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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

१९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे शरीर में तेल लगाकर स्नान करने के गुण—शरीर में तेल लगाकर स्नान करने पर वह तेल रोमकूप, शिराओं का समूह और धमनियों के द्वारा शरीर में सञ्चारित होकर शरीर को तर्पित और बलिष्ठ करता है। जल से जिनके मूल सींचे गये हुये हैं, ऐसे वृक्षों के पल्लवादि जैसे बढ़ते हैं वैसे ही मनुष्यों के रक्तादि सम्पूर्ण धातु भी तेल की मालिश करने से बढ़ते हैं ।।७५-७६।। अथाभ्यङ्गायोग्यजनानाह- नवज्वरी अजीर्णी च नाभ्यक्तव्यः कथञ्चन। तथा विरिक्तो वान्तश्च निरूढो यश्च मानवः ।।६६।। अभ्यङ्ग के अयोग्य जन—जो नवीन ज्वर और अजीर्ण रोग से युक्त हो, जिसने जुलाब लिया हो, जिसे दस्त होते हों अथवा वमन हुआ हो और जिसे निरूह वस्ति दी गई हो ऐसे मनुष्य को कभी तेल की मालिश नहीं करनी चाहिये ।।७७।। ❖ निरूढः=दत्तो निरूहवस्तिर्यस्मै सः ।।७७।। 'निरूढ' पद का 'जिसे निरूहवस्ति दी गई हो' वह अर्थ समझना चाहिये ।।७७।। पूर्वयोः कृच्छ्रता व्याधेरसाध्यत्वमथापि वा। शेषाणां च त्विह प्रोक्ता वह्निसादादयो गदाः ।। नवीन ज्वर तथा अजीर्ण रोगवाले दोनों रोगी यदि तैल की मालिश करावें तो उनके रोग कष्ट साध्य अथवा असाध्य हो जाते हैं और बाकी बचे हुये जो विरक्ति, वान्त और निरूढ़ रोगी हैं वे यदि तैल की मालिश करावें तो उनको अग्निमान्द्य (जठराग्नि का मन्द हो जाना) आदि रोग हो जाते हैं ।।७८।। ❖ पूर्वयोः=तरुणज्वरिणोऽजीर्णिनश्च ।।७८।। 'पूर्वयोः' इस पद से 'पूर्व के ७७ वें श्लोक के आरम्भ में कहे हुये नवीन ज्वर तथा अजीर्ण रोगवाले इन दो रोगियों' का ग्रहण करना चाहिये ।।७८।। अथोद्वर्त्तनगुणानाह- उद्वर्त्तनं कफहरं मेदोघ्नं शुक्रदं परम्। बल्यं शोणितकृच्चापि त्वक्प्रसादमृदुत्वकृत् ।।७९।। मुखलेपाद्दृढं चक्षुः पीनो गण्डस्तथाऽऽननम्। कान्तमव्यङ्गपिडकं भवेत्कमलसन्निभम् ।।८०।। उद्वर्त्तन (उबटन) लगाने के गुण—उद्वर्त्तन, कफ को हरण करनेवाला, मेद का नाशक, अत्यन्त वीर्यवर्धक, बलदायक, रक्त उत्पन्न करने वाला, त्वचा को निर्मल तथा कोमल करने वाला होता है। मुख में उबटन लगाने से नेत्र दृढ़ अर्थात् तीक्ष्ण दृष्टि होती है और गण्डस्थल मोटा तथा मुख झाईं मुहासे रहित होकर कमल की भाँति सुन्दर हो जाता है ।।७९-८०।। अथ स्नानविधिमाह- दीपनं वृष्यमायुष्यं स्नानमोजोबलप्रदम्। कण्डूमलश्रमस्वेदतन्द्रातृड्दाहपाप्मनुत् ।।८१।। बाह्यैश्च सेकैः शीताद्यैरूष्माऽन्तर्याति पीडितः। नरस्य स्नानमात्रस्य दीप्यते तेन पावकः ।।८२।। शीतेन पयसा स्नानं रक्तपित्तप्रशान्तिकृत्। तदेवोष्णेन तोयेन बल्यं वातकफापहम् ।।८३।। शिरः स्नानमचक्षुष्यमत्युष्णेनाम्बुना सदा। वातश्लेष्मप्रकोपे तु हितं तच्च प्रकीर्त्तितम् ।।८४।। स्नान की विधि—स्नान अग्नि को दीप्त करनेवाला, वृष्य (वीर्यवर्धक), आयु को बढ़ानेवाला, ओज तथा बल को देनेवाला, खुजली, मल, श्रम, पसीना, तन्द्रा, प्यास, दाह और पाप को दूर करनेवाला है। बाहर से शीतल जल का सेवन करने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती किन्तु लौट कर शरीर के अन्दर ही चली जाती है। अतएव CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १९९. स्नान करते ही तुरन्त जठराग्नि दीप्त हो उठती है। शीतल जल से स्नान रक्तपित्त को शान्त करता है वही स्नान यदि गर्म जल से किया जाय तो बलदायक तथा वात और कफ का नाशक होता है। यदि शिर पर डाल कर अत्यन्त गर्म जल से सदा स्नान किया जाय तो नेत्रों के लिये अहितकर होता है किन्तु वात कफ के प्रकुपित होने पर उसी को ऋषियों ने हितकारी बतलाया है ॥८१-८४॥ अशीतेनाम्भसा स्नानं पयःपानं नवाःस्त्रियः । एतद्भो मानवाः पथ्यं स्निग्धमल्पं च भोजनम् ॥८५॥ उष्णजल से स्नान करना, दूध पीना, नवीन स्त्री के साथ संभोग करना, स्निग्ध (घृतादि पदार्थ मिश्रित) और स्वल्प भोजन करना लोगों के लिये हितकर है ॥८५॥ हरिश्चन्द्रस्यैतत् ॥८५॥ यह (८५) श्लोकोक्ति 'हरिश्चन्द्र' का है ॥८५॥ अथामलकैः स्नानस्य गुणानाह- यः सदाऽऽमलकैः स्नानं करोति स विनिश्चितम् । बलीपलितनिर्मुक्तो जीवेद्वर्षशतं नरः ॥८६॥ आँवला मिश्रित जल के गुण—जो मनुष्य आँवला मिले हुये जल से अथवा आँवला लगा कर सदा स्नान करता है वह निश्चय बली और पलित से मुक्त होकर सौ वर्ष जीता है ॥८६॥ अथ स्नानानर्हजनानाह- स्नानं ज्वरेऽतिसारे च नेत्रकर्णानिलार्तिषु । आध्मानपीनसाजीर्णभुक्तवत्सु च गर्हितम् ॥८७॥ स्नान करने के अयोग्य जन—जिनको ज्वर या अतिसार हो या नेत्र तथा कानों में पीड़ा होती हो अथवा वात सम्बन्धी पीड़ा होती हो किंवा आध्मान (अफारा), पीनस अथवा अजीर्ण रोग हुआ हो और जो भोजन कर चुका हो, ऐसे लोगों के लिये स्नान करना अनुचित है ॥८७॥ अथ स्नानोत्तरं वस्त्रेणाङ्गमार्जनस्य गुणानाह- स्नानस्यानन्तरं सम्यग्वस्त्रेणाङ्गस्य मार्जनम्। कान्तिप्रदं शरीरस्य कण्डूत्वग्दोषनाशनम् ॥८८॥ स्नान करने के बाद अँगोछे से देह पोंछने के गुण—स्नान के बाद वस्त्र (अँगोछे) से अच्छी तरह अङ्गों का पोंछना—शरीर में कान्ति उत्पन्न करनेवाला तथा खुजली, एवं त्वग् गत दोषों को दूर करने वाला होता है ॥८८॥ अथ वस्त्रधारणगुणानाह, तत्रादौ शीतकाले धारणार्हवस्त्राणि तद गुणवर्णनपूर्वकमाह- कौशेयोर्णिकवस्त्रं च रक्तवस्त्रं तथैव च। वातश्लेष्महरं तत्तु शीतकाले विधारयेत् ॥८९॥ वस्त्र धारण करने का विधान—शीत ऋतु में कौशेय वस्त्र (पीताम्बर और तसर) तथा ऊनी वस्त्र एवं लाल वस्त्र ये सब वात तथा कफ को दूर करनेवाले हैं अत एव शीत काल में इन सबों को धारण करना चाहिये ॥८९॥ कौशेयं=पट्टाम्बरं तसरवस्त्रं च ॥८९॥ 'कौशेय' पद से पट्टवस्त्र (पीताम्बर) और 'तसर वस्त्र' का ग्रहण होता है ॥८९॥ अथोष्णकाले धारणार्हवस्त्राणि तद्गुणाँश्चाह- मेध्यं सुशीतं पित्तघ्नं कषायं वस्त्रमुच्यते । तद्धारयेदुष्णकाले तत्रापि लघु शस्यते ॥९०॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१२० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ग्रीष्म ऋतु में वस्त्र धारण करने का विधान—कषाय वस्त्र-पवित्र, सुशीतल और पित्त का नाशक कहा हुआ है, अतएव इसे उष्ण काल में धारण करना चाहिये। उसमें भी जो लघु अर्थात् पतला कषाय वस्त्र हो वह ग्रीष्मकाल में अधिक प्रशस्त होता है ॥९०॥ ❖ कषायं=कौङ्कुमी इति लोके। कषायरागरक्तं वा ॥९०॥ 'कषाय' पद से 'कौङ्कुमी' (कुमकुम) नाम से प्रसिद्ध अथवा जोगिया रंग का ग्रहण करना चाहिये ॥९०॥ अथ वर्षाकाले धारणार्हवस्त्राणि तद्गुणाँश्चाह- शुक्लं तु शुभदं वस्त्रं शीतातपनिवारणम्। न चोष्णं न च वा शीतं तत्तुवर्षासु धारयेत् ।।९१।। वर्षाकाल में धारण करने योग्य वस्त्र—(सफेद) शुक्ल शुभ को देने वाला, शीत तथा आतप का निवारण करने वाला है। यह न तो उष्ण है और न शीतल ही है अत एव ऐसा ही वस्त्र वर्षा काल में धारण करना चाहिये ॥९१॥ **अथ नवनि

