अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
२८ शंखस्मृतिः ॥
नास्त्यघमर्षणात्परमन्तर्जले ॥२॥ नसावित्र्याः समं जप्यं न व्याहृतिसमं हुतम् ॥ ३ ॥ कुशशय्यामासीनः कुशोत्तरीयवान् कुशपवित्रपाणिः प्राङ्मुखः सूर्याभिमुखो वा ऽक्षमालामुपादाय देवताध्यायी जपं कुर्यात् ॥ ४ ॥ सुवर्णमणिमुक्तास्फटिकपद्माक्षरुद्राक्षपुत्रजीवकानामन्यतमेनादाय मालां कुर्यात् ॥५॥ कुशग्रन्थिं कृत्वा वामहस्तोपयमैर्वा गणयेत् ॥६॥ आदौ देवता ऋषिश्च्छन्दः स्मरेत् ॥ ७ ॥ ततः सप्रणवां सव्याहृतिकामाद्यन्तं च शिरसा गायत्रीमावर्तयेत् ॥ ८ ॥ अस्यास्याः सविता देवता ऋषिर्विश्वामित्रो गायत्री छन्दः ॥ ९ ॥ ओं कारः प्रणवाख्यः ॥ १० ॥ ओं भूः । ओं भुवः । ओं स्वः । ओं महः । ओं जनः । ओं तपः । ओं सत्यमिति व्याहृतयः ॥११॥ ओं आपोज्योतीरसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोमिति शिरः ॥ १२ ॥ भवन्ति चात्र श्लोकाः ॥ १३ ॥
जल के भीतर के जपों में अघमर्षण से बढ़ दूसरा नहीं है ॥२॥ गायत्री के समान अन्य मन्त्र का जप नहीं है और व्याहृतियों के समान अन्य होम नहीं है ॥३॥ कुशासन पर बैठ कुश का दुपट्टा कन्धे पर धर कुश की पवित्रियों को धारण कर पूर्व को वा सूर्य के सम्मुख मुख कर के रुद्राक्ष की माला को लेकर देवता का ध्यान करता हुआ मूल गायत्री वा अपने गुरु मन्त्र का जप करे ॥ ४ ॥ सुवर्ण, मूंगा, मोती, स्फटिक, कमलगट्टा, रुद्राक्ष, अहेड़ के फल, जीवक, इन में से किसी एक को लेकर जप की माला बनावे ॥ ५ ॥ अथवा कुश की रस्सी में दी गांठों से अथवा बायें हाथ की अंगुलियों से गिनती करे ॥ ६ ॥ प्रथम मन्त्र के देवता, ऋषि, छन्द, इन का स्मरण करे ॥ ७ ॥ फिर आदि से व्याहृतियों सहित और अन्त में शिरः मन्त्र (आपोज्योती०) सहित गायत्री का जप करे ॥ ८ ॥ इस (तत्सवितुः) इस का सविता देवता, विश्वामित्र ऋषि, और गायत्री छन्द है ॥ ९ ॥ ॐकार का नाम प्रणव है ॥ १० ॥ ॐभूः, ॐभुवः, ॐस्वः, ॐमहः, ॐजनः, ॐतपः, ॐसत्यम् । ये सात व्याहृति कहाती हैं ॥११॥ (ॐ आपोज्योती रसोऽमृतं भूर्भुवःस्वरोम्) इस को गायत्री का शिरो मन्त्र कहते हैं ॥ १२ ॥ यही बात श्लोकों में भी कही है ॥ १३ ॥
भाषार्थसंहिता ॥ २९
सव्याहृतिकांसप्रणवां गायत्रीं शिरसासह् ।
ये जपन्ति सदा तेषां न भयं विद्यते क्वचित् ॥ १४ ॥
शतंजप्त्वा तु सा देवी दिनपापप्रणाशिनी ।
सहस्रंजप्त्वा तु तथा पातकेभ्यः समुद्धरेत् ॥ १५ ॥
दशसहस्रंजप्त्वा तु सर्वकल्मषनाशिनी ।
सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ १६ ॥
सुरापश्च विशुद्ध्येत लक्षजाप्यान्न संशयः ।
प्राणायामत्रयं कृत्वा स्नानकाले समाहितः ॥ १७ ॥
अहोरात्रकृतात्पापान्तत्क्षणादेव मुच्यते ।
सव्याहृतिकाः सप्रणवाः प्राणायामास्तु षोडश ॥ १८ ॥
अपि भ्रूणहनं मासान्पुनन्त्यहरहः कृताः ।
हुता देवी विशेषेण सर्वकामप्रदायिनी ॥ १९ ॥
सर्वपापक्षयकरी वरदा भक्तवत्सला ।
शान्तिकामस्तु जुहुयात्सावित्रीमक्षतैः शुचिः ॥ २० ॥
हन्तुकामोऽपमृत्युञ्च घृतेन जुहुयात्तथा ।
व्याहृति प्रणव शिरो मन्त्र इन सबके सहित गायत्री को जो मनुष्य सदैव जपते हैं उन को कहीं भी भय नहीं होता ॥१४॥ सौ बार जपी हुई गायत्री दिन के पापों को नष्ट करती है हजार बार जपी हुई पातकी से उद्धार करती है ॥१५॥ दश हजार बार जपी हुई सब पापों का नाश करती है । सुवर्ण की चोरी, ब्रह्महत्या गुरुपत्नी गमन ॥१६॥ मदिरा पान इन महापातकों का भी कर्त्ता ब्राह्मण लक्ष गायत्री का जप करने से निस्संदेह शुद्ध हो जाता है । स्नान के समय सावधानी से तीन प्राणायाम करके ॥१७॥ एक रात दिन में किये पाप से उसी क्षण में छूट जाता है। व्याहृति और ॐकार सहित सोलह प्राणायाम ॥१८॥ प्रति दिन करने से एक मास में भ्रूण गर्भ की हत्या करने वाले को भी शुद्ध निर्दोष कर देते हैं। और गायत्री से किया होम सब कामनाओं का देने वाला होता है ॥१९॥ भक्ति है प्यारी जिस को ऐसी वर देने वाली गायत्री की अधिष्ठात्री देवता सब पापों को क्षय करती है । जो मनुष्य शान्ति चाहे वह शुद्ध होकर गायत्री का होम बिना कुटे जौ वा धानों से करे ॥२०॥ जो पुरुष अकाल मृत्यु को दूर किया चाहे, वह घी से, लक्ष्मी
३० | शङ्खस्मृतिः ॥
श्रीकामस्तुतथापद्मैर्विल्वैःकाञ्चनकामुकः ॥ २१ ॥ ब्रह्मवर्चसकामस्तु पयसाजुहुयात्तथा । घृतप्लुतैस्तिलैर्वह्निं जुहुयात्सुसमाहितः ॥ २२ ॥ गायत्र्ययुतहोमाच्च सर्वपापःप्रमुच्यते । पापात्मालक्षहोमेन पातकेभ्यःप्रमुच्यते ॥ २३ ॥ अभीष्टंलोकमाप्नोति प्राप्नुयात्काममीप्सितम् । गायत्रीवेदजननी गायत्रीपापनाशिनी ॥ २४ ॥ गायत्र्याःपरमंनास्ति दिविचेहचपावनम् । हस्तत्राणप्रदादेवी पततांनरकार्णवे ॥ २५ ॥ तस्मान्नामभ्यसेन्नित्यं ब्राह्मणोनियतःशुचिः । गायत्रीजाप्यनिरतं हव्यकव्येषुभोजयेत् ॥ २६ ॥ तस्मिन्नन्तिष्ठतेपापमम्बुबिन्दुरिवपुष्करे ॥ २७ ॥ जप्येनैवतुसंसिध्येद् ब्राह्मणोनात्रसंशयः ।
