अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
आदि दोष का प्रशमन करता है, कोई द्रव्य प्रकृतिस्थ घातु को बढ़ा या घटा देता है और कोई द्रव्य स्वस्थवृत्त के लिए उपयोगी माना जाता है।
शार्ङ्गधराचार्य ने शमनद्रव्य का वर्णन इस प्रकार किया है—‘न शोधयति न द्रेष्टि समान् दोषास्त-योद्भूताम्। समीकरोति विषमान् शमनं तद्यथाऽमुता’ ॥ (शा.प्र.अ. ४२) अर्थात् जो द्रव्य वमन या विरेचन द्वारा वात आदि दोषों का शोधन भी नहीं करता, सम दोषों को विकृत भी नहीं करता, किन्तु कुपित या विषम (बड़े अथवा क्षीण) दोषों को जो सम करता है, वह ‘शमन’ द्रव्य कहा जाता है। यथा—अमृता (गिलोय)।
उष्णशीतगुणोत्कर्षात्तत्र वीर्यं द्विधा स्मृतम्।
वीर्य का वर्णन—द्रव्यों में शीतगुण तथा उष्णगुण की अधिकता से दो प्रकार का ‘वीर्य’ माना जाता है।
वक्तव्य—महर्षि चरक अपनी संहिता में किन्हीं दो आचार्यों के मतों का उल्लेख करने के बाद वे अपनी बात को प्रसंगवश अन्त में कह रहे हैं। एक आचार्य का मत—वीर्य आठ प्रकार का होता है—१. मृदु, २. तीक्ष्ण, ३. गुरु, ४. लघु, ५. स्निग्ध, ६. रुक्ष, ७. उष्ण और ८. शीत। दूसरे आचार्य का मत—१. शीत तथा २. उष्ण दो प्रकार का वीर्य होता है। चरक का मत—‘वीर्य तु क्रियते येन या क्रिया। नावीर्यं कुर्वते किञ्चित् सर्वा वीर्यकृता क्रिया’ ॥ (च.सू. २६।६४-६५) इन्होंने द्रव्य की कर्मशक्ति को ही ‘वीर्य’ संज्ञा दी है। सुश्रुत का विचार भी इन्हीं के अनुरूप है। देखें—‘येन कुर्वन्ति तद्वीर्यम्’। (सु.सू. ४१।५) इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि उक्त दोनों संहिताकारों में इस विषय में किसी प्रकार का मतभेद नहीं है। द्विविध तथा अष्टविध वीर्य को सुश्रुत ने भी स्वीकार कर अपनी संहिता में स्थान दिया है। देखें—सु.सू. ४०।५। चरक की मान्यता का ऊपर उल्लेख कर ही दिया गया है।
आप ध्यान दें—संसार में सभी पदार्थ या तो उष्ण हैं अथवा शीत हैं, अतः दो प्रकार का वीर्य होना स्वाभाविक ही है; किन्तु वायु द्रव्य ऐसा है जो ‘अनुष्णाशीतस्पर्श’ वाला है, अतः यहाँ उक्त समाधान वायु को ‘योगवाही’ मान लेने से हो जायेगा।
त्रिधा विपाको द्रव्यस्य स्वादुस्लकटुकात्मकः ॥ १७ ॥
विपाक का वर्णन—भले ही कोई द्रव्य किसी रस से युक्त क्यों न हो, उसका विपाक तीन प्रकार का होता है—१. मधुर, २. अम्ल तथा ३. कटु ॥ १७ ॥
वक्तव्य—प्रायः सभी प्रकार के रस वाले द्रव्यों का भोजन के पाचनकाल के बाद कार्यरूप में जिसका अनुमान द्वारा निर्णय किया जा सकता है, वह रस जठराग्नि द्वारा पाक हो जाने पर उपर्युक्त तीन प्रकार का पाया जाता है। यथा—मधुर तथा लवण रस वाले द्रव्यों का मधुर, अम्ल रस वाले द्रव्यों का अम्ल और तित्त, कटु, कषाय रस वाले द्रव्यों का कटु विपाक होता है। इसी विषय को महर्षि वामभट आगे अ.हृ.सू. १।२० में कहेंगे। चरक ने उक्त विषय को अपनी संहिता में इस प्रकार से दिया है—‘रसो……च्छोपलभ्यते’ ॥ (च.सू. २६।६६) अर्थात् रसों का भिन्न-भिन्न ज्ञान जीभ के साथ स्पर्श होने पर होता है और विपाक का ज्ञान कर्म की समाप्ति होने पर होता है। आशय यह है कि विपाक का ज्ञान आहार के पचने पर दोषों एवं घातुओं की वृद्धि अथवा क्षीणता रूपी लक्षणों से जाना जाता है और वीर्य का ज्ञान जीभ के स्पर्श से लेकर शरीर में रहने तक होता रहता है।
निष्कर्ष—रस का ज्ञान जीभ के स्पर्श से, विपाक का ज्ञान उसके कार्य को देखकर और वीर्य का ज्ञान प्रत्यक्ष तथा अनुमान दोनों से होता है। इसके आगे च.सू. २६।६७-६८ इन दो श्लोकों का भी परिशीलन इस प्रसंग में कर लेना चाहिए, जो विषय को स्पष्ट करने में उपकारक हैं। इस विषय के विशेष विवेचन के लिए सु.सू. ४० का अध्ययन करें।
आयुष्कामीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
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शार्ङ्गधराचार्य ने विपाक का परिचय इस प्रकार दिया है—'जाठरेणाग्निना योगाद् यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः' ॥ (शा.पू.खं.द्वि. ३३) अर्थात् मधुर आदि रसों का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ जाने के बाद जठराग्नि के साथ संयोग होने के अनन्तर जो दूसरे रस की उत्पत्ति होती है, वह 'विपाक' कहा जाता है। आयुर्वेदशास्त्र में रस-गुण-वीर्य-विपाक का विपुल साहित्य है, फिर भी आप देखें—यह 'सम्यक् विपाक' हुआ है या 'मिथ्या विपाक', तभी आप ठीक निष्कर्ष पर पहुँच पायेंगे। फिर भी आप निम्न सन्दर्भों का अवलोकन अवश्य करें—च.सू. २६।५७-५८। च.सू. २६।६१-६२। सु.सू. ४०।१०-१२। च.चि. १५।९-११। शा.प्र.ख. ६।१-२।
गुरुमन्दहिमस्निग्धश्लक्ष्णसान्द्रमुदुस्थिराः। गुणाः ससूक्ष्मविशदा विशतिः सविपर्यायाः ॥ १८ ॥
द्रव्य के गुणों का वर्णन —द्रव्यों में परस्पर विपरीत ये २० गुण पाये जाते हैं—१. गुरु, २. लघु, ३. मन्द, ४. तीक्ष्ण, ५. शीत, ६. उष्ण, ७. स्निग्ध, ८. रुक्ष, ९. श्लक्ष्ण, १०. खर, ११. सान्द्र, १२. द्रव, १३. मुदु, १४. कठिन, १५. स्थिर, १६. सर, १७. सूक्ष्म, १८. रु, १९. विशद और २०. पिच्छल ॥ १८ ॥
वक्तव्य —अ.हृ.नि. ६।१ में मद्य के १० गुण और इनके विपरीत १० ओजस् के जो गुण गिनाये हैं, वे भी ये ही २० गुण हैं। चरक ने दूध के दस गुण गिनाकर यह बतलाया है कि जो गुण दूध के कहे गये हैं वे गुण ओजस् के भी हैं, अतएव दूध को पीने से ओजोगुण की वृद्धि होती है। चरक ने जो दिव्य जल के ६ गुणों का वर्णन च.सू. २७।१९८ में किया है, यदि हम इन्हें मानते हैं तो फिर गुणों की संख्या २० ही कैसे मानी जा सकती है? इसका समाधान इस प्रकार है—ये जो ६ अतिरिक्त गुणों का वर्णन यहाँ किया गया है, इनका अन्तर्भाव उक्त २० गुणों में ही कर लिया जाता है।
ध्यान दें —व्यवाधि, विकाशी, आशुकारी ये गुण मद्य में कहे गये हैं और 'प्रसन्न' नामक गुण दूध में। फिर यह भी कहा गया है कि मद्य के गुणों से विपरीत गुण ओजस् में होते हैं। साथ ही फिर यह भी कहा गया है कि जो गुण ओजस् में होते हैं वे ही गुण दूध में होते हैं। इन विषयों का समन्वय इस प्रकार किया गया है—व्यवायी गुण का अन्तर्भाव द्रव गुण में, विकाशी का खर में, आशुकारी का चल में और प्रसन्न का स्थूल में। इनका समर्थन चरक तथा सुश्रुत के वचनों द्वारा प्राप्त है।
उक्त २० गुणों के अर्थ
| १. गुरु = भारी | ६. उष्ण = गरम | ११. सान्द्र = गाढ़ा | १६. सर = चल |
|---|---|---|---|
| २. लघु = हल्का | ७. स्निग्ध = चिकना | १२. द्रव = पतला | १७. सूक्ष्म = बारीक |
| ३. मन्द = चिरकारी | ८. रुक्ष = रुखा | १३. मुदु = कोमल | १८. स्थूल = मोटा |
| ४. तीक्ष्ण = तीखा | ९. श्लक्ष्ण = साफ | १४. कठिन = कठोर | १९. विशद = टूटने वाला |
| ५. शीत = शीतल | १०. खर = खुरदरा | १५. स्थिर = अचल | २०. पिच्छल = लसीला |
विशेष —३. मन्द—जो न शीघ्र हानि करता हो और न लाभ करता हो। ४. तीक्ष्ण—शीघ्र लाभ या हानि करने वाला। १६. सर—फैलने वाला या गतिशील। १७. सूक्ष्म—छोटे-से-छोटे स्रोतों में प्रवेश करने वाला। २०. पिच्छल—लुआबदार।
कालार्थकर्मणों योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः। सम्यग्योगश्च विज्ञेयो रोगारोग्येककारणम् ॥ १९ ॥
रोग एवं आरोग्य के कारण —काल, अर्थ तथा कर्म के हीनयोग, मिथ्यायोग एवं अतियोग रोग या रोगों की उत्पत्ति में एक मात्र कारण होते हैं तथा काल, अर्थ और कर्म का सम्यक् योग आरोग्य (स्वस्थ रहने) का एक मात्र कारण होता है ॥ १९ ॥
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अष्टाङ्गहृदये
वक्तव्य—काल— आयुर्वेदीय दृष्टि से यह तीन प्रकार का होता है, इसी को मौसम या मौसिम भी कहते हैं। इसका विभाजन इस प्रकार किया गया है—१. शीतकाल, २. उष्णकाल तथा ३. वर्षाकाल। इन कालों के समूह को वर्ष, वत्सर तथा संवत्सर कहते हैं। यहाँ इन्हीं तीन कालों से सम्बन्ध है। इन कालों में क्रमशः शीत, उष्ण, वर्षा का अधिक होना 'अतियोग' है, थोड़ा होना 'हीनयोग' है और अपनी सीमा के विपरीत होना 'मिथ्यायोग' है।
अर्थ— श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जिन-जिन विषयों का ग्रहण किया जाता है, उन्हीं को इस प्रकरण में 'अर्थ' कहा गया है। इन अर्थों का अपनी-अपनी इन्द्रियों के साथ अधिक संयोग होना उन-उनका 'अतियोग' है, थोड़ा संयोग होना 'हीनयोग' है और अनिष्टकारक संयोग होने को 'मिथ्यायोग' कहते हैं।
कर्म— वाणी, मन तथा शरीर की प्रवृत्ति या चेष्टा का नाम 'कर्म' है। न्यायशास्त्र के अनुसार 'संयोग-भिन्नत्वे सति संयोगाऽसमवायिकारणत्वं कर्मत्वम्'। (तर्कसंग्रह) यह कर्मत्व भी हमारा उपकारक है। उक्त तीनों के या दो के अथवा एक के कर्म की अधिकता का नाम 'अतियोग' है, कर्म की कमी को 'हीनयोग' तथा अहितकर या हानिकर कर्म के योग को 'मिथ्यायोग' कहते हैं।
इस प्रकार काल, अर्थ तथा कर्म के अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग किसी-न-किसी रोग को उत्पन्न करने में कारण होता है। उक्त अतियोग आदि शारीरिक एवं मानसिक रोगों की उत्पत्ति में कारण होते ही हैं। शीत, उष्ण एवं वर्षा का अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग प्राकृतिक रूप से भी देखा जाता है और मानव द्वारा भी किया जाता है किन्तु फल दोनों का रोगोत्पत्ति में कारण होता ही है।
सम्यग्योग— काल, अर्थ एवं कर्म का अतियोग, हीनयोग तथा मिथ्यायोग के अतिरिक्त जो समुचित योग होता है, उसे 'सम्यग्योग' कहते हैं। यह 'आरोम्य' (स्वास्थ्य-वृद्धि) का कारण होता है। इसका विशेष विवरण अ.हृ.सू. के 'रोगानुत्पादनीय' नामक ४थे अध्याय में देखें। यही विषय अष्टांगसंग्रह के पाँचवें अध्याय में देखें। प्रस्तुत पद्य अष्टांगसंग्रह १।४२ में द्रष्टव्य है।
इस विषय को चरक की दृष्टि से देखें—च.सू. ११।३७-४१ तक। इन कर्मों को महर्षि चरक ने 'प्रजापराध' संज्ञा दी है, अन्यथा बुद्धि-प्रधान मानव इन कर्मों की ओर कैसे प्रवृत्त हो सकता है?
