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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३६ बोल सकते हैं। इसी प्रकार काश्मीरी में, शुक आदि विहंगों की भाषा में और प्राकृत में भी कृष्ण बड़े ही वाचाल हैं।" उसने गोपियों से विस्मय व्यक्त किया कि इतनी भाषाओं को बोलने में श्रीकृष्ण इतने दक्ष कैसे हो गए। ८. सत्यवाक् जिस पुरुष का वचन कभी झूठा सिद्ध न हो, वह सत्यवाक् कहा जाता है। कृष्ण ने एक बार पाण्डवों की माता को वचन दिया था कि वे उसके पाँचों पुत्रों को कुरुक्षेत्र की रणभूमि से जीवित लौटा लायेंगे। युद्ध के अन्त में पाँचों पाण्डवों के घर वापस आ जाने पर कुन्ती ने अपने वचन को सत्य करने के लिए श्रीकृष्ण की स्तुति की। वह बोली, "सूर्य भले ही शीतल हो जाय और चन्द्रमा भले ही उष्ण हो जाय पर फिर भी हे मुरारि ! आपका वचन असत्य नहीं हो सकता।" इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण भीम- अर्जुन के साथ जरासन्ध से युद्ध करने गये तो उन्होंने उसे स्पष्ट कह दिया कि दो पाण्डवों सहित छद्मवेष में वहाँ उपस्थित हुए वे स्वयं सनातन पुरुषोत्तम कृष्ण हैं। श्रीकृष्ण तथा भीम-अर्जुन क्षत्रिय थे। जरासन्ध भी क्षत्रिय था और इसलिए ब्राह्मणों को उदारता से दान देता था। अतः जरासन्ध के वध की योजना बनाकर श्रीकृष्ण भीम-अर्जुन के साथ ब्राह्मण वेष में उसके पास गए। उदारदानी जरासन्ध ने उनसे अपना अभीष्ट माँगने को कहा तो उन्होंने उससे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की। उसी समय श्रीकृष्ण ने घोषित किया कि ब्राह्मण-वेष में वे उसके सदा के शत्रु ही आए हैं। ६. प्रियभाषी जो अपने शत्रु को भी प्रिय वचनों से शान्त कर सकता है, वह पुरुष प्रियभाषी है। श्रीकृष्ण तो प्रियभाषण की अवधि ही हैं। यमुना जल में कालिय नाग का मान-मर्दन करके उन्होंने कहा- "हे नागराज ! यद्यपि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है, फिर भी मुझमें दोष-दृष्टि न करें। देवताओं के लिए भी आराध्य गोधन की रक्षा मेरा कर्तव्य है। आपकी उपस्थिति से गायों की रक्षा के लिए ही मैं आपको यहाँ से निष्कासित कर रहा हूँ।" कालिय के निवास के कारण यमुनाजल विष से दूषित हो गया था। उसे पीकर कितनी ही गायें कालकवलित हो गई थीं। अतः बालकृष्ण

१४० ] भक्तिरसामृतसिन्धु ने जल में प्रवेश किया और कालिय का शासन करके उसे वहाँ से अन्यत्र चले जाने का आदेश दिया । इस अवसर पर श्रीकृष्ण ने गोधन को देवों के लिए भी आराध्य कहा और साथ में गोरक्षा का आदर्श भी स्थापित किया । कम से कम कृष्णभावनाभावित पुरुषों को तो उनकी अनुगति में गोधन की सब प्रकार से रक्षा करनी चाहिए । गायें देवों की ही आराध्य नहीं हैं, स्वयं श्रीकृष्ण ने गोपाष्टमी, गोवर्धनपूजा आदि अवसरों पर गोपूजन किया है । १०. वावदूक कानों को प्रिय लगने वाले और विनय आदि वाणी के सम्पूर्ण गुणों से युक्त वचन कहने वाला वावदूक अर्थात् बोलने में निपुण कहलाता है । श्रीकृष्ण की श्रुतिप्रिय विनीत वाणी का उदाहरण श्रीमद्भागवत में है । जब श्रीकृष्ण ने नन्द बाबा से वर्षा के देवता इन्द्र का यज्ञ न करने का विनम्र निवेदन किया तो एक गोपगृहिणी मुग्ध हो उठी । बाद में कहने लगी, "हे सखी ! जो सरस और कोमल पदावली से युक्त होने के कारण मनोहर है और जिसके एक-एक अक्षर से अक्षय अमृतधारा झरती है, सब लोगों के कानों के लिए रसायन जैसी श्रीकृष्ण की वाणी ने किस का मन नही हर लिया ?" श्रीकृष्ण की वाणी ब्रह्माण्डभर के सारे वाग्गुणों से विभूषित है; इस के प्रमाण में उद्धव का यह वाक्य है—"शत्रुओं के हृदय को भी तत्काल बदल देने वाली, संसार के सारे संशय-दुःखों का अन्त करने वाली तथा मात्रा में अल्प होने पर विविध अर्थ वाली श्रीकृष्ण की वाणी मेरे हृदय को अतिशय प्रिय है ।" ११. सुपण्डित विद्वान् और नीतिज्ञ पुरुष को सुपण्डित कहा जाता है । अखिल विद्याओं का ज्ञाता विद्वान् कहलाता है और यथोचित कार्य करने वाला नीतिज्ञ है । इन दोनों गुणों के समुच्चय का नाम सुपाण्डित्य है । श्रीकृष्ण के सान्दीपनि मुनि से शिक्षा ग्रहण करने का वर्णन नारद जी ने इस प्रकार किया है, "ब्रह्मादिक उन मेघों के समान हैं, जो कृष्णरूप महासागर के जल से बने हैं । सागर से जैसे मेघ को जल मिलता है, वैसे सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण से वैदिक ज्ञान पाया । ब्रह्मा द्वारा जगत् में प्रवर्तित वही वैदिक ज्ञान फिर सान्दीपनि मुनि रूप शैल में रहा । सान्दीपनि का श्रीकृष्ण को उपदेश करना पर्वत से उस नदीरूप में जल

