भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
४९० भावप्रकाशनिघण्टुः इसके सभी भाग विषैले होते हैं। जानवर इसको नहीं खाते। आत्मघात, परहत्या एवं गर्भपात आदि के लिये इसके जड़ को खाते हैं। इसके पुष्प शिवजी को चढ़ाये जाते हैं। इसके मूलत्वक् एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में नेरिओडोरिन (Neriodorin) नामक जल में अविलेय तथा नेरिओ डोरेन (Neriodorein) नामक जल में विलेय ये दो कडुवे पदार्थ पाये जाते हैं जो हृदय के लिये अत्यन्त विषैले होते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें उड़नशील तैल, कषायाम्ल, मोम, डिजिटेलिन के सदृश नेरिन (Neriene) नामक रवेदार पदार्थ एवं रोसेजिनीन (Rosaginine) नामक ग्लूकोसाइड ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसके पत्तों में ओलिएण्ड्रन (Oleandrine) नामक क्षाराम्र, सूडोफ्युरारीन (Pseudocurarine) नामक ग्लूकोसाइड एवं नेरीन तथा नेरिएण्टाइन (Neriantine) ये द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, चक्षुष्य, ज्वरहर, शोथघ्न, हृदय के लिये घातक एवं कुष्ठ, कण्डू, नेत्रप्रकोप, त्वग्रोग तथा व्रण के लिये लाभदायक है। यह सब प्राणियों के लिये विषैला है। अल्प मात्रा में इसके मूल की क्रिया हृदय पर पीत कनेर की तरह होती है। मूल तीव्र मूत्रल एवं डिजिटेलिस् तथा स्ट्रोफॅन्थस् के सदृश हृदय के लिये बलदायक है। पीत कनेर की अपेक्षा यह अधिक तीव्र है। ओलिएण्ड्रिन के सूचिकाभरण से हृदय की गति १०-१२ तक प्रतिमिनट कम हो जाती है जो स्वस्थवस्था में ७२-८० तक रहती है। यदि इसको और देते रहें तो हृदय एवं श्वसन दोनों की क्रिया बन्द हो जाती है। इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत सावधानी के साथ करना चाहिये। (१) अल्प मात्रा में हृद्रोग एवं तज्जन्य जलोदर में इसका बहुत सावधानी के साथ प्रयोग करने से मूत्रोत्सर्ग होकर जलोदर कम होता है। इसे खाली पेट नहीं देना चाहिये। अधिक मात्रा से शीत आकर नाड़ी की गति बहुत कम हो जाती है, आक्षेप आते हैं एवं हृदयं तथा श्वसन क्रिया बन्द पड़ती है। (२) सर्पदंश में इसकी जड़ की छाल १-२ रत्ती की मात्रा में या १-२ पत्ते थोड़े-थोड़े अन्तर से देते हैं। इतनी अधिक मात्रा से वमन तथा एकाध दो पाखाना हो जाता है। ज्यादा से ज्यादा यह ६ माशे तक दिया जाता है। (३) इसकी जड़ की छाल एवं पत्तों का बाह्य प्रयोग ही अधिक किया जाता है। त्वग्रोग, व्रणशोथ, कुष्ठ, कण्डू, शुष्क एवं पपड़ी युक्त त्वचा के विकारों में इसके मूल को तैल में पकाकर उस तैल की मालिश करते हैं। शोथ में पत्ते के क्वाथ से सेंकते हैं। व्रण, अर्श, कुष्ठ, दाद तथ चकत्ता आदि पर इसकी जड़ को गोमूत्र में घिसकर लगाने से शोथ एवं पीड़ा कम होती है। अधिक दीर्घ व्रण में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये अन्यथा इसमें के सत्व का शोषण होकर तीव्र विषैले सार्वदैहिक परिणाम हो सकते हैं। उपदंशजन्य व्रण पर इसके मूल को जल में घिसकर लगाने से वेदना कम होती है एवं इसी प्रकार इसके पत्तों के क्वाथ से प्रक्षालन करने से भी लाभ होता है। इसके पंचांग के स्वरस से सिद्ध तैल का व्यवहार पामा, कण्डू आदि त्वचा के रोगों में किया जाता है। नेत्रकोष में कोमल पत्तों को तोड़ने से प्राप्त रस को डालने से लाभ होता है। पलित में इसके दूध में पीसकर लगाने से लाभ होता है। मात्रा-मूलत्वक चूर्ण १/८-१ रत्ती। ३२. कनेर (पीत) हिं०-पीला कनेर। बं०-कल्केफुल, कोलका फूल। म०-पिंवली कणहेर। गु०-पीली करेण। ता०- पच्चैअलर। ते०-पच्चागत्रेरु। अं०-Yellow oleander (यलो ओलिएण्डर); Exile Tree (एक्साइल् ट्री); Lucky nut (लकी नट)। ले०-Thevetia neriifolia Juss. (थिवेटिआ नेराइफोलिआ जस्.)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। यह प्रायः सभी प्रान्तों में पाया जाता है। उष्ण प्रदेशों में यह अधिक होता है। यह अमेरिका का आदिवासी है परन्तु अब भारत में सर्वत्र फैल गया है। इसके पुष्पों के लिये यह बगीचों में लगाया जाता है।
गुडूच्यादिवर्गः ४९१ इसका क्षुप-सदाहरित, सुन्दर एवं करीब १२ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-रेखाकार-भालाकार, चमकीले एवं नुकीले होते हैं। फूल-घंटाकृति, पीतवर्ण के, किञ्चित् गन्धयुक्त, पाँच दलवाले तथा शाखाओं के अग्र पर होते हैं। फल-गोल, कच्ची अवस्था में हलके हरे रंग का तथा पकने पर भूरे रंग का १ १/२-२ इञ्च व्यास का होता है जिसके अन्दर एक विशिष्ट त्रिकोणाकृति गुठली होती है। बीज-गुठली के अन्दर हलके पीतवर्ण के २ बीज रहते हैं। इसके प्रत्येक भाग से दुग्ध निकलता है। इसके बीज अत्यन्त विषैले होते हैं तथा आत्महत्या, परहत्या एवं गर्भपात आदि के लिये प्रयोग किये जाते हैं। जानवरों के लिये भी यह विषैले होते हैं। इसकी छाल का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। कोमल टहनियों की छाल को खुली हवा में सुखाकर प्रयोग करना चाहिये। सुखाकर रखी हुई छाल कुछ महीनों में निःसत्त्व हो जाती है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों के गूदे में ५७% तैल पाया जाता है जिससे एक थिवेटीन नामक रवेदार, श्वेतवर्ण का ग्लूकोसाइड प्राप्त किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें अन्य विषैले तत्त्व भी रहते हैं। इसकी छाल में भी यह पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकां क्षीर दाहजनक तथा तीव्र विषैला है। इसकी छाल कड़वी, भेदन, प्रभावशाली ज्वरघ्न तथा नियतकालिक-ज्वरप्रतिबन्धक है। छाल की मात्रा अधिक होने से पानी की तरह पतले दस्त एवं वमन होता है। इसके फल से वमन होता है। छाल की क्रिया तीव्र होने के कारण इसको हमेशा कम मात्रा में ही प्रयोग करना चाहिये। बिल्ली में इसके ग्लूकोसाइड के सूचिकाभरण से देखा गया है कि .२ ग्राम प्रति कि. ग्राम की मात्रा में देने से वह दो घण्टे के अन्दर मर जाती है। इसका मुख्य विषैला परिणाम हृदय की मांसपेशियों पर होता है। तीव्र विषैला होने के कारण इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत कम किया जाता है। (१) पर्यायिक ज्वर में इसकी छाल का टिंक्चर (५ में १) १०, १५ बूँद की मात्रा में दिन में ३ बार दिया जाता है। १ रत्ती इसकी छाल का चूर्ण १५ रत्ती सिंकोना के बराबर गुणकारक होता है। १/२ रत्ती घनक्वाथ देने से ज्वर की पारी नहीं आती। ज्वर आने पर फांट का प्रयोग करते हैं। इसको खाली पेट कभी भी प्रयोग न करें। इससे बहुत पसीना होकर शरीर ठंडा होता है। यदि थकावट हो तो उष्ण दुग्ध एवं थोड़ी अच्छी मदिरा देनी चाहिये। (२) हृदयरोग तथा हृदयोदर में इसके प्रयोग से हृदय को बल मिलता है जिससे रुधिराभिसरणक्रिया ठीक होने लगती है। वृक्कों में रक्ताभिसरण अधिक होने से मूत्रोत्सर्ग अधिक होकर उदर कम होता है। इसका यह प्रभाव डिजिटॅलिस् तथा इसी प्रकार कार्य करने वाली अन्य औषधियों जैसे कडू (हेलीबोर नाइग्रम्), श्वेत रक्त कनेर एवं जंगली प्याज आदि की तरह होता है। इस प्रकार की औषधियों का मिश्रण करके नहीं देना चाहिये। इनके साथ स्वेदजनन, मूत्रजनन तथा विरेचन द्रव्यों का प्रयोग किया जा सकता है। मात्रा-टिंक्चर (५ में १) १०-१५ बूँद; घनक्वाथ १/२ रत्ती। अथ धत्तूरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह धत्तूरधूर्त्तधुस्तूरा उन्मत्तः कनकाह्वयः । देवता कितवस्तूरी महामोही शिवप्रियः ।। ८५ ।। मातुलो मदनश्चास्य फले मातुलपुत्रकः । धत्तूरो मदवर्णाग्निवातकृज्ज्वरकुष्ठनुत् ।। ८६ ।। कषायो मधुरस्तिक्तो यूकालिक्षाविनाशकः । उष्णो गुरुर्व्रणश्लेष्मकण्डूकृमिविषापहः ।। ८७ ।। धत्तूर के नाम तथा गुण-धत्तूर, धूर्त्त, धुत्तूर, उन्मत्त, कनकाह्वय (सुवर्ण वाचक सभी शब्द), देवता, कितव, तूरी, महामोही, शिवप्रिय, मातुल और मदन ये सब इसके संस्कृत नाम हैं। इसके फल को 'मातुलपुत्रक' कहते हैं। धतूरा-मद, वर्ण तथा वातकारक एवं जठराग्निवर्धक, ज्वर-कुष्ठ-नाशक, कषाय, मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, जूंयें और लीखों को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, गुरु तथा व्रण, कफ, खुजली, कृमि एवं विष का नाशक होता है। [८५-८७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
