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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

४३४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है। आपके पैर नहीं हैं तो भी आप चलनेकी योग्यता रखते हैं। नेत्रहीन होकर भी सबको देखते हैं। हाथ और मुखसे रहित होकर भी भोजन करते हैं। आप तेजोमय परमात्माको मेरा नमस्कार है। वेदमें जिस वस्तुका निरूपण है, विद्वान् पुरुष उसीका वर्णन कर सकते हैं। जिसका वेदमें भी निरूपण नहीं हो सका है, आपके उस तेजोमय स्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ।

जो सर्वेश्वर है, किंतु जिसका ईश्वर कोई नहीं है; जो सबका आदि है, परंतु स्वयं आदिसे रहित है तथा जो सबका आत्मा है, किंतु जिसका आत्मा दूसरा कोई नहीं है; आपके उस तेजोमय स्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं स्वयं जगत्का स्रष्टा और वेदोंको प्रकट करनेवाला हूँ। धर्मदेव जगत्के पालक हैं तथा महादेवजी संहारकारी हैं; तथापि हममेंसे कोई भी आपके उस तेजोमय स्वरूपका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं है। आपकी सेवाके प्रभावसे वे धर्मदेव अपने रक्षककी रक्षा करते हैं। आपकी ही आज्ञासे आपके द्वारा निश्चित किये हुए समयपर महादेवजी जगत्का संहार करते हैं। आपके चरणारविन्दोंकी सेवासे ही सामर्थ्य पाकर मैं प्राणियोंके प्रारब्ध या भाग्यकी लिपिका लेखक तथा कर्म करनेवालोंके फलका दाता बना हुआ हूँ। प्रभो! हम तीनों आपके भक्त हैं और आप हमारे स्वामी हैं। ब्रह्माण्डमें बिम्बसदृश होकर हम विषयी हो रहे हैं। ब्रह्माण्ड अनन्त हैं और उनमें हम-जैसे सेवक कितने ही हैं। जैसे रेणु तथा उनके परमाणुओंकी गणना नहीं हो सकती, उसी प्रकार ब्रह्माण्डों और उनमें रहनेवाले ब्रह्मा आदिकी गणना असम्भव है। आप सबके उत्पादक परमेश्वर हैं। आपकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है? जिन महाविष्णुके एक-एक रोम-कूपमें एक-एक ब्रह्माण्ड है, वे भी आपके ही सोलहवें अंश हैं। समस्त योगीजन आपके इस मनोवाञ्छित ज्योतिर्मय स्वरूपका ध्यान करते हैं। परंतु जो आपके भक्त हैं, वे आपकी दासतामें अनुरक्त रहकर सदा आपके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं। परमेश्वर! आपका जो परम सुन्दर और कमनीय किशोर-रूप है, जो मन्त्रोक्त ध्यानके अनुरूप है, आप उसीका हमें दर्शन कराइये। जिसकी अङ्गकान्ति नूतन जलधरके समान श्याम है, जो पीताम्बरधारी तथा परम सुन्दर है, जिसके दो भुजाएँ, हाथमें मुरली और मुखपर मन्द-मन्द मुसकान है, जो अत्यन्त मनोहर है, माथेपर मोरपंखका मुकुट धारण करता है, मालतीके पुष्पसमूहोंसे जिसका शृङ्गार किया गया है, जो चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरके अङ्गरागसे चर्चित है, अमूल्य रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित आभूषणोंसे विभूषित है, बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए किरीट-मुकुट जिसके मस्तकको उद्भासित कर रहे हैं, जिसका मुखचन्द्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको चुराये लेता है, जो पके बिम्बफलके समान लाल ओठोंसे सुशोभित है, परिपक्व अनारके बीजकी भाँति चमकीली दन्तपंक्ति जिसके मुखकी मनोरमताको बढ़ाती है, जो रास-रसके लिये उत्सुक हो केलि-कदम्बके नीचे खड़ा है, गोपियोंके मुखोंकी ओर देखता है तथा श्रीराधाके वक्षःस्थलपर विराजित है; आपके उसी केलि-रसोत्सुक रूपको देखनेकी हम सबकी इच्छा है। ऐसा कहकर विश्वविधाता ब्रह्मा उन्हें बारंबार प्रणाम करने लगे। धर्म और शंकरने भी इसी स्तोत्रसे उनका स्तवन किया तथा नेत्रोंमें आँसू भरकर बारंबार वन्दना की*।


* वरं वरेण्यं वरदं वरदानां च कारणम्। कारणं सर्वभूतानां तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
मङ्गल्यं मङ्गलाहं च मङ्गलं मङ्गलप्रदम्। समस्तमङ्गलाधारं तेजोरूपं नमाम्यहम्॥

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४३५

मुने! उन त्रिदशेश्वरोंने खड़े-खड़े पुनः स्तवन किया। वे सब-के-सब वहाँ भगवान् श्रीकृष्णके तेजसे व्याप्त हो रहे थे। धर्म, शिव और ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस स्तवराजको जो प्रतिदिन श्रीहरिके पूजाकालमें भक्तिपूर्वक पढ़ता है, वह उनकी अत्यन्त दुर्लभ और दृढ़ भक्ति प्राप्त कर लेता है। देवता, असुर और मुनीन्द्रोंको श्रीहरिका दास्य दुर्लभ है; परंतु इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला उसे पा लेता है। साथ ही अणिमा आदि सिद्धियों तथा सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तियोंको भी प्राप्त कर लेता है।

इस लोकमें भी वह भगवान् विष्णुके समान ही विख्यात एवं पूजित होता है; इसमें संशय नहीं है। निश्चय ही उसे वाक्सिद्धि और मन्त्रसिद्धि भी सुलभ हो जाती है। वह सम्पूर्ण सौभाग्य और आरोग्य लाभ करता है। उसके यशसे सारा जगत् पूर्ण हो जाता है। वह इस लोकमें पुत्र, विद्या, कविता, स्थिर लक्ष्मी, साध्वी सुशीला पतिव्रता पत्नी, सुस्थिर संतान तथा चिरकालस्थायिनी कीर्ति प्राप्त कर लेता है और अन्तमें उसे श्रीकृष्णके निकट स्थान प्राप्त होता है।

(अध्याय ५)


स्थितं सर्वत्र निर्लिप्तमात्मरूपं परात्परम्। निरीहमवितर्क्यं च तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
सगुणं निर्गुणं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्। साकारं च निराकारं तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
त्वमनिर्वचनीयं च व्यक्तमव्यक्तमेककम्। स्वेच्छामयं सर्वरूपं तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
गुणत्रयविभागाय रूपत्रयधरं परम्। कलया ते सुराः सर्वे किं जानन्ति श्रुतेः परम्॥
सर्वाधारं सर्वरूपं सर्वबीजमबीजकम्। सर्वान्तकमनन्तं च तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
लक्ष्यं यद् गुणरूपं च वर्णनीयं विचक्षणैः। किं वर्णयाम्यलक्ष्यं ते तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
अशरीरं विग्रहवदिन्द्रियवदतीन्द्रियम्। यदसाक्षि सर्वसाक्षि तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
गमनार्हमपादं यदचक्षुः सर्वदर्शनम्। हस्तास्यहीनं यद् भोक्तुं तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
वेदे निरूपितं वस्तुसन्तः शक्ताश्च वर्णितुम्। वेदेऽनिरूपितं यत्तत्तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
सर्वेशं यदनीशं यत् सर्वादि यदनादि यत्। सर्वात्मकमनात्मं यत्तेजोरूपं नमाम्यहम्॥
अहं विधाता जगतां वेदानां जनकः स्वयम्। पाता धर्मो हरो हर्ता स्तोतुं शक्तो न कोऽपि यत्॥
सेवया तव धर्मोऽयं रक्षितां च रक्षति। तवाज्ञया च संहर्ता त्वया काले निरूपिते॥
निषेकलिपिकर्ताहं त्वत्पादाम्भोजसेवया। कर्मिणां फलदाता च त्वं भक्तानां च नः प्रभुः॥
ब्रह्माण्डे विम्बसदृशा भूत्वा विषयिणो वयम्। एवं कतिविधाः सन्ति तेष्वनन्तेषु सेवकाः॥
यथा न संख्या रेणूनां तथा तेषामणीयसाम्। सर्वेषां जनकश्रेष्ठो यस्त्वां स्तोतुं च कः क्षमः॥
एकैकलोमविवरे ब्रह्माण्डमेकमेककम्। यस्यैव महतो विष्णोः षोडशांशस्तवैव सः॥
ध्यायन्ति योगिनः सर्वे तवैतद्रूपमीप्सितम्। त्वद्भक्ता दास्यनिरताः सेवन्ते चरणाम्बुजम्॥
किशोरं सुन्दरतरं यद्रूपं कमनीयकम्। मन्त्रध्यानानुरूपं च दर्शयास्माकमीश्वर॥
नवीनजलदश्यामं पीताम्बरधरं परम्। द्विभुजं मुरलीहस्तं सस्मितं सुमनोहरम्॥
मयूरपुच्छचूडं च मालतीजालमण्डितम्। चन्दनागुरुकस्तूरी कुङ्कुमद्रवचर्चितम् ॥
अमूल्यरत्नसाराणां भूषणैश्च विभूषितम्। अमूल्यरत्नखचितकिरीटमुकुटोज्ज्वलम् ॥
शरत्प्रफुल्लकमलप्रभामोभ्यास्य चन्द्रकम्। पक्वबिम्बसमानेन ह्यधरोष्ठेन राजितम्॥
पक्वदाडिम्वबीजाभदन्तपंक्ति मनोरमम्। केलिकदम्बमूले च स्थितं रासरसोत्सुकम्॥
गोपीवक्त्राणि पश्यन्तं राधावक्षःस्थलस्थितम्। एवं वाञ्छास्ति रूपं ते द्रष्टुं केलिरसोत्सुकम्॥
इत्येवमुक्त्वा विश्वसृट् प्रणाम पुनः पुनः। एवं स्तोत्रेण तुष्टाव धर्मोऽपि शंकरः स्वयम्।
ननाम भूयो भूयश्च साश्रूपूर्णविलोचनः॥

(श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५। ९४—१२०)

४३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

देवताओंद्वारा तेजःपुञ्जमें श्रीकृष्ण और राधाके दर्शन तथा स्तवन, श्रीकृष्णद्वारा देवताओंका स्वागत तथा उन्हें आश्वासन-दान, भगवद्भक्तके महत्त्वका वर्णन, श्रीराधासहित गोप-गोपियोंको व्रजमें अवतीर्ण होनेके लिये श्रीहरिका आदेश, सरस्वती और लक्ष्मीसहित वैकुण्ठवासी नारायणका तथा क्षीरशायी विष्णुका शुभागमन, नारायण और विष्णुका श्रीकृष्णके स्वरूपमें लीन होना, संकर्षण तथा पुत्रोंसहित पार्वतीका आगमन, देवताओं और देवियोंको पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करनेके लिये प्रभुका आदेश, किस देवताका कहाँ और किस रूपमें जन्म होगा—इसका विवरण, श्रीराधाकी चिन्ता तथा श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देते हुए अपनी और उनकी एकताका प्रतिपादन करना, फिर श्रीहरिकी आज्ञासे राधा और गोप-गोपियोंका नन्द-गोकुलमें गमन

श्रीनारायण कहते हैं—मुने! उस तेजः-पुञ्जके सामने ध्यान और स्तुति करके खड़े हुए उन देवताओंने उस तेजोराशिके मध्यभागमें एक कमनीय शरीरको देखा, जो सजल जलधरके समान श्याम-कान्तिसे युक्त एवं परम मनोहर था। उसके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उसका रूप परमानन्दजनक तथा त्रिलोकीके चित्तको मोह लेनेवाला था। उसके दोनों गालोंपर मकराकार कुण्डल जगमगा रहे थे। उत्तम रत्नोंके बने हुए नूपुरोंसे उसके चरणारविन्दोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। अग्निशुद्ध दिव्य पीताम्बरसे उस श्रीविग्रहकी अपूर्व शोभा हो रही थी। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो स्वेच्छा और कौतूहलवश श्रेष्ठ मणियों और रत्नोंके सारतत्त्वसे रचा गया हो। मनोरञ्जनकी सामग्री मुरलीसे संलग्न बिम्बसदृश अरुण अधरोंके कारण उसके मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। वह शुभ दृष्टिसे देखता और भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर जान पड़ता था। उत्तम रत्नोंकी गुटिकासे युक्त किवाड़-जैसा विशाल वक्षःस्थल प्रकाशित हो रहा था। कौस्तुभमणिके कारण बढ़े हुए तेजसे वह देदीप्यमान दिखायी देता था।

