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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

एतदाहारपाके विशेषमाह । शरीरं पाञ्चभौतिकम् । तत्र पञ्चसु भूतेषु पञ्चाग्नयस्तिष्ठन्ति। उक्तं च चरकेण¹- भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसाः । पञ्चाहारगुणान् स्वान् स्वान्यार्थिवादीन् पचन्त्यनु ।।१६९।। पञ्च महाभूतों में चरकोक्त पञ्चाग्नि का निर्देश-भौम (भूमिसम्बन्धी), आप्य (जल सम्बन्धी), आग्नेय (अग्नि सम्बन्धी), वायव्य (वायु सम्बन्धी) और नाभस (आकाश सम्बन्धी) पाँच अग्नि हैं, ये सब अपने-अपने पृथिवी आदि (पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश) के सम्बन्धी पाँच प्रकार के आहार के गुणों को पकाते हैं ।।१६९।। ❖ अत्रोष्मपदेनाग्निरुच्यते ।।१६९।। यहाँ 'ऊष्मा' से 'अग्नि' का ग्रहण होता है ।।१६९।। आहारोऽपि पाञ्चभौतिकः तत्र पाचकपित्तस्थेनाग्निनोत्तेजितेन शरीरवर्तिना भूभागाग्निना आहारवर्त्तिभूभागः पच्यते । पक्तो भूभागः स्वकीयान् गुणानभिवर्द्धयति । एवं जलादिभागा अपि पच्यन्ते । तथा च सुश्रुते- 'पञ्च भूतात्मके देहे आहारः पाञ्चभौतिकः । विपक्तः पञ्चधा सम्यग्गुणान् स्वानभिवर्द्धयेद्' ।।१७०।। इति । पञ्च महाभूतों से बने हुये शरीर में पञ्च महाभूत सम्बन्धी आहार पाँच प्रकार से अच्छी तरह परिपक्व होकर अपने गुणों को बढ़ाता है ।।१७०।। ❖ गुणशब्देनात्र गुणिनः पृथिव्यादय उच्यन्ते । तेन गुणान शरीरवर्त्तिन; पार्थिवादीन् भागान- भिवर्द्धयेदित्यर्थः ।।१७०।। यहाँ 'गुण' पद से गुणी पृथिवी आदि का ग्रहण किया जाता है, इससे 'गुणों को अर्थात् शरीरवर्त्ती पृथिवी आदि सम्बन्धी भागों को बढ़ाता है' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ।।१७०।। एवमहोरात्रेण पक्व आहारो मिष्टः पटुश्च मधुरो भवति । अम्लस्त्वम्लो भवति । कटुतिक्तः कषायश्च कटुर्भवति । उक्तञ्च- मिष्टः पटुश्च मधुरम्लोऽम्लं पच्यते रसः । कटुतिक्तकषायाणां विपाको जायते कटुः' इति ।।१७१।। कटु, तिक्त, कसैला आहार रस का स्वाद—'मीठा और नमकीन रस युक्त आहार पकने पर मधुर और खट्टा पकने पर खट्टा ही होता है तथा कटु, तिक्त और कसैला का परिपाक कटु होता है ।।१७१।। एवं विपक्वस्याहारस्य सारो निगदितो रसः, शेषो ग्रहणीस्थो मलद्रवः मलद्रवस्य जलभागः शिराभिर्वस्तिं नीतो मूत्रं भवति । उक्तञ्च- आहारस्य रसः सारः सार हीनो मलद्रवः । शिराभिस्तज्जलं नीतं बस्तिं मूत्रत्वमाप्नुयात् ।।१७२।। शेषं किट्टञ्च यत्तस्य तत्पुरीषं निगद्यते । समानवायुना नीतन्तत्तिष्ठति मलाशये ।।१७३।। आहार से रसादि का निर्माण—'आहार का सार भाग रस और सारहीन भाग मलद्रव कहलाता है और मलद्रव का जो जलभाग होता है वह शिराओं द्वारा बस्ति में पहुँच कर मूत्र कहलाने लगता है तथा उस मलद्रव का द्रव से हीन


१. 'इत्याह चरक' इति पाठान्तरम् ।

५४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जो शेष भाग होता है वह पुरीष (विष्ठा) कहलाता है और वही पुरीष समान वायु के द्वारा पहुँचाये जाने पर मलाशय में जाकर ठहरता है ॥१७२-१७३॥ तत्र १मलाशयस्थेनापानवायुना प्रेरितं मूत्रं मेढ्रभगमार्गेण पुरीषं गुदमार्गेण शरीराद् बहिर्याति । उक्तञ्च- मूत्रञ्चोपस्थमार्गेण पुरीषं गुदमार्गतः । अपानवायुना क्षिप्तं बहिर्याति शरीरतः ॥१७४॥ मूत्र और पुरीषोत्सर्ग में कारण- 'अपान वायु से प्रेरित होने पर उपस्थमार्ग से मूत्र और गुदा मार्ग से पुरीष शरीर के बाहर निकलता है ॥१७४॥ ❖ उपस्थः = शिश्नो भगञ्च ॥१७४॥ 'उपस्थ' का अर्थ 'लिङ्ग और योनि' समझना चाहिये ॥१७४॥ रसस्तु समानवायुना प्रेरितो धमनीमार्गेण शरीरारम्भकस्य रसस्य स्थानं हृदयं गत्वा तेन सह मिश्रितोभवति । उक्तञ्च- रसस्तु हृदयं याति समानमरुतेरितः । स तु व्यानेन विक्षिप्तः सर्वान् धातून् विवर्द्धयेत् ॥१७५॥ केदारेषु यथा कुल्याः पुष्णन्ति विविधौषधीः । तथा कलेवरे धातून् सर्वान् वर्द्धयते रस ॥१७६॥ आहार रस का कार्य-समान वायु से प्रेरित होकर रस हृदय में जाता है और वहाँ से व्यान वायु के द्वारा फेके जाने पर रस सम्पूर्ण धातुओं को बढ़ाता है। जिस प्रकार खेतों में स्थित अनेक प्रकार के धान्यादि ओषधियों को कुल्या (नहरें) पुष्ट किया करती हैं, उसी भाँति रस भी शरीर में सब धातुओं को बढ़ाता रहता है ॥१७५-१७६॥ रसस्तु तत्र तत्र त्रिधा विभज्यते । उक्तञ्च चरके- स्थूलःसूक्ष्मस्तन्मलश्च तत्र तत्र त्रिधारसः । स्वं स्थूलोऽशः परं सूक्ष्मस्तन्मलो याति तन्मलम् ।। आहार से उत्पन्न हुआ रस क्रम से शरीरारम्भ रसरक्तादि प्रत्येक धातुओं में जाकर प्रत्येक धातुओं के स्थानों में स्थूल, सूक्ष्म और तन्मल (रस का मल) इस प्रकार से तीन अंशों में विभक्त हो जाता है और इनमें से स्थूलांश अपने स्थान में रहता है, सूक्ष्मांश दूसरे धातु में जाता है तथा रस का मलांश धातुओं के मल में जाता है ॥१७७॥ ❖ अयमर्थः । स्थूलोऽशः स्वं याति यथास्थितस्तिष्ठति, सूक्ष्मस्त्वंशः परं द्वितीयं धातुं याति, तन्मलो=रसादिमलः, तन्मलं=शरीरारम्भकं तत्तद्धातुमलं यातीत्यर्थः ॥१७७॥ स्पष्टार्थ यह है कि रस का स्थूल भाग अपने स्थान में रहता है अर्थात् रस जिस धातु में जाता है स्थूल भाग उसी धातु में रह जाता है और सूक्ष्म भाग दूसरे रक्तादि धातुओं में जाता है और उसका मल भाग अर्थात् रसादिकों का मल भाग उसके मल को अर्थात् शरीराम्भक तत्तद्घातुओं के मल को जाता है ॥१७७॥ यथा लौकिकाग्निनेक्षुरसः पच्यते तथा शरीरारम्भकस्य रसस्याग्निनाऽऽहाररसः पच्यते । पच्यमानः स पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डमेकञ्च यावत् प्राक्तनरसधातावेव तिष्ठति । उक्तं च सुश्रुते-'स खलु रसस्त्रीणि त्रीणि कलासहस्राणि पञ्चदश कला एकैकस्मिन् धातावुपतिष्ठते' । अत्र कलानां विंशतिर्मुहूर्तः, स च दण्डद्वयात्मकः ('इत्यभिप्रेत्याह)-तथा च भोजः- धातौ रसादौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः । अहोरात्रात्स्वयं पञ्च सार्द्धदण्डं च तिष्ठति ॥१७८॥ जिस प्रकार लोक की अग्नि से ईख का रस पकता है उसी प्रकार शरीर के आरम्भक रस के अग्नि से आहार का १. 'मलाशयेने'ति पाठान्तरं प्रामादिकम्। २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५५ रस पकता है और पकता हुआ वह रस पाँच अहोरात्र (रातदिन) १॥ डेढ़ दण्ड तक प्रथम जो रस धातु अर्थात् शरीरारम्भक रस धातु है उसी में रहता है, इसी बात को सुश्रुत में भी कहा है कि-वही रस (आहार से उत्पन्न रस) एक-एक धातु में (शरीरारम्भक प्रत्येक रसादि धातु में) तीन हजार पन्द्रह (३०१५) कला परिमित काल तक रहता है । २० कला का एक मुहूर्त्त होता है तथा एक मुहूर्त्त दो दण्ड का होता है अतः उसमें अर्थात् ३०१५ कला में पाँच अहोरात्र डेढ़ दण्ड होता है । इन्हीं सब अभिप्रायों को लेकर भोज ने भी कहा है कि— 'शरीरारम्भक रस धातु से लेकर मज्जाधातु तक प्रत्येक धातु में क्रम क्रम से जाकर रस प्रत्येक धातु में पाँच अहोरात्र डेढ़ दण्ड तक रहता है ।।१७८।। ❖ प्रत्येकमेकैकस्मिन्नित्यर्थः ।।१७८।। 'प्रत्येकम्' का अर्थ 'एक-एक धातु में' समझना चाहिये ।।१७८।। ततो यथा पच्यमानादिक्षुरसान्मलो निर्गच्छति तथा पच्यमानादाहाररसान्मलो निर्गच्छति स कफः । उक्तं च सुश्रुते- कफः पित्तं मलः खेषु प्रस्वेदो नखरोम च । नेत्रविट् त्वक्षु च स्नेहो धातूनां क्रमशो मलाः ।।३९।। धातुओं के मल—'कफ, पित्त, कर्णादि स्रोतों का मल, पसीना, नख, लोम, नेत्रमल और त्वचाओं के स्नेह, ये क्रम से धातुओं के मल हैं' ।।३९।। खेषु मलः=कर्णादि स्रोतोमलः ।।३९।। 'खेषु मलः' का अर्थ 'कर्णादि स्रोतों का मल' समझना चाहिये ।।