने की क्रिया, जिह्वा से रस का बोध होता है। इस प्रकार से उन-उन इन्द्रियों से होने वाले ज्ञान की (तत्त्वोद्भव) सृष्टि को तन्मात्रादिक कहा जाता है। आत्मा तन्मात्राण स ? मनः सङ्कल्पलक्षणम्। व्यवसायो बुद्धिभावः प्रज्ञाहङ्कारकौ तथा ॥ 12 ॥ तत्तथा तु तन्मात्रं बुद्धीन्द्रियक्रमस्फुटम्। व्यवसायो बुद्धियोगः प्रज्ञा विकाशकोद्भवा ॥ 13 ॥ अहङ्कारश्च विकृतो रागद्वेषाकुलो ध्रुवम्। पञ्चपित्तोद्भवाश्चैवं आतपकुलसम्भवाः ॥ 14 ॥ आत्मा की तन्मात्रा का ज्ञान सः (वह परमतत्त्व है?), मन की तन्मात्रा सङ्कल्प को तथा बुद्धि की तन्मात्रा व्यवसाय भाव, काम करने का तरीका है, बुद्धि की तन्मात्रा अहङ्कार का भाव है। इन-इन तन्मात्राओं से ही बुद्धि आदि इन्द्रियों का क्रम स्पष्ट हो पाता है। व्यवसाय से बुद्धियोग तथा विकाश से उत्पन्न होता है प्रज्ञा का परिचय। जब अहङ्कार में विकृति होती है, तब राग-द्वेष से दुखी होना तो निश्चित है। आतप या गर्मी के समूह से उत्पन्न होने वाले पाँच पित्त से होने वाले विकार हैं। पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च। शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धश्च पञ्चकं त्विदम् ॥ 15 ॥
48 अपराजितपृच्छा गतिर्ग्राहः श्रुतिर्व्याप्तिर्विसर्गो दशपञ्चकम्₁₅ । ( 1 . ) पृथ्वी, ( 2 . ) जल, ( 3 . ) तेज ( 4 . ) वायु और ( 5 . ) आकाश— ये पाँच, ( 1 . ) शब्द, ( 2 . ) स्पर्श, ( 3 . ) रस, ( 4 . ) रूप ( 5 . ) गन्ध— ये पाँच और ( 1 . ) गति, ( 2 . ) ग्राह्यता, ( 3 . ) श्रुति, ( 4 . ) व्याप्ति, ( 5 . ) विसर्ग— ये पाँच मिलकर कुल पन्द्रह होते हैं। अहङ्कारो रागद्वेषौ क्रोधोऽस्मिता प्रकृतयः ॥ 16 ॥ मनः प्रज्ञा बुद्धिचित्तभावाश्च पञ्चविंशतिः₂₅ । कामो मदो लोभमोहौ भयं तत्त्वानि त्रिंशतिः₃₀ ॥ 17 ॥ इनमें ( 1 . ) अहङ्कार, ( 2 . ) राग, ( 3 . ) द्वेष, ( 4 . ) अस्मिता, ( 5 . ) क्रोध, ( 6 . ) प्रकृतियाँ,
सूत्र-१० 49 ब्रह्मबिन्दुसमायोगं शिवशक्तिः परात्परम्। संयुक्तयोग एवं यो योगयुक्तः स उच्यते॥ २२॥ योग युक्तियों के प्रयास से बनने वाले संयोगों, कामों में तथा योग युक्ति रहित (?) कामों में बनने वाले अयोगकारी काम आदि सब शिव-शक्ति के सम्मिलित प्रयास से होने वाले सफल काम की तरह एवं ब्रह्मा, विष्णु की सम्मिलित शक्ति अपने आप होने वाले काम की तरह संयोग ही है। ब्रह्म और नादबिन्दु के समायोग से जो परात्पर सर्वोच्च शिवशक्ति प्रकट होती है, उसे ही संयुक्तयोग तथा योगयुक्त-ऐसा कहा जाता है। रक्तः पीतः श्वेतकृष्णौ श्यामो नीलस्तथा हरित्। सप्तधास्तु इमे प्रोक्ताः सप्तस्थानादिकोद्भवाः॥ २३॥ सात स्थानों से उत्पन्न होने वाले (1.) रक्त-लाल, (2.) पीत-पीला, (3.) श्वेत-सफेद, (4.) कृष्ण, (5.) श्याम-सांवला (6.) नील-आसमानी, (7.) हरित्- हरा- ये सप्तधातु कहलाते हैं। श्वेताः श्वेतसमुद्भूता रक्ता रक्तसमुद्भवाः। पीताः पीतसमुत्पन्नाः कृष्णाश्च मेचकोद्भवाः॥ २४॥ श्यामाः श्यामसमुद्भूता नीलाश्च ज्योतिर्मण्डले। निशा भासाद्भवोत्पन्नाः सङ्ख्याः सप्त प्रकीर्तिताः॥ २५॥ श्वेत सभी श्वेत वस्तुओं से बनते हैं, रक्त सभी लाल वस्तुओं से, पीत सभी पीली वस्तुओं से, कृष्ण काली वस्तुओं से बनते हैं। श्यामा-सांवले रङ्गों की वस्तुओं से तथा नीले नील की वस्तुओं से इस ज्योतिर्मण्डल में बनते हैं। इसी प्रकार (हरित) हल्दी जैसी वस्तुओं से होते हैं, इन सबकी संख्या सात कही गई है। रागद्वेषालसाश्चैव विमला मतसम्भवाः। चतुर्विधा भूतग्राम मेतसांनि चतुर्विधा ?॥ २६॥ अण्डजा उद्भिजाश्चैव जरायुजाश्च स्वदेजाः। चतुर्विधा योनिजाश्च संसारे सृष्टिसम्भवाः॥ २७॥ (1.) राग, (2.) द्वेष, (3.) आलस्य, (4.) विमल-निर्मलता और (5.) मल- मैल से उत्पन्न होने वाले चार तरह के प्राणी समूह होते हैं जो भी सब चार प्रकार के होते हैं। ये चारों (1.) अण्डज- अण्डों से उत्पन्न होने वाले, (2.) उद्भिज- पृथ्वी पर उगने वाले पेड़-पौधे, (3.) जरायुज- गर्भ में उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि और (4.) स्वेदज- पसीने से उत्पन्न होने वाले जूँ, खटमल आदि जीव। ये चार प्रकार