को चाहने वाला कमलों से सुवर्ण को चाहने वाला विल्व फलों से गायत्री मन्त्र द्वारा होम करे ॥२१॥ जो ब्रह्म तेज को चाहे, वह दूध से गायत्री द्वारा होम करे और भली प्रकार सावधानी से घी मिले तिलों से ॥ २२ ॥ दश हजार गायत्री द्वारा किये होम से सब पापों से छूट जाता है। और बड़ा पापी मनुष्य भी लक्ष गायत्री के होम से पातकों से छूट जाता है ॥ २३ ॥ तथा वह वाँछित लोक को और वाञ्छित फल को प्राप्त होता है। गायत्री वेदों की माता और पापों को नाश करने वाली है ॥ २४ ॥ इस लोक तथा परलोक-स्वर्ग में गायत्री से अधिक पवित्र करने वाला कोई नहीं है। नरक रूप समुद्र में गिरने वाले मनुष्यों को हाथ पकड़ कर रक्षा करने वाली गायत्री ही है ॥ २५ ॥ तिस से नियम पूर्वक शुद्धता से ब्राह्मण नित्य गायत्री का अभ्यास नाम जप करे । गायत्री के जप में तत्पर ब्राह्मण को हव्य (जो अन्न देवताओं के लिये बनाया हो ) और कव्य (जो पितरों के निमित्त हो) सो जिमावे ॥ २६ ॥ क्योंकि उस ब्राह्मण में पाप इस प्रकार नहीं ठहरते जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूंद ॥ २७ ॥ जप से ही ब्राह्मण सिद्धि को प्राप्त हो जाता है इसमें संशय नहीं है, वह ब्राह्मण चाहे अन्य कोई पुण्य का काम
कुर्यादन्यन्नवाकुर्यान् मैत्रोब्राह्मणउच्यते ॥ २८ ॥
उपांशुःस्याच्छतगुणः साहस्त्रोमानसःस्मृतः ।
नोच्चैर्जपंबुधःकुर्यात्सावित्र्यास्तुविशेषतः ॥ २९ ॥
सावित्रीजप्यनिरतः स्वर्गमाप्नोतिमानवः ।
गायत्रीजाप्यनिरतो मोक्षोपायंचविन्दति ॥ ३० ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नातःप्रयतमानसः ।
गायत्रींतुजपेद्भक्त्या सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ ३१ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
स्नातःकृतजप्यस्तदनु प्राङ्मुखो दिव्येन तीर्थेन देवानु-
दकेन तर्पयेत् ॥ १ ॥ अथ तर्पणविधिः॥२॥ ओं० भगवन्तं
शेषं तर्पयामि ॥ ३ ॥ कालाग्निरुद्रंतुततो रुक्मभौमंतथैवच ।
श्वेतभौमंततःप्रोक्तं पातालानांचसप्तकम् ॥ ४ ॥
जम्बूद्वीपं ततःप्रोक्तं शाकद्वीपंततःपरम् ।
गोमेदपुष्करंतद्वच्छाकाख्यंचततःपरम् ॥ ५ ॥
करे वा न करे तो भी उस को मित्र कहते हैं ॥ २८ ॥ वाणी से साफ २ बोलने की अपेक्षा उपांशु (मन्द) जप सौगुणा और मानस (मन २ में) जप करना हजार गुणा अधिक फल दायक कहा है । ज्ञानवान् मनुष्य ऊंचे स्वर से जप न करे और गायत्रीका जप तो ऊंचे स्वर से विशेष कर कदापि न करे ॥२९॥ गायत्री के जप में तत्पर मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता और गायत्री के जपमें तत्पर मनुष्य मोक्ष के उपाय को भी प्राप्त होता है ॥ ३० ॥ तिससे सब प्रयत्न से स्नान के पीछे मन को रोक कर भक्ति से सब पापों के नाश करने वाली गायत्री को जपे ॥ ३१ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में बारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
स्नान और सन्ध्योपासन जप करके पूर्वाभिमुख बैठा पुरुष देवतीर्थ से देवताओं का जल से तर्पण करे ॥ १ ॥ अब तर्पणविधि कहते हैं ॥ २ ॥ ओं भगवान् शेषको तृप्त करता हूं ॥ ३ ॥ फिर कालाग्निरुद्र, रुक्मभौम, श्वेतभौम, सातों पाताल सब को क्रम से तृप्त करें अर्थात् (अतलं तर्पयामि) इत्यादि रीति से पृथक् २ सबका तर्पण करे ॥ ४ ॥ फिर जम्बूद्वीप, शाकद्वीप, गोमेद, पुष्कर, और शाक, इन को पृथक् २ जलदान से तृप्त करे ॥ ५ ॥
३२ | संस्कारविधिः ॥
शार्व्वरं ततः स्वधामानं ततो हिरण्यरोगणं ततः कल्पस्थायिनो लोकांस्तर्पयेत् ॥ ६ ॥ लवणोदकं ततः क्षीरोदं ततो घृतोदं तत इक्षुदं ततः स्वादूदं तत इति सप्त समुद्रकं प्रत्यृचं पुरुषसूक्तेनोदकाञ्जलीन् दद्यात्, पुष्पाणि च तथा भक्त्या॥७॥ अथ कृतापसव्यो दक्षिणामुखोऽन्तर्जानुः पित्र्येण पितॄणां यथाश्रद्धं प्रकाममुदकं दद्यात् ॥ ८ ॥ सौवर्णेन पात्रेण राजतेनौदुम्बरेण खड्गपात्रेणान्यपात्रेण वोदकं पितृतीर्थं स्पृशन्दद्यात् ॥९॥ पित्रे पितामहाय प्रपितामहाय मात्रे पितामह्यै प्रपितामह्यै मातामहाय प्रमातामहाय वृद्धप्रमातामहाय मातामह्यै प्रमातामह्यै वृद्धप्रमातामह्यै सप्रभान्पुरुषान् पितृपक्षे यावतां नाम जानीयात् पितृपक्षाणां तर्पणं कृत्वा गुरूणां मातृपक्षाणां तर्पणं कुर्यात् ॥१०॥ मातृपक्षाणां तर्पणं कृत्वा सम्बन्धिबान्धवानां कुर्यात् तेषां कृत्वा सुहृदां कुर्यात् ॥ ११ ॥ भवन्ति चात्र श्लोकाः ॥ १२ ॥
फिर शार्वर, स्वधामा, हिरण्यरोमा, कल्पतक ठहरने वाले लोक, इन सबको तृप्त कर देवे। फिर लवणोद, क्षीरोद, घृतोद, इक्षुद, इन सात समुद्रों को तृप्त करे । फिर परमेश्वर की पुरुष सूक्त (सहस्रशीर्षा०) के प्रत्येक मन्त्रसे जलकी अञ्जली देवे और अञ्जलि के साथ भक्ति से पुष्पों को समर्पण करे ॥ ७ ॥ फिर अपसव्य हो कर दक्षिण को मुख किये और गोड़ेके भीतर हाथ करके पितृतीर्थ से उत्तम श्रद्धाके साथ यथेष्ट जल पितरों को देवे ॥ ८ ॥ सुवर्ण, चांदी, गूलर, गैंडा, इन सुवर्णादि के पात्रों से अथवा किसी अन्य तांबादिके पात्र से पितृ तीर्थ का स्पर्श करते हुए जलको देवे ॥ ९ ॥ पिता, पितामह, (दादा) प्रपितामह (पड़दादा) माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, (नाना) प्रमातामह, (पड़नाना) वृद्धप्रमातामह, मातामही (नानी) प्रमातामही, (पड़नानी) वृद्धप्रमातामही, सात पीढ़ी तक पिता के पक्ष में जितनों का नाम जानता हो, पितृपक्ष वालोंका तर्पण करके, गुरु और मातृपक्षवालों का तर्पण करे ॥ १० ॥ और मातृपक्षवालों का तर्पण करके अन्य सम्बन्धि तथा बान्धवोंका तर्पण करे ॥ ११ ॥ इस तर्पणके विषयमें श्लोक भी प्रमाण हैं ॥१२॥
