भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
४. चतुर्थ खण्ड: कुष्ठ, शीतपित्त, विद्रधि, व्रण, नासा-कर्ण-नेत्र-शिरोरोग, रसायन-वाजीकरण उपसंहार
८५० भावप्रकाशनिघण्टुः मानकन्द का संस्कृत नाम—मानकन्द और महापत्र हैं। मानकन्द—शीतल, लघु एवम्—शोथ तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [१०६] ६५. मानकन्द हिं०—मानकन्द। बं०—मानकचू। म०—कांसालू। अं०—Giant taro (जाएण्ट टारो)। ले०—Alocasia indica (Roxb.) Schott. (एलोकेसिया इंडिका)। Fam. Araceae (ऐरॅसी)। प्रायः इसको बागों में लगाते हैं और आसाम तथा बंगाल में इसकी उपज की जाती है। इसका क्षुप—अरुई की तरह किन्तु उससे बड़ा एवं ३ से ६ फीट ऊँचा होता है। स्कंध–मांसल, फूला हुआ, ४ से ८ इञ्च व्यास का होता है। पत्ते–२ से ३ फीट लम्बे, पुंखवत् त्रिभुजाकार होते हैं। इसके अग्र खण्ड त्रिभुजाकार एवं पार्श्व खण्ड लट्वाकार होते हैं। पुष्प–पुं. पुष्प एवं स्त्री पुष्प पत्रावृत व्यूह में पृथक्-पृथक्, ४ से ८ इञ्च लम्बे वृन्त पर आते हैं। फल—बाली के रूप में आते हैं जिसमें दाने (फल) लाल होते हैं। स्कन्ध से मूल निकले रहते हैं एवं मूल स्तम्भ से निकले हुए मूलों के अग्र कन्द सदृश होते हैं। स्कन्ध तथा छोटे कन्द खाये जाते हैं। इसके कई भेदोपभेद पाये जाते हैं जिनमें एक मीठा तथा दूसरा कड़वा होता है। मीठे का उपयोग किया जाता है। इसको प्रयोग के पूर्व उबाल कर धोना पड़ता है। रासायनिक संगठन—इसमें स्टार्च काफी होता है। इसमें कॅल्शियम आग्झेलेट भी होता है। इसका आटा चावल की अपेक्षा अधिक सुपाच्य होता है। गुण और प्रयोग—मानकन्द सुपाच्य, पौष्टिक, मूत्रजनन, अल्प मृदुविरेचन एवं स्कंध स्वरस रक्तसंग्राहक एवं कषाय है। इसके सूखे कंद के चूर्ण को चावल की माँड़ के साथ पकाकर, छानकर देने से शोथ और जलोदर में लाभ होता है। उस समय आहार में और कोई पदार्थ नहीं दिया जाता। कंद का साग पुराने विबंध एवं उससे उत्पन्न अर्श में दिया जाता है। कर्णस्राव में इसके स्कंध को भूनकर निकाला स्वरस डालने से लाभ होता है। मूल को कस कर गरम करके उससे सन्धिशोथ में सेंकते हैं। मात्रा—मूल चूर्ण १ से २ तोला। अथ वाराहीकन्दः (गेंठी)। तस्य गुणानाह वाराही पित्तला बल्या कट्वी तिक्ता रसायनी। आयुःशुक्राग्निकृन्मेहकफकुष्ठानिलापहा ।।१०७।। वाराहीकन्द—कटु तथा तिक्त रस युक्त, पित्तजनक, बलकारक, रसायन तथा आयु, शुक्र और जठराग्नि को बढ़ाने वाला एवम्–प्रमेह, कफ, कुष्ठ और वायु को नष्ट करने वाला होता है। [१०७] ६. वाराही कन्द इसका विवरण गुडूच्यादिवर्ग (पृष्ठ ५५४) में एवं आलुक के वर्णन के साथ इसी वर्ग में (पृष्ठ ८४५) किया जा चुका है। अथ हस्तिकर्णा। तस्यास्तत्कन्दस्य च गुणानाह गजकर्णा तु तिक्तोष्णा तथा वातकफाञ्जयेत्। शीतज्वरहरी स्वादुः पाके तस्यास्तु कन्दकः ।।१०८।। पाण्डुशोथकृमिप्लीहगुल्मानाहोदरापहः । ग्रहण्यार्शोविकारघ्नी वनसूरणकन्दवत् ।।१०९।। हस्तिकर्ण के संस्कृत नाम—गजकर्णा और हस्तिकर्णा इसके संस्कृत नाम हैं।
शाकवर्गः ८५१ हस्तिकर्ण-तिक्तरसयुक्त, उष्ण, विपाक में मधुर रसयुक्त एवम्-वात-कफ तथा शीतज्वर को दूर करने वाला होता है। इसका कन्द-जङ्गली सूरन के कन्द की भाँति, पाण्डु, शोथ, कृमि, प्लीहा, गुल्म, आनाह (अफरा), उदररोग, ग्रहणी तथा अर्श के विकारों को नष्ट करने वाला होता है। [१०८-१०९] नोट-टीकाकारों ने इसे भूपलाश, रक्तएरण्ड तथा कुछ ने मानकन्द का बड़ा भेद लिखा है किन्तु निम्न वर्णित क्षुप हीं हस्तिकर्ण है। ६७. हस्तिकर्ण हिं०-हत्कन, हस्तिकर्ण पलाश, समुद्रक । बं०-ढोलसमुद्र । म०-दिंडा । ले०-Leea macrophylla Horn. (लिआ मॅक्रोफाइला) । Fam. Vitaceae (विटेसी) । भारत के समस्त उष्णप्रदेश एवं आसाम में यह होता है। इसका क्षुप-१ से ३ फीट ऊँचा, मोटा तथा बहुवर्षायु कन्द से प्रति वर्ष निकलता है। पत्ते-हाथी के कान की तरह बहुत बड़े, १ से २ फीट लम्बे एवं लट्वाकार-हहूत होते हैं। उपपत्र बहुत बड़े होते हैं। पुष्प-श्वेत होते हैं। फल-काले एवं झुमकेदार होते हैं। इसके कन्द का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह ग्राही, वेदनास्थापक एवं रक्तस्कन्दक है। कन्द को पीसकर व्रण, दाद एवं नारूकृमि पर लगाते हैं। इससे वेदना कम होती है और स्थानिक रक्तस्राव भी रुकता है। कहीं-कहीं क्षय में भी इसका उपयोग किया जाता है। अथ केमुकम् (केमुआँ) । तस्य गुणानाह केमुकं कटुकं पाके तिक्तं ग्राहि हिमं लघु ।।११०।। दीपनं पाचनं हृद्यं कफपित्तज्वरापहम् । कुष्ठकासप्रमेहास्त्रनाशनं वातलं कटु ।।१११।। केमुक-विपाक में कटुरसयुक्त, स्वाद में तिक्त तथा कटुरसयुक्त, ग्राही, शीतल, लघु, अग्निदीपक, पाचक, हृदय के लिये हितकर, वातजनक एवम्-कफ, पित्त, ज्वर, कुष्ठ, कास, प्रमेह तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [११०-१११] ६८. केमुक हिं०-केमुआ, केमुक, केवुक कन्द, केवा। म०-पेवा। ते०, क०-चेंगलकोश्टू । बं०-केऊ । ले०- Costus speciosus (Koen) Sm. (कोस्टस् स्पेसिओसस्) । Fam. Zingiberaceae (जिंजिबरेसी) । यह प्रायः सभी स्थानों पर किन्तु विशेष रूप से बंगाल तथा कोंकण में होता है। इसे शोभा के लिए बागों में भी लगाते हैं। आर्द्र तथा छायादार स्थानों में वर्षा में यह अधिक होता है। इसका क्षुप-२ से ६ फीट ऊँचा होता है मूलस्तम्भ कन्दवत् तथा अदरक के समान होता है। पत्ते-भालाकार, ६ से १२ इञ्च लम्बे एवं अधर तल पर रोमश होते हैं। पुष्प-कांड के अग्र पर, सफेद, ३-४ इञ्च बड़े, निर्गन्ध पुष्प, व्यूह में आते हैं जिनके कोणपुष्पक भड़कीले लाल होते हैं। इसके कन्द को पकाकर खाते हैं। यह निर्गन्ध, कुछ कसैला एवं कुछ लुआबदार होता है।
८५२ भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-गलती से इसे कहीं-कहीं कलिहारी माना जाता है। इसी प्रकार कुष्ठ के नाम से भी इसका गलत उपयोग, विशेष रूप से दक्षिण में होता है। रासायनिक संगठन-इसमें स्टार्च होता है। गुण और प्रयोग-इसे बल्य, कुछ विरेचन, रक्तशोधक एवं कृमिनाशक मानते हैं। इसके ताजे कंदों का मुरब्बा रुचिकारक एवं पौष्टिक मानते हैं। हड्डियों में पीड़ा होने पर इसका उपयोग करते हैं। नवीन प्रयोगों से देखा गया है कि कलिहारी की तुलना में इसमें गर्भाशय संकोचक, गुण अधिक होता है (कु० प्रे० तिवारी तथा अन्य; आ० अनु० पत्रिका, भाग १, अंक २)। अथ कसेरू, चिचोढं च। तयोर्गुणानाह कसेरु द्विविधं तत्तु महद्राजकसेरुकम्। मुस्ताकृति लघु स्याद्यत्तच्चिचोढमिति स्मृतम् ।।११२।। कसेरुकद्वयं शीतं मधुरं तुवरं गुरु। पित्तशोणितदाहघ्नं नयनामयनाशनम्। ग्राहि शुक्रानिलश्लेष्मारुचिस्तन्यकरं स्मृतम् ।।११३।। कसेरू के भेद-(१) बड़ा, (२) छोटा, भेद से कसेरू दो प्रकार का होता। उनके संस्कृत नाम-जो बड़ा कसेरू होता है उसे “राजकसेरुक” कहते हैं और छोटा मोथे के समान आकार वाला होता है उसे “चिचोढ़” कहते हैं। दोनों प्रकार के कसेरू-शीतल, मधुर तथा कषाय रसयुक्त, गुरु, ग्राही एवम्-शुक्र, वायु, कफ, अरुचि तथा दुग्धवर्धक होते हैं और पित्त, रक्तविकार, दाह, नेत्ररोग इन सबका नाश करने वाले होते हैं। [११२-११३] ६९. कसेरू हिं०-कसेरू। बं०-केसूर । म०-कचरा। अं०-Water chestnut (वाटर चेस्टनट)। ले०-Scirpus kysoor Roxb. (स्किर्पस् काय्सूर)। Fam. Cyperaceae (साइपेरेसी)। सभी प्रान्तों में यह होता है। इसके पौधे-तालाबों में प्रायः एक फुट या अधिक गहरे पानी में होते हैं। काण्ड-४ से ६ फीट ऊँचा तथा ३ पहल का होता है। पत्ते-एक इञ्च चौड़े तथा काण्ड के बराबर या कुछ कम लम्बे होते हैं। पुष्प मंजरी-करीब-करीब ३ फीट लम्बी होती है। फल-छोटे, धूसर या कृष्णवर्ण के होते हैं। कन्द-ऊपर से काले रंग के, अंदर से श्वेत, जायफल इतने बड़े एवं कुछ गोलाई लिये हुये होते हैं। इनका स्वाद कुछ मधुर एवं सुगन्धित होता है। स्कि. आर्टिक्युलेटस् (S. articulatus Linn.) तथा साइपेरस् एस्क्यूलेन्टस् (Cyperus esculentus Linn.) के कन्दों को जो कसेरू जैसे ही होते हैं 'चिचोडा' कहा जाता है जो भावप्रकाशोक्त चिचोढ हैं। कसेरू को भून कर, उबाल कर या वैसे ही खाया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें कार्बोहाइड्रेट ६३, प्रोटीन ७, गोंद ७, रेशा ६ एवं राख २.