४९२ भावप्रकाशनिघण्टुः ३३. धतूरा हिं० - धतूर, धतूरा, धातूरा। बं० - धुतुरा, धुत्तूरा। म० - धोत्रां। गु० - धंतूरो, धत्तूरो। पं० - धत्तूर, धत्तूरा। मल० - उन्मं, उन्मत्तं। क० - मदकुणिके। ते० - उम्मेत्त, धुत्तुरम्। ता० - उम्मतई। फा० - तातूरह, तातूरा। अ० - बौजमासम, जौजुल्मासेल। अं० - Datura (दतूरा), Thornapple (थार्नेपल)। Fam. Solamaceae (सोलेनेसी)। नोट - राजनिघण्टु ने इसके श्वेत, नील, कृष्ण, रक्त एवं पीत ये पाँच भेद लिखे हैं तथा उनमें से कृष्ण पुष्पवाला अधिक गुणकारी माना है¹। धन्वन्तरिनिघण्टु एवं इसमें इसके भेदों का उल्लेख नहीं है। चरक में धुत्तूर का उल्लेख नहीं है किन्तु 'कनक' का उल्लेख आया है²। लेकिन टीकाकारों ने कनक के कई अर्थ किये हैं। सुश्रुत ने अलर्कविष में इसका उपयोग लिखा है³। यद्यपि तमक श्वास में इसका बहुत उपयोग होता आ रहा है तथापि प्राचीनों ने इसका उल्लेख नहीं किया है। आधुनिक विद्वानों ने भी इसके कई भेदों का वर्णन किया है। इनके गुणों में विशेष अन्तर नहीं है। पाश्चात्य चिकित्सा में स्ट्रैमोनियम् (राजधतूरा) का उपयोग किया जाता है, जिसके बीज काले होते हैं। यहाँ पर कुछ भेदों का वानस्पतिक वर्णन अलग-अलग किया गया है। किन्तु गुणों में साम्य होने के कारण उनको एक साथ ही लिखा गया है। (क) ले० - Datura stramonium Linn. (दतूरा स्ट्रैमोनियम् लिन.), Datura tatula Linn. (दतूरा टॅटुला लिन.), हिं० - राजधतूरा। यह हिमालय के मन्द कटिबन्ध में काश्मीर से लेकर सिक्किम तक ९००० फीट की ऊँचाई तक, मध्य भारत के पहाड़ी प्रदेश, दक्षिणी एवं अन्य प्रान्तों में भी पाया जाता है। इसका क्षुप - एकवर्षायु तथा करीब २-४ फीट ऊँचा होता है। काण्ड - हरा या जामुनी रंग का काला होता है। पत्ते - अंडाकार, धार पर लहरदार यां गहरे विच्छेदों से युक्त, करीब ७ इञ्च लम्बे, ५ इञ्च चौड़े, हलके हरे रंग के, चिकने (कोमल पत्र-लोमयुक्त) तथा पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। इनमें उग्रगन्ध रहती है तथा इनका स्वाद कड़वा एवं अरुचिकारक होता है। पुष्प - श्वेत भूरे या कभी-कभी बैंगनी आभायुक्त, दलपत्र करीब ३-६ इञ्च लम्बे तथा संख्या में ५ रहते हैं। फल - अंडाकार, ऊर्ध्वमुख, चार खण्डों से युक्त तथा कठोर, लम्बे एवं छोटे कंटकों से ढका हुआ, शीर्ष पर चार फाँक में खुलनेवाला एवं इसके आधार पर बाहर और नीचे की ओर मुड़ा हुआ स्थायी प्रवृद्ध बाह्यदल रहता है। बीज - चिपटे, वृक्काकार, करीब ३ मि० मि० लम्बे, २ मि० मि० चौड़े, १ मि० मि० मोटे, काले से भूरे रंग के, खुरदरे, स्वाद में कड़वे, तैलीय एवं अत्यल्प गन्धवाले रहते हैं। दतूरा टॅटुला के क्षुप ऊपर के समान ही होते हैं। इसके काण्ड, पर्णवृन्त एवं पत्तों की प्रधान शिराएँ कुछ लालिमा किये हुए होती हैं एवं दलपत्र ताजी अवस्था में बैंगनीपन लिये हुए नीले रंग के तथा सूखने पर बैंगनी हरे रंग के होते हैं। इसके पत्ते पहले की अपेक्षा कुछ गहरे हरे रंग के होते हैं। इनके बीज, पुष्पयुक्त अग्रभाग एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। पाश्चात्य वैद्यक में इसके टिंक्चर एवं शुष्क तथा प्रवाही सत्व का उपयोग किया जाता है। १. सितनीलकृष्णलोहितपीतप्रसवाश्च सन्ति धत्तूराः। सामान्यगुणोपेतास्तेषु गुणाढ्यस्तु कृष्णकुसुमः स्यात्॥ २. च. चि. अ. ७, अ. २३। ३. श्वेतो पुनर्नवाञ्चास्य दद्याद्धत्तूरकायुताम् । (सु. क. अ. ७)
गुडूच्यादिवर्गः ४९३ रासायनिक संगठन-इसके पत्तों एवं पुष्पयुक्त अग्रभाग में क्षाराभ की मात्रा ०.४७-०.६५% होती है जिसमें मुख्यतया हायोसायमीन (Hyoscyamine) एवं अल्पमात्रा में ॲट्रोपीन (Atropine) तथा हायोसीन (Hyoscine) रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें क्लोरोजेनिक् एसिड (Chlorogenic acid) एवं गहरे रंग का उड़नशील तैल (०.०४५%) पाया जाता है। इसके बीजों में क्षाराभ की मात्रा ०.१-०.५% (औसतन ०.२%) रहती है जिसमें हायोसायमीन अधिक एवं ॲट्रोपीन तथा हायोसीन अल्प रहते हैं। इसमें १५-३०% स्थिर तैल भी होता है। (ख) ले०-Datura metel Linn. (दतूरा मेटल् लिन.)। हिं०-काला धतूरा। यह भारतवर्ष के प्रायः सभी भागों में परती भूमि में पाया जाता है। इसका पौधा-वर्षायु, ३-५ फीट ऊँचा एवं चिकना होता है। पत्ते-अंडाकार-भालाकार, कुछ लहरदार, नोकीले, पर्णवृन्त की तरफ असम, कुछ दन्तुर या खण्डित, ऊपर के दोनों पृष्ठों पर चिकने, पतले, अकेले या युग्म जिसमें से एक बड़ा (७-८ इञ्च) एक छोटा एवं प्रायः ४ इञ्च लम्बे तथा ३ इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-सीधे एवं ६.५-७ इञ्च लम्बे होते हैं। आभ्यन्तर दल श्वेत, प्रायः बाहर से नीललोहित एवं अन्दर से पीताभ होते हैं। फल-गोलाकार, लटकते हुये, छोटे काँटों से युक्त, १। इञ्च व्यास के एवं इनका स्फुटन अनियमित होता है। बीज-कर्णाकृति, चिपटे, ४-५ मि० मि० लम्बे, ३-४ मि० मि० चौड़े एवं १ मि० मि० मोटे होते हैं। इनका किनारा लहरदार, मोटा तथा ३ धारियों से युक्त होता है। इनकी बाह्य सतह पीताभ, भूरी तथा गड्ढेदार होती है। इनमें गन्ध नहीं होती तथा इनका स्वाद कड़वा होता है। (ग) ले०-Datura innoxia Miller (दतूरा इन्नॉक्सिआ मिलर)। यह यद्यपि मेक्सिओ का आदिवासी है तथापि अपने यहाँ भी अब बहुत उत्पन्न होता है। यह (घ) के समान ही होता है किन्तु यह मृदुरोमश होता है तथा इसके आभ्यन्तर कोश १० कोणों से युक्त होते हैं। इसके फल के काँटें कमजोर होते हैं तथा बीज भूरे रङ्ग के होते हैं। रासायनिक सङ्गठन-(ख) एवं (ग) के पत्तों में क्षाराभ की मात्रा ०.२५-०.५५% रहती है जिसमें मुख्यतया हायोसायमीन एवं अल्पमात्रा में हायोसीन रहता है। ख-के बीजों में हायोसीन ०.२% एवं अल्पमात्रा में हायोसायमीन रहता है। इसके अतिरिक्त राल एवं तैल भी इसमें पाया जाता है। गुण और प्रयोग-धतूरा के पत्ते एवं बीज वेदनाहर, उद्वेष्टननिरोधी, संज्ञानाशक, कासहर, श्वासहर, नियतकालिकज्वरप्रतिबन्धक एवं शोथहर हैं। धतूरे की क्रिया बेलाडोना (Belladona) की तरह होती है किन्तु श्वासनलिकाओं पर इसकी क्रिया अधिक तीव्र होने के कारण उनका अधिक विस्फार होता है। यह ॲसीटिल्कोलीन् (Acetylcholine) के कार्य को रोकता है जिससे श्वासनलिकाओं में रहने वाले प्राणदा (Vagus) नाड़ी के अग्रों का घात होने से श्वासनलिकाओं का विस्फार होता है। कभी-कभी इससे हृदय की गति में अनियमितता आती है। इससे विबन्ध नहीं होता। अधिक मात्रा में यह अत्यन्त तीव्र विष है। कुछ लोगों में यह उन्मादकारक होने के कारण उनके लिये यह वाजीकर है। (१) तमक श्वास में उद्वेष्टन रोकने के लिये इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इसके चूर्ण का धूँआ या इसकी बनी सिगरेट का धूम्रपान इसमें लाभदायक होता है। इसका आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। धूँए के लिए धतूरा की पत्ती, कलमी सोरा, काले चाय की पत्ती, लोबेलिआ एवं अनीसी का तेल इनसे बना हुआ मिश्रण (पल्ह लोबेलिआ कम्पाउण्ड) मिलता है जिसमें से चाय की चम्मच बराबर चूर्ण को कमरे में जलाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
४९४ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) पारी से आने वाले शीतज्वर में इसके बीज दही के साथ ज्वर आने के पूर्व खिलाते हैं। इससे ज्वरजन्य कष्ट कम होता है। (३) उदरशूल, पित्ताश्मरीशूल एवं वृक्कशूल आदि में वेदनाहर एवं उद्वेष्टननिरोधिरूप में इसका उपयोग करते हैं। (४) शोथ पर इसके पत्तों का लेप करने से वेदना एवं शोथ कम होता है। अंडशोथ, आमवात, सन्धिशोथ, आध्मान, फुफ्फुसावरणशोथ, नाडीशूल एवं गृध्रसी आदि में इसके पत्तों के क्वाथ से सेंक पत्तों का बन्धन या इससे सिद्ध तैल की मालिश की जाती है। इसके पत्तों के स्वरस का भी उपयोग किया जाता है। शोथयुक्त अर्श तथा गुदविदार में इसका मलहम उपयोगी है। अनेक चर्मरोगों में तथा वातिकविकारों में इससे सिद्ध तैल का उपयोग किया जाता है। स्तनशोथ पर हरिद्रा के साथ इसका पोल्टिस बाँधने से शोथ एवं दुग्ध कम होता है। (५) उन्माद, धनुर्वात एवं जलसंत्रास आदि में इसका प्रयोग करते हैं। शोधन—इसके बीजों को दुग्ध से साथ दोलायन्त्र में शोधन कर लेना आवश्यक है। विषपरिणाम—इसके बीजों को ठग लोग दूसरों को बेहोश कर लूटने के लिये अन्नादि के साथ मिलाकर खिला दिया करते हैं या इसकी सिगरेट आदि पिला देते हैं। इससे गले में शुष्कता, चक्कर, चेहरा लाल, आँखों की पुतलियों का विकास, उन्माद, प्रलाप एवं संन्यास ये लक्षण होकर मृत्यु हो सकती है। उन्माद में रोगी काल्पनिक वस्तुओं को पकड़ने जैसी क्रियायें करने लगता है। विषचिकित्सा—वमन, आमाशयप्रक्षालन, उत्तेजक औषधियों का प्रयोग, शीतल जल से छींटा देना एवं कृत्रिम श्वसन करना चाहिये। प्रलाप अधिक होने पर अफीम का उपयोग किया जा सकता है। शर्करा मिश्रित दुग्ध तथा घृत पिलाना भी हितकर है। विनौले की गरी को दुग्ध के साथ पीसकर पिलाते हैं। कपास के पंचांग का क्वाथ, चौलाई की जड़, गिलोय, दही, नींबू का रस इनका उपयोग भी किया जाता है। पाश्चात्य वैद्यक के फाइसोस्टिग्मीन् या पाइलोकार्पिन नाइट्रेट (१/४-१/२ ग्रेन) इनका प्रयोग बहुत सावधानीपूर्वक किया जा सकता है। मात्रा—बीजचूर्ण १/२-१ रत्ती; पत्रचूर्ण १/२-१ १/२ रत्ती; धूम्रपान के लिये पत्रचूर्ण ५-१५ रत्ती; बीज का टिंक्चर (४ में १) ५-१५ बूँद (५ बूँद से प्रारम्भ करें); टिंक्चर स्ट्रैमोनियम् ५-३० बूँद। अथारूषः (अडूसा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह वासको वासिका वासा भिषङ्माता च सिंहिका। सिंहास्यो वाजिदन्ता स्यादाटरूषोऽटरूषकः॥८८॥ अटरूपो वृषस्ताम्रः सिंहपर्णश्च स स्मृतः। वासको वातकृत्स्वर्यः कफपित्तास्रनाशनः॥८९॥ तिक्तस्तुवरको हृद्यो लघुशीतस्तृडर्त्तिहृत्। श्वासकासज्वरच्छर्दिमेहकुष्ठक्षयापहः॥९०॥ अडूसा के नाम तथा गुण—वासक, वासिका, वासा, भिषङ्माता, सिंहिका, सिंहास्य, वाजिदन्ता, आटरूप, अटरूषक, अटरूष, वृष, ताम्र और सिंहपर्ण ये सब संस्कृत नाम अडूसा के हैं। अडूसा—वातकारक, स्वर उत्तम करनेवाला, तिक्त तथा कषाय-रसयुक्त, हृदय को हितकर, लघु और शीतवीर्य होता है। यह—कफ, पित्त, रक्तकोप (या रक्तपित्त), तृषा, श्वास, खाँसी, ज्वर, वमन, प्रमेह, कुष्ठ एवं क्षय को दूर करता है। [८८-९०] नोट—प्राचीन ग्रन्थों में अडूसा एक ही प्रकार का लिखा है। श्री डॉ० देसाई ने अडूसा, अधाटोडा वासिका (Adhatoda vasica) के अतिरिक्त एक श्वेत (रक्तपुष्प) अडूसा, जस्टिसिआ पिक्टा (Justicia picta) एवं अन्य
