अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भावार्थसहिता ॥ ३१
अविज्ञातस्तुचाण्डालो यस्यवेश्मन्नितिष्ठति । विज्ञातउपसंन्यस्य द्विजाःकुर्युरनुग्रहम् ॥३४॥ मुनिवक्त्रोद्गतान्धर्मान् गायन्तोवेदपारगाः । पतन्तमुद्धरेयुस्ते धर्मज्ञाःपापसंकटात् ॥ ३५ ॥ दध्नाचसर्पिषाचैव क्षीरगोमूत्रयावकम् । भुञ्जीतसहभृत्यैश्च त्रिसंध्यमवगाहनम् ॥ ३६ ॥ त्र्यहंभुञ्जीतदध्नाच त्र्यहंभुञ्जीतसर्पिषा। त्र्यहंक्षीरेणभुञ्जीत एकैकेनदिनत्रयम् ॥३७ ॥ भावदुष्टंनभुञ्जीत मोच्छिष्टंकृमिदूषितम् । दधिक्षीरस्यत्रिपलं पलमेकंघृतस्यतु ॥ ३८ ॥ भस्मनातुभवेच्छुद्धिरुभयोःकांस्यताम्रयोः । जलशौचेनवस्त्राणां परित्यागेनमृन्मयम् ॥ ३९ ॥
यदि बिना जाने कोई चांडाल द्विजों के घर में ठहरे तो जान लेने पर उसे निकाल कर द्विज ब्राह्मण लोग उस ब्राह्मण पर दया कर उसे शुद्ध करें ॥३४॥ मुनियों के मुख से निकले धर्मों को गाते हुये वेद के पार पहुंचे हुए धर्म के ज्ञाता विद्वान् लोग पतित हुए उस ब्राह्मण को प्रायश्चित्त कराके पाप संकट से उद्धार करें ॥ ३५ ॥ वह ब्राह्मण जिस के घर में अज्ञात चाण्डाल मिल जुल के रहा हो दही, घी, दूध, गोमूत्र, और कुलत्थ इन को भृत्यों और स्त्री पुत्रादि के सङ्ग निम्न प्रकार से खावे और त्रिकाल स्नान करै ॥ ३६ ॥ तीन दिन दही से, तीन दिन घी से, और तीन दिन दूध से ( यावक ) नाम कुल्माष-( कुलथी ) खावे और तीन दिन एक २ दही आदि खावे ॥ ३७ ॥ जिस में कोई दोषारोपण हो गया हो वा दूषित होने की शंका हो गयी हो, जो किसी का झूठा हो, जिस में कृमि पड़ गये हों,उसे न खावे । दही और घी ऊपर कहे व्रत में तीन २ पल ( अर्थात् चार तोला का एक पल होता तब १२ तोले के तीन पल हुए ) और घी एक पल खावे ॥ ३८ ॥ जिस के घर में चाण्डाल रह चुका हो उस घर के कांसे और तांबे के पात्रों की शुद्धि भस्म से, जलमें धोने से वस्त्रों की शुद्धि होती और मही के पात्र अशुद्ध हों तो त्याग देने चाहिये ॥ ३९ ॥
३८ पाराशरस्मृतिः ॥
कुसुम्भगुडकार्पासलवणंंतैलसर्पिषी ।
द्वारेकृत्वातुधान्यानि दद्याद्वेश्मनिपावकम् ॥ ४० ॥
एवंशुद्धस्ततःपश्चात्कुर्याद्ब्राह्मणतर्पणम् ।
त्रिंशतंगाववृषंचैकं दद्याद्विप्रेषुदक्षिणाम् ॥ ४१ ॥
पुनर्लेपनखातेन होमजाप्येनशुद्ध्यति ।
आधारेणचविप्राणां भूमिदोषोनविद्यते ॥ ४२ ॥
चाण्डालैःसहसंपर्कं मासंमासार्द्धमेववा ।
गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥ ४३ ॥
रजकीचर्मकारीच लुब्धकीवेणुजीविनी ।
चातुर्वर्ण्यस्यतुगृहे त्वविज्ञातानुतिष्ठति ॥ ४४ ॥
ज्ञात्वातुनिष्कृतिंकुर्यात् पूर्वोक्तस्यार्द्धमेवतु ।
गृहदाहंनकुर्वीत शेषंसर्वंचकारयेत् ॥ ४५ ॥
गृहस्याभ्यन्तरंगच्छेच्चाण्डालोयदि कस्यचित् ।
तमागाराद्विनिःसार्य मृद्भाण्डंतुविसर्जयेत् ॥ ४६ ॥
रसपूर्णंतुमृद्भाण्डं नत्यजेत्तु कदाचन ।
फिर घर के द्वारपर कुसुम, गुड़, कपास, लवण, तेल, घी अन्न इन को निकाल कर घर में अग्नि लगा देवे ॥४०॥ इस प्रकार शुद्ध होकर ब्राह्मणों को भोजन कराके तृप्त करै और तीस गौ एक बैल ब्राह्मणों को दक्षिणा देवे ॥ ४१ ॥ दुबारा लीपना, खोदना, होम, जप, और ब्राह्मणों के बैठने से पृथ्वी शुद्ध होती है फिर उस भूमि में कुछ दोष नहीं रहता ॥ ४२ ॥ यदि चांडालों के संग एक महीना वा पन्द्रह दिन संसर्ग रहे तो पन्द्रह १५ दिन तक गोमूत्र और कुलथी खाकर शुद्ध होता है ॥४३॥ रजकी (धोबिन) चमारी, व्याधनी, बांस के पात्र बना के जीविका करने वाले की स्त्री, ये यदि अज्ञान से चारों वर्णों के घर में निवास करें तो ॥४४॥ जानने पीछे पूर्वोक्त का आधा प्रायश्चित करै घर को जलावे नहीं और सब कृत्य आधा करै ॥४५॥ यदि किसी के घर के भीतर चांडाल चला जाय तो उस को घर से बाहर निकाल कर मिट्टी के पात्रों को फेंक देवे ॥ ४६ ॥ परंतु रस के भरे मिट्टी
भाषार्थसहिता ॥ ३९
गोमयेनतुसंमिश्रैर्जलैःप्रोक्षेद्गृहंतथा ॥ ४७ ॥ ब्राह्मणस्यव्रणद्वारे पूयशोणितसंभवे । क्रमिरुत्पद्यतेयस्य प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ ४८ ॥ गवांमूत्रपुरीषेण दध्नाक्षीरेणसर्पिषा । त्र्यहंस्नात्वाचपीत्वाच कृमिदष्टःशुचिर्भवेत् ॥ ४९ ॥ क्षत्रियोऽपिसुवर्णस्य पञ्चमाषान्प्रदायतु । गोदक्षिणांतुवैश्यस्याप्युपवासंविनिर्दिशेत् ॥ ५० ॥ शूद्राणांनोपवासः स्याच्छूद्रोदानेनशुद्ध्यति । ब्राह्मणांस्तुनमस्कृत्य पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ ५१ ॥ अच्छिद्रमितियद्वाक्यं वदन्तिक्षितिदेवताः । प्रणम्यशिरसाग्राह्यमग्निष्टोमफलंहितत् ॥ ५२ ॥ जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रंयज्ञकर्मणि । सर्वंभवतिनिश्चिद्रं ब्राह्मणैरुपपादितम् ॥ ५३ ॥ व्याधिव्यसननिष्क्रान्ते दुर्भिक्षेडामरेतथा ।