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४१ प्रवाहित होने जैसा है, जो वापस जाकर सागररूपी श्रीकृष्ण को प्राप्त हो जाय।" भाव यह है कि वास्तव में श्रीकृष्ण को कोई उपदेश नहीं कर सकता, जैसे सागर को प्राप्त होने वाली सारी जलराशि का मूल स्रोत सागर स्वयं है। देखने में प्रतीत होता है कि नदियाँ सागर को जल से भर रही हैं। श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा में वैदिक ज्ञान का संचार किया और ब्रह्मा से आगे शिष्य- परम्परा के द्वारा इस ज्ञान का प्रसारण हुआ। इसलिए सान्दीपनि मुनि के विद्या-उपदेश को उस नदी की उपमा दी गई है जो वापस जाकर कृष्णरूपी मूल सागर में मिल जाती है। सिद्धचारण श्रीकृष्ण की वन्दना करते हुए कहते हैं, "हे गोविन्द ! विद्या के चौदह गुणों से अलंकृत, जिसकी बुद्धि चारों वेदों में व्यापिनी है, जो मनु आदि की स्मृतियों से सदा युक्त हैं, जो शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष - वेद के इन छः अंगरूप परिधान से विभूषित है, पुराण जिसके सुहृद हैं, ऐसी मीमांसा से मण्डित सरस्वती को गुरुकुल में आप का संग सुलभ हो गया है। अब यह आपकी सेवा में संलग्न है।" भगवान् श्रीकृष्ण को किसी विद्या का अभाव नहीं है, वे तो केवल विद्यादेवी सरस्वती को अपनी सेवा का अवसर प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण पूर्णकाम हैं; अतः यद्यपि उनके असंख्य भक्त हैं, फिर भी उन्हें किसी भी जीव की सेवा अपेक्षित नहीं है। यह उनकी अहैतुकी करुणा और कृपा ही है कि वे सब को अपनी सेवा करने का अवसर देते हैं, मानो उन्हें अपने भक्तों से अपनी सेवा कराने की आवश्यकता हो। उनकी नीतिज्ञता के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत में कहा है, "तस्करों के लिए मृत्यु के समान, पुण्यात्मा पुरुषों के लिए आनन्ददायी वसन्त वायु के समान, रमणियों में परम मनोहर कामदेव के समान, बन्धु-बान्धवों के लिए आह्लादकारी पूर्ण चन्द्र के समान, दीनों में कल्याण के कल्पवृक्ष के समान, शत्रुओं के लिए भगवान् शिव के मुख की कालाग्नि के समान, व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण मथुरा पुरी का शासन कर रहे हैं।" अस्तु, नाना प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार करने में श्रीकृष्ण पूरे नीतिज्ञ हैं। जब उन्हें चोरों के लिए कालरूप कहा जाता है तो इसका अर्थ नहीं कि वे नीतिरहित अथवा निर्दयी हैं। वे तब भी कृपामय ही हैं क्योंकि अपराधियों को मृत्यु-दण्ड देना सब प्रकार से नीतिसंगत है। भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो उनसे जैसा व्यवहार करता है, वे भी उसके साथ वैसा ही करते हैं। उनका व्यवहार भक्तों और अभक्तों के साथ भिन्न- भिन्न होता है, परन्तु ये दोनों बराबर मंगलमय हैं। श्रीकृष्ण मंगलायतन

१४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हैं, इसलिए सब के साथ उनके व्यवहार में भी मंगल ही मंगल है। १२. बुद्धिमान् तीक्ष्ण स्मृति और सूक्ष्म बुद्धि वाले को बुद्धिमान् कहा जाता है। श्रीकृष्ण की स्मृति की तीक्ष्णता के विषय में कथन है कि अवन्तीपुर में स्थित सान्दीपनि मुनि के आश्रम में अध्ययन करते हुए श्रीकृष्ण गुरु से एक बार जो शिक्षा सुन लेते थे, तत्काल उस विषय में पूर्ण निष्णात् हो जाते थे। वास्तव में तो सान्दीपनि के गुरुकुल में जाकर वे जगत् के सामने यह आदर्श रखना चाहते थे कि चाहे कोई कितना भी महान् अथवा दक्ष क्यों न हो, पर विद्या के लिए किसी बड़े के पास अवश्य जाना पड़ेगा। महान् से महान् व्यक्ति के लिए भी गुरुशरण में जाना अनिवार्य है। श्रीकृष्ण की सूक्ष्म बुद्धि तब प्रकट हुई जब वे मथुरापुरी पर आक्रमण- कारी म्लेच्छराज से युद्ध कर रहे थे। वैदिक विधान है कि क्षत्रिय राजाओं को म्लेच्छों को मारने के लिए भी स्पर्श नहीं करना चाहिए। अतः जब उस म्लेच्छराज ने मथुरा को घेर लिया तो श्रीकृष्ण ने उसे अपने हाथों मारना अच्छा नहीं समझा। पर उसे मारना भी अवश्य है; इसलिए अपनी सूक्ष्म बुद्धि का परिचय देते हुए श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि से भागने का निश्चय किया, जिससे यवनराज उनका पीछा करे। तब वे उसे उस कन्दरा में ले गए जहाँ मुचुकुन्द निद्रामग्न था। मुचुकुन्द को शिवजी से यह वर था कि निद्राभग्न होने पर उसकी दृष्टि जिस पर पड़ जायगी, वह तत्क्षण भस्म हो जायगा। अतः श्रीकृष्ण बुद्धिमानी से म्लेच्छराज को उस कन्दरा में ले गए जहाँ मुचुकुन्द निद्रामग्न था और इस प्रकार उसे भस्म करा दिया। १३. प्रतिभाशाली जो तुरन्त नए-नए तर्कों से किसी भी विपक्ष का प्रतिकार करने में कुशल हो, उसे प्रतिभाशाली कहते हैं। इस सन्दर्भ में पद्यावली में श्रीराधा- कृष्ण का यह संवाद है। एक दिन प्रातः जब श्रीकृष्ण राधारानी के पास गए तो वे पूछने लगीं- "हे केशव ! आजकल तुम्हारा वास कहाँ है?" संस्कृत में 'वास' शब्द के तीन अर्थ हैं-निवास, सुगन्ध तथा वस्त्र। श्रीराधारानी का अभिप्राय था, "हे कृष्ण ! तुम्हारा वस्त्र कहाँ है ?" परन्तु श्रीकृष्ण ने उसे निवास मानकर उत्तर दिया- "हे प्रिये ! इस क्षण मेरा वास तुम्हारे चंचल नेत्रों में है।" इस पर राधारानी ने कहा- "अरे शठ ! मैं निवास-स्थान को नहीं, तुम्हारे वास (वस्त्र) को पूछ रही हूँ।"

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४३ अब श्रीकृष्ण 'वास' का अर्थ सुगंध समझकर बोले—"हे सुभगे ! तुम्हारे अंगों के संसर्ग से मुझे यह सुवास प्राप्त हुआ है।" श्रीमती राधारानी ने श्रीकृष्ण से फिर पूछा—"हे धूर्त ! तुमने रात्रि कहाँ बितायी ?" (यामिन्यामुषितः यामिन्याम् = रात्रि; उषितः = व्यतीत की)। परन्तु श्रीकृष्ण ने उस 'यामिन्यामुषितः' का प्रकारान्तर से 'यामिन्या मुषितः' पदच्छेद किया, जिसका अर्थ यह हो गया कि रात्रि ने उनका हरण किया। वे कहने लगे—"हे राधे ! भला क्या रात्रि भी चोरी करती है ?" इस प्रकार राधारानी के सब प्रश्नों का छलपूर्वक उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण इस परमप्रिया गोपी को आनन्दित कर रहे थे। १४. विदग्ध कला तथा विलास में अतिशय कुशल को विदग्ध कहा जाता है। यह विशेष गुण श्रीकृष्ण के स्वरूप में प्रकाशित है, राधारानी कहती हैं, "हे सखि ! कृष्ण कभी गीत रचते हैं, कभी विनोद करते हैं, कभी वंशी बजाते हैं, कभी नाचते हैं, मालायें गूंथते हैं और कभी ऐसा मधुर श्रृंगार करते हैं मानो उन्होंने द्यूत में सब खिलाड़ियों को जीत लिया हो। इस प्रकार परमोच्च कला का विलास करते हुए श्रीहरि अद्भुत क्रीड़ा कर रहे हैं।" १५. चतुर एक साथ अनेक कार्य करने की सामर्थ्य वाले को चतुर कहते हैं। एक गोपी कहती है, "हे सखियो ! कृष्ण की चातुरी भरी क्रियाओं को तो देखो। वे नाना गोपगीतों की रचना करके गोधन को आह्लादित कर रहे हैं तथा नेत्रप्रान्तों के संचालन से गोपियों को प्रसन्न और अरिष्ट आदि असुरों को भयभीत कर रहे हैं। इस प्रकार नाना जीवों के साथ नाना प्रकार से वे पूरा आनन्द उठा रहे हैं।" १६. दक्ष कठिन कार्य को भी सरलता से तत्काल कर देने वाला दक्ष है। श्रीकृष्ण की दक्षता के सम्बन्ध में शुकदेवजी श्रीमद्भागवत में परीक्षित से कहते हैं, "हे कुरुश्रेष्ठ ! श्रीकृष्ण ने सब योद्धाओं के नाना अस्त्रों को खण्ड- खण्ड कर दिया।" प्राचीन काल में जब धनुष-बाण से युद्ध होते थे, एक दल बाण चलाता और विपक्ष अन्य बाण से उसका प्रतिकार करके परास्त करता। उदाहरण के लिए, यदि एक दल आकाश से जल की वर्षा करने