उसी तेजःपुञ्जमें देवताओंने मनोहर अङ्गवाली श्रीराधाको भी देखा। वे मन्द मुस्कराहटके साथ अपनी ओर देखते हुए प्रियतमको तिरछी चितवनसे निहार रही थीं। मोतियोंकी पाँतको तिरस्कृत करनेवाली दन्तावली उनके मुखकी शोभा बढ़ा रही थी। उनका प्रसन्न मुखारविन्द मन्द हास्यकी छटासे सुशोभित था। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी छबिको लज्जित कर रहे थे। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी आभाको निन्दित करनेवाले मुखके कारण वे बड़ी मनोहारिणी जान पड़ती थीं। दोपहरियाके फूलकी शोभाको चुरानेवाले उनके लाल-लाल अधर और ओष्ठ बड़े मनोहर थे तथा वे बहुत सुन्दर वस्त्र धारण किये हुए थीं। उनके युगल चरणारविन्दोंमें झनकारते हुए मञ्जीर शोभा दे रहे थे। नखोंकी पंक्ति श्रेष्ठ मणिरत्नोंकी प्रभाको छीने लेती थी। कुंकुमकी आभाको तिरस्कृत कर देनेवाले चरणतलके स्वाभाविक रागसे वे सुशोभित थीं। बहुमूल्य रत्नोंके सारतत्त्वसे बने हुए पाशकोंकी श्रेणी उन्हें विभूषित कर रही थी। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करके वे अत्यन्त उद्भासित हो रही थीं। श्रेष्ठ महामणियोंके सारतत्त्वसे बनी हुई काञ्चीसे

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४३७ उनका मध्यभाग अलंकृत था। उत्तम रत्नोंके हार, बाजूबंद और कंगनसे वे विभूषित थीं। उत्तम रत्नोंके द्वारा रचित कुण्डलोंसे उनके कपोल उद्दीप्त हो रहे थे। कानोंमें श्रेष्ठ मणियोंके कर्णभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। पक्षिराज गरुड़की चोंचके समान नुकीली नासिकामें गजमुक्ताकी बुलाक शोभा दे रही थी। उनके घुंघराले बालोंकी वेणीमें मालतीकी माला लपेटी हुई थी। वक्षःस्थलमें अनेक कौस्तुभमणियोंकी प्रभा फैली हुई थी। पारिजातके फूलोंकी माला धारण करनेसे उनकी रूपराशि परम उज्ज्वल जान पड़ती थी। उनके हाथकी अंगुलियाँ रत्नोंकी अँगूठियोंसे विभूषित थीं। दिव्य शङ्खके बने हुए विचित्र रागविभूषित रमणीय भूषण उन्हें विभूषित कर रहे थे। वे शङ्खभूषण महीन रेशमी डोरेमें गुँथे हुए थे। उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वकी बनी हुई गुटिकाको लाल डोरेमें गूंथकर उसके द्वारा उन्होंने अपने-आपको सज्जित किया था। तपाये हुए सुवर्णके समान अङ्गकान्तिको सुन्दर वस्त्रसे आच्छादित करके वे बड़ी शोभा पा रही थीं। उनका शरीर अत्यन्त मनोहर था। नितम्बदेश और श्रोणिभागके सौन्दर्यसे वे और भी सुन्दरी दिखायी देती थीं। वे समस्त आभूषणोंसे विभूषित थीं और समस्त आभूषण उनके सौन्दर्यसे विभूषित थे। उन श्रेष्ठ परमेश्वर और सुन्दरी परमेश्वरीका दर्शन करके सब देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके सम्पूर्ण मनोरथ पूरे हो गये थे। अतः उन सब देवताओंने पुनः भगवान्‌की स्तुति आरम्भ की— ब्रह्मोवाच तव चरणसरोजे मन्मनश्चञ्चरीको भ्रमतु सततमिश प्रेमभक्त्या सरोजे । भवनमरणरोगात् पाहि शान्त्यौषधेन सुदृढसुपरिपक्वां देहि भक्तिं च दास्यम् ॥ ब्रह्माजी बोले—परमेश्वर ! मेरा चित्तरूपी चञ्चरीक (भ्रमर) आपके चरणारविन्दमें निरन्तर प्रेम-भक्तिपूर्वक भ्रमण करता रहे। शान्तिरूपी औषध देकर मेरी जन्म-मरणके रोगसे रक्षा कीजिये तथा मुझे सुदृढ़ एवं अत्यन्त परिपक्व भक्ति और दास्यभाव दीजिये। शङ्कर उवाच भवजलधिनिमग्नश्चित्तमीनो मदीयो भ्रमति सततमस्मिन् घोरसंसारकूपे । विषयमतिविनिन्द्यं सृष्टिसंहाररूप- मपनय तव भक्तिं देहि पादारविन्दे ॥ भगवान् शंकरने कहा—प्रभो! भवसागरमें डूबा हुआ मेरा चित्तरूपी मत्स्य सदा ही इस घोर संसाररूपी कूपमें चक्कर लगाता रहता है। सृष्टि और संहार यही इसका अत्यन्त निन्दनीय विषय है। आप इस विषयको दूर कीजिये और अपने चरणारविन्दोंकी भक्ति दीजिये। धर्म उवाच तव निजजनसाद्धं सङ्गमो मे सदैव भवतु विषयबन्धच्छेदने तीक्ष्णखड्गः। तव चरणसरोजे स्थानदानैकहेतु- र्जनुषि जनुषि भक्तिं देहि पादारविन्दे ॥ धर्म बोले—मेरे ईश्वर ! आपके आत्मीयजनों (भक्तों)-के साथ मेरा सदा समागम होता रहे, जो विषयरूपी बन्धनको काटनेके लिये तीखी तलवारका काम देता है तथा आपके चरणारविन्दोंमें स्थान दिलानेका एकमात्र हेतु है। आप जन्म- जन्ममें मुझे अपने चरणारविन्दोंकी भक्ति प्रदान कीजिये। भगवान् नारायण कहते हैं—इस प्रकार स्तुति करके पूर्णमनोरथ हुए वे तीनों देवता कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले श्रीराधावल्लभके सामने खड़े हो गये। देवताओंकी यह स्तुति सुनकर कृपानिधान श्रीकृष्णके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कान खिल उठी। वे उनसे हितकर एवं सत्य वचन बोले।

४३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


श्रीकृष्णने कहा—तुम सब लोग इस समय मेरे धाममें पधारे हो। यहाँ तुम्हारा स्वागत है, स्वागत है। शिवके आश्रयमें रहनेवाले लोगोंका तो कुशल पूछना उचित नहीं है। यहाँ आकर तुम निश्चिन्त हो जाओ। मेरे रहते तुम्हें क्या चिन्ता है? मैं समस्त जीवोंके भीतर विराजमान हूँ; परंतु स्तुतिसे ही प्रत्यक्ष होता हूँ। तुम्हारा जो अभिप्राय है, वह सब मैं निश्चितरूपसे जानता हूँ। देवताओ! शुभ-अशुभ जो भी कर्म है, वह समयपर ही होगा। बड़ा और छोटा—सब कार्य कालसे ही सम्पन्न होता है। वृक्ष अपने-अपने समयपर ही सदा फूलते और फलते हैं। समयपर ही उनके फल पकते हैं और समयपर ही वे कच्चे फलोंसे युक्त होते हैं। सुख-दुःख, सम्पत्ति-विपत्ति, शोक-चिन्ता तथा शुभ-अशुभ—सब अपने-अपने कर्मोंके फल हैं और सभी समयपर ही उपस्थित होते हैं। तीनों लोकोंमें न तो कोई किसीका प्रिय है और न अप्रिय ही है। समय आनेपर कार्यवश सभी लोग अप्रिय अथवा प्रिय होते हैं। तुमलोगोंने देखा है, पृथ्वीपर बहुत-से राजा और मनु हुए और वे सभी अपने-अपने कर्मोंके फलके परिपाकसे कालके अधीन हो गये। तुमलोगोंका यहाँ गोलोकमें जो एक क्षण व्यतीत हुआ है, उतनेमें ही पृथ्वीपर सात मन्वन्तर बीत गये। सात इन्द्र समाप्त हो गये। इस समय आठवें इन्द्र चल रहे हैं। इस प्रकार मेरा कालचक्र दिन-रात भ्रमण करता रहता है। इन्द्र, मनु तथा राजा सभी लोग कालके वशीभूत हो गये। उनकी कीर्ति, पृथ्वी, पुण्य और पापकी कथामात्र शेष रह गयी है। इस समय भी भूमिपर बहुत-से राजा दुष्ट और भगवन्निन्दक हैं। उनके बल और पराक्रम महान् हैं। परंतु समयानुसार वे सब-के-सब कालान्तक यमके ग्रास हो जायँगे। यह काल इस समय भी मेरी आज्ञासे उपस्थित है। वायु मेरी आज्ञा मानकर ही निरन्तर बहती रहती है। मेरी आज्ञासे ही आग जलती और सूर्य तपते हैं। देवताओ! मेरी आज्ञासे ही सब शरीरोंमें रोग निवास करते हैं। समस्त प्राणियोंमें मृत्युका संचार होता है तथा वे समस्त जलधर वर्षा करते हैं। मेरे शासनसे ही ब्राह्मण ब्राह्मणत्वमें, तपोधन तपस्यामें, ब्रह्मर्षि ब्रह्ममें और योगी योगमें निष्ठा रखते हैं। वे सब-के-सब मेरे भयसे भीत होकर ही स्वधर्म-कर्मके पालनमें तत्पर हैं। जो मेरे भक्त हैं, वे सदा निःशङ्क रहते हैं; क्योंकि वे कर्मका निर्मूलन करनेमें समर्थ हैं।

देवताओ! मैं कालका भी काल हूँ। विधाताका भी विधाता हूँ। संहारकारीका भी संहारक तथा पालकका भी पालक परात्पर परमेश्वर हूँ। मेरी आज्ञासे ये शिव संहार करते हैं; इसलिये इनका नाम 'हर' है। तुम मेरे आदेशसे सृष्टिके लिये उद्यत रहते हो; इसलिये 'विश्वस्रष्टा' कहलाते हो और धर्मदेव रक्षाके कारण ही 'पालक' कहलाते हैं। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सबका ईश्वर मैं ही हूँ। मैं ही कर्मफलका दाता तथा कर्मोंका निर्मूलन करनेवाला हूँ। मैं जिनका संहार करना चाहूँ, उनकी रक्षा कौन कर सकता है? तथा मैं जिनका पालन करूँ, उनको मारनेवाला भी कोई नहीं है। मैं सबका सृजन, पालन और संहार करता हूँ। परंतु मेरे भक्त नित्यदेही हैं। उनके संहारमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। भक्त सदा मेरे पीछे चलते हैं और मेरे चरणोंकी आराधनामें तत्पर रहते हैं; अतः मैं भी सदा भक्तोंके निकट उनकी रक्षाके लिये मौजूद रहता हूँ। ब्रह्माण्डमें सभी नष्ट होते और बारंबार जन्म लेते हैं; परंतु मेरे भक्तोंका नाश नहीं होता है। वे सदा निःशङ्क और निरापद रहते हैं। इसीलिये समस्त विद्वान् पुरुष मेरे दास्यभावकी अभिलाषा रखते हैं; दूसरे किसी वरकी नहीं। जो मुझसे दास्यभावकी याचना करते हैं; वे धन्य हैं। दूसरे सब-के-सब वञ्चित हैं। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, भय और यमयातना—ये सारे कष्ट दूसरे-