गुडूच्यादिवर्गः ४९५ काला अडूसा (नील निर्गुण्डी), जस्टिसिआ जेण्डारुसा (Justicia gendarùssa) इनका वर्णन किया है। केरल देश में अडूसा का अन्य छोटा भेद अधाटोडा बेड्डोमी सी० बी० क्ला० (Adhatoda beddomei C. B. Clarke) का अधिक व्यवहार किया जाता है क्योंकि वह अधिक गुणकारी होता है ऐसा कोट्टयम से प्रकाशित ‘आयुर्वेदिक फ्लोरा मेडिका’ में लिखा हुआ है। उसके पुष्प बिलकुल श्वेत होते हैं। ३४. अडूसा हिं०-अडूसा, अडूस, अरुस, बाकस, बिसोंटा, रूसा, अरुशा। बं.-बासक, बाकस। म०-अडुलसा। मा०- अडुसो। गु०-अरडुसो (सी)। क०-आडुसोगे। ते०- आडा सारं, अडुसरमु। मल०-वलिय आटलोटकम्। ता०-अटतोटै। पं०-भेकर। फा०-वाँसा, ख्वाजा। अ०-हशीशतुस्सुआल। अं०-Malabar nut (मलाबारनट)। ले०-Adhatoda vasica, Nees. (अधाटोडा वासिका नीज)। Fam. Acanthaceae (एकैन्थ्येसी)। यह भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में एवं हिमालय के निचले भागों में ४००० फीट की ऊँचाई तक उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-सदाहरित, झाड़ीदार, दुर्गन्धयुक्त, ३-८ फीट ऊँचा एवं प्रायः समूहबद्ध होकर लगता है। काण्ड की गाँठें फूली हुई रहती हैं। पत्ते-५-८ इञ्च लम्बे, १॥-२॥ इञ्च चौड़े, भालाकार, या अंडाकार, दोनों सिरों पर नोकीले, अखण्ड, अत्यन्त सूक्ष्म मृदुरोमश, विशेषकर नये पत्ते एवं १/२-१ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-श्वेत, विनाल, द्वयोष्ठी एवं १.३ इञ्च लम्बे होते हैं तथा १-३ इञ्च लम्बी मञ्जरियों में पाये जाते हैं जो उपशाखाओं के अग्र पर प्रायः समूहबद्ध रहती हैं। पुष्पों पर २ टेढ़ी बैंगनी धारियाँ होती हैं। इसमें बड़े-बड़े कोणपुष्पक और वृन्तपत्र भी रहते हैं। फली-पौन इञ्च लम्बी, तिहाई इञ्च चौड़ी, मुद्रराकार, लम्बाई में धारीदार मृदुरोमश एवं ४ छोटे बीजों से युक्त होती. है। इसके पत्तों से एक प्रकार का पीला रंग निकलता है। इसके पत्र, पुष्प एवं मूलत्वक् का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। मूलत्वक् पुराने क्षुप की लेनी चाहिये। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक कडुवा खेदार क्षाराभ वॅसिसिन (Vasicine, C₁₁ H₁₂ N₂ O) करीब .२५%, अधाटोडिक एसिड, उड़नशील तैल, वसा, राल, शर्करा, गोंद एवं पीत रंजक द्रव्य में पाये जाते हैं। मूलत्वक् में भी क्षाराभ की करीब इतनी ही मात्रा होती है। यह क्षाराभ मद्यसार में घुलनशील, शीत जल में अल्प एवं उष्ण जल में अधिक घुलनशील होता है। यह क्षाराभ हरमल (Peganum harmala) में पाये जाने वाले पेगॅनीन (Peganine) के सदृश होता है। गुण और प्रयोग-अडूसा उत्तेजक, कफनिःसारक, शीतवीर्य, उद्वेष्टननिरोधी, स्वर्य, कृमिघ्न, कुष्ठहर, रक्तपित्तघ्न, श्वासहर, कासहर एवं क्षयघ्न है। इसके पुष्प तिक्त, कटु, ज्वरघ्न, मूत्रजनन, उद्वेष्टननिरोधी एवं शीतल हैं। इसकी मूलत्वक् ज्वरघ्न, मूत्रजनन, कफनिःसारक, नियतकालिक ज्वरहर, कृमिघ्न एवं कोथप्रशमन है। उद्वेष्टननिरोधी गुण मूल एवं पत्र की अपेक्षा पुष्पों में एवं कफनिःसारक गुण पत्तों की अपेक्षा मूल में अधिक रहता है। पत्र स्वेदजनन है। इसका प्रधान गुण कफ को पतला करना एवं आसानी से बाहर निकालना है। अधिक मात्रा में इससे वमन एवं विरेचन होता है। इसमें के क्षाराभ वासिसिन को जानवरों में शिरान्तर्गत सूचिकाभरण से देखा गया कि रक्तसंवहन एवं महास्रोत पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। इससे श्वासनलिकाओं में अल्प किन्तु स्थायी विस्फार होता है.जो ॲट्रोपीन साथ में देने से अधिक हो जाता है। इसमें का कफनिःसारक गुण सम्भवतः मुख्यतया इसमें के उड़नशील तैल के कारण है। इसके पत्ते निम्न श्रेणी के जलाश्रयी जीव, बुरा, पराश्रयी जीवाणु, मच्छर, मक्खी एवं गोजर आदि के लिये विषैले माने जाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
४९६ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) कफविकारों में इसका बहुत प्रयोग करते हैं। नवीन श्वसनीशोथ में इससे आराम मिलता है विशेषकर जब कफ गाढ़ा तथा चिपचिपा होता है। जीर्ण श्वसनीशोथ में इससे खाँसी में आराम मिलता है तथा कफ ढीला होकर आसानी से बाहर निकल जाता है। कफयुक्त प्रलेपक ज्वर में इसका बहुत उपयोग करते हैं। इनमें इसके पुटपाक करके निकाले स्वरस को १/२-१ १/२ तो० की मात्रा में आर्द्रक स्वरस या छोटी पीपल, कुछ सैंधव एवं मधु के साथ देते हैं। श्वास, कास एवं रक्तपित्त में अडूसा, द्राक्षा एवं हर्रा इनका क्वाथ मधु एवं शर्करा के साथ उपयोगी है। नये श्वसनीशोथ में कण्टकारी, जवासा, नागरमोथा, सोंठ एवं अडूसा इनका क्वाथ उपयोगी है। बच्चों के कफविकारों में इसके स्वरस के साथ टंकण देते हैं। वासावलेह का भी अच्छा उपयोग होता है। (२) राजयक्ष्मा में हाथ-पैर आदि में जलन, ज्वर एवं ऊर्ध्वग रक्तपित्त होने पर वासाघृत (च० चि० अ० ८) का उपयोग किया जाता है। इसमें पत्रस्वरस, वंशलोचन, तालीसपत्र, कोहड़े का रस एवं मधु भी दिया जाता है। नवीन प्रयोगों से देखा गया है कि राजयक्ष्मा में इसका कोई प्रभाव नहीं है। केवल इससे वातनाडियों पर शामक प्रभाव के कारण एवं कफ के पतला होने से खाँसी में आराम मिलता है। (३) तमकश्वास में इसके पत्तों का धूम्रपान लाभदायक है। इसके साथ धतूरे के पत्र का उपयोग करने से जल्दी गुण होता है। इसका आंतरिक प्रयोग भी किया जाता है। इससे सिद्ध घृत का प्रयोग करते हैं। यह तमकश्वास के आवेग को बन्द करने में समर्थ नहीं है। (४) रक्तपित्त में इसका स्वरस मधु के साथ देते हैं। इसके फूलों के गुलकंद तथा पत्र चूर्ण का भी उपयोग किया जाता है। वासाघृत (च० चि० अ० ४) मधु के साथ सेवन करने से रक्तपित्त जल्दी रुकता है। (५) मलेरिया में इसके पत्तों के चूर्ण या मूलत्वक्चूर्ण का उपयोग करते हैं। (६) आध्मान, अतिसार एवं प्रवाहिका में इसका स्वरस दिया जाता है। इससे आंत्रस्थ जीवाणुओं का नाश होता है एवं अन्न का सड़न रुकता है। (७) आमवातिक संधिशोथ, शोथ एवं नाड़ीशूल आदि में पत्तों का पोल्टिस लगाया जाता है। (८) त्वचा के रोगों में इसका रस पिलाते हैं तथा इसके पत्तों का लेप एवं क्वाथ से स्नान आदि कराते हैं। (९) जंतुघ्न होने के कारण इसके पत्तों को जल में रखने पर जल खराब नहीं होता। इसके पत्तों में फल बाँध कर रखने से फल सड़ता नहीं। इसका मद्यसारीय अर्क मक्खी, पिस्सू एवं मच्छर आदि के लिये घातक होता है। खेत में इसके पत्तों का खाद देने से इनमें रोग नहीं होते। ऊनी कपड़ों में इसके पत्ते रखने से कीड़े नहीं लगते। मात्रा-पत्रचूर्ण १-२ माशा, स्वरस १/२-१ १/२ तोला, मूलत्वक् ४ र०-१ माशा, पुष्प ५-१० र० क्वाथ १- २ तो०। ३५. रक्तपुष्प अडूसा ले०-Justicia picta Linn. (जस्टिसिआ पिक्टा लिन.)। Fam. Acan-thaceae (एकैन्थ्येसी)। यह बागों में लगाया हुआ मिलता है। इसके क्षुप बड़े होते हैं। इसके पत्ते दीर्घवृत्ताकार, ३-८ इञ्च बड़े, गहरे रंग के एवं इन पर सफेद छींटे रहते हैं। इसके काण्ड की गाँठें फूली हुई और रक्ताभ होती है। इसमें गहरे लाल वर्ण के पुष्प आते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण अडूसा के समान ही होते हैं किन्तु इसमें स्नेहन एवं शोथघ्न ये गुण अधिक हैं। बच्चों के गले में जब कफ से घुरघुराहट होती है तब इसके पत्तों का पुटपाक करके निकाला स्वरस एवं टंकणक्षार देते