के पात्रों को कदापि न त्यागै और गोबर मिले जल से घर को लीपे वा छिड़के ॥ ४७ ॥ राध ( पीव ) और रुधिर से भरे ब्राह्मण के घाव में यदि कृमि ( कीड़े ) पड़ जांय तो प्रायश्चित्त कैसे हो सो कहते हैं ॥ ४८ ॥ गोमूत्र, गोबर, गोदही गोदूध गोघृत इन को मिला कर तीन दिन स्नान और इन को तीन दिन पीकर वह कीड़ों का काटा हुआ पुरुष शुद्ध होता है ॥ ४९ ॥ क्षत्रिय भी पांच मासे सुवर्ण का दान देवे । वैश्य एक गौ की दक्षिणा देवे इसी उपवास से वह शुद्ध होता है ॥ ५० ॥ शूद्रों को उपवास का निषेध है इस से शूद्र दान से शुद्ध होता है । शूद्र दान देने पश्चात् ब्राह्मणों को प्रणाम कर और पञ्चगव्य का प्राशन करने से शुद्ध होता है ॥ ५१ ॥ जिस काम को ब्राह्मण लोग (अच्छिद्रमस्तु) ऐसा कह देवें । उस वाक्य को सब लोग शिरोधार्य मानकर ग्रहण करें क्योंकि उससे अग्निष्टोम यज्ञ का फल होता है ॥५२॥ जप का छिद्र तप का छिद्र और यज्ञ कर्म का छिद्र नाम जो कुछ त्रुटि है । ब्राह्मणों के कहने से यह सब छिद्र रहित हो जाता है ॥ ५३ ॥ यदि शूद्र मनुष्य व्याधियों से पीड़ित दुःखित हो, वा दुर्भिक्ष से पीड़ित हो, वा लूट लड़ाई
४० | पराशरस्मृतिः ॥
उपवासोव्रतोहोमो द्विजसंपादितान्निवै ॥ ५४ ॥
अथवाब्राह्मणास्तुष्टाः सर्वेकुर्वन्त्यनुग्रहम् ।
सर्वान्कामानवाप्नोति द्विजैःसंवर्धिताशिषा ॥५५॥
दुर्बलानुग्रहःप्रोक्तस्तथावैबालवृद्धयोः ।
ततोऽन्यथाभवेद्दोषस्तस्मान्नानुग्रहःस्मृतः ॥ ५६
स्नेहाद्वायदिवालोभाद्भयादज्ञानतोऽपिवा ।
कुर्वन्त्यनुग्रहंयेतु तत्पापंतॆषुगच्छति ॥ ५७ ॥
शरीरस्यात्ययेप्राप्ते वदन्तिनियमंतुये ।
महत्कार्योपरोधेन नस्वस्थस्यकदाचन ॥ ५८ ॥
स्वस्थस्यमूढाःकुर्वन्ति नियमंतुवदन्तिये ।
तेतस्यविघ्नकर्तारः पतन्तिनरकेऽशुचौ ॥ ५९ ॥
स्वयमेवव्रतंकृत्वा ब्राह्मणंयोऽवमन्यते ।
वृथातस्योपवासःस्यान्नसपुण्येनयुज्यते ॥ ६० ॥
आदि से दुःखित हो तो उपवास, व्रत, और होम सुपात्र ब्राह्मण द्वारा करावे ॥ ५४ ॥ अथवा प्रसन्न संतुष्ट हुए सब ब्राह्मण लोग अनुग्रह (कृपा) करते हैं । अर्थात् ब्राह्मणों के आशीर्वाद से बढ़ा हुआ वह शूद्र सब कामनाओं को प्राप्त होता है ॥ ५५ ॥ निर्बल (असमर्थ) बालक, और वृद्ध इन पर अनुग्रह करना चाहिये । यदि इन से भिन्न मनुष्यों पर अनुग्रह किया जाय अर्थात् प्रायश्चित्त न कराया जाय तो ठीक नहीं है ॥ ५६ ॥ उसको अनुग्रह नहीं कहते जो स्नेह से, भय से, लोभ से, अथवा अज्ञान से, ब्राह्मण लोग किसी पर अनुग्रह करते हैं तो अपराधी का पाप उन को ही लगता है ॥५७॥ जो ब्राह्मण लोग प्राण नाश की सम्भावना होने पर भी प्रायश्चित्त का विधान करते, और बड़े महान् कामों की हानि होने के विचार से स्वस्थ पुरुष को नियम पालन का निषेध करते हैं ॥५८॥ तथा जो मूढ़लोग स्वस्थ पुरुष के पालनीयनियम को लोभादि से स्वयं पालन करते वा कहते हैं । वे सब उस के कार्य में विघ्न करने वाले होने से अपवित्र नरक में पड़ते हैं ॥५९॥ जो पुरुष विद्वानों से पूछे बिना आपही व्रत करके ब्राह्मणों का तिरस्कार करता है। उस का उपवास वृथा है और उसे पुण्य फल प्राप्त नहीं होता ॥६०॥
भाषार्थसहिता ॥ ४९
सएवनियमोग्राह्यो यमेकोऽपिवदेद्विजः । कुर्याद्वाक्यंद्विजानांतु अन्यथाभ्रूणहाभवेत् ॥ ६१ ॥ ब्राह्मणाजङ्गमंतीर्थं तीर्थभूताहिसाधवः । तेषांवाक्योदकेनैव शुद्ध्यन्तिमलिनाजनाः ॥ ६२॥ ब्राह्मणायानिभाषन्ते मन्यन्तेतानिदेवताः । सर्वदेवमयोविप्रो नतद्वचनमन्यथा ॥ ६३ ॥ उपवासोव्रतंचैव स्नानंतीर्थंजपस्तपः । विप्रैःसंपादितंयस्य संपूर्णंतस्यतद्भवेत् ॥६४ ॥ अन्नाद्येकीटसंयुक्ते मक्षिकाकेशदूषिते । तदन्तरास्पृशेच्चापस्तदन्नंभस्मनास्पृशेत् ॥ ६५ ॥ भुञ्जानश्चैवयोविप्रः पादंहस्तेनसंस्पृशेत् । समुच्छिष्टमसौभुङ्क्ते योभुङ्क्तेभुक्तभाजने ॥ ६६ ॥ पादुकास्थोनभुञ्जीत पर्यङ्कस्थःस्थितोऽपिवा।
इससे वही नियम ग्रहण करना योग्य है जिसे एक भी ब्राह्मण कहे । और ब्राह्मण के वचन को अवश्य स्वीकार करे यदि न करेगा तो भ्रूणहत्या का दोष लगता है ॥ ६१ ॥ क्योंकि ब्राह्मण लोग जंगम ( चेतन ) तीर्थ हैं और साधु ( सीधे शुद्ध निर्विकार ब्राह्मण लोग ) भी तीर्थ रूप ही होते हैं । उन ब्राह्मणों के वाक्य रूप जल से ही मलिन पुरुष शुद्ध हो जाते हैं ॥ ६२ ॥ ब्राह्मण लोग जिन धर्मयुक्त वाक्यों को कहते हैं उन्हें देवता भी मानते हैं । ब्राह्मण सर्व देवताओं का रूप है इस से उस का वचन अन्यथा नहीं हो सकता ॥ ६३ ॥ उपवास व्रत स्नान जप तप ये सब जिस के ब्राह्मण ने संपादन ( अनुमोदन ) कर दिये उस को ही इन का ठीक फल होता है ॥ ६४॥ यदि पकाये हुये अन्न में कीड़े मिल गये हों वा वह भोज्यान्न मक्खी और केशों से दूषित हो गया हो तो कीड़ा, मक्खी केशादि को निकाल के उस के बीच २ जल से धो कर शुद्ध करे और उस अन्न का भस्म से स्पर्श करे ॥६५॥ जो भोजन करता हुआ ब्राह्मण पग को दहिने हाथ से छूलेवे तो अथवा किसी के जूठे पात्र में भोजन करे तो उस का उच्छिष्ट भोजन करना जानो ॥ ६६ ॥
खड़ागू पर बैठ कर वा खाट अथवा बिस्तरे पर बैठ कर अथवा खड़ा हो कर
६
४२ | पराशरस्मृतिः ॥
चाण्डालेनशुनादृष्टं भोजनंपरिवर्जयेत् ॥६७॥
पक्वान्नंप्रतिषिद्धंस्यादन्नशुद्धिस्तथैवच ।
यथापराशरेणोक्तं तथैवाहंवदामिवः ॥ ६८ ॥
मितंद्रोणाढकस्यान्नं काकश्वानोपघातितम् ।
केनेदंशुद्ध्यतेचेति ब्राह्मणेभ्योवेदयेत् ॥ ६९ ॥
काकश्वानावलीढंतु द्रोणान्नंपरित्यजेत् ।
वेदवेदाङ्गविद्वद्भिर्धर्मशास्त्रानुपालकैः ॥ ७० ॥
प्रस्थाद्द्वात्रिंशतिर्द्रोणः स्मृतोद्विप्रस्थआढकः ।
ततोद्रोणाढकस्यान्नं श्रुतिस्मृतिविदोविदुः ॥ ७१ ॥
काकश्वानावलीढंतु गवांघ्रातं खरेणवा ।