५ भाग होती है। गुण और प्रयोग-यह मधुर, शीत, ग्राही, कफ-वातवर्धक, शुक्रल तथा स्तन्य है। इसका उपयोग तृषा, दाह, अतिसार एवं वमन में किया जाता है। गर्भावस्था में गर्भपात की संभावना होने पर तथा प्रसूता को दुग्धवृद्धि के लिये इसे देते हैं। हैजे में इसे गुलाबजल में पीस कर पिलातें हैं जिससे प्यास कम होती है, दस्त एवं वमन कम होता है तथा हृदय को बल भी मिलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
शाकवर्गः ८५३ अथ शालूकम् भिस्साण्डञ्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह पद्मादिकन्दः शालूकं करहाटश्च कथ्यते ।।११४।। मृणालमूलं भिस्साण्डं १जलालूकञ्च कथ्यते । शालूकं शीतलं वृष्यं पित्तदाहास्त्रनुद् गुरु ।।११५।। दुर्जरं स्वादुपाकश्च स्तन्यानिलकफप्रदम् । संग्राही मधुरं रूक्षं भिस्साण्डमपि तद्गुणम् ।।११४।। कमल आदि के कन्दों के संस्कृत नाम—कमलकन्द, शालूक तथा करहाट ये सब हैं। मृणाल (कमल के नाल) के मूल भाग के संस्कृत नाम—मृणालमूल, भिस्साण्ड और जलालूक ये सब हैं। कमलकन्द—शीतल, वीर्यवर्धक, गुरु, कठिनता से हजम होने वाला, दुग्ध, वायु तथा कफ को करने वाला, ग्राही, रूक्ष, मधुर रसयुक्त, विपाक में भी मधुर एवम्—पित्त, दाह और रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। भसींडा—गुणों में कमल कन्द के ही समान होता है। [११४-११६] ७०. कमलकन्द, भसींडा वास्तव में भसींडा यह कमल के नाल का आधारीय भाग है जो मोटा तथा लम्बा होता है एवं कुमुद में आधारीय भाग कन्दवत् होता है। कमल का पूर्ण परिचय पुष्पादिपर्व (पृष्ठ ६४०) में दिया गया है। अथ निषिद्धशाकान्याह बालं ह्यनार्त्तवं जीर्णं व्याधितं कृमिभक्षितम् । कन्दं विवर्जयेत्सर्वं यद्वाऽग्न्यादिविदूषितम् । अतिजीर्णमकालोत्थं रूक्षसिद्धमदेशजम् ।।११७।। कर्कशं कोमलं चातिशीतव्यालादिदूषितम् । संशुष्कं सकलं शाकं नाश्नीयान्मूलकं विना ।।११८।। निषिद्ध (न खाने योग्य)—जो कन्द-कच्चा, बिना ऋतु के (असमय में) होने वाला, पुराना, रोगयुक्त, कीड़ों से खाया हुआ अर्थात् जिसमें कीड़े आदि पड़े हों या खाये हों अथवा अग्नि आदि से दूषित हो गये हों उन सबों को त्याग देना चाहिये। जो शाक—अत्यन्त पुराना, अकाल में उत्पन्न हुआ, बिना तेल आदि के पकाया हुआ, अशुभ स्थान श्मशान आदि में उत्पन्न हुआ, कठिन, कोमल, अत्यन्त शीत पड़ने तथा सर्पादि से दूषित हुआ हो उसे त्याग देना चाहिये। एवम्—सभी सूखे शाक नहीं खाने चाहिये, किन्तु मूली के लिये यह नियम नहीं है, उसे सूखी भी खा सकते हैं। [११७-११८] रूक्षसिद्धम् = अतैलादिसिद्धम् । अदेशजम् = अशुभस्थानजम् ।।११७-११८।। यहाँ पर मूल में "रूक्षसिद्ध" पद का "बिना तेल आदि के पकाया हुआ" तथा "अदेशज" पद का "अशुभ स्थान श्मशान आदि में उत्पन्न हुआ" अर्थ समझना चाहिये। [११७-११८] ।। इति कन्दशाकानि ।। अथ संस्वेदजशाकानि । तेषां नामानि गुणानाह उक्तं सस्वेदजं शाकं भूमिच्छत्रं शिलीन्ध्रकम् । क्षितिगोमयकाष्ठेषु वृक्षादिषु तदुद्भवेत् ।।११९।। सर्वे संस्वेदजाः शीता दोषालाः पिच्छिलाश्च ते । गुरवश्छर्द्यतीसारज्वरश्लेष्मामयप्रदाः ।।१२०।। श्वेताश्शुचिस्थलीकाष्ठवंशगोमयसम्भवाः । नातिदोषकरास्ते स्युः शेषास्तेभ्यो विगर्हिताः ।।१२१।। संस्वेदज शाक के संस्कृत नाम—संस्वेदज, भूमिच्छत्र और शिलीन्ध्रक ये सब हैं। १. जलालूबं इति पाठ० ।
८५४ भावप्रकाशनिघण्टुः उत्पत्ति स्थान—संस्वेदज शाक—पृथ्वी, गोबर, काष्ठ तथा वृक्षादिकों पर उत्पन्न होता है । संस्वेदज शाक—शीतल, दोषकारक, पिच्छिल, गुरु एवम्—वमन, अतिसार, ज्वर और कफ सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करने वाले होते हैं । किन्तु जो संस्वेदक शाक—श्वेत वर्णवाले, पवित्र स्थान, काष्ठ, बाँस तथा गोबर पर उत्पन्न होने वाले होते हैं, वे अत्यन्त दोषकारक नहीं (साधारण दोषकारक) होते हैं । शेष अर्थात् इनसे अन्य स्थान में उत्पन्न होने वाले संस्वेदज शाक निन्दित (त्याज्य) होते हैं । [११९-१२१] ७१. छत्रक हिं०—भुईं छत्ता, भुई फोड़ छत्ता छतोना, छाता, साँप की छत्री, खुमी, धरतीफूल । बं०—कोड़क छाता, व्यांगेर छाता, छातकुड़, भुई छाति, छात कुण्ड । पं०—ब्लेओफोरे । सि०—खुम्भी । म०—अलम्बे । गु०—बिलाडीनो रोम । अं०—Mush-room (मशरूम) । ले०—Agaricus campe stris Linn. (एगेरिकस् कॅम्पेस्ट्रिस्) । Fam. Agaricaceae (एगेरिकेसी) । यह सभी प्रांतों में होता है किन्तु पंजाब में अधिक होता है । भुईं छात्ता—वर्षाऋतु में आप ही आप जमीन फोड़कर उत्पन्न होता है । यह खाद की ढेरी पर अधिक होता है । इसका क्षुप—६-७ इञ्च ऊँचा होता है और इसमें कोई डाली नहीं होती, केवल एक डण्डी जो जमीन फोड़ कर निकलती है उस पर गोल छत्ते के आकार का एक छत्र होता है । छत्र के नीचे की सतह से पतले परदे लटकते हैं जिन्हें गिल (Gill) कहा जाता है जिसमें अनेक बीजाणु (Spores) रहते हैं । छत्रक के अनेक प्रकार होते हैं जिनमें से कुछ विषैले होते हैं । निम्नलिखित लक्षणों से यद्यपि इसका ज्ञान हो सकता है तथापि अनुभव के आधार पर ही इसका आसानी से ज्ञान होता है । जब तक निश्चित ज्ञान न हो तब तक इनका प्रयोग उचित नहीं है । इनकी उपज भी की जाती है । निर्विष के लक्षण—छोटे, शीर्ष का भाग २ से ४ इञ्च चौड़ा, दुर्गन्धहीन, श्वेत या गुलाबी, गिल गुलाबी, कांड से अलग तथा बीजाणु गहरे बैंगनी, ठोस, घासं या कचरे के ढेर पर होने वाले, छत्र के नीचे कांड पर वलययुक्त प्रायः विषैले नहीं होते । विषैले छत्रक—बहुत भंगुर या कड़े, छत्र चमकीला, पतला, गिल समान लम्बाई के, गढ़े में उत्पन्न, कृमि द्वारा खाये हुए, तोड़ने पर नीले रंग के, दुर्गन्धयुक्त, स्वाद में कड़वे, अम्ल, खराब, डण्ठल के आधार भाग पर कटोरी जैसी रचना युक्त, पकाने पर चमकीले पीले हो जाने वाले, छायादार स्थान में होने वाले एवं दुग्ध जैसे रसयुक्त अखाद्य होते हैं । गुण और प्रयोग—यह पौष्टिक एवं कामवर्धक होते हैं । मांस के समान यह पौष्टिक है । इसका साग आमाशय की दुर्बलता से उत्पन्न दुर्बलता तथा कृशता में दिया जाता है । क्षय में दूध तथा शर्करा के साथ इसे उबालकर देते हैं । मात्रा—५ से १० तोला । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे शाकवर्गः समाप्त ।
अथ मांसवर्गः
अथ मांसम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
मांसं तु पिशितं क्रव्यमामिषं पललं पलम् । मांसं वातहरं सर्वं बृंहणं बलपुष्टिकृत् ।। प्रीणनं गुरु हृद्यञ्च मधुरं रसपाकयोः ।। १ ।। मांसवर्ग में प्रथम मांस के संस्कृत नाम-मांस, पिशित, क्रव्य, आमिष, पलल तथा पल ये हैं । सभी मांस- रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), बल तथा पुष्टि के करने वाले, सन्तर्पण कारक, गुरु, हृदय के लिये हितकर तथा वातनाशक होते हैं । [१]