१४४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु वाले पर्जन्य-अस्त्र का प्रयोग करता तो दूसरे दल को ऐसा अस्त्र चलाना पड़ता, जिससे जल तत्काल मेघों में परिणत हो जाता । अतएव उपरोक्त वाक्य से प्रकट होता है कि श्रीकृष्ण शत्रु के बाणों का प्रतिकार करने में बड़े ही दक्ष हैं। इसी प्रकार रासलीला में जब प्रत्येक गोपी ने उनसे अपने ही साथ नृत्य करने की प्रार्थना की तो श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियों थीं, उतने ही रूप धारण कर लिये । परिणामतः प्रत्येक गोपी ने उन्हें अपने साथ नाचते पाया । १७. कृतज्ञ जो मित्र के उपकार को मानता है और उसकी सेवा को कभी नहीं भूलता, उसे कृतज्ञ कहते हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण का उद्गार है, चीरहरण के समय द्रौपदी ने जो दूर होने पर भी मुझे, 'हे गोविन्द !' कहकर पुकारा था, उसका यह ऋण मेरे हृदय से उतर नहीं सकता, निरन्तर बढ़ता ही जाता है ।" श्रीकृष्ण का यह वचन इस बात का प्रमाण है कि केवल 'हे कृष्ण । हे गोविन्द !', ऐसा कहने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। महामन्त्र हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे भी श्रीभगवान् और उनकी शक्ति का सम्बोधन है। जब एक बार पुकारने से भी भगवान् चिरऋणी हो जाते हैं तो जो नित्य- निरन्तर भगवान् और उनकी शक्ति का नाम लेता रहता है, उसके वे कितने ऋणी हो जाते हैं—इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । भगवान् उस भक्त को कभी नहीं भूल सकते। श्लोक से स्पष्ट है कि भगवान् को पुकारने वाला तत्काल भगवान् के ध्यान को आकर्षित कर लेता है; वे उसके सदा के ऋणी बन जाते हैं। श्रीकृष्ण की कृतज्ञता का एक अन्य उदाहरण जाम्बवान् से उनके व्यवहार में दृष्टिगोचर होता है। जब वे रामरूप में प्रकट हुए थे तो ऋषराज जाम्बवान् ने उनकी बड़ी ही श्रद्धापूर्वक सेवा की थी। अतः फिर जब वे कृष्णरूप में प्रकट हुए तो उन्होंने जाम्बवान् की कन्या का पाणिग्रहण कर उसका गुरुजनों के सदृश सम्मान किया। साधुजन अपने प्रति किए अल्प उपकार को भी कभी नहीं भूलते; फिर साधुओं की कोटि के मुकुट- मणि श्रीकृष्ण का तो कहना ही क्या है, अर्थात् वे अपने सेवक को कैसे भुला सकते हैं । १८. सुदृढ़व्रत जिसके नियम और प्रतिज्ञा, दोनों सदा सत्य रहें, वह सुदृढ़व्रत है ।

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४५ श्रीकृष्ण के सत्यप्रतिज्ञ होने का उदाहरण हरिवंश में है। इसका सम्बन्ध श्रीकृष्ण और इन्द्र के उस युद्ध से है, जब श्रीकृष्ण ने नन्दनकानन से बलपूर्वक पारिजात का हरण किया था। एक समय सत्यभामा ने पारिजात के पुष्पों की इच्छा की तो श्रीकृष्ण ने वचन दिया कि वे उसे अवश्य लायेंगे। परन्तु इन्द्र ने पारिजात को देना स्वीकार नहीं किया। इस पर घोर युद्ध हुआ। पाण्डवों सहित श्रीकृष्ण एक ओर थे और दूसरी ओर सारे देवता थे। अन्त में श्रीकृष्ण उन सब को हरा कर पारिजात को ले गए तथा रानी सत्यभामा को भेंट किया। इसी घटना के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण नारदजी से कहते हैं, “हे देवर्षि नारदजी ! तुम सब भक्तों में और अभक्तों में यह घोषणा कर दो कि पारिजात-हरण में सब देवताओं ने मुझे हराने का प्रयत्न किया, परन्तु अपनी रानी को दिए मेरे वचन को कोई भी असत्य नहीं कर सका। वास्तव में मेरी प्रतिज्ञा को मिथ्या करने में न गन्धर्व समर्थ हो सकते हैं, न राक्षस, न यक्ष, न असुर और न पन्नग ही समर्थ हो सकते हैं।” भगवद्गीता में श्रीकृष्ण की यह प्रतिज्ञा भी है कि उनके भक्त का कभी नाश नहीं होता। अतः निरन्तर भगवत्सेवा में लगे सच्चे भक्त को दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि श्रीकृष्ण अपनी प्रतिज्ञा को कदापि भंग नहीं करेंगे। चाहे जो हो, वे सदा अपने भक्त की रक्षा करेंगे। सत्यभामा को पारिजात भेंट कर, द्रौपदी की लाज बचाकर तथा अर्जुन की सब शत्रुओं से रक्षा करके श्रीकृष्ण ने इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण दिए हैं कि वे सत्यप्रतिज्ञ हैं। गोवर्धनलीला में परास्त हो जाने पर इन्द्र ने भी भगवान् की इस प्रतिज्ञा को सत्य स्वीकार किया है कि उनके भक्त का कदापि नाश नहीं होता। जब श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इन्द्र की उपासना से रोका तो इन्द्र क्रुद्ध होकर वृन्दावन को मूसलाधार वर्षा से प्लावित करने लगा। परन्तु गोवर्धन पर्वत को छत्र के समान हाथ में उठाकर श्रीकृष्ण ने वृन्दा- वन के सारे वासियों और पशुओं को बचा लिया। इस घटना के बाद इन्द्र उनकी शरण में आकर नाना प्रकार से स्तुति करने लगा। उसने कहा, “गोवर्धन पर्वत को धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा करके आपने अपनी इस प्रतिज्ञा को सत्य किया है कि मेरे भक्तों का कभी नाश नहीं होता। १६. देशकालसुपात्रज्ञ श्रीकृष्ण देश, काल, सामग्री और पात्र के अनुसार लोगों से व्यवहार

