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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

अथ नवनीतवर्गः तत्र नवनीतस्य नामगुणानाह म्रक्षणं सरजं हैयङ्गवीनं नवनीतकम्। नवनीतं हितं गव्यं वृष्यं वर्णबलाग्निकृत् ।।१।। संग्राहि वातपित्तासृक्क्षयार्शोऽर्दितकासहृत्। तद्धितं बालके वृद्धे विशेषादमृतं शिशोः ।।२।। मक्खन के संस्कृत नाम-म्रक्षण, सरज, हैयङ्गवीन तथा नवनीतक ये सब हैं। गाय का मक्खन-हितकर, वीर्यवर्धक, वर्ण को उत्तम करने वाला, बल तथा अग्नि को बढ़ाने वाला, मलसंग्राही, एवम् वात, पित्त, रक्तविकार, क्षय, अर्श, अर्दित वात तथा कास को दूर करने वाला होता है। तथा यह-बालक और वृद्ध के लिये हितकर एवम् विशेषकर के शिशु (अत्यन्त छोटे बच्चों) के लिये अमृत के समान गुणकारी होता है। [१-२] अथ माहिषनवनीतस्य गुणानाह नवनीतं महिष्यास्तु वातश्लेष्मकरं गुरु। दाहपित्तश्रमहरं मेदःशुक्रविवर्द्धनम् ।।३।। भैंस का मक्खन-वात तथा कफ कारक, गुरु एवम् दाह, पित्त तथा श्रम को दूर करने वाला और मेद तथा शुक्र की वृद्धि करने वाला होता है। [३] अथ दुग्धोत्थनवनीतस्य गुणानाह दुग्धोत्थं नवनीतं तु चक्षुष्यं रक्तपित्तनुत्। वृष्यं बल्यमतिस्निग्धं मधुरं ग्राहि शीतलम् ।।४।। दूध से निकला हुआ मक्खन-नेत्रों के लिये हितकर, रक्तपित्तनाशक, वीर्यवर्धक, बलकारक, अत्यन्त स्निग्ध, मधुर रसयुक्त, ग्राही तथा शीतल होता है। [४] अथ सद्योनिःसारितनवनीतस्य गुणानाह नवनीतं तु सद्यस्कं स्वादु ग्राहि हिमं लघु। मेध्यं किञ्चित्कषायाम्लमीषत्तक्रांशसङ्क्रमात् ।।५।। तत्काल का निकाला हुआ मक्खन-स्वादिष्ट, ग्राही, शीतल, लघु, मेधा के लिये हितकर एवम् किञ्चित् तक्र का अंश मिला रहने से किञ्चित् कषाय तथा अम्ल रस से युक्त भी होता है। [५] अथ चिरन्तननवनीतस्य गुणानाह सक्षारकटुकाम्लत्वाच्छर्द्यर्शःकुष्ठकारकम् । श्लेष्मलं गुरु मेदस्यं नवनीतं चिरन्तनम् ।।६।। पुराना मक्खन-क्षार, कटु तथा अम्ल रस युक्त होने से वमन, अर्श तथा कुष्ठ को उत्पन्न करने वाला होता है एवम् कफजनक, गुरु तथा मेद को बढ़ाने वाला होता है। [६] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे नवनीतवर्गः समाप्तः।

अथ घृतवर्गः तत्र घृतस्य नामगुणानाह घृतमाज्यं हविः सर्पिः कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । घृतं रसायनं स्वादु चक्षुष्यं वह्निदीपनम् ।।१।। शीतवीर्यं विषालक्ष्मीपापपित्तानिलापहम् । अल्पाभिष्यन्दि कान्त्योजस्तेजोलावण्यवृद्धिकृत् ।।२।। स्वरस्मृतिकरं मेध्यमायुष्यं बलकृद्गुरु । उदावर्त्तज्वरोन्मादशूलानाहव्रणान् हरेत् । स्निग्धं कफकरं रक्षःक्षयवीसर्परक्तनुत् ।।३।। घी के संस्कृत नाम-घृत, आज्य, हविस् तथा सर्पिस् ये सब हैं। घी-रसायन, स्वादिष्ट, नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, शीतवीर्य, किंचित् अभिष्यन्दौ, क्रान्ति, ओज, तेज और लावण्य की वृद्धि करने वाला, स्वर को स्वच्छ करने वाला तथा स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला, मेधा (धारणाशक्ति) के लिये हितकर, आयु को बढ़ाने वाला, बलकारक, गुरु, स्निग्ध, कफकारक, एवम् विष, अलक्ष्मी (दरिद्रता), पाप, पित्त, वायु, उदावर्त्त, ज्वर, उन्माद, शूल, आनाह (अफारा), व्रण, रक्षोग्रह, क्षय, वीसर्प तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [१-३] अथ गव्यघृतस्य गुणानाह गव्यं घृतं विशेषेण चक्षुष्यं वृष्यमग्निकृत् । स्वादुपाककरं शीतं वातपित्तकफापहम् ।।४।। मेधालावण्यकान्त्योजस्तेजोवृद्धिकरं परम् । अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं वयसः स्थापकं गुरु ।।५।। बल्यं पवित्रमायुष्यं सुमङ्गल्यं रसायनम् । सुगन्धि रोचनं चारु सर्वाज्येषु गुणाधिकम् ।।६।। गाय का घी-विशेष करके नेत्रों के लिये हितकर, वीर्यवर्धक, अग्निवर्धक, विपाक में मधुररसयुक्त, शीतल, वात पित्त तथा कफ को नष्ट करने वाला एवम् मेधाशक्ति, लावण्य, कान्ति, ओज तथा तेज की अत्यन्त वृद्धि करने वाला, अलक्ष्मी, पाप तथा रक्षोग्रह को दूर करने वाला, अवस्था को स्थिर रखने वाला, गुरु, बलकारक, पवित्र, आयु को बढ़ाने वाला, मङ्गलदायक, रसायन, सुगन्धयुक्त, रोचक एवम् सम्पूर्ण घृतों में उत्तम तथा अधिक गुणकारी होता है। [४-६] अथ माहिषघृतस्य गुणानाह माहिषन्तु घृतं स्वादु पित्तरक्तानिलापहम् । शीतलं श्लेष्मलं वृष्यं गुरु स्वादु विपच्यते ।।७।। भैंस का घी-स्वादिष्ट, शीतल, कफजनक, वीर्यवर्धक, गुरु, विपाक में मधुर रसयुक्त एवम् पित्त और रक्त विकार तथा वात को नष्ट करने वाला होता है। [७] अथाजघृतस्य गुणानाह आजमाज्यं करोत्यग्निं चक्षुष्यं बलवर्द्धनम् । कासे श्वासे क्षये चापि हितं पाके भवेत् कटु ।।८।। बकरी का घी-जठराग्निकारक, नेत्रों के लिये हितकर, बलवर्धक, कास, श्वास तथा क्षय रोग में हितकर एवम् विपाक में कटुरसयुक्त होता है। [८] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

घृतवर्गः ९२३ अथौष्ट्रघृतस्य गुणानाह औष्ट्रं कटु घृतं पाके शोषक्रिमिविषापहम्। दीपनं कफवातघ्नं कुष्ठगुल्मोदरापहम्।।९।। ऊँटिनी का घी—विपाक में कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, कफ-वात नाशक एवम् शोष, क्रिमि, विष, कुष्ठ, गुल्म तथा उदररोग को नष्ट करने वाला होता है। [९] अथाविकघृतस्य गुणानाह पाके लघ्वाविकं सर्पिः सर्वरोगविनाशनम् ।।१०।। वृद्धिं करोति चास्थ्नां वा अश्मरीशर्कराऽपहम्। चक्षुष्यमग्निसंधुक्ष्यं वातदोषनिवारणम् ।।११।। भेंड़ी का घी—पाक में लघु, सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला, हड्डियों की वृद्धि करने वाला, नेत्रों के लिए हितकर, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला एवम् पथरी, शर्करा तथा वात सम्बन्धी दोषों को दूर करने वाला होता है। [१०-११] अथ नारीघृतस्य गुणानाह कफेऽनिले योनिदोषे पित्ते रक्ते च तद्धितम्। चक्षुष्यमाज्यं स्त्रीणां वा सर्पिः स्यादाभृतोपमम् ।।१२।। स्त्री का घी—अमृत के समान होता है तथा यह नेत्रों के लिये हितकर, एवम् कफ, वात, योनिदोष, पित्त तथा रक्तविकार में भी हितकर होता है। [१२] अथ वडवाघृतस्य गुणानाह वृद्धि करोति देहाग्नेर्लघु पाके विषापहम्। तर्पणं नेत्ररोगघ्नं दाहनुद् वडवाघृतम् ।।१३।। घोड़ी का घी—देह तथा अग्नि की वृद्धि करने वाला, पाक में लघु, विषनाशक, तृप्तिकारक, नेत्ररोगनाशक तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [१३] अथ दुग्धनिःसृतघृतस्य गुणानाह घृतं दुग्धभवं ग्राहि शीतलं नेत्ररोगहृत्। निहन्ति पित्तदाहास्रमदमूर्च्छाभ्रमानिलान् ।।१४।। दूध से निकाला हुआ घी—ग्राही, शीतल, नेत्ररोगनाशक एवम्—पित्त, दाह, रक्तविकार, मद, मूर्च्छा, भ्रम तथा वात को दूर करने वाला होता है। [१४] अथ ह्यस्तनदुग्धोत्थघृतस्य गुणानाह हविर्ह्यस्तनदुग्धोत्थं तत्स्याद्धैयङ्गवीनकम्। हैयङ्गवीनं चक्षुष्यं दीपनं रुचिकृत्परम्। बलकृद् बृंहणं वृष्यं विशेषाज्ज्वरनाशनम् ।।१५।। एक दिन के पहले के दूध से निकाले हुए घी को संस्कृत में "हैयङ्गवीन" कहते हैं। हैयङ्गवीन—यह नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, अत्यन्त रुचिकारक, बलवर्धक, बृंहण (रसरक्तादिवर्धक), वीर्यवर्धक तथा विशेष करके ज्वरनाशक होता है। [१५] अथ पुराणघृतस्य गुणानाह वर्षादूर्ध्वं भवेदाज्यं पुराणं तत् त्रिदोषनुत् । मूर्च्छाकुष्ठविषोन्मादापस्मारतिमिरापहम् ।।१६।। यथा यथाऽखिलं सर्पिः पुराणमधिकं भवेत्तत् । तथा तथा गुणैः स्वैः स्वैरधिकं तदुदाहृतम् ।।१७।।