भाषाधर्मसंहिता ॥ ३३
विनारौप्यसुवर्णेन विनाताम्रेणतिलेन च । विनादर्भैश्चमन्त्रैश्च पितॄणांनोपतिष्ठते ॥ १३ ॥ सौवर्णराजताभ्यांच खङ्गेनौदुम्बरेणच । दत्तमक्षयतांयाति पितॄणांतुतिलोदकम् ॥ १४ ॥ हेम्नातुराहतंयुक्तं क्षीरेणमधुनासह । तदप्यक्षयतांयाति पितॄणांतुतिलोदकम् ॥ १५ ॥ कुर्यादहरहःश्राद्धमन्नाद्येनोदकेनवा । पयोमूलफलैर्वापि पितॄणांप्रीतिमावहन् ॥ १६ ॥ स्नातःसंतर्पणंकृत्वा पितॄणांतुतिलाम्भसा । पितृयज्ञमवाप्नोति प्रीणातिचपितॄंस्तथा ॥ १७ ॥ इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
ब्राह्मणान्नपरीक्षेत दैवेकर्मणिधर्मवित् । पित्र्येकर्मणिसंप्राप्ते युक्तमाहुःपरीक्षणम् ॥ १ ॥ ब्राह्मणाश्चैविविकर्मस्था वैडालव्रतिकारतथा ।
चांदी, सोना, तांबा, तिल, कुश, और मन्त्र, इन के बिना दिया हो जल वह पितरों को प्राप्त नहीं होता ॥ १३ ॥ सोना, चांदी, गेंडा, गूलर, इन के पात्रों में, पितरों को दिया जल प्रदाय अविनाशी फल दायक होता है ॥१४॥ सोना, दूध, मदन, इन के साथ जो तिल सहित जल पितरों को दिया जाता है, वह भी अक्षय फलदायी है ॥१५॥ पितरों की श्रद्धा प्रीति प्रकट करता हुआ अन्न आदि, जल, दूध मूल, अथवा फलों से पितरों का प्रति दिन श्राद्ध करे ॥ १६ ॥ स्नान के पीछे तिल सहित जल में पितरों का तर्पण करने से पितृयज्ञ पूरा हो जाता है और पितर भी तृप्त हो जाते हैं ॥ १७ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
धर्म का मर्म ज्ञाता पुरुष देवताओं के निमित्त किये दान पुण्यादि कर्म में ब्राह्मणों की परीक्षा न करे और पितरों के निमित्त श्राद्धादि कर्म हो तो परीक्षा करना आवश्यक कहा है ॥१॥ जो ब्राह्मण निषिद्ध कर्म को करते हैं अथवा बैडालव्रत (निर्दयी चित्त वाले) हैं, या जिन के देह के अंगुली आदि
५
भाषाधर्मसंहिता ॥ ३३
विनारौप्यसुवर्णेन विनाताम्रतिलेनच ।
विनादर्भैश्चमन्त्रैश्च पितॄणांनोपतिष्ठते ॥ १३ ॥
सौवर्णराजताभ्यांच खड्गेनौदुम्बरेणच ।
दत्तमक्षयतांयाति पितॄणांतुतिलोदकम् ॥ १४ ॥
हेम्नातुसहयुद्धृतं क्षीरेणमधुनासह ।
तदप्यक्षयतांयाति पितॄणांतुतिलोदकम् ॥ १५ ॥
कुर्यादहरहःश्राद्धमन्नाद्येनोदकेनवा ।
पयोमूलफलैर्वापि पितॄणांप्रीतिमावहन् ॥ १६ ॥
स्नातःसंतर्पणंकृत्वा पितॄणांतुतिलाम्भसा ।
पितृयज्ञमवाप्नोति प्रीणातिचपितॄंस्तथा ॥ १७ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
ब्राह्मणान्नपरीक्षेत दैवेकर्मणिधर्मवित् ।
पित्र्येकर्मणिसंप्राप्ते युक्तमाहुःपरीक्षणम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणाश्चेविकर्मस्था बडालव्रतिकास्तथा ।
चांदी, सोना, तांबा, तिल, कुश, और मन्त्र, इन के बिना दिया जो जल वह पितरों को प्राप्त नहीं होता ॥ १३ ॥ सोना, चांदी, गेंडा, गूलर, इन के पात्रों से, पितरों को दिया जल अक्षय अविनाशी फल दायक होता है ॥१४॥ सोना, दूध, शहद, इन के साथ जो तिल सहित जल पितरों को दिया जाता है वह भी अक्षय फलदायी है॥१५॥ पितरों की श्रद्धा प्रीति प्रकट करता हुआ अन्न आदि, जल, दूध, मूल, अथवा फलों से पितरों का प्रति दिन श्राद्ध करे ॥ १६ ॥ स्नान के पीछे तिल सहित जल से पितरों का तर्पण करने से पितृयज्ञ पूरा हो जाता है और पितर भी तृप्त हो जाते हैं ॥ १७ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
धर्म का मर्म ज्ञाता पुरुष देवताओं के निमित्त किये दान पुण्यादि कर्म में ब्राह्मणों की परीक्षा न करे और पितरों के निमित्त श्राद्धादि कर्म हो तो परीक्षा करना आवश्यक कहा है ॥१॥ जो ब्राह्मण निषिद्ध कर्म को करते हैं, अथवा बैड़ालव्रत (निर्दयी चित्त वाले) हैं, वा जिन के देह के अंगुली आदि
५
३४ शंखस्मृतिः ॥
ऊनाङ्गाअतिरिक्ताङ्गा ब्राह्मणाःपङ्क्तिदूषकाः ॥ २ ॥ गुरूणांप्रतिकूलाश्च वेदान्न्युत्सादिनश्चये । गुरूणांत्यागिनश्चैव ब्राह्मणाःपङ्क्तिदूषकाः ॥ ३ ॥ अनध्यायेष्वधीयानाः शौचाचारविवर्जिताः । शूद्रान्नरससंपुष्टा ब्राह्मणाःपङ्क्तिदूषकाः ॥ ४ ॥ षडङ्गवित्त्रिसुपर्णो बह्वृचोज्येष्ठसामगः । त्रिणाचिकेतःपञ्चाग्निर्ब्राह्मणाःपङ्क्तिपावनाः ॥५॥ ब्रह्मदेयानुसन्तानो ब्रह्मदेयाप्रदायकः । ब्रह्मदेयापतिर्यश्च ब्राह्मणःपङ्क्तिपावनः ॥ ६ ॥ ऋग्यजुःपारगायश्च साम्नांयश्चापिपारगः । अथर्वाङ्गिरसोऽध्येता ब्राह्मणःपङ्क्तिपावनः ॥ ७ ॥ नित्यंयोगरतोविद्वान् समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