रोगस्तु दोषवैषम्यं, दोषसाम्यमरोगता।
रोग-आरोम्य में भेद— वात, पित्त, कफ इन तीन दोषों की विषमता या विषम अवस्था का नाम 'रोग' है। अर्थात् दोषों के विषम (किसी का बढ़ जाना और किसी का घट जाना) हो जाने से किसी-न-किसी प्रकार का रोग हो जाता है और जब उक्त दोष समान स्थिति में रहते हैं तब आरोम्य की प्राप्ति होती है अर्थात् मानव 'सुखी' रहता है।
वक्तव्य— दोष या दोषों की विषमता अर्थात् तीनों में से एक या दो दोषों का बढ़ या घट जाना, इसी की विषमता को सम का विपरीत भाव कहा जाता है। यहाँ दोष शब्द रोग का अन्तरंग (भीतरी) कारण मात्र है। दोषों का सम होना ही 'आरोम्य' है। आगे जो दो श्लोक अ.हृ.सू. में क्रम सं० २०-२१ पर हैं, ये ही दो श्लोक अ.सं.सू. १।४३-४४ में हैं।
निजागन्तुविभागेन तत्र रोगा द्विधा स्मृताः ॥ २० ॥
रोगों के दो भेद— सामान्य रूप से रोग दो प्रकार के होते हैं—१. निज (वात आदि भीतरी दोषों की विषमता से होने वाले) तथा २. आगन्तुज (अभिघात आदि बाहरी कारणों से होने वाले) ॥ २० ॥
वक्तव्य— महर्षि चरक के शब्दों में रोगों के दो भेद इस प्रकार कहे गये हैं—'तत्र निजः शारीर-दोषसमृत्यः, आगन्तुर्भूतविषवाव्यभिपसम्प्रहारादिसमृत्यः'। (च.सू. ११।४५) अर्थात् शारीरिक वात आदि दोषों से उत्पन्न रोग 'निज' कहा जाता है और 'आगन्तुज' रोग अभिघात, भूतावेश, सर्प आदि के दंश, शीत, उष्ण, आम, तेजाब आदि आश्रय द्रव्यों के लग जाने से या गदा, लाठी, हाकी, तलवार आदि के लग जाने से होता है।
आयुष्कामीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
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तेषां कायमनोभेदादधिष्ठानमपि द्विधा।
दो प्रकार के रोगाधिष्ठान—रोगों के अधिष्ठान (आथयस्थान) भी दो होते हैं—१. काय (शरीर) तथा २. मन।
वक्तव्य—प्रथम भेद से होने वाले रोगों का अधिष्ठान ‘काय’ है। वे रोग ज्वर, रक्तपित्त, कास, श्वास आदि हैं। दूसरे भेद से कहे जाने वाले रोगों का अधिष्ठान है ‘मन’। इससे सम्बन्धित रोग हैं—मद, मूच्छर्ण, संन्यास, ग्रहारिष्ट, भूतोन्माद, अपस्मार, राग, द्वेष आदि। अधिष्ठान—‘अधिष्ठित रोगाः अस्मिन् इति अधिष्ठानम्’। अर्थात् जिसमें रोग टिकते हैं। इस दृष्टि से भी कायिक एवं मानसिक दो प्रकार के रोग होते हैं। अब यहाँ शंका यह होती है कि शारीरिक रोगों की उत्पत्ति में प्रकृपित वात आदि दोष कारण कहे गये हैं, मानस रोगों की उत्पत्ति में किसे कारण माना जायेगा? उसी के समाधान के लिए कहा जा रहा है।
रजस्तमश्च मनसो द्वौ च दोषावुदाहृतौ॥२१॥
मानसिक दोषों का परिचय—मनस् के दो दोष हैं—१. रजस् (रजोगुण) और २. तमस् (तमोगुण)।
वक्तव्य—गुण तीन हैं—१. सत्त्व, २. रजस् और ३. तमस्। इसी विषय को महर्षि ऋक ने ‘मानसः पुनरहिष्टो रजश्च तम एव च’। (च.सू. १।५७) भी स्वीकार किया है और मानस रोगों की चिकित्सा के लिए उन्होंने अगले (५८वें) पद्य में कहा है—मानस रोगों की ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति तथा समाधि द्वारा चिकित्सा करें। इस विषय को आप ‘नियतस्त्वनुबन्धो रजस्तमसोः परस्परं, न ह्यरजस्के तमः प्रवर्तते’। (च.वि. ६।१) अर्थात् काम आदि मानस रोगों तथा ज्वर आदि शरीर सम्बन्धी रोगों का कदाचित् परस्पर अनुबन्ध हो जाता है, परन्तु रजस् और तमस् का परस्पर अनुबन्ध होना निश्चित ही है, क्योंकि तमस् रजस् के बिना प्रवृत्त ही नहीं होता। ये दोनों कभी भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते और सत्त्व गुण सर्वथा निर्विकार है। अतः वह (सत्त्वगुण) मानसिक आरोग्य को देने में कारण है।
अष्टांगसंग्रह में वाग्भट ने सत्त्व, रजस्, तमस् को ‘महागुण’ कहा है, अतः ये तीनों कारण रजस् तथा शुक्र रूप बीज में भी रहते हैं और कार्य (श्रृण) में भी रहते हैं। अतएव इनके विषय में भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत से कहा है। देखें—सु.शा. १।३।
सत्त्व-रजस्-तमस् की निरुक्ति—
१. सत्त्वम्—अस्ति इति सत्, सतो भावः सत्त्वम् = अस्तित्व युक्त।
२. रजस्—रञ्जति अनेन इति रजः = रागः, आसक्तिः वा।
३. तमस्—ताम्यति अनेन इति तमः = विनाशकारक प्रधान गुण।
रजोगुण तथा तमोगुण का वर्णन करते हुए महर्षि पुनर्वसु ने कहा है—‘सृष्टि के समय पुरुष अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था में आता है और पुनः प्रलयकाल में व्यक्त अवस्था से अव्यक्त अवस्था में चला जाता है। इस प्रकार बन्धन के कारण रजस् तथा तमस् गुणों से युक्त पुरुष संसार-चक्र के समान घूमता रहता है। (च.शा. १।६८)
दर्शनस्पर्शनप्रश्नैः परीक्षेत च रोगिणम्।
रोगी की परीक्षा—दर्शन (देखना), स्पर्शन (हाथ आदि से छूकर देखना) तथा रोग सम्बन्धी विविध प्रश्न पूछकर रोगी (रोग से पीड़ित शरीर वाले) की परीक्षा करनी चाहिए।
वक्तव्य—सुश्रुत ने ‘ततोऽप्रश्नेन चेति’। (सु.सू. १०।४) प्रारम्भ में रोगी देखने के सम्बन्ध में दूसरे किसी आचार्य का मत उद्धृत किया है कि ‘दूत, लक्षण, शकुन तथा मंगल की अनुकूलता होने पर रोगी के घर जाना चाहिए’। इस मत की सामान्य दृष्टि से उपेक्षा करते हुए वे कहते हैं—रोग जानने के छः उपाय हैं—पाँच श्रोत्र आदि इन्द्रियों से और छठा प्रश्न से।
२ अ० हू०
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अष्टाङ्गहृदय
आचार्य पुनर्वसु 'रसना इन्द्रिय' के परीक्षा का विषय किसी को नहीं मानते। देखें—'रसं तु... रसानुमिमीत'। (च.वि. ४।७) अर्थात् रोगी के शरीर का रस यद्यपि रसना इन्द्रिय द्वारा ग्रहण किया जा सकता है, परन्तु उसे अनुमान से ही जान लेना चाहिए। इसका प्रत्यक्ष उपाय से ग्रहण करना उचित नहीं है। अतएव रोगी से पूछकर उसके मुखा का स्वाद कैसा है, जान ले; जू यदि रोगी के शरीर से हट गयी हो तो रोगी के शरीर को नीरस समझ लें। प्रायः साफ-सुथरे परिवार के रोगियों में यह लक्षण नहीं पाया जाता, तथापि रोगियों के शरीरों में यह लक्षण दिखलायी देता है। मस्तिष्यों के बार-बार शरीर पर बैठने से शरीर की मधुरता समझें। रक्तपित्तरोग में निकलने वाले रक्त की परीक्षा—क्या यह जीवरक्त तो नहीं निकल रहा है, इसके लिए उसे कुत्ते या कौए के सामने डालें, यदि प्राणी खा ले तो उसे जीवरक्त समझें, अन्यथा रक्तपित्त का दूषित रक्त समझें। इस प्रकार अन्य रसों का भी अनुमान कर लेना चाहिए। यह २२वाँ पद्य अ.सं. १।४५ में अविकल द्रष्टव्य है।
रोगी-परीक्षा के आधुनिक उपकरण
१. थर्मामीटर—यह स्पर्श द्वारा शरीर के तापमान को बतलाता है। इसमें वात-पित्त-कफ दोषों को बतलाने की क्षमता नहीं होती है।
२. स्टेथोस्कोप—यह थोत्रेन्द्रिय का प्रतिनिधि यन्त्र है। इसकी सहायता से कफ से होने वाली हृदय की आवाज सुनी जा सकती है। ब्लडप्रेसर जोचने में भी चिकित्सक इसका उपयोग करते हैं।
३. एक्स-रे—यह चक्षुरिन्द्रिय का प्रतिनिधि यन्त्र है। त्वचा तथा मांस से ढकी हुई जिन अस्थियों या अस्थिभंग को हम अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते वहाँ यह यन्त्र सहायक होता है।
४. कार्डियोग्राम—हृदय-परीक्षा के लिए इसका उपयोग होता है। जो हृदय क्या कह रहा है, उसे यह टेढ़ी-सीधी रेखाओं द्वारा निर्दिष्ट कर देता है, तदनुसार चिकित्सक उसकी चिकित्सा करते हैं।
५. अल्ट्रासाउण्ड—यह स्थान-विशेष को चित्रित कर देता है, तदनुसार चिकित्सा की जाती है।
६. लिटमस पेपर—इसकी सहायता से हम मूत्र की धारता तथा अम्लता का ज्ञान कर लेते हैं।
७. सेक्रोमीटर—इससे मधुमेहरोगी के मूत्र की शंकरा नापी जाती है, इस दृष्टि से यह रसनेन्द्रिय का प्रतिनिधि यन्त्र है।
इस प्रकार के अन्य अनेक उपकरणों का इस क्षेत्र में आविष्कार होता जा रहा है, उन्हें भी देखें।
विशेष—नाडीज्ञान के लिए अभी तक जो यन्त्र अत्यधिक प्रयुक्त हुए हैं, वे अधिक श्रद्धेय नहीं हैं।
रोगं निदानप्रागुरुपलक्षणोपशयाप्तिभिः ॥ २२ ॥
रोग की परीक्षा—निदान, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय तथा सम्प्राप्ति नामक रोगज्ञान के उपायों से रोग की परीक्षा करनी चाहिए ॥ २२ ॥
बक्तव्य—यहाँ मात्र इनके नामों का उल्लेख कर दिया गया है। विशेष देखें—अ.हृ.नि.अ. १ में।
भूमिदेहप्रभेदेन देशमाहुरिह दिधा।
देशभेदों का वर्णन—आयुर्वेदीय दृष्टिकोण के अनुसार देश दो प्रकार का होता है—१. भूमिदेश और २. देहदेश। शरीर के विभिन्न अवयवों को यहाँ देहदेश कहा गया है। भूमिदेश का वर्णन आगे किया जा रहा है।
बक्तव्य—आयुर्वेदशास्त्र में प्रधान महत्त्व निदान एवं चिकित्सा का ही है। यहाँ ग्रन्थकार सूत्र रूप में विषयों का वर्णन कर आगे यथास्थान इन विषयों का विस्तृत विवेचन करेंगे। यह इनकी अपनी शैली है। देह शब्द देश के अर्थ में केवल आयुर्वेद में ही प्रयुक्त हुआ है। देहदेश का क्षेत्र है—सिर, हाथ, पैर आदि।
आयुष्कामीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