गुडूच्यादिवर्गः ४९७ हैं। इसको मधु एवं छोटी पीपल के साथ भी दिया जाता है। दुग्ध के कारण स्तन में शोथ होने पर या अन्य स्थान में शोथ होने पर इसके पत्तों को नारियल के रस में पीसकर बाँधने से सूजन कम होती है। मात्रा—बच्चों में १०-२० बूँद स्वरस मधु एवं छोटी पीपल के साथ। ३६. काला अडूसा सं०-नीलनिर्गुण्डी ? हिं०-काला अडूसा, नील निर्गुण्डी। बं०-जगतमदन, मामलक। म०-काला अडूलसा, कालोशंबालू। बंब०-वाकस। ता०, मल०-करुनोचचि। ते०-नल्लनोचिलि। ले०-Justicia gendarussa Burm. (जस्टिसिआ जेण्डारुसा बर्म)। Fam. Acanthaceae (एकैन्थेसी)। इसके क्षुप बागों में रास्ते के किनारों पर लगाये जाते हैं। इसके क्षुप-२-४ फी ऊँचे होते हैं। काण्ड-कभी-कभी धारीदार होते हैं। पत्ते-३-५ इञ्च लम्बे, पासवत् या रेखाकार प्रासवत्, चिकने एवं १/४ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-बरसात में श्वेतवर्ण के पुष्प अवृन्त काण्डज क्रम में निकले रहते हैं। पुष्पों के अन्दर जामुनी रंग के चिह्न रहते हैं। बीजकोष १/२ इञ्च, सूक्ष्म, लोमयुक्त तथा ४ बीजों से युक्त होता है। इसके पत्तों में मनोहर गन्ध आती है। इसके पत्तों का स्वरस चिकित्सा में उपयोग में लाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, ज्वरघ्न, कफनिःसारक, वामक एवं रेचन है। यह वनस्पति अत्यन्त तीव्र होती है इसलिये बाल एवं वृद्ध में इसका उपयोग नहीं करना चाहिये। इससे वमन एवं विरेचन होने लगता है। इसके प्रयोग के समय चावल की माँड़ घृत डालकर देनी चाहिये। (१) फुफ्फुस के विकारों में इसका प्रयोग करते हैं। तीव्र कफविकारों में इसके २-४ पत्ते एवं अपामार्ग की राख १/८ तो०, एक तोला मधु के साथ देते हैं। न्युमोनिया (Pneumonia) में चार पत्तों का रस, सहेजन की छाल का रस एवं सामुद्र नमक मधु के साथ देते हैं। (२) ज्वर एवं आमवात में इससे पसीना निकलता है। आमवात में इसके पत्तों के क्वाथ से सेकने से आराम मिलता है। (३) इसका रस सरसों के तेल के साथ पिलाने से वमन होता है। (४) इसके रस को तैल में मिलाकर गाँठों पर लगाया जाता है। अथ पर्पटः (पित्तपापड़ा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पर्पटो वरतिक्तश्च स्मृतः पर्पटकश्च सः। कथितः पांशुपर्यायस्तथा कवचनामकः ।।९१।। पर्पटो हन्ति पित्तास्रभ्रमतृष्णाकफज्वरान् । संग्राही शीतलस्तिक्तो दाहनुद्वातलो लघुः ।।९२।। पित्तपापड़ा के नाम तथा गुण-पर्पट, वरतिक्त, पर्पटक, पांशुपर्याय ('पांशु' वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) एवं कवचनामक ('कवच'वाची सभी शब्द इसके पर्यायवाचक हैं) ये सब संस्कृत नाम 'पित्तपापड़ा' के हैं। पित्तपापड़ा-संग्राही, शीतवीर्य, तिक्तरसयुक्त, दाह को दूर करने वाला, वातकारक और लघु होता है एवं यह पित्त, रक्तदोष, भ्रमरोग, तृषा, कफ और ज्वर इन सबों को नष्ट करता है। [९१-९२] नोट-पित्तपापड़ा के नाम से विभिन्न प्रान्तों में भिन्न-भिन्न वर्गों की वनस्पतियों का एवं उनके उपभेदों का उपयोग किया जाता है इस कारण इसके लेटिन नामों में पर्याप्त विभिन्नता पाई जाती है। जिन द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है उनमें उपर्युक्त शास्त्रीय गुणों में से कुछ-न-कुछ पाये जाते हैं। अन्य निघण्टुओं में भी उपर्युक्त प्रकार के ही गुण लिखे हैं। चरक मे तृष्णानिग्रहण गण में इसका पाठ है एवं रक्तपित्त, ज्वर, कुष्ठ, संग्रहणी, पांडु एवं अतिसार आदि में इसका उपयोग किया गया है। ३५ भाव.I
४९८ भावप्रकाशनिघण्टुः विभिन्न ग्रन्थों में निम्नलिखित विभिन्न वनस्पतियों का पर्पट नाम से उल्लेख है :— (१) Oldenlandia corymbosa, Linn. Fam.; Rubiaceae (ओल्डेन्लेण्डिआ कोरिम्बोसा, लिन. रुबिएसी), बं०-खेतपापड़ा। इसका बंगाल में अधिक व्यवहार किया जाता है। श्रीयुत यादवजी ने अपनी पुस्तक में जो नव्य मत दिया है उसे श्री डॉ० देसाई ने इसी वर्ग के हेडिओटिस् बाइफ्लोरा (Hedyotis biflora) के अन्तर्गत किया है। लेकिन डॉ० देसाई ने इसका बंगाली नाम खेतपाप्रा ही लिखा है। श्री डॉ० चोपरा ने खेतपाप्रा का नाम ओ० बाइफ्लोरा, लिन. (O. biflora, Linn.) लिखा है। श्री बापालालजी की पुस्तक में हे० बर्मानिआना (H. burmanniana) का भी उल्लेख है। इन उपर्युक्त नामों से ऐसा मालूम होता है कि ये या तो एक दूसरे के पर्याय हों या एक ही वनस्पति के उपभेदों में से हों। (२) Fumaria indica, Pugsley; Fam. Fumariaceae (फ्युमेरिया इण्डिका, पग्सले, फ्युमेरिएसी), हिं-शाहतराभेद—यह शाहतरा, फ्यु० ऑफिसिनॅलिस् (Fumaria officinalis) का भेद है। इन दोनों का व्यवहार पंजाब, सिंध, राजपुताना, उत्तर प्रदेश और बिहार के वैद्य पर्पट नाम से करते हैं ऐसा श्री यादवजी ने लिखा है। (३) Polycarpea corymbosa, Lam.; Fam. Caryophyllaceae (पॉलिकार्पीआ कोरिम्बोसा, लॅम्, कॅरियोफाइलेसी)। श्री ठा० बलवन्तसिंहजी लिखते हैं कि उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर पर्पट के नाम से इसका व्यवहार किया जाता है। (४) (क) Justicia procumbens, Linn.; Fam Acanthaceae (जस्टिसिआ प्रोकम्बेन्स, लिन., एकेन्थेसी)। बम्ब०-घांटी पित्तपापडा। इसे श्री डॉ० चोपरा ने नं० २ का प्रतिनिधि लिखा है। कुछ लोगों ने ज० डिफ्यूजा विल्ड (J. diffusa Wild) को घांटी पित्तपापड़ा माना है। (ख) Rungia repens, Nees.; Fam. Acanthaceae (रंजिआ रिपेन्स, नीज; एकन्थेसी)। श्री यादवजी ने लिखा है कि गुजरात के वैद्य ‘खडसलियो’ नाम से इसका व्यवहार करते हैं। श्री बापालालजी ने नं० ४ (क) को ‘खडसलियो पीतपापडो’ लिखा है। (ग) Rungia parviflora, Nees. (रंजिआ पार्विफ्लोरा, नीज.)—इसका भी ‘खडसलीयो’ नाम से व्यवहार किया जाता है। (घ) Peristrophe bicalyculata Nees.; Fam. Acanthaceae (पेरिस्ट्रोफ बाइकॅलिकुलेटा. नीज. एकेन्थेसी)। श्री डॉ० सखाराम अर्जुन ने ‘बाम्बेड्रग्स’ पुस्तक में इसका ‘घाटीपित्तपापड़ा, नाम से उल्लेख किया है। इसका विशेष वर्णन आगे काकजंघा के अन्तर्गत किया गया है। (५) Glossocardia linearifolia, Cass.; Fam. Compositae (ग्लॉसो-कार्डिआ लिनिएरिफोलिआ, कॅस; कॉम्पोझिटी)। श्री डॉ० देसाई ने इसका ‘पूना’ का नाम पित्तपापडा दिया है तथा अन्य प्रान्तों में भी कहीं-कहीं इसका पित्तपापड़ा के स्थान पर व्यवहार किया जाता है। (६) Mollugo stricta, Linn.; Fam. Ficoidaceae (मोल्युगो स्ट्रिक्टा, लिन.; फिको इडीसी)। श्री डॉ० देसाई ने इसका संस्कृत नाम ‘पर्पटका’ लिखा है। ३७. पर्पट (१) सं०-क्षेत्रपर्पट, पर्पट। हिं०-दमनपापड़ा। बं०-खेतपापड़ा। म०-परिपाठ, पापटी। गु०-परपट। ता०- पर्पदागम। ते०-वेरिनेल्लावेमु। गोआ-पोपटी, कड्डरी। ले०-Oldenanldia corymbosa Linn. (ओल्डेन्लेण्डिआ कोरिम्बोसा लिन.); Fam. Rubiaceae (रुबिएसी)।
गुडूच्यादिवर्गः ४९९ यह भारतवर्ष के प्रायः सभी भागों में ६००० फीट की ऊँचाई तक होता है। इसके क्षुप गीले स्थानों एवं सूखे धान के खेतों में पाये जाते हैं। इसका क्षुप-वर्षायु, ३-१५ इञ्च ऊँचा, अनेक शाखाओंवाला, प्रसरणशील, प्रायः चिकना या कभी-कभी मृदुरोमश होता है। पत्ते-रेखाकार, रेखाकार-भालाकार या पतले लम्बे परन्तु अंडाकार प्रासवत् एवं .५-२ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, प्रायः दो-दो एक साथ और सफेद होते हैं। फली-गोलाकार एवं चिकनी होती है। बीज-हलके भूरे रंग के एवं कोणयुक्त होते हैं। इसके तथा इसके अन्य उपभेदों के ताजे अथवा सुखाये हुये पौधे का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। बंगाल के वैद्य पर्पट के नाम से इसका प्रयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पंचांग में दो समान प्रकार के क्षाराभ बाइफ्लोरीन एवं बाइफ्लोरोन (Biflorine and Biflorone) तथा एक रंजित द्रव्य ये पदार्थ पाये जाते हैं। क्षाराभ की मात्रा शुष्क पौधे के वजन के अनुपात में ०.१२% तक रहती है। इसकी राख में सोडियम्, पोटैशियम् एवं कॉल्शियम के क्षार विशेषकर क्लोराइड पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-खेतपापड़ा, शीतल, ज्वरघ्न, दाहशामक, कफघ्न, तिक्तपौष्टिक एवं अल्प स्तम्भन है। इसका उपयोग ज्वर, यकृद्विकार, कामला एवं कृमि में किया जाता है। (१) पित्त तथा वातप्रधान ज्वर में इसका बहुत उपयोग किया जाता है। अर्धविसर्गी ज्वर एवं जीर्ण मलेरिया में इसका क्वाथ दिया जाता है। इससे शरीर का दाह, तृष्णा, आमाशयिक प्रक्षोभ, भ्रम एवं सुस्ती आदि दूर होती है तथा पसीना एवं पेशाब अधिक होती है। पित्तज्वर में इसके साथ 'शाहतराभेद' का उपयोग करते हैं। सन्ततज्वर में वमन, विरेचन, भ्रम एवं शरीर में शिथिलता आदि लक्षण होने पर इसके साथ हंसराज, ब्राह्मी, चन्दन, विरेचन, भ्रम एवं शरीर में शिथिलता आदि लक्षण होने पर इसके साथ हंसराज, ब्राह्मी, चन्दन, खस, नागरमोथा, गुडूच एवं हरी चाय का क्वाथ बनाकर पिलाते हैं। खेतपापड़ा, गुडुच, नागरमोथा, चिरायता एवं घोडवच इनका पंचभद्र नामक क्वाथ सब प्रकार के ज्वरों में दिया जाता है। दाहशान्ति के लिये चन्दन एवं इसका लेप किया जाता है। इसके स्वरस को हाथ-पैर की जलन में लगाते हैं। (२) क्षेत्रपर्पट, रोमान्तिका (Measles) के लिए बिल्कुल निश्चित औषध मानी जाती है। (३) गले एवं श्वासनलिका की सूजन में इसके धूम्रपान से कफ ढीला होकर शीघ्र गिरने लगता है। तमकश्वास, में छोटी पीपल, मुलेठी एवं क्षेत्रपर्पट मधु के साथ देते हैं तथा इससे थोड़ा धूम्रपान भी कराते हैं। मात्रा-२ से ८ माशा। ३८. पर्पट (२) हिं०-शाहतराभेद, पित्तपापड़ा, धमगजरा। बं०-वनशुल्फा। म०-पित्तपापड़ा, शातरा। गु०-पित्तपापड़ा। ता०-तुरा। ते०-चाटराशि। अ०-शाहतरज। फा०-शाहतर। ले०-Fumaria indica Pugsley (फ्युमेरिआ इण्डिका, पग्सले); Fam. Fuma-riaceae (फ्युमॅरिएसी)। यह पंजाब, दिल्ली, चित्तौड़ एवं खानदेश तथा अन्य सभी प्रान्तों में गेहूँ के खेतों में जाड़े के दिनों में पाया जाता है। इसका क्षुप-(क्षुद्र वनस्पति) अनेक शाखाओं वाला स्वावलम्बी या प्रसरणशील एवं ½-१ फुट ऊँचा होता है। पत्ते-गाजर के पत्ते के समान बहु विभक्त होते हैं। पुष्प-श्वेताभ या गुलाबीलाल, सिरे पर जामुनी रंग के और .२- ३ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प के बाह्यदल दो, आभ्यन्तर दल २-२ और इनमें बाहरवाले नीचे की ओर चोंचदार, भीतर