१४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु करने में अतिशय कुशल हैं। वे देश, काल और पात्र से किस प्रकार पूर्ण लाभ लेते, इसका एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में उद्धव से गोपियों के सम्बन्ध में कहा गया स्वयं उनका एक वाक्य है, “हे सखे ! आज की शारदीय पूर्णिमा की रात्रि जैसा उत्तम समय नहीं हो सकता; त्रिभुवन में वृन्दावन से बढ़कर कोई स्थान नहीं मिल सकता तथा गोपियां अप्रतिम सुन्दरी हैं। इसलिए हे उद्धव ! मेरा मन रासोत्सव के लिए बारम्बार उत्कण्ठित हो रहा है।” २०. शास्त्रचक्षु जो शास्त्र के अनुसार ही सब कर्म करता है, वह शास्त्रचक्षु है, —जो प्रामाणिक शास्त्रों की दृष्टि से देखे। वास्तव में किसी भी ज्ञानी तथा अनुभवी व्यक्ति को सम्पूर्ण तत्त्व इन्हीं ग्रन्थों की दृष्टि से देखना चाहिए। उदाहरण के लिए, साधारण नेत्रों से देखने पर सूर्यमण्डल केवल एक छोटा सा देदीप्यमान् पिण्ड प्रतीत होता है; परन्तु प्रामाणिक वैज्ञानिक पुस्तकों की दृष्टि से ज्ञात होता है कि सूर्य इस पृथ्वी से अनेक गुणा बड़ा और शक्तिशाली है। अतः चर्म-चक्षुओं से देखना यथार्थ देखना नहीं है। प्रामाणिक पुस्तक अथवा प्रामाणिक शिक्षक के माध्यम से देखना ही यथार्थ देखना है। इसलिए यद्यपि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं और भूत, वर्तमान् और भविष्य को पूर्ण रूप से जानते हैं, फिर भी लोकशिक्षा के हेतु वे सदा शास्त्र का आश्रय लेते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने जो कुछ कहा है, वह अधिकारी के रूप में कहा है। फिर भी उन्होंने वेदान्तसूत्र का प्रमाण दिया। श्रीमद्भागवत में किसी का परिहास है कि कंस के शत्रु श्रीकृष्ण को शास्त्रचक्षु कहा जाता है। परन्तु अपनी प्रामाणिकता को स्थापित करने के लिए वे गोपियों को ही देख रहे हैं, जिससे उन गोपियों को उन्माद हो चला है। २१. शुचि शुचिता दो प्रकार की होती है। एक अपनी शुचिता से दूसरों के पाप का नाश करके उन्हें शुद्ध बना देना और दूसरा प्रकार स्वयं पापों से रहित होना। इनमें से किसी भी कोटि का शुचि व्यक्ति पावन कहा जाता है। श्रीकृष्ण में ये दोनों गुण हैं। वे सारे पापात्मा बद्ध जीवों का उद्धार कर सकते हैं और साथ ही स्वयं कभी कोई पापकर्म नहीं करते ।

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४७ इस सन्दर्भ में धृतराष्ट्र को परिवार की आसक्ति से निवृत्त करने के लिए प्रयत्न करते हुए विदुर का वाक्य है, "हे अग्रज ! ऋषि-मुनि उत्तम श्लोकों में जिनकी धवल कीर्ति का गान करते हैं, उन पावनों के भी पावन भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में ही अपने मन को एकाग्र करो। निःसन्देह शिव, ब्रह्मा, आदि बहुत से देवता हैं, परन्तु उनकी पावनता नित्य श्रीकृष्ण की कृपा पर ही निर्भर है।" विदुर ने धृतराष्ट्र को परामर्श दिया कि वह एकाग्रचित्त से केवल श्रीकृष्ण की आराधना करे। यदि कोई पावन कृष्णनाम का जप करे तो यह नामरूपी देदीप्यमान् सूर्य हृदय में उदित होकर तत्काल सम्पूर्ण पापरूप अंधकार को दूर कर देगा। अतः विदुर ने धृतराष्ट्र से निरन्तर कृष्ण का ही चिन्तन करने को कहा, जिससे पापपुंज तत्क्षण भस्म हो जाये। भगवद्गीता में अर्जुन भी श्रीकृष्ण को परं ब्रह्म परं धाम पवित्रम्—परम पवित्र कहता है। श्रीकृष्ण की परम पावनता के और भी अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। २२. वशी जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है, उसे वशी, अर्थात् जिते- न्द्रिय कहा जाता है। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है, "श्रीकृष्ण की सभी १६००० स्त्रियाँ इतनी अनिन्द्य सुन्दरी थीं कि उनके उद्दाम भाव, मनोहर हास और लज्जा को देखकर शिव आदि देवों का मन भी मोहित हो जाता था। परन्तु अपने इस कमनीय हाव-भाव से भी वे श्रीकृष्ण के चित्त को तनिक भी विचलित नहीं कर सकीं।" श्रीकृष्ण की १६००० स्त्रियों में से प्रत्येक यही समझती थी कि वे उसकी कमनीयता पर मुग्ध हैं; पर वास्तव में ऐसा न था। अतः श्रीकृष्ण सर्वोत्तम जितेन्द्रिय हैं और यह भगवद्गीता में भी स्वीकृत है; वहाँ उन्हें हृषिकेश—इन्द्रियों का स्वामी कहा गया है। २३. स्थिर जो अभीष्ट फल की प्राप्ति होने तक निरन्तर कार्यशील रहता है, वह स्थिर है। स्यमन्तमणि को खोजते समय श्रीकृष्ण न तो वन में घुसने से घबराए और न ऋक्षराज जाम्बवान् के स्थान में घुसने के भय से उन्हें चिन्ता हुई। वरन् स्थिरतापूर्वक मणि को प्राप्त करके की द्वारका को लौटे। २४. दान्त जो पुरुष उचित होने पर दुःसह कष्ट को भी सहन कर लेता है, वह दान्त है।

१४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु जिस समय श्रीकृष्ण गुरुकुल में निवास कर रहे थे, तो कोमलांग होते हुए उन्होंने गुरुसेवा में होने वाले क्लेश को सहर्ष सहन किया । शिष्य का कर्तव्य है कि कष्टों को गिने बिना निश्छल भाव के साथ सब प्रकार से गुरु की सेवा करे । गुरुकुल में रहते हुए शिष्य को द्वार-द्वार से भिक्षा करके गुरु को समर्पित करनी होती है । प्रसाद ग्रहण के समय गुरु एक-एक शिष्य को पुकारते हैं । यदि किसी कारणवश वे किसी शिष्य को प्रसाद के लिए बुलाना भूल जायें तो शास्त्रों में विधान है कि अपने-आप भोजन करने के स्थान पर उस दिन उपवास ही करना चाहिए । ऐसे बहुत से विधान हैं । श्रीकृष्ण कभी-कभी वन में ईंधन लाने भी जाते थे । २५. क्षमाशील जो अपने विरोधी के सब अपराधों को सहन करता है, वह क्षमा- शील कहलाता है । भगवान् श्रीकृष्ण की क्षमा का वर्णन महाभारत में है, जब उन्होंने शिशुपाल का वध किया था । शिशुपाल चेदि का राजा था । श्रीकृष्ण का मौसेरा भाई होते हुए भी वह उनसे सदा द्वेष करता रहता । जब भी वे मिलते, शिशुपाल श्रीकृष्ण का अपमान करता और यथाशक्ति अपशब्द कहता । महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भी उसने ऐसा ही किया; परन्तु श्रीकृष्ण ने उपेक्षापूर्वक उसे कोई उत्तर नहीं दिया । वहाँ उपस्थित कुछ लोग शिशुपाल का वध करने को उद्यत हुए तो भी श्रीकृष्ण ने उनका भी निषेध कर दिया । वे स्वभाव से ही क्षमाशील थे । प्रसिद्ध है कि सिंह मेघ की गर्जना को सुनकर हुंकार करता है, मूर्ख शृंगालों के शब्द को सुनकर नहीं । श्रीयामुनाचार्य श्रीकृष्ण की क्षमाशीलता की स्तुति करते हुए कहते हैं, "हे रघुवर ! शरणागत समझ कर आप जानकी के चरण में चोंच मारने वाले उस काक के प्रति भी दयालु बन गए ।" एक समय देवराज इन्द्र ने काक रूप में भगवान् राम की अर्धांगिनी जानकी के चरण में घाव कर दिया । जगन्माता सीता के इस अपमान को देखकर श्रीराम तत्काल उस उद्धत काक का वध करने को उद्यत हो गए । परन्तु वह त्राहि-त्राहि करता हुआ उनके चरणों में गिर पड़ा; अतः भगवान् ने उसे क्षमादान दिया । श्रीयामुना- चार्य आगे कहते हैं कि श्रीकृष्ण की क्षमाशीलता भगवान् राम से भी विशेष है । शिशुपाल तीन जन्मों से लगातार उनका अपमान कर रहा था; फिर भी श्रीकृष्ण इतने क्षमाशील हैं कि उन्हें शिशुपाल को सायुज्य