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जाङ्गलं वातभूमिच्छमनूपं तु कफोल्बणम् ॥२३॥ साधारणं सममलं त्रिधा भूदेशमादिशेत्।
भूमिदेश का वर्णन—भूमिदेश तीन प्रकार का कहा गया है—१. जांगल देश; यहाँ हवा अधिक बलती है, २. आनूप देश; इस देश में कफदोष की प्रधानता रहती है और ३. साधारण देश; इस देश में वात आदि तीनों दोष समान अवस्था में रहते हैं ॥ २३ ॥
वक्तव्य—‘भूमिदेशग्रहभेदेन’ से लेकर ‘भूदेशमादिशेत्’ तक की उक्त तीन पंक्तियाँ संग्रह तथा हृदय में समान हैं। इस प्रकार यहाँ संक्षेप में भूमिदेशों का वर्णन किया गया है। इनका विस्तृत वर्णन च. वि. ३।४५-४८, च. क. १।८ तथा सु. सु. के ३६६ में भूमिप्रविभागीय अध्याय में देखें। इन देशों का परिचय औषधसंग्रह, रोगनिर्णय तथा साध्य-असाध्य का विचार करते समय अवश्य कर लेना चाहिए। उक्त तीन प्रकारों के देश-विवेचन से समस्त भूमण्डल का विचार किया जा सकता है।
शाङ्कघराचार्य ने तीन प्रकार के देशभेदों की चर्चा इस प्रकार की है—‘बहुदकनगोऽनूपः कफमातुरोगवान्। जाङ्गलोऽल्याम्बुशाखी च पितामुङ्गमातुरोत्तरः ॥ संमृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः’। (शा. सं. पू. खं. ६४)
१. जाङ्गल देश—रूखा-सूखा मरुस्थल; जैसे—भारत का बीकानेर तथा जैसलमेर क्षेत्र तथा बाहरी प्रदेश अरब, अफ्रीका आदि। प्रायः ये जल तथा वृक्षरहित देश हैं। यहाँ पित्तज, रक्तज एवं वातज रोग अधिक होते हैं।
२. आनूप देश—त्रिपुल जल तथा पर्वतों से युक्त देश; जैसे—आसाम, ब्रह्मा तथा बंगाल की खाड़ी, नदी-नालों से व्याप्त भू-प्रदेश। यहाँ कफज तथा वातज रोग अधिक होते हैं।
३. साधारण देश—इसमें वात आदि सभी दोष सम रहते हैं, अतएव यहाँ अधिकांश रोग नहीं होते; फलतः यहाँ के निवासी अन्य देशवासियों की अपेक्षा स्वस्थ, सुन्दर, सुठिल शरीर वाले तथा नीरोग रहते हैं; जैसे—उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि के निवासी।
क्षणदिव्याध्यवस्था च कालो भेषजयोगकृत ॥ २४ ॥
काल के भेद—आयुर्वेद में काल दो प्रकार का माना जाता है—१. क्षण अर्थात् प्रातःकाल तथा सार्यकाल और २. रोग की अवस्था (आमावस्था एवं जीर्णावस्था)। इन दोनों कालों के अनुसार भेषजयोग (चिकित्सा का प्रयोग) किया जाता है ॥ २४ ॥
वक्तव्य—कोष-साहित्य में ‘क्षण’ शब्द दिन के विभाजन या प्रमाण में प्रयुक्त होता है। दूसरा यह ‘काल-विशेष’ का भी सूचक है। क्षणादि—यहाँ आदि शब्द से लब्ध (३६ निमेष का समय), बुटि (दो क्षण या क्षण के चतुर्थांश के बराबर काल), मुहूर्त (१२ क्षण का या ४८ मिनट का समय), याम (पहर या तीन घण्टे का समय), अहोरात्र (२४ घण्टे का समय या १ दिन १ रात), पक्ष (१५ दिन), मास (३० दिन), ऋतु (२ मास का समय), अयन (६ मास का समय) तथा वर्ष से १२ मासों का ग्रहण कर लेना चाहिए। इस कालभेद का प्रयोग शास्त्र में इस प्रकार देखा जाता है। जैसे—प्रातःकाल वमनकारक औषधयोग को देना चाहिए, मध्याह्न में विरेचन करना चाहिए, फिर कुछ समय रुक कर बस्ति का प्रयोग करना चाहिए आदि। इसके पहले जो देशभेद की व्याख्या की गयी थी, तदनुसार विचार कर अर्थात् यह किस देश का निवासी है, इसका आहार-विहार, रहन-सहन कैसा है, इसे क्या सात्व्य होगा, क्या असात्व्य होगा, यह सब विचार कर तब चिकित्सा करनी चाहिए। अतएव आगे औषध-प्रयोग की चर्चा प्रस्तावित है।
शोधनं शमनं चेति समासादीषधं द्विधा।
२०
अष्टाङ्गहृदये
औषध के भेद—संक्षिप्त रूप से औषध ( चिकित्सा ) दो प्रकार की होती है—१. शोधन अर्थात् वमन-विरेचन आदि विधियों से दोषों को निकालना शोधन कहा जाता है और २. शमन अर्थात् उभड़े हुए वात आदि दोषों को शान्त करने का उपचार।
बक्तव्य—शोधन-चिकित्सा से बड़े हुए दोषों को निकाल दिया जाता है एवं शमन-चिकित्सा द्वारा बड़े हुए दोषों को शान्त कर दिया जाता है। आयुर्वेदीक समस्त औषधों का समावेश शोधन तथा शमन औषधों में हो जाता है। उक्त श्लोक में जो 'औषध' शब्द का प्रयोग हुआ है, यहाँ इसका अर्थ है—'चिकित्सा'। देखें—च.सू. १०।३; च.वि. १।३ तथा अ.हृ.सू. के द्विविधोपक्रमणीय नामक १४वें अध्याय को भी इस प्रसंग में देखें।
शरीरजानां दोषाणां क्रमेण परमौषधम् ॥ २५ ॥
बस्तिविरको वमनं तथा तैलं घृतं मधु।
शारीरिक दोषों की चिकित्सा—शरीरसम्बन्धी दोषों की उत्तम चिकित्सा क्रमशः इस प्रकार है—वातदोष की चिकित्सा बस्ति-प्रयोग, पित्तदोष की चिकित्सा विरेचन-प्रयोग तथा कफदोष की चिकित्सा वमन-प्रयोग है तथा वातदोष में तैल, पित्तदोष में घृत और कफदोष में मधु का प्रयोग उत्तम शमन-चिकित्सा है ॥ २५ ॥
बक्तव्य—उक्त श्लोक द्वारा शारीरिक दोषों की संक्षिप्त चिकित्सा कही गयी है। इनका विस्तृत विवरण अ.हृ.सू. अध्याय १६ में स्नेहविधि, १८ में वमन एवं विरेचन विधि, १९ में बस्तिविधि को कहा गया है। अष्टांगहृदय का यह सूत्रस्थान है। आर्य आयुर्वेदीय संहिता-ग्रन्थों का यह प्राचीन विषय-विभागक्रम रहा है। इसमें यथासम्भव आयुर्वेद सम्बन्धी अर्थों की सूचना होती है। इसमें आयुर्वेद के सूत्रों को मणियों की भाँति गुँथा गया है और इन्हीं सूत्रों की अगले अध्यायों या स्थानों में विस्तृत व्याख्यान करने की इसमें प्रतिज्ञा की गयी है; अतः इसे 'सूत्रस्थान' कहा गया है। अतएव उक्त २५वाँ पद्य इसका एक उदाहरण मात्र है।
धीर्धैर्यत्मादिविज्ञानं मनोदोषोषधं परम् ॥ २६ ॥
मानसिक दोषों की चिकित्सा—मानसिक ( रजस् तथा तमस् ) दोषों की उत्तम चिकित्सा है—बुद्धि तथा धैर्य से व्यवहार करना और आत्मादि विज्ञान ( कौन मेरा है, क्या मेरा बल है, यह कौन देश तथा कौन मेरे हितैषी या सहायक हैं ) का विचार कर कार्य करना ॥ २६ ॥
बक्तव्य—नीति-उपदेश आचार्य चाणक्य ने कुल ऐसी ही स्थिति को ध्यान में रखकर यह पद्य कहा होगा—'कः कालः कानि मित्राणि को देशः को व्यायामो। कस्याऽहं का च मे शक्तिरिति चित्त्यं मुहुर्महुः' ॥ ( चाणक्यनीति )। बस्ति, विरेचन, वमन तथा तैल, घृत, मधु के प्रयोगों से क्रमशः वात, पित्त, कफ दोषों का शमन हो जाता है और बुद्धि, धैर्य आदि से रजोगुण एवं तमोगुण जनित रोग तथा क्रोध आदि की शान्ति हो जाती है।
भिषगद्रव्याण्युपस्थाता रोगो पादचतुष्टयम्। चिकित्सितस्य निर्दिष्टं, प्रत्येकं तच्चतुर्गुणम् ॥ २७ ॥
चिकित्सा के चार पाद—चिकित्सा-कर्म के चार पाद ( चरण या विभाग ) माने जाते हैं। जैसे—१. भिषक् ( वैद्य या चिकित्सक ), २. द्रव्य ( सैनफल आदि वमनकारक अर्थात् शोधन द्रव्य, गुरुच आदि शमन द्रव्य तथा बस्ति आदि शोधन उपकरण ), ३. उपस्थाता ( उप समीपे तिष्ठतीति )—परिचारक ( जो रोगी के पास में रहकर उसकी देख-भाल करे; उसे उठाये, बैठाये, खिलाये, पिलाये तथा मल-मूत्र करने में सहायता करे ) और ४. रोगी। इन चारों में प्रत्येक में चार-चार गुण होने चाहिए ॥ २७ ॥
दक्षतीर्थतित्ताश्चाप्यो दूषकर्मा शुचिभिषक्।
आयुष्कामीवाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
२१
वैद्य के चार लक्षण—१. दक्ष (चिकित्सार्क में कुशल), २. तीर्थ (आचार्य) से शास्त्र (आयुर्वेदशास्त्र) के अर्थ को ग्रहण कर चुका हो। ३. दृष्टकर्मा (चिकित्सा की विधियों को जो अनेक बार देख चुका हो) और ४. जो शुचि (शरीर तथा आचरण से पवित्र) हो।
बहुकल्पं बहुगुणं सम्पन्नं योग्यमौषधम् ॥ २८ ॥
औषध-द्रव्य के चार लक्षण—१. बहुकल्प (जो स्वरस, क्वाथ, फाण्ट, अवलेह, चूर्ण आदि अनेक रूपों में दिया जा सकता) हो, २. बहुगुण (जो औषध के सभी गुणों से सम्पन्न) हो, ३. सम्पन्न (अपने गुणों की सम्पत्ति से जो युक्त) हो और ४. योग्य (जो रोग-रोगी, देश, काल आदि के अनुकूल) हो ॥ २८ ॥
अनुरक्तः शुचिर्दक्षो बुद्धिमान् परिचारकः ।
परिचारक (उपस्थाता) के चार लक्षण—१. अनुरक्त (रोगी से स्नेह रखने वाला), २. शुचि (खान-पान, औषधि खिलाने, रखने आदि में साफ-सफाई रखने वाला), ३. दक्ष (कुशल) तथा ४. बुद्धिमान् (समयचित्त सूक्ष्म-बूझ वाला) होना चाहिए।
आदृढो रोगी भिषग्वश्यो ज्ञापकः सत्त्ववानपि ॥ २९ ॥
रोगी के चार लक्षण—१. आदृढ (धन-जन आदि से सम्पन्न), २. भिषग्वश्य (वैद्य की आज्ञानुसार औषध तथा पथ्य सेवन करने वाला), ३. ज्ञापक (अपने सुख-दुःख कहने में सक्षम) तथा ४. सत्त्ववान् (मानसिक शक्तिसम्पन्न अर्थात् चिकित्साकाल में होने वाले कष्टों से न घबड़ाते वाला) हो ॥ २९ ॥
बक्तव्य—चरक-सूत्रस्थान अध्याय ९ का नाम 'बुद्धाडकचतुष्पाद' है। इस सम्पूर्ण अध्याय में वैद्य, द्रव्य, परिचारक तथा रोगी इन्हीं चिकित्सा के चार पादों का वर्णन किया गया है, इसे देखें। इसके अगले दसवें अध्याय में मैत्रेय की शंकाओं का अन्रैय पुनर्वसु द्वारा जो समाधान दिया है, वह भी ध्यान देने योग्य है।