अंग न्यूनाधिक हों, वे पंक्ति को दूषित करने वाले हैं ऐसे ब्राह्मणों को न जि- मावे ॥ २ ॥ गुरुओं के जो प्रतिकूल हों, वा जो वेद के अभ्यास तथा अग्निहोत्र के त्यागने वाले और जो गुरुओं को त्यागते हैं, वे भी पंक्ति के दूषक हैं ॥ ३ ॥ जो अनध्यायी में वेद को पढ़ते, जो शौच आचार से हीन और शूद्र के अन्न से बने रस से पुष्ट होंति, वे भी पंक्ति के दूषक हैं ॥ ४ ॥ वेद के छः अंगों ( शिक्षादि ) को जो जाने, त्रिसुपर्ण को जो जाने, ऋग्वेद जिस ने पढ़ा हो, या ज्येष्ठ ( बड़े ) सामगान को जो गावे, तीन वेद को जान कर नाचिकेत अग्नि में चयन यज्ञ करने वाला, पांच अग्नियों ( गार्हन्त्याऽऽहवनीय आदि ) में अग्निहोत्रादि करने वाला, ये सब ब्राह्मण पंक्ति के पावन ( पवित्र करने वाले ) हैं ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण कुल परम्परा से वेद को पढ़ता पढ़ाता हो, जो ब्राह्मणों को देने योग्य दान देता हो और जो अनेक ब्राह्मणों के देनेयोग्य पदार्थों को स्वयं अकेला ही न लेवे, वह पङ्क्ति पावन कहाता है ॥ ६ ॥ जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, और सामवेद को पूरा २ जानता हो और आङ्गिरस अथर्व वेद को जिस ने पढ़ा हो, वह ब्राह्मण भी पङ्क्तिपावन है ॥७॥ जो विद्वान् नित्य योगाभ्यास में तत्पर हो, जो मट्टी, पत्थर और सुवर्ण को
भाषार्थसहिता ॥ ३५
ध्यानशीलोहियोविद्वान् ब्राह्मणःपङ्क्तिपावनः ॥ ८ ॥ द्वौदैवेप्राङ्मुखौत्रींश्च पित्र्येचोदङ्मुखांस्तथा । भोजयेद्विविधान्विप्रानैकैकमुभयत्रवा ॥ ९ ॥ भोजयेदथवाऽप्येकं ब्राह्मणंपङ्क्तिपावनम् । दैवेकृत्वानु नैवेद्यं पश्चादग्नौतुतांन्क्षिपेत् ॥ १० ॥ उच्छिष्टसन्निधौकार्यं पिण्डनिर्वपणंबुधैः । अभावेचतथाकार्यमग्निकार्यंयथाविधि ॥ ११ ॥ श्राद्धंकृत्वाप्रयत्नेन व्यग्रक्रोधविवर्जितः । उष्णमन्नंद्विजातिभ्यः श्रद्धयाविनिवेदयेत् ॥ १२ ॥ अन्यत्रपुष्पमृत्स्यः पीठकेभ्यस्तृणौष्ठतः । भोजयेद्विविधान्विप्रान्गन्धमाल्यैरमुज्ज्वलान् ॥ १३ ॥ यत्किंचित्पच्यतेगेहे भक्ष्यंवाभोज्यमेववा ।
बराबर समझता हो और ध्यानशील पण्डित हो वह ब्राह्मण भी पङ्क्ति-पावन है ॥ ८ ॥ दैव (विश्वेदेवा) कर्म में पूर्वाभिमुख दो ब्राह्मणों और पितृकर्म में उत्तराभिमुख अनेक प्रकार के तीन ब्राह्मणों अथवा दोनों जगह एक २ ही ब्राह्मण को जिमावे ॥ ९ ॥ अथवा कई न मिलें तो पङ्क्तिपावन एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में जिमावे और दैव कर्म के निमित्त बनाये नैवेद्य का अग्नि में होम करदेवे ॥ १० ॥ भोजन किये ब्राह्मणों के उच्छिष्ट के समीप ही बुद्धिमान् मनुष्य पितरोंके लिये पिण्डदान करे और किसी कारण से सुपात्र न मिले तो विधिपूर्वक उस अन्न का अग्नि में होम करे कि जो ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता ॥ ११ ॥ ब्राह्मणोंको भोजन कराने का बड़े यत्न से पिण्डदानरूप श्राद्ध को पूरा करके शीघ्रता और क्रोध से रहित मनुष्य श्रद्धा के साथ ताज़ा गर्म २ भोजन ब्राह्मणों को जिमावे ॥ १२ ॥ फल तृण और पीढ़ा नामक आसनोंको छोड़कर अर्थात् ऊन आदिके शुद्ध आसन पर बठाकर गन्ध और मालासे सुस्वस्थ विविध ब्राह्मणोंको विचारशील जिमावे ॥ १३॥ जो कुछ भक्ष्य, वा भोज्य घरमे पकाया हो उसको पितरोंके समीप निवेदन किये बिना कभी
३६ शंखस्मृतिः ॥
अनिवेद्यनभोक्तव्यं पिण्डमूलेकदाचन ॥ १४ ॥ उग्रगन्धान्यगन्धानि चैत्यवृक्षभवानिच । पुष्पाणिरक्तवर्णानि स्वयमुत्पतितान्यच ॥ १५ ॥ तोयोद्भवानिदेयानि रक्ताम्यपिविशेषतः । ऊर्णासूत्रं प्रदातव्यं कार्पासमथवाभवम् ॥ १६ ॥ दशांविवर्जयेत्प्राज्ञो यद्यप्यहतवस्त्रजाम् । घृतेनदीपादतव्यस्तिलतैलेन वा पुनः ॥ १७ ॥ धूपार्थंगुग्गुलं दद्याद् घृतयुक्तंमधूत्कटम् । चन्दनंचनशं दद्यात्पितॄणांकुङ्कुमंशुभम् ॥ १८ ॥ भृङ्गतृर्णसुरसिशिग्रुं पालकंसिन्धुशेफया । कूष्माण्डालाबुवार्त्ताकं कोविदारांश्चवर्जयेत् ॥ १९ ॥ पिप्पलीमरिचं चैव तथाचैवपिण्डमूलकम् । कृत्रिमंलवणंसर्वं दद्याग्रंतद्विवर्जयेत् ॥ २० ॥ राजमाषान् मसूरांश्च कोद्रवांश्चानुरूपकान् । लोहितांश्चैव निर्यासान् श्राद्धकर्मणिवर्जयेत् ॥ २१ ॥
भी भोजन न करे ॥ १४ ॥ जिन में अधिक सुगन्ध हो या जिन में सर्वथा गंध न हो, जो किसी अन्य नाम श्मशान के वृक्ष पर लगे हों, और जो लाल रंग के हों, ऐसे फूल पितरों को श्राद्ध में न चढ़ावे ॥ १५ ॥ यदि लाल फूल जल में पैदा हुये हों, तो विशेष कर पितरों पर चढ़ावे, ऊन का सूत वा नया कपास का सूत पितरों पर चढ़ावे ॥ १६ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य अहत (जो किसी थान आदि में से फाड़ा न हो ऐसे) वस्त्र की दशा भी पितरों पर न चढ़ावे। और घी का अथवा तिलों के तैल का दीपक पिण्डों के समीप में जलावे। १७। धूप के लिये घृत और मधु बहुत जिस में विशेष मिले हों, ऐसे गुग्गुल का धूप देवे, चन्दन और केशर को घिस कर पितरों का पूजन करे ॥ १८ ॥ भृङ्गवृक्ष (भांग का वृक्ष), सुरस, सहिजना, पालक, सिन्धुक कुष्माण्डक वा डिण्डिश, कहिहड़ा, तुम्बा, बैंगन, कचनार इनको श्राद्ध में छोड़ देवे अर्थात भोजनार्थ में न लेवे ॥ १९ ॥ पीपल, मिरच, गलगल, बनाया लवण, दधि का अग्र भाग इन को भी श्राद्ध में वर्ज देवे ॥ २० ॥ राजमाष (रवांस) मसूर-कोदों, कांगूदार, लाल गोंद इन को भी श्राद्ध कर्म में वर्ज देवे ॥ २१ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ३९