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४६ मुक्ति प्रदान की। इससे सिद्ध हो जाता है कि भगवान् की ब्रह्मज्योति में लीन होना, जो अद्वैतवादियों का लक्ष्य है, बहुत कठिन कार्य नहीं है। शिशुपाल जैसे लोग, जो जन्म-जन्म में श्रीकृष्ण का अपराध करते हैं, उन्हें तक यह मुक्ति मिल सकती है। २६. गम्भीर जो पुरुष अपने मनोभाव को सब से प्रकट नहीं करता, अथवा जिसके मन का आशय जानना बड़ा कठिन हो, वह गम्भीर कहा जाता है। जब ब्रह्मा से भगवान् श्रीकृष्ण का अपराध बन बैठा तो उसने क्षमा-याचना की। परन्तु उत्तम स्तुति करने पर भी वह यह नहीं समझ सका कि श्रीकृष्ण तुष्ट हो गए या अब भी रुष्ट हैं। भाव यह है कि श्रीकृष्ण ने गम्भीरता का परिचय देते हुए ब्रह्मस्तुति पर ध्यान नहीं दिया। गम्भीरता का एक अन्य उदाहरण राधारानी से श्रीकृष्ण के प्रेमविलास में है। श्रीकृष्ण राधा से अपने प्रेम के विषय में इतने गम्भीर रहते कि उनके अग्रज और चिरसंगी बलरामजी तक उनके मन के भाव को नहीं जान पाते। २७. धृतिमान् जिसकी सब इच्छायें पूर्ण हो चुकी हैं, इसलिए जो आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है और क्षोभ का महान् कारण होने पर भी शान्त बना रहता है, वह धृतिमान् है। श्रीकृष्ण की पूर्णस्पृहत्व का एक उदाहरण वह घटना है जब वे अर्जुन-भीम के साथ मगधराज जरासन्ध को चुनौति देने गए और श्रीकृष्ण ने जरासन्ध-वध का पूर्ण श्रेय भीम को दिया। इससे स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण यश की इच्छा कभी नहीं करते, यद्यपि वास्तव में उन सा यशोमय दूसरा कोई नहीं हो सकता। क्षोभ का कारण होने पर भी शान्त रहने का गुण तब प्रकट हुआ जब शिशुपाल उन्हें अपशब्द कह रहा था। इस पर वहाँ विद्यमान सभी राजा और ब्राह्मण क्षुब्ध हो कर तत्काल उत्तम स्तुतियों से श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने लगे। परन्तु उन सब को श्रीकृष्ण में कुछ भी क्षोभ दृष्टिगोचर नहीं हुआ। २८. समता जो राग-द्वेष से मुक्त हो उसे सम कहते हैं। श्रीकृष्ण की समता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१०.१६.३३) में

१५० ] भक्तिरसामृतसिन्धु कालियदमन-लीला में है। जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण कालिय को दण्डित कर रहे थे, तब उसकी स्त्रियाँ भगवान् के आगे कर यह विनती करने लगीं, "हे नाथ ! हमारे इस पापात्मा पति कालिय नाग को आपने जो दण्ड दिया है वह सर्वथा योग्य ही है, क्योंकि सब प्रकार के आसुरी जीवों का निग्रह करने के लिए आपका अवतार हुआ है। हम जानती हैं कि आप अपने शत्रुओं और पुत्रों को समान समझते हैं। इसलिए हे प्रभो ! आपने इस अधम का दमन इसके कल्याण के लिए ही किया है।" एक अन्य स्तुति में कहा है, "हे कृष्ण ! हे यदुवर ! आप इतने समद्रष्टा हैं कि यदि शत्रु योग्य हो तो उसका भी सम्मान करते हैं और पुत्र भी दुष्ट है तो उसके लिए भी दण्ड का विधान करते हैं। यही आपका कार्य है क्योंकि आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के रचयिता हैं। आप सब प्रकार के पक्षपात से रहित हैं। यदि किसी को आपकी कोई चेष्टा विषम प्रतीत हो तो निश्चित रूप से यह केवल उसका भ्रम है।" २६. वदान्य दानवीर पुरुष, जो उदारता से दान देता है, वह वदान्य कहलाता है। जब श्रीकृष्ण द्वारका में राज्य कर रहे थे, तब उनकी उदारता तथा दानवीरता की कोई अवधि न थी। वस्तुतः उनकी उदारता इस सीमा पर थी कि चिन्तामणि, सुरभि तथा कल्पवृक्षों आदि ऐश्वर्यों से युक्त वैकुण्ठ-जगत् का भी द्वारका में अतिक्रमण हो गया। श्रीकृष्ण के गोलोक- वृन्दावन नामक दिव्य धाम में सुरभि नामक गायें अपरिमित मात्रा में दुग्धामृत प्रदान करती हैं। वहाँ ऐसे असंख्य कल्पतरु हैं जिनसे सब प्रकार के फल यथेष्ट संख्या में प्राप्त किए जा सकते हैं। भूमि उस चिन्तामणि से रचित है, जिसके संसर्ग से लोहा भी स्वर्ण बन जाता है। भाव यह है कि श्रीकृष्ण के दिव्य धाम में सब कुछ अद्भुत ऐश्वर्यमय है। फिर भी जब श्रीकृष्ण द्वारका में विराजमान थे तो उनकी उदारता गोलोक-वृन्दावन के ऐश्वर्य से कहीं बढ़-चढ़ कर थी। श्रीकृष्ण जहाँ भी रहते हैं, गोलोक- वृन्दावन का अनन्त ऐश्वर्य स्वतः रहता है। यह भी उल्लेख है कि द्वारका में श्रीकृष्ण १६१०८ रूपों में प्रत्येक महिषी के साथ अलग महल में रहते थे। वे अपनी रानियों के साथ उन महलों में सुख से रहते ही नहीं थे, अपितु प्रत्येत महल से नित्य नियम से सुन्दर वस्त्र और अलंकारों से युक्त १३०५४ गौओं का दान भी करते थे