३९।। स च कफःप्राणानिलप्रेरितो धमनीमार्गेण शरीरारम्भकंकलेदनाख्यं कफं गत्वा पुष्णाति, ततः सारभूतस्याहाररसस्य द्वौ भागौ भवतःस्थूलः सूक्ष्मश्च तत्र स्थूलो¹ भागः शरीरारम्भकं रसं पोषयति सकलशरीराधिष्ठानेन व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः सञ्चरन् पोषणस्नेहनजठरानलोष्मकृतसन्तापनिवारणादिभिर्गुणैः सकलशरीरं पुष्णाति । ततः सूक्ष्मो² भागः प्राणवायुना प्रेरितो धमनीमार्गेण शरीरारम्भकस्य रक्तस्य स्थानं यकृत्प्लीहरूपं गत्वा तेन सह मिलितो भवति । ततः प्राक्तनस्य रक्तस्याग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात्सार्द्धदण्डञ्च यावत् प्राक्तनरक्तधातावेव तिष्ठति । ततो यथा अग्निना पुनः पुनः पच्यमानादिक्षुविकाराद्वारं वारं मलं निर्गच्छति तथा पुनः पुनः पच्यमानादाहाररसात् प्रतिबारं मलं निर्गच्छति । तत्र रक्ताग्निना पच्यमानामलं पित्तं निर्गच्छति । तच्च पित्तं समानवायुना प्रेरितं धमनीमार्गेण शरीरारम्भकं पाचकाख्यं पित्तं गत्वा पुष्णाति । वह कफ प्राण वायु से प्रेरित होकर धमनी मार्ग से शरीरारम्भक क्लेदन नामक कफ को जाकर पुष्ट करता है, उसके बाद सारभूत आहारजात रस के दो भाग होते हैं एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें स्थूल भाग शरीरारम्भक रस को पुष्ट करता है तथा सम्पूर्ण शरीर में रहनेवाले व्यान नामक वायु से प्रेरित होकर धमनियों के द्वारा सञ्चार करता हुआ अर्थात् बह करके पोषण, स्नेहन तथा जठरानल की गर्मी से उत्पन्न हुये सन्ताप के निवारण आदि गुणों से सम्पूर्ण शरीर को पुष्ट करता है । उसके बाद सूक्ष्मभाग प्राणवायु से प्रेरित होकर धमनियों द्वारा शरीरारम्भक (शरीर को बनाने वाले) रक्त के स्थान पर अर्थात् यकृत् और प्लीहारूप रक्त के स्थान पर जाकर रक्त के साथ मिल जाता है । उसके बाद प्राचीन रक्त के अग्नि से पुनः पकता हुआ पाँच अहोरात्र (दिन-रात) और डेढ़ दण्ड तक उसी प्राचीन रक्तसंज्ञक धातु में स्थित रहता है । उसके बाद जैसे लोक में अग्नि से पुनः-पुनःपकाये जाते हुये ईख के रस से बारबार मल निकलता है, वैसे ही पुनः पुनः पकाये जाते हुये आहार के रस से भी प्रति बार मल निकलता है । उसमें रक्त की अग्नि से पकाये जाते हुये आहार १. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरं प्रामादिकम् । २. 'स्थूल' इति पाठान्तरं प्रामादिकम् ।

५६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे रस से जो मल निकलता है वह पित्त कहलाता और वह पित्त समान नामक वायु से प्रेरित होकर धमनी-मार्ग से जाकर शरीराम्भक पाचक नामक पित्त को पुष्ट करता है । ततः सारभूतस्याहाररसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च, स्थूलो१ भागोरञ्जकाख्येन२ पित्तेन३ रक्तीकृतः शरीरारम्भकं रक्तं (पोषयन्४) व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः सञ्चरन् सकलशरीरगतानि रुधिराणि पुष्णाति । ततः सूक्ष्मो५ भागो व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शिराभिश्च शरीरारम्भकाणि मांसानि याति । ततो मांसाग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डञ्च यावन्मांसेष्वेव तिष्ठति । ततः पच्यमानात्तस्मान्मलं निर्गच्छति । तद्व्यानवायुना क्षिप्तं कर्णावागत्य कर्णविट् भवति । उसके बाद सारभूत उसी आहार-रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें स्थूलभाग रञ्जकनामक पित्त के द्वारा रँगा जाने पर रक्तरूप होकर शरीरारम्भक रक्त को पुष्ट करता हुआ व्यान-वायु से प्रेरित होकर धमनियों के द्वारा संचार करता हुआ सम्पूर्ण शरीरस्थित रुधिर को पुष्ट करता है, उसके बाद सूक्ष्म भाग व्यान वायु से प्रेरित होकर धमनी और शिराओं के द्वारा शरीरारम्भक मांस में जाता है, उसके बाद मांस में स्थित अग्नि के द्वारा पुनः-पुनः पकाया जाता हुआ पाँच अहोरात्र और १॥ डेढ़ दण्ड तक मांस ही में स्थित रहता है, उसके बाद मांसाग्नि से पकाये जाते हुये उससे जो मल निकलता है, वह व्यान वायु से प्रेरित होने पर दोनों कानों में आकर कान का मैल होता है । ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः । स्थूलः सूक्ष्मश्च । ततः स्थूलो६ भागो मांसानि पुष्णाति । ततः सूक्ष्मो७ भागो व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शरीरारम्भकस्य भेदसः स्थानमुदरं याति ततो मेदसोऽग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डं च यावन्मेदस्येव तिष्ठति । ततः पच्यमानात् तस्मान्मलो निर्गच्छति प्रस्वेदरूपः । स चः शीतः स्रोतस्येव तिष्ठति शरीरोष्मणा तप्तश्चेत्तदा व्यानवायुना प्रेरितः शिरामार्गेर्लोमकूपेभ्यो बहिर्याति 'जिह्वादन्तक्षामेढ्रादिमलञ्च मेदोमलमि' त्येके । उसके बाद सारभूत उसी आहार-रसके दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें से स्थूल भाग मांस को पुष्ट करता है और सूक्ष्म भाग व्यान-वायु से प्रेरित होकर धमनियों के द्वारा शरीरारम्भक मेद के स्थान उदर में जाता है, उसके बाद मेद की अग्नि से फिर पकाया जाता हुआ वह पञ्च अहोरात्र और डेढ़ दण्ड तक उसी मेद में ठहरता है, उसके बाद मेद की अग्नि से पकाये जाते हुये उससे प्रस्वेद रूप (पसीना-रूपी) मल निकलता है और वह शीत (ठण्डा) रहने पर तो स्रोतों ही में रहता है और शरीर की गर्मी से तप्त होने पर पिघल जाने से व्यान वायु से प्रेरित होकर शिराओं के मार्ग से रोमकूपों (रोएँ के छिद्रों) से बाहर निकलता है 'जीभ, दाँत, काँख और मूत्रेन्द्रिय के मल को भी कोई २ मेद का मल कहते हैं' किन्तु यह सभी लोगों का मत नहीं है । ततः सारभूतरसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च, तत्र स्थूलो८ भागो मेदः पुष्णाति, उदरे तिष्ठन् (९व्यानवायुना प्रेरितः स्रोतोमार्गैः सूक्ष्मास्थिस्थितान्यपि मेदांसि पुष्णाति । सूक्ष्मो भागो) व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शिराभिश्च शरीरारम्भकाण्यस्थीनि याति । ततोऽस्थ्यग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात्सार्द्धदण्डञ्च यावदस्थिष्वेव तिष्ठति । ततः पच्यमानात् तस्मान्मलो निर्गच्छति । स च व्यानवायुना प्रेरितः १०शिरामार्गेर्गत्वाऽङ्गुलिषु नखास्तनौ लोमानि भवन्ति । १. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । २. 'रञ्जकाग्निने'ति पाठान्तरम् । ३. 'पित्तेन स' इति पाठान्तरम् । ४. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ५. 'स्थूल' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ६. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरमसङ्गतम् । ७. 'स्थूल' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ८. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ९. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । १०. 'शिराभिर्मार्गेणागत्यागत्ये'ति पाठान्तरम् ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५७ उसके बाद सारभूत रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें से स्थूल भाग उदर में रहता हुआ मेद को पुष्ट करता है तथा वहाँ से व्यान वायु से प्रेरित होकर स्रोतों के मार्ग से जाकर सूक्ष्म (पतली) हड्डियों में भी स्थित मेद को पुष्ट करता है और सूक्ष्म भाग व्यानवायु से प्रेरित होकर धमनी और शिराओं के द्वारा शरीरारम्भक हड्डी को जाता है, उसके बाद हड्डी की अग्नि से पुनः पकाया जाता हुआ पाँच अहोरात्र और डेढ़ दण्ड तक हड्डियों ही में ठहरता है, उसके बाद पकाये जाते हुये उस सारभूत से जो मल निकलता है वही व्यान वायु से प्रेरित होकर शिराओं के मार्ग से आकर अङ्गुलियों में नख और शरीर में रोम हो जाता है। ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च। तत्र स्थूलो¹ भागोऽस्थीनि पुष्णाति ततः सूक्ष्मो² भागो व्यानवायुना प्रेरितः स्रोतोमार्गैरमज्जस्थानानि स्थूलास्थ्यभ्यन्तराणि याति। ततो मज्जाग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डञ्च यावन्मज्जन्येत्र तिष्ठति, ततः पच्यमानात्तस्मान्मलं निर्गच्छति। तच्च व्यानवायुना प्रेरितं शिरामार्गैनयनयोरागत्य नेत्रविट् त्वक्षु स्नेहश्च भवति। उसके बाद सारभूत रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म उसमें से स्थूल भाग हड्डियों को पुष्ट करता है, उसके बाद भाग व्यानवायु से प्रेरित होकर स्रोतों के मार्ग से मज्जा के स्थान मोटी हड्डियों के भीतरी भाग को जाता है, उसके बाद मज्जा की अग्नि से फिर पकाया जाता हुआ पाँच अहोरात्र और डेढ़ दण्ड तक मज्जा ही में ठहरता है, उसके बाद पकाये जाते हुये उससे जो मल निकलता है, वह व्यानवायु से प्रेरित होकर शिराओं के मार्ग से आकर नेत्रों में नेत्र का मल (कीचड़) और त्वचाओं में स्नेह (चिकनाहट) हो जाता है। ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च, तत्र स्थूलो भागो मज्जानं पुष्णाति ततः सूक्ष्मो व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शिराभिश्च शुक्रस्य स्थानं सकलं शरीरं गत्वा शरीरारम्भकेण शुक्रेण सह मिश्रितो भवति। ततः शुक्रस्याग्निना पुनः पच्यते पच्यमाने तस्मिन्मलं नास्ति। सहि सहस्रधाध्मातसुवर्णवत्। इत्युत्तरोपदिश्यते- उसके बाद सारभूत रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें से स्थूल भाग मज्जा को पुष्ट करता है और सूक्ष्म भाग व्यानवायु से प्रेरित होकर धमनी और शिराओं के द्वारा शुक्र के स्थान सम्पूर्ण शरीर में जाकर शरीरारम्भक शुक्र के साथ मिल जाता है। उसके बाद शुक्र के अग्नि से पुनः पकाया जाता है और पकते हुये उसमें फिर मल नहीं रहता है, क्योंकि वह हजार बार के तपाये हुये सोने के समान निर्मल हो जाता है, इसी बात को आगे के श्लोकों में कहते हैं। स्वाग्निभिः पच्यमानेषु मज्जान्तेषु रसादिषु। षट्सु धातुषु जायन्ते मलानि मुनयो जगुः ।।१७९।। यथा सहस्रधा ध्माते न मलं किल काञ्चने। तथा रसे मुहुः पक्वे न मलं शुक्रताङ्गते ।।१८०।। ‘अपने-अपने अग्नियों से पकते हुये रस से लेकर मज्जा तक छः धातुओं में मल निकलता है’ ऐसा मुनियों ने कहा है। जिस प्रकार हजार बार तपाये हुए सुवर्ण में मल नहीं रहता, उसी प्रकार बारंबार परिपक्व होने से जब आहाररस शुक्रत्व को प्राप्त हो जाता है तब उसमें भी मल नहीं रहता है ।।१७९-१८०।। ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च। तत्र स्थूलो भागः शरीरारम्भकं शुक्रं याति, सूक्ष्मः स्नेहभागं ओजस्तस्य लक्षणमाह- ओजः सर्वशरीरस्थं स्निग्धं शीतं स्थिरं सितम्। सोमात्मकं शरीरस्य बलपुष्टिकं मतम् ।।१८१।। १. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरम् सङ्गतम्। २. 'स्थूल' इति पाठान्तरमसङ्गतम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

५८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ओज के लक्षण—ओज सम्पूर्ण शरीर में रहने वाला, स्निग्ध, शीतल (ठण्डा), स्थिर, सफेद और सोमात्मक होता है तथा शरीर में बल और पुष्टि का करनेवाला होता है ॥ १८० ॥ ❖ बलं=चेष्टापाटवम् । तथा च-'चेष्टासु पाटवं यत्तु बलं तदभिधीयते । यत्तु सुश्रुते— 'रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत्परं तेजस्तत्खलु ओजस्तदेव बलम्' इति । तेजस्तेजोद्रवः । अत्रायमभिप्रायः- यस्माद्रसाद्रोजो भवति स रसः सर्वधातुस्थानगतत्वात्तद्घातुवन्मन्यत इति । सर्वधातूनां स्नेहमोजः, क्षीरे घृतमिव तदेव बलमिति । तत्कार्यकारणयोरभेदोपचारात् । अभेदकथनञ्च चिकित्सैक्यार्थम् ॥ १८१ ॥ यहाँ 'बल' पद से 'चेष्टा करने में सामर्थ्य' यह अर्थ समझा जाता है, क्योंकि अन्यत्र भी कहा है कि—'चेष्टा करने में जो पाटव अर्थात् सामर्थ्य (फुर्तीलापन) होता है उसी को पण्डित लोग 'बल' कहते हैं और 'सुश्रुत' में जो यह कहा है कि 'रस से लेकर शुक्र पर्यन्त सात धातुओं का जो प्रधान तेज है वह ओज कहलाता है तथा वही बल भी कहलाता है' यहाँ पर 'तेज' पद से 'तेज सम्बन्धी द्रव' लिया जाता है । इस वाक्य में 'सुश्रुत' का यह अभिप्राय है कि—जिस रस से ओज होता है वह रस सब धातुओं के स्थान में जाता है अत एव जब जिन जिन धातुओं के स्थान में जाता है तब उन उन धातुओं के तरह से उन-उन स्थानों में वह समझा जाता है, अतएव सब धातुओं का स्नेह ओज है, अर्थात् जिस प्रकार से दूध में घी होता है उसी प्रकार से ओज भी धातुओं में होता है और 'वही बल भी कहलाता है' ऐसा जो कहा है वह कार्य और कारण का अभेद मानकर कहा है अर्थात् ओज और बल यद्यपि एक नहीं हैं क्योंकि ओज से बल की उत्पत्ति होने से ओज कारण है तथा बल कार्य है, तथापि कार्य और कारण का अभेद होने से 'ओज ही बल कहलाता है' यह कहना सङ्गत ही है और अभेद कथन का फल यह है कि कार्य और कारणरूप जो बल और ओज हैं इन दोनों की चिकित्सा का ऐक्य हो ॥ १८१ ॥ अन्यच्च- गुरु शीतं मृदुस्निग्धं सान्द्रं स्वादु स्थिरं तथा । प्रसन्नं पिच्छिलं सूक्ष्ममोजो दशगुणं स्मृतम् ॥ १८२ ॥ ओज—गुरु (भारी), शीतल, मृदु, स्निग्ध, सान्द्र (गाढ़ा), स्वादु (स्वादयुक्त), स्थिर, निर्मल, पिच्छिल और सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतोगामी) इन दश गुणों से युक्त कहा गया है ॥ १८२ ॥ चरके तु- अष्टविन्दुप्रमाणं तदीषद्रक्तं सपीतकम् । १अग्नीषोमात्मकत्वेन द्विरूपं वर्णितन्तु तत् ॥ १८३ ॥ चरक में तो—ओज को आठ बिन्दु प्रमाण तथा थोड़ा लाल तथा पीला वर्ण लिये हुये कहा है तथा अग्निसोमात्मक होने से दो तरह का कहा है अर्थात् ओज आग्नेय और सौम्य भेद से दो प्रकार का कहा है ॥ १८३ ॥ वाग्भटश्च- ओजश्च तेजो धातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् । हृदयस्थम

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५९ रहता है तथा ओज से ही उत्साह, प्रतिभा, धैर्य्य, लावण्य और सुकुमारता इत्यादि देह के आश्रित रहने वाले अनेक प्रकार के भाव उत्पन्न होते हैं ।।१८४-१८६।। ततः स्थूलो भागो रसो मासेन पुंसां शुक्रं स्त्रीणान्त्वार्त्तवं शुक्रञ्च भवति। उक्तञ्च सुश्रुते-'एवं मासेन रसः शुक्लो भवति । ३स्त्रीणामात्तर्वञ्चे'ति । चकारात् स्त्रीणामपि शुक्रं भवति । अत एवोक्तं सुश्रुते- योषितोऽपि स्रवत्येव शुक्रं पुंसः समागमे । तत्र गर्भस्य किञ्चित् न करोतीति न चिन्त्यते ।।१८७।। उसके बाद पूर्वोक्त प्रकार से आहार रस का स्थूल भाग एक मास में पुरुषों का शुक्र और स्त्रियों का आर्तव तथा शुक्र हो जाता है और 'सुश्रुत' में भी कहा है कि इस प्रकार से एक मास में रस पुरुषों का शुक्र हो जाता है तथा स्त्रियों का आर्तव भी हो जाता है, यहाँ पर मूल में 'च' का पाठ है अतएव उसका 'भी' अर्थ होने

६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मांसान्मेदः प्रजायत इति । मांसादनन्तरं मेदः प्रजायते रसादेवेत्यर्थः । मेदसोऽस्थि जायते, रसादेवेत्यर्थः । एवं ततो मज्जा (जायते१, रसादेवेत्यर्थः ।) ततः२ शुद्धं शुक्रं (रसादेव३) सम्भवतीत्यर्थः ।। १८९ ।। इस प्रकार से आहार रस ही 'केदारकुल्या' न्याय से अर्थात् कुल्या (थोड़े जलवाली मनुष्यों द्वारा बनाई हुई नदी (नहर) जिस प्रकार केदार (खेत) स्थित धान्यादिकों का पोषण करती है, उसी प्रकार रस भी सम्पूर्ण धातुओं का पोषण करता हुआ एक मास और नौ दण्ड में शुक्र और आर्तव होता है, ऐसा सर्वसम्मत सिद्धान्त होने पर 'रस से रक्त' इत्यादि जो अभी ऊपर श्लोक में कह आये हैं वह सङ्गत ही है, अब उसी श्लोक की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि— 'रक्त से मांस' अर्थात् रक्तोत्पत्ति होने के बाद मांस उत्पन्न होता है वह भी वस्तुतः रस से ही उत्पन्न होता है तथा 'मांस से मेद उत्पन्न होता है' अर्थात् मांस के बाद रस से ही मेद उत्पन्न होता है, एवम् 'मेद से अस्थि उत्पन्न होता है' अर्थात् मेद के बाद रस से ही अस्थि उत्पन्न होती है। इसी प्रकार से 'अस्थि से मज्जा' अर्थात् अस्थि के बाद रस से ही मज्जा उत्पन्न होता है तथा 'मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है' अर्थात् मज्जा के बाद रस से ही शुद्ध शुक्र की उत्पत्ति होती है ।।१८९।। रसः शरीर त्रिधा सञ्चरतीत्याह- रसः शरीरे शब्दार्च्चिर्ज्वलसन्तानवत् त्रिधा । सञ्चरत्यनुरूपोऽयं नित्यमेव हि देहिनाम् ।। १९० ।। शरीर में आहार-रस का सञ्चार—प्राणियों के शरीर के अनुरूप रस शब्द, अर्चि (ज्योति) और जल के सन्तान (प्रवाह) की तरह तीन प्रकार से नित्य ही संचार करता रहता है ।।