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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

प्रकृतिखण्ड

२९७

विनियोग

ॐ अस्य श्रीजगन्मङ्गलकवचस्य प्रजापति-ऋषिर्गायत्री छन्दः स्वयं रासेश्वरी देवता श्रीकृष्ण-भक्तिसम्प्राप्तौ विनियोगः।

इस जगन्मङ्गल राधाकवचके प्रजापति ऋषि हैं, गायत्री छन्द है, स्वयं रासेश्वरी देवता हैं और श्रीकृष्णभक्ति-प्राप्तिके लिये इसका विनियोग बताया गया है।

जो अपना शिष्य और श्रीकृष्णभक्त ब्राह्मण हो, उसीके समक्ष इस कवचको प्रकाशित करे। जो शठ तथा दूसरेका शिष्य हो, उसको इसका उपदेश देनेसे मृत्युकी प्राप्ति होती है। प्रिये! राज्य दे दे, अपना मस्तक कटा दे; परंतु अनधिकारीको यह कवच न दे। मैंने गोलोकमें देखा था कि साक्षात् परमात्मा श्रीकृष्णने भक्तिभावसे अपने कण्ठमें इसको धारण किया था। पूर्वकालमें ब्रह्मा और विष्णुने भी इसे अपने गलेमें स्थान दिया था।

‘ॐ राधायै स्वाहा।’ यह मन्त्र कल्पवृक्षके समान मनोवाञ्छित फल देनेवाला है और श्रीकृष्णने इसकी उपासना की है। यह मेरे मस्तककी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै स्वाहा।’ यह मन्त्र मेरे कपालकी तथा दोनों नेत्रों और कानोंकी सदा रक्षा करे। ‘ॐ रां ह्रीं श्रीं राधिकायै स्वाहा।’ यह मन्त्रराज सदा मेरे मस्तक और केशसमूहोंकी रक्षा करे। ‘ॐ रां राधायै स्वाहा।’ यह सर्वसिद्धिदायक मन्त्र मेरे कपोल, नासिका और मुखकी रक्षा करे। ‘ॐ क्लीं श्रीं कृष्णप्रियायै नमः।’ यह मन्त्र मेरे कण्ठकी रक्षा करे। ‘ॐ रां रासेश्वर्यै नमः।’ यह मन्त्र मेरे कंधेकी रक्षा करे। ‘ॐ रां रासविलासिन्यै स्वाहा।’ यह मन्त्र मेरे पृष्ठभागकी सदा रक्षा करे। ‘ॐ वृन्दावनविलासिन्यै स्वाहा।’ यह मन्त्र वक्षःस्थलकी सदा रक्षा करे। ‘ॐ तुलसीवनवासिन्यै स्वाहा।’ यह मन्त्र नितम्बकी रक्षा करे। ‘ॐ कृष्ण-प्राणाधिकायै स्वाहा।’ यह मन्त्र दोनों चरणों तथा सम्पूर्ण अङ्गोंकी सदा सब ओरसे रक्षा करे। राधा पूर्व-दिशामें मेरी रक्षा करें। कृष्णप्रिया अग्निकोणमें मेरा पालन करें। रासेश्वरी दक्षिणदिशामें मेरी रक्षाका भार सँभालें। गोपीश्वरी नैर्ऋत्यकोणमें मेरा संरक्षण करें। निर्गुणा पश्चिम तथा कृष्णपूजिता वायव्यकोणमें मेरा पालन करें। मूलप्रकृति ईश्वरी उत्तरदिशामें निरन्तर मेरे संरक्षणमें लगी रहें। सर्वपूजिता सर्वेश्वरी सदा ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें। महाविष्णु-जननी जल, स्थल, आकाश, स्वप्न और जागरणमें सदा सब ओरसे मेरा संरक्षण करें।

दुर्गे! यह परम उत्तम श्रीजगन्मङ्गलकवच मैंने तुमसे कहा है। यह गूढ़से भी परम गूढ़तर तत्त्व है। इसका उपदेश हर एकको नहीं देना चाहिये। मैंने तुम्हारे स्नेहवश इसका वर्णन किया है। किसी अनधिकारीके सामने इसका प्रवचन नहीं करना चाहिये। जो वस्त्र, आभूषण और चन्दनसे गुरुकी विधिवत् पूजा करके इस कवचको कण्ठ या दाहिनी बाँहमें धारण करता है, वह भगवान् विष्णुके समान तेजस्वी हो जाता है। सौ लाख जप करनेपर यह कवच सिद्ध हो जाता है। यदि किसीको यह कवच सिद्ध हो जाय तो वह आगसे जलता नहीं है। दुर्गे! पूर्वकालमें इस कवचको धारण करनेसे ही राजा दुर्योधनने जल और अग्निका स्तम्भन करनेमें निश्चितरूपसे दक्षता प्राप्त की थी। मैंने पहले पुष्करतीर्थमें सूर्यग्रहणके अवसरपर सनत्कुमारको इस कवचका उपदेश दिया था। सनत्कुमारने मेरुपर्वतपर सान्दीपनिको यह कवच प्रदान किया। सान्दीपनिने बलरामजीको और बलरामजीने दुर्योधनको इसका उपदेश दिया। इस कवचके प्रसादसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो सकता है।*


* ॐ राधेति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च। कृष्णोनोपासितो मन्त्रः कल्पवृक्षः शिरोऽवतु ॥
ॐ ह्रीं श्रीं राधिका ङेउन्तं वह्निजायान्तमेव च। कपालं नेत्रयुग्मं च श्रोत्रयुग्मं सदावतु ॥
ॐ रां ह्रीं श्रीं राधिकेति ङेऽन्तं वह्निजायान्तमेव च। मस्तकं केशसंघांश्च मन्त्रराजः सदावतु ॥

२९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण जो राधामन्त्रका उपासक होकर प्रतिदिन इस कवचका भक्तिभावसे पाठ करता है, वह विष्णुतुल्य तेजस्वी होता तथा राजसूय-यज्ञका फल पाता है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, सब प्रकारका दान, सम्पूर्ण व्रतोंमें उपवास, पृथ्वीकी परिक्रमा, समस्त यज्ञोंकी दीक्षाका ग्रहण, सदैव सत्यकी रक्षा, नित्यप्रति श्रीकृष्णकी सेवा, श्रीकृष्ण-नैवेद्यका भक्षण तथा चारों वेदोंका पाठ करनेपर मनुष्य जिस फलको पाता है, उसे निश्चय ही वह इस कवचके पाठसे पा लेता है। राजद्वारपर, श्मशानभूमिमें, सिंहों और व्याघ्रोंसे भरे हुए वनमें, दावानलमें, विशेष संकटके अवसरपर, डाकुओं और चोरोंसे भय प्राप्त होनेपर, जेल जानेपर, विपत्तिमें पड़ जानेपर, भयंकर एवं अटूट बन्धनमें बँधनेपर तथा रोगोंसे आक्रान्त होनेपर यदि मनुष्य इस कवचको धारण कर ले तो निश्चय ही वह समस्त दुःखोंसे छूट जाता है। दुर्गे! महेश्वरि ! यह तुम्हारा ही कवच तुमसे कहा है। तुम्हीं सर्वरूपा माया हो और छलसे इस विषयमें मुझसे पूछ रही हो। श्रीनारायण कहते हैं— नारद ! इस प्रकार राधिकाकी कथा कहकर बारंबार माधवका स्मरण करके भगवान् शंकरके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगी। श्रीकृष्णके समान कोई देवता नहीं है, गङ्गा-जैसी दूसरी नदी नहीं है, पुष्करके समान कोई तीर्थ नहीं है तथा ब्राह्मणसे बढ़कर कोई वर्ण नहीं है। नारद ! जैसे परमाणुसे बढ़कर सूक्ष्म, महाविष्णु (महाविराट्)-से बढ़कर महान् तथा आकाशसे अधिक विस्तृत दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उसी प्रकार वैष्णवसे बढ़कर ज्ञानी तथा भगवान् शंकरसे बढ़कर कोई योगीन्द्र नहीं है। देवर्षे ! उन्होंने ही काम, क्रोध, लोभ और मोहपर विजय पायी है। भगवान् शिव सोते, जागते हर समय श्रीकृष्णके ध्यानमें तत्पर रहते हैं। जैसे कृष्ण हैं, वैसे शिव हैं। श्रीकृष्ण और शिवमें कोई भेद नहीं है।* वत्स ! जैसे वैष्णवोंमें शम्भु तथा देवताओंमें माधव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कवचोंमें यह जगन्मङ्गल राधाकवच सर्वोत्तम है। 'शि' यह मङ्गलवाचक है ॐ रां राधेति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च। सर्वसिद्धिप्रदः पातु कपोलं नासिकां मुखम् ॥ क्लीं श्रीं कृष्णप्रिया ङेऽन्तं कण्ठं पातु नमोऽन्तकम्। ॐ रां रासेश्वरी ङेऽन्तं स्कन्धं पातु नमोऽन्तकम् ॥ ॐ रां रासविलासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु । वृन्दावनविलासिन्यै स्वाहा वक्षः सदावतु ॥ तुलसीवनवासिन्यै स्वाहा पातु नितम्बकम् । कृष्णप्राणाधिका ङेऽन्तं स्वाहान्तं प्रणवादिकम् ॥ पादयुग्मं च सर्वाङ्गं संततं पातु सर्वतः । राधा रक्षतु प्राच्यां च वह्नौ कृष्णप्रियावतु ॥ दक्षे रासेश्वरी पातु गोपीशा नैर्ऋतेऽवतु । पश्चिमे निर्गुणा पातु वायव्ये कृष्णपूजिता ॥ उत्तरे संततं पातु मूलप्रकृतिरीश्वरी । सर्वेश्वरी सदैशान्यं पातु मां सर्वपूजिता ॥ जले स्थले चान्तरिक्षे स्वप्ने जागरणे तथा। महाविष्णोश्च जननी सर्वतः पातु संततम् ॥ कवचं कथितं दुर्गे श्रीजगन्मङ्गलं परम्। यस्मै कस्मै न दातव्यं गूढाद् गूढ़तरं परम् ॥ तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् । गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालंकारचन्दनैः ॥ कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ धृत्वा विष्णुसमो भवेत् । शतलक्षजपेनैव सिद्धं च कवचं भवेत् ॥ यदि स्यात् सिद्धकवचो न दग्धो वह्निना भवेत् । एतस्मात् कवचाद् दुर्गे राजा दुर्योधनः पुरा ॥ विशारदो जलस्तम्भे वह्निस्तम्भे च निश्चितम्। मया सनत्कुमाराय पुरा दत्तं च पुष्करे ॥ सूर्यपर्वणि मेरौ च स सान्दीपनये ददौ । बलाय तेन दत्तं च ददौ दुर्योधनाय सः ॥ कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ॥ (प्रकृतिखण्ड ५६। ३२-४९)

  • यथा कृष्णस्तथा शम्भुर्न भेदो माधवेशयोः ॥ (प्रकृतिखण्ड ५६। ६१)

प्रकृतिखण्ड २९९

और 'व' कारका अर्थ है दाता। जो मङ्गलदाता है, वही शिव कहा गया है। जो विश्वके मनुष्योंका सदा 'शं' अर्थात् कल्याण करते हैं, वे ही शंकर कहे गये हैं। कल्याणका तात्पर्य यहाँ मोक्षसे है। ब्रह्मा आदि देवता तथा वेदवादी मुनि—ये महान् कहे गये हैं। उन महान् पुरुषोंके जो देवता हैं, उन्हें महादेव कहते हैं। सम्पूर्ण विश्वमें पूजित मूलप्रकृति ईश्वरीको महती देवी कहा गया है। उस महादेवीके द्वारा पूजित देवताका नाम महादेव है। विश्वमें स्थित जितने महान् हैं, उन सबके वे ईश्वर हैं। इसलिये मनीषी पुरुष इन्हें महेश्वर कहते हैं।*—ब्रह्मपुत्र नारद! तुम धन्य हो, जिसके गुरु श्रीकृष्णभक्ति प्रदान करनेवाले साक्षात् महेश्वर हैं। फिर तुम मुझसे क्यों पूछ रहे हो! (अध्याय ५६)


दुर्गाजीके सोलह नामोंकी व्याख्या, दुर्गाकी उत्पत्ति तथा उनके पूजनकी परम्पराका संक्षिप्त वर्णन

नारदजी बोले— ब्रह्मन्! मैंने अत्यन्त अद्भुत सम्पूर्ण उपाख्यानोंको सुना। अब दुर्गाजीके उत्तम उपाख्यानको सुनना चाहता हूँ। वेदकी कौथुमी शाखामें जो दुर्गा, नारायणी, ईशाना, विष्णुमाया, शिवा, सती, नित्या, सत्या, भगवती, सर्वाणी, सर्वमङ्गला, अम्बिका, वैष्णवी, गौरी, पार्वती और सनातनी—ये सोलह नाम बताये गये हैं, वे सबके लिये कल्याणदायक हैं। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारायण! इन सोलह नामोंका जो उत्तम अर्थ है, वह सबको अभीष्ट है। उसमें सर्वसम्मत वेदोक्त अर्थको आप बताइये। पहले किसने दुर्गाजीकी पूजा की है? फिर दूसरी, तीसरी और चौथी बार किन-किन लोगोंने उनका सर्वत्र पूजन किया है?