50 अपराजितपृच्छा की योनियाँ हैं जिनसे यह संसार की सृष्टि सम्भव हुई है।¹ कामक्रोधलोभमोहभयादि पञ्चकोद्भवः। एवमादि गुणोपेताः पञ्चकामेन्द्रियाणि च॥ 28 ॥ अब पञ्च कामेन्द्रियों से उनके गुणों से उत्पन्न होने वाले (1.) काम, (2.) क्रोध, (3.) लोभ, (4.) मोह और (5.) भय को समझें। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां संसारभूतग्रामोत्पत्तिपञ्चतत्त्वनिर्णयाधिकारो नाम दशमं सूत्रम् ॥ 10 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में संसार भूतग्राम उत्पत्ति पञ्चतत्त्व निर्णय अधिकार नामक दसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ 10 ॥ पञ्चतत्त्वपञ्चगुणनिर्णयो नामैकादशं सूत्रम् ॥ 11 ॥ अपराजित उवाच - कथं भवश्च जीवानां स्नेहः स्त्रीणां नृणां कथम्। स्नेहात्त्वां परिपृच्छामि ह्लादयन्तं निजात्मजम् ॥ 1 ॥ अपराजित बोले - इस भव-संसार में जीवों में स्नेह किस प्रकार बनता है और यहाँ के स्त्री-पुरुषों में भी लगाव किस प्रकार बनता है, यह सब मैं आपसे स्नेह होने के कारण बड़ी नम्रतापूर्वक पूछता हूँ, अतः इसका उद्बोधन करके आप अपने आत्मज मुझ अपराजित को आह्लाद-प्रसन्नता प्रदान करें। विश्वकर्मोवाच - शिवशक्तिस्नेहात्मकः कामश्च हृदयात्मजः। ततः सम्युक्तयोगश्च शिवशक्ती परात्परे ॥ 2 ॥ इति कामस्य संयोगाच्छिवशक्तिप्रभावतः। स्वयं ब्रह्मरुतेनैव नादबिन्दुसमुद्भवः ॥ 3 ॥ विश्वकर्मा बोले - शिव तथा शक्ति² के हृदय से उत्पन्न होने वाले काम से ही शिव-शक्ति में स्नेहात्मक भाव की उत्पत्ति हुई तथा इससे ही यह संयुक्तयोग बन
- तथा च भागवतीगीतायां - अण्डजाः स्वेदजाश्चैवोद्भिजाश्चैव जरायुजा। अण्डजाः पक्षिसर्पाद्याः स्वेदजा मशकादयः॥ वृक्षगुल्मप्रभृतयश्चोद्भिजा हि विचेतनाः। जरायुजा महाराज मानुषाः पशवस्तथा॥ शुक्रशोणितसम्भूतो देहो ज्ञेयो जरायुजः। (महाभागवत अपरनाम देवीपुराण 17, 6-8)
- अन्यच्च - शक्तिद्वयं हि मायया विक्षेपावृत्तिरूपकम्। विक्षेपशक्तिर्लिङ्गादिब्रह्माण्डन्तं जगत्सृजेत्॥ अतर्हद्दृश्ययोर्भेदं बहिञ्च ब्रह्मसर्गयोः। आवृणोत्यपरा शक्तिः सा संसारस्य कारणम्॥ (वेदान्तसारटीका)
सूत्र-११ 51 सका जिससे शिव-शक्ति परात्पर, सबसे महान माने जाते हैं। यह सब काम के संयोग से शिव-शक्ति का ही प्रभाव है जिससे स्वयं ब्रह्मा के हृदय में इसी तरह का नाद और बिन्दू का समुद्भव हुआ। एकीभूतं यदा काले त्वन्तकाले प्ररोहति। सङ्क्रमच्छुक्ररक्तं तु ब्रह्मविष्णुशिवात्मजम् ॥ ४ ॥ इस तरह जब जिस काल में यह नाद और बिन्दू एकीभूत हुआ या मिला और अन्त में जब वह एकीभूत स्वरूप शुक्र व रक्त के संक्रमण से मिलने से प्ररोहण करने लगा, बढ़ने लगा तो वह ब्रह्मा, विष्णु और शिव का ही आत्मज-सन्तान है, ऐसा समझना चाहिए। पिण्डनिर्माणचरणमाह — कललं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रैश्च बुद्बुदम्। शोणितं दशरात्रैश्च मांसहीनं चतुर्दशैः ॥ ५ ॥ घनं मांसं विंशतिभिर्गर्भस्थं वर्द्धते क्रमात्। एकमासे च सम्पूर्णे पञ्चतत्त्वानि धारयेत् ॥ ६ ॥ यह शुक्र-रक्त का एकीभूत रूप जब बढ़ता है तो एक रात्रि में उसका रूप कलल कहा जाता है और वही जब पाँच रात्रि का हो जाता है तब बुद्बुद कहा जाता है। दस रात्रि का हो जाने पर उसे ही शोणित कहते हैं और चौदह दिन का हो जाने पर उस मांसहीन कहते है। इस प्रकार वह बढ़ते-बढ़ते बीस दिन में घन मांसपिण्ड रूप बनकर गर्भस्थ होकर क्रमपूर्वक बढ़ता जाता है और पूरा एक मास का हो जाने पर पञ्चतत्त्वों को धारण कर लेता है। मासद्वये च सम्पूर्णे मांसपिण्डः प्रजायते। मज्जास्थिनी त्रिभिर्मासैः केशाङ्गुल्यश्चतुर्थके ॥ ७ ॥ कर्णजिह्वानासिकाश्च रन्ध्रं मासे तु पञ्चमे। कण्ठरन्ध्रोदरे षष्ठे गुह्यं चाण्डं च सप्तमे ॥ ८ ॥ सर्वाङ्गसन्धिसम्पूर्तिरष्टमासैः प्रजायते। मासे च नवमे प्राप्ते गर्भस्थः स्मरति स्वयम् ॥ ९ ॥ यही जब दो मास का हो जाता है तो मांसपिण्ड बन जाता है। उसमें तीन मास में मज्जा, अस्थि आदि बनती है और चौथे मास में उसके केश और अङ्गुलियाँ भी बनने लगती है। इस तरह बढ़ते-बढ़ते पाँचवें मास में उसके कान, जिह्वा, नासिका आदि के रन्ध्र बनते हैं। छठे मास तक बढ़ने पर तो इसमें कण्ठ के और उदर के
52 अपराजितपृच्छा रन्ध्र-छिद्र तथा सातवें माह में उसके गुसाङ्ग और अण्डकोश बनते हैं। इस प्रकार बढ़ते-बढ़ते वह कलल आठवें मास तक सभी अङ्गों की सम्पूर्ति से युक्त हो जाता है और नवें मास में पहुँचने पर वह गर्भस्थ प्राणी स्वयं अपने आपको स्मरण करने लगता है।¹ मातरं पितरं भ्रातॄन् पुत्रपौत्रादिकं तथा। ज्ञानतोऽथ प्रार्थयते धर्मं च देवतादिकम्॥ 10 ॥ येनाहं न पतेयं वै संसारयोनिसङ्कटे। अहं तं च करिष्यामि निःसृतो गर्भवासतः ॥ 11 ॥ इस प्रकार स्मरण करता हुआ वह अपने पूर्व के माता-पिता, भाई-बन्धु, पुत्र- पौत्रादिकों को याद करता हुआ अपने धर्म और देवताओं की प्रार्थना करता है कि जिससे मैं संसार में इस योनि सङ्कट गर्भवास में पुनः नहीं पहूँ, वही मैं करूँगा, यदि मैं गर्भवास से बाहर आ जाऊँ। विकासो जायते तस्य गर्भवासं ततस्त्यजेत्। योनेर्यो निस्सरेत्तिर्यक् मृत्युस्तस्य भवेद् ध्रुवम्॥ 12 ॥ बधिरो वा भवेदन्धो जायते मूर्च्छनादिकम्। एवं विनिःस्रतो जन्तुः संसारे मुह्यते क्षणात्॥ 13 ॥ इस प्रकार पूर्ण विकास हो जाने पर वह गर्भवास को तत्काल त्याग देता है। इस अवस्था में यदि वह गर्भस्थ शिशु योनि से बाहर निकलते समय तिर्यक् अर्थात् आड़ा पड़ जाए तो उसकी निश्चित ही मृत्यु हो जाती है, यह ध्रुव सत्य है। यदि योनि से बाहर आते समय वह मूर्च्छित अवस्था में होता है तो बहरा अथवा अन्धा हो जाता है परन्तु इस प्रकार स्वस्थ जन्म लेने वाला जन्तु जीव संसार को तत्क्षण मोहित कर लेता है और सबको प्रसन्न कर देता है।
- वराहमिहिर का मत है कि गर्भाधान के पहले मास से लेकर सातवें मास तक क्रमशः शुक्र, मङ्गल, गुरु, सूर्य, चन्द्र, शनि और बुध मासाधिपति होते हैं। इनके प्रभाव से पहले मास में गर्भ का रूप कलल अर्थात् शुक्र-शोणित मिश्रित झिल्ली का आकार, द्वितीय में पिण्डाकार (घन) तीसरे में अवयव, चतुर्थ में अस्थिवाला, पाँचवें में त्वचा, छठे में रोम और सातवें में स्मृतियुक्त होता है। इसके बाद, आठवें से दसवें मास तक क्रमशः लग्नेश, चन्द्र और सूर्य मासाधिपति होते हैं। उनके प्रभाव से आठवें मास में असन (मातृभुक्त-अन्नभोजन), नवें मास में उद्वेग और दसवें मास में प्रसव होता है- कललघनावयवास्थित्वग्रोमस्मृति समुद्भवः क्रमशः। मासेषु शुक्रकुजजीवसूर्यचन्द्रार्कि सौम्यानाम्॥ अशनोद्वेगप्रसवाः परतो लग्नेशचन्द्रसूर्याणाम्। कलुषैः पीडा पतनं निपीडितैर्निर्मलैः पुष्टिः ॥ (लघु जातकम् 5, 6-7)