चिकित्सा के चार पादों में वैद्य सब में उत्तम (प्रधान) होता है, क्योंकि यदि वैद्य नहीं है तो अन्य तीन पाद गुणवान् होने पर भी अपना-अपना कार्य ठीक प्रकार से नहीं कर पाते। अतएव चिकित्सक को (च.सू. १।१० में) विज्ञाता, शासिता, योक्ता तथा प्रधान कहा गया है। इन विशेषणों का तात्पर्य है—१. विज्ञाता अर्थात् औषधियों का जानकार, २. शासिता—परिचारक या परिचारकों से समयोचित कार्य कराने में सक्षम एवं कुशल और ३. योक्ता—रोगी को यह खाओ, यह पीओ आदि व्यवस्था देने में चतुर। इस प्रकार औषध-द्रव्य आदि तीनों वैद्य के अधिकार में रहते हैं। इनमें विज्ञाता विशेष ज्ञानवान् होने के कारण वैद्य प्रधान एवं स्वतन्त्र होता है।
अष्टांगसंग्रह-सूत्रस्थान २।८-९ में सुयोग्य वैद्य के तथा श्लोक १२ में राजवैद्य के लक्षण दिये हैं। इसी प्रसंग में श्लोक १० में कुवैद्य के भी लक्षण सामाजिकों के परिचर्याय दिये गये हैं, इन्हें देखें। शाङ्गधराचार्य ने जो वैद्य के लक्षण दिये हैं, वे मनीय हैं—'तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयं कृती। लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपरकरभेषजः ॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्दिमान् व्यवसायी प्रियेवदः। सत्यधर्मपरो यश्च वैद्य ईदृक् प्रशस्यते' ॥ (शा.सं.पू.खं. ३।२३-२४) अर्थ स्पष्ट है।
रोगी के गुणों में एक गुण 'ज्ञापक' है—जिसका अर्थ है—अपनी बात को जो ठीक प्रकार से कह सके। बालक रोगी में यह शक्ति नहीं होती, अतएव चिकित्सक को उसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए। उसकी विधि वाग्भट ने अ.हू.उ. २ में बतलाई है, आप ध्यान दें।
चिकित्सा के चार पादों (पैरों) का यहाँ वर्णन किया गया है। इसका आशय है कि वह (चिकित्सा) अपने बल पर खड़ी रह सके, गतिशील हो और सफल हो। यदि कोई पाद कम पड़ जायेगा तो वह डगमगाने लगेगा, अतः चिकित्साकाल में चारों पादों की व्यवस्था सतर्कता से होनी चाहिए।
(साध्योऽसाध्य इति व्याधिर्द्विधा, तौ तु पुनर्द्विधा।
सुसाध्यः कुञ्च्यसाध्यश्च, याप्यो यश्चानुपक्रमः ॥ )
२२
अष्टाङ्गहृदये
सर्वोपधक्षमे देहे यूतः पुंसो जितात्मनः। अमर्मगोऽल्पहेत्वग्ररूपरूपोऽनुपद्रवः ॥ ३० ॥ अतुल्यदृष्यदेशतृप्रकृतिः पादसम्पदि। ग्रहेष्वनुगुणेष्वेकदोपमार्गो नवः सुखः ॥ ३१ ॥
साध्य-असाध्य के अनुसार व्याधि के भेद—१. साध्य तथा २. असाध्य इस प्रकार रोग के दो भेद होते हैं। इनके भी पुनः दो भेद होते हैं—१. सुखसाध्य एवं २. कुन्त्र (कष्ट) साध्य। इसके बाद असाध्य के पुनः दो भेद होते हैं—१. याप्य (कुछ दिन चिकित्सा द्वारा चलाने योग्य) और २. अनुपक्रम अर्थात् चिकित्सा के अयोग्य या प्रत्याश्रयेय (जवाब देकर चिकित्सा करने योग्य) ॥ १ ॥
सुखसाध्य रोग के लक्षण—जिस रोगी का शरीर सभी प्रकार की चिकित्साविधियों को सहन करने में समर्थ (सक्षम) हो, जो युवक (बालक या बृद्ध न) हो, जो जितेन्द्रिय हो, जिसका रोग किसी मर्मस्थल में उत्पन्न न हुआ हो, जिस रोग के उत्पादक हेतु (कारण), पूर्वरूप, रूप आदि थोड़े एवं सामान्य (उग्र न) हों, जिसमें अभी तक कोई उपद्रव पैदा न हुए हों तथा जिसमें दूष्य, देश, ऋतु एवं प्रकृति समान न हों, चिकित्साकाल में उक्त चारों पाद अपने-अपने गुणों से सम्पन्न हों; सूर्य-चन्द्र आदि ग्रह अनुकूल हों, रोग एक दोष से उत्पन्न हों, एकमार्गिणी हो (जैसे रक्तपित्तरोग—‘ऊर्ध्व साध्यम्’) और रोग नया हो ॥ ३०-३१ ॥
वक्तव्य—यद्यपि यह कोष्ठांकित पद्य अष्टांगसंग्रह-सूत्रस्थान अध्याय २।२६ का है, फिर भी यह प्रसंगोचित है, अतएव कुछ विद्वान् इसका यहाँ भी संग्रह करते हैं।
रोग के भेदों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ साध्य रोगी के स्वरूप का विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है—‘सर्वोपधक्षमे देहे’ अर्थात् जो तीक्ष्ण, मध्य, मृदु सभी प्रकार की औषधियों को तथा शोधन-शमन चिकित्सा में प्रयुक्त विष-क्षार आदि द्रव्यों के प्रयोगों को सहन कर सके। इसके आगे ‘श्रीअरुणदत्त’ कहते हैं—‘पुंसो न स्त्रियाः’। ‘पुण्ग्रहणं स्त्रीनिवृत्त्यर्थम्’। यह विचार उनका केवल इस अंश में माना जा सकता है कि पुरुष-शरीर से स्त्री-शरीर ‘मृदु’ होता है, अन्यथा चिकित्सा-क्षेत्र में पुरुष शब्द से प्राणिमात्र का ग्रहण किया जाता है। आप देखें—‘खादयश्चैतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः’ ॥ (च.शा. १।१६) और भी—‘वेदानामामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः’ ॥ (च.शा. १।३६) रोगों की साध्यता एवं असाध्यता का विचार हम स्त्री-शरीर में भी करेंगे। जितात्मनः —जिसने अपनी इन्द्रियों के साथ आत्मा को जीत लिया है अर्थात् जिसे विषयों के उपभोग की प्रवृत्ति न हो। अमर्मगः —जो रोग मर्मों (प्राणहर मर्मों—सिर, हृदय, बस्ति आदि) में उत्पन्न न हुआ हो। अनुपद्रवः —वर्तमान में उत्पन्न रोग के बाद जो दूसरा रोग उत्पन्न हो जाता है, उसे ‘उपद्रव’ कहते हैं, उससे रहित अर्थात् पूर्व चिकित्सा में जो बाधक हो। अतुल्यदृष्यदेशतृप्रकृतिः —अतुल्य = जो रोग के समान न हो। जैसे दूष्य—मेदस् तथा मज्जा में उत्पन्न रोग, अनुपदेश में जाड़े में उत्पन्न रोग। रोगी वातप्रकृति का हो और उसका पित्तदोष प्रकृपित हो तो सुखसाध्य होता है। अतुल्यदृष्य—शीतगुण-प्रधान कफ से उष्णगुण-प्रधान रक्त का दूषित होना। अतुल्यदेश रोग—अनुपदेश में पित्तदोष से उत्पन्न रोग। अतुल्यऋतु—शरद ऋतु में कफज रोग। अतुल्यप्रकृति—पित्तप्रकृति वाले पुरुष को कफज रोग की उत्पत्ति। ये सुखसाध्य के लक्षण हैं।
कहाँ चिकित्सा क्षेत्र में विपरीत स्थिति के भी दर्शन होते हैं। यथा—‘ज्वरे तुल्यतृदोषत्वं प्रमेहे तुल्य-दृष्यता। रक्तगुलेषु पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम्’ ॥ अर्थ स्पष्ट है। पादचतुष्टय की उपलब्धि भी चिकित्सा-सौकर्य में सहायक होती है। ग्रहेष्वनुगुणेषु—आयुर्वेद का ज्योतिषशास्त्र से घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतएव अनुकूल ग्रह-नक्षत्र आदि की चर्चा यहाँ की गयी है। एकदोषमार्गः—तीनों में से किसी एक दोष का होना। द्विदोषज, त्रिदोषज रोग उत्तरोत्तर कष्टसाध्य तथा असाध्य होते हैं। मार्ग तीन प्रकार के कहे गये हैं—१. बाह्य, २. अन्तर, ३. मध्य। नवः—प्रायः नये रोग सुखसाध्य होते हैं। वे ही रोग विलम्ब कर देने से कष्टसाध्य हो जाते हैं। अतएव कहा गया है—‘सुखसाध्यः सुबोपायः कालेनाल्पेन साध्यते’।
आयुष्कायीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
२३
शस्त्रादिसाधनः कृच्छ्रः सङ्कृते च ततो गदः।
कष्टसाध्य रोग के लक्षण—कुच्छ्र शब्द का अर्थ है—कष्ट। कष्टसाध्य वे रोग होते हैं जिनमें शस्त्र, धार, अग्नि (दाह) कर्म तथा विष आदि के प्रयोग किये जाते हैं। जिन रोगों में ऊपर कहे गये सुखसाध्य के लक्षण संकर (मिले-जुले) हों अर्थात् पूर्णरूप से विद्यमान न हों।
शेषत्वादायुपो याप्यः पथ्याभ्यासाद्विपर्यये ॥ ३२ ॥
याप्य रोग के लक्षण—उम रोग को 'याप्य' कहते हैं जिसमें पूर्वोक्त सुखसाध्य के लक्षणों से विपरीत लक्षण हों, किन्तु आयु के शेष (बचे) रहने के कारण तथा पथ्य (हितकर) आहार-विहार तथा औषध (यथायोग्य चिकित्सा) के अभ्यास (लगातार सेवन) करने के कारण रोगी बल-फिर सक रहा हो ॥ ३२ ॥
वक्तव्य—'याप्य' चिकित्सा की वह स्थिति है जिसे चिकित्सक पूर्ण रूप से स्वस्थ कर देना चाहता है, किन्तु ऐसा कर नहीं सकता और यह चिकित्सा तब तक चल सकती है जब तक रोगी की आयु शेष है। इसके सम्बन्ध में विशेष विवरण देखें—'दत्त्वाऽल्य'-'हितैः'। (अ.सं.सू. २।३१-३२) अर्थात् जो रोग उचित चिकित्सा करने तथा पथ्य सेवन करते रहने से कुछ शान्त रहता है, उसे 'याप्य' कहते हैं। व्याकरणशास्त्र में 'याप्य' का अर्थ कुत्सित या निन्दिता है। देखें—याप्ये पाशष् (अ. ५।३।४७)।
अनुपक्रम एव स्यात्पित्तोऽत्यन्तविपर्यये। औत्सुक्यमोहारतिकृद् दृष्टिरष्टोऽक्षताशनः ॥ ३३ ॥
प्रत्याख्येय रोग के लक्षण—उम रोग को 'अनुपक्रम' भी कहते हैं जो सुखसाध्य लक्षणों से अत्यन्त विपरीत हो और जो औत्सुक्य, मोह तथा अरति (बेचैनी) लक्षणों वाला हो, जिसमें अरिष्ट लक्षण दिखलायी दे रहे हों एवं जिसमें ज्ञानेन्द्रियों का नाश हो गया हो ॥ ३३ ॥
वक्तव्य—उक्त ३३वें श्लोक में कहे गये सभी लक्षण असौम्य रोग के हैं। आप भी लक्षणों पर ध्यान दें। 'औत्सुक्य' भाव को आप रोगी में इस प्रकार देखेंगे—अधिक प्रसन्न होना या उठ-उठ कर दौड़ना आदि या मोह, बेहोशी, प्रलप (अंट-संट बकना) आदि। 'अरति' (बेचैनी), हाथ-पाँव का पटकना या सिर को घुमाते रहना। 'दृष्टिरष्टः'—जिसमें अरिष्ट (मृत्युकारक) लक्षण दिखलायी दे रहे हों। आयुर्वेद में 'रिष्ट' तथा अरिष्ट दोनों शब्द समानार्थक हैं। 'अक्षनाशनः'—अक्ष का अर्थ है ज्ञानेन्द्रियाँ, इनकी क्रियाशक्ति का जिस रोगी में नाश हो गया हो अर्थात् जो संज्ञाशून्य हो गया हो। उत्तम चिकित्सक घर के लोगों से उसके रोग की विषम (असाध्य) स्थिति को बतला कर उसकी चिकित्सा न करे। देखें—च.सू. १०।८। इस अध्याय में श्लोक ९ से २२ तक का अवश्य अवलोकन करें। देखें—इस विषय में महर्षि चरक ने अपने शब्दों में किस प्रकार कहा है?