श्रीनारायणने कहा— देवर्षे! भगवान् विष्णुने वेदमें इन सोलह नामोंका अर्थ किया है, तुम उसे जानते हो तो भी मुझसे पुनः पूछते हो। अच्छा, मैं आगमोंके अनुसार उन नामोंका अर्थ कहता हूँ। दुर्गा शब्दका पदच्छेद यों है—दुर्ग+आ। 'दुर्ग' शब्द दैत्य, महाविघ्न, भवबन्धन, कर्म, शोक, दुःख, नरक, यमदण्ड, जन्म, महान् भय तथा अत्यन्त रोगके अर्थमें आता है तथा 'आ' शब्द 'हन्ता' का वाचक है। जो देवी इन दैत्य और महाविघ्न आदिका हनन करती है, उसे 'दुर्गा' कहा गया है। यह दुर्गा यश, तेज, रूप और गुणोंमें नारायणके समान है तथा नारायणकी ही शक्ति है। इसलिये 'नारायणी' कही गयी है। ईशानाका पदच्छेद इस प्रकार है—ईशान+आ। 'ईशान' शब्द सम्पूर्ण सिद्धियोंके अर्थमें प्रयुक्त होता है और 'आ' शब्द दाताका वाचक है। जो सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाली है, वह देवी 'ईशाना' कही गयी है। पूर्वकालमें सृष्टिके समय परमात्मा विष्णुने मायाकी सृष्टि की थी और अपनी उस मायाद्वारा सम्पूर्ण विश्वको मोहित किया। वह मायादेवी विष्णुकी ही शक्ति है, इसलिये 'विष्णुमाया' कही गयी है। 'शिवा' शब्दका पदच्छेद यों है—शिव+आ। 'शिव' शब्द शिव एवं कल्याण-


* शिरिति मङ्गलार्थं च वकारो दातृवाचकः। मङ्गलानां प्रदाता यः स शिवः परिकीर्तितः॥
नराणां संततं विश्वे शं कल्याणं करोति यः। कल्याणं मोक्षवचनं स एव शंकरः स्मृतः॥
ब्रह्मादीनां सुराणां च मुनीनां वेदवादिनाम्। तेषां च महतां देवो महादेवः प्रकीर्तितः॥
महती पूजिता विश्वे मूलप्रकृतिरीश्वरी। तस्या देवः पूजितश्च महादेवः स च स्मृतः॥
विश्वस्थानां च सर्वेषां महतामीश्वरः स्वयम्। महेश्वरं च तेनेमं प्रवदन्ति मनीषिणः॥
(प्रकृतिखण्ड ५६। ६३—६७)

३०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अर्थमें प्रयुक्त होता है तथा 'आ' शब्द प्रिय और दाता-अर्थमें। वह देवी कल्याणस्वरूपा है, शिवदायिनी है और शिवप्रिया है, इसलिये 'शिवा' कही गयी है। देवी दुर्गा सद्बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं, प्रत्येक युगमें विद्यमान हैं तथा पतिव्रता एवं सुशीला हैं। इसीलिये उन्हें 'सती' कहते हैं। जैसे भगवान् नित्य हैं, उसी तरह भगवती भी 'नित्य' हैं। प्राकृत प्रलयके समय वे अपनी मायासे परमात्मा श्रीकृष्णमें तिरोहित रहती हैं। ब्रह्मासे लेकर तृण अथवा कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् कृत्रिम होनेके कारण मिथ्या ही है, परंतु दुर्गा सत्यस्वरूपा हैं। जैसे भगवान् सत्य हैं, उसी तरह प्रकृतिदेवी भी 'सत्या' हैं। सिद्ध, ऐश्वर्य आदिके अर्थमें 'भग' शब्दका प्रयोग होता है, ऐसा समझना चाहिये। वह सम्पूर्ण सिद्ध, ऐश्वर्यादिरूप भग प्रत्येक युगमें जिनके भीतर विद्यमान है, वे देवी दुर्गा 'भगवती' कही गयी हैं। जो विश्वके सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंको जन्म, मृत्यु, जरा आदिकी तथा मोक्षकी भी प्राप्ति कराती हैं, वे देवी अपने इसी गुणके कारण 'सर्वाणी' कही गयी हैं। 'मङ्गल' शब्द मोक्षका वाचक है और 'आ' शब्द दाताका। जो सम्पूर्ण मोक्ष देती हैं, वे ही देवी 'सर्वमङ्गला' हैं। 'मङ्गल' शब्द हर्ष, सम्पत्ति और कल्याणके अर्थमें प्रयुक्त होता है। जो उन सबको देती हैं, वे ही देवी 'सर्वमङ्गला' नामसे विख्यात हैं। 'अम्बा' शब्द माताका वाचक है तथा वन्दन और पूजन-अर्थमें भी 'अम्ब' शब्दका प्रयोग होता है। वे देवी सबके द्वारा पूजित और वन्दित हैं तथा तीनों लोकोंकी माता हैं, इसलिये 'अम्बिका' कहलाती हैं। देवी श्रीविष्णुकी भक्ता, विष्णुरूपा तथा विष्णुकी शक्ति हैं। साथ ही सृष्टिकालमें विष्णुके द्वारा ही उनकी सृष्टि हुई है। इसलिये उनकी 'वैष्णवी' संज्ञा है। 'गौर' शब्द पीले रंग, निर्लिप्त एवं निर्मल परब्रह्म परमात्माके अर्थमें प्रयुक्त होता है। उन 'गौर' शब्दवाच्य परमात्माकी वे शक्ति हैं, इसलिये वे 'गौरी' कही गयी हैं। भगवान् शिव सबके गुरु हैं और देवी उनकी सती-साध्वी प्रिया शक्ति हैं। इसलिये 'गौरी' कही गयी हैं। श्रीकृष्ण ही सबके गुरु हैं और देवी उनकी माया हैं। इसलिये भी उनको 'गौरी' कहा गया है। 'पर्व' शब्द तिथिभेद (पूर्णिमा), पर्वभेद, कल्पभेद तथा अन्यान्य भेद अर्थमें प्रयुक्त होता है तथा 'ती' शब्द ख्यातिके अर्थमें आता है। उन पर्व आदिमें विख्यात होनेसे उन देवीकी 'पार्वती' संज्ञा है। 'पर्वन्' शब्द महोत्सव-विशेषके अर्थमें आता है। उसकी अधिष्ठात्री देवी होनेके नाते उन्हें 'पार्वती' कहा गया है। वे देवी पर्वत (गिरिराज हिमालय)-की पुत्री हैं। पर्वतपर प्रकट हुई हैं तथा पर्वतकी अधिष्ठात्री देवी हैं। इसलिये भी उन्हें 'पार्वती' कहते हैं।' 'सना'का अर्थ है सर्वदा और 'तनी' का अर्थ है विद्यमाना। सर्वत्र और सब कालमें विद्यमान होनेसे वे देवी 'सनातनी' कही गयी हैं।

महामुने ! आगमोंके अनुसार सोलह नामोंका अर्थ बताया गया। अब देवीका वेदोक्त उपाख्यान सुनो। पहले-पहल परमात्मा श्रीकृष्णने सृष्टिके आदिकालमें गोलोकवर्ती वृन्दावनके रासमण्डलमें देवीकी पूजा की थी। दूसरी बार मधु और कैटभसे भय प्राप्त होनेपर ब्रह्माजीने उनकी पूजा की। तीसरी बार त्रिपुरारि महादेवने त्रिपुरसे प्रेरित होकर देवीका पूजन किया था। चौथी बार पहले दुर्वासाके शापसे राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट हुए देवराज इन्द्रने भक्तिभावके साथ देवी भगवती सतीकी समाराधना की थी। तबसे मुनीन्द्रों, सिद्धेन्द्रों, देवताओं तथा श्रेष्ठ महर्षियोंद्वारा सम्पूर्ण विश्वमें सब ओर और सदा देवीकी पूजा होने लगी।

मुने! पूर्वकालमें सम्पूर्ण देवताओंके तेजःपुञ्जसे देवी प्रकट हुई थीं। उस समय सब देवताओंने अस्त्र-शस्त्र और आभूषण दिये थे। उन्हीं दुर्गादेवीने दुर्ग आदि दैत्योंका वध किया

प्रकृतिखण्ड ३०१

और देवताओंको अभीष्ट वरके साथ स्वराज्य दिया। दूसरे कल्पमें महात्मा राजा सुरथने, जो मेधस् ऋषिके शिष्य थे, सरिताके तटपर मिट्टीकी मूर्तिमें देवीकी पूजा की थी। उन्होंने वेदोक्त सोलह उपचार अर्पित करके विधिवत् पूजन और ध्यानके पश्चात् कवच धारण किया तथा परिहार नामक स्तुति करके अभीष्ट वर पाया। इसी तरह उसी सरिताके तटपर उसी मृण्मयी मूर्तिमें एक वैश्यने भी देवीकी पूजा करके मोक्ष प्राप्त किया। राजा और वैश्यने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए दोनों हाथ जोड़कर देवीकी स्तुति की और उनकी उस मृण्मयी प्रतिमाका नदीके निर्मल गम्भीर जलमें विसर्जन कर दिया। वैसी मृण्मयी प्रतिमाको जलमग्न हुई देख राजा और वैश्य दोनों रो पड़े और वहाँसे अन्यत्र चले गये। वैश्यने देह त्याग करके जन्मान्तरमें पुष्करतीर्थमें दुष्कर तपस्या की और दुर्गादेवीके वरदानसे वे गोलोकधाममें चले गये। राजा अपने निष्कण्टक राज्यको लौट गये और वहाँ सबके आदरणीय होकर बलपूर्वक शासन करने लगे। उन्होंने साठ हजार वर्षोंतक राज्य भोग किया। तत्पश्चात् अपनी पत्नी तथा राज्यका भार पुत्रको सौंपकर वे कालयोगसे पुष्करमें तप करके दूसरे जन्ममें सावर्णि मनु हुए। वत्स! मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने आगमोंके अनुसार दुर्गोपाख्यानका संक्षेपसे वर्णन किया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ?

तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर भगवान् नारायणने ताराकी कथा कही और चैत्रतनय राजा अधिरथसे राजा सुरथकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग सुनाया।

(अध्याय ५७–६१)


सुरथ और समाधि वैश्यका मेधस्के आश्रमपर जाना, मुनिका दुर्गाकी महिमा एवं उनकी आराधना-विधिका उपदेश देना तथा दुर्गाकी आराधनासे उन दोनोंके अभीष्ट मनोरथकी पूर्ति

तदनन्तर नारदजीके प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् नारायण बोले—ध्रुवके पौत्र तथा उत्कलके पुत्र बलवान् नन्दि स्वायम्भुव मनुके वंशमें सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय राजा थे। उन्होंने सौ अक्षौहिणी सेना लेकर महामति सुरथके राज्यको चारों ओरसे घेर लिया। नारद! दोनों पक्षोंमें पूरे एक वर्षतक निरन्तर युद्ध होता रहा। अन्तमें चिरंजीवी वैष्णवनरेश नन्दिने सुरथपर विजय पायी। नन्दिने उन्हें राज्यसे बाहर कर दिया। भयभीत राजा सुरथ रातमें अकेले घोड़ेपर सवार हो गहन वनमें चले गये। वहाँ भद्रा नदीके तटपर उनकी एक वैश्यसे भेंट हुई। मुने! उन दोनोंने परस्पर बन्धुभावकी स्थापना की और उनमें बड़ा प्रेम हो गया। राजा वैश्यके साथ मेधस्के आश्रमपर गये। भारतमें सत्पुरुषोंके लिये जो दुष्कर पुण्यक्षेत्र है, उस पुष्करमें जाकर राजाने उन महातेजस्वी मुनिका दर्शन किया। मेधस्जी अपने शिष्योंको परम दुर्लभ ब्रह्मतत्त्वका उपदेश दे रहे थे। राजा और वैश्यने मस्तक झुकाकर उन मुनिश्रेष्ठको प्रणाम किया। मुनिने उन दोनों अतिथियोंका आदर किया और उन्हें शुभाशीर्वाद दिया। फिर पृथक्-पृथक् उन दोनोंका कुशल-मङ्गल, जाति और नाम पूछा। राजा सुरथने उन मुनीश्वरको क्रमशः उनके प्रश्नोंका उत्तर दिया।

सुरथ बोले—ब्रह्मन्! मैं राजा सुरथ हूँ। मेरा जन्म चैत्रवंशमें हुआ है। इस समय बलवान् राजा नन्दिने मुझे अपने राज्यसे निकाल दिया है। अब मैं कौन उपाय करूँ? किस प्रकार पुनः अपने राज्यपर मेरा अधिकार हो? यह आप बतावें। महाभाग मुने! मैं आपकी ही शरणमें आया हूँ।

३०२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

यह समाधि नामक वैश्य है और बड़ा धर्मात्मा है; तथापि दैववश इसके स्त्री-पुत्रोंने धनके लोभसे इसको घरसे बाहर निकाल दिया है। इसका अपराध इतना ही है कि यह स्त्री, पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंके मना करनेपर भी प्रतिदिन ब्राह्मणोंको प्रचुर धन और रत्न दानमें दिया करता था। इसीसे क्रोधमें आकर उन लोगोंने इसे घरसे निकाल दिया। फिर शोकके कारण वे पुनः इसका अन्वेषण करते हुए आये। परंतु यह पवित्र, ज्ञानी एवं विरक्त वैश्य उनके आग्रह करनेपर भी घरको नहीं लौटा। तब इसके पुत्र भी पितृशोकसे संतप्त हो सब कर्मोंसे विरक्त हो गये और सारा धन ब्राह्मणोंको देकर घर छोड़ वनको चले गये। 'श्रीहरिका परम दुर्लभ दास्य प्राप्त हो'—यही इस वैश्यका अभीष्ट मनोरथ है। इस निष्काम वैश्यको वह अभीष्ट वस्तु कैसे प्राप्त होगी? यह बात आप विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।

श्रीमेधसने कहा—राजन्! निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णकी आज्ञासे दुर्लङ्घ्य त्रिगुणमयी विष्णुमाया सम्पूर्ण विश्वको अपनी मायासे आच्छन्न कर देती है। वह कृपामयी देवी जिन धर्मात्मा पुरुषोंपर कृपा करती है, उन्हें दया करके परम दुर्लभ श्रीकृष्ण-भक्ति प्रदान करती है। नरेश्वर! परंतु जिन मायावी पुरुषोंपर विष्णुमाया दया नहीं करती है, उन दुर्गतिग्रस्त जीवोंको मायाद्वारा ही मोहजालसे बाँध देती है। फिर तो वे बर्बर जीव इस नश्वर एवं अनित्य संसारमें सदा नित्यबुद्धि कर लेते हैं और परमेश्वरकी उपासना छोड़कर दूसरे-दूसरे देवताओंकी सेवामें लग जाते हैं तथा उन्हीं देवताओंके मन्त्रका जप करते हैं। लोभवश मनमें किसी मिथ्या निमित्तको स्थान देकर वे इस तरह भटक जाते हैं। अन्य देवता भी श्रीहरिकी कलाएँ हैं। उनका सात जन्मोंतक सेवन करनेके पश्चात् वे देवी प्रकृतिकी कृपासे उनकी आराधनामें संलग्न होते हैं। सात जन्मोंतक कृपामयी विष्णुमायाकी सेवा करनेके बाद उन्हें सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप शिवकी भक्ति प्राप्त होती है। भगवान् शंकर श्रीहरिके ज्ञानके अधिष्ठाता देवता हैं। उनका सेवन करके मनुष्य शीघ्र ही उनसे श्रीविष्णु-भक्ति प्राप्त कर लेते हैं। तब उनके द्वारा सत्त्वस्वरूप सगुण विष्णुकी सेवा होने लगती है। इससे उनको परम निर्मल ज्ञानका साक्षात्कार होता है। सगुण विष्णुकी आराधनाके पश्चात् सात्त्विक वैष्णव मानव प्रकृतिसे परवर्ती निर्गुण श्रीकृष्णकी भक्ति पाते हैं। तदनन्तर वे साधु पुरुष श्रीकृष्णके निरामय मन्त्रको ग्रहण करते हैं और उन निर्गुण देवकी आराधनासे स्वयं निर्गुण हो जाते हैं। वे वैष्णव पुरुष निरामय गोलोकमें रहकर निरन्तर भगवान्‌का दास्य-(कैंकर्य)-मय सेवन करते हैं और अपनी आँखोंसे अगणित ब्रह्माओंका पतन (विनाश) देखते हैं। जो श्रेष्ठ मानव श्रीकृष्णभक्तसे उनके मन्त्रकी दीक्षा ग्रहण करता है, वह अपने पूर्वजोंकी सहस्रों पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। इतना ही नहीं, वह नानाके कुलकी सहस्रों पीढ़ियोंका, माताका तथा दास आदिका भी उद्धार करके गोलोकमें चला जाता है। महाभयंकर भवसागरमें कर्णधाररूपिणी दुर्गा श्रीकृष्ण-भक्तिरूपी नौकाद्वारा उन सबको पार कर देती है। वैष्णवोंके कर्म-बन्धनका उच्छेद करनेके लिये परमात्मा श्रीकृष्णकी वह वैष्णवी शक्ति तीखे शस्त्रका काम करती है। नरेश्वर! उस शक्तिकी शक्ति भी दो प्रकारकी है। एक विवेचनाशक्ति और दूसरी आवरणी शक्ति। पहली अर्थात् विवेचनाशक्ति तो वह भक्तोंको देती है और दूसरी आवरणी शक्ति अभक्तके पल्ले बाँधती है। भगवान् श्रीकृष्ण सत्यस्वरूप हैं। उनसे भिन्न सारा जगत् नश्वर है। विवेचना-बुद्धि नित्यरूपा एवं सनातनी है। यह मेरी श्री है। यही वैष्णव भक्तोंको प्राप्त होती है। किंतु आवरणी बुद्धि कर्मोंका फल भोगनेवाले अधम अवैष्णव पुरुषोंको

प्रकृतिखण्ड ३०३

प्राप्त हुआ करती है। राजन्! मैं प्रचेताका पुत्र और ब्रह्माजीका पौत्र हूँ तथा भगवान् शंकरसे ज्ञान प्राप्त करके परमात्मा श्रीकृष्णका भजन करता हूँ। महाराज! नदीके तटपर जाओ और सनातनी दुर्गाका भजन करो। तुम्हारे मनमें राज्यकी कामना है, इसलिये वे देवी तुम्हें आवरणी बुद्धि प्रदान करेंगी तथा इस निष्काम वैष्णव वैश्यको वे कृपामयी वैष्णवीदेवी शुद्ध विवेचना-बुद्धि देंगी। ऐसा कहकर कृपानिधान मुनिवर मेधस्‌ने उन दोनोंको दुर्गाजीकी पूजाकी विधि, स्तोत्र, कवच और मन्त्रका उपदेश दिया। वैश्यने उन कृपामयी देवीकी आराधना करके मोक्ष प्राप्त किया तथा राजाको अपना अभीष्ट राज्य, मनुका पद और मनोवाञ्छित परम ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार मैंने सुखद, सारभूत एवं मोक्षदायक परम उत्तम दुर्गाका उपाख्यान पूर्णरूपसे सुना दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय ६२)


सुरथ और समाधिपर देवीकी कृपा और वरदान, देवीकी पूजाका विधान, ध्यान, प्रतिमाकी स्थापना, परिहारस्तुति, शङ्खमें तीर्थोंका आवाहन तथा देवीके षोडशोपचार-पूजनका क्रम

नारदजीने पूछा— वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग नारायण! अब कृपया यह बताइये कि राजाने किस प्रकारसे पराप्रकृतिका सेवन किया था? समाधि नामक वैश्यने भी किस प्रकार प्रकृतिका उपदेश पाकर निर्गुण एवं निष्काम परमात्मा श्रीकृष्णको प्राप्त किया था। उनकी पूजाका विधान, ध्यान, मन्त्र, स्तोत्र अथवा कवच क्या है? जिसका उपदेश महामुनि मेधस्‌ने राजा सुरथको दिया था। समाधि वैश्यको देवी प्रकृतिने कौन-सा उत्तम ज्ञान दिया था? किस उपायसे उन दोनोंको सहसा प्रकृतिदेवीका साक्षात्कार प्राप्त हुआ था? वैश्यने ज्ञान पाकर किस दुर्लभ पदको प्राप्त किया था? अथवा राजाकी क्या गति हुई थी? उसे मैं सुनना चाहता हूँ।

श्रीनारायणने कहा— मुने! राजा सुरथ और समाधि वैश्यने मेधस् मुनिसे देवीका मन्त्र, स्तोत्र, कवच, ध्यान तथा पुरश्चरण-विधि प्राप्त करके पुष्करतीर्थमें उत्तम मन्त्रका जप आरम्भ कर दिया। वे एक वर्षतक त्रिकाल स्नान करके देवीकी समाराधनामें लगे रहे, फिर दोनों शुद्ध हो गये। वहीं उन्हें मूलप्रकृति ईश्वरीके साक्षात् दर्शन हुए। देवीने राजाको राज्यप्राप्तिका वर दिया। भविष्यमें मनुके पद और मनोवाञ्छित सुखकी प्राप्तिके लिये आश्वासन दिया। परमात्मा श्रीकृष्णने भगवान् शंकरको जो पूर्वकालमें ज्ञान दिया था, वही परम दुर्लभ गूढ़ ज्ञान देवीने वैश्यको दिया। कृपामयी देवी उपवाससे अत्यन्त क्लेश पाते हुए वैश्यको निश्चेष्ट तथा श्वासरहित हुआ देख उसे गोदमें उठाकर दुःख करने लगीं और बार-बार कहने लगीं—‘बेटा! होशमें आओ।' चैतन्यरूपिणी देवीने स्वयं ही उसे चेतना दी। उस चेतनाको पाकर वैश्य होशमें आया और प्रकृतिदेवीके सामने रोने लगा। अत्यन्त कृपामयी देवी उसपर प्रसन्न हो कृपापूर्वक बोलीं।

श्रीप्रकृतिने कहा— बेटा! तुम्हारे मनमें जिस वस्तुकी इच्छा हो, उसके लिये वर माँगो। अत्यन्त दुर्लभ ब्रह्मत्व, अमरत्व, इन्द्रत्व, मनुत्व और सम्पूर्ण सिद्धियोंका संयोग, जो चाहो, ले लो। मैं तुम्हें बालकोंको बहलानेवाली कोई नश्वर वस्तु नहीं दूँगी।

वैश्य बोला— माँ! मुझे ब्रह्मत्व या अमरत्व पानेकी इच्छा नहीं है। उससे भी अत्यन्त दुर्लभ

३०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


कौन-सी वस्तु है ? यह मैं स्वयं ही नहीं जानता। यदि कोई ऐसी वस्तु हो तो वही मेरे लिये अभीष्ट है। अब मैं तुम्हारी ही शरणमें आया हूँ, तुम्हें जो अभीष्ट हो, वही मुझे दे दो। मुझे ऐसा वर देनेकी कृपा करो, जो नश्वर न हो और सबका सार-तत्त्व हो।