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४३९

दूसरे कर्मपरायण लोगोंको प्राप्त होते हैं; मेरे भक्तोंको नहीं। मेरे भक्त पाप या पुण्य किसी भी कर्ममें लिप्त नहीं होते हैं। मैं उनके कर्मभोगोंका निश्चय ही नाश कर देता हूँ। मैं भक्तोंका प्राण हूँ और भक्त भी मेरे लिये प्राणोंके समान हैं। जो नित्य मेरा ध्यान करते हैं, उनका मैं दिन-रात स्मरण करता हूँ$^१$। सोलह अरोंसे युक्त अत्यन्त तीखा सुदर्शन नामक चक्र महान् तेजस्वी है। सम्पूर्ण जीवधारियोंमें जितना भी तेज है, वह सब उस चक्रके तेजके सोलहवें अंशके बराबर भी नहीं है। उस अभीष्ट चक्रको भक्तोंके निकट उनकी रक्षाके लिये नियुक्त करके भी मुझे प्रतीति नहीं होती; इसलिये मैं स्वयं भी उनके पास जाता हूँ। तुम सब देवता और प्राणाधिका लक्ष्मी भी मुझे भक्तसे बढ़कर प्यारी नहीं है। देवेश्वरो! भक्तोंका भक्तिपूर्वक दिया हुआ जो द्रव्य है, उसको मैं बड़े प्रेमसे ग्रहण करता हूँ, परंतु अभक्तोंकी दी हुई कोई भी वस्तु मैं नहीं खाता। निश्चय ही उसे राजा बलि ही भोगते हैं। जो अपने स्त्री-पुत्र आदि स्वजनोंको त्यागकर दिन-रात मुझे ही याद करते हैं, उनका स्मरण मैं भी तुमलोगोंको त्यागकर अहर्निश किया करता हूँ। जो लोग भक्तों, ब्राह्मणों तथा गौओंसे द्वेष रखते हैं, यज्ञों और देवताओंकी हिंसा करते हैं, वे शीघ्र ही उसी तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे प्रज्वलित अग्निमें तिनके। जब मैं उनका घातक बनकर उपस्थित होता हूँ, तब कोई भी उनकी रक्षा नहीं कर पाता$^२$। देवताओ! मैं पृथ्वीपर जाऊँगा। अब तुमलोग भी अपने स्थानको पधारो और शीघ्र ही अपने अंशरूपसे भूतलपर अवतार लो।

ऐसा कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्णने गोपों और गोपियोंको बुलाकर मधुर, सत्य एवं समयोचित बातें कहीं—'गोपो और गोपियो! सुनो। तुम सब-के-सब नन्दरायजीका जो उत्कृष्ट व्रज है, वहाँ जाओ (उस व्रजमें अवतार ग्रहण करो)। राधिके! तुम भी शीघ्र ही वृषभानुके घर पधारो। वृषभानुकी प्यारी स्त्री बड़ी साध्वी हैं। उनका नाम कलावती है। वे सुबलकी पुत्री हैं और लक्ष्मीके अंशसे प्रकट हुई हैं। वास्तवमें वे पितरोंकी मानसी कन्या हैं तथा नारियोंमें धन्या और मान्या समझी जाती हैं। पूर्वकालमें दुर्वासाके शापसे उनका व्रजमण्डलमें गोपके घरमें जन्म हुआ है। तुम उन्हीं कलावतीकी पुत्री होकर जन्म ग्रहण करो। अब शीघ्र नन्दव्रजमें जाओ। कमलानने! मैं बालकरूपसे वहाँ आकर तुम्हें प्राप्त करूँगा। राधे! तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो और मैं भी तुम्हें प्राणोंसे भी बढ़कर प्यारा हूँ। हम दोनोंका कुछ भी एक-दूसरेसे भिन्न नहीं है। हम सदैव एक-रूप हैं।'

मुने! यह सुनकर श्रीराधा प्रेमसे विह्वल होकर वहाँ रो पड़ीं और अपने नेत्र-चकोरोंद्वारा श्रीहरिके मुखचन्द्रकी सौन्दर्य-सुधाका पान करने लगीं। 'गोपो और गोपियो! तुम भूतलपर श्रेष्ठ गोपोंके शुभ घर-घरमें जन्म लो।' श्रीकृष्णकी यह बात पूरी होते ही वहाँ सब लोगोंने देखा, एक उत्तम रथ (विमान) आ गया। वह श्रेष्ठ मणिरत्नोंके सारतत्त्व तथा हीरकसे विभूषित था। लाखों श्वेत चँवर तथा दर्पण उसकी शोभा बढ़ा


१.अहं प्राणाश्च भक्तानां भक्ताः प्राणा ममापि च। ध्यायन्ति ये च मां नित्यं तां स्मरामि दिवानिशम्॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६।५२)
२.स्त्रीपुत्रस्वजनांस्त्यक्त्वा ध्यायन्ते मामहर्निशम्। युष्मान् विहाय तान् नित्यं स्मराम्यहमहर्निशम्॥
द्वेष्टारो ये च भक्तानां ब्राह्मणानां गवामपि। क्रतूनां देवतानां च हिंसां कुर्वन्ति निश्चितम्॥
तदाऽचिरं ते नश्यन्ति यथा वह्नौ तृणानि च। न कोऽपि रक्षिता तेषां मयि हन्तुर्युपस्थिते॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६।५८–६०)

६०- आकाशवाणीसे प्रभावित हो देवीके वधके लिये उद्यत हुए कंसको वसुदेवजीका समझाना

४४० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

रहे थे। वह अग्निशुद्ध सूक्ष्म गेरुए वस्त्रोंसे सजाया गया था। श्रेष्ठ रत्नोंके बने हुए सहस्रों कलश उसकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। पारिजातपुष्पोंके हारोंसे उस विमानको सुसज्जित किया गया था। सोनेका बना हुआ वह सुन्दर विमान अनुपम तेजःपुञ्जमय दिखायी देता था। उससे सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाश फैल रहा था तथा उस विमानपर बहुत-से श्रेष्ठ पार्षद बैठे हुए थे। उस विमानमें एक श्यामसुन्दर कमनीय पुरुष दृष्टिगोचर हुए, जिनके चार हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पा रहे थे। उन श्रेष्ठ पुरुषने पीताम्बर पहन रखा था। उनके मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल और वक्षःस्थलपर वनमाला शोभा दे रही थी। उनके श्रीअङ्ग चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा केसरके अङ्गरागसे अलंकृत थे। चार भुजाएँ और मुस्कराता हुआ मनोहर मुख देखने ही योग्य थे। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे आकुल दिखायी देते थे। श्रेष्ठ मणिरत्नोंके सारातिसार तत्त्वसे बने हुए आभूषण उनके अङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके वामभागमें सुरम्य शरीरवाली शुक्लवर्णा, मनोहरा, ज्ञानरूपा एवं विद्याकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती दिखायी दीं, जिनके हाथोंमें वेणु, वीणा और पुस्तकें थीं। वे भी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ती थीं। उन महानारायणके दाहिने भागमें शरत्कालके चन्द्रमाकी-सी प्रभा तथा तपाये हुए सुवर्णकी भाँति कान्तिसे प्रकाशमान परम मनोहरा और रमणीया देवी लक्ष्मी दृष्टिगोचर हुईं, जिनके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कान खेल रही थी। उनके सुन्दर कपोल उत्तम रत्नमय कुण्डलोंसे जगमगा रहे थे। बहुमूल्य रत्न, महामूल्यवान् वस्त्र उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते थे। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित बाजूबंद और कंगन उनकी भुजाओंकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वके बने हुए मञ्जीर अपनी मधुर झनकार फैला रहे थे। पारिजातके फूलोंकी मालाओंसे वक्षःस्थल उज्ज्वल दिखायी देता था। उनकी वेणी प्रफुल्ल मालतीकी मालाओंसे अलंकृत थी। सुन्दरी रमाका मनोहर मुख शरत्कालके चन्द्रमाकी प्रभाको छीने लेता था। उनके भालदेशमें कस्तूरीबिन्दुसे युक्त सिन्दूरका तिलक शोभा दे रहा था। शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंके समान नेत्रोंमें मनोहर काजलकी रेखा शोभायमान थी। उनके हाथमें सहस्र दलोंसे संयुक्त लीलाकमल सुशोभित होता था। वे अपनी ओर देखनेवाले नारायणदेवको तिरछी चितवनसे निहार रही थीं। पत्नियों और पार्षदोंके साथ शीघ्र ही विमानसे उतरकर वे नारायणदेव गोप-गोपियोंसे भरी हुई उस रमणीय सभामें जा पहुँचे। उन्हें देखते ही ब्रह्मा आदि देवता, गोप और गोपी सब-के-सब सानन्द उठकर खड़े हो गये। सबके हाथ जुड़े हुए थे। देवर्षिगण सामवेदोक्त स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति समाप्त होनेपर नारायणदेव आगे जाकर श्रीकृष्णविग्रहमें विलीन हो गये। यह परम आश्चर्यकी बात देखकर सबको बड़ा विस्मय हुआ।

इसी समय वहाँ एक दूसरा सुवर्णमय रथ आ पहुँचा। उससे जगत्का पालन करनेवाले त्रिलोकीनाथ विष्णु स्वयं उतरकर उस सभामें आये। उनके चार भुजाएँ थीं। वनमालासे विभूषित पीताम्बरधारी सम्पूर्ण अलंकारोंकी शोभासे सम्पन्न तथा करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान श्रीमान् विष्णु बड़े मनोहर दिखायी देते थे। वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। मुने! उन्हें देखते ही सब लोग उठकर खड़े हो गये। सबने प्रणाम करके उनका स्तवन किया। तत्पश्चात् वे भी वहीं श्रीराधिकावल्लभ श्रीकृष्णके शरीरमें लीन हो गये। यह दूसरा महान् आश्चर्य देखकर उन सबको बड़ा विस्मय हुआ।

श्वेतद्वीपनिवासी श्रीविष्णुके श्रीकृष्णविग्रहमें विलीन हो जानेके बाद वहाँ तुरंत ही शुद्ध

६१- धर्म, ब्रह्मा तथा शिव आदि देवेश्वरगणद्वारा देवकीके गर्भमें स्थित परमेश्वरकी स्तुति