त्यजेदार्ता भिषग्भूपैर्द्विष्टं तेषां द्विष्टं द्विषम्। हीनोपकरणं व्यग्रमविधेयं गतायुषम् ॥ ३४ ॥
चण्डं शोकातुरं भीरुं कृतघ्नं वैद्यमानिनम्।
त्याज्य रोगों—चिकित्सक को चाहिए कि निम्नलिखित प्रकार के रोगियों की चिकित्सा न करे—१. जिससे राजा या महान् जन्य द्रष्ट करता हो और जो स्वयं अपना द्रष्टी हो, २. जो राजाओं (श्रीमानों) से द्रष्ट करता हो, ३. वैद्य से द्रष्ट करता हो, ४. जिसके पास चिकित्सा के उपयोगी साधन न हों, ५. जो व्यग्र हो अर्थात् जो चिकित्सा कराने में सक्रिय न हो, इधर-उधर भटकता रहता हो, ६. जो रोगी चिकित्सक की आज्ञा के अनुसार चलना स्वीकार न करता हो, ७. जो गतायु हो (इसका ज्ञान ज्योतिषी आदि से किया जा सकता है) अर्थात् जो अब अधिक समय तक जीवित नहीं रहेगा, ८. जो अत्यन्त क्रोधी हो, ९. शोकातुर अर्थात् जो पुत्र-स्त्री-धन आदि के नाश से दुःखी हो, १०. जो भीरु (डरपोक) हो अर्थात् जो पञ्चकर्म आदि क्रियाओं से डरता हो, ११. कृतघ्न अर्थात् जो दूसरों द्वारा किये उपकार को न मानता हो और १२. जो वैद्यमानी हो अर्थात् जिसमें वैद्य का ज्ञान न हो, फिर भी अपने को वैद्य समझता हो ॥ ३४ ॥
२४
अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—इन त्याज्य रोगियों के लिए सरकारी अस्पताल बने हैं, अतः व्यक्तिगत चिकित्सक इन झंझतों में न पड़ें; यह शास्त्रीय उद्बोधन है। इनसे अपयश तो मिल सकता है किन्तु धर्म, अर्थ, यश की प्राप्ति नहीं हो सकती। महर्षि बरक ने भी प्रकारान्तर से इनकी चिकित्सा करने का निषेध किया है। देखें—ज.सि. २।४-६। इसी के आगे ७वें पद्य में कहा है—‘एभ्योऽन्ये समुपक्रम्या नराः सर्वैरुपक्रमैः’। वाभट ने अ.सं.सू. २।३४ में कहा है—पहले रोग की परीक्षा कर ले, तभी चिकित्सा करना प्रारम्भ करे।
तन्त्रस्यास्य परं चातो वक्ष्यतेऽध्यायसङ्ग्रहः ॥ ३५ ॥
अध्यायसंग्रह-वर्णन—अब यहाँ से सम्पूर्ण अष्टांगहृदयतन्त्र के अध्यायों के संग्रह का वर्णन किया जा रहा है ॥ ३५ ॥
बक्तव्य—यह क्रम संहिता के स्त्रियताओं का अथवा तन्त्रकारों का अन्यत्र भी देखा जाता है। ‘अतः परं’ इसके बाद तथा ‘अस्मात् ऊर्ध्व’ इसके आगे। इस प्रकार का संकेत तन्त्रकार अपने ग्रन्थ, संहिता या तन्त्र में किया करते हैं।
आयुष्कामदिनत्वीहरोपानुत्पादनद्रवाः । अन्नजानानन्नसंस्मात्राद्रव्यरसाश्रयाः ॥ ३६ ॥
दोषादिज्ञानतद्वेदतन्त्रचिकित्साद्वयुपक्रमः । शुद्ध्यादिस्नेहनस्वेदकास्थापनपावनम् ॥ ३७ ॥
धूम्रगण्डूषद्वृत्केतुत्पित्यन्त्रकशस्त्रकम् । शिराविधिः शल्यविधिः शस्त्रक्षाराश्रिकर्मिकौ ॥ ३८ ॥
सूत्रस्थानमिमेऽध्यायस्त्रिंशत्—
सूत्रस्थान के अध्याय—सूत्रस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. आयुष्कामीय, २. दिनचर्या, ३. ऋतुचर्या, ४. रोगानुत्पादनीय, ५. द्रवद्रव्यविज्ञानीय, ६. अन्नस्वरूपविज्ञानीय, ७. अन्नरक्षाध्याय, ८. मात्रा-शिलीय, ९. द्रव्यादिविज्ञानीय, १०. रसभेदीय, ११. दोषादिविज्ञानीय, १२. दोषभेदीय, १३. दोषोपक्रमणीय, १४. द्विविधोपक्रमणीय, १५. शोधनादिगणसंग्रह, १६. स्नेहविधि, १७. स्वेदविधि, १८. वमन-विरेचनविधि, १९. वस्तिविधि, २०. नस्यविधि, २१. धूम्रपानविधि, २२. गण्डूषादि विधि, २३. आश्वतोत्तनाञ्जनविधि, २४. तर्पण-पुष्टपाकविधि, २५. यन्त्रविधि, २६. शस्त्रविधि, २७. सिराव्यधविधि, २८. शल्यारहरणविधि, २९. शस्त्रकर्मविधि तथा ३०. क्षाराश्रिकर्मविधि। ये अध्याय सूत्रस्थान में हैं ॥ ३६-३८ ॥
—शारीरमुच्यते । गर्भविक्रान्तितद्व्यापदङ्गमर्मविभागिकम् ॥ ३९ ॥
विकृतिर्दूतजं षष्ठं—
शारीरस्थान के अध्याय—शारीरस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. गर्भविक्रान्ति, २. गर्भव्यापद, ३. अङ्गविभाग, ४. मर्मविभागीय, ५. विकृतिविज्ञानीय तथा ६. दूतादिविज्ञानीय। ये अध्याय शारीरस्थान में हैं ॥ ३९ ॥
—निदानं सार्वरोगिकम् । ज्वरासुकृत्वासयश्मादिमदाघशोऽतिसारिणाम् ॥ ४० ॥
मूत्राघातप्रमेहाणां विद्रध्याचुदरस्य च । पाण्डुकुष्ठानिलार्तानां वाताघ्नस्य च षोडश ॥ ४१ ॥
निदानस्थान के अध्याय—निदानस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. सर्वरोगनिदान, २. ज्वरनिदान, ३. रक्तपित्तकासननिदान, ४. श्वासहिकानिदान, ५. राजयश्मानिदान, ६. मदात्ययनिदान, ७. अशोनिदान, ८. अतिसारग्रहणीरोगनिदान, ९. मूत्राघातनिदान, १०. प्रमेहननिदान, ११. विद्रधिबृद्धि-गुल्म-निदान, १२. उदररोगनिदान, १३. पाण्डुरोगशोफविसर्पनिदान, १४. कुष्ठश्वित्रक्रिमिनिदान, १५. वातव्याधि-निदान तथा १६. वातशोणितनिदान। ये अध्याय निदानस्थान में हैं ॥ ४०-४१ ॥
चिकित्सितं ज्वरे रक्ते कासे श्वासे च यक्षमणि । वमो मदात्ययेऽश्वः सु, विशि द्वौ, द्वौ च मूर्त्रिते ॥ विद्रधी गुल्मजठराण्डुशोफविसर्पिषु । कुष्ठश्वित्रानिलव्याघिवाताग्नेषु चिकित्सितम् ॥ ४३ ॥
द्वारविशतिरिमेऽध्यायाः—
आयुष्कार्याध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
२५
चिकित्सितस्थान के अध्याय—चिकित्सितस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. ज्वर, २. रक्तपित्त, ३. कास, ४. श्वासहिका, ५. राजयश्मादि, ६. छर्द्विद्वद्गोतुष्णा, ७. मदात्ययादि, ८. अर्शसां चिकित्सित, ९. अतिसार, १०. ग्रहणीरोग, ११. मूत्राघात, १२. प्रमेह, १३. विद्विघ्नद्विष्ट, १४. गुल्म, १५. उदर, १६. पाण्डुरोग, १७. श्वयशु, १८. विसर्प, १९. कुष्ठ, २०. शिवबक्रिमि, २१. वातव्याधि तथा २२. वातशोणित। ये अध्याय चिकित्सितस्थान में हैं। ४२-४३ ॥
—कल्पसिद्धिरतः परम्। कल्पो वमेविरैकस्य तत्सिद्धिर्बस्तिकल्पना ॥ ४४ ॥
सिद्धिर्बस्थापदां षष्ठो द्व्यकल्पः—
कल्प-सिद्धिस्थान के अध्याय—कल्प-सिद्धिस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. वमनकल्प, २. विरेचनकल्प, ३. वमनविरेचनसिद्धि, ४. बस्तिकल्प, ५. बस्तिव्याप्तिसिद्धि तथा ६. भेषजकल्प। ये अध्याय कल्प-सिद्धिस्थान में हैं। ४४ ॥
—अत उत्तरम्। बालोपचारे तद्व्याधौ तद्वग्ने, द्वौ च भूतगे ॥ ४५ ॥
उन्मादेऽथ स्मृतिभ्रंशे, द्वौ द्वौ वर्त्तसु सन्धिषु। दूकमोलिङ्गनाशेषु त्रयो, द्वौ द्वौ च सर्वगे ॥ ४६ ॥
कर्णनासामुखशिरोब्रणै, भङ्गे भगन्दरे। ग्रन्थ्यादौ शुद्धरोगेषु गुह्यारोगे पुण्यद्वयम् ॥ ४७ ॥
विषे भुजङ्गे कीटेषु मूषकेषु रसायने। चत्वारिशोऽनपत्यानामध्यायो बीजपोषणः ॥ ४८ ॥
उत्तरस्थान के अध्याय—उत्तरस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. बालोपचरणीय, २. बालामयप्रतिषेध, ३. बालग्रहप्रतिषेध, ४. भूतविज्ञानीय, ५. भूतप्रतिषेध, ६. उन्मादप्रतिषेध, ७. अपस्मार-(स्मृतिभंश)प्रतिषेध, ८. वर्त्तसुगविज्ञानीय, ९. वर्त्तसुगप्रतिषेध, १०. सन्धिस्तितासितरोगविज्ञानीय, ११. सन्धिस्तितासितरोगप्रतिषेध, १२. दृष्टिरोगविज्ञानीय, १३. तिमिरप्रतिषेध, १४. लिङ्गनाशप्रतिषेध, १५. सर्वाशिरोगविज्ञानीय, १६. सर्वाकिरोगप्रतिषेध, १७. कर्णरोगविज्ञानीय, १८. कर्णरोगप्रतिषेध, १९. नासा-रोगविज्ञानीय, २०. नासारोगप्रतिषेध, २१. मुखरोगविज्ञानीय, २२. मुखरोगप्रतिषेध, २३. शिरोरोगविज्ञानीय, २४. शिरोरोगप्रतिषेध, २५. ब्रणविज्ञानीय, २६. सद्योब्रणप्रतिषेध, २७. भङ्गप्रतिषेध, २८. भगन्दरप्रतिषेध, २९. ग्रन्थि-अर्बुद-श्लोपद-अपची-नाडीविज्ञानीय, ३०. ग्रन्थि-अर्बुद-श्लोपद-अपची-नाडी-प्रतिषेध, ३१. शुद्धरोगविज्ञानीय, ३२. शुद्धरोगप्रतिषेध, ३३. गुह्यारोगविज्ञानीय, ३४. गुह्यारोगप्रतिषेध, ३५. विषप्रतिषेध, ३६. सर्पविषप्रतिषेध, ३७. कीटलूताद्विप्रतिषेध, ३८. मूषिकलार्कविषप्रतिषेध, ३९. रसायनाध्याय तथा ४०. वाजीकरणध्याय। ये अध्याय उत्तरस्थान में हैं। ४५-४८ ॥
इत्यध्यायशतं विशं षड्भिः स्थानैरुदीरितम् ॥
इति श्रीबैष्णवपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने आयुष्कामीयो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अष्टांगहृदय के छः स्थान—इस प्रकार सम्पूर्ण अष्टांगहृदय के १२० अध्यायों की नाम-गणना उक्त (१. सूत्र, २. शरीर, ३. निदान, ४. चिकित्सित, ५. कल्प-सिद्धि तथा ६. उत्तर नामक) छः स्थानों में कर दी गयी है। ४८ ॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
‘निर्मला’ हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान में
आयुष्कामीय नामक पहला अध्याय समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
अथातो दिनचर्याध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से दिनचर्या नामक अध्याय का वर्णन करेंगे, इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था ॥ १ ॥
उपक्रम —दिनचर्या शब्द से रात्रिचर्या, ऋतुचर्या आदि का भी ग्रहण कर लिया जाता है। दिनचर्या शब्द में इतने अर्थ छिपे हैं—'दिने-दिने चर्या, दिनस्य चर्या किं वा दिनानां चर्या = दिनचर्या'। इस प्रकार परिभाषित करने पर उक्त सभी अर्थों का इसमें समावेश हो जाता है। इस अध्याय में उन आचरणों की चर्चा की जायेगी जो नर-नारी के लिए दोनों लोकों में हितकर होती है। हमारा यह आयुर्वेद इस लोक और परलोक को मानता है। आपको इसके अनेक प्रमाण मिलेंगे, अस्तु। विशेष देखें—इसी अध्याय के ४८वें पद्य को।
निरुक्ति —गति तथा भक्षण अर्थ में प्रयुक्त चरू धातु से यत् + टापू प्रत्यय करने पर चर्या शब्द निष्पन्न होता है। इसका अर्थ है—आहार-विहार तथा आचरण विधि।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. ५, ७, ८; सु.चि. २४ तथा अ.सं.सू. ३ में देखें।
ब्राह्मो मूर्हते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः ।
ब्राह्मामूर्हते में जागना —स्वस्थ (नीरोग) स्त्री-पुरुष को अपनी आयु (मुखायु-हितायु) की रक्षा करने के लिए प्रातःकाल ब्राह्मामूर्हते में उठना चाहिए।
