अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
३४ शंखस्मृतिः ॥
ऊनाङ्गाअतिरिक्ताङ्गा ब्राह्मणाःपङ्क्तिदूषकाः ॥ २ ॥ गुरूणांप्रतिकूलाश्च वेदान्न्युत्सादिनश्चये । गुरूणांत्यागिनश्चैव ब्राह्मणाःपङ्क्तिदूषकाः ॥ ३ ॥ अनध्यायेष्वधीयानाः शौचाचारविवर्जिताः । शूद्रान्नरससंपुष्टा ब्राह्मणाःपङ्क्तिदूषकाः ॥ ४ ॥ षडङ्गवित्त्रिसुपर्णो बह्वृचोज्येष्ठसामगः । त्रिणाचिकेतःपञ्चाग्निर्ब्राह्मणाःपङ्क्तिपावनाः ॥५॥ ब्रह्मदेयानुसन्तानो ब्रह्मदेयाप्रदायकः । ब्रह्मदेयापतिर्यश्च ब्राह्मणःपङ्क्तिपावनः ॥ ६ ॥ ऋग्यजुःपारगायश्च साम्नांयश्चापिपारगः । अथर्वाङ्गिरसोऽध्येता ब्राह्मणःपङ्क्तिपावनः ॥ ७ ॥ नित्यंयोगरतोविद्वान् समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
अंग न्यूनाधिक हों, वे पंक्ति को दूषित करने वाले हैं ऐसे ब्राह्मणों को न जि- मावे ॥ २ ॥ गुरुओं के जो प्रतिकूल हों, वा जो वेद के अभ्यास तथा अग्निहोत्र के त्यागने वाले और जो गुरुओं को त्यागते हैं, वे भी पंक्ति के दूषक हैं ॥ ३ ॥ जो अनध्यायी में वेद को पढ़ते, जो शौच आचार से हीन और शूद्र के अन्न से बने रस से पुष्ट होंति, वे भी पंक्ति के दूषक हैं ॥ ४ ॥ वेद के छः अंगों ( शिक्षादि ) को जो जाने, त्रिसुपर्ण को जो जाने, ऋग्वेद जिस ने पढ़ा हो, या ज्येष्ठ ( बड़े ) सामगान को जो गावे, तीन वेद को जान कर नाचिकेत अग्नि में चयन यज्ञ करने वाला, पांच अग्नियों ( गार्हन्त्याऽऽहवनीय आदि ) में अग्निहोत्रादि करने वाला, ये सब ब्राह्मण पंक्ति के पावन ( पवित्र करने वाले ) हैं ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण कुल परम्परा से वेद को पढ़ता पढ़ाता हो, जो ब्राह्मणों को देने योग्य दान देता हो और जो अनेक ब्राह्मणों के देनेयोग्य पदार्थों को स्वयं अकेला ही न लेवे, वह पङ्क्ति पावन कहाता है ॥ ६ ॥ जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, और सामवेद को पूरा २ जानता हो और आङ्गिरस अथर्व वेद को जिस ने पढ़ा हो, वह ब्राह्मण भी पङ्क्तिपावन है ॥७॥ जो विद्वान् नित्य योगाभ्यास में तत्पर हो, जो मट्टी, पत्थर और सुवर्ण को
भाषार्थसहिता ॥ ३५
ध्यानशीलोहियोविद्वान् ब्राह्मणःपङ्क्तिपावनः ॥ ८ ॥ द्वौदैवेप्राङ्मुखौत्रींश्च पित्र्येचोदङ्मुखांस्तथा । भोजयेद्विविधान्विप्रानैकैकमुभयत्रवा ॥ ९ ॥ भोजयेदथवाऽप्येकं ब्राह्मणंपङ्क्तिपावनम् । दैवेकृत्वानु नैवेद्यं पश्चादग्नौतुतांन्क्षिपेत् ॥ १० ॥ उच्छिष्टसन्निधौकार्यं पिण्डनिर्वपणंबुधैः । अभावेचतथाकार्यमग्निकार्यंयथाविधि ॥ ११ ॥ श्राद्धंकृत्वाप्रयत्नेन व्यग्रक्रोधविवर्जितः । उष्णमन्नंद्विजातिभ्यः श्रद्धयाविनिवेदयेत् ॥ १२ ॥ अन्यत्रपुष्पमृत्स्यः पीठकेभ्यस्तृणौष्ठतः । भोजयेद्विविधान्विप्रान्गन्धमाल्यैरमुज्ज्वलान् ॥ १३ ॥ यत्किंचित्पच्यतेगेहे भक्ष्यंवाभोज्यमेववा ।
बराबर समझता हो और ध्यानशील पण्डित हो वह ब्राह्मण भी पङ्क्ति-पावन है ॥ ८ ॥ दैव (विश्वेदेवा) कर्म में पूर्वाभिमुख दो ब्राह्मणों और पितृकर्म में उत्तराभिमुख अनेक प्रकार के तीन ब्राह्मणों अथवा दोनों जगह एक २ ही ब्राह्मण को जिमावे ॥ ९ ॥ अथवा कई न मिलें तो पङ्क्तिपावन एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में जिमावे और दैव कर्म के निमित्त बनाये नैवेद्य का अग्नि में होम करदेवे ॥ १० ॥ भोजन किये ब्राह्मणों के उच्छिष्ट के समीप ही बुद्धिमान् मनुष्य पितरोंके लिये पिण्डदान करे और किसी कारण से सुपात्र न मिले तो विधिपूर्वक उस अन्न का अग्नि में होम करे कि जो ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता ॥ ११ ॥ ब्राह्मणोंको भोजन कराने का बड़े यत्न से पिण्डदानरूप श्राद्ध को पूरा करके शीघ्रता और क्रोध से रहित मनुष्य श्रद्धा के साथ ताज़ा गर्म २ भोजन ब्राह्मणों को जिमावे ॥ १२ ॥ फल तृण और पीढ़ा नामक आसनोंको छोड़कर अर्थात् ऊन आदिके शुद्ध आसन पर बठाकर गन्ध और मालासे सुस्वस्थ विविध ब्राह्मणोंको विचारशील जिमावे ॥ १३॥ जो कुछ भक्ष्य, वा भोज्य घरमे पकाया हो उसको पितरोंके समीप निवेदन किये बिना कभी
३६ शंखस्मृतिः ॥
अनिवेद्यनभोक्तव्यं पिण्डमूलेकदाचन ॥ १४ ॥ उग्रगन्धान्यगन्धानि चैत्यवृक्षभवानिच । पुष्पाणिरक्तवर्णानि स्वयमुत्पतितान्यच ॥ १५ ॥ तोयोद्भवानिदेयानि रक्ताम्यपिविशेषतः । ऊर्णासूत्रं प्रदातव्यं कार्पासमथवाभवम् ॥ १६ ॥ दशांविवर्जयेत्प्राज्ञो यद्यप्यहतवस्त्रजाम् । घृतेनदीपादतव्यस्तिलतैलेन वा पुनः ॥ १७ ॥ धूपार्थंगुग्गुलं दद्याद् घृतयुक्तंमधूत्कटम् । चन्दनंचनशं दद्यात्पितॄणांकुङ्कुमंशुभम् ॥ १८ ॥ भृङ्गतृर्णसुरसिशिग्रुं पालकंसिन्धुशेफया । कूष्माण्डालाबुवार्त्ताकं कोविदारांश्चवर्जयेत् ॥ १९ ॥ पिप्पलीमरिचं चैव तथाचैवपिण्डमूलकम् । कृत्रिमंलवणंसर्वं दद्याग्रंतद्विवर्जयेत् ॥ २० ॥ राजमाषान् मसूरांश्च कोद्रवांश्चानुरूपकान् । लोहितांश्चैव निर्यासान् श्राद्धकर्मणिवर्जयेत् ॥ २१ ॥