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४४१ स्फटिकमणिके समान गौरवर्णवाले संकर्षण नामक पुरुष पधारे। वे बड़ी उतावलीमें थे। उनके सहस्रों मस्तक थे तथा वे सौ सूर्योंके समान देदीप्यमान हो रहे थे। उनको आया देख सबने उन विष्णुस्वरूप संकर्षणका स्तवन किया। नारद! उन्होंने भी वहाँ आकर मस्तक झुकाकर राधिकेश्वरकी स्तुति की तथा सहस्रों मस्तकोंद्वारा भक्तिभावसे उनको प्रणाम किया। तत्पश्चात् धर्मके पुत्र-स्वरूप हम दोनों भाई नर और नारायण वहाँ गये। मैं तो श्रीकृष्णके चरणारविन्दमें लीन हो गया। किंतु नर अर्जुनके रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। फिर ब्रह्मा, शिव, शेष और धर्म—ये चारों वहाँ एक स्थानपर खड़े हो गये। इस बीचमें देवताओंने वहाँ दूसरा उत्तम रथ देखा, जो सुवर्णके सारतत्त्वका बना हुआ था और नाना प्रकारके रत्ननिर्मित उपकरणोंसे अलंकृत था। वह श्रेष्ठ मणियोंके सारतत्त्वसे संयुक्त, अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रसे सुसज्जित, श्वेत चँवर तथा दर्पणोंसे अलंकृत, सद्रत्न-सारनिर्मित कलश-समूहसे विराजमान, पारिजात-पुष्पोंके मालाजालसे सुशोभित, सहस्र पहियोंसे युक्त, मनके समान तीव्रगामी और मनोहर था। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक मार्तण्डकी प्रभाको तिरस्कृत करनेवाला वह श्रेष्ठ विमान मोती, माणिक्य और हीरोंके समूहसे जाज्वल्यमान जान पड़ता था। उसमें विचित्र पुतलियों, पुष्प, सरोवरों और काननोंसे उसकी अद्भुत शोभा हो रही थी। मुने! वह देवताओं और दानवोंके रथोंसे बहुत बड़ा था। भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये विश्वकर्माने यत्नपूर्वक उस दिव्य रथका निर्माण किया था। वह पचास योजन ऊँचा और चार योजन विस्तृत था। रतिशय्यासे युक्त सैकड़ों प्रासाद उसकी शोभा बढ़ाते थे। उस विमानमें बैठी हुई मूलप्रकृति ईश्वरी देवी दुर्गाको भी देवताओंने देखा, जो रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थीं और अपनी दिव्य दीप्तिसे तपाये हुए सुवर्णके सारभागकी प्रभाका अपहरण कर रही थीं। उन अनुपम तेजःस्वरूपा देवीके सहस्रों भुजाएँ थीं और उनमें भाँति-भाँतिके आयुध शोभा पा रहे थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हासकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये कातर दिखायी देती थीं। उनके गण्डस्थल और कपोल उत्तम रत्नमय कुण्डलोंसे उद्भासित हो रहे थे। रत्नेन्द्रसाररचित तथा मधुर झनकारसे युक्त मञ्जीरोंके कारण उनके चरणोंकी अपूर्व शोभा हो रही थी। श्रेष्ठ मणिनिर्मित मेखलासे मण्डित मध्यदेश अत्यन्त मनोहर दिखायी देता था। हाथोंमें श्रेष्ठ रत्नसारके बने हुए केयूर और कङ्कण शोभा दे रहे थे। मन्दार-पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत वक्षःस्थल अत्यन्त उज्ज्वल जान पड़ता था। शरत्कालके सुधाकरकी आभाको तिरस्कृत करनेवाले सुन्दर मुखसे उनकी मनोहरता और बढ़ गयी थी। काजलकी काली रेखासे युक्त नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल नील कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे थे। चन्दन, अगुरु तथा कस्तूरीद्वारा रचित चित्रपत्रक उनके भाल और कपोलको विभूषित कर रहे थे। नूतन बन्धुजीव-पुष्पके समान आभावाले लाल- लाल ओठके कारण उनके मुखकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। उनकी दन्तावली मोतियोंकी पाँतकी प्रभाको लूटे लेती थी। प्रफुल्ल मालतीकी मालासे अलंकृत वेणी धारण करनेवाली वे देवी बड़ी ही सुन्दर थीं। गरुड़की चोंचके समान नुकीली नासिकाके अग्रभागमें लटकती हुई गजमुक्ताकी बुलाक अपूर्व छटा बिखेर रही थी। अग्निशुद्ध एवं अत्यन्त दीप्तिमान् वस्त्रसे वे उद्भासित हो रही थीं और दोनों पुत्रोंके साथ सिंहकी पीठपर बैठी थीं। उस रथसे उतरकर पुत्रोंसहित देवीने शीघ्रतापूर्वक श्रीकृष्णको प्रणाम किया। फिर वे एक श्रेष्ठ आसनपर बैठ गयीं। इसके बाद गणेश और कार्तिकेयने परात्पर श्रीकृष्ण, शंकर, धर्म, संकर्षण तथा ब्रह्माजीको नमस्कार किया।

४४२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उन दोनों देवेश्वरोंको निकट आया देख वे सब देवता उठकर खड़े हो गये। उन्होंने आशीर्वाद दिया और दोनोंको अपने पास बिठा लिया। देवता बड़ी प्रसन्नताके साथ गणेश और कार्तिकेयके साथ उत्तम वार्तालाप करने लगे। उस समय देवता और देवी उस सभामें श्रीहरिके सामने बैठ गये। उन्हें देख बहुसंख्यक गोप और गोपियाँ आश्चर्यसे चकित हो रही थीं। तदनन्तर श्रीकृष्णके मुखारविन्दपर मुस्कराहट खेलने लगी। वे लक्ष्मीसे बोले—'सनातनी देवि! तुम नाना रत्नोंसे सम्पन्न भीष्मकके राजभवनमें जाओ और वहाँ विदर्भदेशकी महारानीके उदरसे जन्म धारण करो। साध्वी देवि! मैं स्वयं कुण्डिनपुरमें जाकर तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा।'

वे रमा आदि देवियाँ पार्वतीको देखकर शीघ्र ही उठकर खड़ी हो गयीं। उन्होंने ईश्वरीको रमणीय रत्न-सिंहासनपर बिठाया। विप्रवर नारद! पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती—ये तीनों देवियाँ परस्पर यथोचित कुशल-प्रश्न करके वहाँ एक आसनपर बैठीं। वे प्रेमपूर्वक गोप-कन्याओंसे वार्तालाप करने लगीं। कुछ गोपियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके निकट बैठ गयीं। इसी समय जगदीश्वर श्रीकृष्णने वहाँ पार्वतीसे कहा—'सृष्टि और संहार करनेवाली कल्याणमयी महामायास्वरूपिणी देवि! शुभे! तुम अंशरूपसे नन्दके ब्रजमें जाओ और वहाँ नन्दके घर यशोदाके गर्भमें जन्म धारण करो। मैं भूतलपर गाँव-गाँवमें तुम्हारी पूजा करवाऊँगा। समस्त भूमण्डलमें, नगरों और वनोंमें मनुष्य वहाँकी अधिष्ठात्री देवीके रूपमें भक्तिभावसे तुम्हारी पूजा करेंगे और आनन्दपूर्वक नाना प्रकारके द्रव्य तथा दिव्य उपहार तुम्हें अर्पित करेंगे। शिवे! तुम ज्यों ही भूतलका स्पर्श करोगी, त्यों ही मेरे पिता वसुदेव यशोदाके सूतिकागारमें जाकर मुझे वहाँ स्थापित कर देंगे और तुम्हें लेकर चले जायेंगे। कंसका साक्षात्कार होनेमात्रसे तुम पुनः शिवके समीप चली आओगी और मैं भूतलका भार उतारकर अपने धाममें आ जाऊँगा।'

[ऐसा कहकर तुरंत ही छः मुखवाले स्कन्दसे श्रीकृष्ण बोले]—वत्स सुरेश्वर! तुम अंशरूपसे भूतलपर जाओ और जाम्बवतीके गर्भसे जन्म ग्रहण करो। सब देवता अपने अंशसे पृथ्वीपर जायँ और जन्म लें। मैं निश्चय ही पृथ्वीका भार हरण करूँगा।

नारद! ऐसा कहकर राधिकानाथ श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठे। फिर देवता, देवियाँ, गोप और गोपियाँ भी बैठ गयीं। इसी बीचमें ब्रह्माजी श्रीहरिके सामने उठकर खड़े हो गये और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक उन जगदीश्वरसे बोले।

**ब्रह्माजीने कहा—**प्रभो! इस सेवकके निवेदनपर ध्यान दीजिये। महाभाग! आज्ञा कीजिये कि भूतलपर किसके लिये कहाँ स्थान होगा। स्वामी ही सदा सेवकोंका भरण-पोषण और उद्धार करनेवाला है। सेवक वही है जो सदा भक्तिभावसे प्रभुकी आज्ञाका पालन करता है। कौन देवता किस रूपसे अवतार लेंगे? देवियाँ भी किस कलासे अवतीर्ण होंगी? भूतलपर कहाँ किसका निवास-स्थान होगा? और वह किस नामसे ख्याति प्राप्त करेगा?

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर जगदीश्वर श्रीकृष्णने इस प्रकार उत्तर दिया।

**श्रीकृष्ण बोले—**ब्रह्मन्! जिसके लिये जहाँ स्थान होगा, वह विधिवत् बता रहा हूँ, सुनो। कामदेव रुक्मिणीके पुत्र होंगे तथा शम्बरासुरके घरमें जो छायारूपसे स्थित है, वह सती मायावतीके नामसे प्रसिद्ध रति उनकी पत्नी होगी। तुम उन्हीं रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके पुत्र होओगे और तुम्हारा नाम अनिरुद्ध होगा। भारती शोणितपुरमें जाकर बाणासुरकी पुत्री होगी। जगदीश्वर अनन्त देवकीके गर्भसे आकृष्ट हो

६२- भगवान् श्रीकृष्णका दिव्य रूप धारणकर देवकीके हृदय-कमलके कोशसे प्रकट होना तथा वसुदेवजीका अपनी पत्नी देवकीके साथ भक्तिभावसे उनकी स्तुति करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४४३

रोहिणीके गर्भसे जन्म लेंगे। मायाद्वारा उस गर्भका संकर्षण होनेसे उनका नाम 'संकर्षण' होगा। सूर्यतनया यमुना गङ्गाके अंशके साथ भूतलपर कालिन्दी नामवाली पटरानी होंगी। तुलसी आधे अंशसे राजकन्या लक्ष्मणाके रूपमें अवतीर्ण होंगी। वेदमाता सावित्री नग्नजित्की पुत्री सती सत्याके नामसे प्रसिद्ध होंगी। वसुधा सत्यभामा और देवी सरस्वती शैव्या होंगी। रोहिणी राजकन्या मित्रविन्दा होंगी। सूर्यपत्नी संज्ञा अपनी कलासे जगद्गुरुकी पत्नी रत्नमाला होंगी। स्वाहा एक अंशसे सुशीलाके रूपमें अवतीर्ण होंगी। ये रुक्मिणी आदि नौ स्त्रियाँ हुईं। इसके अतिरिक्त पार्वती अपने आधे अंशसे जाम्बवती होंगी। ये दस पटरानियाँ बतायी गयी हैं।

समस्त देवताओंके अंश भूतलपर जायँ। ब्रह्मन्! वे राजकुमार होकर युद्धमें मेरे सहायक बनेंगे। कमलाकी कलासे सोलह हजार राजकन्याएँ प्रकट होंगी, वे सब-की-सब मेरी रानियाँ बनेंगी। वे धर्मदेव अंशरूपसे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर होंगे। वायुके अंशसे भीमसेनका और इन्द्रके अंशसे साक्षात् अर्जुनका प्रादुर्भाव होगा। अश्विनीकुमारोंके अंशसे नकुल और सहदेव प्रकट होंगे। सूर्यका अंश वीरवर कर्ण होगा और साक्षात् यमराज विदुर होंगे। कलिका अंश दुर्योधन, समुद्रका अंश शान्तनु, शंकरका अंश अश्वत्थामा और अग्निका अंश द्रोण होगा। चन्द्रमाका अंश अभिमन्युके रूपमें प्रकट होगा। स्वयं वसु देवता भीष्म होंगे। कश्यपके अंशसे वसुदेव और अदितिके अंशसे देवकी होंगी। वसुके अंशसे नन्द-गोपका प्रादुर्भाव होगा। वसुकी पत्नी यशोदा होंगी। कमलाके अंशसे द्रौपदी होंगी, जिनका प्रादुर्भाव यज्ञकुण्डसे होगा। अग्निके अंशसे महाबली धृष्टद्युम्नका जन्म होगा। शतरूपाके अंशसे सुभद्रा होंगी, जिनका जन्म देवकीके गर्भसे होगा। देवतालोग भारहारी होकर अपने अंशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हों। इसी प्रकार देवपत्नियां भी अपनी कलासे भूतलपर पधारें।

नारद! ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो गये। वह सारा विवरण सुनकर प्रजापति ब्रह्मा वहाँ अपने स्थानपर जा बैठे। देवर्षे! श्रीकृष्णके वामभागमें वाग्देवी सरस्वती थीं। दाहिने भागमें लक्ष्मी थीं। अन्य सब देवता और पार्वतीदेवी सामने थीं। गोप और गोपियाँ भी उनके सम्मुख ही बैठी थीं। श्रीराधा श्यामसुन्दरके वक्षःस्थलमें विराजमान थीं। इसी समय व्रजेश्वरी राधा अपने प्रियतमसे बोलीं।