९२४ भावप्रकाशनिघण्टुः पुराना घी—एक वर्ष से ऊपर का रक्खा हुआ घी पुराना कहलाता है । पुराना घी—त्रिदोषनाशक एवम्, मूर्च्छा, कुष्ठ, विष, उन्माद, मिर्गी तथा तिमिर रोग को दूर करने वाला होता है । पूर्वोक्त सभी घृत—जैसे-जैसे अधिक पुराने होते जायेंगे वैसे-वैसे अपने-अपने गुणों को अधिक करते जायेंगे अर्थात् उत्तरोत्तर अधिक गुणकारी होते जायेंगे । [१६-१७] अथ नवीनघृतस्य विषयानाह योजयेन्नवमे वाज्यं भोजने तर्पणे श्रमे । बलक्षये पाण्डुरोगे कामलानेत्ररोगयोः ।। १८ ।। नवीन घी के प्रयोग करने के विषय—भोजन, तर्पण, परिश्रम, बल का क्षय, पाण्डु, कामला तथा नेत्ररोग इन सबों में नवीन घृत का ही प्रयोग करना चाहिये । [१८] अथ घृतप्रयोगस्याविषयानाह राजयक्ष्मणि बाले च वृद्धे श्लेष्मकृते गदे ।। १९ ।। रोगे सोमे विषूच्याञ्च विबन्धे च मदात्यये । ज्वरे च दहने मन्दे न सर्पिर्बहु मन्यते ।। २० ।। घी प्रयोग करने के अविषय—बालक तथा वृद्ध लोगों के लिये, एवम् राजयक्ष्मा, कफजन्यरोग, आमयुक्त रोग, विषूचिका (हैजा), मलबन्ध, मदात्ययं, ज्वर तथा अग्नि की मन्दता इन सबों में घी देना अत्यन्त प्रशस्त नहीं है। [१९-२०] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे घृतवर्गः समाप्तः ।।

अथ मूत्रवर्गः तत्र गोमूत्रगुणानाह गोमूत्रं कटु तीक्ष्णोष्णं क्षारं तिक्तकषायकम्। लघ्वग्निदीपनं मेध्यं पित्तकृत्कफवातहृत् ।।१।। शूलगुल्मोदरानाहकण्ड्वक्षिमुखरोगजित् । किलासगदवातामवस्तिरुक्कुष्ठनाशनम् ।। कासवासापहं शोथकामलापाण्डुरोगहृत् ।।२।। कण्डूकिलासगदशूलमुखाक्षिरोगान्गुल्मातिसारमरुदामयमूत्ररोधान् । कासं सकुष्ठजठरक्रिमिपाण्डुरोगानगोमूत्रमेकमपि पीतमपाकरोति ।।३।। सर्वेष्वपि च मूत्रेष्ु गोमूत्रं गुणतोऽधिकम् । अतोऽविशेषात्कथने मूत्रं गोमूत्रमुच्यते ।।४।। प्लीहोदरश्वासकासशोथवर्चोग्रहापहम् ।।५।। शूलगुल्मरुजाऽऽनाहकामलापाण्डुरोगहृत् । कषायं तिक्ततीक्ष्णं च पूरणात्कर्णशूलहृत् ।।६।। गोमूत्र-कटु-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, क्षार, लघु, अग्निदीपक, मेधा के लिये हितकर, पित्तकारक, कफ तथा वातनाशक एवम् शूल, गुल्म, उदररोग, आनाह (अफारा), खुजली, नेत्र तथा मुखसम्बन्धी रोग, किलास रोग (कुष्ठभेद), वात, आम, बस्तिसम्बन्धी रोग, कुष्ठ, कास, श्वास, शोथ, कामला तथा पाण्डुरोग को नष्ट करने वाला होता है। और केवल एक गोमूत्र पान करने से खुजली, किलास रोग, शूल, मुख तथा नेत्र सम्बन्धी रोग, गुल्म, अतिसार, वातरोग, मूत्ररोध, कास, कुष्ठ, उदररोग, क्रिमि तथा पाण्डुरोग ये सब दूर हो जाते हैं। और सम्पूर्ण मूत्रों में गोमूत्र ही सबसे अधिक गुणकारी होता है, अतः जहाँ पर सामान्य रूप से केवल "मूत्र" शब्द का प्रयोग आवे वहाँ पर "गोमूत्र" का ही बोध करना चाहिये। गोमूत्र-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, तीक्ष्ण गुण युक्त, कान में डालने से कर्णशूलनाशक एवम्-प्लीहा, उदररोग, श्वास, कास, शोथ, मलरोध, शूल, गुल्म, आनाह (अफारा), कामला तथा पाण्डु रोग को दूर करने वाला होता है। [१-६] अथ मनुष्यमूत्रगुणानाह नरमूत्रं गरं हन्ति सेवितं तद्रसायनम् । रक्तपामाहरं तीक्ष्णं सक्षारलवणं स्मृतम् ।।७।। मनुष्य का मूत्र-तीक्ष्ण, क्षार तथा लवण रसयुक्त, गरसंज्ञक विष, रक्तविकार तथा पामारोग नाशक होता है एवम् यह सेवन करने से रसायन है। [७] अथ मूत्रस्य सामान्यपरिभाषामाह गोऽजाऽविमहिषीणां तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते । खरोष्ट्रे भनराश्वानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम् ।।९।। मूत्रविषयक सामान्य परिभाषा-गाय, बकरी तथा भैंस इनमें स्त्री जाति का मूत्र उत्तम होता है तथा गदहा, ऊँट, हाथी, मनुष्य तथा घोड़ा इनमें पुरुष जाति का मूत्र हितकारक होता है अर्थात् जहाँ पर प्रयोग करना हो तो वहाँ पर उक्त मूत्रों का ही ग्रहण करना चाहिये। [९] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे मूत्रवर्गः समाप्तः ।।१८।।

अथ तैलवर्गः

तत्र तैलस्य स्वरूपं गुणं चाह

तिलादिस्निग्धवस्तूनां स्नेहस्तैलमुदाहृतम्। तत्तु वातहरं सर्वं विशेषात्तिलसम्भवम् ।।१।। तेल का स्वरूप—तिल आदि स्निग्ध (स्नेहयुक्त) वस्तुओं के स्नेह भाग को मुनि लोग “तैल” कहते हैं। तेल—सभी प्रकार के तेल यद्यपि वातनाशक होते हैं तथापि तिल का तेल विशेष रूप से वात को नष्ट करने वाला होता है। [१]