आम्रामलकीमिक्षुं मृद्वीकादधिदाडिमान् । विदार्य्यश्वत्थरम्भाद्यान्दद्याच्छ्राद्धेप्रयत्नतः ॥ २२ ॥ धानालाजेमधुपुने सक्तून्शर्करयासह । दद्याच्छ्राद्धेप्रयत्नेन शृङ्गाटकविसेतकान् ॥ २३ ॥ भोजयित्वाद्विजान्भक्त्या स्वाचान्तान्दत्तदक्षिणान् । अभिवाद्यपुनर्विप्राननुव्रज्याविसर्जयेत् ॥ २४ ॥ निमन्त्रितस्तुयःश्राद्धे मैथुनंसेवतेद्विजः । श्राद्धंदत्त्वाचभुक्त्वाच युक्तःस्यान्महत्तैनसा ॥ २५ ॥ कालशाकंमहाशल्कं मांसंवाधीणसस्यच । खड्गमांसंतदानन्तं यमःप्रोवाचधर्मवित् ॥ २६ ॥ यद्ददातिगयाक्षेत्रे प्रभासेपुष्करेत्तथा । प्रयागेनमिषारण्ये सर्वमानन्त्यमश्नुते ॥ २७ ॥ गङ्गायमुनयोस्तीरे पयोष्ण्याममरकण्टके ।
आम के फल आंवला गाड़ा, या गन्ना, वा पोड़ा, दाख, दही, अनार, विदारी कन्द, केला, इनको श्राद्ध में विशेष कर ब्राह्मणों को जिमावे ॥ २२ ॥ महत से मिले भुंजे जो और सांठों खांड मिल सत्तू, शृंगाटक (जल की कटहल्ली का फल) विसैतक (भिम) इनको श्राद्ध में विशेष कर देवे ॥ २३ ॥ ब्राह्मणों को भक्ति से भोजन करा कर किया है आचमन जिन्होंने ने और दी है दक्षिणा जिन को ऐसे ब्राह्मणों को फिर नमस्कार और अनु (पीछे २) दूर तक पधार के विसर्जन करे ॥ २४ ॥ जो श्राद्ध में न्योता हुआ ब्राह्मण मैथुन करे उसको जो श्राद्ध में जिमाये, वह और भोजन कराने वाला दोनो बड़े पाप से युक्त होते हैं ॥ २५ ॥ ऋतु का शाक, महाशल्क नामक मछली, वार्धाणस अधिक लम्बे कानोंवाले बकराका मांस, और गेंडा का मांस इन को यमराज ने श्राद्ध में अनन्त फल देने वाले कहा है ॥ २६ ॥ गया, प्रभास, पुष्कर, प्रयाग, नैमिषारण्य इन तीर्थों में जा कर जो पितरों का श्राद्ध करता है, वह अक्षय फलदायी है ॥ २७ ॥ गंगा, यमुना के तीर पर, पयोष्णी नदी पर, अमरकंटक, नर्मदा और गया के तीर पर इन में पिण्ड
३८ | शंखस्मृतिः ॥
नर्मदायांगयातीरे सर्वमानन्त्यमुच्यते ॥ २८ ॥ वाराणस्यांकुरुक्षेत्रे भृगुतुङ्गेमहालये । सप्तवेण्यामृषिकूपेच तदप्यक्षयमुच्यते ॥ २९ ॥ म्लेच्छदेशेतथारात्रौ सन्ध्यायांचविशेषतः । नश्राद्धमाचरेत्प्राज्ञो म्लेच्छदेशेनचव्रजेत् ॥ ३० ॥ हस्तिच्छायासुयद्दत्तं यद्दत्तंराहुदर्शने । विषुवत्ययनेचैव सर्वमानन्त्यमुच्यते ॥ ३१ ॥ प्रौष्ठपदामतीतायां मघायुक्तांत्रयोदशीम् । प्राप्यश्राद्धंप्रकर्त्तव्यं मधुनापायसेनवा ॥ ३२ ॥ प्रजांपुष्टिंयशःस्वर्गमारोग्यंचधनंतथा । नृणांश्राद्धैःसदाप्रीताः प्रयच्छन्तिपितामहाः ॥ ३३ ॥ इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ जननेमरणेचैव सपिण्डानांद्विजोत्तम । त्र्यहाच्छुद्धिमवाप्नोति योऽग्निवेदसमन्वितः ॥ १ ॥ सपिण्डतातुपुरुषे सप्तमेविनिवर्त्तते ।
देने से अनन्त फल होता है ॥ २८ ॥ काशी कुरुक्षेत्र, भृगुतुङ्ग, महालय (कन्या-गत ) सप्तवेणी, ऋषि कूप, इन में पिण्ड दान अनन्त फल दायक कहा है ॥२९॥ म्लेच्छों के देश में, रात्रि में और विशेष कर सन्ध्या के समय, बुद्धिमान् मनुष्य श्राद्ध न करे और म्लेच्छ देश में गमन भी न करें ॥ ३० ॥ गजच्छाया ( यह योग पहिले लिख आये हैं ) ग्रहण के समय, - विषुवत्स्रंक्रांति और दोनों अयन इन में कहा है ॥ ३१ ॥ भादों मास की पूर्णिमा बीत जाने पर, मघा नक्षत्र से संयुक्त त्रयोदशी के दिन, मधु महत से व खीर से श्राद्ध करे ॥ ३२ ॥ सन्तान, पुष्टि, यश, स्वर्ग, आरोग्य, धन, इन सब को, प्रसन्न हुये पितर लोग सदैव मनुष्यों को देते हैं ॥ ३३ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में चौदहवा अध्याय पूरा हुआ ॥
सपिण्डों (पांच वा सात पीढ़ी वालों) के जन्म, अथवा मरण में अग्निहोत्री और नियमानुसार वेदाध्यायन कर्त्ता ब्राह्मण, तीन दिन में शुद्ध होता है ।१। सातवीं पीढ़ी में सपिण्डता निवृत्त हो जाती है । और गुण कर्म हीन जाति
भाषार्थसहिता ॥ ३९
नामधारकविप्रस्तु दशाहेनविशुध्यति ॥ २ ॥ क्षत्रियोद्वादशाहेन वैश्यःपक्षेणशुध्यति । मासेनतुतथाशूद्रः शुद्धिमाप्नोतिनान्तरा ॥ ३ ॥ रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्त्रावेविशुध्यति । अजातदन्तबालेतु सद्यःशौचंविधीयते ॥ ४ ॥ अहोरात्रात्तथाशुद्धिर्बालेत्वकृतचूडके । तथैवानुपनीतेतु त्र्यहाच्छुध्यन्तिबान्धवाः ॥ ५ ॥ अनूढानांतुकन्यानां तथैवशूद्रजन्मनाम् । अनूढभार्यःशूद्रस्तु षोडशाद्वत्सरात्परम् ॥ ६ ॥ मृत्युंसमधिगच्छेच्चेन्मासात्तस्यापिबान्धवाः । शुद्धिसमधिगच्छेयुर्नात्रकार्याविचारणा ॥ ७ ॥ पितृवेश्मनियाकन्या रजःपश्यत्यसंस्कृता । तस्यांमृतायांनाशौचं कदाचिदपिशाम्यति ॥ ८ ॥ हीनवर्णान्तुयानारी प्रमादात्प्रसवंव्रजेत् । प्रसवंमरणेतज्जमाशौचंनोपशाम्यति ॥ ९ ॥