राधिकाने कहा—नाथ! मैं कुछ कहना चाहती हूँ। प्रभो! इस दासीकी बात सुनो। मेरे प्राण चिन्तासे निरन्तर जल रहे हैं, चित्त चञ्चल हो रहा है। तुम्हारी ओर देखते समय मैं पलभरके लिये आँख बंद करने या पलक मारनेमें भी असमर्थ हो जाती हूँ। फिर प्राणनाथ! तुम्हारे बिना भूतलपर अकेली कैसे जाऊँगी? प्राणेश्वर! जीवनबन्धो! सच बताओ, वहाँ गोकुलमें कितने कालके पश्चात् तुम्हारे साथ मेरा अवश्य मिलन होगा। तुम्हें देखे बिना एक निमेष भी मेरे लिये सौ युगोंके समान प्रतीत होगा। वहाँ मैं किसे देखूँगी? कहाँ जाऊँगी? और कौन मेरी रक्षा करेगा? प्राणेश! तुम्हारे सिवा दूसरे किसी पिता, माता, भाई, बन्धु, बहिन अथवा पुत्रका मैं क्षणभर भी चिन्तन नहीं करती हूँ। मायापते! यदि तुम भूतलपर मुझे भेजकर मायासे आच्छन्न कर देना चाहते हो, वैभव देकर भुलाना चाहते हो तो मेरे समक्ष सच्ची प्रतिज्ञा करो। मधुसूदन! मेरा मनरूपी मधुप तुम्हारे मकरन्दयुक्त चरणारविन्दमें ही नित्य-निरन्तर भ्रमण करता रहे। जहाँ-जहाँ जिस योनिमें भी मेरा यह जन्म हो, वहाँ-वहाँ तुम मुझे अपना स्मरण एवं मनोवाञ्छित दास्यभाव प्रदान करोगे। मैं भूतलपर कभी भी इस बातको न भूलूँ कि तुम मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण हो, मैं

४४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण तुम्हारी प्रेयसी राधिका हूँ तथा हम दोनोंका प्रेम सौभाग्य शाश्वत है। प्रभो! यह उत्तम वर मुझे अवश्य दो। जैसे शरीर छायाके साथ और प्राण शरीरके साथ रहते हैं, उसी प्रकार हम दोनोंका जन्म एवं जीवन एक-दूसरेके साथ बीते। विभो! यह श्रेष्ठ वर मुझे दे दो। भगवन्! भूतलपर पहुँचकर भी कहीं हम दोनोंका पलभरके लिये भी वियोग न हो। यह वर मुझे दो। हरे! मेरे प्राणोंसे ही तुम्हारा शरीर निर्मित हुआ है- मेरे प्राण तुम्हारे श्रीअङ्गोंसे विलग नहीं हैं। मेरी इस धारणाका कौन निवारण कर सकता है? मेरे शरीरसे ही तुम्हारी मुरली बनी है और मेरे मनसे ही तुम्हारे चरणोंका निर्माण हुआ है। तात्पर्य यह है कि मैं तुम्हारी मुरलीको अपना शरीर मानती हूँ और मेरा मन तुम्हारे चरणोंसे कभी विलग नहीं होता है। संसारमें कितने ही ऐसे स्त्री-पुरुष हैं, जो सामने एक-दूसरेकी स्तुति करते हैं; परंतु कहीं भी अपने प्रियतममें निरन्तर आसक्त रहनेवाली मुझ-जैसी प्रेयसी नहीं है। तुम्हारे शरीरके आधे भागसे किसने मेरा निर्माण किया है? हम दोनोंमें भेद है ही नहीं। अतः मेरा मन निरन्तर तुम्हींमें लगा रहता है। मेरी आत्मा, मेरा मन और मेरे प्राण जिस तरह तुममें स्थापित हैं, उसी तरह तुम्हारे मन, प्राण और आत्मा भी मुझमें ही स्थापित हैं। अतः विरहकी बात कानमें पड़ते ही आँखोंका पलक गिरना बंद हो गया है और हम दोनों आत्माओंके मन, प्राण निरन्तर दग्ध हो रहे हैं। श्रीकृष्ण बोले- देवि! उत्तम आध्यात्मिक योग शोकका उच्छेद करनेवाला होता है। अतः उसे बताता हूँ, सुनो। यह योग योगीन्द्रोंके लिये भी दुर्लभ है। सुन्दरि ! देखो, सारा ब्रह्माण्ड आधार और आधेयके रूपमें विभक्त है। इनमें भी आधारसे पृथक् आधेयकी सत्ता सम्भव नहीं है। फलका आधार है फूल, फूलका आधार है पल्लव, पल्लवका आधार है तना या डाली तथा उसका भी आधार स्वयं वृक्ष है। वृक्षका आधार अंकुर है, जो बीजकी शक्तिसे सम्पन्न होता है। उस अंकुरका आधार बीज है, बीजका आधार पृथ्वी है, पृथ्वीके आधार शेषनाग हैं। शेषके आधार कच्छप हैं, कच्छपका आधार वायु है और वायुका आधार मैं हूँ। मेरी आधारस्वरूपा तुम हो; क्योंकि मैं सदा तुममें ही स्थित रहता हूँ। तुम शक्तियोंका समूह और मूलप्रकृति ईश्वरी हो। शरीररूपिणी तथा त्रिगुणाधार-स्वरूपिणी भी तुम्हीं हो। मैं तुम्हारा आत्मा निरीह हूँ। तुम्हारा संयोग प्राप्त करके ही चेष्टावान् होता हूँ। शरीरके बिना आत्मा कहाँ? और आत्माके बिना शरीर कहाँ? देवि! शरीर और आत्मा दोनोंकी प्रधानता है। बिना दोके संसार कैसे चल सकता है? राधे! हम दोनोंमें कहीं भेद नहीं है; जहाँ आत्मा है, वहाँ शरीर है। वे दोनों एक-दूसरेसे अलग नहीं हैं। जैसे दूधमें धवलता, अग्निमें दाहिका शक्ति, पृथ्वीमें गन्ध और जलमें शीतलता है, उसी तरह तुममें मेरी स्थिति है। धवलता और दुग्धमें, दाहिका शक्ति और अग्निमें, पृथ्वी और गन्धमें तथा जल और शीतलतामें जैसे ऐक्य (भेदाभाव) है, उसी तरह हम दोनोंमें भेद नहीं है। मेरे बिना तुम निर्जीव हो और तुम्हारे बिना मैं अदृश्य हूँ। सुन्दरि ! तुम्हारे बिना मैं संसारकी सृष्टि नहीं कर सकता, यह निश्चित बात है। ठीक उसी तरह, जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घड़ा नहीं बना सकता और सुनार सोनेके बिना आभूषणोंका निर्माण नहीं कर सकता। स्वयं आत्मा जैसे नित्य है, उसी प्रकार साक्षात् प्रकृतिस्वरूपा तुम नित्य हो। तुममें सम्पूर्ण शक्तियोंका समाहार सञ्चित है। तुम सबकी आधारभूता और सनातनी हो*।

  • यथा क्षीरे च धावल्यं दाहिका च हुताशने । भूमौ गन्धो जले शैत्यं तथा त्वयि मम स्थितिः ॥ धावल्यदुग्धयोरैक्यं दाहिकानलयोस्तथा । भूगन्धजलशैत्यानां नास्ति भेदस्तथाऽऽवयोः ॥

६३- वसुदेवजीका नन्दगाँवमें पहुँचकर शय्यापर यशोदाजीको निद्रित अवस्थामें देखकर तुरंत ही पुत्र (श्रीकृष्ण)-को शय्यापर सुलाकर तथा उनके बदले सुवर्णके समान गौर कान्तिवाली एक बालिकाको गोदमें लेकर मथुराके लिये प्रस्थान करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४४५ लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, ब्रह्मा, शिव, शेषनाग और धर्म- ये सब मेरे प्राणोंके समान हैं; परंतु तुम मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्यारी हो। राधिके! ये सब देवता और देवियाँ मेरे निकट हैं; परंतु तुम यदि इनसे अधिक न होतीं तो मेरे वक्षः- स्थलमें कैसे विराजमान हो सकती थीं ? सुशीले राधे ! आँसू बहाना छोड़ो। साथ ही इस निष्फल भ्रमका परित्याग करो। शङ्का छोड़कर निर्भीक- भावसे वृषभानुके घरमें पधारो। सुन्दरि! नौ मासतक कलावतीके पेटमें स्थित गर्भको मायाद्वारा वायुसे भरकर रोके रहो। दसवाँ महीना आनेपर तुम भूतलपर प्रकट हो जाना। अपने दिव्य रूपका परित्याग करके शिशुरूप धारण कर लेना। जब गर्भसे वायुके निकलनेका समय हो, तब कलावतीके समीप पृथ्वीपर नग्न शिशुके रूपमें गिरकर निश्चय ही रोना। साध्वि ! तुम गोकुलमें अयोनिजा-रूपसे प्रकट होओगी। मैं भी अयोनिज-रूपसे ही अपने आपको प्रकट करूँगा; क्योंकि हम दोनोंका गर्भमें निवास होना सम्भव नहीं है। मेरे भूमिपर स्थित होते ही पिताजी मुझे गोकुलमें पहुँचा देंगे। वास्तवमें कंसके भयका बहाना लेकर मैं तुम्हारे लिये ही गोकुलमें जाऊँगा। कल्याणि ! तुम वहाँ यशोदाके मन्दिरमें मुझ नन्दनन्दनको प्रतिदिन आनन्दपूर्वक देखोगी और हृदयसे लगाओगी। राधिके ! मेरे वरदानसे तुम्हें समयपर मेरी स्मृति होगी और मैं तुम्हारे साथ वृन्दावनमें नित्य स्वच्छन्द विहार करूँगा। सुशीला आदि जो तैंतीस तुम्हारी सखियाँ हैं, उनके तथा अन्यान्य बहुसंख्यक गोपियोंके साथ तुम गोकुलको पधारो। असंख्य गोपियोंको अपने मृतोपम एवं परिमित वाणीद्वारा समझा-बुझाकर आश्वासन दे गोलोकमें ही रखकर तुम्हें गोकुलमें जाना है। राधिके ! मैं भी इन असंख्य गोपोंको यहीं स्थापित करके पीछेसे वसुदेवके निवासस्थान मथुरापुरीमें पदार्पण करूँगा। मेरे प्रिय-से-प्रिय गोप बहुत बड़ी संख्यामें मेरे साथ क्रीडाके लिये व्रजमें चलें और वहाँ गोपोंके घरमें जन्म लें। नारद ! यों कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। देवता, देवियाँ, गोप और गोपियाँ वहीं ठहर गयीं। ब्रह्मा, शिव, धर्म, शेषनाग, पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वतीने बड़ी प्रसन्नताके साथ परात्पर श्रीकृष्णका स्तवन किया। उस समय उनके विरहज्वरसे व्याकुल तथा प्रेम-विह्वल गोपों और गोपियोंने भी भक्तिभावसे वहाँ श्रीकृष्णकी स्तुति करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। विरह-ज्वरसे कातर हुई पूर्णमनोरथा राधाने भी अपने प्राणाधिक प्रियतम हृदयवल्लभ श्रीकृष्णका भक्तिभावसे स्तवन किया। उस समय श्रीराधाके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे। वे अत्यन्त दीन और भयसे व्याकुल दिखायी देती थीं। उन्हें इस अवस्थामें देख स्वयं श्रीहरिने सान्त्वना देनेके लिये यह सच्ची बात कही। श्रीकृष्ण बोले- प्राणाधिके महादेवि ! सुस्थिर होओ। भयका त्याग करो। जैसी तुम हो वैसा ही मैं हूँ। मेरे रहते तुम्हें क्या चिन्ता है? श्रीदामके शापकी सत्यताके लिये कुछ समयतक (बाह्यरूपमें) मेरे साथ तुम्हारा वियोग रहेगा। तदनन्तर मैं मथुरामें आ जाऊँगा। वहाँ भूतलका भार उतारना, माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाना, माली, दर्जी और कुब्जाका उद्धार करना, कालयवनको मरवाकर मुचुकुन्दको मोक्ष देना, द्वारकाका निर्माण, राजसूय- यज्ञका दर्शन, सोलह हजार एक सौ दस राजकन्याओंके साथ विवाह करना, शत्रुओंका दमन, मित्रोंका मया विना त्वं निर्जीवा चादृश्योऽहं त्वया विना। त्वया विना भवं कर्तुं नालं सुन्दरि निश्चितम् ॥ विना मृदा घटं कर्तुं यथा नालं कुलालकः । विना स्वर्णं स्वर्णकारोऽलंकारं कर्तुमक्षमः ॥ स्वयमात्मा यथा नित्यस्तथा त्वं प्रकृतिः स्वयम् । सर्वशक्तिसमायुक्ता सर्वधारा सनातनी ॥ ( श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६ । २१४-२१८)