अथ मांसभेदानाह
मांसवर्गो द्विधा ज्ञेयो जाङ्गलाानूपभेदतः ।। २ ।। मांस के भेद—मांसवर्ग दो भागों में विभक्त है, (१)—जाङ्गल (जङ्गली जीवों के) मांस (२)—आनूप (जल के समीप या जल में रहने वाले जीवों के) मांस । [२]
अथ जाङ्गलमांसस्य भेदान् गुणाँश्चाह
मांसवर्गेऽत्र जङ्घाला विलस्थाश्च गुहाशयाः । तथा पर्णमृगा ज्ञेया विष्किराः प्रतुदस्तथा ।। ३ ।। प्रसहा अथ च ग्राम्या अष्टौ जाङ्गलजातयः । जाङ्गला मधुरा रूक्षास्तुवरा लघवस्तथा ।। ४ ।। बल्यास्ते बृंहणं वृष्या दीपना दोषहारिणः । मूकतां मिन्मिनत्वं च गद्गदत्वार्दिते तथा ।। ५ ।। बाधिर्यमरुचिच्छर्दिप्रमेहमुखजान् गदान् । श्लीपदं गलगण्डञ्च नाशयन्त्यनिलामयान् ।। ६ ।। जाङ्गल मांस के भेद—इस मांसवर्ग में—(१) जङ्घाल (जङ्घा के बल से चलने वाले), (२) बिलस्थ (बिल में रहने वाले), (३) गुहाशय (गुफा में सोने वाले), (४) पर्णमृग (वृक्षों पर चढ़ने वाले), (५) विष्किर (कुरेद २ कर खाने वाले), (६) प्रतुद (चोंच से पदार्थ को निकाल कर खाने वाले) (७) प्रसह (जबरदस्ती से छीन कर खाने वाले), (८) ग्राम्य (ग्राम में रहने वाले) ये ८ जातियाँ “जाङ्गल” होती हैं । इन्हीं का मांस “जाङ्गल” मांस कहलाता है । जाङ्गल मांस—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, लघु, बलकारक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक), वीर्यवर्धक, अग्निदीपक, दोषनाशक एवम्—मूकता (गुँगापन), मिन्मिनापन, तोतलापन, अर्दितवात (मुँह का लकवा), बहिरापन, अरुचि, वमन, प्रमेह, मुख में होने वाले रोग, श्लीपद (फीलपाँव), गलगण्ड औश्च वातसम्बन्धी रोग को दूर करने वाला होता है । [३-६]
अथानूपमांसस्य भेदान् गुणाँश्चाह
कूलेचराः प्लवाश्चापि कोशस्थाः पादिनस्तथा । मत्स्या एते समाख्याताः पञ्चधाऽऽनूपजातयः ।। ७ ।। अनूपा मधुराः स्निग्धा गुरवो वह्निसादनाः । श्लेष्मलाः पिच्छिलाश्चापि मांसपुष्टिप्रदा भृशम् ।। तथाऽभिष्यन्दिनस्ते हि प्रायः पथ्यतमाः स्मृताः ।। ८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८५६ भावप्रकाशनिघण्टुः आनूप मांस के भेद— (१) कूलेचर (नदी आदि के किनारे पर चलने वाले), (२) प्लव (जल के ऊपर तैरने वाले पक्षी), (३) कोशस्थ (ढकने के मध्य में रहने वाले), (४) पादो (पाँव वाले जल के जीव), (५) मत्स्य (मछली), ये ५ प्रकार की जातियाँ आनूप कहलाती हैं। आनूपमांस— मधुररसयुक्त, स्निग्ध, गुरु, जठराग्नि को मन्द करने वाला, कफ उत्पन्न करने वाला, पिच्छिल, मांस को अत्यन्त पुष्ट करने वाला, अभिष्यन्दी तथा प्रायः करके अत्यन्त पथ्य होता है। [७-८] अथ जाङ्गलाः । तत्र जङ्घालानां गणनां लक्षणानि विशिष्टगुणाँश्चाह हरिणैणकुरङ्गर्य्यपृषतन्यङ्कुशम्बराः ।।९।। राजीवोऽपि च मुण्डी चेत्याद्या जङ्घालसंज्ञकाः । हरिणस्ताम्रवर्णः स्यादेणः कृष्णः प्रकीर्त्तितः ।।१०।। कुरङ्गईषत्ताम्रः स्यादेणतुल्याकृतिर्महान् । ऋष्यो नीलाङ्गको लोके स रोझ इति कीर्त्तितः ।।११।। पृषतश्चन्द्रबिन्दुः स्याद्धरिणात्किञ्चिदल्पकः । न्यङ्कुर्बहुविषाणोऽथ शम्बरो गवयो महान् ।।१२।। राजीवस्तु मृगो ज्ञेयो राजिभिः परितोवृतः । यो मृगः शृङ्गहीनः स्यात्स मुण्डीति निगद्यते ।।१३।। जङ्घालाः प्रायशः सर्वे पित्तश्लेष्महराः स्मृतः । किञ्चिद्वातकराश्चापि लघवो बलवर्द्धनाः ।।१४।। जाङ्गल जीवों में प्रथम जङ्घाल संज्ञक जीवों की गणना—हरिण, एण, कुरङ्ग, ऋष्य, पृषत, न्यङ्कु, शम्बर, राजीव और मुण्डी इत्यादि जंघालसंज्ञक जीव हैं। लक्षण—हरिण— यह ताँबे के समान वर्णवाला मृग होता है। एण— यह कृष्ण वर्ण का मृग होता है। कुरङ्ग— यह किंचित् ताँबे के समान वर्ण वाला, आकार में एण मृग के समान किन्तु उससे बड़ा होता है। ऋष्य— यह नीले वर्ण का होता है, इसे लोक में "रोझ" कहते हैं। पृषत— इसके ऊपर चन्द्र के समान बिन्दु होते हैं और यह हरिण से कुछ छोटा होता है। न्यङ्कु— इसके बहुत से झाड़दार सींग होते हैं, इसे "बारहसिंगा" कहते हैं। शम्बर— यह गवय (गौ के समान पशुविशेष-नीलगाय) की अपेक्षा बड़ा होता है। राजीव— यह मृग कहलाता है जिसके शरीर पर बहुत सी रेखायें हों। मुण्डी— यह मृग (हरिण) सींग से रहित होता है। जङ्घाल जीवों के मांस— प्रायः करके पित्त तथा कफ नाशक, किंचित् वातकारक, लघु तथा बलवर्धक होते हैं। [९-१४] अथ बिलेशयाः (बिलनिवासी प्राणी) तेषां गणनां गुणाँश्चाह गोधाशशभुजङ्गाखुशल्लक्याद्या बिलेशयाः । बिलेशया वातहरा मधुरा रसपाकयोः ।। बृंहणा बद्धविण्मूत्रा वीर्य्योष्णाश्च प्रकीर्त्तिताः ।।१५।। बिलेशय (बिल में रहने वाले) प्राणियों की गणना— गोह, खरगोश, साँप, मूसा, साही आदि जीव बिलेशय कहलाते हैं। बिलेशय जीवों का मांस— वात नाशक, रस तथा विपाक में मधुर, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), उष्णवीर्य, मल तथा मूत्र का विबन्ध करने वाला होता है। [१५] अथ गुहाशयाः (गुफानिवासी प्राणी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह सिंहव्याघ्रवृका ऋक्षतरक्षुद्वीपिनस्तथा । बभ्रुजम्बुकमार्जार इत्याद्याः स्युर्गुहाशयाः ।।१६।। गुहाशय (गुफा में रहने वाला) जीवों की गणना— सिंह, बाघ, भेड़िया, भालू, तरस (लकड़बग्घा), चित्रव्याघ्र (चीता), बभ्रु (नेवला), गीदड़, बिलार इत्यादि गुहाशय जीव हैं। [१६] ❖ तरक्षुः— "तेंदुआबाघ" इति लोके । द्वीपी = "चित्रव्याघ्र" इति लोके ।
मांसवर्गः ८५७ स्थूलपुच्छो रक्तनेत्रो बभ्रुदेहः स नाकुलः ।।१६।। यहाँ पर मूल में "तरक्षु" से "तेंदुआबाघ" और "द्वीप" से "चित्रव्याघ्र" (चीता) समझना चाहिये और "बभ्रु" से स्थूल पूँछ तथा लाल नेत्रों वाला, पीले रंग का जो जीव (नेवला) होता है उसका ग्रहण करना चाहिये। [१६] गुहाशया वातहरा गुरूष्णा मधुराश्च ते। स्निग्धा बल्या हिता नित्यं नेत्रगुदविकारिणाम् ।।१७।। गुहाशय जीवों का मांस-वातनाशक, गुरु, उष्ण, मधुर, स्निग्ध, बलकारक तथा नेत्र और गुदा रोग (अर्श) वालों के लिये नित्य हितकर होता है। [१७] अथ पर्णमृगाः (वृक्षों पर चढ़ने वाले प्राणी)। तेषां गणनां गुणांश्चाह ❖ वनौका वृक्षमार्जारो वृक्षमर्कटिकाऽऽदयः। एते पर्णमृगाः प्रोक्ताः सुश्रुताद्यैर्महर्षिभिः ।।१८।। पर्णमृग (वृक्ष पर चढ़ने वाले) जीवों की गणना-वानर, वृक्षविडाल (वन बिलाव), रूपी वानर आदि को सुश्रुतादि महर्षियों ने "पर्णमृग" संज्ञक बतलाया है। [१८] वनौका = वानरः। वृक्षमार्जारो = वृक्षविडालः। वृक्षमर्कटिका = 'रूपी वानर' इति लोके ।।१८।। यहाँ पर मूल में- "वनौका" से "वानर" तथा "वृक्षमार्जार" से वृक्षविडाल अर्थात् पेड़ पर रहने वाले वन विलाव और "वृक्षमर्कटिका" से "रूपी वानर" नाम से लोक में प्रसिद्ध जीव का ग्रहण करना चाहिये। [१८] स्मृताः पर्णमृगा वृष्याश्चक्षुष्या शोषिणे हिताः। श्वासाशः कासशमनाः सृष्टमूत्रपुरीषकाः ।।१९।। पर्णमृग संज्ञक जीवों का मांस-वीर्यवर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, शोष (क्षय) रोगियों के लिये हितकारी, मूत्र तथा मल को निकालने वाला एवम्-श्वास, अर्श (बवासीर) और खाँसी को दूर करने वाला होता है। [१९] अथ विष्किराः (विष्किरपक्षी)। तेषां गणनां गुणांश्चाह वर्त्तका वाववर्त्तीरकपिञ्जलकत्तित्तिराः। कुलिङ्गकुक्कुटाद्याश्च विष्किरा समुदाहृताः ।।२०।। विकीर्य भक्षयन्त्येते यस्मात्तस्माद्धि विष्किराः। कपिञ्जल इति प्राज्ञै कथितो गौरतित्तिरिः ।।