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५०० भावप्रकाशनिघण्टुः के दोनों ऊपर की ओर संयुक्त, पुंकेशर ६, तीन-तीन एक साथ मिले हुए रहते हैं। फल-गोलाकार और बीज छोटे होते हैं। इसके पंचांग का उपयोग किया जाता है। शाहतरा-नामक फारस से आने वाला द्रव्य इसी की दूसरी जाति फ्यु. ऑफिसिनॅलिस् लिन. (F. officinalis Linn.) से प्राप्त होता है। यह स्वाद में कड़ुआ, कुछ तीता एवं कषाय रहता है। भारतीय की अपेक्षा फारसी शाहतरा अधिक गुणकारी होता है तथा उसी का अधिक प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-शाहतरा में फ्युमॅरिक् ॲसिड (Fumaric acid) एवं फ्युमेरिन (Fumarine) नामक एक क्षाराभ रहता है। क्षाराभ की मात्रा ६% तक रहती है जिस पर इसके गुण निर्भर हैं। गुण और प्रयोग-शाहतरा स्वेदजनन, मूत्रल, सं्रसन एवं तिक्तपौष्टिक है। इसकी क्रिया 'घांटीपित्तपापड़ा' के समान होता है किन्तु उससे यह अधिक लाभदायक है। इसके पंचांग के क्वाथ का उपयोग ज्वर, प्रतिश्याय, रक्तविकार, गंडमाला, राजयक्ष्मा दण्डाणुजन्य त्वचा के विकार, यकृतपीड़ा, कुष्ठ, उपदंश एवं अन्य त्वचा के विकारों में किया जाता है। कफज्वर में गोल मिरिच के साथ इसका क्वाथ देते हैं। पित्तज्वर में इसका क्वाथ बहुत ही लाभदायक है। प्रतिश्याय आदि में इसका बहुत व्यवहार करते हैं। इससे पसीना होता है, पेशाब अधिक होता है। शरीरपीड़ा कम होती है एवं पाखाना साफ होता है। इसके लिये २ १/२ तोला शाहतरा, वनफशाह १/२ तोला, मिरिच एवं सोंठ १/४ तोला, मुनक्का १ तोला एवं जल १ सेर इनका चतुर्थांश क्वाथ बनाकर ५ तोला दिन में ३-४ बार देते हैं। आंत्रशैथिल्य से उत्पन्न कुपचन में शाहतरा लाभदायक है। मात्रा-क्वाथ २ १/२ से ५ तोला; चूर्ण २ से ७ माशा। ३९. पर्पट (३) हिं०-पित्तपापड़ा प्रतिनिधि । गु०-झीणा पाननो ओखराड़ । ता०-निलैसेदचि । ले०-Polycarpea corymbosa Lam. (पॉलिकार्पिआ कोरिम्बोसा लॅम्) । Fam. Caryophyllaceae (कॅरियोफाइलेसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। उत्तर प्रदेश में पूर्वी जिलों में क्वार-कार्तिक महीने में प्रायः बाजरे के खेतों में इसके पौधे उगे हुए मिलते हैं और ग्रामीण पित्तप्रकोप की शान्ति के लिये इसका पित्तपापड़ा के नाम से व्यवहार करते हैं। उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर पर्पट के नाम से इसका व्यवहार किया जाता है। छोटा नागपुर तथा सोन के आसपास पथरीली एवं बलुई जमीन में यह पाया जाता है। इसका क्षुप-अनेक शाखाओं से युक्त ३-६ इञ्च ऊँचा एवं कभी १२ इञ्च ऊँचा होता है। शाखाएँ-अत्यन्त कृश, तूलरोमश और सीधी होती है। पत्ते-रेखाकार और अभिमुख होते हैं। पुष्प-रजत वर्ण, बहुत छोटे तथा शीर्षस्थ सघन द्विविभक्त मंजरियों में आते हैं। बाह्यदल भूरे और फल बन जाने पर चमकीले या रजतवर्ण और आभ्यन्तरदल सूक्ष्म एवं रक्तवर्ण के होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें साबुनसत्त्व पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग सर्पादि के दंश में विषनिवारण के लिये बाह्याभ्यन्तर करते हैं। इसके पत्तों को पीसकर, व्रण, व्रणशोथ एवं फोड़े आदि पर बाँधते हैं। इसके पत्तों का स्वरस राब के साथ कामला में पिलाया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। ४०. पर्पट (४) म०-घांटी पित्तपापड़ा। ता०-नेरिपुट्टी। ले०-Justicia procumbens Linn. (जस्टिसिआ प्रोकम्बेन्स लिन.) । Fam. Acanthaceae (एकॅन्थेसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
यह दक्षिण में बरसात के दिनों में अधिक होता है। इसका क्षुप-करीब ९-१० इञ्च ऊँचा होता है। इसके पत्ते-३/४-१ १/२ इञ्च लम्बे, १/४-३/४ इञ्च चौड़े तथा सूक्ष्मरोमावृत होते हैं। फूल-छोटे तथा हलके जामुनी रंग के होते हैं। पुष्पित होने पर इनको उखाड़ कर सुखाकर रखना चाहिये। इसकी गंध हल्लासकारक होती है। इसी वर्ग के अन्य क्षुपों का भी पर्पट नाम से कहीं-कहीं व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक कडुआ क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह मूत्रल, मृदुविरेचक एवं स्वेदकारक है। कडुए पदार्थों के साथ इसका क्वाथ पित्तज्वर में देने से पसीना होता है, दाह कम होता है, पेशाब अधिक होता है एवं एक दो पाखाना होकर यकृतशोथ एवं यकृत्पीड़ा कम होती है। नेत्राभिष्यन्द में इसके पत्रस्वरस को डालने से लाभ होता है। इसका शाहतरा के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। J. diffusa Willd. (ज. डिफ्यूजा विल्ड.) के मूल का उपयोग मुंडा जाति के लोग पागलपन में करते हैं। यह राँची, सरकार तथा डेक्कन में होता है। ४१. पर्पट (५) हिं०-सेरी, दांतरीसा। बम्ब०-फत्तरसुबा। पूना-पित्तपापड़ा। ते०-परपलकम्। ले०-Glossocardia linearifolia Cass. (ग्लॉसोकार्डिआ लिनिएरिफोलिआ कॅस्.)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। यह मध्यभारत, दक्षिण तथा अन्य प्रान्तों में प्रायः चट्टानों के ऊपर पाया जाता है। इसका क्षुप-छोटा, सुन्दर, गंधयुक्त, १-६ इञ्च या कभी-कभी १० इञ्च तक ऊँचा, चिकना तथा अनेक शाखाओं वाला होता है। पत्ते-१-२ बार पञ्चवत्-खण्डित, एकान्तर और खण्ड,रेखाकार होते हैं। पुष्प-छोटे तथा पीले रंग के मुण्डकों (Capitulum) में आते हैं। प्रान्तीय जिह्वाकार पुष्प, स्त्रीपुष्प और प्रायः अकेला रहता है। केन्द्रीय पुष्प उभयलिंग, संख्या में कम और नालाकार होते हैं। अधःपत्रावलि (Involucre) के पत्र बाहर की ओर प्रायः संख्या में तीन और छोटे तथा भीतर के आयताकार, बड़े और धार पर झिल्ली सदृश होते हैं। इसका स्वाद कडुआ एवं गन्ध साधारण सीवा जैसी होती है। इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में उड़नशील तैल तथा पत्र, पुष्प एवं काण्ड में एक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह स्वेदजनन, ज्वरघ्न एवं गर्भाशयसंकोचक है। इसके गुण पित्तपापड़ा जैसे ही होते हैं किन्तु इसकी क्रिया यकृत् की अपेक्षा गर्भाशय पर अधिक होती है। इसका क्वाथ अन्य सुगंधित पदार्थों के साथ अनार्तव एवं पीड़ितार्तव में दिया जाता है। दाँतों से रक्तस्राव होने पर या दन्तकृमि में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। ४२. पर्पट (६) सं०-पर्पटका। हिं०-तपझाड। बं०-जोलपप्र। ले०-Mollugo stricta Linn. (मोल्युगो स्ट्रिक्टा लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडिसी)। यह प्रायः सब जगह ऊसर या जोताऊ भूमि में होता है।
।इसका क्षुप-(क्षुद्र वनस्पति) ३-१० इञ्च ऊँचा होता है। शाखायें-अनेक, पतली, नालीदार या कोणयुक्त होती हैं। पत्ते-अभिमुख या चक्राभास क्रम में निकले हुये, .५-१.७ इञ्च लम्बे तथा प्रायः मांसल होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, हरित या श्वेत होते हैं। फल-आयताकार और तीन पक्षवाला होता है। इसका स्वाद कड़वा होता है। इसका साग बनाकर खाते हैं। गुण और प्रयोग-यह दीपन, आनुलोमिक, विषमज्वरहर एवं आर्तवजनन है। प्रसूता को इसकी साग खिलाई जाती है। इससे भूख बढ़ती है, पाखाना साफ होता है तथा आर्तवशुद्धि होती है। विषमज्वर में भी इसे खिलाते हैं।
अथ निम्बः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
निम्बः स्यात्पिचुमर्दश्च पिचुमन्दश्च तिक्तकः। अरिष्टः पारिभद्रश्च हिङ्गुनिर्यास इत्यपि ।।९३।। निम्बः शीतो लघुर्ग्राही कटुपाकोऽग्निवातनुत्¹। अहृद्यः श्रमहृत्तृट्कासज्वरारुचिकृमिप्रणुत्। व्रणपित