४४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


उपकार, वाराणसीपुरीका दहन, महादेवजीको
जृम्भणास्त्रसे बाँधना, बाणासुरकी भुजाओंको काटना,
पारिजातका अपहरण, अन्यान्य कर्मोंका सम्पादन,
प्रभासतीर्थकी यात्रामें जाना, वहाँ मुनिमण्डलीका
दर्शन करना, ब्रजके बन्धुजनोंसे वार्तालाप, पिताके
यज्ञका सम्पादन, वहीं शुभ बेलामें पुनः तुम्हारे
साथ मिलन तथा गोपियोंका साक्षात्कार आदि
कार्य मुझे करने हैं। फिर तुम्हें अध्यात्मज्ञानका
उपदेश देकर वास्तवमें तुम्हारे साथ नित्य मिलनका
सौभाग्य प्राप्त करूँगा। इसके बाद मेरे साथ दिन-
रात तुम्हारा संयोग बना रहेगा। कभी क्षणभरके
लिये भी वियोग न होगा। इतना ही नहीं, वहाँसे
तुम्हारे साथ मेरा पुनः ब्रजमें आगमन होगा।
प्राणवल्लभे ! वियोगकालमें भी स्वप्नमें तुम्हारे साथ
मेरा सदैव मिलन होता रहेगा। तुमसे बिछुड़कर
द्वारकामें जानेपर मेरे और मेरे नारायणांशके द्वारा
उपर्युक्त कार्य सम्पादित होंगे। फिर वृन्दावनमें
तुम्हारे साथ मेरा निवास होगा। फिर माता-पिता
तथा गोपियोंके शोकका पूर्णतः निवारण होगा।
भूतलका भार उतारकर तुम्हारे और गोप-गोपियोंके
साथ मेरा पुनः गोलोकमें आगमन होगा। राधे !
मेरे अंशभूत जो नित्य परमात्मा नारायण हैं, वे
लक्ष्मी और सरस्वतीके साथ वैकुण्ठलोकको
पधारेंगे। धर्म और मेरे अंशोंका निवासस्थान
श्वेतद्वीपमें होगा। देवताओं और देवियोंके अंश
भी अक्षय धामको पधारेंगे। फिर इसी गोलोकमें
तुम्हारे साथ मेरा निवास होगा। कान्ते ! इस प्रकार
समस्त भावी शुभाशुभका वर्णन मैंने कर दिया।
मेरे द्वारा जो निश्चय हो चुका है, उसका कौन
निवारण कर सकता है?

तदनन्तर श्रीहरिने देवताओं और देवियोंसे
समयोचित बात कही—देवताओ ! अब तुमलोग
भावी कार्यकी सिद्धिके लिये अपने-अपने स्थानको
जाओ। पार्वति ! तुम अपने दोनों पुत्रों तथा
स्वामीके साथ कैलासको जाओ। मैंने जो कार्य
तुम्हारे जिम्मे लगाया है, वह सब यथासमय पूरा
होगा। ब्रजेश्वरि ! राधे ! गणेशजीको छोड़कर शेष
छोटे-बड़े सभी देवताओं और देवियोंका कलाद्वारा
भूतलपर अवतरण होगा।

तदनन्तर लक्ष्मी, सरस्वती तथा श्रीराधासहित
पुरुषोत्तम श्रीहरिको भक्तिभावसे प्रणाम करके
सब देवता आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानको
चले गये। श्रीहरिने जिस कार्यका आयोजन किया
था, उसे सफल बनानेके लिये वे व्यग्रतापूर्वक
भूतलपर पधारे; क्योंकि स्वामीका बताया हुआ
स्थान देवताओंके लिये भी दुर्लभ था।

श्रीकृष्णने राधासे कहा—प्रिये ! तुम
पूर्वनिश्चित गोप-गोपियोंके समुदायके साथ वृषभानुके
निवासगृहको पधारो। मैं मथुरापुरीमें वसुदेवके
घर जाऊँगा। फिर कंसके भयका बहाना बनाकर
गोकुलमें तुम्हारे समीप आ जाऊँगा।

लाल कमलके समान नेत्रोंवाली श्रीराधा
श्रीकृष्णको प्रणाम करके प्रेमविच्छेदके भयसे
कातर हो उनके सामने फूट-फूटकर रोने लगीं।
वे ठहर-ठहरकर कभी कुछ दूरतक जातीं और
जा-जाकर बार-बार लौट आती थीं। लौटकर
पुनः श्रीहरिका मुँह निहारने लगती थीं। सती
राधा शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी कान्तिसुधासे
पूर्ण प्रभुके मुखचन्द्रकी सौन्दर्य-माधुरीका अपने
निमेषरहित नेत्र-चकोरोंद्वारा पान करती थीं।
तदनन्तर परमेश्वरी राधा प्रभुकी सात बार परिक्रमा
करके सात बार प्रणाम करनेके अनन्तर पुनः
श्रीहरिके सामने खड़ी हुईं। इतनेमें ही करोड़ों
गोप-गोपियोंका समूह वहाँ आ पहुँचा। उन
सबके साथ श्रीराधाने पुनः श्रीकृष्णको प्रणाम
किया। तत्पश्चात् तैंतीस सखीस्वरूपा गोपकिशोरियों
और गोपसमूहोंके साथ सुन्दरी राधा श्रीहरिको
मस्तक झुकाकर भूतलके लिये प्रस्थित हुईं। वे
सब-के-सब श्रीहरिके बताये हुए स्थान नन्द-
गोकुलको गये। फिर राधा वृषभानुके घरमें और

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४४७ गोपियाँ अन्यान्य गोपोंके घरोंमें गयीं। गोप- उन्हें कंसने तत्काल मार डाला। इस तरह उनके गोपियोंसहित श्रीराधाके भूतलपर चले जानेपर छः पुत्रोंको उसने कालके गालमें डाल दिया। श्रीहरि भी शीघ्र ही वहाँ पहुँचनेके लिये उत्सुक देवकीका सातवाँ गर्भ शेषनागका अंश था, जिसे हुए। गोलोकके गोपों और गोपियोंसे बात करके योगमायाने खींचकर गोकुलमें निवास करनेवाली उन्हें अपने-अपने कामोंमें लगाकर मनकी गतिसे रोहिणीजीके गर्भमें स्थापित कर दिया। फिर वह चलनेवाले जगदीश्वर श्रीहरि मथुरामें जा पहुँचे। श्रीहरिकी आज्ञासे चली गयी। पहले देवकी और वसुदेवके जो-जो पुत्र हुए, (अध्याय ६) श्रीकृष्णजन्म-वृत्तान्त - आकाशवाणीसे प्रभावित हो देवकीके वधके लिये उद्यत हुए कंसको वसुदेवजीका समझाना, कंसद्वारा उसके छः पुत्रोंका वध, सातवें गर्भका संकर्षण, आठवें गर्भमें भगवान्‌का आविर्भाव - देवताओंद्वारा स्तुति, भगवान्‌का दिव्य रूपमें प्राकट्य, वसुदेवद्वारा उनकी स्तुति, भगवान्‌का पूर्वजन्मके वरदानका प्रसङ्ग बताकर अपनेको व्रजमें ले जानेकी बात बता शिशुरूपमें प्रकट होना, वसुदेवजीका व्रजमें यशोदाके शयनगृहमें शिशुको सुलाकर नन्द-कन्याको ले आना, कंसका उसे मारनेको उद्यत होना, परंतु वसुदेवजी तथा आकाशवाणीके कथनपर विश्वास करके कन्याको दे देना, वसुदेव- देवकीका सानन्द घरको लौटना नारदजीने पूछा- महाभाग ! श्रीकृष्णका जन्म- फलरूपसे ही उन्होंने श्रीहरिको पुत्ररूपसे प्राप्त वृत्तान्त महान् पुण्यप्रद और उत्तम है। वह जन्म, किया था। देवमीढ़द्वारा मारिषाके गर्भसे महान् मृत्यु और जराका नाश करनेवाला है। अतः आप पुरुष वसुदेवका जन्म हुआ। उनके जन्मकालमें इस प्रसङ्गको कुछ विस्तारके साथ बतलाइये। अत्यन्त हर्षसे भरे हुए देवसमुदायने आनक और वसुदेव किसके पुत्र थे और देवकी किसकी दुन्दुभि नामक बाजे बजाये थे। इसलिये श्रीहरिके कन्या थीं? देवकी और वसुदेव पूर्वजन्ममें कौन जनक वसुदेवको प्राचीन संत-महात्मा 'आनकदुन्दुभि' थे ? उनके विवाहका वृत्तान्त भी बताइये। अत्यन्त कहते हैं। यदुकुलमें आहुकके पुत्र श्रीमान् देवक क्रूर स्वभाववाले कंसने देवकीके छः पुत्रोंका वध हुए थे, जो ज्ञानके समुद्र कहे जाते हैं। उन्हींकी क्यों किया ? तथा श्रीहरिका जन्म किस दिन पुत्री देवकी थीं। यदुकुलके आचार्य गर्गने हुआ ? यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। आप वसुदेवके साथ देवकीका विधिपूर्वक यथोचित कृपापूर्वक कहिये। विवाहसम्बन्ध कराया था। देवकने विवाहके श्रीनारायणने कहा - महर्षि कश्यप ही लिये बहुत सामान एकत्र किये थे। उन्होंने उत्तम वसुदेव हुए थे और देवमाता अदिति देवकीके लग्नमें अपनी पुत्री देवकीको वसुदेवके हाथमें समर्पण रूपमें अवतीर्ण हुई थीं। पूर्वजन्मके पुण्यके कर दिया। नारद ! देवकने दहेजमें सहस्रों घोड़े,

