भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
६१५ मंगल, बुध, गुरु, शुक्र [कुण्डली १४१० : लग्न में मं. १, बु., गु., शु.] (३१) मंगल, बुध, गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक सुशील, धनी, दयालु, राज-मान्य, स्वस्थ, लोकप्रिय, परन्तु अपनी स्त्री से कलह करने वाला होता है। मंगल, बुध, गुरु, शनि [कुण्डली १४११ : लग्न में मं. १, बु., गु., श.] (३२) मंगल, बुध, गुरु और शनि की युति हो तो जातक सत्यवादी, पवित्र-हृदय, विनम्र, धैर्यवान्, विद्वान् सुवक्ता, शूर-वीर परन्तु धनहीन होता है। मंगल, बुध, शुक्र, शनि [कुण्डली १४१२ : लग्न में मं. १, बु., शु., श.] (३३) मंगल, बुध, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक मधुरभाषी, मल्ल-विद्या में निपुण, लोक-प्रसिद्ध, पुष्ट शरीर वाला तथा कुत्तों को पालने वाला होता है। मंगल, गुरु, शुक्र, शनि [कुण्डली १४१३ : लग्न में मं. १, गु., शु., श.] (३४) मंगल, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक धूर्त, विषयी, मानी, विनम्र, साहसी विद्वान्, धनी, पर-स्त्रीगामी तथा श्रेष्ठ मनुष्यों को प्रिय होता है।
६१६ बुध, गुरु, शुक्र, शनि (३५) बुध, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक मेधावी, वेद-वेदांग का ज्ञाता, शस्त्र- विद्या का प्रेमी परन्तु विषय-वासना में लीन रहने वाला कामी होता है। पाँच ग्रहों की युति का फलादेश सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बुध (१) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध और गुरु की युति हो तो जातक दुष्ट, क्रोधी, छली तथा सदैव दुःखी रहने वाला होता है। उसकी पत्नी दुष्ट स्वभाव वाली होती है, जिसके कारण वह सदैव उद्विग्न बना रहता है। ऐसा व्यक्ति स्त्री-हीन भी हो सकता है। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र (२) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध और शुक्र की युति हो तो जातक मिथ्यावादी, दयालु स्वभाव का, बुद्धि-हीन, दूसरों का काम करने वाला तथा हिजड़ों- जैसी आकृति का होता है। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शनि (३) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध और शनि की युति हो तो जातक चोर, सदैव दुःखी, स्त्री-पुत्रादि से रहित, बन्धन (जेल या कैद) प्राप्त करने वाला तथा प्रायः अल्पायु होता है।
६१७ सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र (४) सूर्य, चन्द्र, मंगल गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक दुःखी, नेत्र-रोगी अथवा जन्मान्ध, माता-पिता के सुख से रहित, संगीतज्ञ तथा हाथी से प्रेम रखनेवाला होता है। सूर्य. चन्द्र, मंगल, गुरु, शनि (५) सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु और शनि की युति हो तो जातक व्यसनी, दुष्ट, झगड़ालू, डरपोक, दूसरों को दुःख देनेवाला, परधनपहारी, सज्जनों का शत्रु तथा वृक्ष-जैसी आकृति वाला होता है। सूर्य, चन्द्र, मंगल, शुक्र, शनि (६) सूर्य, चन्द्र, मंगल, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक धनहीन, अधर्मी, सब का द्वेषी, परस्त्रीगामी तथा आचार-विचार से हीन होता है। सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र (७) सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक धनी, यशस्वी, चतुर, राजा द्वारा सम्मानित, न्यायाधीश, राज्य-मंत्री तथा सर्वत्र प्रशंसित होता है।