मात्र से ब्राह्मण कहाने वाला दश दिन में शुद्ध होता है ॥ २ ॥ क्षत्रिय बारह दिन में, वैश्य एक पक्ष १५ दिन में और शूद्र एक मास में शुद्धि को प्राप्त होता है, पहिले नहीं ॥ ३ ॥ जितने महिने का गर्भ गिर जावे, उतने ही दिन में शुद्धि होती है और बालक के दांत उगने से पहिले मर जाने पर उसी समय शुद्धि कही है ॥ ४ ॥ मुण्डन से पहिले बालक के मरने पर एक दिन रात में और यज्ञोपवीत से पहिले मरने पर तीन दिन में, कुटुम्बी लोग शुद्ध होते हैं ॥ ५ ॥ बिना विवाही कन्या, शूद्रास्त्री, और बिना विवाहा शूद्र, सोलह वर्ष की अवस्था से ऊपर, इन के मरने पर उस मृतक के कुटुम्बी लोग एक महीने में शुद्ध होते हैं, इस में विचार नहीं करना चाहिये ॥ ६ । ७ ॥ यदि बिना विवाही कन्या पिता के घर पर ही रजस्वला हो जाय, तो उसके मरने का अशौच जन्म पर्यन्त कभी भी निवृत्त नहीं होता ॥ ८ ॥ यदि नीच वर्ण की कन्या विवाह से पहिले प्रसूता होते समय मर जाय, तो उस के प्रसव और मरण के दोनों सूतक जन्म पर्यन्त कभी भी निवृत्त नहीं होते ॥ ९ ॥
४१ शङ्खस्मृतिः ॥
समानं खल्वशौचन्तु प्रथमेन समापयेत् ।
असमानं द्वितीयेन धर्मराजवचो यथा ॥ १० ॥
देशान्तरगतः श्रुत्वा कुल्यानामरणोद्भवौ ।
यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥ ११ ॥
अतीते दशरात्रे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
तथा संवत्सरेऽतीते स्नानमेव विशुद्ध्यति ॥ १२ ॥
अनौरसेषु पुत्रेषु भार्यास्वन्यगतासु च ।
परपूर्वासु च स्त्रीषु त्र्यहाच्छुद्धिर्विधीयते ॥ १३ ॥
मातामहे व्यतीते तु आवापे च गतासुनि ।
गृहे दत्तासुकन्यासु सुतापुत्रेष्वहस्तथा ॥ १४ ॥
विद्राविते जनपदे जामातुर्दौहित्रके गृहे ।
आचार्यपत्निपुत्रेषु प्रेतेष्वेकदिनमेव च ॥ १५ ॥
मातुले पक्षिणी रात्रित्रिर्गणितोऽभ्यन्तरं चरेत् ।
यदि जन्म वा मरण के दो सूतक दस दिन के भीतर आगे पीछे हों जाँय तो पहिलेके समाप्त होने पर दूसरे जन्मसूतक समाप्त हो जायगा यदि असमान होय तो धर्मराज के वचनानुसार दूसरे के अन्त पर्य्यन्त शुद्धि करे ॥ १० ॥ परदेश में गया मनुष्य दश दिन के बीच में अपने कुल के हरण मरण को सुन कर दश दिन में शेष रहे दिनों तक अशुचि रहे ॥ ११ ॥ यदि दश दिन बीतने पर सुने तो तीन दिन में और एक वर्ष बीतने पर सुने तो तत्काल सचैल स्नान करने से ही शुद्धि होती है ॥ १२ ॥ आत्मज भिन्न (दत्तक आदि) पुत्रों के व्यभिचारिणी और जो अपने पति को छोड़ कर दूसरे को करने वाली स्त्री इनके मरने पर भी तीन दिन में शुद्धि होती है ॥ १३ ॥ नाना आचार्य और विवाहित कन्या इनके मरने पर भी तीन दिन में शुद्धि होती है ॥१४॥ देशके राजा के मरने अपने घरमें दौहित्र के जन्मने पर गुरु की पत्नी, और पुत्री के मरने पर एक दिन में शुद्धि होती है ॥ १५ ॥ मामाके मरने पर एक दिन रात शिष्य ऋत्विक् और सात पीढ़ी से पृथक् कुटुम्बी इन के मरने पर एक दिन रात अशुद्धि माने । सब्रह्मचारी ( जो संग में वेद पढ़ा हो ।
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४१
सब्रह्मचारिण्येकाहमनूचाने तथा मृते ॥ १६ ॥
एकरात्रं त्रिरात्रं च षडूरात्रं मासमेव च ।
शूद्रे सपिण्डे वर्णानामाशौचं क्रमशः स्मृतम् ॥ १७ ॥
त्रिरात्रमथ षडूरात्रं पक्षं मासं तथैव च ।
वैश्ये सपिण्डे वर्णानामाशौचं क्रमशः स्मृतम् ॥ १८ ॥
सपिण्डे क्षत्रिये शुद्धिः षडूरात्रेण ब्राह्मणस्य तु ।
वर्णानां परिशिष्टानां द्वादशाहो विनिर्दिशेत् ॥ १९ ॥
सपिण्डे ब्राह्मणे वर्णाः सर्व एव अविशेषतः ।
दशरात्रेण शुद्ध्यन्त्याह भगवान् यमः ॥ २० ॥
भृग्वग्न्यनशनाम्भोभिर्मृतानामात्मघातिनाम् ।
पतितानां च नाशौचं शस्त्रविद्युद्धताश्च ये ॥ २१ ॥
यतिव्रतिब्रह्मचारिनृपकारुकर्मिणाम् ।
नाशौचभाजः कथिता राजाज्ञाकारिणश्च ये ॥ २२ ॥
और अनूचान (जो वेद से अधिक जानकार था) के मरने पर (एक दिन रात एक दिन) अशुद्धि रहती है ॥ १६ ॥ जो शूद्र अपना सपिण्ड हो अथवा ही उन के मरने पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों को क्रमशः एक दिन, तीन दिन, छः दिन और एक मास में शुद्धि होती है ॥ १७ ॥ अथवा अपना सपिण्डी वैश्य होकर मर गया हो तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों को क्रम से तीन दिन, छः दिन, १५ दिन और एक मास में शुद्धि होती है ॥ १८ ॥ अथवा अपने सपिण्ड का क्षत्रिय होकर मर गया हो तो ब्राह्मण को छः दिन में और शेष तीनों वर्णों को बारह दिन में शुद्धि होती है ॥ १९ ॥ ब्राह्मण सपिण्ड अर्थात् ब्राह्मण में क्षत्रियादि की स्त्री से उत्पन्न के मर जाने में विप्र आदि सब जाति वर्ण दश रात में शुद्ध होते हैं। यह बात धर्मशास्त्रकर्ता भगवान् यम ने कही है ॥ २० ॥ भृगु (ऊंची जगह वा पर्वत की शिखर से गिर कर), अग्नि से जल कर, अनशन (भोजन के त्याग से), जल में डूब कर, अथवा स्वयं आत्मघात करके, शस्त्र, और बिजली इन से जो मरे हों वा जो पतित होके मरे हों उन का अशौच नहीं लगता ॥ २१ ॥ सन्यासी, व्रती, (जिस ने कोई व्रत धारण किया हो) ब्रह्मचारी, राजा, कारीगर, दीक्षित (जिस ने यज्ञ आदि में दीक्षा ले रक्खी हो) और राजा की आज्ञा करने वाले ये सब सूतक में अशुद्ध नहीं होते ॥ २२ ॥