४४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण सहस्रों स्वर्णपात्र, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सैकड़ों सुन्दरी दासियाँ, नाना प्रकारके द्रव्य, भाँति- भाँतिके रत्न, उत्तम मणि, हीरे तथा रत्नमय पात्र दिये थे। देवककी कन्या श्रेष्ठ रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित, सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमती, त्रिभुवनमोहिनी, धन्य, मान्य तथा श्रेष्ठ युवती थी। रूप और गुणकी निधि थी। उसके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी रहती थी। उसे रथपर बिठाकर वसुदेव जब प्रस्थान करने लगे, तब बहिनके विवाहमें हर्षसे भरा हुआ कंस भी उसके साथ चला। वह तत्काल देवकीके रथके निकट आ गया। इसी समय कंसको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—'राजेन्द्र! क्यों हर्षसे फूल उठे हो? यह सच्ची बात सुनो। देवकीका आठवाँ गर्भ तुम्हारी मृत्युका कारण होगा।' यह सुनकर महाबली कंसने हाथमें तलवार ले ली। दैवी वाणीपर विश्वास करके भयभीत और कुपित हो वह महापापी नरेश देवकीका वध करनेके लिये उद्यत हो गया। वसुदेवजी बड़े भारी पण्डित, नीतिज्ञ तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे। उन्होंने कंसको देवकीका वध करनेके लिये उद्यत देख उसे समझाना आरम्भ किया। वसुदेवजी बोले- राजन् ! जान पड़ता है तुम राजनीति नहीं जानते हो। मेरी बात सुनो। यह तुम्हारे लिये हितकर और यशस्कर है। साथ ही कलङ्कको दूर करनेवाली, शास्त्रोंद्वारा प्रतिपादित तथा समयके अनुरूप भी है। भूपाल ! यदि इसके आठवें गर्भसे ही तुम्हारी मृत्यु होनेवाली है तो इस बेचारीका वध करके क्यों अपयश लेते और अपने लिये नरकका मार्ग प्रशस्त करते हो ? जीवमात्रके वधसे ही न्यूनाधिक पाप होता है; परंतु ब्रह्महत्या बहुत बड़ा पातक है। स्त्रीका वध करनेसे मनुष्यको ब्रह्महत्याके समान पाप लगता है। विशेषतः यह तुम्हारी बहिन है। तुमसे पालित और पोषित होने योग्य है तथा तुम्हारी शरणमें आयी है। नरेश्वर ! इसका वध करनेपर तुम्हें सौ स्त्रियोंकी हत्याका पाप लगेगा। मनुष्य जप, तप, दान, पूजा, तीर्थदर्शन, ब्राह्मणभोजन और होमयज्ञ आदिका अनुष्ठान स्वर्ग (दिव्य सुख)-की प्राप्तिके लिये ही करता है। साधुपुरुष समस्त संसारको पानीके बुलबुले और स्वप्नकी भाँति निःसार एवं मिथ्या मानते और भयदायक समझते हैं। इसीलिये वे सदैव यत्नपूर्वक धर्मका अनुष्ठान करते हैं। यदुकुल-कमल-दिवाकर धर्मिष्ठ नरेश्वर ! अपनी इस बहिनको छोड़ दो; मारो मत। तुम्हारी राजसभामें कई प्रकारके विद्वान् हैं। तुम उन सबसे पूछो कि इसके विषयमें क्या करना चाहिये ? भाई ! इसके आठवें गर्भमें जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे हाथमें दे दूँगा। उससे मेरा क्या प्रयोजन है? अथवा ज्ञानिशिरोमणे ! जितनी भी संतानें होंगी, उन सबको मैं तुम्हारे हवाले कर दूँगा; क्योंकि उनमेंसे एक भी मुझे तुमसे अधिक प्रिय नहीं है। राजेन्द्र ! बहिनको जीवित छोड़ दो। यह तुम्हें बेटीके समान प्यारी है। तुमने इस छोटी बहिनको सदा मीठे अन्न-पान देकर पाल- पोसकर बड़ा किया है।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४४९ वसुदेवजीकी यह बात सुनकर राजा कंसने बहिनको छोड़ दिया। वसुदेवजी प्यारी पत्नीको साथ लेकर अपने घर गये। नारद ! देवकीके गर्भसे क्रमशः जो छः संतानें हुईं, उन्हें वसुदेवजीने कंसको दे दिया; क्योंकि वे सत्यसे बँधे हुए थे। कंसने क्रमशः उन सबको मार डाला। देवकीके सातवें गर्भके आनेपर कंसने भयके कारण उसकी रक्षाकी ओर विशेष ध्यान दिया। परंतु योगमायाने उस गर्भको खींचकर रोहिणीके पेटमें रख दिया। रक्षकोंने राजाको यह सूचना दी कि देवकीका सातवाँ गर्भ गिर गया। उसी गर्भसे भगवान् अनन्त प्रकट हुए, जो 'संकर्षण' नामसे प्रसिद्ध हुए। तदनन्तर देवकीका आठवाँ गर्भ प्रकट हुआ जो वायुसे भरा हुआ था। नवाँ मास व्यतीत होनेके पश्चात् दसवाँ मास उपस्थित होनेपर सर्वदर्शी भगवान्ने उस गर्भपर दृष्टिपात किया। समस्त नारियोंमें श्रेष्ठ देवी देवकी स्वयं तो रूपवती थीं ही, भगवान्के दृष्टिपात करनेपर तत्काल ही उनका सौन्दर्य चौगुना बढ़ गया। कंसने देखा, देवकीके मुख और नेत्र खिल उठे हैं। वह तेजसे प्रज्वलित हो योगमायाके समान दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रही है; मूर्तिमान् ज्योतिःपुञ्ज-सी दिखायी देती है। उसे देख असुरराज कंसको बड़ा विस्मय हुआ। उसने मन-ही-मन कहा- 'इस गर्भसे जो संतान होगी, वही मेरी मृत्युका कारण है' - ऐसा कहकर कंस यत्नपूर्वक देवकी और वसुदेवकी रखवाली करने लगा। उसने सात द्वारवाले भवनमें उन दोनोंको रख छोड़ा था। दसवें मासके पूर्ण होनेपर जब वह गर्भ वायुसे पूर्ण हो गया। तब सबसे निर्लिप्त रहनेवाले साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने देवकीके हृदय-कमलमें निवास किया। उस समय महामनस्वी वसुदेवने देवकीपर दृष्टिपात करके समझ लिया कि प्रसवकाल सन्निकट आ गया है। फिर तो वे भगवान् श्रीहरिका स्मरण करने लगे। रत्नमय प्रदीपसे युक्त उस परम मनोहर भवनमें उन्होंने तलवार, लोहा, जल और अग्निको लाकर रखा। मन्त्रज्ञ मनुष्य तथा भाई-बन्धुओंकी स्त्रियोंको भी बुला लिया। भयसे व्याकुल वसुदेवने विद्वान् ब्राह्मण तथा बन्धुओंको भी सादर बुला भेजा। इसी समय जब रातके दो पहर बीत गये, आकाशमें बादल घिर आये, बिजलियाँ चमकने लगीं, अनुकूल वायु चलने लगी तथा रक्षक निद्रित हो शय्यापर इस तरह निश्चेष्ट सो गये, मानो मरकर अचेत हो गये हों; तब धर्म, ब्रह्मा तथा शिव आदि देवेश्वरगण वहाँ आये तथा गर्भस्थ परमेश्वरकी स्तुति करने लगे। देवता बोले- भगवन् ! आप समस्त संसारकी उत्पत्तिके स्थान हैं, किंतु आपकी उत्पत्तिका स्थान कोई नहीं है। आप अनन्त, अविनाशी, निष्पाप, सगुण, निर्गुण तथा महान् ज्योतिःस्वरूप हैं। आप निराकार होते हुए भी भक्तोंके अनुरोधसे साकार बन जाते हैं। आपपर किसीका अंकुश या नियन्त्रण नहीं है। आप सर्वथा स्वच्छन्द, सर्वेश्वर, सर्वरूप तथा समस्त गुणोंके आश्रय हैं। आप संतोंको सुख देनेवाले, दुष्टोंको दुःख प्रदान करनेवाले, दुर्गमस्वरूप एवं दुर्जनोंके नाशक हैं। आपतक

४५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण तर्ककी पहुँच नहीं होती है। आप सबके आधार हैं। शङ्का और उपद्रवसे शून्य हैं। उपाधिशून्य, निर्लिप्त और निरीह हैं। मृत्युकी भी मृत्यु हैं। अपनी आत्मामें रमण करनेवाले पूर्णकाम, निर्दोष और नित्य हैं। आप सौभाग्यशाली और दुर्भाग्यरहित हैं तथा प्रवचनकुशल हैं। आपको रिझाना या लाँघना कठिन ही नहीं, असम्भव है। आपके निःश्वाससे वेदोंका प्राकट्य हुआ है; इसलिये आप उनके प्रादुर्भावमें हेतु हैं। सम्पूर्ण वेद आपके स्वरूप हैं। छन्द आदि वेदाङ्ग भी आपसे भिन्न नहीं हैं। आप वेदवेत्ता और सर्वव्यापी हैं। ऐसा कहकर देवताओंने बारंबार उनको प्रणाम किया। उन सबके नेत्रोंमें हर्षके आँसू छलक रहे थे। उन सबने फूलोंकी वर्षा की। जो पुरुष प्रातःकाल उठकर (मूल श्लोकमें कहे गये) बयालीस नामोंका पाठ करता है, वह श्रीहरिकी दृढ़भक्ति, दास्यभाव तथा मनोवाञ्छित फल पाता है*। भगवान् नारायण कहते हैं - इस प्रकार स्तुति सुनाकर देवतालोग अपने-अपने धामको चले गये। फिर जलकी वृष्टि होने लगी। सारी मथुरा नगरी निश्चेष्ट होकर सो रही थी। मुने ! वह रात्रि घोर अन्धकारसे व्यास थी। जब रातके सात मुहूर्त निकल गये और आठवाँ उपस्थित हुआ, तब आधी रातके समय सर्वोत्कृष्ट शुभ लग्न आया। वह वेदोंसे अतिरिक्त तथा दूसरोंके लिये दुर्ज्ञेय लग्न था। उस लग्नपर केवल शुभ ग्रहोंकी दृष्टि थी। अशुभ ग्रहोंकी नहीं थी। रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथिके संयोगसे जयन्ती नामक योग सम्पन्न हो गया था। मुने ! जब अर्धचन्द्रमाका उदय हुआ, उस समय लग्नकी ओर देख-देखकर भयभीत हुए सूर्य आदि सभी ग्रह आकाशमें अपनी गतिके क्रमको लाँघकर मीन लग्नमें जा पहुँचे। शुभ और अशुभ सभी वहाँ एकत्र हो गये। विधाताकी आज्ञासे एक मुहूर्तके लिये वे सभी ग्रह प्रसन्नतापूर्वक ग्यारहवें स्थानमें जाकर वहाँ सानन्द स्थित हो गये। मेघ वर्षा करने लगे। ठंडी-ठंडी हवा चलने लगी। पृथ्वी अत्यन्त प्रसन्न थी। दसों दिशाएँ स्वच्छ हो गयी थीं। ऋषि, मनु, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, देवता और देवियाँ सभी प्रसन्न थे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वराज और विद्याधरियाँ गीत गाने लगीं। नदियाँ सुखपूर्वक बहने लगीं। अग्निहोत्रकी अग्नयाँ प्रसन्नतापूर्वक प्रज्वलित हो उठीं। स्वर्गमें दुन्दुभियों और आनकोंकी मनोहर ध्वनि होने लगी। खिले हुए पारिजातके पुष्पोंकी झड़ी लग गयी। पृथ्वी नारीका रूप धारण करके स्वयं सूतिकागारमें गयी। वहाँ जय- जयकार, शङ्खनाद तथा हरिकीर्तनका शब्द गूँज रहा था। इसी समय सती देवकी वहाँ गिर पड़ीं। उनके पेटसे वायु निकल गयी और वहीं भगवान् श्रीकृष्ण दिव्यस्वरूप धारण करके देवकीके हृदयकमलके कोशसे प्रकट हो गये। उनका शरीर अत्यन्त कमनीय और परम मनोहर था। दो भुजाएँ थीं। हाथमें मुरली शोभा पा रही थी। कानोंमें