अथ तिलतैलगुणानाह

तिलतैलं गुरु स्थैर्यबलवर्णकरं सरम्। वृष्यं विकाशि विशदं मधुरं रसपाकयोः ।।२।। सूक्ष्मं कषायानुरसं तिक्तं वातकफापहम्। वीर्येणोष्णं हिमं स्पर्शे बृंहणं रक्तपित्तकृत् ।।३।। लेखनं बद्धविण्मूत्रं गर्भाशयविशोधनम्। दीपनं बुद्धिदं मेध्यं व्यवायि व्रणमेहनुत् ।।४।। श्रोत्रयोनिशिरःशूलनाशनं लघुताकरम्। त्वच्यं केश्यं च चक्षुष्यमभ्यङ्गे भोजनेऽन्यथा ।।५।। छिन्नभिन्नच्युतोत्पिष्टमथितक्षतपिच्चिते । भग्नस्फुटितविद्धाग्निदग्धविश्लिष्टदारिते ।।६।। तथाऽभिहतनिर्भुग्नमृगव्याघ्रादिविक्षते । वस्तौ पानेऽन्नसंस्कारे नस्ये कर्णाक्षिपूरणे ।। सेकाभ्यङ्गावगाहेषु तिलतैलं प्रशस्यते ।।७।। तिल का तेल—गुरु, स्थिरता तथा बल कारक, वर्ण को उत्तम करने वाला, सारक, वृष्य (वीर्यवर्धक), विकाशी, विशद, रस तथा पाक में मधुर, सूक्ष्म गुण युक्त, आरम्भ में तिक्तरसयुक्त पश्चात् कषाय रस युक्त, वात तथा कफ नाशक, उष्णवीर्य, स्पर्श में शीतल, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), रक्तपित्तकारक, लेखन, मल तथा मूत्र को बाँधने वाला, गर्भाशय का शोधन करने वाला, अग्निदीपक, बुद्धिदायक, मेधा के लिये हितकर, व्यवायि गुण युक्त, व्रण तथा मेह को दूर करने वाला, कान, योनि तथा शिर सम्बन्धी शूल नाशक, शरीर में लघुता करने वाला, अभ्यङ्ग (शरीर में मालिश) करने से त्वचा, केश तथा नेत्रों के लिये हितकर, किन्तु भोजन करने से अन्यथा होता है अर्थात् त्वचा, केश तथा नेत्र के लिये अहितकर होता है। एवम्—छिंदजाने, भिदजाने, गिरजाने, पिसजाने, मसलजाने, घाव हो जाने, पिचजाने, टूटजाने, फटजाने, बिधजाने, अग्नि से जलजाने, हड्डियों के अपने स्थान से हटजाने, चिरजाने, चोट लगजाने, किसी अंग के टेढ़े हो जाने तथा मृग या बाघ आदि से घायल हो जाने पर तिल का तेल हितकर होता है, एवम्—बस्तिकर्म, पीने तथा अन्न के संस्कार करने (छौंकने) में और नस्य (नास) लेने तथा कान व आँख में डालने में एवम् सेंकने, मर्दन तथा अवगाहन करने में तिल का तेल उत्तम होता है। [२-७] तिल—इसका अन्य विवरण धान्य वर्ग के (पृष्ठ ८०४) पर किया गया है।

ननु बृंहणलेखनयोः कथं सामानाधिकरण्यमित्याह

रूक्षादिदुष्टः पवनः स्रोतः संकोचयेद् यदा। रसोऽसम्यग्वहन् कार्श्यं कुर्याद्रक्तान्यवर्द्धनम् ।।८।। तेषु प्रवेष्टुं सरतासौक्ष्म्यस्निग्धत्वमार्दवैः। तैलं क्षमं रसं नेतुं कृशानां तेन बृंहणम् ।।९।। व्यवायिसूक्ष्मतक्ष्णोष्णसरत्वैर्भेदसः क्षयम्। शनैः प्रकरुते तैलं तेन लेखनमीरितम् ।।१०।। द्रुतं पुरीषं बध्नाति स्खलितं पत्प्रवर्त्तयेत्। ग्राहकं सारकञ्चापि तेन तैलमुदीरितम् ।।११।।

तैलवर्गः ९२७ यहाँ पर यह शङ्का होती है कि—परस्पर विरुद्ध धर्म वाले बृंहण तथा लेखन ये दोनों एक साथ तिल के तेल में कैसे रहते हैं ? इसी का उत्तर देते हुये कहते हैं कि—रूक्षादि पदार्थों के सेवन करने से जब वायु दुष्ट होकर स्रोतोमार्ग को संकुचित करता है तब रस भली-भाँति नहीं बहने पाता और उससे रक्त की भी वृद्धि नहीं होने पाती अतः उक्त रस शरीर में कृशता करने लगता है। ऐसी स्थिति में तिलतैल—उन संकुचित स्रोतों में अपने सरता, सूक्ष्मता, स्निग्धता तथा मृदुता इन सब गुणों के द्वारा प्रवेश करने के लिये तथा रसों को सर्वत्र यथास्थान पहुँचाने के लिये समर्थ होता है, इसी से कृश (दुर्बल) लोगों के लिये बृंहण (रस-रक्त-मांसादि का वर्धक) कहा गया है और व्यवायी, सूक्ष्म, तीक्ष्ण, उष्ण तथा सर इन सब गुणों से युक्त होने से इनके द्वारा मेदा का धीरे-धीरे क्षय करता है, अतः तिल का तेल “लेखन” कहा गया है। और पतले मल को बाँधता है तथा जो मल अपने स्थान से हट चुका है उसकी प्रवृत्ति कराता है अतः क्रम से तेल ग्राहक तथा सारक दोनों कहा गया है। [८-११] अथ घृततैलयोः परिभाषामाह घृतमब्दात्परं पक्वं हीनवीर्यं प्रजायते। तैलं पक्वमपक्वं वा चिरस्थायि गुणाधिकम् ।।१२।। घी तथा तेल की परिभाषा—एक वर्ष से अधिक पुराना होने पर पकाया हुआ घी हीनवीर्य हो जाता है किन्तु तेल चाहे पकाया हुआ हो अथवा कच्चा ही हो जैसे-जैसे पुराना होता जाता है वैसे-वैसे अधिक गुणकारी होता है। [१२] अथ सर्षपराजिका तैलयोगुणानाह दीपनं सार्षपं तैलं कटुपाकरसं लघु। लेखनं स्पर्शवीर्य्योष्णं तीक्ष्णं पित्तास्रदूषकम् ।।१३।। कफमेदोऽनिलार्शोघ्नं शिरःकर्णामयापहम्। कण्डूकुष्ठकृमिश्वित्रकोठदुष्टकृमिप्रणुत् ।।१४।। तद्वद्राजिकयोस्तैलं विशेषान्मूत्रकृच्छ्रकृत् ।।१५।। सरसों का तेल—अग्निदीपक, रस तथा विपाक में कटु रस युक्त, लघु, लेखन, स्पर्श तथा वीर्य में उष्ण, तीक्ष्ण, पित्त तथा रक्त को दूषित करने वाला एवम्-कफ, मेद, वायु, बवासीर, शिर तथा कान सम्बन्धी रोग, खुजली, कुष्ठ, कृमि, श्वेतकुष्ठ, कोठ तथा दुष्ट कृमि को नष्ट करने वाला होता है, इसी प्रकार से दोनों प्रकार के राई के तेल के भी गुण हैं—किन्तु विशेष कर उन दोनों के तेल मूत्रकृच्छ्र-कारक होते हैं। [१४-१५] ❖ राजिकयोः = कृष्णराजिकारक्तराजिकयोः ।।१५।। यहाँ पर मूल में “राजिकयोः” पद से “दोनों प्रकार की राई अर्थात् काली राई तथा लाल राई के” यह अर्थ समझना चाहिये। [१५] इनका अन्य विवरण धान्य वर्ग के पृष्ठ ८२९ पर किया गया है। अथ तुवरीतैलगुणानाह तीक्ष्णोष्णं तुवरीतैलं लघु ग्राहि कफास्रजित्। वह्निकृद्विषहृत्कण्डूकुष्ठकोठकृमिप्रणुत् ।। मेदोदोषापहं चापि व्रणशोथहरं परम् ।।१६।। तुवरी का तेल—तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, ग्राही, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाला, अग्निकारक, विषनाशक एवम्-खुजली, कुष्ठ, कोठ, कृमि तथा मेद सम्बन्धी दोष को नष्ट करने वाला, एवम् व्रण तथा शोथ को अत्यन्त दूर करने वाला होता है। [१६] इसका अन्य विवरण धान्य वर्ग के पृष्ठ ८०६ पर किया गया है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

९२८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथातसीतैलगुणानाह अतसीतैलमाग्नेयं स्निग्धोष्णं कफपित्तकृत्। कटुपाकमचक्षुष्यं बल्यं वातहरं गुरु ।।१७।। मलकृद्रसतः स्वादु ग्राहि त्वग्दोषहृद् घनम् ।।१८।। वस्तौ पाने तथाऽभ्यङ्गे नस्ये कर्णस्य पूरणे। अनुपानविधौ चापि प्रयोज्यं वातशान्तये ।।१९।। अलसी का तेल-आग्नेय (अग्नि के अधिक अंशों से युक्त), स्निग्ध उष्ण, कफ तथा पित्त कारक, विपाक में कटु रसयुक्त, नेत्रों के लिए अहितकर, बलकारक, वातनाशक, गुरु, मलकारक, मधुररसयुक्त, ग्राही, त्वचा गत दोष को दूर करने वाला और घन है और बस्तिकर्म पीने तथा मालिश करने में एवम् नस्य (नास) लेने तथा कान में डालने के लिये और वायु को शान्त करने के लिये अनुपान विधि में अलसी के तेल का प्रयोग करना चाहिये । [१७-१९] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ९२७ पर किया गया है । अथ कुसुम्भतैलगुणानाह कुसुम्भतैलमम्लं स्यादुष्णं गुरु विदाहि च। चक्षुर्भ्यामहितं बल्यं रक्तपित्तकफप्रदम् ।।२०।। कुसुम का तेल-अम्लरस युक्त, उष्ण, गुरु, विदाही, नेत्रों के लिये अहितकर, बलकारक एवम् रक्तपित्त तथा कफ कारक है । [२०] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ९२८ पर किया गया है । अथ खसबीज (पोस्त) तैलगुणानाह तैलं तु खसबीजानां बल्यं वृष्यं गुरु स्मृतम्। वातहृत्कफहृच्छीतं स्वादुपाकरसं च तत् ।।२१।। पोस्ता का तेल-बलकारक, वीर्यवर्धक, गुरु, वात तथा कफ नाशक, शीतल एवम् रस तथा विपाक में मधुर होता है । [२१] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ३३७ पर किया गया है । अथैरण्डतैलगुणानाह एरण्डतैलं तीक्ष्णोष्णं दीपनं पिच्छिलं गुरु। वृष्यं त्वच्यं वयःस्थापि मेधाकान्तिबलप्रदम् ।।२२।। कषायानुरसं सूक्ष्मं योनिशुक्रविशोधनम्। विस्रंस्वादु रसे पाके सतिक्तं कटुकं रसम् ।।२३।। विषमज्वरहृद्रोगपृष्ठगुह्यादिशूलनुत् । हन्ति वातोदरानाहगुल्माष्ठीलाकटिग्रहान् ।।२४।। वातशोणितविड्बन्धब्रध्नशोथामविद्रधीन् । आमवातगजेन्द्रस्य शरीरवनचारिणः ।। एक एव निहन्ताऽयमेरण्डस्नेहकेसरी ।।२५।। रेंड़ी का तेल-तीक्ष्ण, उष्ण, अग्निदीपक, पिच्छिल गुण युक्त, गुरु, वीर्यवर्धक, त्वचा के लिये हितकर, अवस्था को स्थिर रखने वाला, मेधा, कान्ति तथा बल को देने वाला, मधुर, तिक्त तथा कटुरस युक्त, अन्त में कषाय रसयुक्त, विपाक में मधुररसयुक्त, सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतों में प्रवेश करने वाला), योनि तथा शुक्र का शोधन करने वाला, विस्र (दुर्गन्ध युक्त), सारक एवम्-विषमज्वर, हृद्रोग, पीठ तथा गुह्य (गुदा) आदि का शूल, वात, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह (अफरा), गुल्म, अष्ठीला, कटिग्रह (कमर का अकड़जाना), वातरक्त, मलबन्ध, ब्रध्न, शोथ, आम और विद्रधि को दूर करने वाला होता है ।