श्रीप्रकृतिने कहा—बेटा! मेरे पास तुम्हारे लिये कोई भी वस्तु अदेय नहीं है। जो वस्तु मुझे अभीष्ट है, वही मैं तुम्हें दूँगी, जिससे तुम परम दुर्लभ गोलोकधाममें जाओगे। महाभाग वत्स! जो देवर्षियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है, वह सबका सारभूत ज्ञान ग्रहण करो और श्रीहरिके धाममें जाओ। भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण, वन्दन, ध्यान, अर्चन, गुण-कीर्तन, श्रवण, भावन, सेवा और सब कुछ श्रीकृष्णको समर्पण—यह वैष्णवोंकी नवधा भक्तिका लक्षण है। यह भक्ति जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि तथा यम-यातनाका नाश करनेवाली है।* जो नवधा भक्तिसे हीन, अधम एवं पापी हैं, उन लोगोंकी सूर्यदेव सदा आयु ही हरते रहते हैं। जो भक्त हैं और भगवान्‌में जिनका चित्त लगा हुआ है, ऐसे वैष्णव चिरजीवी, जीवन्मुक्त, निष्पाप तथा जन्मादि विकारोंसे रहित होते हैं। शिव, शेषनाग, धर्म, ब्रह्मा, विष्णु, महाविराट्, सनत्कुमार, कपिल, सनक, सनन्दन, वोढु, पञ्चशिख, दक्ष, नारद, सनातन, भृगु, मरीचि, दुर्वासा, कश्यप, पुलह, अङ्गिरा, मेधस्, लोमश, शुक्र, वसिष्ठ, क्रतु, बृहस्पति, कर्दम, शक्ति, अत्रि, पराशर, मार्कण्डेय, बलि, प्रह्लाद, गणेश्वर, यम, सूर्य, वरुण, वायु, चन्द्रमा, अग्नि, अकूपार, उलूक, नाडीजङ्घ, वायुपुत्र हनुमान्, नर, नारायण, कूर्म, इन्द्रद्युम्न और विभीषण—ये परमात्मा श्रीकृष्णकी नवधा भक्तिसे युक्त महान् 'धर्मिष्ठ' भक्तशिरोमणि हैं। वैश्यराज! जो भगवान् श्रीकृष्णके भक्त हैं, वे उन्हींके अंश हैं तथा सदा जीवन्मुक्त रहते हैं। इतना ही नहीं, वे भूमण्डलके समस्त तीर्थोंके पापोंका अपहरण करनेमें समर्थ हैं। ऊपर सात स्वर्ग हैं, बीचमें सात द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी है और नीचे सात पाताल हैं। ये सब मिलकर 'ब्रह्माण्ड' कहलाते हैं। बेटा! ऐसे विश्व-ब्रह्माण्डोंकी कोई गणना नहीं है। प्रत्येक विश्वमें पृथक्-पृथक् ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, देवर्षि, मनु और मानव आदि हैं। सम्पूर्ण आश्रम भी हैं। सर्वत्र मायाबद्ध जीव रहते हैं। जिन महाविष्णुके रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्ड वास करते हैं, उन्हें महाविराट् कहते हैं। वे परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। सबके अभीष्ट आत्मा श्रीकृष्ण सत्य, नित्य, परब्रह्मस्वरूप, निर्गुण, अच्युत, प्रकृतिसे परे एवं परमेश्वर हैं। तुम उनका भजन करो। वे निरीह, निराकार, निर्विकार, निरञ्जन, निष्काम, निर्विरोध, नित्यानन्द और सनातन हैं। स्वेच्छामय (स्वतन्त्र) तथा सर्वरूप हैं। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही वे दिव्य शरीर धारण करते हैं। परम तेजः-स्वरूप तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता हैं। ध्यानके द्वारा उन्हें वशमें कर लिया जाय, यह असम्भव है। शिव आदि योगियोंके लिये भी उनकी आराधना कठिन है। वे सर्वेश्वर, सर्वपूज्य, सबकी सम्पूर्ण कामनाओंके दाता, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सबको आनन्द प्रदान करनेवाले, सम्पूर्ण धर्मोंके दाता, सर्वरूप, प्राणरूप, सर्वधर्मस्वरूप, सर्वकारणकारण, सुखद, मोक्षदायक, साररूप, उत्कृष्ट रूपसम्पन्न, भक्तिदायक, दास्यप्रदायक तथा सत्पुरुषोंको सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले हैं। उनसे भिन्न सारा कृत्रिम जगत् नश्वर है।


* स्मरणं वन्दनं ध्यानमर्चनं गुणकीर्तनम्। श्रवणं भावनं सेवा सर्वं कृष्णे निवेदितम्॥
एतदेव वैष्णवानां नवधाभक्तिलक्षणम्। जन्ममृत्युजराव्याधियमताडनखण्डनम् ॥
(प्रकृतिखण्ड ६३। १९-२०)

प्रकृतिखण्ड

वे परात्परतर शुद्ध, परिपूर्णतम एवं शिवरूप हैं। बेटा! तुम सुखपूर्वक उन्हीं भगवान् अधोक्षजकी शरण लो। 'कृष्ण' यह दो अक्षरोंका मन्त्र श्रीकृष्णदास्य प्रदान करनेवाला है। तुम इसे ग्रहण करो और दुष्कर सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाले पुष्करतीर्थमें जाकर इस मन्त्रका दस लाख जप करो। दस लाखके जपसे ही तुम्हारे लिये यह मन्त्र सिद्ध हो जायगा।

ऐसा कहकर भगवती प्रकृति वहीं अन्तर्धान हो गयीं। मुने! उन्हें भक्तिभावसे नमस्कार करके समाधि वैश्य पुष्करतीर्थमें चला गया। पुष्करमें दुष्कर तप करके उसने परमेश्वर श्रीकृष्णको प्राप्त कर लिया। भगवती प्रकृतिके प्रसादसे वह श्रीकृष्णका दास हो गया।

भगवान् नारायण कहते हैं—महाभाग नारद! राजा सुरथने जिस क्रमसे देवी परा प्रकृतिकी आराधना की थी, वह वेदोक्त क्रम बता रहा हूँ, सुनो। महाराज सुरथने स्नान करके आचमन किया। फिर त्रिविध न्यास, करन्यास, अङ्गन्यास तथा मन्त्राङ्गन्यास करके भूतशुद्धि की। इसके बाद प्राणायाम करके शङ्ख-शोधनके अनन्तर देवीका ध्यान किया और मिट्टीकी प्रतिमामें उनका आवाहन किया। फिर भक्तिभावसे ध्यान करके प्रेमपूर्वक उनका पूजन किया। देवीके दाहिने भागमें लक्ष्मीकी स्थापना करके परम धार्मिक नरेशने उनकी भी भक्तिभावसे पूजा की। नारद! तत्पश्चात् देवीके सामने कलशपर गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वती—इन छः देवताओंका आवाहन करके राजाने विधिपूर्वक भक्तिसे उनका पूजन किया। प्रत्येक विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह पूर्वोक्त छः देवताओंकी पूजा और वन्दना करके महादेवीका प्रेमपूर्वक निम्नाङ्कित रीतिसे ध्यान करे। मुने! सामवेदमें जो ध्यान बताया गया है, वह परम उत्तम तथा कल्पवृक्षके समान वाञ्छापूरक है।

ध्यान

मूलप्रकृति ईश्वरी महादेवीका नित्य ध्यान करे। वे सनातनी देवी ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके लिये भी पूजनीया तथा वन्दनीया हैं। उन्हें नारायणी और विष्णुमाया कहते हैं। वे वैष्णवीदेवी विष्णुभक्ति देनेवाली हैं। यह सब कुछ उनका ही स्वरूप है। वे सबकी ईश्वरी, सबकी आधारभूता, परात्परा, सर्वविद्यारूपिणी, सर्वमन्त्रमयी तथा सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। वे सगुणा और निर्गुणा हैं। सत्यस्वरूपा, श्रेष्ठा, स्वेच्छामयी एवं सती हैं। महाविष्णुकी जननी हैं। श्रीकृष्णके आधे अङ्गसे प्रकट हुई हैं। कृष्णप्रिया, कृष्णशक्ति एवं कृष्णबुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। श्रीकृष्णने उनकी स्तुति, पूजा और वन्दना की है। वे कृपामयी हैं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है। उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योंकी दीप्तिको भी लज्जित करती है। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द-मन्द हास्यकी छटा छायी हुई है। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल हैं। उनका नाम दुर्गादेवी है। वे सौ भुजाओंसे युक्त हैं और महती दुर्गतिका नाश करनेवाली हैं। त्रिनेत्रधारी महादेवजीकी प्रिया हैं। साध्वी हैं। त्रिगुणमयी एवं त्रिलोचना हैं। त्रिलोचन शिवकी प्राणरूपा हैं। उनके मस्तकपर विशुद्ध अर्द्धचन्द्रका मुकुट है। वे मालतीकी पुष्पमालाओंसे अलंकृत केशपाश धारण करती हैं। उनका मुख सुन्दर एवं गोलाकार है। वे भगवान् शिवके मनको मोहनेवाली हैं। रत्नोंके युगल कुण्डलसे उनके कपोल उद्भासित होते रहते हैं। वे नासिकाके दक्षिण भागमें गजमुक्तासे निर्मित नथ धारण करती हैं। कानोंमें बहुसंख्यक बहुमूल्य रत्नमय आभूषण पहनती हैं। मोतियोंकी पाँतको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपंक्ति उनके मुखकी शोभा बढ़ाती है। पके हुए बिम्बफलके समान उनके लाल-लाल ओठ हैं। वे अत्यन्त प्रसन्न तथा परम मङ्गलमयी हैं। विचित्र पत्ररचनासे रमणीय

३०६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उनके कपोल-युगल परम उज्ज्वल प्रतीत होते हैं। रत्नोंके बने हुए बाजूबन्द, कंगन तथा रत्नमय मञ्जीर उनके विभिन्न अङ्गोंका सौन्दर्य बढ़ाते हैं। रत्नमय कङ्कणोंसे उनके दोनों हाथ विभूषित हैं। रत्नमय पाशक उनकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्नमयी अंगूठियोंसे उनके हाथोंकी अँगुलियाँ जगमगाती रहती हैं। पैरोंकी अँगुलियों और नखोंमें लगे हुए महावरकी रेखा उनकी शोभावृद्धि करती है। वे अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करती हैं। उनके विभिन्न अङ्ग गन्ध, चन्दनसे चर्चित हैं। वे कस्तूरीके विन्दुओंसे सुशोभित दो स्तन धारण करती हैं। सम्पूर्ण रूप और गुणोंसे सम्पन्न हैं तथा गजराजके समान मन्द गतिसे चलती हैं। अत्यन्त कान्तिमती तथा शान्तस्वरूपा हैं। योगसिद्धियोंमें बहुत बढ़ी-चढ़ी हैं। विधाताकी भी सृष्टि करनेवाली तथा सबकी माता हैं। समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाली हैं। शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति उनका परम सुन्दर मुख है। वे अत्यन्त मनोहारिणी हैं। उनके भालदेशका मध्यभाग कस्तूरी-बिन्दु, चन्दन-बिन्दु तथा सिन्दूर-बिन्दुसे सदा उद्दीप्त होता रहता है। उनके नेत्र शरद्-ऋतुके मध्याह्नकालमें खिले हुए कमलोंकी कान्तिको छीने लेते हैं। काजलकी सुन्दर रेखाओंसे वे सर्वथा सुशोभित होते हैं। उनके श्रीअङ्ग करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्यलीलाको तिरस्कृत करनेवाले हैं। वे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनका मस्तक उत्तम रत्नोंके बने हुए मुकुटसे उद्भासित होता है। वे स्रष्टाकी सृष्टिमें शिल्परूपा और पालकके पालनमें दयारूपा हैं। संहारकालमें संहारककी उत्तम संहाररूपिणी शक्ति हैं। निशुम्भ और शुम्भको मथ डालनेवाली तथा महिषासुरका मर्दन करनेवाली हैं। पूर्वकालमें त्रिपुर-युद्धके समय त्रिपुरारि महादेवने इनकी स्तुति की थी। मधु और कैटभके युद्धमें वे विष्णुकी शक्तिस्वरूपिणी थीं। समस्त दैत्योंका वध तथा रक्तबीजका विनाश करनेवाली यही हैं। हिरण्यकशिपुके वधकालमें ये नृसिंहशक्तिरूपमें प्रकट हुई थीं। हिरण्याक्षके वधकालमें भगवान् वाराहके भीतर वाराही शक्ति यही थीं। ये परब्रह्मरूपिणी तथा सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ।

इस प्रकार ध्यान करके विद्वान् पुरुष अपने सिरपर पुष्प रखे और पुनः ध्यान करके भक्तिभावसे आवाहन करे। प्रकृतिकी प्रतिमाका स्पर्श करके मनुष्य इस प्रकार मन्त्र पढ़े तथा मन्त्रद्वारा ही यत्नपूर्वक जीव-न्यास करे।

अम्ब ! भगवति ! सनातनि ! शिवलोकसे आओ, आओ। सुरेश्वरि ! मेरी शारदीया पूजा ग्रहण करो। जगत्पूज्ये ! महेश्वरि ! यहाँ आओ, ठहरो, ठहरो। हे मातः ! हे अम्बिके ! तुम इस प्रतिमामें निवास करो। अच्युते ! इस प्रतिमामें तुम्हारे प्राण निम्नभागमें रहनेवाले प्राणोंके साथ आवें, रहें। तुम्हारी सम्पूर्ण शक्तियाँ इस प्रतिमामें तुरंत पदार्पण करें। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गायै स्वाहा।' इस मन्त्रका उच्चारण करके कहे—'हे सदाशिवे ! इस प्रतिमाके हृदयमें प्राण स्थित हों। चण्डिके ! सम्पूर्ण इन्द्रियोंके अधिदेवता यहाँ आवें। तुम्हारी शक्तियाँ यहाँ आवें। ईश्वर यहाँ आवें। देवि ! तुम इस प्रतिमामें पधारो।' इस प्रकार आवाहन करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे परिहार-स्तुति करनी चाहिये। विप्रवर ! एकाग्रचित्त होकर परिहारको सुनो।