भी भोजन न करे ॥ १४ ॥ जिन में अधिक सुगन्ध हो या जिन में सर्वथा गंध न हो, जो किसी अन्य नाम श्मशान के वृक्ष पर लगे हों, और जो लाल रंग के हों, ऐसे फूल पितरों को श्राद्ध में न चढ़ावे ॥ १५ ॥ यदि लाल फूल जल में पैदा हुये हों, तो विशेष कर पितरों पर चढ़ावे, ऊन का सूत वा नया कपास का सूत पितरों पर चढ़ावे ॥ १६ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य अहत (जो किसी थान आदि में से फाड़ा न हो ऐसे) वस्त्र की दशा भी पितरों पर न चढ़ावे। और घी का अथवा तिलों के तैल का दीपक पिण्डों के समीप में जलावे। १७। धूप के लिये घृत और मधु बहुत जिस में विशेष मिले हों, ऐसे गुग्गुल का धूप देवे, चन्दन और केशर को घिस कर पितरों का पूजन करे ॥ १८ ॥ भृङ्गवृक्ष (भांग का वृक्ष), सुरस, सहिजना, पालक, सिन्धुक कुष्माण्डक वा डिण्डिश, कहिहड़ा, तुम्बा, बैंगन, कचनार इनको श्राद्ध में छोड़ देवे अर्थात भोजनार्थ में न लेवे ॥ १९ ॥ पीपल, मिरच, गलगल, बनाया लवण, दधि का अग्र भाग इन को भी श्राद्ध में वर्ज देवे ॥ २० ॥ राजमाष (रवांस) मसूर-कोदों, कांगूदार, लाल गोंद इन को भी श्राद्ध कर्म में वर्ज देवे ॥ २१ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ३९
आम्रामलकीमिक्षुं मृद्वीकादधिदाडिमान् । विदार्य्यश्वत्थरम्भाद्यान्दद्याच्छ्राद्धेप्रयत्नतः ॥ २२ ॥ धानालाजेमधुपुने सक्तून्शर्करयासह । दद्याच्छ्राद्धेप्रयत्नेन शृङ्गाटकविसेतकान् ॥ २३ ॥ भोजयित्वाद्विजान्भक्त्या स्वाचान्तान्दत्तदक्षिणान् । अभिवाद्यपुनर्विप्राननुव्रज्याविसर्जयेत् ॥ २४ ॥ निमन्त्रितस्तुयःश्राद्धे मैथुनंसेवतेद्विजः । श्राद्धंदत्त्वाचभुक्त्वाच युक्तःस्यान्महत्तैनसा ॥ २५ ॥ कालशाकंमहाशल्कं मांसंवाधीणसस्यच । खड्गमांसंतदानन्तं यमःप्रोवाचधर्मवित् ॥ २६ ॥ यद्ददातिगयाक्षेत्रे प्रभासेपुष्करेत्तथा । प्रयागेनमिषारण्ये सर्वमानन्त्यमश्नुते ॥ २७ ॥ गङ्गायमुनयोस्तीरे पयोष्ण्याममरकण्टके ।
आम के फल आंवला गाड़ा, या गन्ना, वा पोड़ा, दाख, दही, अनार, विदारी कन्द, केला, इनको श्राद्ध में विशेष कर ब्राह्मणों को जिमावे ॥ २२ ॥ महत से मिले भुंजे जो और सांठों खांड मिल सत्तू, शृंगाटक (जल की कटहल्ली का फल) विसैतक (भिम) इनको श्राद्ध में विशेष कर देवे ॥ २३ ॥ ब्राह्मणों को भक्ति से भोजन करा कर किया है आचमन जिन्होंने ने और दी है दक्षिणा जिन को ऐसे ब्राह्मणों को फिर नमस्कार और अनु (पीछे २) दूर तक पधार के विसर्जन करे ॥ २४ ॥ जो श्राद्ध में न्योता हुआ ब्राह्मण मैथुन करे उसको जो श्राद्ध में जिमाये, वह और भोजन कराने वाला दोनो बड़े पाप से युक्त होते हैं ॥ २५ ॥ ऋतु का शाक, महाशल्क नामक मछली, वार्धाणस अधिक लम्बे कानोंवाले बकराका मांस, और गेंडा का मांस इन को यमराज ने श्राद्ध में अनन्त फल देने वाले कहा है ॥ २६ ॥ गया, प्रभास, पुष्कर, प्रयाग, नैमिषारण्य इन तीर्थों में जा कर जो पितरों का श्राद्ध करता है, वह अक्षय फलदायी है ॥ २७ ॥ गंगा, यमुना के तीर पर, पयोष्णी नदी पर, अमरकंटक, नर्मदा और गया के तीर पर इन में पिण्ड
३८ | शंखस्मृतिः ॥
नर्मदायांगयातीरे सर्वमानन्त्यमुच्यते ॥ २८ ॥ वाराणस्यांकुरुक्षेत्रे भृगुतुङ्गेमहालये । सप्तवेण्यामृषिकूपेच तदप्यक्षयमुच्यते ॥ २९ ॥ म्लेच्छदेशेतथारात्रौ सन्ध्यायांचविशेषतः । नश्राद्धमाचरेत्प्राज्ञो म्लेच्छदेशेनचव्रजेत् ॥ ३० ॥ हस्तिच्छायासुयद्दत्तं यद्दत्तंराहुदर्शने । विषुवत्ययनेचैव सर्वमानन्त्यमुच्यते ॥ ३१ ॥ प्रौष्ठपदामतीतायां मघायुक्तांत्रयोदशीम् । प्राप्यश्राद्धंप्रकर्त्तव्यं मधुनापायसेनवा ॥ ३२ ॥ प्रजांपुष्टिंयशःस्वर्गमारोग्यंचधनंतथा । नृणांश्राद्धैःसदाप्रीताः प्रयच्छन्तिपितामहाः ॥ ३३ ॥ इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ जननेमरणेचैव सपिण्डानांद्विजोत्तम । त्र्यहाच्छुद्धिमवाप्नोति योऽग्निवेदसमन्वितः ॥ १ ॥ सपिण्डतातुपुरुषे सप्तमेविनिवर्त्तते ।
देने से अनन्त फल होता है ॥ २८ ॥ काशी कुरुक्षेत्र, भृगुतुङ्ग, महालय (कन्या-गत ) सप्तवेणी, ऋषि कूप, इन में पिण्ड दान अनन्त फल दायक कहा है ॥२९॥ म्लेच्छों के देश में, रात्रि में और विशेष कर सन्ध्या के समय, बुद्धिमान् मनुष्य श्राद्ध न करे और म्लेच्छ देश में गमन भी न करें ॥ ३० ॥ गजच्छाया ( यह योग पहिले लिख आये हैं ) ग्रहण के समय, - विषुवत्स्रंक्रांति और दोनों अयन इन में कहा है ॥ ३१ ॥ भादों मास की पूर्णिमा बीत जाने पर, मघा नक्षत्र से संयुक्त त्रयोदशी के दिन, मधु महत से व खीर से श्राद्ध करे ॥ ३२ ॥ सन्तान, पुष्टि, यश, स्वर्ग, आरोग्य, धन, इन सब को, प्रसन्न हुये पितर लोग सदैव मनुष्यों को देते हैं ॥ ३३ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में चौदहवा अध्याय पूरा हुआ ॥
सपिण्डों (पांच वा सात पीढ़ी वालों) के जन्म, अथवा मरण में अग्निहोत्री और नियमानुसार वेदाध्यायन कर्त्ता ब्राह्मण, तीन दिन में शुद्ध होता है ।१। सातवीं पीढ़ी में सपिण्डता निवृत्त हो जाती है । और गुण कर्म हीन जाति