सूत्र-११ 53 इत्यमनन्तरमहाभूतादिकमाह— अथ चैवं प्रवक्ष्यामि महाभूतविनिर्णयम्। पञ्चात्मकः परो भावो ह्यपरं पञ्चभूतकम् ॥ 14 ॥ अब मैं महाभूतादिकों के विषय में कहता हूँ। इन पञ्चभूतों का परोभाव पञ्चात्मक होता है, जो निम्नानुसार होगा— त्वचामांसास्थिनखरा रोमाण्याद्या पञ्चकम्। क्षितेरेतान् गुणान् पञ्च वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ 15 ॥ देह में (1.) त्वचा, (2.) मांस, (3.) अस्थि, (4.) नख और (5.) रोम— ये पाँचों पृथ्वी के गुण होते हैं, ऐसा ब्रह्मवादियों का कहना है। लाला मूत्रं तथा शुक्रं मज्जा रक्तं च पञ्चमम्। इमान्यपांव्यञ्जकानि वदन्ति ज्ञानिनः सदा ॥ 16 ॥ इसी प्रकार (1.) लार, (2.) मूत्र, (3.) शुक्र, (4.) मज्जा और (5.) रक्त— ये पाँचों गुण जल से बनते हैं, ज्ञानियों का सदा से ही ऐसा कहना है। क्षुधा तृषा तथा निद्रा चालस्यं कान्तिरेव च। तेजस्तु समुत्पन्ना वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ 17 ॥ इसके अतिरिक्त (1.) क्षुधा, (2.) तृष्णा, (3.) निद्रा, (4.) आलस्य और (5.) कान्ति— देह में इन पाँचों गुणों को तेजोत्पन्न जानना चाहिए, ऐसा ब्रह्मवादियों का कहना है। धावनं प्लवनं चैव सङ्कोचनप्रसारणे। निरोधः पञ्चमश्चैव वायोरेतन्तु पञ्चकम् ॥ 18 ॥ वायु से उत्पन्न होने वाले गुण हैं— (1.) धावन या दौड़ना, (2.) प्लवन या बहना, (3.) सङ्कोचन या सिकुड़ना, (4.) प्रसारण या फैलना और (5.) निरोध। रागद्वेषौ भयं मोहः प्रसादश्चैव पञ्चमः। एते पञ्च गुणाः प्रोक्ता आकाशस्य व्यवस्थिताः ॥ 19 ॥ इसी प्रकार (1.) राग, (2.) द्वेष, (3.) भय, (4.) मोह और (5.) प्रसाद या प्रसन्नता— ये पाँचों गुण आकाश की व्यवस्था में कहे गए हैं। पञ्चतत्त्वैः समुत्पन्ना गुणानां पञ्चविंशतिः₂₅ । पृथक् पृथक् च प्रत्येकं पञ्च पञ्चकसम्भवः ॥ 20 ॥ इस प्रकार इन पञ्चतत्त्वों से पच्चीस गुण उत्पन्न होते हैं। इन सबके पृथक्-
54 अपराजितपृच्छा पृथक् प्रत्येक के पुनः पाँच गुण होते हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योपराजितपृच्छायां पञ्चतत्त्वपञ्चगुणनिर्णयाधिकारो नामैकादशं सूत्रम् ॥ 11 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पञ्चतत्त्व पञ्चगुण निर्णय अधिकार नामक ग्यारहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 11 ॥ गर्भविज्ञानोद्भवो नाम द्वादशं सूत्रम् ॥ 12 ॥ अपराजित उवाच — पञ्चविंशगुणैर्युक्ताः पञ्चतत्त्वसमन्विताः । वर्तन्ते संसृतौ ये तु तेषां मोक्षः कथञ्चन ॥ 1 ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्तिरेषां कथं भवेत् । किं तेषां च फलं लोके संसारसारसागरे ॥ 2 ॥ अपराजित बोले — पच्चीस गुणों से युक्त इन पञ्चतत्त्वों से समन्वित होकर जो प्राणी इस संसार में आते हैं, उनका मोक्ष, उद्धार कैसे होता है ? कहें। इनको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— इन पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति किस प्रकार होती है और उनको इस संसार रूपी भवसागर में आने का इस लोक में क्या फल मिलता है ? विश्वकर्मोवाच — उत्पन्ना गर्भसम्भूतेर्निःसृता योनिसङ्कटात् । अचैतन्या अस्मराश्च उद्भूता बधिरान्धकाः ॥ 3 ॥ तत्रैवं ते प्रवर्तन्ते संसारजालमोहिताः । कामात्मानः प्रपीड्यन्ते तृष्णाक्रान्तास्तथैव च ॥ 4 ॥ विश्वकर्मा बोले— गर्भवास मे आकर योनि सङ्कट से निकलने वाले प्राणी यदि अचेतन अवस्था में जन्मते हैं तो या तो बहरे हो जाते हैं या अन्धे होते हैं। इसी तरह से वे संसार जाल से मोहित होकर तृष्णाओं से घिरे हुए तरह-तरह की कामनाओं से पीड़ा पाते हुए प्रवृत्त होते हैं। चक्षुर्भिः स्नेहपाशैश्च मोहं कुर्वन्ति कामिनः । पुनः पतन्ति संसारे पतङ्गा दीपवर्त्तिषु ॥ 5 ॥ आत्मानं वेदचक्षुर्भिः पश्यन्ति ज्ञानदृष्टयः । ते नराः परमं यान्ति न पतन्ति पुनर्भवे ॥ 6 ॥