वक्तव्य —ब्राह्मामूर्हते—रात के पिछले पहर की दो घड़ी या दो दण्ड। श्रीअरुणदत्त ब्राह्मामूर्हते की व्याख्या करते हुए कहते हैं—'रात्रेश्वतुर्दशो मूर्हते ब्राह्मो मूर्हतेः', किन्तु 'मूर्हतेचिन्तामणि' के विवाह-प्रकरण में दिये गये ५३वें पद्य में दिया गया रात्रि का १४वां मूर्हते 'त्वाष्ट्र' है, जिसका स्वामी चित्रा नामक नक्षत्र है। हाँ, आठवें मूर्हते का नाम 'ब्रह्मा' है, जो प्रसंगोचित नहीं है। इसके अगे वे कहते हैं—'ब्रह्म—ज्ञानं तदर्थमध्यनाद्यापि ब्रह्म, तस्य योग्यो मूर्हते ब्राह्मः'। यह व्याख्या युक्तियुक्त प्रतीत होती है। अन्यत्र कहा गया है—'रात्रेस्तु पश्चिमो यामो मूर्हते ब्राह्म उच्यते'। यह नियम केवल स्वस्थ पुरुष के लिए है। सूर्योदय से पहले रात्रि के अन्तिम पहर की चार घड़ियों को 'ब्राह्मामूर्हते' माना गया है। सुश्रुत ने केवल 'उत्थायोत्थाय सततं' (सु.चि. २४३) में प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर, इतना ही कहा है।
शरीरचिन्तां निर्वर्त्य कृतशौचविधितस्ततः ॥ १ ॥
अर्कन्यग्रोधविदरकरञ्जककुभादिजम् । प्रातर्भुक्त्वा च मृद्वग्रं कपायकटुतिक्तकम् ॥ २ ॥ कनीन्यग्रसमस्थौल्यं प्रगुणं द्वादशाङ्गुलम् । भक्षयेद्भुतपवनं दन्तमांसात्म्यबाधयन् ॥ ३ ॥
दतवन का विधान —उठते ही शरीर की चिन्ता से निवृत्त होकर अर्थात् मैं उठने योग्य हूँ या नहीं—ऐसा विचार करके यदि वह अपने को दिनचर्या करने योग्य समझे तब वह शौचविधि (मल-मूत्र त्याग कर मल-मूत्र स्थानों को मिट्टी, जल आदि से शुद्ध करने के बाद अर्क, बरगद, बैर या बबूल, करञ्ज (डिठोरी), ककुभ (अर्जुन) आदि वृक्षों में से किसी की पतली शाखा को लेकर दतवन (दातौन) करे।
दिनचर्चाध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
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दतवन करने के दो समय होते हैं—१. प्रातःकाल और २. भोजन कर लेने के बाद। इससे मूष की मलिनता दूर होती है और भोजन करने के बाद दांतों या मसूड़ों में फंसे हुए अन्नकण आदि निकल जाते हैं।
दतवन करने की विधि —दतवन के अगले भाग को दांतों से चबाकर अथवा कूटकर मुलायम कर लेना चाहिए, नहीं तो उसकी रगड़ मसूड़ों में लग सकती है। इस (दतवन) का रस कठौला (खैर या बबूल का जैसा) या कटु (तेजबल या तिमूर का जैसा) अथवा तिक्त (नीम का जैसा) होना चाहिए। इसकी मोटाई कनीनिका (सबसे छोटी पांचवीं अंगुली) के समान तथा लम्बाई बारह अंगुल होनी चाहिए। इस प्रकार की दतवन को लेकर दांतों पर इस प्रकार घिमें जिससे मसूड़ों पर खरोश न लगे और दांत स्वच्छ हो जायें ॥१-३॥
बक्तव्य —वामभट ने 'अर्क' (मदार) की दतवन करने का विधान किया है, तथापि दूध सहित इसकी शाखा को मुख में न डाले, अन्यथा मुख पक जायेगा, घाव हो जायेगे। अतः इसकी बाहरी लंबा को छीलकर तथा पानी से धोकर ही इसका दतवन के लिए प्रयोग करें। आजकल अनेक चूर्णों तथा मञ्जनों का दांत साफ करने के लिए प्रयोग होने लगा है। इसका प्रयोग अंगुली या ब्रश से किया जाता है, अतः ब्रश का मुलायम होना अति आवश्यक है। दूसरी ओर 'कोलोट' आदि ट्यूपेस्टों का प्रयोग चल पड़ा है। जहाँ उचित गुण वाली दतवन सुलभ नहीं है वहाँ मुलभ विकल्पों का प्रयोग कर लेना चाहिए। ध्यान रहे—दांत जिससे साफ हों, मसूड़ों को हानि न पहुँचे उसका उपयोग करें। इसका प्रयोग करने से मुखरोग नहीं होते और मुख साफ बना रहता है।
शुश्रुत ने चि.२४४-१२ में जो मधुर रस वाली दतवन का विधान किया है, उसका तात्पर्य है—मुखपाक (सर्वसर) या मुखदाह आदि पित्तज विकारों में इसका प्रयोग करना चाहिए। इसके अतिरिक्त ऐसे अवसरों पर फिटकर का चूर्ण डालकर तैलगण्डूष भी अत्यन्त हितकर होता है।
जिह्वानिलेखन —इस प्रसंग में दतवन कर लेने के बाद जीभी का प्रयोग भी कर लेना चाहिए। इसका वर्णन चरक, शुश्रुत, वामभट (अष्टांगसंग्रह) ने किया है, किन्तु अष्टांगहृदय में नहीं हुआ है। इसकी हम सुश्रुतोक्त विधि कह रहे हैं—जीभ को साफ करने (उसमें जमे हुए मैल को खुरचने) के लिए सोने, चाँदी या लकड़ी की जीभी बनवा लेनी चाहिए। आजकल बाजार में ताँबा या स्टील की भी जीभी मिलती है। दतवन करने वाले उसी को दांतों से चिर कर जीभी बना लेते हैं। वास्तव में यह जीभी 'वाक्षी' (वृक्ष से सम्बन्धित) है। इस विषय को च.सू. ५।७४-७५ में देखें।
नाद्यादजीर्णवमयुधसासकासज्वरादिति। तुष्णास्पपाकहृन्नेत्रशिरःकर्णामयी च तत्॥४॥
दतवन का निषेध —अजीर्ण होने पर, छिद्रिरोग में, श्वासरोग में, कासरोग में, ज्वररोग में, अर्दित (मुख का लकवा) रोग में, तुधारोग में, मुखपाकरोग में, हृदयरोग में, नेत्ररोग में, शिरोरोग में तथा कर्णरोग में दतवन न करें ॥४॥
बक्तव्य —दतवन करने की क्रिया को आयुर्वेदशास्त्र में दो नामों से कहा गया है—१. दन्तपवन और २. दन्तधवन। इनमें 'पवन' का अर्थ है—पवित्र करना और 'धवन' का अर्थ है—धोना या साफ करना। अष्टांगसंग्रह-सू. ३।२०-२२ में निषिद्ध दतवनों का परिगणन इस प्रकार विस्तार से किया है—१. ल्मिओडा, २. रौठा, ३. बहेडा, ४. धव, ५. करौर, ६. बबूल, ७. सम्भालू, ८. महजन, ९. लोध, १०. तैन्तू, ११. कचनार, १२. शमी, १३. पीलू, १४. पीपल, १५. इंगुदी (हिगोट), १६. गुगल, १७. फरहद, १८. इमली, १९. मोच, २०. सफेद शाल्मली, २१. सेमल तथा २२. शप (सनई) की दतवन न करें। इनके अतिरिक्त जिन वृक्षों का रस मीठा, खट्टा अथवा नमकीन हो उनकी भी दतवन न करें। जो दतवन सूखी, खोखली, दुर्गन्धयुक्त तथा लसीली हो उसका भी निषेध किया है और पलाश तथा विजयसार की दतवन एवं खड़ाऊं का परित्याग करें।
२८
अष्टाङ्गहृदये
सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्षोस्ततो भजेत्।
अञ्जन-प्रयोग—मुखशुद्धि करने के बाद प्रतिदिन सौवीर अञ्जन को आँखों में लगाना चाहिए। यह आँखों के लिए हितकर होता है।
बक्तव्य—सुवीर (सिन्धु) देश में प्राप्त होने वाला यह अञ्जन (काला सुरमा) आँखों के लिए हितकर होता है। इसका विशेष विवेचन देखें—अ.सं.सू. २२।७-८। स्वस्थ आँखों में प्रतिदिन लगाने वाले अञ्जन को प्रत्यञ्जन कहते हैं। श्रीभावमिश्र ने इस सौवीराञ्जन को 'सफेद सुरमा' स्वीकार किया है। यह काला सुरमा से अधिक सौम्य होता है। इन दोनों सुरमों का प्रयोग नेत्रप्रसादन के लिए किया जाता है। सुश्रुत ने भी इस अञ्जन की प्रशंसा की है। देखें—सु.चि. २४।८-१९।
वक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषात् श्लेष्मतो भयम्॥५॥
योजयेत्सप्तरात्रेऽस्मात् प्रावणार्थं रसाञ्जनम्।
रसाञ्जन-प्रयोगविधि—प्रावण अञ्जन का प्रयोग चक्षु (आँख) तेजोमय अर्थात् अग्निगुण-प्रधान अवयव है। उसे (चक्षु को) विशेष करके शीतगुण-प्रधान कफ का भय रहता है। अतएव आँख से कफदोष को निकालने के लिए सप्ताह में एक बार रसाञ्जन का प्रयोग अवश्य करना चाहिए॥५॥
बक्तव्य—उक्त रसाञ्जन के साप्ताहिक प्रयोग से आँखों में से संचित कफदोष निकल जाता है, अतः कफदोषजनित कोई भी नेत्ररोग नहीं हो पाता। विशेष करके काच (मोतियाबिन्द) रोग का भय नहीं रहता है। सुश्रुत ने 'काच' रोग को 'नीलिका' तथा 'लिंगनाश' भी कहा है। देखें—सु.उ. ७।१८। 'काच' को सफेद मोतिया और 'नीलिका' को नीला या काला मोतिया भी कहते हैं। यह कफदोष आँख में संचित होते-होते मोती जैसा दिखलायी देता है, तब इसे मोतियाबिन्द कहते हैं। आपरेशन करके निकालने के बाद यह आकार में मसूर की दाल जैसा होता है। चरक ने उक्त प्रावणांजन का प्रयोग प्रतिदिन या पाँचवें अथवा आठवें दिन करने की सलाह दी है। चरक ने अंजन-प्रयोग का समय रात्रि में बतलाया है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जब प्रतिदिन लगाये जाने वाले अंजन को छोड़कर प्रातःकाल रसाञ्जन का प्रयोग किया जायेगा तब प्रतिदिन लगाये जाने वाले अंजन को रात में लगाना चाहिए, यह चरक के वचन का अभिप्राय है। इसी प्रसंग में मनु ने कहा है—'मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनमञ्जनम्। पूर्वाहि एव कुर्वीत देवतानाञ्च पूजनम्'॥ (मनु० ४।५२) यहाँ 'मैत्रं' का अर्थ है—सूर्य की आराधना, उपासना या पूजा। इसलिए रसवत अथवा किसी प्रावण अंजन का प्रयोग सदा करता रहे।
ततो नावनगणद्वृषधूमताम्बूलभागभवेत्॥६॥
नस्य आदि सेवन-निर्देश—अंजनप्रयोग करने के बाद नस्य (सुंधनी), गणद्वृष (कुल्ली, देखें—बृहत् हिन्दी-कोश), धूम्रपान तथा ताम्बूल का सेवन करें॥६॥
बक्तव्य—उक्त नस्य आदि की विस्तृत सेवनविधियाँ क्रमशः इस प्रकार अष्टांगहृदय में दी गयी हैं। देखें—१. नस्यसेवनविधि अ.हृ.सू. २०।१-२। धूम्रपानविधि वहीं २१ तथा ३. गणद्वृषादि विधि वहीं २२। ताम्बूलभक्षण की विस्तृत विधि अ.सं.सू. ३।३६-३८ देखें।
ताम्बूल-सेवनविधि—भोजन के प्रति इच्छा अधिक हो, मुख स्वच्छ एवं सुगन्धित रहे, ऐसी इच्छा रखने वाले को धुला-धुलाकर पान खाना चाहिए। इसे भोजन की भाँति मुख में रखकर तत्काल निगलना नहीं चाहिए। पान के मसाले—जावियाँ, जायफल, लौंग, कपूर, पिपरमेण्ट, कंकोल (शीतल चीनी), कटुक (लताकस्तूरी के बीज) तथा इसमें सुपारी के भिगाये हुए टुकड़े भी रखें। इस प्रकार सेवन करने से पान हृदय को प्रिय लगता है और यह शक्तिवर्धक होता है। इसका सेवन सौकर उठने के बाद स्नान एवं भोजन करने के बाद तथा वमन करने के पश्चात् करना चाहिए। एक बार में अधिक-से-अधिक दो बीड़ा पान लें, जिसमें चूना, कल्या लगा हो और सुपारी के टुकड़े पड़े हों।
दिनचर्याध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
२९
विशिष्ट अवसर—राजसम्मान, विद्वत्सम्मान, रतिकाल, युद्ध आदि में जाते समय इसके सेवन का विशेष महत्त्व है। अन्य अवसर भी अनेक हैं, उन्हें लोकव्यवहार से समझें।