भाषार्थसहिता ॥ ३९
नामधारकविप्रस्तु दशाहेनविशुध्यति ॥ २ ॥ क्षत्रियोद्वादशाहेन वैश्यःपक्षेणशुध्यति । मासेनतुतथाशूद्रः शुद्धिमाप्नोतिनान्तरा ॥ ३ ॥ रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्त्रावेविशुध्यति । अजातदन्तबालेतु सद्यःशौचंविधीयते ॥ ४ ॥ अहोरात्रात्तथाशुद्धिर्बालेत्वकृतचूडके । तथैवानुपनीतेतु त्र्यहाच्छुध्यन्तिबान्धवाः ॥ ५ ॥ अनूढानांतुकन्यानां तथैवशूद्रजन्मनाम् । अनूढभार्यःशूद्रस्तु षोडशाद्वत्सरात्परम् ॥ ६ ॥ मृत्युंसमधिगच्छेच्चेन्मासात्तस्यापिबान्धवाः । शुद्धिसमधिगच्छेयुर्नात्रकार्याविचारणा ॥ ७ ॥ पितृवेश्मनियाकन्या रजःपश्यत्यसंस्कृता । तस्यांमृतायांनाशौचं कदाचिदपिशाम्यति ॥ ८ ॥ हीनवर्णान्तुयानारी प्रमादात्प्रसवंव्रजेत् । प्रसवंमरणेतज्जमाशौचंनोपशाम्यति ॥ ९ ॥
मात्र से ब्राह्मण कहाने वाला दश दिन में शुद्ध होता है ॥ २ ॥ क्षत्रिय बारह दिन में, वैश्य एक पक्ष १५ दिन में और शूद्र एक मास में शुद्धि को प्राप्त होता है, पहिले नहीं ॥ ३ ॥ जितने महिने का गर्भ गिर जावे, उतने ही दिन में शुद्धि होती है और बालक के दांत उगने से पहिले मर जाने पर उसी समय शुद्धि कही है ॥ ४ ॥ मुण्डन से पहिले बालक के मरने पर एक दिन रात में और यज्ञोपवीत से पहिले मरने पर तीन दिन में, कुटुम्बी लोग शुद्ध होते हैं ॥ ५ ॥ बिना विवाही कन्या, शूद्रास्त्री, और बिना विवाहा शूद्र, सोलह वर्ष की अवस्था से ऊपर, इन के मरने पर उस मृतक के कुटुम्बी लोग एक महीने में शुद्ध होते हैं, इस में विचार नहीं करना चाहिये ॥ ६ । ७ ॥ यदि बिना विवाही कन्या पिता के घर पर ही रजस्वला हो जाय, तो उसके मरने का अशौच जन्म पर्यन्त कभी भी निवृत्त नहीं होता ॥ ८ ॥ यदि नीच वर्ण की कन्या विवाह से पहिले प्रसूता होते समय मर जाय, तो उस के प्रसव और मरण के दोनों सूतक जन्म पर्यन्त कभी भी निवृत्त नहीं होते ॥ ९ ॥
४१ शङ्खस्मृतिः ॥
समानं खल्वशौचन्तु प्रथमेन समापयेत् ।
असमानं द्वितीयेन धर्मराजवचो यथा ॥ १० ॥
देशान्तरगतः श्रुत्वा कुल्यानामरणोद्भवौ ।
यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥ ११ ॥
अतीते दशरात्रे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
तथा संवत्सरेऽतीते स्नानमेव विशुद्ध्यति ॥ १२ ॥
अनौरसेषु पुत्रेषु भार्यास्वन्यगतासु च ।
परपूर्वासु च स्त्रीषु त्र्यहाच्छुद्धिर्विधीयते ॥ १३ ॥
मातामहे व्यतीते तु आवापे च गतासुनि ।
गृहे दत्तासुकन्यासु सुतापुत्रेष्वहस्तथा ॥ १४ ॥
विद्राविते जनपदे जामातुर्दौहित्रके गृहे ।
आचार्यपत्निपुत्रेषु प्रेतेष्वेकदिनमेव च ॥ १५ ॥
मातुले पक्षिणी रात्रित्रिर्गणितोऽभ्यन्तरं चरेत् ।
यदि जन्म वा मरण के दो सूतक दस दिन के भीतर आगे पीछे हों जाँय तो पहिलेके समाप्त होने पर दूसरे जन्मसूतक समाप्त हो जायगा यदि असमान होय तो धर्मराज के वचनानुसार दूसरे के अन्त पर्य्यन्त शुद्धि करे ॥ १० ॥ परदेश में गया मनुष्य दश दिन के बीच में अपने कुल के हरण मरण को सुन कर दश दिन में शेष रहे दिनों तक अशुचि रहे ॥ ११ ॥ यदि दश दिन बीतने पर सुने तो तीन दिन में और एक वर्ष बीतने पर सुने तो तत्काल सचैल स्नान करने से ही शुद्धि होती है ॥ १२ ॥ आत्मज भिन्न (दत्तक आदि) पुत्रों के व्यभिचारिणी और जो अपने पति को छोड़ कर दूसरे को करने वाली स्त्री इनके मरने पर भी तीन दिन में शुद्धि होती है ॥ १३ ॥ नाना आचार्य और विवाहित कन्या इनके मरने पर भी तीन दिन में शुद्धि होती है ॥१४॥ देशके राजा के मरने अपने घरमें दौहित्र के जन्मने पर गुरु की पत्नी, और पुत्री के मरने पर एक दिन में शुद्धि होती है ॥ १५ ॥ मामाके मरने पर एक दिन रात शिष्य ऋत्विक् और सात पीढ़ी से पृथक् कुटुम्बी इन के मरने पर एक दिन रात अशुद्धि माने । सब्रह्मचारी ( जो संग में वेद पढ़ा हो ।
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४१
सब्रह्मचारिण्येकाहमनूचाने तथा मृते ॥ १६ ॥
एकरात्रं त्रिरात्रं च षडूरात्रं मासमेव च ।
शूद्रे सपिण्डे वर्णानामाशौचं क्रमशः स्मृतम् ॥ १७ ॥
त्रिरात्रमथ षडूरात्रं पक्षं मासं तथैव च ।
वैश्ये सपिण्डे वर्णानामाशौचं क्रमशः स्मृतम् ॥ १८ ॥
सपिण्डे क्षत्रिये शुद्धिः षडूरात्रेण ब्राह्मणस्य तु ।
वर्णानां परिशिष्टानां द्वादशाहो विनिर्दिशेत् ॥ १९ ॥
सपिण्डे ब्राह्मणे वर्णाः सर्व एव अविशेषतः ।
दशरात्रेण शुद्ध्यन्त्याह भगवान् यमः ॥ २० ॥
भृग्वग्न्यनशनाम्भोभिर्मृतानामात्मघातिनाम् ।
पतितानां च नाशौचं शस्त्रविद्युद्धताश्च ये ॥ २१ ॥
यतिव्रतिब्रह्मचारिनृपकारुकर्मिणाम् ।
नाशौचभाजः कथिता राजाज्ञाकारिणश्च ये ॥ २२ ॥