शिवप्रिये ! भगवति अम्बे ! शिवलोकसे जो तुम आयी हो, तुम्हारा स्वागत है। भद्रे ! मुझपर कृपा करो। भद्रकालि ! तुम्हें नमस्कार है। दुर्गे ! माहेश्वरि ! तुम जो मेरे घरमें आयी हो, इससे मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ और मेरा जीवन सफल है। आज मेरा जन्म सफल और जीवन सार्थक हुआ; क्योंकि मैं भारतवर्षके पुण्यक्षेत्रमें दुर्गाजीका पूजन करता हूँ। जो विद्वान् भारतवर्षमें आप पूजनीया दुर्गाका पूजन करता है, वह अन्तमें गोलोकधामको जाता है और इहलोकमें भी उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न

प्रकृतिखण्ड ३०७

बना रहता है। वैष्णवीदेवीकी पूजा करके विद्वान् पुरुष विष्णुलोकमें जाता है और माहेश्वरीकी पूजा करके वह शिवलोकको प्राप्त होता है। वेदोंमें सात्त्विकी, राजसी और तामसीके भेदसे तीन प्रकारकी देवीकी पूजा बतायी गयी है, जो क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम है। सात्त्विकी पूजा वैष्णवोंकी है, शाक्त आदि राजसी पूजा करते हैं और जो किसी मन्त्रकी दीक्षा नहीं ले सके हैं, ऐसे असत् पुरुषोंकी पूजा तामसी कही गयी है। जो पूजा जीवहत्यासे रहित और श्रेष्ठ है, वही सात्त्विकी एवं वैष्णवी मानी गयी है। वैष्णवलोग वैष्णवीदेवीके वरदानसे गोलोकमें जाते हैं। माहेश्वरी एवं राजसी पूजामें बलिदान होता है। शाक्त आदि राजस पुरुष उस पूजासे कैलासमें जाते हैं। किरात लोग तामसी पूजाद्वारा भूत-प्रेतोंकी आराधना करके नरकमें पड़ते हैं। माँ! तुम्हीं जगत्‌के जीवोंको धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों फल प्रदान करनेवाली हो। तुम परमात्मा श्रीकृष्णकी सर्वशक्तिस्वरूपा हो। जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका अपहरण करनेवाली परात्परा हो। सुखदायिनी, मोक्षदायिनी, भद्रा (कल्याणकारिणी) तथा सदा श्रीकृष्णभक्ति प्रदान करनेवाली हो। महामाये! नारायणि! दुर्गे! तुम दुर्गतिका नाश करनेवाली हो। दुर्गा नामके स्मरणमात्रसे यहाँ मनुष्योंका दुर्गम कष्ट दूर हो जाता है।

इस प्रकार परिहार-स्तवन करके साधक देवीके बायें भागमें तिपाईके ऊपर शङ्ख रखे। उसमें जल भर दे और दूर्वा, पुष्प तथा चन्दन डाल दे। तत्पश्चात् उसे दाहिने हाथसे पकड़कर मनुष्य इस तरह मन्त्र पढ़े।

'हे शङ्ख! तुम पवित्र वस्तुओंमें परम पवित्र हो, मङ्गलोंके भी मङ्गल हो। पूर्वकल्पमें शङ्खचूडसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई, इसलिये परम पवित्र हो।' इस विधिसे अर्घ्यपात्रकी स्थापना करके विद्वान् पुरुष उसे देवीको अर्पित करे।

तदनन्तर सोलह उपचार चढ़ाकर देवीकी पूजा करे। सजल कुशसे त्रिकोण मण्डल बनाकर वहाँ धार्मिक पुरुष कच्छप, शेषनाग और पृथ्वीका पूजन करे। मण्डलके भीतर ही तिपाई रखे और उसके ऊपर शङ्ख। शङ्खमें तीन भाग जल डालकर उसकी पूजा करे तथा उसमें गङ्गा आदि तीर्थोंका आवाहन करते हुए कहे—

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि चन्द्रभागे च कौशकि॥
स्वर्णरेखे कनखले पारिभद्रे च गण्डकि।
श्वेतगङ्गे चन्द्ररेखे पम्पे चम्पे च गोमति॥
पद्मावति त्रिपर्णाशे विपाशे विरजे प्रभे।
शतह्रदे चेलगङ्गे जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥

हे गङ्गे! यमुने! गोदावरि! सरस्वति! नर्मदे! सिन्धु! कावेरि! चन्द्रभागे! कौशकि! स्वर्णरेखे! कनखले! पारिभद्रे! गण्डकि! श्वेतगङ्गे! चन्द्ररेखे! पम्पे! चम्पे! गोमति! पद्मावति! त्रिपर्णाशे! विपाशे! विरजे! प्रभे! शतह्रदे! तथा चेलगङ्गे! आपलोग इस जलमें निवास करें।

तत्पश्चात् उस जलमें तुलसी और चन्दनसे अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, वरुण तथा शिव—इन छः देवताओंकी पूजा करे। फिर उस जलसे समस्त नैवेद्योंका प्रोक्षण करे। इसके बाद एक-एक करके सोलह उपचार समर्पित करे। आसन, वसन, पाद्य, स्नानीय, अनुलेपन, मधुपर्क, गन्ध, अर्घ्य, पुष्प, अभीष्ट नैवेद्य, आचमनीय, ताम्बूल, रत्नमय भूषण, धूप, दीप और शय्या—ये सोलह उपचार हैं।

(आसन) शंकरप्रिये! अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके चित्रोंद्वारा शोभित श्रेष्ठ सिंहासन ग्रहण करो। (वस्त्र) शिवे! असंख्य सूत्रोंसे बने हुए तथा ईश्वरकी इच्छासे निर्मित प्रज्वलित अग्निद्वारा शुद्ध किया हुआ दिव्य वस्त्र स्वीकार करो। (पाद्य) दुर्गे! बहुमूल्य रत्नमय पात्रमें रखे हुए निर्मल गङ्गाजलको पैर धोनेके लिये पाद्यके रूपमें ग्रहण करो। (स्नानीय) परमेश्वरि! सुगन्धित आँवलेका

४८- शिवजीका श्रीपार्वतीको पुण्यक-व्रतके अनुष्ठानके लिये प्रेरित करना

३०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

स्निग्ध द्रव और परम दुर्लभ सुपक्व विष्णुतैल स्नानीय सामग्रीके रूपमें प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करो। (अनुलेपन) जगदम्ब ! कस्तूरी और कुङ्कुमसे मिश्रित सुगन्धित चन्दनद्रव सुवासित अनुलेपनके रूपमें समर्पित है। इसे ग्रहण करो। (मधुपर्क) महादेवि ! रत्नपात्रमें स्थित परम पवित्र एवं परम मङ्गलमय माध्वीक मधुपर्कके रूपमें प्रस्तुत है। इसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करो। (गन्ध) देवि ! विभिन्न वृक्षोंके मूलका चूर्ण गन्ध द्रव्यसे युक्त हो परम पवित्र एवं मङ्गलोपयोगी गन्धके रूपमें समर्पित है। इसे ग्रहण करो। (अर्घ्य) चण्डिके ! पवित्र शङ्खपात्रमें स्थित स्वर्गङ्गाका जल दूर्वा, पुष्प और अक्षतसे युक्त अर्घ्यके रूपमें अर्पित है। इसे स्वीकार करो। (पुष्प) जगदम्बिके ! पारिजात-वृक्षसे उत्पन्न सुगन्धित श्रेष्ठ पुष्प और मालती आदि फूलोंकी माला ग्रहण करो। (नैवेद्य) शिवे ! दिव्य सिद्धान्न, आमान्न, पीठा, खीर आदि, लड्डू और दूसरे-दूसरे मिष्टान्न तथा सामयिक फल नैवेद्यके रूपमें प्रस्तुत हैं। इन्हें स्वीकार करो। (आचमनीय) गिरिराजनन्दिनि ! मैंने भक्तिभावसे आचमनीयके रूपमें कर्पूर आदिसे सुसंस्कृत एवं सुवासित शीतल जल अर्पित किया है। इसे ग्रहण करो। (ताम्बूल) देवि ! सुपारी, पान और चूनाको एकत्र करके उसे कर्पूर आदिसे सुवासित किया है। वही यह समस्त भोगोंमें श्रेष्ठ रमणीय ताम्बूल है। इसे स्वीकार करो। (रत्नमय भूषण) देवि ! अत्यन्त मूल्यवान् रत्नोंके सार-भागके द्वारा ईश्वरेच्छासे निर्मित तथा सम्पूर्ण अङ्गोंको शोभासम्पन्न बनानेवाला रत्नमय आभूषण ग्रहण करो। (धूप) देवि ! वृक्षकी गोदके चूर्णको सुगन्धित वस्तुओंसे मिश्रित करके अग्निकी शिखासे शुद्ध किया गया है। इस धूपको स्वीकार करो। (दीप) परमेश्वरि ! घने अन्धकारको दूर करनेवाला यह परम पवित्र दीप दिव्य रत्नविशेष है। इसे ग्रहण करो। (शय्या) देवि ! यह उत्तम दिव्य पर्यङ्क रत्नोंके सारभागसे निर्मित हुआ है। इसपर गद्दा है और वह महीन वस्त्रकी चादरसे ढका हुआ है। तुम इस शय्याको स्वीकार करो।

मुने ! इस प्रकार दुर्गादेवीका पूजन करके उन्हें पुष्पाञ्जलि चढ़ावे। तदनन्तर देवीकी सहचरी आठ नायिकाओंका यत्नतः पूजन करे। उनके नाम इस प्रकार हैं—उग्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, अतिचण्डा, चामुण्डा, चण्डा और चण्डवती। अष्टदल कमलपर पूर्व आदि दिशाके क्रमसे इनकी स्थापना करके पञ्चोपचारोंद्वारा पूजन करे। दलोंके मध्यभागमें भैरवोंका पूजन करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं—महाभैरव, संहारभैरव, असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, कालभैरव, क्रोधभैरव, ताम्रचूड़भैरव तथा चन्द्रचूड़भैरव। इन सबकी पूजा करके बीचकी कर्णिकामें नौ शक्तियोंका पूजन करे। क्रम यह है कि कमलके आठ दलोंमें आठ शक्तियोंकी और बीचकी कर्णिकामें नवीं शक्तिकी स्थापना करे। इस तरह इन सबका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। इन शक्तियोंके नाम यों हैं—ब्रह्माणी, वैष्णवी, रौद्री, माहेश्वरी, नारसिंही, वाराही, इन्द्राणी तथा कार्तिकी (कौमारी)। इनके अतिरिक्त नवीं प्रधाना शक्ति हैं सर्वमङ्गला, जो सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। इन नौ शक्तियोंका पूजन करनेके पश्चात् कलशमें देवताओंका पूजन करे। शंकर, कार्तिकेय, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, वरुण, देवीकी चेटी, वटु तथा चौंसठ योगिनी—इन सबका विधिवत् पूजन करके यथाशक्ति भेंट-उपहार अर्पित करके विद्वान् पुरुष स्तुति करे। कवचको भक्तिपूर्वक पढ़कर उसे गलेमें बाँध ले। फिर परिहार नामक स्तुति करके विद्वान् पुरुष देवीको नमस्कार करे। इस प्रकार उपहार दे स्तुति करके कवच बाँधकर विद्वान् पुरुष धरतीपर माथा टेक दण्डवत् प्रणाम करे और ब्राह्मणको दक्षिणा दे।

(अध्याय ६३-६४)

प्रकृतिखण्ड ३०९

देवीके बोधन, आवाहन, पूजन और विसर्जनके नक्षत्र, इन सबकी महिमा, राजाको देवीका दर्शन एवं उत्तम ज्ञानका उपदेश देना

नारदजीने पूछा— महाभाग! आपने जो कुछ कहा है, वह अमृतरससे भी बढ़कर मधुर और उत्तम है। उसे पूर्णरूपसे मैंने सुन लिया। प्रभो! अब भलीभाँति यह बताइये कि देवीका स्तोत्र और कवच क्या है? तथा उनके पूजनसे किस फलकी प्राप्ति होती है?