२१।। विष्किरा मधुराः शीताः कषायाः कटुपाकिनः।बल्या वृष्यास्त्रिदोषघ्नाः पथ्यास्ते लघवः स्मृताः ।।२२।। विष्किर (कुरेद-कुरेद कर खाने वाले) पक्षियों की गणना-वर्तका, (बटेर-जङ्गली गौरैया), लाव (लबा), वत्तीर (कपिञ्जल के सदृश पक्षिविशेष), कपिञ्जलक (गौर तीतर), तीतर, कुलिङ्ग (गौरैया) और मुर्गा इत्यादि पक्षी विष्किर कहलाते हैं। विष्किर शब्द की निरुक्ति-जो पक्षी पहले चोंच आदि से बिखेर कर पीछे खाते हैं इसी से वे "विष्किर" कहलाते हैं और कपिञ्जल को विद्वान् लोग "गौरतित्तिरि" कहते हैं। विष्किर पक्षियों का मांस-मधुर, शीतल, कषाय (कसैला), विपाक में कटु रस युक्त, बलकारक, वीर्यवर्धक, त्रिदोषनाशक, पथ्य तथा लघु होता है। [२०-२२] अथ प्रतुदाः (चोंच से खानेवाले पक्षी)। तेषां गणनां गुणांश्चाह कालकण्ठकहारीतकपोतशतपत्रकाः। वारावतः खञ्जरीटः पिकाद्याः प्रतुदाः स्मृताः। प्रतुद्य भक्षयन्त्येते तुण्डेन प्रतुदास्ततः ।।२३।। प्रतुद पक्षियों को गणना-कालकण्ठक (धूंयें के रंग का जलकौवा), हरियल, पडुकी (कपोत भेद), शतपत्रक (कठफोरा), पारावत (कबूतर), खिड़रिच, कोयल आदि पक्षी "प्रतुद" कहलाते हैं। प्रतुद शब्द की निरुक्ति-जो पक्षी चोंच से निखोर कर खाते हैं। इसी से वे "प्रतुद" कहे जाते हैं। [२३]
८५८ भावप्रकाशनिघण्टुः ❖ हारीतः = "हरियल" इति लोके । कपोतो धवलः पाण्डुः । शतपत्रो बृहच्छुकः । "दार्वाघाटः" इत्यमरः । "कठफोरा" इति लोके ।।२३।। यहाँ पर "हारीत" से लोक प्रसिद्ध "हरियल" तथा कपोत पद से उसी का भेद शुक्लपीत वर्ण की पड्डुखी एवम् "शतपत्रक" से अमरकोश के प्रमाण से दार्वाघाट अर्थात् लोकप्रसिद्ध "कठफोरा" का बोध करना चाहिये । [२३] प्रतुदा मधुराः पित्तकफघ्नास्तुवरा हिमाः । लघवो बद्धवर्चस्काः किञ्चिद्वातकराः स्मृताः ।।२४।। प्रतुदा संज्ञक पक्षियों के मांस—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, पित्त तथा कफनाशक, शीतल, लघु, मल को गाढ़ा करने वाले तथा किञ्चित् वातकारक होते हैं । [२४] अथ प्रसहाः (दूसरे से छीनकर खानेवाले पक्षी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह काको गृध्र उलूकश्च चिल्लश्च शशघातकः । चाषो भासश्च कुरर इत्याद्याः प्रसहाः स्मृताः ।।२५।। प्रसह संज्ञक (दूसरे से जबरदस्ती छीन कर खानेवाले) पक्षियों की गणना—कौवा, गीध, उल्लू, चील्ह, बाज, नीलकण्ठ, भास (गीध का भेद) और कुरांकुर या कडांकुल इत्यादि पक्षी प्रसह संज्ञक हैं । [२५] ❖ शशघातकः = "बाज" इति लोके । चाषः = "नीलकण्ठ" इति लोके । भासः = गृध्रविशेषः स्यात् । कुररः = "कुरांकुर" इति लोके ।।२५।। यहाँ पर "शशघातक" काक लोकप्रसिद्ध "बाज" पक्षी, "चाष" का "नीलकण्ठ" इस नाम से लोकप्रसिद्ध पक्षी, "भास" का गीध के भेद का पक्षी, "कुरर" का "कुरांकुर" इस नाम से लोकप्रसिद्ध पक्षी का ग्रहण करना चाहिये ॥२५॥ प्रसहाः कीर्त्तिता एते प्रसह्याच्छिद्य भक्षणात् ।।२६।। "प्रसह" शब्द की उत्पत्ति—जो पक्षी दूसरे से जबरदस्ती छीनकर खाते हैं इससे वे "प्रसह" कहलाते हैं । [२६] प्रसहाः खलु वीर्योष्णास्तन्मांसं भक्षयन्ति ये । तेषोषभस्मकोन्मादशुक्रक्षीणा भवन्ति हि ।।२७।। प्रसह संज्ञक के मांस—ये सब उष्णवीर्य होते हैं, अतः जो उनके मांस को खाते हैं उनको शोष (क्षय), भस्मक रोग, पागलपन तथा शुक्रक्षीणता हो जाती है । [२७] अथ ग्राम्याः (ग्राम्यपशु) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह छागमेषवृषाश्वाद्या ग्राम्याः प्रोक्ता महर्षिभिः । ग्राम्या वातहराः सर्वे दीपनाः कफपित्तलाः । मधुरा रसपाकाभ्यां बृंहणा बलवर्द्धनाः ।।२८।। ग्राम्य (गाँव के अन्दर रहने वाले) पशुओं की गणना—बकरा, भेंडा (मेढ़ा), बैल (गोजाति), घोड़ा आदि पशुओं को महर्षियों ने "ग्राम्य" संज्ञक कहा है । ग्राम्य पशुओं का मांस—वातनाशक, अग्निदीपक, कफ तथा पित्तकारक, रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, बृंहण (रस-रक्तादि वर्द्धक) एवम् बल को बढ़ाने वाला होता है । [२८] अथानूपाः । तत्र कूलेचराणां गणनां गुणाँश्चाह लुलायगण्डवाराहचमरीवारणादयः । एते कूलेचराः प्रोक्ता यतः कूले चरन्त्यपाम् ।।२९।। आनूप जाति के जीवों में कुलेचर संज्ञक जीवों की गणना—भैंसा, गैंडा, सूअर, चमरी (Yak—याक्) जाति की गाय और हाथी ये "कूलेचर" संज्ञक जीव कहलाते हैं ।
मांसवर्गः ८५९ "कूलेचर" शब्द की निरुक्ति-जो जीव नदी आदि जलाशयों के तट पर चरने वाले होत हैं उन्हें "कूलेचर" कहा जाता है । [२९] लुलायो = महिषः । गण्डः = खड्गः । चमरी = चमरपुच्छी गौः ।।२९।। यहाँ पर मूल में "लुलाय" से भैंसा, "गण्ड" से गैंडा, चमरी से जिस गोजाति के पशु की पूँछ से चमर बनाया जाता है उस चमरी जाति का ग्रहण करना चाहिये । [२९] कूलेचरा मरुत्पित्तहरा वृष्या बलावहाः । मधुराः शीतलाः स्निग्धा मूत्रलाः श्लेष्मवर्धनाः ।।३०।। कूलेचर संज्ञक जीवों का मांस-वात तथा पित्त को दूर करने वाला, वीर्यवर्धक, बलकारक, मधुर रसयुक्त, शीतल, स्निग्ध, मूत्रकारक तथा कफ को बढ़ाने वाला होता है । [३०] अथ प्लवाः (जलपर तैरने वाले पक्षी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह हंससारसकारण्डबकक्रौञ्चशरारिकाः ।।३१।। नन्दीमुखी सकादम्बा बलाकाद्याः प्लवाः स्मृताः । प्लवन्ति सलिले यस्मादेते तस्मात्प्लवा स्मृताः ।।३२।। प्लवसंज्ञक पक्षियों की गणना-हंस, सारस, कारण्ड (करंड), बगला, क्रौञ्च, शरारिका, नन्दीमुखी, कादम्ब, बगुली आदि ये सब "प्लव" संज्ञक हैं । प्लव शब्द की निरुक्ति जो पक्षी जल पर तैरने वाले होते हैं वे "प्लव" कहे जाते हैं । [३१-३२] ❖ कारण्ड = कपर्दिकाक्षो बृहद्धंसभेदः । क्रौञ्चः = शरद्विहङ्गः स्यात्-"टेंक" इति लोके । शरारिका = "सिन्धू" इति लोके ।। स्थूला कठोरा वृत्ता च यस्याश्चञ्चुपरिस्थिता । गुटिका जम्बुसदृशी प्रोक्ता नन्दीमुखीति सा ।। ❖ कादम्बः = "करवा" इति लोके । बलाका = "बगुली" इति लोके ।।३१-३२।। यहाँ पर मूल में-"कारण्ड" पद से "कपर्दिकाक्ष", बड़े हंस का भेद, काले रंग के बड़े-बड़े पैर वाले पक्षी; "क्रौञ्च" से शरद ऋतु का पक्षी, "टेंक" नाम से प्रसिद्ध; "शरारिका" से "सिन्धू" नाम से लोक प्रसिद्ध पक्षी का ग्रहण करना चाहिये । "नन्दीमुखी" से उस पक्षी का ग्रहण करना चाहिये कि जिसके चोंच के ऊपर मोटी, कठोर, गोल, जामुन के फल के समान गुटिका हो और "कादम्ब" से लोक प्रसिद्ध करना अर्थात् बत्तख का तथा "बलाका" से "बगुली" का बोध करना चाहिये । [३१-३२] प्लवा पित्तहराः स्निग्धा मधुरा गुरवो हिमाः । वातश्लेष्मप्रदाश्चापि बलशुक्रकराः सराः ।।३३।। प्लव संज्ञक पक्षियों का मांस-पित्तनाशक, स्निग्ध, मधुररसयुक्त, गुरु, शीतल, वात तथा कफ को उत्पन्न करने वाला, बल तथा शुक्रवर्धक एवम् सारक होता है । [३३] अथ कोशस्थाः (ढकने के मध्य में रहनेवाले प्राणी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह शङ्खः शङ्खनखश्चापि शुक्तिशम्बूककर्कटाः । जीवा एवंविधाश्चान्येकोशस्थाः परिकीर्तिताः ।।३४।। कोशस्थ (ढकने के मध्य में रहने वाले) प्राणियों की गणना-शंख, क्षुद्रशंख (छोटे शंख), सितुही, घोंघा, केकड़ा, (यहाँ पर सु० सू० ४६ अ० में कोशस्थ जीवों में "भल्लुक" का पाठ है अतः "कर्कट" पाठ ठीक नहीं मालूम