स्वल्पमन्नंत्यजेद्विप्रः शुद्धिर्द्रोणाढकेभवेत् ॥ ७२ ॥
अन्नस्योद्धृत्यतन्मात्रं यच्चलालाहतंभवेत् ।
सुवर्णोदकमभ्युक्ष्य हुताशेनैवतापयेत् ॥ ७३ ॥
हुताशनेनसंस्पृष्टं सुवर्णसलिलेनच ।
भोजन न करे। कुत्ते और चांडाल के देखे हुये भोजन को त्याग देवे ॥६७॥ पका-
या हुआ कोई अन्न निषिद्ध है वा किसी अन्न की शुद्धि हो सकती है। व्यास
जी कहते हैं कि इस उक्त विषय में महर्षि पराशर ने जैसा विचार कहा वैसा
हम कहते हैं ॥६८॥ द्रोण वा आढक भर पकाये अन्न को यदि कौआ वा कुत्ता
बिगाड़ देवे तो यह अन्न कैसे शुद्ध हो ऐसा ब्राह्मणों से कहे ॥६९॥ उस समय
धर्मशास्त्र की मर्यादा के रक्षक और वेद वेदाङ्ग के जानने वाले ब्राह्मण लोग
यह आज्ञा देवें कि काक वा कुत्ते ने बिगाड़े द्रोण भर अन्न को न त्यागे
॥ ७० ॥ बत्तीस प्रस्थ (अंजली) का एक द्रोण और दो प्रस्थ का एक आढक
कहाता है। तिस से श्रुति स्मृति के ज्ञाता विद्वान् लोग द्रोणान्न तथा आढ-
कान्न को शुद्ध मानते हैं ॥ ७१ ॥ यदि कौआ वा कुत्ता ने चाटा और गौ वा
गधे ने सूंघा थोड़ा अन्न हो तो त्याग देवे और वह पकाया अन्न द्रोण वा
आढक भर होतो उस की शुद्धि हो सकती है ॥ ७२ ॥ जितने अन्न में कौवे
आदि का मुख लगा हो उतना निकाल देने बाद सुवर्ण के जल से छिड़क कर
अग्नि से तपावे तब शुद्ध हो जाता है ॥ ७३ ॥ क्योंकि जिस अन्न में अग्नि का
भाषार्थसहिता ॥ ४३
विप्राणांब्रह्मघोषेण भोज्यंभवतितत्क्षणात् ॥ ७४ ॥ स्नेहोवागोरसोवाऽपि तत्रशुद्धिःकथंभवेत् । अल्पंपरित्यजेत्तत्र स्नेहस्योत्पवनेनच ॥ अनलज्वालयाशुद्धिर्गोरसस्यविधीयते ॥ ७५ ॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ अथातोद्रव्यशुद्धिस्तु पराशरवचोयथा । दारवाणांतुपात्राणां तत्क्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥ १ ॥ मार्जनाद्यज्ञपात्राणां पाणिनायज्ञकर्मणि । चमसानांग्रहाणांच शुद्धिःप्रक्षालनेनच ॥ २ ॥ चरूणांस्रुक्स्रुवाणांच शुद्धिरुष्णेनवारिणा । भस्मनाशुद्ध्यतेकांस्यं ताम्रमम्लेनशुद्ध्यति ॥ ३ ॥ रजसाशुद्ध्यतेनारी विकलंयानगच्छति । नदीवेगेनशुद्ध्येत लेपोयदिनदृश्यते ॥ ४ ॥
और सुवर्ण के जल का स्पर्श होता है उससे तथा ब्राह्मणों के वेद पाठ की ध्वनि से वह अन्न उसी समय खाने योग्य शुद्ध हो जाता है ॥ ७४ ॥ यदि स्नेह ( घी आदि ) हो वा गोरस ( दूध आदि ) होय तो उस की शुद्धि कैसे हो ? उस में से थोड़ा सा निकाल देवे और घी आदि स्नेह को छान लेवे और दूध को अग्नि की ज्वाला से तपा लेने से शुद्धि कही है ॥ ७५॥
यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥६॥
अब महर्षि पराशर भगवान् के वचनानुसार द्रव्य की शुद्धि कहते हैं। काठ के पात्रों की तो उसी समय शुद्धि करनी इष्ट है ॥ १ ॥ यज्ञ कर्म में यज्ञ के पात्रों की शुद्धि हाथ से मांजने से होती सोम याग के चमस और सोम ग्रहों की शुद्धि जल में धोने से होती है ॥ २ ॥ चरुस्थाली, स्रुक्, स्रुवा, इन यज्ञपात्रों की उष्णजल से, कांसे के पात्र की भस्म से और तांबे के पात्र की खटाई से मांजने पर शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ यदि स्त्री ने पर पुरुष से व्यभिचार न किया हो किन्तु केवल मन से चलायमान हुई हो तो वह रजोदर्शन (मासिक धर्म होने ) ही से शुद्ध होजाती है और यदि नदी में कहीं अधिक मलिनता संलग्न न हो तो उस की साधारण अशुद्धि प्रवाह के वेग से शुद्ध हो जाती है ॥ ४ ॥
| ४४ | पराशरस्मृतिः ॥ |
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वापीकूपतडागेषु दूषितेषुकथंचन ।
उद्धृत्यवैकुंभशतं पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ ५ ॥
अष्टवर्षाभवेद्गौरी नववर्षातुरोहिणी ।
दशवर्षाभवेत्कन्या ततऊर्ध्वंरजस्वला ॥ ६ ॥
प्राप्तेतुद्वादशेवर्षे यःकन्यांनप्रयच्छति ।
मासिमासिरजस्तस्याः पिबन्तिपितरःस्वयम् ॥ ७ ॥
माताचैवपिताचैव ज्येष्ठोभ्रातातथैवच ।
त्रयस्तेनरकंयान्ति दृष्ट्वाकन्यांरजस्वलाम् ॥ ८ ॥
यस्तांसमुद्वहेत्कन्यां ब्राह्मणोमदमोहितः ।
असंभाष्योह्यपाङ्क्तेयः सविप्रोवृषलीपतिः ॥ ६ ॥
यःकरोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनंद्विजः ।
बावड़ी, कूप, तालाब, यदि ये किसी प्रकार दूषित हो जांय तो उन में से सौ घड़े जल निकाल कर पंचगव्य गेरने से शुद्ध होजाते हैं ॥ ५ ॥ आठ वर्ष की कन्या को गौरी, नौ वर्ष की रोहिणी, और दश वर्ष की को कन्या ही कहते हैं और दश वर्ष से ऊपर रजस्वला कोटि में गिनी जाती है ॥ ६ ॥ जो मनुष्य बारह वर्ष की कन्या का विवाह नहीं करता उसके पितर महीने २ में उस लड़की के रज को पीते हैं ॥ ७ ॥ माता, पिता, और जेठा भाई ये तीनों रजस्वला कन्या को देख २ कर नरक में जाते (पाप के भागी) होते हैं ॥ ८ ॥ जो ब्राह्मणादि मद से मोहित उस रजस्वला * कन्या के साथ विवाह करता है वह भी संभाषण करने और पंक्ति में बैठाने योग्य नहीं क्योंकि वह स्वधर्म से पतित स्त्री का पति है ॥ ९ ॥ जो द्विज ब्राह्मणादि पुरुष एक रात भर में जितना पाप वृषली (वेश्या) का सेवन करने से प्राप्त