और अनूचान (जो वेद से अधिक जानकार था) के मरने पर (एक दिन रात एक दिन) अशुद्धि रहती है ॥ १६ ॥ जो शूद्र अपना सपिण्ड हो अथवा ही उन के मरने पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों को क्रमशः एक दिन, तीन दिन, छः दिन और एक मास में शुद्धि होती है ॥ १७ ॥ अथवा अपना सपिण्डी वैश्य होकर मर गया हो तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों को क्रम से तीन दिन, छः दिन, १५ दिन और एक मास में शुद्धि होती है ॥ १८ ॥ अथवा अपने सपिण्ड का क्षत्रिय होकर मर गया हो तो ब्राह्मण को छः दिन में और शेष तीनों वर्णों को बारह दिन में शुद्धि होती है ॥ १९ ॥ ब्राह्मण सपिण्ड अर्थात् ब्राह्मण में क्षत्रियादि की स्त्री से उत्पन्न के मर जाने में विप्र आदि सब जाति वर्ण दश रात में शुद्ध होते हैं। यह बात धर्मशास्त्रकर्ता भगवान् यम ने कही है ॥ २० ॥ भृगु (ऊंची जगह वा पर्वत की शिखर से गिर कर), अग्नि से जल कर, अनशन (भोजन के त्याग से), जल में डूब कर, अथवा स्वयं आत्मघात करके, शस्त्र, और बिजली इन से जो मरे हों वा जो पतित होके मरे हों उन का अशौच नहीं लगता ॥ २१ ॥ सन्यासी, व्रती, (जिस ने कोई व्रत धारण किया हो) ब्रह्मचारी, राजा, कारीगर, दीक्षित (जिस ने यज्ञ आदि में दीक्षा ले रक्खी हो) और राजा की आज्ञा करने वाले ये सब सूतक में अशुद्ध नहीं होते ॥ २२ ॥
६
४२ शंखस्मृतिः ॥
यस्तुभुङ्क्तेपराशौचे वर्णीसोप्यशुचिर्भवेत् ।
आशौचशुद्धौशुद्धिश्च तस्याप्युक्तामनीषिभिः ॥ २३ ॥
पराशौचेनरोभुक्त्वा कृमियोनौप्रजायते ।
भुक्त्वाऽन्नंम्रियतेयस्य तस्ययोनौप्रजायते ॥ २४ ॥
दानंप्रतिग्रहोहोमः स्वाध्यायःपितृकर्मच ।
प्रेतपिण्डक्रियावर्जमाशौचेविनिवर्तते ॥ २५ ॥
इति शांखे धर्मशास्त्रे पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
मृन्मयंभाजनंसर्वं पुनःपाकेनशुद्ध्यति ।
मद्यैर्मूत्रैःपुरीषैर्वा ष्ठीवनैःपूयशोणितैः ॥ १ ॥
संस्पृष्टंनैवशुद्ध्येत पुनःपाकेनमृन्मयम् ।
एतैरेवतथास्पृष्टं ताम्रसौवर्णराजतम् ॥ २ ॥
शुद्ध्यत्यावर्तितंपश्चादन्यथाकेवलाम्भसा ।
जो ब्रह्मचारी पराये घर मृतक में खाता है, वह भी अशुद्ध होता है और मृतक की शुद्धि होने पर उस की भी बुद्धिमानों ने शुद्धि कही है ॥२३॥ पराये अशौच में खाकर मनुष्य कीड़ों की योनि में जन्म लेता है और जिस के अन्न को खाकर पेट में रक्खे हुए मरता है उसी की जाति में पैदा होता है ॥२४॥ दान देना, दान लेना, होम, वेदपाठ, पितरों का कर्म, ये सब, प्रेत के लिये पिण्ड दान के कर्म को छोड़ कर मृतक में निवृत्त हो जाते हैं। अर्थात् सूतक के समय दानादि कर्म नहीं करने चाहिये ॥ २५ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में पन्द्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१५॥
मट्टी का पात्र दुबारा पकाने से शुद्ध हो जाता है, परन्तु मदिरा, मूत्र, विष्ठा, थूक, राध (पीव) और रुधिर, ॥१॥ ये मद्यादि जिस में रक्खे गये हों, ऐसा मट्टी का पात्र दुबारा पकाने से भी शुद्ध नहीं होता और इन मद्यादि का ही स्पर्श जिस में हुआ हो, ऐसा तांबे, सोने और चांदी का पात्र ॥ २ ॥ फिर अचाने से शुद्ध होता और अन्य किसी प्रकार से अशुद्ध हो, तो केवल जल से धोकर शुद्ध होता है। खटाई के जल से धोने पर तांबा, सीसा और लास के
भाषार्थसंहिता ॥ ४३
अम्लोदकेनताम्रस्य सीसस्यत्रपुणस्तथा ॥ ३ ॥
क्षारेणशुद्धिः कांस्यस्य लोहस्यचविनिर्दिशेत् ।
मुक्तामणिप्रवालानां शुद्धिःप्रक्षालनेनतु ॥ ४ ॥
अब्जानांचैवभाण्डानां सर्वस्याश्ममयस्यच ।
शाकवर्जमूलफल द्विद्लानांतथैवच ॥ ५ ॥
मार्ज्जनाद्यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि ।
उष्णाम्भसातथाशुद्धिं सस्नेहानाविनिर्दिशेत् ॥ ६ ॥
शयनासनयानानां स्फ्यशूर्पशकटस्यच ।
शुद्धिःसंमोक्षणाद्यज्ञे कटामिन्धनयोस्तथा ॥ ७ ॥
मार्जनाद्वेश्मनांशुद्धिः क्षितेःशोधस्तुतक्षणात् ।
सम्मार्जितेनतोयेन वाससांशुद्धिरिष्यते ॥ ८ ॥
बहूनांप्रोक्षणाच्छुद्धिर्धान्यादीनांविनिर्दिशेत् ।
प्रोक्षणात्संहतानांच दारुवाणांचतक्षणात् ॥ ९ ॥
सिद्धार्थकानांकल्केन शुद्धेद्दन्तमयस्यच ।
गोवालैःफलपात्राणामस्थ्नां शृङ्गवतांतथा ॥ १० ॥
पात्रादि की शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ कांसे और लोह के पात्रादि की शुद्धि खारे जल से और मोती, मणि, मूंगा, इन की शुद्धि जल से धोने मात्र से ही जाती है ॥ ४ ॥ जल के विकारों से पैदा हुए वस्तु, सब प्रकार के पत्थर के पात्र, शाक को छोड़ कर, मूल, फल, और उड़द, मूंग आदि दाल वाले इन सब की शुद्धि धोने से होती है ॥ ५ ॥ यज्ञ कर्म में यज्ञ के पात्रों की मांजने से और चिकने पात्रों की गर्म जल से शुद्धि कही है ॥ ६ ॥ शय्या, आसन, सवारी, सूप, शकट (गाड़ी) चटाई, इन्धन, इन की यज्ञ में जल छिड़कने से शुद्धि होती ॥ ७ ॥ बुहारने से घरों की और उसी समय छील देने से पृथिवी की और जल के मार्जन से वस्त्रों की शुद्धि होती है ॥ ८ ॥ बहुत से अन्नादि राशि की संहत (मिले हुए) पदार्थों की छिड़कने से और काष्ठ के पात्रों की शुद्धि छील देने से होती है ॥ ९ ॥ सींग और हाथी के दांत आदि से बने वस्तुओं की शुद्धि ओषधियों के उबाले रस से और फल से बने पात्र, हाड़ और सींग वाले वस्तुओं की शुद्धि गौ के चंवर से होती है ॥ १० ॥