सेवनविधि—पान के जड़ की डण्डी और आगे का भाग काट देना चाहिए, तभी उसमें कृता-कल्याण सुगंधी आदि मसाले डालकर मुख में लें। इसकी पहली पीक को थूककर फिर इसका रसपान करते रहें। सुर्ती आदि आधुनिक मसाले हानिकर होते हैं, इनसे दंत कमजोर हो जाते हैं और इनसे मुख का अल्सर होता देखा गया है। देखिए 'भावप्रकाश'—'दिनचर्या-प्रकरण'।
ताम्बूलं क्षतपित्तस्रद्धश्लोकुपितचक्षुषाम्। विषमूर्च्छाभदार्तानामपथ्यं शोषिणामपि ॥७॥
ताम्बूलसेवन-निषेध—ऊपर छठे पद्य में ताम्बूल का सेवन सभी को करना चाहिए, ऐसा निर्देश करने के बाद अब यहाँ इसका सेवन किनको नहीं करना चाहिए, इस विषय का निर्देश किया जा रहा है—क्षत तथा उरःक्षत से पीड़ित, पित्तविकार, रक्तविकार (रक्तपित्त) से पीड़ित, हृद्द शरीर वाले, नेत्ररोगी, विषविकार से पीड़ित, मूर्च्छा एवं भदाल्य आदि रोगों से पीड़ित तथा शोषरोगी को ताम्बूल का सेवन नहीं करना चाहिए ॥७॥
वक्तव्य—ताम्बूलसेवन का निषेध जिन रोगियों के लिए किया गया है, उसमें कारण हैं—ताम्बूलपत्र के वे गुण-धर्म होते हैं—तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रुचिकारक, कषाय, सर, तित्तक, क्षारीय गुणयुक्त, चरपरा तथा लघु। यह कामवासना, रक्तधातु तथा पित्तधातु को बढ़ाता है। इसका अधिक सेवन करना एक प्रकार का दुर्घसन है। इसे भूले पेट में तथा शौच के अन्त में कदापि सेवन न करें।
अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं, स जराश्रमवातहा। दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुःस्वप्नसुत्वक्त्वदादर्घकृत् ॥८॥
अभ्यङ्गसेवन-विधान—प्रतिदिन अभ्यंग (मालिश) करना या कराना चाहिए, क्योंकि वह जरा (बुढ़ापा), श्रम (थकावट) तथा वातज विकारों को नष्ट करता है, दृष्टि को स्वच्छ करता है, शरीर को पुष्ट करता है, आयु को बढ़ाता है, गहरी नींद लाता है, त्वचा के सौन्दर्य को स्थिर बनाये रखता है और मांसपेशियों को दृढ़ एवं सुडील (गठीली) बनाता है ॥८॥
वक्तव्य—अभ्यंग = मालिश, उबटन, फोहा रखना, कान में तेल डालना तथा लेप लगाना, इसे अलंकरण भी कहा गया है। इसका विस्तृत क्षेत्र इस प्रकार है—दंतों या आँखों पर तेल लगाना, स्नेहमिश्रित काजल लगाना, स्नेहमय लेप या महहम लगाना आदि। उक्त विषय के लिए देखें—सु.सू. २१।१० तथा सु.चि. २४।३०-३७। साथ ही उक्त श्लोकों पर आचार्य डल्हन द्वारा लिखी गयी टीका को भी देखें। अभ्यंग के लिए घी से आठ गुना अधिक तेल लाभदायक होता है, अवसर-विशेष पर घी आदि अन्य स्नेहों द्वारा भी मालिश की जाती है।
सुश्रुत-चि. २४।३० श्लोक पर की गयी आचार्य डल्हन की टीका में अभ्यंग के सम्बन्ध में ये तीन पद्य मिलते हैं—'रोमान्तेष्वनुदेहस्य स्थित्वा मात्राशतत्रयम्। ततः प्रविशति स्नेहश्चतुर्भिर्गच्छति त्वचाम् ॥ रक्तं गच्छति मात्राणां शतैः पञ्चभिरेव तु। षड्भिर्मांसं प्रपद्येत मेदः मत्तभिरेव च ॥ शतैरष्टाभिरेस्थीनि मज्जानं नवभिर्ब्रजैतु। तत्रास्याञ्च शमयेद्वोगान् वातपित्तकफात्मकान् ॥ अर्थात् प्राचीन विद्वानों का अनुमान है और अभ्यंगप्रिय पहलवानों का अनुभव है कि अभ्यंग द्वारा प्रयोग किया गया तेल ३०० मात्रा समय तक वह रोमकूपों में रहता है; फिर ४०० मात्रा समय तक त्वचा में, फिर ५०० मात्रा समय तक रक्त में, फिर ६०० मात्रा समय तक मांस में, ७०० मात्रा समय तक मेदस् में, ८०० मात्रा समय तक अस्थि में और ९०० मात्रा समय तक मज्जा में व्याप्त होकर उन-उन धातुओं में उत्पन्न वातज, पित्तज तथा कफज रोगों को शान्त कर देता है। उक्त डल्हन कृत टीका से मालिश के सम्बन्ध में उद्धृत श्लोकों में व्याकरण की दृष्टि ये प्रयोग महत्त्वपूर्ण हैं। देखें—त्वचाम्, रक्तं, मांसं, मेदः, अस्थीनि तथा मज्जानं। आप ध्यान दें—'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे द्वितीया' (अ. २।३।५) सूत्र के नियमानुसार 'त्वचाम्' आदि प्रयोग बतला
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अष्टाङ्गहृदये
रहे हैं कि मालिश ऐसी होनी चाहिए कि मसलते-मसलते उस तेल का अत्यन्त संयोग उन-उन घातुओं तक हो जाय, तभी मालिश का पूरा-पूरा लाभ मिलता है।
यहाँ जो ३०० तथा ५०० आदि मात्रा शब्द का प्रयोग किया है, इस मात्रा नामक काल की अवधि का प्रमाण है—हृस्व स्वर अ, इ या उ आदि किसी एक को उच्चारण करने में जितना समय लगता है, उतने मात्र समय को कालविभागज्ञों ने 'मात्रा' कहा है। ध्यान दें—मात्रा हृस्व, दीर्घ तथा प्लुत भेद से तीन प्रकार की होती है। यहाँ केवल हृस्व स्वर वाली मात्रा से तात्पर्य है। अश्र्यंग का रहस्य पहलवान लोग जानते हैं, वे बड़े चाव से मालिश करते तथा कराते हैं और उसका लाभ भी उठाते हैं। अश्र्यंग कराने वाले को चर्मरोग कभी नहीं होते हैं।
शिरःश्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत्।
अश्र्यंग के प्रमुख स्थान—अश्र्यंग सम्पूर्ण शरीर में करना चाहिए, यह आठवें पद्य में कह दिया है। अब अश्र्यंग के विशेष स्थलों का निर्देश किया जा रहा है। यथा—सिर, कानों तथा पैरों के तलुओं में विशेष रूप से अश्र्यंग करना चाहिए।
वक्तव्य—यहाँ 'शीलयेत्' क्रिया का अर्थ है—'अश्र्यसेत्' अर्थात् बार-बार इसका अभ्यास करे। इस निर्देश की गुणवत्ता वाग्भट ने अष्टांगसंग्रह-सू. ३।५१-६० में इस प्रकार बतलाई है—'सिर पर तेलमालिश करते रहने से वह केशों का हित करता है अर्थात् उन्हें बढ़ाता है, मुखायम तथा चिकना बनाये रखता है। इससे शिरः कपालस्थियों और इन्द्रियों ( आंख, कान, नाक ) का तर्पण होता रहता है। कान के छेद में गुनगुना तेल डालते रहने से हनुमन्धियों ( गण्ड, कर्ण, श्रव, वर्त्म, नेत्र तथा हनु से सम्बन्धित ११ अस्थियों ) का, मन्त्राओं ( गरदन के अलग-बगल में दिखलायी देने वाली दोनों ओर की धमनियों ) का, सिर तथा कानों का शुल शान्त हो जाता है। पैरों पर अश्र्यंग करते रहने से पाँवों में स्थिरता आती है, निद्रा आती है और दृष्टि प्रसन्न रहती है। पैरों का मुन पड़ जाना, श्रम, स्तम्भ ( जकड़न ), सिकुड़न, विवाई फटना—ये कष्ट दूर हो जाते हैं।
वज्योऽभ्यङ्गः कफप्रस्तकृतसंशुद्धजोर्णिभिः ॥९॥
अश्र्यंग का निषेध—प्रतिशय आदि कफज विकारों से पीड़ित रोगी, जिन्होंने शरीरशुद्धि के लिए वमन-विरचन आदि किया हो तथा जो जोर्णरोग से ग्रस्त हों, वे अश्र्यंग का प्रयोग न करें ॥९॥
वक्तव्य—शास्त्रीय विचार विधि-निषेधमय होते हैं, क्योंकि उनके निर्देश सभी अवस्थाओं के लिए दिये जाते हैं, अतएव वे सर्वांगीण होते हैं। इस प्रकरण में सबसे पहले प्रतिदिन अश्र्यंग करने का सामान्य निर्देश दिया था, यह निषेधात्मक निर्देश विशेष परिस्थिति के लिए है। सुश्रुत का अनुसरण करने वाले आचार्य हेमाद्रि ने कहा है—'कृतसंशुद्धस्तदहरेव निषिद्धः'। अर्थात् जिसने वमन आदि का जिस दिन प्रयोग किया हो उस दिन अश्र्यंग न करे। इसी विषय को स्पष्ट रूप से सुश्रुत ने चिकित्सास्थान २।४।३५-३७ में कहा है।
लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मैदसः क्षयः। विभक्तघनपात्रत्वं व्यायामादुपजायते ॥१०॥
व्यायाम का विधान—व्यायाम करने से कार्य करने की शक्ति बढ़ती है, जठराग्नि या पाचकाग्नि प्रदीप्त होती है, मेदम् ( स्थूलता ) का क्षय होता है अर्थात् मोटापा घटता है, अंग-प्रत्यंग ( मांसपेशियों ) स्पष्ट दिखलायी देते हैं और वे ठोस हो जाते हैं ॥१०॥
वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह में इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है—'शरीरायामजनकं कर्म व्यायाम उच्यते'। ( अ.सं. ३।६२ ) अर्थात् जिससे शरीर में थकावट पैदा हो, उसे 'व्यायाम' कहते हैं। इस परिभाषा से सभी शारीरिक परिश्रम व्यायाम कहे जा सकते हैं, किन्तु भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में व्यायाम की परिभाषा इस प्रकार है—'शरीरचेष्टा या चेष्टा स्वीयार्थं बलवर्द्धिनी। देहव्यायामसङ्ख्याता मात्रया तां समाचरेत्' ॥ ( च.सू. ७।३१ ) अर्थात् जो भी शरीर की चेष्टा ( कर्म ) अपने मन को अच्छी लगे, जो शरीर को स्थिरता
दिनचर्याध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
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प्रदान करती हो और बल को बढ़ाती हो, उसे 'व्यायाम' कहते हैं। उसे मात्रा के अनुसार करना चाहिए। यह व्यायाम की परिभाषा सर्वोत्तम है।
संसार में व्यायाम के अनेक प्रकार देखे जाते हैं, वे भी विभिन्न दृष्टियों से व्यायाम ही हैं। यथा—दण्ड, बैठक, शीर्षासन, कुश्ती, तैरना, हाकी, क्रिकेट आदि। इसी प्रसंग में आगे कहा जायेगा कि किनको व्यायाम नहीं करना चाहिए। पहलवान बनने की इच्छा हो तो उत्तम (पौष्टिक) खान-पान की व्यवस्था होनी चाहिए। जो प्रत्येक नर-नारी घरेलू कार्य करते हैं उनसे भी थकावट आती ही है, किन्तु वास्तव में इनकी गणना व्यायाम के रूप में नहीं होती। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक श्रम अति आवश्यक है।
वातपित्तामयी बालो वृद्धोऽजीर्णी च तं त्यजेत्।
व्यायाम का निषेध —वातज तथा पित्तज रोगों से पीड़ित रोगी, बालक, वृद्ध तथा अजीर्णरोग से पीड़ित मनुष्य 'व्यायाम' न करें।
बक्तव्य —यहाँ बालक तथा वृद्ध के लिए व्यायाम करने का निषेध किया है, अतः इनकी आयुसीमा का निर्देश करते हुए वारम्भट के टीकाकार श्री अरुणदत्त कहते हैं—'बालः आपोऽशवर्षात्', 'वृद्धः सप्ततैरुद्ध्वम्' अर्थात् सोलह वर्ष तक की अवस्था वाला बालक कहा जाता है और सत्तर वर्ष से ऊपर की अवस्था वाला वृद्ध होता है।
अर्धशक्त्या निषेव्यस्तु बलिभिः स्निग्धभोजिभिः ॥ ११ ॥
शीतकाले वसन्ते च, मन्दमेव ततोऽव्यदा।
अर्धशक्ति तथा काल-निर्देश —बलवान् तथा स्निग्ध (घी-तेल आदि से बने हुए तथा बादाम, काजू आदि) पदार्थों को खाने वाले मनुष्य शीतकाल (हेमन्त-शिशिर ऋतु) में एवं वसन्त ऋतु में आधी शक्ति भर व्यायाम करें, इससे अन्य ऋतुओं में और भी कम व्यायाम करें ॥ ११ ॥
बक्तव्य —अर्धशक्ति का परिचय—व्यायाम करते-करते हृदयस्थान में स्थित वायु जब मुख की ओर आने लगे अर्थात् जब व्यायाम करने वाला हाँफता हुआ मुख से साँस लेने लगे तो यह बलाघर्ष या अर्धशक्ति का लक्षण है। इस स्थिति में यह सोच लेना चाहिए कि इस समय आधा बल समाप्त हो चुका है। देखें—सु.चि. २४४७। और लक्षण भी देखें—काँखों में, माथे पर, नासिका के ऊपर, हाथों-पैरों तथा सभी मधियों में पसीना आने लगे और मुख सूखने लगे तब समझना चाहिए कि आधी शक्ति समाप्त हो चुकी है। उस समय व्यायाम करना छोड़ दें। स्वयं बैठकर अपने शरीर के अवयवों को मसलें। सर्दी के दिनों में अर्धशक्ति पर्यन्त व्यायाम करने की शास्त्र की आज्ञा है, उसके बाद और भी कम व्यायाम करना चाहिए, यही 'मन्दमेव' शब्द का अभिप्राय है।
तं कृत्वाऽनुसुखं देहं मर्दयेच्छ समन्ततः ॥ १२ ॥
शरीरमर्दन-निर्देश —व्यायाम के बाद का कर्म—व्यायाम कर लेने के बाद सम्पूर्ण शरीर का अनुलोम सुखद मर्दन कर्म चारों ओर से करना चाहिए अथवा क्रमशः सभी अंगों को मसलना चाहिए ॥ १२ ॥
बक्तव्य —सुश्रुत के टीकाकार जैज्जट का कथन है कि मर्दन (मसलना) यह क्रिया भी व्यायाम का ही एक अंग है। यह मर्दन कर्म भी ऐसा न हो जो शरीर को कष्टकारक हो, अतएव महर्षि वारम्भट ने इसका एक विशेषण 'अनुसुखं' दिया है अर्थात् जो सुख के अनुकूल हो।
तृष्णा क्षयः प्रतमको रक्तपित्तं श्रमः क्लमः। अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिविश्व जायते ॥
अतिव्यायाम से हानि —अधिक व्यायाम करने से प्यास का लगना, क्षय (राजयक्ष्मा), प्रतमक श्वास, रक्तपित्त, श्रम (थकावट), क्लम (मानसिक दुर्बलता या मुस्ती), कास, ज्वर तथा छर्दि (वमन) आदि रोग हो जाते हैं अथवा हो सकते हैं ॥ १३ ॥
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अष्टाङ्गहृदये
वक्तव्य —प्रायः देखा गया है कि जो बहुत दिनों तक व्यायाम करते रहे, बाद में जिन्होंने एकाएक व्यायाम करना छोड़ दिया, उन्हें वृद्धावस्था में आमवात, ऊहस्तम्भ, अर्शरोग ( बवासीर ) अथवा अण्डवृद्धि ( पोता का बढ़ जाना ) आदि रोग हो जाते हैं।
व्यायामजागराध्वस्तीहास्यभाष्यादि साहसम् । गजं सिंहं इवाकर्पन् भजन्नति विनश्यति ॥ १४ ॥
व्यायाम आदि का निषेध —व्यायाम, जागरण, मार्गगमन, मैथुन, हैसना, बोलना ( जोर-जोर से चिल्लाना ) तथा साहसिक कार्य का अधिक सेवन करने से शक्ति युक्त मनुष्य का भी उस प्रकार विनाश हो जाता है जैसे सिंह अपने द्वारा मारे हुए हाथी को खींचकर ले जाने का दुःसाहस करता है, तो वह स्वयं मर जाता है ॥ १४ ॥
वक्तव्य —व्यायाम आदि का युक्तियुक्त सेवन सुखद होता है, किन्तु इनका अधिक सेवन न करे, यही ग्रन्थकार का अभिप्राय है। इसीलिए शक्तिमान् सिंह भी यदि अपने द्वारा मारे गये हाथी को खींचकर ले जाना चाहेगा तो वह भी मर जायेगा। यह एक दुःसाहस का उदाहरण है। जागरण ( रात में अधिक जागना ), अधिक मार्ग चलना, जो कभी नहीं चलता उसके लिए थोड़ा चलना भी बहुत है, इस प्रकार विचार कर लें। ऐसे ही अन्य उदाहरण भी हैं। दुःसाहस का अधिक प्रयोग करने से उरःक्षत हो जाता है।
अधिक व्यायाम करने से 'क्षय' हो जाता है, यह ऊपर कहा गया है। तन्त्रकार की एक अपनी शैली होती है, वह है—सूत्र तथा व्याख्यान शैली। क्षय या राज्यक्षमा के सम्बन्ध में महर्षि पुनर्वसु के उद्गार—'राज्यक्षमा रोगसमूहानाम्' तथा 'अयथाबलमारम्भः प्राणोपरोधिनाम्' । ( च.सू. २५।४० ) उक्त १४ वें श्लोक का आधार है—'व्यायाम'... 'मात्रया' ( च.सू. ७।३४ )।
उद्भूतं कफहरं मेदसः प्रविलायनम् । स्थिरीकरणमङ्गानां त्वचप्रसादकरं परम् ॥ १५ ॥
उबटन के गुण —व्यायाम के बाद उबटन करना चाहिए, इससे कफ का नाश होता है। यह मेदोघातु को पिघला कर उसे मुखा देता है, अंगों को स्थिर ( मजबूत ) करता है और त्वचा को कान्तियुक्त करता है ॥ १५ ॥
वक्तव्य —जो या चना का आटा अथवा सरसों को पीसकर उसमें तेल तथा हल्दी मिलाकर शरीर पर मसलने को उद्भूतन, उत्सादन या उबटन कहा जाता है। इस विधि से रोमकूपों में जमी हुई मैल भलीभाँति निकल जाती है। इससे त्वचा चिकनी तथा कोमल हो जाती है। इसका प्रयोग छोटे बच्चों के शरीर पर भी किया जाता है। इसके बाद गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए। परन्तु इस वैज्ञानिक युग में ये सात्विक सुख कहीं सुलभ है ?
दीपनं वृष्यमायुष्यं स्नानमूर्जाबलप्रदम् । कण्डूमलश्रमस्वेदतन्नातुइदाहपाभजित् ॥ १६ ॥
स्नान के गुण —स्नान करने से जठराग्नि प्रदीप्त होता है, यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ) है, आयु को बढ़ाता है, उत्साहशक्ति तथा बल को बढ़ाता है; कण्डू ( खुजली ), मल ( त्वचा का मैल ), थकावट, पसीना, ऊँचाई, प्यास, दाह ( जलन ) तथा पाप ( रोग ) का नाश करता है ॥ १६ ॥
वक्तव्य —स्नान करने से ऊपर जिन लाभों का वर्णन किया है, उनका यहाँ स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जा रहा है। स्नान वृष्य है, देखें—अ.हू.उ. ४०।३५। स्नान कर लेने से मन प्रसन्न होता है, अतः यह वृष्य है।
उष्णाम्बुनाऽधःकायस्य परिषेको बलावहः । तेनैव तूतमाङ्गुस्य बलहृत्केशचक्षुषाम् ॥ १७ ॥
उष्ण-शीत जलप्रयोग —उष्ण ( गरम ) जल से अधःकाय ( गरदन से नीचे के शरीर ) का परिषेक ( स्नान ) बल को बढ़ाता है। यदि उसी ( गरम जल ) से सिर को घोया जाय अर्थात् गरम पानी से शिरःस्नान किया जाय तो इससे बालों तथा आँखों की शक्ति घटती है ॥ १७ ॥
दिनचर्याध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
३३
स्नानमर्दितनेत्रास्यकर्णरोगातिसारिषु। आध्यानपीनसाजोर्णभुक्तवत्सु च गृहितम्॥१८॥
स्नान का निवेश— अर्दित ( मुखप्रदेश का लकवा ), नेत्ररोग, मुखरोग, कर्णरोग, अतिसार, आध्यान ( अफरा ), पीनस, अजीर्ण रोगों में तथा भोजन करने के तत्काल बाद स्नान करना हानिकारक होता है॥१८॥
वक्तव्य— स्नान करने के बाद बालों को मुँह अंगोछा से पोछकर उनमें तेल लगाकर कंघी कर लें और स्वच्छ वस्त्रों को धारण करें। दिनचर्या के अनेक कृत्यों का उल्लेख इसमें नहीं हो पाया है, उन्हें आप चरक-सुश्रुत से संग्रह कर लें। अ.सं.अ. ३ में दिनचर्या से सम्बन्धित अन्य अनेक विषय दिये गये हैं, आप उन्हें भी देखें।
जोर्णं हितं मितं चाद्यान्न वेगनीरयेद्वलात्। न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान्नजित्वा साध्यमामयम्॥
भोजन आदि कर्तव्य— स्नान कर लेने के बाद तथा पहले किये हुए भोजन के पच जाने के पश्चात् जो हितकर भोजन हो उसे मात्रा के अनुसार खाये; मूत्र, पुरीष के वेगों को बलपूर्वक न उभाईं। यदि मल-मूत्र का वेग मालूम पड़े तो उन्हें दबाकर अन्य कर्मों में न लग जाय। साथ ही यदि किसी प्रकार का साध्यरोग हो तो उसकी चिकित्सा किये बिना भी किसी दूसरे कार्य में नहीं लग जाना चाहिए॥१९॥
वक्तव्य— स्मृतियों में कथित दिनचर्या से आयुर्वेदीय दिनचर्या सर्वथा भिन्न है और होनी भी चाहिए, क्योंकि दोनों के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं। स्मृतिनिर्दिष्ट चर्या मनु. ४।१२-१३ में आप ही देखिए—कहाँ स्नान के बाद सन्ध्या और कहीं सीधे भोजन, वह भी जब पहले का पच गया हो। हितं मितं— हितकारक वह भोजन है जिसमें धारण तथा पोषण करने की शक्ति हो। देखें—'डुधाद्धारपोषणयोः' धातु से त्त प्रत्यय जोड़कर बना हुआ शब्द—धा + त्त + हित। इसके बाद ऋतु, देश, काल का विचार करके जो साल्प्य हो, उसे हित कहते हैं। मितं—नपा-तुला, परिमित या थोड़ा। 'न वेगितोऽन्यकार्यः स्यात्—'इस विषय का विशेष व्याख्यान आप चरकसंहिता सू.अ. ७ में विस्तारपूर्वक देखें। अथवा अ.हृ.सू. अध्याय ४ का अवलोकन करें। 'नजित्वा साध्यमामयम्—'यह वाग्भट का उपदेश विशेष करके आशुकारी रोगों के लिए है। अन्यथा प्रमेह तथा अर्श ( बवासार ) आदि अनेक रोग ऐसे हैं, जिनमें रोगी चिकित्सा के साथ अन्य कार्यों को भी करता ही रहता है। यदि साध्य एवं आशुकारी रोगों की उपेक्षा कर रोगी अन्य कार्य करने लगता है, तो वह रोग असाध्य हो सकता है। भोजनविधि का वर्णन अ.सं.सू. ३।७६-८० तक को भी देख लें। यह भोजनविधि का आर्य स्वरूप है।
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः। सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत्॥२०॥
सुख का साधन धर्म— सभी प्राणी चाहते हैं कि हमें सुख मिले, अतएव उनकी प्रवृत्तियाँ ( कार्य करने की लगन ) सुख पाने के लिए होती है और सुख की प्राप्ति धर्म के बिना नहीं होती। अतः सभी को धर्म-कार्य करने में तत्पर रहना चाहिए॥२०॥
वक्तव्य— धर्म शब्द को लेकर धार्मिक नेताओं तथा राजनीतिक नेताओं ने बड़ा हंगामा चलाया है, अस्तु। वास्तव में प्राणिमात्र का यह धर्म है कि वह अपनी तथा अपने उपकारक पदार्थों की रक्षा करे। इसमें किसी को किसी प्रकार का मतभेद नहीं है। इसी प्रकार की व्युत्पत्ति हमारे शास्त्रचिन्तकों ने धर्म शब्द की की है। देखें—'प्रियते लोकः अनेन इति धर्मः' अथवा 'धरति लोकम् असौ इति धर्मः'। आज वास्तविक धर्म का आचरण न करने के कारण देश में जो दुर्बलथा फैली है, इसको कोई नहीं देख रहा है। मनु आदि धर्माचार्यों ने धर्म का आचरण करने की सभी को आज्ञा दी है तथा सभी के अलग-अलग धर्मों का उपदेश दिया है। संक्षेप में इन स्थलों का अवलोकन करें। मनु. २।१२, २।११२. ४।२३८, २४१, २४२; ६।९२, ८।१५ तथा १७। उक्त उद्धरणों के अतिरिक्त महामानव मनु ने 'धर्म' शब्द की एक परिभाषा और भी दी है—'सत्तेर्केणाऽनुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतः'। ( मनुः १।२।०६ ) अर्थात् जो तर्कबुद्धि से अनुसन्धान ( विचार ) करता है, वही धर्म को समझता है, यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है—'अतर्क्यं वै
३ अ० हू०