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १५१ इस प्रकार वे प्रतिदिन कुल १६१०८ × १३०५४ गौओं का दान करते थे। इतने विशाल गोधन के दान के मूल्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती; परन्तु द्वारका पर राज्य करते हुए श्रीकृष्ण का तो यह साधारण दैनिक कार्य था। ३०. धार्मिक जो स्वयं शास्त्र-विहित धर्म का आचरण करता है और दूसरों को भी उसकी शिक्षा देता है, वह धार्मिक है। केवल किसी मत में विश्वास होना धार्मिकता का द्योतक नहीं है। यह आवश्यक है कि स्वयं धर्म का आचरण करे और अपने निजी उदाहरण से दूसरों को भी शिक्षित करे। ऐसा व्यक्ति ही यथार्थ में धार्मिक है। इस धराधाम पर श्रीकृष्ण की उपस्थिति के काल में यहाँ अधर्म का नाम भी नहीं था। इस सन्दर्भ में नारदजी ने एक बार श्रीकृष्ण से परिहास में कहा था, “हे गोपेन्द्र ! आपके बैलरूपी धर्म के चारों चरण इस प्रकार बढ़े कि उसने अधर्म रूप सारी जात-पात को खा डाला।” भाव यह है कि श्रीकृष्ण की कृपा से धर्म का इस अच्छी प्रकार से रक्षण होता था, जिससे अधर्म देखने को भी दुर्लभ हो गया।” प्रसिद्ध है कि श्रीकृष्ण निरन्तर नाना यज्ञों में देवताओं का आह्वान करते रहते थे, जिससे वे देवता अपनी स्त्रियों से सदा दूर रहते। अतः पतियों के वियोग से संतप्त उनकी स्त्रियाँ कलियुग में प्रकट होने वाले भगवान् श्रीकृष्ण के नौवें अवतार बुद्धदेव के लिए प्रार्थना करने लगीं। भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार से प्रसन्न होने के स्थान पर वे बुद्धदेव से अवतीर्ण होने की याचना करने लगीं, क्योंकि पशु-हिंसा रोकने के लिए बुद्धदेव वैदिक यज्ञों का निषेध कर देते हैं। देवांगनाओं ने विचार किया कि यदि बुद्धदेव का अवतार हो गया तो यज्ञ बन्द हो जायेंगे, जिससे उनका अपने पतियों से विछोह नहीं होगा। कभी-कभी जिज्ञासा होती है कि आजकल देवगण स्वर्ग से पृथ्वी पर क्यों नहीं आते ? इसका सीधा सा उत्तर यह है कि जब से भगवान् बुद्ध ने प्रकट होकर पशु-हिंसा रोकने के लिए यज्ञानुष्ठान का निषेध किया है, तब से यज्ञ-विधि का लोप सा हो गया है। अतः अब देवता यहाँ नहीं आते।

अध्याय २२ श्रीकृष्ण के गुण (२) ३१. शूर जो युद्ध करने में उत्साही और नाना अस्त्रों के प्रयोग में दक्ष हो उसे शूर कहा गया है। श्रीकृष्ण की शूरवीरता के सम्बन्ध में एक वाक्य है, "हे रिपुनाशन ! सरोवर में नहाता गजराज जैसे सूंड के वेग से जल में सभी कमलों का उच्छेद कर देता है, वैसे ही गजतुण्ड-तुल्य अपनी भुजाओं के उत्तोलन से आपने कितने ही शत्रु रूपी कमलों का मर्दन कर दिया है।" श्रीकृष्ण की अस्त्र-प्रयोग-दक्षता के विषय में यह उल्लेखनीय है कि जब जरासन्ध ने १६,००० अक्षौहिणी सेना के साथ श्रीकृष्ण के दल पर आक्रमण किया तो वह उनके एक भी सैनिक को आहत नहीं कर सका। यह श्रीकृष्ण की दक्ष युद्धशिक्षा के कारण हुआ, जो युद्धकला के इतिहास में अद्वितीय है। ३२. करुण जिसके लिए दूसरे का दुःख असह्य हो, वह करुण है। श्रीकृष्ण का कारुण्य उस समय प्रकट हुआ जब उन्होंने मगधेन्द्र के बन्दी राजाओं का मोचन किया। अपनी मरण-शय्या पर श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए भीष्मपितामह ने कहा कि वे उस सूर्य के समान हैं जो अज्ञानरूप अन्धकार को हरता है। मगधेन्द्र ने अपने बन्दी राजाओं को अंधकारमय कक्षों में डाल रखा था। श्रीकृष्ण के वहाँ प्रकट होते ही अंधकार तत्काल दूर हो गया, मानो सूर्य उदित हो गया हो। भाव यह है कि मगधेन्द्र ने जितने भी राजा बन्दी बनाए थे, वे सब श्रीकृष्ण के वहाँ आते ही मुक्त हो गए। राजाओं पर अपनी अहैतुकी करुणा से अभिभूत होकर ही श्रीकृष्ण ने ऐसा किया।

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५३ श्रीकृष्ण की करुणा तब भी अभिव्यंजित हुई थी जब पितामह भीष्म बाणविद्ध अवस्था में पड़े थे । इस अवस्था में भीष्म श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ अत्यन्त आतुर हो उठे, अतः श्रीकृष्ण को आना पड़ा । भीष्म की दयनीय अवस्था का अवलोकन करके श्रीकृष्ण अश्रुविमोचन करते हुए शोक करने लगे । वे आँसु ही नहीं बरसा रहे थे, बल्कि करुणा की बाढ़ में अपनी सुध-बुध भी भूल गए । इसीलिए सीधे श्रीकृष्ण को प्रणाम न करके भक्तजन उनकी करुणा को नमस्कार करते हैं। श्रीकृष्ण की प्राप्ति बड़ी कठिन है, क्योंकि वे परात्पर भगवान् हैं। परन्तु भक्त सदा राधारानी से प्रार्थना करते हैं, क्योंकि वे उनकी करुणा की मूर्तरूपा है। ३३. मान्यमानकृत गुरु, ब्राह्मण तथा वृद्धों का पर्याप्त सम्मान करने वाला मान्यमानकृत कहलाता है । जब पूज्यजन श्रीकृष्ण के समक्ष एकत्र होते तो श्रीकृष्ण क्रम से गुरुदेव, पिता और अग्रज बलरामजी को नमस्कार करते थे । इस प्रकार कमलनयन श्रीकृष्ण सम्पूर्ण व्यवहार में प्रसन्न और निर्मलहृदय थे । ३४. विनयी जिसमें औद्धत्य तथा अभिमान का अभाव हो वह विनयी है । श्रीकृष्ण का विनयी स्वभाव तब प्रकट हुआ जब वे युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में पधारे । महाराज युधिष्ठिर जानते थे कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं, इसलिए उनकी अगवानी के लिए वे रथ से उतर रहे थे । परन्तु इससे पहले कि वे उतर पायें भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं अपने रथ से उतर पड़े और आगे दौड़ कर युधिष्ठिर का चरणस्पर्श किया । यद्यपि श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं, फिर भी अपने व्यवहार में वे सदाचार का पालन करना कभी नहीं भूलते । ३५. दक्षिण सुशील स्वभाव के कारण जिसका व्यवहार बड़ा मृदु और कोमल हो उसे दक्षिण कहा जाता है । स्यमन्तकमणि हरण के प्रसंग में उद्धव के एक वाक्य से प्रमाणित होता है कि श्रीकृष्ण बड़े ही दयामय और कृपालु हैं। वे सेवक के महान् अपराध पर भी ध्यान नहीं देते, बस भक्त की सेवा देखते हैं।