४३ | शंखस्मृतिः ॥
निर्यासानांगुडानांच लवणानांतथैवच । कुसुंभकुंकुमानांच ऊर्णाकार्पासयोस्तथा ॥ ११ ॥ प्रोक्षणात्कथिताशुद्धिरित्याहभगवान्यमः । भूमिष्ठमुदकंशुद्धं शुचितोयंशिलागतम् ॥ १२ ॥ वर्णगन्धरसैर्दुष्टैर्वर्जितंयदि तद्भवेत् । शुद्धंनदीगतंतोयं सर्वदैवनथाकरः ॥ १३ ॥ शुद्धंप्रसारितंपण्यं शुद्धेचाजाश्वयोर्मुखे । मुखवर्जंतुगौःशुद्धा मार्जारश्चाक्रमेशुचिः ॥ १४ ॥ शय्याभार्याशिशुर्वस्त्रमुपवीतंक्रमण्डलुः । आत्मनःशुचितंशुद्धं नशुद्धिःपरस्यच ॥ १५ ॥ नारीणांचैववत्सानां शकुनीनांशुनांमुखम् । रात्रौप्रस्रवणेवृक्षे मृगयायांसदाशुचि ॥ १६ ॥ शुद्धाभर्तुश्चतुर्थेऽन्हि स्नानेनस्त्रीरजस्वला । दैवेकर्मणिपित्र्येच पञ्चमेऽह्नि विशुद्ध्यति ॥ १७ ॥ रथ्याकर्दमतोयेन ष्ठीवनाद्येनवाप्यथ ।
गोंद, गुड़, लवण, कुसुम्भ, ऊन, और कपास इन की ॥११॥ शुद्धि भी भगवान् यमराजने छिड़कने से कही है। पृथिवीके शुद्ध स्थल में और शिला पर पड़ा जल स्वतः ही शुद्ध होता है ॥१२॥ यदि वह भूमिस्थ जल दुष्ट वर्ण, बुरा रस, और बुरे गंध से वर्जित हो, नदी का और आकर (खान) का जल सदा ही शुद्ध है ॥ १३ ॥ दूकान में फैली चीज़, बकरी और घोड़े का मुख भी शुद्ध है। मुख को छोड़कर गौके सब अंग शुद्ध हैं और आक्रमण (किसी जानवर को पकड़ के मार डालने) में बिलाव शुद्ध है ॥ १४ ॥ शय्या, स्त्री, बालक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, कमण्डलु, ये सब अपने ही शुद्ध कहे हैं और अन्य के नहीं ॥१५॥ स्त्री, बछड़े, पक्षि, और कुत्ते का मुख, क्रमसे रात्रि में प्रस्त्रवण थन चूसने में, वृक्ष से फल गिरने में और शिकार करने में सदैव शुद्ध है ॥ १६ ॥ रजस्वला स्त्री चौथे दिन स्नान करके अपने पति के लिये और देवता वा पितरोंके कर्म में पाचवें दिन शुद्ध हुई मानी जावे ॥ १७ ॥ यदि मनुष्य की नाभि से ऊपर के
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४५
नाभेरूर्ध्वंनरःस्पृष्टः सद्यःस्नानेनशुद्ध्यति ॥ १८ ॥
कृत्वामूत्रंपुरीषंवा स्नात्वाभोक्तुमनास्तथा ।
भुक्त्वाक्षुत्वात्तथासुप्त्वा पीत्वाचाम्भोऽवगाह्यच ॥१९॥
रथ्यामाक्रम्यवाऽऽचामेद्वासोविपरिधायच ।
कृत्वामूत्रंपुरीषंच लेपगन्धापहंद्विजः ॥ २० ॥
उद्धृतेनाम्भसाशौचं मृदाचैवसमाचरेत् ।
मेहनेमृत्तिकाःसप्त लिङ्गेद्वेपरिकीर्तिते ॥ २१ ॥
एकस्मिन्विंशतिर्हस्तेद्वयोर्ज्ञेयाप्ततुर्दश ।
तिस्रस्तुमृत्तिकाज्ञेयाः कृत्वानखविशोधनम् ॥ २२ ॥
तिस्रस्तुपादयोर्ज्ञेयाः शौचकामस्यसर्वदा ।
शौचमेतद्गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥ २३ ॥
त्रिगुणंतुवनस्थानां यतीनांतुचतुर्गुणम् ।
मृत्तिकाचविनिर्दिष्टा त्रिपर्वपूरयेत्तया ॥ २४ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
शरीर में गांव की गली का जल या थूक लगजाय तो उसी समय स्नान करने से शुद्ध होता है ॥१८॥ लघु शंका, मल का त्याग, भोजन करना, नाक छिनकना, सोना, जल पीना, और जल में अवगाहन (स्नान आदि) इन कामों को करके भोजन से पहिले ॥१९॥ गली में चल कर और वस्त्रों को धारण करके आचमन करे मल मूत्र का त्याग करके द्विज जिससे दुर्गन्ध दूर हो ॥ २० ॥ ऐसी शुद्धि कृपादि से निकाले जल और मिट्टी से करे, मल मूत्र त्यागने पश्चात् गुदेन्द्रिय में सात बार, लिंगेन्द्रिय में दो बार मट्टी लगानी कही है ॥ २१ ॥ एक बांय हाथ में बीस बार और फिर दोनों में चौदह बार फिर नखों की शुद्धि करके तीन बार मट्टी लगानी जानो ॥ २२ ॥ शुद्धि की इच्छा वाले पुरुष को तीन बार पगों में मट्टी लगानी कही है। यह शुद्धि गृहस्थों के लिये कही है इससे दूनी ब्रह्मचारियों को ॥२३॥ तिगुनी वानप्रस्थों को और चौगुनी संन्यासियों के लिये जानो और प्रत्येक बार में इतनी मट्टी लेवे जिससे हाथ के तीन अंगुल भर जावें ॥ २४ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
४६ शंखस्मृतिः ॥
नित्यं त्रिषवणस्नायी कृत्वापर्णकुटीं वने ।
अधःशायी जटाधारी पर्णमूलफलाशनः ॥ १ ॥
ग्रामं विशेच्च भिक्षार्थं स्वकर्म परिकीर्तयन् ।
एककालं समश्नीयादूर्ध्वं तु द्वादशे गते ॥ २ ॥
हेमस्तेयी सुरापश्च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।
व्रतेनैतेन शुध्यन्ते महापातकिनस्त्विमे ॥ ३ ॥
यागस्थं क्षत्रियं हत्वा वैश्यं हत्वा च याजकम् ।
एतदेव व्रतं कुर्यादात्रेयीविनिषूदकः ॥ ४ ॥
कूटसाक्ष्यं तथैवोक्त्वा निःक्षेपमपहृत्य च ।
एतदेव व्रतं कुर्यात्त्यक्त्वा च शरणागतम् ॥ ५ ॥
आहिताग्नेः स्त्रियं हन्त्वा मित्रं हत्वा तथैव च ।
हत्वा गर्भमविज्ञातमेतदेव व्रतं चरेत् ॥ ६ ॥
वनस्थं च द्विजं हन्त्वा पार्थिवं चाकृतागसम् ।
एतदेव व्रतं कुर्याद्द्विगुणं च विशुद्धये ॥ ७ ॥
क्षत्रियस्य च पादोनं वधेऽर्द्धं वैश्यघातने ।