गुडूच्यादिवर्गः ५०३ सुगंधयुक्त फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल-करीब १/२ इञ्च खिरनी के समान लम्बाई लिये गोल होते हैं जिसमें एक- एक बीज होते हैं। बीजों को निम्बोली कहते हैं। इसकी छाल से एक स्वच्छ, चमकीला अम्बर के वर्ण का गोंद निकलता है। इसकी छाल करीब १० मि० मि० मोटी, बाहर से भूरे-धूसर वर्ण की, खुरदरी शल्कसम एवं फटी हुई तथा अन्दर से पीताभ, परतदार एवं मोटे रेशों से युक्त होती है। इसकी छाल, मूलत्वक्, पत्र, गोंद, फल, बीज, पुष्प, ताड़ी एवं तैल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके काण्डत्वक् में एक कडुवा पदार्थ मार्गोसीन (Margosine), निम्बिडिन (Nimbidin, 0,5%), निम्बिन (Nimbin, C₂₈ H₄₀ O₈, 0.03%), निम्बिनिन् (Nimbinin C₂₇ H₃₀ O₉), निम्बोस्टेरोल् एवं पुष्पों में पाये जाने वाले उड़नशील तैल की तरह एक उड़नशील तैल ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें करीब ६% टैनिन भी रहता है। इसके बाह्यत्वक् में टैनिन अधिक रहता है तथा अन्तस्त्वक में कडुवे पदार्थ पाये जाते हैं। इसके अन्तस्त्वक् का क्वाथ बनाना चाहिये। इसके पत्तों में भी कडुवा पदार्थ रहता है जो छाल की अपेक्षा कम मात्रा में होते हुए भी जल में अधिक मात्रा में एवं जल्दी घुलता है। इसके बीजों में ३१% तक एक तेल रहता है जो गहरे पीले रंग का, कडुवा, तीता एवं दुर्गन्धयुक्त होता है। इसमें करीब २% कडुवे पदार्थ रहते हैं जिनमें निम्बिन, निम्बिनिन, निम्बिडिन एवं तैल में घुलनशील एक द्रव निम्बिडोल (Nimbidol, 0,6%) ये पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इस तैल में ओलिक एसिड (Oleic acid, 49-61.9%), लिनोलिक् एसिड (Linoleic acid, 2.12-15%), पामिटिक् एसिड् (Palmitic acid, 12.62-15%), स्टियरिक् एसिड् (Stearic acid, 14.4-21.3%), ॲरॅचिडिक् एसिड् (Arachidic acid, 1.3-1.8%) एवं लिग्नोसेरिक एसिड् (Lignoceric acid, 0.74%) ये रहते हैं। इस तैल के साबुन बनाने लायक भाग से बचे हुए हिस्से में निम्बोस्टेरॉल रहता है। इस तैल में 0.427% गंधक पाया जाता है। इसके तैल से अत्यन्त कडुवा एवं जल में घुलने वाला सोडियम् मार्गोसेट (Sodium margosate, B. C. P. W.) नामक एक लवण बनाया गया है। गुण और प्रयोग-इसके अन्दर की छाल शीतल, कडुवी, पौष्टिक, नियतकालिक-ज्वरप्रतिबन्धक, ग्राही त्वग्दोषहर, कृमिघ्न एवं रसायन है। सम्पूर्ण छाल अधिक ग्राही होती है। त्वचा पर निम्बत्वक् की क्रिया सोमल की तरह होती है। इसका ज्वरघ्न गुण सिंकोना की तरह है। इसकी मूलत्वक् कृमिघ्न (आन्त्रिक) मानी जाती है। इसके पत्ते शोधन, त्वचा के लिये उत्तेजक, त्वग्दोषहर, व्रणशोधक, व्रणरोपक, कृमिघ्न, प्रतिदूषक, यकृतोत्तेजक, कुष्ठहर एवं अधिक मात्रा में वामक होते हैं। इसका तेल उष्ण, वातहर, प्रतिदूषक, व्रणशोधक, व्रणरोपक, उत्तेजक, केश्य, कृमिघ्न, कुष्ठघ्न एवं रसायन है। निम्ब के सभी अङ्गों की अपेक्षा इसका तैल अधिक प्रभावशाली है। (१) नीम की छाल का चूर्ण मलेरिया के लिये बहुत लाभदायक है। शोथयुक्त ज्वर एवं विषमज्वर तथा ज्वर के पश्चात् दौर्बल्य दूर करने के लिये इसके चूर्ण या क्वाथ का उपयोग किया जाता है। क्विनीन आदि से जब लाभ नहीं होता तब इसका उपयोग करते हैं। ज्वर में इसके साथ धनियाँ, सोंठ, लौंग, दालचीनी या मिरिच, चिरायता तथा ग्राहीपन कम करने के लिये कुटकी का उपयोग किया जाता है। श्वेतप्रदर में बबूल की छाल एवं नीम की छाल का क्वाथ लाभदायक होता है। (२) इसके पत्तों का उपयोग त्वचा के विकार, व्रण, क्षत तथा कुष्ठ में किया जाता है। चर्मविकारों में इससे स्नान कराया जाता है। व्रण, पामा, कण्डू, छाजन, अरुंषिका, दूषितव्रण, पुराने व्रण एवं अन्य चर्मविकारों में इससे स्नान कराते हैं, इसके पत्तों को पीस कर बाँधते है या इससे सिद्ध घृत का मलहम आदि लगाते हैं। अर्श, बद, गाँठ एवं व्रणशोथ
में इसका पोल्टिस बाँधा जाता है। विचर्चिका (Weeping eczema) में यदि इसके पत्तों को पीस कर बाँध दें और जब तक अपने से निकले नहीं तब तक रहने दें तो बहुत जल्दी लाभ होता है। कुष्ठ में इसके पञ्चाङ्ग के चूर्ण या क्वाथ का स्नान, पान एवं लेपादि में उपयोग होता है। इसके पत्तों को पीसकर आँवला या हरीतकी के साथ खाने से कुष्ठ में लाभ होता है। यद्यपि इसके पत्तों का स्वरस आन्त्र के कृमियों (केंचुआ) में लाभदायक माना जाता है तथापि श्रीकेस और म्हसकर का मत है कि ४ ड्राम की मात्रा में इसके प्रयोग से कोई लाभ नहीं हुआ। इसके देने के पहले और पश्चात् विरेचन नहीं दिया गया था। फिरंग में इसका रस १ पाव की मात्रा में सुबह शाम पिलाते हैं। सोजाक में शिश्न में शोथ होकर मूत्र रुकता है तब इसके क्वाथ में रोगी को बैठाते हैं जिससे पेशाब होने लगती है। कामला में अधिक मात्रा में इसका स्वरस मधु के साथ सुबह पिलाया जाता है। इसके साथ सोंठ भी देते हैं। कभी-कभी अधिक मात्रा से वमन हो जाता है। प्रसूता को प्रथम दिन से ही इसका स्वरस देने से हर प्रकार से लाभ होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होकर स्राव की शुद्धि होती है एवं शोथ कम होता है। भूख लगना, पाखाना साफ होना, ज्वर न आना या कम आना एवं बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा रहना ये सब लाभ इसके देने से होते हैं। मसूरिका (Small pox) में इसके पत्तों से हवा की जाती है एवं रोगी के बिस्तर पर इसको बिछाते हैं। इसके कोमल पत्तों की दो रत्ती की गोली बना कर मुलेठी के साथ देने से लाभ होता है। पत्तों को पुस्तक तथा कपड़े आदि में रखने से कीड़े नहीं लगते। ज्वर में घृत एवं मधु के साथ इसके पत्तों का धूप दियां जाता है। (३) इसके तैल का कुष्ठ, फिरंग, श्लीपद, व्रण, दूषितव्रण, गण्डमाला, आमवात एवं विषमज्वर में उपयोग किया जाता है। कुष्ठ, फिरंग, त्वचा के रोग एवं विषमज्वर आदि में इसको ५-१० बूँद की मात्रा में दिन में २ बार देते हैं। इसका बाह्य प्रयोग भी करते हैं। अपची, नाड़ीव्रण, पामा, कण्डू, छाजन, दद्रु, विसर्प, आमवात, उददर्द्, शीतपित्त एवं दूषित व्रण में तैल को लगाते हैं। कुष्ठव्रण में इसके साथ चौलमोगरा का तैल मिलाकर लगाते हैं। तैल से दाह होने पर इसमें १/२ तिलतैल मिलाकर उपयोग करना चाहिये। आमवात में इसकी मालिश के साथ-साथ इसका आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। शिरःशूल में सर पर इसको मलते हैं। खालित्य एवं पालित्य में इसके नस्य का विधान है। आन्त्रिक कृमि में पत्रस्वरस की तरह इसके तैल को १-४ ड्राम की मात्रा में देने से लाभ नहीं देखा गया, यद्यपि पूर्ण मात्रा से किसी-किसी में अतिसार, हल्लास तथा बेचैनी होती है। इसके तैल से बने हुए लवण सोडियम या पोटैशियम् मार्गोसेट (Margosate) का उपयोग त्वचा, मांसपेशी तथा सिरा के द्वारा किया जाता है। इसका शरीर में जीवाणुविरोधी कार्य होता है। पामा (Scabies), छाजन (Eczema) एवं स्फोट (Pemphigus) में इससे अच्छा लाभ होता है। फिरंग की प्रथम एवं द्वितीयावस्था में चिकित्सा जिनमें नहीं की गई उनकी अपेक्षा इसके द्वारा अधिक लाभ होता है। इसमें इसे ०.०१-०.३२ ग्राम सूचिकाभरण द्वारा दिया जाता है। फिरंग की तृतीयावस्था या द्वितीयावस्था के अन्त के ग्रन्थि (गमा) तथा त्वचा के विकार इससे जल्दी अच्छे होते हैं, यद्यपि इसका परिणाम पाश्चात्य चिकित्सा की अन्य पारद, आयोडाइड आदि औषधियों के इतना संतोषजनक नहीं होता। कुष्ठ एवं फिरंगादि में तैल की अपेक्षा इसके सूचिकाभरण एवं मार्गोसिक एसिड के स्थानिक प्रयोग से अधिक लाभ होता है। (४) इसके फल विरेचक एवं स्नेहन हैं तथा कृमि, अर्श एवं मूत्रविकार में इनका उपयोग करते हैं। अर्श में इसके बीज को गुड़ के साथ खिलाते हैं। (५) इसके पुष्प का फांट ज्वर के पश्चात् बल्यरूप में एवं पाचन की खराबी में देते हैं। (६) इसकी ताड़ी में शर्करा, ॲल्ब्युमिन, गोंद एवं लौह, खटिक तथा अल्युमिनिअम् के लवण होते हैं। यह दीपन, पोषक, बलप्रद, कृमिघ्न, रसायन एवं चर्मविकारों में लाभदायक मानी जाती है। मात्रा—अन्तस्त्वक् चूर्ण २-४ माशा; स्वरस १/२-१ छटाँक; तैल ५-१० बूँद।
गुडूच्यादिवर्गः ५०५ अथ महानिम्बः तस्य नामानि गुणाँश्चाह महानिम्बः स्मृतो द्रेका रम्यको विषमुष्टिकः । केशमुष्टिनिम्बकश्च कार्मुको जीव इत्यपि ॥९७॥ महानिम्बो हिमो रूक्षस्तिक्तो ग्राही कषायकः ॥९८॥ कफपित्तभ्रमच्छर्दिकुष्ठहल्लासरक्तजित् । प्रमेहश्वासगुल्मार्शोमूषिकाविषनाशनः ॥९९॥ महानिम्ब के नाम तथा गुण-महानिम्ब, द्रेका, रम्यक, विषमुष्टिक, केशमुष्टि, निम्बक, कार्मुक और जीव ये सब संस्कृत नाम 'बकायन' के हैं। बकायन-शीतवीर्य, रूक्ष, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और ग्राही (मलावरोधक) होता है। यह कफ, पित्त, भ्रम, वमन, कुष्ठ, हल्लास, रक्तदोष, प्रमेह, श्वास, गुल्म, बवासीर और चूहे का विष इन सबों का नाशक होता है। [९७-९९] नोट-महानिंब के विषय में कुछ भ्रम है। भावप्रकाश, धन्वन्तरि एवं मदनपाल निघंटुओं में निंब तथा महानिंब ये दो भेद मिलते हैं। राजनिघंटु में एक तृतीय भेद कैडर्य का उल्लेख किया है। कैडर्य नाम कायफल के लिये आता है। किन्तु टीकाकारों ने उसका अर्थ पर्वतनिव भी किया है। चरक एवं सुश्रुत में 'पर्वतनिंब' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। कुछ लोगों ने कैडर्य को मीठा नीम, ले०-मुरया कोनिजीआई स्प्रेंग (Murraya koenigii Spreng) माना है किन्तु रा० नि० ने कैडर्य का स्वाद कटु तिक्त कषाय लिखा है। ऐइलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स (Ailanthus excelsa Roxb.) को कुछ लोगों ने महानिंब माना है जिसको पंजाबी में 'अरुआ' कहने के कारण कुछ लोग अरलू के स्थान पर प्रयोग करते हैं या अरलू (श्योनाक) का भेद मानते हैं। अधिकांश लोगों ने बकायन को, जिसका ले०-नाम मेलिआ एझेडैरॅक (Melia azedarach) है उसे महानिंब माना है। निघंटुओं में महानिंब का पर्याय 'ट्रेका' दिया हुआ है तथा बकायन को पंजाब में द्रेक कहते भी हैं। अर्श में महानिम्ब का प्रयोग वाग्भट ने किया है (चि० अ० ८) एवं वैद्य तथा हकीमी में बकायन के फलों का प्रयोग प्रचलित है। महानिंब का 'अक्षीर' यह पर्याय अन्य निघंटुओं ने दिया है तथा निंब का पर्याय 'हिंगुनिर्यास' दिया हुआ है जो क्रमशः बकायन एवं नीम की ओर संकेत करते हैं। सुश्रुत में पिप्पल्यादिगण (सू० अ० ३८) में महानिंब के फल का एवं अधोभागहरवर्ग (सू० अ० ३९) में 'रम्यक' नाम से इसकी त्वचा का उल्लेख है। आकाश नीम-नीम चमेली नामक वृक्ष होता है। इसका लेटिन नाम मिलिंगटोनिया हॉर्टेन्सिस् लिन. (Millingtonia hortensis Linn. fi; Fam. Bignoniaceae) है। इसके सुन्दर ऊँचे वृक्ष होते हैं जो बगीचों में इसके सुन्दर पत्र एवं श्वेत सुगंधित पुष्पों के लिये लगाये जाते हैं। इसमें एक तिक्त द्रव्य तथा टैनिन् होता है तथा ज्वरघ्न गुण के लिये इसका प्रयोग करते हैं। यहाँ पर दोनों प्रकार के महानिम्बों का वर्णन अलग-अलग किया गया है। ४४. (क) महानिंब (बकायन) हिं०-बकायन, बकाइन, महानीम। बं०-घोड़ानिम, महानिम। म०-बकाणानिंब। गु०-बकानलिंबडो। क०- बेट्टदबेड। ते०-तुरक, बेवक, कोड वेप। ता०-मलैवेम्बु। पं०-देक, धरेक, बकइन। कोल०-गरनिम। आसाम- थमगा। ने०-बकैनु। सिन्धु-बकयनु, ड्रेक। फा०-आजाद दरख्त। अ०-बान्, हर्बीत। अं०-Persian Lilac (पर्शियन् लिलॅक); The Bead Tree (बीड ट्री)। ले०-Melia azedarach Linn. (मेलिआ एझेडेरॅक् लिन.)