नारायणने कहा— आर्द्रा नक्षत्रमें देवीको जगावे और मूल नक्षत्रमें उनका प्रतिमामें प्रवेश या आवाहन करे। फिर उत्तराषाढ़ नक्षत्रमें पूजा करके श्रवण नक्षत्रमें देवीका विसर्जन करे। आद्रायुक्त नवमी तिथिमें देवीको जगाकर जो पूजा की जाती है, उस एक बारकी पूजासे मनुष्य सौ वर्षोंतककी की हुई पूजाका फल पा लेता है। मूल नक्षत्रमें देवीका प्रवेश होनेपर यज्ञका फल प्राप्त होता है। उत्तराषाढ़में पूजन करनेपर वाजपेय-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। श्रवण नक्षत्रमें देवीका विसर्जन करके मनुष्य लक्ष्मी तथा पुत्र-पौत्रोंको पाता है, इसमें संशय नहीं है। देवीकी पूजासे मनुष्यको पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्य प्राप्त होता है। यदि तिथिके साथ आर्द्रा नक्षत्रका योग न मिले तो केवल नवमीमें पार्वतीका बोधन करके मनुष्य एक पक्षतक पूजन करे तो उसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। उस दशामें नवमीको पूजन करके दशमीको विसर्जन कर दे। सप्तमीको पूजन करके विद्वान् पुरुष बलि अर्पण करे, अष्टमीको बलिरहित पूजन उत्तम माना गया है। अष्टमीको बलि देनेसे मनुष्योंपर विपत्ति आती है। विद्वान् पुरुष नवमी तिथिको भक्तिभावसे विधिवत् बलि दे। विप्रवर! उस बलिसे मनुष्योंपर दुर्गाजी प्रसन्न होती हैं। परंतु यह बलि हिंसात्मक नहीं होनी चाहिये; क्योंकि हिंसासे मनुष्य पापका भागी होता है, इसमें संशय नहीं। जो जिसका वध करता है, वह मारा गया प्राणी भी जन्मान्तरमें उस मारनेवालेका वध करता है—यह वेदकी वाणी है।* इसीलिये वैष्णवजन वैष्णवी (हिंसारहित) पूजा करते हैं।

इस प्रकार पूरे वर्षतक भक्तिभावसे पूजन करके गलेमें कवच बाँधकर राजाने परमेश्वरीका स्तवन किया। उनके द्वारा किये गये स्तवनसे संतुष्ट हुई देवीने उन्हें साक्षात् दर्शन दिये। उन्होंने सामने देवीको देखा, वे ग्रीष्म-ऋतुके सूर्यकी भाँति देदीप्यमान थीं। वे तेजःस्वरूपा, सगुणा एवं निर्गुणा परादेवी तेजोमण्डलके मध्यभागमें स्थित हो अत्यन्त कमनीय जान पड़ती थीं। भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर हुई उन कृपारूपा स्वेच्छामयी देवीको देखकर राजेन्द्र सुरथने भक्तिसे गर्दन नीची करके पुनः उनकी स्तुति की। उस स्तुतिसे संतुष्ट हो जगदम्बाने मन्द मुस्कराहटके साथ राजेन्द्रको सम्बोधित करके कृपापूर्वक यह सत्य बात कही।

प्रकृति बोली— राजन्! तुम साक्षात् मुझको पाकर उत्तम वैभव माँग रहे हो। इस समय तुम्हें यही अभीष्ट है, इसलिये मैं वैभव ही दे रही हूँ। महाराज! तुम अपने समस्त शत्रुओंको जीतकर निष्कण्टक राज्य पाओ। फिर दूसरे जन्ममें तुम सावर्णि नामक आठवें मनु होओगे। नरेश्वर! मैं परिणाममें (अन्ततोगत्वा) तुम्हें ज्ञान दूँगी। साथ ही परमात्मा श्रीकृष्णमें भक्ति एवं दास्यभाव प्रदान करूँगी। जो मन्दबुद्धि मानव साक्षात् मुझको पाकर वैभवकी याचना करता है, वह मायासे ठगा गया है; इसलिये विष खाता है और अमृतका त्याग करता है। ब्रह्मा आदिसे


* हिंसाजन्यं च पापं च लभते नात्र संशयः॥ यो यं हन्ति स तं हन्ति चेति वेदोक्तमेव च।
(प्रकृतिखण्ड ६५। १०, १२)

३१०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् नश्वर ही है, केवल निर्गुण परब्रह्म श्रीकृष्ण ही नित्य सत्य हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिकी आदिजननी परात्परा प्रकृति मैं ही हूँ। मैं सगुणा, निर्गुणा, श्रेष्ठा, सदा स्वेच्छामयी, नित्यानित्या, सर्वरूपा, सर्वकारणकारणा और सबकी बीजरूपा मूलप्रकृति ईश्वरी हूँ। रमणीय गोलोकमें पुण्यमय वृन्दावनके भीतर रासमण्डलमें परमात्मा श्रीकृष्णकी प्राणाधिका राधा मैं ही हूँ। मैं ही दुर्गा, विष्णुमाया तथा बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हूँ। वैकुण्ठमें मैं ही लक्ष्मी और साक्षात् सरस्वती देवी हूँ। ब्रह्मलोकमें मुझे ही ब्रह्माणी तथा वेदमाता सावित्री कहते हैं। मैं ही गङ्गा, तुलसी तथा सबकी आधारभूता वसुन्धरा हूँ। नरेश्वर! मैंने अपनी कलासे नाना प्रकारके रूप धारण किये हैं। मायाद्वारा सम्पूर्ण स्त्रियोंके रूपमें मेरा ही प्रादुर्भाव हुआ है। परम पुरुष परमात्मा श्रीकृष्णने अपनी भ्रूभङ्गलीलासे मेरी सृष्टि की है। उन्हीं पुरुषोत्तमने अपनी भ्रूभङ्गलीलासे उस महान् विराट्की भी सृष्टि की है, जिसके रोमकूपोंमें सदैव असंख्य विश्व-ब्रह्माण्ड निवास करते हैं। वे सब-के-सब कृत्रिम हैं, तथापि मायासे सब लोग उन अनित्य लोकोंमें भी सदा नित्यबुद्धि करते हैं। सातों द्वीपों और समुद्रोंसे युक्त पृथ्वी, नीचेके सात पाताल और ऊपरके सात स्वर्ग—इन सबको मिलाकर एक विश्व-ब्रह्माण्ड कहा गया है, जिसकी रचना ब्रह्माद्वारा हुई है। इस तरहके जो असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, उन सबमें पृथक्-पृथक् ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि विद्यमान हैं। उन सबके ईश्वर श्रीकृष्ण हैं। यही परात्पर ज्ञान है। वेदों, व्रतों, तीर्थों, तपस्याओं, देवताओं और पुण्योंका जो सारतत्त्व है, वह श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण-भक्तिसे हीन जो मूढ़ मनुष्य है, वह निश्चय ही जीते-जी मृतकके समान है। श्रीकृष्ण-भक्तोंको छूकर बहनेवाली वायुका स्पर्श पाकर सारे तीर्थ पवित्र हो गये हैं। श्रीकृष्ण-मन्त्रोंका उपासक ही जीवन्मुक्त माना गया है। जप, तप, तीर्थ और पूजाके बिना केवल मन्त्रग्रहणमात्रसे नर नारायण हो जाता है। श्रीकृष्ण-भक्त अपने नाना और उनके ऊपरकी सौ पीढ़ियोंका तथा पितासे लेकर ऊपरकी एक सहस्र पीढ़ियोंका उद्धार करके गोलोकमें जाता है। नरेश्वर! यह सारभूत ज्ञान मैंने तुम्हें बताया है। सावर्णिक मन्वन्तरके अन्तमें जब तुम्हारे सारे दोष समाप्त हो जायँगे, उस समय मैं तुम्हें श्रीहरिकी भक्ति प्रदान करूँगी।

कर्मोंका फल भोगे बिना उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी क्षय नहीं होता है। अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है।* मैं जिसपर अनुग्रह करती हूँ, उसे परमात्मा श्रीकृष्णके प्रति निर्मल, निश्चल एवं सुदृढ़ भक्ति प्रदान करती हूँ और जिन्हें ठगना चाहती हूँ; उन्हें प्रातःकालिक स्वप्नके समान मिथ्या एवं भ्रमरूपिणी सम्पत्ति प्रदान करती हूँ। बेटा! मैंने तुम्हें यह ज्ञानकी बात बतायी है। अब तुम सुखपूर्वक जाओ।

ऐसा कहकर महादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। राज्यप्राप्तिका वरदान पाकर राजा देवीको नमस्कार करके अपने घरको चले गये। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने तुम्हें दुर्गाजीका परम उत्तम उपाख्यान सुनाया है। (अध्याय ६५)


* नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥
(प्रकृतिखण्ड ६५। ३९)

प्रकृतिखण्ड ३११

दुर्गाजीका दुर्गनाशनस्तोत्र तथा प्रकृतिकवच या ब्रह्माण्डमोहनकवच एवं उसका माहात्म्य

नारदजीने कहा—मुनिश्रेष्ठ! मैंने सब कुछ सुन लिया। अवश्य ही अब कुछ भी सुनना शेष नहीं रहा। केवल प्रकृतिदेवीके स्तोत्र और कवचका मुझसे वर्णन कीजिये।

श्रीनारायण बोले—नारद! सबसे पहले गोलोकमें परमात्मा श्रीकृष्णने वसन्त-ऋतुमें रासमण्डलके भीतर प्रसन्नतापूर्वक देवीकी पूजा करके उनकी स्तुति की थी। दूसरी बार मधु और कैटभके साथ युद्धके अवसरपर भगवान् विष्णुने देवीका स्तवन किया। तीसरी बार वहीं प्राणसंकटका अवसर आया जान ब्रह्माजीने दुर्गादेवीकी स्तुति की थी। मुने! चौथी बार त्रिपुरारि शिवने त्रिपुरोंके साथ अत्यन्त घोरतर युद्धका अवसर आनेपर भक्तिभावसे देवीका स्तवन किया था और पाँचवीं बार वृत्रासुरवधके समय घोर प्राणसंकटकी बेलामें सम्पूर्ण देवताओंसहित इन्द्रने दुर्गादेवीकी स्तुति की थी। तबसे मुनीन्द्रों, मनुओं और सुरथ आदि मनुष्योंने प्रत्येक कल्पमें परात्परा परमेश्वरीका स्तवन एवं पूजन करना आरम्भ किया। ब्रह्मन्! अब तुम देवीका स्तोत्र सुनो, जो सम्पूर्ण विघ्नोंका नाश करनेवाला, सुखदायक, मोक्षदायक, सार वस्तु तथा भवसागरसे पार होनेका साधन है।

श्रीकृष्ण उवाच

त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी।
त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका॥
कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्।
परब्रह्मस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी॥
तेजःस्वरूपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा।
सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा॥
सर्वबीजस्वरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया।
सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमङ्गलमङ्गला॥
सर्वबुद्धिस्वरूपा च सर्वशक्तिस्वरूपिणी।
सर्वज्ञानप्रदा देवी सर्वज्ञा सर्वभाविनी॥
त्वं स्वाहा देवदाने च पितृदाने स्वधा स्वयम्।
दक्षिणा सर्वदाने च सर्वशक्तिस्वरूपिणी॥
निद्रा त्वं च दया त्वं च तृष्णा त्वं चात्मनः प्रिया।
क्षुत्क्षान्तिः शान्तिरीशा च कान्तिः सृष्टिश्च शाश्वती॥
श्रद्धा पुष्टिश्च तन्द्रा च लज्जा शोभा दया तथा।
सतां सम्पत्स्वरूपा च विपत्तिरसतामिह॥
प्रीतिरूपा पुण्यवतां पापिनां कलहाङ्कुरा।
शश्वत्कर्ममयी शक्तिः सर्वदा सर्वजीविनाम्॥
देवेभ्यः स्वपदोदात्री धातुर्धात्री कृपामयी।
हिताय सर्वदेवानां सर्वासुरविनाशिनी॥
योगनिद्रा योगरूपा योगदात्री च योगिनाम्।
सिद्धस्वरूपा सिद्धानां सिद्धिदा सिद्धयोगिनी॥
ब्रह्माणी माहेश्वरी च विष्णुमाया च वैष्णवी।
भद्रदा भद्रकाली च सर्वलोकभयङ्करी॥
ग्रामे ग्रामे ग्रामदेवी गृहदेवी गृहे गृहे।
सतां कीर्तिः प्रतिष्ठा च निन्दा त्वमसतां सदा॥
महायुद्धे महामारी दुष्टसंहाररूपिणी।
रक्षास्वरूपा शिष्टानां मातेव हितकारिणी॥
वन्द्या पूज्या स्तुता त्वं च ब्रह्मादीनां च सर्वदा।
ब्राह्मण्यरूपा विप्राणां तपस्या च तपस्विनाम्॥
विद्या विद्यावतां त्वं च बुद्धिर्बुद्धिमतां सताम्।
मेधास्मृतिस्वरूपा च प्रतिभा प्रतिभावताम्॥
राज्ञां प्रतापरूपा च विशां वाणिज्यरूपिणी।
सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा त्वं रक्षारूपा च पालने॥
तथान्ते त्वं महामारी विश्वस्य विश्वपूजिते।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च मोहिनी॥
दुरत्यया मे माया त्वं यया सम्मोहितं जगत्।
यया मुग्धो हि विद्वांश्च मोक्षमार्गं न पश्यति॥
इत्यात्मना कृतं स्तोत्रं दुर्गाया दुर्गनाशनम्।
पूजाकाले पठेद्यो हि सिद्धिर्भवति वाञ्छिता॥