६
४२ शंखस्मृतिः ॥
यस्तुभुङ्क्तेपराशौचे वर्णीसोप्यशुचिर्भवेत् ।
आशौचशुद्धौशुद्धिश्च तस्याप्युक्तामनीषिभिः ॥ २३ ॥
पराशौचेनरोभुक्त्वा कृमियोनौप्रजायते ।
भुक्त्वाऽन्नंम्रियतेयस्य तस्ययोनौप्रजायते ॥ २४ ॥
दानंप्रतिग्रहोहोमः स्वाध्यायःपितृकर्मच ।
प्रेतपिण्डक्रियावर्जमाशौचेविनिवर्तते ॥ २५ ॥
इति शांखे धर्मशास्त्रे पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
मृन्मयंभाजनंसर्वं पुनःपाकेनशुद्ध्यति ।
मद्यैर्मूत्रैःपुरीषैर्वा ष्ठीवनैःपूयशोणितैः ॥ १ ॥
संस्पृष्टंनैवशुद्ध्येत पुनःपाकेनमृन्मयम् ।
एतैरेवतथास्पृष्टं ताम्रसौवर्णराजतम् ॥ २ ॥
शुद्ध्यत्यावर्तितंपश्चादन्यथाकेवलाम्भसा ।
जो ब्रह्मचारी पराये घर मृतक में खाता है, वह भी अशुद्ध होता है और मृतक की शुद्धि होने पर उस की भी बुद्धिमानों ने शुद्धि कही है ॥२३॥ पराये अशौच में खाकर मनुष्य कीड़ों की योनि में जन्म लेता है और जिस के अन्न को खाकर पेट में रक्खे हुए मरता है उसी की जाति में पैदा होता है ॥२४॥ दान देना, दान लेना, होम, वेदपाठ, पितरों का कर्म, ये सब, प्रेत के लिये पिण्ड दान के कर्म को छोड़ कर मृतक में निवृत्त हो जाते हैं। अर्थात् सूतक के समय दानादि कर्म नहीं करने चाहिये ॥ २५ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में पन्द्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१५॥
मट्टी का पात्र दुबारा पकाने से शुद्ध हो जाता है, परन्तु मदिरा, मूत्र, विष्ठा, थूक, राध (पीव) और रुधिर, ॥१॥ ये मद्यादि जिस में रक्खे गये हों, ऐसा मट्टी का पात्र दुबारा पकाने से भी शुद्ध नहीं होता और इन मद्यादि का ही स्पर्श जिस में हुआ हो, ऐसा तांबे, सोने और चांदी का पात्र ॥ २ ॥ फिर अचाने से शुद्ध होता और अन्य किसी प्रकार से अशुद्ध हो, तो केवल जल से धोकर शुद्ध होता है। खटाई के जल से धोने पर तांबा, सीसा और लास के
भाषार्थसंहिता ॥ ४३
अम्लोदकेनताम्रस्य सीसस्यत्रपुणस्तथा ॥ ३ ॥
क्षारेणशुद्धिः कांस्यस्य लोहस्यचविनिर्दिशेत् ।
मुक्तामणिप्रवालानां शुद्धिःप्रक्षालनेनतु ॥ ४ ॥
अब्जानांचैवभाण्डानां सर्वस्याश्ममयस्यच ।
शाकवर्जमूलफल द्विद्लानांतथैवच ॥ ५ ॥
मार्ज्जनाद्यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि ।
उष्णाम्भसातथाशुद्धिं सस्नेहानाविनिर्दिशेत् ॥ ६ ॥
शयनासनयानानां स्फ्यशूर्पशकटस्यच ।
शुद्धिःसंमोक्षणाद्यज्ञे कटामिन्धनयोस्तथा ॥ ७ ॥
मार्जनाद्वेश्मनांशुद्धिः क्षितेःशोधस्तुतक्षणात् ।
सम्मार्जितेनतोयेन वाससांशुद्धिरिष्यते ॥ ८ ॥
बहूनांप्रोक्षणाच्छुद्धिर्धान्यादीनांविनिर्दिशेत् ।
प्रोक्षणात्संहतानांच दारुवाणांचतक्षणात् ॥ ९ ॥
सिद्धार्थकानांकल्केन शुद्धेद्दन्तमयस्यच ।
गोवालैःफलपात्राणामस्थ्नां शृङ्गवतांतथा ॥ १० ॥
पात्रादि की शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ कांसे और लोह के पात्रादि की शुद्धि खारे जल से और मोती, मणि, मूंगा, इन की शुद्धि जल से धोने मात्र से ही जाती है ॥ ४ ॥ जल के विकारों से पैदा हुए वस्तु, सब प्रकार के पत्थर के पात्र, शाक को छोड़ कर, मूल, फल, और उड़द, मूंग आदि दाल वाले इन सब की शुद्धि धोने से होती है ॥ ५ ॥ यज्ञ कर्म में यज्ञ के पात्रों की मांजने से और चिकने पात्रों की गर्म जल से शुद्धि कही है ॥ ६ ॥ शय्या, आसन, सवारी, सूप, शकट (गाड़ी) चटाई, इन्धन, इन की यज्ञ में जल छिड़कने से शुद्धि होती ॥ ७ ॥ बुहारने से घरों की और उसी समय छील देने से पृथिवी की और जल के मार्जन से वस्त्रों की शुद्धि होती है ॥ ८ ॥ बहुत से अन्नादि राशि की संहत (मिले हुए) पदार्थों की छिड़कने से और काष्ठ के पात्रों की शुद्धि छील देने से होती है ॥ ९ ॥ सींग और हाथी के दांत आदि से बने वस्तुओं की शुद्धि ओषधियों के उबाले रस से और फल से बने पात्र, हाड़ और सींग वाले वस्तुओं की शुद्धि गौ के चंवर से होती है ॥ १० ॥
४३ | शंखस्मृतिः ॥
निर्यासानांगुडानांच लवणानांतथैवच । कुसुंभकुंकुमानांच ऊर्णाकार्पासयोस्तथा ॥ ११ ॥ प्रोक्षणात्कथिताशुद्धिरित्याहभगवान्यमः । भूमिष्ठमुदकंशुद्धं शुचितोयंशिलागतम् ॥ १२ ॥ वर्णगन्धरसैर्दुष्टैर्वर्जितंयदि तद्भवेत् । शुद्धंनदीगतंतोयं सर्वदैवनथाकरः ॥ १३ ॥ शुद्धंप्रसारितंपण्यं शुद्धेचाजाश्वयोर्मुखे । मुखवर्जंतुगौःशुद्धा मार्जारश्चाक्रमेशुचिः ॥ १४ ॥ शय्याभार्याशिशुर्वस्त्रमुपवीतंक्रमण्डलुः । आत्मनःशुचितंशुद्धं नशुद्धिःपरस्यच ॥ १५ ॥ नारीणांचैववत्सानां शकुनीनांशुनांमुखम् । रात्रौप्रस्रवणेवृक्षे मृगयायांसदाशुचि ॥ १६ ॥ शुद्धाभर्तुश्चतुर्थेऽन्हि स्नानेनस्त्रीरजस्वला । दैवेकर्मणिपित्र्येच पञ्चमेऽह्नि विशुद्ध्यति ॥ १७ ॥ रथ्याकर्दमतोयेन ष्ठीवनाद्येनवाप्यथ ।