१९०।। ❖ अस्यायसभिप्रायः । पुरुषास्तीक्ष्णाग्नयो मध्यमाग्नयो मन्दाग्नयश्च भवन्ति, तत्र तीक्ष्णाग्नीनां स रसः शब्दसन्तानवच्छीघ्रं सञ्चरति, मध्यमाग्नीनामर्चिःसन्तानवन्मध्यवेगेन चरति, मन्दाग्नीनां जलसन्तानवन्मन्दं चरति । तेन मासेन रसाच्छुक्रं भवतीति, यदुक्तं तन्मध्यमाग्नीनधिकृत्योक्तम्, दीप्ताग्नीनान्तु रसः किञ्चिन्न्यूनेन मासेन शुक्रं भवति, मन्दाग्नेः किञ्चिदधिकेन मासेनेति सिद्धान्तः ।।१९०।। इसका अभिप्राय यह है कि पुरुष तीन प्रकार के होते हैं—(१) तीक्ष्णाग्निपुरुष, (२) मध्यमाग्निपुरुष और (३) मन्दाग्निपुरुष । उनमें तीक्ष्ण अग्निवाले पुरुषों के शरीर में वह रस शब्द प्रवाह की भाँति शीघ्रता से सञ्चार करता है, मध्यम अग्निवाले पुरुषों के शरीर में अर्चिः प्रवाह (ज्योतिः प्रवाह) की भाँति मध्यवेग से सञ्चार करता है और मन्द अग्नि वाले पुरुषों के शरीर में जल-प्रवाह की भाँति मन्दवेग से सञ्चार करता है, इससे 'एक मास में रस से शुक्र होता है' ऐसा जो कहा गया है वह मध्यम अग्निवाले पुरुषों के ही विषय में कहा गया है, दीप्त (तीक्ष्ण) अग्नि वाले पुरुषों का तो रस कुछ कम एक मास में ही वीर्य हो जाता है तथा मन्द अग्नि वाले पुरुषों का रस कुछ अधिक एक मास में वीर्य हो जाता है यह सिद्धान्त है ।।१९०।। तर्हि बाजीकरिणीनामोषधीनां किं प्रयोजनमित्याह- बाजीकरण ओषध्यः स्वप्रभावगुणोच्छ्रयात् । विरेचयन्ति ताः शुक्लं विरेकिद्रव्यवन्नृणाम् ।। १९१ ।। बाजीकरण ओषधियों का प्रयोजन—वाजीकरण ओषधियाँ अपने प्रभाव की अधिकता से अथवा गुण की अधिकता से अथवा प्रभाव और गुण दोनों की अधिकता से विरेचन (दस्त कराने वाली) ओषधियों की भाँति शुक्र का विरेचन करती हैं ।।१९१।। ❖ वाजीकरिण्यः = याभिरोषधीभिः पुरुषः शुक्राधिक्यात् स्त्रीषु वाजिवत् सामर्थ्यं प्राप्नोति ता वाजीकरिण्यः, स्वप्रभावगुणोच्छ्रयात् = तत्र काश्चिदोषध्यः स्वभावाधिक्यात्, काश्चित् स्वगुणाधिक्यात्, काश्चित् १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. 'अग्रे' इति पाठ । ३. कोष्ठस्थः पाठः क्वचित्कः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६१ स्वप्रभावगुणाधिक्यात्। तत्रसङ्कल्पपादलेपविशिष्टकान्तास्पर्शादयः स्वप्रभावाधिक्यात् शुक्रं विरेचयन्ति। घृतक्षीरादयः स्वगुणाधिक्यात्=स्निग्धत्वाधिक्यात्, माषादयः स्वप्रभावस्निग्धत्वादिगुणाधिक्यात्। वाजीकरिण्य इति बहुवचनमाद्यर्थानुवर्त्तनम्। बल्यबृंहणजीवनीयगणादयः, तद्वद्बोद्धव्याः। विरेचयन्ति=स्वप्रभावगुणा- धिक्याच्छीघ्रमेव रसाद्युत्पादनपूर्वकं शुक्रं जनयित्वा प्रवर्त्तयन्ति ।।१९१।। 'वाजीकरण ओषधियाँ' अर्थात् जिन ओषधियों से पुरुष शुक्र की अधिकता होने से स्त्रियों के साथ रमण करने में घोड़े की भाँति सामर्थ्य प्राप्त करता है वे वाजीकरण ओषधियाँ कहलाती हैं। 'वाजीकरण ओषधियाँ अपने प्रभाव और गुण की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं' इसका अर्थ यह है कि वाजीकरण ओषधियों में से कोई अपने प्रभाव की अधिकता से, कोई अपने गुण की अधिकता से तथा कोई अपने प्रभाव और गुण दोनों की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं। उनमें से सङ्कल्प (किसी स्त्री के विषय में चिन्ता आदि करना), पैर में विशेष औषध का लेप करना और विशिष्ट (सुन्दरी) स्त्रियों का स्पर्श करना आदि जितने हैं वे सब केवल अपने प्रभाव की अधिकता से ही शुक्र का विरेचन करती हैं। घी, दूध आदि अपने स्निग्धत्व रूप गुण की अधिकता से तथा माष (उड़द) आदि अपने प्रभाव और अपने स्निग्धत्व गुण आदि की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं। यहाँ 'वाजीकरिण्यः' इस बहुवचनान्त पद के प्रयोग करने से यह समझना चाहिये कि- 'आदि' इस अर्थ का अनुवर्त्तन हो, अर्थात्-केवल वाजीकरण ओषधियों का ही बोध न हो किन्तु 'वाजीकरण आदि' अर्थात् वाजीकरण से भिन्न चरकोक्त बल्य, बृंहण तथा जीवनीय गुणादि ओषधियों का भी वाजीकरण ओषधियों की भाँति ही बोध हो। 'वाजीकरण आदि ओषधियाँ अपने प्रभाव तथा गुण की अधिकता से शीघ्र हैं विरेचन करती है' ऐसा कहने से यह समझना चाहिये कि अपने प्रभाव और गुण की अधिकता से शीघ्र ही रस रक्तादि धातुओं को उत्पन्न करने के अनन्तर शुक्र को भी उत्पन्न करके प्रवर्त्तन (विरेचन) करती हैं ।।१९१।। यत आह१- दुग्धं माषाश्च भल्लात२ फलमज्जाऽऽमलानि च। जनकानि निगद्यन्ते रेचनानि च रेतसः ।।१९२।। शुक्रवर्धक पदार्थ-दूध, उड़द, भिलावा का फल मींगी और आँवला ये सब ओषधियाँ शुक्र को उत्पन्न करनेवाली तथा विरेचन करनेवाली हैं ।।१९२।। ननु बालानां कथं शुक्रं न दृश्यत इत्याह- बालानां शुक्रमस्त्येव किन्तु सौक्ष्म्यान्न दृश्यते। पुष्पाणां मुकुले गन्धो यथा सन्नपि नाप्यते ।।१९३।। तेषां तदेव तारुण्ये पुष्टत्वाद्यक्तिमेति हि। कुसुमानां प्रफुल्लानां गन्धः प्रादुर्भवेद्यथा ।।१९४।। बालकों के अदृश्य शुक्र में कारण-बालकों के भी शुक्र होता है किन्तु सूक्ष्म होने से नहीं दिखाई पड़ता जैसे कि पुष्पों की कच्ची कलियों में गन्ध होते हुए भी उसका घ्राणेन्द्रिय से कुछ भी प्रत्यक्ष नहीं होता है। बालकों की तरुण अवस्था होने पर वही शुक्र पुष्ट हो जाने से दिखाई पड़ने लगता है, जैसे कि कलियों के खिलने पर पुष्पों की गन्ध मालूम पड़ने लगती है ।।१९३-१९४।। रोमराज्यादयः पुंसां नारीणामपि यौवने। जायतेऽत्र च यो भेदो ज्ञेयो व्याख्यानतः स च ।।१९५।। युवा अवस्था में पुरुषों के जैसे स्त्रियों के भी रोमावली आदि उत्पन्न होती हैं; किन्तु स्त्री और पुरुषों के रोमराजी आदि में भेद है, उसे निम्नलिखित व्याख्यान से जानना चाहिये ।।१९५।। ❖ व्याख्यानं यथा-पुंसां रोमराजीश्मश्रुप्रभृतयः। नारीणान्तु रोमराजीस्तनस्तन्यार्त्तवप्रभृतयः ।। १. अतः परं क्वचित् 'उत्तरत्रे'त्यधिकः पाठोऽपि दृश्यते। २. 'भल्लातः'इति पाठान्तरमसमीचीनम्।

६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे व्याख्यान यह है कि पुरुषों के रोमराजी-दाढ़ी, मूँछ आदि-हैं और स्त्रियों के रोमराजी-स्तन, दुग्ध, आर्तव (रज) आदि-हैं ॥१९५॥ ननु अन्नरसो वृद्धस्य धातुवृद्धिं कथं न करोतीत्याह- वार्द्धके वर्द्धमानेन वायुना रसशोषणात् । न तथा धातुवृद्धिः स्यात्ततस्तत्रानिलं जयेत् ।।१९६।। वृद्धावस्था में शुक्रवृद्धि का ह्रास—वृद्धा अवस्था में वृद्धि को प्राप्त हुये वायु के द्वारा रस के सूख जाने से युवावस्था की भाँति धातु की वृद्धि नहीं होती इसलिये उस अवस्था में वायु को जीतना चाहिये अर्थात्—जिस प्रकार के आहार-विहार करने से वायु वृद्धि को न प्राप्त होकर शान्त रहे वही करें ।।१९६।। शुक्लं सौम्यं सितं स्निग्धं बलपुष्टिकंर स्मृतम् । गर्भबीजं वपुःसारो जीवस्याश्रय उत्तमः ।।१९७।। शुक्र के स्वरूप—शुक्र सौम्य (सोमात्मक), श्वेतवर्ण, स्निग्ध, बल और पुष्टि करनेवाला, गर्भ का बीज, शरीर का सार पदार्थ और जीवात्मा का उत्तम आश्रय है ।।१९७।। जीवस्याश्रय उत्तम इत्यत१ आह- जीवो वसति सर्वस्मिन्देहे तत्र विशेषतः । वीर्ये रक्ते मले यस्मिन् क्षीणे याति क्षयं क्षणात् ।।१९८।। जीव का आश्रय—यद्यपि जीव सम्पूर्ण शरीर में रहता है तथापि सम्पूर्ण शरीर की अपेक्षा विशेष रूप से वीर्य रक्त तथा मल में ही रहता है । क्योंकि इनमें से चाहे जिस किसी के नाश हो जाने पर तत्काल ही जीव का भी नाश हो जाता है ।।१९८।। अथ गर्भसञ्जननशुक्रस्य लक्षणमाह- स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च । शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभञ्च तत् ।।१९९।। गर्भ उत्पन्न करने वाले शुक्र के लक्षण—गर्भ को उत्पन्न करनेवाला शुक्र-स्फटिक मणि के तुल्य निर्मल, द्रव, स्निग्ध, मधुर और शहद के समान गन्धवाला होता है, कोई-कोई गर्भोत्पादक शुक्र को तैल तथा शहद के सदृश वर्ण का मानते हैं ।।१९९।। अथ शुक्रस्य स्थानमाह- यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्चेक्षौ२ रसो यथा । एवं हि सकले काये शुक्लं तिष्ठति देहिनाम् ।।२००।। शुक्र के स्थान—जिस प्रकार से दूध में घी, इक्षु (ऊख) में रस छिपा रहता है उसी भाँति प्राणियों के सम्पूर्ण शरीर के अन्दर शुक्र भी छिपा रहता है ।।