* रजो दर्शन होने से पहिले विवाह करे यह सभी धर्मशास्त्रों का राय से विधिवाक्य है । यदि अच्छा वर खोजने आदि में देर लगे और कन्या रजस्वला होने लगे तो दोष पितादि को नहीं लगता यह उक्त विधि का अपवाद माना जायगा । माता पितादि नरक में जाते हैं यह उक्त विधिवाक्य का अर्थवाद है । जिस का मतलब यह है कि रजस्वला होने पर सन्तानोत्पत्ति की सम्भावना है उस में बाधा पड़ती है । इस कारण माता पितादि को अपराध लगता है । विधि से विरुद्ध करने का निन्दार्थ वाद विध्यनुकूल करने की आवश्यकता और उत्तमता दिखाने के लिये है । विधि विरुद्ध करना ही पाप है और वह नरक नाम दुःख विशेष का हेतु है ॥
भाषाऽर्थसहिता ॥ ४५
सभैक्ष्यभुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्विशुद्ध्यति ॥ १० ॥
अस्तंगतेयदासूर्ये चाण्डालंपतितंस्त्रियम् ।
सूतिकांस्पृशतेचैव कथंशुद्धिर्विधीयते ॥ ११ ॥
जातवेदंसुवर्णंच सोममार्गंविलोक्यच ।
ब्राह्मणानुगतश्चैव स्नानंकृत्वाविशुध्यति ॥ १२ ॥
स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीब्राह्मणींतथा ।
तावत्तिष्ठेन्निराहारा त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥१३॥
स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीक्षत्रियांतथा ।
अर्द्धकृच्छ्रंचरेत्पूर्वा पादमेकमनन्तरा ॥ १४ ॥
स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीवैश्यजांतथा ।
पादहीनंचरेत्पूर्वा पादमेकमनन्तरा ॥ १५ ॥
स्पृष्ट्वारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणीशूद्रजांतथा ।
कृच्छ्रेणशुद्ध्यतेपूर्वा शूद्रादानेनशुद्ध्यति ॥ १६ ॥
स्नातारजस्वलायातु चतुर्थेऽहनिशुद्ध्यति ।
करता है वह भिक्षा का अन्न खाकर और जप करता हुआ तीन वर्ष तक किये प्रायश्चित्त से शुद्ध होता है ॥१०॥ यदि सूर्य के अस्त हो जाने पर चांडाल, पतित, और सूतिका स्त्री इनका स्पर्श करे तो कैसे शुद्धि कही है ? सो कहते हैं ॥११॥ अग्नि, सुवर्ण, और चन्द्रमा का मार्ग इन को देख कर और ब्राह्मणों की आज्ञा से स्नान करके शुद्ध होता है ॥ १२ ॥ यदि दो रजस्वला ब्राह्मणी परस्पर स्पर्श करें तो रजोदर्शन की समाप्ति तक निराहार रहें और तीन ही दिन प्रायश्चित्त करने से शुद्ध होती हैं ॥ १३ ॥ यदि ब्राह्मणी और क्षत्रिया रजस्वला परस्पर छूजावें तो ब्राह्मणी अर्द्ध कृच्छ्र व्रत और क्षत्रिया चौथाई कृच्छ्र व्रत प्रायश्चित्त करें ॥ १४ ॥ यदि रजस्वला ब्राह्मणी और वैश्या परस्पर स्पर्श करलें तो ब्राह्मणी पौन कृच्छ्र व्रत और वैश्या चौथाई कृच्छ्र व्रत करे ॥ १५ ॥ यदि रजस्वला ब्राह्मणी और शूद्रा परस्पर स्पर्श कर लें तो ब्राह्मणी एक कृच्छ्र से और शूद्रा स्त्री दान करने से ही शुद्ध हो जाती है ॥ १६ ॥ जो रजस्वला स्त्री स्नान करके चौथे दिन शुद्ध
४६ पराशरस्मृतिः ॥
कुर्याद्रजोनिवृत्तौतु दैवपित्र्यादिकर्मच ॥ १७ ॥ रोगेणयद्रजःस्त्रीणामन्वहंतुप्रवर्त्तते । नाऽशुचिःसाततस्तेन तत्स्याद्वैकारिकंमतम् ॥१८॥ साध्वाचारानतावत्स्याद्रजोयावत्प्रवर्त्तते । रजोनिवृत्तौगम्यास्त्री गृहकर्माणिचैवहि ॥ १९ ॥ प्रथमेऽहनिचाण्डाली द्वितीयेब्रह्मघातिनी । तृतीयेरजकीप्रोक्ता चतुर्थेऽहनिशुद्ध्यति ॥ २० ॥ आतुरेस्नानउत्पन्ने दशकृत्वोह्यनातुरः । स्नात्वास्नात्वास्पृशेदेनं ततःशुद्ध्येत्सआतुरः ॥२१॥ उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः शुनाशूद्रेणवाद्बिजः। उपोष्यरजनीमेकां पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ २२ ॥ अनुच्छिष्टेनशूद्रेण स्पर्शस्नानंविधीयते । तेनोच्छिष्टेनसंस्पृष्टः प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ २३ ॥
होती है वह रज के निवृत्त होने पर देवता तथा पितृआदि सम्बन्धी कर्मों में अपने पति के साथ संमिलित हो सकती है ॥१७॥ जो रोग के कारण प्रतिदिन स्त्रियों के रजोधर्म होता है उस रज से वह स्त्री अशुद्ध नहीं होती क्योंकि वह विकार जन्य माना गया है ॥ १८ ॥ जबतक रजदर्शन रहता है तब तक शुद्ध आचरण न करै रज की निवृत्ति होने पर ही स्त्री गृहस्थीके काम और संग करने योग्य होती है ॥१९॥ पहिले दिन चांडाली के तुल्य अशुद्ध, दूसरे दिन ब्रह्महत्यारी के तुल्य, तीसरे दिन रजकी (धोबिन) के तुल्य अशुद्ध जानना और चौथे दिन शुद्ध होती है ॥ २० ॥ यदि रोगी को स्नान करना ही पड़े तो नीरोग मनुष्य दशबार स्नान कर २ उस रोगी का स्पर्श करै तब वह स्नान कियेके तुल्यशुद्ध होजाता है॥२१॥यदि ब्राह्मण जूठन खाते हुए कुत्ते वा शूद्र का स्पर्शकरले तो एक दिन रात उपवास करके पञ्चगव्य पीने से शुद्ध होता है॥२२॥ जो उच्छिष्ट नहो ऐसा शूद्र ब्राह्मण का स्पर्श कर लेवे तो स्नान ही करे । यदि उच्छिष्ट शूद्र स्पर्श करले तो प्राजापत्य व्रत करे ॥ २३ ॥ जिस में
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४७
भस्मनाशुद्ध्यते कांस्यं सुरायायन्नलिप्यते । सुरामात्रेणसंस्पृष्टं शुद्ध्यतेऽग्न्युपलेखनैः ॥ २४ ॥ गवाघ्रातानि कांस्यानि श्वकाकोपहतानि च । शुद्ध्यन्तिदशभिःक्षारैः शूद्रोच्छिष्टानियानि च ॥ २५ गण्डूषंपादशौचं च कृत्वावैकांस्यभाजने । षण्मासान्भुविनिक्षिप्य उद्धृत्यपुनराहरेत् ॥ २६ ॥ आयसेष्वपसारेण सीसस्याग्नौविशोधनम् । दन्तमस्थि तथाशृङ्गं रौप्यंसौवर्णभाजनम् ॥ २७ ॥ मणिपाषाणशंखाश्च एतान्प्रक्षालयेज्जलैः । पाषाणेतु पुनर्धर्ष एषाशुद्धिरुदाहृता ॥ २८ ॥ अद्भिस्तुप्रोक्षणंशौचं बहूनांधान्यवाससाम् । प्रक्षालनेनत्वल्पानामद्भिःशौचंविधीयते ॥ २९ ॥ मृद्भाण्डदहनाच्छुद्धिर्धान्यानांमार्जनादपि । वेणुवल्कलचीराणां क्षौमकार्पासवाससाम् ॥