गोंद, गुड़, लवण, कुसुम्भ, ऊन, और कपास इन की ॥११॥ शुद्धि भी भगवान् यमराजने छिड़कने से कही है। पृथिवीके शुद्ध स्थल में और शिला पर पड़ा जल स्वतः ही शुद्ध होता है ॥१२॥ यदि वह भूमिस्थ जल दुष्ट वर्ण, बुरा रस, और बुरे गंध से वर्जित हो, नदी का और आकर (खान) का जल सदा ही शुद्ध है ॥ १३ ॥ दूकान में फैली चीज़, बकरी और घोड़े का मुख भी शुद्ध है। मुख को छोड़कर गौके सब अंग शुद्ध हैं और आक्रमण (किसी जानवर को पकड़ के मार डालने) में बिलाव शुद्ध है ॥ १४ ॥ शय्या, स्त्री, बालक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, कमण्डलु, ये सब अपने ही शुद्ध कहे हैं और अन्य के नहीं ॥१५॥ स्त्री, बछड़े, पक्षि, और कुत्ते का मुख, क्रमसे रात्रि में प्रस्त्रवण थन चूसने में, वृक्ष से फल गिरने में और शिकार करने में सदैव शुद्ध है ॥ १६ ॥ रजस्वला स्त्री चौथे दिन स्नान करके अपने पति के लिये और देवता वा पितरोंके कर्म में पाचवें दिन शुद्ध हुई मानी जावे ॥ १७ ॥ यदि मनुष्य की नाभि से ऊपर के
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४५
नाभेरूर्ध्वंनरःस्पृष्टः सद्यःस्नानेनशुद्ध्यति ॥ १८ ॥
कृत्वामूत्रंपुरीषंवा स्नात्वाभोक्तुमनास्तथा ।
भुक्त्वाक्षुत्वात्तथासुप्त्वा पीत्वाचाम्भोऽवगाह्यच ॥१९॥
रथ्यामाक्रम्यवाऽऽचामेद्वासोविपरिधायच ।
कृत्वामूत्रंपुरीषंच लेपगन्धापहंद्विजः ॥ २० ॥
उद्धृतेनाम्भसाशौचं मृदाचैवसमाचरेत् ।
मेहनेमृत्तिकाःसप्त लिङ्गेद्वेपरिकीर्तिते ॥ २१ ॥
एकस्मिन्विंशतिर्हस्तेद्वयोर्ज्ञेयाप्ततुर्दश ।
तिस्रस्तुमृत्तिकाज्ञेयाः कृत्वानखविशोधनम् ॥ २२ ॥
तिस्रस्तुपादयोर्ज्ञेयाः शौचकामस्यसर्वदा ।
शौचमेतद्गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥ २३ ॥
त्रिगुणंतुवनस्थानां यतीनांतुचतुर्गुणम् ।
मृत्तिकाचविनिर्दिष्टा त्रिपर्वपूरयेत्तया ॥ २४ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
शरीर में गांव की गली का जल या थूक लगजाय तो उसी समय स्नान करने से शुद्ध होता है ॥१८॥ लघु शंका, मल का त्याग, भोजन करना, नाक छिनकना, सोना, जल पीना, और जल में अवगाहन (स्नान आदि) इन कामों को करके भोजन से पहिले ॥१९॥ गली में चल कर और वस्त्रों को धारण करके आचमन करे मल मूत्र का त्याग करके द्विज जिससे दुर्गन्ध दूर हो ॥ २० ॥ ऐसी शुद्धि कृपादि से निकाले जल और मिट्टी से करे, मल मूत्र त्यागने पश्चात् गुदेन्द्रिय में सात बार, लिंगेन्द्रिय में दो बार मट्टी लगानी कही है ॥ २१ ॥ एक बांय हाथ में बीस बार और फिर दोनों में चौदह बार फिर नखों की शुद्धि करके तीन बार मट्टी लगानी जानो ॥ २२ ॥ शुद्धि की इच्छा वाले पुरुष को तीन बार पगों में मट्टी लगानी कही है। यह शुद्धि गृहस्थों के लिये कही है इससे दूनी ब्रह्मचारियों को ॥२३॥ तिगुनी वानप्रस्थों को और चौगुनी संन्यासियों के लिये जानो और प्रत्येक बार में इतनी मट्टी लेवे जिससे हाथ के तीन अंगुल भर जावें ॥ २४ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
४६ शंखस्मृतिः ॥
नित्यं त्रिषवणस्नायी कृत्वापर्णकुटीं वने ।
अधःशायी जटाधारी पर्णमूलफलाशनः ॥ १ ॥
ग्रामं विशेच्च भिक्षार्थं स्वकर्म परिकीर्तयन् ।
एककालं समश्नीयादूर्ध्वं तु द्वादशे गते ॥ २ ॥
हेमस्तेयी सुरापश्च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।
व्रतेनैतेन शुध्यन्ते महापातकिनस्त्विमे ॥ ३ ॥
यागस्थं क्षत्रियं हत्वा वैश्यं हत्वा च याजकम् ।
एतदेव व्रतं कुर्यादात्रेयीविनिषूदकः ॥ ४ ॥
कूटसाक्ष्यं तथैवोक्त्वा निःक्षेपमपहृत्य च ।
एतदेव व्रतं कुर्यात्त्यक्त्वा च शरणागतम् ॥ ५ ॥
आहिताग्नेः स्त्रियं हन्त्वा मित्रं हत्वा तथैव च ।
हत्वा गर्भमविज्ञातमेतदेव व्रतं चरेत् ॥ ६ ॥
वनस्थं च द्विजं हन्त्वा पार्थिवं चाकृतागसम् ।
एतदेव व्रतं कुर्याद्द्विगुणं च विशुद्धये ॥ ७ ॥
क्षत्रियस्य च पादोनं वधेऽर्द्धं वैश्यघातने ।
प्रायश्चित्ती पुरुष वन में ढांक आदि के पत्तों की कुटी बनाकर उस में बसे, सायं, प्रातः और मध्यान्ह में तीन बार स्नान करे, पृथिवी पर सोवे, जटाओं को धारण करे, वृक्षों के पत्ते, मूल, फल, इन का भोजन करे ॥ १ ॥ अपने कर्म को कहता हुआ भिक्षा मांगने के लिये गांव में जाय, बारह वर्ष पर्यन्त एक काल भोजन करै ॥ २ ॥ इस प्रकार सुवर्ण का चौर, ब्रह्म हत्या करने वाला तथा—गुरुस्त्री गामी, ये चारो महापातकी ब्राह्मणादि इस व्रत से शुद्ध होते हैं ॥ ३ ॥ यज्ञ करते हुए क्षत्रिय को और यज्ञ करने वाले वैश्य को मारकर और रजस्वला स्त्री को मार डालने वाला भी यही व्रत करे ॥ ४ ॥ झूठी गवाही देकर, न्यास (धरोहर) को मार लेने पर और अपने शरण आये को त्याग करके भी यही व्रत करे ॥ ५ ॥ अग्निहोत्री की स्त्री, मित्र, और बिना जाने गर्भ को मार कर भी यही व्रत करे ॥ ६ ॥ वनवासी ब्राह्मण और अपराधी राजा इन को मार कर भी विशेष शुद्धि के लिये उक्त से दूना व्रत करे ॥ ७ ॥ वनवासी क्षत्रिय के मारने में पौन, वनस्थ वैश्य के और स्त्री के