(प्रकृतिखण्ड ६६।७—२६)

३१२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्रीकृष्ण बोले— देवि! तुम्हीं सबकी जननी, मूलप्रकृति ईश्वरी हो। तुम्हीं सृष्टिकार्यमें आद्याशक्ति हो। तुम अपनी इच्छासे त्रिगुणमयी बनी हुई हो। कार्यवश सगुण रूप धारण करती हो। वास्तवमें स्वयं निर्गुणा हो। सत्या, नित्या, सनातनी एवं परब्रह्मस्वरूपा हो, परमा तेजःस्वरूपा हो। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये दिव्य शरीर धारण करती हो। तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेशा, सर्वाधारा, परात्परा, सर्वबीजस्वरूपा, सर्वपूज्या, निराश्रया, सर्वज्ञा, सर्वतोभद्रा (सब ओरसे मङ्गलमयी), सर्वमङ्गलमङ्गला, सर्वबुद्धिस्वरूपा, सर्वशक्तिरूपिणी, सर्वज्ञानप्रदा देवी, सब कुछ जाननेवाली और सबको उत्पन्न करनेवाली हो। देवताओंके लिये हविष्य दान करनेके निमित्त तुम्हीं स्वाहा हो, पितरोंके लिये श्राद्ध अर्पण करनेके निमित्त तुम स्वयं ही स्वधा हो, सब प्रकारके दानयज्ञमें दक्षिणा हो तथा सम्पूर्ण शक्तियाँ तुम्हारा ही स्वरूप हैं। तुम निद्रा, दया और मनको प्रिय लगनेवाली तृष्णा हो। क्षुधा, क्षमा, शान्ति, ईश्वरी, कान्ति तथा शाश्वती सृष्टि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्रद्धा, पुष्टि, तन्द्रा, लज्जा, शोभा और दया हो। सत्पुरुषोंके यहाँ सम्पत्ति और दुष्टोंके घरमें विपत्ति भी तुम्हीं हो। तुम्हीं पुण्यवानोंके लिये प्रीतिरूप हो, पापियोंके लिये कलहका अङ्कुर हो तथा समस्त जीवोंकी कर्ममयी शक्ति भी सदा तुम्हीं हो। देवताओंको उनका पद प्रदान करनेवाली तुम्हीं हो। धाता (ब्रह्मा)-का भी धारण-पोषण करनेवाली दयामयी धात्री तुम्हीं हो। सम्पूर्ण देवताओंके हितके लिये तुम्हीं समस्त असुरोंका विनाश करती हो। तुम योगनिद्रा हो। योग तुम्हारा स्वरूप है। तुम योगियोंको योग प्रदान करनेवाली हो। सिद्धोंकी सिद्धि भी तुम्हीं हो। तुम सिद्धिदायिनी और सिद्धयोगिनी हो। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, विष्णु-माया, वैष्णवी तथा भद्रदायिनी भद्रकाली भी तुम्हीं हो। तुम्हीं समस्त लोकोंके लिये भय उत्पन्न करती हो। गाँव-गाँवमें ग्रामदेवी और घर-घरमें गृहदेवी भी तुम्हीं हो। तुम्हीं सत्पुरुषोंकी कीर्ति और प्रतिष्ठा हो। दुष्टोंकी होनेवाली सदा निन्दा भी तुम्हारा ही स्वरूप है। तुम महायुद्धमें दुष्टसंहाररूपिणी महामारी हो और शिष्ट पुरुषोंके लिये माताकी भाँति हितकारिणी एवं रक्षारूपिणी हो। ब्रह्मा आदि देवताओंने सदा तुम्हारी वन्दना, पूजा एवं स्तुति की है। ब्राह्मणोंकी ब्राह्मणता और तपस्वीजनोंकी तपस्या भी तुम्हीं हो, विद्वानोंकी विद्या, बुद्धिमानोंकी बुद्धि, सत्पुरुषोंकी मेधा और स्मृति तथा प्रतिभाशाली पुरुषोंकी प्रतिभा भी तुम्हारा ही स्वरूप है। राजाओंका प्रताप और वैश्योंका वाणिज्य भी तुम्हीं हो। विश्वपूजिते! सृष्टिकालमें सृष्टिरूपिणी, पालनकालमें रक्षारूपिणी तथा संहारकालमें विश्वका विनाश करनेवाली महामारीरूपिणी भी तुम्हीं हो। तुम्हीं कालरात्रि, महारात्रि तथा मोहिनी, मोहरात्रि हो; तुम मेरी दुर्लङ्घ्य माया हो, जिसने सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है तथा जिससे मुग्ध हुआ विद्वान् पुरुष भी मोक्षमार्गको नहीं देख पाता।

इस प्रकार परमात्मा श्रीकृष्णद्वारा किये गये दुर्गाके दुर्गम संकटनाशनस्तोत्रका जो पूजाकालमें पाठ करता है, उसे मनोवाञ्छित सिद्धि प्राप्त होती है।

जो नारी वन्ध्या, काकवन्ध्या, मृतवत्सा तथा दुर्भगा है, वह भी एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण करके निश्चय ही उत्तम पुत्र प्राप्त कर लेती है। जो पुरुष अत्यन्त घोर कारागारके भीतर दृढ़ बन्धनमें बँधा हुआ है, वह एक ही मासतक इस स्तोत्रको सुन ले तो अवश्य ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य राजयक्ष्मा, गलित कोढ़, महाभयंकर शूल और महान् ज्वरसे ग्रस्त है, वह एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण कर

प्रकृतिखण्ड ३१३

ले तो शीघ्र ही रोगसे छुटकारा पा जाता है। पुत्र, प्रजा और पत्नीके साथ भेद (कलह आदि) होनेपर यदि एक मासतक इस स्तोत्रको सुने तो इस संकटसे मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है। राजद्वार, श्मशान, विशाल वन तथा रणक्षेत्रमें और हिंसक जन्तुके समीप भी इस स्तोत्रके पाठ और श्रवणसे मनुष्य संकटसे मुक्त हो जाता है। यदि घरमें आग लगी हो, मनुष्य दावानलसे घिर गया हो अथवा डाकुओंकी सेनामें फँस गया हो तो इस स्तोत्रके श्रवणमात्रसे वह उस संकटसे पार हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। जो महादरिद्र और मूर्ख है, वह भी एक वर्षतक इस स्तोत्रको पढ़े तो निस्संदेह विद्वान् और धनवान् हो जाता है।

नारदजीने कहा—समस्त धर्मोंके ज्ञाता तथा सम्पूर्ण ज्ञानमें विशारद भगवन्! ब्रह्माण्ड-मोहन नामक प्रकृतिकवचका वर्णन कीजिये।

भगवान् नारायण बोले—वत्स! सुनो। मैं उस परम दुर्लभ कवचका वर्णन करता हूँ। पूर्वकालमें साक्षात् श्रीकृष्णने ही ब्रह्माजीको इस कवचका उपदेश दिया था। फिर ब्रह्माजीने गङ्गाजीके तटपर धर्मके प्रति इस सम्पूर्ण कवचका वर्णन किया था। फिर धर्मने पुष्करतीर्थमें मुझे कृपापूर्वक इसका उपदेश दिया, यह वही कवच है, जिसे पूर्वकालमें धारण करके त्रिपुरारि शिवने त्रिपुरासुरका वध किया था और ब्रह्माजीने जिसे धारण करके मधु और कैटभसे प्राप्त होनेवाले भयको त्याग दिया था। जिसे धारण करके भद्रकालीने रक्तबीजका संहार किया, देवराज इन्द्रने खोयी हुई राज्य-लक्ष्मी प्राप्त की, महाकाल चिरजीवी और धार्मिक हुए, नन्दी महाज्ञानी होकर सानन्द जीवन बिताने लगा, परशुरामजी शत्रुओंको भय देनेवाले महान् योद्धा बन गये तथा जिसे धारण करके ज्ञानिशिरोमणि दुर्वासा भगवान् शिवके तुल्य हो गये।

'ॐ दुर्गायै स्वाहा' यह मन्त्र मेरे मस्तककी रक्षा करे। इस मन्त्रमें छः अक्षर हैं। यह भक्तोंके लिये कल्पवृक्षके समान है। मुने! इस मन्त्रको ग्रहण करनेके विषयमें वेदोंमें किसी बातका विचार नहीं किया गया है। मन्त्रको ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य विष्णुके समान हो जाता है। 'ॐ दुर्गायै नमः' यह मन्त्र सदा मेरे मुखकी रक्षा करे। 'ॐ दुर्गे रक्ष' यह मन्त्र सदा मेरे कण्ठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं' यह मन्त्र निरन्तर मेरे कंधेका संरक्षण करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं' यह मन्त्र सदा सब ओरसे मेरे पृष्ठभागका पालन करे। 'ह्रीं' मेरे वक्षःस्थलकी और 'श्रीं' सदा मेरे हाथकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं' यह मन्त्र सोते और जागते समय सदा मेरे सर्वाङ्गका संरक्षण करे। पूर्वदिशामें प्रकृति मेरी रक्षा करे। अग्निकोणमें चण्डिका रक्षा करे। दक्षिणदिशामें भद्रकाली, नैर्ऋत्यकोणमें महेश्वरी, पश्चिमदिशामें वाराही और वायव्यकोणमें सर्वमङ्गला मेरा संरक्षण करे। उत्तरदिशामें वैष्णवी, ईशानकोणमें शिवप्रिया तथा जल, थल और आकाशमें जगदम्बिका मेरा पालन करे।

वत्स! यह परम दुर्लभ कवच मैंने तुमसे कहा है। इसका उपदेश हर एकको नहीं देना चाहिये और न किसीके सामने इसका प्रवचन ही करना चाहिये। जो वस्त्र, आभूषण और चन्दनसे गुरुकी विधिवत् पूजा करके इस कवचको धारण करता है, वह विष्णु ही है, इसमें संशय नहीं है। मुने! सम्पूर्ण तीर्थोंकी यात्रा और पृथ्वीकी परिक्रमा करनेपर मनुष्यको जो फल मिलता है, वही इस कवचको धारण करनेसे मिल जाता है। पाँच लाख जप करनेसे निश्चय ही यह कवच सिद्ध हो जाता है। जिसने कवचको सिद्ध कर लिया है, उस मनुष्यको रणसंकटमें

३१४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अस्त्र नहीं बेधता है। अवश्य ही वह जल या अग्निमें प्रवेश कर सकता है। वहाँ उसकी मृत्यु नहीं होती है। वह सम्पूर्ण सिद्धोंका ईश्वर एवं जीवन्मुक्त हो जाता है। जिसको यह कवच सिद्ध हो गया है, वह निश्चय ही भगवान् विष्णुके समान हो जाता है।*

मुने! इस प्रकार प्रकृतिखण्डका वर्णन किया गया, जो अमृतकी खाँड़से भी अधिक मधुर है। जिन्हें मूलप्रकृति कहते हैं तथा जिनके पुत्र गणेश हैं, उन देवी पार्वतीने श्रीकृष्णका व्रत करके ही गणपति-जैसा पुत्र प्राप्त किया था। साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण अपने अंशसे गणेश हुए थे। यह प्रकृतिखण्ड सुननेमें सुखद और सुधाके समान मधुर है। इसे सुनकर वक्ताको दही, अन्न भोजन करावे और उसे सुवर्ण दान दे। बछड़ेसहित सुन्दर गौका भक्तिपूर्वक दान करे। मुने! वाचकको वस्त्र, आभूषण तथा रत्न देकर संतुष्ट करे। पुष्प, आभूषण, वस्त्र तथा नाना प्रकारके उपहार ले भक्ति और श्रद्धाके साथ पुस्तककी पूजा करे। जो ऐसा करके कथा सुनता है, उसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। उसके पुत्र-पौत्र आदिकी वृद्धि होती है। वह भगवान्‌की कृपासे यशस्वी होता है। उसके घरमें लक्ष्मी निवास करती हैं और अन्तमें वह गोलोकको प्राप्त होता है। उसे श्रीकृष्णका दास्यभाव सुलभ होता है तथा भगवान् श्रीकृष्णमें उसकी अविचल भक्ति हो जाती है।