८६० भावप्रकाशनिघण्टुः पड़ता है अतएव “भल्लुक” से बड़ी “कौड़ी” का ग्रहण करना चाहिये) ये सब तथा इसी प्रकार के अन्य भी जो जीव हैं वे सब “कोशस्थ” कहलाते हैं। [३४] शङ्खनखः = क्षुद्रशङ्खः ।।३४।। यहाँ पर “शङ्खनख” से क्षुद्रशङ्ख अर्थात् “छोटे शङ्ख” का ग्रहण करना चाहिये। [३४] कोशस्था मधुराः स्निग्धा वातपित्तहरा हिमाः । बृंहणा बहुवर्चस्का वृष्याश्च बलवर्द्धनाः ।।३५।। कोशस्थ जीवों का मांस—मधुर रस युक्त, स्निग्ध, वात तथा पित्तनाशक, शीतल, बृंहण (रस रक्त-मांसादि वर्धक), अधिक मात्रा में मल निकालने वाला, वीर्यवर्धक तथा बलवर्धक होता है। [३५] अथ पादिनः (पाँवों के प्राणी)। तेषां गणनां गुणाँश्चाह कुम्भीरकूर्मनक्राश्च गोधामकरशङ्कव । घण्टिकः शिशुमारश्चेत्यादयः पादिनः स्मृताः ।।३६।। पादी अर्थात् पाँव वाले प्राणियों की गणना—कुम्भीर, कछुआ, नाक, गोह, मगर, शाकुचा, घड़ियाल, सूस इत्यादि जीव पादी (पाँव वाले) कहलाते हैं। [३६] कुम्भीरो = मारको जलजन्तुः । कूर्मः = कच्छपः । नक्रः = “नाकः” इति लोके (सरख्वादिनदीषु बहुलः) । गोधा = “गोहि” जलजन्तुः । मकरः = “मगर” इति लोके । शङ्कुः = “शाकुवा” इति लोके । घण्टिकः = “घड़ियाल” इति लोके । शिशुमारः = “सूस” इति लोके ।।३६।। यहाँ पर मूल में— “कुम्भीर” से मारने वाला नाक के भेद का जीव विशेष; “कूर्म” से कछवा; “नक्र” के लोक प्रसिद्ध-नाक (सरयू आदि नदियों में अधिक रूप से रहने वाला); “गोधा” से गोह नामक जल का जीव; “मकर” से मगर नाम से प्रसिद्ध जीव; “शंकु” से शाकुचा नामक जीव; “घण्टिक” से घड़ियाल; “शिशुमार” से सूस नाम से प्रसिद्ध जीव समझना चाहिये। [३६] पादिनोऽपि च ये ते तु कोशस्थानां गुणैः समाः ।।३७।। पादी अर्थात् पाँव वाले जीवों का मांस—गुणों में उपर्युक्त कोशस्थ जीवों के मांस के समान होता है। [३७] अथ मत्स्याः (मछली)। तेषां नामानि गुणाँश्चाह मत्स्यो मीनो विसारश्च झषो वैसारिणोऽण्डजः । शकुली पृथुरोमा च स सुदर्शन इत्यपि ।।३८।। रोहिताद्यास्तु ये जीवास्ते मत्स्याः परिकीर्त्तिताः । मत्स्याः स्निग्धोष्णमधुरा गुरवः कफपित्तलाः ।।३९।। वातघ्नाबृंहणा वृष्या रोचका बलवर्द्धनाः । मद्यव्यवायसक्तानां दीप्ताग्नीनाञ्च पूजिताः ।।४०।। मछलियों के संस्कृत नाम—मत्स्य, मीन, विसार, झष, वैसारिण, अण्डज, शकुली, पृथुरोमा और सुदर्शन ये सब हैं। मछलियों की गणना—रोहू आदि जो जीव हैं (जिनका आगे वर्णन आने वाला है) उनकी गणना मत्स्यों (मछलियों) के अन्तर्गत समझनी चाहिये। मछली का मांस—स्निग्ध, उष्ण, मधुर रस युक्त, गुरु, कफ तथा पित्तजनक, वातनाशक, बृंहण, वृष्य, रोचक, बलवर्द्धक तथा मद्य (शराब) पीने तथा मैथुन करने में आसक्त चित्त वालों एवम् प्रदीप्त जठराग्नि वालों के लिये हितकर होता है। [३८-४०]
मांसवर्गः ८६१ अथ जङ्घालाः (जाँघ के बल से चलने वाले प्राणी)। तत्र हरिणस्य मांसगुणानाह हरिणः शीतलो बद्धविण्मूत्रो दीपनो लघुः। रसे पाके च मधुरः सुगन्धिः सन्निपातहा ।।४१।। हरिन का मांस—शीतल, मल तथा मूत्र का विबन्ध करने वाला, अग्निदीपक, लघु, रस तथा विपाक में मधुर रस युक्त, अच्छे गन्ध वाला तथा सन्निपातनाशक होता है। [४१] अथैणहरिणः (कालाहरिण)। तस्य मांसगुणानाह एणः कषायो मधुरः पित्तासृक्कफवातहृत् । संग्राही रोचनो बल्यो ज्वरप्रशमनः स्मृतः ।।४२।। काले हरिण का मांस—कषाय तथा मधुर रस युक्त, संग्राही, रोचक, बलकारक एवम्—पित्त, रक्तविकार, कफ, वात तथा ज्वर का नाशक होता है। [४२] अथ कुरङ्गः। तस्य मांसगुणानाह कुरङ्गो बृंहणो बल्यः शीतलः पित्तहृद् गुरुः। मधुरो वातहृद् ग्राही किञ्चित्कफकरः स्मृतः ।।४३।। कुरङ्गनामक मृग का मांस—बृंहण (रस—रक्तादिवर्धक), बलकारक, शीतल, पित्तनाशक, गुरु, मधुररसयुक्त, वातनाशक, ग्राही तथा किंचित् कफ करने वाला होता है। [४३] अथ ऋष्यः (रोझ)। तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह ऋष्यो नीलाण्डकश्चापि गवयो रोझ इत्यपि। गवयो मधुरो बल्यः स्निग्धोष्णः कफपित्तलः ।।४४।। ऋष्य (रोझ) नामक मृग के संस्कृत नाम—ऋष्य, नीलाण्डक, गवय, रोझ ये सब हैं। (यहाँ पर "रोझ', संस्कृत का नाम नहीं मालूम पड़ता है, ग्रन्थानुरोध से लिख दिया गया है)। रोझ का मांस—मधुर रस युक्त, बलकारक, स्निग्ध, उष्ण, एवम् कफ तथा पित्त जनक होता है। [४४] अथ पृषतः (चित्तलमृग)। तस्य मांसगुणानाह पृषतस्तु भवेत्स्वादुर्गाहकः शीतलो लघुः। दीपनो रोचनः श्वासज्वरदोषत्रयास्रजित् ।।४५।। चित्तल मृग का मांस—स्वादिष्ट, ग्राही, शीतल, लघु, अग्निदीपक, रोचक एवम्—श्वास (दमा), ज्वर, त्रिदोष तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [४५] अथ न्यङ्कुः (बारहसिंगा)। तस्य मांसगुणानाह न्यङ्कुः स्वादुलघुर्बल्यो वृष्यो दोषत्रयापहः ।।४६।। न्यङ्कुसंज्ञक मृग का मांस—स्वादिष्ट, लघु, बलकारक, वीर्यवर्धक तथा त्रिदोषनाश होता है। [४६] अथ साबरम् । तस्य मांसगुणानाह साबरं पललं स्निग्धं शीतलं गुरु च स्मृतम् । रसे पाके च मधुरं कफदं रक्तपित्तहृत् ।।४७।। सांभर मृग का मांस—स्निग्ध, शीतल, गुरु, रस तथा विपाक में मधुर रस युक्त, कफजनक एवम्—रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [४७] अथ राजीवः । तस्य मांसगुणानाह राजीवस्तु गुणैर्ज्ञेयः पृषतेन समो जनैः ।।४८।। राजीव मृग का मांस—गुणों में चित्तलमृग के मांस के समान ही होता है, ऐसा समझना चाहिये। [४८] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भावप्रकाशनिघण्टुः ८६२ अथ मुण्डी । तस्य मांसगुणानाह मुण्डी तु ज्वरकासास्रक्षयश्वासापहो हिमः ।।४९।। मुण्डी मृग का मांस-शीतल तथा ज्वर, खांसी, रक्तविकार, क्षय और श्वास को दूर करने वाला होता है । [४९] अथ बिलेशयाः । तत्र शशः (खरगोश) । तस्य नामानि मांसगुणांश्चाह लम्बकर्णः शशः शूली लोमकर्णो बिलेशयः । शशः शीतो लघुग्राही रूक्षः स्वादुः सदा हितः ।। वह्निकृत्कफपित्तघ्नो वातसाधारणः स्मृतः । ज्वरातीसारशोषास्रश्वासामयहरश्च सः ।। ५० ।। बिलेशय संज्ञक जीवों में खरगोश के संस्कृत नाम-लम्बकर्ण, शश, शूली, लोमकर्ण तथा बिलेशय ये सब हैं। खरगोश का मांस-शीतल, लघु, ग्राही, रूक्ष, स्वादिष्ट, सभी ऋतुओं में हितकर, जठराग्नि को प्रज्वलित करने वाला, कफ तथा पित्त नाशक, साधारण वात कारक एवम्-ज्वर, अतिसार, शोष, रक्तविकार तथा दमा को दूर करने वाला होता है । [५०] अथ सेधा (सेह, साही) । तस्या नामानि मांसगुणांश्चाह सेधा तु शल्यकः श्वावित्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । शल्यकः श्वासकासास्रशोषदोषत्रयापहः ।। ५१ ।। साही के संस्कृत नाम-सेंधा, शल्यक और श्वावित् ये सब हैं । साही के मांस-श्वास, खाँसी, रक्तविकार, शोष तथा त्रिदोष को दूर करनेवाला होता है । [५१] अथ पक्षिणः (पक्षी) । तेषां नामानि मांसगुणाँश्चाह पक्षी खगो विहङ्गश्च विहगश्च विहङ्गमः । शकुनिर्विः पत्रत्री च विष्करो विकिरोऽण्डजः ।। धान्याङ्कुरचरा येऽत्र तेषां मांसं लघूत्तमम् । आनूपं बलकृन्मांसं स्निग्धं गुरुतरं स्मृतम् ।। ५१ ।। पक्षी के संस्कृत नाम-पक्षी, खग, विहङ्ग, विहग, विहङ्गम, शकुनि, वि, पत्रत्री, विष्किर, विकिर तथा अण्डज ये सब हैं । पक्षियों में जो धान के अङ्कुर चरने वाले हैं, उनका मांस-हल्का तथा उत्तम होता है । आनूप अर्थात् जल के किनारे रहने वाले पक्षियों का मांस-बलकारक, स्निग्ध तथा अत्यन्त गुरु होता है । [५२] अथ तेषु विष्किरेषु वर्त्तकः (बटेर) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह वर्त्तीको वर्त्तकश्चित्रस्ततोऽन्या वर्त्तका स्मृता । वर्त्तकोऽग्निकरः शीतो ज्वरदोषत्रयापहः । सुरुच्यः शुक्रदो बल्यो वर्त्तकाऽल्पगुणा ततः ।। ५३ ।। पूर्वोक्त विष्किर संज्ञक पक्षियों में वर्त्तक अर्थात् बटेर के संस्कृत नाम-वर्त्तीक, वर्त्तक तथा चित्र ये सब हैं । इससे अन्य प्रकार का एक बटेर होता है जिसे संस्कृत में "वर्त्तका" कहते हैं । बटेर का मांस-जठराग्निकारक, शीतल, सुरुचिकारक, शुक्र उत्पन्न करने वाला, बलकारक एवम्-ज्वर तथा त्रिदोष को नष्ट करने वाला होता है । और दूसरे प्रकार का जो बटेर है उसका मांस-पूर्वोक्त बटेर के मांस की अपेक्षा स्वल्प गुण वाला होता है । [५३]