मदिरा का संसर्ग न हुआ हो ऐसा कांसे का पत्र भस्म से, और जिस में मदि- रा लग गई हो वह अग्नि में तपाने से, और घिसने छीलने से, शुद्ध होता है ॥ २४ ॥ गौ के सूंघे, कुत्ता और कौआ के छूए, और शूद्र ने जिन में खाया हो ऐसे कांसे के पात्र दश खारी वस्तु लगाने से शुद्ध होते हैं ॥ २५ ॥ कांसे के पात्र में कुल्ला करे वा पग धोवे तो उसे छः महीने तक पृथ्वी में गाड़ रक्खे फिर निकाले तब भोजनादि के योग्य शुद्ध होता है ॥२६॥ लोहे के पात्र स्था- नान्तर में कर देने ही से शुद्ध हो जाते हैं । और सीसे के पात्रों की शुद्धि अग्नि में तपाने से होती है । दांत, हड्डी सींग, और चांदी सोने के पात्र मणि, पत्थर-और शंख इनको जलसे धोके शुद्ध करे परन्तु पत्थर के पात्र ॥२७॥ को फिर से घिसे तब शुद्ध होता है ॥२८॥ बहुत से धान्य की राशि तथा बहुत से वस्त्र किसी कारण अशुद्ध हो जांय तो कुशों द्वारा जल छिड़कने से, तथा थोड़े वस्त्र वा धान्य हों तो जल में धोने से शुद्ध होते हैं ॥२९॥ मिट्टी के पात्र की अग्नि में फिर से पकाने पर, अन्नों की मार्जन ( जल सेचन ) से, बांस, बक्कल, चीर (झिरझा कपड़ा ) अलसीके वस्त्र, और कपास के वस्त्र, ऊन और नेत्र ( वेतस्रादि )
४८ पराशरस्मृतिः ॥
और्णानांनेत्रपट्टानां प्रोक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥ ३० ॥ मुंञ्जोपस्करशूर्पाणां शाणस्यफलचर्मणाम् । तृणकाष्ठादिरज्जूनामुदकाभ्युक्षणंमतम् ॥ ३१ ॥ तूलिकाद्युपधानानि रक्तवस्त्रादिकानिच । शोषयित्वार्कतापेन प्रोक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥ ३२ ॥ मार्जारमक्षिकाकीट पतङ्गकृमिदर्दुराः । मेध्यामेध्यंस्पृशन्तो ये नोच्छिष्टान्मनुरब्रवीत् ॥३३ ॥ महींस्पृष्ट्वागतंतोयं याश्चाप्यन्योन्यविप्रुषः। भुक्तोच्छिष्टंतथास्नेहं नोच्छिष्टंमनुरब्रवीत् ॥ ३४ ॥ तांबूलेक्षुफलान्येव भुक्तस्नेहानुलेपने । मधुपर्केचसोमेच नोच्छिष्टंधर्मतोविदुः ॥ ३५ ॥ रथ्याकर्दमतोयानि नावःपन्थास्तृणानिच । मरुतार्केणशुद्ध्यन्ति पक्केष्टकरचितानिच ॥ ३६ अदुष्टाःसंतताधारा वातोद्भूताश्चरेणवः ।
के वस्त्र इन की पछोरने ( फींचने ) से शुद्धि मानी है ॥ ३० ॥ मूंज की वस्तु सूप, शण की वस्तु, फल, चाम, तृण, काठ, रस्सी इन की जल छिड़कने से शुद्धि मानी है ॥ ३१ ॥ रुई आदि के तकिये तथा लाल वस्त्रादि को सूर्य के घाम में सुखा के जल छिड़कने से शुद्धि होना इष्ट है ॥३२॥ विलाव, मक्खी, कीड़े, पतंगे, कृमि, मेंडक, ये सब पवित्र वा अपवित्र वस्तु का स्पर्श करें तो वस्तु उच्छिष्ट अशुद्ध नहीं होता यह मनु जी ने कहा है ॥ ३३ ॥ अशुद्ध वा नीच ने छुआ पृथ्वी में बहता हुआ जल और परस्पर बोलने से गिरने वाले थूक के छींटा तथा रसोईखाने में भोजन से बचा घी आदि स्नेह ये उच्छिष्ट नाम अशुद्ध नहीं होते यह भी मनु जी ने कहा है ॥ ३४ ॥ पान, गांडा, स्नेह युक्त फल, जिस में से खाया हो, ऐसा घी आदि स्नेह मधुपर्क तथा सोम यागों का सोमरस तथा घिसा हुआ केशर चन्दनादि इन में से कुछ भाग प्रथम किसी ने खाया वा बर्त्ता हो तो शेष धर्मानुसार उच्छिष्ट वा अशुद्ध नहीं होता ॥ ३५ ॥ सड़क, डगड़ा, कीचड़, जल, नौका, मार्ग, तृण ( पलालचटाई आदि) पकी ईंटों से चिने (मन्दिर घर की भित्ति आदि) ये सब पवन और सूर्य के किरणों से शुद्ध होजाते हैं ॥३६॥ निरंतर वर्षती हुई मेघ की धारा, पवन
भाषाऽर्थसहिता ॥ ४९
स्त्रियोवृद्धाश्चबालाश्च नदुष्यन्तिकदाचन ॥ ३७ ॥ क्षुतेनिष्ठोवनेचैव दन्तोच्छिष्टेतथाऽनृते । पतितानांचसंभाषे दक्षिणंश्रवणंस्पृशेत् ॥ ३८ ॥ अग्निरापश्चवेदाश्च सोमसूर्यानिलास्तथा । एतेसर्वेऽपिविप्राणां श्रोत्रेतिष्ठन्तिदक्षिणे ॥ ३९ ॥ प्रभासादीनितीर्थानि गङ्गाद्याःसरितस्तथा । विप्रस्यदक्षिणेकर्णे सान्निध्यंमनुरब्रवीत् ॥ ४० ॥ देशभङ्गेप्रवासेवा व्याधिषुव्यसनेष्वपि । रक्षेदेवस्वदेहादि पश्चाद्धर्मंसमाचरेत् ॥ ४१ ॥ येनकेनचधर्मेण मृदुनादारुणेनवा । उद्धरेद्दीनमात्मानं समर्थोधर्ममाचरेत् ॥ ४२ ॥ आपत्कालेतुसम्प्राप्ते शौचाऽचारंनचिन्तयेत् । शुद्धिंसमुद्धरेत्पश्चात्स्वस्थोधर्मंसमाचरेत् ॥ ४३ ॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
गवांबन्धनयोक्त्रेतु भवेन्मृत्युरकामतः ।
के अंग से उड़ी हुई धूल, (रजस्वला होने से भिन्न) स्त्रियां, बालक, वृद्ध, ये स्नानादि किये बिना भी कभी दूषित नहीं होते ॥ ३७ ॥ छींकने, थूकने, दांतों में जूठन निकलने, झूठ बोलने, और पतितों के संग बोलने पर दहिने कान का स्पर्श करे ॥ ३८ ॥ अग्नि, जल, वेद, चन्द्रमा, सूर्य, और वायु, ये सब देवता ब्राह्मण के दहिने कान में निवास करते हैं ॥ ३९ ॥ प्रभासक्षेत्र आदि तीर्थ और गंगा आदि नदी, ये सब ब्राह्मण के दहिने कान में वास करते हैं यह मनु जी ने कहा है ॥ ४० ॥ देश में गदर होने, परदेश गमन, रोग, तथा व्यसन विपत्तियों के समय में अपने शरीरादि की रक्षा करे और पीछे स्वस्थ दशा होने पर धर्म का आचार विचार कर लेवे ॥४१॥ कोमल वा कठोर जिस किसी धर्म से अपनी असमर्थ दीन दशा का उद्धार करे और समर्थ होजाने पर फिर धर्म करै ॥ ४२ ॥ आपत्काल आ जाने पर शौच तथा आचार के बिगड़ने की चिन्ता न करै । पीछे स्वस्थ दशा प्राप्त होने पर शुद्धि और धर्म का आचारण कर लेवे ॥४३॥