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १२१ ❖ घनसारः=कर्पूरः, बालकम्=ह्रीबेरम् ।। ९५ ।। 'घनसार' से 'कर्पूर' तथा 'बालक' से 'ह्रीबेर' (सुगन्धबाला) समझना चाहिये ।। ९५ ।। अथ वर्षाकाले प्रलेपार्हद्रव्यगुणानाह- चन्दनं घुसुणोपेतं मृगनाभिसमायुतम् । न चोष्णं न च वा शीतं वर्षाकाले तदिष्यते ।। ९६ ।। वर्षाकाल में प्रलेप के योग्य द्रव्य—केशर और कस्तूरी से युक्त चन्दन का प्रलेप वर्षाकाल में प्रशस्त होता है। क्योंकि यह न तो शीतल होता है और न उष्ण होता है ।। ९६ ।। घुमृणं=कुङ्कुमम् । मृगनाभिः=कस्तूरी ।। ९६ ।। 'घुसृण' से 'कुङ्कुम' (केशर) और 'मृगनाभि' से 'कस्तूरी' का ग्रहण करना चाहिये ।। ९६ ।। अथ सामान्यतोऽनुलेपगुणवर्णनपूर्वकं तदनर्हजनमप्याह- अनुलेपस्तृषामूर्च्छादुर्गन्धस्वेददाह

१२२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सूर्यादि नवग्रहों को प्रसन्न करने वाले रत्न—सूर्यग्रह का माणिक्य (मानिक), चन्द्रग्रह का मोती, मङ्गलग्रह का मूँगा, बुधग्रह का मरकतमणि (पन्ना), गुरुग्रह का पोखराज, शुक्रग्रह का हीरा, शनिग्रह का नीलम एवं राहु और केतु का क्रम से गोमेद और वैदूर्यमणि है। इन रत्नों के धारण करने से पूर्वोक्त नवग्रह प्रसन्न होते हैं॥१०१॥ अथ वस्त्रशृङ्गाररत्नानां धारणगुणानाह- वासःशृङ्गाररत्नानां धारणं प्रीतिबर्धकम्। रक्षोघ्नमर्थ्यभोजस्यं१ सौभाग्यकरमुत्तमम्॥१०२॥ सुन्दर वस्त्रादि धारण करने के गुण—वस्त्र तथा शृङ्गार (शोभा) प्रयोजक चिह्न सुगन्ध, माला, चन्दनादि अथवा शोभाप्रयोजक रत्नों का धारण, प्रसन्नता बढ़ाने वाला, राक्षसबाधा को दूर करने वाला, धन देने वाला, प्रयोजन सिद्ध करने वाला, ओज उत्पन्न करने वाला और उत्तम सौभाग्य करने वाला होता है॥१०२॥ अथ सिद्धमन्त्रमहौषध्यादिधारणगुणानाह- सततं सिद्धमन्त्रस्य महौषध्यास्तथैव च। रोचनासर्षपादीनां २मङ्गल्यानां च धारणम्॥ वायुर्लक्ष्मीकरं रक्षोहरं मङ्गलदं शुभम्। हिंस्रादिभयविध्वंसि वशीकरणकारणम्॥१०४॥ सिद्ध मन्त्र, महौषधादि धारण करने के गुण—सिद्ध मन्त्र, महौषधि, मङ्गलप्रद गोरोचन और सफेद सरसों आदि द्रव्यों का धारण, आयु तथा लक्ष्मी को बढ़ाने वाला, राक्षस बाधा दूर करने वाला, मङ्गल-प्रद, शुभजनक, हिंस्र-जीव व्याघ्रादि के भय को दूर करने वाला और वशीकरण का कारण है॥१०३-१०४॥ अथ भोजनविधिमाह, तत्रादौ भोजनकाले मङ्गलवस्तुदर्शनगुणानाह- ततो भोजनवेलायां कुर्यान्म ३मङ्गल्यदर्शनम्। तस्य प्रदर्शनं नित्यमायुर्धर्मविवर्धनम्॥१०५॥ मङ्गल वस्तुओं के दर्शन के गुण—स्नानोपरान्त वस्त्र-धारणादि कार्य कर चुकने के बाद भोजन करने के समय मङ्गलप्रद वस्तुओं का दर्शन करना चाहिये क्योंकि उन सबों का नित्य दर्शन आयु तथा धर्म को बढ़ाने वाला होता है॥१०५॥ अथ मङ्गलवस्तून्याह- लोकेऽस्मिन्मङ्गलान्यष्टौ ब्राह्मणो गौर्हुताशनः। पुष्पस्रक्सर्पिरादित्य आयो राजा तथाऽष्टमः॥१०६॥ मङ्गलप्रद वस्तु—इस लोक में (१) ब्राह्मण, (२) गौ, (३) अग्नि, (४) पुष्पमाला, (५) घृत, (६) सूर्य, (७) जल तथा (८) राजा ये सब मङ्गलप्रद हैं॥१०६॥ अथ पादुकाधारणगुणानाह- पादुकाधारणं कुर्यात्पूर्व भोजनतः परम्। पादरोगहरं वृष्यं चक्षुष्यं चायुषो हितम्॥१०७॥ खड़ाऊँ धारण करने के गुण—भोजन के पहले और पीछे खड़ाऊँ पहिनना चाहिये क्योंकि यह पैर सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, वृष्य (वीर्यवर्धक), नेत्र के लिये हितकर और आयु को बढ़ाने बाला है॥१०७॥ अथ क्षुत्तृडाद्यवरोधे हानिमाह- शरीरे जायते नित्यं वाञ्छा नृणां चतुर्विधा। बुभुक्षा च पिपासा च सुषुप्सा च रतिस्पृहा॥१०८॥ १. 'ओजस्यामि'ति पा.। २. 'माङ्गल्यानामि'ति पा.। ३. 'माङ्गल्ये'ति पा.।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १२३ स्वाभाविक मानुषी इच्छा—मनुष्यों के शरीर में नित्य—(१) भोजन करने की इच्छा, (२) जल पीने की इच्छा, (३) सोने की इच्छा और (४) मैथुन करने की इच्छा उत्पन्न होती रहती है ॥११०८॥ अथ भोजनेच्छाविघाते हानिमाह- भोजनेच्छाविघातात्स्यादङ्गमर्दोऽरुचिः श्रमः। तन्द्रा लोचनदौर्बल्यं धातुदाहो बलक्षयः ॥११०९॥ भोजन की इच्छा रोकने से हानि—भोजन की इच्छा रोकने से शरीर टूटना, भोजन में अरुचि, श्रम, तन्द्रा, नेत्रों में दुर्बलता, धातुओं का दाह (जठराग्नि के द्वारा रसादिकों का जलना) और बल का क्षय होता है ॥११०९॥ अथ जलपानेच्छाविघाते हानिमाह- विघातेन पिपासायाः शोषः कण्ठास्ययोर्भवेत् । श्रवणस्यावरोधश्च रक्तशोषो हृदि व्यथा ।। ११० ।। प्यास रोकने से हानि—प्यास रोकने से कण्ठ और मुख सूखने लगता है तथा कान से शब्द नहीं सुनाई पड़ता और रक्त सूखने लगता है एवं हृदय में पीड़ा होने लगती है ॥१११०॥ अथ स्वापेक्षाविघाते हानिमाह- निद्राविघाततो जृम्भा शिरोलोचनगौरवम् । अङ्गमर्दस्तथा तन्द्रा स्यादन्नपाक एव च ।।१११।। नींद रोकने से हानि—नींद रोकने से जँभाई, आँख तथा शिर में भार मालूम पड़ना, शरीर का टूटना, तन्द्रा तथा अन्न का परिपाक न होना ये सब होने लगते हैं ।।१११।। अथ बुभुक्षायां सत्यामपि भोजनाकरणे दोषमाह- बुभुक्षितो न योऽश्नाति तस्याहारेन्धनक्षयात् । मन्दीभवति कायाग्निर्यथा चाग्निरिन्धनः ॥१११२।। आहारं पचति शिखी दोषानाहारवर्जितः । पचेद्¹ दोषक्षये धातून्प्राणान्यातुक्षयेऽपि च ।। ११३ ।। भूख लगने पर भोजन न करने से हानि—भूख लगने पर जो भोजन नहीं करता उसकी जठराग्नि भोज्य पदार्थ रूपी ईंधन के न रहने से, उसी तरह मन्द हो जाती है जैसे-लोक में इन्धन (लकड़ी) के न रहने पर अग्नि मन्द हो जाती है। जठराग्नि आहार (खाये हुए भोज्य पदार्थ) को पचाती है परन्तु आहार न मिलने पर पहले वातादि दोषों को पचाती है तत्पश्चात् दोषों का क्षय होने पर रस रक्तादि धातुओं को पचाती है और धातुओं का क्षय होने पर प्राणों को पचाती है अर्थात् भूख लगने पर भोजन न करने से क्रमशः प्राण तक नष्ट हो जाते हैं ॥१११२-११३।। अथ भोजनकरणे गुणानाह- आहारःप्रीणनः सद्यो बलकृद् देहधारणः । स्मृत्यायुःशक्तिवर्णौजःसत्त्वशोभाविवर्धनः ।।११४।। भूख लगने पर भोजन करने का गुण—भूख लगने पर भोजन प्रसन्नता को देने वाला, तत्काल बल उत्पन्न करने वाला, शरीर को स्थिर रखने वाला, स्मरण शक्ति, आयु, सामर्थ्य, शरीर का वर्ण, ओज, सत्त्व (वीर्यातिशय) और शोभा को बढ़ाने वाला होता है ॥११४॥ यथोक्तगुणसम्पन्नं नरः सेवेत भोजनम् । विचार्य दोषकालादीन्कालयोरुभयोरपि ।। ११५ ।। भोजन का समय—मनुष्य को उचित है कि वह दोष, कालादि का विचार कर दोनों कालों में अन्न का भोजन करे ।।११५।। १. 'पचती'ति पा. । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