सूत्र- १२ 55 अपनी आँखों के स्नेह-पाश से कामीजन मोह रूपी अज्ञान में पड़कर ऐसे कर्म कर बैठते हैं जिनसे वे इस संसार रूपी गर्त में वैसे ही गिरते हैं, जैसे कोई पतङ्गा दीप की बाती को जलते हुए देखकर स्नेह और मोहवश जलते हुए दीप की लौ में हठात् गिरकर अपने पङ्ख जला बैठता है और मृत्यु को प्राप्त करता है। इसके विपरीत जो लोग अपने को वेद की दृष्टि के अनुसार चलकर ज्ञान की दृष्टि से देखते हैं, वे लोग परमपद को प्राप्त करते हैं और पुनर्भव में नहीं पड़ते अर्थात् पुनर्जन्म नहीं लेते, उनकी सीधे ही मुक्ति हो जाती है। उद्यमैः साहसैर्धैर्यैर्गुरुभक्तिपरायणाः । धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्तिहेतुर्मनीषया ॥ 7 ॥ नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ 8 ॥ अतः मनीषियों, ज्ञानियों, समझदारों को चाहिए कि वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पदार्थ चतुष्टय की प्राप्ति के लिए उद्यमपूर्वक, धैर्य और साहस के साथ गुरु-भक्ति परायण होकर सदाचरण युक्त जीवन व्यतीत करें। क्योंकि, अरबों-खरबों कल्पों में भोगे गए कर्मों का फल कभी भी क्षीण नहीं हो सकता और शुभ या अशुभ कर्म जो भी किए जा चुके हों, उनका शुभ या अशुभ फल भी अवश्य भोगना पड़ता है। कृतयुगानुरूपेणज्ञानमाह — कृतत्रेताद्वापरे च चतुर्थे वा कलौ युगे । ज्ञानं धर्मो गुरुर्देवो युगानुरूपभावना ॥ 9 ॥ कृते तु सहजं ज्ञानं त्रेताया कुलजं तथा । द्वापरे शास्त्रजं ज्ञानं क्षेत्रजं तु कलौ युगे ॥ 10 ॥ सहजं कुलजं चैव शास्त्रजं क्षेत्रजं तथा । एवं चतुर्विधं ज्ञानं युगरूपानुमोदितम् ॥ 11 ॥ (1.) कृतयुग, (2.) त्रेतायुग, (3.) द्वापरयुग और (4.) कलियुग में (1.) ज्ञान, (2.) धर्म, (3.) गुरु और (4.) देवता के प्रति अपने-अपने युग के अनुरूप ही लोगों की भावना होती है। इस नियमानुसार सत्युग में अपने सहज ज्ञान से; त्रेतायुग में अपने कुल की परम्परा के ज्ञान से; द्वापर में शास्त्रों के अनुसार प्रचलित ज्ञान से और कलियुग में अपने क्षेत्र के आसपास के रीति-रिवाजों के ज्ञान प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार सहज, कुलज, शास्त्रज और क्षेत्रज—इन चार विधियों का ज्ञान इन युगों के अनुरूप अनुमोदित किया गया है।
56 अपराजितपृच्छा ज्ञानं गुरुमुखोद्भूतं संसृतेः पाशच्छेदनम्। ये भजन्ति गुरुं भक्त्या सूर्य तमिहरं यथा ॥ 12 ॥ लभन्ते ते ततो ज्ञानं धर्मे तीर्थे महात्मनि। अर्थदानप्रभावेण ज्ञास्यन्ति तपसां क्रमम् ॥ 13 ॥ ज्ञाने मोक्षं तपो राज्यं दाने भोग्यं महोत्कटम्। एवं तु जायते मुक्तिर्यो जानाति स पण्डितः ॥ 14 ॥ गुरुमुख से उद्भूत ज्ञान संसार रूपी भवसागर के पाशों को काटने वाला है और जो लोग भक्तिपूर्वक गुरु की पूजा और आज्ञा में रहते हैं, उनका अज्ञानान्धकार उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे सूर्य का प्रकाश अन्धकार को समास कर देता है। ऐसे भक्त लोग इस ज्ञान को धर्मस्थानों में तथा तीर्थस्थानों में महात्मा स्वरूप गुरुओं से प्राप्त करते रहते हैं और अपने अर्थ के दान-पुण्य के प्रभाव से वे तपस्या के क्रम को जान लेते हैं। वे यह सम्यक् प्रकार से जान जाते हैं कि ज्ञान का फल मोक्ष है, तप का फल राजपद पाना है, दान का फल महान भोगों को भोगना है। इसी तरह से मुक्ति होती है। यह जानने वाला ही सही तौर पर पण्डित कहा जाता है। यः करोति स कर्त्ता च भूतात्मा कथ्यते बुधैः। जीवसञ्ज्ञो ह्यन्तरात्मा सहजः सर्वदेहिनाम् ॥ 15 ॥ येन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु। न भूत भूतसम्पर्कों महाक्षेत्रज्ञ एव सः ॥ 16 ॥ जो करता है, वही कर्ता है जिसे विद्वान लोग 'भूतात्मा' कहते हैं और सभी देहियों की सहज अन्तरात्मा को 'जीव' संज्ञा से कहा जाता है और जिससे जन्म लेने के उपरान्त के सभी सुख-दुःख जाने जाते हैं, उसे ही 'महाक्षेत्रज्ञ' कहा गया है¹, उसे कोई भूत-प्राणी या भूत सम्पर्क-प्राणी का स्पर्श नहीं होता। वह तो केवल साक्षी और दृष्टा मात्र है। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्। इदं शरीरं ज्ञानेन क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥ 17 ॥ आत्मैव चात्मचैतन्यमात्मना सृजति स्वयं। आत्मना कृतं नानात्वमात्मन्येव प्रलीयते ॥ 18 ॥ वह ज्ञानी अपने सात्विक ज्ञान से इस शरीर को 'क्षेत्र' समझता है। उसे एक