यह पाराशरीय धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥
यदि अज्ञान से बांधने वा जोड़ने से गौओं की मृत्यु हो जाय तो
७
५० पराशरस्मृतिः ॥
अकामकृतपापस्य प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १ ॥ वेदवेदाङ्गविदुषां धर्मशास्त्रविजानताम् । स्वकर्मरतविप्राणां स्वकंपार्पंनिवेदयेत् ॥ २ ॥ अतऊर्ध्वंप्रवक्ष्यामि उपस्थानस्यलक्षणम् । उपस्थितोहिन्यायेन व्रतादेशनमर्हति ॥ ३ ॥ सद्योनिःसंशयेपापे नभुञ्जीतानुपस्थितः । भुञ्जानोवर्द्धयेत्पापं पर्षद्यत्रनविद्यते ॥ ४ ॥ संशयेतुनभोक्तव्यं यावत्कार्य्यविनिश्चयः । प्रमादस्तु नकर्त्तव्यो यथैवासंशयस्तथा ॥ ५ ॥ कृत्वापापंनगूहेत गृह्यमानंविवर्द्धते । स्वल्पंवाथप्रभूतंवा धर्मविद्भ्यो निवेदयेत् ॥ ६ ॥ तेहिपापकृतांवैद्या हन्तारश्चैवपाप्मनाम् । व्याधितस्ययथावैद्या बुद्धिमन्तोरुजापहाः ॥ ७ ॥ प्रायश्चित्तेसमुत्पन्ने हीमान्सत्यपरायणः ।
अनिच्छा से किये पाप का प्रायश्चित्त कैसे हो ? सो कहते हैं ॥१॥ वेद वेदाङ्ग और धर्मशास्त्र को जो जानते हों और जो अपने कर्म में तत्पर हों ऐसे ब्राह्मणों से अपना पाप निवेदन करे ॥ २ ॥ इस से आगे विद्वानों की सभा में उपस्थित (हाजिर) होने का स्वरूप कहते हैं क्योंकि जो न्याय से उपस्थित होता है वही व्रत के उपदेश योग्य है ॥ ३ ॥ यदि शीघ्र ही पाप का निश्चय हो जाय तो प्रायश्चित्त के लिये विद्वत्सभा में उपस्थित हुये बिना भोजन न करे। जहां सभा न हो वहां भी पहिले जो भोजन करता है वह पाप को बढ़ाता है ॥४॥ यदि संशय होय कि मुझ से अपराध हुआ है वानहीं ? तो कार्य के निश्चय तक भोजन न करे और अपराध के निश्चय करने में प्रमाद (भूल) भी न करे किन्तु जिस प्रकार सन्देह मिट जाय वैसा ही करे ॥ ५ ॥ पाप को करके कदापि न छिपाये, क्योंकि छिपाया हुआ पाप बढ़ता है—थोड़ा पाप हो वा बहुत हो उसे धर्म के ज्ञाताओं को निवेदन करके प्रायश्चित्त पूछे ॥ ६ ॥ क्योंकि वे ही लोग पाप करने वाले रोगियों के वैद्य हैं और पापों का नाश करने वाले हैं—जैसे कि बुद्धिमान् वैद्य रोगी के रोगको दूर करने वाले होते हैं ॥७॥ प्रायश्चित्त के समय, लज्जा युक्त हो सत्य धर्ममें तत्पर और बारंबार नम्रता कोमलता को धारण करने वाला क्षत्रिय वा वैश्य मनुष्य शुद्धि
भाषार्थसहिता ॥ ५१
मुहुरार्जवसंपन्नः शुद्धिंगच्छतिमानवः ॥ ८ ॥ सचैलंवाग्यतःस्नात्वा क्लिन्नवासाःसमाहितः । क्षत्रियोवाथवैश्योवा ततःपर्षदमाव्रजेत् ॥ ९ ॥ उपस्थायततःशीघ्रमार्तिमान्धरणींव्रजेत् । गात्रैश्चशिरसाचैव नचकिंचिदुदाहरेत् ॥ १० ॥ सावित्र्याश्चापिगायत्र्याः संध्योपास्त्यग्निकार्ययोः । अज्ञानात्कृषिकर्त्तारो ब्राह्मणानामधारकाः ॥ ११ ॥ अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशःसमेतानां परिषत्त्वंनविद्यते ॥ १२ ॥ यद्वदन्तितमोमूढा मूर्खाधर्ममतद्विदः । तत्पापंशतधामूत्वा तद्वक्तृनधिगच्छति ॥ १३ ॥ अज्ञात्वाधर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्तंददाति यः । प्रायश्चित्तोभवेत्पूतः किल्विषंपर्षदिव्रजेत् ॥ १४ ॥ चत्वारोवात्रयोवापि यंब्रूयुर्वेदपारगाः । सधर्मइतिविज्ञेयो नेतरेस्तुसहस्रशः ॥ १५ ॥
को प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥ मौन धारण कर सचैल स्नान करके गीले वस्त्र पहिने हुये सावधान हो कर पर्षद (धर्म सभा) में जावे ॥ ९ ॥ फिर शीघ्र सभाके समीप जाकर दुःखी हुआ गात और शिरसे (साष्टांग) पृथ्वी में पड़ जाय और कुछ न कहे ॥ १० ॥ सूर्यनारायण जिस के देवता हैं ऐसी गायत्री सन्ध्यावंदन और अग्निहोत्र इन कामों को जो नहीं जानते और न करते हों और जो खेती करते हों वे नाम मात्र के ब्राह्मण हैं ॥११॥ जिन के सन्ध्यादि कर्म करने का नियम नहीं, जो वेद मन्त्रों को नहीं जानते और जातिमात्र से जो ब्राह्मण बने हैं ऐसे चाहे हजारों भी जिस में इकट्ठे हों वह परिषद (धर्मसभा) नहीं है ॥ १२ ॥ धर्म के मर्म को न जानने वाले अज्ञानी मूर्ख ब्राह्मण लोग जो (प्रायश्चित्त आदि) बतलाते हैं वह पाप सौ गुणा होकर उन धर्मकी व्यवस्था कहने वालों को प्राप्त होता है ॥१३॥ जो धर्मशास्त्रों को न जानकर प्रायश्चित्त देता है तो वह पापी पवित्र हो जाता है और उस प्रायश्चित्ती का प्रायश्चित्त देने वाले को लगता है ॥१४॥ चार वा तीन वेदोंको पूर्ण रूप से ठीक २ जाननेवाले जिस को कहें वही धर्म जानो और अन्य हजार भी जिसे कहें वह धर्म नहीं ॥१५॥
५२ पराशरस्मृतिः ॥
प्रमाणमार्गंमार्गन्तो येधर्मंप्रवदन्तिवै । तेषामुद्विजतेपापं संभूतगुणवादिनाम् ॥ १६ ॥ यथाश्मनिस्थितंतोयं मारुतार्केणशुद्ध्यति । एवं परिषदादेशान्नाशयेत्तद्गदुष्कृतम् ॥ १७ ॥ नैवगच्छतिकर्त्तारं नैवगच्छतिपर्षदम् । मारुतार्कादिसंयोगात्पापंनश्यतितोयवत् ॥ १८ ॥ चत्वारोवात्रयोवापि वेदवन्तोऽग्निहोत्रिणः । ब्राह्मणानांसमर्थाये परिषत्साविधीयते ॥ १९ ॥ अनाहिताग्नयोयेऽन्ये वेदवेदाङ्गपारगाः । पञ्चत्रयोवाधर्मज्ञाः परिषत्साऽपिकीर्त्तिता ॥ २० ॥ मुनीनामात्मविद्यानां द्विजानांयज्ञयाजिनाम् । वेदव्रतेषुस्नातानामेकोऽपिपरिषदद्भवेत् ॥ २१॥ पञ्चपूर्वंमयाप्रोक्तास्तेषांचासंभवेत्रयः । स्ववृत्तिपरितुष्टाये परिषत्साऽपिकीर्त्तिता ॥ २२ ॥