६१८ सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शनि (८) सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु और शनि की युति हो तो जातक ऋणग्रस्त, कायर, उन्मादी, उग्र- स्वभावी, वेश्यागामी, दुष्ट कर्म करने वाला, परान्न पर निर्वाह करने वाला, धूर्त तथा अपने मित्रों से कारण दुःख पाने वाला होता है । १४२२ सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, शनि (९) सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक उत्साही एवं धन, सन्तान, मित्र एवं सुखों से हीन, रोगी शरीर वाला होता है । उसके शरीर पर रोयें अधिक होते हैं तथा कद लम्बा होता है । १४२३ सूर्य, चन्द्र, गुरु, शुक्र, शनि (१०) सूर्य, चन्द्र, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक पण्डित, समर्थ, निर्भय, चंचल, ऐन्द्रजालिक, सुवक्ता, पापी, वाक्छल में प्रवीण, स्त्रियों का प्रिय तथा शत्रुओं द्वारा पीड़ित होता है । १४२४ सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र (११) सूर्य, -मंगल, बुध, गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक धीर, समर्थ, सुन्दर, स्वच्छ, यशस्वी, धन-धान्य तथा सेवकों से युक्त, बहुत घोड़े रखने वाला, सेनापति तथा राजा का प्रिय होता है । १४२५
सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शनि (१२) सूर्य, मंगल, बुध, गुरु और शनि की युति हो तो जातक भिक्षुक, अल्पधनी, जर्जर, मलिन, रोगी, अङ्क, पुत्रवान् तथा उद्विग्न चित्त वाला होता है। सूर्य, मंगल, बुध, शुक्र, शनि (१३) सूर्य, मंगल, बुध, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक दुःखी, स्थान-भ्रष्ट, कुत्सित, दरिद्री, रोगी तथा शत्रुओं से त्रस्त होता है। सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र, शनि (१४) सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक विद्वान्, विचारवान्, तपस्वी, धनी भाई-बन्धुओं से युक्त तथा धातु, यंत्र अथवा रसायन के काम में प्रवीण होता है। वह प्रसिद्धि भी प्राप्त करता है। सूर्य, बुध, गुरु, शुक्र, शनि (१५) सूर्य, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक दयालु, धर्मात्मा, धनी, शास्त्रज्ञ, सुवक्ता, सेनापति, मित्रों का प्रिय तथा माता-पिता और गुरु का भक्त होता है।
६२० चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र (१६) चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु और शुक्र की की युति हो तो जातक विद्वान्, धनवान्, सज्जन, निष्पाप, श्रेष्ठ स्वभाव वाला, बहुत पुत्रों वाला, मित्र- वान् तथा सुखी जीवन बिताने वाला होता है। चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शनि (१७) चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु और शनि की युति हो तो जातक मलिन, पराई सेवा करने वाला तथा अन्न की याचना करने वाला होता है। उसे रतौंधी रोग भी होता है। चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र, शनि (१८) चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक कुरूप, मलिन, निर्धन, मूर्ख, दुष्ट कर्म करने वाला, पर-निन्दक, कठोर-हृदय, नपुंसक तथा अपने मित्रों से ही शत्रुता रखने वाला होता है। चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र, शनि (१९) चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक मलिन, पराई सेवा करने वाला, दूसरों को कष्ट देने वाला, दुष्ट स्वभाव वाला, परन्तु विद्वान् होता है। उसके अनेक मित्र तथा अनेक शत्रु होते हैं।
६२१ चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि (२०) चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक धनी, सुखी, अत्यन्त गुणवान्, विद्वान्, यशस्वी, गणाधीश, लोकपूजित तथा राजा का मंत्री होता है। १५३४ मंगल, बुध गुरु, शुक्र, शनि (२१) मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक चंचल, आलसी, धनी, सुखी, लोकप्रिय, पवित्र वक्ता, दीर्घायु, अधिक सोने वाला तथा तामसी स्वभाव का होता है। १५३५ छः ग्रहों की युति का फलादेश सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र (१) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक यशस्वी, भाग्यवान्, भोगी, धन- धान्य तथा विद्या से युक्त, धर्मात्मा, अल्पभाषी तथा सुखी जीवन बिताने वाला होता है। १५३६ सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शनि (२) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु और शनि की युति हो तो जातक दयालु, परोपकारी, मंगल चिह्न शुद्ध अन्तःकरण वाला, विवाद में विजय पानेवाला तथा वनों में विचरण करनेवाला होता है। १५३७
६२२ सूर्य, चन्द्र, मंगल बुध, शुक्र, शनि (३) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक चिन्तित, प्रत्येक बात में संशय करने वाला, संग्राम अथवा विवाद में विजय पाने वाला, वन-पर्वतों में विचरण करने वाला तथा जातक स्वभाव का होता है। १४३८ सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र, शनि (४) सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक क्रोधी, कृपण, धनी, सुखी, लोभी, सुन्दर, स्त्रियों को प्रिय, भ्रान्त-बुद्धि, राजाओं का कृपापात्र तथा युद्ध करने के लिए तैयार रहने वाला होता है। १४३९ सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि (५) सूर्य, चन्द्र बुध, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक धर्मज्ञ, वेदज्ञ, दयालु, क्षमाशील, स्त्री-विहीन, राज-मन्त्री, राजा द्वारा सम्मानित तथा लोक में प्रसिद्ध होता है। १४४० सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि (६) सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक क्षमाशील, ब्रह्म-विद्या का वेत्ता, भिक्षुक, वनवासी, तीर्थयात्री तथा धन, स्त्री एवं पुत्र से विहीन होता है। १४४१
६२३ चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि (६) चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक धनी, गुणी, यशस्वी, पवित्र हृदय वाला, आलसी, अनेक पत्नियों वाला, गुणवान्, राजमान्य अथवा राजमंत्री होता है। सात ग्रहों की युति का फलादेश सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि यदि सातों ग्रह—सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि एक ही भाव में बैठे हों तो जातक सूर्य के समान तेजस्वी, धनी, दानी, राजाओं द्वारा सम्मानित तथा शिवजी का परम भक्त होता है। स्त्री-जातक सामान्यतः पुरुष अथवा स्त्री की जन्म-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों का फलादेश एक-जैसा ही होता है, परन्तु कुछ ग्रहों की विभिन्न भावों में स्थिति के फलस्वरूप स्त्रियों के सम्बन्ध में उनके फलादेश में अन्तर भी आ जाता है। ऐसे अन्तर वाले फलादेश के विषय में आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए। स्त्रियों के सम्बन्ध में विशिष्ट फलादेश की विस्तृत जानकारी के लिए हमारी लिखी पुस्तक 'स्त्री-जातक' का अध्ययन करना चाहिए। (१) जिस स्त्री के जन्म-काल में लग्न तथा चन्द्रमा सम-राशि पर हो (चित्र १५४४), यह स्त्री स्वाभाविक आकार वाली होती है।
६२४ (२) जिस स्त्री के जन्म-काल में लग्न तथा चन्द्रमा विषम राशि पर हों (चित्र १५४५), वह पुरुष-जैसे आकार वाली होती है। (३) जिस स्त्री के लग्न तथा चन्द्रमा सम-राशि पर हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो (चित्र १५४६), वह श्रेष्ठ शीलवती तथा सुन्दर वस्त्राभूषणों को धारण करने वाली होती है। (४) जिस स्त्री के लग्न तथा चन्द्रमा विषम-राशि पर हों और उन पर पाप-ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो (चित्र १५४७), वह पापिष्ठ तथा बुरे कर्म करने वाली होती है। (५) जिस स्त्री के लग्न तथा चन्द्रमा विषम-राशि पर हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो (चित्र १५४८), तो उसे मध्यम स्वभाव वाली समझना चाहिए।
६२५ (६) जिस स्त्री के लग्न तथा चन्द्रमा सम-राशि पर हों और उस पर पाप-ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो (चित्र १५४६), तो उसे भी मध्यम स्वभाव वाली समझना चाहिए । टिप्पणी : जो ग्रह अधिक बली हो, उसी के अनुसार स्त्री का स्वभाव समझना चाहिए । (७) जिस स्त्री की कुण्डली में जन्म-लग्न अथवा चन्द्रमा से सातवें घर में कोई भी ग्रह न बैठा हो, अथवा निर्बल ग्रह बैठा ही (चित्र १५५०), उसका पति निरुद्यमी होता है । (८) जिस स्त्री की कुण्डली में जन्म-लग्न अथवा सातवें घर पर शत्रु-ग्रहों की दृष्टि न हो (चित्र १५५१), उसका पति भी निरुद्यमी होता है । (६) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के सातवें घर में बुध तथा शनि बैठे हों (चित्र १५५२), उसका पति नपुंसक होता है ।
६२६ (१०) जिस स्त्री के सातवें घर में स्थिर राशि हो (चित्र १५५३), उसका पति सदैव घर में रहता है। (११) जिस स्त्री के सातवें घर में चर राशि हो (चित्र १५५४), उसका पति सदैव परदेश में रहता है। (१२) जिस स्त्री के सातवें घर में द्वि- स्वभाव राशि हो (चित्र १५५५), उसका पति घर तथा परदेश में दोनों जगह रहता है। (१३) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के सप्तमभाव में 'सूर्य' की स्थिति हो (चित्र १५५६), वह अपने पति द्वारा त्याग दी जाती है।
६२७ (१४) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के सप्तमभाव में 'मंगल' की स्थिति हो (चित्र १५५७), वह बाल-विधवा होती है। (१५) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के सप्तम भाव में 'शनि' की स्थिति हो तथा सभी पाप-ग्रहों की उस पर दृष्टि हो (चित्र १५५८), वह अनब्याही ही रह जाती है। यदि विवाह हो भी तो उसके पति की मृत्यु शीघ्र हो जाती है। (१६) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के सप्तम भाव में सभी पाप-ग्रह एकत्र हो गए हों (चित्र १५५६), वह अवश्य विधवा होती है। (१७) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के सप्तमभाव में शुभग्रह बलहीन हों तथा पाप-ग्रह भी हों (चित्र १५६०°), वह अपने पति को छोड़कर दूसरा पति करती है।
६२८ (१८) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के सप्तम भाव में एक पाप-ग्रह बलहीन बैठा हो और उसे कोई शुभ ग्रह देखता न हो (चित्र १५६१), उसे उसका पति त्याग देता है। (१९) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के सातवें घर में चन्द्रमा के साथ मंगल की युति हो (चित्र १५६२), वह अपने पति की आज्ञा से पर- पुरुष-गमन करती है। (२०) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में मेष, वृश्चिक, मकर अथवा कुम्भ में से कोई लग्न हो और उसमें चन्द्रमा तथा शुक्र दोनों ही बैठे हों तथा उन पर पाप-ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो (चित १५६३), तो ऐसी स्त्री अपनी माता के साथ पर-पुरुष-गमन करती है। (२१) जिस स्त्री के जन्म-लग्न में चन्द्रमा और शुक्र दोनों बैठे हों (चित्र १५६४), वह ईर्ष्यालु स्वभाव वाली, दूसरों को सन्ताप देने वाली तथा स्वयं सदैव सुखी रहने वाली होती है।
६२६ (२२) जिस स्त्री के जन्म-लग्न में बुध तथा चन्द्रमा दोनों यह बैठे हों (चित्र १५६५), वह संगीत-कुशल, सुखी, गुणवती, सुन्दरी तथा सब को प्रिय होती है। (२३) जिस स्त्री के जन्म-लग्न में बुध, शुक्र तथा चन्द्रमा—तीनों ही ग्रह बैठे हुए हों (चित्र १५६६), वह अनेक प्रकार के सुखों से युक्त, धनी तथा गुणवती होती है। (२४) जिस स्त्री की कुण्डली में लग्न से आठवें स्थान पर (अष्टम भाव में) कोई पाप-ग्रह बैठा हो तथा दूसरे स्थान में कोई शुभग्रह बैठा हो, (चित्र १५६७), वह अपने पति से पहले मृत्यु को प्राप्त होती है। (२५) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में वृष, वृश्चिक, सिंह अथवा कन्या—इनमें से किसी भी राशि पर चन्द्रमा स्थित हो (चित्र १५६८), वह अल्प-पुत्रवती होती है।