१२४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ उभयोःकालयोः = प्रातःसायं च ।।१९५।। 'उभयोःकालयोः' से 'प्रातःकाल तथा सायंकाल में' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१९५।। तथा च- सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं श्रुतिबोधितम्। नान्तरा भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः ।।१९६।। प्रातः और सायंकाल मनुष्यों के लिये भोजन करना वेद से अनुमोदित है। इन दो कालों के मध्यकाल में भोजन नहीं करना चाहिये, क्योंकि वेदानुमोदित अग्निहोत्र के समान भोजन करने की भी विधि है अर्थात् जिस प्रकार अग्निहोत्र प्रातः तथा सायंकाल ही में किया जाता है, उसी प्रकार भोजन भी प्रातः तथा सायंकाल ही में करना चाहिये ।।१९६।। प्रातः-प्रथमयामादुपरि द्वितीययामादवार्क् (तदेवोत्तरत्राह¹) तथा च- याममध्ये न भोक्तव्यं यामयुग्मं न लङ्घयेत्। याममध्ये रसोत्पत्तिर्यामयुग्माद्वलक्षयः ।।१९७।। प्रातःकालीन भोजन का समय—प्रातःकाल एक प्रहर के मध्य और दो प्रहर के बाद भोजन करना उचित नहीं, क्योंकि एक प्रहार के अन्दर भोजन न करने से रसोत्पत्ति होती है और दूसरे प्रहार के व्यतीत होने पर भोजन करने से बल की हानि होती है (तस्मात् एक प्रहर के बाद दो प्रहर के मध्य (९ से १२ के अन्दर) भोजन करना चाहिये) ।।१९७।। अन्यच्च- क्षुत्सम्भवति पक्वेषु रसदोषमलेषु च। काले वा यदि वाऽकाले सोऽन्नकाल उदाहृतः ।।१९८।। भूख लगने पर भोजन का अनियमित समय—वचन-रस, दोष और मल के परिपक्व होने पर ही भूख लगती है, अतः चाहे भोजन का समय हुआ हो या न हुआ हो किन्तु जभी भूख मालूम पड़े तभी भोजन का समय समझना चाहिये ।।१९८।। अथ जीर्णाहारस्य लक्षणमाह- उद्गारशुद्धिरुत्साहो वेगोत्सर्गो यथोचितः। लघुता क्षुत्पिपासा च जीर्णाहारस्य लक्षणम् ।।१९९।। आहार परिपाक के लक्षण—जब शुद्ध उद्गार (डकार), चित्त में उत्साह, यथोचित रीति से मल मूत्रादि का वेग तथा उनका यथोचित त्याग एवं शरीर में हल्कापन, भूख और प्यास भी मालूम पड़ने लगे तब भोजन किया हुआ पदार्थ पच गया है, ऐसा समझना चाहिये ।।१९९।। अंथाहारस्थानमाह- आहारं तु रहः² कुर्यान्निर्हारमपि सर्वदा। उभाभ्यां लक्ष्म्युपेतः स्यात्प्रकाशे³ हीयते श्रिया⁴ ।।१२००।। भोजन करने योग्य स्थान—भोजन तथा मल-मूत्र का त्याग सर्वदा एकान्त (निर्जन) स्थान में करना चाहिये, क्योंकि इस प्रकार करने से मनुष्य लक्ष्मी से युक्त होता है और इसके विपरीत (प्रकाश में, सब के सामने) करने पर लक्ष्मी से रहित दरिद्र होता है ।।१२००।। निर्हारो=मलमूत्रोत्सर्गः ।।१२००।। 'निर्हार' पद से 'मल मूत्र का त्याग करना' अर्थ समझना चाहिये ।।१२००।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः। २. 'विजने' इति पा.। ३. 'प्रकाशो' इति पा.। ४. 'श्रिया' इति पा.।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १२५ अन्यच्च- आहारनिर्हारविहारयोगाः सदैव सद्भिर्विजने विधेयाः ॥१२१॥ और भी कहा है कि—भोजन, मल, मूत्रादि का परित्याग तथा विहार (स्त्रीभोगादि) ये सब सद्विवेकी को सदा एकान्त ही में करना चाहिये ॥१२१॥ १अथभोजन काले शुभाशुभदृष्टिमाह- पितृमातृसुहृद्वैद्यपाककृद्धंसबर्हिणाम्। सारसस्य चकोरस्य भोजने दृष्टिरुत्तमा ॥१२२॥ दीनहीनक्षुधाऽऽर्त्तानां पापपाषण्डरोगिणाम्। कुक्कुटादेः शुनो दृष्टिर्भोजने नैव शोभना ॥१२३॥ भोजन के समय शुभाशुभ दृष्टि—भोजन करते समय पिता, माता, मित्र, वैद्य, पाककर्त्ता एवं हंस, मयूर, सारस तथा चकोर इन सबों की दृष्टि उत्तम होती है और दीन, हीन, भूख से व्याकुल, पापी, पाखण्डी, रोगी तथा कुक्कुर, कुक्कुट (मुर्गा) आदि की दृष्टि पड़ना अशुभ (निषिद्ध) कहा गया है ॥१२२-१२३॥ अथ भोजनपात्रमाह- दोषहृद् दृष्टिदं पथ्यं हैमं भोजनभाजनम्। रौप्यं भवति चक्षुष्यं पित्तहृत्कफवातकृत् ॥१२४॥ कांस्यं बुद्धिप्रदं रुच्यं रक्तपित्तप्रसादनम्। पैत्तलं वातकृद्रूक्षमुष्णं कृमिकफप्रणुत् ॥१२५॥ आयसे काचपात्रे च भोजनं सिद्धिकारकम्। शोथपाण्डुहरं बल्यं कामलाऽपहमुत्तमम् ॥१२६॥ शैलेये मृण्मये पात्रे भोजनं श्रीनिवारणम्। दारूद्भवे विशेषेण रुचिदं श्लेष्मकारि च ॥ पात्रं पत्रमयं रुच्यं दीनं विषपापनुत् ॥१२७॥ भोजन करने योग्य पात्र—सुवर्ण का भोजन पात्र दोषों का नाशक, दृष्टिप्रद, (दर्शन शक्ति को देनेवाला) और पथ्य (स्वास्थ्यप्रद) होता है। चाँदी का भोजन पात्र आँख के लिये हितकारी, पित्त का हरण करने वाला, कफ और वातरोग करने वाला होता है। काँसे का भोजन पात्र बुद्धिप्रद, रुचि कर तथा रक्त पित्त का शान्त करने वाला होता है। पित्तल का भोजन पात्र वात जनक, रूक्षता कारक, उष्ण—वीर्य एवं कृमि तथा कफ का नाश करने वाला होता है। लोहा तथा काच का बना भोजन पात्र—दृष्टि सिद्धि कारक और शोथ तथा पाण्डुरोग को हरण करनेवाला, बलकारी एवं कामला रोग को नष्ट करने वाला अतएव उत्तम होता है। पत्थर तथा मिट्टी का बना भोजन पात्र लक्ष्मी (धन) नाशक होता है। काठ का बना भोजनपात्र रुचि उत्पन्न करने वाला किन्तु उससे कफ की वृद्धि होती है और पत्तों से बना भोजन पात्र (पत्तल) हो तो वह भोजन में रुचि बढ़ाने वाला, अग्नि दीपक, विष तथा पाप को नष्ट करने वाला (उत्तम) होता है ॥१२४-१२७॥ अथ जलपात्रमाह- जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम् ॥१२८॥ पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्। काचेन रचितं तद्वत्तथा वैदूर्यसम्भवम् ॥१२९॥ जलपात्र का विधान—जल के लिये तामे का जल पात्र उत्तम है, उसके अभाव में मिट्टी का भी जलपात्र हितकारी है। स्फटिक का बना हुआ जलपात्र पवित्र तथा शीतल होता है। उसी प्रकार काच तथा वैदूर्य रत्न का हुआ जलपात्र भी पवित्र तथा शीतल होता है ॥१२८-१२९॥ १. कोष्ठस्थः क्वाचित्कः पा.।