२००।। ❖ अत्र सर्पिर्दृष्टान्तो बहुशुक्रेऽल्पमथनेन सर्पिःशुक्रयोर्लाभात् । इक्षुरसदृष्टान्तस्तु स्वल्पशुक्रे पुंसि अतिपीडनेनेक्षुरसशुक्रयोर्लाभात् ।।२००।। यहाँ पर घृत का दृष्टान्त जिसके शरीर में अधिक शुक्र है उसके विषय में समझना चाहिये, क्योंकि जैसे थोड़ा मथने से ही दुग्ध से घृत निकल आता है वैसे ही थोड़े मैथुन करने से अधिक शुक्रवाले पुरुष का भी शुक्र शरीर से बाहर निकल जाता है और जो इक्षु-रस का दृष्टान्त है उसे अल्प शुक्रवाले पुरुष के विषय में समझना चाहिये, क्योंकि जिस प्रकार ईख को अत्यन्त पेरने से उससे रस निकलता है; उसी प्रकार अधिक मैथुन करने से अल्प शुक्रवाले पुरुष का शुक्र निकलता है ।।२००।। १. 'इत्याहे'ति पाठान्तरम् । २. 'चेक्षो'रिति पाठान्तरम् ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६३ अथ शुक्रस्य क्षरणमार्गमाह- द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः । मूत्रस्रोतःपथाच्छुक्रं¹ पुरुषस्य प्रवर्त्तते ।।२०१।। शुक्र के निकलने के मार्ग—बस्ति द्वार के नीचे भाग में दो अङ्गुल दक्षिण पार्श्व की तरफ मूत्रवाही शिरा के मार्ग से पुरुष का शुक्र प्रवृत्त होता है अर्थात् निकलता है ।।२०१।। ❖ वृद्धवाग्भटोऽप्याह-‘सप्तमी शुक्रधरा द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधो मूत्रमार्गमाश्रिता सकलशरीरव्यापिनी शुक्रं प्रवर्त्तयती'ति सप्तमी कला ।।२०१।। इसी विषय में 'वृद्ध वाग्भट' भी कहते हैं कि—बस्तिद्वार के नीचे के भाग में दो अङ्गुल दक्षिण पार्श्व की ओर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहनेवाली, शुक्रधरा (शुक्र को धारण करनेवाली) जो सातवीं कला मूत्र के मार्ग का आश्रय लेकर स्थित है, वही शुक्र को प्रवृत्त कराती है अर्थात् उसी से शुक्र का क्षरण होता है ।।२०१।। अथ शुक्रक्षरणकारणमाह- कृत्स्नदेहस्थितं शुक्रं प्रसन्नमनसस्तथा । स्त्रीषु व्यायच्छतश्चापि हर्षात्तत् सम्प्रवर्त्तते ।।२०२।। शुक्र के क्षरण होने में कारण—प्रसन्न मन होकर स्त्री के साथ मैथुन रूप व्यायाम करते हुए पुरुष के हर्ष के वश होने से; सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त शुक्र का क्षरण होता है; अर्थात् मैथुन के समय चित्त की प्रसन्नता तथा हर्ष होना यही शुक्रक्षरण के कारण हैं ।।२०२।। ❖ स्त्रीषु व्यायच्छतः=स्त्रीसुरतरूपं व्यायामं कुर्वतः ।।२०२।। 'स्त्रीषु व्यायच्छतः' इसका स्त्रीके साथ मैथुनरूप व्यायाम को करते हुए पुरुष के यह अर्थ हैं ।।२०२।। अन्यञ्च- शुक्रं कामेन कामिन्या दर्शनात् स्पर्शनादपि । शब्दसंश्रवणाद् ध्यानात् संयोगाश्च प्रवर्त्तते ।।२०३।। कामभाव से स्त्रियों के देखने, स्पर्श करने, शब्द सुनने, ध्यान करने तथा संयोग से शुक्र प्रवृत्त (स्खलित) होतां है ।।२०३।। अथार्त्तवस्य स्वरूपमाह- स्त्रीणां रस एव मासेनार्त्तवं भवतीत्युक्त्वा पुनराह सुश्रुत² एव- रसादेव रजः स्त्रीणां मासि मासि त्र्यहं स्रवेत् । तद्वर्षाद् द्वादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतः क्षयम् ।।२०४।। मासेनोपचितं काले धमनीभ्यस्तदार्त्तवम् । ईषद्विवर्णं कृष्णाञ्च वायुर्योनिमुखं³ नयेत् ।।२०५।। आर्तव के स्वरूप—रस से ही स्त्रियों के रज उत्पन्न होकर प्रतिमास में तीन दिन तक निकलता रहता है और वह रज बारह वर्ष की अवस्था के बाद निकलता है और पचास वर्ष की अवस्था के बाद बन्द हो जाता है तथा प्रतिदिन एक मास तक थोड़ा-थोड़ा करके सञ्चित होता रहता है बाद एक मास के स्राव का समय होने पर वायु उसे धमनियों के द्वारा योनि के मुख की तरफ ले आता है और उस समय वह देखने में कुछ विवर्ण तथा काले रङ्ग का मालूम पड़ता है ।।२०४-२०५।। गर्भग्रहणयोग्यस्यार्त्तवस्य लक्षणमाह- शशासृक्प्रतिमं यच्च यद्वा लाक्षारसोपमम् । तदार्त्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ।।२०६।। १. 'पथे' इति पाठान्तरम् । २. 'शुक्रत' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ३. 'योनेरि'ति पाठान्तरम् ।

६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे गर्भ ग्रहण के योग्य आर्त्तव—जिस आर्तव का वर्ण खरगोश के रक्त के सदृश अथवा लाख के रस के सदृश हो तथा लगने पर जिससे कपड़े में दाग न पड़ सके ऐसे आर्तव की पण्डित लोग प्रशंसा करते हैं अर्थात् गर्भ ग्रहण के योग्य बतलाते हैं ॥२०६॥ ❖ आर्त्तवस्य वर्णद्वयाभिधानम् । वातादिप्रकृतिभेदेन वर्णभेदात् । 'यद्वासो विरञ्जयेत्' । यद्वासोलग्नं प्रक्षालितं तद्द्वासस्त्यजति न तु विकृतरक्तं कुर्यात् । ऋतुः=स्त्रीणां रजोदर्शनात् षोडशनिशाः, तत्र भव- मार्त्तवम्, गृहीतगर्भाणां स्त्रीणामात्तर्ववहानां स्रोतसां गर्भेणावरोधादार्त्तवं न स्रवति । किन्तु तदेवाधःप्रतिहतमूर्ध्वमागतमुपचीयमानमपरा भवति । अपरा तु श्रीवर१ इति लोके । शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोधरौ याति, तस्माद्गर्भिण्यः पीवरपयोधरा भवन्ति ।। २०६ ।। आर्तव का वर्ण जो दो प्रकार का कहा है वह वातादि प्रकृति भेद से वर्ण का भेद होने से, क्योंकि वातादि द्वारा वर्ण होता है । मूल में जो 'यद्वासो न विरञ्जयेत्' यह वाक्य है इसका अर्थ यह है कि जो आर्तव कपड़े में लगने पर धोने के बाद उस कपड़े को छोड़ देता है न कि विकृत रङ्ग का दाग से युक्त कर देता है । स्त्रियों के रजोदर्शन के दिन से लेकर सोलह रात्रि पर्यन्त जो काल है उसे ऋतुकाल कहते हैं, उस ऋतुकाल में जो रज और रक्त निकलता है उसी को 'आर्त्तव' कहते हैं । गर्भवती स्त्रियों के आर्तव वहन करने वाली नाड़ियों का गर्भ के द्वारा अवरोध (रुकावट) होने से आर्तव बाहर नहीं निकलता किन्तु वही आर्तव नीचे से (गर्भ के द्वारा) रोके जाने पर ऊपर आकर इकट्ठा होता हुआ कुछ अंशों से अपरा अर्थात् जेर बन जाता है । इसी को लोक में 'श्रीवर' भी कहते हैं । और बाकी कुछ अंशों से जेर बनने के बाद वहाँ से ऊपर आकर दोनों स्तनों में जाता है, इसी से गर्भिणी स्त्रियाँ मोटे स्तनों वाली हो जाती हैं ॥२०६॥ अथ धातुवतिरिक्तान् गुणानाह- अतिरिक्ता गुणा रक्ते वह्नेर्मांसे तु पार्थिवाः । मेदस्र्यापां २भुवश्चास्थ्नि पृथिव्यनिलतेजसाम् ।। २०७।। मज्ज्ञि शुक्रे च सोमस्य मूत्रे च शिखिनो गुणाः । भुवस्तथाऽऽर्त्तवे त्वग्ने रसे क्षीरे तथाऽम्भसः ।।२०८।। धातुगुण-वर्णन-रक्त में अग्नि के, मांस में पृथ्वी के, मेद में पृथ्वी और जल के, अस्थि में पृथ्वी, वायु और अग्नि के, मज्जा और शुक्र में चन्द्र के, मूत्र में अग्नि के, आर्तव में पृथ्वी तथा अग्नि के और रस तथा दूध में जल के गुण अधिक हैं ।।२०७-२०८।। कफः पित्तं मलः खेषु प्रस्वेदो नखलोम च । नेत्रविट्त्वक्षु३ च स्नेहो धातूनां क्रमश्रो मलाः ।।२०९।। धातुओं के मल-कफ, पित्त, ख अर्थात् कर्णादिक स्रोतों के मल, पसीना, नख, लोम तथा नेत्र का मल तथा त्वचाओं के ऊपर के स्नेह, ये सब क्रम से रसादिक छः धातुओं के मल हैं ।।२०९।। ❖ 'नेत्रजिह्वाकपोलानां जलञ्च रसजं मलम्' इत्येके। खेषु मलः =कर्णादिस्रोतःसु मलः, 'रसनादन्तकक्षामेढ्रादिमलपि मेदोमलम्' इत्येके । नेत्रविट्त्वचां स्नेहश्च मज्जमलः, शुक्रस्य मलमेव नास्ति सहस्रधा ध्मातसुवर्णस्येव ।। २०९।। यहाँ कोई 'नेत्र, जिह्वा और कपोल के जल को रस का मल' बतलाते हैं । और 'खेषु मलः' इसका अर्थ 'कर्णादिक स्रोतों में स्थित मल' तथा कोई 'जिह्वा, दाँत, कक्षा (बगल) तथा लिङ्ग आदि के मल को भी मेद का मल' मानते हैं एवं नेत्रों के मल तथा त्वचाओं के ऊपर के स्नेह को मज्जा का मल तथा हजार बार तपाये हुये सुवर्ण में जैसे मल नहीं होता वैसे ही शुक्र में भी मल नहीं होता, ऐसा समझना चाहिये ।।२०९।। १. 'आवरणा जरायु'रिति पाठान्तरम् । २. 'रसे' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ३. 'च त्वचः' इति पाठान्तरम् ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६५ अथोपधातूनाह- वनितानां प्रसूतानां धमनीभ्यां स्तनौ गतात् । रसादेव हि जायेत स्तन्यं स्तनयुगाशयम् ।।२१०।। शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्त्तिता । मेदस्तस्ताप्यमानस्य१ स्नेहो वा कथिता वसा ।।