मांसवर्गः ८६३ अथ लावः (लवा) । तस्य मांसगुणसहितान् भेदान् मांसगुणाँश्चाह लावा विष्किरवर्गेषु ते चतुर्धा मता बुधैः ।।५४।। पांशुलो गौरकोऽन्यस्तु पौण्ड्रको दर्भरस्तथा । लावा वह्निकराः स्निग्धा गरघ्ना ग्राहका हिताः ।।५५।। पांशुलःश्लेष्मलस्तेषु वीर्योष्णोऽनिलनाशनः । गौरो लघुसरो रूक्षो वह्निकारी त्रिदोषजित् ।।५६।। पौण्ड्रकः पित्तकृत्किञ्चिल्लघुर्वातकफापहः । दर्भरो रक्तपित्तघ्नो हृदामयहरो हिमः ।।५७।। विष्किर वर्ग के पक्षियों में जो लवा है, उसके ४ भेद पण्डितों ने कहे हैं । उसमें प्रथम—पांशुल, दूसरा—गौरक, तीसरा—पौण्ड्रक एवं चौथा—दर्भर भेद है । लवा पक्षियों का मांस—अग्निकारक, स्निग्ध, विषनाशक, ग्राही तथा हितकर(पथ्य) होता है । पांशुल संज्ञक लवा का मांस—कफकारक, उष्णवीर्य तथा वातनाशक होता है । गौरक संज्ञक लवा का मांस—अत्यन्त लघु, रूक्ष, अग्नि वृद्धिकारक एवम् त्रिदोषनाशक होता है । पौण्ड्रक संज्ञक लवा का मांस—पित्तकारक, किञ्चित् लघु, वात तथा कफनाशक होता है । दर्भर संज्ञक लवा का मांस—रक्तपित्तनाशक, हृद्रोग को दूर करनेवाला तथा शीतल होता है । [५४-५७] अथ वार्त्तीकः (बगेरा, बटेरा) । तस्य नामानि मांसगुणानाह वर्त्तीको वर्त्तिचटको वार्त्तीकश्चैव स स्मृतः । वर्त्तीको मधुरः शीतो रूक्षश्च कफपित्तनुत् ।।५८।। बगेरा के संस्कृत नाम—वर्त्तीक, वर्त्तिचटक तथा वार्त्तीक ये सब हैं । बगेरा के मांस—मधुर रस युक्त, शीतल, रूक्ष एवम् कफ तथा पित्तनाशक होता है । [५८] अथ कृष्णतित्तिरिगौरतित्तिरिञ्च (तीतर) । तयोर्नामानि मांसगुणाँश्चाह तित्तिरिः कृष्णवर्णः स्यात्स तु गौरः कपिञ्जलः । तित्तिरिर्बलदो ग्राही हिक्कादोषत्रयापहः ।। श्वासकासज्वरहरस्तस्माद्गौरोऽधिको गुणैः ।।५९।। तीतर के भेद और लक्षण—तीतर दो प्रकार का होता है । (१) तीतर, (२) गौर तीतर । काले रंग का जो तीतर होता है उसे कृष्णतित्तिरि, या तित्तिरि, संस्कृत में कहते हैं । यदि वही तीतर गौर वर्ण का हो तो उसे संस्कृत में गौर तित्तिरि या कपिञ्जल कहते हैं । तीतर का मांस—बलदायक, ग्राही एवम्-हिचकी, त्रिदोष, श्वास, खाँसी तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है । गौर तीतर का मांस—तीसर के मांस की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है । [५९] अथ चटकः (गौरैया, चिडा) । तस्य नामानि मांसगुणानाह चटकः कलविङ्कः स्यात्कुलिङ्गः कालकण्ठकः ।।६०।। कुलिङ्गः शीतलः स्निग्धः स्वादुः शुक्रकफप्रदः । सन्निपातहरो वेश्मचटकश्चातिशुक्रलः ।।६१।। गौरैया के संस्कृत नाम—चटक, कलविङ्क, कुलिङ्ग और कालकण्ठक ये सब हैं । गौरैया का मांस—शीतल, स्निग्ध, स्वादिष्ट, शुक्र तथा कफ को उत्पन्न करने वाला एवम् सन्निपात को दूर करने वाला होता है । घर में रहने वाले गौरैया का मांस—अत्यन्त शुक्र को उत्पन्न करने वाला होता है । [६०-६१] अथ कुक्कुटो वनकुक्कुटश्च (मुरगा-बनमुरगा) । तयोर्नामानि मांसगुणाँश्चाह कुक्कुटः कृकवाकुः स्यात्कालज्ञश्चरणायुधः । ताम्रचूडस्तथा दक्षो यामनादी शिखण्डिकः ।।६२।। कुक्कुटो बृंहणः स्निग्धो वीर्योष्णोऽनिलहृद् गुरुः । चक्षुष्यः शुक्रकफकृद् बल्यो वृष्यः कषायकः ।।६३।। आरण्यकुक्कुटः स्निग्धो बृंहणः श्लेष्मलो गुरुः । वातपित्तक्षयवमिविषमज्वरनाशनः ।।६४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८६४ भावप्रकाशनिघण्टुः मुर्गा का संस्कृत नाम-कुक्कुट, कृकवाकु, कालज्ञ, चरणायुध, ताम्रचूड, दक्ष, यामनादी तथा शिखण्डिक ये सब हैं । वनमुरगा का संस्कृत नाम-वनकुक्कुट तथा आरण्यकुक्कुट आदि हैं । मुर्गा का मांस-बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), स्निग्ध, उष्णवीर्य, वायु को नष्ट करने वाला, गुरु, नेत्रों के लिये हितकर, शुक्र तथा कफकारक, बलदायक, वृष्य (वीर्यवर्धक) तथा कषाय रसयुक्त होता है । वनमुरगा का मांस- स्निग्ध, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), कफजनक, गुरु, एवम् वात, पित्त, क्षय, वमन तथा विषमज्वर को दूर करने वाला होता है । [६२-६४] अथ प्रतुदाः तत्र हारीतः (हरियल) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह हारीतो रक्तपीतः स्याद्धरितोऽपि स कथ्यते । हारीतो रूक्ष उष्णश्च रक्तपित्तकफापहः । स्वेदस्वरकरः प्रोक्तः ईषद्रातकरश्च सः ।।६५।। प्रतुद जाति के पक्षियों में हरियल के संस्कृत नाम-हारीत, रक्तपीत और हरित ये सब हैं । हरियल का मांस-रूक्ष, उष्ण, रक्तपित्त तथा कफनाशक, स्वेद (पसीना) लाने वाला, स्वर को उत्तम करने वाला एवम् किञ्चित् वातकारक होता है । [६५] अथ पाण्डुर्धवलवाण्डुश्च (पण्डुक) । तयोर्नामानि मांसगुणाँश्चाह पाण्डुस्तु द्विविधो ज्ञेयश्चित्रपक्षः कलध्वनिः ।।६६।। द्वितीयो धवलः प्रोक्तः स कपोतः स्फुटध्वनिः । चित्रपक्षः कफहरो वातघ्नो ग्रहणीप्रणुत् ।।६७।। धवलः पाण्डुरुद्दिष्टो रक्तपित्तहरो हिमः । रसे पाके च मधुरः संग्राही वातशान्तिकृत् ।।६८।। पंडुक का भेद एवं नाम-पंडुक दो प्रकार का होता है, उसमें जो अनेक प्रकार के रंगों से युक्त पङ्खवाला तथा अस्फुट एवम् मधुर ध्वनि करने वाला पंडु होता है उसे संस्कृत में चित्रपक्ष, पाण्डु तथा कलध्वनि कहते हैं । दूसरा पंडु जो (सफेद) है उसे धवल पाण्डु संस्कृत में कहते हैं । यह स्फुट शब्द करने वाला कबूतर है । चित्रपक्ष का मांस-कफ को दूर करने वाला, वातनाशक एवम् ग्रहणी रोग को नष्ट करने वाला होता है । धवलपाण्डु-रक्तपित्त को दूर करने वाला, शीतल, रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, संग्राही एवम् वायु को शमन करने वाला होता है । [६६-६८] अथ मयूरः (मोर) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह मयूरश्चन्द्रकी केकी मेघरावो भुजङ्गभुक् । शिखी शिखावलो बर्ही शिखण्डी नीलकण्ठकः ।।६९।। शुक्लापाङ्गः कलापी च मेघनादानुलास्यपि । रसे पाके च मधुरः संग्राही वातशान्तिकृत् ।।७०।। मोर के संस्कृत नाम-मयूर, चन्द्रकी, केकी, मेघराव, भुजङ्गभुक्, शिखी, शिखाबल, बर्ही, शिखण्डी, नीलकण्ठक, शुक्लापाङ्ग, कलापी तथा मेघनादानुलासी ये सब हैं । मोर का मांस-रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, संग्राही तथा वायु को शमन करने वाला होता है । [६९-७०] अथ पारावतः (कबूतर, परेवा) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह वारावतः कलरवः कपोतो रक्तलोचनः । पारावतो गुरुः स्निग्धो रक्तपित्तानिलापहः । संग्राही शीतलस्तज्ज्ञैः कथितो वीर्यवर्द्धनः ।।७१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