तैलवर्गः ९२९ शरीर रूपी जंगल के अन्दर विचरने वाले आमवात रूपी गजराज को अकेला ही नाश करने वाला यह रेड़ी का तेल रूपी सिंह है। [२२-२५] इसका अन्य विवरण पृष्ठ ४७५ पर किया गया है। अथ सर्जरसतैलगुणानाह तैलं सर्जरसोद्भूतं विस्फोटव्रणनाशनम्। कुष्ठपामाकृमिहरं वातश्लेष्मामयापहम् ।। २६ ।। सर्जरस का तेल—विस्फोटक (फोड़ा), व्रण, कुष्ठ, खुजली, कृमि, वात तथा कफसम्बन्धी रोग को दूर करने वाला होता है। [२६] अथ सर्व तैलानां गुणानाह तैलं स्वयोनिगुणकृद्वाग्भटेनाखिलं मतम्। अतः शेषस्य तैलस्य गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिवत् ।। २७ ।। सभी प्रकार के तैलों के गुण—“वाग्भट” का यह मत है कि—सभी तेल अपने-अपने मूल द्रव्यों के अनुरूप गुणवाले होते हैं अर्थात् जिसका जो गुण होता है उसके तेल का भी वही गुण होता है। अतः अवशिष्ट तैलों के गुण उनके द्रव्यों के समान ही समझने चाहिये। [२७] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे तैलवर्गः समाप्तः ।। २० ।। ६२ भाव.I

अथ सन्धानवर्गः तत्र काञ्जिकस्य लक्षणं गुणाँश्चाह सन्धितं धान्यमण्डादि काञ्जिकं कथ्यते जनैः । काञ्जिकं भेदि तीक्ष्णोष्णं रोचनं पाचनंलघु ।।१।। दाहज्वरहरं स्पर्शात्पानाद्वातकफापहम् । माषादिवटकैर्यत्तु क्रियते तद् गुणाधिकम् ।।२।। लघु वातहरं तत्तु रोचनं पाचनं परम् । शूलाजीर्णविबन्ध्यामनाशनं वस्तिशोधनम् ।।३।। काञ्जी के लक्षण—जो धान्य और मण्डक आदि किसी पात्र में रख कर उसमें जल डाल कर उस पात्र का मुँह तीन दिन ढँक कर रखा रहता है उसी को कांजिक (कांजी) कहते हैं । कांजी—मल का भेदन करने वाली, तीक्ष्ण, उष्ण, रोचक, पाचक, लघु, स्पर्श (लगाने) से दाह तथा ज्वर को दूर करने वाली, पीने से वात तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है । और यही-कांजी—यदि उरद के बड़े आदि से तैयार की जाय तो अधिक गुणकारी होती है । अर्थात् यह—लघु, वातनाशक, रोचक तथा अत्यन्त पाचक, वस्तिशोधक एवम् शूल, अजीर्ण, विबन्ध तथा आम को नष्ट करने वाली होती है । [१-३] अथ काञ्जिकसेवनायोग्यजनानाह शोषमूर्च्छाभ्रमार्त्तानां मदकण्डूविशोषिणाम् । कुष्ठिनां रक्तपित्तिनां काञ्जिकं न प्रशस्यते ।।४।। पाण्डुरोगे यक्ष्मणि च तथा शोषातुरेषु च । क्षतक्षीणे तथा श्रान्ते मन्दज्वरनिपीडते ।। एतेषां न हितं प्रोक्तं काञ्जिकं दोषकारकम् ।।५।। काञ्जी सेवन के अयोग्य लोग—जो लोग-शोष, मूर्च्छा या भ्रम से आर्त हैं अथवा-मद तथा खुजली से सूखते जाते हैं, किंवा कुष्ठ तथा रक्तपित्त रोग वाले हैं, उन लोगों के लिये काञ्जी उत्तम (हितकर) नहीं होता है । एवम्-पाण्डुरोग, यक्ष्मा तथा शोष रोग से पीड़ित और क्षत से क्षीण, परिश्रम से थके हुए तथा मन्दज्वर से जो पीड़ित हैं उन लोगों के लिये भी काञ्जी हितकर नहीं होती प्रत्युत दोषों को उत्पन्न करने वाली ही होती है । [४-५] अथ तुषोदकस्य लक्षणं गुणाँश्चाह तुषोदकं यवैरामैः सतुषैः शकलीकृतैः ।।६।। तुषोदक के लक्षण—कच्चे तथा भूसी के सहित जो टुकड़े-टुकड़े किये हुये जौ हैं उन्हें सन्धान की रीति से यदि रख दिया जाय तो जो जल भाग है उसी को "तुषोदक" कहते हैं । [६] ❖ यवैः = उदके संहितैः सन्धानवर्गोक्तत्वात् ।।६।। यहाँ पर "यवैः" पद से "सन्धानवर्ग" में कहे हुये होने से जल में सन्धान की रीति से रखे हुये जौ यह अर्थ समझना चाहिये ।।६।। तुषाम्बु दीपनं हृद्यं पाण्डुकृमिगदापहम् । तीक्ष्णोष्णं पाचनं पित्तरक्तकृद्वस्तिशूलनुत् ।।७।। तुषाम्बु अर्थात् तुषोदक—अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, तीक्ष्ण, उष्ण, पाचक एवम् पाण्डु तथा क्रिमिरोग नाशक, पित्त तथा रक्तविकार को उत्पन्न करने वाला और वस्तिशूल नाशक होता है । [७]