२११।। उपधातु का लक्षण—प्रसूता स्त्रियों के दोनों स्तनों में दो धमनियों के द्वारा प्राप्त हुये रस से ही दूध होता है और उसके आशय दोनों स्तन हैं अर्थात् वह दूध दोनों स्तनों में रहता है । और शुद्ध मांस का जो स्नेह होता है वह 'वसा' कहलाती है । अथवा तपाये जाते हुये मेद का जो स्नेह होता है वह 'वसा' कहलाती है ।।२१०-२११।। शार्ङ्गधरे तु- स्तन्यं रजो वसा स्वेदो दन्ताः केशास्तथैव च । ओजश्च सप्तधातूनां क्रमात् सप्तोपधातवः ।।२१२।। 'शार्ङ्गधर' में दूध, रज, वसा, पसीना, दाँत, केश और ओज, ये रसादिक सात धातुओं के क्रम से सात उपधातु हैं ।।२१२।। उरोरक्ताशयस्तस्मादधः श्लेष्माशयः स्मृतः । आमाशयस्तु तदधस्तल्लिङ्गं चरकोऽवदत् ।।२१३।। आशय के लक्षण—वक्षःस्थल ही रक्ताशय है, उसके नीचे श्लेष्माशय (कफाशय) और उसके नीचे आमाशय है, ऐसा चरकने कहा है ।।२१३।। तद्यथा—❖ 'नाभिस्तनान्तरं जन्तोराहुरामाशयं बुधाः' इति ।।२१३।। 'नाभि और स्तन के बीच के भाग को पण्डितों ने आमाशय बतलाया है' ।।२१३।। आमाशयादधः पक्वाशायादूर्ध्वन्तु या कला । ग्रहणी नामिका सैव कथितः पाचकाशयः ।।२१४।। ऊर्ध्वमग्न्याशयो नाभेर्मध्यभागे व्यवस्थितः । तस्योपरि तिलं ज्ञेयं तदधः पवनाशयः ।।२१५।। पक्वाशयस्तु तदधः स एव तु मलाशयः । तदधः कथितो बस्तिः स हि मूत्राशयो मतः ।।२१६।। आमाशय के नीचे तथा पक्वाशय के ऊपर जो 'कला' है उसी का नाम 'ग्रहणी' है और वह 'पाचकाशय' कहलाता है । नाभि के मध्य में ऊपर की ओर 'अग्न्याशय' है और उसके ऊपर तिल (पाचकाग्नि) और नीचे 'पवनाशय' है । पुनः उसके नीचे पक्वाशय जो 'मलाशय' नाम से भी प्रसिद्ध है और उसके नीचे 'बस्ति' है जो 'मूत्राशय' कहलाता है ।।२१४-२१६।। आशयानुक्रमस्तु वाग्भटेनोक्तः स यथा- कफाऽऽमपित्तवातामाशया मलमूत्रयोः । पुरुषेभ्योऽधिकाश्चान्ये नारीणामाशयास्त्रयः ।।२१७।। धरा गर्भाशयः प्रोक्तः पित्तपक्वाशयान्तरे । स्तनौ प्रवृद्धौ तावेव बुधैःस्तन्याशयौ मतौ ।।२१८।। वाग्भटोक्त आशयों का क्रम—कफाशय, आमाशय, पित्ताशय, पवनाशय, मलाशय और मूत्राशय ये पुरुषों के क्रम से आशय हैं । स्त्रियों के इससे भिन्न अन्य तीन आशय अधिक होते हैं, जैसे-पित्ताशय और पक्वाशय के मध्य में 'धरा' है जिसे पण्डितों ने गर्भाशय और स्तनों के वृद्ध होने पर उन्हीं को 'स्तन्याशय' कहा है ।।२१७-२१८।। अथ कलास्वरूपमाह- स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्तांश्च जरायुणा । श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कलाभागांस्तु तान्विदुः ।।२१९।। धात्वाशयान्तरे धातोर्यः क्लेदस्त्वधितिष्ठति । देहोष्मणाऽभिपक्वश्च सा कलेत्यभिधीयते ।।२२०।। १. 'स्रवमाणस्ये'ति पाठान्तरम् । ८ भाव.I

६६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कलाओं के स्वरूप—स्नायुओं से ढके हुये, जरायुओं से व्याप्त तथा कफ से वेष्टित धात्वाशयों के जो भाग हैं उन्हीं को कलाभाग समझना चाहिये। धात्वाशयों के मध्य में धातुओं का जो क्लेद (गीला) भाग है वह देह की ऊष्मा गर्मी से जब अत्यन्त परिपक्व हो जाता है तब उसे ही पण्डित लोग 'कला' कहते हैं ॥२१९-२२०॥ ताः सप्त- आद्या मांसधरा प्रोक्ता द्वितीया रक्तधारिणी । मेदोधरा तृतीया तु चतुर्थी श्लेष्मधारिणी ॥२२१॥ पञ्चमी तु मलं धत्ते षष्ठी पित्तधरा मता । रेतोधरा सप्तमी स्यादिति सप्त कलाः स्मृताः ॥२२२॥ वे कलायें संख्या में सात हैं, जैसे—(१) मांसधरा, (२) रक्तधारिणी (रक्तधरा), (३) मेदोधरा, (४) श्लेष्मधारिणी (श्लेमधरा), (५) मल को धारण करनेवाली मलधरा, (६) पित्तधरा और (७) शुक्रधरा ॥२२१-२२२॥ अथ मर्माण्याह- सन्निपातः शिरास्नायुसन्धिमांसास्थिसम्भवः । मर्माणि तेषु तिष्ठन्ति प्राणाः खलु विशेषतः ॥२२३॥ मर्मस्थल के लक्षण—शिरा, स्नायु, सन्धि, मांस और अस्थि इन सबों में से जो जहाँ जहाँ परस्पर संयुक्त होते हैं वे ही मर्मस्थल कहलाते हैं, अर्थात् एक शिरा के साथ दूसरी शिराके, एक स्नायु के, एक सन्धि के साथ दूसरे सन्धि के, एक मांस के साथ दूसरे मांस के और एक अस्थि के साथ दूसरे अस्थि के संयोगस्थल को मर्मस्थल कहते हैं। इन्हीं मर्मस्थलों में विशेष करके प्राण रहते हैं ॥२२३॥ तेषां सङ्ख्याः स्थानं चाह- सप्तोत्तरशतं सन्ति देहे मर्माणि देहिनाम् । तान्येकादश मांसे स्युरष्टावस्थिषु सन्ति हि ॥२२४॥ सन्धीनां विंशतिस्तानि स्नायूनां सप्तविंशतिः । चत्वारिंशत्तथैकञ्च शिरामर्माणि तत्र तु ॥२२५॥ द्वाविंशतिः सक्थियुगे तावत्येव १भुजद्वये । द्वादशोरसि कुक्षौ च पृष्ठदेशे चतुर्दश ॥२२६॥ ग्रीवायामूर्ध्वभागे तु सप्तत्रिंशन्मतानि हि । मर्माणि तानि सन्तीह पञ्चधा च भवन्ति हि ॥२२७॥ मर्मों की संख्या तथा स्थान—मनुष्यों के शरीर में १०७ मर्मस्थल हैं। तथा—मांस में ११, अस्थि में आठ, सन्धियों में बीस, स्नायुओं में २७, शिराओं में ४१, दोनों पैरों में २२, दोनों बाहुओं में २२, वक्षः स्थल में नव, कुक्षि में तीन, पीठ में १४ और ग्रीवा तथा ऊर्ध्वभाग में ३७ मर्म हैं तथा वे मर्म पाँच प्रकार के होते हैं ॥२२४-२२७॥ तान्याह- सद्यःप्राणहराणि स्युर्मर्माण्येकोनविंशतिः । मर्मदेशास्त्रयस्त्रिंशत् स्युः कालान्तरमारकाः ॥२२८॥ चत्वारिंशच्च चत्वारि वैकल्यं जनयन्ति हि । मर्माष्टकं रुजाकारि विशल्यघ्नं त्रिकं मतम् ॥२२९॥ मर्मों के कार्य—१०७ मर्मों में से १९ मर्मस्थल तत्काल प्राण के हरण करनेवाले, ३३ कालान्तर में मारनेवाले, ४४ विकलता करनेवाले, आठ पीड़ा करनेवाले तथा तीन विशल्यघ्न मर्मस्थल हैं (जिस मर्मस्थल से बाण आदि निकाल लेने पर मृत्यु हो जाती है किन्तु मर्मस्थल में शल्य जितने क्षण रहता है उतने क्षण मृत्यु नहीं होती, उसे 'विशल्यघ्न' मर्मस्थल कहते हैं) इस प्रकार सद्यःप्राणहर एक, कालान्तरमारक दो, वैकल्यकर तीन, रुजाकर चार और विशल्यघ्न पाँच, ये पाँच प्रकार के मर्मस्थल हुये ॥२२८-२२९॥ तत्र सद्योमारकाणि मर्माण्याह- शृङ्गाटकान्यधिपतिः शङ्खौ कण्ठशिरा गुदम् । हृदयं बस्तिनाभी च सद्यो घ्नन्ति हतानि चेत् ॥२३०॥


१. 'तावन्त्येव'ति पाठान्तरं चिन्त्यम्।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६७ उनमें से सद्यःप्राण हरण करनेवाले मर्मस्थल—शृङ्गाटक के .चार, अधिपति के एक, शङ्ख के दो, कण्ठ की शिरा के आठ, गुदा के एक, हृदय के एक, बस्ति के एक, और नाभि के एक, इन सब मर्मस्थलों में चोट लगने से शीघ्र प्राण नाश हो जाता है ॥२३०॥ ❖ शृङ्गाटकानि-घ्राणश्रोत्राक्षिजिह्वासन्तर्पकाणां शिरामुखानां शिरसो मध्ये संयोगस्थानम् तानि चत्वारि शिरामर्माणि चतुरङ्गुलप्रमाणानि हतानि घ्नन्ति=सद्योमारकाणि भवन्ति । शृङ्गाटक मर्म—मस्तक के मध्य में जिन चार स्थानों में नाक, कर्ण, नेत्र और जिह्वा का सन्तर्पण करनेवाली शिराओं का मुख एकत्र मिलता है, उन्हीं चारों स्थानों को शृङ्गाटक मर्म कहते हैं । ये शिरासम्बन्धी मर्म चार अङ्गुल प्रमाण के चार हैं । चोट लगने पर ये सद्यः प्राणों के हरण करनेवाले होते हैं । ❖ अधिपतिः-मस्तकस्याभ्यन्तरे १शिरासन्धिसन्निपात उपरिष्टाद्रोमावर्त्तः, स-एकः, सन्धिमर्मेद- मर्द्धाङ्गुलप्रमाणं सद्योमारकम् । अधिपति मर्म—मस्तक के भीतर शिरा सम्बन्धी सन्धियों का जो संयोग स्थान है उसके ऊपर बाहर रोमावर्त्त (भौरी) है, उसी को अधिपति मर्म कहते हैं । यह सन्धिसम्बन्धी मर्म एक है, इसका प्रमाण आधा अङ्गुल है, चोट लगने पर यह सद्यः प्राण का हरण करनेवाला होता है । ❖ शङ्खः-भ्रुवोरन्तोपरि कर्णललाटयोर्मध्ये२ तौ द्वौ, अस्थिमर्मणी सार्द्धाङ्गुले सद्योमारके । दोनों भौहों प्रान्तभाग के ऊपर कर्ण और लला