१२६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ भोजने प्रथमभोज्यपदार्थमाह- भोजनाग्रे सदा पथ्यं लवणार्द्रकभक्षणम्। अग्निसन्दीपनं रुच्यं जिह्वाकण्ठविशोधनम् ॥ १३०॥ भोजन के समय सबसे पहले भोज्य वस्तु-भोजन के समय सबसे पहले सदा नमक और अदरख भक्षण करना हितकारी है क्योंकि वह अग्निको दीपन करने वाला, रुचिकारक, जिह्वा और कण्ठ का शोधन करने वाला है ॥१३०॥ ❖ ननु लवणस्य पित्तजनकत्वाद् आर्द्रकस्य कटुकत्वेन पित्तलत्वाद् बुभुक्षितस्य वृद्धपित्तस्य कथं प्रथमं लवणार्द्रकभक्षणमुचितम् । उच्यते- 'लवणं सैन्धवं ज्ञेयं चन्दनं रक्तचन्दनम्' । इति वचनाल्लवणमत्र सैन्धवम्, तत् त्रिदोषघ्नम् । यत आह गुणग्रन्थे- सैन्धवं लवणं स्वादु दीपनं पाचनं लघु । स्निग्धं रुच्यं हिमं वृष्यं सूक्ष्मं नेत्र्यं त्रिदोषहृत् ॥१॥ यहाँ शंका यह होती है कि नमक पित्तजनक एवं अदरख कडुबा होने से पित्त कारक होता है तब भूख लगने के समय जब कि मनुष्य का पित्त स्वतः बढ़ा रहता है तब स्वतः बढ़े हुये पित्त वाले मनुष्य को भोजन के पहले पित्त- वर्धक नमक के साथ अदरख खाना किस प्रकार उचित है ? इसका उत्तर यह है कि-परिभाषा प्रकरण में 'लवण' का अर्थ सेंधानमक और 'चन्दन' का 'रक्त चन्दन' अर्थ किया गया है। अतः पूर्वोक्त श्लोक में भी लवण पद से सेंधा नमक ही ग्रहण होता है जो तीनों दोषों का नाशक है । ओषधियों के गुण बतलाने वाले ग्रन्थों में भी कहा है कि-सेंधा नमक- स्वादु, अग्निदीपक, अन्नपाचक, लघु, स्निग्ध, रुचिकारक, शीतल, वृष्ण (वीर्य वर्धक) सूक्ष्म, नेत्रों के लिये हितकर तथा तीनों दोषों का नाशक हैं ॥१॥ आर्द्रकं तु कटुकमपि न पित्तविरोधि मधुरपाकित्वान् । यत आह तत्रैव- आर्द्रिका भेदिनी गुर्वी तीक्ष्णोष्णा दीपनी च सा। कटुका मधुरा पाके सूक्ष्मा वातकफापहा ॥२॥ भोजन के प्रथम अदरख तो भक्षण करने लायक है ही क्योंकि अदरख के विषय में गुण ग्रन्थ में भी कहा है कि- 'अदरख-भेदक, गुरु, तीक्ष्ण, उष्ण-वीर्य, अग्नि दीपक, कटु रस युक्त, पाक समय में मधुर रस युक्त, सूक्ष्म, वात और कफ का नाशक है' ॥२॥ ❖ अथ चान्यदपि लवणमार्द्रकं च नात्र पित्तविरोधि संयोगस्वभावात् । संयोगस्वरूपं१ चैतादृशम् । भोजनस्य पूर्वं लवणार्द्रकभक्षणबोधकवचनमेव प्रमाणयति ॥१३०॥ इसके अतिरिक्त यह भी कहा है कि, यद्यपि लवण और अदरख पृथक्-पृथक् रूप से भले ही पित्त विरोधी हैं तथापि परस्पर दोनों के संयोग होने पर विलक्षण हो जाने से पित्तविरोधी नहीं होते हैं। क्योंकि इन दोनों के संयोग होने पर पित्त के साथ विरोध न करना ऐसा स्वभाव ही हो जाता है और भी इस बात को 'भोजन के पहले लवण और अदरख एक साथ खाना चाहिये' यह उपर्युक्त वचन भी प्रमाणित करता है ॥१३०॥ (अथ २भोजनादौ) दृष्टिदोषविनाशाय ब्रह्मादीनां स्मरणमाह, तद्यथा- अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुर्भोक्ता देवो महेश्वरः । इति सञ्चिन्त्य भुञ्जानं दृष्टिदोषो न बाधते ॥१३१॥ ३अञ्जनागर्भसम्भूतं कुमारं ब्रह्मचारिणम् । दृष्टिदोषविनाशाय हनुमन्तं स्मराम्यहम् ॥ १३२॥ १. 'स्वभावे' इति पा. । २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ३. 'अञ्जनी'ति पा.।

ri-matra)! Wait, why did I see 'यु'? Let's look very closely: Is it 'पृ' or 'पु' or 'यु'? In Sanskrit: "पृथुक" means flattened rice / chiwda! And look at Hindi in line 19: "तथा चावल और चिउडा आदि"! "चावल" = तण्डुल. "चिउडा" = पृथुक! Yes! "पृथुक" means चिउड़ा (flattened rice)! And in line 18, it is: "तण्डुलान्पृथुकानपि"! Let's look at the glyph in line 18: 'न्' connected to 'पृ': 'न्पृ'. It is definitely 'न्पृ'! So: "तण्डुलान्पृथुकानपि". Excellent catch!

Let's check line 19: "बुभुक्षित (भूखा) मनुष्य गुरु (देर में हजम होने वाला) पिष्टमय (कचौड़ी, बड़ा आदि) तथा चावल और चिउडा आदि" Wait, is it "चिउडा" or "चिउड़ा"? Look at line 19: 'चि' 'उ' 'डा'. No dot under 'ड'. "कचौड़ी, बड़ा" -> 'कचौड़ी' has dot, 'बड़ा' has dot.

Let's check line 20: "पदार्थ उपयुक्त मात्रा में खा सकता है किन्तु भोजन कर चुकने के बाद पुनः उक्त पदार्थों को न खावे ॥१

१२८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ स्वाद्वन्नस्य गुणमाह- सौमनस्यं बलं पुष्टिमुत्साहं वृद्धिमायुषः । स्वादु सञ्जनयत्यन्नमस्वादु च विपर्ययम् ।। १४३९ ।। स्वादिष्ट अन्न के गुण—स्वादिष्ट अन्न भोजन करने पर चित्त की प्रसन्नता, बल, शरीर की पुष्टता, उत्साह और आयु की वृद्धि होती है और अस्वादिष्ट अन्न भोजन करने पर इसके विपरीत अर्थात् चित्त की अप्रसन्नता, बलक्षय, अपुष्टता, उत्साह तथा आयु की हानि होती है ।। १४३९ ।। अथात्युष्णान्नादिभोजने दोषानाह- अत्युष्णान्नं बलं हन्ति शीतं शुष्कं च दुर्जरम् । अतिक्लिन्नं ग्लानिकरं युक्तियुक्तं हि भोजनम् ।। १४४० ।। अत्यन्त गर्म, शीतल, सूखा और गीला भोजन करने से दोष—अत्यन्य उष्ण अन्न भोजन करने से बल का नाश, शीतल तथा शुष्क अन्न खाने से देर में हजम और जलादि से अत्यन्त गीला अन्न ग्लानि उत्पन्न करने वाला होता है। अत एव सर्वदा युक्तियुक्त (न अत्यन्त उष्ण, न अत्यन्त शीतल, न अत्यन्त शुष्क और न अत्यन्त गीला) अन्न भोजन करना चाहिये ।। १४४० ।। अथातिद्रुतविलम्बिताशनयोर्दोषानाह- अतिद्रुताशिताहारे गुणान्दोषान्न बिन्दति । भोज्यं शीतमहृद्यं च स्याद्विलम्बितमश्नतः ।। १४४१ ।। अत्यन्त शीघ्रता तथा अत्यन्त धीरे-धीरे अन्न खाने के दोष—अत्यन्त शीघ्रता से भोजन करने पर भोज्य पदार्थों के गुण तथा दोषों का परिज्ञान नहीं हो पाता तथा अत्यन्त धीरे-धीरे भोजन करने से भोज्य पदार्थ शीतल और अहृद्य (हृदय को अप्रिय) हो जाता है ।। १४४१ ।। अथ गुर्वन्नं त्रिविधं तन्निवारयन्नाह- मन्दानलो नरो द्रव्यं मात्रागुरु विवर्जयेत् । स्वभावतश्च गुरु यत्तथा संस्कारतो गुरु ।। १४४२ ।। मात्रागुरुस्तु मुद्गादिर्माषादिः प्रकृतेर्गुरुः । संस्कारगुरु पिष्टान्नं प्रोक्तमित्युपलक्षणम् ।। १४४३ ।। गुरु अन्न का भोजन निषेध—मन्द अग्निवाले मनुष्य मात्रा से, स्वभाव से और संस्कार से जो गुरु पाक अन्न है उनका भोजन करना छोड़ दें, उसमें मात्रा से गुरु-मूँग वगैरह हैं ये सब वस्तुतः लघु होते हुये भी अधिक मात्रा में खाने पर गुरु होते हैं। स्वभाव से गुरु-उड़द, मटर आदि हैं, ये सब लघुमात्रा में खाने से भी स्वभावतः परिपाक में गुरु ही होते हैं संस्कार से गुरु—पिष्टान्न (पिसा हुआ अन्न पिष्ठी) आदि होते हैं, ये सब पाकादि संस्कार से गुरु कहलाते हैं। यहाँ मुद्गादि उपलक्षण हैं अतः मन्दाग्नि वाले इनके सदृश अन्यान्य गुरु पदार्थों का भी भोजन नहीं करें ।। १४४२-१४४३ ।। अथाहारस्य षाड्विध्यमाह- आहारं षड्विधं चूष्यं पेयं लेह्यं तथैव च । भोज्यं भक्ष्यं तथा चर्व्यं गुरु विद्याद्यथोत्तरम् ।। छः प्रकार का आहार—आहार छः प्रकार का होता हैं (१) चूष्य (चूसने लायक), (२) पेय, (पीने लायक), (३) लेह्य (चाटने लायक), (४) भोज्य, (भोजन करने लायक), (५) भक्ष्य (दाँतों से काट कर खाने लायक) और (६) चर्व्य (चबाने लायक) ये सब उत्तरोत्तर गुरु होते हैं ।। १४४४ ।। ❖ चूष्यम्=इक्षुदाडिमादि, पेयं=पानकशर्करोदकादि, लेह्यं=रसालाक्वथितादि, क्वथिता 'कढ़ी' इति लोके । भोज्यं=भक्तसूपादि, भक्ष्यं=लड्डुकमोदकादि, चर्व्य=चिपिटचणकादि ।। १४४४ ।। 'चूष्य' से ईख, अनार आदि, 'पेय' से शक्कर और जल से बने हुये शर्बत आदि, 'लेह्य' से रसाला (सिखरन), 'क्वथिता' से लोक में प्रसिद्ध कढ़ी आदि, 'भोज्य' से भात, दाल आदि, 'भक्ष्य' से लड्डू-मोदक आदि और 'चर्व्य' से चिउड़ा, चना आदि का ग्रहण करना चाहिये ।। १४४४ ।।