प्रायश्चित्ती पुरुष वन में ढांक आदि के पत्तों की कुटी बनाकर उस में बसे, सायं, प्रातः और मध्यान्ह में तीन बार स्नान करे, पृथिवी पर सोवे, जटाओं को धारण करे, वृक्षों के पत्ते, मूल, फल, इन का भोजन करे ॥ १ ॥ अपने कर्म को कहता हुआ भिक्षा मांगने के लिये गांव में जाय, बारह वर्ष पर्यन्त एक काल भोजन करै ॥ २ ॥ इस प्रकार सुवर्ण का चौर, ब्रह्म हत्या करने वाला तथा—गुरुस्त्री गामी, ये चारो महापातकी ब्राह्मणादि इस व्रत से शुद्ध होते हैं ॥ ३ ॥ यज्ञ करते हुए क्षत्रिय को और यज्ञ करने वाले वैश्य को मारकर और रजस्वला स्त्री को मार डालने वाला भी यही व्रत करे ॥ ४ ॥ झूठी गवाही देकर, न्यास (धरोहर) को मार लेने पर और अपने शरण आये को त्याग करके भी यही व्रत करे ॥ ५ ॥ अग्निहोत्री की स्त्री, मित्र, और बिना जाने गर्भ को मार कर भी यही व्रत करे ॥ ६ ॥ वनवासी ब्राह्मण और अपराधी राजा इन को मार कर भी विशेष शुद्धि के लिये उक्त से दूना व्रत करे ॥ ७ ॥ वनवासी क्षत्रिय के मारने में पौन, वनस्थ वैश्य के और स्त्री के
पादन्तुशूद्रहत्यायामुदक्यागमनेतथा ।
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४१
अर्द्धमेवसदाकुर्यात्स्त्रीवधेपुरुषस्तथा ॥ ८ ॥
पादन्तुशूद्रहत्यायामुदक्यागमनेतथा ।
गोवधेचतथाकुर्यात्परदारगतस्तथा ॥ ९ ॥
पशून्हत्वातथाग्राम्यान् मासंकृत्वाविचक्षणः ।
आरण्थानांवधेतद्वत्तदर्धंतुविधीयते ॥ १० ॥
हत्वाद्विजंतथासर्पंजलेशयविलेशयान् ।
सप्तरात्रं तथाकुर्याद्व्रतंब्रह्महणस्तथा ॥ ११ ॥
अनस्थ्नांशकटंहत्वा सास्थ्नांदशशतंतथा ।
ब्रह्महत्याव्रतंकुर्यात्पूर्णंसंवत्सरंनरः ॥ १२ ॥
यस्ययस्यचवर्णस्य वृत्तिच्छेदंसमाचरेत् ।
तस्यतस्यवधेप्रोक्तं प्रायश्चित्तंसमाचरेत् ॥ १३ ॥
अपहृत्यतुवर्णानां भुवंप्राप्यप्रमादतः ।
प्रायश्चित्तंवधेप्रोक्तं ब्राह्मणानुमतंचरेत् ॥ १४ ॥
गोजाश्वस्यापहरणो मणेर्नांरजतस्य च ।
जलापहरणेचैव कुर्यात्संवत्सरव्रतम् ॥ १५ ॥
तिलानांधान्यवस्त्राणांमद्यानामामिषस्यच ।
मारने में उक्त में से आधा व्रत करे ॥ ८ ॥ शूद्र की हत्या, रजस्वला स्त्री के गमन, गोवध, और परस्त्री के गमन में उक्त में से चौथाई व्रत को करे ॥९॥ गांव के तथा बन के पशुओं को एक मास तक मार कर उक्त आधा व्रत कहा है ॥१०॥ पक्षी, सांप, जल और बिल में रहने वाले जीव, इन को मार कर ब्रह्महत्या का व्रत सात दिन तक करे ॥ ११ ॥ बिना हड्डी वाले जीवों की भरी गाड़ी और हाड़ वालों के एक हज़ार को मार कर मनुष्य एक वर्ष तक सम्पूर्ण ब्रह्म हत्या का व्रत करे ॥ १२ ॥ जिस २ वर्ण की जीविका में हानि करे, उसी २ वर्ण की हत्या का प्रायश्चित्त करे ॥१३॥ वर्णों की भूमि को चोरी से अनजाने लेकर ब्राह्मणों की आज्ञा से हत्या का जो प्रायश्चित्त है उस को करे ॥ १४ ॥ गौ, बकरी, घोड़ा, मणी, चांदी, जल, इन की जो चोरी करे वह एक वर्ष तक उक्त व्रत करे ॥ १५ ॥ तिल, अन्न, वस्त्र, मदिरा, मांस, इन
४८ शंखस्मृति ॥
संवत्सराद्धं कुर्वीत व्रतमेतत्समाहितः ॥ १६ ॥ तृणेक्षुकाष्ठतक्राणां रसानामपहारकः । मासमेकंव्रतं कुर्याद्गन्धानांसर्पिषांतथा ॥ १७ ॥ लवणानांगुडानांच मूलानांकुसुमस्यच । मासाद्धंतुव्रतं कुर्यादेतदेवसमाहितः ॥ १८ ॥ लोहानांवैदलानांच सूत्राणांचर्मणांतथा । एकरात्रंव्रतं कुर्यादेतदेवसमाहितः ॥ १९ ॥ भुक्त्वापलाण्डुलशुनं मद्यंचकवकानिच । नारंमलंतथामांसं विड्वराहंखरंतथा ॥ २० ॥ गौधेरकुञ्जरोष्ट्रंच सर्वंपञ्चनखंतथा । क्रव्यादंकुक्कुटंग्राम्यं कुर्यात्संवत्सरव्रतम् ॥ २१ ॥ भक्ष्याःपञ्चनखास्त्वेते गोधाकच्छपशल्लकः । खड्गश्चशशकश्चैव तान्हत्वाचाचरेद्व्रतम् ॥ २२ ॥ हंसंमद्गुंबकं काकं काकोलंखञ्जरीटकम् । मत्स्यादांश्चतथामत्स्यान्बलाक्रंशुकसारिके ॥ २३ ॥
की चोरी करके छः महीने तक सावधानी से उक्त व्रत करै ॥ १६ ॥ तृण, गांठ, काठ, मठा, रस, सुगन्ध, घी इन का चोर एक महीना तक व्रत करै ॥ १७ ॥ लवण, गुड़, मूल, फूल, इन की चोरी करने वाला सावधानी से पन्द्रह दिन यही व्रत करै ॥ १८ ॥ लोहे के पात्र बांस के पात्र, सूत, चाम, इन की चोरी करने वाला सावधान हो कर एकदिनरात यही व्रत करै ॥ १९ ॥ पलाण्डु, (प्याज) लहशुन, मदिरा, कवक (कटफल) मनुष्य का मल, मनुष्य का मांस विष्ठा खाने वाले सूकर और गधा का मांस इन को खा कर ॥ २० ॥ गोधेय (गोह का बच्चा) हाथी, ऊंट, सब पांच नखवाले, कच्चा मांस खाने वाले जीव, और गांव का मुरगा इन सब का मांस खा कर एक वर्ष तक उक्त व्रत करै ॥ २१ ॥ परन्तु गोह, कछुआ, सेही, गेंडा, खरगोश, ये पांच नखों वाले पांच भक्ष्य हैं और इन पांचों को मारकर भी एकवर्ष तक व्रत को करै ॥ २२ ॥ हंस-मद्गुर, (मत्स्यभेद या जलकाक) बगुला, बलाका, कौआ, काकोल, (सर्प) खञ्जरीट (खञ्जन पक्षि) मछलीको खानेवाली - मछली, तोता, सारिका (मैना,)॥ २३ ॥
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४९
चक्रवाकंप्रप्लवंकौकं मण्डूकंभुजगंतथा ।
मासमेकंव्रतंकुर्याद्धेनञ्चैवनभक्षयेत् ॥ २४ ॥