मांसवर्गः ८६५ परेवा के संस्कृत नाम-पारावत, कलरव, कपोत तथा रक्तलोचन ये सब हैं। परेवा का मांस-गुरु, स्निग्ध, रक्तपित्त तथा वायुनाशक, संग्राही, शीतल तथा वीर्य को बढ़ाने वाला होता है, ऐसा द्रव्य गुण के विद्वानों ने कहा है। [७१] अथ पक्ष्यण्डानि (पक्षियों के अण्डे)। तेषां गुणानाह नातिस्निग्धानि वृष्याणि स्वादुपाकरसानि च। वातघ्नान्यतिशुक्राणि गुरूण्यण्डानि पक्षिणाम् ।।७२।। पक्षियों के अण्डे-अत्यन्त स्निग्ध नहीं (किञ्चित् स्निग्ध) होते हैं और वृष्य (वीर्यवर्धक), विपाक तथा रस में मधुर रस युक्त, वातनाशक तथा अत्यन्त शुक्र को उत्पन्न करने वाले होते हैं। [७२] अथ ग्राम्याः। तत्र छागः (बकरा)। तस्य नामानि मांसगुणांश्चाह छागलो बर्करश्छागो बस्तोऽजश्छेलकः स्तुभः ।।७३।। अजा छागी स्तुभा चापि छेलिका च गलस्तनी। छागमांसं लघु स्निग्धं स्वादुपाकं त्रिदोषनुत् ।।७४।। नातिशीतमदाहि स्यात्स्वादु पीनसनाशनम्। परं बलकरं रुच्यं बृंहणं वीर्यवर्द्धनम् ।।७५।। ग्राम्य पशुओं में बकरा के संस्कृत नाम-छागल, बर्कर, छाग, बस्त, अज, छेलक तथा स्तुभ ये सब हैं। बकरी के संस्कृत नाम—अजा, छागी तथा स्तुभा ये सब हैं। जिसके गले में स्तन के समान मांस लटकता हो उस बकरी को संस्कृत में-गलस्तनी तथा छेलिका कहते हैं। बकरे का मांस-लघु, स्निग्ध, विपाक में मधुर रस युक्त, त्रिदोषनाशक, अत्यन्त शीतल नहीं (किञ्चित् शीतल), दाह न पैदा करने वाला, स्वादिष्ट, पीनस रोग को दूर करने वाला, अत्यन्त बलकारक, रोचक, बृंहण तथा वीर्यवर्धक होता है। [७३-७५] अथाप्रसूताजाया बालकाजासुतस्य च मांसगुणानाह अजायास्त्वप्रसूताया मांसं पीनसनाशनम्। शुष्ककासेऽरुचौ शोषे हितमग्नेश्च दीपनम् ।।७६।। अजासुतस्य बालस्य मांसं लघुतरं स्मृतम्। हृद्यं ज्वरहरं श्रेष्ठं सुखदं बलदं भृशम् ।।७७।। बिना ब्याई हुई बकरी का मांस-पीनस रोगनाशक, सूखी खाँसी, अरुचि तथा शोष रोग में हितकारक एवम् अग्निदीपक होता है। बकरी के छोटे बच्चों का मांस-अत्यन्त लघु, हृदय को हितकर, ज्वरनाशक, अत्यन्त सुख तथा बल को देने वाला अतएव श्रेष्ठ होता है। [७३-७७] अथ निष्कासिताण्ड-वृद्ध-व्याधिमृतानां छागानां मांसस्य छागमुण्डस्य च गुणानाह मांसंनिष्कासिताण्डस्य छागस्य कफकृद् गुरु। स्रोतःशुद्धिकरं बल्यं मांसदं वातपित्तनुत् ।।७८।। वृद्धस्य वातलं रूक्षं तथा व्याधिमृतस्य च। ऊर्ध्वजत्रुविकारघ्नं छागमुण्डं रुचिप्रदम् ।।७९।। जिस बकरे के अण्ड-कोश निकाल लिये गये हैं उसके अर्थात् बधिया किये हुए बकरे का मांस-कफकारक, गुरु, स्रोतों की शुद्धि करने वाला, बलकारक, मांसवर्धक, वात तथा पित्त नाशक होता है। बुड्ढे बकरे का मांस- वायु को उत्पन्न करने वाला तथा रूक्ष होता है। रोग से पीड़ित होकर मरे हुए बकरे का मांस-भी वात कारक तथा रूक्ष होता है। बकरे का मुण्ड (शिर)-जत्रु (काँख तथा कन्धे के सन्धि स्थान) के ऊपरी भाग में होने वाले रोगों को दूर करने वाला तथा रुचिजनक होता है। [७८-७९] ५८ भाव. I . CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
८६६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ मेषः (मेढा) । तस्य नामान्यण्डविहीनस्य तस्य च मांसगुणाँश्चाह मेढ्रो मेढो हुडो मेष उरणोऽप्येडकोऽपि च । अविर्वृष्णिस्तथौर्णायुः कथ्यन्ते तद्गुणा अथ ॥८०॥ मेषस्य मांसं पुष्टौ स्यात्पित्तश्लेष्मकरं गुरु । तस्यैवाण्डविहीनस्य मांसं किञ्चिल्लघु स्मृतम् ॥८१॥ मेढा के संस्कृत नाम-मेढ्र, मेढ, हुड, मेष, उरण, एडक, अवि, वृष्णि और ऊर्णायु ये सब हैं। मेढे का मांस-पुष्टि के लिये उत्तम, पित्त तथा कफ को उत्पन्न करने वाला एवम् गुरु होता है। अण्डकोश निकाले हुये (बधिया किये हुये) मेढे का मांस-किञ्चित् लघु होता है और शेष गुण पूर्वोक्त होते हैं। [८०-८१] अथैडकः । (दुम्बा मेढा) । तस्य नामानि तद्भेदस्य च मांसगुणाँश्चाह एडकः पृथुशृङ्गः स्यान्मेदःपुच्छस्तु दुम्बकः । एडकस्य पलं ज्ञेयं मेषामिषसमं गुणैः ॥८२॥ मेदःपुच्छोद्भवं मांसं हृद्यं वृष्यं श्रमापहम् । पित्तश्लेष्मकर किञ्चिद्वातव्याधिविनाशनम् ॥८३॥ एडक अर्थात् मोटी सींग वाले मेढा का संस्कृत नाम-एडक और पृथुशृङ्ग है। इसकी सींग बड़ी मोटी होती है। दुम्बा मेढ़ा का संस्कृत नाम-मेदःपुच्छ तथा दुम्बक है। इसकी पूँछ मेद बढ़ जाने से बड़ी चौड़ी हो जाती है। एडक संज्ञक मेढ़े का मांस-गुणों में पूर्वोक्त मेढ़े के मांस के समान ही समझना चाहिये। दुम्बा मेढ़े का मांस-हृदय को हितकर, वीर्यवर्धक, श्रम को दूर करने वाला, पित्त तथा कफ कारक एवम् किञ्चित् वातरोग को नष्ट करने वाला होता है। [८२-८३] अथ वृषभः (बैल) । तस्य नामानि मांसगुणानाह बलीवर्दस्तु वृषभः ऋषभश्च तथा वृषः । अनड्वांन्सौरभेयोऽपि गौरुक्षा भद्र इत्यपि ॥८४॥ सुरभिः सौरभेयी च माहेयी गौरुदाहता । गोमांसं सुगुरु स्निग्धं पित्तश्लेष्मविवर्द्धनम् ।। बृंहणं वातहृत् बल्यमपथ्यं पीनसप्रणुत् ।।८५।। बैल के संस्कृत नाम-बलीवर्द, वृषभ, ऋषभ, वृष, अनड्वान् (अनडुह), सौरभेय, गौः (गो), उक्षा (लक्षण) तथा भद्र ये सब हैं। गौ के संस्कृत नाम-सुरभि, सौरभेयी, माहेयी तथा गौः (गो) ये सब कहे हुये हैं। गोमांस-अत्यन्त गुरु, स्निग्ध, पित्त तथा कफ को बढ़ानेवाला, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), वात को दूर करने वाला, बलकारक, अस्वस्थों के लिये अपथ्य तथा पीनस रोग नाशक होता है। [८४-८५] अथाश्वः (घोड़ा)। तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह घोटकेऽप्यश्वस्तुरगास्तुरङ्गमाश्च तुरङ्गाः। बाजिवाहार्वगन्धर्वहयसैन्धवसप्तयः ॥८६॥ अश्वमांसन्तु तुवरं वह्निकृत्कफपित्तलम्। वातहृद् बृंहणं बल्यं चक्षुष्यं मधुरं लघु ॥८७॥ घोड़े के संस्कृत नाम-घोटक, अश्व, तुरग, तुरङ्ग, तुरङ्गम, बाजि, वाह, अर्व (अर्वन्) गन्धर्व, हय, सैन्धव तथा सप्ति ये सब हैं। घोड़े का मांस-कषाय तथा मधुर रस युक्त, अग्निकारक, कफ तथा पित्त को उत्पन्न करने वाला, वातनाशक, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), बलकारक, नेत्रों के लिये हितकर तथा लघु होता है। [८६-८७] अथ कूलेचराः । तत्रः महिषः (भैंसा)। तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह महिषो घोटकारिः स्यात्कासरश्च रजस्वलाः ॥८८॥ पीनस्कन्धः कृष्णकायो लुलायो यमवाहनः । महिषस्यामिषं स्वादु स्निग्धोष्णं वातनाशनम् ॥८९॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
मांसवर्गः ८६७ निद्राशुक्रप्रदं बल्यं तनुदार्ढ्यकरं गुरु । वृष्यञ्च सृष्टविण्मूत्रं वातपित्तास्रनाशनम् ।। ९० ।। कूलेचर संज्ञक पशुओं में भैंसा के संस्कृत नाम-महिष, घोटकारि, कासर, रजस्वल, पीनस्कन्ध, कृष्णकाय, लुलाय और यमवाहन ये सब हैं। भैंसे का मांस-स्वादिष्ट, स्निग्ध, उष्ण, वातनाशक, निद्रा तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाला, बलकारक, शरीर को पुष्ट करने वाला, गुरु, वीर्यवर्धक, मूत्र तथा मल को निकालने वाला एवम् वातपित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [८८-९०] अथ मण्डूकः (मेंढक) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह मण्डूकः प्लवगो भेको वर्षाभूर्दर्दुरो हरिः । मण्डूकः श्लेष्मलो नातिपित्तलो बलकारकः ।। ९१ ।। मेढक के संस्कृत नाम-मण्डूक, प्लवग, भेक, वर्षाभू, दर्दुर तथा हरि ये सब हैं। मेढक का मांस-कफ पैदा करने वाला, अत्यन्त पित्तकारक नहीं (थोड़ा पित्तकारक) तथा बलकारक होता है। [९१] अथ पादिनः । तत्र कच्छपः (कछुआ) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह कच्छपो गूढपात्कूर्मः कमठो दृढपृष्ठकः । कच्छपो बलदो वातपित्तनुत्पुंस्त्वकारकः ।। ९२ ।। कूलेचरों के अन्तर्गत पादी अर्थात् पाँववाले जीवों में कछुये का संस्कृत नाम-कच्छप, गूढपाद, कूर्म, कमठ तथा दृढपृष्ठक ये सब हैं। कछुये का मांस-बलदायक, वात-पित्त को दूर करने वाला एवम् पुंस्त्व (मैथुनशक्ति) बढ़ाने वाला है। [९२] अथ विशेषाः । तत्र सद्योहतस्य मांसगुणानाह