६८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बस्तिमर्म—नाभि, पीठ, कटि, गुदा, वंक्षण (ऊरुसन्धि) और लिङ्ग इन सब के मध्य में बस्ति है । बस्ति का चमड़ा पतला होता है तथा इसका एक द्वार होता है और मुख नीचे की ओर रहता है ॥४१॥ ❖ स्नायुमर्मेदंश्चतुरङ्गुलं सद्योमारकम् । स्नायुसम्बन्धी मर्म चार अङ्गुल प्रमाण का होता है, चोट लगने पर यह सद्यः प्राणनाशक है । ❖ नाभिमर्म-नाभिः प्रसिद्धा, शिरामर्मेदंश्चतुरङ्गुलं सद्योमारकम् ।।२३०।। नाभिमर्म—यह नाभि नाम से प्रसिद्ध है । शिरासम्बन्धी यह मर्म चार अङ्गुल प्रमाण में होता है, चोट लगने पर यह सद्यः प्राणनाशक है ॥२३०॥ कालान्तरहराणि मर्माण्याह- वक्षोमर्माणि सीमन्ततलक्षिप्रेन्द्रबस्तयः । बृहत्यौ पार्श्वयोः सन्धी कटीकतरुणे च ये । नितम्बाविति चैतानि कालान्तरहराणि तु ।।२३१।। कालान्तर (देर) में प्राणहरण करने वाले मर्म—वक्षो मर्म आठ, सीमन्त पाँच, तल चार, क्षिप्र, इन्द्रबस्ति चार, बृहती दो, पसलियों की सन्धि दो, कटीकतरुण दो, नितम्ब दो, इन सब मर्मस्थलों में चोट लगने पर कालान्तर में प्राणनाश होता है ॥२३१॥ ❖ वक्षोमर्माणि- (स्तनमूलं१ स्तनरोहितापलापापस्तम्बाः । तत्र स्तनमूले-) स्तनयोरधस्ताद् द्व्यङ्गुलं यावत् स्तनमूले नाम द्वे शिरामर्मणी, तत्र कफपूर्णकोष्ठतया कालान्तरमारके । वक्षोमर्म—स्तनमूल दो, स्तनरोहित दो, अपलाप दो, और अपस्तम्भ नामक दो मर्म, इस प्रकार ये आठ वक्षोमर्म हैं, उनमें से दोनों स्तनों के नीचे दो दो अङ्गुल परिमित स्थान में स्तनमूल नामक दो मर्म हैं, वे शिरा सम्बन्धी मर्म हैं, वहाँ चोट लगने पर कफ से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से वे कालान्तर में प्राणनाशक होता है । ❖ स्तनरोहिते-स्तनयोरुपरि द्व्यङ्गुलं यावत् । द्वे मांसमर्मणी रक्तपूरितकोष्ठतया कालान्तरमारके२ । स्तनरोहित मर्म—दोनों स्तनों के ऊपर दो दो अङ्गुल परिमित स्थान में स्तनरोहित नामक ये मांस सम्बन्धी २ मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर रक्त से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से कालान्तर में प्राण के हरण करनेवाले होते हैं। ❖ अपलापौ-अंसकूटयोरधस्तात् पार्श्वयोरुपरि द्वे३ शिरामर्मणी । अर्द्धाङ्गुले रक्तेन पूयताङ्गतेन कालान्तरमारके । अपलाप मर्म—दोनों ओर के अंसकूटों (कन्धे के ऊपर की उभरी हुई हड्डी) के नीचे एवं दोनों ओर पंसुलियों के ऊपर आधा अंगुल परिमित अपलाप नामक दो शिरासम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर वहाँ के रक्त पूय (पीब) हो जाने से ये कालान्तर में मारक होते हैं । ❖ अपस्तम्भौ-उरस उभयतो' नाड्यौ वातवहे शिरामर्मणी । अर्द्धाङ्गुले वातपूर्णकोष्ठतया कासश्वासाभ्यां च कालान्तरमारके । अपस्तम्भ मर्म—वक्षःस्थल के दोनों पार्श्व (बगल) में वायु को वहन करनेवाली दोनों नाड़ियों में आधे अंगुल १. अयं कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. 'मारकावि'ति पा. । ३. 'द्वावि'ति पा. ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६९ परिमित अपस्तम्भ नामक दो शिरासम्बन्धी मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर बात से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से कास और श्वास उत्पन्न करके ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं। ❖ सीमन्ताः-शिरसि पञ्च सन्धयः सन्धिमर्माणि चतुरङ्गुलानि, उन्मादभयचित्तविनाशैः कालान्तरमारकाणि२ । सीमन्त मर्म—मस्तक में जो पाँच सन्धियाँ हैं वे ही सीमन्तनामक मर्म है ये सन्धिसम्बन्धी पाँच मर्म चार अङ्गुल परिमित हैं, इनमें चोट लगने पर उन्माद (पागलपन), भय और चित्त का विनाश, इन सब उपद्रवों के द्वारा ये कालान्तर से प्राणनाशक होते हैं। ❖ तलानि-मध्याङ्गुलिमनुक्रम्य हस्तस्य मध्यन्तलमेवमपरस्य हस्तस्य, पादयोश्चैवं३ चत्वारि तलानि मांसमर्माणि द्वयङ्गुलानि रुजाभिः कालान्तरमारकाणि । तलमर्म—दोनों हाथ पैर के बीचवाली अङ्गुली के सीध से लेकर हथेली तथा तलुओं के मध्य में दो अङ्गुल परिमित जो स्थान हैं वे ही तल नामक मर्म हैं, दोनों हथेलियों में दो और दोनों पैर के तलुओं में दो, इस प्रकार सब चार तल मर्म हैं। ये सब मांस सम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर पीड़ा पहुँचने से ये कालान्तर में प्राणनाशक हो जाते हैं। ❖ क्षिप्राणि-अङ्गुष्ठाङ्गुल्योर्मध्यं क्षिप्रम्। तच्च४ हस्तयोर्द्वे पादयोर्द्वे चैवं चत्वारि स्नायुमर्माण्यर्द्धाङ्गुलान्याक्षेपेकण कालान्तरमारकाणि । क्षिप्रमर्म—अङ्गुष्ठ और तर्जनी अङ्गुली के मध्य में क्षिप्रनामक मर्म हैं, वे दोनों हाथों में दो और दोनों पैरों में दो होने से कुल मिल कर चार क्षिप्र मर्म हैं, ये स्नायुसम्बन्धी मर्म हैं, तथा आधे अङ्गुल परिमित हैं, इनमें चोट लगने पर आक्षेपक नामक वायु सम्बन्धी रोग के द्वारा ये कालान्तर में मारक होते हैं। ❖ इन्द्रबस्तयः-प्रकोष्ठयोर्मध्ये द्वौ जङ्घयोर्मध्ये द्वौ । एवं चत्वारि मांसमर्माणि द्वयङ्गुलानि शोणितक्षयेण कालान्तरमारकाणि५ । इन्द्रबस्ति मर्म—दोनों प्रकोष्ठों (कलाई से ऊपर केहुनी के नीचे के भागों) के मध्य में दो और दोनों जङ्घाओं (जानु से नीचे और एड़ी से ऊपर के भागों) के मध्य में दो, सब मिल कर चार और दो अङ्गुल परिमित मांससम्बन्धी इन्द्रबस्ति मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर रक्त का क्षय होने से कालान्तर में ये प्राणनाशक होते हैं। ❖ बृहत्यौ-स्तनमूलादुभयतः पृष्ठवंशं यावत् । शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुले६ शोणितातिप्रवृत्तिनिमित्तरुपद्रवैः कालान्तरमारके७ । बृहती मर्म—दोनों स्तनों के मूल भाग से लेकर पृष्ठवंश (पीठ की डण्डे के समान हड्डी) तक जो स्थान हैं, उनमें आधे अङ्गुल परिमित बृहती नामक शिरासम्बन्धी दो मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर अत्यन्त रक्त निकलने से जो उपद्रव होते हैं उनके द्वारा ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं। ❖ पार्श्वसन्धी-जघनपार्श्वयोः सन्धी८ शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुले९ शोणितपूर्णकोष्ठतया कालान्तरमारके१० । पार्श्वसन्धि मर्म—जघन और दोनों पार्श्वभाग (काँख के नीचे का हिस्सा कमरतक) की जो दो सन्धियाँ हैं उन्हीं १. 'उभयोरि'ति पा.। २. 'मारका' इति पा.। ३. 'चैवमि'ति पा.। ४. 'तानि चे'ति पा.। ५. 'मारका' इति पा.। ६. 'अर्द्धाङ्गुलावृत्ते' इति पा.। ७. 'मारकाणी'ति पा.। ८. 'सन्धी प्रती'ति पा.। ९. 'अर्द्धाङ्गुला'विति पा.। १०. 'मारका' विति पा.।

७० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे को पार्श्व सन्धिनामक मर्म कहते हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म हैं। इनमें चोट लगने पर रक्त से पूर्ण कोष्ठ हो जाने से कालान्तर में ये प्राणनाशक होते हैं। ❖ कटीकतरुणे—त्रिकसन्निधाने उभयतः श्रोणिकाण्डं १लक्ष्यीकृत्यास्थिस्थिते अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले शोणितक्षयात्पाण्डुविवर्णरूपं कृत्वा कालान्तरमारके। कटीकतरुण मर्म—त्रिक (पृष्ठवंश के नीचे की तीन हड्डी) के पास दोनों ओर दोनों श्रोणिकाण्डों को लक्ष्य करके जो दो हड्डियाँ हैं, उन्हीं में आधे अङ्गुल परिमित दो कटीकतरुण नामक अस्थिसम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर रक्त का क्षय होने से पाण्डु तथा विवर्ण रूप करके ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं। ❖ नितम्बौ—प्रसिद्धौ। द्वे२ अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुलावधः कायशोषेण दौर्बल्येन च कालान्तर- मारके३ ॥२३१॥ नितम्बमर्म—नितम्ब नाम से प्रसिद्ध जो स्थान है, उसके दोनों भागों में आधे अङ्गुल परिमित दो अस्थिसम्बन्धी मर्म हैं, इनमें चोट लगने पर शरीर के नीचे भाग में शोष होने से तथा दुर्बलता होने से ये कालान्तर में प्राणनाशक होते हैं ॥२३१॥ वैकल्यकराणि मर्माण्याह- लोहिताक्षाणिजानूर्वी४ कूर्चा विटपकूर्पराः। कुकुन्दरे कक्षधरे विधुरे सकृकाटिके ॥२३२॥ अंसांसफलकापाङ्गा५ नीले मन्ये फणे तथा। वैकल्यकरणान्याहुरावत्तौ द्वौ तथैव च ॥२३३॥ विकलता करनेवाले मर्मस्थल—लोहिताक्ष चार, आणि चार, जानु दो, ऊर्वी चार, कूर्च चार, विटप दो, कूर्पर दो, कुकुन्दर दो, कक्षधर दो, विधुर दो, कृकाटिका दो, अंस दो, अंसफलक दो, अपाङ्ग दो, नीला दो, मन्या दो, फण दो, और आवर्त्त दो, ये सब मर्मस्थल चोट लगने पर अङ्ग में विकलता उत्पन्न करनेवाले होते हैं ॥