। Fam. Meliaceae (मेलिएसी)। प्रायः सब प्रान्तों में इसका वृक्ष पाया जाता है। बकायन का वृक्ष सुन्दर, मध्यमाकार का, नीम वृक्ष से छोटा और अचिरस्थायी होता है। नीम के पत्तों के समान इसके भी पत्ते होते हैं। पत्ते-प्रायः त्रिपक्षवत्, २ फीट लम्बे और शाखाओं पर दलबद्ध होकर रहते हैं। पत्रक-प्रासवत, आरावत् दन्तुर, लम्बाय्र, नीम जैसे किन्तु उससे कुछ कम लम्बे तथा क्रम मुड़े हुए होते हैं। पुष्प-लिलॅक (Lilac) एवं सुगन्धित रहते हैं जिसके आभ्यंतर दल फैले हुए, श्वेत या बैंगनी रंग
के होते हैं तथा बीच में पुंकेसरों की गहरे बैंगनी रंग की नलिका रहती है। फल—नीम की तरह अष्ठिल फल प्रायः १ इञ्च से कम लम्बे होते हैं। बीज—प्रत्येक फल में ५ बीज होते हैं जिनके बीच में मणि के समान छिद्र होता है जिसके कारण इनकी माला बनाई जाती है। इसके मूल की ताजी अन्तस्त्वक्, पुष्प, फलमज्जा एवं पत्र का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसकी अन्तस्त्वक् में हलके पीतवर्ण का, कडुवा तथा राल की तरह का पदार्थ रहता है जो उबलते जल में घुलता है। बाह्यत्वक् में टैनिन् रहता है। इसमें शर्करा भी पाई जाती है। गुण और प्रयोग—बकायन के गुण साधारणतः नीम के समान हैं। यह कृमिघ्न, त्वग्दोषहर, गर्भाशयसंकोचक, वेदनाहर, अर्शोघ्न एवं शोधन है। अधिक मात्रा में यह वामक, विरेचक एवं संज्ञानाशन है। इससे केंचुए मरते हैं। प्रसूता में शिरःशूल एवं गर्भाशयपीड़ा कम करने के लिये इसके पुष्पों को पीसकर सर पर एवं पेडू पर बाँधते हैं। रक्तविकार के कारण उत्पन्न कुष्ठ, गंडमाला एवं खालित्य आदि त्वचा के विकारों में इसके बीज, छाल या पत्रस्वरस को देते हैं। अर्श में इसके फल की मज्जा का उपयोग किया जाता है। इसके पुष्प एवं पत्तों को पीसकर स्नायविक शिरःशूल में लेप करते हैं। इसके पत्तों का क्वाथ हिस्टीरिया में पिलाते हैं। मात्रा—छाल ३ से ६ माशा; फलमज्जा २ से ८ रत्ती। ४५. (ख) महानिंब हिं०—महानिंब, घोड़ाकरंज। बं०—महानिम। म०—महारूख। गु०—मोटो अडुसो, अरलबो। पं०—अरूअ। ता०—पेरुमरुत्तु। ते०—पेद्दमानु। क०—दोडुमणि। मल०—पेरुमरम्। उरि०—महानिम महाल। ले०—Ailanthus excelsa Roxb. (ऐलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स) । Fam. Simarubaceae (सिमारुबेसी) । यह भारत के कई प्रान्त—उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी पेनिनसुला, कर्नाटक एवं गुजरात आदि में पाया जाता है। इसका वृक्ष—६० से ८० फ़ीट ऊँचा होता है। छाल—धूसर वर्ण की होती है। पत्ते—२-३ फीट लम्बे, पक्षवत्, संयुक्त पत्र होते हैं। पत्रक—३ १/२-६ लम्बे, २-३ चौड़े, अधरतल् पर रोमश, नोकदार, दन्तुर धारवाले, तिरछे आधारवाले, संख्या में १०-१३ जोड़े, १-२ लम्बे वृन्त से युक्त एवं आधार के पास दो रोमश ग्रंथियों से युक्त होते हैं। पत्तों में उग्र गंध आती हैं। पुष्प—पीताभ, बड़ी-बड़ी मंजरियों में आते हैं। फल—छीमी की तरह बीच से फूला हुआ एवं अन्त में अकुड़ेदार होता है जिसमें एक बीज रहता है। इसकी लकड़ी हलकी तथा मुलायम होती है। इसकी छाल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसमें गन्ध नहीं होती किन्तु इसका स्वाद बहुत कड़वा होता है। यह मोटी, खुरदरी तथा रवेदार होती है। इसका बाह्यभाग तथा अन्दर का भाग पीताभ श्वेत रहता है तथा अन्दर रेशे मालूम होते हैं। भिगोने से यह फूलती है, चिपचिपी होती है तथा उसमें अप्रिय गन्ध आती है। इसे कुछ लोगों ने महानिंब तथा कुछ लोगों ने श्योनाक-भेद माना है। रासायनिक संगठन—इसकी छाल में ऐलेण्टिक् ॲसिड (Ailantic acid) नामक एक अत्यन्त कडुआ, रक्ताभ भूरे रंग का पदार्थ पाया जाता है जो जल में आसानी से घुल जाता है किन्तु मद्यसार में आसानी से नहीं घुलता। गुण और प्रयोग—यह कडुआ, पौष्टिक, दीपन, ग्राही एवं ज्वरहर है। इसका प्रभाव कुरैया के समान होता है। प्रसूता को इसके पत्रस्वरस या ताजी छाल के रस को नारियल के दूध, गुड़, मधु एवं सुगंधित पदार्थों के साथ खीर बनाकर देने से प्रसवपश्चात् पीडा कम होती है। इसकी छाल एवं पत्तों का क्वाथ प्रसवपश्चात् दौर्बल्य के लिये बल्यरूप में देते हैं। जीर्णज्वर या दौर्बल्य में इसके प्रयोग से बल बढ़ता है। अग्निमांद्य में इसके छाल का रस १ १/२ औं० की
गुडूच्यादिवर्गः ५०७ मात्रा में दिन में दो बार देते हैं। एइलेण्टिक् एसिड को बल्य एवं रसायन रूप में १/२-१ १/२ र० की मात्रा में दिया जाता है किन्तु अधिक मात्रा में इससे हल्लास, वमन एवं विरेचन होता है।१ मात्रा-१/४-१/८ तो०। अथ पारिभद्रः (फरहद)। तस्य नामानि तत्पत्रस्य च गुणाँश्चाह पारिभद्रो निम्बतरुर्मन्दारः पारिजातकः। पारिभद्रोऽनिलश्लेष्मशोथमेदःकृमिप्रणुत्। तत्पत्रं पित्तरोगघ्नं कर्णव्याधिविनाशनम्१॥१००॥ फरहद के नाम तथा गुण-पारिभद्र, निंबतक, मन्दार और पारिजातक ये सब संस्कृत नाम फरहद के हैं। फरहद-वायु, कफ, शोथ, मेदरोग और कृमि का नाशक होता है। इसके पत्ते-पित्तरोग तथा कान के रोगों को दूर करने वाले होते हैं। [१००] नोट-पारिभद्र के जो पर्याय निंबतरु, मंदार एवं पारिजातक दिये हुये हैं उनसे कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। इसी प्रकार देवदार एवं पर्वतनिंब के लिये भी पारिभद्र नाम का उपयोग किया गया है। पारिभद्र से अधिकांश विद्वान् फरहद का ग्रहण करते हैं। संदर्भ के आधार पर या टीकाकारों के मतानुसार पारिभद्र का अर्थ निंब, देवदार या पारिजातक किया जा सकता है। पारिजाता यह नाम हरसिंगार के लिये अधिक प्रचलित होने के कारण एवं पारिभद्र का पारिजातक यह पर्याय होने के कारण हरसिंगार को ही कुछ लोग पारिभद्र मानते हैं। कुछ विद्वानों के मत से हरसिंगार 'शेफालिका' हो सकती है किन्तु भावप्रकाशकार तथा अन्य निघंटुकारो ने शेफाली(लिका) को निर्गुण्डी भेद लिखा है। पारिभद्रक नाम से सुश्रुत ने पूतनाप्रतिषेध (उ० अ० ३२-३) के लिये एवं कृमि (उ० अ० ५४-२६) के लिये उपयोग लिखा है। पारिजातक नाम से प्लीहोदर (चि० १४-१२) में एवं पारिजात नाम से उदकमेह (चि० ११-८) में उल्लेख है। यहाँ पर फरहद एवं हरसिंगार दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। ४६. फरहद हिं०-फरहद, पांगरा। बं०-पाल ते मादार। म०-पाङ्गारा। गु०-पांडेरवो, पनरवो। क०-होंगर, हलिवाणदमर। ते०-मोदुगो, बरिदे चेट्टु, बारिजमु। ता०-कल्याण मुरुक्क। अं०-Coral Tree (कोरल ट्री)। ले०-Erythrina indica Lam. (एरिथ्रिना इण्डिका लॅम०)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है, विशेषकर कोंकण और उत्तर कनारा में अधिक मिलता है। इसका वृक्ष मध्यमाकार का, शीघ्रता से बढ़ने वाला तथा समय पाकर नष्ट हो जाने वाला होता है। कोमल डालियों पर सीधे, काले रङ्ग के तीक्ष्ण काँटे रहते हैं। छाल-चिकनी तथा हरी, भूरी, हलकी पीली या श्वेत खड़ी रेखाओं से युक्त एवं पतली पपड़ियाँ छूटने पर हरी होती है। पत्ते-पलाशपत्र के समान त्रिदल होते हैं। पत्रक-४-६ इञ्च के घेरे में गोलाकार और किञ्चित् नुकीले होते हैं। अग्र का पत्रक सबसे बड़ा होता है। पुष्पदंड ४ इञ्च लम्बा और मंजरी प्रायः ६ इञ्च लम्बी होती है। फूल-अत्यन्त रक्त वर्ण के सुहावने दिखाई पड़ते हैं। पुष्प का बाह्यकोश एक ओर मूल तक फट जाता है और अग्र पर पाँच दाँत बन जाते हैं। आभ्यंतर दल पाँच होते हैं जिनमें एक सबसे बड़ा होता है। इनके बीच से लाल पुंकेसरों का गुच्छा निकला रहता है। इनमें गन्ध नहीं होती। फलियाँ-६-१० इञ्च लम्बी, चिपटी, चोंचदार, किंचित् टेढ़ी, ताजी अवस्था में हरी किन्तु बाद में काली हो जाती है। बीज-संख्या में ६-१२, चिकने, भूरे या लाल, अंडाकार तथा करीब १ इञ्च बड़े होते हैं। १. पुष्पं पित्तरुजं हन्ति कर्णव्याधि विनाशयेत्। (नि. र.)