सन्धानवर्गः ९३१ अथ सौवीरस्य लक्षणं गुणाँश्चाह सौवीरं तु यवैरामैः पक्वैर्वा निस्तुषैः कृतम्। गोधूमैरपि सौवीरमाचार्याः केचिदूचिरे ।।८।। सौवीरं तु ग्रहण्यार्शःकफघ्नं भेदि दीपनम्। उदावर्त्ताङ्गमर्दास्थिशूलानाहेषु शस्यते ।।९।। सौवीर के लक्षण-कच्चे अथवा पके भूसी रहित जौ के टुकड़ों से उक्त संधान की रीति से जो जल तैयार होता है उसे "सौवीर" कहते हैं। कोई-कोई आचार्य ऐसा कहते हैं कि-इसी भाँति जो गेहूँ के टुकड़ों से तैयार किया जाता है उसे "सौवीर" कहते हैं। सौवीर-मलभेदक, अग्निदीपक तथा ग्रहणी, अर्श और कफ नाशक एवम् उदावर्त्त, अंगमर्द (शरीर में दर्द) हड्डियों में शूल की भाँति दर्द तथा आनाह (अफरा) में उत्तम (हितकर) होता है। [८-९] अथारनालस्य लक्षणं गुणाँश्चाह आरनालं तु गोधूमैरामैः स्यान्निस्तुषीकृतैः। पक्वैर्वा सन्थितैस्तत्तु सौवीरसदृशं गुणैः ।।१०।। आरनाल के लक्षण-कच्चे अथवा पके हुए भूसी रहित गेहूँ के टुकड़ों से सन्धान की रीति से तैयार किये हुए को "आरनाल" कहते हैं। आरनाल-गुणों में सौवीर की भाँति ही होता है। [१०] अथ धान्याम्लस्य लक्षणं गुणाँश्चाह धान्याम्लं शालिचूर्णं च कोद्रवादिकृतं भवेत्। धान्याम्लं धान्ययोनित्वाप्रीणनं लघु दीपनम्। अरुचौ वातरोगेषु सर्वेष्वास्थापने हितम् ।।११।। धान्याम्ल के लक्षण-शालि (जड़हन) चावलों के चूर्ण अथवा कोदो आदि के चावलों के चूर्ण से सन्धान की रीति से जो तैयार होता है उसे "धान्याम्ल" कहते हैं। धान्याम्ल-इसका योनि (उपादान कारण) धान्य होने से यह- तृप्तिकारक, लघु, अग्निदीपक एवम् अरुचि, सभी प्रकार के वातरोग तथा आस्थापन वस्ति में हितकर होता है। [११] अथ शिण्डाक्या लक्षणं गुणाँश्चाह शिण्डाकी राजिकायुक्तैः स्यान्मूलकदलद्रवैः। सर्षपस्वरसैर्वाऽपि शालिपिष्टकसंयुतैः ।।१२।। शिण्डाकी के लक्षण-राई तथा मूली के पत्तों के रस अथवा सरसों के स्वरस और शालि (जड़हन) के चावलों के चूर्ण से सन्धान की रीति से जो तैयार होता है उसे "शिण्डाकी" कहते हैं। [१२] ❖ सन्थितैरिति शेषः ।।१२।। यहाँ पर "सन्थितैः" यह विशेषण ऊपर से लगाना चाहिये जिससे "सन्धान की रीति से जो तैयार होता है" यह अर्थ निकले। [१२] शिण्डाकी रोचनी गुर्वी पित्तश्लेष्मकरी स्मृता ।।१३।। शिण्डाकी-रोचक, गुरु एवम् पित्त तथा कफ को उत्पन्न करने वाली होती है। [१३] अथ शुक्तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह कन्दमूलफलादीनि सस्नेहलवणानि च। यत्र द्रवेऽभिषूयन्ते तच्छुक्तमभिधीयते ।।१४।। शुक्तं कफघ्नं तीक्ष्णोष्णं रोचनं पाचनं लघु। पाण्डुकृमिहरं रूक्षं भेदनं रक्तपित्तकृत् ।।१५।। शुक्त के लक्षण-कन्द, मूल तथा फल आदि तेल तथा नमक के सहित जिस द्रव पदार्थ में डुबोये जाकर सन्धान की रीति से बनाये जाते हैं उसे शुक्त कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

९३२ भावप्रकाशनिघण्टुः शुक्त-कफनाशक, तीक्ष्ण, उष्ण, रोचक, पाचक, लघु, रूक्ष, मलभेदक, रक्तपित्तकारक एवम् पाण्डु तथा कृमि को दूर करने वाला होता है। [१४-१५] अथासुतम् (संधान) । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह कन्दमूलफलाढ्यं यत्तत्तु विज्ञेयमासुतम्। तद्रुच्यं पाचनं वातहरं लघु विशेषतः ।। १६ ।। कन्द, मूल तथा फल आदि से युक्त जो कांजी है उसे "आसुत" कहते हैं। आसुत-रुचिकारक, पाचक, वातनाशक तथा विशेष कर लघु होता है। [१६] अथ मद्यस्य नामानि लक्षणं गुणाँश्चाह मद्यन्तु सीधुमैरेयमिरा च मदिरा सुरा। कादम्बरी वारुणी च हालाऽपि बलवल्लभा ।। १७ ।। पेयं यन्मादकं लोकैस्तन्मद्यमभिधीयते। यथाऽरिष्टं सुरा सीधुरासवाद्यमनेकधा ।। १८ ।। मद्यं सर्वं भवेदुष्णं पित्तकृद्वातनाशनम्। भेदनं शीघ्रपाकं च रूक्षं कफहरं परम् ।। १९ ।। अम्लं च दीपनं रुच्यं पाचनं चाशुकारि च। तीक्ष्णं सूक्ष्मं च विशदं व्यवायि च विकाशि च ।। २० ।। मद्य के संस्कृत नाम-मद्य, सीधु, मैरेय, हरा, मदिरा, सुरा, कादम्बरी, वारुणी, हाला तथा हलवल्लभा ये सब हैं। लक्षण-नशा लाने वाला, पीने योग्य जो द्रव्य है उसे लोग "मद्य" कहते हैं। भेद-मद्य के अरिष्ट, सुरा सीधु तथा आसव आदि अनेक प्रकार हैं। सभी प्रकार के मद्य-उष्ण, पित्तकारक, वातनाशक, मलभेदक, शीघ्र पचने वाले, रूक्ष, अत्यन्त कफनाशक, अम्ल रस युक्त, अग्निदीपक, रुचिकारक, पाचक, एवम् शीघ्रकारिता, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, विशद, व्यवायि तथा विकाशि गुणों से युक्त होते हैं। [१७-२०] अथारिष्टस्य लक्षणं गुणाँश्चाह पक्वौषधाम्बुसिद्धं यन्मद्यं तत्स्यादरिष्टकम् ।। २१ ।। अरिष्ट के लक्षण-पकाई हुई औषध तथा जल से सिद्ध किया हुआ जो मद्य होता है उसे "अरिष्ट" कहते हैं। [२१] ❖ अरिष्टं = मद्यमिति लोके। यथा-द्राक्षारिष्टं, दशमूलारिष्टम्, बब्बूलारिष्ट-मिति ।। २१ ।। यहाँ पर "अरिष्ट" पद से लोक में प्रसिद्ध "मद्य" का ग्रहण करना चाहिये। जैसे- द्राक्षारिष्ट (दाख का अरिष्ट), दशमूलारिष्ट, बब्बूलारिष्ट इत्यादि। [२१] अरिष्ट लघुपाकेन सर्वतश्च गुणाधिकम्। अरिष्टसूरू गुणा ज्ञेया बीजद्रव्यगुणैः समाः ।। २२ ।। अरिष्ट-पाक में लघु होता है एवम् सबसे अधिक गुणकारी होता है। और अरिष्ट के गुण जिन द्रव्यों का वह बनाया जाता है उसके समान होते हैं। [२२] अथ सुराया लक्षणं गुणाँश्चाह शालिषष्टिकपिष्टादिकृतं मद्यं सुरा स्मृता। सुरा गुर्वी बलस्तन्यपुष्टिमेदःकफप्रदा। ग्राहिणी शोथगुल्मार्शोग्रहणीमूत्रकृच्छ्रनुत् ।। २३ ।। सुरा के लक्षण-शालि (जड़हन) तथा साठी के चावलों के चूर्ण आदि से जो मद्य तैयार किया जाता है उसे "सुरा" कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

सन्धानवर्गः ९३३ सुरा-गुरु, ग्राही तथा बल, स्तनों में दूध की वृद्धि, शरीर की पुष्टि, मेद तथा कफ को करने वाला एवम् शोथ, गुल्म, अर्श (बवासीर), ग्रहणी तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करने वाला होता है। [२३] अथ सुराभेदस्य वारुण्या लक्षणगुणानाह पुनर्नवाशालिपिष्टिविहिता वारुणी स्मृता। संधितैस्तालखर्जूररसैर्या साऽपि वारुणी। सुरावद्वारुणी लघ्वी पीनसाध्मानशूलनुत् ।। २४ ।। सुरा का भेद वारुणी के लक्षण-पुनर्नवा तथा शालि के चावलों के चूर्ण से जो सुरा बनाई जाती है उसे "वारुणी" कहते हैं। और ताल तथा खजूर के रस को सन्धान की रीति से रखने पर जो तैयार होता है उसे भी "वारुणी" कहते हैं। वारुणी-गुणों में यद्यपि सुरा के समान ही होती है तथापि यह उसकी अपेक्षा लघु एवम् पीनस, आध्मान (अफरा) तथा शूल को दूर करने वाली होती है। [२४] त्तसुरातो भेदार्थं लघ्वीति ।। २४ ।। यहाँ पर "लघ्वी" इस पद से "सुरा" से इसका (वारुणी का) भेद दिखलाते हैं। अर्थात् "सुरा" गुरु होती है और "वारुणी" लघु होती है यह समझना चाहिये। [२४] अथ द्विविधसीधोर्लक्षणगुणानाह इक्षोः पकै रसैः सिद्धः सीधुः पक्वरसश्च सः। आमैस्तैरेव यः सीधुः स च शीतरसः स्मृतः ।। २५ ।। सीधुः पक्वरसः श्रेष्ठः स्वराग्निबलवर्णकृत्। वातपित्तकरः सद्यः स्नेहनो रोचनो हरेत् ।। २६ ।। विबन्धमेदःशोफार्शःशोफोदरकफामयान् । तस्मादल्पगुणः शीतरसः संलेखनः स्मृतः ।। २७ ।। दो प्रकार के सीधु के लक्षण-ईख के पके हुये रस से जो मद्य तैयार होता है वह "पक्वरस सीधु" कहलाता है। और जो ईख के कच्चे रस से तैयार होता है वह "शीतरस सीधु" कहलाता है। पक्वरस सीधु-श्रेष्ठ, स्वर तथा वर्ण को उत्तम करने वाला, अग्नि तथा बलकारक, वात तथा पित्त को करने वाला, तत्काल स्नेहन करने वाला, रोचक एवं विबन्ध, मेद, शोथ, बवासीर, उदर का शोथ तथा कफ सम्बन्धी विकारों को नष्ट करने वाला होता है। शीतरस सीधु-यह पक्वरस सीधु की अपेक्षा अल्प गुणकारी तथा अधिक लेखन गुण विशिष्ट होता है। [२५-२७] अथासवस्य लक्षणं गुणाँश्चाह यदपक्वौषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः ।। २८ ।। आसव के लक्षण-बिना पकाये हुये औषध तथा जल से जो मद्य बनाया जाता है वह "आसव" कहलाता है। [२८] ❖ यथा-लोहासवादिः ।। २८ ।। जैसे-"लोहासव" आदि बनता है इतना यहाँ पर और समझना चाहिये। [२८] आसवस्य गुणा ज्ञेया बीजद्रव्यगुणैः समाः ।। २९ ।। आसव-इसके गुण बीजद्रव्यों (जिन द्रव्यों से आसव बनाया जाता है उसे "बीजद्रव्य" समझना चाहिये) के गुणों के समान होते हैं। [२९]