सद्योहतस्य मांसं स्याद्व्याधिघाति यथाऽमृतम् । वयस्यं बृंहणं सात्म्यमन्यथा तद् विवर्जयेत् ।। ९३ ।। मांस विषयक विशेष बातों में तत्काल मारे गये जीवों के मांस का गुण-अमृत के समान व्याधि को दूर करने वाला, आयु को स्थिर करने वाला, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक) तथा हितकर होता है। यदि तत्काल का मारा हुआ जीव न हो तो उसका मांस नहीं खाना चाहिये। [९३] अथ स्वयं मृतस्य मांसगुणानाह स्वयं मृतस्य चाबल्यमतीसारकरं गुरु ।। ९४ ।। स्वयं मरे हुये जीवों का मांस-बलकारक नहीं होता है अर्थात् निर्बलता-कारक, अतीसार को उत्पन्न करने वाला तथा गुरु होता है। [९४] अथ वृद्धबालयोर्मांसगुणानाह वृद्धानां दोषलं मांसं बालानां बलदं लघु ।। ९५ ।। बुड्ढे जीवों का मांस-दोषों को बढ़ाने वाला होता है। बच्चे जीवों का मांस-बलकारक तथा लघु होता है। [९५] अथ सर्पव्यालदष्टयोर्मांसयोः शुष्कमांसस्य च गुणानाह सर्पदष्टस्य मांसञ्च शुष्कमांस त्रिदोषकृत् । त्रिदोषकृद् व्यालदष्टं शुष्कं शूलकरं परम् ।। ९६ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
८६८ भावप्रकाशनिघण्टुः सर्प के काटने से मरे हुए जीवों का मांस-त्रिदोषकारक तथा उसी का सूखा मांस भी त्रिदोषकारक होता है। और हिंस्र जीव व्याघ्रादिकों से काटे हुये जीवों का मांस भी त्रिदोषकारक ही होता है किन्तु सूखा मांस अत्यन्त शूलकारक होता है। [९६] अथ विषादिमृतस्य मांसगुणानाह विषाम्बुरुङ्मृतस्यैतन्मृत्युदोषरुजाकरम् । क्लिन्नमुत्क्लेशजनकं कृशं वातप्रकोपणम्। तोयपूर्णं शिराराजं मृतमप्सु त्रिदोषकृत् ।।९७।। विष से, जल में डूब कर अथवा रोग से पीड़ित होकर मरे जीवों का मांस-मृत्युदायक, दोषकारक तथा रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है। क्लिन्न (सड़ा गला) मांस-उत्क्लेश (वमन की इच्छा) को उत्पन्न करने वाला होता है। कृश (दुर्बल) जीवों का मांस-वायु को प्रकुपित करने वाला होता है। जल में मरे हुये जीवों का मांस- त्रिदोषकारक होता है क्योंकि उसकी जितनी शिरायें (नाड़ियाँ) होती हैं वे सब जल से पूर्ण रहती हैं। [९७] अथ जात्यादिपरत्वेन मांसस्य गुणानाह परार्द्धं लघु पुंसां स्यात्स्त्रीणां पूर्वार्द्धमादिशेत् । देहमध्यं गुरुप्रायं सर्वेषां प्राणिनां स्मृतम् ।।९८।। पक्षक्षेपाद्विहङ्गानां तदेव लघु कथ्यते। गुरूण्यण्डानि सर्वेषां गुर्वी ग्रीवा च पक्षिणाम् ।।९९।। उरःस्कन्धोदरं कुक्षी पादौ पाणी कटी तथा । पृष्ठत्वग्यकृदन्त्राणि गुरूणीह यथोत्तरम् ।।१००।। लघुवातकरं मांसं खगानां धान्यचारिणाम् । मत्स्याशिनां पित्तकरं वातघ्नं गुरु कीर्त्तितम् ।।१०१।। फलाशिनां श्लेष्मकरं लघु रूक्षमुदीरितम् । बृंहणं गुरु वातघ्नं तेषामेव पलाशिनाम् ।।१०२।। तुल्यजातिष्वल्पदेहा महादेहेषु पूजिताः । अल्पदेहेषु शस्यन्ते तथैव स्थूलदेहिनः ।।१०३।। जीवों के जाति आदि की प्रधानता से मांस का गुण-जाति की प्रधानता-पक्षियों में पुरुष जाति के जीवों का मांस-श्रेष्ठ होता है तथा चौपायों (बकरा आदि) में स्त्री जाति के जीवों का मांस-श्रेष्ठ होता है। अंग की प्रधानता- पुरुष संज्ञक जीवों के शरीर में नीचे भाग का मांस-लघु होता है। तथा स्त्रीसंज्ञक जीवों के ऊपरी भाग का मांस लघु होता है। सम्पूर्ण जीवों के शरीर में मध्य भाग का मांस-प्रायः करके गुरु होता है। सम्पूर्ण पक्षियों के अण्डे तथा गर्दन गुरु होते हैं। छाती, कन्धा, उदर, दोनों कोख, दोनों पैर, दोनों हाथ, कमर, पीठ, त्वचा, यकृत् (जिगर) और आँत ये सब एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर गुरु होते हैं। भोजन की प्रधानता-धान्य भोजन करने वाले पक्षियों का मांस- लघु तथा वातकारक होता है। मछली भोजन करने वाले पक्षियों का मांस-पित्तकारक, वातनाशक तथा गुरु होता है। फलभोजी पक्षियों का मांस-कफ कारक, लघु तथा रूक्ष होता है। मांसभोजी पक्षियों का मांस-बृंहण (रस- रक्तादिवर्धक), गुरु तथा वातनाशक होता है। सजातियों में शरीर की छुटाई बड़ाई की प्रधानता-समान जाति वाले जीवों में यदि वे बड़े शरीर वाले हैं तो उनमें जो अपेक्षाकृत छोटे शरीरवाले हैं उनका मांस श्रेष्ठ होता है। एवम्-समान जाति के छोटे शरीरवाले जीवों में जो अपेक्षाकृत स्थूल शरीर वाले हैं उनका मांस-श्रेष्ठ होता है। [९८-१०३] अथ मत्स्याः । तत्र रोहितः (रोहू) । तस्य लक्षणं मांसमुण्डयोगुणाँश्चाह रक्तोदरो रक्तमुखो रक्ताक्षो रक्तपक्षतिः । कृष्णपुच्छो झषः श्रेष्ठो रोहितः कथितो बुधैः ।।१०४।। रोहितः सर्वमत्स्यानां वरो वृष्योऽर्द्दिमार्त्तिजित् । कषायानुरसः स्वादुर्वातघ्नो नातिपित्तकृत् । ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान् हन्याद्रोहितमुण्डकम् ।।१०५।।
मांसवर्ग: ८६९ मछलियों में रोहू मछली के लक्षण-जिस मछली का उदर, मुख, नेत्र तथा अगल-बगल के छोटे-छोटे पंख ये सब रक्तवर्ण के हों एवम्-पूँछ काली हो तो पण्डित लोग उसे "रोहू मछली" कहते हैं। सम्पूर्ण मछलियों में रोहू नामक मछली ही श्रेष्ठ होती है। रोहू का मांस-वीर्यवर्धक, अर्दितवात (मुँह का लकवा) को दूर करने वाला, आरम्भ में स्वादिष्ट, अन्त में कषायरसयुक्त, वातनाशक और अत्यन्त पित्तकारक नहीं (किञ्चित् पित्तकारक) होता है। रोहू का मुण्ड-जत्रु (कन्धा तथा काँख की सन्धि) से ऊपर के भागों में होने वाले रोगों को दूर करने वाला होता है। [१०४-१०५] अथ शिलीन्ध्रः तस्य मांसगुणानाह शिलीन्ध्रः श्लेष्मलो बल्यो विपाके मधुरो गुरुः । वातपित्तहरो हृद्यः आमवातकरश्च सः ॥१०६॥ शिलीन्ध्र मछली का मांस-कफकारक, बलदायक, विपाक में मधुर रसयुक्त, गुरु, वातपित्तनाशक, हृदय के लिये हितकर तथा आमवात कारक होता है। [१०६] अथ भाकुरः । तस्य मांसगुणानाह भाकुरो मधुरः शीतो वृष्यः श्लेष्मकरो गुरुः । विष्टम्भजनकश्चापि रक्तपित्तहरः स्मृतः ॥१०७॥ भाकुर मछली का मांस-मधुररसयुक्त, शीतल, वीर्यवर्धक, कफकारक, गुरु, विष्टम्भ उत्पन्न करने वाला तथा रक्तपित्त नाशक होता है। [१०७] अथ मोचिका। तस्यां मांसगुणानाह मोचिका वातहृद् बल्या बृंहणी मधुरा गुरुः । पित्तहृत्कफकृद्रुच्या वृष्या दीप्ताग्नये हिता ॥१०८॥ मोचिका मछली का मांस-वात को दूर करनेवाला, बलकारक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), मधुर रसयुक्त, गुरु, पित्तनाशक, कफकारक, रोचक, वीर्यवर्धक एवम् दीप्त अग्निवाले पुरुषों के लिये हितकर होता है। [१०८] अथ पाठीनः । तस्य मांसगुणानाह पाठीनः श्लेष्मलो बल्यो निद्रालुः पिशिताशनः । दूषयेद्रुधिरं पित्तं कुष्ठरोगं करोति च ॥१०९॥ पाठीन मछली का मांस-कफकारक, बलदायक, निद्रा को लाने वाला होता है। यह मछली मांस खाने वाली होती है अतः इसका मांस रुधिर को दूषित करने वाला एवम् पित्त तथा कुष्ठ रोग को उत्पन्न करने वाला होता है ॥१०९॥ अथ शृङ्गी (सींगी) । तस्या मांसगुणानाह शृङ्गी तु वातशमनी स्निग्धा श्लेष्मप्रकोपणी । रसे तिक्ता कषाया च लघ्वी रुच्या स्मृताबुधैः ॥११०॥ शृङ्गी मछली का मांस-वायु को शमन करने वाला, स्निग्ध, कफ को प्रकुपित करने वाला, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, लघु तथा रुचिकारक होता है। [११०] अथेल्लीशः (हिल्सा) । तस्य मांसगुणानाह इल्लीसो मधुरः स्निग्धो रोचनो वह्निवर्द्धनः । पित्तहृत्कफकृत्किञ्चिल्लघुर्वृष्योऽनिलापहः ॥१११॥ हिल्सा मछली का मांस-मधुर रस युक्त, स्निग्ध, रोचक, अग्निवर्धक, पित्त को दूर करने वाला, कफकारक, किंचित् लघु, वीर्यवर्धक तथा वायुनाशक होता है। [१११]