५०८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसी का एक उपभेद होता है जिसके पुष्प मटमैले श्वेताभ रंग के होते हैं। इसकी दूसरी जाति ए. सुबरोजा राक्स. (E. suberosa Roxb.), धवलढाक-उत्तर भारत में अधिक होता है। इसके वृक्ष छोटे होते हैं। इसकी छाल मोटी कार्क वाली, पत्रक चौड़े लट्वाकार या तिर्यगायताकार एवं पुष्प का बाह्यकोश द्वयोष्ठक होता है। फरहद की छाल एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। छाल हल्लासकारक तो होती है किन्तु कड़वी नहीं होती। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में दो प्रकार की राल एवं एक कड़वा एरिथेराइन (Erytherine) नामक विषैला क्षाराभ पाया जाता है जो कुचले के क्षाराभ स्ट्रिकनीन (Strychnine) के विषैले प्रभाव का निवारक (Antidote) माना जाता है। यह क्षाराभ पत्तों में भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग-फरहद की छाल ज्वरहर, ग्राही, बल्य, कृमिघ्न, स्वप्नजनन एवं शोथहर होती है। इसके पत्ते मूत्रल, मृदुविरेचक, आर्तवजनन, दुग्धवर्धक, शोथहर, व्रणशोधक एवं कृमिघ्न होते हैं। केन्द्रीयवातनाडीसंस्थान के ऊपर इसकी छाल का शामक प्रभाव पड़ने के कारण उसकी क्रिया कम होती है या बन्द होती है। हृदय पर भी इसका शामक प्रभाव पड़ता है। कुचले के प्रभाव के विरुद्ध इसका प्रभाव पड़ता है। इसकी छाल को रक्तयुक्त आँव, ज्वर तथा निद्रा लाने के लिये प्रयोग करते हैं। नेत्राभिष्यंद में छाल को पीसकर पलकों पर लगाते हैं। इसकी छाल के अन्दर के भाग पर घी लगाकर तथा उस पर घी के दिये का काजल जमाकर इसका नेत्र के विकारों में अञ्जन कराया जाता है। वाजीकरण के लिये सफेद फूल के फरहद की कोमल जड़ को पीस कर शीतल दूध के साथ पिलाते हैं। इसके पत्तों का स्वरस फिरंग, उपदंश, ज्वर, अनार्तव, कष्टार्तव, मूत्रकृच्छ्र एवं कृमि में पिलाया जाता है। व्रणप्रक्षालन के लिये एवं कर्णशूल, दंतशूल आदि के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। पत्तों का लेप शोथ, बद, संधिपीड़ा तथा व्रण पर किया जाता है। इससे वेदना कम होती है। आर्तवशुद्धि तथा दुग्धवृद्धि के लिये नारियल के दूध के साथ इसके पत्तों को उबालकर बनाया हुआ क्वाथ प्रसूता को पिलाया जाता है। मात्रा-त्वक्चूर्ण १/२-१ तो०; पत्रस्वरस १/२-१ तो०। ४७. पारिजाता, हरसिंगार सं०-शेफालिका। हिं०-हरसिंगार, पारिजाता, कूरी, सिहारु। बं०-शेफालिका, शिउली। म०-पारिजातक। गु०-हारशणगार। पं०-कूरी, पकर। ता०-पवलमल्लिकै। ते०-पगडमल्ले। मल०-पविझमल्लि। क०- पारिजात। अं०-Night Jasmine (नाइट जस्मीन); Weeping Nyctanthes (वीपिंग् निक्टेन्थस्); Tree of Sorrow (ट्री ऑफ सारी)। ले०-Nyctanthes arbor-tristis, Linn. (निक्टॅन्थिस अर्बोर्-ट्रिस्टिस्, लिन.)। Fam. Oleaceae (ओलिएसी)। यह मध्यभारत तथा हिमालय के निचली प्रदेशों में बहुत होता है। यह प्रायः सब प्रांतों के बागों में लगाया हुआ मिलता है। इसका वृक्ष-छोटा, झाड़ीदार तथा कभी-कभी २५.३० फीट ऊँचा होता है। छाल-हलके भूरे रंग की तथा खुरदरी होती है। काष्ठ-श्वेत तथा हरित हलके लाल या पीताभ भूरे रंग का होता है। पत्ते-जपापत्र की तरह, करीब ४ इञ्च लम्बे, २ १/२ इञ्च चौड़े, विपरीत, स्पर्श में अत्यन्त रूक्ष (खर), नुकीले, अंडाकार, आधार की तरफ गोल, नीचे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५०९ का पृष्ठ मृदुरोमश, पत्रतट अखंड या दूर-दूर पर कुछ दन्तुर एवं मजबूत पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-अत्यन्त सुगन्धित होते हैं। इनकी पंखडियाँ श्वेत एवं पुष्पवृन्त केसरिया वर्ण के होते हैं। ये रात को खिलते हैं तथा सुबह झड़ जाते हैं। फल-चिपटे, गोल, हरे रंग के, करीब ३/४ इञ्च व्यास के एवं किनारे पर दबे हुए रहते हैं। बाद में ये भिदुर एवं भूरे रंग के हो जाते हैं। बीज-छोटे, दो, चिपटे तथा अंडाकार होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पुष्पों में एक सुगंधित उड़नशील तैल रहता है। पुष्पवृन्त से एक प्रकार का रंग निकाला जाता है जिससे रेशमी वस्त्र रँगा जाता है। इसके पत्तों में एक निक्टेन्थाइन (Nyctanthine) नामक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-पारिजातक ज्वरघ्न, कफघ्न, यकृत् उत्तेजक, मृदुविरेचक एवं शामक है। इसके पत्र सॅण्टोनिन् (Santonin) जैसे कृमिघ्न, ज्वरघ्न, तिक्तपौष्टिक, पित्तद्रावक एवं मृदुविरेचक होते हैं। बच्चों के लिये इसके पत्तों का स्वरस अच्छा मृदुविरेचक होता है। (१) इसके पत्तों का (शेफालिकादलैः) मंद आँच पर बनाया हुआ क्वाथ गृध्रसी (Sciatica) के लिये बहुत लाभदायक माना जाता है (चक्रदत्त) शेफालिका यह नाम नीलगिर्गुण्डी के पर्याय में आया हुआ है तथा व्यवहार में निर्गुण्डी का उपयोग गृध्रसी में किया जाता है। इस दृष्टि से हरसिंगार के पत्तों की अपेक्षा निर्गुण्डी का प्रयोग उचित मालूम पड़ता है। (२) जीर्ण ज्वर के लिये इसके ७-८ कोमल पत्तों का स्वरस, आर्द्रकस्वरस एवं मधु मिलाकर देते हैं। मलेरिया में यह बहुत लाभदायक है। जीर्ण मलेरिया में इसके साथ त्रिकटु का प्रयोग उचित है। इससे यकृत् एवं प्लीहावृद्धि कम होती है। पाण्डु होने पर इसके साथ लौह का प्रयोग किया जाता है। इसके सेवन के समय पथ्य में दुग्ध, घृत एवं शर्करा का अधिक उपयोग किया जाता है। (३) बच्चों के कृमि (केंचुए) के लिये पत्तों के स्वरस को चीनी मिलाकर देते हैं। (४) खाँसी तथा दमा में इसकी छाल के चूर्ण को १-२ र० की मात्रा में पान में रखकर दिन में ३-४ बार देने से कफ का चिपचिपापन कम होता है। (५) इसके बीजों को जल में पीसकर सर के गंज़ पर लगाते हैं जिससे नये बाल उगते हैं। मात्रा-पत्र २-४; छालचूर्ण १-२ रत्ती। अथ काञ्चनारो रक्तकाञ्चनारश्च, तयोर्नामानि तत्पुष्पस्य गुणाँश्चाह काञ्चनारः काञ्चनको गण्डारिः शोणपुष्पकः ॥१०१॥ कोविदारश्च मरिकः कुद्दालो युगपत्रकः। कुण्डली ताम्रपुष्पश्चाश्मन्तकः स्वल्पकेशरी ॥१०२॥ काञ्चनारो हिमो ग्राही तुवरः श्लेष्मपित्तनुत्। कृमिकुष्ठगुदभ्रंशगण्डमालाव्रणापहः ॥१०३॥ कोविदारोऽपि तद्वत्स्यात्तयोः पुष्पं लघु स्मृतम्। रूक्षं संग्राहि पित्तास्रप्रदरक्षयकासनुत् ॥१०४॥ कचनार तथा लाल कचनार के नाम और गुण-काञ्चनार, काञ्चनक, गण्डारि और शोणपुष्पक ये सब संस्कृत नाम कचनार के हैं। कचनारभेद कोविदार के संस्कृत नाम-कोविदार, मरिक, कुद्दाल, युगपत्रक, कुण्डली, ताम्रपुष्प, अश्मन्तक और स्वल्पकेशरी ये सब हैं। कचनार-शीतवीर्य, मलावरोधक, कषायरसयुक्त, कफ, पित्त, कृमि, कुष्ठ, गुदभ्रंश, गण्डमाला और व्रण को दूर करनेवाला होता है। इसी प्रकार से कचनारभेद कोविदार के भी गुण हैं। दोनों कचनारों के फूल-लघु, रूक्ष, मलावरोधक एवं पित्त, रक्त-प्रदर, क्षय तथा कास (खाँसी) को दूर करने वाले होते हैं। [१०१-१०४]