राजीवान्सिंहतुण्डांश्च शकुलांश्चतथैवच ।
पाठीनरोहितौभक्ष्यो मनुष्येषुपरिकीर्तितौ ॥ २५ ॥
जलेचरांश्चजलजान् मुखाग्रनखविष्किरान् ।
रक्तपादान्जालपादान्सप्ताहांतव्रतमाचरेत् ॥ २६ ॥
तित्तिरिंचमयूरंच लावकंचकपिञ्जलम् ।
वार्ध्रीणसंवर्त्तकंच भक्ष्यानाहयमस्तथा ॥ २७ ॥
भुक्त्वाचोभयतोदन्त मन्यैकशफदीर्घोर्णः ।
तथाभुक्त्वातुमांसांश्च मासाद्धैव्रतमाचरेत् ॥ २८ ॥
स्वयंमृतंष्टथामांसं माहिषंवाजमेवच ।
गौरचक्षीरंविवत्सायाः संधिन्थाश्चतथापयः ॥ २९ ॥
संधिन्यमेध्यमशित्वा पक्षंतुव्रतमाचरेत् ।
क्षीराणियान्यभक्ष्याणि तद्विकाराननेबुधः ॥ ३० ॥
सप्तरात्रंव्रतंकुर्याह्येतत्परिकीर्त्तितम् ।
चक्रवा, प्लव (जल का पंछी) कंक (बगुला) मेढक, सर्प इनको खाकर एक महीना तक व्रत करे और आगे इनको कभी न खावै ॥ २४ ॥ राजीव, सिंहतुंड, श-कुल, पाठीन, रोहित, इन२ नामों वाली मच्छी भक्ष्य कही हैं ॥ २५ ॥ जल में विचरने और जल में पैदा होने वाले, मुख के अग्रभाग में जो नख उनसे खोदने वाले जिनके पग लाल हों, और जिनके जाल के समान पग हों, उन पक्षियों का मांस खाकर सात दिन व्रत करे ॥ २६ ॥ तीतर, मोर, लावक (लावपंछी) कपिंजल, वा-र्ध्रीणस, बत्तक, ये यमराजने भक्ष्य कहे हैं ॥ २७ ॥ जिनके दोनों ओर दांत होते, जिनके एक जुड़े खुर होते, जो एक ओर दानवाले हैं इनका मांस खाकर पंद्रह दिन व्रत करे ॥ २८ ॥ स्वयं मरे जीवका मांस, भैंस और बकरेका मांस, जिस का बछड़ा मरगयाहो अथवा जो संधिनी (गाभिन हो जाने पर दूध देती हो) उस गौ का दूध ॥ २९ ॥ संधिनी गौ का अशुद्ध मूत्रादि इनको खाकर पंद्रह दिन व्रत करे और जो दूध अभक्ष्य हैं उनके विकार (दही, मट्ठा, कढ़ी आदि) को खाकर बुद्धिमान् पुरुष ॥ ३० ॥ सात दिन तक उक्त व्रतको करे। जिसका लाल गोंड़, और जो गोंड़ वृक्षके
५
५२ | शंखस्मृतिः ॥
लोहितान्वृक्षनिर्यासान्व्रश्चनप्रभवांस्तथा ॥ ३१ ॥
केवलानिचशुक्तानि तथापर्युषितंचयत् ।
गुडशुक्तंतथाभुक्त्वा त्रिरात्रंचव्रतीभवेत् ॥ ३२ ॥
दधिभक्ष्यंचशुक्तेषु यच्चान्यद्दधिसंभवम् ।
गुडशुक्तंतुभक्ष्यंस्यात् ससर्पिष्कमितिस्थितिः ॥ ३३ ॥
यवगोधूमजाःसर्वे विकाराःपयसश्चये ।
राजवाड्वकुल्यंच भक्ष्यंपर्युषितंभवेत् ॥ ३४ ॥
सजीवपक्वंमांसंच सर्वयत्नेनवर्जयेत् ।
संवत्सरंव्रतंकुर्यात् प्राश्यैतानज्ञानतस्तुतान् ॥ ३५ ॥
शूद्रान्नंब्राह्मणोभुक्त्वा तथारङ्गावतारिणः ।
चिकित्सकस्यक्षुद्रस्य तथास्त्रीमृगजीविनः ॥ ३६ ॥
षण्डस्यकुलटायाश्च तथाबन्धनचारिणः ।
वद्धस्यचैवचौरस्य अवीरायाःस्त्रियस्तथा ॥ ३७ ॥
चर्मकारस्यवेनस्य क्लीवस्यपतितस्यच ।
रुक्मकारस्यधूर्त्तस्य तथावार्द्धुपिकस्यच ॥ ३८ ॥
कदर्यस्यनृशंसस्य वेश्यायाःकितवस्यच ।
गोंदने से निकलेहों ॥३१॥ केवल शुक्त (खटाये हुए) और वासी पदार्थ, खटाया बिगड़ा हुआ गुड़ का विकार इन को खाकर तीन दिन व्रत करे ॥ ३२ ॥ विकार से खटाये हुए पदार्थों में दही, तथा दही से बने कढ़ी, रायतादि, घी जिस में मिला हो ऐसा खटाया गुड़ ये शुक्तों में भक्ष्य कहे हैं ॥ ३३ ॥ जौ, गेहूं, दूध,-इन से बने सब विकार और राजवाड़व नामक जीव का मांस ये वासी (धरे हुए) भी भक्ष्य हैं ॥३४॥ जीते जीवों के पकाये मांस को सब प्रकार त्याग देवे और इन पूर्वोक्त अभक्ष्य पदार्थों को ज्ञान पूर्वक खावे तो एक वर्ष तक व्रत करे ॥३५॥ शूद्र, रंगावतारी (नाटकी) वैद्य, क्षुद्रबुद्धि, स्त्री को नचा के तथा मृगों को मार के जीविका करने वाला ॥३६॥ नपुंसक, व्यभिचारिणी स्त्री, बन्धन चारी, (डाकिये) कैदी चोर, पति पुत्र हीन स्त्री, ॥ ३७ ॥ चमार, वेन, क्लीव, (नामर्द) पतित, सुनार, धूर्त्त नाम अन्य की हानि करने वाला, व्याज लेने वाला, ॥ ३८ ॥ कंजूस, हिंसक, वेश्या, जुवारी, इन शूद्रादि
भाषार्थसहिता ॥ ५१
गणान्नंभूमिपालान्न मन्नंचैवम्प्रजीविनाम् ॥ ३९ ॥
मौञ्जिकानांसूतिका नं भुक्त्वामा संव्रतंचरेत् ।
शूद्रस्यसततं भुक्त्वा षण्मासान्व्रतमाचरेत् ॥ ४० ॥
वैश्यस्यतुतथाभुक्त्वा त्रीन्मासान्व्रतमाचरेत् ।
क्षत्रियस्यतथाभुक्त्वा द्वौमासौव्रतमाचरेत् ॥ ४१ ॥
ब्राह्मणस्यतथाभुक्त्वा मासमेकंव्रतंचरेत् ।
आपःसुराभाजनस्थाः पीत्वापक्षंव्रतंचरेत् ॥ ४२ ॥
मद्यभाण्डगताःपीत्वा सप्तरात्रंव्रतंचरेत् ।
शूद्रोच्छिष्टाशनेमासं पक्षमेकंतथाविशः ॥ ४३ ॥
क्षत्रियस्यतुसप्ताहं ब्राह्मणस्यतथादिनम् ।
अग्रश्राद्धाशनेविद्वान् मासमेकंव्रतीभवेत् ॥ ४४ ॥
परिवित्तिःपरिवेत्ता ययाचपरिविन्दति ।
व्रतंसंवत्सरंकुर्य्युर्दातृयाजकपञ्चमाः ॥ ४५ ॥
काकोच्छिष्टंगवाघ्रातं भुक्त्वापक्षंव्रतीभवेत् ।