९३४ भावप्रकाशनिघण्टुः

अथ नवपुराणमदिरागुणानाह

मद्यं नवमभिष्यन्दि त्रिदोषजनकं सरम्। अहृद्यं बृंहणं दाहि दुर्गन्धं विशदं गुरु।।३०।। जीर्णं तदेव रोचिष्णु क्रिमिश्लेष्मानिलापहम्। हृद्यंसुगन्धिगुणवल्लघु स्रोतोविशोधनम्।।३१।। **नई मदिरा—**अभिष्यन्दी, त्रिदोषजनक, सारक, हृदय के लिये अहितकर, बृंहण, दाह उत्पन्न करने वाली, दुर्गन्ध तथा विशद गुण युक्त एवम् गुरु होती है। **पुरानी मदिरा—**रुचि को उत्पन्न करने वाली, हृदय के लिये हितकर, सुगन्ध युक्त, गुणकारक, लघु, स्रोतोमार्ग का शोधन करने वाली एवम् क्रिमि, कफ तथा वायु को नष्ट करने वाली होती है। [३०-३१]

अथ सात्त्विकादिमनुष्याणां मद्येन जाताश्चेष्टा आह

सात्त्विके गीतहास्यादि राजसे साहसादिकम्। तामसे निन्द्यकर्माणि निन्द्राञ्च मदिराऽऽचरेत् ।।३२।। सात्त्विकादि मनुष्यों की मद्य से उत्पन्न हुई चेष्टायें—मदिरा सात्त्विक (सत्त्वगुणी) मनुष्यों में पीने से गाना तथा हँसना आदि कार्यों को कराने लगती है—राजस (रजोगुणी) मनुष्यों में साहस आदि कार्यों को, तामस (तमोगुणी) मनुष्यों में निन्द्यकर्म तथा निद्रा को कराती है। [३२] ❖ आचरेत् = कुर्यात् ।।३२।। यहाँ पर "आचरेत्" पद से "कराने लगती है" यह भावार्थ समझना चाहिये। [३२]

अथ मद्यपानप्रकारमाह

विधिना मात्रया काले हितैरन्नैर्यथाबलम्। प्रहृष्टो यः पिबेन्मद्यं तस्य स्यादमृतं यथा ।।३३।। किन्तु मद्यंस्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम्। अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथाऽमृतम् ।।३४।। **मद्य पीने का प्रकार—**जो मनुष्य प्रसन्न होता हुआ, हितकारक अन्नों के साथ, बलानुसार यथासमय, विधिपूर्वक, मात्रा के साथ मद्य पीता है, तो उसे वह (मद्य) अमृत के समान गुणकारी होता है। क्योंकि—मद्य का स्वभाव जिस प्रकार अन्न का है ठीक वैसा ही है, जैसे अन्न—अविधिपूर्वक सेवन करने से रोग उत्पन्न करने वाला होता है और विधिपूर्वक सेवन करने से अमृत के समान गुणकारी होता है वैसे ही मद्य को भी समझना चाहिये। [३३-३४]

अथ मद्यगन्धस्य दूरीकरणोपायमाह

मुस्तैलवालुगदजीरकधान्यकैला यश्चर्वयन्सदसि वाचमभिव्यनक्ति। स्वाभाविकं मुखजमुज्झति पूतिगन्धं—गन्धञ्च मद्यलशुनादि भवञ्च नूनम् ।।३५।। **मद्य के गन्ध को दूर करने का उपाय—**नागरमोथा, कूठ, एलवालु जीरा, धनिया और इलायची इन सबको चबाता हुआ जो मद्य पीने वाला मनुष्य सभा के मध्य में बातचीत करता है, उसके मुख की स्वाभाविक दुर्गन्ध तथा मद्य एवम् लहशुन आदि से उत्पन्न गन्ध निश्चय दूर हो जाती है। [३५] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे सन्धानवर्गः समाप्तः।

अथ मधुवर्गः

तत्र मधुनो नामगुणानाह

मधु माक्षिकमाध्वीकक्षौद्रसारघमीरितम् । मक्षिकावरटीभृङ्गवान्तं पुष्परसोद्भवम् ॥१॥ मधु शीतं लघु स्वादु रूक्षं ग्राहि विलेखनम् । चक्षुष्यं दीपनं स्वर्यं व्रणशोधनरोपणम् ॥२॥ सौकुमार्यकरं सूक्ष्मं परं स्रोतोविशोधनम् । कषायानुरसं ह्लादि प्रसादजनकं परम् ॥३॥ वर्ण्यं मेधाकरं वृष्यं विशदं हरेत् । कुष्ठार्शःकाशपित्तास्रकफमेहक्लमक्रिमीन् ॥४॥ मेदस्तृष्णावमिश्वासहिक्काऽतीसारविङ्ग्रहान् । दाहक्षतक्षयांस्तत्तुयोगवाह्यल्पवातलम् ॥५॥ मधु (शहद) के संस्कृत नाम—मधु, माक्षिक, माध्वीक, क्षौद्र सारघ, मक्षिकावान्त, वरटी वान्त, भृङ्गवान्त तथा पुष्परसोद्भव ये सब हैं। मधु—शीतल, लघु, स्वादिष्ट, रूक्ष, ग्राही, विलेखन, नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, स्वर को उत्तम बनाने वाला, व्रण का शोधन तथा रोपण करने वाला, सुकुमारता करने वाला, सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतोगामी), स्रोतोमार्ग का अत्यन्त शोधन करने वाला, आरम्भ में मधुर अन्त में कषाय रसयुक्त, आह्लादकारक, अत्यन्त प्रसादजनक, वर्ण (शरीर के रंग) को उत्तम करने वाला, मेधाशक्ति को उत्पन्न करने वाला, वीर्यवर्धक, विशद गुणयुक्त, रोचक, योगवाही (जिसके साथ इसका योग हो उसके सदृश गुण को करने वाला), थोड़ा वातजनक एवम् कुष्ठ, अर्श, कास, पित्त, रक्तविकार, कफ, प्रमेह, क्लान्ति, क्रिमि, मेद, तृषा, वमन, श्वास, हिचकी, अतीसार, मलबन्ध, दाह, क्षत और क्षय को नष्ट करने वाला होता है। [१-५]

अथ मधुभेदानाह

माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तिकं छात्रमित्यपि । आर्घ्यमौद्दालकं दालमित्यष्टौ मधुजातयः ॥६॥ मधु के भेद—(१) माक्षिक, (२) भ्रामर, (३) क्षौद्र, (४) पौत्तिक, (५) छात्र, (६) आर्घ्य, (७) औद्दालक, (८) दाल, इस प्रकार से ८ मधु की जातियाँ हैं। [६]

अथ तेषां लक्षणं गुणाँश्च ।

तत्र माक्षिकस्य लक्षणगुणानाह

मक्षिकाः पिङ्गवर्णास्तु महत्यो मधुमक्षिकाः । ताभिः कृतं तैलवर्णं माक्षिकं परिकीर्त्तितम् ॥७॥ माक्षिकं मधुषु श्रेष्ठं नेत्रामयहरं लघु । कामलाऽर्शःक्षतश्वासकासक्षयविनाशनम् ॥८॥ पूर्वोक्त भेदों में प्रथम माक्षिकजातीय मधु के लक्षण—पिङ्गल वर्ण वाली जो बड़ी मधुमक्खियाँ होती हैं उनके द्वारा उत्पन्न किये हुये तेल के समान वर्णवाले मधु को “माक्षिक” कहते हैं। माक्षिकजातीय मधु—सभी प्रकार के मधुओं में श्रेष्ठ होता है एवम् नेत्र सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, लघु तथा कामला, अर्श, क्षत, श्वास, कास और क्षय को नष्ट करने वाला होता है। [७-८]