(अध्याय ६६-६७)


॥ प्रकृतिखण्ड सम्पूर्ण ॥


* ॐ दुर्गेति चतुर्थ्यन्तं स्वाहान्तो मे शिरोऽवतु ॥
मन्त्रः षडक्षरोऽयं च भक्तानां कल्पपादपः। विचारो नास्ति वेदेषु ग्रहणे च मनोर्मुने॥
मन्त्रग्रहणमात्रेण विष्णुतुल्यो भवेन्नरः। मम वक्त्रं सदा पातु ॐ दुर्गायै नमोऽन्ततः॥
ॐ दुर्गे रक्ष इति च कण्ठं पातु सदा मम। ॐ ह्रीं श्रीं इति मन्त्रोऽयं स्कन्धं पातु निरन्तरम्॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं इति पृष्ठं च पातु मे सर्वतः सदा। ह्रीं मे वक्षःस्थलं पातु हस्तं श्रीमिति संततम्॥
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पातु सर्वाङ्गं स्वप्ने जागरणे तथा। प्राच्यां मां पातु प्रकृतिः पातु वह्नौ च चण्डिका॥
दक्षिणे भद्रकाली च नैर्ऋते च महेश्वरी। वारुणे पातु वाराही वायव्यां सर्वमङ्गला॥
उत्तरे वैष्णवी पातु तथैशान्यं शिवप्रिया। जले स्थले चान्तरिक्षे पातु मां जगदम्बिका॥
इति ते कथितं वत्स कवचं च सुदुर्लभम्। यस्मै कस्मै न दातव्यं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालङ्कारचन्दनैः। कवचं धारयेद्यस्तु सोऽपि विष्णुर्न संशयः॥
भ्रमणे सर्वतीर्थानां पृथिव्याश्च प्रदक्षिणे। यत् फलं लभते लोकस्तदेतद्धारणे मुने॥
पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धमेतद्भवेद् ध्रुवम्। लोकं च सिद्धकवचं नास्त्रं विध्यति सङ्कटे॥
न तस्य मृत्युर्भवति जले वह्नौ विशेद् ध्रुवम्। जीवन्मुक्तो भवेत् सोऽपि सर्वसिद्धेश्वरः स्वयम्॥
यदि स्यात् सिद्धकवचो विष्णुतुल्यो भवेद् ध्रुवम्। (प्रकृतिखण्ड ६७। ७—१९ ½)

गणपतिखण्ड

नारदजीकी नारायणसे गणेशचरितके विषयमें जिज्ञासा, नारायणद्वारा शिव-पार्वतीके विवाह तथा स्कन्दकी उत्पत्तिका वर्णन, पार्वतीकी महादेवजीसे पुत्रोत्पत्तिके लिये प्रार्थना, शिवजीका उन्हें पुण्यक-व्रतके लिये प्रेरित करना

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

अन्तर्यामी नारायणस्वरूप श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीलाको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वती तथा (उस लीलाको संकलित करनेवाले) व्यासजीको नमस्कार करके जय (पुराण-इतिहास आदि)-का पाठ करना चाहिये।

नारदजीने पूछा— भगवन्! जो सर्वोत्कृष्ट, मूढ़ोंके लिये ज्ञानकी वृद्धि करनेवाला तथा अमृतका उत्तम सागर है, उस अभीप्सित प्रकृतिखण्डको तो मैंने सुन लिया। अब मैं गणपतिखण्डको, जो मनुष्योंके सम्पूर्ण मङ्गलोंका भी मङ्गलस्वरूप तथा गणेशजीके जन्म-वृत्तान्तसे परिपूर्ण है, सुनना चाहता हूँ। जगदीश्वर! भला, पार्वतीजीके शुभ उदरसे सुरश्रेष्ठ गणेशकी उत्पत्ति कैसे हुई? किस प्रकार पार्वतीदेवीने ऐसे पुत्रको प्राप्त किया? गणेशजी किस देवताके अंशसे उत्पन्न हुए थे? उन्हें जन्म क्यों लेना पड़ा? वे अयोनिज थे अथवा किसी योनिसे उत्पन्न हुए थे? उनका ब्रह्मतेज कैसा था? उनमें कितना पराक्रम था? उनकी तपस्या कैसी थी? वे कितने ज्ञानी थे तथा उनका यश कितना निर्मल था? जगदीश्वर नारायण, शम्भु और ब्रह्माके रहते हुए सम्पूर्ण विश्वमें उनकी अग्रपूजा क्यों होती है? वे हाथीके मुखवाले एकदन्त तथा विशाल तोंदवाले कैसे हो गये? महाभाग! पुराणोंमें उनके रहस्यमय जन्म-वृत्तान्तका वर्णन किया गया है। आप उस परम मनोहर तथा अत्यन्त विस्तृत चरित्रको पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये; क्योंकि उसे सुननेके लिये मुझे परम कौतूहल हो रहा है।

श्रीनारायणने कहा— नारद! मैं उस परम अद्भुत रहस्यका वर्णन करता हूँ, सुनो! वह पाप-संतापका हरण करनेवाला, सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाशक, समस्त मङ्गलोंका दाता, साररूप, निखिल श्रुतियोंके लिये मनोहर सुखप्रद, मोक्षका बीज तथा पापोंका मूलोच्छेद करनेवाला है। दैत्योंद्वारा पीड़ित हुए देवताओंकी तेजोराशिसे उत्पन्न हुई देवीने दैत्यसमुदायका संहार कर डाला। तत्पश्चात् वे दक्षकी कन्या होकर प्रकट हुईं। उस समय उन देवीका नाम सती था। उन्होंने अपने स्वामी (शिवजी)-की निन्दा होनेके कारण योगधारणाद्वारा अपने शरीरका परित्याग कर दिया और फिर शैलराजकी प्रिय पत्नी (मेना)-के पेटसे जन्म लिया। पर्वतराजने उन पार्वतीजीका विवाह शंकरजीके साथ कर दिया। तब महादेवजी उन्हें साथ लेकर निर्जन वनमें चले गये। वहाँ दीर्घकालतक शंकर-पार्वतीका विहार चलता रहा। जब देवताओंने आकर विहारसे विरत होनेके लिये उनसे प्रार्थना की, तब भगवान् शंकर विरत हो गये। उस समय महादेवजीका शुक्र भूमिपर गिर पड़ा, जिससे स्कन्द—कार्तिकेय उत्पन्न हुए। तब पार्वतीजीने श्रीशंकरजीसे एक श्रेष्ठ पुत्रके लिये प्रार्थना की।

इसपर महादेवजीने कहा— पार्वति! मैं उपाय बतलाता हूँ, सुनो। उससे तुम्हारा परम

३१६ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कल्याण होगा; क्योंकि त्रिलोकीमें उपाय करनेसे कार्यसिद्धि होती ही है। मैं तुमसे जिस उपायका वर्णन करूँगा, वह सम्पूर्ण अभीष्ट-सिद्धिका बीजरूप, परम मङ्गलदायक तथा मनको हर्ष प्रदान करनेवाला है। वरानने! तुम श्रीहरिकी आराधना करके व्रत आरम्भ करो। एक वर्षतक इसका अनुष्ठान करना होगा। इस व्रतका नाम पुण्यक है। यह महाकठोर बीज, कल्पतरुके समान अभीष्ट सिद्ध करनेवाला, उत्कृष्ट, सुखदायक, पुण्यदाता, साररूप, पुत्रप्रद और समस्त सम्पत्तियोंको देनेवाला है। प्रिये! जैसे नदियोंमें गङ्गा, देवताओंमें श्रीहरि, वैष्णवोंमें मैं (शिव), देवियोंमें तुम, वर्णोंमें ब्राह्मण, तीर्थोंमें पुष्कर, पुष्पोंमें पारिजात, पत्रोंमें तुलसीदल, पुण्य प्रदान करनेवालोंमें एकादशी तिथि, वारोंमें पुण्यप्रद रविवार, मासोंमें मार्गशीर्ष, ऋतुओंमें वसन्त, वत्सरोंमें संवत्सर, युगोंमें कृतयुग, पूजनीयोंमें विद्या पढ़ानेवाले गुरु, गुरुजनोंमें माता, आप्तजनोंमें साध्वी पत्नी, विश्वस्तोंमें मन, धनोंमें रत्न, प्रियजनोंमें पति, बन्धुजनोंमें पुत्र, वृक्षोंमें कल्पतरु, फलोंमें आमका फल, वर्षोंमें भारतवर्ष, वनोंमें वृन्दावन, स्त्रियोंमें शतरूपा, पुरियोंमें काशी, तेजस्वियोंमें सूर्य, सुखदाताओंमें चन्द्रमा, रूपवानोंमें कामदेव, शास्त्रोंमें वेद, सिद्धोंमें कपिल मुनि, वानरोंमें हनुमान्, क्षेत्रोंमें ब्राह्मणका मुख, यश प्रदान करनेवालोंमें विद्या तथा मनोहारिणी कविता, व्यापक वस्तुओंमें आकाश, शरीरके अङ्गोंमें नेत्र, विभवोंमें हरिकथा, सुखोंमें हरिस्मरण, स्पर्शोंमें पुत्रका स्पर्श, हिंसकोंमें दुष्ट, पापोंमें असत्यभाषण, पापियोंमें पुंश्चली स्त्री, पुण्योंमें सत्यभाषण, तपस्याओंमें श्रीहरिकी सेवा, गव्य पदार्थोंमें घृत, तपस्वियोंमें ब्रह्मा, भक्ष्य वस्तुओंमें अमृत, अन्नोंमें धान, पवित्र करनेवालोंमें जल, शुद्ध पदार्थोंमें अग्नि, तेजस वस्तुओंमें सुवर्ण, मीठे पदार्थोंमें प्रियभाषण,

पक्षियोंमें गरुड़, हाथियोंमें इन्द्रका वाहन ऐरावत, योगियोंमें कुमार (सनत्कुमार आदि), देवर्षियोंमें नारद, गन्धर्वोंमें चित्ररथ, बुद्धिमानोंमें बृहस्पति, श्रेष्ठ कवियोंमें शुक्राचार्य, काव्योंमें पुराण, सोतोंमें समुद्र, क्षमाशीलोंमें पृथ्वी, लाभोंमें मुक्ति, सम्पत्तियोंमें हरिभक्ति, पवित्रोंमें वैष्णव, वर्णोंमें ॐकार, मन्त्रोंमें विष्णुमन्त्र, बीजोंमें प्रकृति, विद्वानोंमें वाणी, छन्दोंमें गायत्री छन्द, यक्षोंमें कुबेर, सर्पोंमें वासुकिनाग, पर्वतोंमें तुम्हारे पिता हिमवान्, गौओंमें सुरभि, वेदोंमें सामवेद, तृणोंमें कुश, सुखप्रदोंमें लक्ष्मी, शीघ्रगामियोंमें मन, अक्षरोंमें अकार, हितैषियोंमें पिता, यन्त्रोंमें शालग्रामशिला, पशु-अस्थियोंमें विष्णुपञ्जर, चौपायोंमें सिंह, जीवधारियोंमें मनुष्य, इन्द्रियोंमें मन, रोगोंमें मन्दाग्नि, बलवानोंमें शक्ति, शक्तिमानोंमें अहंकार, स्थूलोंमें महाविराट्, सूक्ष्मोंमें परमाणु, अदितिपुत्रोंमें इन्द्र, दैत्योंमें बलि, साधुओंमें प्रह्लाद, दानियोंमें दधीचि, अस्त्रोंमें ब्रह्मास्त्र, चक्रोंमें सुदर्शनचक्र, मनुष्योंमें राजा रामचन्द्र और धनुर्धारियोंमें लक्ष्मण श्रेष्ठ हैं तथा जैसे श्रीकृष्ण सर्वाधार, समस्त जीवोंद्वारा सेवनीय, सबके बीजस्वरूप, सर्वाभीष्टप्रदाता और सम्पूर्ण वस्तुओंके साररूप हैं, उसी प्रकार यह पुण्यक-व्रत सम्पूर्ण व्रतोंमें श्रेष्ठ है।