२३२-२३३॥ ❖ लोहिताक्षाणि—ऊर्व्या६ ऊर्ध्वमधो वङ्क्षणसन्धेर्लोहिताक्षम्, ते च द्वे बाह्रोर्द्वे ऊर्वोरिवं तानि चत्वारि शिरामर्माण्यर्द्धाङ्गुलानि। वैकल्यकराणि। तत्र शोणितक्षयेण पक्षाघातः सक्थिसादो वा। लोहिताक्ष मर्म—ऊर्वी नामक मर्म के ऊपर और वंक्षण नामक सन्धि के नीचे लोहिताक्ष नामक मर्म रहता है, वे दोनों बाहुओं में दो तथा दोनों ऊरुओं में दो इस प्रकार कुल चार हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म कहलाते हैं, चोट लगने पर ये विकलता करनेवाले होते हैं। इन मर्मस्थलों में चोट लगने पर जब रुधिर का क्षय होता है तब पक्षाघात (वायु सम्बन्धी रोग) अथवा सक्थिसाद होता है। ❖ आणयः-जानुन ऊर्ध्वमुभयोः पार्श्वयोस्त्र्यङ्गुला एकस्मिन् जानुनि द्वे अपरस्मिन् द्वे एवञ्चतस्रः, स्नायुमर्माण्यर्द्धाङ्गुलानि वैकल्यकराणि, तत्र शोथाभिवृद्धिः सक्थिस्तम्भश्च। आणिमर्म—जानुओं के ऊपर दोनों ओर तीन अङ्गुल परिमिति जो स्थान है उसी को आणिमर्म कहते हैं। पैर में एक जानु के ऊपर दो और दूसरे पैर में जानु के ऊपर दो, इस प्रकार मिल कर चार आणिमर्म हैं। आधे अङ्गुल परिमित ये स्नायु सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इन मर्मों में चोट लगने पर शोथ की अधिकता तथा सक्थिस्तम्भ रोग होता है। १. 'लक्ष्मी'ति पा.। २. 'द्वावि'ति पा.। ३. 'मारकावि'ति पा.। ४. 'जानूर्वोरि'ति पा.। ५. 'अंसांसफलकापाङ्गावि'ति पाठान्तरं प्रामादिकम्। ६. 'ऊर्वोरि'ति पा.।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ७१ ❖ जानुनी-जङ्घोर्वोः१ सन्धी सन्धिमर्मणी द्वयङ्गुले वैकल्यकरे तत्र खञ्जता । जानुमर्म—जङ्घा और ऊरु की जो दो सन्धियाँ हैं वे ही जानु नामक मर्म कहलाती हैं, ये दो अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर खंजता (लङ्गड़ापन) रोग हो जाता है । २ऊर्व्यः—द्वे ऊर्वोर्मध्ये द्वे प्रगण्डयोर्मध्ये एवं चतस्रः, शिरामर्माणि एकाङ्गुल्यो वैकल्यकारिण्यस्तत्र३ शोणितक्षयात्सक्थिबाह्वोः४ शोषः । ऊर्वी मर्म—दोनों ऊरुओं के मध्य में दो और दोनों बाजुओं के मध्य में दो इस प्रकार मिल कर चार ऊर्वी मर्म हैं, ये एक अङ्गुल परिमित शिरा सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर रक्तक्षय होने से सक्थि शोष (पैर का सूखना) और बाहुशोष (बाहु का सूखना) रोग हो जाता है । कूर्चाः—पादयोरङ्गुष्ठाङ्गुल्योर्मध्ये तयोरूर्ध्वमधश्च, ५एवं चत्वारि स्नायुमर्माणि वैकल्यकराणि, तत्र पादयोर्भ्रमणवेपने भवतः । कूर्च मर्म—दोनों पैरों के अँगूठे और अङ्गुलियों के मध्य में ऊपर और नीचे दो दो करके कूर्चनामक चार स्नायु सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर पैर का भ्रमण (घूमजाना) तथा कम्पन (काँपना) होता है । ❖ विटपे—द्वे वङ्क्षणवृषणयोर्मध्ये स्नायुमर्मणी एकाङ्गुले वैकल्यकरे च तत्र षाण्ड्यमल्पशुक्रता वा । विटपमर्म—वङ्क्षण और अण्डकोश के मध्य में विटप नामक दो मर्म हैं, ये दोनों एक अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर नपुंसकता अथवा शुक्र की अल्पता हो जाती है । ❖ कूर्परौ—कफोणिजौ द्वौ सन्धिमर्मणी द्वयङ्गुलौ वैकल्यकरौ तत्र बाहुमध्ये सङ्कोचः । कूर्परमर्म—दोनों कफोणि (वेहुनी) कूर्परनामक मर्म कहलाते हैं, ये दोनों दो अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर बाहु के मध्य में सङ्कोच होता है । ❖ कुकुन्दरे—नितम्बकूपकौ६ द्वे७ सन्धिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र स्पर्शाज्ञानमधः—कायस्य चेष्टोपघातश्च । कुकुन्दर मर्म—दोनों नितम्बों के ऊपर जो दो गड्ढे से हैं, वे ही कुकुन्दर नामक मर्म कहलाते हैं । ये आधे अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं । इनमें चोट लगने पर स्पर्शज्ञान का अभाव (सुन्न हो जाना) तथा शरीर के नीचे भाग की चेष्टाओं का नाश हो जाता है । ❖ कक्षधरे—वक्षःकक्षयोर्मध्ये द्वे स्नायुमर्मणी एकाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र पक्षाघातः । कक्षधर मर्म—वक्षःस्थल तथा कक्ष (काँख) के मध्य में दोनों ओर दो कक्षधर नामक मर्म हैं, ये दोनों एक अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं, इनमें चोट लगने पर पक्षाघात होता है । ❖ विधुरे—कर्णपृष्ठतोऽधःसंश्रिते८ किञ्चिन्निम्नाकारे द्वे स्नायुमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र बाधिर्यम् । विधुरमर्म—दोनों कानों के पीछे नीच के भाग में कुछ दबे हुये जो स्थान हैं उन्हीं स्थानों में विधुर नामक मर्म होता १. 'जङ्घयो'रिति पा. । २. 'ऊर्वोरि'ति पा.। ३. 'वैकल्यकर्य' इति पा. । ४. 'सक्थिशोष' इति पा. । ५. 'हस्तयोरधश्चे'ति पाठान्तरं चिन्त्यम्। ६. 'कूर्पराविति पाठान्तरं चिन्त्यम्। ७. 'द्वावि'ति पा. । ८. 'पृष्ठाध' इति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA

है, ये दोनों आधे अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले होते हैं। इनमें चोट लगने पर बाधिर्य (बहरापन) रोग हो जाता है। ❖ कृकाटिके-शिरोग्रीवयोरुभयतः सन्धी द्वे सन्धिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र शिरःकम्पः । कृकाटिका मर्म—शिर और ग्रीवा के दोनों भाग में जो दो सन्धियाँ हैं, वे ही कृकाटिका नामक मर्म हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित सन्धिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर शिरःकम्प रोग होता है। ❖ अंसौ-स्कन्धौ स्नायुमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र बाहुस्तम्भः । अंसमर्म—दोनों अंस (कन्धे) ही अंस नामक मर्म कहलाते हैं, ये आधे अङ्गुल परिमित स्नायुसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर बाहुस्तम्भ (बाहुओं का जकड़ जाना) रोग होता है। ❖ अंसफलके-पृष्ठोपरि पृष्ठवंशमुभयतस्त्रिकसम्बद्धे, (ग्रीवायमंसद्वयस्य च संयोगो यत्र तन्त्रिकम् ।) अस्थिमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र बाह्वोः शून्यता शोषश्च । अंसफलक मर्म—पीठ के ऊपर पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) के दोनों ओर त्रिक से सम्बन्ध रखे हुये जो दो मर्म हैं वे ही अंसफलक नामक मर्म कहलाते हैं, (यहाँ पर 'त्रिक' पद से 'ग्रीवा में दोनों कन्धों का जहाँ पर संयोग होता है' उस स्थान को समझना चाहिये) ये आधे अङ्गुल परिमित अस्थिसम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर बाहुओं की शून्यता (सुन्न हो जाना) तथा शोष (सूख जाना) रोग होता है। ❖ अपाङ्गौ=नेत्रयोरन्तौ शिरामर्मणी अर्द्धाङ्गुलौ वैकल्यकरौ, तत्रान्ध्यं दृष्ट्युपघातो वा । अपाङ्गमर्म—दोनों नेत्रों के जो दोनों प्रान्त भाग हैं वे ही अपाङ्ग मर्म कहलाते हैं। दोनों आधे अङ्गुल परिमित शिरासम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं, इनमें चोट लगने पर आन्ध्य (अन्धा हो जाना) अथवा दर्शन शक्ति का ह्रास हो जाता है। नीले मन्ये च-कण्ठनाडीमुभयतश्चतस्रो धमन्यः, द्वे नीले द्वे मन्ये । तत्र एका मन्या एका लीना एकस्मिन् पार्श्वे, एव¹ अन्या मन्या नीला च अपरस्मिन् पार्श्वे द्वे द्वे शिरा मर्मणी द्व्यङ्गुले द्व्यङ्गुले वैकल्यकरे, तत्र मूकता ²विकृतस्वरताऽरसग्राहिता च । नीला और मन्या मर्म—कण्ठ-नली के दोनों ओर नीला और मन्या नामक चार धमनियाँ हैं। उनमें से एक पार्श्व में एक नीला, एक मन्या और दूसरे पार्श्व में एक नीला तथा एक मन्या नामक धमनियाँ रहती हैं। इन्हीं मन्या नामक धमनियों में मन्या मर्म और नीला नामक धमनियों में नीला मर्म रहता है। दो दो अङ्गुल परिमित ये दोनों शिरा सम्बन्धी मर्म विकलता करनेवाले हैं। इनमें चोट लगने पर मूकता (गूँगा हो जाना) या विकृतस्वरता (स्वर का विकृत हो जाना) अथवा अरसग्राहिता (किसी रस के भी स्वाद लेने की शक्ति का न रहना) हो जाता है। ❖ फणे-घ्राणमार्गमुभयतः (³स्रोतोमार्गप्रतिबद्धे अभ्यन्तरतः) मांसमर्मणी अर्द्धाङ्गुले वैकल्यकरे तत्र गन्धाज्ञानम् । फणमर्म—नासामार्ग के दोनों ओर (नासिका के भीतर स्रो