९३६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ भ्रामरस्य लक्षणगुणानाह किञ्चित्सूक्ष्मैः प्रसिद्धेभ्यः षट्पदेभ्योऽलिभिश्चितं । निर्मलं स्फटिकाभं यत्तन्मधु भ्रामरं स्मृतं ।।९।। भ्रामरं रक्तपित्तघ्नं मूत्रजाड्यकरं गुरु । स्वादुपाकमभिष्यन्दि विशेषात्पिच्छिलं हिमम् ।।१०।। भ्रामरजातीय मधु के लक्षण-प्रसिद्ध, छ पैरों वाले भौंरों से कुछ छोटे भ्रमरों (भौरों) से संगृहीत, स्फटिक के समान निर्मल, जो मधु होता है उसे "भ्रामर" कहते हैं । भ्रामरजातीय मधु-रक्तपित्तनाशक, मूत्र में जड़ता उत्पन्न करने वाला, गुरु, विपाक में मधुर रस युक्त, अभिष्यन्दी, विशेष रूप से पिच्छिल और शीतवीर्य होता है । [९-१०] अथ क्षौद्रस्य लक्षणगुणानाह माक्षिकाः कपिलाः सूक्ष्माः क्षुद्राऽऽख्यास्तत्कृतं मधु । मुनिभिः क्षौद्रमित्युक्तंतद्वर्णात्कपिलं भवेत् ।। गुणैर्माक्षिकवत्क्षौद्रं विशेषान्मेहनाशनम् ।।११।। क्षौद्रजातीय मधु के लक्षण-कपिल वर्ग की सूक्ष्म जो "क्षुद्रा" नामक मधुमक्खियाँ होती हैं उनके द्वारा बनाये गये कपिल वर्ण के मधु को मुनियों ने "क्षौद्र" कहा है । क्षौद्रजातीय मधु-गुणों में पूर्वोक्त माक्षिक जातीय मधु के सदृश होता है और विशेष रूप से प्रमेहनाशक होता है।।[११] अथ पौत्तिकमधुनो लक्षणगुणानाह कृष्णा या मशकोपमा लघुतराः प्रायो महापीड़िका वृक्षाणां पृथुकोटरान्तरगताः पुष्पासव कुर्वते । तास्तज्ज्ञैरिह पुत्तिका निगदितास्ताभिः कृतं सर्पिषा तुल्यं यन्मधु तद्वनेचरजनैः संकीर्तितं पौत्तिकम् ।।१२।। पौत्तिकं मधु रूक्षोष्णं पित्तदाहास्त्रवातकृत् । विदाहि मेहकृच्छ्रघ्नं ग्रन्थ्यादिक्षतशोषि च ।।१३।। पौत्तिकजातीय मधु के लक्षण-प्रायः करके मच्छरों के समान अत्यन्त छोटी-छोटी काले रंग की, काटने से अत्यन्त पीड़ा पहुँचाने वाली, वृक्षों के कोटरों (खोढ़रों) में रहने वाली जो मधुमक्खियाँ होती है, जिन्हें उनके जानने वाले लोग "पुत्तिका" कहते हैं उनके द्वारा संगृहीत, घी के समान जो मधु होता है उसे जंगली कोल, भिल्लादि लोग "पौत्तिक" कहते हैं । पौत्तिकजातीय मधु-रूक्ष, उष्ण, पित्त-दाह-रक्तविकार तथा वात कारक, विदाही, प्रमेह तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करने वाला, एवम्-गाँठ आदि तथा क्षत (घाव) को सुखाने वाला होता है । [१२-१३] अथ छात्रमधुनो लक्षणं गुणाँश्चाह वरटाः कपिलाः पीताः प्रायो हिमवतो वने ।।१४।। कुर्वन्ति छत्रत्राकाकारं तज्जं छात्रं मधु स्मृतम् । छात्रं कपिलपीतं स्यात्पिच्छिलं शीतलं गुरु ।।१५।। स्वादुपाकं कृमिश्वित्ररक्तपित्तप्रमेहजित् । भ्रमतृण्मोहविषहत्तर्पणञ्च गुणाधिकम् ।।१६।। छात्रजातीय मधु के लक्षण-प्रायः करके हिमालय पर्वत के जंगलों में कपिल तथा पीत वर्ण की मधुमक्खियाँ छत्ते के आकार का घर बनाती हैं, अतएव उस छत्र से उत्पन्न हुये मधु को "छात्र" कहते हैं । छात्रजातीय मधु-कपिल तथा पीत वर्ण युक्त, पिच्छिल, शीतल, गुरु, विपाक में मधुर रस युक्त, तृप्तिदायक, अधिक गुणकारी एवम्-कृमि, श्वेत, कुष्ठ, रक्तपित्त, प्रमेह, भ्रम, तृषा, मोह तथा विष को दूर करने वाला होता । [१४-१६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

मधुवर्गः ९३७ अथार्घ्यस्य लक्षणगुणानाह मधूकवृक्षनिर्यासं जरत्कार्वाश्रमोद्भवम्। स्रवत्यार्घ्यं तदाख्यातं श्वेतकं मालवे पुनः ॥१७॥ तीक्ष्णतुण्डास्तु याः पीता मक्षिकाः षट्पदोपमाः । अध्यस्तास्तत्कृतं यत्तदार्घ्यमित्य परे जगुः ॥१८॥ आर्घ्यं मध्वतिचक्षुष्यं कफपित्तहरं परम्। कषायं कटुकं पाके तिक्तञ्च बलपुष्टिकृत् ॥१९॥ आर्घ्यजातीय मधु के लक्षण– “जरत्कारु” ऋषि के आश्रम में उत्पन्न हुये, महुये के वृक्ष से जो गोंद स्रवता है, उसे “आर्घ्य” कहते हैं तथा मालवा देश में उसी को “श्वेतक” कहते हैं। किन्तु अन्य कोई-कोई आचार्य ऐसा कहते हैं कि—भौरों के समान आकारवाली, पीले रंग की तथा तीक्ष्ण मुखवाली जो मधुमक्खियाँ होती हैं, उन्हें “अर्घ्या” कहते हैं और उनसे संगृहीत मधु को “आर्घ्य” कहते हैं। आर्घ्यजातीय मधु–नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकर और विशेष रूप से कफ तथा पित्त को दूर करने वाला, कषाय तथा तिक्त रस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त एवम्-बल तथा पुष्टिकारक होता है। [१७-१९] अथौद्दालकमधुनो लक्षणगुणानाह प्रायो वल्मीकमध्यस्थाः कपिलाः स्वल्पकीटकाः । कुर्वन्ति कपिलं स्वल्पं तत्स्यादौद्दालकं मधु ॥२०॥ औद्दालकं रुचिकरं स्वर्यं कुष्ठविषापहम्। कषायमुष्णमम्लञ्च कटुपाकञ्च पित्तकृत् ॥२१॥ औद्दालकजातीय मधु के लक्षण–प्रायः करके वल्मीक (विमवट) के अन्दर रहने वाले, कपिल वर्ण के छोटे- छोटे कीड़े, जो कपिल वर्ण का थोड़ी मात्रा में मधु बनाते हैं उसी को “औद्दालक” कहते हैं। औद्दालकजातीय मधु–रुचिकारक, स्वर को उत्तम बनाने वाला, कषाय तथा अम्ल रस युक्त, उष्ण, विपाक में कटुरसयुक्त एवम् पित्तकारक होता है। [२०-२१] अथ दालमधुनो लक्षणगुणानाह संस्रुत्य पतितं पुष्पाद्यत्तु पत्रोपरि स्थितम्। मधुराम्लकषायञ्च तद्दालं मधु कीर्त्तितम् ॥२२॥ दालं मधु लघु प्रोक्तं दीपनीयं कफापहम्। कषायानुरसं रूक्षं रुच्यं छर्दिप्रमेहजित् ॥२३॥ अधिकं मधुरं स्निग्धं बृंहणं गुरु भारिकम् ॥२४॥ दालजातीय मधु के लक्षण–फूलों से टपक करके जो पुष्परस (मधु) पत्तों पर गिरता है और जो मधुर, अम्ल तथा कषाय रसयुक्त होता है उसे “दाल” कहते हैं। दालजातीय मधु–(पाक में) लघु, अग्निदीपक, कफनाशक, अधिक मधुररसयुक्त, अन्त में कषाय रसयुक्त, रूक्ष, रुचिकारक, स्निग्ध गुण युक्त, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), तौल में गुरु एवम् वमन तथा प्रमेह को दूर करने वाला होता है। [२२-२४] ❖ लघु पाके । गुरु भारिकं, तुलितम् ॥ २२-२४॥ यहाँ पर मूल में “लघु” पद का “विपाक में लघु” ऐसा अर्थ समझना चाहिये। और “गुरु भारिकम्” इस पद का “तौल में गुरु” (भारी) यह अर्थ समझना चाहिये। अथ नवपुराणमधुगुणानाह नवं मधु भवेत्पुष्ट्यै नातिश्लेष्महरं सरम्। पुराणं ग्राहकं रूक्षं मेदोघ्नमतिलेखनम् ॥२५॥ नया मधु–पुष्टिकारक, कफ को अत्यन्त दूर करने वाला नहीं (किञ्चित् कफनाशक) तथा सारक होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