  • देवा ऊचुः - जगद्योनिरयोनिस्त्वमनन्तोऽव्यय एव च । ज्योतिःस्वरूपो ह्यनघः सगुणो निर्गुणो महान् ॥ भक्तानुरोधात् साकारो निराकारो निरंकुशः । स्वेच्छामयश्च सर्वेशः सर्वः सर्वगुणाश्रयः ॥ सुखदो दुःखदो दुर्गो दुर्जनान्तक एव च । निर्व्यूहो निखिलाधारो निःशङ्को निरुपद्रवः ॥ निरुपाधिश्च निर्लिप्तो निरीहो निधनान्तकः । आत्मारामः पूर्णकामो निर्दोषो नित्य एव च ॥ सुभगो दुर्भगो वाग्मी दुराराध्यो दुरत्ययः । वेदहेतुश्च वेदाश्च वेदाङ्गो वेदविद् विभुः ॥ इत्येवमुक्त्वा देवाश्च प्रणेमुश्च मुहुर्मुहुः । हर्षाश्रुलोचनाः सर्वे ववृषुः कुसुमानि च ॥ द्विचत्वारिंशन्नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् । दृढां भक्तिं हरेर्दास्यं लभते वाञ्छितं फलम् ॥ ( श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७। ५५-६१)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४५१ मकराकृति कुण्डल झलमला रहे थे। मुख मन्द हास्यकी छटासे प्रसन्न जान पड़ता था। वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये कातर-से दिखायी पड़ते थे। श्रेष्ठ मणि-रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित आभूषण उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे। पीताम्बरसे सुशोभित श्रीविग्रहकी कान्ति नूतन जलधरके समान श्याम थी। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे निर्मित अङ्गराग सब अङ्गोंमें लगा हुआ था। उनका मुखचन्द्र शरत्पूर्णिमाके शशधरकी शुभ्र ज्योत्स्नाको तिरस्कृत कर रहा था। बिम्बफलके सदृश लाल अधरके कारण उसकी मनोहरता और बढ़ गयी थी। माथेपर मोरपंखके मुकुट तथा उत्तम रत्नमय किरीटसे श्रीहरिकी दिव्य ज्योति और भी जाज्वल्यमान हो उठी थी। टेढ़ी कमर, त्रिभङ्गी झाँकी, वनमालाका शृङ्गार, वक्षमें श्रीवत्सकी स्वर्णमयी रेखा और उसपर मनोहर कौस्तुभमणिकी भव्य प्रभा अद्भुत शोभा दे रही थी। उनकी किशोर अवस्था थी। वे शान्तस्वरूप भगवान् श्रीहरि ब्रह्मा और महादेवजीके भी परम कान्त (प्राणवल्लभ) हैं। मुने! वसुदेव और देवकीने उन्हें अपने समक्ष देखा। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। वसुदेवजीने अपनी पत्नी देवकीके साथ अश्रुपूर्णनयन, पुलकितशरीर तथा नतमस्तक हो हाथ जोड़ भक्तिभावसे उनकी स्तुति की। वसुदेवजी बोले—भगवन्! आप श्रीमान् (सहज शोभासे सम्पन्न), इन्द्रियातीत, अविनाशी, निर्गुण, सर्वव्यापी, ध्यानसे भी किसीके वशमें न होनेवाले, सबके ईश्वर और परमात्मा हैं। स्वेच्छामय, सर्वस्वरूप, स्वच्छन्द रूपधारी, अत्यन्त निर्लिप्त, परब्रह्म तथा सनातन बीजरूप हैं। आप स्थूलसे भी अत्यन्त स्थूल, सर्वत्र व्याप्त, अतिशय सूक्ष्म, दृष्टिपथमें न आनेवाले, समस्त शरीरोंमें साक्षीरूपसे स्थित तथा अदृश्य हैं। साकार, निराकार; सगुण, गुणोंके समूह; प्रकृति, प्रकृतिके शासक तथा प्राकृत पदार्थोंमें व्याप्त होते हुए भी प्रकृतिसे परे विद्यमान हैं। विभो! आप सर्वेश्वर, सर्वरूप, सर्वान्तक, अविनाशी, सर्वाधार, निराधार और निर्व्यूह (तर्कके अविषय) हैं; मैं आपकी क्या स्तुति करूँ? भगवान् अनन्त (सहस्रों जिह्वावाले शेषनाग) भी आपका स्तवन करनेमें असमर्थ हैं। सरस्वतीदेवीमें भी वह शक्ति नहीं कि आपकी स्तुति कर सकें। पञ्चमुख महादेव और छः मुखवाले स्कन्द भी जिनकी स्तुति नहीं कर सकते, वेदोंको प्रकट करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा भी जिनके स्तवनमें सर्वदा अक्षम हैं तथा योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु गणेश भी जिनकी स्तुतिमें असमर्थ हैं; उन आपका स्तवन ऋषि, देवता, मुनीन्द्र, मनु और मानव कैसे कर सकते हैं? उनकी दृष्टिमें तो आप कभी आये ही नहीं हैं। जब श्रुतियाँ आपकी स्तुति नहीं कर सकतीं तो विद्वान् लोग क्या कर सकते हैं? मेरी आपसे इतनी ही प्रार्थना है कि आप ऐसे दिव्य शरीरको त्यागकर बालकका रूप धारण कर लें। जो मनुष्य वसुदेवजीके द्वारा किये गये इस स्तोत्रका तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह श्रीकृष्णचरणारविन्दोंकी दास्य-भक्ति प्राप्त कर

४५२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

लेता है। उसे विशिष्ट एवं हरिभक्त पुत्रकी प्राप्ति होती है। वह सारे संकटोंसे शीघ्र पार हो जाता और शत्रुके भयसे छूट जाता है*।

**भगवान् नारायण कहते हैं—**वसुदेवजीकी बात सुनकर भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर रहनेवाले प्रसन्नवदन श्रीहरिने स्वयं इस प्रकार कहा।

**श्रीकृष्ण बोले—**मैं तपस्याओंके फलसे ही इस समय तुम्हारा पुत्र हुआ हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो। तुम्हारा कल्याण होगा, इसमें संशय नहीं। पूर्वकालमें तुम तपस्वीजनोंमें श्रेष्ठ प्रजापति कश्यप थे और ये सुतपा माता अदिति तुम्हारे साथ थीं। तुमने अपनी इन तपस्विनी पत्नी अदितिके साथ तपस्याद्वारा मेरी आराधना की थी। वहाँ मुझे देखकर तुमने मेरे समान पुत्र होनेका वर माँगा और मैंने भी तुम्हें यह वर दिया कि मेरे समान पुत्रकी प्राप्ति होगी। तात! तुम्हें वर देकर मैंने मन-ही-मन विचार किया। फिर यह बात ध्यानमें आयी कि मेरे समान तो कोई त्रिभुवनमें है ही नहीं। इसलिये मैं स्वयं ही तुम्हारे पुत्रभावको प्राप्त हुआ। आप स्वयं कश्यपजी हैं और तपस्याके प्रभावसे इस समय मेरे पिता वसुदेव हुए हैं। ये उत्तम तपस्यावाली पतिव्रता देवमाता अदिति ही इस समय अपने अंशसे मेरी माता देवकीके रूपमें प्रकट हुई हैं। आप और माता अदितिसे ही मैं अंशतः वामनरूपमें अवतीर्ण हुआ था; किंतु इस समय आपके तपके फलसे मैं परिपूर्णतम परमात्मा ही पुत्ररूपमें प्रकट हुआ हूँ। महामते! तुम पुत्रभावसे या ब्रह्मभावसे जब मुझे पा गये हो तो अब निश्चय ही जीवन्मुक्त हो जाओगे। तात! अब तुम मुझे लेकर शीघ्र ही ब्रजमें चलो और यशोदाके घरमें मुझे रखकर वहाँ उत्पन्न हुई मायाको ले आओ तथा यहाँ अपने पास उसे रख लो। ऐसा कहकर श्रीहरि वहाँ तुरंत शिशुरूप हो गये।

श्यामल पुत्रको पृथ्वीपर नग्नभावसे सोया देख विष्णुकी मायासे मोहित हो वसुदेवजी सूतिकागारमें अपनी स्त्रीसे तन्द्रामें बोले—‘प्रिये! यह कैसा तेजःपुञ्ज है?’ ऐसा कह वसुदेवने पत्नीके साथ कुछ विचार करके बालकको गोदमें उठा लिया और उसे लेकर वे नन्द-गोकुलमें जा पहुँचे। वहाँ नन्दगाँवमें यशोदा नींदसे अचेत हो रही थीं। उन्होंने शय्यापर उन्हें निद्रित अवस्थामें देखा। साथ ही नन्दजी भी वहाँ नींदमें बेसुध हो रहे थे। वहाँ घरमें जो कोई भी प्राणी थे, सब सो गये थे। वसुदेवजीने देखा, तपाये हुए सुवर्णके समान गौर कान्तिवाली एक नग्न बालिका पड़ी-पड़ी घरकी छतकी ओर दृष्टिपात


*श्रीमन्तमिन्द्रियातीतमक्षरं निर्गुणं विभुम्। ध्यानासाध्यं च सर्वेषां परमात्मानमीश्वरम्॥
स्वेच्छामयं सर्वरूपं स्वेच्छारूपधरं परम्। निर्लिप्तं परमं ब्रह्म बीजरूपं सनातनम्॥
स्थूलात् स्थूलतरं व्याप्तमतिसूक्ष्ममदर्शनम्। स्थितं सर्वशरीरेषु साक्षिरूपमदृश्यकम्॥
शरीरवन्तं सगुणमशरीरं गुणोत्करम्। प्रकृतिं प्रकृतीशं च प्राकृतं प्रकृतेः परम्॥
सर्वेशं सर्वरूपं च सर्वान्तकरमव्ययम्। सर्वाधारं निराधारं निर्व्यूहं स्तौमि किं विभो॥
अनन्तः स्तवनेऽशक्तोऽशक्ता देवी सरस्वती। यं स्तोतुमसमर्थश्च पञ्चवक्त्रः षडाननः॥
चतुर्मुखो वेदकर्ता यं स्तोतुमक्षमः सदा। गणेशो न समर्थश्च योगीन्द्राणां गुरोर्गुरुः॥
ऋषयो देवताश्चैव मुनीन्द्रमनुमानवाः। स्वप्ने तेषामदृश्यं च त्वामेवं किं स्तुवन्ति ते॥
श्रुतयः स्तवनेऽशक्ताः किं स्तुवन्ति विपश्चितः। विहायैवं शरीरं च बालो भवितुमर्हसि॥
वसुदेवकृतं स्तोत्रं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। भक्तिदास्यमवाप्नोति श्रीकृष्णचरणाम्बुजे॥
विशिष्टपुत्रं लभते हरिदासं गुणान्वितम्। सङ्कटं निस्तरेत् तूर्णं शत्रुभीत्या प्रमुच्यते॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७। ८०—९०)

६५- बालक श्रीकृष्णको गोपीका प्रसन्नतापूर्वक देखना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४५३

कर रही है। उसके प्रसन्न मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उसे देखकर वसुदेवजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे तुरंत ही पुत्रको वहाँ सुलाकर कन्याको गोदमें ले डरते-डरते मथुराकी ओर गये

और अपनी पत्नीके सूतिकागारमें जा पहुँचे। वहीं उन्होंने उस महामायास्वरूपिणी बालिकाको सुला दिया। बालिका जोर-जोरसे रोने लगी। उसे देखकर देवकी थर्रा उठी। उस बालिकाने अपने रोनेकी आवाजसे ही रक्षकोंको जगा दिया। रक्षक शीघ्र उठकर खड़े हो गये और उस बालिकाको छीनकर कंसके निकट जा पहुँचे। देवकी और वसुदेव भी शोकसे विह्वल हो पीछे-पीछे गये। महामुने! बालिकाको देखकर कंसको अधिक प्रसन्नता नहीं हुई। उस रोती हुई बच्चीपर भी उसे दया नहीं आयी। वह क्रूरकर्मा असुर उस बालिकाको लेकर पत्थरपर दे मारनेके लिये आगे बढ़ा। उस समय वसुदेव और देवकीने बड़े आदरके साथ उससे कहा—'नृपश्रेष्ठ कंस! तुम नीतिशास्त्रमें निपुण विद्वान् हो; अतः हमारी सच्ची, नीतियुक्त तथा मनोहर बात सुनो। भैया! तुमने हमारे भाई-बन्धु होकर भी हम दोनोंके छः पुत्रोंका वध कर डाला, फिर भी तुम्हें दया नहीं आती! अब इस आठवें गर्भमें यह अबला बालिका प्राप्त हुई है। हमारी इस बच्चीको मारकर तुम्हें भूतलपर कौन-सा महान् ऐश्वर्य प्राप्त हो जायगा? क्या एक अबला युद्धके मुहानेपर तुम्हारी राज्यलक्ष्मीका हनन करनेमें समर्थ हो सकती है?' ऐसा कहकर वसुदेव और देवकी दोनों दुरात्मा कंसके सामने वहाँ फूट-फूटकर रोने लगे। कंस बड़ा ही निर्दय था। उसने उन दोनोंकी बातें सुनकर इस प्रकार उत्तर दिया।

कंस बोला—बहिन! मेरी बात सुनो। मैं तुम्हें समझाता हूँ। विधाता दैववश एक तिनकेके द्वारा पर्वतको धराशायी करनेमें समर्थ हैं। एक कीड़ेके द्वारा सिंह और व्याघ्रको तथा एक मच्छरके द्वारा विशालकाय हाथीको नष्ट कर सकते हैं। शिशुके द्वारा महान् वीरका, क्षुद्र जन्तुओंन्द्वारा विशालकाय प्राणीका, चूहेके द्वारा बिल्लीका और मेढकके द्वारा सर्पका वध करा सकते हैं। इस प्रकार विधाता जन्यके द्वारा जनकका, भक्ष्यके द्वारा भक्षकका, अग्निके द्वारा जलका और सूखे तिनकेके द्वारा अग्निका नाश करनेमें समर्थ हैं। एकमात्र द्विज जह्नुने सात