प्रमाण के मार्ग को खोजते हुये जो पण्डित लोग धर्म की व्यवस्था कहते हैं उन सत्य कहने वालों से पाप डरता कांपता है ॥ १६ ॥ जैसे पत्थर पर पड़ा जल पवन और सूर्य के तेज से शुद्ध होजाता है। ऐसे ही धर्मसभा की आज्ञा से किये प्रायश्चित्त से उस पापी का पाप भी नष्ट हो जाता है ॥ १७ ॥ वह पाप न तो करने वाले पर रहता और न सभा पर जाता किन्तु पवन और सूर्य के संयोग से पत्थर पर पड़े जल के समान नष्ट हो जाता है ॥१८॥ वेद के ज्ञाता अग्निहोत्री चार वा तीन जो ब्राह्मणों में शास्त्र जानने में समर्थ हों उसे परिषत् कहते हैं ॥१९॥ अथवा जो अग्निहोत्री नहीं किन्तु वेद वेदाङ्गों के तत्त्व को जानने वाले और धर्म के मर्म को जानने वाले हों ऐसे पांच वा तीन को भी परिषत् (धर्मसभा) कह सकते हैं ॥ २० ॥ कुछ न बोलने वाले मौनव्रती वा अत्यल्पमितभाषी तपस्वी मुनि आत्मविद्या (वेदान्त) के ज्ञाता, द्विजों को यज्ञ कराने वाले, और वेदोक्त नियमों को ब्रह्मचर्य्यद्वारा समाप्त करके जिनने समावर्त्तन किया हो, ऐसे ब्राह्मणों में से कोई एक भी हो तो उसे परिषत् (धर्मसभा) कह सकते हैं ॥ ॥ २१ ॥ हमने जो पहिले पांच सभ्य कहे हैं यदि वे पांचो न मिलें तो अपनी वृत्ति (जीविका) करने से सन्तोषी तीन भी पण्डित परिषत् (धर्मसभा) कहाते हैं ॥२२॥
भाषार्थसहिता ॥ ५३
अतऊर्ध्वंतुयेविप्राः केवलंनामधारकाः । परिषत्त्वंनतेष्वस्ति सहस्रगुणितेष्वपि ॥ २३ ॥ यथाकाष्ठमयो हस्ती यथाचर्ममयोमृगः । ब्राह्मणास्त्वनधीयानास्त्रयस्तेनामधारकाः ॥ २४ ॥ ग्रामस्थानंयथाशून्यं यथाकूपस्तुनिर्जलः । यथाहुतमनग्नौच अमन्त्रोब्राह्मणस्तथा ॥२५॥ यथाषण्ढोऽफलःस्त्रीषु यथागौरूपराऽफला । यथाचाज्ञेफलं दानं तथाविप्रोऽनृचोऽफलः ॥ २६ ॥ चित्रंकर्मयथानेकैरङ्गैरुन्मील्यतेशनैः । ब्राह्मण्यमपितद्वद्धि संस्कारैर्मन्त्रपूर्वकैः ॥ २७ ॥ प्रायश्चित्तंप्रयच्छन्ति येद्विजानामधारकाः । तेद्विजाःपापकर्माणः समेतानरकंययुः ॥ २८ ॥ येपठन्तिद्विजावेदं पञ्चयज्ञरताश्चये । त्रैलोक्यंतारयन्त्येव पञ्चेन्द्रियरताअपि ॥ २९ ॥ संप्रणीतःश्मशानेषु दीप्तोऽग्निःसर्वभक्षकः ।
इन से भिन्न जो ब्राह्मण केवल नाम के धारण करने वाले हैं वे चाहें हजार गुणे भी हों तो उन की धर्मसभा नहीं होती ॥ २३ ॥ जैसे काठ का हाथी जैसे चाम का हिरण हिरण नहीं वैसे ही वेद के बिना पढ़े ब्राह्मण हैं ये तीनों नाम के ही धारण करने वाले हैं ॥ २४ ॥ जैसा निर्जन (जिस में कोई मनुष्य न हो वह) ग्राम, जैसा जल के विना कूप (अंधौआ) जैसा अग्नि विना भस्मादि में होम करना है ऐसा ही वेद मन्त्रों को पढ़े विना ब्राह्मण भी शून्य मात्र है ॥ २५ ॥ जैसे स्त्रियों में नपुंसक वृथा है जैसे बंध्या गौ वृथा है और जैसे मूर्ख ब्राह्मण को दान देना वृथा है ऐसे ही वेद हीन ब्राह्मण वृथा है ॥ २६ ॥ जैसे चित्र खींचने वालों की चित्रकारी अनेक रंगों से शनैः २ अति शोभायमान चमकीली होती है इसी प्रकार मंत्रों के द्वारा हुए अनेक संस्कारों से ब्राह्मणपन भी उज्ज्वल प्रकाशमान होता है ॥२७॥ जो विद्या और तप से हीन नामधारी ब्राह्मण प्रायश्चित्त देतेहैं वे सब पापों के कर्त्ता इकट्ठे होकर नरक में जाते हैं ॥ २८ ॥ जो ब्राह्मण वेद को पढ़ते हैं वा जो पंच महायज्ञों के करने में तत्पर हैं वे पांचो इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हों तो भी त्रिलोकी को तारने वाले ही हैं ॥२९॥ जैसे जलता हुआ अग्नि श्मशानों में मुर्दों का भक्षक होने पर भी संसार का उद्धार कर्त्ता
२४ पराशरस्मृतिः ॥
तथाचवेदविद्विप्रः सर्वभक्षोऽपिदैवतम् ॥ ३० ॥ अमेध्यानि तु सर्वाणि प्रक्षिप्यन्तेयथोदके । तथैवकिल्बिषंसर्वं प्रक्षिपेद्द्विजानले ॥ ३१ ॥ गायत्रीरहितोविप्रः शूद्रादप्यशुचिर्भवेत् । गायत्रोब्रह्मतत्त्वज्ञाः संपूज्यन्तेजनैर्द्विजाः ॥ ३२ ॥ दुःशीलोऽपिद्विजःपूज्यो नतुशूद्रोजितेन्द्रियः । कःपरित्यज्यगांदुष्टां दुहेच्छीलवतींखरीम् ॥ ३३ ॥ धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखङ्गधराद्विजाः । क्रीडार्थमपियद्ब्रूयुः सधर्मःपरमःस्मृतः ॥ ३४ ॥ चातुर्वेद्योविकल्पीच अङ्गविद्धर्मपाठकः । त्रयश्चाश्रमिणोमुख्याः पर्षदेषादशावरा ॥ ३५ ॥ राज्ञश्चानुमतेस्थित्वा प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् । स्वयमेवनकर्तव्यं कर्तव्यास्वल्पनिष्कृतिः ॥ ३६ ॥ ब्राह्मणांस्तानतिक्रम्य राजाकर्तुं यदीच्छति ।