का अन्न, बहुत मनुष्यों के चन्द का अन्न, राजा का अन्न शिकारी कुत्ते रखने वालों का अन्न, ॥३९॥ सूत के व्यापारी और सूतिका का अन्न खाकर एक मास तक व्रत करे और निरन्तर शूद्र के अन्न को खाकर छ मास तक व्रत करे ॥४०॥ वैश्यका अन्न निरन्तर खाकर तीन महीने और क्षत्रिय का अन्न निरन्तर खाकर दो महीने व्रत करे ॥ ४१ ॥ ब्राह्मणका अन्न निरन्तर खाकर एक महीने तक व्रत करे और मदिरा के पात्र में रक्खा जल पीकर पन्द्रह दिन तक व्रत करे । ४२॥ गुड़ की मदिरा के पात्र का जलपीकर सातदिन व्रत करे । शूद्रका उच्छिष्ट खाकर एक महीना और वैश्य का उच्छिष्ट खाकर पन्द्रह दिन व्रत करे ॥ ४३ ॥ क्षत्रिय का उच्छिष्ट अन्न खाकर सात दिन, ब्राह्मण का उच्छिष्ट अन्न खाकर एक दिन और अद्यादशाह के श्राद्ध में खाकर एक महीना ज्ञानवान् मनुष्य व्रत करे ॥ ४४ ॥ परिवेत्ता परिवित्ति जिस स्त्री के साथ परिवित्ति ने जेठे भाई से पहिले विवाह किया हो वह स्त्री कन्या का दाता और पांचवा याजक (विवाह पढ़ने वाला ) ये पांचों एक वर्ष तक व्रत करें ॥ ४५ ॥ कौवे का उच्छिष्ट, गौ का सूँघा अन्न इन को खाकर पंद्रह दिन व्रत करे और बाल कीड़ा, मूसा, हत इन में जो दूषित हो अर्थात बाल आदि पड़ गये हों
५२ | शंखस्मृतिः ॥
दूषितंकेशकीटैश्च मूषिकालाङ्गुलेनच ॥ ४६ ॥
मक्षिकामशकेनापि त्रिरात्रंतुव्रतीभवेत् ।
वृथाकृसरसंयावपायसापूपशष्कुलीः ॥ ४७ ॥
भुक्त्वात्रिरात्रंकुर्वीत व्रतमेतत्समाहितः ।
नील्याचैवक्षतोविप्रः शुनादष्टस्तथैवच ॥ ४८ ॥
त्रिरात्रंतुव्रतं कुर्यात् पुंश्चलीदशनक्षतः ।
पादप्रतापनंकृत्वा वह्निकृत्वात्तथाप्यधः ॥ ४९ ॥
कुशैःप्रमृज्यपादौच दिनमेकंव्रतीभवेत् ।
नीलीवस्त्रंपरीधाय भुक्त्वास्नानार्हमस्तथा ॥ ५० ॥
त्रिरात्रंव्रतं कुर्याच्छित्वागुल्मलतास्तथा ।
अध्यास्यशयनंयानमासनंपादुकेतथा ॥ ५१ ॥
पलाशन्वादिजंपृष्ट्वात्रिरात्रंतुव्रतीभवेत् ।
वाग्दुष्टंभाजदुष्टंच भाजनेभावदूषिते ।
भुक्त्वाऽन्नंब्राह्मणः पश्चात्त्रिरात्रंतुव्रतीभवेत् ॥ ५२ ॥
क्षत्रियस्तुरणेदत्वा पृष्ठंप्राणपरायणः ।
वा सूयादि ने खाया हो ॥ ४६ ॥ मक्खी मच्छर इनके पड़जाने से दूषित हुए को खा कर तीन दिन व्रत करे और वृथा (केवल अपने लिये) कृसर, (मिले हुए दाल तिल चावल की खिचड़ी) संयाव (सोहनभोग) खीर, पूआ, पूरी, ॥४७॥ इनको खा कर सावधानी से तीन दिन तक व्रत करे । जिस ब्राह्मण के शरीर में नील की लकड़ी से घाव हो जाय वा जिस को कुत्ता काटे ॥ ४८ ॥ वह तीन दिन व्रत करे, जिसके पुंश्चली (वेश्या आदि व्यभिचारिणी) के दांतों से घाव हो जाय और नीचे अग्नि रखकर जो पग तपाये ॥४९॥ वह कुशाओं से पगों को शुद्ध कर के एक दिन व्रत करे । और नील का रंगा वस्त्र पहन कर और जिस के छूने से स्नान करना योग्य है उस का अन्न खा कर ॥ ५०॥ तीन दिन व्रत करे गुल्म (गुच्छे) लता, इन को काट कर शय्या (खटिया) सवारी, आसन पट्ठा वा पलन और खड़ाऊं इन पर बैठ कर ॥ ५१ ॥ यदि ये खटिया आदि सब पलाश (ढाक) के काष्ठादि से बनी हों तो तीनदिन व्रत करे । वाणी से और भावना से दूषित पदार्थ को, खाके तथा भाव से दूषित पात्र में अर्थात् जो निन्दित घृणित नाम से बोला गयाहो । खाकर ब्राह्मण तीन दिन व्रत करे ॥ ५२ ॥ और अपने प्राणों की रक्षा में तत्पर क्षत्रिय रण
भाषाधर्मसंहिता ॥ ५३
संवत्सरंव्रतंकुर्याच्छित्त्वावृक्षंफलप्रदम् ॥ ५३ ॥
दिवाचमैथुनंगत्वा स्नात्वानग्नस्तथाम्भसि ।
नग्नांपरस्त्रियंदृष्ट्वा दिनमेकंव्रतीभवेत् ॥ ५४ ॥
क्षिप्त्याग्नावशुचिद्रव्यं तदेवाम्भसिमानवः ।
मासमेकंव्रतंकुर्यादुपक्रुध्यत्तथागुरुम् ॥ ५५ ॥
पातावशेषंपानीयं पीत्वाचब्राह्मणःक्वचित् ।
त्रिरात्रंतुव्रतंकुर्याद्वामहस्तेनवापुनः ॥ ५६ ॥
एकपङ्क्त्युपविष्टेषु विषमंयःप्रयच्छति ।
सचनावदसौपक्षं कुर्यात्तुब्राह्मणोव्रतम् ॥ ५७ ॥
धारयित्वा तुलाधार्यं विषमं कारयेद्बुधः ।
सुरालवणमद्यानां दिनमेकंव्रतीभवेत् ॥ ५८ ॥
मांसस्यविक्रयं कृत्वा कुर्याञ्चैवमहाव्रतम् ।
विक्रीयपणिनामद्यं तिलस्यचतथाचरेत् ॥ ५९ ॥
हुंकारंब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारंचगरीयसः ।
दिनमेकंव्रतंकुर्यात् प्रयतःसुसमाहितः ॥ ६० ॥
प्रेतस्यप्रेतकार्याणि अकृत्वाधनहारकः ।
( युद्ध ) में पीठ दे कर भाग आवै तो एक वर्ष तक व्रत करै, फल देने हुए वृक्ष को काट कर ॥ ५३ ॥ दिन में मैथुन करके, नंगा होकर जलाशय में स्नान करके और अन्य की स्त्री को नंगी देखकर एक दिन व्रत करे ॥ ५४ ॥ अग्नि और जल में अशुद्ध पदार्थ डाल कर, और गुरु पर क्रोध करके एक मास तक व्रत करे ॥ ५५ ॥ और पीने में बचे पानी को ब्राह्मण कदाचित् पीकर, और बाये हाथ से जल पीकर तीन दिन व्रत करै ॥ ५६ ॥ एक पङ्क्ति में बैठे हुओं के आगे जो विषम किसी मित्र या प्रतिष्ठित को उत्तम पदार्थ तथा अन्यों को साधारण वस्तु परोसे जिसको अच्छा परोसा हो वह और परोसने वाला दोनों पन्द्रह दिन व्रत करें ॥ ५७ ॥ तौला को रखकर जो कम तुलवावे तथा सुरा, मदिरा, लवण, मद्य, इनको बेंचै या बिकवावे वह एक दिन व्रत करै ॥ ५८ ॥ मांस को बेंच कर महाव्रत करे । अपने हाथ से मदिरा और तिलों को बेंच कर भी महाव्रत करे ॥ ५९ ॥ और ब्राह्मण को हुंः और बड़े प्रतिष्ठित पुरुष को तू कह कर सावधान होके एकाग्र मन से एक दिन व्रत करै ॥ ६० ॥ मरे मनुष्य के दाहादि कर्म न करके उस के धनादि सामान को लेने