१५४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु ३६. ह्रीमान् जो पुरुष कभी-कभी शील-संकोच व्यक्त करता है, उसे ह्रीमान् कहते हैं। जैसा 'ललितमाधव' में वर्णन है, अपनी कनिष्ठ अंगुली पर गोवर्धन धारण करते समय श्रीकृष्ण में लज्जाभाव प्रकट हुआ था। सारी गोपियाँ श्रीकृष्ण के इस अद्भुत कृत्य को निहार रही थीं और वे भी गोपियों को देखकर मुस्करा रहे थे। जब उनकी दृष्टि गोपियों के वक्षः- स्थल पर गई तो हाथ के कंपन से गोवर्धन तनिक-सा हिल गया जिससे उसके नीचे खड़े सब गोपवृन्द कुछ भयभीत से हो गए। गोपों के इस भय को देखकर बलराम जी हँस पड़े। परन्तु श्रीकृष्ण समझे कि बलराम ने गोपियों के वक्षःस्थल को देखने में उनके मनोभाव को जान लिया है, इसलिए लज्जित होकर उन्होंने तुरन्त सिर झुका लिया। ३७ शरणागत-पालक श्रीकृष्ण सब शरणागत जीवों के रक्षक हैं। श्रीकृष्ण का एक शत्रु तो इस विचार से ही मुग्ध हो उठा कि यदि वह केवल श्रीकृष्ण के शरणागत हो जाय तो वे सब प्रकार से उसकी रक्षा करेंगे। श्रीकृष्ण उस चन्द्रमा के समान हैं जो चाण्डाल और अस्पृश्यों के घरों पर भी अपनी शीतल चन्द्रिका का वितरण करने में संकोच नहीं करता। ३८. सुखी निरन्तर प्रसन्न रहते हुए दुःख की गन्ध तक से सदा दूर रहने वाला सुखी कहलाता है। जहाँ तक श्रीकृष्ण द्वारा सुख के भोग का सम्बन्ध है, शास्त्रों में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण एवं उनकी महिषियों के श्रीअंग जिन अलंकारों से से विभूषित रहते थे, स्वर्ग के कोषाध्यक्ष कुबेर के लिए उनका मनोरथ करना भी असम्भव है। श्रीकृष्ण के राजद्वार पर निरन्तर जो नृत्य चलता था, स्वर्ग के देवता उसकी स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते। स्वर्ग में इन्द्र सदा अप्सराओं के नृत्य को देखने में डूबे रहते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण के द्वार पर अभिनीत नृत्य का सौन्दर्य इन्द्र के अनुमान से परे का था। गौरी से भी अधिक सुन्दर और चन्द्रकलाओं से पूर्ण सुन्दरियों का निरन्तर श्रीकृष्ण के पास अन्तःपुर में निवास था। अतः श्रीकृष्ण से बढ़कर भोगी और कौन

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५५ हो सकता है। भोग की तीन वस्तुएँ हैं—सुन्दर स्त्रियाँ, अलंकार एवं धन। ये सभी श्रीकृष्ण के महलों में विद्यमान थीं, जिससे शिव, कुबेर, इन्द्र, आदि की कल्पना तक परास्त हो जाती थी। लेशमात्र दुःख भी कभी श्रीकृष्ण का स्पर्श नहीं कर सकता। एक बार कुछ गोपियों ने याज्ञिक ब्राह्मणों की पत्नियों के पास जाकर कहा था, "हे ब्राह्मणपत्नियो ! तुम यह जान लो कि श्रीकृष्ण को दुःख की गन्ध भी नहीं छू सकती। उन्हें न हानि की, न ग्लानि की, न अपयश की और न भय, उद्वेग या उत्पात की कोई चिन्ता है। वे तो बस व्रजांगनाओं से घिरे हुए उनके साथ रासरस का दिन-रात उपभोग करते रहते हैं। ३६. भक्तसुहृद भक्तिभाव से तुलसी का एक पत्ता अथवा अंजलि भर जल को अपर्ण करने से भी भक्तवत्सल भगवान् अपने आत्मा को भक्तों के हाथ बेच देते हैं। श्रीकृष्ण भक्तसुहृद हैं, यह भीष्म के साथ उनके युद्ध में भलीभाँति प्रकट हुआ है। जिस समय भीष्म बाणों की शय्या पर मरणासन्न अवस्था में पड़े थे, तो श्रीकृष्ण भी वहाँ उनके आगे उपस्थित थे। भीष्म को युद्ध का वह दृश्य स्मरण हो आया जब श्रीकृष्ण ने उन पर कृपा की थी। श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा थी कि वे कुरुक्षेत्र के युद्ध में किसी भी दल की ओर से अस्त्र को हाथ भी नहीं लगायेंगे, पूर्ण रूप से तटस्थ रहेंगे। अर्जुन के सारथि होते हुए भी उनका प्रण था कि वे किसी अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग से उसकी सहायता नहीं करेंगे। परन्तु श्रीकृष्ण की इस प्रतिज्ञा को भंग कराने के लिए भीष्म ने एक दिन अर्जुन के विरुद्ध ऐसा अतुल पराक्रम प्रकट किया कि श्रीकृष्ण अपने रथ से उतरने को बाध्य हो गए। एक खण्डित रथ के पहिए को उठा कर पितामह की ओर दौड़े, मानो कोई सिंह गजराज को मारने के लिए जा रहा हो। मरण-शय्या पर इस मार्मिक दृश्य को स्मरण करके भीष्मदेव ने अपने भक्त अर्जुन के प्रति वात्सल्यवश अपनी प्रतिज्ञा भंग करने में भी संकोच न करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण का जय-जयकार किया। ४०. प्रेमवश्य श्रीकृष्ण भक्त के प्रेमभाव से वशीभूत हो जाते हैं। इसमें प्रेम ही प्रधान है, सेवा का प्रकार नहीं। वैसे तो कोई भी श्रीकृष्ण की पूर्ण सेवा

१५६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नहीं कर सकता। वे अपने में सब प्रकार से पूर्ण एवं तृप्त हैं; अतः भक्त से किसी प्रकार की सेवा की उन्हें अपेक्षा नहीं है। श्रीकृष्ण के लिए भक्त का प्रेम और स्नेह ही उन्हें वशीभूत करता है। श्रीकृष्ण की इस प्रेम- वश्यता का एक सुन्दर उदाहरण तब अभिव्यक्त हुआ जब सुदामा विप्र उनके महल में आया। पूर्व में वह श्रीकृष्ण का सहपाठी रह चुका था; अब दरिद्रता-निवारण के लिए स्त्री की प्रेरणा से श्रीकृष्ण के पास आया था। श्रीकृष्ण ने उसका हार्दिक सत्कार किया और स्त्रियों सहित ब्राह्मण समझ कर उसका पद-प्रक्षालन किया। मित्र से मिलते हुए श्रीकृष्ण उसके साथ शैशव के प्रेमविहारों की स्मृति से प्रेमाश्रु बहाने लगे। श्रीकृष्ण की प्रेमवश्यता का एक अन्य उदाहरण श्रीमद्भागवत (१०.६.१८) में है। शुकदेव गोस्वामी परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् ! अपने को पकड़ने के लिए पीछे-पीछे दौड़ती माता यशोदा को पसीने से तर और बहुत श्रान्त हुआ जानकर श्रीकृष्ण स्वयं बँध गए।" बालकृष्ण अपने चपल क्रीड़ा से माता को बहुत तंग करते, इसलिए माता उन्हें बाँधना चाहती थीं। वे घर में से रस्सी ले आईं और उन्हें बाँधने लगीं। परन्तु रस्सी में गाँठ नहीं लग सकी। उन्होंने रस्सी कितनी भी बढ़ायी, पर वह छोटी ही रही। इससे उन्हें बहुत अधिक परिश्रम हुआ और शरीर से स्वेद-स्राव हो चला। उस समय श्रीकृष्ण स्वयं माता के बन्धन में आ गए। भाव यह है कि श्रीकृष्ण को प्रेम से ही बाँधा जा सकता है। भक्त उन्हें प्रेम करते हैं, इसलिए वे उनके प्रेमवश्य हैं। ४१. सर्वशुभंकर जो सदा सब का हितकारी हो, उसे सर्वशुभंकर कहते हैं। इस धराधाम से श्रीकृष्ण के अप्रकट हो जाने पर उद्धव उनकी लीलाओं का स्मरण करके कहने लगा, "अपने अद्भुत लीला-चरित से सब मुनियों को कृतार्थ किया, क्रूर राजवंशों की सारी आसुरी क्रियाओं को समाप्त किया, पुण्यात्माओं को बचाया और युद्ध में सभी क्रूरकर्मी पुरुषों को मार डाला। अतः वे सभी के लिए कल्याणकारी हैं।" ४२. प्रतापी शत्रुओं को संकट में डालने वाला प्रतापी कहलाता है। जिस समय श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर विद्यमान थे, तब जैसे प्रतापी सूर्य सम्पूर्ण अन्धकार को कन्दराओं की शरण में खदेड़ देता है, वैसे ही उनके शत्रुरूप उलूक उनकी दृष्टि से दूर जा छिपे।