- श्रीमद्भगवद्गीतायां - इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ (13, 1)
सूत्र-१२ ७१ प्रकार से या बहुत प्रकार से वैसे ही देखता है जैसे एक चन्द्रमा जल ही लहरों पर अनेक रूपों में दिखाई देता है, फिर भी वह वास्तव में एक ही है। इसी जल- चन्द्रवत न्यायानुसार आत्मा ही आत्म चैतन्य को अपनी आत्मा में ही स्वयं सृजन करती है और अपनी स्वयं की की गई नानात्व की कृतियों को वही आत्मा स्वयं उन्हें प्रलीयते अर्थात् मिटा देती है।¹ ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ 19 ॥² आकाश की ओर मूलवाले और नीचे की ओर शाखा वाले जिस संसार-रूप अश्वत्थ वृक्ष को अव्यय अर्थात् कभी व्यय नहीं होने वाला— ऐसा कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं (अर्थात् विविध छन्दों के सृष्टि के रूप ऐसे ही असंख्य हैं जैसे किसी पीपल के असंख्य पर्ण हों), उस संसार-वृक्ष को जो तत्त्व से जानता है, वह सम्पूर्ण वेदों को जानने वाला है। एकस्तम्भे नवद्वारे त्रिशूले पञ्चदेवताः। क्षितिप्राकारसन्नद्धेऽनुपरिचारनायकाः ॥ 20 ॥ यह जीवात्मा एक स्तम्भ पर टिका हुआ है, वह स्तम्भी ऐसा है कि जिसमें नौ द्वार हैं, तीन शूल हैं, पाँच देवता हैं और उसके भूमि पर परकोटे पर सन्नद्ध पहरेदार चार नायक सैन्य है।³ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गर्भविज्ञानोद्भवाधिकारो नाम द्वादशं सूत्रम् ॥ 12 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गर्भविज्ञान उद्भव अधिकार नामक बारहवां सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 12 ॥
- श्रीमद्भगवद्गीतायां— क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा। भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥ (13,
- श्रीमद्भगवद्गीतायां (15, 1) तथा च कठोपनिषदे — ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेवं शुक्लं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते॥ तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन। एतद्वैतत्॥ (2, 3, 1)
- एक स्तम्भ अर्थात् यह शरीर। नवद्वार अर्थात् इस देह के नौ द्वार— दो आँखें, दो कान, दो नासिका, एक मुंह, एक उपस्थ और एक गुह्य। तीन शूल अर्थात् सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण। पाँच देवता अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश। चार सेनानायक अर्थात् धीरोदात्त, धीरप्रशान्त, धीरललित, धीरोद्धत (अग्निपुराण, काव्यशास्त्रीय भाग) या अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट अथवा चार अन्तःकरण— मन, बुद्धि, चित्त व अहङ्कार।
58 अपराजितपृच्छा कर्मज्ञानोद्भवो नाम त्रयोदशं सूत्रम् ॥ 13 ॥ अपराजित उवाच - केवलं कुलजं ज्ञानं शास्त्रजं क्षेत्रजं तथा । चतुर्मार्गबहिस्थं च कथय परमेश्वर ॥ 1 ॥ कष्टं साध्यं विना कष्टैरभ्यासं किल शाश्वतम् । कथयस्व प्रसादेन ज्ञानाभ्यासस्तु वै यथा ॥ 2 ॥ अपराजित बोले - केवलज्ञान, कुल से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र से प्राप्त होने वाला ज्ञान और क्षेत्रीय परम्परानुसार होने वाले ज्ञान के अतिरिक्त जो बाहरी ज्ञान शेष है, उसे भी हे परमेश्वर ! कहिए। यह सब ज्ञान प्राप्त करने का अभ्यास चाहे कष्ट साध्य हो अथवा बिना कष्ट साध्य, सारा शाश्वत ज्ञान आप कृपाकर जैसा भी हो, कहिए। विश्वकर्मोवाच - अग्निः काष्ठे तिले तैलं क्षीरमध्ये यथा घृतम्। गुरुवत् कर्मयोगेन अभ्यासो ज्ञानदेहजः ॥ 