९३८ भावप्रकाशनिघण्टुः पुराना मधु-ग्राही, रूक्ष, अत्यन्त लेखन गुण विशिष्ट एवम् मेद को दूर करने वाला होता है। [२५] अथ परिभाषामाह मधुनः शर्करायाश्च गुडस्यापि विशेषतः। एकसंवत्सरे वृत्ते पुराणत्वं स्मृतं बुधैः ।।२६।। परिभाषा-मधु, शक्कर (चीनी) तथा गुड़ इन सबों को एक वर्ष बीत जाने पर पण्डित लोग पुराना कहते हैं। अर्थात्-एक वर्ष के अन्दर के ये सब नये और बाद एक वर्ष के पुराने कहलाते हैं। [२६] अथ शीतलोष्णमधुनोर्गुणदोषानाह विषपुष्पादपि रसं सविषा भ्रमरादयः। गृहीत्वा मधु कुर्वन्ति तच्छीतं गुणवन्मधु ।।२७।। विषान्वयात्तदुष्णान्तु द्रव्येणोष्णेन वा सह। उष्णार्त्तस्योष्णकाले च स्मृतं विषसमं मधु ।।२८।। शीतल तथा उष्ण मधु की क्रम से गुणकारिता और दोषकारिता-विषैले भौंरे आदि विष के फूलों से भी रस लेकर मधु बनाते हैं, अतएव शीतल मधु ही गुणकारी होता है। और विष के फूलों का सम्बन्ध होने से मधु यदि उष्ण या उष्ण द्रव्यों के साथ वा उष्ण काल में वा गर्मी से दुःखी रोगियों के लिये प्रयोग किया जाता हो तो विष के समान होता है। [२७-२८] अथ मधूच्छिष्टम् (मोम) तस्य नामगुणानाह मयनं तु मधूच्छिष्टं मधुशेषं च सिक्थकम्। मध्वाधारो मदनकं मधूषितमति स्मृतम् ।।२९।। मदनं मृदु सुस्निग्धं भूतघ्नं व्रणरोपणम्। भग्नसन्धानकृद्वातकुष्ठवीसर्परक्तजित् ।।३०।। मोम के संस्कृत नाम-मयन, मधूच्छिष्ट, मधुशेष, सिक्थक, मध्वाधार, मदनक तथा मधूषित ये सब हैं। मोम-मृदु गुण युक्त, अत्यन्त स्निग्ध, भूतग्रहनाशक, व्रण का रोपण करने वाला, टूटे हुये अस्थियों को जोड़ने वाला एवम्-वात, कुष्ठ, वीसर्प तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [२९-३०] इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे मधुवर्गः समाप्तः।

अथ इक्षुवर्गः तत्रादाविक्षोर्नामगुणानाह इक्षुर्दीर्घच्छदः प्रोक्तस्तथा भूरिरसोऽपि च। गुडमूलोऽसिपत्रश्च तथा मधुतृणः स्मृतः ॥१॥ ऊख के संस्कृत नाम—इक्षु, दीर्घच्छद, भूरिरस, गूढमूल, असिपत्र तथा मधुतृण ये सब हैं। सभी प्रकार की ईख—रक्तपित्तनाशक, बलकारक, वीर्यवर्धक, कफजनक, रस तथा विपाक में मधुर, स्निग्ध, गुरु, मूत्रकारक, एवम् शीतवीर्य होती हैं। [१-२] हिं०-ईख, गन्ना। अं०-Sugar Cane (सुगर केन)। ले०-Sacharum officinarium (सेक्केरम् ऑफिसिनेरम्) । Fam. Gramineae (ग्रैमिनी) । इसकी खेती भारतवर्ष के सभी उष्ण प्रदेशों में की जाती है। भावप्रकाशकार इसके १३ भेदों का उल्लेख करते हैं। आजकल भी इसके अनेक कृषित प्रकार पाये जाते हैं। इसके काण्ड स्वरस, मूल स्वरस तथा शर्करा, राव आदि इक्षुविकारों का उपयोग किया जाता है। अनेक योगों को टिकाऊ बनाने के लिए शर्करा आदि का उपयोग करते हैं। इसमें शर्करा आदि के अतिरिक्त कैल्शियम ऑक्जेलेट भी पाया जाता है। यह मधुर, शीतल, मूत्रल, सारक, बल्य, कण्ठ्य, श्रमहर, शुक्रशोधक तथा वात एवं कफवर्धक है। इसका मूल शीतल, मूत्रल एवं वृष्य है। यह मधुर होते हुये भी शीतवीर्य होने से वातवर्धक होता है (सुश्रुत)। इसको मूत्रजनन द्रव्यों में श्रेष्ठ माना गया है (चरक)। इसका उपयोग रक्तपित्त, गुल्म, उदर, कामला एवं पांडु आदि में भी किया जाता है। इसका बाह्य प्रयोग पित्ताभिष्यन्द में किया गया है। अथेक्षुभेदानाह पौण्ड्रको भीरुकश्चापि वंशकः शतपोरकः। कान्तारतापसेक्षुश्च काण्डेक्षुः सूचिपत्रकः।।३।। नैपालो दीर्घपत्रश्च नीलपोरोऽथ कोशकृत्। मनोगुप्ता च इत्येता जातयस्तत्र कीर्तिताः ।।४।। ऊख के भेद—पौण्ड्रक, भीरुक, वंशक, शतपोरक, कान्तार, तापसेक्षु, काण्डेक्षु, सूचिपत्रक, नैपाल, दीर्घपत्र, नीलपोर, कोशकृत् तथा मनोगुप्ता ये सब ऊखकी जातियाँ मानी गई है। [३-४] अथ श्वेतपौण्ड्रक-भीरुकेक्षुगुणानाह वातपित्तप्रशमनो मधुरो रसपाकयोः। सुशीतो बृंहणो बल्यः पौण्ड्रको भीरुकस्तथा ।।५।। पौण्ड्रक तथा भीरुक ये दोनों ईख—वात तथा पित्त को शमन करने वाला, रस तथा विपाक में मधुर, अत्यन्त शीतल, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) एवम् बलकारक होती हैं। [५] अथ कोशकारेक्षुः । तस्य गुणानाह कोशकारो गुरुः शीतो रक्तपित्तक्षयापहः ।।६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA

९४० भावप्रकाशनिघण्टुः कोशकार नामक ईख—गुरु, शीतल एवम् रक्तपित्त तथा क्षय को नष्ट करने वाली होती है । [६] अथ कान्तारेक्षुगुणानाह कान्तारेक्षुर्गुरुर्वृष्यः श्लेष्मलो बृंहणः सरः ।।७।। कान्तार संज्ञक ईख—गुरु, वीर्यवर्धक, कफजनक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक) तथा सारक होती है । [७] अथ वंशकेक्षुगुणानाह दीर्घपोरः सुकठिनः सक्षारो वंशकः स्मृतः ।।८।। वंशक नामक ईख—लम्बे-लम्बे पोरों वाली, अत्यन्त कठिन तथा क्षारयुक्त होती है । [८] अथ शतपोरकेक्षुगुणानाह शतपर्वा भवेत्किञ्चित्कोशकारगुणान्वितः । विशेषात्किञ्चिदुष्णश्च सक्षारः पवनापहः ।।९।। शतपोरक संज्ञक ईख—औरों की अपेक्षा अधिक पोरोंवाली, किंचित् कोशकार संज्ञक ऊख के गुणों से युक्त, विशेष करके किंचित् उष्ण, क्षारयुक्त तथा वातनाशक होती है । [९] अथ तापसेक्षुगुणानाह तापसेक्षुर्भवेन्मृद्वी मधुरा श्लेष्मकोपनी । तर्पणी रुचिकृच्चापि वृष्या च बलकारिणी ।।१०।। तापसेक्षु संज्ञक ईख—कोमल, मधुर रसयुक्त, कफ को कुपित करने वाली, तृप्तिकारक, रुचि को उत्पन्न करने वाली, वीर्यवर्धक तथा बलकारक होती है । [१०] अथ काण्डेक्षुगुणानाह एवं गुणैस्तु काण्डेक्षुः स तु वातप्रकोपणः ।।११।। काण्डेक्षु नामक ईख—गुणों में यद्यपि "तापसेक्षु" के समान ही होती है तथापि यह वात को विशेष रूप से कुपित करने वाली होती है । [११] अथ सूचीपत्र-नीलपोर-नैपाल-दीर्घपत्राणां गुणानाह सूचीपत्रो नीलपोरो नैपालो दीर्घपत्रकः । वातलाः कफपित्तघ्नाः सकषाया विदाहिनः ।।१२।। सूचीपत्र, नीलपोर, नैपाल तथा दीर्घपत्रक संज्ञक ईख—वातजनक, कफ तथा पित्त नाशक, कषाय रसयुक्त तथा विदाही होती है । [१२] अथ मनोगुप्तेक्षुगुणानाह मनोगुप्ता वातहरी तृष्णाऽऽमयविनाशिनी । सुशीता मधुराऽतीव रक्तपित्तप्रणाशिनी ।।१३।। मनोगुप्ता संज्ञक ईख—वातनाशक, तृषा रोग को दूर करने वाली, अति शीतल, अत्यन्त मधुर एवम् रक्तपित्त को नष्ट करने वाली होती है । [१३] अथ बाल-तरुण-वृद्धेक्षुगुणानाह बाल इक्षुः कफं कुर्य्यान्मेदोमेहकरश्च सः । युवा तु वातहृत् स्वादुरीषत्तीक्ष्णश्च पित्तनुत् ।। रक्तपित्तहरो वृद्धः क्षतहृद् बलवीर्यकृत् ।।१४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA