भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

· श्रीकृष्णजन्मखण्ड · ७४१

मरवा डाला। इसके बाद नगर-निर्माणका क्रम चालू किया।

**श्रीभगवान्ने कहा—**विश्वकर्मन्! तुम पद्मराग, मरकत, सर्वश्रेष्ठ इन्द्रनील, मनोहर पारिभद्र, पलंक, स्यमन्तक, गन्धक, गालिम, चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, स्फटिककी रची हुई पुतलियों, पीली-श्याम-श्वेत और नीली मणियों, दाडिमी-बीजके सदृश पीली गोरोचना, पद्म-बीजके सदृश, नीले कमलके-से रंगवाली, कज्जलके-से आकारवाली, उज्ज्वल, परिष्कृत, श्वेत चम्पकके सदृश कान्तिमती, तपाये हुए स्वर्णकी-सी चमकीली, स्वर्णके मूल्यसे सौगुनी अधिक मूल्यवाली, थोड़ी-थोड़ी लाल, परम सुन्दर, वजनदार, सर्वोत्तम और पूजनीय उत्तम मणियोंद्वारा वास्तु-शास्त्रके विधानानुसार यथायोग्य घटा-बढ़ाकर एक ऐसे मनोवाञ्छित परम मनोहर नगरकी रचना करो, जो सौ योजनके विस्तारवाला हो। जबतक तुम नगरका निर्माण करोगे, तबतक यक्षगण हिमालयसे रात-दिन मणियोंको लाते रहेंगे। कुबेरकी प्रेरणासे आये हुए सात लाख यक्ष, शंकरद्वारा भेजे हुए एक लाख बेताल और एक लाख कूष्माण्ड तथा गिरिराजनन्दिनीद्वारा नियुक्त किये हुए दानव और ब्रह्मराक्षस तुम्हारे सहायक बने रहेंगे। मेरी सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियोंके लिये ऐसे दिव्य शिविर तैयार करो, जो खाइयोंसे युक्त तथा ऊँची-ऊँची चहारदीवारियोंसे परिवेष्टित हों। जिनमें प्रत्येकमें बारह कमरे और सिंहद्वार लगे हों, जो चित्र-विचित्र कृत्रिम किवाड़ोंसे युक्त हों; निषिद्ध वृक्षोंसे रहित और प्रसिद्ध वृक्षोंसे सम्पन्न हों और जिनके आँगन शुभ लक्षणयुक्त और चन्द्रवेध हों। इसी प्रकार यदुवंशियों और नौकरोंके लिये भी दिव्य आश्रम बनाओ। भूपाल उग्रसेनका भवन सर्वप्रसिद्ध तथा मेरे पिता वसुदेवजीका आश्रम सर्वतोभद्र होना चाहिये।

**तब विश्वकर्मा बोले—**जगद्गुरो! वे प्रशस्त वृक्ष कौन-कौन हैं और कौन निषिद्ध हैं तथा शुभ-अशुभ प्रदान करनेवाले कौन हैं? उन सबका परिचय दीजिये। प्रभो! साथ ही यह भी बतलाइये कि किनकी अस्थि पड़नेसे शिविर शुभ और किनकी अस्थिसे अशुभ होता है? शिविरकी किस दिशामें जल मङ्गलकारक और किस दिशामें अमाङ्गलिक होता है? और कौन वृक्ष किस दिशामें कल्याणप्रद होता है? सुरेश्वर! गृहों तथा अँगनोंका विस्तार कितना होना चाहिये? किस दिशामें पुष्पोद्यान मङ्गलप्रद होता है? सुरेश्वर! परकोटों, खाइयों, दरवाजों, गृहों और चहारदीवारियोंका क्या प्रमाण है? प्रभो! शिविर-निर्माणमें किस-किस वृक्षकी लकड़ी प्रशस्त मानी गयी है और किन वृक्षोंके काष्ठ अमङ्गलजनक होते हैं? यह सब मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।

**श्रीभगवान्ने कहा—**देवशिल्पिन्! गृहस्थोंके आश्रममें नारियलका वृक्ष धन प्रदान करनेवाला होता है। वही वृक्ष यदि शिविरके ईशानकोण अथवा पूर्व दिशामें हो तो पुत्रप्रद होता है। वह मनोहर वृक्षराज सर्वत्र मङ्गलका दाता होता है। यदि पूर्व दिशामें आमका वृक्ष हो तो वह मनुष्योंको सम्पत्ति प्रदान करता है और सर्वत्र शुभदायक होता है। बेल, कटहल, जम्बीरी नींबू तथा बेरके वृक्ष पूर्व दिशामें संतानदायक, दक्षिणमें धनदाता तथा सर्वत्र सम्पत्तिप्रद होते हैं। इनसे गृहस्थकी उन्नति होती है। जामुन, अनार, केला तथा आमलाके वृक्ष पूर्वमें बन्धुप्रद तथा दक्षिणमें मित्रकी वृद्धि करनेवाले होते हैं और सर्वत्र शुभदायक होते हैं। सुवाक दक्षिणमें धन-पुत्र-शुभप्रद, पश्चिममें हर्षदायक और ईशानकोणमें तथा सर्वत्र सुखद होता है। भूतलपर चम्पाका वृक्ष शुद्ध तथा सर्वत्र मङ्गलकारक होता है। लौकी, कुम्हड़ा, आयाम्बु, पलाश, खजूर और कर्कटीके वृक्ष शिविरमें मङ्गलप्रद होते हैं। विश्वकर्मन्! बेल और बैंगनके पौधे भी शुभदायक

८०- रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह, बारातकी बिदाई, भीष्मकद्वारा दहेज-दान और द्वारकामें मङ्गलोत्सव

७४२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

होते हैं। सारी फलवती लताएँ निश्चय ही सर्वत्र शुभदायिनी होती हैं। शिल्पिन्! इस प्रकार प्रशस्त वृक्षोंका वर्णन कर दिया गया; अब निषिद्धका वर्णन सुनो।

नगर अथवा शिविरमें वन्यवृक्षका रहना निषिद्ध है। शिविरमें वटवृक्षका रहना ठीक नहीं है; क्योंकि उससे सदा चोरका भय लगा रहता है, किंतु नगरोंमें उसका रहना उत्तम है; क्योंकि उसके दर्शनसे पुण्य होता है। नगर, गाँव और शिविरमें सेमलके वृक्षका रहना सर्वथा निषिद्ध है। वह सदा राजाओंको दुःख देता रहता है। हे देवशिल्पी! इमलीका वृक्ष नगरों और गाँवोंमें तो प्रशस्त है; परंतु शिविरमें उसका रहना ठीक नहीं है। वह विद्या-बुद्धिका विनाशक तथा सदा दुःखदायक होता है। उससे निश्चय ही प्रजा और धनकी हानि होती है; अतः विद्वान्‌को उचित है कि यत्नपूर्वक उसका परित्याग कर दे। खजूर और काँटेदार वृक्ष भी शिविरमें नहीं रहने चाहिये; क्योंकि वे विद्या और बुद्धिको नष्ट कर देनेवाले होते हैं; अतः उनसे दूर रहना ही ठीक है। गाँवों और नगरोंमें चना आदि अन्नोंके पेड़ मङ्गलप्रद होते हैं। गाँव, नगर तथा शिविरमें गन्नेका वृक्ष सदा शुभदायक होता है। अशोक, सिरिस और कदम्ब शुभप्रद होते हैं। हल्दी, अदरक, हरीतकी और आमलकी—ये गाँवों तथा नगरोंमें सदा शुभदायिनी तथा कल्याणकारिणी होती हैं।

वास्तुभूमिमें स्थापन करनेवालोंके लिये गजकी अस्थि शुभदायिनी और उच्चैःश्रवाके वंशज घोड़ोंकी हड्डी कल्याणकारिणी होती है। इनके अतिरिक्त अन्य पशुओंकी अस्थि शुभकारक नहीं होती; वह विनाशका कारण होती है। वानरों, मनुष्यों, गदहों, गौओं, कुत्तों, सियारों और बिलावोंकी हड्डी अमङ्गलकारिणी होती है। शिविरके पूर्व, पश्चिम, उत्तर और ईशानकोणमें जलका रहना उत्तम है। इनके अतिरिक्त अन्य दिशाओंमें अशुभ होता है। शिल्पिन्! बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जिसकी लंबाई-चौड़ाई समान हो, ऐसा घर न बनावें; क्योंकि चौकोर गृहमें वास करना गृहस्थोंके धनका नाशक होता है। घरकी परिमित लंबाई-चौड़ाईमें पृथक्-पृथक् दोका भाग देनेसे यदि शेष शून्यरहित हो तो शुभ अन्यथा शून्य शेष आनेपर वह घर मनुष्योंके लिये शून्यप्रद होता है। गृहोंकी चौड़ाईमें पश्चिमसे दो हाथ पूर्व और लंबाईमें दक्षिणसे तीन हाथ हटकर घरका तथा परकोटेका द्वार रखना शुभदायक होता है। मध्यभागमें दरवाजा नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि वह कुछ कम-बेशमें ही रखनेपर शुभकारक होता है। चौकोर घर चन्द्रवेध होनेपर मङ्गलप्रद होता है; परंतु मङ्गलप्रद गृह भी सूर्यवेध होनेपर अमङ्गलकारक हो जाता है। उसी प्रकार सूर्यवेध आँगन भी अमङ्गलदायक होता है। घरके भीतर लगायी हुई तुलसी मनुष्योंके लिये कल्याणकारिणी, धन-पुत्र प्रदान करनेवाली, पुण्यदायिनी तथा हरिभक्ति देनेवाली होती है। प्रातःकाल तुलसीका दर्शन करनेसे सुवर्ण-दानका फल प्राप्त होता है। मकानके पूर्व और दक्षिणभागमें मालती, जूही, कुन्द, माधवी, केतकी, नागेश्वर, मल्लिका (मोतिया), काञ्चन (श्याम धतूर), मौलसिरी और शुभदायिनी अपराजिता (विष्णुक्रान्ता)—इन पुष्पोंका उद्यान शुभद होता है; इसमें तनिक भी संशय नहीं है। गृहस्थको सोलह हाथसे ऊँचा गृह नहीं बनवाना चाहिये। इसी तरह बीस हाथसे ऊँचा परकोटा भी शुभप्रद नहीं होता। बुद्धिमान् पुरुषको घरके समीप तथा गाँवके बीचमें बढ़ई, तेली और सोनारको नहीं बसाना चाहिये; किंतु मकानके पास-पड़ोसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सत्‌शूद्र, ज्योतिषी, भाट, वैद्य और पुष्पकार (माली)-को अवश्य रहने देना चाहिये। शिविरके चारों ओर

१०९- रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७४३

सौ हाथ लंबी और दस हाथ गहरी खाई प्रशस्त मानी जाती है। उस खाईका दरवाजा भी ऐसा संकेतयुक्त होना चाहिये, जो शत्रुके लिये अगम्य हो; परंतु मित्र सुखपूर्वक आ-जा सकें। भवन-निर्माणमें सेमल, इमली, हिंताल (एक प्रकारका जंगली खजूर), नीम, सिन्धुवार (निर्गुण्डी), गूलर, धतूरा, बरगद और रेंड—इनके अतिरिक्त अन्य वृक्षोंकी ही लकड़ी काममें लानी चाहिये। वस्तुतस्तु बुद्धिमान्‌को लकड़ी, वज्रहस्त तथा शिला आदिका उपयोग न करना ही उचित है; क्योंकि ये स्त्री, पुत्र और धनके नाशक होते हैं—ऐसा कमलजन्मा ब्रह्माका कथन है। वत्स! यह सब मैंने लोक-शिक्षाके लिये कहा है। अब तुम सुखपूर्वक जाओ और बिना काष्ठके ही पुरीका निर्माण करो; क्योंकि उसके लिये यही शुभ मुहूर्त है।

तब विश्वकर्मा गरुड़के साथ श्रीहरिको नमस्कार करके वहाँसे चल दिये और समुद्र-तटपर मनोहर वटवृक्षके नीचे आकर उन्होंने गरुड़के साथ वहाँ रात्रिमें शयन किया। मुने! स्वप्नमें गरुड़को वह रमणीय द्वारकापुरी दिखायी पड़ी। परमात्मा श्रीकृष्णने विश्वकर्मासे जो कुछ कहा था, वे सारे-के-सारे लक्षण उन्हें उस नगरमें दृष्टिगोचर हुए। स्वप्नमें वे सभी कारीगर विश्वकर्माकी और दूसरे बलवान् गरुड़ पक्षी गरुड़की हँसी उड़ा रहे थे। जागनेपर उस पुरीको देखकर गरुड़ और विश्वकर्मा लज्जित हो गये। वह द्वारकापुरी अत्यन्त रमणीय थी और सौ योजनमें उसका विस्तार था। वह ब्रह्मा आदि देवताओंकी पुरियोंको पराभूत करके सुशोभित हो रही थी; उसमें रत्नोंकी कारीगरी की गयी थी, जिसके कारण उसके तेजसे सूर्य ढक गये थे।

श्रीनारायणजी कहते हैं—नारद! इसी समय ब्रह्मा, हर, पार्वती, अनन्त, धर्म, सूर्य, अग्नि, कुबेर, वरुण, वायु, यम, महेन्द्र, चन्द्र, रुद्र, आदित्य, वसु, दैत्य, गन्धर्व, किंनर आदि सब द्वारकापुरी देखने आये। आकाश दर्शनार्थियोंके विमानोंसे छा गया। सबने मनोहर रत्नमयी शोभायुक्त दिव्य द्वारकाको देखा। वहाँ भगवान्‌के स्मरण करते ही वसुदेव, देवकी, उग्रसेन, पाण्डवगण, नन्द, यशोदा, गोप-गोपी, विभिन्न देशोंके राजा, संन्यासी, यति, अवधूत और ब्रह्मचारी आ गये। पञ्चवर्षीय दिगम्बर चारों सनकादि मुनि, दुर्वासा, कश्यप, वाल्मीकि, गौतम, बृहस्पति, शुक्र, भरद्वाज, अङ्गिरा, प्रचेता, पुलस्त्य, अगस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, मरीचि, शतानन्द, ऋष्यशृंग, विभाण्डक, पाणिनि, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, शुक, पराशर, च्यवन, गर्ग, सौभरि, गालव, लोमश, मार्कण्डेय, वामदेव, जैगीषव्य, सांदीपनि, वोढु, पञ्चशिख, मैं (नारायण), नर, विश्वामित्र, जरत्कारु, आस्तीक, परशुराम, वात्स्य, संवर्त, उतथ्य, जैमिनि, पैल, सुमन्त, व्यास, कपिल, शृंगी, उपमन्यु, गौरमुख, कच, द्रोण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य आदि अपने असंख्य शिष्योंसहित पधारे; तथा भीष्म, कर्ण, शकुनि, भ्राताओंसहित दुर्योधन आदि सब आये। उग्रसेन आदिने उन सबका स्वागत-सत्कार किया।

देवताओं और मुनियोंका स्वागत-सत्कार करनेपर उन लोगोंने उग्रसेन आदिको विविध उपहार दिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको मणि, रत्न और वस्त्र आदि दान किये गये। उग्रसेनका राज्याभिषेक हुआ और सब लोग परमानन्दित होकर अपने-अपने घर लौटे। (अध्याय १०३-१०४)


८१- श्रीकृष्णके कहनेसे नन्द-यशोदाका ज्ञानप्राप्तिके लिये कदलीवनमें राधिकाके पास जाना, वहाँ अचेतनावस्थामें पड़ी हुई राधाको श्रीकृष्णके सन्देशद्वारा चैतन्य करना और राधाका उपदेश देनेके लिये उद्यत होना

७४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण भीष्मकद्वारा रुक्मिणीके विवाहका प्रस्ताव, शतानन्दका उन्हें श्रीकृष्णके साथ विवाह करनेकी सम्मति देना, रुक्मीद्वारा उसका विरोध और शिशुपालके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भीष्मकका श्रीकृष्ण तथा अन्यान्य राजाओंको निमन्त्रित करना श्रीनारायणजी कहते हैं - नारद ! विदर्भ देशमें भीष्मक नामके एक राजा राज्य करते थे, जो नारायणके अंशसे उत्पन्न हुए थे। वे विदर्भदेशीय नरेशोंके सम्राट्, महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, पुण्यात्मा, सत्यवादी, समस्त सम्पत्तियोंके दाता, धर्मिष्ठ, अत्यन्त महिमाशाली, सर्वश्रेष्ठ और समादृत थे। उनके एक कन्या थी, जिसका नाम रुक्मिणी था। वह महालक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थी तथा नारियोंमें श्रेष्ठ, अत्यन्त सौन्दर्यशालिनी, मनोहारिणी और सुन्दरी स्त्रियोंमें पूजनीया थी। उसमें नयी जवानीका उमंग था। वह रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके शरीरकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति उद्दीप्त थी। वह अपने तेजसे प्रकाशित हो रही थी तथा शुद्धसत्त्वस्वरूपा, सत्यशीला, पतिव्रता, शान्त, दमपरायणा और अनन्त गुणोंकी भण्डार थी। वह शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके सदृश शोभाशालिनी थी। उसके नेत्र शरत्कालीन कमलके-से थे और उसका मुख लज्जासे अवनत रहता था। अपनी उस सुन्दरी युवती कन्याको सहसा विवाहके योग्य देखकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, धर्मस्वरूप एवं धर्मात्मा राजा भीष्मक चिन्तित हो उठे। तब वे अपने पुत्रों, ब्राह्मणों तथा पुरोहितोंसे विचार- विमर्श करने लगे। भीष्मक बोले - सभासदो ! मेरी यह सुन्दरी कन्या बढ़कर विवाहके योग्य हो गयी है; अतः मैं इसके लिये मुनिपुत्र, देवपुत्र अथवा राजपुत्र - इनमेंसे किसी अभीष्ट उत्तम वरका वरण करना चाहता हूँ। अतः आपलोग किसी ऐसे योग्य वरकी तलाश करो, जो नवयुवक, धर्मात्मा, सत्यसंध, नारायणपरायण, वेद-वेदाङ्गका विशेषज्ञ, पण्डित, सुन्दर, शुभाचारी, शान्त, जितेन्द्रिय, क्षमाशील, गुणी, दीर्घायु, महान् कुलमें उत्पन्न और सर्वत्र प्रतिष्ठित हो । राजाधिराज भीष्मककी बात सुनकर महर्षि गौतमके पुत्र शतानन्द, जो वेद-वेदाङ्गके पारगामी विद्वान्, यथार्थज्ञानी, प्रवचनकुशल, विद्वान्, धर्मात्मा, कुलपुरोहित, भूतलपर सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता और समस्त कर्मोंमें निष्णात थे, राजासे बोले। शतानन्दने कहा - राजेन्द्र ! तुम तो स्वयं ही धर्मके ज्ञाता तथा धर्मशास्त्रमें निपुण हो; तथापि मैं वेदोक्त प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ, सुनो। जो परिपूर्णतम परमेश्वर ब्रह्माके भी विधाता हैं; ब्रह्मा, शिव और शेषद्वारा वन्दित, परमज्योतिःस्वरूप, भक्तानुग्रहमूर्ति, समस्त प्राणियोंके परमात्मा, प्रकृतिसे परे, निर्लिप्त, इच्छारहित और

११०- श्रीकृष्णके कहनेसे नन्द-यशोदाका ज्ञानप्राप्तिके लिये कदलीवनमें राधाके पास जाना और अचेतन अवस्थामें पड़ी राधाको चैतन्य करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७४५


सबके कर्मोंके साक्षी हैं; वे स्वयं श्रीमान् नारायण पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूतलपर वसुदेवनन्दनके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। राजेन्द्र! उन परिपूर्णतमको कन्या-दान करके तुम अपनी सौ पीढ़ियोंके साथ गोलोकमें जाओगे। अतः उन्हें कन्या देकर परलोकमें सारूप्य-मुक्ति प्राप्त कर लो और इस लोकमें सर्वपूज्य तथा विश्वके गुरुके गुरु हो जाओ। विभो! सर्वस्व दक्षिणामें देकर महालक्ष्मी-स्वरूपा रुक्मिणीको उन्हें समर्पित कर दो और अपने जन्म-मरणके चक्करको नष्ट कर डालो। राजन्! ब्रह्माने यही सम्बन्ध लिख रखा है और यह सर्वसम्मत भी है; अतः शीघ्र ही द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णके पास ब्राह्मण भेजो और जल्दी-से-जल्दी जो सभीको सम्मत हो, ऐसा शुभ मुहूर्त निश्चित करके परमात्मा श्रीकृष्णको—जो भक्तानुग्रह-मूर्ति, ध्यानानुरोधके कारण, नित्यविग्रहधारी और सर्वोत्तम हैं—यहाँ बुलाओ। नरेश! इस प्रकार उनके दर्शन करके अपना आवागमन मिटा डालो। महाराज! जिन्हें चारों वेद, संत, देवगण, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र तथा ब्रह्मा आदि देवता नहीं जान पाते; ध्यानपूत योगीलोग जिनका ध्यान करते हैं; परंतु साक्षात्कार नहीं कर पाते; चारों वेद, छहों शास्त्र और सरस्वती जिनका गुणगान करनेमें जड हो जाती है; हजार मुखवाले शेषनाग, पाँच मुखधारी महेश्वर, चार मुखवाले जगत्स्रष्टा ब्रह्मा, कुमार कार्तिकेय, ऋषि, मुनि तथा परम वैष्णव भक्तगण जिनका स्तवन करके पार नहीं पाते; जो योगियोंके लिये ध्यानद्वारा साध्य हैं; उन श्रीकृष्णका गुण मैं बालक होकर किस प्रकार वर्णन कर सकता हूँ?

शतानन्दजीका वचन सुनकर राजाका मुख प्रफुल्लित हो उठा। उन्होंने वेगपूर्वक उठकर शतानन्दजीका आलिङ्गन किया। उस समय राजाके मुखपर प्रसन्नता खेल रही थी; उन्होंने शतानन्दजीको नाना प्रकारके रत्न, सुवर्ण, वस्त्र, रत्ननिर्मित आभूषण, गजराज, श्रेष्ठ अश्व, मणिनिर्मित रथ, रमणीय रत्नसिंहासन, बहुत-सा धन, सम्पूर्ण अन्नोंसे भरी हुई ऐसी उत्तम भूमि, जो बिना जोते अन्न उपजानेवाली तथा सदा वृष्टि करनेवाली थी और सबके द्वारा प्रशंसित गाँव दिये। इसी बीच राजकुमार रुक्मि—जो चञ्चल स्वभाववाला तथा अधर्मी था—कुपित हो उठा। क्रोधावेशमें उसके मुख और नेत्र लाल हो गये तथा उसका शरीर काँपने लगा। वह सभामें उठकर सभी सभासदोंके समक्ष खड़ा हो गया और पिता भीष्मक तथा विप्रवर शतानन्दजीसे बोला।

रुक्मिने कहा—राजेन्द्र! इन भिक्षुकों, लोभियों और क्रोधियोंकी बात छोड़िये तथा मेरा हितकारक, तथ्य एवं प्रशंसनीय वचन सुनिये। महाबाहो! कृष्णने भयवश युक्तिका आश्रय लेकर राजेन्द्र मुचुकुन्दके सामने कालयवनका वध करके उसका सारा धन हड़प लिया है। उसी कालयवनका धन पाकर ही कृष्ण द्वारकामें धनी हो गये हैं। उन्होंने एक जरासंधके भयसे डरकर समुद्रके भीतर घर बनाया है। परंतु ऐसे सैकड़ों जरासंधोंको मैं अकेले ही क्षणभरमें खेल-ही-खेलमें मार सकता हूँ; फिर किसी अन्य राजाकी तो बात ही क्या है? भीष्मक! मैं दुर्वासाका शिष्य हूँ और रणशास्त्रमें निपुण हूँ। अपने उसी ज्ञानके बलसे मैं निश्चय ही विश्वका संहार करनेमें समर्थ हूँ। मेरे समान बलवान् या तो परशुरामजी हैं या शिशुपाल ही मेरी समता कर सकता है। वह शिशुपाल मेरा सखा, बलवान्, शूरवीर और स्वर्गको भी जीत लेनेकी शक्ति रखता है। मैं भी क्षणभरमें गणसहित महेन्द्रको जीतनेमें समर्थ हूँ। नरेश्वर! दुर्बल एवं योगी जरासंधको युद्धमें जीतकर श्रीकृष्णको अहंकार हो गया है। वे अपने मन अपनेको वीर मानने लगे हैं; परंतु यदि वे विवाह करनेकी इच्छासे मेरे नगरमें आयेंगे तो मैं क्षणभरमें निश्चय ही उन्हें यमलोक पहुँचा दूँगा।

८२- राधिकाद्वारा 'राम' आदि भगवन्नामोंकी व्युत्पत्ति और उनकी प्रशंसा तथा यशोदाके पूछनेपर अपने 'राधा' नामकी व्याख्या करना.

७४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जो वैश्यजातीय नन्दका पुत्र, गौओंका चरवाहा, गोपाङ्गनाओंका लम्पट और ग्वालोंकी जूठन खानेवाला है, उसे आप कन्या देना स्वीकार करते हैं। यह महान् आश्चर्यकी बात है! राजेन्द्र! इस बकवादीके वचनसे आपकी बुद्धि मारी गयी है; इसी कारण इस भिक्षुक ब्राह्मणके कहनेसे आप देवयोग्या रुक्मिणीको श्रीकृष्णके हाथों सौंपना चाहते हैं। अरे! वह तो न राजपुत्र है, न शूरवीर है, न कुलीन है, न पवित्र आचरणवाला है, न दाता है, न धनी है, न योग्य है और न जितेन्द्रिय ही है। इसलिये भूपाल! आप शिशुपालको कन्या दीजिये; क्योंकि वह सुपूत एवं राजाधिराजका पुत्र है तथा अपने बलसे रुद्रको भी संतुष्ट कर चुका है। राजन्! अब शीघ्र ही पत्र भेजकर विभिन्न देशोंमें उत्पन्न हुए नरेशों, भाई-बन्धुओं तथा मुनिवरोंको निमन्त्रित कीजिये।

तदनन्तर रुक्मीकी बात सुनकर पुरोहितसहित राजेन्द्र भीष्मकने एकान्त स्थानमें मन्त्रीके साथ पूर्णरूपसे सलाह की। तत्पश्चात् जो सबको अभीष्ट था, ऐसा शुभ लग्न निश्चित करके एक योग्य एवं अन्तरङ्ग ब्राह्मणको द्वारका भेजनेकी व्यवस्था की। इधर राजा तुरंत ही हर्षपूर्वक सामग्री जुटानेमें लग गये और पुत्रके कहनेसे उन्होंने चारों ओर निमन्त्रण-पत्र भेज दिये। उधर उस ब्राह्मणने सुधर्मा-सभामें, जो राजाओं तथा देवताओंसे परिवेष्टित थी; पहुँचकर राजा उग्रसेनको वह मङ्गल-पत्रिका दी। उस परम माङ्गलिक पत्रको सुनकर राजा उग्रसेनका मुख प्रफुल्लित हो उठा। उन्होंने हर्षमें भरकर ब्राह्मणोंको हजारों स्वर्णमुद्राएँ दान कीं और द्वारकामें चारों ओर दुन्दुभिका शब्द कराकर घोषणा करा दी। श्रीकृष्णकी उस बारातमें बड़े-बड़े देवता, मुनि, राजागण, यादवगण, कौरव, पाण्डव, विद्वान् ब्राह्मण, माली, शिल्पी, गायक, गन्धर्व आदि सम्मिलित हुए। उस समय उपबर्हण नामक गन्धर्वके रूपमें तुम नारद भी बारातके साथ थे। (अध्याय १०५)


रेवती और बलरामके विवाहका वर्णन तथा रुक्मी, शाल्व, शिशुपाल और दन्तवक्रका श्रीकृष्णको कटुवचन कहना

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इसी समय महाबली राजा ककुद्मी अपनी कन्याके लिये वरकी तलाशमें ब्रह्मलोकसे भूतलपर आये। उनकी कन्याका नाम रेवती था। वह निरन्तर स्थिर यौवनवाली, अमूल्य रत्नोंसे विभूषित और तीनों लोकोंमें दुर्लभ थी। उसकी आयुके सत्ताईस युग बीत चुके थे। राजाने कौतुकवश अपनी उस कन्याको महाबली बलदेवको ब्याह दिया। इस प्रकार मुनियों तथा देवेन्द्रोंकी सभामें विधानपूर्वक कन्यादान करके राजाने लाखों-लाखों हाथी, घोड़े, रथ, रत्नाभूषण, मणि-रत्न, करोड़ों स्वर्णमुद्राएँ जामाताको दहेजमें दीं तथा सुन्दर दिव्य वस्त्रादि दिये। यों बलशाली बलदेवको कन्या देकर राजेन्द्र ककुद्मी अमूल्य रत्नोंके सारसे निर्मित रथद्वारा कुण्डिन-नगरको गये। तदनन्तर उस वैवाहिक मङ्गल-कार्यके समाप्त होनेपर देवकी, रोहिणी, नन्दपत्नी यशोदा, अदिति, दिति और शान्तिने जय-जयकार करके रेवतीको, जो नारियोंमें श्रेष्ठ तथा लक्ष्मीकी कलास्वरूपा थीं, महलमें प्रवेश कराया। तत्पश्चात् वसुदेवजीकी प्रियतमा पत्नी देवकीने हर्षपूर्वक सारा मङ्गल-कार्य सम्पन्न कराया और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें धन दान दिया।

तदनन्तर देवताओं और मुनियोंका समुदाय तथा देश-देशान्तरके नरेश आनन्दमग्न हो अपनी-अपनी सेनाओंके साथ सहसा कुण्डिन-नगरमें

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७४७

आ पहुँचे। उन सब लोगोंने उस परम मनोहर नगरका अवलोकन किया। बारातियोंने उस नगरके बाहरी दरवाजेको देखा; चार महारथी सैनिकोंके साथ उसकी रक्षा कर रहे थे। उनके नाम थे—रुक्मी, शिशुपाल, महाबली दन्तवक्र और मायावियोंमें श्रेष्ठ एवं युद्ध-शास्त्रमें निपुण शाल्व। उस समय राजकुमार रुक्मि, जो युद्धके लिये उद्यत हो नाना शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित रथपर सवार था, श्रीकृष्णकी सेनाका अवलोकन करके कुपित हो उठा और

ऐसे निष्ठुर वचन कहने लगा जो कर्णकटु, अत्यन्त दुष्कर तथा मुनीन्द्रों, देवगणों और मुनिवरोंके लिये उपहासास्पद थे।

रुक्मिने कहा—अहो! कालकृत कर्म और दैवको कौन हटा सकता है? भला, मैं देवेन्द्रोंकी सभामें क्या कहूँगा; क्योंकि जो नन्दके पशुओंका रखवाला, गोपियोंका साक्षात् लम्पट और ग्वालोंकी जूठन खानेवाला है तथा जिसकी जाति, खान-पान और उत्पत्तिका कोई निर्णय ही नहीं है; यह भी पता नहीं कि क्या वह राजकुमार है अथवा किसी मुनिका पुत्र है; जिसके पिता वसुदेव क्षत्रिय हैं, परंतु जिसका भरण-पोषण वैश्यके घर हुआ है; जिस दुष्टने अभी हालमें ही मथुरामें धर्मात्मा राजा कंसको मार डाला है, अतः उस राजेन्द्रके वधसे जिसे निश्चय ही ब्रह्महत्या लगी है; वह कृष्ण देवताओं और मुनियोंके साथ देवयोग्य मनोहारिणी कन्या रुक्मिणीको ग्रहण करनेके लिये आ रहा है। फिर शाल्व, शिशुपाल और दन्तवक्रने भी कुवाक्य कहे। इन सबके दुर्वचनोंको सुनकर बारातमें आये हुए देवता, मुनि, राजागण और बलदेवजीसहित यादवोंको क्रोध आ गया। (अध्याय १०६)


रुक्मी आदिका यादवोंके साथ युद्ध, शाल्वका वध, रुक्मीकी सेनाका पलायन, बारातका पुरीमें प्रवेश और स्वागत-सत्कार, शुभलग्नमें श्रीकृष्णका बारातियों तथा देवोंके साथ राजाके आँगनमें जाना, भीष्मकद्वारा सबका सत्कार करके श्रीकृष्णका पूजन

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर बलदेवजीने हलके द्वारा रुक्मिका रथ भङ्ग कर दिया। फिर तो घोर युद्ध आरम्भ हो गया। शाल्व मारा गया। बलदेवजी शिशुपालको मार रहे थे; परंतु उसे श्रीकृष्णके द्वारा मारे जानेवाला समझकर शिवजीने बलदेवजीको रोक दिया। बलदेवजीके विक्रमको देखकर सब इधर-उधर भाग गये।

तब महामुनि शतानन्दजीने आकर अभ्यर्थना की। बारातने पुरीमें प्रवेश किया। बड़ा भारी स्वागत-सत्कार किया गया। उस समयकी वर-रूपमें सुसज्जित श्रीकृष्णकी शोभा अवर्णनीय थी। उनके शरीरकी कान्ति नूतन जलधरके समान

७४८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्याम थी, वे पीताम्बरसे सुशोभित थे, उनके सर्वाङ्गमें चन्दनका अनुलेप किया गया था, वे वनमालासे विभूषित तथा रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और हिलते हुए हारसे प्रकाशित हो रहे थे, उनके कपोल रत्ननिर्मित दोनों कुण्डलोंसे उद्भासित हो रहे थे, कटिभागमें अमूल्य रत्नोंके सारभागसे बनी हुई करधनीकी मधुर झंकार हो रही थी, जिससे उनकी शोभा और बढ़ गयी थी, उनके एक हाथमें मुरली सुशोभित थी, वे मुस्कराते हुए रत्नजटित दर्पणकी ओर देख रहे थे, सात गोप-पार्षद श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रहे थे, उनका शरीर नवयौवनके उमंगसे सम्पन्न था, नेत्र शरत्कालीन कमलके-से सुन्दर थे, मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी निन्दा कर रहा था, वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो रहे थे और उनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंका मान हर रहा था। वे सत्य, नित्य, सनातन, तीर्थोंको पावन करनेवाले, पवित्रकीर्ति तथा ब्रह्मा, शिव और शेषनागद्वारा वन्दित हैं। उनका रूप परम आह्लादजनक था तथा उनकी प्रभा करोड़ों चन्द्रमाओंके सदृश थी। वे ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, परमोत्कृष्ट तथा प्रकृतिसे परे हैं। वे दूर्वासहित रेशमी सूत्र, अमूल्य रत्नजटित दर्पण और कंघी करके ठीक की हुई कदलीकी खिली हुई मञ्जरी धारण किये हुए थे। उनकी शिखा मालतीकी मालाओंसे विभूषित त्रिविक्रमके-से आकारवाली थी। उनका मस्तक नारियोंद्वारा दिये गये पुष्पमय मुकुटसे उद्दीप्त हो रहा था। ऐसे ऐश्वर्यशाली वरको देखकर युवतियाँ प्रेमवश मूर्च्छित हो गयीं और कहने लगीं कि ‘रुक्मिणीका जीवन धन्य एवं परम श्लाघनीय है।' जब महारानी भीष्मक-पत्नीकी दृष्टि अपने जामातापर पड़ी तब वे परम प्रसन्न हुईं। उनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। वे निर्निमेष दृष्टिसे उनकी ओर निहारने लगीं। राजा भीष्मक भी अपने पुरोहित तथा मन्त्रियोंसहित परम हर्षित हुए। उन्होंने वहाँ आकर देवताओं, ब्राह्मणों तथा समस्त प्राणियोंको प्रणाम किया और उन सबको अमृतोपम भक्ष्यसामग्रियोंसे परिपूर्ण यथायोग्य वासस्थान दिया। वहाँ रात-दिन 'दीयताम्, दीयताम्—देते रहो, देते जाओ'—यही शब्द गूँज रहे थे।

उधर वसुदेवजीने देवताओं तथा भाई-बन्धुओंके साथ सुखपूर्वक वह रात व्यतीत की। प्रातःकाल उठकर उन्होंने शौच आदि प्रातःकृत्य समास किया। फिर स्नान करके शुद्ध धुली हुई धोती और चद्दर धारण करके संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म सम्पन्न किया। तत्पश्चात् वेदमन्त्रद्वारा श्रीहरिका शुभ अधिवासन (मूर्ति-प्रतिष्ठा) किया। फिर साक्षात् सम्पूर्ण देवताओं तथा सारी मातृकाओंका भलीभाँति पूजन और वसुधारा प्रदान करके वृद्धिश्राद्ध आदि मङ्गलकृत्य किये और देवताओं, ब्राह्मणों तथा जाति-भाइयोंको भोजन कराया, बाजा बजवाया, मङ्गल-कार्य कराये और अप्रतिम सौन्दर्यशाली वरका उत्तम शृङ्गार करवाया। फिर वरकी सवारीको अत्यन्त सुन्दर ढंगसे सजवाया।

इसी प्रकार राजा भीष्मकने भी पुरोहितोंके साथ वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे वैवाहिक मङ्गल-कार्य सम्पन्न किये। हर्षमग्न हो भटों, ब्राह्मणों और भिक्षुकोंको भी मणि, रत्न, धन, मोती, माणिक्य, हीरे, भोजन-सामग्री, वस्त्र और अनुपम उपहार दिये, बाजा बजवाया, मङ्गल-कार्य कराया और रानियों तथा मुनि-पत्नियोंद्वारा यथोचित विधि-विधानके साथ रुक्मिणीको मनोहर सुन्दर साज-सज्जासे विभूषित कराया। तदनन्तर जब परमोदय माहेन्द्र नामक शुभ मुहूर्त, जो लग्नाधिपतिसे संयुक्त, शुद्ध शुभ ग्रहोंसे दृष्ट तथा असद् ग्रहोंकी दृष्टिसे रहित था। ऐसा विवाहोचित लग्न आया जिसमें नक्षत्र और क्षण शुभ थे, चन्द्र-बल और तारा-बल विशुद्ध था तथा शलाका आदि वेधदोष नहीं था। ऐसे परिणाममें सुखदायक

८३- प्रद्युम्नाख्यान-वर्णन, श्रीकृष्णका सोलह हजार आठ रानियोंके साथ विवाह और उनसे संतानोत्पत्तिका कथन, दुर्वासाका द्वारकामें आगमन और वसुदेव-कन्या एकानंशाके साथ विवाह, श्रीकृष्णके अद्भुत चरित्रको देखकर दुर्वासाका भयभीत होना, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और दुर्वासाका पत्नीको छोड़कर तपके लिये जाना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७४९

तथा वर-वधूके लिये कल्याणकारी समयके आनेपर श्रीहरि महाराज भीष्मकके प्राङ्गणमें पधारे। उस समय उनके साथ देवता, मुनि, ब्राह्मण, पुरोहित, जाति-भाई, बन्धु-बान्धव, पिता, माता, नरेशगण, ग्वाले, मनोहर वेश-भूषासे सुसज्जित समवयस्क पार्षद, भट्ट और ज्योतिः-शास्त्रविशारद गणक भी थे। उस स्थानकी मङ्गलमयता, माङ्गलिक वस्तुओंसे सुशोभित मनोहर विचित्र शिल्पकलाके द्वारा निर्मित सभाको देखकर सब मुग्ध हो गये। तब ब्रह्मा आदि देवता, राजेन्द्र, दानवेन्द्र, सनकादि मुनि और श्रेष्ठ पार्षदोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण हर्षपूर्वक शीघ्र ही रथसे उतरकर आँगनमें खड़े हो गये। उन देवों, मुनीन्द्रों तथा नरेशोंको आये हुए देखकर राजा भीष्मक उतावलीके साथ सहसा उठ खड़े हुए और सिर झुकाकर उन सबकी वन्दना की; फिर उन्होंने आदरपूर्वक क्रमशः पृथक्-पृथक् सबका भलीभाँति पूजन करके उन्हें परम रमणीय रत्नसिंहासनोंपर बैठाया। उस समय राजाके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये थे। वे अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उन सबकी तथा वसुदेव और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए बोले।

भीष्मकने कहा—प्रभो! आज मेरा जन्म सफल, जीवन सुजीवन और करोड़ों जन्मोंके कर्मोंका मूलोच्छेद हो गया; क्योंकि जो लोकोंके विधाता, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता और तपस्याओंके फलदाता हैं; स्वप्नमें भी जिनके चरणकमलका दर्शन होना दुर्लभ है; वे सृष्टिकर्ता स्वयं ब्रह्मा मेरे आँगनमें विराजमान हैं। योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र, सुरेन्द्र और मुनीन्द्र ध्यानमें भी जिनका दर्शन नहीं कर पाते, वे देवाधिदेव शंकर मेरे आँगनमें पधारे हैं, जो कालके काल, मृत्युकी मृत्यु, मृत्युञ्जय और सर्वेश्वर हैं; वे भगवान् विष्णु मनुष्योंके दृष्टिगोचर हुए हैं। जिनके हजारों फणोंके मध्य एक फणपर सारा चराचर विश्व स्थित है और सम्पूर्ण वेदोंमें जिनकी महिमाका अन्त नहीं है; वे ये भगवान् अनन्त मेरे आँगनमें वर्तमान हैं। जो सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, सर्वप्रथम जिनकी पूजा होती है और जो देवगणोंमें श्रेष्ठ हैं; वे गणेश मेरे आँगनमें उपस्थित हैं। जो मुनियों और वैष्णवोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा ज्ञानियोंके गुरु हैं; वे भगवान् सनत्कुमार प्रत्यक्ष-रूपसे मेरे आँगनमें विद्यमान हैं। ब्रह्माके जितने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और वंशज हैं; वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित होते हुए आज मेरे घर अतिथि हुए हैं। अहो! मेरा यह वासस्थान कल्पान्तपर्यन्त तीर्थतुल्य हो गया। जिनके चरणोदकसे तीर्थ पावन हो जाते हैं, उन्हीं चरणोंके स्पर्शसे आज मेरा गृह विशुद्ध हो गया है, क्योंकि भूतलपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी सागरमें हैं और जितने सागरमें तीर्थ हैं, वे सभी ब्राह्मणके चरणोंमें वास करते हैं। जो प्रभु प्रकृतिसे परे हैं; ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवोंके लिये ध्यानद्वारा असाध्य हैं; योगियोंके लिये भी दुराराध्य, निर्गुण, निराकार तथा भक्तानुग्रहमूर्ति हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवगण जिनके चरणकमलका ध्यान करते हैं; जो कुबेर, गणेश और सूर्यके लिये भी दुर्लभ हैं; वे ही भगवान् साक्षात्-रूपसे मेरे घर पधारकर मनुष्योंके नयन-गोचर हुए हैं। यों कहकर भीष्मक स्वयं श्रीकृष्णको सामने लाकर सामवेदोक्त स्तोत्रद्वारा उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे।

भीष्मक बोले—भगवन्! आप समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा, सबके साक्षी, निर्लिप्त, कर्मियोंके कर्मों तथा कारणोंके कारण हैं। कोई-कोई आपका एकमात्र सनातन ज्योतिरूप बतलाते हैं। कोई, जीव जिनका प्रतिबिम्ब है, उन परमात्माका स्वरूप कहते हैं। कुछ भ्रान्तबुद्धि पुरुष आपको प्राकृतिक सगुण जीव उद्घोषित करते हैं। कुछ सूक्ष्मबुद्धिवाले ज्ञानी आपको नित्य

१११- सरस्वती देवीका आकर मायावती (रति)-को समझाना

७५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शरीरधारी बतलाते हैं। आप ज्योतिके मध्य सनातन अविनाशी देहरूप हैं; क्योंकि साकार ईश्वरके बिना भला यह तेज कहाँसे उत्पन्न हो सकता है?

नारद! यों स्तुति करके राजा भीष्मकने विष्णुका स्मरण करते हुए हर्षपूर्वक श्रीकृष्णके पद्मद्वारा समर्चित चरणकमलमें पाद्य निवेदित किया। फिर दूर्वा और जलसमन्वित अर्घ्य प्रदान करके मधुपर्क और गौ समर्पित की तथा उनके सारे शरीरमें सुगन्धित चन्दन लगाया। उस शुभ कर्ममें महेन्द्रने जो पारिजात-पुष्पोंकी माला दहेजरूपमें प्रदान की थी, उसे राजाने अपने जामाताके गलेमें डाल दिया। कुबेरने जो अमूल्य रत्नाभरण दिया था, उसके द्वारा राजाने भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णका वरण किया। पूर्वकालमें अग्निद्वारा जो अग्निशुद्ध युग्म वस्त्र दिये गये थे, उनको भीष्मकने परिपूर्णतम श्रीकृष्णको समर्पित कर दिया। विश्वकर्माने जो चमकीला रत्नमुकुट दिया था, उसे राजाने परमात्मा श्रीकृष्णके मस्तकपर रख दिया। इसके बाद रत्ननिर्मित सिंहासन, नाना प्रकारके पुष्प, धूप, रत्नप्रदीप तथा अत्यन्त मनोहर नैवेद्य प्रदान किये। पुनः सात तीर्थोंके जलसे आचमन कराया। फिर कर्पूर आदिसे सुवासित उत्तम रमणीय पानबीड़ा, मनोहर रतिकरी शय्या और पीनेके लिये सुवासित जल दिया। इस प्रकार वरण करके राजाने उस पूजनको सम्पन्न किया और अञ्जलिको सम्पुटित करके श्रीकृष्णको पुष्पाञ्जलि समर्पित की। (अध्याय १०७)


रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह, बारातकी बिदाई, भीष्मकद्वारा दहेज-दान और द्वारकामें मङ्गलोत्सव

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! इसी समय महालक्ष्मी-स्वरूपा रुक्मिणीदेवी मुनियों और देवताओंके साथ सभामें आयीं और रत्नसिंहासनपर विराजमान हुईं। वे रत्नाभरणोंसे विभूषित थीं और उनके शरीरपर अग्निशुद्ध साड़ी शोभा पा रही थी। उनकी वेणी सुन्दररूपसे गूँथी गयी थी। वे मुस्कराती हुई अमूल्य रत्नजटित दर्पणमें अपना मुख निहार रही थीं, कस्तूरीके बिन्दुओंसे युक्त एवं सुकोमल चन्दनसे चर्चित थीं तथा उनके ललाटका मध्य भाग सिन्दूरकी बेंदीसे उद्भासित हो रहा था। उनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णकी-सी और प्रभा सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान थी, उनके सर्वाङ्गमें चन्दनका अनुलेप हुआ था, मालतीकी माला उनकी शोभा बढ़ा रही थी और सात बालक राजकुमारोंद्वारा वे वहाँ लायी गयी थीं। ऐसी महालक्ष्मीस्वरूपा पतिव्रता रुक्मिणीदेवीको देवेन्द्रों, मुनीन्द्रों, सिद्धेन्द्रों तथा नृपश्रेष्ठोंने देखा।

तदनन्तर सती रुक्मिणीने अपने पति श्रीकृष्णकी सात प्रदक्षिणा करके उन्हें नमस्कार किया और चन्दनके सुकोमल पल्लवोंद्वारा शीतल जलसे सींचा। तत्पश्चात् जगत्पति श्रीकृष्णने शान्तरूपिणी एवं मन्द मुस्कानयुक्त अपनी प्रियतमा रुक्मिणीपर जल छिड़का। फिर शुभ मुहूर्तमें पतिने पत्नीका और पत्नीने पतिका अवलोकन किया। इसके बाद सुमुखी रुक्मिणीदेवी पिताकी गोदमें जा बैठीं; उस समय वे अपने तेजसे उद्दीप्त हो रही थीं और उनका मुख लज्जावश झुक गया था। नारद! तब राजा भीष्मकने वेदमन्त्रोच्चारणपूर्वक दानकी विधिसे देवेश्वरी रुक्मिणीको परिपूर्णतम श्रीकृष्णके हाथों सौंप दिया। उस समय हर्षपूर्वक बैठे हुए श्रीकृष्णने वसुदेवजीकी आज्ञासे 'स्वस्ति' ऐसा कहकर रुक्मिणीदेवीको उसी प्रकार ग्रहण कर

११३- नरकासुरके राजमहलमें श्रीकृष्णका सोलह हजार कन्याओंसे पाणिग्रहण

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७५१

लिया, जैसे भगवान् शंकरने भवानीको ग्रहण

किया था। इसके बाद राजाने परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णको पाँच लाख अशर्फियाँ दक्षिणामें दीं। इस प्रकार मुनियों और देवेन्द्रोंकी सभामें उस शुभ कर्मके समाप्त होनेपर राजा मोहवश कन्याको हृदयसे चिपटाकर रोने लगे और अपने दोनों नेत्रोंके जलसे उन्होंने उस श्रेष्ठ कन्याको भिगो दिया। फिर वचनद्वारा उसका परिहार करके उन्होंने उसे श्रीकृष्णको समर्पित कर दिया।

इसी समय रुक्मिणीकी माता महारानी सुन्दरी सुभद्रा आनन्दमग्न हो पति-पुत्रवती साध्वी महिलाओंके साथ वहाँ आयीं और निर्मन्थन आदि मङ्गल-कार्य करके दम्पतिको एक ऐसे रत्ननिर्मित महलमें लिवा ले गयीं, जो नाना प्रकारकी विचित्र चित्रकारीसे सुशोभित, हीरेके हारसे विभूषित तथा मोती, माणिक्य, रत्न और दर्पणसे उद्दीप्त था। वहीं श्रीकृष्णने दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, सरस्वती, सावित्री, रति, सती, रोहिणी, पतिव्रता देवपत्नी, राजपत्नी और मुनिपत्नियोंको देखा, जो रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनोंपर आसीन थीं। वे सभी जगदीश्वर श्रीकृष्णको निकट आया देखकर अपने-अपने आसनोंसे उठ पड़ीं और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें एक रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया। फिर समागत देवाङ्गनाओं तथा मुनिपत्नियोंने अञ्जलि बाँधकर क्रमशः पृथक्-पृथक् उन माधवकी स्तुति की। महारानी सुभद्राने वरसहित कन्याको भोजन कराया और सुवासित जल तथा कर्पूरयुक्त उत्तम पान प्रदान किया। तदनन्तर वहाँ दुर्गादेवीने सभी महिलाओंकी आज्ञासे श्रीकृष्णके हाथमें मङ्गल-पत्रिका दी और उनसे उसे पढ़नेके लिये कहा। तब देवियोंके उस समाजमें श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए उस पत्रिकाको पढ़ने लगे। (उसमें लिखा था—) लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, सती, राधिका, तुलसी, पृथ्वी, गङ्गा, अरुन्धती, यमुना, अदिति, शतरूपा, सीता, देवहूति, मेनका—ये सभी देवियाँ दम्पतिका परम मङ्गल करें।* जब श्रीकृष्णने इस प्रकार पढ़ा, तब वे उसे सुनकर विनोद करने लगीं।

तदनन्तर राजा भीष्मकने भी देवगणों, मुनिवरों तथा भूपालोंका विधिपूर्वक पूजन किया और उन्हें आदरसहित भोजन कराया। उस समय कुण्डिननगरमें माङ्गलिक वाद्य और संगीतके साथ-साथ 'लोगो! खाओ-खाओ, देते जाओ-देते जाओ' ऐसे शब्द गूँज रहे थे। प्रातःकाल होनेपर ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवता तथा भूपालगण उतावलीपूर्वक अपने-अपने वाहनोंपर सवार हुए। इधर महाराज उग्रसेन और वसुदेवजीने भी शीघ्रतापूर्वक श्रीकृष्ण और सती रुक्मिणीकी यात्रा करायी। उस समय रुक्मिणीकी


* लक्ष्मीः सरस्वती दुर्गा सावित्री राधिका सती॥
तुलसी पृथिवी गङ्गारुन्धती यमुनादितिः। शतरूपा च सीता च देवहूतिश्च मेनका॥
देव्यश्चैता दम्पतीनां कुर्वन्तु मङ्गलं परम्।
(१०९। ९–११)

८४- पार्वतीद्वारा दुर्वासाके प्रति अकारण पत्नी-त्यागके दोषका वर्णन, दुर्वासाका पुनः लौटकर द्वारका जाना, श्रीकृष्णका युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें पधारना, शिशुपालका वध, उसके आत्माद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, श्रीकृष्ण-चरितका निरूपण

७५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण माता सुभद्रा कन्याको अपनी छातीसे लगाकर उसकी सखियों तथा बान्धवोंके साथ उच्च स्वरसे रोने लगीं और इस प्रकार बोलीं। सुभद्राने कहा—वत्से ! तू मुझ अपनी माताका परित्याग करके कहाँ जा रही है ? भला, मैं तुझे छोड़कर कैसे जी सकूँगी ? और तू भी मेरे बिना कैसे जीवन धारण करेगी ? रानी बेटी ! तू महालक्ष्मी है, तूने मायासे ही कन्याका रूप धारण कर रखा है। अब तू वसुदेव-नन्दनकी प्रिया होकर मेरे घरसे वसुदेवजीके भवनको जा रही है। यों कहकर रानीने शोकवश नेत्रोंके जलसे अपनी कन्याको भिगो दिया। भीष्मकने भी आँखोंमें आँसू भरकर अपनी कन्या श्रीकृष्णको समर्पित कर दी। इस प्रकार उसका परिहार करके वे फूट-फूटकर रोने लगे। तब रुक्मिणीदेवी तथा श्रीकृष्ण भी लीलासे आँसू टपकाने लगे। तत्पश्चात् वसुदेवजीने पुत्र और पुत्रवधूको रथपर चढ़ाया। इस अवसरपर राजा भीष्मक अपने जामाताको दहेज देने लगे। उन्होंने हर्षपूर्ण हृदयसे एक हजार गजराज, छः हजार घोड़े, एक सहस्र दासियाँ, सैकड़ों नौकर, अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण, एक हजार रत्न, पाँच लाख शुद्ध सुवर्णकी मोहरें, विश्वकर्माद्वारा निर्मित सोनेके सुन्दर-सुन्दर जलपात्र तथा भोजनपात्र, बहुत-सी गायें, एक हजार दूधवाली सवत्सा धेनुएँ और बहुत-से बहुमूल्य रमणीय अग्निशुद्ध वस्त्र प्रदान किये। तब वसुदेव और उग्रसेन देवताओं और मुनियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक शीघ्र ही द्वारकाकी ओर चले। वहाँ अपनी रमणीय पुरीमें प्रवेश करके उन्होंने मङ्गल- कृत्य कराये, सुन्दर एवं अत्यन्त मनोहर बाजे बजवाये। तदनन्तर देवकी, सुन्दरी रोहिणी, नन्दपत्नी यशोदा, अदिति, दिति तथा अन्यान्य सौभाग्यवती नारियाँ श्रीकृष्ण और सुन्दरी रुक्मिणीकी ओर बारंबार निहारकर उन्हें घरके भीतर लिवा ले गयीं और उन्होंने उनसे मङ्गल-कृत्य करवाये। फिर देवताओं, मुनिवरों, नरेशों और भाई- बन्धुओंको चतुर्विध (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) भोजन कराकर उन्हें बिदा किया। पुनः हर्षमग्न हो भृष्ट ब्राह्मणोंको इतने रत्न आदि दान किये, जिससे वे प्रसन्न और संतुष्ट हो गये। उन्हें भोजन भी कराया। इस प्रकार भोजन करके और धन लेकर वे सभी खुशी-खुशी अपने घरोंको गये। यों वसुदेव-पत्नीने सारा मङ्गल-कार्य सम्पन्न कराया। (अध्याय १०८-१०९) श्रीकृष्णके कहनेसे नन्द-यशोदाका ज्ञानप्राप्तिके लिये कदलीवनमें राधिकाके पास जाना, वहाँ अचेतनावस्थामें पड़ी हुई राधाको श्रीकृष्णके संदेशद्वारा चैतन्य करना और राधाका उपदेश देनेके लिये उद्यत होना श्रीनारायण कहते हैं—नारद ! इस प्रकार उस साङ्गोपाङ्ग मङ्गल-कार्यके अवसरपर पधारे हुए लोगोंके चले जानेपर नन्दजी यशोदाके साथ अपने प्रिय पुत्र (श्रीकृष्ण)-के निकट गये। वहाँ जाकर यशोदाने कहा—माधव ! तुमने अपने पिता नन्दजीको तो ज्ञान प्रदान कर ही दिया, परंतु बेटा ! मैं तुम्हारी माता हूँ; अतः कृपानिधे ! मुझपर भी कृपा करो। महाभाग ! तुम पृथ्वीका उद्धार करनेवाले और भक्तोंको उबारनेवाले हो। मैं भयभीत हो इस भयंकर भवसागरमें पड़ी हुई हूँ। मायामयी प्रकृति ही इस भवसागरसे तरनेके लिये नौका है और तुम्हीं उसके कर्णधार हो; अतः कृपामय ! मेरा उद्धार करो। यशोदाकी बात सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण जो ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु हैं, हँस पड़े और भक्तिपूर्वक मातासे बोले।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७५३ श्रीभगवान्ने कहा—माँ! जो भक्त्यात्मक ज्ञान है, वह तुम्हें राधा बतलायेगी। यदि तुम राधाके प्रति मानवभावका त्याग करके उसकी आज्ञाका पालन करोगी तो जो ज्ञान मैंने नन्दजीको दिया है; वही ज्ञान वह तुम्हें प्रदान करेगी। अतः अब नन्दजीके साथ आदरपूर्वक नन्द-ब्रजको लौट जाओ। इतना कहकर और विनय प्रदर्शित करके श्रीहरि महलके भीतर चले गये। तब नन्दजी यशोदाके साथ कदलीवनको गये। वहाँ उन्होंने राधाको देखा, जो पङ्कस्थ चन्दनचर्चित जलयुक्त कमल-दलकी शय्यापर अचेत हो शयन कर रही थीं। राधाने अपने अङ्गोंसे भूषणोंको उतार फेंका था, उनके शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहा था, आहारका त्याग कर देनेसे उनका उदर कृश हो गया था, मूर्च्छितावस्थामें उनके ओष्ठ सूख गये थे और नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे। वे परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलका ध्यान कर रही थीं, उनका चित्त एकमात्र उन्हींमें निविष्ट था और बाह्यज्ञान लुप्त हो गया था। वे बीच-बीचमें मुखकमलको ऊपर उठाकर मन्द मुस्कानयुक्त प्रियतम श्रीकृष्णका मार्ग जोहती रहती थीं। स्वप्नमें प्रियतमके समीप पहुँचकर कभी हँसती और कभी रोती थीं। सखियाँ चारों ओरसे श्वेत चँवरद्वारा निरन्तर उनकी सेवा कर रही थीं। राधाकी यह दशा देखकर भार्यासहित नन्दको महान् विस्मय हुआ। उन्होंने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर परम भक्तिके साथ राधाको नमस्कार किया। उसी समय ईश्वरेच्छासे सहसा राधाकी नींद उचट गयी। वे जाग पड़ीं और क्षणभरमें ही उन्हें विषयज्ञानरहित चेतना प्राप्त हो गयी। तब वे उस सखी-समाजमें सामने पति-पत्नी नन्द-यशोदाको देखकर उनसे आदरपूर्वक पूछते हुए मधुर वचन बोलीं। राधिकाने पूछा—बतलाओ, तुम कौन हो और यहाँ किस प्रयोजनसे आये हो? सुनो; मुझे विषयज्ञान नहीं है। मैं यह भी नहीं जान पाती कि कौन मनुष्य है कौन पशु; कौन जल है कौन स्थल; और कौन रात है कौन दिन? यहाँतक कि मुझे स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसकका भी भेद नहीं ज्ञात होता। राधिकाकी बात सुनकर नन्दको महान् विस्मय हुआ। तब गोपी यशोदा सम्भाषण करनेके लिये डरते-डरते राधाके निकट गयीं और उनके पास ही बैठकर प्रिय वचन बोलीं। नन्द भी वहीं यशोदाद्वारा दिये गये आसनपर बैठ गये। तब यशोदाने कहा—राधे! चेत करो; तुम यत्नपूर्वक अपनी रक्षा करो; क्योंकि मङ्गल दिन आनेपर तुम अपने प्राणनाथके दर्शन करोगी। सुरेश्वरि ! तुमने अपने कुल तथा विश्वको पवित्र कर दिया है। तुम्हारे चरणकमलकी सेवासे ये गोपियाँ पुण्यवती हो गयी हैं। जनसमूह, संतगण, चारों वेद और पुरातन पुराण तुम्हारी तीर्थोंको पावन बनानेवाली सुमङ्गल कीर्तिका गान करेंगे। बुद्धिरूपे ! मैं यशोदा हूँ, ये नन्द हैं और तुम वृषभानुनन्दिनी राधा हो। सुव्रते ! मेरी बात सुनो। भद्रे ! मैं द्वारका नगरसे श्रीकृष्णके पाससे तुम्हारे

७५४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

निकट आयी हूँ। सति! श्रीहरिने ही मुझे तुम्हारे पास भेजा है। अब तुम उन गदाधरका मङ्गल-समाचार एवं मङ्गल-संदेश सुनो। तुम्हें शीघ्र ही उन श्रीकृष्णके दर्शन होंगे। हे देवि! होशमें आ जाओ और इस समय मुझे भक्त्यात्मक ज्ञानका उपदेश दो। हम दोनों तुम्हारे पतिके उपदेशसे तुम्हारे पास आये हैं। वरानने! इसके बाद श्रीहरि तुम्हारे पास आयेंगे और तुम शीघ्र ही श्रीदामाके शापसे मुक्त हो जाओगी। इस प्रकार यशोदाके वचन सुनकर और गदाधरका समाचार पाकर श्रीकृष्णके नामस्मरणसे राधाका अमङ्गल दूर हो गया। वे भीतर-ही-भीतर श्रीकृष्णकी सम्भावना करके चेतनामें आ गयीं और शान्त होकर मधुर वाणीसे परमोत्तम लौकिकी भक्तिका वर्णन करने लगीं।

(अध्याय ११०)


राधिकाद्वारा 'राम' आदि भगवन्नामोंकी व्युत्पत्ति और उनकी प्रशंसा तथा यशोदाके पूछनेपर अपने 'राधा' नामकी व्याख्या करना

राधिकाने कहा—यशोदे! स्त्रीजाति तो वस्तुतः यों ही अबला, मूढ़ और अज्ञानमें तत्पर रहनेवाली होती है; तिसपर भी श्रीकृष्णके विरहसे मेरी चेतना निरन्तर नष्ट हुई रहती है। ऐसी दशामें पाँच प्रकारके ज्ञानोंमें, जो सर्वोत्तम भक्त्यात्मक ज्ञान है, उसके विषयमें मैं क्या कह सकती हूँ? तथापि जो कुछ तुमसे कहती हूँ, उसे सुनो। यशोदे! तुम इन सारे नश्वर पदार्थोंका परित्याग करके पुण्यक्षेत्र भारतमें स्थित रमणीय वृन्दावनमें जाओ। वहाँ निर्मल यमुनाजलमें त्रिकाल स्नान करके सुकोमल चन्दनसे अष्टदल कमल बनाकर शुद्ध मनसे गर्ग-प्रदत्त ध्यानद्वारा परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्णका भलीभाँति पूजन करो और आनन्दपूर्वक उनके परमपदमें लीन हो जाओ। सति! सौ पूर्व पुरुषोंके साथ अपने कर्मका उच्छेद करके सदा वैष्णवोंके ही साथ वार्तालाप करो। भक्त अग्निकी ज्वाला, पिंजरेमें बंद होना, काँटोंमें रहना और विष खाना स्वीकार करता है, परंतु हरिभक्तिरहित लोगोंका सङ्ग ठीक नहीं समझता; क्योंकि वह नाशका कारण होता है। भक्तिहीन पुरुष स्वयं तो नष्ट होता ही है, साथ ही दूसरेकी बुद्धिमें भेद उत्पन्न कर देता है। भक्तके सङ्गसे तथा हरिकथालापरूपी अमृतके सिञ्चनसे भक्तिरूपी वृक्षका अङ्कुर बढ़ता है; किंतु भक्तिहीनोंके साथ वार्तालापरूपी प्रदीप्ताग्निकी ज्वालाकी एक कलाके स्पर्शसे भी वह अङ्कुर सूख जाता है; फिर सींचनेसे ही उसकी वृद्धि होती है। इसलिये सावधान होकर भक्तिहीनोंके सङ्गका उसी प्रकार परित्याग कर देना चाहिये, जैसे मनुष्य कालसर्पको देखकर डरके मारे दूर भाग जाते हैं। यशोदे! अपने ऐश्वर्यशाली पुत्रका, जो साक्षात् परमात्मा और ईश्वर हैं, उत्तम भक्तिके साथ भजन करो। उनके राम, नारायण, अनन्त, मुकुन्द, मधुसूदन, कृष्ण, केशव, कंसारे, हरे, वैकुण्ठ, वामन—इन ग्यारह नामोंको जो पढ़ता अथवा कहलाता है, वह सहस्रों कोटि जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है*।

'रा' शब्द विश्ववाची और 'म' ईश्वरवाचक है, इसलिये जो लोकोंका ईश्वर है उसी कारण वह 'राम' कहा जाता है। वह रमाके साथ रमण


* वरं हुतवहज्वालां भक्तोवाञ्छति पञ्जरम्। वरं च कण्टके वासं वरं च विषभक्षणम्॥
हरिभक्तिविहीनानां न सङ्गं नाशकारणम्। स्वयं नष्टो भक्तिहीनो बुद्धिभेदं करोति च॥

८५- अनिरुद्ध और उषाका पृथक्-पृथक् स्वप्नमें दर्शन, चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धका अपहरण, अन्तःपुरमें अनिरुद्ध और उषाका गान्धर्व-विवाह

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७५५

करता है इसी कारण विद्वान्लोग उसे 'राम' कहते हैं। रमाका रमणस्थान होनेके कारण राम-तत्त्ववेत्ता 'राम' बतलाते हैं। 'रा' लक्ष्मीवाची और 'म' ईश्वरवाचक है; इसलिये मनीषीगण लक्ष्मीपतिको 'राम' कहते हैं। सहस्रों दिव्य नामोंके स्मरणसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल निश्चय ही 'राम' शब्दके उच्चारणमात्रसे मिल जाता है¹।

विद्वानोंका कथन है कि 'नार' शब्दका अर्थ सारूप्य-मुक्ति है; उसका जो देवता 'अयन' है, उसे 'नारायण' कहते हैं। किये हुए पापको 'नार' और गमनको 'अयन' कहते हैं। उन पापोंका जिससे गमन होता है, वही ये 'नारायण' कहे जाते हैं। एक बार भी 'नारायण' शब्दके उच्चारणसे मनुष्य तीन सौ कल्पोंतक गङ्गा आदि समस्त तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। 'नार' को पुण्य मोक्ष और 'अयन' को अभीष्ट ज्ञान कहते हैं। उन दोनोंका ज्ञान जिससे हो, वे ही ये प्रभु 'नारायण' हैं।²

जिसका चारों वेदों, पुराणों, शास्त्रों तथा अन्यान्य योगग्रन्थोंमें अन्त नहीं मिलता; इसी कारण विद्वान्लोग उसका नाम 'अनन्त' बतलाते हैं। 'मुकु' अध्ययमान, निर्माण और मोक्षवाचक है; उसे जो देवता देता है, उसी कारण वह 'मुकुन्द' कहा जाता है। 'मुकु' वेदसम्मत भक्तिरसपूर्ण प्रेमयुक्त वचनको कहते हैं; उसे जो भक्तोंको देता है वह 'मुकुन्द' कहलाता है। चूँकि वे मधु दैत्यका हनन करनेवाले हैं, इसलिये उनका एक नाम 'मधुसूदन' है। यों संतलोग वेदमें विभिन्न अर्थका प्रतिपादन करते हैं। 'मधु' नपुंसकलिङ्ग तथा किये हुए शुभाशुभ कर्म और माध्वीक (महुएकी शराब)-का वाचक है; अतः उसके तथा भक्तोंके कर्मोंके सूदन करनेवालेको 'मधुसूदन' कहते हैं। जो कर्म परिणाममें अशुभ और भ्रान्तोंके लिये मधुर है उसे 'मधु' कहते हैं, उसका जो 'सूदन' करता है; वही 'मधुसूदन' है।

'कृषि' उत्कृष्टवाची, 'ण' सद्‌भक्तिवाचक और 'अ' दातृवाचक है; इसीसे विद्वान्लोग उन्हें 'कृष्ण' कहते हैं। परमानन्दके अर्थमें 'कृषि' और


अङ्कुरो भक्तिवृक्षस्य भक्तसङ्गेन वर्धते। परं हरिकथालापपीयूषासेचनेन च॥
अभक्तालापदीप्ताग्निज्वालायाः कलयापि च। अङ्कुरं शुष्कतां याति पुनः सेकेन वर्धते॥
तस्माद्भक्तसङ्गं च सावधानः परित्यज। यथा दृष्ट्वा कालसर्पं नरो भीतः पलायते॥
यशोदे च प्रयत्नेन स्वात्मनः पुत्रमीश्वरम्। भजस्व परया भक्त्या परमात्मानमीश्वरम्॥
राम नारायणानन्त मुकुन्द मधुसूदन। कृष्ण केशव कंसारे हरे वैकुण्ठ वामन॥
इत्येकादश नामानि पठेद् वा पाठयेदिति। जन्मकोटिसहस्राणां पातकादेव मुच्यते॥
(१११। ११–१७)

¹- राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचकः। विश्वानामीश्वरो यो हि तेन रामः प्रकीर्तितः॥
रमते रमया सार्धं तेन रामं विदुर्बुधाः। रमाणां रमणस्थानं रामं रामविदो विदुः॥
राश्चेति लक्ष्मीवचनो मश्चापीश्वरवाचकः। लक्ष्मीपतिं गतिं रामं प्रवदन्ति मनीषिणः॥
नाम्नां सहस्रं दिव्यानां स्मरणे यत्फलं लभेत्। तत्फलं लभते नूनं रामोच्चारणमात्रतः॥
(१११। १८–२१)

²- सारूप्यमुक्तिवचनो नारेति च विदुर्बुधाः। यो देवोऽप्यायनं तस्य स च नारायणः स्मृतः॥
नाराश्च कृतपापाश्चाप्ययनं गमनं स्मृतम्। यतो हि गमनं तेषां सोऽयं नारायणः स्मृतः॥
सकृन्नारायणेत्युक्त्वा पुमान् कल्पशतत्रयम्। गङ्गादिसर्वतीर्थेषु स्नातो भवति निश्चितम्॥
नारं च मोक्षणं पुण्यमयनं ज्ञानमीप्सितम्। तयोर्ज्ञानं भवेद् यस्मात् सोऽयं नारायणः प्रभुः॥
(१११। २२–२५)

११४- चित्रलेखाका द्वारकामें श्रीहरिके भवनसे सोते हुए अनिरुद्धको उठा ले जाना

७५६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उनके दास्य कर्ममें ‘ण’ का प्रयोग होता है। उन दोनोंके दाता जो देवता हैं, उन्हें ‘कृष्ण’ कहा जाता है। भक्तोंके कोटिजन्मार्जित पापों और क्लेशोंमें ‘कृषि’ का तथा उनके नाशमें ‘ण’ का व्यवहार होता है; इसी कारण वे ‘कृष्ण’ कहे जाते हैं। सहस्र दिव्य नामोंकी तीन आवृत्ति करनेसे जो फल प्राप्त होता है; वह फल ‘कृष्ण’ नामकी एक आवृत्तिसे ही मनुष्यको सुलभ हो जाता है। वैदिकोंका कथन है कि ‘कृष्ण’ नामसे बढ़कर दूसरा नाम न हुआ है, न होगा। ‘कृष्ण’ नाम सभी नामोंसे परे है। हे गोपी! जो मनुष्य ‘कृष्ण-कृष्ण’ यों कहते हुए नित्य उनका स्मरण करता है; उसका उसी प्रकार नरकसे उद्धार हो जाता है, जैसे कमल जलका भेदन करके ऊपर निकल आता है। ‘कृष्ण’ ऐसा मङ्गल नाम जिसकी वाणीमें वर्तमान रहता है, उसके करोड़ों महापातक तुरंत ही भस्म हो जाते हैं। ‘कृष्ण’ नाम-जपका फल सहस्रों अश्वमेध-यज्ञोंके फलसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उनसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति होती है; परंतु नाम-जपसे भक्त आवागमनसे मुक्त हो जाता है। समस्त यज्ञ, लाखों व्रत, तीर्थस्नान, सभी प्रकारके तप, उपवास, सहस्रों वेदपाठ, सैकड़ों बार पृथ्‍वीकी प्रदक्षिणा—ये सभी इस ‘कृष्णनाम’-जपकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते*। उन उपर्युक्त कर्मोंके लोभसे मनुष्योंको चिरकालके लिये स्वर्गरूप फलकी प्राप्ति होती है और उस स्वर्गसे पतन होना निश्चित है; परंतु जपकर्ता पुरुष श्रीहरिके परम पदको प्राप्त कर लेता है।

‘क’ जलको कहते हैं; उस जलमें तथा समस्त शरीरोंमें भी जो आत्मा शयन करता है; उस देवको सभी वैदिक लोग ‘केशव’ कहते हैं। ‘कंस’ शब्दका प्रयोग पातक, विघ्न, रोग, शोक और दानवके अर्थमें होता है, उनका जो ‘अरि’ अर्थात् हनन करनेवाला है; वह ‘कंसारि’ कहा जाता है। जो रुद्ररूपसे नित्य विघ्नोंका तथा भक्तोंके पातकोंका संहार करते रहते हैं, इसी कारण वे ‘हरि’ कहलाते हैं। जो ब्रह्मस्वरूपा ‘मा’ मूलप्रकृति, ईश्वरी, नारायणी, सनातनी विष्णुमाया, महालक्ष्मीस्वरूपा, वेदमाता सरस्वती, राधा, वसुन्धरा और गङ्गा नामसे विख्यात हैं, उनके स्वामी (धव) को ‘माधव’ कहते हैं।

यशोदे! ब्रह्मा, विष्णु, महेश और शेष आदि जिनकी वन्दना करते हैं; सनकादि मुनि ध्यानद्वारा जिनका कुछ भी रहस्य नहीं जान पाते और वेद-पुराण जिनका निरूपण करनेमें असमर्थ हैं; उन माखनचोरका भक्तिपूर्वक भजन करो। दूध, दही, घी, नया मथकर तैयार किया हुआ मट्ठा—ये सब कहाँ हैं, उनका चुरानेवाला कहाँ है, तुम कहाँ हो और तुम्हारा भवबन्धन कहाँ है? योगी,


* कृषिरुत्कृष्टवचनो णश्च सद्द्‌भक्तिवाचकः। अश्रापि दातृवचनः कृष्णं तेन विदुर्बुधाः॥
कृषिश्च परमानन्दे णश्च तद्दास्यकर्मणि। तयोर्दाता च यो देवस्तेन कृष्णः प्रकीर्तितः॥
कोटिजन्मार्जिते पापं कृषिः क्लेशे च वर्तते। भक्तानां णश्च निर्वाणे तेन कृष्णः प्रकीर्तितः॥
सहस्रनाम्नां दिव्यानां त्रिरावृत्त्या च यत्फलम्। एकावृत्त्या तु कृष्णस्य तत्फलं लभते नरः॥
कृष्णनाम्नः परं नाम न भूतं न भविष्यति। सर्वेभ्यश्च परं नाम कृष्णेति वैदिका विदुः॥
कृष्ण कृष्णेति हे गोपि यस्तं स्मरति नित्यशः। जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम्॥
कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते। भस्मीभवन्ति सद्यस्तन्महापातककोटयः॥
अश्वमेधसहस्रेभ्यः फलं कृष्णजपस्य च। वरं तेभ्यः पुनर्जन्म नातो भक्तपुनर्भवः॥
सर्वेषामपि यज्ञानां लक्षाणि च व्रतानि च। तीर्थस्नानानि सर्वाणि तपांस्यनशनानि च॥
वेदपाठसहस्राणि प्रदक्षिण्यं भुवः शतम्। कृष्णनामजपस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥

८६- कन्याकी दुःशीलताका समाचार पाकर बाणका युद्धके लिये उद्यत होना; शिव, पार्वती, गणेश, स्कन्द और कोटरीका उसे रोकना; परंतु बाणका स्कन्दको सेनापति बनाकर युद्धके लिये नगरके बाहर निकलना, उषा-प्रदत्त रथपर सवार होकर अनिरुद्धका भी युद्धोद्योग करना, बाण और अनिरुद्धका परस्पर वार्तालाप

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७५७

सिद्धगण, मुनीन्द्र, भक्तसमुदाय, ब्रह्मा, शिव और शेष योगद्वारा जिन्हें बाँध नहीं सके; वह तुम्हारे ओखली-मूलसे कैसे बँध गया? अतः सति। भारतवर्षमें शीघ्र ही हृत्कमलके मध्यमें स्थित परमेश्वररूप अपने पुत्रका प्रेम, भक्ति, स्तवन, पूजन और यत्नपूर्वक ध्यान करते हुए भजन करो। गोपी! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह वरदान माँग लो। इस समय जगत्में जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ होगा, वह सब कुछ मैं तुम्हें प्रदान करूँगी।

यशोदाने कहा—राधे! श्रीहरिके चरणोंमें निश्चल भक्ति तथा उनकी दासता—यही मेरा अभीष्ट वर है। साथ ही तुम्हारे नामकी क्या व्युत्पत्ति है—यह भी मुझे बतलानेकी कृपा करो।

श्रीराधिका बोलीं—यशोदे! मेरे वरदानसे तुम्हारी श्रीहरिके चरणोंमें निश्चल भक्ति हो और तुम्हें श्रीहरिकी दुर्लभ दासता प्राप्त हो। अब उत्तम निर्णयका वर्णन करती हूँ, सुनो। पूर्वकालमें नन्दने मुझे भाण्डीर-वटके नीचे देखा था, उस समय मैंने व्रजेश्वर नन्दको वह रहस्य बतलाया था और उसे प्रकट करनेको मना कर दिया था। मैं ही स्वयं राधा हूँ और रायाण गोपकी भार्या मेरी छायामात्र है। रायाण श्रीहरिके अंश, श्रेष्ठ पार्षद और महान् हैं।

जिनके रोमकूपोंमें अनेकों विश्व वर्तमान हैं, वे महाविष्णु ही ‘रा’ शब्द हैं और ‘धा’ विश्वके प्राणियों तथा लोकोंमें मातृवाचक धाय है; अतः मैं इनकी दूध पिलानेवाली माता, मूलप्रकृति और ईश्वरी हूँ। इसी कारण पूर्वकालमें श्रीहरि तथा विद्वानोंने मेरा नाम ‘राधा’ रखा है*। इस समय मैं सुदामाके शापसे वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई हूँ। अब सौ वर्ष पूरे होनेतक मेरा श्रीहरिके साथ वियोग बना रहेगा। मेरे पिता वृषभानु श्रीकृष्णके श्रेष्ठ पार्षद और महान् हैं तथा मेरी माता कलावती पितरोंकी मानसी कन्या हैं। इस भारतवर्षमें मेरी माता तथा मैं—दोनों अयौनिजा हैं। पुनः तुमलोगोंके साथ श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होंगी। व्रजेश्वरि! इस प्रकार मैंने तुम्हें सारा भक्त्यात्मक ज्ञान बतला दिया। सति! तब तुम अपने ज्ञानी स्वामी व्रजेश्वरके साथ व्रजको लौट जाओ; क्योंकि इस समय तुम्हीं मेरे ध्यानमें रुकावट डालनेवाली हो। सुन्दरि! ध्यानभङ्ग हो जानेपर मनुष्योंको महान् दोषका भागी होना पड़ता है।
(अध्याय १११)


प्रद्युम्नाख्यान-वर्णन, श्रीकृष्णका सोलह हजार आठ रानियोंके साथ विवाह और उनसे संतानोत्पत्तिका कथन, दुर्वासाका द्वारकामें आगमन और वसुदेव-कन्या एकानंशाके साथ विवाह, श्रीकृष्णके अद्भुत चरित्रको देखकर दुर्वासाका भयभीत होना, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और दुर्वासाका पत्नीको छोड़कर तपके लिये जाना

श्रीनारायण कहते हैं—मुने! द्वारकामें पहुँचकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वसुदेवजीकी आज्ञासे रुक्मिणीके रत्ननिर्मित श्रेष्ठ भवनमें गये। वह भवन शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल, बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित, सामने तथा चारों ओरसे रमणीय और नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित था।


* राशब्दश्च महाविष्णुर्विश्वानि यस्य लोमसु । विश्वप्राणिषु विश्वेषु धा धात्री मातृवाचकः ॥
धात्री माताहमेतेषां मूलप्रकृतिरीश्वरी । तेन राधा समाख्याता हरिणा च पुरा बुधैः ॥
(१११ । ५७-५८)

८७- बाण और अनिरुद्धके संवाद-प्रसङ्गमें अनिरुद्धद्वारा द्रौपदीके पाँच पति होनेका वर्णन, बाणसेनापति सुभद्रका अनिरुद्धके साथ युद्ध और अनिरुद्धद्वारा उसका वध

७५८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उसपर अमूल्य रत्नोंके कलश चमक रहे थे और वह श्वेत चँवरों, दर्पणों तथा अग्निशुद्ध पवित्र वस्त्रोंद्वारा सब ओरसे सुशोभित था। तदनन्तर रुक्मिणीदेवीसे पूर्वकालमें शिवके द्वारा भस्मीभूत कामदेव प्रकट हुए। उन्होंने शम्बरासुरका वध करके अपनी पतिव्रता पत्नी रतिको प्राप्त किया। उस समय रति देवताके संकेतसे 'मायावती' नाम धारण करके शम्बरासुरके महलमें उसकी गृहिणी बनकर रहती थी; परंतु उसकी शय्यापर स्वयं न जाकर अपनी छायाको भेजती थी।

नारदने पूछा— महाभाग ! कामदेव (प्रद्युम्न)-ने किस प्रकार दैत्यराज शम्बरका वध किया था ? वह शुभ कथा विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

श्रीनारायणने कहा— नारद ! एक सप्ताहके व्यतीत होनेपर दैत्यराज शम्बर रुक्मिणीके सूतिकागृहसे बालकको लेकर वेगपूर्वक अपने वासस्थानको चला गया। वह दैत्यराज पुत्रहीन था; अतः उस पुत्रको पाकर उसे महान् हर्ष हुआ। फिर उसने प्रसन्नतासे वह बालक मायावतीको दे दिया। उसे पाकर सती मायावतीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर सरस्वतीदेवीने आकर मायावती (रति)-को और श्रीकृष्ण-पुत्र (कामदेव)-को समझाया कि तुम दोनों पत्नी-पति हो। शिवके कोपसे भस्म हुए कामदेवने ही श्रीकृष्णके पुत्ररूपसे जन्म लिया है; अतएव तुम दोनों पति-पत्नीकी भाँति रहो।

तब वे पति-पत्नीकी भाँति रहने लगे। इस बातका शम्बरासुरको पता लग गया। तब वह दोनोंकी भर्त्सना करके उन्हें मारने दौड़ा। उसने शिवजीका दिया हुआ शूल चलाया। इसी बीच पवनदेवने चुपके-से दुर्गाका स्मरण करनेको कहा। दुर्गाका स्मरण करते ही शिव-शूल रमणीय और मनोहर मालाके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर कामदेवने हर्षपूर्वक ब्रह्मास्त्रद्वारा उस दैत्यको मार डाला और रतिको लेकर वे विमानद्वारा द्वारकापुरीको चले गये। उनके पीछे समस्त देवगण स्वयं पार्वतीकी स्तुति करके चले। रुक्मिणीने मङ्गल-कार्य सम्पन्न करके रतिको और अपने पुत्रको ग्रहण किया। श्रीहरिने स्वस्त्ययनपूर्वक परम उत्सव कराया, ब्राह्मणोंको जिमाया और पार्वतीकी पूजा की।

तदनन्तर श्रीकृष्णने वेदोक्त शुभ दिन आनेपर

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७५९


क्रमशः सात रमणियोंका पाणिग्रहण किया। उनके नाम हैं—कालिन्दी, सत्यभामा, सत्या, सती, नाग्नजिती, जाम्बवती और लक्ष्मणा। उन्होंने क्रमशः इनके साथ विवाह किये और पुत्र उत्पन्न किये। उनमें एक-एकसे क्रमशः दस-दस पुत्र और एक-एक कन्या उत्पन्न हुई। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने राजाधिराज नरकासुरको पुत्रसहित मारकर रणके मुहानेपर महाबली मुर दैत्यको भी यमलोकका पथिक बना दिया। वहाँ उसके महलमें श्रीकृष्णको सोलह हजार कन्याएँ दीख पड़ीं, जिनकी अवस्था सौ वर्षसे ऊपर हो चुकी थी; परंतु उनका यौवन सदा स्थिर रहनेवाला था। वे सब-की-सब रत्नाभूषणोंसे विभूषित थीं तथा उनके मुख प्रफुल्लित थे। माधवने शुभ मुहूर्तमें उन सबका पाणिग्रहण किया और शुभकालमें क्रमशः उन सबके साथ रमण किया उनमें भी प्रत्येकसे क्रमशः दस-दस पुत्र और एक-एक कन्याका जन्म हुआ। इस प्रकार श्रीहरिके पृथक्-पृथक् इतनी संतानें उत्पन्न हुईं।

नारद ! एक समयकी बात है। मुनिवर दुर्वासा अनायास घूमते-घूमते रमणीय द्वारकापुरीमें आये। उस समय उनके साथ तीन करोड़ शिष्य भी थे। उन्हें आया देखकर पुत्र और पुरोहितके साथ महाराज उग्रसेन, वसुदेव, श्रीकृष्ण, अक्रूर तथा उद्धवने षोडशोपचारद्वारा मुनिवरकी पूजा करके उन्हें प्रणाम किया। ब्रह्मन् ! तब मुनिवरने उन्हें पृथक्-पृथक् शुभाशीर्वाद दिये। तदनन्तर वसुदेवजीने अपनी कन्या एकानंशाको शुभ मुहूर्तमें महर्षि दुर्वासाको दान कर दिया और बहुत-से मोती, माणिक्य, हीरे तथा रत्न दहेजमें दिये। उन्होंने दुर्वासाको बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित एक सुन्दर आश्रम भी दिया।

एक बार मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाने अपने मनमें विचारकर देखा कि कहीं तो श्रीकृष्ण रत्ननिर्मित मनोहर पलंगपर शयन कर रहे हैं, कहीं वे सर्वव्यापी प्रभु श्रद्धापूर्वक पुराणकी कथा सुन रहे हैं, कहीं सुन्दर आँगनमें महोत्सव मनानेमें संलग्न हैं, कहीं सत्याद्वारा भक्तिपूर्वक दिया गया ताम्बूल चबा रहे हैं, कहीं शय्यापर पौढ़े हैं और रुक्मिणी श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रही हैं, कहीं आनन्दपूर्वक शयन कर रहे हैं और कालिन्दी उनके चरण दबा रही हैं; फिर सुधर्मा-सभामें सुन्दर रूप धारण करके सत्समाजके मध्य विराज रहे हैं। ऐश्वर्यशाली मुनिने सर्वत्र उनके साथ समान रूपसे सम्भाषण किया। इस परम अद्भुत दृश्यको देखकर विप्रवर दुर्वासाको महान् विस्मय हुआ। तब वे पुनः रुक्मिणीके महलमें उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगे।

दुर्वासा बोले—जगदीश्वर ! आप सबपर विजय पानेवाले, जनार्दन, सबके आत्मस्वरूप, सर्वेश्वर, सबके कारण, पुरातन, गुणरहित, इच्छासे परे, निर्लिप्त, निष्कलङ्क, निराकार, भक्तानुग्रह-मूर्ति, सत्यस्वरूप, सनातन, रूपरहित, नित्य नूतन और ब्रह्मा, शिव, शेष तथा कुबेरद्वारा वन्दित हैं। लक्ष्मी आपके चरणकमलोंकी सेवा करती रहती हैं। आप ब्रह्मज्योति और अनिर्वचनीय हैं,

८८- गणेश-शिव-संवाद

७६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वेद भी आपके रूप और गुणका थाह नहीं लगा पाते और आप महाकाशके समान सम्माननीय हैं; आपकी जय हो, जय हो। परमात्मन्! आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। श्रीहरिकी अनुमतिसे मन-ही-मन यों कहकर प्रियवर दुर्वासा श्रीकृष्णको प्रणाम करके वहीं उनके सामने खड़े हो गये। तब जगन्नाथ श्रीकृष्णने उन्हें वह ज्ञान बतलाना आरम्भ किया; जो हितकारक, सत्य, पुरातन, वेदविहित और सभी सत्पुरुषोंद्वारा मान्य था।

श्रीभगवान्‌ने कहा— विप्र! तुम तो शिवके अंश हो; अतः डरो मत। क्या ज्ञानद्वारा तुम्हें यह नहीं ज्ञात है कि मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ और सभी मुझसे उत्पन्न होते हैं? मुने! मैं ही सबका आत्मा हूँ। मेरे बिना सभी शव Ocean... शवतुल्य हो जाते हैं। प्राणियोंके शरीरसे मेरे निकल जानेपर सभी शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। अकेला मैं ही उत्पन्न होकर पृथक्-पृथक्-रूपसे व्यक्त होता हूँ। जो भोजन करता है, उसीकी तृप्ति होती है; दूसरे कभी भी तृप्त नहीं होते। जीवादि समस्त प्राणियोंकी प्रतिमाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। गोलोक-स्थित रासमण्डलमें परिपूर्णतम मैं ही हूँ। राधा श्रीदामाके शापसे इस समय मेरा दर्शन नहीं कर सकती। सभी राधाके अंश-कलांशरूपसे उत्पन्न हुए हैं। रुक्मिणीके भवनमें राधाका अंश है और अन्य सभी रानियोंके महलोंमें कलाएँ हैं। मेरा भी शरीरधारियोंकी प्रतिमाओंमें कहीं अंश, कहीं कलाकी कला और कहीं कलाका कलांश वर्तमान है। इतना कहकर जगदीश्वर महलके भीतर चले गये और दुर्वासाजी अपनी प्रिया एकानंशाको त्यागकर श्रीहरिके लिये तप करने चले गये।

(अध्याय ११२)


पार्वतीद्वारा दुर्वासाके प्रति अकारण पत्नी-त्यागके दोषका वर्णन, दुर्वासाका पुनः लौटकर द्वारका जाना, श्रीकृष्णका युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें पधारना, शिशुपालका वध, उसके आत्माद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, श्रीकृष्ण-चरितका निरूपण

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! महर्षि दुर्वासा शिष्योंसहित द्वारकापुरीसे निकलकर भक्तिपूर्वक भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये कैलासको चले। कैलासपर पहुँचकर मुनिने शिव और शिवाको नमस्कार किया तथा शिष्योंसहित पवित्रभावसे प्रणत होकर परम भक्तिके साथ उनकी स्तुति की। फिर श्रीहरिका वह सारा वृत्तान्त, अपनी तपस्याका तत्त्व तथा अपने मनके वैराग्यका वर्णन किया। मुनिकी बात सुनकर सती पार्वती हँस पड़ीं और साक्षात् शंकरजीके संनिकट मुनिसे हितकारक एवं सत्य वचन बोलीं।

पार्वतीने कहा— मुने! तुम्हें धर्मका तत्त्व तो ज्ञात है नहीं, किंतु अपनेको धर्मिष्ठ मानते हो। भला, तुम अपनी संतानहीना पत्नीका परित्याग करके कहाँ तपस्याके लिये जा रहे हो? जो अपनी कुलीना पतिव्रता युवती पत्नीको संतानहीन अवस्थामें त्यागकर संन्यासी, ब्रह्मचारी अथवा यति हो जाता है; व्यापार अथवा नौकर आदिके निमित्त चिरकालके लिये दूर चला जाता है, मोक्षके हेतु अथवा आवागमनका विनाश करनेके लिये तीर्थवासी अथवा तपस्वी हो जाता है, उसे पत्नीके शापसे मोक्ष तो मिलता नहीं; उलटे धर्मका नाश हो जाता है—परलोकमें उसे निश्चय ही नरककी प्राप्ति होती है और इस लोकमें उसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है। ऐसा कमलजन्मा ब्रह्माने कहा है। इसलिये हे विप्र! इस समय