3 ॥ यथा चात्यूर्ध्वसंस्थोऽपि दृश्यते जलचन्द्रमाः । तथा सर्वत्रसंस्थोऽपि ह्यात्माल्पैरवे दृश्यते ॥ 4 ॥ विश्वकर्मा बोले - हे वत्स ! जिस प्रकार अग्नि काष्ठ में, तेल तिल में और घी दूध में अदृश्य रूप में स्थित है, परन्तु अभ्यास से ये सब ही प्राप्त किए जाते हैं, उसी तरह ज्ञान भी देह में अदृश्य रूप में उपस्थित है जिसे गुरु के समान कर्मयोग के अभ्यास द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। जिस प्रकार अत्यन्त ऊँचे होने पर भी चन्द्रमा को हम जल में आसानी से निकट देख सकते हैं, उसी प्रकार सभी में सर्वत्र स्थित आत्मा को भी अपनी आत्मा द्वारा अल्प प्रयास मात्र से देखा जा सकता है। अदृष्टरूपे दृष्टव्यं हस्तौ चापि तथा श्रुतिः । अव्यक्ते व्यक्तरूपं च व्यक्ताव्यक्तस्य सम्भवः ॥ 5 ॥ क्षरं चैव परित्यज्य ध्यायेदात्मानमक्षरम्। त्रिपदं( थं ) स्यात्परं स्थानं परं ब्रह्मा तदुच्यते ॥ 6 ॥ जिस प्रकार हाथ से स्पर्श करके या या कान से सुनकर भी अदृष्ट वस्तु का ज्ञान दृष्ट रूप की तरह हो जाता है, उसी प्रकार अव्यक्त को भी व्यक्त रूप में और मिश्र रूप में व्यक्ताव्यक्त भाव को भी देखा जाना सम्भव है। व्यक्ति को चाहिए कि
सूत्र- १३ [gap] 59 क्षर अर्थात् नाशवान वस्तु का ध्यान करना त्यागकर अक्षर अर्थात् नित्य रहने वाले आत्मतत्त्व का ध्यान करें क्योंकि त्रिपदं- त्रिपदासावित्री के ध्यान करने से ऊँचा कोई स्थान नहीं है, उस परम ध्यान को ही परमब्रह्म कहा गया है। ब्रह्मारन्ध्रं ततो मध्ये जलसूर्य पुरभेदकम् ? । तन्मध्ये च समस्तं तु जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ 7 ॥ ऊर्ध्व चन्द्रो ह्यधः सूर्यो ब्रह्ममूलोद्भवन्तरम्। वर्षन्त्यमोघमेघाश्च चन्द्रस्थानमतः परम् ॥ 8 ॥ इस ब्रह्मारन्ध्र अर्थात् ब्रह्माण्ड की पोल में जलसूर्य अर्थात् सूर्य की गर्मी से वाष्पीभूत हुआ जल, पुरभेदक अर्थात् पूरी तरह भेदकर पूर्णतः ब्रह्माण्ड में व्यास है और इसी के बीच में यह समस्त स्थावर जङ्गम जगत समाया हुआ है। ऊपर चन्द्रलोक स्थित है, उसके नीचे सूर्यलोक है और इनके बाद ब्रह्म का मूलोद्भव हुआ। चन्द्रस्थान अर्थात् चन्द्रलोक से और उससे भी ऊपर से अमोघ मेघों से वृष्टि होती रहती है। चन्द्र
60 अपराजितपृच्छा अथ हंसयोगसाधनमाह – हकारादि सकारान्तं संस्मरेत्तदहर्निशम् । लक्षयेत्तत्र सञ्चारं वर्णोच्चारविवर्जितम् ॥ 12 ॥ अनन्तं सहजं हंसं नित्याभ्यासपदे स्थितम् । गमागमनयोगेन सप्तकोटिजपः स्मृतः ॥ 13 ॥ षट्त्रिंशदङ्गुलं चारे वामदक्षिणगोचरे । स्वयमुच्चार्यते हंसो हंसस्तेन स उच्यते ॥ 14 ॥ (उसके आगे) साधक को हंस-योग की साधना करनी चाहिए। इसके अभ्यास में हकार से आरम्भ करें और सकार से अन्त करें परन्तु ध्यान रखें कि यह प्राणायाम की साधना है जिसमें केवल प्राण के आवागमन को साक्षी भाव से लक्ष्य करके देखना है। आते श्वास में 'ह' की ध्वनि जैसा अभ्यास और जाते श्वास में 'स' की ध्वनि जैसा आभास मात्र करना है और किसी प्रकार का 'ह' वर्ण या 'स' वर्ण का वर्णोच्चार अर्थात् ध्वनि मुख उच्चारित नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार इस सहजयोग में अनन्त हंस के नित्याभ्यास से पद पर दृढ़ स्थिति प्राप्त होती है और इस सहजयोग में नित्य श्वास के आने-जाने के स्वरूप योग में सात करोड़ जप सहज ही प्रतिदिन होते रहते हैं— इस योग में मात्र श्वास पर आते-जाते समय लक्ष्य रखना है। इस सहजयोग के हंस प्राणायाम में नासिका के वाम व दक्षिण गोचर से अर्थात् चन्द्रनाड़ी व सूर्यनाड़ी से सञ्चरित होने वाले श्वास की लम्बाई छत्तीस अङ्गुल की होनी चाहिए अर्थात् व्यक्ति को सदा दीर्घ श्वास लेने का अभ्यास होना चाहिए। जिससे वायु में स्थित प्राणी की पूर्ण प्राप्ति होती रहे। इस योग की सहज प्रक्रिया में 'हंसो', 'सोऽहं' की ध्वनि स्वयं ही उच्चारित होती रहती है, इसीलिए इसे हंस (योग) कहा जाता है।¹