६३० (२६) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली में मंगल, शुभ और बुध बलवान हों तथा लग्न समराशि में हो (चित्र १५६९), वह ब्रह्मविद्या में प्रवीण, अनेक शास्त्रों की जानकार तथा ब्रह्म- वादिनी होती है। (२७) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली के सप्तम भाव में पाप-ग्रह बैठा हो तथा नवम भाव में कोई अन्य ग्रह बैठा हो (चित्र १५७०), वह स्त्री संन्यासिनी हो जाती है। नवें घर में जो ग्रह बैठा हो, उसी की प्रव्रज्या समझनी चाहिए। सूर्य से तपस्विनी, चन्द्रमा से कपालिनी, मंगल से रक्त- वस्त्र-धारिणी, शुक्र से चक्रिणी, शनि से नग्ना, बुध से दण्डी तथा गुरु से यति होती है। (२८) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में केन्द्र में शुभ ग्रह बैठे हों तथा पाप-ग्रह ६, ८ या १२वें घर में हों तथा सप्तम भाव में पुरुष राशि हो (चित्र १५७१), वह शान्त स्वभाव की, ऐश्वर्य- शालिनी, पुत्रवती तथा रानी अथवा रानी-जैसी होती है। (२९) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में बुध लग्न में उच्च का होकर बैठा हो तथा गुरु एकादश भाव में हो (चित्र १५७२), वह ऐश्वर्य- शालिनी, रानी अथवा रानी-जैसी होती है तथा उसकी गणना संसार की प्रसिद्ध स्त्रियों में की जाती है।
६३१ विशिष्ट योग जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों की विशिष्ट स्थिति के कारण विशिष्ट योग भी बनते हैं, जिनका फलादेश सामान्य स्थिति वाले ग्रहों से भिन्न होता है। अगले पृष्ठों में कुछ ऐसे ही विशिष्ट फलादेशों का वर्णन किया जा रहा है। सहस्रों प्रकार के विशिष्ट योगों के फलादेश की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारी लिखी पुस्तक 'योग-रत्नाकर' का अध्ययन करना चाहिए। राजयोग (१) लग्न में चन्द्रमा और गुरु, दसवें भाव में शुक्र एवं तुला, मकर अथवा कुम्भ में शनि हो तो जातक राजा के समान अथवा राजमान्य होता है। (२) दसवें, ग्यारहवें, पहले, दूसरे तथा तीसरे भाव में संपूर्ण शुभ ग्रह बैठे हों तो जातक राजा के समान होता है। (३) गुरु बुध के साथ बैठा हो अथवा बुध के द्वारा दृष्ट हो तथा गुरु, मीन अथवा धनुराशि का होकर, केन्द्र में बैठा हो तो ऐसे जातक की आज्ञा को राजागण भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं।
६३२ (४) चन्द्रमा केन्द्र में हो तथा गुरु लग्न को छोड़ कर, नवम अथवा पंचम दृष्टि से केन्द्र को देख रहा हो, साथ ही बलवान दृष्टि से शुभ को भी देखता हो तो जातक राजा के समान भाग्यशाली होता है। (५) गुरु लग्न में तथा बुध केन्द्र में बैठा हो तथा यह नवम भाव के स्वामी द्वारा दृष्ट भी हो तो जातक राजमान्य होता है। (६) गुरु सातवें, नवें अथवा पाँचवें भाव में बैठा हो तथा लग्नेश की उस पर दृष्टि भी हो तो जातक राजमान्य होता है। (७) शनि केन्द्र, पंचम अथवा नवम भाव में अपनी उच्च राशि अथवा मूल त्रिकोण राशि में हो तथा दशम भाव पर उसकी दृष्टि भी हो तो जातक राजमान्य होता है।
६३३ (८) नवम भाव का स्वामी चन्द्रमा के साथ द्वितीय भाव में बैठा हो तो जातक राजमान्य होता है। १४८० (९) चन्द्रमा मंगल के साथ द्वितीय अथवा तृतीय भाव में बैठा हो अथवा राहु के साथ पंचम भाव में बैठा हो तो जातक राजमान्य होता है। १४८१ (१०) यदि जन्म-काल में पाँच ग्रह उच्च के हों, तो जातक चक्रवर्ती राजा अथवा मंत्री होता है। १४८२ (११) यदि जन्म-काल में बुध उच्च राशि का हो, मंगल तथा शनि मकर राशि में हों तथा गुरु, चन्द्रमा तथा शुक्र तीनों धनु राशि में बैठे हों तो ऐसा जातक महाराजाधिराज होता है। १४८३
६३४ (१२) यदि सूर्य सिंह राशि में, मगल मकर में, शनि कुम्भ में तथा चन्द्रमा मीन राशि में हो तथा लग्न भी मीन ही हो तो ऐसा जातक महाराजा होता है। (१३) यदि मंगल मेष राशि का होकर लग्न में बैठा हो तो ऐसा जातक राजा होता है। (१४) गुरु कर्क लग्न में हो तथा मगल मेष राशि का होकर दशमभाव में बैठा हो तो ऐसा जातक राजनीतिज्ञ एवं शत्रु-जयी राजा होता है। (१५) बृहस्पति उच्च का होकर लग्न में बैठा हो, दशम भाव में मेष का सूर्य हो तथा एकादश भाव में शनि, शुक्र और बुध तीनों बैठेहों, तो ऐसा जातक अत्यन्त पराक्रमी राजा होता है।