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १२९ अथ स्वभावगुरुसंस्कारगुरुणोः स्वभावलघुनश्च भक्ष्यस्य भोजनपरिमाणमाह- गुरूणामर्धसौहित्यं लघूनां तृप्तिरिष्यते । द्रवो द्रवोत्तरश्चापि न मात्रागुरुरिष्यते ।।१४५।। स्वभाव और संस्कार से गुरु तथा स्वभाव से लघु भोज्य पदार्थों के परिमाण-जितनी मात्रा से भोजन करने पर आधी तृप्ति हो, उतनी ही मात्रा से गुरु द्रव्यों का और जितनी मात्रा से भोजन करने पर भली भाँति तृप्ति हो, उतनी ही मात्रा से लघुद्रव्यों का भोजन करना चाहिये । केवल द्रव तथा द्रवबहुल ये दोनों द्रव्य भोजन करने में मात्रा से अधिक होने पर भी 'मात्रा गुरु' नहीं माने जाते अर्थात् मुगादि की भाँति 'मात्रा गुरु' नहीं होते हैं ।।१४५।। ❖ अयमर्थः-माषपिष्टान्नादिभिरर्धसौहित्यं कर्त्तव्यं मुगादिभिः स्वभावादेव लघुभिर्मात्रया तृप्तिः, कर्त्तव्येत्यर्थः । द्रवः=पेयादिः, द्रवोत्तरः=तक्राद्यधिक ओदनादिः । मात्रातोऽधिकोऽपि मात्रागुरुर्न मन्तव्यः, पेयस्य सर्वतो लघुत्वात् ।। उपर्युक्त श्लोक का सारार्थ यह है कि-उड़द, पिष्टान्न (पिसा हुआ) आदि सब 'स्वभाव गुरु' द्रव्य हैं, उन सबों का आधी तृप्ति होने पर्यन्त भोजन करना चाहिये । मूँग आदि जितने 'स्वभाव से लघु' द्रव्य हैं उन सबों का भली भाँति तृप्ति होने पर्यन्त भोजन करना चाहिये । द्रव अर्थात् पेयादि तथा द्रवोत्तर अर्थात् जिसमें तक्र (माठा) आदि द्रव- द्रव्य अधिक रूप से युक्त हुये हों ऐसे भात आदि मात्रा से अधिक होने पर भी 'मात्रा गुरु' नहीं होते क्योंकि पेय द्रव्य सभी प्रकार के भक्ष्य द्रव्यों की अपेक्षा लघु होते हैं । ❖ उक्तं च सुश्रुतेन-पेयलेह्मादिभक्ष्याणां गुरुर्विद्याद्यथोत्तरम् ।।३।। पेयं=पेयादि । लेह्यं=रसालादि । आदिशब्दाद्भोज्यमोदनसूपादि । भक्ष्यं-मोदकादि ।।१४५।। 'सुश्रुत' ने भी कहा है कि- 'पेय और लेह्यादि भोज्य पदार्थों के मध्य में पेयादि उत्तरोत्तर एक की अपेक्षा दूसरे गुरु होते हैं । अतः सुतरां पेय, लेह्यादि भक्ष्य पदार्थों के मध्य में पेय ही सब से लघु हुआ' इस सुश्रुतोक्त वचन में 'पेय' से 'पेया' दूध आदि का तथा 'लेह्य' से 'सिखरन' आदि का ग्रहण होता है और 'पेयलेह्मादिभक्ष्याणाम्' इस में स्थित 'आदि' शब्द से 'भोज्य'-भात, दाल आदि का तथा भक्ष्य लड्डू आदि का भी ग्रहण करना चाहिये ।।३/१४५।। द्रवाढ्यमपि शुष्कं तु सम्यगेवोपपद्यते ।। शुष्क द्रव्य यदि अधिक द्रव पदार्थ से युक्त हो तो भलीभाँति उसका भोजन कर सकते हैं। ❖ अयमर्थः-शुष्कमपि स्रोतोरोधकमपि द्रवाढ्यं सम्यक्पाकं याति ।। भावार्थ यह है कि-शुष्क द्रव्य स्रोतोरोधक होने पर भी बहुत द्रव द्रव्यों से संयुक्त हो जाने पर भोजन करने से परिपक्व हो जाता है। अपक्वं तत्किम्भवतीत्यपेक्षामाह- पिण्डीकृतमसंक्लिन्नं विदाहमुपगच्छति । द्रव रूप पदार्थों से भली प्रकार नहीं भीजा हुआ शुष्क अन्न अपरिपक्व होकर पिंड के सदृश अर्ध परिपक्व अवस्था को प्राप्त हो जाता है ।। ❖ पिण्डीकृतमष्ठीलावद्भूतम् । असंक्लिन्नं=न सम्यगार्द्रम् । विदाहमुपगच्छति=विदग्धं भवतीत्यर्थः ।। यहाँ 'पिंडीकृत' से 'पिंड के सदृश अष्ठीला (गाँठ) की भाँति हुआ और 'असंक्लिन्न' से 'द्रव रूप पदार्थों से भली प्रकार नहीं गीला हुआ' तथा 'विदाहमुपगच्छति' से 'विदग्ध (अर्ध परिपक्व) अवस्था को प्राप्त हो जाता है' ऐसा समझना चाहिये ।।१४६।। १२ भाव.I

१३० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ केवलस्य शुष्कान्नस्य दोषमाह-विशुष्कमन्नमित्यादि । विशुष्कमन्नमभ्यस्तं न पाकं साधु गच्छति ॥१४६॥ केवल शुष्क अन्न सम्बन्धी दोष को 'विशुष्कमन्नम्' इत्यादि से कहते हैं- केवल जो शुष्क अन्न होता है वही भोजन करने पर भलीभाँति परिपक्व नहीं होता है ॥१४६॥ अथ शुष्कादीनां वैगुण्यमाह- शुष्कं निरुद्धं विष्टम्भि वह्निव्यापादकृद्भवेत्' ॥१४७॥ शुष्कादि द्रव्यों के भोजन से दोष- शुष्क, विरुद्ध और विष्टम्भि इन सब द्रव्यों के भोजन करने से अग्नि मन्द हो जाती है ॥१४७॥ शुष्कं चिपिटकादि, विरुद्धं क्षीरमत्स्यादि, विष्टम्भि-चणकमसूरादि, (वह्निव्यापादकृद्²) वह्निमान्द्यं कुर्यात् ॥१४७॥ यहाँ 'शुष्क' पद से 'चिउड़ा' आदि, 'विरुद्ध' पद से 'दूध मछली' आदि और 'विष्टम्भि' पद से 'चना मसूर' आदि पदार्थों का और 'वह्निव्यापादकृद्' इस पद से 'अग्नि को मन्द कर देता है' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥१४७॥ अथ सक्तुभक्षणविधिमाह- न भुक्त्वा न रदैश्छित्त्वा न निशायां न वा बहून् । न जलान्तरितान्द्विः सक्तूनद्यान्न केवलान् । सत्तू खाने की विधि-भोजन कर चुकने के बाद और दाँतों से चबा कर तथा रात्रि में एवं यदा कदा अधिक सत्तू नहीं खाना चाहिये एवं जल से अन्तरित करके अर्थात् एकबार जल दूसरी बार सत्तू फिर तीसरी बार जल इस क्रम से सत्तू नहीं खाना चाहिये । और केवल जलसे अर्थात् केवल सूखा सत्तू को मुख में रख कर फिर जल के साथ नहीं निगलना चाहिये ॥१४८॥ अथ सक्तुभक्षणे वर्जनीयानि सप्त कर्माण्यिाह- पुनर्दानं पृथक्पानं सामिषं वयसा निशि । दन्तच्छेदमुष्णं च सप्त सक्तुषु वर्जयेत् ।।१४९।। सत्तू खाने में वर्ज्य कर्म - सत्तू भोजन करने के समय सात कर्मों को छोड़ना चाहिये, जैसे- (१) सत्तू भोजन किये हुए को पुनः सत्तू देकर भोजन कराना, (२) सत्तू खाकर अलग जलपान करना, (३) मांस के साथ सत्तू खाना, (४) दूध के साथ-साथ सत्तू खाना (५) रात्रि में सत्तू खाना, (६) दाँतों से चबाकर सत्तू खाना और (७) गरम सत्तू खाना ॥१४९॥ सुश्रुतः-सक्तूनामाशु जीर्येत मृदुत्वादवलेहिका ।१५०।। सत्तू भोजन के विषय में 'सुश्रुत' का मत यह है कि सत्तू को अवलेह (चटनी की भाँति) बनाकर खाना चाहिये । क्योंकि सत्तू का अवलेह मृदु होने से जल्दी पच जाता है ।।१५०।। ३अथ विषमाशनस्य लक्षणमाह- यथाकालेऽतिमात्रं यत् तद्भवेद्विषमाशनम् । बहुस्तोकमकाले वा ज्ञेयं तद्विषमाशनम् ।। १५१ ।। १. 'वह्निव्यापदमावहेदिति पा. । २. कोष्ठस्थः पा. क्वाचित्कः । ३. कोष्ठस्थः पा. क्वाचित्कः ।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३१ विषमाशन के लक्षण—भोजन के समय अतिमात्रा से जो भोजन किया जाता है उसे अथवा कभी ज्यादा कभी कम और कभी असमय में जो भोजन किया जाता है उसे 'विषमाशन' कहते हैं ॥१५१॥ अथ बहुनोऽल्पस्य भक्षितस्य दोषमाह- आलस्यगौरवाटोपसादांश्च कुरुतेऽधिकम्। हीनमात्रं तनोःकार्श्यं करोति च बलक्षयम् ।।१५२।। बहुत तथा कम भोजन करने के दोष—बहुत भोजन करने से शरीर में आलस्य, गुरुता (भारी पन), आटोप (पेट में पीड़ा युक्त गुड़-गुड़ शब्द) और अवसाद (अवसन्न होना) ये सब दोष उत्पन्न होते हैं और कम भोजन करने से शरीर में कृशता तथा बलक्षय होता है ।।१५२।। अधिकम्=अन्नमिति यावत् ।।१५२।। 'अधिक' से 'अधिक अन्न भोजन करना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१५२॥ अथाकाले भुक्तस्य दोषमाह- अप्राप्तकाले भुञ्जानो ह्यसमर्थतनुर्नरः । तांस्तान् व्याधीनवाप्नोति मरणं चाधिगच्छति ।।१५३।। असमय में भोजन करने के दोष—असमय में भोजन करने से मनुष्य का शरीर असमर्थ हो जाता है और उसे अ समय अ में भोजन करने से उत्पन्न होने वाली व्याधियाँ होती हैं जिससे उसकी मृत्यु भी हो जाती है ।।१५३।। ❖ अप्राप्तकाले कालादतिप्राग् भुञ्जानोऽसमर्थशरीरो भवति। तथा सति तांस्तान् व्याधीन् शिरोव्यथाविषूचिकाऽलसकविलम्बिकाऽऽदीन् प्राप्नोति। तेषामाधिक्ये मरणमपि प्राप्नोतीत्यर्थः ।।१५३।। भावार्थ यह है कि—भोजन करने के समय से बहुत पहले प्रतिदिन भोजन करने से मनुष्य असमर्थ शरीर हो जाता है और इससे उसे सिरदर्द, हैजा, अलसक और विलम्बिका आदि व्याधियाँ हो जाती हैं तथा उन व्याधियों के बढ़ने से अन्त में उसकी मृत्यु हो जाती है ।।१५३।। अथ भोजनकालेऽतीते सति भोजन करणे दोषानाह- कालेतीतेश्नतो जन्तोर्वायुनोपहतेनले । कृच्छ्राद्विपच्यते भुक्तं न स्याद्भोक्तुं पुनः स्पृहा ।।१५४।। भोजन का समय व्यतीत होने पर भोजन करने से दोष—भोजन का समय व्यतीत होने पर भोजन करने वाले की जठराग्नि वायु से नष्ट (मन्द) हो जाती है। अत एव उसका भोजन किया हुआ अन्न कठिनाई से परिपक्व होता है तथा पुनः उसे खाने की इच्छा नहीं होती है ।।१५४।। अथ भोजनप्रमाणमाह- कुक्षेर्भागद्वयं भोज्यैस्तृतीये वारि पूरयेत्। वायोः सञ्चारणार्थाय चतुर्थमवशेषयेत् ।।१५५।। रसेनान्नस्य रसना प्रथमेनोपतर्पिता। न तथा स्वादमाप्नोति ततः शोध्याम्बुनान्तर ।।१५६।। भोजन का प्रमाण—उदर का दो भाग भोज्य पदार्थों से तथा तीसरा भाग जल से पूर्ण करना चाहिये और चौथा भाग वायु के सञ्चारण के लिये खाली छोड़ देना चाहिये। भोजन के समय प्रथम जो खाया जाता है उसके रस से जिह्वा तृप्त हो जाती है अतः जिह्वा जैसा पहले रस का स्वाद जानती वैसा बाद के रस का स्वाद नहीं जानती है। इसलिये एक रस के खाने के बाद दूसरे रस खाने के पहले बीच में जलपान द्वारा उसे (जीभ को) शुद्ध (साफ) कर लेना चाहिये ॥१५५-१५६॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

१३२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथाम्बुपानानम्बुपानयोर्निषेधपूर्वकं मुहुर्मुहुः स्वल्पमात्रया वारिपानमाह- अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नमनम्बुपानाच्च च एव दोषः । तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पिवेदभूरि ।।१५७।। भोजन के बीच में थोड़ा थोड़ा जलपान की विधि-भोजन करते समय अधिक जलपान करने से तथा एक दम से जल न पीने से भी अन्न नहीं पचता है अतः जठराग्नि की दीप्ति के लिये भोजन के बीच में बारंबार थोड़ा-थोड़ा जल अवश्य पीना चाहिये ॥१५७॥ अथ भुक्तस्यादौ मध्येऽन्ते च जलपानस्य फलान्याह- भुक्तस्यादौ जलं पीतं कार्श्यमन्दाग्निदोषकृत् । मध्येऽग्निदीपनं श्रेष्ठमन्ते स्थौल्यकफप्रदम् ।।१५८।। भोजन के आरम्भ, मध्य अथवा अन्त में जल पीने का फल - भोजन के आरम्भ में जल पीने से कृशता तथा अग्नि की मन्दता दोष हो जाते हैं, मध्य में पीने से अग्नि का दीपन होने से उत्तम होता है और अन्त में पीने से शरीर की स्थूलता तथा कफ की वृद्धि होती है ॥१५८॥ अन्यच्च वाग्भटे- समस्थूलकृशा भुक्तमध्यान्तप्रथमाम्बुपाः ।।१५९।। इस विषय में 'वाग्भट का मत है कि - भोजन के मध्य, अन्त और आदि में जल पान करने वाले मनुष्यों का शरीर क्रम से सम, स्थूल तथा कृश होता है अर्थात् भोजन के मध्य में जलपान करने से शरीर सम (न स्थूल और न कृश), अन्त में करने से स्थूल तथा आदि में करने से कृश होता है ॥१५९॥ ❖ भुक्तं=भोजनम् ।।१५८-१५९।। पूर्वोक्त दोनों श्लोकों में 'भुक्त' से 'भोजन' अर्थ समझना चाहिये ॥१५८-१५९॥ अथ तृषितक्षुधितयोः क्रमेण भोजनजलपानयोः सहेतुकं निषेधमाह- तृषितस्तु न चाश्नीयात्क्षुधितो न पिबेज्जलम् । तृषितस्तु भवेद्गुल्मी क्षुधितस्तु जलोदरी ।। प्यासे के लिये भोजन और भूखे के लिये जलपान का निषेध - जो मनुष्य प्यासा हो, वह उसी समय भोजन न करे तथा जो भूखा हो वह उसी समय जलपान न करे क्योंकि भोजन करने से प्यासे को गुल्म तथा जलपान करने से भूखे को जलोदर रोग हो जाता है ।।१६०।। अथ भोजनस्यादौ मध्येऽन्ते च मधुरादिपदार्थानां भोजनविधिं वर्णयन् भोजनान्ते दुग्धपानविधिं सोपपत्तिकमाह- ननु शिष्टा भोजनान्ते दुग्धं पिबन्ति तत्कथमुचितम् ? यतस्त्रिधा विभक्तस्य भोजनकालस्य प्रथमो भागो वातस्य, द्वितीयः पित्तस्य, तृतीयः कफस्य । अत एवाह- अश्नीयात्तन्मना भूत्वा पूर्वं तु मधुरं रसम् । मध्येऽम्ललवणौ पश्चात्कटुतिक्तकषायकान् ।।१६१।। भोजन के अन्त में दुग्धपान विधि - शिष्ट लोग जो भोजन के अन्त में दूध पीते हैं यह कैसे उचित हो सकता है ? क्योंकि - तीन भागों में विभक्त भोजन का प्रथम भाग वायु का, द्वितीय पित्त का और तृतीय कफ का है, अतः इन्हीं भागों में वायु आदि का प्रकोप काल होता है, अत एव कहा भी है कि - भोजन के समय तन्मनस्क होकर प्रथम मधुर, तदनन्तर मध्य में अम्ल तथा लवण रस युक्त पदार्थों का और सब के अन्त में कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त पदार्थों का भोजन करना चाहिये ॥१६१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३३ ❖ अस्यायसभिप्रायः- भोजने पूर्व भुक्तो मधुरो रसो बुभुक्षितस्य वातपित्तयोः शमकोभवति । भोजनमध्ये भुक्तावम्ललवणौ पित्ताशये च वह्निवृद्धिं कुरुतः । भोजनान्तसमये भुक्ताः कटुतिक्तकषायरसाः कफं शमयन्तीति ।। १६१।। पूर्वोक्त श्लोक का अभिप्राय यह है कि—भोजन करते समय यदि प्रथम-प्रथम मधुर रस खाया जाय तो वह बुभुक्षित पुरुष का वायु तथा पित्त का शमन करता है और भोजन के मध्य में यदि अम्ल तथा लवण रस खाया जाय तो वे पित्ताशय में अग्निकी वृद्धि करते हैं एवं भोजन के अन्त में कटु, तिक्त तथा कषाय रस खाया जाय तो वे कफ को शमन करते हैं ।।१६१।। १अतो भोजनावसानसमयस्य कफकालत्वात् तत्र कथं श्लेष्मजनकं दुग्धं पातुमुचितं भवति ।। यत उक्तम्- दुग्धं स्वादुरसं स्निग्धमोजस्यं धातुवर्धनम् । वातपित्तहरं वृष्यं श्लेष्मलं गुरु शीतलम् । इति ।। १६२ ।। अतः भोजनान्त में कफ का समय होने से कफ को उत्पन्न करनेवाला दूध पीना कैसे उचित हो सकता है, क्योंकि कहा भी है कि—दूध स्वादु (मधुर) रस युक्त, स्निग्ध, भोज को उत्पन्न करने वाला, धातुवर्धक, वात और पित्त का हरण करने वाला, वृष्य (वीर्य वर्धक) कफकारी, गुरु और शीतल होता है ।। १६२।। उच्यते- विदाहीन्यन्नपानानि यानि भुंक्ते हि मानवः । तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं भोजनान्ते पयः पिबेत् ।। १६३ ।। मनुष्य जो कुछ दाह पैदा करने वाला अन्न पान रूपी भोज्य पदार्थ खाता है उनसे उत्पन्न होने वाले दाह की शान्ति के लिये भोजन के अन्त में दूध पीवे ।। १६३ ।। तथा च ब्रह्मपुराणे—कुर्यात्क्षीरान्तमाहारं न दध्यन्तं कदाचन । इति । लवणाम्लकटूष्णानि विदाहीन्यत्ति यानि तु । तद्दोषं हर्तुमाहारं मधुरेण समापयेत् ।। १६४।। 'ब्रह्मपुराण' में भी कहा है कि—दूध पीकर ही भोजन की समाप्ति करनी चाहिये न कि दही खाकर । क्योंकि दाहोत्पादक लवण, अम्ल, कटु तथा उष्ण पदार्थ जो मनुष्य खाता है, उस के दाहकता रूप दोष को दूर करने के लिये मधुर रस युक्त पदार्थों को खाकर ही भोजन की समाप्ति करे ।।१६४।। भोजनावसानसमये दुग्धादिमधुरभोजनेनैव वर्धितः कफो लवणाम्लकटुभोजनजनितपित्तस्य वृद्धिं विनाशयति पित्तवृद्धिविनाशनेन कफस्यापि वृद्धिस्तु क्षीणा भवति । क्षीणाकफवृद्धिरग्निमांद्यादीन् व्याधीनुत्पादयितुं न शक्नोति ।। १६४ ।। भोजन के अन्त में दूध आदि मधुर पदार्थों के भोजन करने से बढ़ा हुआ कफ लवण, अम्ल और कटु पदार्थों के भोजन करने से उत्पन्न हुई पित्त की वृद्धि को दूर करता है और पित्त की वृद्धि का नाश करने से कफ की वृद्धि भी क्षीण हो जाती है । अत एव क्षीण हुई कफ की वृद्धि भी अग्निमान्द्यता आदि रोगों को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होती ।। १६४ ।। ननु शत्रोर्नाशनेन शत्रुहन्तुर्वृद्धिर्दृश्यते न तु क्षीणता, तत् कथं कफः क्षीयत इति२ । उच्यते-बलवच्छत्रुविनाशनेन शत्रुहन्तुः क्षीणता च दृश्यते । १. 'अथे'ति पा. । २. 'क्षीण' इति पा. ।

१३४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथा च- नाशनात्प्रत्यनीकस्य स्वयं च क्षीयते यथा। वह्निसन्तप्तलोहस्य तप्ततां नाशयेज्जलम् ।।१६५।। अब प्रश्न यह उठता है कि लोक में शत्रु का नाश करने से शत्रु के नाश करने वाले की वृद्धि ही दिखलाई पड़ती है न कि क्षीणता, तब फिर किस प्रकार कफ की क्षीणता हुई अर्थात् वृद्धि प्राप्त हुआ कफ पित्त का नाश करके क्यों क्षीण हुआ ? इसका उत्तर यह है कि-लोक में भी बलवान् शत्रु के नाश करने से शत्रु को नाश करने वाले की क्षीणता दिखलाई पड़ती है जैसे कि जल अग्नि से तपे हुए लोहे की गर्माहट को नष्ट करके स्वयं को क्षय को प्राप्त हो जाता है अर्थात् अपनी शीतलता रूपी शक्ति से रहित तथा छन-छन करके जल जाने से कम वजन का हो जाता है वैसे ही प्रतिपक्षी पित्त का नाश करने से स्वयं कफ भी क्षीण हो जाता हैं ।।१६५।। ननु भोजनावसानसमये प्रयुक्ताः कटुतिक्तकषायरसाः१ कफं शमयिष्यन्ति वातस्य वृद्धिं विधास्यन्तीति चेत्, तन्न । कट्वादीनां क्षीणशक्तित्वात् । तथा च- यदेकं नाशयेद्दोषं तदन्यं वर्धयेत्कुतः । नाशने ह्येकदोषस्य यतस्तत्क्षीणशक्तिकम् । इति ।।१६६।। यहाँ यदि ऐसा कहें कि-भोजन के अन्त में खाया हुआ कटु, तिक्त और कषाय रस कफ का शमन करके वायु की वृद्धि अवश्य करेंगे तो वह ठीक नहीं, क्योंकि कटु, तिक्त और कषाय रस कफ के नाश करने पर क्षीणशक्ति हो जाने से वायु की वृद्धि करने में असमर्थ हो जाते हैं। अतः कहा भी है कि-जो एक दोष को नाश करता है वह दूसरे दोष को कैसे बढ़ा सकता है, क्योंकि एक दोष नाश करने में ही उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। अत एव कट्वादि रस वायु की वृद्धि नहीं कर सकते ।।१६६।। वस्तुतो य एव रसः प्राचुर्येण भुक्तस्तस्यैव सर्वे रसा वशा भवन्ति ।। यत आह सुश्रुतः- जग्धाः सर्वेऽपि गच्छन्ति बलिनो वश्यतां रसाः । यथा प्रकुपिता दोषा वशं यान्ति बलीयसः ।।१६७।। वस्तुतः सच्ची बात तो यह है कि जो रस अधिक मात्रा में खाया जाता है उसी रस के अधीन शेष सभी रस होते हैं, अतः सुश्रुत ने भी कहा है कि-जिस प्रकार प्रकुपित सम्पूर्ण दोष अधिक बलवान् दोष के अधीन हो जाते हैं, उसी प्रकार खाये हुए पदार्थों के सभी रस भी खाये हुये बलवान् रस के वश हो जाते हैं ।।१६७।। ❖ बलिनः=रसस्य । बलीयसः=दोषस्य ।।१६७।। 'बलिनः' से 'बलवान् रस का' तथा 'बलीयसः' से 'अधिक बलवान् दोष का' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ।।१६७।। अथाचमनविधिमाह- एवं भुक्त्वा समाक्षामे२ रूक्षग्रहणपूर्वकम् । भोजने दन्तलग्नानि निर्हृत्याचमनं चरेत् ।।१६८।। दन्तान्तरगतं चान्नं शोधनेनाहरेच्छनैः । कुर्यादनिर्हृतं तद्धि मुखस्यानिष्टगन्धताम् ।।१६९।। दन्तलग्नमनिहार्यं लेपं मन्येत दन्तवत् । न तत्र बहुशः कुर्याद्यत्नं निर्हरणं प्रति ।।१७०।। भोजनोपरान्त आचमन विधि-पूर्वोक्त नियम से भोजन करने के बाद पापड़ आदि का भोजन करके उससे मुख शुद्ध कर अथवा (मतान्तर से) भोजनोपरान्त नमक, मयदा आदि रूक्ष पदार्थों से हाथ मल कर कुल्ला करके आचमन करे, और दाँत में लगे हुये अन्नादि को खरका (तिनका) से निकाल कर पुनः आचमन करे और दाँतों के भीतर जो अन्न लगे हुये हों, उन्हें धीरे धीरे शोधन (खरिका से) सफा करे क्योंकि दाँत सफा न करने से मुख की दुर्गन्धता बनी रहती १. 'कटुतिक्तकषाया रसाः' इति पा. । २. 'च्यूषे'ति पा. ।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३५ है। दाँतों में लगी हुई जो वस्तुयें निकालने पर भी न निकले अर्थात् अनिर्हार्य हों उन्हें बाहर निकालने के लिये विशेष यत्न नहीं करना चाहिये किन्तु उन्हें दाँत की भाँति ही लगा हुआ समझकर छोड़ दें ॥१६८-१७०॥ आचम्य जलयुक्ताभ्यां पाणिभ्यां चक्षुषी स्पृशेत् ॥१७१॥ (१भुक्तवा पाणितलं घृष्ट्वा चक्षुषोर्यदि दीयते। अचिरेणैव तद्वारि तिमिराणि व्यपोहति ।।) भोजनोपरान्त आचमन करके जल लगे हुये दोनों हाथों से दोनों नेत्रों का स्पर्श करना चाहिये। भोजन के बाद यदि हथेलियों को परस्पर रगड़ कर दोनों नेत्रों में लगावे तो हाथ में लगे हुये उसी जल के लगने से नेत्रगत तिमिरादि रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं ॥१७१॥ अथ भोजनान्तरक्रियामाह- भुक्त्वा च संस्मरेन्नित्यमगस्त्यादीन्सुखावहान् ।।१७२।। विष्णुरात्मा तथैवान्नं परिणामश्च वै यथा। सत्येन तेन मद्‌भुक्तं जीर्यत्वन्नमिदं तथा ।।१७३।। अगस्तिरग्निर्वडवानलश्च भुक्तं ममान्नं जरयन्त्वशेषम् ।। सुखं च मे तत्परिणामसम्भवं यच्छन्त्वरोगं मम 'चास्तु' देहम् ।। १७४।। अङ्गारकमगस्तिं च पावकं सूर्यमश्विनौ। पञ्चैतान्संस्मरेन्नित्यं भुक्तं तस्याशु जीर्यति ।।१७५।। भोजनोपरान्त कर्म- भोजनोपरान्त अगस्त्यादि मुनियों के (१७३-७४) श्लोकों से स्मरण करना चाहिये। इन श्लोकों के अर्थ ये हैं: - जैसे अनायास हमारी आत्मा विष्णु है। उसी सत्यस्वरूप विष्णु के द्वारा हमारा खाया हुआ यह अन्न पच जाय। अगस्ति, अग्नि और वड़वानल ये सब मेरे खाये हुये अन्न को पूर्णरूप से पचावें तथा अन्न पचने से होने वाले सुखों को देवें और उन सबों की कृपा से हमारी देह रोगमुक्त हो। इस प्रकार मंगल, अगस्ति, अग्नि, सूर्य और अश्विनीकुमार इन पाँचों का जो कोई नित्य स्मरण करता है उसका खाया हुआ अन्न शीघ्र पच जाता है ॥१७२-१७५॥ इत्युच्चार्य स्वहस्तेन परिमार्ज्य तथोदरम्। अनायासप्रदायीनि कुर्यात्कर्माप्यतन्द्रितः ॥१७६।। इस प्रकार अगस्त्यादिकों का नामोच्चारण करके हाथों को उदर पर फेर कर अनायास (परिश्रम न मालूम पड़े ऐसे) कर्मों को अतन्द्रित होकर करे ॥१७६॥ ❖ अतन्द्रितः = निरन्तरं जाग्रत् तिष्ठेद् न तु स्वप्यात् । 'भुक्तमात्रस्य तु स्वप्नाद्धन्त्यग्निं कुपितः कफः' । इति वचनात् ।।१७६।। 'अतन्द्रितः' अर्थात् दिन में भोजन करके निरन्तर जागता हुआ स्थित रहे किन्तु सोवे नहीं। 'जो कोई भोजन करने के पश्चात् ही सो जाता है उसका कफ कुपित होकर उसके जठराग्नि को नष्ट कर देता है'। (अतः भोजनोत्तर तन्द्रा से शून्य होकर रहे) ॥१७६॥ अथ भोजनोपरि वातादीनां वृद्धिक्रममाह- जीर्णेऽन्ने वर्धते वायुर्विदग्धे पित्तमेधते। भुक्तमात्रे कफश्चापि क्रमोऽयं भोजनोपरि ।। १७७।। भोजनोपरान्त वातादि की वृद्धि - अन्न के परिपक्व होने पर वायु और विदग्ध होने पर पित्त बढ़ता है, भोजन कर चुकने के बाद आरम्भ में ऐसा क्रम है ॥१७७॥ विदग्धे = किञ्चित्पक्वे किञ्चिदपक्वे ।। १७७।। 'विदग्ध' का 'कुछ पका और कुछ नहीं पका हुआ' अर्थ समझना चाहिये ॥१७७॥ १. कोष्ठस्थापाठः क्वाचित्कः ।

१३६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ भुक्तमात्रे सञ्जातस्य कफस्य प्रतीकारमाह- धूमेनापोह्य हृद्यैर्वा कषायकटुतिक्तकैः । पूगैः कर्पूरकस्तूरीलवंगसुमनः फलैः ।। १७८ ।। फलैः कटुकषायैर्वा मुखवैशद्यकारिभिः । ताम्बूलपत्रसहितैः सुगन्धैर्वा विचक्षणः ।। १७९ ।। भोजनोपरान्त कफ वृद्धिका प्रतीकार—भोजनोपरान्त धूम के द्वारा अथवा हृदय को प्रिय लगने वाले कषाय, कटु और तिक्त रस युक्त सुपारी, कपूर, कस्तूरी लवंग और जायफल खाने से अथवा मुख को शुद्ध करने वाले कटु तथा कषाय रसयुक्त इलायची, हर्रें आदि खाने से किंवा पान सहित सुगन्धित पदार्थों के खाने से सञ्चित कफ को दूर करे ।। १७८-१७९ ।। ❖ धूमेन=अगुर्वादिधूमेन, अपोह्य=कफं दूरीकृत्य, कषायकटुतिक्तकैः फलैः = कर्पूरकस्तूरीलवंगादिभिः, पूगैः=क्रमुकैः । सुमनःफलैः=जातीफलैः, (कटु¹ कषायैः)=एलाहरीतक्यादिफलैः ।। 'धूमेन'='अगर आदि के धूम से' 'अपोह्य'=संचित कफ को दूर करे, कषायकटुतिक्तकैः=कषाय, कटु और तिक्त रस युक्त कपूर, कस्तूरी, लौंग आदि फलों से, पूगैः=सुपारी से, सुमनः फलैः=जायफल से और 'कटुकषायैः' 'कटु और कषाय रससे युक्त इलायची, हर्रें आदि फलों से ऐसा अर्थ करना चाहिये ।। १७८-१७९ ।। अथ ताम्बूलभक्षणसमयमाह- रतौ सुप्तोत्थिते स्नाते भुक्तेवान्ते च संगरे । सभायां विदुषां राज्ञां कुर्यात्ताम्बूलचर्वणम् ।। १८० ।। पान खाने का समय—रति करने के समय, सो के उठने पर, वमन करने पर, युद्ध में तथा पण्डित और राजाओं की सभा में पान खाना चाहिये ।। १८० ।। ताम्बूलमुक्तं तीक्ष्णोष्णं रोचनं तुवरं सरम् । तिक्तं क्षारोषणं कामरक्तपित्तकरं लघु ।। १८१ ।। वश्यं श्लेष्मास्यदौर्गन्ध्यमलवातश्रमापहम् । मुखवैशद्यसौगन्ध्यकान्तिसौष्ठवकारकम् ।। १८२ ।। हनुदन्तमलध्वंसि जिह्वेन्द्रियविशोधनम् । मुखप्रसेकशमनं गलामयविनाशनम् ।। १८३ ।। पान के गुण—पान तीक्ष्ण और उष्णवीर्य वाला, रुचिकारक, सारक (दस्तावर), तुवर (कसैला), तिक्त, क्षार और कटु रस से युक्त, कामोद्दीपक, रक्तपित्तवर्धक, हलका, लोगों को वश में करने वाला, कफ मुख की दुर्गन्धि, मल, वायु तथा श्रम इन सबों को दूर करने वाला, मुख की स्वच्छता तथा सुगन्धित करने वाला, शरीर की कान्ति तथा सुन्दरता को बढ़ानेवाला, हनु तथा दाँतों के मल को दूर करनेवाला, जिह्वेन्द्रिय की शुद्धि करनेवाला, मुख से लार्रों को गिरने से रोकने वाला और गले के समस्त रोगों को नष्ट करनेवाला है ।। १८१-१८३ ।। अथ नवीनताम्बूलगुणानाह- नवं तदेव मधुरं कषायानुरसं गुरु । बलासजननं प्रायः पत्रशाकगुणं स्मृतम् ।। १८४ ।। नवीन पान के गुण—नया पान कसैला रस लिये हुए मधुर रसयुक्त पचने में भारी और कफ-जनक होता है । नया पान प्रायः करके पत्ते के शाक के समान गुणों से युक्त होता है ।। १८४ ।। अथ बङ्गदेशोद्भवताम्बूलगुणानाह- बङ्गदेशोद्भवं पर्णं परं कटुरसं सरम् । पाचनं पित्तजनकमूष्णं कफहरं स्मृतम् ।। १८५ ।। १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १३७ बङ्गाल में उत्पन्न होने वाले पान के गुण—बंगला पान अत्यन्त कटु रस से युक्त, सर (दस्ताबर), पाचक, पित्तजनक, उष्ण तथा कफ को दूर करने वाला होता है ॥१८४॥ अथ पुराणताम्बूलगुणानाह- पर्णं पुराणमकटु क्षुल्लकं तनु पाण्डुरम्। विशेषाद्गुणवद्द्वेद्यमन्वद्धीनगुणं स्मृतम्॥१८६॥ पुराने पान के गुण—पुराना पान अकटु (थोड़े कटु रस युक्त), छोटा, पतला, पाण्डु वर्ण (थोड़ी पिलाई लिये हुये श्वेतवर्ण) होता है तथा पुराना पान विशेष गुणों से युक्त होता है और दूसरा अर्थात् नया पान इसकी अपेक्षा कम गुणवाला होता है ॥१८६॥ अथ पूगीफलगुणानाह- पूगं गुरु हिमं रूक्षं कषायं कफपित्तनुत्। मोहनं दीपनं रुच्यमास्यवैरस्यनाशनम्॥१८७॥ पूगं स्यात् दृढमध्यं यत्स्विन्नं वाऽपि त्रिदोषनुत्। सरसङ्गुर्वभिष्यन्दितद् भृशं वह्निनाशनम्॥१८८॥ सुपारी के गुण—सुपारी गुरु (पचने में भारी) शीत-वीर्य, रूक्ष, कषाय, रसयुक्त, कफ और पित्त का नाशक, मोहजनक, अग्निदीपक, रुचिवर्धक और मुख की विरसता को दूर करने वाली होती है। जिस सुपारी का मध्य भाग कठिन हो अथवा जो उबाल कर बनाई गई (चिकनी सुपारी) हो वह त्रिदोष दूर करने वाली होती है। रस से युक्त नवीन सुपारी, भारी, अभिष्यन्दि (कफकारक) एवं अत्यन्त अग्निनाशक होती है ॥१८७-१८८॥ अथ खदिरसुधाताम्बूलगुणानाह- खदिरः कफपित्तघ्नश्चूर्ण वातबलांसनुत्। संयोगस्त्रिदोषघ्नं सौमनस्यं करोति च॥१८९॥ मुखवैशद्यसौगन्ध्यकान्तिसौष्ठवकारकम्। प्रभाते पूगमधिकं मध्याह्ने खदिरं तथा॥ निशासु चूर्णमधिकं ताम्बूलं भक्षयेत्सदा॥१९०॥ खैर, चूना युक्त पान के गुण—खैर-कफ-पित्त का और चूना-वायु-कफ का नाशक है अत एव दोनों पान के साथ संयुक्त होकर त्रिदोष को दूर करने वाले होते हैं तथा चित्त की प्रसन्नता, मुख की स्वच्छता तथा सुगन्धि एवं शरीर में कान्ति और सुन्दरता को उत्पन्न करने वाले होते हैं। प्रातः काल अधिक सुपारी, दोपहर को अधिक खैर एवं रात्रि में अधिक चूना मिला हुआ पान खाना चाहिये ॥१८९-१९०॥ अथ ताम्बूलपर्णाग्रमध्यादिभागापरित्यागे दोषानाह- आयुराग्रे यशो मूले लक्ष्मीर्मध्ये व्यवस्थिता। तस्मादग्रं तथा मूलं मध्यं पर्णस्य वर्जयेत्॥१९१॥ पर्णमूले भवेद्व्याधिः पर्णाग्रे पापसम्भवः। पर्णमध्यं हरत्यायुः शिरा बुद्धिविनाशिनी ॥१९२॥ पान के अग्र तथा मध्य भागों के परित्याग न करने से दोष—पान के पत्ते के अग्रभाग में आयु, मूल, (डण्ठल) में यश, एवं मध्य में लक्ष्मी रहती हैं। अत एव पान का अग्र, मूल तथा मध्य भाग को