- तथा च योगगीतायां – शृणु राजन्यवक्ष्यामि हंसमन्त्रस्य साधनम्। यथोक्तं शम्भुना पूर्वं गिरिजायै महात्मना॥ हृदयादुत्थितः प्राणो बहिर्याति महीपते। द्वादशाङ्गुलमानेन नासाद्वारा निरन्तरम्॥ परावृत्य ततस्तूर्णं हृदयं प्रति गच्छति। हृदयाम्भोजतः पश्चाद्बहिरायाति सत्वरम्॥ एवं पुनः पुनः प्राणः श्वासोच्छ्वासक्रमेण वै। सर्वेषामेव जन्तूनां बहिरन्तः प्रधावति॥ निर्गमेहं भवेच्छब्दः प्रवेशे सः प्रकीर्तितः। हंसो हंस इति प्राणी वारम्वारं जपेत्सदा॥ बहिरागमने हंसः सोहं स्यादन्तरागमे। हंसः सोहं जपो देहे स्वतो नित्यं प्रवर्त्तते॥ षट्शतानि च संख्या स्यात्सहस्राण्येकविंशतिः। जपस्याष्टसु यामेषु नित्यमेव दिने दिने॥ एकान्ते समुपविश्य परेशं हंसविग्रहम्। ध्यायन्नेकाग्रचित्तेन पश्येत्प्राणगति बुधः॥ निर्गमे चप प्रवेशे च हंसः सोहं निरन्तरम्। चेतसा चिन्तयेन्मन्त्र वाचा नोच्चारयेत्क्वचित्॥ एवमभ्यासतो नित्यं जपकोटिर्यदा भवेत्। तदा प्रवर्त्तते नादः स्वयमेव न संशयः॥ (योगगीता 15, 65-74; तुलनीय हंसोपनिषद् एवं दत्तात्रेयसंहिता)
सूत्र- १३ ६१ यावन्न चालयेद्योगी ह्यक्षसूत्रकरस्थितम्। सप्तकोटिजपं कृत्वा हंसस्त्वेवं निवर्तते ॥ 15 ॥ एवं विश्वगतश्चारः प्राणिनां शुभदायकः। हंसरूपे स्थिताः प्राणाः प्राणास्तत्त्वैः प्रकीर्तिताः ॥ 16 ॥ इस प्रकार के हंसयोग के जाप में योगी अपने हाथ में अक्षमाला नहीं चलाता है तथापि उसके जाप सात करोड़ इस हंसत्व से पूरे निवर्त हो जाते हैं। इस प्रकार का विश्वगत सञ्चार समस्त प्राणियों के लिए शुभदायक है। इसीलिए हंस रूप में इन प्राणों के स्थित होने से ही इनको प्राणतत्त्व नाम से कहा गया है। अथ हृदयकमलमाह — हृदये सहजं पद्ममष्टपत्रं सबिन्दुकम्। इच्छाशक्तिस्तथा मध्ये दलान्ते कुलदेवताः ॥ 17 ॥ शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः। बीभत्साद्भुतशान्ताश्चाल्पाष्टौ ? कमले स्थिताः ॥ 18 ॥ कुलदेव्यष्टकोपेतमिच्छाशक्तिर्हदिस्थिता। अब हृदय के भावों का विशेष परिचय दिया जा रहा है— हृदय में सहज ही आठ पँखड़ियों और मध्य में बिन्दू युक्त कमल कहा गया है। इसमें बिन्दू रूप मध्य में तो इच्छा शक्ति है और आठों दलों-पँखड़ियों में कुल देवता हैं। इस कमल में (1.) शृङ्गार, (2.) हास्य, (3.) करुणा, (4.) रौद्र, (5.) वीर, (6.) भयानक, (7.) वीभत्स, (8.) अद्भुत- ये आठ (अल्परूप से शान्त भी) रस और मध्य बिन्दु में कुल देवियाँ भी स्थित हैं तथा इच्छा शक्ति भी हृदय में ही स्थित हैं। ऊर्ध्वाकारैः स्थिता ख्यातेन्द्रियैर्बुद्धिरनुक्रमात् ॥ 19 ॥ शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः। मनो बुद्धिरहंकारः सत्त्वं रजस्तमस्तथा ॥ 20 ॥ इस हृदय में ही ऊर्ध्वाकार में स्थित इन्द्रियाँ भी बुद्धि के अनुक्रम में स्थित हैं। इसी हृदय-कमल में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध तथा मन, बुद्धि और आठवाँ अहङ्कार तथा सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण युक्त स्थित है। कामः क्रोधश्च मोहश्च लोभो हर्षो मदो भयम्। विषादश्चाष्टमः प्रोक्त इत्यष्टौ च गुणाः स्मृताः ॥ 21 ॥ इसी प्रकार हृदय कमल की अष्ट पँखड़ियों में ही काम, क्रोध, मोह, लोभ, हर्ष, मद, भय और आठवाँ विषाद स्थित हैं। इन्हीं आठों को गुण भी कहा गया है।