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५७ ४३. कीर्तिमान् निर्मल चरित के कारण प्रसिद्ध पुरुष कीर्तिमान् कहलाता है । श्रीकृष्ण के यश का प्रसारण उस चन्द्रकौमुदी के समान है जो कालिमा को भी शुभ्र ज्योत्स्ना में बदल देती है । अर्थात्, यदि कृष्णभावना का सम्पूर्ण जगत् में प्रसार किया जाय तो भवरोग का उद्वेग और अन्धकार शुद्धता, शान्ति और समृद्धि की शुभ्र ज्योत्स्ना में परिणत हो जायगा । देवर्षि नारद के वीणा पर श्रीकृष्ण की कीर्ति का गान करने पर शिवजी का कण्ठ नीला न रहा । यह देखकर परपुरुष की आशंका से गौरी ने शिवजी को त्याग दिया; नीलाम्बरधारी बलराम जी ने अपने वस्त्र को श्वेत देखकर फेंक दिया; तथा यमुनाजल को दूध हुआ देखकर गोपियाँ उससे मक्खन का मन्थन करने लगीं। भाव यह है कि कृष्णभावना के प्रसार से सब कुछ शुद्ध और शुभ्र हो जाता है। ४४. रक्तलोक जो पुरुष सम्पूर्ण लोक का प्रीतिभाजन हो, उसे रक्तलोक कहते हैं । श्रीकृष्ण की लोकप्रियता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१.११.६) में है जब वे हस्तिनापुर से घर लौटे थे । कुरुक्षेत्र के युद्ध में द्वारका से उनकी अनुपस्थिति के कारण सारे द्वारकावासी बहुत हतप्रभ हो गए थे । फिर जब वे लौटे तो सारे निवासियों ने बड़े ही हर्षोल्लास सहित उनका अभिवादन किया और कहा, "हे नाथ ! जब आप यहाँ से चले जाते हैं तो आपके बिना एक-एक क्षण रात्रि के समान अंधकारमय, करोड़ों वर्ष के जैसा हो जाता है । हमारे लिए आपका विरह असह्य है ।" इस वाक्य से पता चलता है कि श्रीकृष्ण सम्पूर्ण देश में कितने लोकप्रिय थे । ऐसी ही घटना तब घटी जब श्रीकृष्ण उस यज्ञमण्डप में आए, जिसका आयोजन राजा कंस ने अपने ही मरण के लिए किया था । श्रीकृष्ण को पधारते देखकर सारे ऋषिवृन्द जयजयकार करने लगे । श्रीकृष्ण कुमारा- वस्था में थे, अतः सब ऋषियों ने सादर आशीर्वाद दिया । वहाँ आए देवताओं ने भी श्रीकृष्ण का स्तवन किया तथा चारों ओर से नगर की नारियों की हर्षध्वनि होने लगी । भाव यह है कि उस स्थान में ऐसा कोई नहीं था, श्रीकृष्ण जिसके अनुराग के पात्र न हों । ४५. साधुसमाश्रय यद्यपि श्रीकृष्ण परात्पर भगवान् के रूप में किसी से पक्षपात नहीं

१५८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु करते, तथापि भगवद्गीता के अनुसार जो श्रद्धा-प्रेम से उनके नाम का भजन करता है, उस भक्त के प्रति उनका विशेष आकर्षण रहता है। श्रीकृष्ण के जगत् में अवतरण-काल में एक भक्त ने वह उद्गार प्रकट किया था, "हे पुरुषोत्तम ! यदि आप जगत् के कल्याण के लिए अवतरण न करते तो असुरों की भयंकर क्रियाओं के कारण न जाने सज्जनों की क्या दशा होती।" अपने आविर्भाव के प्रारम्भ से ही श्रीकृष्ण सब प्रकार के आसुरी जीवों के परम वैरी थे, यद्यपि असुरों से उनके द्वेष और भक्तों से प्रेम में भेद नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण के हाथ से मरा कोई भी असुर तत्काल मुक्तिलाभ कर लेता है। ४६. नारीगणमनोहारी जिस पुरुष में विशेष गुण हों, वह सुन्दरियों के समूह को मोहित करने वाला होता है। द्वारका की महिषियों के सम्बन्ध में एक भक्त ने कहा, "साक्षात् भगवान् की सेवापरायणा द्वारका की महिषियों की महिमा का क्या कहना। भगवान् की महिमा इतनी अगाध है कि नारद आदि सब ऋषिवृन्द उनके नाम-कीर्तन से ही दिव्य रस का आस्वादन कर सकते हैं; फिर उन महिषियों का क्या कहना जो निरन्तर उनका दर्शन और सेवन करती थीं?" द्वारका में श्रीकृष्ण की १६१०८ महिषियाँ थीं। ये सभी श्रीकृष्ण के प्रति आकृष्ट रहती थीं, ठीक उसी प्रकार जैसे लोहा चुम्बक की ओर। एक भक्त का उद्गार है, "हे कृष्ण ! आप चुम्बक हैं और व्रजांगनायें लोहे जैसी हैं। आप जहाँ भी जाते हैं, वे आपके पीछे-पीछे दौड़ती हैं।" ४७. सर्व आराध्य जो सब देव-मनुष्यों के लिए सबसे पहले पूजा के योग्य हो, उसे सर्वाराध्य कहते हैं। श्रीकृष्ण ब्रह्मा, शिव आदि सब जीवों के ही नहीं, वरन् बलराम, शेष जैसे विष्णुरूपों के भी आराध्य हैं। बलदेव श्रीकृष्ण के स्वयं प्रकाश हैं, परन्तु वे भी उन्हें आराध्य मानते हैं। जब श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के राजसूय में पधारे तो वे ऋषि, देव, सहित सारे सभासदों के आकर्षण के केन्द्र बन गए और सभी ने उनका अग्रपूजन किया। ४८. समृद्धिमन् श्रीकृष्ण वीर्य, श्री, यश, रूप, ज्ञान और वैराग्य—सभी ऐश्वर्यों में