देवता है इसी प्रकार सर्व भक्षक होने पर भी धर्म निष्ठ ब्राह्मण वेद का ज्ञाता होने से देवता ही है ॥ ३०॥ जैसे संपूर्ण अपवित्र वस्तु वर्षादि के समय नद्यादि के जल में फेंके शुद्ध हो जाते हैं वैसे ही संपूर्ण पाप ब्राह्मण रूप अग्नि में छोड़ देने से भस्म हो जाते हैं ॥ ३१ ॥ गायत्री से हीन ब्राह्मण शूद्र से भी अधिक अशुद्ध होता है । और गायत्री रूप वेद के तत्त्व को जानने वाले ब्राह्मणों को मनुष्य पूजते हैं ॥३२॥ दुष्ट स्वभाव वाला भी ब्राह्मण पूजने योग्य है और जितेन्द्रिय भी शूद्र वैसा पूज्य नहीं क्योंकि (निकृष्ट ब्राह्मण में भी कुछ ब्राह्मण पन अवश्य होगा) ऐसा कौन है जो दुष्ट गौ को छोड़ कर सुशीला गधी को दुहे ॥३३॥ धर्मशास्त्ररूपी रथमें बैठे, वेदरूपी खड्ग (हथियारों) को धारण किये विद्वान् ब्राह्मण साधारण विचार से भी जो कुछ कहें वह भी उत्तम धर्म माना जाय ॥ ३४॥ चारों वेदों के ज्ञाता चार विद्वान्, पांचवां नैयायिक, छठा छः वेदाङ्गों का ज्ञाता, सातवां धर्मशास्त्रों का पाठक और ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, ये तीनों आश्रमों वाले मुखिया, यह कम से कम दश धर्मज्ञ विद्वानों की धर्म सभा कहाती है ॥३५॥ राजा की अनुमति में होकर प्रायश्चित्त बतावें आप ही प्रायश्चित्त का निर्णय न कर देवे (अर्थात प्रायश्चित्तादि धर्म व्यवस्था कारिणी विद्वत्सभा राजसभा की अनुमति से अपना काम करे) परन्तु स्वल्प प्रायश्चित्त को स्वयं भी निश्चित कर देवे ॥ ३६ ॥ यदि उन वि-
भाषार्थसहिता ॥ ५५
तत्पापंशतधाभूत्वा राजानमनुगच्छति ॥ ३७ ॥
प्रायश्चित्तंसदादद्याद्देवतायतनाग्रतः ।
आत्मकृच्छ्रंततःकृत्वा जपेद्वेवेदमातरम् ॥ ३८ ॥
सशिखंवपनंकृत्वा त्रिसंध्यमवगाहनम् ।
गवांमध्येवसेद्रात्रौ दिवागाश्चाप्यनुव्रजेत् ॥ ३६ ॥
उष्णेवर्षतिशीतेवा मारुतेवातिवाभृशम् ।
नकुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वातुशक्तितः ॥ ४० ॥
आत्मनोयदिवाऽन्येषां गृहेक्षेत्रेऽथवाखले ।
भक्षयन्तीनंकथयेत्पिबन्तंचैववत्सकम् ॥ ४१ ॥
पिवन्तांपुपिवेत्तोयं संविशन्तीमुपाविशेत् ।
पतितांपङ्कलग्नांवा सर्वप्राणैःसमुद्धरेत् ॥ ४२ ॥
ब्राह्मणार्थेगवार्थेवा यस्तुप्राणान्परित्यजेत् ।
मुच्यतेब्रह्महत्याया गोप्तागोर्ब्राह्मणस्यच ॥ ४३ ॥
गायधस्यानुरूपेण प्राजापत्यंविनिर्दिशेत् ।
द्वान् ब्राह्मणों का उल्लंघन करके राजा स्वयं किया चाहे तो वह पाप सौ गुणा होकर राजा को लगता है ॥ ३७ ॥ सदैव देवता के मन्दिर के आगे प्रायश्चित्त करावे। फिर वह विद्वान् भी अपना कृच्छ्र व्रत (प्रायश्चित्त) करके वेद की माता गायत्री का जप करे ॥ ३८ ॥ प्रायश्चित्त करने वाला शिखा सहित बालों का मुंडन कराके त्रिकाल स्नान करै । रात्रि को गौओं के बीच गोशाला में वसे और दिन में चरने को निकली गौओं के पीछे २ जंगल में भ्रमण करै ॥३९॥ अत्यन्त उष्णकाल (गर्मी) में, वर्षा में, शीतकाल में, और अत्यन्त पवन (आंधी) में अपनी रक्षा का उपाय तब करे जब शक्ति भर गौओं की रक्षा पहिले करलेवे ॥४०॥ अपने अथवा अन्य के घर में, खेत में अथवा खलियान में खाती हुई गौ को न स्वयं हटावे तथा न अन्य से हटाने को कहे और दूध पीते हुए बछड़े को भी किसी को न बतावे ॥ ४१ ॥ गौ ओं के जल पीने पर स्वयं जल पीवे, गौओं के बैठने पर स्वयं बैठे और गढ़े आदि में गिरी पड़ी वा कीचड़ में फसी गौ को संपूर्ण बल से उठावे निकाले ॥४२॥ जो कोई मनुष्य ब्राह्मण वा गौओं की रक्षा करने के लिये अपने प्राणों को देकर गौ और ब्राह्मण की रक्षा करै वह ब्रह्महत्यादि महापापों से भी शीघ्र ही छूट जाता है ॥४३॥ गौवध पाप के अनुसार निम्न चतुर्विधों में से उचित प्राजापत्य व्रत बतावे । उस
५६ पराशरस्मृतिः ॥
प्राजापत्यंतुयत्कृच्छ्रं विभजेत्तच्चतुर्विधम् ॥ ४४ ॥
एकाहमेकभक्ताशी एकाहंनक्तभोजनः ।
अयाचितञ्चै कमहरेकाहंमारुताशनः ॥ ४५ ॥
दिनद्वयंचैकभक्तो द्विदिनंनक्तभोजनः ।
दिनद्वयमयाचीस्याद् द्विदिनंमारुताशनः ॥ ४६॥
त्रिदिनंचैकभक्ताशी त्रिदिनंनक्तभोजनः ।
दिनत्रयमयाचीस्यात्त्रिदिनंमारुताशनः ॥ ४७ ॥
चतुरहंत्वेकभक्ताशी चतुरहंनक्तभोजनः ।
चतुर्द्दिनमयाचीस्याच्चतुरहंमारुताशनः ॥ ४८ ॥
प्रायश्चित्तेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ।
विप्राणांदक्षिणां दद्यात्पवित्राणिजपेद्द्विजः ॥ ४६ ॥
ब्राह्मणान्भोजयित्वातु गोघ्नःशुद्ध्येन्नसंशयः ॥ ५० ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
कृच्छ्र व्रत को चार भाग में बांटे ॥ ४४ ॥ एक दिन प्रातः एक वार परिमित अन्न खावे, और एक दिन रात में भोजन करै, एक दिन बिना मांगे जो मिले उसे खावे और एक दिन सर्वथा निराहार रहे यह छोटा कृच्छ्र वा पादकृच्छ्र व्रत है ॥ ४५ ॥ दो दिन एकवार प्रातःकाल परिमित खावे, दो दिन रातमें परिमित भोजन करै, दो दिन बिना मांगे जो मिले उसे खावे, फिर दो दिन निराहार उपवास करे यह द्वितीय कक्षा का कृच्छ्र व्रत वा अर्द्ध कृच्छ्र जानो ॥ ४६ ॥ तीन दिन एकवार प्रातः खावे, तीन दिन रात में भोजन करै, तीन दिन बिना मांगे जो मिले उसे खावे फिर तीन दिन निराहार रहे यह तीसरा वा पौन कृच्छ्र व्रत है ॥ ४७ ॥ चार दिन एक वार प्रातः खावे, चार दिन रात में एक वार भोजन करै फिर चार दिन बिना मागे जो मिले उसे खावे और चार दिन निराहार रहे यह पूरा कृच्छ्र व्रत है ॥ ४८ ॥ प्रायश्चित्त के पूर्ण हुए पीछे यह द्विज ब्राह्मणादि अन्य सुपात्र ब्राह्मणों को भोजन करावे दक्षिणा देवे और पवित्र वेद मन्त्रों ( गायत्री आदि ) को जपे ॥ ४९ ॥ ब्राह्मणों को भोजन करा कर गोवध का करने वाला शुद्ध हो जाता है इस में संदेह नहीं है ॥५०॥
यह पाराशरीय धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